गुरुवार, 6 नवंबर 2025

राजा जोधसिंह को राज्य प्राप्ति

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*॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥*
*॥ दादूराम~सत्यराम ॥*
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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८ आचार्य निर्भयरामजी
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महाराज रात को आकर अपनी शय्या पर बैठ कर भजन करने लगे । प्रात: सब साधुओं को दर्शन हो गये । साधुओं ने पूछा भी, कहां पधार गये थे ? तब आपने कह दिया । किसी बात का निर्णय करने गये थे । दूसरे दिन पंक्ति के समय फिर कहा - आप संतों के प्रताप से हमको भोजन के लिये अच्छे - अच्छे माल मिलते हैं । संतों ने कहा - महाराज यह तो आपका ही प्रताप है, जो हमको अच्छे - अच्छे माल मिलते हैं । 
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तब जो रोटी रात को आचार्य जी को मिली थी उनको आचार्य जी अपने साथ ही पंक्ति में ले आये थे, उनको खोलकर संतों को दिखाते हुये कहा - संतों मेरा तो यह प्रताप है । मैंने कल अकेले जाकर मेरे प्रताप का निर्णय कर लिया है । रोटियां देखकर सब संत मौन रहे । इससे सूचित होता है कि आचार्य निर्भयराम जी महाराज में अभिमान का लेश भी नहीं था ।(गुरु पद्धति ग्रंथ से)
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राजा जोधसिंह को राज्य प्राप्ति ~ 
पंजाब देश के राजा जोधसिंह का राज्य रणजीतसिंह ने छीन लिया था । जोधसिंह अपना राज्य छिन जाने से अति व्यथित हुआ । किन्तु इस राजा ने नारायणा दादूधाम के आचार्य निर्भयरामजी महाराज की गुण गाथा बहुत सुन रखी थी । अत: जोधसिंह पंजाब से नारायणा दादूधाम में आचार्य निर्भयरामजी महाराज के पास आया । 
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दर्शन कर सत्यराम बोलते हुये साष्टांग दंडवत की फिर हाथ जोडकर सामने बैठ गया । फिर अवकाश देखकर उसने अपना सारा दु:ख आचार्य निर्भयराम जी को सुनाकर कहा - मैं आप का यश सुनकर आपकी शरण आया हूं, मेरी लज्जा अब आप ही रखेंगे । 
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आचार्य निर्भयराम जी महाराज ने राजा जोधसिंह को धैर्य बंधाते हुये कहा - तुम भय मत करो, तुम्हारी व हमारी दोनों की लाज तो प्रभु रखने वाले हैं । अब तुम अपने देश को जाकर हरि, गुरु, संतों की सेवा करो, भगवान् तुम पर दया ही करेंगे । आचार्य निर्भयरामजी का उक्त उपदेश सुनकर जोधसिंह ने अपने हृदय में दॄढ रुप से वह उपदेश धारण कर लिया । 
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फिर राजा रणजीतसिंह को भी ज्ञात हो गया कि - जोधसिंह नारायणा दादूधाम के आचार्य निर्भयराम जी की शरण गया है । जब जैतराम जी महाराज ने सिक्ख गुरु गोविन्दसिंह जी के बाज को ज्वार चुगा दी थी तब से ही नारायणा दादूधाम की प्रतिष्ठा पंजाब में बहुत हो गई थी । 
(क्रमशः) 

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