शुक्रवार, 4 सितंबर 2026

*हरमाड़ा का स्थान*

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*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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*आप तैं उपाइ बाजी, निरखि देखै सोइ ।*
*बाजीगर को यहु भेद आवै, सहज सौंज समोइ ॥*
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*जूनियां स्थान* = जूनियां स्थान की प्रणाली अज्ञात है । जूनियां में गरीबदासोत भी अपना स्थान बताते हैं । किन्तु कुछ वर्ष पूर्व मैं जूनियां गया था । वहां केवल एक माखूजी की परंपरा का स्थान है । उसकी परंपरा माखूजी के थांमे के वर्णन में दी जायगी । कनिरामजी स्वामी नारायणा ने परमेश्वरदास को आचार्य चैनरामजी की शिष्य परंपरा के स्थान का उत्तराधिकारी बताया है किन्तु परमेश्वरदासजी आत्मारामजी माखूजी की परंपरा के स्थान के उत्तराधिकारी थे ।
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हां हो सकता है कि ~गरीबदासोतों वह मसकीनदासोतों के कोई अप्रधान स्थान हों, उनके रिक्त होने पर परमेश्वरदासजी का अधिकार हो गया हो । एक स्थान ग्राम में भी था । किन्तु वह भी आत्मारामजी का ही था । ऐसा मैंने ग्राम वालों से सुना था और परमेश्वरदासजी ने आत्मारामजी के गुरु परंपरा दौलतरामजी और आत्मारामजी तथा आत्मारामजी के शिष्य के नामों से युक्त जूनियांरावजी के भूमि आदि के पट्टे भी मुझे दिखाये थे ।
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*आखतड़ी का स्थान *= आचार्य चैनरामजी की शिष्य परंपरा का स्थान आखतड़ी में था । पूर्व का संपन्न स्थान था । उसके उत्तराधिकारी रामदयालजी हुये हैं । अन्य कुछ ज्ञात नहीं है । नारायणा के अन्य स्थान = एक आचार्य चैनरामजी की शिष्य परंपरा के स्थान की प्रणाली पूर्ण रूप से ज्ञात नहीं हो सकी । इस स्थान में सं. १८७९ में केवलरामजी थे । उनके मनीरामजी हुये । केवलरामजी प्रसिद्ध संत थे, दादूवाणी के कथा वाचकों में प्रधान माने जाते थे । अब यह स्थान समाप्त है ।
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नारायणा के दूसरे स्थान का कुछ विवरण इस प्रकार है~ १~हरिकृष्णदासजी वि. सं. १८०९ । २~ जीवणदासजी वि. सं. १८५९ । ३~ आशारामजी वि. सं. १८९१ । ४~ जोगीदासजी । इनमें प्रथम हरिकृष्णदासजी अच्छे संगीतज्ञ थे । वीणा वादकों में प्रधान माने जाते थे । वे प्रायः वीणा बजाते हुये हरिगुण गाते रहते थे । अच्छे महात्मा थे । भगवद् भजन ही इन का मुख्य कार्य था ।
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*हरमाड़ा का स्थान*== आचार्य चैनरामजी महाराज की शिष्य परंपरा के स्थान हरमाड़ा की परंपरा आचार्य चैनरामजी महाराज के शिष्य १~गोर्धनदासजी वि. सं. १८४२ । २-मोतीरामजी सं. १८८० । ३~ मयारामजी ४- सेवादासजी ५~ कुशलदासजी ६- हृदयरामजी वि. सं. १९११ । ७~विसनदासजी वि. सं. १९३१ । ८- रामवगसजी सं. १९२८ । ९- देईरामजी १० जयकिशनजी ११- संतोषदासजी वि . सं. १९५१ । १२- दयालबगसजी गुड़िया सं. १९७३ । १३- आडारामजी वि. सं. २०३० । १४- मानदासजी वर्तमान में हैं । यह स्थान हरमाड़ा ग्राम के तालाब के दक्षिणी किनारे पर है । उस क्षेत्र में इस स्थान की अच्छी प्रतिष्ठा थी । यह स्थान कई जातियों का गुरुद्वारा था । इस स्थान के संतों का उस प्रदेश में अच्छा प्रभाव था ।
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१३-आडारामजी ने आचार्य रामलालजी का चातुर्मास भी करवाया था । आडारामजी भ्रमण भी करते थे । संतों के शब्दों को संग्रह भी किया करते थे । इनकी संग्रही वृत्ति थी । आप दादूवाणी का पाठ पढ़ाया करते थे । आपने बहुतों को वाणी पढ़ाई थी । ये पंच केश रखते थे । इनका स्थान एक नारायणा दादूधाम के बाग़ में और एक नारायणा के बाजार में माताजी का कुआ के पास है । इनके उत्तराधिकारी मानदास हैं । उक्त आचार्य चैनरामजी महाराज के शिष्य परंपरा के स्थानों का परिचय इनकी परंपरा के वर्तमान स्वामी कनिरामजी ने बताया है । वही यहां लिखा गया है । इति श्री चतुर्थ अध्याय समाप्त: ४
(क्रमशः)

*४७. अध्यातम कौ अंग १७/२०*

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*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
*श्रद्धेय श्री Tapasvi @Ram Gopal Das की प्रेरणा से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Meta AI*
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*४७. अध्यातम कौ अंग १७/२०*
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कहि* जगजीवन देह थैं, अबिगत करै बिदेह१ ।
वो देहि आगै चलै, अगम ठौर करि नेह ॥१७॥
*-*. १७ से ४७ तक की साषियों में योगशास्त्र का वर्णन है ।
(१. विदेह=देहाध्यासरहित)
संत जगजीवनदास जी कहते हैं कि साधक पहले इस स्थूल देह के भाव से ऊपर उठता है और देहाध्यास(मैं देह हूँ) से मुक्त होकर विदेह हो जाता है । फिर वह सूक्ष्म देह से भी आगे निकल कर, उस अगम्य स्थान(परमात्मा के धाम) से प्रेम लगा लेता है । 
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खैंचि पवन मन खोज तन, खालिक२ सौं चित लाइ ।
सहजैं बरसै प्रेम रस, जगजीवन तहां आइ ॥१८॥
{२. खालिक=सृष्टिकर्ता(सिरजनहार)}
प्राणायाम से पवन को खींच कर, मन को शरीर के भीतर खोज कर, और चित्त को सृष्टिकर्ता मालिक में लगाओ । ऐसा करने से सहज ही प्रेम के रस की वर्षा होने लगती है और साधक जगजीवन(परमात्म स्वरूप) तक पहुँच जाता है ।
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रिधि सिधि प्रहरी रांम कहि, मन मथि३ मांही पैठी ।
जगजीवन हाथी सबद, उठै तहां ही बैठि ॥१९॥
(३. मन मथि=मन का निरोध कर)
रिद्धि-सिद्धि को तो बाहर का पहरेदार समझो, उन्हें राम-नाम कह कर बाहर ही रोक दो । मन का मंथन करके, मन को रोक कर भीतर प्रवेश करो । संत जगजीवनदास जी कहते हैं कि भीतर अनहद हाथी के समान गम्भीर शब्द(अनहद नाद) उठ रहा है, वहीं स्थिर होकर बैठ जाओ ।  
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बंक नालि४ रस पीवतां, ससिहर५ खैंचै सूर६ ।
जगजीवन तहँ सहजि घर, बाजै अनहद तूर ॥२०॥
(४. बंक नालि=तालुमूल में जिह्वा का स्पर्श)   (५. ससिहर=चन्द्रनाड़ी)   (६. सूर=सूर्यनाडी) 
जब योगी बंकनालि(तालू मूल में जीभ लगाकर - खेचरी मुद्रा) से अमृत रस का पान करता है, तब चन्द्र नाड़ी सूर्य नाड़ी को खींच लेती है अर्थात इड़ा-पिंगला का भेद मिट जाता है । संत जगजीवनदास जी कहते हैं कि उसी सहज अवस्था रूपी घर में अनहद के तुरही-नगाड़े बजने लगते हैं ।
(क्रमशः)

