गुरुवार, 29 अक्टूबर 2026

*राघवदासजी की वाणी*

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🌷*卐 श्री दादूदयालवे नम:  卐*🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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*दुर्बल देही निर्मल वाणी, दादू पंथी ऐसा जाणी ।*
*काहू जीव विरोधे नांही, परमेश्‍वर देखे सब माँही ॥*
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एक समय दुष्काल के कारण ग्राम की जनता अन्न की कमी से ग्राम छोड़ कर जाने लगी थी । दयालु संत राघवदासजी ने जनता को कहा—जाओ मत सब लोग भंडार से अन्न ले आओ, बनाकर पावो, भगवान् का भजन करो, कहीं मत जावो । भगवान् ने राघवदासजी टेक की रखी । नया अन्न न आने तक उनका भंडार सब ग्राम को अन्न देता रहा था । कहा भी है—
जन सेवा में भक्त जन, करत नहीं संकोच ।
राघवदास ने ग्राम को, अन्न दिया तज सोच ॥२७१॥दृ.त.९
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एक समय राघवदासजी ने ब्रह्म भोजन दिया था । जीमने वालों की संख्या बढ़ जाने से घृत की कमी आ गई । मालपुओं की तई चल रही थी । पंक्तियां भी बैठी जीम रही थीं । घृत शीघ्र प्राप्त नहीं हो सका । अत: राघवदासजी स्नान के तालाब से जल के पीपे भर लाये और घृत के स्थान में तई में डाल दिये । वह जल घृत बन गया । फिर घृत आने पर जितने पीपे तालाब से लाकर तई में डाले थे तालाब में उतने ही पीपे घृत के डाल दिये । इससे सूचित होता है कि भक्तों के कार्य में जल भी घृत का काम कर देता है । कहा भी है- 
भक्त जनों के कार्य में, जल भी दे घी काम ।
राघवदास के ताल जल, बना सु घृत अभिराम ॥३६४॥दृ.त.९
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राघवदासजी महाराज के तप तेज व परोपकारादि दिव्य गुणों से प्रभावित होकर तत्कालीन करौली नरेश उनको करौली ले गये थे तथा करौली में ही निवास स्थान बनवाकर उसमें विराजने की प्रार्थना की थी और निर्वाह के लिये भूमि भेंट की थी । कुछ समय आप विराजे भी थे । उदेई भी जाते थे और रहते भी थे । राघवदासजी ब्रह्मलीन उदेई ग्राम में ही हुये थे । उनकी समाधि उदेई में ही है । राघवदासजी की समाधि उदेई ग्राम में श्वेत चबूतरे के नाम से प्रसिद्ध है ।  
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राघवदासजी अच्छे विद्वान और कवि थे । उनकी रचना से ही ज्ञात होता है कि वे कवि गुणों से विभूषित थे । उन्होंने अपने दादा गुरु प्रहलाददासजी की प्रेरणा से भक्तमाल की रचना की थी । प्रेरणा में कारण था - नाभाजी ने सगुण उपासक वैष्णवों की कथा ही भक्तमाल में दी थी । यह देखकर प्रहलाददासजी ने सोचा भक्त तो सगुण और निर्गुण दोनों प्रकार के ही होते हैं । अतः दोनों ही प्रकार के भक्तों की कथा भक्तमाल में होनी चाहिये । 
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ऐसा विचार करके अपने पौत्र शिष्य राघवदासजी को आज्ञा दी कि - तुम ऐसी भक्तमाल की रचना करो जिसमें निर्गुण ब्रह्म के भक्तों तथा सगुण ब्रह्म के भक्तों की कथायें हों । वे भक्त चाहे किसी भी संप्रदाय के हों व किसी भी जाति के हों, किसी भी देश के हों, किसी भी भेष के हों । सभी प्रकार के पक्ष का त्याग करके भक्तों की कथायें उसमें दो । राघवदासजी ने अपने दादा-गुरुजी की आज्ञा मानकर सभी की कथायें अपनी भक्तमाल में दी हैं । उनके समय तक जो भक्त हुये हैं और जिनको वे जान सके उनको अपनी भक्तमाल में स्थान दिया है । 
