गुरुवार, 25 जून 2026

२८. आत्म अनुभव कौ अंग ३७/४०

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२८. आत्म अनुभव कौ अंग ३७/४०
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दूरि करै सब बासना, आशा रहै न कोइ । 
सुन्दर वह ई मुक्ति है, जीवत ही सुख होइ ॥३७॥
इस भवमुक्ति का वास्तविक उपाय यही है कि साधक को अपने मन की सभी सांसारिक वासनाएँ दूर करते हुए समस्त तृष्णाओं का भी त्याग कर देना चाहिये । यही मुक्ति है । इसी से साधक को जीवन में स्थायी सुख मिल सकता है ॥३७॥ (३२ से ३७ साषी के विस्तार के लिये द्र० - सवैया, इसी अंग का छन्द १३-१४)
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सुन्दर कोऊ कहत हैं, नाभि कंवल मैं ईस ।
कोऊ ऐसैं कहत हैं, हृदय माहिं जगदीस ॥३८॥
कोई मतवादी(हठयोगी) नाभिकमल में उस ईश्वर का निवास(आश्रयस्थल) बताता है । कोई उस जगत्स्वामी का आवास हृदय कमल में बताता है (भ० गीता, अ० १८/६१) ॥३८॥
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कोऊ कंठ बिषै कहैं, अग्र नासिका कोइ । 
कोऊ भृकुटी मैं कहैं, सुन्दर अचिरज होइ ॥३९॥
किसी योगी ने ईश्वर का वास कण्ठ में बताया है । किसी ने इस का स्थान नासिका के अग्रभाग पर बताया है । तथा कोई भृकुटी(चक्षुओं के मध्य भाग) में ईश्वर का स्थान बताता है - यह सब सुन सुन कर हमें आश्चर्य होता है ॥३९॥
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कोऊ कहैं लिलाट मैं, कोऊ तालु मांहिं । 
कोऊ भौंर गुफा कहैं, सुन्दर अनुभव नांहिं ॥४०॥
कोई इस का वास ललाट(मस्तक) में मानता है तो कोई तालु में मानता है । कोई(मेरुदण्ड के सम्मुख, ग्रीवा के उपरि भाग में विद्यमान) भ्रमरगुफा को ईश्वर का वास मानता है; परन्तु हमारा अनुभव ज्ञान इन सब मतों के विरुद्ध है ॥४८॥ (३८ से ४० साषी के लिये द्र० - सवैया : अंग २८/१६)
(क्रमशः) 

भौ जल क्यूँ तिरौं रे

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*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*भौ सागर में डूबतां, सतगुरु काढे आय ।*
*दादू खेवट गुरु मिल्या, लीये नाव चढाय ॥*
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विनती ॥
भौ जल क्यूँ तिरौं रे, म्हारौ पाण न पूजै कोइ ।
एकहि खेवट नाव बिन, डाभकडूभा होइ ॥टेक॥
अति औंडौ आसँध नहीं, कीजै कौंन उपाइ ।
पारि परोहन नीसरै, जे हरिजी होइ सहाइ ॥
पाँच कुसंगी सँगि रहै, भूंडा भौंडै होइ ।
जे हौं तिरिबा की करौं, तौ आघौ देहि धकाइ ॥
पाण नहीं पाणी नहीं, भेले पड़ी न बाथ ।
जे तूँ तारै तौ तिरौं, हरिजी पाकड़ि हाथ ॥
भौ सागर मैं डूबताँ, अबकै लेहु उबारि ।
बषनां दे रे बूंबड़ी, साहिब कै दरबारि ॥१६०॥
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पाण = शक्ति, सामर्थ्य । पूजै = प्रभावशाली । डाभकडूभा = कभी डूबना कभी पानी के ऊपर आना । आसंघ = शक्ति, बल । परोहन = नौका । भूंडा-भौंड़ै =बुरे-बुरे होकर । पाणी = प्राणी = साथी । भेले = साथ में । बाथ = पतवार । बूंबड़ी = जोर से चिल्लाकर अर्थात् अतीव दीन होकर प्रार्थना ॥
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मेरी स्वयं की शक्ति इतनी प्रभावी नहीं है कि मैं भवजल से पार हो सकूँ । अतः मैं बार-बार विचारता और कहता हूँ कि मैं भवजल से कैसे तिर सकता हूँ । मेरे पास एक हरि क आश्रय रूप केवट का बल नहीं है । इसीलिये डाभकडूभा हो रही है । भवसागर अत्यन्त गहरा है । मेर स्वयं की सामर्थ्य इतनी नहीं है कि मैं इसे पार कर जाऊँ ।
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बताइये ! अब इसको पार करने का क्या उपाय है । मेरी नौका तबही पार निकल सकती है, जब परात्पर-परब्रह्म-परमात्मा मेरे सहायक बन कर मेरी सहायता करें । बुरे स्वाभाव वाले बुरा करने के लिये सदैव ही शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंधात्मक पंचविषय मेरे साथ रहते हैं जो जब भी मैं भवसागर को तैरने का प्रयत्न करता हूँ तब ही वे और गहरे जल में धक्का दे देते हैं । मेरे में बल का सर्वथा अभाव है ।
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मेरे रामजी के अतिरिक्त और कोई सहायक प्राणधारी नहीं है । मेरे पास भक्ति रूपी पतवार भी नहीं है । अतः हे हरिजी ! यदि तू ही मेरा हाथ पकड़ कर मुझे तारेगा तो मैं तिरुंगा । अन्यथा नहीं तिर पाऊंगा । हे हरि ! भवसागर में मुझ डूबते हुए को अबकी बार अवश्य पार कर देना ।
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बषनांजी अपने मन को सम्बोधित करते हुए कहते हैं, हे मन ! परमात्मा के दरबार में विनीत भावापन्न होकर गंभीर एवं करुण-प्रार्थना कर कि अबकी बार मुझ डूबत हुए को पार कर दे ॥१६०॥

*२०. सुमिरण का अंग ~४१/४४*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*२०. सुमिरण का अंग ~४१/४४*
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*तू हीं तू ही तन में करे, इक तत तृष१ तिहुँ काल ।*
*जन रज्जब रुचि सौं रटे, भाग भले तिहि भाल ॥४१॥*
शरीर में मनोवृत्ति निरन्तर 'तू हीं तू हीं' करती रहती है । तीनों कालों में एक ब्रह्म तत्त्व को प्राप्त करने की ही तृषा१ अर्थात अभिलाषा लगी रहती है । इस प्रकार जो प्रीति से हरि नाम की रट लगाये रहता है उसका का भाग्य विशाल है ।
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*रज्जब प्राण पिंड ब्रह्माण्ड मधि, जीव जगत गुरु नाम ।*
*संत सजीवन सो सुमिर, तिनकी मैं बलि जाम ॥४२॥*
ब्रह्माण्ड में जो प्राण अर्थात सूक्ष्म शरीर धारी और पिंड अर्थात स्थूल शरीर धारी जगत् के जीव गुरु द्वारा प्रप्त हुये ईश्वर नाम का स्मरण करते हैं, वे सजीवन संत हो जाते हैं अर्थात ब्रह्म को प्राप्त हो जाते हैं, उनकी मैं बलिहारी जाता हूँ ।
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*नाम लेत निर्भय भये, साधू सुर नर शेष ।*
*जन रज्जब लै लूटि हैं, मानुष देही देश ॥४३॥*
नाम-स्मरण करने से ही, शेषजी, देवता, संत और साधारण नर भी काल-कर्म के भय से रहित हुये हैं । इस मनुष्य देह रूप देश में नाम-स्मरण रूप धन की वृत्ति द्वारा चिन्तन करना रूप लूट विशेष रूप से होती है, अत: मानव को इसमें प्रमाद नहीं करना चाहिये ।
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*सदा सनेह रहै सुमिरन सौ, भाग्य भजन में भीगा भाव ।*
*जन रज्जब जप जीवन जीया, मानुष देही पाया डाँव ॥४४॥*
जिस का हरि-स्मरण में सदा प्रेम है, अन्त:करण के सभी भाव भजन-रस से भीगे रहते हैं, वह भाग्यशाली है । अत: मनुष्य देह रूप सुन्दर दाँव प्राप्त हुआ है, इससे जीवों के जीवन रूप परमात्मा के नाम का जप अवश्य करना चाहिये ।
(क्रमशः)

