शनिवार, 11 फ़रवरी 2017

= लै का अंग =(७/१०-१२)

卐 सत्यराम सा 卐 
**श्री दादू अनुभव वाणी** टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥ 
**= लै का अँग ७ =** 
सहज शून्य मन राखिये, इन दोनों के माँहि । 
लै समाधि रस पीजिये, तहां काल भय नाँहि ॥१०॥ 
अष्टाँग योग समाधि और लय रूप पराभक्ति, इन दोनों साधनों में स्थित होकर अपने मन को सहज शून्य रूप ब्रह्म में ही रखो और लय रूप पराभक्ति तथा निर्विकल्प समाधि द्वारा ब्रह्मानन्द - रस का पान करो । समाधि में सहज शून्य ब्रह्म में मन की स्थिति के समय मृत्यु का भी भय नहीं रहता, अन्य भय की तो बात ही क्या ? समाधि के समय मृत्यु का कुछ भी जोर नहीं चलता किन्तु समाधि खुलने पर मृत्यु का भय होता है और प्राणपिंड का वियोग ही हो जाता है तथापि लयरूप पराभक्ति में मृत्यु का सर्वथा ही भय नहीं रहता, कारण, पराभक्ति का साधक ज्ञान द्वारा अपने को मृत्यु के ग्रास शरीर से भिन्न ब्रह्मरूप मानता है । अत: काल से सर्वथा निर्भय रहता है । यही लय रूप पराभक्ति की विशेषता है । 
*सूक्ष्म मार्ग* 
किहिं मारग ह्वै आइया, किहिं मारग ह्वै जाइ । 
दादू कोई ना लहै, केते करैं उपाइ ॥११॥ 
११ - १३ में सूक्ष्म मार्ग विषयक विचार कर रहे हैं - प्रश्न - सँत लय योग में किस साधन द्वारा आता है और लय योग से ब्रह्म में किस साधन द्वारा पहुंचता है ? हम कितने ही साधारण साधक इसके जानने का उपाय करते हैं किन्तु हमारे में से कोई भी नहीं जान पाया है । 
शून्य हि मारग आइया, शून्य हि मारग जाइ । 
चेतन पैंडा सुरति का, दादू रहु ल्यौ लाइ ॥१२॥ 
११ में स्थित प्रश्न का उत्तर दे रहे हैं - अखिल अनात्मकार वृत्तियों से मन को शून्य करना रूप साधन से साधक ब्रह्माकार वृत्ति रूप लय योग में आता है और सर्व प्रपँच शून्य चेतन स्थिति रूप साधन से सहजावस्था में जाकर ब्रह्म से अभेद हो जाता है । चेतन ब्रह्म में अभेद होने के लिये, अखण्ड ब्रह्माकार वृत्ति का साधन - मार्ग ही श्रेष्ठ है । अत: वृत्ति को निरन्तर ब्रह्म में ही लगाकर स्थिर रहो ।
(क्रमशः)

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें