卐 सत्यराम सा 卐
**श्री दादू अनुभव वाणी** टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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**= लै का अँग ७ =**
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यों मन तजे शरीर को, ज्यों जागत सो जाइ ।
दादू बिसरे देखताँ, सहज सदा ल्यौ लाइ ॥३४॥
जैसे जाग्रत मानव निद्रा - वश होता है तब उसे अपने जाग्रत शरीर का कुछ भी ज्ञान नहीं रहता, वैसे ही जब मन सहज स्वरूप ब्रह्म में वृत्ति लगाकर स्थिर रहता है, तब देखते-देखते ही=शरीर के रहते ही, मन शरीर की सम्पूर्ण परिस्थितियों को भूलकर शरीराध्यास तज देता है ।
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जिहिं आसन पहली प्राण था, तिहिं आसन ल्यौ लाइ ।
जे कुछ था सोई भया, कछू न व्यापै आइ ॥३५॥
हे प्राणधारी जीव ! प्रथम जिस ब्रह्म रूप स्थान में था उसी निर्द्वन्द्व ब्रह्म - स्थान में वृत्ति लगा । जिसने उसमें वृत्ति लगाई है वह जो पूर्व में था, उसी ब्रह्म रूप को प्राप्त हुआ है । ब्रह्म रूप हो जाने पर उस पर मायिक प्रपँच का कुछ भी प्रभाव नहीं पड़ता ।
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तन मन अपना हाथ कर, ताही सौं ल्यौ लाइ ।
दादू निर्गुण राम सौं, ज्यों जल जलहि समाइ ॥३६॥
साधक ! सँयम के द्वारा निज शरीर और मन को अपने अधीन करके उस अपने आत्म - स्वरूप ब्रह्म से ही वृत्ति लगा और जैसे जल में जल मिल जाता है वैसे ही निर्गुण राम से अपनी आत्मा को एक कर ।
(क्रमशः)

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