२८. आत्म अनुभव कौ अंग ३३/३६

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२८. आत्म अनुभव कौ अंग ३३/३६ 
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मुक्ति बतावत ब्योम परि, कहि धोखे के बैंन । 
सुन्दर अनुभव आतमा, उहै मुक्ति सुख चैंन ॥३३॥ 
यवनमत : कुछ मतवादी(सूफी दार्शनिक) सातवें आकाश(आसमान) में इस मुक्ति का स्थान बताते हैं । उन का भी यह कथन भ्रममात्र ही है; क्योंकि आत्मा का साक्षात्कार केवल शुद्ध हृदय में आत्मचिन्तन से ही हो पाता है । तभी साधक परम सुख एवं शान्ति का अनुभव कर पाता है ॥३३॥
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कोऊ मुक्ति शिला कहै, दूरि बतावत प्रोक्ष । 
सुन्दर अनुभव आतमा, यह ई कहिये मोक्ष ॥३४॥
कोई(जैनमतानुयायी) दार्शनिक दूरस्थ मुक्तिशिला को मुक्ति का वास्तविक स्थल बताते हैं । यह मत भी परोक्ष का ही ज्ञापन करता है; क्योंकि इस साधन(मत) से आत्मतत्त्व का प्रत्यक्ष साक्षात्कार कहाँ हुआ । यह भवमुक्ति आत्मानुभव के विना अन्य किसी भी साधन से सम्भव नहीं है ॥३४॥
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सुन्दर साधन सब करैं, कहै मुक्ति हम जांहिं । 
आतम के अनुभव बिना, और मुक्ति कहुं नांहिं ॥३५॥ 
श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - इस प्रकार वे सभी तथाकथित साधक भवमुक्ति के लिये पूर्ण प्रयास करते हैं; परन्तु आत्मानुभव के विना अपनी लक्ष्य-प्राप्ति में किसी को भी सफलता नहीं मिल पाती ॥३५॥
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सुन्दर मीठी बात सुनि, लागे करवा खांन । 
कष्ट करै बहु भांति के, तांतें अति अज्ञांन ॥३६॥
इन मतवादियों की बातें सुनने में तो बहुत मधुर लगती है; परन्तु व्यवहार में असफलता मिलने पर उन में कडुवापन(कटुता) आ जाता है । इस कष्टसाध्य साधना में असफल रहने पर इन का साधक अज्ञान में ही डूबा रह जाता है ॥३६॥
(क्रमशः)

बुधवार, 24 जून 2026

माया बादली रे

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*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*प्रेम भक्ति जब ऊपजै, निश्‍चल सहज समाधि ।*
*दादू पीवे राम रस, सतगुरु के प्रसाद ॥*
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राग धनाश्री ॥१९॥माया॥
माया बादली रे, तामैं हरि चंदा दीसै नाहिं ।
तिहि कारणि दुख पाइहै, कमोदनि जल माहिं ॥टेक॥
माया का बादल मिल्या, चंद छिप्या ता माहिं ।
मोह अंधारा व्है रह्या, ताथैं सूझै नाहिं ॥
ए बादल बहु भाँति का, पार न पावै कोइ ।
न बादल आघा खिसै, ना रैंणि उजाला होइ ॥
घात घटा बित ऊलटै, गाजै नित अहंकार ।
तन त्रिसना दिन की खिवै, यौं भीगा संसार ॥
रन मैं बन मैं घर महै, घूमि रही सब ठाँइ ।
बड़ा बड़ा गैंवर गल्या, माया का दौं माहिं ॥
ग्यान पवन जे संचरै, तौ बादल देइ उडाइ ।
बषनां कवल कमोदनी, बिगसै चंद तहाँ दिठि जाइ ॥१५९॥
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माया बादल = मेघ रूपा है । आकाश में = हृदय में माया के छा जाने पर परमात्मा रूपी चंद्रमा का दर्शन नहीं हो पाता है । इसी कारण संसार रूपी जल में कुमोदनी रूपी साधक = जीव दुख पाता है । माया रूपी बादलों के आपस में मिल जाने पर = माया का गहरा प्रभाव हो जाने पर परमात्मा रूपी चंद्रमा हृदय रूपी आकाश में छिप जाता है ।
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होता तो परमात्मा हृदयाकाश में ही है किन्तु मात्र छिप जाता है । ऊपर से मोह रूपी अधकार और अपना साम्राज्य जमा लेता है जिससे झूठ-सच कुछ भी सूझता = मालूम नहीं होता है । माया रूपी बादल अनेक प्रकार के हैं, धन-सम्पत्ति, बढ़ाई-मान, अहंकार, काम, क्रोध, लोभ, मोह, स्त्री, घर, दूकान, खेत, खलियान, पद, प्रतिष्ठा आदि आदि ।
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इनका पार कोई नहीं पा सकता । ये माया रूपी बादल आगे भी नहीं खिसकते हैं तो इनके कारण रात्री में उजाला भी नहीं होता है । अज्ञानावस्था में माया के कारण ज्ञान का प्रकाश भी नहीं हो पाता है । माया के कारण घात = हिंसा रूपी घटाएँ नित्य ही उमड़ती-घुमड़ती है । अहंकार रूपी गर्जना नित्य ही होती रहती है ।
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शरीर में त्रिष्ना रूपी बिजली दिन की = प्रतिदिन ही चमकती = प्रकट होती रहती है । इस प्रकार से सारा संसार ही इस माया रूपी बदली के प्रभाव रूपी जल से भीगता रहता है । यह माया रणसंग्राम में, जंगल में, घर में सभी जगहों पर अपना प्रभाव फैलाती फिरती है । इस माया रूपी अग्नि की लपटों में बड़े बड़े गैंवर = हाथी जैसे दिग्गज महान् व्यक्ति भी जलकर भस्म हो गये हैं ।
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यदि ज्ञान रूपी पवन का संचार हो जाये तो माया रूपी बादलों को वह उड़ा देता है जिससे साधक का हृदय रूपी कुमोदनी जहाँ भी चन्द्रमा रूपी परमात्मा होता है वही उसको दिठि = देखकर प्रफुल्लित हुई आनंद निमग्न हो जाती है ॥१५९॥

*२०. सुमिरण का अंग ~३७/४०*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*२०. सुमिरण का अंग ~३७/४०*
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*ज्यों जोगी मृग सींग सौ, विप्र जनेऊ जाण ।*
*त्यों रज्जब राम ही गहो, तकि हरियल की बाण ॥३७॥*
जैसे नाथ मृग के सींग को नहीं छोड़ता, ब्राह्माण जनेऊ नहीं छोड़ता, और हरियल पक्षी का स्वभाव देखो वह काष्ठ को नहीं छोड़ता, वैसे ही प्रतिक्षण राम का स्मरण करते रहना चाहिये ।
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*तन मन ले सुमिरण करे, रोम रोम रट राम ।*
*यूं रज्जब जगदीश भज, सरे सु आतम राम ॥३८॥*
तन को अनुचित व्यवहार से, मन को भोग-वासनाओं से ऊंचा उठाकर स्मरण करे, रोम रोम से राम नाम की रट लगाता रहे, इस प्रकार जगदीश्वर का भजन करने से ही जीवात्मा का मुक्ति कार्य सिद्ध होता है ।
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*सुमिरण सुरति संभालना, अविगत याद अराध ।*
*भजन यही भूले न प्रभु, रज्जब निज मग लाध॥३९॥*
वृत्ति द्वारा नाम को संभालना ही स्मरण है, मन इन्द्रियों के अविषय राम को याद रखना ही आराधना है प्रभु को न भूलना ही भजन है । इस प्रकार साधन करने से ही निज स्वरूप प्राप्ति का ज्ञान रूप मार्ग प्राप्त होता है ।
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*बंदे को यहु बन्दगी, साहिब करना याद ।*
*यह सेवा सुमिरन यही, यही जिकर फरियाद ॥४०॥*
भक्त के लिये यही भक्ति कर्तव्य है कि -निरन्तर भगवान को याद रखना, यही सेवा है, यही स्मरण है और यही चर्चा है और यही पुकार है ।
(क्रमशः)

