शनिवार, 17 जनवरी 2026

*१६. चाणक को अंग १७/१९*

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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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*१६. चाणक को अंग १७/१९*
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यंत्र मंत्र बहु बिधि करै, झाडा बूंटी देत । 
सुन्दर सब पाषंड है, अंति पडै सिर रेत ॥१७॥
ऐसे ही अन्य कुछ पाषण्डी साधु जनता को, उन की मनोवाञ्छा पूर्ण करने के लिये, विविध मन्त्र, मन्त्र, झाड़-फूंक, या कोई विशिष्ट जड़ी – बूंटी देते रहते हैं । महात्मा सुन्दरदासजी कहते हैं - ऐसे साधुओं का यह सब कृत्य केवल पाषण्ड है । ऐसे कुकर्मों से वैसे साधुओं को समाज में अपमानित ही होना पड़ता है ॥१७॥
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कोऊ होत रसाइनी, बात बनावै आइ ।
सुन्दर घर मैं होइ कछु, सो सब ठगि ले जाइ ॥१८॥ 
ऐसे ही कोई रसायन विद्या का ज्ञाता ठग किसी भले घर में आ कर, वहाँ मीठी मीठी बातें बनाता हुआ सोना बनाने के नाम पर सब कुछ धन लूट ले जाता है ॥१८॥
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गल मैं पहरी गूदरी, कियौ सिंह कौ भेख । 
सुन्दर देखत भय भयौ, बोलत जान्यौ मेख ॥१९॥
कोई पाषण्डी साधु लोगों को ठगने के लिये अपना त्याग दिखाने हेतु फटी पुरानी गूदड़ी ओढे रहता है, कोई व्याघ्रचर्म पहनकर ऐसा लगता है कि आदमी देखते ही भय से कांप उठे; परन्तु उस साधु के द्वारा यांचायुक्त दो शब्द बोलते ही उसका पाषण्ड लोगों के सम्मुख स्पष्ट हो जाता है और वह उनको भेड़ के समान लगने लगता है ॥१९॥
(क्रमशः)

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