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बुधवार, 15 सितंबर 2021

= २०० =

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*हिरदै राम सँभाल ले, मन राखै विश्‍वास ।*
*दादू समर्थ सांइयां, सब की पूरै आस ॥*
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साभार विद्युत् संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
साभार ~ ### स्वामी श्री नारायणदासजी महाराज, पुष्कर, अजमेर ###
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श्री दृष्टान्त सुधा - सिन्धु --- *॥ ५ अर्चना भक्ति ॥*
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॥ अपने पूजक की लाज भगवान् रखते हैं ॥
अपने पूजक की प्रभू, रख लेते हैं लाज ।
देवहित केश श्वेत किये, लाख लज्जित नरराज ॥१३७॥
दृष्टांत कथा – उदयपुर के पास के श्री चतुर्भुज स्वामी के मन्दिर के पुजारी वृद्ध ब्राह्मण देवाजी थे । एक दिन रात्रि के शयन के समय वे भगवान् की पुष्पमाला अपने शिर पर लपेट कर भगवान को शयन कराने के विचार में थे कि महाराणा आगये ।
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देवाजी ने शीघ्र शिर की माला उतार करके राणाजी को पहना दी । माला में राणा को एक श्वेत केश दीख पड़ा । राणा ने देवाजी से कहा – 'क्या भगवान् के केश भी श्वेत होगये' देवाजी हां, जी होगये ।' 'राणा – तो प्रभात मैं भी देखूंगा ।' यह कह कर राणा चले गये । देवाजी ने रात्रि भर भगवान् से प्रार्थना की कि 'मेरी लाज रखना ।' उनकी प्रार्थना स्वीकृत होगई ।
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प्रभात राणा ने आकर देखा तो भगवान् के केश अवश्य श्वेत है । कहीं देवा ने नकली लगा दिये होंगे यह सोच कर परीक्षा के निमित्त एक केश खेंचा तो मूर्ति का नाक चढ़ गया और केश के टूटते ही उसके स्थान से रक्त की धार निकली जो राणा के वस्त्रों पर जाकर पड़ी । यह देखकर राणा मूर्छित सा होगया और होश आने पर देवाजी से क्षमा माँगी । इससे सूचित होता है कि पूजक की लाज हरि रखते हैं ।

= १९९ =

 
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*ज्यों जल पैसे दूध में, ज्यों पानी में लौंन ।*
*ऐसैं आत्मराम सौं, मन हठ साधै कौंन ॥*
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साभार विद्युत् संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
साभार ~ ### स्वामी श्री नारायणदासजी महाराज, पुष्कर, अजमेर ###
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श्री दृष्टान्त सुधा - सिन्धु --- *॥ ५ अर्चना भक्ति ॥*
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*॥ सच्चे पूजक की रोटी भगवान् नित्य खाते हैं ॥*
सच्चे पूजक की प्रभू, रोटी प्रतिदिन खाय ।
धन्ना की खाते रहे, हरि मन में हर्षाय ॥१३६॥
दृष्टांत कथा – एक जाट के लड़के का नाम था धन्ना । एक बार उनके घर एक ब्राह्मण आया था । उसे पूजा करते देख कर बालक धन्ना ने भी पूजा करने के लिये उससे मूर्ति माँगी । प्रथम तो ब्राह्मण नट गया किन्तु अन्त में बाल हट देख कर एक काला पत्थर दे दिया ।
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वह गो चराने जाता था । जंगल में तालाब पर जाकर उसने पूजा आरम्भ की । पूजा समाप्त होते ही उसकी माता रोटियां लेकर आई । बालक ने रोटियां भगवान् के आगे रखदी । जब बहुत विनय करने पर भी भगवान् ने रोटी नहीं खाई तब धन्ना ने भी नहीं खाकर रोटियां तालाब में डालदी । इसी प्रकार कई दिन बीत गये । भूख से धन्ना बहुत कमजोर होगया ।
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अन्त में भगवान् प्रसन्न हुये और प्रगट होकर उसकी रोटी खाने लगे । जब आधा भोजन खा चुके तब धन्ना ने कहा –'क्या सब तुमही खाजाओगे कुछ मुझे भी तो दो ।' भगवान् हँसे और बची रोटी धन्ना को दे दी । अब प्रति दिन की ऐसी ही व्यवस्था होगई । इससे सूचित होता है कि सच्चे पूजक की रोटी भगवान् प्रति दिन खाते हैं ।