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यही बात निम्न कवित्त में है-
"अग्र गुरु नाभाजी को आज्ञा दीन्ही कृपा कर,
प्रथम ही साखी छप्पै कीन्ही भक्तमाल है ।
तैसे प्रहलादजी विचार कहा राघोजी से,
करो संत-श्रावली सु बात ये रसाल है ॥
लिई मान करी जान धरे ध्यान भक्त सब,
निर्गुण सगुण षट् दरशन विशाल है ।
साखी छप्पै मनहर इन्दव अरिल्ल चौपै,
निसानी सवैया छंद जानयौ हंसाल है ॥"
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उक्त कवित्त इन राघवदासजी की भक्तमाल के पद्य टीकाकार चतुरदासजी की रचना का ६३१ वां मनहर कवित्त है । उक्त विवरण के अनुसार राघवदासजी ने ऐसी ही भक्तमाल रची । नाभाजी की भक्तमाल में समास व्यास से लगभग चार सौ भक्तों की कथायें हैं किन्तु राघवदासजी की भक्तमाल में समास व्यास से लगभग १२ सौ भक्तों की कथायें हैं । अतः राघवदासजी की भक्तमाल नाभाजी की भक्तमाल से तिगुनी बड़ी है । यह समास से मंगलदासजी जाखल की ढांणी वालों ने सुन्दरोदय के छप्पै में "जनयश" से सूचित किया है । छप्पै का अगला पद 'बारसी सहस रवि" से सूचित किया है कि - इन राघवदासजी की वाणी १२ हजार है । इसलिये अब उनकी रचना का परिचय भी यहां दिया जाता है । 
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*राघवदासजी की वाणी*
राघवदासजी की वाणी के *साखी भाग* में अंग ५८ हैं और साखी तथा अन्य चौपाई आदि *छोटे पद्य* १७२३ हैं । *अरिल्ल ग्रंथ* में १७ अंग हैं और ३७० अरिल्ल हैं, अरिल्ल ग्रंथ में ३६ चौपाई भी हैं । *पद भाग* की ३० रागों में १७९ गेय पद हैं । उत्पत्ति स्थिति चितावनी ग्रंथ में चार सौ के लगभग पद्य हैं । *लघु ग्रंथ* १- सवैया ग्रंथ- इसमें ६ अंगों में ७१ सवैयै हैं । *कवित्त ग्रंथ*- इसमें १३ अंगों में १२५ के लगभग कवित्त हैं । ३- गुरु शिष्य संवाद ग्रंथ, इसमें ९१ चौपाई आदि पद्य हैं । ४- गुरुदत्त रामरज ग्रंथ, इसमें ४३ दोहा चौपाई और कवित्त हैं । ५- हरिश्चन्द्रसत ६- ध्रुव चरित्र । ७- कहरा विनती ग्रंथ, ८- चितावणी ग्रंथ । ९- वाणी । १०- अरिल्ल ग्रंथ । ११- उत्पत्ति स्थिति चितावनी । १२- सत्तवार, इसमें २६ पद हैं । १३- पन्द्रह तिथि, इसमें ६९ पद्य हैं । १४- भक्तियोग इसमें ६१ पद्य हैं । 
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१४ ग्रंथ इनके प्राप्त होते हैं और एक भक्तमाल । और भी कोई हो तो ज्ञात नहीं है । किन्तु १५ ग्रंथ तो इनके देखने में आते हैं । इन सबकी पद्य संख्या ग्रंथ संख्या पद्धति से अर्थात ३२ अक्षर का पद्य मानकर संख्या करने से १२ हजार होती है । अतः मंगलदासजी जाखल की ढांणी वालों ने यही संख्या अपने 'सुन्दरोदय के छप्पै में दी है । वह छप्पैया राघवदासजी के विवरण के आरंभ में पहले दिया जा चुका है । उसका अंश यहां भी पाठकों की सुविधा के लिये दिया जाता है - "जन यश वाणी सहस रवि" इसका अर्थ होता है - जन यश भक्तों का यश भक्तमाल को मिलाकर राघवदासजी की वाणी १२ हजार है ।
(क्रमशः)

