रविवार, 18 जनवरी 2026

*१६. चाणक को अंग २०/२२*

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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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*१६. चाणक को अंग २०/२२*
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मेल्है पाव उठाइ कै, बक ज्यौं मांडै ध्यान ।
बैठौ गटकै माछली, सुन्दर कैसौ ज्ञान ॥२०॥
कोई पाषण्डी साधु(लोगों को) अहिंसा धर्म पालन की दृढता दिखाने के लिये मार्ग में चलते समय अपने पैर भूमि पर इतना धीरे रखता है कि कोई चींटी आदि सुक्ष्म जन्तु भी पैर के नीचे आकर न मर जाय; और ध्यान समाधि का बगुले के समान दिखावा करता है । जब कि वह यथार्थ जीवन में परहिंसा हेतु निरन्तर तत्पर रहता है । श्रीसुन्दरदासजी पूछते हैं कि यह उस पाषण्डी का कैसा ध्यान है । उस पर कोई कैसे विश्वास करे ! ॥२०॥
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सुंदर जीव दया करै, न्यौता मानै नाहिं । 
माया छुवै न हाथ सौं, परकाला ले जाहिं ॥२१॥
कोई कोई पाषण्डी साधु किसी का भी निमन्त्रण इसलिये स्वीकार नहीं करते कि उस के कारण किस मत्स्य मृग आदि की हिंसा न हो । परन्तु ऐसे पाषण्डी अपने वास्तविक जीवन में ऐसे हिंसक या चौर होते हैं कि अवसर मिलने पर वे कहीं फटा पुराना चिथड़ा(वस्त्र) भी नहीं छोड़‌ते ॥२१॥
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भेख बनावै बहुत बिधि, जटा बधावैं सीस । 
माला पहिरै तिलक दे, सुंदर तजै न रीस ॥२२॥
अनेक पाषण्डी साधु अपने सिर पर बड़ी बड़ी जटा बढा लेते हैं, गले में लम्बी माला तथा मस्तक पर तिलक लगा लेते हैं; परन्तु वे दूसरों के प्रति क्रोध तथा ईर्ष्या नहीं त्याग सकते ॥२२॥
(क्रमशः) 

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