परमगुरु ब्रह्मर्षि श्री दादूदयाल जी महाराज की अनुभव वाणी

सोमवार, 3 नवंबर 2025

जयपुर पधारने का निमंत्रण

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*॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥*
*॥ दादूराम~सत्यराम ॥*
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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८ आचार्य निर्भयरामजी
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आचार्य जैतराम जी महाराज की स्थापित मर्यादा के अनुसार आचार्य निर्भयराम जी महाराज का प्रथम चातुर्मास उतराधे संतों ने ही करवाया था । उसमें आचार्यों की मर्यादा के अनुसार ही सब व्यवहार किया गया था । फिर उतराधे की रामत भी कराई थी ।
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उस चातुर्मास तथा रामत में श्री दादूवाणी के प्रवचनों से तथा परम विरक्त महान् संत आचार्य निर्भयराम जी महाराज के दर्शनों से धार्मिक जनता को महान लाभ हुआ था । सभी स्थानों में आचार्य निर्भयराम जी की जय ध्वनि होती रही थी । अति आनन्द पूर्वक यह रामत हुई थी । 
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उक्त रामत के पश्‍चात् जयपुर नरेश प्रतापसिंह ने नारायणा दादूधाम के आचार्य निर्भयराम जी को स्वयं ने ही अपने हाथ से पत्र लिखकर जयपुर पधारने का निमंत्रण भेजा । तब आचार्य निर्भयराम जी महाराज ने अपने आने की स्वीकृति दे दी । फिर आचार्य जी अपने शिष्य मंडल के सहित भ्रमण करते हुये जयपुर के पास पहुँचे तब आचार्य जी ने अपनी परम्परा के अनुसार अपने भंडारी को भेजकर राजा को अपने आने की सूचना दी । 
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आचार्य निर्भयराम जी का आगमन सुनकर जयपुर नरेश प्रतापसिंह अति प्रसन्न हुये और आचार्य जी का स्वागत करने के लिये स्वयं राजा प्रतापसिंह ने अपने लवाजमा के सहित आचार्य जी के सामने जाकर उनका सामेला किया । मिलने के समय अपने पूर्व राजाओं की रीति के समान दी मुहर और पार्चा थान भेंट किया । 
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फिर आचार्य जी को उचित स्थान में ठहराया और जितने दिन आचार्य जी जयपुर में ठहरे उतने दिन तक राजा सत्संग में जाते रहे तथा सब प्रकार की सेवा करते रहे । राजा की आज्ञा से सेवा का प्रबन्ध सुचारु रुप से चलता था । श्रीदादू वाणी का प्रवचन चलता था । राजा के अन्य सामन्त तथा प्रजा जन भी आते थे । 
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दादूवाणी के प्रवचन तथा आचार्य के दर्शन से राजा प्रजा सभी प्रभावित थे । राजा पर तो बहुत अच्छा प्रभाव पडा था । राजा कुछ स्थायी सेवा करना चाहता था । किन्तु आचार्य निर्भयराम जी महाराज परम विरक्त थे । वे ग्राम, भूमि तो लेते ही नहीं थे । फिर जब आचार्य निर्भयराम जी महाराज जयपुर से जाने का विचार करने लगे तब नारायणा दादूधाम के सदाव्रत तथा स्थान सेवा के लिये भंडारी को धनराशि देकर आचार्य निर्भयरामजी महाराज का उचित सम्मान करके उनको विदा किया ।
(क्रमशः)

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