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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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*७. काल चितावनी कौ अंग ४८/५०*
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सुन्दर काल तहां तहां, जब लग है अज्ञान ।
ममत गयौ सब देह कौ, तब ब्यापक भगवान ॥४८॥
संक्षेप में इस उपर्युक्त मृत्युप्रकरण को इस प्रकार समझिये - जहाँ अज्ञान है वहाँ मृत्यु है । जब हम ममत्व का त्याग कर देहाध्यास से मुक्ति पा लें तो हमारा समस्त सांसारिक भ्रमजाल ही मिट जाय । रज्जु में सर्प का भ्रम मिट जाय तो सर्प से भय कहां रह जायगा ! ॥४८॥
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सुन्दर बंध्या देह सौं, तब लग ग्रासै काल ।
छाडि ममत न्यारौ भयौ, रज्जु बिषै कत ब्याल ॥४९॥
जब तक प्राणी का देहाध्यास रहेगा तब तक प्राणी को मृत्यु का भय बना हो रहेगा । यदि हम यह सर्वविध सांसारिक ममत्व त्याग दें तो तथाकथित रज्जू में सर्प का भ्रम स्वतः ही नष्ट हो जायगा ॥४९॥
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सुन्दर काल अखंड है, तिमिर रह्यौ ज्यौं छाइ ।
ज्ञान भान प्रगटै जबहिं, दोन्यूं जांहिं बिलाइ ॥५०॥
इति काल चितावनी कौ अंग ॥७॥
जब तक प्राणी पर अज्ञान का आवरण रहेगा तब तक वहा मत्य का भी अखण्ड राज्य रहेगा । परन्तु ज्ञानरूप सूर्य के उदित होते ही यह अज्ञान तथा उसके कारण अस्तित्वप्राप्त मृत्यु - दोनों का ही विलय हो जायगा ॥५०॥.
इति कालचितावनी को अंग सम्पन्न ॥७॥
(क्रमशः)

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