बुधवार, 7 जनवरी 2026

ईश्वर ही अवतार

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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
🌷 *#श्रीरामकृष्ण०वचनामृत* 🌷
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*दादू निराकार मन सुरति सौं, प्रेम प्रीति सौं सेव ।*
*जे पूजे आकार को, तो साधु प्रत्यक्ष देव ॥*
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साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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काशीपुर बगीचे में श्रीरामकृष्ण जिस समय कैन्सर रोग की यन्त्रणा से बैचेन हो रहे हैं, भात का तरल माँड़ तक गले के नीचे नहीं उतर रहा है, उस समय एक दिन नरेन्द्र श्रीरामकृष्ण के पास बैठकर सोच रहे हैं, 'इस यन्त्रणा में यदि कहें कि मैं ईश्वर का अवतार हूँ तो विश्वास होगा ।' उसी समय श्रीरामकृष्ण कहने लगे, "जो राम, जो कृष्ण, इस समय वे ही रामकृष्ण के रूप में भक्तों के लिए अवतीर्ण हुए हैं ।" नरेन्द्र यह बात सुनकर दंग रह गये ।
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श्रीरामकृष्ण के स्वधाम में सिधार जाने के बाद नरेन्द्र ने संन्यासी होकर बहुत साधन-भजन तथा तपस्या की । उस समय उनके हृदय में अवतार के सम्बन्ध में श्रीरामकृष्ण के सभी महावाक्य मानो और भी स्पष्ट हो उठे । वे स्वदेश और विदेशो में इस तत्त्व को और भी स्पष्ट रूप से समझाने लगे ।
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स्वामीजी जब अमरीका में थे, उस समय नारदीय भक्तिसूत्र आदि ग्रन्थों के अवलम्बन से उन्होंने भक्तियोग नामक ग्रन्थ अंग्रेजी में लिखा । उसमें भी वे कह रहे हैं कि अवतारगण छूकर लोगों में चैतन्य उत्पन्न करते हैं । जो लोग दुराचारी हैं, वे भी उनके स्पर्श से सदाचारी बन जाते हैं । 'अपि चेत् सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक्, साधुरेव स मन्तव्यः सम्यक् व्यवसितो हि सः ।' ईश्वर ही अवतार के रूप में हमारे पास आते हैं । यदि हम ईश्वर-दर्शन करना चाहें तो अवतारी पुरुषों में ही उनका दर्शन करना होगा । उनका पूजन किये बिना हम रह नहीं सकते ।
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“... साधारण गुरुओं से श्रेष्ठ एक और श्रेणी के गुरु होते हैं, जो इस संसार में ईश्वर के अवतार होते हैं । केवल स्पर्श से ही वे आध्यात्मिकता प्रदान कर सकते हैं, यहाँ तक कि इच्छा मात्र से ही । उनकी इच्छा से महान् दुराचारी तथा पतित व्यक्ति भी क्षण भर में ही साधु हो जाता है ।
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वे गुरुओं के भी गुरु हैं तथा मनुष्य रूप में भगवान के अवतार हैं । उनके माध्यम बिना हम ईश्वर-दर्शन नहीं कर सकते । उनकी उपासना किये बिना हम रह ही नहीं सकते और वास्तव में केवल वे ही ऐसे हैं जिनकी हमें उपासना करनी चाहिए । ... जब तक हमारा यह मनुष्य शरीर है तब तक हमें ईश्वर की उपासना मनुष्य के रूप में और मनुष्य के सदृश ही करनी पड़ती है ।
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तुम चाहे जितनी बातें करो, चाहे जितना यत्न करो, परन्तु भगवान को मनुष्य-रूप के अतिरिक्त तुम किसी अन्य रूप में सोच ही नहीं सकते । ईश्वर तथा संसार की सारी वस्तुओं पर चाहे तुम सुन्दर तर्कयुक्त भाषण दे सकते हो, चाहे बड़े युक्तिवादी बन सकते हो और मन को समझा सकते हो कि इन सारे ईश्वरावतारों की कथा भ्रमात्मक है । पर थोड़ी देर के लिए सहज बुद्धि से सोचो । हमें इस विचित्र विचारबुद्धि से क्या प्राप्त होता है ?
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- शून्य, कुछ नहीं, केवल शब्दाडम्बर । भविष्य में जब कभी तुम किसी मनुष्य को अवतार-पूजा के विरुद्ध एक बड़ा तर्कपूर्ण भाषण देते हुए सुनो तो उससे यह प्रश्न करो कि उसकी ईश्वर सम्बधी धारणा क्या है । 
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सर्वशक्तिशाली, सर्वव्यापी तथा इस प्रकार के अन्य शब्दों का अर्थ वह केवल अक्षरों के जानने की अपेक्षा और क्या समझता है ? वास्तव में वह कुछ नहीं समझता । वह उनका कोई ऐसा अर्थ नहीं लगा सकता जो उसकी स्वयं की मानवी प्रकृति से प्रभावित न हो । इस सम्बन्ध में वह बिलकुल उसी सामान्य मनुष्य के सदृश है, जिसने एक पुस्तक भी नहीं पढ़ी ।”
- 'भक्तियोग' से उद्धृत
(क्रमशः)

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