सोमवार, 13 सितंबर 2021

= १९८ =

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*हिरदै राम सँभाल ले, मन राखै विश्‍वास ।*
*दादू समर्थ सांइयां, सब की पूरै आस ॥*
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साभार विद्युत् संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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श्री दृष्टान्त सुधा - सिन्धु --- *॥ ५ अर्चना भक्ति ॥*
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*॥ अर्चना भक्त की प्रतिज्ञा प्रभु रखते हैं ॥*
निज अर्चक की प्रतिज्ञा, पूर्ण करत भगवान् ।
पृथ्वीराज ने तन तजा, मथुराजी में आन ॥१३५॥
दृष्टांत कथा – राजा पृथ्वीराज, बीकानेर नरेश कल्याणसिंहजी के पुत्र थे । वे भगवान् कि अर्चना भक्ति में ऐसे रत थे कि एक बार कहीं प्रदेश में गये हुये थे, वहां मानस पूजा करते समय उन्हें अपनी राजधानी के मन्दिर में दो दिन तक भगवत् मूर्ति के दर्शन नहीं हुये फिर तीसरे दिन हुये । समाचार मँगवाने से ज्ञात हुआ कि मन्दिर की मरम्मत हो रही थी इस लिये श्रीनाथजी दो दिन दुसरे स्थान में थे ।
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पृथ्वीराज की प्रतिज्ञा थी कि – 'मथुरा में देह त्याग करूंगा । बादशाह को जब ज्ञात हुआ तो उसने द्वेष से उन्हें काबुल के युद्ध में भेज दिया । जब उनके मृत्य का समय निकट आया तब भगवान् ने उन्हें बतला दिया । वे तुरन्त एक शीघ्रगामी सांडिनी पर चढ़ करके मृत्यु के समय मथुरा में आ पहुंचे और उनकी प्रतिज्ञा पूर्ण होगई । इससे सूचित होता है कि अर्चक की प्रतिज्ञा प्रभु पूर्ण करते हैं ।

= १९७ =

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*दादू मनसा वाचा कर्मणा, साहिब का विश्‍वास ।*
*सेवक सिरजनहार का, करे कौन की आस ?*
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साभार विद्युत् संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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श्री दृष्टान्त सुधा - सिन्धु --- *॥ ५ अर्चना भक्ति ॥*
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*॥ सच्चे युवक का भोग भगवान् तत्काल लेते हैं ॥*
सच्चे पूजक का प्रभु, भोग लेत तत्काल ।
नामदेव का दूध पी, कीन्हा परम निहाल ॥१३३॥
दृष्टांत कथा – नामदेवजी सच्चे पुजारी थे, इसी से भगवान् ने उनका दूध पीया था यह प्रसिद्ध है ।
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॥ सच्चे पूजक की आशा हरि शीघ्र पूर्ण करे ॥
सच्चे पूजक की तुरत, आश पूरते राम ।
अल्हजी हित बाग़ का, झुका शीघ्रतर आम ॥१३४॥
दृष्टांत कथा – भक्त अल्हजू तीर्थ यात्रा में कहीं एक राजा के बाग़ में एक आम के वृक्ष के नीचे भगवत् पूजा कर रहे थे । पूजा समाप्त होने पर उनकी दृष्टि आम के पके हुये सुन्दर फलों पर पड़ी और उनकी इच्छा हुई कि भगवान् के आम का भोग लगावें । बागवान से आप माँगा । वह बोला – 'यदि आम खाये बिना नहीं रहा जाता तो तुम ही तोड़लो ।'
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आम का वृक्ष बहुत उंचा था किन्तु तत्काल आम की डालियें नीचे झुक कर के भगवान् के सिंहासन पर आ लगी और उन्होंने भगवान के आम का भोग लगाया । माली ने दौड़ कर यह बात राजा से कही । राजा आया और अल्हजी चरणों में पड़ करके अपने को धन्य मानने लगा । अल्हजी ने भक्ति का उपदेश करके राजा को कृतार्थ किया । इससे यह सूचित होता है कि सच्चे पूजक की आशा भगवान् शीघ्र ही पूर्ण कर देते हैं ।

शनिवार, 11 सितंबर 2021

= १९६ =

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*साचा सांई शोध कर, साचा राखी भाव ।*
*दादू साचा नाम ले, साचे मारग आव ॥*
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साभार विद्युत् संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
साभार ~ ### स्वामी श्री नारायणदासजी महाराज, पुष्कर, अजमेर ###
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श्री दृष्टान्त सुधा - सिन्धु --- *॥ ५ अर्चना भक्ति ॥*
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*॥अर्चना के भाव ही मुख्य आचारादि गौण॥*
अर्चन में इक भाव ही, मुख्य अन्य कुछ नाँहि ।
चन्द्रहास हरिमूर्ति को, रखते मुख के माँहि ॥१३२॥
दृष्टांत कथा – भगवत् पूजा में मुख्य हेतु भाव ही है । अवस्था, वस्तुएं और आचार आदि सब गौण हैं । देखो, 'चन्द्रहास की अवस्था बालक थी । पूजा के उपचार उन्हें प्राप्त नहीं थे और आचार की तो बात ही कहां थी । वे अपने शालग्राम की मूर्ति मुख में रखते थे । तो भी उनका भाव परम शुद्ध और महान् होने से भगवान् ने उन पर महान् कृपा की थी । चन्द्रहास की कथा प्रसिद्ध है ।

