॥ दादूराम सत्यराम ॥
**श्री दादू चरितामृत(भाग-२)**
लेखक ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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**= विन्दु ९३ =**
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**द्वितीय पद** -
गोविन्दा गाइबा देरे,
आडड़ी आन निवार, गोविन्दा गाइबा दे ।
अन१ दिन अन्तर आनन्द कीजे,
भक्ति प्रेम रस सार रे ॥ टेक ॥
अनुभव आतम अभय एक रस,
निर्भय कांई न कीजे रे ।
अमी महारस अमृत आपे,
अम्हे२ रसिक रस पीजे रे ॥ १ ॥
अविचल अमर अखै अविनाशी,
ते रस कांई न दीजे रे ।
आतम राम अधार हमारो,
जन्म सफल कर लीजे रे ॥ २ ॥
देव दयाल कृपाल दामोदर,
प्रेम बिना क्यों रहिये रे ।
दादू रंग भर राम रमाड़ो३
भक्तबछल तो कहिये रे ॥ ३ ॥
हे गोविन्द ! आपके भजन में विघ्न डालने वाले जो ये दूसरे चित्र हैं, इन्हें हटाइये और हमको आपके नाम तथा गुण गान करने दीजिये । प्रेमाभक्ति रूप सार - रस द्वारा हमारे हृदय में निरंतर१ आनन्द रहे, ऐसी कृपा कीजिये । अभय और एक रस आत्मा के अनुभव द्वारा हमें निर्भय क्यों नहीं करते हैं ? यदि आप अमर भाव - रूप महान् सुधा - रस दें तो हमें२ रसिक उस रस का पान करें । जो अचल, अमर, अक्षय और अविनाशी आपका स्वरूप - रस है, वह आप क्यों नहीं देते हैं ? आप आत्म - स्वरूप राम ही हमारे आधार हैं, हमारे जन्म को सफल करें । हे दयालु ! कृपालु ! दामोदर ! आप हमें अपना प्रेम - रस प्रदान करें । हम आपके प्रेम बिना कैसे सुखपूर्वक रह सकते हैं । आप तो भक्त वत्सल कहलाते हैं, अतः हमारा हृदय अपने प्रेम - रंग से भरकर हमें आनन्द प्रदान रूप खेल३ खिलाइये । उक्त दोनों पद रूप प्रार्थना पूर्ण होते ही सब चित्र एक साथ मिट गए । उनका कुछ भी चिन्ह नहीं रहा । मानो यहां थे ही नहीं ऐसी दीवारें दीखने लगीं । कहा भी हैं -
"नगर निराणे देहु रे, गुरु राखे पधराय ।
स्वामी पद ये गावते, पुतलों गईं विलाय ॥"
(क्रमशः)

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