परमगुरु ब्रह्मर्षि श्री दादूदयाल जी महाराज की अनुभव वाणी

बुधवार, 22 फ़रवरी 2017

= ९१ =


卐 सत्यराम सा 卐
सुख मांहि दुख बहुत हैं, दुख मांही सुख होइ ।
दादू देख विचार कर, आदि अंत फल दोइ ॥ 
मीठा खारा, खारा मीठा, जाने नहीं गँवार ।
आदि अंत गुण देखकर, दादू किया विचार ॥ 
कोमल कठिन, कठिन है कोमल, मूरख मर्म न बूझै ।
आदि रु अंत विचार कर, दादू सब कुछ सूझै ॥ 
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साभार ~ Chetna Kanchan Bhagat

कोई तुम्हारी प्रशंसा करता है, तुम्हारा सम्मान करता है तुम फूल जाते हो। तुम सोचते हो कि तुम्हारे अंदर महान प्रतिभा है और अब लोग पहचान रहे हैं। वह थी तो हमेशा से तुम्हें तो पता ही था लेकिन लोग अब पहचाने हैं, अब लोग अधिक समझदार हो गये हैं इसलिए वे तुम्हारी महानता को पहचान सकते हैं।
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लेकिन फिर पीछे अपमान आता है और चीजों का स्वभाव ही ऐसा है कि सम्मान के पीछे अपमान आता है, वह उसकी छाया है। वह दूसरा हिस्सा है, उसी सिक्के का दूसरा पहलू है। और जब वह आता है, तुम उदास हो जाते हो, तुम निराशा से भर जाते हो, तुमको लगता है कि आत्महत्या कर लें। चारों तरफ पूरी दुनिया तुम्हें गलत लगती है, पूरी दुनिया तुम्हारी दुश्मन मालूम पड़ती है।
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जो व्यक्ति चीजों के स्वभाव को समझता है, वह दोनों का मजा लेगा। वह कहेगा, “ऐसा चीजों का स्वभाव है, कि लोग मुझे सम्मान दे रहे हैं। और ऐसा चीजों का स्वभाव है कि सम्मान के पीछे अपमान आता है, जीत के पीछे हार आती है, सुख के पीछे दुख आता है, स्वास्थ्य के पीछे बीमारी आती है ऐसा चीजों का स्वभाव है! जवानी के पीछे बुढ़ापा आता है, और जन्म के पीछे मृत्यु आती है ऐसा चीजों का स्वभाव है।”

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तो कोई भी परिस्थिति हो, अगर तुम यह महसूस कर सको कि ऐसा है और इससे अन्यथा होना संभव नहीं है, कि जो संभव है वही घटता है.. वह सदा ही घट रहा है जो संभव है। और जो असंभव है वह कभी नहीं घटता। और अगर तुम असंभव की मांग कर रहे हो तो तुम चीजों के स्वभाव के विपरीत होने की कोशिश कर रहे हो। 
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तथाता का जो दर्शन है वह सिर्फ इतना ही है : असंभव को पाने की कोशिश मत करो; जो संभव है उसके साथ बहो और तुम कभी दुखी नहीं होओगे। आनंद उन्हें ही मिलता है जो तथाता के भाव के साथ बहते हैं।”

!! ओशो !! ~ केनोपनिषद :16

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