#daduji
卐 सत्यराम सा 卐
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*सवैया ग्रन्थ(सुन्दर विलास)*
साभार ~ @महंत बजरंगदास शास्त्री जी,
पूर्व प्राचार्य - श्री दादू आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(जयपुर) व
राजकीय आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(चिराणा, झुंझुनूं, राजस्थान)
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*पढ़े के न बैठ्यो पास आखिर न बांचि सकै,*
*बिन ही पढ़े तैं कैसें आवत है फ़ारसी ।*
*जौंहरी के मिलै बिन परख न जानैं कोई,*
*हाथ नग लिये फिरै संशै नहिं टारसी ॥*
*वैद हू मिल्यौ न कोऊ बूंटी कौ बताइ देत,*
*भेद बिनु पाये वाकै औषध है छारसी ।*
*सुन्दर कहत मुख रंच हूं न देख्यौ जाइ,*
*गुर बिन ज्ञान ज्यौं अंधेरै मांहि आरसी ॥१६॥*
गुरु के बिना ज्ञान का असम्भव :
१. जब तक कोई विद्यार्थी पहले से किसी पाठशाला में पढ़कर नहीं आयगा या उसे अक्षर ज्ञान न होगा, तो वह कुछ भी पढ़े बिना फारसी के समान किसी गम्भीर भाषा का ज्ञान कैसे प्राप्त कर सकेगा !
२. जैसे हाथ में लिये हुए रत्न की परीक्षा किसी जौहरी(रत्न - परीक्षक) के बिना नहीं हो सकती, भले ही वह उसे लेकर कहीं भी फिरता रहे, उसका वह रत्नविषयक सन्देह निराकृत नहीं हो सकता ।
३. जैसे किसी औषध की वास्तविकता ज्ञानी वैद्य के बिना नहीं जानी जा सकती, फिर वास्तविकता जाने बिना वह औषध उसके लिये राख के समान ही है ।
४. जैसे अन्धकार होने पर किसी दर्पण में अपनी मुखाकृति नहीं देखी जा सकती; श्री सुन्दरदास जी कहते हैं - इसी तरह गुरु द्वारा ज्ञान प्राप्त किये बिना साधक की सन्मार्ग में प्रवृत्ति नहीं हो सकती ॥१६॥
(क्रमशः)

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