गुरुवार, 3 सितंबर 2026

*कुशालीरामजी*

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*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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*अविनाशी साहिब सत्य है, जे उपजै विनशै नांहि ।*
*जेता कहिये काल मुख, सो साहिब किस मांहि ॥*
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१~ *कुशालीरामजी* को जोधपुर नरेश मानसिंह ने नीमोला ग्राम की ४५ बीघा भूमि समर्पण की थी वि. सं. १८६६ में । ठाकुर मालुम सिंह ने स्थान की सेवा के लिये कुशालीरामजी को वि. सं. १८६० व १८६९ में दो बार भूमि दी थी और चार आने प्रति-दिन के हिसाब से रैंण के जागीरदार स्थान सेवा दादूजी की सेवार्थ देते थे । प्रति गाड़ी अन्न की जो बिक्री के लिये आती थी उससे ६ छटाँक अन्न दादू द्वारे को दिया जाता था । और प्रति हलवाला प्रतिवर्ष एक धड़ी अन्न की सेवा दादूद्वारे की करता था ।
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७~ *नानकदासजी* वि. सं. २००१ मार्गशीर्ष पूर्णिमा से स्थान की सेवा कर रहे हैं । चार ग्रामों की~ १- बछवास, २- नीमोला, ३- खारिया, ४- जाबली की तथा रैंण के जागीरदार की दी हुई भूमि लोगों ने दबाली थी । नानकदासजी ने अति परिचय कर उक्त पांचों ही ग्रामों की भूमि को पुनः स्थान के नीचे लगाने का श्लाघनीय कार्य किया था । रैंण की भूमि रैंण के जागीरदार ने, खारिया की खारिये के दोनों जागीरदारों ने, जाबली की भूमि जोधपुर नरेश ने दी थी । पालीवाल भक्त पाली से संतों को यहां लाये थे और अभी तक पालीवाल भक्त स्थान की सेवा करते हैं ।
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*कुशालीरामजी* ने जोधपुर नरेश के सिंगी मंत्री का अदीठ मिटाया था इससे जोधपुर नरेश ने भूमि दी थी और रैंण का स्थान भी बनवाया था । रैंण स्थान की शाखा रूप स्थान~ १~ बछवास, २~ नीमोला, ३~खारिया, ४~जावली, ५~डावराणी है । नानकदासजी ने स्टेशन व कुचेरा रोड़ पर स्कूल के पास धर्मार्थ प्याऊ भी बनाई है और उसे सदा चलाते हैं । अन्यान्य धर्म कार्यों में व साधु सेवा में अग्रसर रहते हैं । अच्छे संत हैं ।
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*बूड़सू स्थान* ~ आचार्य चैनरामजी महाराज की शिष्य परंपरा बूड़सू(मारवाड़) अच्छा स्थान था । किन्तु न तो इसकी प्रणाली ज्ञात हो सकी है तथा यह स्थान भी समाप्त हो गया है ।
*खन्डेल स्थान* ~ आचार्य चैनरामजी की शिष्य परंपरा का स्थान खंडेल था । यह स्थान फुलेरा की शाखा रूप था । इसके अधिष्ठाता धनीरामजी थे । वर्तमान में कौन है कोई है या नहीं है निश्चय नहीं हो सका ।
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*तिलोनिया स्थान* ~ तिलोनिया स्थान नारायणा चैनरामजी महाराज के शिष्य परंपरा के स्थान का शाखा रूप था इसकी पूर्ण प्रणाली अज्ञात है । जो ज्ञात हो सकी है सो यह है १~ मगनीरामजी २~ सम्पतरामजी ३~ लक्ष्मणदासजी । आगे समाप्त है ।
*मन्डावरिया स्थान* ~ यह स्थान तिलोनिया स्टेशन से पश्चिम की ओर है किन्तु अब उसमें साधु नहीं है । राजकीय स्कूल है । इसमें पहले लक्ष्मणदासजी वैद्य थे । *झीटिया स्थान* ~ झिटिया मारवाड़ में है । यहां का स्थान आचार्य चैनरामजी महाराज की शिष्य परंपरा का ही था । पहले इसमें चन्दनदासजी थे । अब कोई नहीं है ।
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*राजगढ़ का स्थान* ~ राजगढ़(अलवर) के स्थान की प्रणाली ज्ञात नहीं हो सकी । अब स्थान तो है किन्तु साधु नहीं है । यह स्थान आचार्य निर्भयरामजी महाराज के समय में बना था । यह प्रतिष्ठित स्थान था । राजगढ़ दादूद्वारे के भंडारी सदाव्रत का कार्य करने वाले भंडारी इसी स्थान के उत्तराधिकारी थे । अलवर राज्य तक इनकी पहुँच थी । अब स्थान रिक्त है ।
(क्रमशः)

*४७. अध्यातम कौ अंग १३/१६*

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*श्रद्धेय श्री Tapasvi @Ram Gopal Das की प्रेरणा से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Meta AI*
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*४७. अध्यातम कौ अंग १३/१६*
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सबद सुन्नि ही मांही समावै, अंतरगति धुनि एह ।
कहि जगजीवन च्यार  मातरा, अहंकार नहिं देह ॥१३॥
वह सच्चा शब्द बाहर नहीं, भीतर के शून्य में समाया हुआ है । जब ध्यान अंदर जाता है तो एक दिव्य धुन सुनाई देती है । संत जगजीवनदास जी कहते हैं - इसे ही चार मात्रा वाला शब्द कहते हैं । जो इसे सुन लेता है, उसकी देह में अहंकार नहीं रहता ।
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परसन परसै आंन अंग, परसै हरि रस प्यास ।
कहि जगजीवन पंच मातरा, तीन पच्चीस निवास ॥१४॥
स्पर्श इन्द्री से दूसरे अंगों का स्पर्श होता है, पर भक्त तो हरि-रस की प्यास का ही स्पर्श करता है । संत जगजीवनदास जी कहते हैं - यही पाँच मात्रा वाला मंत्र है । इसका वास तीन गुण और पच्चीस प्रकृतियों से परे है ।
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रूपद्रिष्टि, रस रसन हरि, गंध नासिका बास ।
इंद्री अपरस सबद थिति, सु कहि जगजीवनदास ॥१५॥
आँखों से हरि का रूप देखना, जीभ से हरि के नाम का रस लेना, नाक से उसी की सुगंध में बसना । संत जगजीवनदास जी कहते हैं - जब पाँचों इन्द्रियाँ संसार से अछूती होकर उस शब्द में टिक जाती हैं, तभी सच्ची भक्ति बनती है ।
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पंच मातरा बांचिये, एकै अक्षर लाइ ।
कहि जगजीवन समझि करि, गोबिंद के गुण गाइ ॥१६॥ 
उस पाँच मात्रा वाले मंत्र को एक अक्षर - ‘सत्’ में मन लगाकर जपो । संत जगजीवनदास जी कहते हैं - इसे समझ कर गोविंद के गुण गाओ, यही सार है ।
(क्रमशः)  

