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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२९. अद्वैत ज्ञान कौ अंग २५/२८
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चीर मांहिं ज्यौं चूनरी, गिलम मांहि बहु भांति ।
ऐसै सुन्दर देखिये, जगत ब्रह्म नहिं द्वांति ॥२५॥
जैसे किसी नारी द्वारा साड़ी पर ओढी हुई चुनरी के मुलायम(मृदु = गिलम) बेलबूटे या किसी ऊनी गलीचे के मुलायम बेलबूटे परस्पर अभिन्न लगते हैं; उसी प्रकार ब्रह्म एवं जगत् की अभिन्नता(अद्वैतता) भी समझनी चाहिये ॥ (द्र०-सवैया : ३२/१८ छ०)
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राजा प्रजा तुरंग गज, पशु पंखी बहु जन्त ।
सुन्दर पट ज्यौं आतमा, जग चित्राम अनंत ॥२६॥
जैसे किसी विस्तृत पट(वस्त्र) पर राजा, प्रजा(जनता), पशु पक्षी एवं विविध प्राणियों का चित्र खींच दिया जाय तो इस उदाहरण में पट को आत्मा तथा उस पर खिंचे हुए राजा आदि के चित्रों को जगत् के सदृश समझना चाहिये ॥२६॥
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इक क्रीडहिं इक मारियंहिं, बस्तर कौं कछु नांहिं ।
सुन्दर जग चित्राम ज्यौं, पट आतम के मांहिं ॥२७॥
जैसे किसी वस्त्र पर कुछ खिलाडियों का, कुछ योद्धाओं का चित्र बना दिया जाय तो उस क्रीडा एवं युद्ध का वस्त्र से इतना ही सम्बन्ध है कि वे चित्र पट पर बने हैं इसी प्रकार आत्मा में इस जगत् का सामञ्जस्य समझें ॥२७॥
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कोट कांगुरे एक हैं, देखत दीसहिं दोइ ।
ऐसैं सुन्दर ब्रह्म तें, जगत भिन्न नहिं होइ ॥२८॥
जैसे किसी नगर के किले पर ऊँचे ऊँचे कंगूरे(गुम्बद, बुर्ज) बना दिये जायँ जो दीखने में भले ही ये कंगूरे एवं किला दो(द्वैत) दिखायी दें; परन्तु यथार्थतः उन दोनों में कोई भेद नहीं है । इसी प्रकार ब्रह्म एवं जगत् की स्थिति समझनी चाहिये ॥२८॥ (द्र० - सवैया : ३२/१८ छ०)
(क्रमशः)








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जो मनुष्य अपने ज्ञानका, अपनी समझका, अपने अनुभवका आदर नहीं करता है, वह न शास्त्रोंका, न ईश्वरका, न गुरुजनोंका— किसीका भी आदर नहीं कर सकेगा। मनुष्योंको कम-से-कम अपनी समझ, अपनी जानकारीका आदर तो करना ही चाहिए। यह बात सब जानते हैं कि शरीर पैदा हुआ है और समय होने पर निश्चित ही मरेगा, फिर भी इस ज्ञानका आदर नहीं करते हैं। इस बातका अर्थ है कि यह मनुष्य शरीर भगवान् ने जिस विशेष उद्देश्यके लिए दिया है, मनुष्य शरीरमें भगवत्प्राप्तिका मौका दिया है, उसे शरीरके रहते प्राप्त कर लेना चाहिए। ऐसा नहीं करके मनुष्य शरीरमें नहीं करने योग्य कार्य करते हैं, यह अपने विवेककी हत्या है।*













