॥ दादूराम सत्यराम ॥
**श्री दादू चरितामृत(भाग-२)**
लेखक ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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**= विन्दु ९३ =**
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फिर हमीरसिंह ने दादूजी से पूछा - भगवन् ! आपको अति प्रिय क्या है ? तब संत प्रवर दादूजी ने महाराज ने यह पद बोला -
**= हमीरसिंह के प्रश्न का उत्तर =**
"ऐन१ एक सो मीठा लागे,
ज्योति स्वरूपी ठाढ़ा आगे ॥ टेक ॥
झिलमिल करणा, अजरा जरणा,
नीझर भरणा, तहँ मन धारणा ॥ १ ॥
निज निराधारं, निर्मल सारं,
तेज अपारं, प्राण आधारं ॥ २ ॥
अगहा गहणा, अकहा कहणा,
अलह लहणा, तहँ मिल रहणा ॥ ३ ॥
निरसँघ नूरं, सब भर पूरं,
सदा हजूरं, दादू सूरं ॥ ४ ॥
जो यथार्थ१ ज्योति - स्वरूप अद्वैत ब्रह्म हमारे ज्ञान - विचार नेत्रों के सामने खड़े हैं वे हमको अतिप्रिय लगते हैं । जिनका प्रकाश झिलमिलाहट कर रहा है, जो अन्य से न पचने वाले संसार को पचाने वाले हैं । परमानन्द - रस के गिराने वाले निर्झर हैं, निज स्वरूप हैं, निराधार, निर्मल, विश्व के सार, प्राणाधार, अपार तेज स्वरूप हैं । उन्हीं परब्रह्म के स्वरूप में हमें मन रखना है । जो ग्रहण करने में नहीं आते, उन्हीं ब्रह्म को व्यापक रूप से ग्रहण करना है । जिनका पूर्ण रूप से कथन नहीं होता, उन्हीं ब्रह्म के विषय में कहना है तथा जो अन्य रूप से प्राप्त नहीं होते, उन्हीं ब्रह्म को स्वस्वरूप रूप से प्राप्त करना हमारा काम है । जिनका स्वरूप संधि रहित है, जो सब विश्व में परिपूर्ण हैं, सूर्यवत सदा ज्ञान - विचार नेत्रों के सामने हैं, उन्हीं परब्रह्म में मिलकर हमें रहना हैं । दादूजी महाराज ने जब अपने परम प्रेम का आस्पद परमात्मा परब्रह्म को बताया तब हमीरसिंह आश्चर्य चकित होकर दादूजी महाराज की ओर देखने लगे । कारण, उन्होंने तो सोचा था स्वामीजी को जो वस्तु प्रिय होगी वही मैं सेवा में उपस्थित करूंगा किन्तु संतों का सांसारिक पदार्थों में प्रेम होता ही नहीं, वे तो प्रभु में ही प्रेम करते हैं, अन्य में नहीं ।
(क्रमशः)

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