बुधवार, 2 सितंबर 2026

*मेड़ता स्थान*

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*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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*ना हम छाड़ैं ना गहैं, ऐसा ज्ञान विचार ।*
*मध्य भाव सेवैं सदा, दादू मुक्ति द्वार ॥*
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*मेड़ता स्थान*
आचार्य चैनरामजी महाराज के शिष्य परंपरा के मेड़ता स्थान की पूर्व की प्रणाली ज्ञात न होने से नारायणदास वैद्य(वि. सं. १९९७) २~जोहरादासजी वर्तमान हैं । यह स्थान घोसी वाड़ा में था । चिकित्सा के कारण प्रसिद्ध भी था किन्तु अब बिक चुका है । कृष्णदेवजी महाराज की छत्री के पास अनेक संतों के चरण हैं किन्तु ज्ञात नहीं हैं कि वे चैनराम महाराज की शिष्य परंपरा के हैं या नहीं हैं किन्तु चैनरामजी महाराज के पीछे के ही हैं ।
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एक छोटी छत्री जो भण्डार के पास है, उसमें बाईजी रामकुमारीजी के चरण हैं । इसमें वि. सं. १८५५ बदि १४ बुधवार लिखा है~ यह संत सोनारामजी की शिष्या थी । पास की तलाई को डोकरी तलाई भी कहते हैं और वह बाई रामकुमारीजी की बनवाई हुई है, ऐसा सुनते हैं । छत्री में शिला लेख~ दोहा-
“सतगुरु सोनारामजी, नृमल सुनायो नाम ।
लाहो हरि बाई लियो, रामकुवरि भजराम ॥
अष्टादस सौ चौवने, बदि फागुण बुधवार ।
दिन चौदश बाई भया, राम कुवरि भो पार ॥१॥
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यह छत्री आज इस वर्ष वि. सं. २०३२ में १७७ वर्ष पूर्व की है । हो सकता है सोनारामजी चैनरामजी की शिष्य परंपरा के ही हों । एक लम्बे चबूतरे पर भी १८७६ में सुन्दरदासजी के, सं. १८८० में पं. रामदासजी के । सं. १८४६ में श्रीनाथजी के । सं. १८९२ में अमरदासजी के । इत्यादिक चरण हैं किन्तु निश्चय पता नहीं कि ये सब चैनरामजी की शिष्य परंपरा के हैं । चैनरामजी महाराज के ब्रह्मलीन होने के पीछे के हैं और कृष्णदेवजी महाराज के छत्री के पास हैं । अतः उनका यहां संकेत कर दिया है ।
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*फुलेरा स्थान*
फुलेरा में आचार्य चैनरामजी महाराज की शिष्य परंपरा का स्थान था । फुलेरा शहर से उत्तर की ओर नागों की छावणी के पास था । अच्छा प्रतिष्ठित स्थान था । कुवा व कृषि योग्य भूमि भी थी । इस स्थान के दो संतों का ही परिचय प्राप्त होता है~ १- उदयरामजी २- मोहनदासजी । अब स्थान समाप्त है ।
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*रैंण स्थान*
आचार्य चैनरामजी की परंपरा का स्थान रैंण में दादूद्वारा है । इसमें एक~कुशालीरामजी महान् संत हुये हैं । उनके दो शिष्य थे, वीररामजी और चैनरामजी । चैनराजी आचार्य कृष्णदेवजी की सेवा में रहते थे । इससे उनके कृपापात्र हो गये और आगे नारायणा दादूधाम के आचार्य बन गये थे । वीरमदासजी रैंण दादूद्वारा में रहे । २-वीरमदासजी, ३-लालदासजी, ४-बोदूरामजी, ५-रघुनाथदासजी, ६-रामचन्द्रदासजी, ७-नानकदासजी वर्तमान हैं । यह स्थान रैंण के तालाब के पश्चिम तट और ग्राम के दक्षिणी छोर पर है ।
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रघुनाथदासजी तक स्थान ठीक चला । बीच में शिथिलता आ गई थी किन्तु नानकदासजी ने इसे पुनः ठीक स्थिति पर पहुँचाया है । पहले कच्चा स्थान था । नानकदासजी ने पक्का दादू मंदिर बना दिया है । नानकदासजी स्थान की अच्छी सेवा कर रहे हैं । आगत अतिथियों व संतोंकी भी अच्छी सेवा करते हैं । उन्होंने स्थान की प्रतिष्ठा बढ़ाई है ।
(क्रमशः)

*४७. अध्यातम कौ अंग ९/१२*

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*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
*श्रद्धेय श्री Tapasvi @Ram Gopal Das की प्रेरणा से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Meta AI*
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*४७. अध्यातम कौ अंग ९/१२*
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सदा सुखी नर संजमी, नित उठ साधै जोग ।
जगजीवन भगवंत भजि, भूलै षटरस भोग* ॥९॥
जो संयमी पुरुष नित्य उठकर योग साधता है, वह सदा सुखी रहता है । संत जगजीवनदास जी कहते हैं, भगवान के भजन में ऐसा आनंद है कि छहों रसों के सांसारिक भोग फीके लगने लगते हैं ।
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रूपद्रिष्टि* आगै सुरति, ता मैं बसै अनूप ।
कहि जगजीवन एक मातरा, मिलि रहै साध सरूप ॥१०॥
(*-*. १० से १६ तक की साषियों में सांख्य दर्शन के अनुसार पच्च तन्मात्राओं का वर्णन है) हैं । [१. रूप तन्मात्रा] आँख के सामने सुरति टिकाने से उसमें अनुपम परमात्मा का वास दिखता है । एक मात्रा सिद्ध होने पर साधक साधु-स्वरूप में मिल जाता है ।  
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रस रसनां हरि रस पीवै, आंनि बिषै रस त्यागि१० ॥
कहि जगजीवन हरिजन हरि सौं, दोइ मातरा लागि ॥११॥
(१०. आंनि विषै रस त्यागि=अन्य सांसारिक विषय भोगों का परिणाम) 
[२. रस तन्मात्रा] जीभ से दूसरे विषय-भोगों के रस को छोड़कर हरि-रस पीना । दो मात्रा लगने पर हरि का जन हरि से एक हो जाता है ।
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गंध सुगंध निवास हरि, अगम बांसना जांनि ।
कहि जगजीवन तीन मातरा, आगै तत्त पिछांनि ॥१२॥ 
[३. गंध तन्मात्रा] हरि का निवास दिव्य सुगंध में है, उस अगम सुगंध को पहचानो । तीन मात्रा पूरी होने पर साधक आगे के तत्व को पहचानने लगता है ।
(क्रमशः)  

मंगलवार, 1 सितंबर 2026

*२६. भजन प्रताप का अंग ~५७/६०*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*२६. भजन प्रताप का अंग ~५७/६०*
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*भजन जोर भगवन्त लग, जाति जोर लग देह ।*
*जन रज्जब साधों कह्या, जाने सो कर लेह ॥५७॥*
जाति की शक्ति तो शरीर तक ही काम देती है और भजन की शक्ति भगवान से मिलाने तक का काम करती है । संतों ने यही कहा है, किन्तु जो भजन का प्रताप जानता है वही भजन करके भगवान को प्राप्त करता है ।
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*प्रथमे१ कड़वा बीज था, पुनि पाके सोइ होय ।*
*मधि मीठा तन तोरई, रज्जब लीजे होय ॥५८॥*
पहले१ तुरई बोते हैं तब बीज कड़वा होता है, फिर पक जाने पर कड़वा हो जाता है, किन्तु बीच में तुरई मीठी होती है तब उसे सभी शाक के काम में लेते हैं, वैसे ही कुल के आगे पीछे अच्छे न हो और बीच में भक्ति हो जाय तो वह पूज्य ही है ।
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*रज्जब दादा दोजखी१, पोता पापी होय ।*
*दोन्यों बीच साधू भया, नाहिं अचरज कोय ॥५९॥*
विरोचन का दादा हिरण्यकशिपु तो नरकगामी१ हुआ और उसका पोता विरोचन भी पापी हुआ, किन्तु दोनों के बीच में प्रहलाद संत हो गया, यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है । अत: उत्तमता में कुल कारण नहीं, भजन ही है ।
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*आगा क्षार समुद्र में, पीछे हिमालय मूल ।*
*जन रज्जब बिच वंदिये, गंगा का अस्थूल ॥६०॥*
गंगा की अगली धार क्षार समुद्र में है और पीछे हिमालय पर्वत उद्गम स्थान है, समुद्र और हिमालय के बीच में जो गंगा का स्थूल स्वरूप है उसी को प्रणाम करते हैं, वैसे ही आगे-पीछे कुल कैसा ही हो बीच में भक्त होगा, तो भजन के प्रताप से वही पूज्य होगा, कुल नहीं ।
(क्रमशः)

