शुक्रवार, 7 नवंबर 2025

*८. नारी पुरुष श्लेष को अंग १३/१६*

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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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*८. नारी पुरुष श्लेष को अंग १३/१६*
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नारी जाकै हाथ में, सोई जीवत जानि । 
नारी कै संग बहि गयौ, सुन्दर मृतक बखानि ॥१३॥
संसार में नारी या नाडी जिसके हाथ(पकड़ = अधीनता) में है उसी को 'जीवित' समझना चाहिये । श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - जो यहाँ नारी के अनुसार चलने लगा उसे 'मृतक' के समान है ॥१३॥
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नारी फिरै गली गली, ताकौं लज्या नांहिं । 
सुन्दर मार्यौ सरम कौ, पुरुष घुस्यौ घर मांहिं ॥१४॥
कुलटा नारी निर्लज्ज होकर जहाँ तहाँ जिस तिस पुरुष के पास जाती आती रहती है । श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - उस के इस हीन कृत्य से लज्जित होकर वह अपने घर में छुप कर बैठा रहता है ॥ (नाडी पक्ष में -) वातादि दोषों से कुपित होकर नाडी इस या उस रोग को उत्पन्न करती रहती है । इन रोगों से व्यथित होकर रोगी पुरुष अपने घर में खाट पर पड़ा रहता है ॥१४॥
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नारी डोलै भटकती, पुरुषहिं नहीं बिसास । 
मति कहुं अटकै और सौं, मोतें होइ उदास ॥१५॥ 
जब कोई कुलटा रत्री, कोई न कोई बहाना बना कर घर से बाहर निकलती है तो उस पर पुरुष विश्वास नहीं करता । उस को यही सन्देह रहता है कि यह कहीं दूसरे घर जाकर किसी अन्य पुरुष से अपवित्र देह सम्बन्ध न स्थापित कर ले ! (नाडी के सम्बन्ध में ऐसा ही अर्थ समझ लें) ॥१५॥
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सुन्दर पिय की लाडिली, नारी सौं अति नेह । 
जाइ दिखावै और कौं, चूक पुरुष की येह ॥१६॥
महात्मा श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - कोई पुरुष अपनी प्रियतमा से भले ही अतिशय स्नेह करता हो, परन्तु उस से यही प्रमाद हो जाता है कि वह अपनी नारी किसी दूसरे पुरुष को(नाडीपक्ष में - किसी साधारण वैद्य को) दिखा देता है ॥१६॥
(क्रमशः)

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