= १९५ =

 

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*दादू मनसा वाचा कर्मना, हिरदै हरि का भाव ।*
*अलख पुरुष आगे खड़ा, ताके त्रिभुवन राव ॥*
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साभार विद्युत् संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
साभार ~ ### स्वामी श्री नारायणदासजी महाराज, पुष्कर, अजमेर ###
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श्री दृष्टान्त सुधा - सिन्धु --- *॥ ५ अर्चना भक्ति ॥*
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*॥ प्रतिमा को साक्षात् भगवत् मानने पर ही पूजा से लाभ ॥*
प्रतिमा को हरि समझकर, पूजे लाभमहान ।
देत नाशिक में रुई, प्रगट भये भगवान् ॥१३१॥
दृष्टांत कथा – एक अथार्थी भक्त को भगवत् पूजन से धन नहीं मिला तब वह किसी अन्य के उपदेश से भगवत् मूर्ति को ऊंचे ताक में रख कर दुर्गा मूर्ति का पूजन करने लगा । एक दिन उसके मनमें यह भाव उठा कि जो धूप दुर्गा को देता हूं वह भगवत् को पहुँचती होगी । इससे भगवत् मूर्ति के नाक में रुई भरने लगा ।
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उसी क्षण भगवान् प्रसन्न होकर बोले – 'जो इच्छा हो माँगले ।' वह बोला – 'पूजा से तो आप प्रसन्न नहीं हुये और आज नाक में रुई देने से कैसे प्रसन्न हुये । 'भगवान् – 'जब तू पूजा करता था तब पत्थर की मूर्ति मानता था किन्तु आज तू साक्षात् चेतन रूप मान करके नाक में रुई देने लगा है, यही मेरी प्रसन्नता में कारण है ।' यह कह कर उसे इच्छा के अनुसार वर दे दिया । इससे सूचित होता है कि प्रतिमा(मूर्ति) को साक्षात् भगवान् रूप समझ कर के पूजा करने से ही सफलता मिलाती है ।

शुक्रवार, 10 सितंबर 2021

= १९४ =

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*आत्म मांही राम है, पूजा ताकी होइ ।*
*सेवा वंदन आरती, साध करैं सब कोइ ॥*
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साभार विद्युत् संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
साभार ~ ### स्वामी श्री नारायणदासजी महाराज, पुष्कर, अजमेर ###
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श्री दृष्टान्त सुधा - सिन्धु --- *॥ ५ अर्चना भक्ति ॥*
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*भाव तथा प्राक्रत उपचार सँवार के ।*
*एकाग्रह मन कर अरु रीति विचार के ॥*
*पूजा करके पीछे स्तुति निज देव की ।*
*करना अर्चन भक्ति प्रदर्शक भेव की ॥*
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*॥ अर्चना के दो भेद ॥*
*ध्यान अवस्था माँहि लखि जो मूर्ति है ।*
*जिससे हुई दर्शन आशा की पूर्ति है ॥*
*तीहिं मानस उपचार सु हिय में पूजना ।*
*अंतर अर्चन जान वाह्य नहिं सूझना ॥*
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*यथा शक्ति अर्चन सामग्री जुटाय के ।*
*प्रतिमा वाह्य पूजना अति हर्षाय के ॥*
*विधि से सो वाह्यार्चन नाम कहाय है ।*
*आंतर अर्चन में सहाय बन जाय है ॥*
(सा०सु०वि० २३ । १०२-१०३-१०४)