*२६. भजन प्रताप का अंग ~५३/५६*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*२६. भजन प्रताप का अंग ~५३/५६*
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*यथा पद्मनी नीच कुल, केशर विष्टा होय ।*
*रज्जब भुगतैं राजवी१, कुल कारण नहिं कोय ॥५३॥*
पद्मनी जाति की नारी नीच कुल में उत्पन्न हो जाती है, केशर विष्टा के खाद से अच्छी उगती है । उक्त दोनों को राज१ पुरुष या राजा महाराजा भी भोगते हैं । अत: उत्तमता में उत्तम कुल कारण नहीं है, वस्तु की उत्तमता ही कारण है ।
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*कुल पर्वत नहिं पूजिये, सुत प्रतिमा की मानि१ ।*
*त्यों रज्जब रामहिं भजे, गई सकल कुल कानि ॥५४॥*
पत्थर की मूर्ति का कुल पहाड़ है, उसकी तो कोई पूजा नहीं करता, उसके पुत्र पत्थर से बनी मूर्ति को पूज्य१ समझकर पूजा करते हैं, वैसे ही राम का भजन करने से कुल की संपूर्ण लज्जा चली जाती है अर्थात भक्त में कुलादि दोष न देखकर उसकी पूजा करते हैं ।
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*दीरध कुल सु अतेरु बूडे, लघु कुल तारक तारै ।*
*सो रज्जब गुण कैसे मेटें, जा सौं जल निधि पारै ॥५५॥*
बड़े कुल के हो और तैरना नहीं जानते हो, तो स्वयं भी डूबते हैं और ज्ञान नौका द्वारा तैरने वाले हों, तो वे तारने वाले होने से संसार-सागर से तारते हैं । जिस ज्ञान के द्वारा वे संसार-सिन्धु से पार करते हैं, वह उनका गुण कैसे मेटा जा सकता है ?
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*प्रतिमा१ नई पुराने पर्वत, प्रत्यक्ष देखो जोय ।*
*रज्जब भरम दिनों का भागा, पूजा किसकी होय ॥५६॥*
मूर्ति१ जिस पर्वत के पत्थर से बनी है, वह पर्वत पुराणा है और मूर्ति नई है, यह अपनी दृष्टि द्वारा प्रत्यक्ष देख सकते हो । देखने प्रतिमा अधिक दिन की है वा पर्वत यह भ्रम तो दूर हो ही जाता है, फिर बड़ी आयु वाला पूज्य हो, तो पर्वत की पूजा करनी चाहिये मूर्ति की नहीं । अत: पूजा में हेतु भजन का प्रताप ही है, आयु नहीं ।
(क्रमशः)

*२६. भजन प्रताप का अंग ~४९/५२*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*२६. भजन प्रताप का अंग ~४९/५२*
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*कड़वी मिठी तुम्बिका, आम नीम की नाव ।*
*रज्जब तिरिये चहुँ चढ़, तो कुल की और न आव१ ॥४९॥*
कड़वी तुम्बी हो वा मीठी, आम की लकड़ी से बनी नाव हो वा नीम्ब की चारों में किसी पर भी चढ़कर तिर सकते हैं, इसी प्रकार कुल ऊंच हो वा नीच भजन कर के सभी भव-सागर से तिर सकते हैं, तो फिर कुल की परमार्थ प्राप्ति में कोई शोभा१ नहीं, भजन की ही है ।
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*रज्जब नीच न नीच कुल, जे मन उत्तम भाव ।*
*क्षार समुद्र सुधारस निकसे, तो कुल का कौन कहाव ॥५०॥*
यदि मन का भजन द्वारा उत्तम भाव हो गया है, तो नीच कुल में जन्मा मनुष्य नीच नहीं होता । देखो, क्षार समुद्र से भी अमृत रस निकलता है, तो फिर नीच-ऊंच में कुल का कहना ही क्या है ? भाव की ऊंच नीचता से ही प्राणी ऊंच नीच होता है ।
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*जे मन उत्तम भाव है, तो कुल का क्या भेद ।*
*जन रज्जब दृष्टान्त को, यथा मंजारी मेद१ ॥५१॥*
जैसे बिलाव की गांठ१ या फोड़ा१ के पीप में सुगंध होती है, इससे वह श्रेष्ठ ही माना जाता है, वैसे ही यदि मन में उत्तम भाव है, तो वह उत्तम ही है कुल का भेद कोई महत्त्व नहीं रखता ।
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*नीम धतूरे आक विष, मधु निकसे उन माँहिं ।*
*रज्जब विष अमृत भया, तो कुल कारण कोउ नाँहिं ॥५२॥*
निम्ब, धतूरा, आकड़ा, ये विष हैं, किन्तु इनके पुष्पों में भी शहद निकलता है । देखो, विष से अमृतमय शहद हो गया तब उत्तमता या हीनता में कुल कारण नहीं सिद्ध होता है ऊंच - नीच भाव ही कारण है ।
(क्रमशः)

*इन्दावड़ का स्थान*

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*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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*एकौं लेइ बुलाइ कर, एकौं देइ पठाइ ।*
*दादू अद्भुत साहिबी, क्यों ही लखी न जाइ ॥*
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*इन्दावड़ का स्थान*
आचार्य चैनरामजी की शिष्य परंपरा का स्थान इन्दावड़ में है । इन्दावड़ मेड़ता से १० मील पश्चिम-दक्षिण में है । इस स्थान की वैद्य हीरादासजी ने उन्नति की थी । हीरादास के गुरु परंपरा के तीन संतों का नाम नहीं हो सका । १- हीरादासजी २- सालगरामजी ३- नैनूरामजी ४- भंडारी मंगलदासजी ५- भूरादासजी वर्तमान में हैं ।
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१~ *हीरादासजी* उस प्रदेश के प्रसिद्ध संत व वैद्य थे । इन्होंने जोधपुर नरेश मानसिंह की कंठमाल खोई थी और एक पानी का कड़ाह ज़माना रूप करामात भी दिखाई थी । ये दोनों बातें इन्दावड़ में प्रसिद्ध हैं । मुझे इन्दावड़ के सबसे वृद्ध हरदीनराम राड़ जाट ने उक्त दोनों बातें सुनाई थीं । उक्त दोनों कार्यों के कारण ही जोधपुर नरेश मानसिंह ने इन्दावड़ा ग्राम में कुछ भूमि का ताम्रपत्र दिया था । हीरादासजी जोधपुर नरेश मानसिंह के समकालीन हैं । इन्दावड़ का स्थान आचार्य चैनरामजी मेड़ता में थे तब का ही है । हीरादासजी ने उन्नति की ।
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इनके पीछे ४- मंगलदासजी भंडारी इस स्थान में विशेष महानुभाव हुये । आप आचार्य दयारामजी महाराज के शिष्य वि. सं. १९५६ में हुये थे । प्रथम मेड़ता के भंडारी रहे । फिर नारायणा में आचार्य रामलालजी के समय में भंडारी रहे आपने आचार्य प्रकाशदेवजी के समय में भी आप कुछ समय भंडारी रहे । आपने आचार्य गुलाबदासजी महाराज से लेकर वर्तमान आचार्य हरिरामजी तक छः आचार्यों के दर्शन किये ।
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आचार्य रामलालजी के समय में ही उनकी आज्ञा से नैनूरामजी के अति वृद्ध होने पर इन्दावड़ गये । आप रात्रि के १२ बजे उठकर अविचल मंत्र का जप किया करते थे । यह आपका दृढ़ नियम था । इन्दावड़ स्थान की आपने उन्नति की । आपने एक कूप बनवाया जिसका नाम दयाल सागर है और खूब पानी वाला है । आचार्य प्रकाशदेवजी का चातुर्मास भी आपने इन्दावड़ में करवाया था । आपका देहान्त वि. सं. २०३२ कार्तिक शु. ७ को हुआ । आपके उत्तराधिकारी भूरारामजी वर्तमान में हैं । आप संगीत के ज्ञाता हैं । उक्त प्रकार आचार्य चैनरामजी की शिष्य परंपरा इन्दावड़ स्थान का परिचय है ।
(क्रमशः)

