परमगुरु ब्रह्मर्षि श्री दादूदयाल जी महाराज की अनुभव वाणी

सोमवार, 13 फ़रवरी 2017

= विन्दु (२)९२ =

॥ दादूराम सत्यराम ॥
**श्री दादू चरितामृत(भाग-२)** 
लेखक ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥

**= विन्दु ९२ =**
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**= द्वितीय गंगादास को उपदेश =**
उन्हीं दिनों में एक दिन दूसरे गंगादास नामक ही व्यक्ति दादूजी का दर्शन करने करड़ाला में आए और प्रणाम करके सामने बैठ गये फिर अवसर देख कर बोले - स्वामिन् ! निरंजन ब्रह्म में मन लगने की क्या पहचान है ? तब दादूजी में कहा - 
"जब मन मृतक हो रहै, इन्द्रिय बल भागा । 
काया के सब गुण तजे, निरंजन लागा ॥" 
जब मन सांसारिक भोग - वासनाओं से रहित मृतकवत स्थिर हो जाता है - प्रारब्ध वेग बिना स्वयं अहंभाव से किसी में भी प्रवृत्त नहीं होता और इन्द्रियों का राजस, तामस निषिद्ध बल नष्ट हो जाता है । इस प्रकार ही शरीर के हिंसादिक संपूर्ण अशुभ कर्मों को त्याग कर जो निरंजनराम के ही चिन्तन में लगा रहता है, तब जानना चाहिये कि मन निरंजन ब्रह्म में लगा है । द्वितीय गंगादास दादूजी के उक्त वचन को सुनकर अति संतुष्ट हुआ और बोला - स्वामिन् ! मुझे भी अपना शिष्य बनाकर मेरा मन निरंजन ब्रह्म में लगाने की कृपा कीजिये । तब दादूजीने उनको अपना शिष्य बनाकर उक्त साधन द्वारा उनका मन निरंजन ब्रह्म में लगा दिया था । द्वितीय गंगादास भी दादूजी के से शिष्यों में ही हैं । 
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**= चतुर्भुज बणजारे का आना =** 
इन्हीं दिनों में लालदास नायक(बणजारों के मुखिया) का पुत्र चतुर्भुज बणजारा सांभर में अपनी बालद लेकर नमक लेने आया था । सांभर में उसने सुना कि मेरे पिता के गुरुदेव दादूजी महाराज आजकल करड़ाला ग्राम में विराजते हैं । तब उसने पूछा - करड़ाला सांभर से कितनी दूर है ? उत्तर मिला अधिक दूर नहीं है एक ही दिन में पहुँच सकते हो । फिर चतुर्भुज दादूजी के दर्शन करने करड़ाले आया और दादूजी का दर्शन करके परमानन्द में निमग्न हो गया । फिर सत्यराम बोलकर साष्टांग दंडवत प्रणाम की और हाथ जोड़े हुये कुछ जिज्ञासा लेकर दादूजी महाराज के सामने बैठ गया । तब दादूजी महाराज ने उसको उक्त प्रकार बैठे देखकर उसके अधिकार के अनुसार उसे उपदेश देने के लिये यह पद बोला - 

**= चतुर्भुज बणजारे को उपदेश =** 
"मन मैला मन ही से धोय, 
उनमनि लागे निर्मल होय ॥टेक॥
मन ही उपजे विषय विकार, 
मन ही निर्मल त्रिभुवन सार ॥१॥ 
मन ही दुविधा नाना भेद, 
मन हु समझे द्वै पख छेद ॥२॥ 
मन ही चंचल चहुँ दिशि जाय, 
मन ही निश्चल रह्या समाय ॥ ३ ॥ 
मन ही उपजे अग्नि शरीर, 
मन ही शीतल निर्मल नीर ॥४॥ 
मन उपदेश मन ही समझाय, 
दादू यहु मन उनमनि लाय ॥ ५ ॥ 
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मन को समाधि द्वारा स्वरूप में लगाने का उपदेश कर रहे हैं - 
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# पापों से मन मलीन हो गया है, उस मैल को मन के द्वारा ही पवित्र - निष्काम, कर्म करके धोओ । जब मन निर्मल होगा, तब समाधि में लगेगा व समाधि में लगकर ही परम निर्मल होगा । 

