गुरुवार, 1 जनवरी 2026

श्रीरामकृष्ण और पापवाद

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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
🌷 *#श्रीरामकृष्ण०वचनामृत* 🌷
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*जब मानसरोवर पाइये, तब छीलर को छिटकाइ ।*
*दादू हंसा हरि मिले, तब कागा गये बिलाइ ॥*
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साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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*(६)श्रीरामकृष्ण और पापवाद*
स्वामीजी के गुरुदेव भगवान श्रीरामकृष्ण कहा करते थे, "ईश्वर का नाम लेने से तथा आन्तरिकता के साथ उनका चिन्तन करने से पाप भाग जाता है - जिस प्रकार रूई का पहाड़ आग लगते ही क्षण भर में जल जाता है, अथवा वृक्ष पर बैठे हुए पक्षी ताली बजाते ही उड़ जाते हैं ।" एक दिन केशवबाबू के साथ वार्तालाप हो रहा था –
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श्रीरामकृष्ण - (केशव के प्रति) - मन से ही बद्ध और मन से ही मुक्त है । मैं मुक्त पुरुष हूँ, - संसार में रहूँ या जंगल में - मुझे कैसा बन्धन ? मैं ईश्वर की सन्तान हूँ, राजाधिराज का पुत्र हूँ, मुझे भला कौन बाँधकर रखेगा ? यदि साँप काटे, तो 'विष नहीं है, विष नहीं है' ऐसा जोर देकर कहने से विष उतर जाता है । उसी प्रकार 'मैं बद्ध नहीं हूं.' 'मैं बद्ध नहीं हूँ,' 'मैं मुक्त हूँ' इस बात को जोर देकर कहते कहते वैसा ही बन जाता है - मुक्त ही हो जाता है ।
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"किसी ने ईसाइयों की एक पुस्तक(Bible) दी थी । मैंने उसे पढ़कर सुनाने के लिए कहा, उसमें केवल 'पाप' और 'पाप' था !
"तुम्हारे ब्राह्मसमाज में भी केवल 'पाप' और 'पाप' है ! जो बार बार कहता है 'मैं बद्ध हूँ' 'मैं बद्ध हैं' वह अन्त में बद्ध ही हो जाता है । जो दिन-रात 'मैं पापी हूँ' 'मैं पापी हूँ' ऐसा कहता रहता है वह वैसा ही बन जाता है !
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"ईश्वर के नाम पर ऐसा विश्वास होना चाहिए - 'क्या ! मैंने ईश्वर का नाम लिया, अब भी मेरा पाप रहेगा ? मेरा अब बन्धन क्या है, पाप क्या है ?' कृष्णकिशोर परम हिन्दू सदाचारी ब्राह्मण है । वह वृन्दावन गया था । एक दिन घूमते-घूमते उसे प्यास लगी । एक कुएँ के पास जाकर देखा - एक आदमी खड़ा है । उससे कहा, 'अरे, तू मुझे एक लोटा जल दे सकेगा ? तेरी क्या जात है ?' उसने कहा, 'पण्डितजी, मैं नीच जाति का हूँ - मोची हूँ ।' कृष्णकिशोर ने कहा, 'तू 'शिव' कह और जल खींच दे ।'
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"भगवान का नाम लेने से देह-मन शुद्ध हो जाते हैं । केवल 'पाप' और 'नरक' की ये सब बातें क्यों ? एक बार कहो कि मैंने जो कुछ अनुचित काम किया है वह अब और नहीं करूँगा । साथ ही ईश्वर के नाम पर विश्वास करो ।"
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स्वामीजी ने भी ईसाइयों के इस पापवाद के सम्बन्ध में कहा है, "पापी क्यों ? तुम लोग अमृत के अधिकारी हो(Sons of Immortal Bliss) ! तुम्हारे धर्माचार्य जो दिनरात नरकाग्नि की बातें बताया करते हैं, उसे मत सुनो !" –
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"... तो तुम तो ईश्वर की सन्तान हो, अमर आनन्द के अधिकारी हो, पवित्र और पूर्ण आत्मा हो । तुम इस मर्त्यभूमि पर देवता हो, तुम पापी ? मनुष्य को पापी कहना ही महा पाप है । विशुद्ध मानव आत्मा को तो यह मिथ्या कलंक लगाना है । उठो ! आओ ! ऐ सिंहो ! तुम भेड़ हो इस मिथ्या भ्रम को झटककर दूर फेंक दो । तुम तो जरा-मरण-रहित एवं नित्यानन्दस्वरूप आत्मा हो । तुम जड़ पदार्थ नहीं हो । तुम शरीर नहीं हो । जड़ पदार्थ तो तुम्हारा गुलाम है, तुम उसके गुलाम नहीं ।....” -'हिन्दू धर्म' से उद्ध्रत
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अमरीका में हार्टफोर्ड नामक स्थान पर स्वामीजी भाषण देने के लिए आमन्त्रित हुए थे । यहाँ के अमरीकन कॉनसल(Consul) पैटर्सन उस समय वहाँ पर उपस्थित थे तथा सभापति थे । स्वामीजी ने ईसाइयों के पापवाद के सम्बन्ध में कहा था – "... वह क्या लोगों को घुटने टेककर यह चिल्लाने की सलाह दे कि 'ओह, हम कितने पापी हैं !' नहीं, प्रत्युत आओ, हम उन्हें उनके दैवी स्वरूप का ख्याल करा दें । ...
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यदि कमरा अँधेरा हो तो क्या तुम अपनी छाती पीटते हुए यह चिल्लाते जाते हो कि 'कमरा अँधेरा है !' 'कमरा अँधेरा है ।' नहीं, उजाला करने का एक मात्र उपाय है रोशनी जलाना, और तब अँधेरा भाग जाता है । उसी प्रकार आत्मज्योति के दर्शन का एकमात्र उपाय है अन्दर में आध्यात्मिक ज्योति जलाना, और तब पाप और अपवित्रता-रूपी अन्धकार दूर भाग जायगा । अपने उच्चतर स्वरूप का चिन्तन करो, क्षुद्र स्वरूप का नहीं ।"
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फिर स्वामीजी ने एक कहानी*(*यह कहानी सांख्यदर्शन में है- आख्यायिका-प्रकरण) सुनायी, जो उन्होंने श्रीरामकृष्णदेव से सुनी थी -
"एक बाघिनी ने बकरों के एक झुण्ड पर आक्रमण किया । वह पूर्ण गर्भवती थी, इसलिए कूदते समय उसे बच्चा पैदा हो गया । बाघिनी वहीं मर गयी । बच्चा बकरों के साथ पलने लगा और उनके साथ घास खाने लगा तथा 'में' 'में' भी कहने लगा । कुछ दिनों बाद वह बच्चा बड़ा हुआ ।
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एक दिन उस बकरों के झुण्ड पर एक बाघ ने आक्रमण किया । वह बाघ यह देखकर हैरान रह गया कि एक बाघ घास खा रहा है तथा 'में' 'में' कर रहा है और उसे देखकर बकरों की तरह भाग रहा है । तब वह उसे पकड़कर जल के पास ले गया और कहा, 'देख, तू भी बाघ है, तू घास क्यों खा रहा है और 'में' 'में' क्यों कर रहा है ? - देख, मैं कैसा माँस खाता हूँ । ले तू भी खा । और जल में देख, तेरा चेहरा भी कैसा बिलकुल मेरे ही जैसा है ।' उस छोटे बाघ ने वह सब देखा, माँस का आस्वादन किया और अपना असली रूप पहचान गया ।"
(क्रमशः)

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