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*॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥*
*॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥*
*॥ दादूराम~सत्यराम ॥*
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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८ आचार्य निर्भयरामजी
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गोविन्ददासजी का आना ~
आचार्य निर्भयराम जी महाराज वसवा में दादूवाणी के प्रवचनों द्वारा धार्मिक जनता को ज्ञानामृत का पान करा रहे थे । उन्हीं दिनों में शिवरामदासजी राजगढ वालों के शिष्य गोविन्ददासजी ने अपने गुरुदेव शिवरामदासजी के ब्रह्मलीन होने पर उनका महोत्सव करके उनकी चद्दर तो ओढ ली थी किन्तु अब इनके योग - क्षेम का साधन इनके पास नहीं था ।
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इसलिये गोविन्ददासजी ने विचार किया - यहां पडे पडे क्या करेंगे ? चलें चारों धामों की यात्रा ही कर आयें । यात्रा करने जाने लगे तो ज्ञात हुआ नारायणा दादूधाम के आचार्य निर्भयराम जी महाराज वसवा में आये हुये हैं । तब गोविन्ददासजी ने सोचा वसवा होते हुये चलें जिससे आचार्य के दर्शन भी हो जायेंगे ।
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फिर गोविन्ददासजी आचार्य निर्भयरामजी महाराज के पास गये । दर्शन करके सत्यराम बोलते हुये साष्टांग की फिर हाथ जोडकर सामने बैठ गये । आचार्य निर्भयराम जी ने उनके कुशल समाचार पूछे और आसन को देखकर कहा - कहां जाने की तैयारी करके आये हो ?
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गोविन्ददासजी ने कहा - महाराज ! राजगढ रहने पर योग - क्षेम भी ठीक नहीं चल रहा है । अत: मैंने सोचा यहां पडे पडे क्या करेंगे ? चारों धामों की यात्रा ही कर आयें । इसलिये चारों धामों की यात्रा करने जा रहा हूँ । आचार्य निर्भयराम जी ने गोविन्ददासजी की स्थिति सुनी और कुछ विचार करके गोविन्ददासजी को कहा - मेरी बात ध्यान से सुनो -
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गोविन्ददासजी को शुभाशीर्वाद ~
चारों धामों की यात्रा करने का विचार तो तुम्हारा अच्छा ही है किन्तु तुम अपने योग - क्षेम की चिन्ता भी मत करो । तुम तो साधु होकर भी राज करोगे । और बहुतों का योक्ष - क्षेम करोगे । तुम्हें अपने योग - क्षेम की चिन्ता का कोई भी प्रसंग नहीं आयेगा । परन्तु अब तुम जहां से आये हो वहां ही लौट जाओ ।
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यह कहकर आचार्य निर्भयराम जी महाराज गोविन्द दासजी को बताशों का प्रसाद देने लगे । तब गोविन्ददासजी ने प्रसाद के लिये अपना अंगोछा बिछा दिया । आचार्य निर्भयरामजी प्रसाद देने लगे । दो चार मुट्ठी बताशों की अंगोछे में पडने पर गोविन्ददासजी ने कहा - बस महाराज ! किन्तु आचार्य ने कहा यहां दादू दयालजी का भंडार है, बहुत से बताशे लो यह कहकर आचार्य जी ने उसका अंगोछा बताशों से भर दिया ।
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फिर गोविन्ददासजी बताशों से भरे हुये अंगोछे को उठाने लगे तो अकस्मात् अंगोछा का एक पल्ला छूट गया और बताशे पृथ्वी पर फैल गये । उनसे गोविन्ददासजी का मन व्याकुल होकर भयभीत हो गया ।
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तब आचार्य निर्भयरामजी महाराज ने कहा - भय मत करो, जैसे ये बताशे फैले हैं, वैसे ही तुम्हारा शिष्य समूह और माया फैलेगी । परन्तु तुम अब जहां से आये वहां ही शीघ्र चले जाओ । राजा से तुमको सम्मान मिलेगा । फिर गोविन्ददास जी आचार्य निर्भयरामजी को दंडवत सत्यराम करके राजगढ ही लौट गये । यात्रा करने नहीं गये ।
(क्रमशः)

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