= १९३ =

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*दादू साचा साहिब सेविये, साची सेवा होइ ।*
*साचा दर्शन पाइये, साचा सेवक सोइ ॥*
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साभार विद्युत् संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
साभार ~ ### स्वामी श्री नारायणदासजी महाराज, पुष्कर, अजमेर ###
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श्री दृष्टान्त सुधा - सिन्धु --- *४ पाद सेवन भक्ति*
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*॥ पद सेवक की सेवा में विघ्न नहीं होता ॥*
पद सेवक की सेव में, विघ्न पड़ सके नाँहि ।
हनुमत् चुटकी से पड़े, सब ही अचरज माँहि ॥१३०॥
दृष्टांत कथा – भगवान् श्री रामचन्द्रजी की सभी सेवा हनुमानजी ही करते थे । किसी अन्य को अवसर ही नहीं देते थे । यह देखकर भाइयों ने जानकी जी की शरण ली और उनकी अनुमति से सब सेवा की सूची बनाई तथा हनुमाजी का उसमें नाम नहीं दिया ।
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हनुमानजी सरयू स्नान को गये तब उस पर रामजी के हस्ताक्षर करवा लिये । जब हनुमान् आये तो सूची दिखादी । हनुमानजी ने कहा – 'इससे बची सेवा तो मै करूंगा' रामजी ने स्वीकृति दे दी । 'प्रभु जब जम्हाई लेंगे तो मैं चुटकी बजाने की सेवा करूंगा ।
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दिन भर तो हनुमान् रामजी के साथ रहे किन्तु रात्रि में अन्त:पुर में जाने से द्वार पर सेविकाओं ने रोक दिया । हनुमान् राजमहल के कंडूरे पर बैठ कर निरन्तर चुटकी बजाने लगे । उधर रामजी ने जम्हाई ली तो उनका मुख खुला ही रह गया । जानकीजी ने कारण पूछा, किन्तु मुख बन्द किये बिना केसे बताया जय ।
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सब माताएं, भाई और गुरुजी भी वहां आ पहुँचे । किसी को कुछ समझ नहीं आया । वशिस्ठजी ने कहा – 'हनुमान् को लाओ ।' आने पर पूछा – 'तुम क्या कर रहे थे ।' हनुमान् – मेरी सेवा है प्रभु को जम्हाई आवे तब चुटकी बजाना । जम्हाई कब आयेगी इसका पता नहीं होने से निरन्तर चुटकी बजा रहा था ।
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अब रामजी बोले – 'हनुमान् चुटकी बजावे तब राम को जम्हाई आती ही रहनी चाहिये । अब सब भेद खुल गया और हनुमानजी को पुनः पूर्ववत सेवा का अवसर मिल गया । इससे होता है की सच्चे पद सेवक की सेवा में कोई भी विघ्न नहीं डाल सकता ।

गुरुवार, 9 सितंबर 2021

= १९२ =

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*दादू जे साहिब को भावै नहीं, सो हम थैं जनि होइ ।*
*सतगुरु लाजै आपना, साध न मानै कोइ ॥*
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साभार विद्युत् संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
साभार ~ ### स्वामी श्री नारायणदासजी महाराज, पुष्कर, अजमेर ###
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श्री दृष्टान्त सुधा - सिन्धु --- *४ पाद सेवन भक्ति*
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*॥ पद सेवक स्वामी से हटता है तब लज्जा ॥*
सेवक स्वामी से हटे, तो लगती है लाज ।
वल्लभ ने इक साधू को, कहा न सुन्दर काज ॥१२९॥
दृष्टांत कथा – एक साधु सालग्रामजी का बटुवा वृक्ष की शाखा के बाँध करके वल्लभाचार्य के दर्शन करने गया था । आया तब बटुवा नहीं मिला । पीछे लौट करके आचार्य से कहा । आचार्य ने उसे कहा – 'तुम कैसे सेवक हो जो स्वामी को छोड़ करके इधर – उधर फिरते हो ।
बहुत विनय करने पर कहा – 'जाओ अब वहां ही देखो ।' साधु ने जाकर देखा तो सेकड़ों बटुवे लटक रहे हैं । पुनः आचार्य से प्रार्थना की । आचार्य ने कहा –'तुम कैसे सेवक हो जो अपने स्वामी को भी नहीं पहचानते ।' साधु चरणों में पड़ गया । तब उसका बटुवा देकर उसे भली भांति भजन में लगाया । इससे सूचित होता है कि पद सेवक स्वामी को छोड़कर इधर – उधर करता है तो उसे लाज लगती है ।

= १९१ =

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*जब चरण कमल रज पावै,*
*तब काल व्याल बौरावै ।*
*तब त्रिविध ताप तन नाशै,*
*तब सुख की राशि विलासै ॥*
(#श्रीदादूवाणी ~ पद्यांश. १८२)
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साभार ~ ### स्वामी श्री नारायणदासजी महाराज, पुष्कर, अजमेर ###
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श्री दृष्टान्त सुधा - सिन्धु --- *४ पाद सेवन भक्ति*
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*॥ प्रभु पद सेवन का लाभ तत्काल मिले ॥*
प्रभु पद सेवन लाभ अति, मिलता है तत्काल ।
छूवत प्रभु पद शिला भी, तिय हो हुई निहाल ॥१२८॥
दृष्टांत कथा – गोतम ऋषि की पत्नी अहिल्याजी श्री रामचन्द्रजी के पद स्पर्श से तत्काल ही शिला से नारी रूप धारण करके निहाल होगई थी, यह प्रसिद्ध है ।