२८. आत्म अनुभव कौ अंग २९/३२

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२८. आत्म अनुभव कौ अंग २९/३२
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नास्ति बादी यौं कहै, कर्त्ता नाहीं कोइ । 
सुन्दर मिल्या संजोग सब, पुनि बियोग हू होइ ॥२९॥ 
कोई नास्तिक(चार्वाकमतानुयायी) कहता है - इस सृष्टि का कर्ता कोई नहीं है; अपितु जब जैसा तत्त्वों का संयोग मिलता है वैसी ही सृष्टि हो जाती है और वियोग होने पर उस सृष्टि का नाश हो जाता है ॥२९॥
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षट दरसन सब अंध मिलि, हस्ती देख्या जाइ । 
अंग जिसा जिनि कर गह्या, तैसा कह्या बनाइ ॥३०॥
ये छह दार्शनिक अन्धगजन्याय१ से अपने अपने मत पर आरूढ रहते हुए सृष्टि के विषय में ही स्व स्व मत का प्रतिपादन करते हैं ॥३०॥ (१ शास्त्रों में इस अन्धगजन्याय का वर्णन है - कुछ अन्धों ने हाथी के विभिन्न अङ्गों का पृथक् पृथक् स्पर्श किया । किसी ने कान का स्पर्श किया तो उसने हाथी को सूप के समान बताया । किसी ने शिर का स्पर्श किया तो वह हाथी को घट के समान बताने लगा । इस प्रकार उन अन्धों ने हाथी के अंगों का पृथक् पृथक् स्पर्श किया और तदनुसार वे उसे पृथक् पृथक् नाम से ख्यापित करने लगे । इस न्याय का वर्णन सर्वप्रथम बौद्ध ग्रन्थों में हुआ है । इसके लिये बौद्धों का उदान पालि ग्रन्थ(पृ० १२४) द्रष्टव्य है । (बौद्धभारती ग्रन्थमाला, वाराणसी से प्रकाशित) ॥
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झगरन लागे परस्पर, काकी मानै कौंन । 
सुन्दर देख्या दृष्टि सौं, तिनि तौ पकरी मौंन ॥३१॥
वे अपने मत पर दृढता से स्थिर रहते हुए परस्पर कलह करते हैं । वहाँ कौन किस की बात मानता है ! परन्तु जिन ज्ञानियों ने शुद्ध ज्ञान से तत्त्व का साक्षात्कार कर लिया वे इन के मतों की उपेक्षा करते हुए मौन ही है ॥३१॥ (३०-३१ साषी के विस्तार के लिये द्र० - सवैया, अंग २८ का छन्द : १७)
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बांधि गरगदा सब चलै, करी मुक्ति कौं दौर । 
सुन्दर धोखा मैं परे, मुक्ति कहौ किहिं ठौर ॥३२॥
कुछ अन्ध अज्ञानी पूरी तत्परता(गरगदा) के साथ मुक्ति प्राप्ति की लालसा से साधना में लगे । परन्तु उन को अपने असत्य मतवाद के कारण, अन्त में धोखा(भ्रम) ही हुआ । उस साधना से उनकी भवमुक्ति कैसे हो पाती ॥३२॥
(क्रमशः)

साहिब सुलतान तूँ ही

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*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*खसम हमारा सिरजनहारा, साहिब समर्थ सांई ।*
*मीरां मेरा मेहर मया कर, दादू तुम ही तांई ॥*
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रागकाफी ॥१८॥विनती॥
साहिब सुलतान तूँ ही, मैं गुलाम तेरा ।
धणी तू धणियाप कीजै, मिहरवान मेरा ॥टेक॥
आदि अंति तूँ ही जाणैं, खानाजाद तुम्हारा ॥
लालबुबा लौंडी का जाया, हरि बोला हुसियारा ।
सादिया बै लबै मीराँ, अैसी भाँति कमाऊँ ।
तुम्हारे दरबार बिना, दूरि रह्याँ दुख पाऊँ ॥
बंदे की अरदासि याहीं, साहिब सुणि लीजै ॥
बषनौं बकसीस पावै, पाऊँ लागण दीजै ॥१५८॥
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सुलतान = स्वामी । धणियाप = स्वामीपना । मिहरवान = दयालु । खानाजाद = सेवक । लालबुबा = वेश्याओं से व्यवहार रखने वाला अर्थात् नीच कर्मरत । लौंडी = वेश्या । सादिया = सीधा-सपाट, निष्कपट । लबै = होठों पर । मीराँ = परमात्मा । अरदासि = प्रार्थना । बकसीस = आशीर्वाद कृपा ॥
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हे परमात्मन् ! तू मेरा मालिक और मैं तेरा गुलाम हूँ । तू मेरा दयालु मालिक है । अतः अपनी दया मेरे ऊपर कर । मैं तेरा खानदानी गुलामी हूँ । अतः तू मेरे आदि अंत अर्थात् बाहर-भीतर आगे-पीछे की सब बातों को जानता है ।
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मैं नीचकर्मरत वैश्या (माया को संतों ने वेश्या ही कहा है क्योंकि यह किसी एक को स्वामी बनाकर स्थाईरूप से उसके घर में नहीं रहती । जने-जने के यहाँ फिरती-फिरती है । शरीर मायाजन्य है । अतः शरीरेण बषनां वेश्या का पुत्र तथा वेश्यागामी है । वास्तविकता में नहीं, आत्मरूपेण भी नहीं) का पुत्र हूँ ।
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राम-राम बोलकर बड़ा हुआ हूँ । अर्थात् बड़ी कठिनाई से तेरे भक्ति-भजन के रास्ते पर आया हूँ । निष्कपटभावयुक्त मेरे होठों पर सदैव परमात्मा का नाम हो; बस, इसी रूप में मैं सदैव कमाता = साधना करता रहूँ ।
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हे परमात्मन् ! बिना तेरी शरण के अन्यत्र मैं दुख ही दुख पाता हूँ । मुझ सेवक की यही प्रार्थना है कि मैं सदैव आपके चरणकमलों का चंचरीक बना उन्हीं पर मंडराता रहूँ । आपकी अहेतुकीकृपा पाने का पात्र बना रहूँ । कृपा प्राप्त कर सकूँ । हे स्वामी ! मेरी इस प्रार्थना को सुण लीजिये = स्वीकार का लीजिये ॥१५८॥

*२०. सुमिरण का अंग ~३३/३६*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*२०. सुमिरण का अंग ~३३/३६*
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*साहिब सबका एक है, राखै नाम अनेक ।*
*रज्जब समझे समझ ही, पूरण परम विवेक ॥३३॥*
हिन्दू और मुसल्मानादि सभी का ईश्वर एक ही है किन्तु अपनी रुचि के अनुसार सभी भिन्न भिन्न नाम रख लेते हैं । जो समझे हुये संत होते हैं वे ही अपने श्रेष्ट विवेक द्वारा पूर्ण ब्रह्म के स्वरूप को समझते हैं ।
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*रज्जब नाम सु एक के, अनन्तों कहे अनन्त ।*
*कोई सुमिर हु एक फल, वेत्ता१ वदति२ महन्त ॥३४॥*
एक ही ईश्वर के अन्नत प्राणियो ने अनन्त नाम कथन करे हैं, तो कोई भी नाम का सुमिरण करो, इच्छा पूर्ति फल एक ही होगा । ऐसा ही ज्ञानी१ महन्त जन कहते२ हैं ।
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*सोते सांई सुमिरिये, बैठा ब्रह्म समाल ।*
*रज्जब राम हिं ले उठो, लै१ लागा मधि चाल ॥३५॥*
सोते समय भी ईश्वर का स्मरण करना चाहिये, बैठे हुये भी ब्रह्म का चिन्तन करना चाहिये, हृदय में राम का चिन्तन करते हुये ही उठना चाहिये, राम में वृत्ति लगाते हुये ही चलना चाहिये ।
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*लीये सूता ले उठे, मुख हृदय हरि राम ।*
*जन रज्जब ज्यों जीव सब, अपने अपने काम ॥३६॥*
जैसे सभी प्राणी अपने अपने काम में संलग्न रहते हैं, वैसे ही साधक को चाहिये कि - हृदय में हरि-चिन्तन और मुख से हरि नाम उच्चारण करता हुआ ही सोये और उठे ।
(क्रमशः)

मंगलवार, 23 जून 2026

२८. आत्म अनुभव कौ अंग २५/२८

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२८. आत्म अनुभव कौ अंग २५/२८
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रवि ससि तारा दीप पुनि, हीरा होइ अनूप । 
सुन्दर उनकै तेज तैं, दीसै उनकौ रूप ॥२५॥ 
सूर्य, चन्द्र, नक्षत्र, दीपक या अनुपम हीरा आदि मणिरत्न अपने ही तेज से अपना रूप प्रकट करते हैं ॥२५॥
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त्यौं आतम के तेज तें, आतम करै प्रकास । 
सुन्दर इन्द्रिय जड सबै, कोइ न जाणैं तास ॥२६॥
इसी प्रकार, आत्मा के तेज(प्रकाश) से उस आत्मा का ज्ञान(दर्शन) होता है; क्योंकि हमारी सभी इन्द्रियाँ जड हैं; वे किसी चेतन का ज्ञान, किसी चेतन का आश्रय लिये विना कैसे कर सकती हैं, प्रकाशित करना तो बहुत दूर की बात है ! ॥२६॥
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कोई थापत कर्म कौं, कोई थापत काल । 
को कहै सृष्टि सुभाव तैं, सुन्दर बाइक जाल ॥२७॥
सृष्टि के विषय में विभिन्न दार्शनिकों के मत : कोई दार्शनिक (कर्मवादी) कर्म को ही इस सृष्टि का रचयिता मानते हैं । उन के मत में जो जैसे कर्म करता है उसकी वैसी ही उत्पत्ति होती है । आत्मा से इस सृष्टि का कोई सम्बन्ध नहीं है ।
कोई कालवादी दार्शनिक काल से ही सृष्टि रचना मानते हैं ।
तथा कोई(स्वभाववादी) दार्शनिक स्वभाव से ही इस समस्त सृष्टि की उत्पत्ति मानता है । जिसका जैसा स्वभाव होता है वैसी ही योनिपरम्परा में उस की उत्पत्ति होती है - ऐसा उन का मानना है ॥२७॥
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कौ कहै माया ब्रह्म पुनि, दोऊ सदा अनादि । 
जैसैं छाया ब्रक्ष की, सुन्दर यौं प्रतिपादि ॥२८॥
कोई(द्वैतवादी) दार्शनिक माया एवं ब्रह्म - इन दोनों से समस्त सृष्टि रचना होती है । तथा वे इन दोनों(माया एवं ब्रह्म) को अनादि मानते हैं । कोई प्रतिबिम्बवादी दार्शनिक कहते हैं कि माया ब्रह्म की छायामात्र है, अतः ब्रह्म यदि अनादि है तो माया भी अनादि ही है । उनसे यह सृष्टि रची गयी है ॥२८॥
(क्रमशः)

