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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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*१३. देह मलिनता गर्ब प्रहार कौ अंग ९/१२*
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सुन्दर ऐसी देह मैं, सुच्चि कहो क्यौं होइ ।
झूठेई पाषंड करि, गर्ब करै जिनि कोइ ॥९॥
हम तुझ से यही पूछते हैं कि इस देह के इतना अपवित्र रहते हुए तेरी यह पवित्रता कैसे निभ पायेगी ! तब तूँ लोक दिखावे के लिये मिथ्या पाषण्ड कर यह वृथाभिमान क्यों कर रहा है ! ऐसा तुझे नहीं करना चाहिये ॥९॥
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सुन्दर सुच्चि रहै नहीं, या शरीर के संग ।
न्हावै धोवै बहुत करि, सुद्ध होइ नहिं अंग ॥१०॥
श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - तुम्हारे इस शरीर के इतना मलिन रहते हुए, तुम्हारी शुद्धि की प्रतिज्ञा का निर्वाह हो पाना मुझे तो असम्भव ही लगता है । भले ही तुम इस शरीर को कितना ही नहलावो या धोवो, इस का आन्तरिक भाग तो सदा मैला ही रहेगा ! यह पवित्र नहीं हो सकता ॥१०॥
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सुन्दर कहा पखारिये, अति मलीन यह देह ।
ज्यौं ज्यौं माटी धोइये, त्यौं त्यौं उकटै खेह ॥११॥
इस मलिन देह को इतना अधिक धोने से(स्नान करने से) तुम को क्या मिलेगा; क्योंकि हम लोक में यही देखते हैं कि मिट्टी की किसी कच्ची मूर्ति को जितना धोते हैं उसमें से उतनी ही मिट्टी निकलती जाती है । वह कभी स्वच्छ नहीं होती ॥११॥
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सुन्दर मैली देह यह, निर्मल करी न जाइ ।
बहुत भांति करि धोइ तूं, अठसठि तीरथ१ न्हाइ ॥१२॥
(१ अड़सठ तीर्थ - यह सान्ध्यभाषा में अतिप्रसिद्ध मुहाविरा है, जो तीर्थयात्रा पर व्यङ्गय के रूप में प्रयुक्त होता है ।)
इसी प्रकार, अरे मानव ! यह तेरी मलिन देह सदा मलिन ही रहेगी, यह कभी स्वच्छ(निर्मल) नहीं हो सकती; भले ही तूं इस की स्वच्छता के लिये अडसठ तीर्थों में जा जा कर बार बार स्नान करता रह ॥१२॥
(क्रमशः)

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