बुधवार, 8 सितंबर 2021

= १९० =

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*साहिब का दर छाड़ि कर, सेवक कहीं न जाय ।*
*दादू बैठा मूल गह, डालों फिरै बलाय ॥६८॥*
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साभार विद्युत् संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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श्री दृष्टान्त सुधा - सिन्धु --- *४ पाद सेवन भक्ति*
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*॥ पद सेवक स्वामी के द्वार को नहीं तजता ॥*
पद सेवक विश्वास कर, बसे स्वामी के द्वार ।
लिया घाटड़े धाम का, नागे ने आधार ॥१२७॥
दृष्टांत कथा – एक वृद्ध दादू पन्थी नागे साधु अन्धे होगये तब सन्तवर दादूजी के शिष्य सुन्दरदासजी की तपो भूमि घाटड़े ग्राम के श्री दादू मन्दिर द्वार के गोखड़े पर जा बैठे और रात दिन 'दादू राम दादूराम' की ध्वनि करते रहते थे । गोखड़े पर बैठे २ नींद ले लेते थे, कारण सोने जितना वह स्थान था ही नहीं । उन्हें कोई वहां सो जाने के लिये कहता था तो वे विश्वास पूर्वक कहते थे कि स्वामी के चरणों को छोड़ कर जीते जी मैं कहीं नहीं जा सकता ।
.
वि० सं० १९८६ के लगभग मेरा भी वहां जाना हो गया था । मैंने भी उस सन्त की वह कठोर तपस्या दो मास तक अपने नेत्रों से देखी थी । जीवन पर्यन्त अपना वह व्रत उन्होंने उसी गोखड़े पर निवाहाया था । इससे सूचित होता है कि पद सेवक भक्त विश्वास पूर्वक स्वामी के द्वार पर ही रहता है ।

= १८९ =

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*सेवक बिसरै आप कौं, सेवा बिसरि न जाइ ।*
*दादू पूछै राम कौं, सो तत्त कहि समझाइ ॥*
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साभार विद्युत् संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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श्री दृष्टान्त सुधा - सिन्धु --- *४ पाद सेवन भक्ति*
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*॥ पद सेवक को ध्यान में बाह्य ज्ञान नहीं रहता ॥*
पद सेवक को ध्यान में, रहे न बाह्य ज्ञान ।
आशकरण पद छिदे पर, हुआ नहीं कुछ भान ॥१२६॥
दृष्टांत कथा – नरवरगढ़ के राजा भीमसिंह के पुत्र और कील्ह स्वामी के शिष्य राजा आशकरण भगवान् के पद सेवक भक्त थे । दश घड़ी दिन चढ़े तक भगवत् सेवा में रहते थे । द्वारपालों को आज्ञा थी कि भगवत् सेवा के समय कोई भी मेरे सामने न आने पावे तथा न कोई सन्देश ही दिया जाय ।
.
एक दिन बादशाह की सवारी निकालने वाली थी । किसी कार्य के लिये बादशाह ने प्रात: ही आशकरनजी को बुलवाया किन्तु राजा के द्वारपालों ने न तो सिपाहियों तथा न दुबारा गये हुये सेना सहित सेनापति को भी राजा के पास तक जाने दिया । सेनापति ने यह सब बादशाह को लिख भेज कर युद्ध की आज्ञा माँगी । तब बादशाह स्वयं ही गया ।
.
द्वारपालों ने केवल बादशाह को ही राजा के पास जाने दिया । बादशाह ने जाकर देखा, राजा सेवा पूजा करके भगवान् को दण्डवत कर रहे थे । देर तक खड़े रहने पर भी राजा ने जब बादशाह की ओर नहीं देखा तब बादशाह ने राजा के पैर पर तलवार मारी जिससे राजा की एडी कट गयी तब भी राजा को कुछ भी भान(ज्ञान) नहीं हुआ ।
.
राजा दण्डवत करके जब बाहर आये तो बादशाह को खड़े देखा और मर्यादा के साथ बादशाह से मिले । राजा की भक्ति से बादशाह बहुत प्रसन्न हुये और क्षमा भी माँगी । इससे सूचित होता है कि पदसेवक भक्त को प्रभु पाद पद्म के ध्यान के समय वाह्य ज्ञान नहीं रहता ।

