बुधवार, 22 फ़रवरी 2017

= निष्कामी पतिव्रता का अंग =(८/१९-२१)

#daduji
卐 सत्यराम सा 卐
**श्री दादू अनुभव वाणी** टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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**= निष्कामी पतिव्रता का अँग ८ =**
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सब सुख मेरे साँइयाँ, मँगल अति आनन्द । 
दादू सज्जन सब मिले, जब भेंटे परमानन्द ॥ १९ ॥ 
भगवान् ही मेरे सँपूर्ण साँसारिक सुख हैं । मँगलमय भगवान् ही मेरे उत्तम लोकों का अति आनन्द हैं । जब परमानन्द रूप ब्रह्म से मिलन होता है तब सभी दैवी गुण रूप सज्जनों का मिलन भी आप ही हो जाता है । 
दादू रीझे राम पर, अनत न रीझे मन्न । 
मीठा भावे एकरस, दादू सोई जन्न ॥ २० ॥ 
हमें तो एक निरंजन देव का साक्षात्कार करके ही प्रसन्नता होती है । हमारा मन अन्य किसी भी वस्तु को देखकर प्रसन्न नहीं होता । जिसको एकरस निरँतर मधुर परब्रह्म ही प्रिय लगता है, वही भक्त माना जाता है । (यह साखी, वाजींदजी ने एक गैंदे का विशाल पुष्प दिखाकर उसकी प्रशँसा की थी, तब उन्हें कही थी - प्रसंग कथा - दृ - सु - सि - त - ६/११ में देखो ।) 
दादू मेरे हृदय हरि बसे, दूजा नाँहीं और । 
कहो कहां धौं राखिये, नहीं आन को ठौर ॥ २१ ॥ 
हमारे हृदय में तो एक मात्र हरि का ही निवास है । अन्य दूसरा माया और मायिक कार्य कोई भी नहीं बस सकता । राम का पतिव्रत पालन करने वाले हृदय में जब अन्य के लिए स्थान ही नहीं; तब हे सज्जनो ! निश्चय करके तुम ही कहो कि द्वैत को कहां रक्खें ?
(क्रमशः)

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