परमगुरु ब्रह्मर्षि श्री दादूदयाल जी महाराज की अनुभव वाणी

रविवार, 12 फ़रवरी 2017

= ७१ =

卐 सत्यराम सा 卐
दादू मन सुध साबित आपणा, निश्चल होवे हाथ ।
तो इहाँ ही आनन्द है, सदा निरंजन साथ ॥ 
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साभार ~ Ramgopal Goyal Rotiram

**"सत्संग पियूष"** 
शास्त्र व सन्त कहते हैं कि इस लौकिक - भौतिक तन और धन की सुन्दरता और आकर्षण तो क्षणिक व अस्थायी हैं । ये तो हर दिन और हरपल बदलते रहे हैं, बदल रहे हैं और बदलते ही रहेंगे । हम मनुष्यों के पास केवल एक मन ही एक ऐसी निधि है, जो कि बहुत जल्दी नहीं बदलता । अगर हम सावधान रह कर अपने मन को एक बार अपना हितैषी बना लें तो, हमारा यही अंत तक हमारा हित साधता रहेगा और अगर अविवेक का आश्रय ले लिया तो अगर असम्भव नहीं तो फिर इसे अपने अनुकूल बना पाना बहुत ही मुश्किल है, फिर तो यह मन जीव लिए लिए नर्क के रास्ते खोल कर तैयार बैठा मिलता है । इसलिए कहा जाता है कि हमारे पास जो मन है, उसकी निर्मलता पर हमेशा हमारा ध्यान रहना चाहिए । देखने में यही आता है कि बाद में मन को बदल पाना सम्भव नहीं हो पाता । यह तन और धन💰 के समान जल्दी से बदलता नहीं । जिसका मन बुरा व कलुषित है, उसका अंत तक बुरा और कलुषित ही रहता है और जिसका निर्मल व सात्विक है, उसका अंत तक निर्मल व सात्विक रह कर उसका हितैषी बना रहता है । 
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इसीलिए तो सन्तों के हृदय के बारे में कहा गया है । चूँकि सद् सन्त इस मामले में सावधान रहते हैं, इसलिए कभी - कभी दुष्टों से पाला पड जाने जाने के बावजूद भी वे अपने मन में कलुष नहीं आने देते न अपना धर्म(स्वभाव) छोडते हैं । उदाहरण के लिए, आपने वह प्रसंग सुना ही होगा कि जब एक सन्त एक बहते हुए बिच्छू को बचाने के प्रयास में बार - बार उस बिच्छू के डंक के शिकार हो रहे थे तो, एक राहगीर के जिज्ञासा करने पर उन सन्त ने यही तो कहा था कि जब यह बिच्छू तक अपना स्वभाव नहीं छोड रहा तो, मैं तो सन्त हूँ, मेरे मन में तो किसी के अहित की बात आती ही नहीं, फिर मुझसे यह उम्मीद कैसे ? की जा सकती है कि मैं अपने मन को मैला करलूँ और इसे बह जाने दूँ । मेरे मन में तो दया और करुणा के अलावा कुछ और है ही नहीं । 
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इसीलिए संत और सारे शास्त्र हम संसारियों को बार - बार आगाह करते हैं कि मन के मामले में बचपन से ही विशेष ध्यान दो । सुन्दर तन और अकूत धन जीव की कोई खास बडी उपलब्धि नहीं है । बड़ी उपलब्धि तो उसका मन निर्मल होना है । क्योंकि तन और धन की प्राप्ति तो जीव को उसके प्रारब्ध के कारण हो जाती है । उसमें उसका पुरुषार्थ कोई खास काम नहीं करता । धन प्राप्ति में जीव अपने स्तर पर स्वतंत्र नहीं है, लेकिन मन के मामले में जीव स्वतंत्र है । मन पर प्रारब्ध का कोई जोर नहीं होता । इसलिए अगर जीव चाहे तो अपने मन को अपने हिसाब से ढाल सकता है, और अपने उज्ज्वल भविष्य की नींव इसी जन्म में डाल सकता है । निर्मल मन तो उस मंदिर के समान होता है, जिसकी कि तलाश भगवान को भी रहती है कि, कोई निर्मल मन वाला महापुरुष मिल जाए तो, मैं जाकर उसके हृदयासन पर अपना आसन लगा लूँ, और उसके निर्मल भावों का रसास्वादन करूँ।
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(संत तुलसीदास जी लिखा है) 
निर्मल मन जन सो मोहि भावा,
मोहि कपट छल छिद्र न भावा । 
संत और शास्त्र तो यहां तक कहते हैं कि, संसार में धन - सम्पदा और सुन्दरता से सम्पन्न, व्यक्ति मिल जाना जितना अधिक आसान व सुलभ है, निर्मल मन वाले व्यक्ति का मिलना उतना ही दुर्लभ । लाखों करोडों में कोई इक्का - दुक्का ही, व्यक्ति ऐसा दिखलाई देता है, जिसने कि अपने मन को, रागाद्वेष व काम - क्रोध से बचा कर रखा हो, और अपने कल्याण का मार्ग प्रशस्त कर लिया हो, जिसको कि भगवान ने अपने लिए रहने के लिए चुना हो, जैसे कि मीरा - सूरदास - नरसी - कबीर, और तुलसी का देख कर चुना .
मन प्रसन्न हो, स्वस्थ तन, इच्छा होंय समाप्त।
तब ही भक्ति हो सके, तभी हरि हों प्राप्त ॥
जब तक मन में मैल है, नहीं सम्भव दोनों काम। 
मैले मन को मैल ही, रुचता "रोटीराम" ॥
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यह मानव जन्म हमको चौरासी लाख यौनियां भोग कर मिला है, इसके मिलने का हेतु भोग नहीं वल्कि भजन है । भोगों के लिए तो पशुयोनि होती है ।

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