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*॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥*
*॥ दादूराम~सत्यराम ॥*
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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१२ आचार्य नारायणदास जी ~
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जयपुर राज्य की रसोई ~
नारायणा दादूधाम में फाल्गुण शुक्ला में होने वाले मेले के समय में एक दिन की रसोई जयपुर राज्य की ओर से होती थी । उसका सब प्रबन्ध जयपुर राज्य के कर्मचारी ही करते थे । जयपुर राज्य के उस समय रसोई के ७५०) रु. लगते थे । किन्तु आगे चलकर ७५०) रु. नारायणा दादूधाम के आचार्य जी के पास मेले से पहले ही भेज देते थे ।
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उसका प्रबन्ध साधु ही करते थे । फिर वे रु. जयपुर राज्य से आने बन्द हो गये । तब आचार्य नारायणदासजी महाराज ने ता. २२ अक्टूबर सन् १८४९ को जयपुर नरेश स्मरण कराया कि - नारायणा दादूधाम के मेले के अवसर पर साधुओं के भोजन के लिये जो आपके राज्य से ७५०) रु. वार्षिक आते थे वे बन्द हैं, नहीं आ रहे हैं ।
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तब जयपुर नरेश ने उसी वर्ष अपने मंत्री को पूछा कि जो नारायणा दादूधाम दादूद्वारे के मेले के समय साधुओं के एक दिन के भेाजन के लिये ७५०) रु. सदा जयपुर राज्य से जाते थे, वे बन्द क्यों कर दिये हैं ? वे पुन: पूर्ववत मेले से पहले भेज देने चाहिये ।
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यह रसोई हमारे पूर्वज नरेशों द्वारा जब से मेला भरना आरंभ हुआ है तब से ही दी जा रही है । अत: यह बन्द नहीं होनी चाहिये । राजा की आज्ञा होने पर उसी वर्ष मेले से पहले ही ७५०) रु. नारायणा दादूधाम में पहुँचा दिये और प्रति वर्ष मेले से पहले ही पहुँचाने लगे । जब तक प्रजातंत्र नहीं हुआ था, तब तक वे ७५०) रु. ठीक समय पर आते रहते थे ।
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प्रजातंत्र होने पर बन्द हो गये मेले पर अन्य रसोइयां मेले के समय राजस्थान तथा अन्य प्रान्तों के बडे छोटे नरेशो की तथा सेठों की रसोइयां भी आती थीं । किन्तु जयपुर राज्य की रसोई के समान प्रति वर्ष नियम पूर्वक नहीं आती थी । जब जिनकी इच्छा होती थी तब वे भेज देते थे तथा स्वयं मेले में आकर संत दर्शन करते थे और रसोई भी देते थे । आगे चलकर स्थानधारी साधुओं की भी रसोइयां होना आरंभ हो गया था, सो अब तक होती ही रहती हैं ।
(क्रमशः)

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