*४७. अध्यातम कौ अंग ५/८*

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*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
*श्रद्धेय श्री Tapasvi @Ram Gopal Das की प्रेरणा से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ AI Meta*
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*४७. अध्यातम कौ अंग ५/८*
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नाभि रिदै के गगन में मंहि, कै त्रिकुटि५ की संधि ।
जगजीवन रस पीजिये, मन कूं मांही बांधि ॥५॥
{५. त्रिकुटि=त्रिकूट चक्र की स्थिति(भौंहों के मध्य के कुछ ऊपर का स्थान)}
चाहे नाभि-चक्र में, चाहे हृदय में, चाहे गगन-मंडल में, या त्रिकुटी की संधि में — जहाँ भी मन को अंदर रोक कर स्थिर कर लोगे, वहीं अमृत रस पीने को मिलेगा । संत जगजीवनदास जी कहते हैं, मन को बाहर नहीं, भीतर ही बांधो ।
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नासा अग्रे६ ध्यान धरि, निरखै रूप अगाध ।
जगजीवन इस घर मगन, थकित भये सब साध ॥६॥
(६. नासा अग्रे=नासिका के अगर भाग पर)
नाक के आगे वाले भाग पर ध्यान टिकाकर जब उस अगाध परमात्मा के रूप को देखा जाता है, तो इस घर में मन मगन हो जाता है । संत जगजीवनदास जी कहते हैं, इस अवस्था को देखकर बड़े-बड़े साधक भी थकित यानी आश्चर्यचकित रह जाते हैं ।
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बंक नाल७ पच्छिम दिसा, उलटा नीर चलाइ ।
भ्रमर गुफा८ के घाटि मन, जगजीवन रस पाइ ॥७॥
(७. बंक नाल=तालुमूल में जिह्वा का स्पर्श) 
(८. भ्रमर गुफा=मेरुदण्ड के सम्मुख ग्रीवा के ऊपर का स्थान)
तालु मूल में जीभ को उलटा लगाकर — खेचरी मुद्रा करके — जब साधक अमृत रूपी जल की धारा को पश्चिम दिशा यानी सुषुम्ना की ओर उलटा चलाता है, तब मन भ्रमर-गुफा के घाट पर पहुँचकर सच्चे रस को पा लेता है । यह योग की गुप्त क्रिया का संकेत है ।
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दस९ द्वै दिनकर की किरन९, उर धरि अंबर धोइ ।
कहि जगजीवन सबद सिधि, सहज रांम धुनि होइ ॥८॥
(९-९. दस द्वै दिनकर की किरण=सूर्य की बारह कला)
सूर्य की बारह कलाओं की किरणों को हृदय में धारण करके, आकाश यानी चित्त को धोकर निर्मल कर लो । संत जगजीवनदास जी कहते हैं, तब शब्द की सिद्धि होती है और सहज ही अंदर राम-नाम की धुन बजने लगती है ।
(क्रमशः) 

सोमवार, 31 अगस्त 2026

*कृपारामजी, पं भूधरदासजी*

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🌷*卐 श्री दादूदयालवे नम: 卐*🌷
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*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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*दादू मार्ग महर का, सुखी सहज सौं जाइ ।*
*भवसागर तैं काढ कर, अपणे लिये बुलाइ ॥*
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५~ आप शरीर पर अधिक वस्त्र नहीं रखते थे, एक कौपीन ही रखते थे । पंच केश रखते थे । शरीर से दुर्बल थे । योगियों के शरीर के सामान ही आपका शरीर तेज संपन्न था । आप रात्रि में भजन के समय अपनी जटा को बेरड़ी की शाखा में बांधकर भजन करते थे आप लगभग ७२ वर्ष के हो गये थे तब वि. सं . अ९७० चैत्र बदी ३ को ब्रह्मलीन हुये थे । आपके ब्रह्मलीन होने के समय नावां नगर में केशर की वर्षा हुई थी । समस्त नगर के नर नारियों के कपड़े पीले हो गये थे । दीवालें पत्थर आदि जो भी मैदान में वस्तु थीं वे सब उस समय केशर के रंग में रंजित हो गई थीं । इस घटना को देखने वाले वृद्ध पुरुषों ने मुझे कहा था, तथा नावां नगर में यह बात अति प्रसिद्ध है कहा भी है~
संतन का सुर भी करत, तन त्यागत सत्कार ।
मोतिराम तन तजत की, केशर की बोछार ।६२। दृ.त ११।
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आपका दाह संस्कार नावां नगर की पूर्व की ओर जोगियों के आश्रम में किया गया था । वहां चन्दन की चिता बनाई गई थी । उस स्थल पर चन्दन किसने पहुँचाया था, इसका पत्ता नहीं लगा । यह भी एक विचित्र घटना थी, कारण~ नावां ग्राम में तो इतना चन्दन मिलना अति कठिन ही नहीं, असंभव था । आपकी समाधि पर प्रति वर्ष चैत्र बदी ३ को बड़ी धूम धाम से मेला लगता है । और भावुकों की भावनानुसार आज भी कामनायें पूर्ण होती है । आप महान् संत हुये हैं ।
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*कृपारामजी*
५~ कृपारामजी वैद्य थे । ये नावां से नारायणा में आ गये थे और नारायणा आने के पश्चात् इनकी बहुत प्रतिष्ठा व ख्याति हो गई थी । ये माने हुये साधु वैद्य थे । चिकित्सा में ये अति कुशल थे । इस कार्य में इनको अच्छा यश मिलता था ।
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*पं भूधरदासजी*
पं. भूधरदासजी भैराणा के साधु झारवोड़जी के शिष्य थे, फिर ये खालसा वालों में आ गये थे । किन्तु भूधरदासजी ने मुझे अपने को आचार्य हरजीरामजी के शिष्य बालुरामजी का शिष्य बताया है । आप दादूवाणी, भागवत, गीता आदि की कथा करते थे । आचार्य दयारामजी, रामलालजी प्रकाशदेवजी के आगे कथा करते रहे थे । ये ही वैद्य कृपारामजी के उत्तराधिकारी बने । ये वैद्य भी हैं । चिकित्सा भी अच्छी करते हैं । आपकी आयु लगभग ९५ वर्ष की है । आप वृद्ध संतों की गणना में हैं । आप सामाजिक साहित्य से परिचित हैं । आप का वर्तमान निवास स्थान नारायणा दादू मंदिर के पीछे के चौक के बाहर द्वार पर है । आप अच्छे संत हैं ।
(क्रमशः)

रविवार, 30 अगस्त 2026

*४७. अध्यातम कौ अंग १/४*

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*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
*श्रद्धेय श्री Tapasvi @Ram Gopal Das की प्रेरणा से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ AI Meta*
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*४७. अध्यातम कौ अंग १/४*
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जे अध्यातम६ मन करै, सोई आवै हाथ ।
कहि जगजीवन नांउ ले, (तो) रहै रांम के साथ ॥१॥
(६. अध्यातम=आत्मा एवं परमात्मा से सम्बद्ध मनन, चिन्तन)
जो मनुष्य अध्यात्म में मन लगाता है, उसे वही फल मिल जाता है । संत जगजीवनदास जी कहते हैं, जो राम का नाम लेता है, वह सदा राम के साथ ही रहता है, राम उससे अलग नहीं होते ।
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जिस आरंभ७ जे लगाये, तिनकूं ते ही कांम । 
कहि जगजीवन देह धरि, कोइ बिरला सुमिरै रांम ॥२॥
(७. आरंभ=नवीन कार्य या चेष्टा)
मनुष्य जिस भी नए काम / चेष्टा में अपना मन लगाता है, उसे वही काम सिद्ध हो जाता है । पर संत जगजीवनदास जी कहते हैं, देह धारण करके भी कोई बिरला ही ऐसा होता है जो सच में राम का स्मरण करता है । बाकी लोग संसारी कामों में ही लगे रहते हैं ।
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सब हूं नर आसान१ है, एक अकल२ की लार३ ।
जगजीवन उस अकल का, दाता सिरजनहार ॥३॥
(१. आसन=सरल)   {२. अकल=अकल(हिताहितविवेकनी बुद्धि)}
इंसान के लिए सब काम आसान हो सकते हैं, पर एक हित-अहित का विवेक करने वाली बुद्धि यानी अकल का मिलना सबसे कठिन है । संत जगजीवनदास जी कहते हैं, उस सच्ची अकल को देने वाला तो केवल वह सृजनहार परमात्मा ही है ।
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द्वादस* बाइ४ गगन घर, मगन प्रांण मन होइ ।
जगजीवन अध्यातम अैसा, जे करि जांणैं कोइ ॥४॥
*-* ४ से ९ तक साषियों में योगशास्त्र का वर्णन है ।
(३. लार=साथ)   (४. द्वादस बाइ=बारह वायु) 
बारह प्रकार की वायु को साध कर जब प्राण और मन गगन-मंडल रूपी घर में यानी सहस्रार में लीन होकर मगन हो जाते हैं, तब सच्चा अध्यात्म प्रकट होता है । संत जगजीवनदास जी कहते हैं, ऐसा अध्यात्म कोई-कोई विरला ही जान पाता है ।
(क्रमशः)

