॥ दादूराम सत्यराम ॥
**श्री दादू चरितामृत(भाग-२)**
लेखक ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
**= विन्दु ९२ =**
**= लालदास नागाजी का आना =**
एक दिन करड़ाले में एक लालदास नागा नामक सज्जन दादूजी का दर्शन करने आये और प्रणाम करके सामने बैठ गये फिर अवकाश देखकर दादूजी से पूछा - स्वामिन् ! ब्रह्म साक्षात्कार के साधन की कोई सीमा है क्या ? कितना साधन करने से कितने दिन में साक्षात्कार होता है ? तब दादूजी ने उनको समझाने के लिये यह साखी सुनाई -
**= लालदास नागाजी के प्रश्न का उत्तर =**
"दादू निभहै त्यों चले, धीरैं धीरज मांहिं ।
परसेगा पिव एकदिन, दादू थाके नांहिं ॥"
जिस साधक से जितना निभ सके उतना उतना ही साधन धैर्य पूर्वक शनैः शनैः उसे करते हुये उस में आगे बढ़ते चलना चाहिये । यदि साधक उक्त प्रकार से अपने साधन को साधन सिद्धि से पहले थक कर त्यागेगा नहीं तब तो ज्ञान प्राप्ति द्वारा एक दिन अवश्य ब्रह्म का साक्षात्कार कर सकेगा । अपने उक्त प्रश्न का उत्तर सुनकर लालदास नागाजी ने कहा - भगवन् ! मैं आप का नाम सुनकर आपके दर्शन करने आया था, मुझे आप के दर्शन होते ही अति शाँति मिली है और मेरे प्राह्न का उत्तर भी आपने अति सरलता से दिया है । अतः मेरी प्रार्थना है - मुझे आप अपने शिष्य बनाकर अपनी साधन पद्धति द्वारा मेरे को ब्रह्म साक्षात्कार कराने की कृपा अवश्य करैं । तब दादूजी ने उनको शिष्य बनाकर निरंजन ब्रह्म की भक्ति में लगा दिया । फिर वे अपने साधन की पूर्णा - वस्था में कृतार्थ हो गये थे । लालदास नागाजी दादूजी के सौ शिष्यों में हैं ।
फिर एक दिन करड़ाला में एक गंगादास नामक सज्जन दादूजी का दर्शन करने आये और नमस्कार कर के सामने बैठ गये फिर अवकाश देख कर बोले - भगवन् ! अज्ञान निद्रा से जागने की क्या पहचान है ? दादूजी ने कहा -
**= गंगादास के प्रश्न का उत्तर =**
"आदि अंत मधि एक रस, टूटे नहिं धागा ।
दादू एकै रह गया, तब जाणी जागा ॥"
साधन आरंभ काल से लेकर मध्य में कहीं किसी हेतु को पाकर अपने साधन का तार टूटे नहीं, अन्ततक लगातार एक रस चलता रहे तथा साधन करते करते अद्वैत ब्रह्म में स्थिर होकर सांसारिक भावनाओं में जाने से रुक जाय, तब जानना चाहिये - वह अज्ञान निद्रा से जागकर अपने वास्तव स्वरूप में स्थिर हुआ है । गंगादास अपने प्रश्न का उत्तर सुनकर अति प्रसन्न हुये और बोले - स्वामीजी महाराज ! मुझे भी अपना शिष्य बनाकर अज्ञान निद्रा से जगाइये और अपने वास्तव स्वरूप में स्थिर कीजिये । मैं आप की शरण हूँ । उक्त कृपा मुझपर अवश्य कीजिये । तब दादूजी ने गंगादास को अपना शिष्य बनाकर ज्ञान द्वारा अज्ञान निद्रा से जगाने का उपदेश करके निरंतर भजन में मन लगाने का उपदेश किया । फिर उसकी अज्ञान निद्रा नष्ट होगई और वृत्ति आत्म स्वरूप में ही स्थिर रहने लगी थी । गंगादास दादूजी के सौ शिष्यों में हैं ।
(क्रमशः)

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