मंगलवार, 7 सितंबर 2021

= १८८ =

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*दादू मनसा वाचा कर्मना, अंतर आवै एक ।*
*ताको प्रत्यक्ष राम जी, बातें और अनेक ॥*
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श्री दृष्टान्त सुधा - सिन्धु --- *४ पाद सेवन भक्ति*
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*॥ पद सेवक भक्त के भाव के समान ही भगवान् उनकी सेवा लेते हैं ॥*
पद सेवक के भाव सम, भगवत् सेवा लेत ।
जयमल बँगला बना कर, फिरते पहरा देत ॥१२५॥
दृष्टांत कथा – मीरां बाई के छोटेभाई मेड़ता के राजा जयमल भगवान् के पाद सेवक भक्त थे । एक बार ग्रीष्म ऋतु में उनके मन में आया कि हम तो अटारी में शयन करते हैं और भगवान् नीचे मन्दिर में जहां वायु का प्रवेश भी नहीं होता । यह अति अनुचित है ।
.
फिर उन्होंने तिमजले पर एक विचित्र बँगला बनाया और सब प्रकार से सजा करके उसमें एक सुन्दर शय्या तैयार करदी और प्रति दिन रात्रि के समय मिठाई आदि आवश्यक सब वस्तुएं रख करके मानस ध्यान से उसमें भगवान् को शयन कराकर आप सशत्र बँगले के चारों ओर फिरते हुये पहरा देने लगे ।
.
भक्त के भाव अनुसार भगवान् भी प्रति दिन उसमें शयन करते हुये मिठाई आदि भी सब खाने पीने लगे । इससे जयमल को बड़ा आनन्द मिलने लगा । राजा जब बहुत समय तक रानी के महल में नहीं गया तब रानी को शंका हुई कि इस नये बँगले में कोई अन्य स्त्री आती होगी ।
.
वह एक रात्रि को छिप कर ऊपर गयी और किशोर अवस्था के एक सुन्दर बालक को सोते देख कर लौट आई प्रात: राजा से पुछा तब राजा ने कुछ क्रोध किया किन्तु मनमें सोचा यह बडभागिनी है जो इसे भगवान् के दर्शन हुये । इससे सूचित होता है कि भगवान् पद सेवक भक्त के भाव के अनुसार ही उसकी सेवा ग्रहण करते हैं ।

= १८७ =

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*दादू मनसा वाचा कर्मना, हिरदै हरि का भाव ।*
*अलख पुरुष आगे खड़ा, ताके त्रिभुवन राव ॥*
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श्री दृष्टान्त सुधा - सिन्धु --- *४ पाद सेवन भक्ति*
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*॥ पद सेवक का कष्ट हरि दूर करते हैं ॥*
पद सेवक के कष्ट का करते हरि झट नास ।
दिया प्रेमनिधि के लिये बादशाह को त्रास ॥१२४॥
दृष्टांत कथा – प्रेमनिधि जी आगरा के ब्राह्मण थे । प्रायः भगवत् सेवा में ही लगे रहते थे । सेवा से छुट्टी मिलने पर भगवचरित्रों की कथा भी करते थे । दुष्टों ने बादशाह से कहा – 'प्रेमनिधि कथा के बहाने नगर की स्त्रियों को अपने यहां बुलवाता है, यह अनर्थ है ।'
.
बादशाह ने उन्हें बुलवाने को भेजा । वे भगवत् सेवा के लिये जल लाने जारहे थे किन्तु सिपाही के आग्रह से बादशाह के पास जाना पड़ा । और बादशाह के पूछने पर कहा – 'कथा में किसी को भी रोक नहीं होती किन्तु स्त्रियों को पाप द्ष्टि से देखना ही पाप है । बादशाह – 'तुम्हारे लोगों ने ही खोटी २ बातें कही है, इसलिये इसका निर्णय कराना है ।' यह कहकर प्रेमनिधि को नजर बन्द कर दिया ।
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रात्रि को स्वप्न में बादशाह के इष्ट देव ने बादशाह से कहा – 'हमें प्यास लगी है ।' बादशाह –'जल के गढ़े भरे हैं पीजिये ।' इस्टदेव – 'तेरे घड़े का जल कौन पियेगा ।' यह कहते हुये बादशाह के एक लात मार करके बोले – 'मेरी बात सुन । बादशाह – 'जो आज्ञा ।'
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इष्ट देव – 'हमें जो पानी पिलाने वाला है उसे तूने कैद कर दिया है । अब हमें पानी कौन पिलावे ।' यह सुनते ही बादशाह की आँखे खुल गयी और उसी समय प्रेमनिधि जी से क्षमा माँगकर उन्हें उनके स्थान पर पहुंचा दिया । इससे सूचित होता है कि पद सेवक भक्त का कष्ट भगवान् शीघ्र ही दूर करते हैं ।