राग-सरोवर ॥

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*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*दादू सहज सरोवर आतमा, हंसा करै कलोल ।*
*सुख सागर सूभर भर्‍या, मुक्ताहल मन मोल ॥*
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*राग-सरोवर ॥*
तिहि तीरथ मेरा मन न्हावै, जिहि तीरथ का थाघ न आवै ॥टेक॥
सो बाहरि न भीतरि नेड़ा न दूरि, सो जल आवै सहज हलूरि ।
मुक्ता झूलि रह्या सर पूरि, तिहि सरि न्हावैं पंचौं दूरि ॥
अठसठि तीरथ तिन थैं भला, तिस तीरथ मेरा मन चला ।
तिनकै न्हायैं निर्मल होइ, अैसा तीरथ और न कोइ ॥
सुखसागर तीरथ का नाऊँ, तिहँ सागर मैं डूभी खाऊँ ।
आठ पहर ताही मैं रहूँ, अैसा तीरथ और न कहूँ ॥
अबरण बरण बहुत बिस्तार, ताका सूझै बार न पार ।
राम कलस ता मांहैं भरै, तहाँ बषनां साँपडि सेवा करै ॥१५७॥
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तीर्थस्थ जिस सागर = सरोवर की थाघ = गहराई का पता नहीं चलता उस तीर्थ में मेरा मन स्नान करता है । वह सरोवर न बाहर है न भीतर है न दूर है और न पास ही है । वह सर्वत्र समान रूप में एक जैसा परिव्याप्त है । उसमें जल सहज रूप में कल्लोल करता हुआ = उछल-कूद करता हुआ आता है ।
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उस भरपूर सरोवर में अनेकों मुक्ता-मोती = मुक्त संत-महात्मा स्नान करते हैं । उसी सरोवर में मैं शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गंधात्मक पांचों विषयों को त्याग कर नहाता हूँ । भूमिस्थ अड़सठ तीर्थों से यह सर्वथा उत्तम है । इस उत्तम तीर्थ में स्नानार्थ ही मेरा मन चल दिया है । जिस तीर्थ में नहाने से मन निर्मल हो जाता है, ऐसा तीर्थ इसके अतिरिक्त और कोई नहीं है । इस तीर्थ का नाम सुखसागर है और मैं इसमें डुबकी पर डुबकी लगाता हूँ ।
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आठोंपहर = चौबीसों घंटे मैं उसी में रहता हूँ । इस जैसा कहीं भी और दूसरा कोई तीर्थ नहीं है । वर्णन से परे अवर्णनीय बहुत विस्तार वाला है यह सरोवर । इसका आर-पार सूझता नहीं है, ज्ञात नहीं होता है । बषनां ऐसे ही राम-सरोवर में से रामनाम रूपी कलश को भरकर उसके जल से साँपडि = स्नान करता है और परमात्मा की अहर्निश स्मरण रूपी सेवा करता है ॥१५७॥

सोमवार, 22 जून 2026

"नाद ब्रह्म : सृष्टि का मूल स्रोत"

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*साभार ~@Subhash Jain*
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*दादू शब्द अनाहद हम सुन्या,*
*नखसिख सकल शरीर ।*
*सब घट हरि हरि होत है, सहजैं ही मन थीर ॥*
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"नाद ब्रह्म : सृष्टि का मूल स्रोत"
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"नाद ब्रह्म" हिंदू दर्शन, वेदांत, योग और भारतीय शास्त्रीय संगीत की एक बहुत गहरी और महत्वपूर्ण अवधारणा है। इसका शाब्दिक अर्थ है — "नाद ही ब्रह्म है" या "ध्वनि/शब्द ही परम सत्य/ईश्वर है"।

सरल भाषा में समझें~
पूरे ब्रह्मांड की उत्पत्ति, संचालन और अस्तित्व ध्वनि/कंपन (वाइब्रेशन) से हुआ माना जाता है। जैसे आधुनिक विज्ञान कहता है कि सब कुछ ऊर्जा और कंपन है, वैसे ही प्राचीन भारतीय ऋषियों ने इसे नाद के रूप में देखा और कहा कि यह नाद ही परम ब्रह्म है।

मुख्य दो प्रकार के नाद~
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1.आहत नाद —
जो सामान्य ध्वनियाँ हैं, जो किसी आघात/टकराव से बनती हैं (जैसे तबला बजाना, बोलना, संगीत वाद्ययंत्र)।
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2.अनाहत नाद (या अनहद नाद) —
यह बिना किसी आघात के, स्वतः होने वाली दिव्य ध्वनि है। इसे कोई कान से नहीं सुन सकता जब तक मन बहुत शांत और एकाग्र न हो जाए। यह शब्द ब्रह्म या नाद ब्रह्म का मूल रूप है।

योगी गहन ध्यान, नादयोग या शब्द साधना से इस अनाहत नाद को सुनते हैं। इसे विभिन्न रूपों में वर्णित किया जाता है जैसे:
ॐ की मूल कंपन
घंटी, शंख, वीणा, झंकार, तुंकार जैसी सूक्ष्म ध्वनियाँ अंत में यह निर्गुण ब्रह्म में विलीन हो जाती है।

महत्व क्या है?

सृष्टि का मूल —
वेदों और उपनिषदों में माना गया है कि सबसे पहले ॐ(प्रणव) की ध्वनि हुई, उसी से सारा जगत उत्पन्न हुआ।

ईश्वर प्राप्ति का मार्ग —
नादयोग के द्वारा अनाहत नाद का श्रवण करके मनुष्य ब्रह्म में लीन हो सकता है।

संगीत का आधार —
भारतीय शास्त्रीय संगीत इसी सिद्धांत पर टिका है। संगीत सिर्फ मनोरंजन नहीं, बल्कि ब्रह्म प्राप्ति का साधन माना जाता है।

आधुनिक कनेक्शन —
आज क्वांटम फिजिक्स भी कहती है कि सब कुछ कंपन/वाइब्रेशन है — यह नाद ब्रह्म की बात से बहुत मिलता-जुलता है।

प्रसिद्ध वाक्य~
नादं ब्रह्मेति — नाद ही ब्रह्म है।
शब्दाद्वैतवाद — शब्द ही ब्रह्म है, जगत शब्दमय है।

संगीतरत्नाकर जैसे ग्रंथों में लिखा है: "नाद रूपं परं ब्रह्म"।

संक्षेप में ~
नाद ब्रह्म का अर्थ है कि ईश्वर ध्वनि/कंपन के रूप में सर्वव्यापी है और उसी से सारी सृष्टि बनी है। गहन साधना से जब हम बाहरी ध्वनियों को पार करके अनाहत नाद सुनते हैं, तो हम ब्रह्म को सीधे अनुभव कर लेते हैं

२८. आत्म अनुभव कौ अंग २१/२४

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२८. आत्म अनुभव कौ अंग २१/२४
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बुद्धि हु पहुंचि सकै नहीं, करै दूरि लग दौर । 
सुन्दर ऐसौ आतमा, पहुंचि सकै क्यौं और ॥२१॥
उस को जानने में किसी की बुद्धि भी समर्थ नहीं, भले ही वह कितना भी श्रम क्यों न करे ! जब वह आत्मज्ञान इतना दुर्गम(दुर्बोध) है तो उस तक जनसामान्य की पहुँच कैसे हो सकती है ! ॥२१॥
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शब्द तहाँ पहुंचै नहीं, बहु बिधि करै बखांन । 
सुन्दर ऐसौ आतमा, अनुभव होइ प्रमांन ॥२२॥
उस तक न किसी शब्द की पहुँच(गति) हो सकती है, भले ही कोई उस(आत्मा) के विषय में कितना ही बोलता रहे । ऐसे आत्मज्ञान के लिये किसी ज्ञानी के केवल ज्ञान की ही पहुँच हो सकती है । इस ज्ञानी का अनुभवज्ञान ही इसके वर्णन में सहायक हो सकता है ॥२२॥
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बेद कह्यौ बहु भांति करि, शास्त्र कही बहु युक्ति । 
सुन्दर स्मृति पुरान पुनि, कही बहुत बिधि उक्ति ॥२३॥
चारों वेद, अठारहों पुराण, छहों शास्त्र या सभी स्मृतियाँ, कितनी भी युक्तियों के साथ, इस आत्मा के वर्णन का प्रयत्न करें ॥२३॥
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क्यौं ही कर्यौ न जात है, ब्योम माहिं चित्रांम । 
सुन्दर कहि कहि सब थके, है अनुभव विश्रांम ॥२४॥
परन्तु ये सब मिल कर भी उस आत्मा के यथातथ वर्णन करने में उसी प्रकार थककर एक और बैठ जाते हैं, जिस प्रकार आकाश में चित्र बनाने वाला अन्त में श्रान्त हो(थक) कर एक ओर बैठ जाता है । इसमें तो किसी ज्ञानी का अनुभव ही सफल हो पाता है ॥२४॥
(क्रमशः)  

