परमगुरु ब्रह्मर्षि श्री दादूदयाल जी महाराज की अनुभव वाणी

बुधवार, 26 अप्रैल 2017

= विन्दु (२)९८ =

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॥ दादूराम सत्यराम ॥
*श्री दादू चरितामृत(भाग-२)* 
लेखक ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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*= विन्दु ९८ =*
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*= अंत्येष्टि संस्कार विचार =* 
फिर सब शिष्य और भक्तों ने आपस में विचार किया - अब हमें महाराज के शरीर का कौनसा संस्कार करना चाहिये । यह सुनकर एक विज्ञ भक्त ने कहा - अग्नि संस्कार प्रधान है और श्रेष्ठ भी है । अग्नि भगवान् का मुख माना ही जाता है । यह तो आप सभी विद्वान् जानते हैं । अतः शरीर भगवान् को को ही समपर्ण करना चाहिये । उक्त विद्वान् के वचनों को सुनकर महाप्रयाण यात्रा यूथ में आये हुये कुछ पंडित तथा संन्यासी संतों ने कहा - संतों के शरीरों के अग्नि संस्कार नहीं होते हैं । वे तो प्रथम ज्ञानाग्नि से दग्ध कषाय होकर जीन्मुक्त हो जाते हैं । हां, यदि नदी हो तो अवश्य जल संस्कार संतों के शरीरों के किये जाते हैं । किन्तु यहां नदी नहीं है । अतः भूमि संस्कार ही उचित होगा । 
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उक्त वचन सुनकर दादूजी के शिष्य विरही बखनाजी ने दादूजी महाराज की यह साखी बोली - 
“विरह अग्नि का दाग दे, जीवत मिरतक गोर । 
दादू पहले घर किया, आदि हमारी ठौर ॥” 
अर्थात् स्वामी दादूदयालजी महाराज ने जो कहा है, उस पर भी विज्ञजन ध्यान दें । वे कहते हैं - हमने अपने अन्तःकरण के अहंत्व ममत्व और काम क्रोधादि कषायों को विरहाग्नि से जला कर अपने आदि स्थान ब्रह्म को प्राप्त कर लिया है तथा जीवन्मुक्ति रूप समाधि ले ली है । भविष्य में हमारे शरीर का संस्कार करना ही हो तो वायु संस्कार करना चाहिये । उससे ही प्राणियों का भला होगा । शरीर को खाकर तृप्ति लाभ करेंगे । यही मत हमें मानकर संस्कार का निश्चय करना चाहिये । 
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फिर बखनाजी के मत का समर्थन करते हुये रज्जबजी ने दादूजी महाराज की यह साखी बोलकर सबको सुनाई - 
“हरिभज साफिल जीवना, परोपकार समाय । 
दादू मरणा तहँ भला, जहँ पशु पक्षी खाय ॥” 
फिर कहा - उक्त वचन से दादूजी महाराज ने परोपकार पर अधिक जोर दिया है । अतः हमें उनके सिद्धांत के अनुसार तथा अन्तिम आज्ञा के अनुसार महाराज के शरीर को इसी स्थान पर इसी अवस्था में छोड़ देना चाहिये । 
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स्वामीजी ने यही कहा था - 
“स्वामीजी आज्ञा दिई, धरियो पर्वत मांहिं । 
करन हार कर लेयगा, तुमको चिन्ता नांहिं ॥” 
जब गरीबदासजी ने पूछा था कि भैराणा पर्वत की खोल में शरीर को रख देने के पश्चात् हमें क्या करना होगा वह भी बता दीजिये ? उसके उत्तर में दादूजी महाराज ने कहा था - आगे के करने योग्य कार्य को करने वाला आप ही कर लेगा, आगे की चिन्ता तुम को नहीं करनी चाहिये । 
(क्रमशः)

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