बुधवार, 18 मार्च 2026

१८ आचार्य प्रकाशदेव जी ~

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*॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥*
*॥ दादूराम~सत्यराम ॥*
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
अथ अध्याय १५ ~ 
१८ आचार्य प्रकाशदेव जी ~ 
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प्रकाशदेवजी प्रथम पुजारी थे और आचार्यजी के प्रशिष्य थे । जब आचार्य रामलाल जी महाराज ब्रह्मलीन हो गये तब समाज ने प्रकाशदेव जी की गद्दी के योग्य अधिकारी समझ कर वि. सं. २००१ आश्‍विन कृष्ण ११ को आचार्य गद्दी पर विराज मान कर दिया । आचार्य प्रकाशदेव जी महाराज के गद्दी पर विराजने के पश्‍चात् मेरे मुख से भी यह मनहर छंद निकला था-
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पूषण प्रकाश सा प्रकाश राजे पाट पर,
यही वरदान दादूदेव हमें दीजिये ॥
पंथ पाथ - निधि संत पद्म फूलें पेखकर, 
 गुण गंध शत गुण फैले अस कीजिये ॥
 कुगुण कुमुद कुम्हलावें औ पलावे भेद, 
 भ्रमर विवेक थिरताई भल दीजिये ॥
 बावन ही घाट पर आतम विचार पाथ, 
 विश्‍व जीव पीय के अघावें कृपा कीजिये ॥१॥
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अर्थात्- हे दादूदेव दयालु जी ! हमें यही वरदान दें कि - आचार्य प्रकाशदेव जी महाराज आपकी गद्दी पर विराजकर पूषण(सूर्य) प्रकाश के समान ज्ञान प्रकाश प्रदान करें । जैसे सूर्यप्रकाश से सरोवर के कमल खिल जाते हैं, वैसे ही दादू पंथरुप सरोवर के संत रुप कमल आचार्य प्रकाशदेव जी के ज्ञान प्रकाश को देखकर खिल जायें अर्थात् पूर्ण संतत्व को प्राप्त हो जायें । 
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और जैसे कमलों के फूलने पर उनकी गंध फैल कर लोकों को सुख प्रदान करती है, वैसे ही संतों के विचारादि दैवी गुण अधिक लोक कल्याण में सहायक हों, ऐसी व्यवस्था कर दीजिये । और जैसे सूर्य के प्रकाश से चन्द्रमुखी कमल कुम्हला जाते हैं, वैसे ही आचार्य प्रकाशदेव जी के ज्ञान प्रकाश से संतों के हृदय के आसुर गुण कमजोर होकर नष्ट हो जायें और भेद - भ्रांति भाग जाय । 
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जैसे खिले हुये कमलों पर भ्रमर स्थिरता पूर्वक मडराते हैं, वैसे ही संतों के हृदय में विवेक आदि को भली भांति स्थिर कर दीजिये । जैसे सरोवर के जल का पान करके जगत के सभी प्राणी प्यास बुझा कर तृप्त होते हैं, वैसे ही दादू पंथ रुप सरोवर के ५२ थांभे रुप घाटों पर जगत के संपूर्ण मानव प्राणी आत्म विचार(ब्रह्मज्ञान) रुप सुधा पान करके तृप्त होते रहें, ऐसी कृपा अवश्य कीजिये । 
(क्रमशः)

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