॥ दादूराम सत्यराम ॥
**श्री दादू चरितामृत(भाग-२)**
लेखक ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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**= विन्दु ९३ =**
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**= राजा नारायणसिंह के भाइयों का आना =**
राजा प्रणाम करके राज महल को चले गये । राजा ने अपने अन्य १५ भाइयों को भी दादूजी के नारायणा पधारने की सूचना पहले ही दे दी थी । इस से वे भी दर्शनार्थ आने लगे थे । वे १५ ये थे ~
१. राघवदासजी(गिधाणी) इन को रायमल भी कहते थे ।
२. वैरीसालजी(दुर्जनसाल) (गुढ़ा), ३. मनोहरदास(मंढ़ा)
४. हमीर सिंह(धांदोली), ५. भाकर सिंह(साखूणा)
६. बाघ सिंह(कालक), ७. किशनसिंह(कैर्या)
८. अमरसिंह(साली), ९. केशवदास(आकोदा)
१०. गैंदीदास(आदरवा), ११. तिलोकदास(ममाणा)
१२. उदयसिंह, १३. सांवलदास, १४. भींवराज, १५. भोजराज, थे ।
इन में भाकरदास, राघवदास आदि कई तो दादूजी में अत्यधिक श्रद्धा पहले से ही रखते थे । दूसरे दिन और तीसरे दिन बाहर से उक्त सज्जनों के आने के कारण तथा आस पास की जनता के आने के कारण मंदिर में बहुत भीड़ रही । दूसरी बात यह थी कि - मंदिर की दीवारों पर बाहर भीतर मन को लुभाने वाले सुन्दर चित्र बने हुये थे । साधारण जनता अधिकतर उन चित्रों को देखते हुये कोलाहल करती थी । रघुनाथजी का दर्शन तो उन चित्रों के कारण लोग बहुत कम कर पाते थे, प्रायः चित्रों को ही अधिक देखते थे । रघुनाथजी के दर्शन में तथा भक्ति में चित्र बाधक ही थे । यद्यपि जनता इस समय दादूजी के दर्शनार्थ ही अधिक आती थी किन्तु चित्रों को देखने में अधिक कोलाहल करने से दादूजी के भजन में भी विघ्न पड़ता था । अतः इस परिस्थिति को देखकर दादूजी महाराज के मुख कमल से ये दो पद निकले -
**= ईश्वर दर्शन तथा भजन बाधक निवृत्ति हित प्रार्थना =**
**= प्रथम पद =**
"गोविन्दा जोइबा दे रे,
जे बरजैं ते वार रे, गोविन्दा जोइबा दे रे ।
आदि पुरुष तू अछय हमारो, कंत तुम्हारी नारी रे ॥टेक॥
अंगैं संगैं रंगै रमिये, देवा दूर न कीजे रे ।
रस मांहीं रस इमि थइ रहिये, ये सुख अमने दीजे रे ॥ १ ॥
सेजड़िये सुख रँग भर रमिये, प्रेम भक्ति रस लीजे रे ।
एक मेक रस केलि करंतां, अम्हे अबला इमि जीजे रे ॥ २ ॥
समर्थ स्वामी अन्तरयामी, बार बार काँइ बाहे रे ।
आदैं अतैं तेज तुम्हारो, दादू देखे गाये रे ॥ ३ ॥"
हे गोविन्द ! जनता को आप अपने दर्शन करने दीजिये और जो आपके दर्शनों में विघ्न ये चित्र हैं, इनको दूर कीजिये । आप अक्षय आदि - पुरुष हमारे स्वामी हैं, हम सब जीव आपकी नारी हैं । हे देव ! आपके स्वरूप के साथ प्रेम - रंग द्वारा रमण करें ऐसी इच्छा है, आप हमें अपने से दूर न करें । जैसे रस में रस मिल जाता है, वैसे ही आपके स्वरूप में मिलकर रहें । यह परमानन्द हमें प्रदान करें, वृत्ति को प्रेम - रंग से भर - कर हृदय - शय्या पर सुख पूर्वक आपसे रमण करते हुये प्रेमाभक्ति रस को ग्रहण कर सकें और जल में मच्छी के समान आपके स्वरूप में रहकर परमानन्द का उपयोग करते हुये रहें । हम अबला इस प्रकार ही जीवित रहें ऐसी कृपा करें । हे समर्थ स्वामिन् ! आप तो अन्तर्यामी हैं फिर भी हमें बारंबार क्यों बहका रहे हैं ? जो संसार के आदि से अन्त तक एक रस तेजोमय आपका शुद्ध स्वरूप है, उसी का साक्षात्कार करते हुये आपके नाम और गुणों का गायन करते रहैं, ऐसी कृपा करें ।
(क्रमशः)

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