मंगलवार, 14 फ़रवरी 2017

= ७५ =

卐 सत्यराम सा 卐
ज्ञानी पंडित बहुत हैं, दाता शूर अनेक ।
दादू भेष अनन्त हैं, लाग रह्या सो एक ॥ 
टीका ~ हे जिज्ञासुओं ! दिखावे के ज्ञानी, बराये नाम पंडित, तमोगुणी या रजोगुणी दाता, शूर कहिये घर में शूरवीर, ऐसे अनेकों हैं । इसी प्रकार स्वांग - धारियों का तो कोई पार ही नहीं है, परन्तु निष्काम भाव से प्रभु का पतिव्रत - धर्म धारण करने वाले भेषधारी मुक्तजन, तो कोई बिरले ही होते हैं । अपनी - अपनी भावनानुसार भक्तों के चिन्ह तो अनेक बनाते हैं, किन्तु उपास्य देव अद्वैत ब्रह्म तो, एक रस सजातीय विजातीय स्वगत - भेद रहित, एक ही है ॥ 
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बाहर दादू भेष बिन, भीतर वस्तु अगाध ।
सो ले हिरदै राखिये, दादू सन्मुख साध ॥ 
टीका ~ हे जिज्ञासुओं ! शरीर तो जिनका भेष आदि चिन्ह से रहित है और भीतर अन्तःकरण ज्ञान, भक्ति, वैराग्य से परिपूर्ण है अर्थात् प्रभु की लय में मन स्थिर हो रहा है । ऐसे मुक्त - पुरुषों की आज्ञा में कहिए, उनके उपदेश में, साधक पुरुषों को स्थिर रहना चाहिए । तब ही उनका कल्याण है ॥ 
(श्री दादूवाणी ~ भेष का अंग)

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