बुधवार, 28 अक्टूबर 2026

*३१. साधु संगति परम लाभ का अंग ~५/८*

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*🌷卐 सत्यराम सा 卐🌷*
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*३१. साधु संगति परम लाभ का अंग ~५/८*
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*रज्जब पारस परसते, लोहा पलट्या गोत१ ।*
*त्यों निर्धन धनवंता मिल, अ वित्त२ स वित्ता३ होत ॥५॥*
लोहा पारस से मिलता है तब उसका गोत्र१ बदल जाता है फिर वह लोह न कहलाकर सुवर्ण कह लाता है, वैसे ही ज्ञान-धन से युक्त संत से मिलकर निर्धन अज्ञानी प्राणी, ज्ञान-धन से रहित२ होने पर भी ज्ञानधन - युक्त३ होकर ज्ञानी कहलाता है ।
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*रज्जब लघु दीरध मिलत, मान महातम जोय१ ।*
*यथा तक्र२ पय३ परसतों, जावण हुं दधि होय ॥६॥*
देखो१, जैसे थोड़ी-सी छाछ२ दूध३ में मिलती है, तब वह जावण भी दही बन जाता है, वैसे ही यह बात निश्चित रूप से मानो कि - जब छोटे बङों से मिलते हैं तब छोटे का महात्म्य बढ़ जाता है अर्थात साधारण जीव की संत संग से उन्नति होती है ।
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*रीते संगति भर्यों की, जे हुंहि भूरि१ सु२ भाग ।*
*देख दश गुने होत हैं, शून्य सु एक हिं लाग ॥७॥*
यदि बहुत१ अच्छा२ भाग्य होता है तब कहीं ज्ञान-धन से खाली प्राणी को ज्ञान-धन से परिपूर्ण संतों का संग मिलता है, मिलने पर तो देखो, एक(१) पर शून्य(०) लगते ही दश(१०) गुना हो जाता है, वैसे ही अज्ञानी ज्ञानी हो जाता है ।
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*भव-सागर संसार यह, साधू शुद्ध जहाज ।*
*रज्जब परसे पार ह्वै, कठिन सरे यहु काज ॥८॥*
यह संसार जन्म से आदि दुखों का समुद्र है इससे पार करने के लिये निर्विकार संत ही जहाज हैं, जो उन संतों का संग करते हैं, वे इस भव-सागर से पार हो जाते हैं, उनका यह कठिन कार्य संत द्वारा सिद्ध हो जाता है ।
(क्रमशः)

*३०. तीर्थ सत्संग का अंग ~९/११*

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*🌷卐 सत्यराम सा 卐🌷*
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*३०. तीर्थ सत्संग का अंग ~९/११*
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*तीरथ आतम राम है, परसे१ पावन होय ।*
*जन रज्जब पहुँचे बिना, अध उतरे नहीं कोय ॥९॥*
आत्म रूप राम ही तीर्थ है, उससे मिलते१ ही प्राणी पवित्र होकर पवित्र करने वाला हो जाता है । आत्मा और राम की अभेद अवस्था में पहुंचे बिना सर्वथा पाप नहीं उतरते, कारण, प्रायश्चित द्वारा पाप नष्ट करने पर भी कर्तृत्व भाव होने से पुनः हो जाता है ।
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*चरणार्विन्द ते प्रकटी, साधु हृदय मँझार ।*
*रज्जब गंगा ज्ञान की, मन मल मज्जन हार ॥१०॥*
संतों के हृदय स्थान में स्थित परमात्मा के स्वरूप भूत चरण कमलों से ज्ञान-गंगा प्रकट हुई है, इसका ब्रह्म साक्षात्कार रूप जल पाप रूप मल को सदा के लिये हटाकर मन को उज्वल करने वाला है ।
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*सलिता१ साधु जवाब जल, मन मल मज्जन होय ।*
*रज्जब रज यूं ऊतरे, उर अंतरि अध धोय ॥११॥*
साधु ही नदी१ है, प्रश्न का उत्तर ही जल है, संतों के साथ प्रश्नोत्तर होने से मन का संशय रूप मल हटकर मन संशय-रहित उज्वलता को प्राप्त होता है । इस प्रकार हृदय के भीतर का संशय रूप पाप धोया जाता है, तब अविद्या रूप रज भी उतर जाती है । अविद्या नष्ट होते ही ब्रह्म प्राप्ति रूप जीवन का लक्ष्य पूरा हो जाता है ।
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इति श्री रज्जब गिरार्थ प्रकाशिका सहित “३०. तीर्थ सत्संग का अंग” समाप्त ॥
(क्रमशः)

