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卐 सत्यराम सा 卐
*श्री दादू अनुभव वाणी* टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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*मन का अँग १०*
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*स्मरण नाम चेतावनी*
भूला भोंदू फेर मन, मूरख मुग्ध गंवार ।
सुमिर सनेही आपना, आतम का आधार ॥७०॥
७० - ७१ में भगवन्नाम स्मरणार्थ चेतावनी दे रहे हैं - हे विषयों में भूले हुये भोंदू ! अपने मन को प्रत्याहार द्वारा विषयों से लौटा और हे माया से मोहित, सज्जन - सभ्यता से रहित मूर्ख ! आत्मा के आधार अपने सँतत स्नेही परमात्मा का स्मरण कर ।
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मन माणिक मूरख राखि रे, जन जन हाथ न देहु ।
दादू पारिख जौहरी, राम साधु दोइ लेहु ॥७१॥
रे मूर्ख ! अपने मन - माणिक्य को परमात्मा में ही रख; स्त्री, पुत्र, मित्र, धन, धामादि विषयों के हाथ में मत दे=इनमें मन लगा कर अनर्थ मत कर । ये सब तेरे मन - माणिक्य की परीक्षा नहीं कर पाते । केवल राम और सँत ये दो ही तेरे मन - माणिक्य के परीक्षक जौहरी हैं । ये ही तेरे मन के भावना - मूल्य को जानते हैं । अत: तू इन्हीं को अपनाकर इन्हीं को अपना मन दे ।
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*मन*
मन मिरगा मारे सदा, ता का मीठा माँस ।
दादू खाबे को हिल्या, तातैं आन उदास ॥७२॥
७२ में मनोजय - जन्य आनन्द का परिचय दे रहे हैं - साधक अपने मन - मृग को निरन्तर मारता रहता है=उसकी भोग - वासना और मनोरथ रूपी जीवन शक्ति को अभ्यास - वैराग्य द्वारा नष्ट करता रहता है । उक्त जीवन शक्ति के नष्ट होने पर जो विषयों में अनासक्ति और एक तत्व पर स्थिरता रूप उसका माँस रहता है, वह बहुत मधुर है, अनासक्ति और स्थिरता पूर्वक भगवत् चिन्तन करने से महान् आनन्द प्राप्त होता है । उस परमानन्द के आस्वादन में साधक अनुरक्त हो जाता है । इसी से अन्य मायिक विषयों से विरक्त हो जाता है ।
(क्रमशः)

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