शनिवार, 29 अगस्त 2026

*चमत्कारिक घटनायें*

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🌷* श्री दादूदयालवे नम:  *🌷
🌷🙏 *सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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*दादू परचा माँगें लोग सब,*
*कहैं हमकौं कुछ दिखलाइ ।*
*समरथ मेरा सांइयाँ,*
*ज्यों समझैं त्यों समझाइ ॥*
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*चमत्कारिक घटनायें* =
१- एक दिन एक फोटोग्राफर आपकी फोटो लेने के लिये तैयार हुआ । किन्तु महात्मा मोतीरामजी ने उसे निषेध कर दिया । निषेध करने पर भी चित्र लिया किन्तु कैमरे में चित्र आया ही नहीं, फिर कुछ समय के पश्चात् वह फोटोग्राफर मर भी गया ।
२- नावां नगर के पास ही सांभर के एक श्रीमान् व्यापारी ने आपको लंगोट भेंट करना चाहा किन्तु महात्मा मोतीरामजी ने उसे कहा “रामजी इसे तो आप ही धारण करें ।” फिर कुछ समय के पश्चात् उक्त व्यापारी लंगोट धारण करने योग्य हो गया था अर्थात्  उसका धन नष्ट होकर वह कंगाल हो गया ।
३- मोतीरामजी महाराज को एक से अनेक शरीर बनाने की सामर्थ्य भी प्राप्त थी । वे एक समय में अनेक शरीर धारण करके अनेक स्थानों में दीख जाते थे । यह बात जब मारोठ के ठाकुर ने सुनी तब उनके मन में तर्क उठी कि यह गप्प है । ऐसा कैसे हो सकता है ? फिर एक दिन पांचवा ग्राम के वैष्णव मन्दिर में रात्रि को जागरण की योजना थी । मोतीरामजी महाराज से भी भक्तगणों ने अति आग्रह पूर्वक जागरण में पधारने की प्रार्थना की थी । अतः मोतीरामजी महाराज भी जागरण के समय वहां विद्यमान थे । उक्त ठाकुर भी जागरण में आया और मोतीरामजी को जागरण में देखकर मन में निश्चय किया कि आज मोतीरामजी की परीक्षा हो सकती है । ये यहां हैं । मैं अब शीघ्र ही नावां स्थान में जाकर देखूं वहां भी मिल जायेंगे तब तो एक समय में अनेक जगह दीख जाने की बात सत्य समझूंगा और नावां में नहीं मिले तो मिथ्या है ही । ठाकुर भरे जागरण में सहसा उठकर बोले~ मुझे नावां अति शीघ्र जाना है, ऐसा ही कार्य है । फिर घोड़े पर चढ़कर शीघ्र गति से नावां में मोतीरामजी महाराज के स्थान के द्वार पर पहुँच कर कपाट खोलें की प्रार्थना की, तब मोतीरामजी ने कपाट खोल दिये । मोतीरामजी को स्थान में देखकर ठाकुर आश्चर्य में पड़ गया । फिर मोतीरामजी  के चरण छूये और सदा के लिये मोतीरामजी का अनन्य भक्त हो गया । एक बार तत्कालीन जोधपुर नरेश इनके दर्शन को आये थे किन्तु उनको दर्शन नहीं दिया था । कहा भी है~
संतों में निर्पेक्षता, विशेष देखी जाय ।
मोतीराम के दर्शहित, मरू नरेश ललचाय । ४७४ । दृ. त. ११ .
४-  किसान लोग आषाढ़ के मास में बाबाजी मोतीरामजी के स्थान के पास जाकर इस आशा में बैठ जाते थे कि मोतीरामजी के मोख से सुकाल दुष्काल की बात निकल जाय तब खेती करें । उनके मन की बात जानकार मोतीरामजी काल, दुष्काल की बात ऊपर से ही कह देते थे । उनके मुख की वाणी सुनकर ही आगे की खेती करते थे और जैसा मोतीरामजी महाराज कहते थे वैसा ही हो जाता था । कहा भी है~  
संत लोक हित के लिये, कहते भावी बात ।
नावे मोतीरामजी, कहते थे विख्यात । ३३२ । दृ त. ११ ।
अतः प्रतिवर्ष किसान ऐसा ही करते थे । आप अज्ञात के नाम ग्राम कुल बता देते थे । कहा भी है~  
संत जनों में होत है, दिव्य ज्ञान अभिराम ।
बिन जाने ग्राम आदि को, कहते मोतीराम । २७१ । दृ त. ११ ।
(क्रमशः) 

*४६. परमारथ कौ अंग ५७/६१*

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*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
*श्रद्धेय श्री @महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी, @Rgopaldas Tapsvi, बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ @Premsakhi Goswami*
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*४६. परमारथ कौ अंग ५७/६१*
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परमारथ पूरण भगति, परमारथ सुख होइ ।
कहि जगजीवन कबीर गोरख, दादू नांमां जोइ ॥५७॥
संत जगजीवन जी कहते हैं कि परमार्थ में ही भक्ति की पूर्णता है वह ही सुख कारक है । इसके प्रमाण कबीर साहिब गोरखनाथ जी, व दादू जी महाराज हैं ।
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परमारथ की ऊपजी, भाव भगति गुर ज्ञांन ।
कहि जगजीवन हरि हरि बांणी, रांम रांम रस पान ॥५८॥
संत जगजीवन जी क हते हैं कि जिसके मन में भक्ति का भाव हो गुरु महाराज का ज्ञानामृत हो जो वाणी से हरि नाम उच्चारें व राम नाम रस का पान करें ।
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भू पृथिवी हरि हरि सबद, ख३ रुचि रांम निवास ।
इहिं परमारथ ए बूझै, सु कहि जगजीवनदास ॥५९॥
(३. ख=आकाश)
संत जगजीवन जी कहते हैं कि जिसकी आधार रूपी पृथ्वी व जिसके आवृत आकाश से राम नाम ध्वनित हो । ऐसे जन ही परमार्थ जानते हैं । ऐसा संत कहते हैं ।
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सत की चेरी लिच्छमी४, पांय पड़ी फिर आइ ।
कहि जगजीवन दलिदर५, सत धरम देखि बिलाइ ॥६०॥
{४. लिच्छमी=लक्ष्मी (=सम्पति)} {५. दलिदर=दारिद्र्य=निर्धनता (अकिंच्चनता)}
संत जगजीवन जी कहते हैं कि लक्ष्मी साधु जन की दासी है । वह उनके चरणौं में रहती है । ओर गरीबी संतो का सत्य धर्म देखकर ही भाग जाती है ।
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कहि जगजीवन सत धरम, लिच्छमी तहँ ही जानि ।
दूरि करण हरि दरिद्दर, रांम रिदै मंहि आंनि ॥६१॥
संत जगजीवन जी कहते हैं कि जहाँ सत्यधर्म है वहां ही लक्ष्मी निवास करती है । जब किसी का दारिद्रय दूर करना होता है तो प्रभु उसके मन में राम नाम स्मरण कर देते हैं जिससे लक्ष्मी वास होता है
इति परमारथ कौ अंग संपूर्ण ॥४६॥
(क्रमशः)

*२६. भजन प्रताप का अंग ~४५/४८*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*२६. भजन प्रताप का अंग ~४५/४८*
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*पहले चंम सु चूमिये, जे बाँध्या बीच मुसाफ१ ।*
*तो जाति पाँति क्या पूछिये, सुहबत२ देखो साफ ॥४५॥*
यदि मित्र१ अपने प्रेम में बँध गया है और पहले चमड़ा चूम लिया है, तो फिर जाति पाँति क्या पूछता है ? शुद्ध मित्रता२ ही देखना चाहिये । भगवान शुद्ध प्रेम को ही देखते हैं, जाति, पांति, आकृति को नहीं देखता ।
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*ग्वाल भीलनी सौ मिल खेले, शंख बजाया कौने काज ।*
*शाक अरोज्ञा कौनै के घर, नीच ऊंच की रही न लाज ॥४६॥*
भगवान राम ने भिलनी के बेर खाये, भगवान कृष्ण ग्वाल बालों के साथ खेलते रहे, जिसके जिमाने पर पांडवो के यज्ञ में शंख बजा था, वह वाल्मीक कौन था ? सरगरा था, जिसके घर जाकर शाक खाया था, ये विदुर कौन थे ? दासी पुत्र थे । अत: भगवान को नीच वा ऊंच के घर जाने पर कभी भी लज्जा नहीं आती, वे तो शुद्ध भक्ति से ही प्रेम करते हैं । वह चाहे किसी में भी हो, उसी के यहां जा पहुंचते हैं ।
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*नामहिं भजैं सु निर्मले, नीच ऊंच राव रंक ।*
*जन रज्जब रस लीजिये, ईख बंक निष्कलंक ॥४७॥*
ईख बाँका होने पर भी उसको दोष रहित जानकर उसका रस ग्रहण करते हैं, वैसे ही जो नाम-स्मरण करते हैं, वे चाहे जाति से ऊंच हो वा नीच हो - राजा हो वा रंक हो, शरीर की आकृति भी कैसी ही हो वे निर्मल ही माने जाते हैं उनसे भगवत् कथा श्रवण रूप रस लेना चाहिये ।
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*साधू चन्दन चंद का, बंक वर्ण कोउ नाँहिं ।*
*वह शीतल रू सुगंध वहै, वहिके गोविंद माँहिं ॥४८॥*
संत, चन्दन और चन्द्रमा की आकृति का टेढापन और रंग को कोई नहीं देखता, किन्तु संत में गोविन्द की अनुभूति, चन्दन की सुगंध और चन्द्रमा की शीतलता को सभी देखते हैं । संत में गोविन्द की अनुभूति भजन का प्रताप है ।
(क्रमशः)