*३०. तीर्थ सत्संग का अंग~ ५/८*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*३०. तीर्थ सत्संग का अंग~ ५/८*
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*ज्ञान गंग तहँतें१ चली, प्राणि प्रवीण सु न्हाहिं ।*
*रज्जब पाप जू युगन के, जीव जड़े सो जाँहिं ॥५॥*
जैसे गंगा ब्रह्म लोक में स्थित विष्णु के चरणों१ से चली है, वैसे ही संतों के हृदय में स्थित परमात्मा के स्वरुपभूत चरणों से ज्ञान-गंगा चली है, इसमें चतुर प्राणी स्नान करते हैं । जो युगों से जीव के ह्रदय में पाप भूषण में नग के समान जटित हैं, वे सभी ज्ञान-गंगा में स्नान करने से हट जाते हैं ।
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*ज्ञान गंग पर देही१ देवल२, मूरति आतम राम ।*
*इहां३ सांपड़ो४ सेय प्राणपति, सरहि५ शिरोमणि काम ॥६॥*
ज्ञान-गंगा पर आत्मा१ रूप मंदिर२ है, आत्म स्वरुप राम ही उसमें मूर्ति है अर्थात ज्ञान द्वारा आत्म स्थित होने पर ही आत्मा में आत्मस्वरूप राम का साक्षात्कार होता है । अतः इस३ ज्ञान-गंगा में स्नान४ करके आत्म स्थिति द्वारा अभेद रूप से ब्रह्म की भक्ति करो अर्थात निरंतर ब्रह्माकर वृत्ति रक्खो, इससे तुम्हारा परम-सुख प्राप्ति रूप सबसे बड़ा कार्य सिद्ध५ होगा ।
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*सत्य तीर्थ सत्संग है, वारि विमल बिच बोध ।*
*रज्जब राज मल ऊतरे, वेत्ता१ वदन२ सु शोध३ ॥७॥*
सच्चा तीर्थ सत्संग ही है, संशय विपर्य्यय रहित पवित्र ज्ञान ही उसमें जल है, सत्संग तीर्थ में स्नान करने से पाप रूप मल और अविद्या रूप रज सदा के लिए उतर जाते हैं । ज्ञानी१ के मुख२ के शब्दों में इस ज्ञान-जल को खोज३ कर स्नान करो ।
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*सत्य तीर्थ सत्संग है, जल जगदीश्वर नाम ।*
*दान पूण्य को बहु किये, रज्जब अठसठ ठाम१ ॥८॥*
दान, पुण्य, यज्ञादि करके उनका फल स्वर्गादी सुख भोगने के लिए तो बहुत तीर्थ बनाए हैं और उनमें ६८ स्थान१ मुख्य हैं किन्तु सच्चा तीर्थ तो सत्संग ही है, परमात्मा का नाम ही उनमें जल है अर्थात सत्संग द्वारा नाम चिंतन करने से ही परमात्मा की प्राप्ति होती है, सत्य ब्रह्म की प्राप्ति में हेतु होने से ही सत्संग सत्य तीर्थ है ।
(क्रमशः)
 

