卐 सत्यराम सा 卐
**श्री दादू अनुभव वाणी** टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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**= निष्कामी पतिव्रता का अँग ८ =**
दादू जब तन मन सौंप्या राम को, ता सन का व्यभिचार ।
सहज शील सँतोष सत, प्रेम भक्ति लै सार ॥३७॥
राम ! जब आप को तन - मन समर्पण कर दिया, तब उस निष्काम पतिव्रतयुक्त साधक -
सुन्दरी से व्यभिचार कैसा ? अर्थात्
उसे अपने से दूर क्यों रखते हो ? उसने तो स्वभाव से ही शील - व्रत, सँतोष, सत्य, नवधा भक्ति, प्रेम और लय योग को ही सार समझ कर
अपनाया है । अत: उसे दूर रखना योग्य नहीं ।
.पर पुरुषा सब परहरै, सुन्दरि देखे जाग ।
अपना पीव पिछान कर, दादू रहिये लाग ॥३८॥
साधक - सुन्दरी को चाहिये - भगवान् से भिन्न देवतादि की उपासना छोड़ दे । फिर निष्काम - पतिव्रत रूप अनन्य भक्ति द्वारा ज्ञान - जाग्रत में आकर प्रभु को देखे और उस अपने परब्रह्म पति को पहचान कर, उसी में अद्वैत भाव से अपनी वृत्ति लगा कर रहे, तभी नित्य - सुहाग प्राप्त हो सकता है ।
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आन पुरुष हूं बहिनड़ी, परम पुरुष भरतार ।
हूं अबला समझूँ नहीं, तूँ जाने करतार ॥३९॥
भगवान् से भिन्न जितने पुरुष हैं, उनकी तो मैं बहिन हूं; वे मेरे उपास्य हो नहीं सकते । मेरा स्वामी तो परम पुरुष ब्रह्म ही है । हे सृष्टि के निमित्त कारण परब्रह्म ! मैं तो साधन - बल - हीन अबला हूं, नित्य, सुहाग प्राप्त होने का उपाय भी नहीं जानती । अत: आप ही कृपा करके मुझे अपनी नित्य समीपता रूप सुहाग दें ।
(क्रमशः)

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