सोमवार, 6 सितंबर 2021

= १८६ =

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*दादू सेवक सांई का भया, तब सेवक का सब कोइ ।*
*सेवक सांई को मिल्या, तब सांई सरीखा होइ ॥*
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साभार विद्युत् संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
साभार ~ ### स्वामी श्री नारायणदासजी महाराज, पुष्कर, अजमेर ###
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श्री दृष्टान्त सुधा - सिन्धु --- *४ पाद सेवन भक्ति*
##################
*॥ भगवत् पद सेवक की देवता भी सेवा करते हैं ॥*
पद सेवक की देव भी, करत सेव सह प्रेम ।
काष्ट नरहरियानन्द के, पताका शक्ति सनेम ॥१२३॥
दृष्टांत कथा – नरहरियानन्दजी सदा भगवत् चरण सेवा में ही लगे रहते थे । एक दिन भगवत् भोग के लिये रसोई बनाने लगे किन्तु सूखी लकड़ी नहीं मिली, तब वह सोच कर कि भगवान् के भोग तो समय पर अवश्य लगाना ही है ।
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अपने समीप के दुर्गा मन्दिर की छत लकड़ियों की थी । वे उस छत को उखाड़ने लगे । शक्ति(दुर्गाजी) उनकी भगवत् सेवा से प्रसन्न होकर बोली – 'छत को नहीं तोड़ो लकड़ियां आपके सदा आवश्यकतानुसार पहुँचती रहेंगी । वे लौट आये' दुर्गाजी प्रतिदिन आवश्यकतानुसार लकड़ियां उनके यहां पहुंचा देती थी ।
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उनके पड़ोसी की स्त्री को ज्ञात हुआ तब उसने भी अपने पति को कहा – तुम भी जाकर दुर्गा को डराओ, जिससे प्रति दिन बिना परिश्रम ही लकड़िया घर आजाया करेंगी ।' वह दुर्गा के मन्दिर में जाकर ज्योंही छत उखाड़ने लगा कि उसका शिर नीचे और पैर ऊपर होगये और वहां ही लटकने लगा । दुर्गा से प्रार्थना करी तब दुर्गा ने कहा – 'यदि तू मेरे बदले प्रति दिन नरहरियानन्दजी के लकडियां पहुंचा दिया करे तब तो तेरे प्राण बच सकते हैं, नहीं तो अभी प्राण लेती हूँ ।' उसने स्वीकार कर लिया और प्रति दिन पहुँचाने लगा । इससे सूचित होता है कि भगवत् पादसेवक की सेवा देवता भी करते हैं ।

= १८५ =

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*सेवक बिसरै आप कौं, सेवा बिसरि न जाइ ।*
*दादू पूछै राम कौं, सो तत्त कहि समझाइ ॥*
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साभार विद्युत् संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
साभार ~ ### स्वामी श्री नारायणदासजी महाराज, पुष्कर, अजमेर ###
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श्री दृष्टान्त सुधा - सिन्धु --- *४ पाद सेवन भक्ति*
##################
*॥ पद सेवक प्रभु सेवा को सदा निवाहता है ॥*
पद सेवक प्रभु सेव का, करता सदा निवाह ।
कीन्हा कुंवरकिशोर ने, मिली इसी से वाह ॥१२२॥
दृष्टांत कथा – कुंवरकिशोर राजा खेमाल के पोते थे । देहत्याग के समय खेमाल के नेत्रों में जल भरा देख कर के पुत्रों ने कहा – 'आप ऐसा क्यों कर रहे हैं ? यह राज्य धन आदि सब भगवान् के ही हैं चाहो सो दान – पूण्य कर सकते हो ।'
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खेमाल ने कहा – 'ये सब तो मैंने अपनी इच्छा के अनुसार कर लिये किन्तु दो बातों के लिये चिन्ता है । एक तो भगवत् सेवा के लिये अपने शिर पर जल का कलश लाकर सेवा नहीं की और दूसरे नूपर बांधकर भगवान् के सामने नृत्य नहीं किया ।' यह सुन करके पुत्र चुप ही रहे कुछ बोल नहीं सके ।
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कुँवरकिशोर ने हात जोड़ करके विनय करी - 'यह आज्ञा इस दास को दीजिये । मैं जीवन पर्यन्त इस आपकी आज्ञा को निबाहूँगा ।' राजा ने कुँवरकिशोर को छाती के लगा लिया और दोनों सेवाए; करने की आज्ञा देकर के परमधाम को प्रस्थान किया । कुंवरकिशोर ने वह आज्ञा प्राणान्त टक बिना व्यवधान निवाही । इसी से उन्हें वाह(धन्यवाद) प्राप्त हुई थी । इससे सूचित होता है कि पद सेवक सेवा में व्यवधान नहीं होने देता ।

रविवार, 5 सितंबर 2021

= १८४ =

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*दादू राम नाम सौं मिलि रहै, मन के छाड़ि विकार ।*
*तो दिल ही मांहैं देखिये, दोनों का दीदार ॥*
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साभार विद्युत् संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
साभार ~ ### स्वामी श्री नारायणदासजी महाराज, पुष्कर, अजमेर ###
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श्री दृष्टान्त सुधा - सिन्धु --- *४ पाद सेवन भक्ति*
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*॥ पद सेवक स्वामी के सदा पीछे रहता है ॥*
पद सेवक निज स्वामी के, पीछे रहता आप ।
इस कारण ही बढ़ाथा, जगतसिंह सुप्रताप ॥ १२१॥
दृष्टांत कथा – राजा आनन्दसिंह का पुत्र जगतसिंह भगवान् की पाद सेवन भक्ति करते थे । वे कभी राजधानी से बाहर जाते तब भगवान् की पालकी उनके आगे २ चलती थी और वे सेवक के समान पीछे २ चला करते थे ।
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जब कभी युद्ध का प्रसंग आ पड़ता था तब भी भगवान् को ही सेनापति तथा अधिपति मान करके युद्ध करते थे । भगवान् की सम्पूर्ण सेवा भी अपने हाथों ही करते थे । शाहजहानाबाद में यशवन्तसिंह जोधपुर के और जयसिंह जयपुर के राजओं ने उनके दर्शन की अभिलाषा की और प्रात: दो तीन घडी रात रहते ही उनके भगवत् सेवा के जल लाने के मार्ग में जा बैठे थे । 
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जगतसिंहजी सशत्र सैकड़ों सैनिकों के शिर पर जल का कलश रक्खे तथा मुख से भगवान् का नाम उच्चारण करते हये नंगे पैरों ही आ रहे थे । दोनों राजाओं ने उनकी ऐसी भक्ति देखकर उनके चरणों में प्रणाम किया तथा अपने को उनके दर्शन से धन्य माना । इससे सूचित होता है कि पद – सेवक भक्त सदा भगवान् के पीछे रहता है और सेवा अपने हाथों से ही करता है । 