*३०. तीर्थ सत्संग का अंग ~१/४*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*३०. तीर्थ सत्संग का अंग ~१/४*
इस अंग में सत्संग रूप तीर्थ संबंधी विचार कर रहे हैं ~
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*साधु सलिता१ शब्द जल, इहिं गंगा कोई जाय ।*
*रज्जब रज मल२ ऊतरे, मन भागीरथि न्हाय ॥१॥*
संत रूप नदी१ में शब्द रूप जल है, इस गंगा में स्नानार्थ कोई बिरला ही जाता है, जो उक्त भागीरथी गंगा में स्नान करता है उसके मन के पाप२ और अविद्या रूप रज दोनों ही हट जाते हैं ।
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*साधु तीरथ ज्ञान जल, बिरला पावे कोय ।*
*रज्जब यहु अठसठ अगम, प्राप्त भाग्य से होय ॥२॥*
संत रूप तीर्थ का ज्ञान जल किसी बिरले साधक को ही प्राप्त होता है, यह संततीर्थ ६८ तीर्थ करने वालों से तो अगम ही है अर्थात उन्हें प्राप्त होना कठिन है, यह तो बड़े भाग्य से ही मिलता है ।
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*महन्त मुखहि मंदाकिनी, वाणी वारि१ प्रवाह ।*
*गगन गंग निर्मल बहै, मन मज्जन२ कर न्हाह३ ॥३॥*
महान् संतों का मुख ही मंदाकिनी गंगा है, उनकी वाणी ही उसमें जल१ का प्रवाह है, यह निर्मल ज्ञान गंगा आकाश में ही बहती है अर्थात शब्द आकाश का गुण है, उसी में चलता है, इस ज्ञान गंगा में स्नान३ करके मन को उज्वल२ करो ।
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*चिदानन्द के चरण निज, साधू के उर माँहिं ।*
*पेखो पति के पगन को, ठाहर और सु नाँहिं ॥४॥*
चेतन-आनन्द स्वरुप परमात्मा के निजी अर्थात आत्मस्वरूप चरण संतों के हृदय में हैं, अपने स्वामी परमात्मा के पाद पद्मों को वहां ही देखो, एनी स्थान में उनका दर्शन नहीं हो सकेगा ।
(क्रमशः)

*४९. भ्रम विधवंस कौ अंग ६१/६४*

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*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
*श्रद्धेय श्री Tapasvi @Ram Gopal Das की प्रेरणा से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Meta AI*
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*४९. भ्रम विधवंस कौ अंग ६१/६४*
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*रांम बिमुख जनमैं मरै, मरै बसै बसिमार ।* 
*कहि जगजीवन रांम रटि, हरि भजि उतरै पार ॥६१॥*  
संत जगजीवन साहेब कहते हैं, जो जीव राम से विमुख है, वह जन्म लेता है और मर जाता है, मर कर फिर नर्क में बसता है और फिर राम को भूल जाता है । यही उसका बार-बार का चक्कर है । इसलिए हे जीव, राम नाम को रट ले, हरि को भज ले, इसी से तू इस भवसागर से पार उतर जाएगा ।
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*कहि जगजीवन पवन नहिं, मन नहिं मोहि सरीर ।*
*अबिगत अलख अगाध है, सतगुरु सा हित धीर ॥६२॥*
संत जगजीवन दास जी कहते हैं, परमात्मा न तो पवन जैसा प्राण है, न मन है, न यह मोह वाला शरीर है । वह तो अबिगत है, अलख है, अगाध है, अर्थात इंद्रियों से परे है । उस परमात्मा तक पहुंचाने वाला, उसका सच्चा हितैषी और धीरज बंधाने वाला केवल सतगुरु ही है ।
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*जहं लग प्रतिमा पूजि सब, सब तीरथ फिर न्हाइ ।*
*कहि जगजीवन भाव सिध४, कोइ जन हरि गुण गाइ ॥६३॥*
(४. भावसिध=भाव भक्ति से पूर्ण साधक)
जहाँ तक सब लोग प्रतिमाओं की पूजा कर लेते हैं, सब तीर्थों में घूम-घूम कर नहा लेते हैं, पर इससे सिद्धि नहीं मिलती । संत जगजीवन साहेब कहते हैं, भाव से ही सिद्धि मिलती है, कोई बिरला जन ही सच्चे भाव से हरि के गुण गाता है और वही पार होता है ।
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*बेद५ कतेब६ मसीत७ देहुरा८, दोइ पष रहतां रांम ।*
*कहि जगजीवन जुगल मधि, कोइ जन सुमिरै नांम ॥६४॥*
(५. बेद=हिन्दुओं का पवित्र ग्रन्थ)   (६. कतेब=पवित्र कुरान) 
(७. मसीति=मस्जिद)   (८. देहुरा=देवालय या देवमूर्ति)
वेद हिन्दुओं के पास है, कतेब मुसलमानों के पास, मसीत यहाँ है तो देहुरा वहाँ है, इन दो पक्षों के बीच में ही लोग राम को बाँट कर रह गए हैं । संत जगजीवन दास जी कहते हैं, इन दोनों पक्षों के झगड़े के बीच में रहकर भी कोई बिरला जन ही है, जो पक्षपात छोड़कर सच्चे राम नाम को सुमिरता है । वही सच्चा सुमिरन है ।
(क्रमशः)

