परमगुरु ब्रह्मर्षि श्री दादूदयाल जी महाराज की अनुभव वाणी

बुधवार, 26 अप्रैल 2017

= मन का अंग =(१०/७९-८१)

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卐 सत्यराम सा 卐 
*श्री दादू अनुभव वाणी* टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
*मन का अँग १०* 
दादू ध्यान धरे का होत है, जे मन का मैल न जाइ ।
बक मीनी१ का ध्यान धर, पशू बिचारे खाइ ॥७९॥
यदि मन का मैल नष्ट नहीं हो तो ध्यान करने से क्या लाभ होता है ? पारमार्थिक लाभ तो कुछ भी नहीं होता । वह तो जैसे बगुला ध्यान करता है और अवसर पाते ही मच्छी१ पकड़ कर खा जाता है वैसे ही मलीन - मन व्यक्ति ध्यान तो करते हुये दिखाई देते हैं किन्तु साथ ही बेचारे दीन - हीन पशुओं को भी खा जाते हैं । अत: दयाहीन ध्यान से लाभ नहीं होता ।
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दादू काले तैं धोला भया, दिल दरिया में धोइ ।
मालिक सेती मिल रह्या, सहजैं निर्मल होइ ॥८०॥
हृदय - दरिया के भगवद् भजन - जल से स्नान करके जब मन मलीनता त्याग कर शुद्ध हो जाता है तब परमात्मा रूप अपने स्वामी से मिल कर उसी में स्थिर रहता है । यह हमारा अनुभव है - उक्त मानस स्मरण से मन अनायास ही निर्मल हो जाता है ।
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दादू जिसका दर्पण उज्वला, सो दर्शन देखे माँहिं ।
जिसकी मैली आरसी१, सो मुख देखे नाँहिं ॥८१॥
जिसका दर्पण१ मैलात होता है, उसमें मुख साफ नहीं दीखता और जिसका दर्पण साफ होता है उसमें साफ दीखता है वैसे ही जिसका मन - दर्पण शुद्ध होता है, वह अपने हृदय में ही आत्म स्वरूप ब्रह्म का साक्षात्कार करता है । मलीन मन वाला नहीं । 
(क्रमशः)

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