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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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*१५. मन कौ अंग २९/३२*
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ज्यौं बाजीगर करत है, कागद मैं हथफेर ।
सुन्दर ऐसैं जानिये, मन मैं धरन सुमेर ॥२९॥
हमारा मन भी कभी कभी बाजीगर के समान ही ऐसा हस्तकौशल(हथफेरी) दिखाता रहता है । वह अपनी कल्पना में कभी पृथ्वी को सुमेरु(पर्वत) एवं कभी पर्वत को पृथ्वी बनाता रहता है ॥२९॥
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सुन्दर यह मन भूत है, निस दिन बकतें जाइ ।
चिन्ह करै रोवै हंसै, खातें नहीं अघाइ ॥३०॥
हमारा यह मन कभी किसी भूत प्रेत के समान निरर्थक प्रलाप(अप्रासङ्गिकः बातें) भी करने लगता है । वह कभी कभी अकारण ही रोने या हँसने लगता है । कभी कोई पदार्थ इतना खाने(भोगने) लगता है कि उससे इस की तृप्ति(सन्तोष) ही प्रतीत नहीं होती ! ॥३०॥
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सुन्दर यह मन चपल अति, ज्यौं पीपर कौं पांन ।
बार बार चलिबौ करै, हाथी कौ सौ कांन ॥३१॥
श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - प्राणियों का मन इतना चञ्चल होता है कि इस की तुलना पीपल वृक्ष के पत्ते से या हाथी के कान से ही की जा सकती है । अर्थात् यह भी पीपल के पत्ते के समान अपनी चञ्चलता दिखाता हुआ निरन्तर इधर उधर की सांसारिक बातों में चलायमान ही रहता है ॥३१॥
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सुन्दर यह मन यौं फिरै, पांनी कौ सौ घेर ।
बायु बघूरा पुनि ध्वजा, यथा चक्र कौ फेर ॥३२॥
प्राणियों का मन जल में पड़ी हुई भँवरी(जलावर्त) या वात्याचक्र(तूफान) के समान निरन्तर इधर उधर उसी प्रकार चक्कर लगाता रहता है, जैसे गाड़ी का चक्का निरन्तर घूमा करता है ॥३२॥
(क्रमशः)

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