*राघवदासजी*

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*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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*दादू तन मन लाइ कर, सेवा दृढ़ कर लेइ ।*
*ऐसा समर्थ राम है, जे मांगै सो देइ ॥*
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कृष्णदास मोहन मगन, अजमेरी ऊधो रहै ।
गगन मगन खेलत फिरै, यथा शक्ति हरिहरि कहै ॥
परमारथ में निपुन अति, आये को जल अन्न दें ।
संतन को उर भाव बहु, सन्मुख जाय रु धामलें ।
ये करणी कर्तव्य भले, ज्यों राजस वृत्ति रिषन के ।
एक टेक हरि नाम की, हापाजी के शिषन के ॥६७०॥भक्तमाल
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कृष्णदासजी और मोहनदासजी ये दोनों भजन में ही निमग्न रहते थे । अजमेर वाले उद्धवजी ब्रह्म रूप गगन में निमग्न रहकर ब्रह्मानन्द रूप खेल खेलते थे और यथा शक्ति हरि हरि करते हुये विचरते थे । ये सब परमार्थ में अति चतुर थे । आने वाले अतिथियों को अन्न जल देते थे । संतों के प्रति इन के हृदय में बहुत प्रेम था । सामने जाकर स्थान पर लाते थे । ये सब करने योग्य कर्तव्य कर्म को अच्छी प्रकार करते थे । जैसे ऋषियों में कर्म करना रूप राज वृत्ति थी, ऐसे ही इन संतों में भी थी । इस प्रकार कर्तव्य कर्म करते रहने पर भी हापाजी के शिष्यों में हरि नाम चिन्तन करने की तो टेक ही थी अर्थात् नाम चिन्तन निरंतर करते ही रहते थे ।
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*हरिदासजी का ब्रह्मलीन होना*
हरिदासजी महाराज अपने जीवन में परम विरक्त रहते हुये हरि भजन ही करते रहे थे तथा अपने प्रसंग में आने वालों को उपदेश द्वारा हरि भक्त बनाते हुये आयु समाप्त होने पर हिन्डौन में ही ब्रह्मलीन हुये थे ।
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*हिन्डौन की महन्त परंपरा*
हरिदासजी महाराज की हिन्डौन की गद्दी की महन्त परंपरा इस प्रकार है—१- हरिदासजी, २- उद्धवदासजी, ३- परशुरामजी, ४- हृदयरामजी(मास्टर नारायण स्वामी ने हृदयरामजी के स्थान में उदयरामजी लिखा है किन्तु सुन्दरोदय और वंश दीपिका में मुझे हृदयरामजी ही मिला है ।), ५- जोगीदासजी(जोगीदासजी के आगे मास्टर नारायण स्वामी ने गिरधरदासजी लिखा है किन्तु सुन्दरोदय और वंश दीपिका में यह नाम मुझे नहीं मिला ।), ६- जयरामदासजी, ७- अमोलकदासजी, ८- लक्ष्मणदासजी । इससे आगे हिन्डौन की परंपरा नहीं मिल सकी है । हिन्डौन में इस परंपरा का स्थान केशवपुरा में चार मंजिल का है, नोहरा के सामने है, नोहरा में ही उक्त महन्तों के चरण बताये जाते हैं । किन्तु अब स्थान किसी महाजन के कब्जे में है । इति श्री तृतीय अध्याय समाप्त: ३ ।
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*अथ अध्याय ४*
*राघवदासजी*
राघवदासजी हरिदासजी हापा के शिष्य थे । पूर्वाश्रम का परिचय इन्होंने भक्तमाल में किंचित दिया है । सो इस प्रकार है—
छप्पय—नमो तात हरिराज, नमो रतनाई माई ।
जीव वध रु मद मांस, छुड़ायो केशीबाई ॥
सत संगति गति ज्ञान, ध्यान ध्वनि धर्म बतायो ।
परमहंस हरिदास, परख पूरो गुरु पायो ॥
