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🌷 *#श्रीरामकृष्ण०वचनामृत* 🌷
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*दादू ऐसा बड़ा अगाध है, सूक्षम जैसा अंग ।*
*पुहुप वास तैं पतला, सो सदा हमारे संग ॥*
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साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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*गुरुभाइयों के साथ नरेन्द्र*
ध्यानवाले कमरे में अर्थात् काली तपस्वीवाले कमरे में नरेन्द्र और प्रसन्न आपस में बातचीत कर रहे हैं । कमरे में एक दूसरी तरफ राखाल, हरीश और छोटे गोपाल हैं । बाद में बूढ़े गोपाल भी आ गये ।
नरेंद्र गीतापाठ करके प्रसन्न को सुना रहे हैं -
“ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति ।
भ्राम्यन् सर्वभूतानि यन्त्रारूढ़ानि मायया ॥
तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत ।
तत् प्रसादात् परां शान्तिं स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम् ॥
सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज ।
अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः ॥
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नरेन्द्र - देखा ? - 'यन्त्रारूढ़' ! 'भ्रामयन् सर्वभूतानि यन्त्रारूढ़ानि मायया ।' इस पर भी ईश्वर को जानने की चेष्टा ! तू कीट से भी गया-बीता है, तू उन्हें जान सकता है ? जरा सोच तो सही आदमी क्या है । ये जो अगणित नक्षत्र देख रहा है, इनके सम्बन्ध में सुना है, ये एक एक Solar system(सौरजगत्) हैं । हम लोगों के लिए जो यह एक ही Solar system है, इसी में आफत है । जिस पृथ्वी की सूर्य के साथ तुलना करने पर वह एक भटे की तरह जान पड़ती है, उस उतनी ही पृथ्वी में मनुष्य चल-फिर रहा है ।
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नरेन्द्र गा रहे हैं । गाने का भाव -
"तुम पिता हो, हम तुम्हारे नन्हे-से बच्चे हैं । पृथ्वी की धूलि से हमारा जन्म हुआ है और पृथ्वी की धूलि से हमारी आँखे भी ढँकी हुई हैं । हम शिशु होकर पैदा हुए हैं और धूलि में ही हमारी क्रीड़ाएँ हो रही हैं, दुर्बलों को अपनी शरण में ग्रहण करनेवाले, हमें अभय प्रदान करो ।
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एक बार हमें भ्रम हो गया है, क्या इसीलिए तुम हमें गोद में न लोगे ? - क्या इसीलिए एकाएक तुम हमसे दूर चले जाओगे ? अगर ऐसा करोगे तो, हे प्रभु हम फिर कभी उठ न सकेंगे, चिरकाल तक भूमि में ही अचेत होकर पड़े रहेंगे । हम बिलकुल शिशु हैं, हमारा मन बहुत ही क्षुद्र है । हे पिता, पग-पग पर हमारे पैर फिसल जाते हैं ।
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इसलिए तुम हमें अपना रुद्रमुख क्यों दिखलाते हो ? - क्यों हम कभी कभी तुम्हारी भौंहों को कुटिल देखते हैं ? हम क्षुद्र जीवों पर क्रोध न करो । हे पिता, स्नेह-शब्दों में हमे समझाओं - हमसे कौनसा दोष हो गया है ? यदि हमसे सैकड़ों बार भी भूल हो जाय, तो सैकड़ों ही बार हमें गोद में उठा लो । जो दुर्बल हैं, वे भला कर क्या सकते हैं ?" "तू पड़ा रह । उनकी शरण में पड़ा रह ।"
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नरेन्द्र भावावेश में आये हुए-से फिर गा रहे हैं - (भावार्थ) –
"हे प्रभु, मैं तुम्हारा गुलाम हूँ । मेरे स्वामी तुम्हीं हो । तुम्हीं से मुझे दो रोटियाँ और एक लंगोटी मिल रही हैं ।"
"उनकी (श्रीरामकृष्णदेव की) बात क्या याद नहीं है ? ईश्वर शक्कर के पहाड़ हैं, और तू चींटी, बस एक ही दाने से तो तेरा पेट भरता है, और तू सोच रहा है कि मैं यह पहाड़ का पहाड़ उठा ले जाऊँगा । उन्होंने कहा है, याद नहीं ? -
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'शुक-देव अधिक से अधिक एक बड़ी चींटी समझे जा सकते हैं ।' इसीलिए तो मैं काली से कहा करता था, 'क्यों रे, तू गज और फीता लेकर ईश्वर को नापना चाहता है ?"
