मंगलवार, 14 फ़रवरी 2017

= सुख समाधि(ग्रन्थ ४/१-२) =

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🙏 *श्री दादूदयालवे नमः ॥* 🙏
🌷 *#श्रीसुन्दर०ग्रंथावली* 🌷
रचियता ~ *स्वामी सुन्दरदासजी महाराज*
संपादक, संशोधक तथा अनुवादक ~ स्वामी द्वारिकादासशास्त्री
साभार ~ श्री दादूदयालु शोध संस्थान
अध्यक्ष ~ गुरुवर्य महमंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमारामजी महाराज
https://www.facebook.com/DADUVANI
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*(ग्रन्थ ४) सुख समाधि*
*सुख समाधि१* 
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{महाकवि श्रीसुन्दरदासजी इस लघु ग्रन्थ में सुखमय समाधि का स्वानुभूत वर्णन कर रहे हैं । स्वामी शंकराचार्य आदि वेदान्त के पूर्वाचार्यों ने भी सुखा समाधि(सहज समाधि) को अनिर्वचनीय और अलौकिक बताया है । महाराज भी उसी शैली में इस समाधि अवस्था का वर्णन कर रहे हैं । वस्तुतः सुख से सोना समाधिनिष्ठ होना ही है । कहा है न "शेते सुखं कस्तु समाधिनिष्ठ:"(श्रीशंकराचार्यजी कृत प्रश्नोत्तर-रत्न मालिका में) । इस समाधि सुख का स्वाद गूँगे के गुड़ या घृत 
के स्वाद के समान है । गूँगा खाये हुए गुड़ का स्वाद कभी नहीं बता सकता । घृत का वास्तविक स्वाद भी आज तक कोई नहीं बता पाया, यद्यपि खाते सभी हैं । साधक को परमतत्व की प्राप्ति तथा स्वात्मानुभव का आनन्द जब प्राप्त होता है तो उसका सभी कर्मों से छुटकारा उसी तरह हो जाता है जैसे साँप का केंचुली से । यह अन्तर्वृत्ति और मस्ती कुछ अनुपम ही होती है । यही जीवन में सबसे उत्तम और महर्घ उपलब्धि है कि जिसके प्राप्त होने पर या जिसकी प्राप्ति के लिये संसार 
को तुच्छ समझा जाकर सर्वथा छोड़ दिया जाता है ।} 
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*= अर्थ सबइया =* 
*नमस्कार गुरुदेव ही मेरौ,*
*जिनि यह कीयौ ज्ञान प्रकाश ।*
*घी२ सौ घौंटि घट भीतरि,*
*सुख सौं सोवै३ सुन्दरदास ॥१॥*
ग्रन्थ प्रारम्भ करने से पूर्व मैं अपने गुरुदेव(श्रीदादूदयालुजी महाराज) को सादर साष्टांग दण्डवत् प्रणाम करता हूँ जिन्होंने मेरे हृन्मन्दिर में अद्वैतज्ञान का प्रकाश कर दिया है तथा जिसके सहारे आज मैं(श्रीसुन्दरदासजी) चित्त के अन्दर ही अन्दर पूर्ण समाधि का उसी तरह आनन्द ले रहा हूँ, जैसे साधारण व्यक्ति घी की डली खाकर उसका आनन्द लिया करता है ।(घी की उपमा से कवि कहना चाहते हैं कि जैसे उस खाये हुये घी के आनन्द का कोई भी व्यक्ति वर्णन नहीं कर सकता, उसी तरह मैं भी अपने इस समाधिसुख का इदन्तया या इत्थन्तया वर्णन नहीं कर सकता) ॥१॥ 
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(१. इस ग्रन्थ में सुखसमाधि(इंद्रियों का निरोध) होकर बृत्तियां सिमट कर अंतर्मुखी हो जांय और ज्ञान के प्रकाश में समाधि लगै, परब्रह्म का अपरोक्ष ज्ञान हो, उस अवस्था में जो ब्रह्मानन्द का 'सुख' मिलता है
उसही के वर्णन की चेष्ठा श्री सुन्दरदास जी ने भांति-भांति से की है । यद्यपि 'जिन जाना तिन न बखाना' । पहुंच गये सो फिर क्या कह सकते हैं । तब भी जिज्ञासु की संतुष्टि के निमित्त शिष्य की शांति के अर्थ, यह शैली अवधारित की है ।
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(२. 'घी सो घौंटि रह्यौ घट भीतर' = यह एक कहने का ढंग है । घी अति सरस, चिकना, अमृतोपम, निःस्वादु पदार्थ है । उसके खाने में जो आनन्द आता है वह अकथनीय है । वैसे ही ब्रह्मानन्द का सुख कहने में नहीं आता । घी के खाने पर जो आल्हाद आता है उसी का उदाहरण है ।) 
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{३. सुख सो सौंवै = "शेते सुखं कस्तू समाधिनिष्ट:" 'प्रश्नोत्तररत्नमालिका' में श्री जगद्गुरु शंकराचार्यजी ने कहा है । इस सुख का स्वाद गूँगे के गुड़ के समान है । साधक को तत्व(ज्ञान) की प्राप्ति और अतत्व(अज्ञान) की हानि ही अपेक्षित है ।} 
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*गई गोपि ह्वै भक्ति आगिली,*
*काढे प्रगट पुरातन खास ।*
*घी सौं घौंटि रह्यौ घट भीतर,*
*सुख सौं सोवै सुन्दरदास ॥२॥*
इस समाधि सुख के प्राप्त होने पर, भक्तियोग(हठयोग तथा ज्ञानयोग सहित) समाप्त हो गया(अर्थात् उनकी साधना की अब कोई आवश्यकता नहीं रह गयी) । अब तो साधक अपनी आत्मा में दबे हुए प्राचीन ज्ञान के संस्कार का उदय हो जाने से परम सत्यस्वरूप ब्रह्म की प्राप्ति की मौज से अपने दिल के भीतर ही भीतर आठों पहर इसी सुख का आनन्द ले रहा है ॥२॥
(क्रमशः)

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