ब्रिक्ख बध्या जड़ जाइ न जाणी

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*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*नूर तेज ज्यों जोति है, प्राण पिंड यो होइ ।*
*दृष्टि मुष्टि आवै नहीं, साहिब के वश सोइ ॥*
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जगत ॥
ब्रिक्ख बध्या जड़ जाइ न जाणी । है कोइ रोपणहार बिनाणी ॥टेक॥
ऊग्या जहाँ तहाँ जड़ नाहिं । कूँपल मेल्ही कूँपल नाहिं ।
तरवर है पर मूल न डार । फूल नहीं फल अनत अपार ॥ 
जाइ तहाँ तहाँ कोइ न जाणैं । है कोइ फेरि अपूठा आणैं ।
जड़ जाणैं सोइ सेवग तेरा । बषनां बोलै वो गुर मेरा ॥
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“ऊर्ध्वमूलमधः शाखमश्वस्थं प्राहुरव्ययम् । 
छंदासि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित् ॥१॥ 
अधश्चोर्ध्वंप्रसृतास्तस्य शाखा गुणप्रवृद्धा विषय प्रवालाः ॥ 
अधश्च मूलान्यनुसंततानि कर्मानुबंधीनि मनुष्यलोके ॥१५|१-२॥ 
इन दो श्लोकों के भावों पर रचा गया जान पड़ता है । संसार रूपी वृक्ष बहुत विशाल रूप में बढ़ गया है किन्तु परमात्मा रूपी जड़ को पूर्णरूप में जानना मुश्किल है । 
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इसको उगाने वाला कोई न कोई बिनाणी = विज्ञानी = विशिष्ट ज्ञानयुक्त पुरुष है । जिस जगह पर यह उगा हुआ है, वहाँ इसकी जड़ नहीं है । इसमें कोपलें उगाई हैं किन्तु कोपलें हैं नहीं । यह वृक्ष रूप वृक्ष है किन्तु न इसकी जड़ है और इसमें डाले ही है । इसमें फूल का नामनिशान तक नहीं है किन्तु फल अनंत संख्या में हैं । 
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जहाँ पर यह जाता है, वहाँ इसको कोई नहीं जानता किन्तु क्या कोई ऐसा है जो इस जाते हुए को वापिस ले आये । (विनाश होते हुए संसार को विनष्ट होने से बचा ले क्योंकि ‘संसरिती-संसारः’ जो प्रतिक्षण क्षरित होता है, वह संसार है) जो इस संसार रूपी वृक्ष की परमात्मा रूपी जड़ को जानता है, हे परमात्मा वही तेरा सच्चा सेवक है । बषनां कहता है, मेरा वही सच्चा गुरु भी है ॥१५६॥

रविवार, 21 जून 2026

*२०. सुमिरण का अंग ~२९/३२*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*२०. सुमिरण का अंग ~२९/३२*
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*नाम अनेकों एक है, तो भज राम रहीम ।
*ज्यों ज्यों सुमिरै सांइयाँ, जन रज्जब सु फहीम१ ॥२९॥*
एक ईश्वर के नाम अनेक हैं, तब नामों में भेद बुद्धि न रख कर दयालु राम के कोई भी नाम का स्मरण करना चाहिये । ज्यों ज्यों स्मरण बढ़ता जायगा त्यों त्यों ही समझदार१ होता जायगा और प्रतिष्ठित हो जायगा ।
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*नाम अनन्त अनन्त के, सो सब एक समानि ।*
*रज्जब जाणे सो सुमिर, मन वच कर्म उर आनि ॥३०॥*
अनन्त स्वरूप परमात्मा के नाम भी अनन्त है और निष्काम भाव से स्मरण करने से सभी ब्रह्म प्राप्ति रूप समान फल देते हैं, अत: मन, वचन, कर्म से हृदय में नाम का स्मरण करके उस पर ब्रह्म के स्वरूप को जानने का यत्न करो ।
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*नाम अनेकों एक गुण, ज्यों बहु बूंद हुँ वारि१ ।*
*जन रज्जब जान रु कही, नर निरखहु सु निहारि॥३१॥*
जैसे बहुत जल बिन्दुओं में एक जल१ होता है, वैसे ही ईश्वर के नाम अनेक हैं किन्तु उनमें स्मरण करने पर इच्छा पूर्ति करना रूप गुण एक ही है । यह बात हमने अच्छी प्रकार जानके कही है, हे साधक नर ! तू भी ध्यानपूर्वक देख ।
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*ज्यों आतम अरवाह इक, त्यों ही राम रहीम ।*
*उदक आब कछु द्वै नहीं, रज्जब समझ फहीम१ ॥३२॥*
जैसे उदक और आब दोनों जल के ही नाम है, आत्मा और अरवाह दोनों आत्मा के ही नाम है । वैसे ही राम और रहीम दोनों ईश्वर के ही नाम हैं । ज्ञानीजनों१ की यही समझ है ।
(क्रमशः)

२८. आत्म अनुभव कौ अंग १७/२०

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२८. आत्म अनुभव कौ अंग १७/२०
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नां वह सूक्षम स्थूल है, नां वह एक न दोइ । 
सुन्दर ऐसौ आत्मा, अनुभव ही गमि होइ ॥१७॥
वह आत्मा न सूक्ष्म है, न स्थूल; न वह एक है, न अनेक । ऐसी विशेषताओं वाला वह आत्मा एकमात्र स्वकीय अनुभव से ही जानने योग्य हो सकता है ॥१७॥
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नां वह रूप अरूप है, नां वह मूल न डाल । 
सुन्दर ऐसौ आतमा, नां वह बृद्ध न बाल ॥१८॥
उस आत्मा को न रूपवान् कह सकते हैं, न नीरूप(रूपरहित); न उसे मूल(जड) कह पाते हैं, न शाखा; न उस पर किसी वृद्धावस्था या युवावस्था का प्रभाव न बाल्यावस्था का ही । यह आत्मा ऐसी ही विशेषताओं वाला है ॥१८॥
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लघु दीरघ दीसै नहीं, नां वह भीत अभीत । 
सुन्दर ऐसौ आतमा, कहिये बचनातीत ॥१९॥
न उस आत्मा को लघु(छोटा) कह सकते हैं, न दीर्घ(बड़ा) ही । न वह किसी से भीत(डरा हुआ) है, न निर्भय(भयरहित) । अतः ऐसी विशेषताओं वाले आत्मा को हम वाणी से अवर्णनीय(वचनातीत = अनिर्वचनीय) ही कह सकते हैं ॥१९॥
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इन्द्रिय पहुंचि सकै नहीं, मन हू की गमि नांहिं । 
सुन्दर जानै आयु कौं, आपु आपु ही मांहिं ॥२०॥
क्योंकि उसकी वास्तविकता जानने में न किसी की इन्द्रियाँ ही समर्थ हैं, न किसी का मन ही समर्थ हो सकता है । वह तो स्वयं ही तन्मय होने पर स्व(अपने) को जान सकता है ॥२०॥
(क्रमशः) 

