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॥ दादूराम सत्यराम ॥
*श्री दादू चरितामृत(भाग-२)*
लेखक ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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*= विन्दु ९९ =*
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फिर क्रम-क्रम से मुख्य देवता अपने-अपने लोक को ले जाने का निवेदन करने लगे -
“शिव जु कहैं चलिये कैलासा,
रहैं समीप सदा सुख वासा ।
ब्रह्म लोक ब्रह्मा जु बतावे,
महा-प्रलय लौं काल न आवै ।
विष्णु कहैं वैकुण्ठ पधारो,
अमृत पान करो सुख सारो ।
सिद्ध लोक सब सिद्ध बतावैं,
रिधिसिधि ठाडी ताहिं नमावैं ॥
(जनगोपाल वि. १५ ।)
❉ शिवजी ने कहा - आप कैलाश में चलैं, वहां हमारे पास ही सदा निवास करना ।
❉ फिर ब्रह्माजी ने ब्रह्म लोक की विशेषता बताते हुये कहा - ब्रह्म लोक में भूख प्यास आदि और महाप्रलय तक काल का भी कुछ भय नहीं है । अतः आप ब्रह्म लोक में ही चलें ।
❉ उसके पश्चात् विष्णुजी ने कहा - आप वैकुण्ठ में पधारिये, वहाँ अमृत पान करते हुये निवास करना वहां आप को सभी सुख प्राप्त होंगे । वहां रहने वाले पूर्ण काम ही रहते हैं । उनकी कोई भी कामना अधूरी नहीं रहती है ।
❉ फिर सिद्धों ने बताया - आप के निवास के लिये सिद्ध लोक ही अच्छा रहेगा । वहाँ सिद्धों का समागम होता रहेगा । अतः आप तो सिद्ध लोक में ही पधारैं । हम लोगों की यही इच्छा है । उस समय ऋद्धियां और सिद्धियां भी खड़ी - खड़ी मस्तक नमाकर प्रार्थना कर रही थीं कि - आपकी सेवा में हम सब उपस्थित हैं, जो भी आज्ञा करैंगे, सो सब सेवा हम आपकी करती रहैंगी ।
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संतगुण सागर में भी यही वर्णन है, देखिये - तरंग २३
- इन्दव -
संत चलो शिव लोक कहैं,
सुक्ख अनन्त नहीं दुख लेशा ।
भाष विरंचि चलो विधि लोकहिं,
कृतान्त कछू न कलेशा ॥
विष्णु कहैं मम लोक चलो तुम,
अमृत को नित पान विशेषा ।
संत उलंघ चले निज लोक जु,
होत प्रवेश निरंजन देशा ॥
❉ शिवजी ने कहा - संत जी शिव लोक में चलें, वहाँ अनन्त सुख हैं । वहाँ दुख का तो लेश भी नहीं है । अतः वहाँ सुख पूर्वक रहना ।
❉ ब्रह्माजी बोले - आप तो ब्रह्म लोक में ही पधारें । वहाँ सबका अन्त करने वाले काल का कुछ भी क्लेश नहीं है । आनन्द से रहना ।
❉ विष्णुजी ने कहा - ‘आप तो मेरे(वैकुण्ठ) लोक में ही चलें, वहाँ विशेष करके आपको नित्य ही अमृत पान होगा ।
❉ किन्तु महान् संत संत दादूजी महाराज ने उक्त किसी भी देवता के लोक में जाना स्वीकार नहीं किया । वे जानते थे कि उक्त सभी लोकों में मायिक सुख ही हैं और वे अन्त में पुण्य क्षीण होने पर दुख रूप बन जाते हैं । उनका त्याग होता है तब महान् दुःख ही होता है । वे तो उक्त लोकों को लाँघकर अर्थात् त्याग करके अपने ही लोक को चले और निजरूप निरंजन ब्रह्म स्वरूप देश में ही प्रविष्ट हुये अर्थात् स्वरूप में स्थित हुये ।
(क्रमशः)

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