परमगुरु ब्रह्मर्षि श्री दादूदयाल जी महाराज की अनुभव वाणी

शुक्रवार, 20 मार्च 2026

२१. समर्थाई आश्चर्य को अंग ३३/३६

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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२१. समर्थाई आश्चर्य को अंग ३३/३६
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उभै बाहु चहु बाहु पुनि, अष्ट बाहु भुज बीस । 
सहस्त्र बाहु नहिं लिखि सकै, सुन्दर गुन जगदीस ॥३३॥
हे जगदीश्वर प्रभो ! आपका गुणानुवाद(महिमागान) कोई मनुष्य(उभयबाहु = दो भुजाओं वाला), या देव(चतुर्बाहु), या देवी(अष्टभुजा), या रावण(बीस बाहु वाला), या(सहस्रबाहु) अर्जुन भी लिखने में पूर्णतः समर्थ नहीं है ॥३३॥
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एकानन चतुराननं, पंचानन षटगीस । 
दश सहस्त्रानन कहि थके, सुन्दर गुनि जगदीस ॥३४॥
इसी प्रकार कोई एक मुख वाला(मनुष्य), या चार मुख वाला(ब्रह्मा), या पाँच मुख वाला(महादेव) या छह मुख वाला(षटगीस कार्तिकेय), या दश मुख वाला(रावण), या सहस्रमुख वाला(शेषनाग) भी आपके महिमागान में समर्थ नहीं हुआ । इन के सम्मुख मुझ अकिञ्चन भक्त सुन्दरदास की तो कथा ही क्या है ! ॥३४॥
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उभै अष्ट दश द्वादशा, अरु कहिये पुनि बीस । 
द्वै सहस्त्र लोचन थके, सुन्दर ब्रह्म न दोस ॥३५॥
इसी प्रकार, दो नेत्रों वाला कोई मनुष्य या आठ नेत्रों वाला ब्रह्मा, या दश नेत्रों वाला महादेव, बारह नेत्रों वाला कार्तिकेय, या बीस नेत्रों वाला रावण एवं दो हजार नेत्रों वाला शेषनाग भी साधना(कठोर तपस्या) करते करते थक गया; परन्तु वह भी आप निरञ्जन निराकार प्रभु का यथार्थतः गुणगान नहीं कर पाया ॥३५॥
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एक रसन चहुं रसन पुनि, पंच षष्ट दश आहि । 
द्वै सहस्त्र सुनि सेस के, बरनि सकै नहिं ताहि ॥३६॥
इसी प्रकार, कोई एक जिह्वा वाला मनुष्य, चार जिह्वा वाला ब्रह्मा, पाँच जिह्वा बाला महादेव, छह जिह्वा वाला कार्तिकेय, दश जिह्वा वाला रावण या दो हजार जिह्वा वाला शेषनाग भी आप का यथार्थतः वर्णन नहीं कर सकता ॥३६॥
(क्रमशः)

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