परमगुरु ब्रह्मर्षि श्री दादूदयाल जी महाराज की अनुभव वाणी

शुक्रवार, 17 फ़रवरी 2017

= ८१ =

卐 सत्यराम सा 卐
दह दिशि फिरै सो मन है, आवै जाय सो पवन ।
राखणहारा प्राण है, देखणहारा ब्रह्म ॥ 
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साभार ~ Chetna Kanchan Bhagat

**●● ईश्वर अभी और यहीं है ●●**

रामतीर्थ एक छोटी सी कहानी कहा करते थे। 
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वे कहते थे एक बड़ा नास्तिक था। उस नास्तिक ने अपनी दीवाल पर एक वचन लिख रखा था, ‘गाड इज नोव्हेयर।’ 
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फिर उसको एक बच्चा हुआ। और बच्चे ने भाषा सीखनी शुरू की और बच्चे को अभी बड़े अक्षर पढ़ने कठिन थे, छोटे-छोटे अक्षर तोड़त्तोड़ कर बच्चा पढ़ता था। 
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तो एक दिन बच्चा पढ़ रहा था दीवाल पर लिखे अक्षर को, तो ‘नो व्हेयर’ बड़ा अक्षर था, तो उसे बच्चे ने तोड़ कर पढ़ा: ‘गाड इज नाउ हीअर’।
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नोव्हेयर को दो हिस्सों में तोड़ लिया। वह नास्तिक बड़ा हैरान हुआ। क्योंकि उसने दीवाल पर इसीलिए रख छोड़ा था ताकि हर आदमी देखे और समझे कि परमात्मा कहीं भी नहीं है। और यह उसने कभी सोचा ही नहीं था कि अपना ही बेटा, उसमें से बिलकुल उलटी बात पढ़ेगा। उस बेटे ने पढ़ा: गाड इज नाऊ हीयर। अभी और यहीं है। 
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नोव्हेयर और एवरीव्हेयर–कहीं भी नहीं और सब कहीं, एक ही अर्थ रखते हैं। परमात्मा को तुम अगर खोजने जाओ कहीं, तो नहीं पाओगे। उंगली से उसे बताया नहीं जा सकता। क्योंकि उंगली से केवल वे ही चीजें बताई जा सकती हैं जिनका आकार है, रूप है। इसलिए ज्ञानी मुट्ठी बांध कर उसे बताते हैं। उंगली से तो वस्तु बताई जा सकती है, खंड, अंश। उंगली का मतलब होगा, यहां है। लेकिन फिर शेष जगह का क्या होगा? वह सब जगह है।
(ओशो)

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