"ईश्वर दया के सागर हैं । उनकी शरण में तू पड़ा रह । वे कृपा अवश्य करेंगे । उनसे प्रार्थना कर -
'यत्ते दक्षिणं मुखं तेन मां पाहि नित्यम् ।‘ –
"असतो मा सद् गमय ।
तमसो मा ज्योतिर्गमय ॥
मृत्योर्माऽमृतं गमय ।
आविराविर्म एधि ॥
रूद्र यत्ते दक्षिणं मुखम् ।
तेन मां पाहि नित्यम् ॥"
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प्रसन्न - कौनसी साधना की जाय ?
नरेन्द्र - सिर्फ उनका नाम लो । श्रीरामकृष्ण का गाना याद है या नहीं ?
नरेन्द्र श्रीरामकृष्णदेव का वह गाना गा रहे हैं, जिसका भाव है –
"ऐ श्यामा, मुझे तुम्हारे नाम का ही भरोसा है । पूजनसामग्री, लोकाचार और दाँत निकालकर हँसने से मुझे क्या काम ?
तुम्हारे नाम के प्रताप से काल के कुल पाश छिन्न-भिन्न हो जाते हैं, शिव ने इसका प्रचार भी खूब कर दिया है, मैंने तो अब इसे ही अपना आधार समझ लिया है । नाम लेता जा रहा हूँ; जो कुछ होने का है, होता रहेगा । क्यों मैं अकारण सोचकर जीवन नष्ट करूँ ? ऐ शिवे, मैंने शिव के वाक्य को सर्वसार समझ लिया है ।"
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प्रसन्न - तुम अभी तो कह रहे हो, ईश्वर है । फिर तुम्हीं बदलकर कहते हो, 'चार्वाक और अन्य दूसरे दर्शनाचार्य कह गये हैं, यह संसार आप ही आप हुआ है ।'
नरेन्द्र - तूने Chemistry (रसायन शासत्र) नहीं पढ़ा ? अरे यह तो बता, Combination (समवाय - संयोग) कौन करता है ? पानी तैयार करने के लिए आक्सीजन, हाइड्रोजन और इलेक्ट्रिसिटी, इन सब चीजों को मनुष्य का हाथ इकट्ठा करता है ।
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"Intelligent Force (ज्ञानपूर्वक शक्तिचालना) तो सब लोग मानते हैं । ज्ञानस्वरूप एक ही है, जो इन सब पदार्थों को चला रहा है ।"
प्रसन्न - दया उनमें है, यह हम कैसे जानें ?
नरेन्द्र - 'यत्ते दक्षिणं मुखं' वेदों में कहा है ।
"जॉन स्टुअर्ट मिल भी यही कहते हैं । जिन्होंने मनुष्य के भीतर दया दी, उनमें न जाने कितनी दया है ! वे (श्रीरामकृष्ण) भी तो कहते थे - 'विश्वास ही सार है ।' वे तो पास ही हैं । विश्वास करने से ही सिद्धि होती हैं ।"
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यह कहकर नरेन्द्र मधुर स्वर में गाने लगे –
"मोको कहाँ ढूँढ़ो बन्दे मैं तो तेरे पास में ।
ना रहता मैं झगड़ि बिगड़ि में, ना छुरी गढ़ास में ।
ना रहता में खाल रोम में, ना हड्डी ना माँस में ॥
ना देवल में ना मसजिद में, ना काशी-कैलास में ।
ना रहता मैं अवध-द्वारका, मेरी भेंट विश्वास में ॥
ना रहता मैं क्रिया करम में, ना योग संन्यास में ।
खोजोगे तो आन मिलूँगा, पल भर की तलाश में ॥
शहर से बाहर डेरा मेरा, कुटिया मेरी मवास में ।
कहत कबीर सुनो भई साधो, सब सन्तन के साथ में ॥"
(क्रमशः)