*आत्मा-परमात्मा ॥*

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*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*आगो पीछो परिमित नांहिं,*
*केते पारिख आवहिं जाहिं ॥*
*आदि अन्त मधि कहै न कोइ,*
*दादू देखै अचरज होइ ॥*
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*आत्मा-परमात्मा ॥*
हंसा एक काया मैं रहै, ताका बरण न कोई लहै ॥टेक॥
हर्या न नीला स्याम न सेत ।  गुर गमि बिना न पावै भेद ॥
जब यहु हंसा उडि करि जाइ । बहुरि न सरवरि बैठे आइ ॥
कितेक ग्याता किताक ग्यान । न जाणैं वाका उनमान ॥
एक अचंभा आवै मोहिं । है तौ सही लहै नहिं कोइ ॥
अैसा कोई साध न चौर । अैसी प्यारी बस्त न और ॥
जब लग घट मैं बाकी लोइ ॥ तब लग घर मैं आनन्द होइ ॥ 
ना सो हलका न सो भार । धनि हो धंनि उपावनहार ॥
जिनि अैसी कल मेल्ही लाइ । जब बषनां ताके गुण गाइ ॥१५५॥
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“न रूपमस्येह तथोपलभ्यते नान्तो न चादिर्न च संप्रतिष्ठा । 
अश्वत्थमेनं सुविरूढमूलमसंग शस्त्रेण दृढेन छित्वा ॥”१५|३॥ 
यद्यपि इस श्लोक में संसार रूपी वृक्ष का वर्णन है जबकि बषनांजी के पद में अरूपा, अवर्णा, अनामा, अशरीरी परमात्मा का वर्णन है तथापि संसार का नाशवान होने के कारण एकरूपा न होना तथा परमात्मा का अरूप होने से रूपहीन होना एक जैसा ही है । “रूप न रंग रेख नहिं जाकै, है तैसा ही देख ॥”
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शरीर में एक हंस रूपी आत्मा रहता है उसका वर्ण कोई नहीं जानता है । वह न हरा है, न नीला है, न काला है और न सफेद है । उसका रहस्य गुरुज्ञान के बिना जानना असंभव है । एकबार जब यह आत्मा शरीर में से निकलकर चली जाती है तब पुनः उसी शरीर में आकर निवास नहीं करती है । कितने ही वेदशास्त्रों के ज्ञाता और कितने ही ज्ञान की चर्चा करने वाले ज्ञानी इस आत्मा का सही उनमान=अनुमान भेद नहीं जान पाते हैं । 
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बषनांजी कहते हैं, मुझे एक बात आश्चर्यजनक लगती है कि आत्मा वास्तव में है काल्पनिक नहीं है फिर भी इसका वास्तविक बोध किसी को भी नहीं हो पाता है । चौर प्रियवस्तु को चुरा लेता है किन्तु इस आत्मा जैसी प्रियवस्तु को चौर भी नहीं चुरा पाता । कोई साधु भी ऐसा नहीं है जो इसको चुराकर अपने पास रख सका हो । जब-तक इस आत्मा का प्रकाश = सत्ता (लोइ) शरीर में रहता है तब-तक हृदय में आनंद होता है, शरीर में हलचल तथा आत्मानंद अनुभव होता है । यह आत्म तत्व न हल्का है और न भारी ही है । इसके उपजाने वाले को अनेकों धन्यवाद है । 
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वास्तव में आत्मा न उत्पन्न होती है और न मरती ही है~ 
“न जायते म्रियते वा कदाचिन्नायं भूत्वा भविता वा न भूय । 
अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे ॥”२|२०॥ 
बस, अपने अंशी से मिलती बिछुड़ती है । बषनांजी ने इस मिलने-बिछुड़ने को उपजना कहा है । जिस परमात्मा ने ऐसी अद्भुत कल = यंत्र = वस्तु बनाई है(आत्मा जैसी) उसके बषनां गुणों को गाता है ॥१५५॥

*२०. सुमिरण का अंग ~२५/२८*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*२०. सुमिरण का अंग ~२५/२८*
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*ररै रीझ्या राम जी, अलिफ अलह अस नाँव ।*
*रज्जब दोनों एक हैं, मन वच कर्म करि गाव ॥२५॥*
राम मंत्र के पहले "राँ" के स्मरण से रामजी और अल्लाह के पहले "अ" से अल्लाह प्रसन्न होते रहे हैं, नाम का महत्व ऐसा ही है । राम और अल्लाह ये शब्द ही तो हैं, इनका नामी ईश्वर एक ही है, अत: मन वचन कर्म से नाम का गायन करते रहना चाहिये ।
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*रज्जब राम रहीम कहि, आदि पुरुष कर याद ।*
*सदा सनेही सुमिरिये, जन्म न जावे बाद ॥२६॥*
दयालु राम का नाम मुख से बोल, आदि पुरुष प्रभु का स्मरण कर सदा अपने प्रेमी प्रभु का स्मरण करते रहना चाहिये, जिससे यह मानव जन्म व्यर्थ न जाय ।
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*अल्लह अल्लह कहत ही, अलह लह्या सो जाय ।*
*रज्जब अज्जब हरफ है, हिरदै हित चित लाय ॥२७॥*
अल्लह, अल्लह नाम करते करते जो न प्राप्त होने योग्य है वह अल्लाह भी प्राप्त हो जाता है यह अल्लाह नाम अदभुत अक्षरों से बना है । अत: मुसल्मानों के हृदय में प्रेमपूर्वक चित्त लगा कर स्मरण कहते रहना चाहिये।
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*सकल नाम जिव के सगे, जाप जिकर रट जंत ।*
*रज्जब राम रहीम रत, मिल्या सु निर्मल मंत ॥२८॥*
चिन्तन करने से ईश्वर के सभी नाम जीव के हितकारक संबन्धी हैं, अत: हे जीव ! नाम जाप करके, नाम संबन्धी चर्चा करके, नाम की रट लगा करके, दयालु राम में अनुरक्त हो, संत शास्त्रों से यही निर्मल और सुन्दर परामर्श मिला है ।
(क्रमशः)

शनिवार, 20 जून 2026

*२०. सुमिरण का अंग ~२१/२४*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*२०. सुमिरण का अंग ~२१/२४*
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*एक अलिफ में सब इलम१, कुल२ कतेब कुरान ।*
*हत्या३ तज हाफिज४ भया, जन रज्जब सब जान ॥२१॥*
सबसे प्रथम एक ऊँ अक्षर उत्पन्न होता है वही ईश्वर का आदि नाम है और वेदादि संपूर्ण विद्यायें सूक्ष्म रूप से उसमें रहती हैं, वैसे ही फारसी का प्रथम अक्षर अलिफ है, ईश्वर का पहला नाम है उस एक अक्षर में संपूर्ण विद्यायें१ तथा कुरानादि सब२ किताबें सूक्ष्मरूप से रहती हैं, ईश्वर नाम जप से ही प्राणी सब कुछ जान जाता है और हिंसा३ त्यागकर सबका संरक्षक४ बन जाता है ।
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*सब इल्मों शिर अलिफ१ है, कुल कामिल२ इस माँहिं ।*
*तू तामें पैवस्त३ हो, और कह्या कुछ नाँहिं ॥२२॥*
संपूर्ण विद्याओं में शिरोमणि ईश्वर का पहला नाम ही है, इस नाम१ में संपूर्ण प्रकार की पूर्णता२ है । हे साधक ! तू नाम-स्मरण रूप साधना में ही प्रवेश३ कर ईश्वर साक्षात्कार के लिये अन्य कोई भी साधन नाम से श्रेष्ठ नहीं कहा गया है ।
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*रंकार अलिफ चहुँ१ वेद में, है आतम अरवाहि२ ।*
*रट रज्जब कण लीजिये, भूल न कूकस३ खाहि ॥२३॥*
राम मंत्र का पहला बीज "राँ " उसका लक्ष्य अर्थ रूप ब्रह्म चारों१ वेदों में व्याप्त है और संपूर्ण जीवात्माओं२ में आत्म रूप से है । अत: हे साधक ! "राँ" का स्मरण करके ब्रह्म रूप कण को प्राप्त कर और विषयरूप भूसे३ को भूल से भी मत खा ।
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*रं कार अलिफ रोटी बड़ी, रज्जब रुचि सौं खाय ।*
*भूख भंग भगवंत लग, यह धापण की राह ॥२४॥*
राम मंत्र का पहला "राँ" चिन्तन द्वारा तृप्ति का हेतु होने से महान रोटी के समान है, जो प्रीतिपूर्वक खाता है, अर्थात चिन्तन करता है । उसकी आशा रूप भूख नष्ट हो जाती है और वह भगवान के स्वरूप में अभेद भाव से लग जाता है । जीवात्मा के तृप्त होने का मार्ग यह स्मरण ही है ।
(क्रमशः)  

२८. आत्म अनुभव कौ अंग १३/१६

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२८. आत्म अनुभव कौ अंग १३/१६
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जाकै अनुभव होत है, ताही कै सुख चैन । 
सुन्दर मुदित रहै सदा, पूछै बोलै बैन ॥१३॥
हम वास्तविक आत्मानन्दानुभवी उसी साधक को कह सकते हैं जिस के हृदय में आत्मज्ञान प्रस्फुटित हो चुका हो । ऐसा साधक उस आनन्द से सदा प्रमुदित रहता है । तथा अधिकारी जिज्ञासु को उस आत्मज्ञान का कुछ उपदेश भी करता है ॥१३॥
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सुन्दर डुबकी मारि कै, सुख मैं रहै समाइ । 
वह सब कौं देखत फिरै, वह नहिं देख्यौ जाइ ॥१४॥
सच्चा साधक इस ज्ञानसागर में गहरा गोता (डुबकी) लगाकार उसी ज्ञानानन्द के अनुभव में ही निमग्न रहता है; क्योंकि व्यवहार में वह सब की यथार्थता जान चुका है, जबकि उसकी यथार्थता कोई भी नहीं जान पाया ॥१४॥
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अनुभव करिकै आतमा, जानैं ज्यौं आकास । 
सदा अखंडित एकरस, सुन्दर स्वयं प्रकास ॥१५॥
परिमाणरहित आत्मा : क्योंकि वह आत्मज्ञान द्वारा यह जान चुका है कि उसका ही आत्मा, आकाश के समान, सर्वत्र व्यापक है । वह आत्मा अखण्ड एवं सदा एक ही स्थिति में रहने वाला और स्वयम्प्रकाश (स्वसंवेद्य) है ॥१५॥
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ताकौ आदि न अंत है, मध्य कह्यौ नहिं जाइ । 
सुन्दर ऐसौ आतमा, सब मैं रह्यौ समाइ ॥१६॥
आकाश के समान, इस आत्मा का भी न आदि है, न अन्त और न मध्य ही है । अतः इन विशेषताओं वाला यह आत्मा ही सर्वत्र व्यापक है ॥१६॥
(क्रमशः) 