# कुसंग द्वारा मन में ही विषय - विकार उत्पन्न होते हैं और जब सत्संग द्वारा मन निर्विकार होकर निर्मल होता है, तब मन ही में त्रिभुवन के सार परमात्मा का ज्ञान होता है । 
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# भेदवादियों के संग से मनही में नाना भेद तथा दुविधा खड़ी होती है और अद्वैत वादियों के संग से मन में ही अभेद विचार उत्पन्न होकर द्वैत पक्ष का छेदन होता है । 
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# विषयों के संग से मन में ही चंचलता उत्पन्न होती है और वह चारों दिशाओं में गमन करता है तथा भगवद् ध्यान द्वारा मन ही निश्चल स्थिति में आकर प्रभु स्वरूप में समाया हुआ रहता है । 
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# प्रतिक्षण के कारण मन ही से शरीर में क्रोधाग्नि उत्पन्न होता है । अनुकूल परिस्थिति होने पर मन ही शरीर को शीतल करने वाला शान्ति रूप निर्मल जल उत्पन्न होता है । 
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# अतः मन को ही उपदेश करो, मन को ही सम्यक् समझाओ । इस मन को समाधि में लगा कर ही तुम परब्रह्म का साक्षात्कार कर सकोगे । 
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उक्त उपदेश को सुनकर चतुर्भुज बणजारे ने कहा - स्वामिन् ! मेरी यही इच्छा थी कि मैं भी पिताजी के समान ही आपका शिष्य होकर परब्रह्म के साक्षात्कार द्वारा अपना जीवन सफल करूं । सो आपने मेरी इच्छा पूर्ति का ही उपदेश देकर मुझे कृतार्थ किया है अर्थात् मेरी इच्छा के समान ही परब्रह्म के साक्षात्कार के साधन की पद्धति मुझे कृपा करके बता दी है । अब मुझे गुरु दीक्षा देकर अपना शिष्य भी बना लीजिये । तब दादूजी महाराज ने उसको दीक्षा देकर गुरु मंत्र(अविचल मंत्र) का उपदेश कर दिया फिर उसने सत्यराम बोलकर दादूजी महाराज को साष्टांग दंडवत प्रणाम करके जाने की आज्ञा माँगी । तब दादूजी महाराज ने कहा - अच्छा जाओ और मन लगाकर ब्रह्म भजन करना । उसने कहा - आपके उक्त उपदेश के समान ही आपका यह शिष्य करेगा । 
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चतुर्भुज करड़ाले से चलकर साँभर आ गया और अपने साथियों के साथ अपने देश पूर्व में चला गया । देश में पहुँचकर उसने अपना व्यापार आदि कारबार सब छोड़ दिया और परम विरक्त बन गया और रामपुर को अपना साधन धाम बनाकर दादूजी के उक्त उपदेश के अनुसार साधन करके वह पूर्ण सिद्धावस्था को प्राप्त हो गया था । ये चतुर्भुज दादूजी के ५२ शिष्यों में हैं । ये पूर्व में प्रसिद्ध संत हुये हैं । इनके परिवार के लोग भी संतों के सेवक के रूप में रहे हैं, वे सब संतों की सेवा करते हुये निरंजन ब्रह्म का ही भजन करते थे और चतुर्भुज के उपदेशानुसार परोपकार भी करते थे । उक्त प्रकार चतुर्भुज अपने पिता के समान ही दादूजी के शिष्य होकर सिद्धावस्था को प्राप्त हुये थे । 
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# इस समय बौंली वाले जैमल चौहान और कृष्णदास दादूजी के साथ करड़ाले में ही थे । 
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# श्यामदासजी के शिष्य प्रहलाद दादूजी की सेवा में तत्पर रहते थे । 
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# गुरु मर्यादा का पूर्ण रूप से पालन करने वाले पीपाजी भी पास ही थे और सच्चे बड़भागी मोहनदासजी भी करड़ाला में ही थे । 
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ये सब ही हरि - स्मरण में अनुराग रखने वाले थे और शिष्य के तथा संत के सुन्दर लक्षणों से संपन्न थे । उक्त सभी दादूजी के शिष्य भजन - ध्यान में तल्लीन रहते थे । एक वर्ष करड़ाला में निवास करने के पश्चात् दादूजी ने मोरड़ा पधारने का विचार किया फिर करड़ाले के भक्तों को संतुष्ट करके वहां से प्रस्थान किया । 
(क्रमशः)

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