गुरुवार, 27 अप्रैल 2017

= मन का अंग =(१०/८२-८४)

#daduji
卐 सत्यराम सा 卐 
*श्री दादू अनुभव वाणी* टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥ 
*मन का अँग १०* 
दादू निर्मल शुद्ध मन, हरि रंग राता होइ ।
दादू कंचन कर लिया, काच कहे नहीं कोइ ॥८२॥
जैसे किसी ने अपने हाथ में सुवर्ण ले रक्खा हो तो उसे काच कोई भी नहीं कहता वैसे ही जिसने अपना मन निर्मल कर लिया है, उसे अशुद्ध कोई नहीं कहता और वह शुद्ध मन हरि - भक्ति - रँग में ही रत होता है, विषयों में नहीं ।
यहु मन अपना थिर नहीं, कर नहीं जाने कोइ ।
दादू निर्मल देव की, सेवा क्यों कर होइ ॥८३॥
यह अपना मन निर्मल और स्थिर नहीं है तथा निर्मल - स्थिर करने का कोई उपाय भी नहीं जानता तब निर्मल निरंजन देव की सेवा मलीन और चँचल मन से किस प्रकार हो सकती है ? ऐसे प्राणी तो ग्राम्य देवादि की ही उपासना करते हैं ।
दादू यहु मन तीनों लोक में, अरस परस सब होइ ।
देही की रक्षा करै, हम जनि भीटे१ कोइ ॥८४॥
सँसारी जन अपने शरीर की बड़े प्रयत्न से रक्षा करते हैं - "हमें कोई छू१ न ले ।" किन्तु यह मन तो तीनों लोकों में सबके साथ एकमेक होता रहता है, इसकी ओर किसी भी आचारवान् व्यक्ति का ख्याल नहीं है=मन के रोकने का विचार कोई नहीं करता । 
(क्रमशः)

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