मनोवृत्ति ॥

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*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*कामधेनु घट घीव है, दिन दिन दुर्बल होइ ।*
*गौरू ज्ञान न ऊपजै, मथि नहिं खाया सोइ ॥*
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मनोवृत्ति ॥ साषी लापचारी की ॥
खैंचों तौ आवै नहीं, जे छोडौं तौ जाइ ॥
बषनां मनसा पूछ्ड़ै, प्राण टटीबा खाइ१ ॥(१ इसका अर्थ ‘मन कौ अंग’ की साषियों में देखें ।)
पद ॥
पहिलै ब्याइति ब्याई गाइ । कौंण दुहै कौंण मेलण जाइ ॥
लाताँ मारै बाँटौ खाइ । जाका बाछा बडी बलाइ ॥
काजल पीयल बरण अबरणी । तीनि लोक मैं फिरि फिरि चरणी ॥
बनि बनि फिरै सँमदि जल पीवै । धरणि गगन मैं पल फिरि आवै ॥
अंमृत सरवै भूखाँ मरती । धाई फिरै मछरता करती ॥
घेरि घारि कैं करौं उपाइ । तौ मारगि छाड़ि कुमारगि जाइ ॥
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साषी ॥
दूध की न मूत की, गाइ कहै सब कोइ
अैसि गाइ घर बारणैं, बैरी कै मति होइ ॥१॥
पद ॥
दूजै ब्याइति ब्याई गाइ । तिहि नैं गूजर दुहिबा जाइ ॥
सावणि ब्यावै हाथि न आवै । तिहि का माछर कौंण उडावै ॥
ले ले ठींगा दिहूँ ठहोड़ै । चरिबा तैं मन रती न मोड़ै ॥
खाँट इसी छींका का फोड़ै । तिहि नैं बषनां दुहिवा लोड़ै ॥
चंचल चपल चहूँ दिसि दोड़ै । मगरै जाती कौंण बहोड़ै ॥
बागि न मिलै हिली हरिहाई । भागी फिरै नहीं ठहराई ॥
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साषी ॥
बाँटौ ध्यौं नीरौं घणाँ, देखि घणाँ चराइ ।
माथै कीयाँ पूछड़ौ, या पहली खेताँ जाइ ॥२॥
पद ॥
तीजै ब्याइति अजहूँ ब्याई ॥ दूध घणाँ पणि हाथि न आई ॥
रात्यूँ दिहौं चराई प्याई । दूहौं कहा डोलै मछराई ॥
इसका थणाँ हाथ को लावै । तौ साम्हीं व्है मारण कूँ धावै ।
बछड़ा आठौं पहर खबावै । थण में लिसक रहण नहिं पावै ॥
रहै न हटकी रामैं जावै । खाली खरक न बैठक आवै ।
इनि मेरी छाती घणी पचाई । या गाइ मरै तौ करौ बधाई ॥
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साषी ॥
पहिलाँ तौ सूनी चरी, अब क्यौं आवै हाथि ।
दौड़ि दौड़ि केता मुवा, इस ढांढी कै साथि ॥३॥
पद ॥
चौथैं अब ऊन्हालै ब्याई ॥ भूखाँ मुई हाथि तब आई ।
सहजि सहजि जाइ बैठक बैठी । घेरी तब घर माँहैं पैठी ॥
गुर का ग्यान रासड़ी लाधी । बुचकारी ले खूँटै बांधी ॥
राम नाम धुणि धूणी लाइ । माछर दीना दूरि उडाई ॥
तब तिहि ढांढी धणी सुहाया । न्याणैं न्यूजि रु हाथ व लाया ॥
लात न मारै सदा दुहावै ॥ भूछ गूजरी महरि कहावै ॥
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साषी ॥
थण काटै था केरड़ा, सो तौ दिया बिडारि ।
ठींगै मारी पासवै, दूझै घर कै बारि ॥४॥
पद ॥
धेनि मिली तब दूधाँ धाया । दोइ दुहारा दुहिबा लाया ॥
बछड़ा घेरि अपूठा दीया । कनक कवल माँहै दुहि लीया
काम किरोध बलीतै बालौं । ऊफणि जासी बेगि सम्हालौं ॥
ताता सीला भेला कीया । तब गुरि मेरै जाँमण दीया ॥
सुन्दरि सहजि बिलोवण लागी । तब गहरै सादि मथाणी बागी ॥
मन मथिया तब माखण आया । साधौं हरि तत इहिं बिधि पाया ॥
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साषी ॥
गुजरी कै आनँद हुवा, दूझण लागी गाइ ।
अब बषणां रोटी घीव सौं, चोपड़ि चोपड़ि खाइ ॥५॥१५४॥
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चौपायों द्वारा बच्चों को जन्म देना उनका ब्याना कहलाता है । प्रसवावसर को ब्याइति, ‘ब्याँत’ आदि कहा जाता है । बषनांजी ने पूर्व पद की भाँति ही इस पद में भी गाय को मनोवृत्ति का प्रतीक मानकर मनोवृत्ति के नाना व्यापारों का चित्रण किया है । वे कहते हैं, गाय पहली बार ब्याई जिसका बछड़ा बहुत बड़ी बला = आफतें पैदा करने वाला है । मन की वृत्तियों ने स्वतंत्र रूप में पहले पहल विषयों का भोग करना प्रारम्भ किया ।
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इसके पूर्व बाल्यावस्था में) वे माता-पिता द्वारा उपलब्ध कराये विषयभोग बालक के रूप में भोगती थीं किन्तु जवान होने पर वे अपनी इच्छानुसार भोगों को भोगती हैं । यही गाय का पहली बार ब्याना तथा बछड़ा देना है । मनोवृत्ति की सहायक इंद्रियाँ ही बछड़ा है । वह प्रथम बार ब्याने वाली गाय खूब खाती है = अनियंत्रित रूप में विषयों का भोग करती है । रोकने पर लातें मारती है = रोकने वालों से भला-बुरा कहती है । ऐसी उच्छ्रंकल गाय का कौन तो दूध निकाले तथा कौन मेलण = नियंत्रित करे ।
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भगवद्भक्ति करना ही दूध निकालना है । वह मनोवृत्ति रूपी गाय काले-पीले रंगों वाली ही नहीं अनेकों रंगों वाली है । तीनों लोकों में भ्रमण करके अपने इच्छित भोगों को भोगती है । मनोवृत्ति रूपी गाय वन-वन में घूमती है, एक स्थान पर व एक विषय पर टिकती नहीं है । संसार रूपी समुद्र का जल पीती है ।
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घूमने-फिरने की गति इतनी क्षिप्र है कि वह पल भर में पूरी पृथ्वी, पूरा आकाश घूम-फिर आती है । जब इसको विषय भोग रूपी चारा पानी खूब मिलता है तब यह छँटाक भर दूध भी नहीं देती है । इसके विपरीत जब इसको खाने-पीने को नहीं मिलता है तब वह भगवत्स्मरण करने रूपी दूध प्रभूत मात्रा में देती है । जब खाने को खूब मिलता है तब मौज-मस्ती करती फिरती है ।
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बषनांजी कहते हैं, चूँकि भगवद्भक्तिमार्ग में यह नितांत नई है । अतः मैं इसे घेर-घारकर इधर-उधर से लाने का प्रयत्न करता हूँ किन्तु यह भगवद्भकति मार्ग छोड़कर पूर्वाभ्यास के अनुसार तत्काल विषय भोगों की ओर दौड़ जाती है । वस्तुतः यह संसारोन्मुखी मनोवृत्ति न भगवद्भक्ति मार्ग के लिये उपयोगी है और न संसार के लिये ही उपयुक्त है ।
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क्योंकि संसार में भी उस ही व्यक्ति को शोभा होती है जो अपना लोक सुधारते हुए परलोक सुधारने के प्रयत्न में लगा रहता है जबकि यह तो बस, लाओ-खाओ-मौज करो का सिद्धान्त अपनाए हुए रहती है । इसके बावजूद भी यह गाय कहलाती है । बषनांजी कहते हैं, ऐसी उच्छ्रंकल गाय रूपी मनोवृत्ति स्वयं के यहाँ तो क्या दुश्मन के दरवाजे पर भी नहीं होनी चाहिये ॥१॥
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दूसरी बार गर्भवती होने के उपरान्त गाय पुनः ब्याई जिसको साधक रूपी गूजर दुहने का प्रयत्न करता है । चूँकि दूसरी बार गाय श्रावण मास में ब्याई है । अतः उसको खाने को हरा-हरा मिलता है । वह गौशाला में बिलकुल ही रुकने का प्रयत्न नहीं करती । हर समय नये-नये भोग रूपी हरी-हरी घास खाने को दौड़ती-फिरती है । फलस्वरूप पकड़ में नहीं आती । जो सदैव भागती रहती है उसके मच्छरों को कौन उड़ा सकता है ।
