परमगुरु ब्रह्मर्षि श्री दादूदयाल जी महाराज की अनुभव वाणी

मंगलवार, 14 फ़रवरी 2017

= लै का अंग =(७/३७-३९)

卐 सत्यराम सा 卐
**श्री दादू अनुभव वाणी** टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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**= लै का अँग ७ =**
*उपजनि* 
एक मना लागा रहे, अंत मिलेगा सोइ । 
दादू जाके मन बसे, ताको दर्शन होइ ॥३७॥ 
३७ - ३८ में ज्ञानोत्पति द्वारा ब्रह्मसाक्षात्कार की पद्धति बता रहे हैं - यदि मन अनन्य भाव से एक परमात्मा के ही चिन्तन में लगा रहेगा तो साधन पूर्ण होते ही ज्ञान होकर उस ब्रह्म का साक्षात्कार अवश्य होगा; क्योंकि यह नियम है - जिसके मन में जो बसता है, उसको उसका दर्शन अवश्य होता है । 
दादू निबहै त्यों चले, धीरैं धीरज माँहिं । 
परसेगा पिव एक दिन, दादू थाके नाँहिं ॥३८॥ 
जिस साधक से जो साधन जितना निभ सके, उतना - उतना ही धैर्य पूर्वक शनै: शनै: उसे करते हुये उसमें आगे बढ़ते चलना चाहिए । यदि साधक उक्त प्रकार से अपने साधन को साधन सिद्धि से पहले थककर त्यागेगा नहीं, तो ज्ञान प्राप्ति द्वारा एक दिन अवश्य ब्रह्म का साक्षात्कार कर सकेगा ।
*लय* 
जब मन मृतक ह्वै रहे, इन्द्री बल भागा । 
काया के सब गुण तजे, निरंजन लागा ॥३९॥ 
३९ - ४२ में लय योग विषयक विचार कह रहे हैं - जब मन साँसारिक भोग वासनाओं से रहित मृतकवत् स्थिर हो जाता है=प्रारब्ध वेग बिना स्वयँ अहँ भाव से किसी में भी प्रवृत्त नहीं होता और इन्द्रियों का राजस - तामस निषिद्ध बल नष्ट हो जाता है । इस प्रकार ही शरीर के हिंसादिक सम्पूर्ण गुणों को त्याग कर जो निरंजन राम के चिन्तन में लगा रहता है, तब जानना चाहिए कि यह लय - योग का साधक है । 
(क्रमशः)

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