मंगलवार, 4 नवंबर 2025

*८. नारी पुरुष श्लेष* को अंग १/४*

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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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*८. अथ नारी पुरुष श्लेष* को अंग १/४*
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(*इस अङ्ग की प्रत्येक साषी के तीन अर्थ होंगे - १. नारी के पक्ष में, २. नाडी के पक्ष में तथा ३. ध्यात्मिक पक्ष में । आध्यात्मिक पक्ष में 'पुरुष' का अर्थ होगा - परमात्मा तथा 'नारी' का अर्थ होगा - आत्मा, प्रकृति या माया । जैसा कि श्रीसुन्दरदासजी स्वयं इस अंग की अन्तिम(२६) साषी में सङ्केत कर रहे हैं ।
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नारी पुरुष सनेह अति, देखैं जीवै सोइ । 
सुन्दर नारी बीछुरै, आप मृतक तब होइ ॥१॥
लोक में प्रायः प्रत्येक पुरुष का अपनी सहचारिणी स्त्री के प्रति अतिशय स्नेह दिखायी देता है । वह उसे देख कर ही अपने जीवन में पूर्णतः शान्ति एवं सुख अनुभव करता है । यदि उस पुरुष को अपनी वह सहचारिणी किसी कारणवश कुछ काल तक न दिखायी दे तो उतने समय तक उस पुरुष के चित्त में व्यग्रता(विकलता) ही प्रतीत होती है और उतने समय तक वह अपने को मृतक के समान समझता है। यही बात पुरुष की नाडी के विषय में भी समझनी चाहिये ॥१॥
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नारी बोलै आकरी, तब दुख पावै नाह । 
सुन्दर बोलै मधुर मुख, तब सुख सीर प्रवाह ॥२॥
यदि कोई स्त्री कभी कर्कश(आकरी = कठोर) वाणी बोलती है तो उसे सुनकर उसका स्वामी(नाह = नाथ) मन में कष्ट पाता है । तथा यदि वही स्त्री जब उसके प्रति मधुर वाणी का प्रयोग करती है तो उसे सुन कर उस पुरुष के हृदय में सुख की नाली(धारा) प्रवाहित होने लगती है । नाडी के विषय में भी यह बात घटित होती है ॥२॥
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नारी बोलै प्यार सौं, तब कछु पीवै खाइ । 
जब नारी क्रोधहिं करै, सुन्दर पिय मुरझाइ ॥३॥
यदि वह नारी, उसे भोजन कराते समय उससे प्रेममय संवाद करती है तो वह अपना भोजन(खाना पीना) सखी चित्त से आरम्भ करता है । परन्तु वही नारी किसी कारणवश उस समय क्रोधमय वचन बोलने लगती है तो वही पुरुष चित्त से उदास हो जाता है, और वह अपना भोजन आधा अधूरा खाकर बीच में ही उसे छोड़ कर उठ जाता है । स्वस्थ एवं रोगी पुरुष की नाडी के विषय में भी यह उदाहरण चरितार्थ होता है ॥३॥
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नारी बोलै रस लिये, कबहूं बिरसी बात । 
सुन्दर जीवै बिरस तें, रस तें पिय की घात ॥४॥
(इस साषी में 'नारी' शब्द शिलष्टार्थक है, अतः इसके दो अर्थ हो सकते हैं - )
१. नारियाँ कभी कभी(स्वार्थवश) अपने स्वामी से मीठी(रस मय) बातें करती है तो कभी नीरस बातें करने लग जाती हैं । ऐसे समय में स्वामी का उस की नीरस बातों से ही हित होता है । उसकी वे रसमय(खुशामदी) बातें तो स्वामी के लिये अहितकारिणी ही होती है । अतः स्वामी को उस की ऐसी बातों से पूर्णतः सावधान रहना चाहिये ।
२. कभी कभी पुरुष के शरीर में नाड़ी अधिक रस(वात, पित्त, कफ = दोष) वाली होती है और कभी विरस(दोषरहित) होकर चलने लगती है, वह विरस नाडी ही पुरुष के स्वास्थ्य के लिये हितकर होती है, रसमय(दोषयुक्त) नाडी तो पुरुष के शरीर में रोग की बोधक ही होती है । महाराज श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - यही स्थिति उपर्यक्त स्वार्थमयी नारी की बातों से भी समझनी चाहिये ॥४॥
(क्रमशः)

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