बुधवार, 10 जून 2026

*१८. संपत्ति विपत्ति मद हरन का अंग ~१/४*

*🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏*
*🌷卐 सत्यराम सा 卐🌷*
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
.
*१८. संपत्ति विपत्ति मद हरन का अंग ~१/४*
.
इस अंग में संपत्ति के मद से रहित और विपत्ति के क्लेश से रहित संतों का परिचय दे रहे हैं -
*संपति विपत्ति मद हरन, जा में यह मत होय ।*
*रज्जब ऋधि आये गये, जे रंग न पलटे कोय ॥१॥*
जो ऐश्वर्य के आने पर तथा जाने पर कोई प्रकार का रंग नहीं बदले अर्थात हर्ष-शोक नहीं करे, जिसके हृदय में यह एक रस रहने का सिद्धांत स्थिर हो वही व्यक्ति संपत्ति का अभिमान रूप मद और विपत्ति का क्लेश रूप मद दोनों के हृदय से दूर करने वाला होता है ।
.
*रज्जब संपति विपत्ति में, साहस एक समान ।*
*आतम अकल अतीत वह, पाया पद निर्बान ॥२॥*
जिसका साहस संपत्ति के समय तथा विपत्ति के समय एक-सा रहता है, उसी जीवात्मा ने कला विभाग से रहित, सर्वातीत निर्वाणपद को प्राप्त किया है ।
.
*मान रहित अरु मान में, सुमन समुद सम देख ।*
*संपत्ति मिले सो ना बधे, घटे न विपति विशेष ॥३॥*
समुद्र को वर्षाकाल में नदियों द्वारा जल रूप संपत्ति मिलने पर समुद्र बढ़ता नहीं और ग्रीष्म ऋतु में न आने घटता नहीं, वैसे ही संपत्ति-विपत्ति में सम रहने वाले संतों का मन अपमान होने पर और सम्मान होने पर सम देखा जाता है । न सम्मान से सुखी होता और अपमान को विपत्ति मानता, यही संतों की विशेषता है ।
.
*संपत्ति में सूधे दरसै, विपत्ति मध्य बहु बंक ।*
*रज्जब मन सु मंयक से, नहिं ईश्वर नहिं रंक ॥४॥*
चन्द्रमा सोलह कला रूप संपत्ति के समय सीधा दिखाई देता है और शुक्ल पक्ष की द्वितीया के दिन उसकी दो कला रहती है, तो भी उसमें वक्रता रहती है, अर्थात वह विपत्ति में दीन नहीं होता वैसे ही संतों के सुन्दर मन में चन्द्रमा के समान ही रहते हैं, उनमें संपत्ति के समय ईश्वरता और विपत्ति के समय रंकता नहीं आती ।
(क्रमशः)

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें