परमगुरु ब्रह्मर्षि श्री दादूदयाल जी महाराज की अनुभव वाणी

बुधवार, 1 मार्च 2017

= विन्दु (२)९३ =

॥ दादूराम सत्यराम ॥
**श्री दादू चरितामृत(भाग-२)** 
लेखक ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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**= विन्दु ९३ =**
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वहां बैठे हुये बाघसिंह ने दादूजी से पूछा - भगवन् ! आपने गुरु ज्ञान के द्वारा क्या निश्चय किया था ? तब दादूजी ने यह पद बोला - 

**= बाघसिंह के प्रश्न का उत्तर =** 
"ऐसा रे गुरु ज्ञान लखाया, 
आवे जाय सो दृष्टि न आया ॥ टेक ॥ 
मन थिर करूंगा, नाद भरूंगा, 
राम रमूंगा, रस माता ॥ १ ॥ 
अधर१ रहूंगा, करम दहूँगा, 
एक भजूंगा, भगवन्ता ॥ २ ॥ 
अलख लखूंगा, अकथ कथूंगा, 
एक मथूंगा, गोविन्दा ॥ ३ ॥ 
अगह गहूंगा, अकह कहूँगा, 
अलह लहूँगा, खोजन्ता ॥ ४ ॥ 
अचर चरूंगा, अजर जरूंगा, 
अतिर तिरूंगा, आनन्दा ॥ ५ ॥ 
यहु तन तारूं, विषय निवारूं, 
आप उबारूं साधंता ॥ ६ ॥ 
आऊं न जाऊं, उनमनि लाऊं, 
सहज समाऊं गुणवन्ता ॥ ७ ॥ 
नूर पिछाणूं, तेजहि जाणूं , 
दादू ज्योतिहि देखन्ता ॥ ८ ॥ 
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मेरे गुरुदेव वृद्ध भगवान् ने ज्ञान द्वारा मुझे ऐसा समझा दिया है - जन्म कर आने वाला और मर कर जाने वाला है वह परमात्मा रूप से मेरी दृष्टि में नहीं आता है । मैं तो मन को स्थिर करके अनाहत नाद से कर्ण भरूंगा अर्थात् सुनूंगा । राम - भक्ति - रस में मस्त होकर राम में ही रमण करूंगा । मायिक१ गुणों से रहित रहूंगा । एक मात्र भगवान् का भजन करते हुये कर्मों को जलाऊंगा । 
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मन इन्द्रियों के अविषय परब्रह्म को आत्मरूप से देखूंगा । जो सर्व साधारण से कथन नहीं किया जा सकता, ऐसे ब्रह्म ज्ञान का कथन करूंगा । वेद वाणी से प्राप्त होने योग्य गोविन्द के स्वरूप का मनन करूंगा । जो ब्रह्म इन्द्रियादि से ग्रहण नहीं किया जाता, उसे ही स्वस्वरूप से ग्रहण करूंगा । 
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जो सर्व साधारण को प्राप्त नहीं होता, उसी ब्रह्म को साधन द्वारा खोजकर निर्विकल्प समाधि में प्राप्त करूंगा । वाणी के अविषय ब्रह्म को अपना स्वरूप कहूँगा । इस शरीर को पाप ताप से तारूंगा । इस प्रकार अन्त रंग साधनों द्वारा अपना उद्धार करके अचर ब्रह्म में विचरूंगा । नहीं पचाने योग्य अनुभव को पचाऊंगा । दुस्तर संसार को तैर कर परमानन्द प्राप्त करूंगा । 
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मैं किसी शरीर वा लोक में नहीं जाऊंगा । उन्मनी मुद्रा द्वारा प्राण लय करके तथा अपने तेज स्वरूप को सम्यक् पहचान करके आत्मज्योति को देखते हुये गुणवान शरीर सहित ही सहज स्वरूप ब्रह्म में समा जाऊंगा । 
इस अपने निश्चय के अनुसार ही अन्त समय में दादूजी महाराज का स्थूल शरीर भी लय हो गया था । बाघसिंह के प्रश्न का उत्तर सुनकर सभी भाइयों ने दादूजी के निश्चय की भूरि - भूरि श्लाघा की फिर प्रणाम करके सब राजा के साथ राज महल को चले गये । 
(क्रमशः)

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