卐 सत्यराम सा 卐
**श्री दादू अनुभव वाणी** टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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**= लै का अँग ७ =**
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आदि अंत मधि एक रस, टूटे नहिं धागा ।
दादू एकै रह गया, तब जाणी जागा ॥४०॥
साधन आरँभ काल से लेकर मध्य में कहीं किसी हेतु को पाकर अपने साधन का तार टूटे नहीं, अन्त तक लगातार एक रस चलता रहे तथा साधन करते - करते अद्वैत ब्रह्म में स्थिर होकर साँसारिक भावनाओं में जाने से रुक जाय, तब जानना चाहिए - यह अज्ञान निद्रा से जागकर अपने वास्तविक स्वरूप में स्थिर हुआ है ।
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जब लग सेवक तन धरे, तब लग दूसर आइ ।
एकमेक ह्वै मिल रहे, तो रस पीवन तैं जाइ ॥४१॥
इसमें अद्वैत और द्वैत वादियों के विचार का प्रदर्शन है - अद्वैत - वादी कहता है - "जब तक सेवक भाव से शरीर धारण किये रहता है तब तक तो द्वैत की भावना हृदय में आती ही है, द्वैत नहीं मिटता ।" द्वैत - वादी कहता है - "भक्त यदि एक अद्वैत ब्रह्म में मिलकर एक हो जायेगा तो वह भक्ति - रस - पान से वँचित रह जायगा, जो शरीर रहते हुये आवश्यक है ।"
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ये दोनों ऐसी कहैं, कीजे कौन उपाइ ।
ना मैं एक न दूसरा, दादू रहु ल्यौ लाइ ॥४२॥
इति लै का अँग समाप्त: ॥७॥सा - ९०१॥
४१ में स्थित विवाद निर्णयार्थ प्रश्न करते हैं - भगवन् ! द्वैताद्वैत - वादी उक्त प्रकार विवाद में रत हैं । इस विवाद से मुक्त होने के लिए हमें क्या उपाय करना चाहिये ? भगवान् उत्तर दे रहे हैं - न मैं अद्वैत हूं और न द्वैत हूं । मुझ निर्विशेष में एकत्व, अन्यत्व, सँख्यादि विशेषण नहीं लग सकते । यदि मेरा वास्तविक स्वरूप जानना चाहो तो अपनी भावनानुसार मेरे में ही निरँतर वृत्ति लगाकर स्थिर रहो । इस प्रकार लय योग की प्रेरणा भगवान् भी करते हैं । अत: लय - योग कर्त्तव्य है ।
इति श्री दादू गिरार्थ प्रकाशिका लै का अँग समाप्त ॥७॥
(क्रमशः)

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