*२६. भजन प्रताप का अंग ~४१/४४*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*२६. भजन प्रताप का अंग ~४१/४४*
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*जाति पांति कुल सब गये, राम नाम के रंग ।*
*रज्जब लागे लोह ज्यों, पारस का परसंग ॥४१॥*
लोह को पारस का स्पर्श प्राप्त होता है तब उसकी लोह रूप जाति, हिंसक शस्त्रों की पंक्ति और लोह वस्तुएँ बनने की कुल परंपरा ये सभी बातें चली जाती है और वह सुवर्ण होकर सर्वप्रिय भूषण बन जाता है, वैसे ही राम नाम स्मरण का रंग लगने पर प्राणी का जाति दोष, पांति अर्थात संग दोष और कुल परंपरा सभी दोष नष्ट हो जाते हैं, फिर वह संतत्त्व को प्राप्त होकर सर्वप्रिय ब्रह्म-रूप ही हो जाता है ।
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*ताँमें के पात्र सु घने, लोहे के हथियार ।*
*रज्जब पारस परसतें, कुल कंचन व्यवहार ॥४२॥*
ताँबे के बहुत से बर्तन हो तथा लोहे के बहुत से हथियार हो, पारस के स्पर्श होते ही वे सब सुवर्ण हैं, ऐसा वचन व्यवहार होता है । वैसे ही पूर्व चाहे कोई भी जाती हो भगवद् भजन करने पर वे सभी भक्त कहे जाते हैं ।
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*संगति साधू सूर की, आतम अंभ१ समान ।*
*कुल कालिबाँ३ कुठौर कस२, सुमिरन शून्य४ विलान ॥४३॥*
संत संगति सूर्य-किरण के समान है आत्मा जल१ के समान है । सूर्य-किरण के संग से जल खराब स्थान पर कैसे२ रह सकता है ? वह तो आकाश३ में चला जाता है, वैसे ही संत संगति से प्राणी कुल और शरीर४ की आसक्ति में बँधा कैसे रह सकता है ? वह तो स्मरण द्वारा ब्रह्म में विलीन हो जाता है, यही भजन का प्रताप है ।
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*रज्जब कागज टाट के, मसि माँहिं व्यवहार ।*
*वेद कुरान सु वन्दिये, जे बिच आया करतार ॥४४॥*
कागज टाट के बनते हैं, उनमें स्याही के द्वारा वेद तथा कुरान लिखने का व्यवहार किया जाता है, तब सभी कागज और स्याही को प्रणाम करते हैं, फिर जिसके हृदय में सृष्टीकर्ता परमेश्वर का स्मरण सदा के लिये आ गया है, उन्हें क्यों नहीं प्रणाम किया जायेगा ? अर्थात किया जाता है और वह भजन का ही प्रताप है ।
(क्रमशः)

*२६. भजन प्रताप का अंग ~३७/४०*

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*🌷卐 सत्यराम सा 卐🌷*
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*२६. भजन प्रताप का अंग ~३७/४०*
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*दूजी दिल व्यापे१ नहीं, जिंहिं हिरदय हरि आन२ ।*
*ज्यों रज्जब रजनी गई, देखो देखत भान३ ॥३७॥*
देखो, जैसे सूर्य३ को देखते ही रात्रि चली जाती है, वैसे ही जिसके हृदय में भजन द्वारा हरि आजाते२ हैं, उसके हृदय को हरि चिन्तन के बिना दूसरी बात प्रभावित१ नहीं करती ।
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*भाव भानु भासत समय, तम तारे गुण नाश ।*
*जन रज्जब रजनी पड्यां, फेरी करे परकाश ॥३८॥*
सूर्य के दीखते ही अँधेरा और तारे नहीं दिखाई देते किन्तु रात्रि पड़ते ही पुन: अँधेरा होता है और तारे प्रकाश करने लगते हैं, वैसे ही भाव द्वारा मन भगवान् में लय होने के समय तो भ्रम और दुर्गण नहीं भासते किन्तु संसार की और मन जाते ही पुन: भ्रम और दुर्गुण हृदय में भासने लगते हैं ।
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*रज्जब उर गिरि की गुफा, ज्ञान दीप तम दूरि ।*
*चित चेतन सु चिराक बिन, तहाँ तिमिर भर पूरि ॥३९॥*
जैसे पर्वत की गुफा में चिरकाल से अँधेरा भरा रहता है, किन्तु दीपक जलाते ही दूर हो जाता है वैसे ही चिरकाल से हृदय में अज्ञान है, किन्तु ज्ञान आते ही दूर हो जाता है । अत: जब तक भजन द्वारा चित्त में चेतन ब्रह्म का साक्षात्कार रूप चिराग नहीं आता तब तक भ्रम रूप अंधकार परिपूर्ण ही रहेगा ।
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*पाप पुंज कुल१ कालिबाँ२, सकल नाम सौं जाँहिं ।*
*ज्यों रज्जब मद३ भाजना४, फूटा गंगा माँहिं ॥४०॥*
जैसे मदिरा३ का बर्तन४ गंगा में फूटता है तब मदिरा गंगा जल में मिलते ही शुद्ध हो जाती है, वैसे ही जब मन नाम-स्मरण में लगता है तब संपूर्ण१ तन२ शुद्ध हो जाता है, उसकी सभी पापराशि चली जाती है ।
(क्रमशः)

बुधवार, 26 अगस्त 2026

*४६. परमारथ कौ अंग ५३/५६*

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*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
*श्रद्धेय श्री @महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी, @Rgopaldas Tapsvi, बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ @Premsakhi Goswami*
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*४६. परमारथ कौ अंग ५३/५६*
मेघ मया करि बूढ़ा तूटा३, हरी दूब बन राइ ।
कहि जगजीवन जे जस मनसा४, तस फल५ भुगतै भाइ ॥५३॥
(३. बूढ़ा तूटा-झंझावत की वर्षा में पुराने वृक्ष टूट करगिर जाते हैं)
(४. जस मनसा-जैसा संकल्प होता है)  {५. तस फल-वैसा ही उस का फल (परिणाम) होता है} 
संत जगजीवन जी कहते हैं कि वर्षा व मेघ झंझावात में पुराने बूढे पेड़ भी टूट जाते हैं ये सब संसारिक क्रियाओं का प्रभाव है । जिनके प्रभास से बड़े बड़े दृढ जन भी लक्ष्य से हट जाते हैं । और सूक्ष्म होने से हरि दूब फलती है जो अहम् से रहित  हो दीन हो रहता है प्रभु उनका पोषण करते हैं । जैसी जिसकी भावना होती है वैसा ही फल मिलता है ।
कहि जगजीवन भजन कौं, उद्दिम कीजै मांहि६ ।
रांम भगति गुर बंदगी, कोइ दुख ब्यापै नांहि ॥५४॥
(६. मांहि-ह्रदय में)
संत जगजीवन जी कहते हैं कि भजन सप्रयास करना चाहिये प्रभु की भक्ति व सेवा से कोइ दुख नहीं होता है ।
उद्दिम अध्यातम भजन, रांम भगति तत सार ।
कहि जगजीवन हरि परमारथ, सब जन पहुँचैं पार ॥५५॥
संत जगजीवन जी कहते हैं कि हमारा परिश्रम अध्यात्म व भजन हो यह ही तत्व राम भक्ति का सार है । परमार्थ परमात्मा को साध कर सभी जन भव पार हो जाते हैं ।
परमारथ कै कारणैं, उद्दिम कीजै ऊठि१ ।
रांम ह्रिदै रसनां रटिन, साध न फेरै मूंठि२ ॥५६॥
(१. उद्दिम कीजै ऊठि-उत्साहपूर्वक उद्योग करना चाहिये) 
(२. मूंठि-साधु के मंत्र तंत्र के चक्कर में नहीं पड़ना चाहिये)
संत जगजीवन जी कहते हैं कि परमार्थ के कारण सप्रयास उठ कर काम करना चाहिये । राम ह्रदय में हों ओर जिह्वा पर प्रभु का नाम हो । साधु जन को तंत्र मंत्र से परे होना चाहिये ।
(क्रमशः)

