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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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*८. नारी पुरुष श्लेष को अंग १७/२०*
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सुन्दर पिय अति बावरौ, ह्वै करि जाइ अनाथ ।
नारी अपनी आनि कै, देइ और कै हाथ ॥१७॥
महात्मा श्रीसुन्दरदासजी कहते है - नारी के प्रियतम का यही प्रबल प्रमाद हो जाता है कि वह अपनी नारी को, अनाथ समझ कर, दूसरे के हाथ में दे देता है । (नाडी पक्ष में भी यही समान अर्थ समझ लें) ॥१७॥
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सुन्दर पीव कहा करै, नारी चंचल होइ ।
न्याइ दिखावै और कौं, जे समुंझावै कोइ ॥१८॥
महात्मा श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - यदि उस की नारी चञ्चलमन हो तो बेचारां वह पति भी क्या करे ! वह उस नारी को कोई बात समझाता भी है तो वह अन्य का अन्य उदाहरण देकर उस की बात को काट देती है ॥१८॥
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छाड्यौ चाहै पीव कौं, नारी पर घर जाइ ।
सुन्दर चंचल चपल अति, तासौं कहा बसाइ ॥१९॥
कोई कुलटा स्त्री पराये घर जा कर अपने पूर्व पति को छोड़ना चाहती है । श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - ऐसी चञ्चलबुद्धि स्त्री या नाडी पर उस सहज स्वभाव पति या स्वस्थ पुरुष का क्या वश चलेगा ! ॥१९॥
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समझावन कौं ल्याइये, भलौ सयानौ कोइ ।
तासौं बोलै आकरी, कै कहुं खबर न होइ ॥२०॥
यदि वह उस को समझाने के लिये किसी बुद्धिमान् को अपने घर बुलाता है तो वह उस से भी कठोर(आकरी) वाणी बोलती है, तथा धमकी देती है कि यह बात किसी अन्य से न कहना, अन्यथा उचित नहीं होगा ॥२०॥
(क्रमशः)

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