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अर्थात् जो सदैव विषयभोगों में ही रमती फिरती है उस मनोवृत्ति द्वारा किये गये पापों कोन समाप्त कर सकता है ? जब उसको उसके दोनों श्रृंगों से पकड़कर नियंत्रित करने का प्रयत्न किया जाता है तब वह दोनों और माथा हिलाकर रोकने वालों को ही घायल करने का प्रयत्न करती है । गुरु रोकने वाला है । गरु की अवज्ञा करना ही दोनों ओर माथा हिलाना है ।
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वस्तुतः गुरूपदेश को न मानने वाली मनोवृत्ति विषयों में रमने से जरा भी अपने को विमुख नहीं करती है । यह मनोवृत्ति इतनी भारी खाँट = बदमाश है कि पूर्वजन्मार्जित पुण्य जो छींके में = संचितकर्म रूपी संदूक में = सुरक्षित जमापूंजी के रूप में जमा थे को भी नहीं छोड़ती । उन्हें भी दुष्कृत = दुष्कर्म करके समाप्त कर डालती है । ऐसी बदमाश = उच्छ्रंकल = विषयभोगों में आकंठ डूबी मनोवृत्ति को बषनां दुहिबा = दोहन करने का प्रयत्न करता है ।
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यह चंचल और चपल है, चारों ओर दौड़ती-फिरती है । मगरै = अतः विषयभोग रूपी जंगल में जाती हुई को कौन वापिस ला सकता है । बाग-बगीचों में हरियाली मिलती है । अतः वहाँ ही जाने के लिए हिल = गीद रही है । मिलती भी उन्हीं विषयभोग रूपी बगीचों में ही है । खूँटे पर तनिक देर के लिये भी रुकती नहीं है ।
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बषनांजी कहते हैं, मैंने सोचा, एक बार इसको छकाकर खिला दूँ । फिर स्वतः ही इसकी विषयभोगों में आसक्ति कम से कम होती चली जायेगी । एतदर्थ मैंने इसको खूब बाँट (खल, काँकडा, दलिया आदि) खिलाया । खूब चारा पानी नीरा (चारा पानी पशु के समक्ष खाने के लिये रखने को चारा नीरना कहते हैं) और देखा कि इसमें क्या कुछ परिवर्तन आया है । किन्तु यह तो विषयों में जाने से रुकने के बजाय उल्टे मस्तमौला होकर पूँछ ऊपर करके = उत्साहपूर्वक विषयभोग रूपी जंगलों में ही सबसे पहले भागती है ॥२॥
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तीसरी बार शीतकाल में ब्याई है । इस बार इसके नीचे दूध तो खूब है किन्तु गूजर(राजस्थान में गूजर जाति को गाय भैसों को पालने वाली जाति माना जाता है ।) को उस दूध में से कुछ मिलता नहीं है । गूजर ने रात-दिन इसको खूब चारा खिलाया और खूब पानी पिलाया जिससे यह आनंदमग्न हुई मौजमस्ती करती फिरती है । ऐसी स्थिति में इसके नीचे के दूध को कैसे दुहा जा सकता है ।
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यदि कोई इसके स्तनों के हाथ भी लगाता है तो वह हाथ लगाने वाले को हाथोंहाथ मारने को दौड़ती है । बछड़े को आठोंपहर खिलाती-पिलाती है जिससे इसके स्तनों में दूध की एक बूंद भी रहने नहीं पाती । मना करने पर रुकती नहीं, जंगल में चरने को भाग जाती है । गौशाला खाली पड़ी रहती है । उसमें बैठने को जंगल में से वापिस आती ही नहीं है । इस उच्छ्रंकल मनोवृत्ति ने मुझे खूब परेशान किया है । यदि यह मनोवृत्ति मर जाये = नियंत्रण में आजाए तो मैं अत्यधिक प्रसन्न होऊँ ।
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बषनांजी कहते हैं, पहले तो यह सूनी = बिना किसी रुकावट के ही चरती थी = मनोवृत्ति बिना नियंत्रण के ही विषयों को भोगती थी । सो अब कैसे नियंत्रण में आ सकती है । क्योंकि इसको भोगों को भोगने का अभ्यास जो पड़ गया है । इस ढांढी = धूर्त के साथ दौड़ दौड़कर = इसके अनुसार चल चलकर अनेकों मनुष्य मर चुके हैं किन्तु यह अपनी धूर्तता छोड़कर सज्जन = भगवदुन्मुख होने का प्रयत्न नहीं करती है ॥३॥
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इसबार उष्णकाल में ब्याई है । भगवद्भक्ति साधनकाल रूपी उष्णकाल में विषयभोग रूपी चारे की न्यूनता रहती है । अतः भूखों मरने लगी जिससे नियंत्रण में आ गई । धीरे-धीरे गौशाला में रहने लगी । सत्संग सुनने लगी, भजन-ध्यान करने की इच्छा करने लगी । जबसे इसको विषयों से एकदम विमुख कर दी, कहीं जाकर तबसे भगवान के ध्यान में स्थिर होने लगी है ।
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गुरु-ज्ञान रूपी रस्सी साधक को मिल गई जिससे समझाबुझाकर धीरज बंधाया कि अधीर होने की आवश्यकता नहीं है । परमात्ममार्ग पर चलने से लौकिक पारलौकिक दोनों सुख मिलते हैं और परमात्मा रूपी खूँटे से बांध दी । राम-राम की ध्वनि रूपी धूणी(कण्डों को जलाकर धुवाँ कर देने से मच्छर भाग जाते हैं) जला दी जिससे चंचलत्व उत्पन्न करने वाले समस्त विघ्न-कष्ट, पाप=कल्मष रूपी मच्छर भाग गये । तब उस बदमाश-धूर्त गाय = मनोवृत्ति को परमात्मा रूपी मालिक अच्छा लगने लगा ।
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परिणामस्वरूप दूध दुहने के काम आने वाली न्याणें की न्यूज = नेज = रस्सी हाथ में आ गई । अर्थात् अब काम में लेने की जरुरत नहीं रही । अब लात नहीं मारती प्रत्युत आराम से दूध भी दुहने देती है । परिणामस्वरूप संसारी जीव महात्मा(महरी = गूजर की पत्नी का सम्मानास्पद सम्बोधन) कहलाने लगी । पहले बत्स स्तनों को दूध न मिलने के कारण काटा करते थे सो उनको तो अब भगा दिया गया । उनके स्थान पर ठींगा मारने से ही पावस जाती है = दूध देने की इच्छुक हो जाती है और घर के द्वार पर बंधी बंधी दूध देती है ॥४॥
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परमात्मोन्मुख मनोवृत्ति जब परमात्मप्राप्ति के रास्ते पर चल पड़ी तब भगवद्भक्ति रूपी दूध प्रभूत मात्रा में स्तनों में आने लगा । विवेक-वैराग्य रूपी दो दुहने के पात्र बना लिये । मन रूपी बछड़े को संसार से उल्टाकर परमात्मा की ओर मोड़ दिया । निर्मल हृदय रूपी सोने के पात्र में दूध को निकाल लिया । काम-क्रोध रूपी लकड़ियों को जलाकर दूध को गर्म किया ।
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गुरुज्ञान रूपी सावधानी के बल पर तुरन्त ही उफनने = फिसलने रूपी पुनः संसार में जाने से रोक लिया । काम क्रोधादि दुर्गुण दुराचारों को और गुरु ज्ञान को एक स्थान पर एकत्रित करके दुर्गुण दुराचारों को दूर भगा दिया । तब गुरुमहाराज ने कृपा करके मुझे भगवद्भक्ति का रहस्य रूपी जामण देकर भगवद्धयान में स्थिर का दिया ।
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सुरति रूपी सुंदरि उस दही रूपी एकाग्रता में घूमने लगी = निमग्न हो गई । परिणामस्वरूप मथाणी = रई रूपी जिव्हा राम राम रटन रूपी गंभीर शब्द ध्वनि करने लगी । मन को मथ डाला । मक्खन रूपी परमात्मा की प्राप्ति हो गई । साधक ने इसप्रकार साधना करके परात्पर-परब्रह्म-हरि को प्राप्त किया । आत्मा रूपी गूजरी के अब परमानन्द हो गया क्योंकि अब मनोवृत्ति रूपी गाय भगवद्भक्ति रूपी दूध देने लग गई है । अतः बषनां परमात्मा की भक्ति रूपी घी से परमात्मएकाकारं रूपी रोटी को चोपड़-चोपड़ कर खाता है ॥१५४॥