*जोबनेर स्थान की परम्परा*

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🌷*卐 श्री दादूदयालवे नम: 卐*🌷
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*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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*सतगुरु संतों की यह रीत,*
*आत्म भाव सौं राखैं प्रीत ।*
*ना को बैरी ना को मीत,*
*दादू राम मिलन की चिंत ॥*
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*जोबनेर स्थान की परम्परा* = आचार्य चैनरामजी महाराज के शिष्य सहजरामजी ने अपना साधनधाम जोबनेर बनाया । उनकी शिष्य परम्परा इस प्रकार है-१-सहजरामजी २ से ७ तक के नाम ज्ञात नहीं हो सके । ८- खूबरामजी ९- विजैरामजी १०- परमेश्वरदासजी ११- नरसीदासजी १२- कनीरामजी १३- जेलदासजी १४- रामनारायणदासजी १५- मंगलदासजी १६- प्रभुदासजी ८- खूबरामजी का नारायणा दादू द्वारा में व बाहर बगीची व बड़ा स्थान है ।
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खूबदासजी अच्छे संत हुये हैं । आप दादूद्वारे के भंडारी रहे हैं । समाज सेवी महात्मा थे । १- सहजरामजी अधिकारी आचार्य चैनरामजी के शिष्य थे और प्रतिष्ठित संत थे । इनकी अधिकारी संज्ञा थी । भेष को चवन्नी पूजा बांटी थी जयपुर नरेश माधवसिंह प्रथम ने इनका अच्छा सम्मान किया था । इस समय जयपुर में उदयपुर जमात की हवेली है, इसके सामने ही सहजरामजी ने अपना अस्थल भी स्थापित किया था ।
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इन्होंने उतराध में रामत की थी । भेंट पूजा लेते थे । रथ सवारी आदि मूर्तब साथ लेकर चलते थे । इनकी समाज में अच्छी प्रसिद्धि व प्रतिष्ठा थी । उए उच्चकोटि के संत थे । इन्होंने अनन्त प्राणियों को निर्गुणराम की भक्ति में लगाया था । इनके मुख्य दो ही काम थे भगवद् भजन और उपदेश करना रूप उपकार ही थे । इन्होंने अपना साधनधाम जोबनेर में भी बनाया था । मुख्य स्थान नारायणा में ही था । ये बहुत ही प्रभावशाली संत हुये हैं ।
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*जयपुर स्थान* = जयपुर पुराणी वस्ती का स्थान नूंनन्दरामजी भंडारी के शिष्य मोहनदासजी ने बनवाया था । उसकी परम्परा १- मोहनदासजी २- जमनादासजी ३- वक्षीराम जी । आगे नहीं चला समाप्त हो गया । यह स्थान नारायणा कुंड वाले स्थान की शाखा रूप था । वि. स. १९०० के लगभग जयपुर का स्थान बना था । इसके संस्थापक मोहनदासजी बहुत अच्छे संत हुये हैं । तत्कालीन जयपुर नरेश से भी इनका अच्छा संपर्क था । ये प्रतिष्ठित महात्मा थे । भजन, विचार, उपदेश ही इनके मुख्य कार्य थे ।
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*नावां का स्थान* = आचार्य चैनरामजी महाराज के शिष्य १-गोविन्ददासजी २- श्योजीरामजी ३- रामवल्लभदासजी ४- मोतीरामजी ५- वैद्य कृपारामजी ६-पं. भूधरदासजी वर्तमान हैं । ४- नावां में प्रसिद्ध संत मोतीरामजी ने अपना साधनधाम बनाया था । महात्मा मोतीरामजी का जन्म नावां नगर में ही हुआ था । आपका बचपन में भगवद् भजन में अनुराग था । आप बाल ब्रह्मचारी थे ।
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बचपन में ही संतों का संग होने से आप काशी चले गये थे । वहां अध्ययन करके फिर रामस्वरूपजी महाराज सीहावालों के पास जाकर साधन का अभ्यास करते रहे थे । पश्चात् नावां नगर में आकर भजन करने लगे थे । आप स्थान से बाहर बहुत कम निकलते थे । सब कार्य स्थान में ही कर लेते थे । स्थान के द्वार पर कूप था । जल भी आप स्थान की छत से ही भर लेते थे । स्थान से कूप तक एक पुल बना रखा था । उस पर से भर लेते थे । स्थान का द्वार बन्द ही रखते थे । महान् अन्तर्मुख योगी संत थे ।
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उनके अनेक चमत्कारों की बातें नावां में प्रसिद्ध है । आपके के पास कोई भी आता था, उसके मन की कल्पना आप जान जाते थे और उसके कहे बिना ही उसके मनकी बात उसे बता देते थे । कोई आपके दर्शन करने आता था तो उसे छत पर से ही दर्शन देते थे । कोई रोग पीड़ित आता तो उसे अपने निवास स्थान के पास की बेरड़ी के पत्ते खाने की आज्ञा देते थे । फिर यदि वह उस बेरड़ी के पत्ते खा लेता था तो अवश्य रोग से मुक्त हो जाता था । किसी से बात करना उचित समझते थे तो विशेष बात भी करते थे । अन्यथा सब से बातें नहीं करते थे । 
(क्रमशः)

मंगलवार, 25 अगस्त 2026

*२६. भजन प्रताप का अंग ~३३/३६*

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*🌷卐 सत्यराम सा 卐🌷*
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*२६. भजन प्रताप का अंग ~३३/३६* 
*गुण तारे माया तिमिर, शीत भरम मन चंद ।* 
*रज्जब सुमिरन सूर सौं, सहज पड़े सब मंद ॥३३॥* 
जब निरंजन नाम-स्मरण रूप सूर्य उदय होता है तब उससे क्रोधादि गुण रूप तारे, माया रूप अँधेरा, श्रम रूप शीत, ये सभी अनायास ही मंद पड़ जाते हैं ।
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*रज्जब भजन भानु उर उदित ही, अस्त होय गुण चारि ।*
*तम तारे शशि शीत गत, नर देखो सुनिहारि ॥३४॥* 
सूर्य उदय होते ही तम, तारे, चन्द्रमा और शीत ये चारों ही अस्त प्राय: हो जाते हैं, वैसे ही भजन का प्रताप उदय होते ही काम क्रोधादि गुण, माया, श्रम और मन की चपलता ये चारों गुण हृदय में चले जाते हैं । हे विचारशील नरो ! तुम विचार द्वारा देखो यह बात सत्य है । 
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*नाम निरंजन उर बसे, तो कोउ गुण व्यापे नाँहिं ।* 
*जन रज्जब ज्यों सर्प विष, गरुड़द्वार मुख माँहिं ॥३५॥* 
जैसे गरुड़द्वार(मोर की पंखों से निकला हुआ ताँबा) मुख से होने में शरीर पर सर्प विष का प्रभाव नहीं पड़ता, वैसे ही निरंजन राम का नाम हृदय में रहने पर कामादि कोई भी मायिक गुण हृदय में व्याप्त नहीं होता अर्थात हृदय को व्यथित नहीं करता । 
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*अहि इन्द्र आतम१ डसी, विष नख शिख रह्यो छाय ।*
*रज्जब मंत्र सु राम रट, तब ही ऊतर जाय ॥३६॥* 
इन्द्रिय रूप सर्प ने अन्त:करण१ को काटा है, उसका विषय रूप विष नख से शिखा पर्य्यन्त व्याप्त हो गया है । जैसे सर्प विष मन्त्र से उतरता है, वैसे ही यह विष निरंतर राम के नाम, राम मंत्र की रटन लगावे तब उतरता है ।
(क्रमशः)