= १८३ =

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*साधु समाना राम में, राम रह्या भरपूर ।*
*दादू दोनों एक रस, क्यों कर कीजै दूर ॥*
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साभार विद्युत् संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
साभार ~ ### स्वामी श्री नारायणदासजी महाराज, पुष्कर, अजमेर ###
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श्री दृष्टान्त सुधा - सिन्धु --- *४ पाद सेवन भक्ति*
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*॥ पद सेवक की भगवान् भी शलाघा करते हैं ॥*
पद सेवक की राम भी, करते स्वयं शलाघ ।
रामचन्द्र ने कर किया, जन हनुमत का आघ ॥१२०॥
दृष्टांत कथा – भगवान् श्री रामचन्द्रजी ने हनुमान की सेवा की प्रशंसा करते हये उनका महान आघ(सत्कार) किया था, यह प्रसिद्ध है । इससे सूचित होता है कि उत्तम पाद सेवक भक्त का भगवान् भी सत्कार करते हैं ।

सोमवार, 30 अगस्त 2021

= १८२ =

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*वाहला मारा हृदया भीतर केम न आवै,*
*मने चरण विलम्ब न दीजे रे ।*
*दादू तो अपराधी तारो, नाथ उधारी लीजे रे ॥*
(#श्रीदादूवाणी ~ पद्यांश. १२८)
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साभार विद्युत् संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
साभार ~ ### स्वामी श्री नारायणदासजी महाराज, पुष्कर, अजमेर ###
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श्री दृष्टान्त सुधा - सिन्धु --- *४ पाद सेवन भक्ति*
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*॥ पद सेवक किसी निमित्त से स्वामी से दूर जाता है तो स्वामी उसके पास जाते हैं ॥*
पद सेवक कोउ निमित्त से, यदपि दूर होजाय ।
तो स्वामी करके कृपा, तिहिं समीप में आय ॥११९॥
दृष्टांत कथा – १.विष्वक्सेन, २.सुसेन, ३.बल, ४.प्रबल, ५.जय, ६.विजय, ७.भद्र, ८.सुभद्र, ९.नन्द, १०.सुनन्द, ११.चंड, १२.प्रचण्ड, १३.कुमुद, १४.कुमुदाक्ष, १५.शील, १६.सुशील ।
ये सोलह पार्षद भगवान् के समीप रहकर उनकी चरण सेवा करते हैं । सनकादिक के शाप से जय विजय को दूर जाना पड़ा था तब भगवान् को भी अवतार लेकर उनके पास जाना पड़ा था । यह प्रसिद्ध है । इससे सूचित होता है कि पद सेवक भक्त यदि किसी निमित्त से भगवान् के चरण कमलों से दूर हो भी जाय तो भगवान् उसके पास ही पहुँच जाते हैं

= १८१ =

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*संग तुम्हारे सब सुख होहि,*
*चरण कमल मुख देखूं तोहि ॥*
*अनेक जतन कर पाया सोइ,*
*देखूं नैनहुँ तो सुख होइ ॥*
(#श्रीदादूवाणी ~ पद्यांश. १९)
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साभार विद्युत् संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
साभार ~ ### स्वामी श्री नारायणदासजी महाराज, पुष्कर, अजमेर ###
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श्री दृष्टान्त सुधा - सिन्धु --- *४ पाद सेवन भक्ति*
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*॥ पाद सेवक सदा स्वामी के साथ रहता है ॥*
पद सेवक भगवान् के, रहता है नित साथ ।
लक्ष्मण घर पर नाहिं रहे, कहा यदपि रघुनाथ ॥११८॥
दृष्टांत कथा – यदपि रघुनाथ रामचन्द्रजी ने लक्ष्मणजी को अयोध्या में ही रहने को कहा था किन्तु वे रामजी के पद सेवक थे, इसलिये अयोध्या नहीं रह सके और रामजी के साथ ही वन को गये थे । इससे सूचित होता है कि पाद सेवक सदा स्वामी के पास ही रहना चाहता है ।