॥ दादूराम सत्यराम ॥
**श्री दादू चरितामृत(भाग-२)**
लेखक ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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**= विन्दु ९३ =**
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उपदेश के समय ही किशनसिंह कैर्या के ठाकुर भी आ गये थे । उन्होंने दादूजी से पूछा - भगवन् ! संत परमात्मा को प्राप्त करने का यत्न किस साधन से करते हैं ? तब दादूजी ने यह पद बोला -
**= किशनसिंह के प्रश्न का उत्तर =**
कोई राम का राता रे, कोई प्रेम का माता रे ॥ टेक ॥
कोई मन को मारे रे, कोई तन को तारे रे,
कोई आप उबारे रे ॥ १ ॥
कोई जोग जुगंता रे, कोई मोक्ष मुकंता रे,
कोई है भगवंता रे ॥ २ ॥
कोई सद्गति सारा रे, कोई तारण हारा रे,
कोई पीव का प्यारा रे ॥ ३ ॥
कोई पार को पाया रे, कोई मिल कर आया रे,
कोई मन को भाया रे ॥ ४ ॥
कोई है बड़भागी रे, कोई सेज सुहागी रे,
कोई है अनुरागी रे ॥ ५ ॥
कोई सब सुख दाता रे, कोई रूप विधाता रे,
कोई अमृत खाता रे ॥ ६ ॥
कोई नूर पिछाणे रे, कोई तेज को जाणे रे,
कोई ज्योति बखाणे रे ॥ ७ ॥
कोई साहिब जैसा रे, कोई सांई तैसा रे,
कोई दादू ऐसा रे ॥ ८ ॥
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सन्त जन नाना प्रकार से परमात्मा की खोज करते हैं, यह कह रहे हैं - कोई राम में अनुरक्त है, कोई राम प्रेम में मस्त हैं ।
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कोई साधन द्वारा मन को लक्ष करने में लगा है । कोई संयम द्वारा शरीर को बूरी प्रवृत्तियों से बचा रहा है । कोई अपने को प्रपंच से बचाने में लगा है ।
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कोई योग युक्तियों में लगा है । कोई अपने को मुक्त समझ कर अन्यों की मुक्ति करने में लगा है, कोई कहता है एक भगवान् ही सत्य है ।
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कोई सद्गति को ही सार समझता है । कोई पारमार्थिक उपदेश द्वारा अन्यों का उद्धार कर रहा है । कोई प्रभु का प्रेमी बन रहा है ।
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कोई ज्ञान द्वारा संसार के पार को देख रहा है । कोई समाधि में प्रभु से मिलकर आया हुआ है । कोई मन को प्रिय लगे, वैसा ही साधन करता है ।
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कोई भाग्य शाली है, कोई हृदय शय्या पर प्रभु का सुहाग सुख ले रहा है । कोई अनुरागी बन रहा है ।
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कोई समता द्वारा सबको सुख दे रहा है । कोई विधाता के स्वरूप में रत्त है । कोई ज्ञानामृत खाता है अर्थात् ज्ञान का विचार करता है ।
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कोई ईश्वर के स्वरूप को पहचानने में लगा है । कोई प्रभु के स्वरूप को तेजोमय जानकार भजता है । कोई प्रभु को ज्योति स्वरूप कहता है ।
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कोई अपने को साहिब जैसा तथा ईश्वर जैसा मानता है । कोई मैं ऐसा हूँ इत्यादिक साधन व्यवहार के द्वारा सन्त जन प्रभु को खोज रहे हैं ।
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दादूजी ने उक्त पद सुनाकर कहा - ऐसे ही संतजन नाना साधना से परमात्मा की खोज करते हैं और सभी साधन मार्ग ब्रह्मज्ञान रूप राज मार्ग में मिल जाते हैं । उक्त उत्तर सुनकर किशनसिंह समझ गये कि जैसे एक ग्राम के अनेक मार्ग होते हैं और वे सब ग्राम में पहुँचा देते हैं, वैसे ही परमात्मा की प्राप्ति के भी अनेक साधन मार्ग हैं, वे सब ही परमात्मा की प्राप्ति करा देते हैं ।
(क्रमशः)

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