परमगुरु ब्रह्मर्षि श्री दादूदयाल जी महाराज की अनुभव वाणी

मंगलवार, 25 अप्रैल 2017

= ३ =


卐 सत्यराम सा 卐
दुख दरिया संसार है, सुख का सागर राम ।
सुख सागर चलि जाइए, दादू तज बेकाम ॥ 
दादू दरिया यहु संसार है, तामें राम नाम निज नाव ।
दादू ढील न कीजिये, यहु औसर यहु डाव ॥ 
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साभार ~ Chetna Kanchan Bhagat

एक संत बहुत दिनों से नदी के किनारे बैठे थे, एक दिन किसी व्यकि ने उससे पुछा आप नदी के किनारे बैठे-बैठे क्या कर रहे हैं ? संत ने कहा, इस नदी का जल पूरा का पूरा बह जाए इसकी प्रतिक्षा कर रहा हूँ। व्यक्ति ने कहा यह कैसे हो सकता है। नदी तो बहती ही रहती है सारा पानी अगर बह भी जाए तो, आप को क्या करना ? संत ने कहा मुझे दुसरे पार जाना है। सारा जल बह जाए, तो मैं चल कर उस पार जाऊँगा। उस व्यक्ति ने गुस्से में कहा: आप पागल नासमझ जैसी बात कर रहे हैं, ऐसा तो हो ही नही सकता। 
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तब संत ने मुस्कराते हुए कहा : यह काम तुम लोगों को देख कर ही सीखा है। तुम लोग हमेशा सोचते रहते हो कि जीवन मे थोड़ी बाधाएं कम हो जाएं, कुछ शांति मिले, फलाना काम खत्म हो जाए तो महामंत्र जाप, सेवा, साधन-भजन, सत्कार्य करेगें। जीवन भी तो नदी के समान है यदि जीवन मे तुम यह आशा लगाए बैठे हो, तो मैं इस नदी के पानी के पूरे बह जाने का इंतजार क्यों न करूँ..?
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अभी भी वक्त है......
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आपका दिन शुभ हो..... !


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