🌷🙏 🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
.
*दादू जे तूं जोगी गुरुमुखी, तो लेना तत्त्व विचार ।*
*गह आयुध गुरु ज्ञान का, काल पुरुष को मार ॥*
==============
*साधु-जोगी ॥*
सो जोगी बैरागी रे । जाकै अंगि बिभूति न लागी रे ॥टेक॥
जिनि जोग लियौ मन माहीं रे । माटी की मुद्रा नाहीं रे ॥
तिहि सँगि जोगणि बाली रे । सो रुणझुण कीगरि वाली रे ॥
नाद बजावै लावै ताली रे । जोगी की जुगति निराली रे ॥
एक अबिनासी ब्रतधारी रे । तिहिं कै आगै मढी हमारी रे ॥
तहाँ अणभै भिख्या कूँ धावै रे । बषनौं जहाँ अलख जगावै रे ॥७५॥
.
वही वैराग्यवान योगी है, जिसके शरीर पर, मन पर माया रूपी विभूति = भस्म न लगी हो । ऐसे योगी कपड़े पहनकर योगी नहीं बनते बल्कि मन से समस्त रागों को निकाल कर योग धारण करते हैं । ये योगी कानों में मिट्टी की मुद्रा नहीं पहनते । ये तो निरन्तर अनहदनाद श्रवण रूपी मुद्राएँ कानों में धारण करते हैं ।
.
बाली = युवावस्थायुक्त = प्रतिक्षण वर्धमान अनन्यप्रेम युक्त रामनाम स्मरण रूपी भक्ति में निमग्न जोगणि = योगिनी रूपी सुरति = चित्तवृत्ति इन योगियों के साथ रहती है । वह सुरति रामनाम स्मरण धीमी-धीमी पायल की सी ध्वनि से युक्त हुई करती है । “आसण अडिग जमाय कै, कह सास उसासाँ राम । अपणाँ ही श्रवणाँ सुणैं, तब सुरति रहै इक ठाम ॥ दूजा कोई ना सुणैं, भल बैठ्या रहौ पास । रामचरण ई रैस सूँ, दृढ़ता गह्या उपास ॥” परिणामस्वरूप तालयुक्त अनहदनाद बजता है और योगी उसको सुनकर उसमें निमग्न हो जाता है ।
.
वास्तव में योगी की युक्तियाँ = जीवनशैली सामान्यजनों से सर्वथा निराली = विलक्षण = न्यारी है । ये योगी मात्र एक अविनाशी परमात्मा की ही उपासना करने के व्रत को धारण करने वाले होते हैं । जिस स्थान पर इन योगियों के रहने की कुटिया है अर्थात् जिस सहजावस्था में ये निवास करते हैं, उसी के आगे = सामने = सदृश ही हमारा (मुझ बषनां की) कुटिया = लक्ष्य है । उस कुटिया पर अणभै भिक्षा = अपरोक्षसाक्षात्कार प्राप्त करने को ही मैं धावै = जाता हूँ, प्रयत्न करता हूँ । मैं बषनां साधना करके उसी स्थान पर अलख जगाता हूँ = परमात्मा स्वरूप आत्मा का अपरोक्ष करता हूँ ॥७५॥

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें