परमगुरु ब्रह्मर्षि श्री दादूदयाल जी महाराज की अनुभव वाणी

बुधवार, 1 मार्च 2017

= निष्कामी पतिव्रता का अंग =(८/४१-३)


卐 सत्यराम सा 卐 
**श्री दादू अनुभव वाणी** टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥ 
**= निष्कामी पतिव्रता का अँग ८ =** 
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सारा दिल सांई सौं राखे, दादू सोइ सयान । 
जे दिल बँटे आपना, सो सब मूढ अयान ॥ ४१ ॥ 
जो अपना मन ईश्वर - चिन्तन करते हुये पूर्ण रूप से ईश्वर में ही लगावे रखता है, वही बुद्धिमान् है, और जो मन को भगवत् चिन्तन से हटा कर मायिक पदार्थों में लगा देते हैं, वे सब जीव और ब्रह्म का भेद मानने वाले अज्ञानी प्राणियों में भी अति मूढ़ हैं । 
**विरक्तता** 
दादू सारों सौं दिल तोर कर, सांई सौं जोरे ।
सांई सेती जोड़ कर, काहे को तोरे ॥ ४२ ॥ 
वैराग्यपूर्वक प्रभु में निरँतर मन लगाने की प्रेरणा कर रहे हैं - देवी, देव, लोग, कुटुम्ब, देह, घर आदि सँपूर्ण मायिक प्रपँच से मन को हटाकर भगवान् में ही लीन करे और जब भगवान् में मन स्थिर हो जाय, तब किसलिये भगवत् चिन्तन से चित्त हटावे, नहीं हटाना चाहिए । भक्त के काम तो भगवान् कर ही देते हैं । 
**अन्य लग्न व्यभिचार** 
साहिब देवे राखणा, सेवक दिल चोरे ।
दादू सब धन साह का, भूला मन थोरे ॥ ४३ ॥ 
४३ में प्रभु से भिन्न में मन लगाना व्यभिचार है, यह कह रहे हैं - प्रभु अपना निष्काम पतिव्रत रखने के लिए ही नर - शरीर देते हैं किन्तु अज्ञानी प्राणी रूप सेवक भगवान् से मन को हटाकर सिद्धि आदि में लगाता है और अपना मानव - जीवन खो देता है । हे मन ! तू सावधान रह, इस अल्प मायिक सुख के लिए भगवान् को क्यों भूलता है ? यदि तू मायिक सुखों की आशा छोड़कर निरँतर निष्काम पतिव्रत रूप अनन्यता से भगवद् भजन करेगा तो सच्चिदानन्द ब्रह्म रूप साह का ब्रह्मानन्द रूप सम्पूर्ण धन तेरे को मिलेगा ।
(क्रमशः)

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