रघवा रजमो¹ पाय के, रामरटत उमग्यो हियो ।
दादूजी के पंथ को, तबहि तनिक वर्णन कियो ॥६७२॥
चौपाई- पीपा वंशी चांगल गोत, हरिहृदय कीन्हों उद्योत ॥७५०॥
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उक्त पद्यों से ज्ञात होता है—राघवदासजी पीपा वंशी चांगल गोत्र के हरिराज के पुत्र थे । इनकी माता का नाम रतनाई था । जाति के क्षत्रिय होने से शिकार करना, मद्य पीना, मांस खाना इनका स्वाभाविक काम था किन्तु केशीबाईजी ने उक्त तीनों—शिकार, मद्य, मांस इनका छुड़ा दिया था । फिर इन्होंने पूरी परीक्षा करके पूरे परमहंस हरिदासजी को गुरु रूप में प्राप्त किया था ।
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उनकी सत्संगति से ज्ञान में गति होने लगी फिर तो राघवदासजी ने गुरुजी के बताये हुये निर्गुण ध्यान, अनाहत व अनहद ध्वनि और भागवत् धर्म में उनकी वृत्ति लीन रहने लगी थी । इसी कारण से रामजी का कृपा रूप बल¹ प्राप्त करके राम-राम करने से मेरा हृदय उमंग धाया था । इसी से मेरे से दादूजी के साधन मार्ग द्वारा भजन करने वाले संतों का कुछ वर्णन हो सका है । राघवदासजी के जन्म स्थान का तो पता नहीं लग सका है । उन्होंने उक्त ही परिचय दिया है ।
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मंगलदासजी जाखल की ढाणी वालों ने भी सुन्दरोदय ग्रंथ में लिखा है—
छप्पय—“दास हरि शु प्रताप, शिष्य राघो रज वंशी ।
खींची चांगल गोत, प्रेम पर ब्रह्म हुलंसी ॥
रहै उदेई धाम, काल बिरखा करवाई ॥
ल्यया करोली राय, धामरची उदक चढ़ाई ॥
जन यश वाणी सहस रवि, सुख सुकुंज की ठाम तिन ।
राजाराम नन्दराम हि, हरिनारायण पाठ धनि ॥सुन्दरोदय॥”
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राजा पीपाजी की वंश परंपरा में चांगल गोत्र के खींची क्षत्रिय राघवजी गुरुदेव हरिदासजी हापा के उपदेश रूप प्रताप से परब्रह्म में प्रेम करने लगे थे । उस प्रेम में उनकी बुद्धि बहुत प्रसन्न हुई थी । फिर राघवदासजी ने अपना साधन धाम उदेई धाम में बनाया था । उदेई में ही रहकर सार भजन करते थे । उदेई गंगापुर के पास है ।एक समय उदेई में दुष्काल पड़ गया था । पानी की भारी कमी आ गई थी । तब जनता को दुःखी देखकर आपका दया भाव गई थी । इससे उदेई के तालाब पर गये और उसके पूरे भराव के चिन्ह स्थान पर खड़े होकर बोले “जब तक तालाब पूरा भरकर पानी मेरे घर तक लगेगा तब तक मैं यहां से नहीं उठूंगा” ।
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यह बात कह वहां बैठकर सच्चे के लिये भगवान् से प्रार्थना की और भगवान् का ध्यान करने लगे । फिर भगवान् ने उदेई में वर्षा की और तालाब पूरा भर गया, राघवदासजी के पानी आ लगा, तब वे वहां से उठे थे । ऐसे दयालु थे । राघवदासजी की यह घटना सुनकर तत्कालीन उस प्रदेश के नरेश ने उनको ५१ बीघा भूमि भेंट की थी । कहा भी है—
संत लोक हित के लिये, दृढ़ प्रतिज्ञा सब काल ।
राघवदास उठे तभी, भरा भली विधि ताल ॥२३४॥दृ.त.११
(क्रमशः)

*४९. भ्रम विधवंस कौ अंग ५७/६०*

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*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
*श्रद्धेय श्री Tapasvi @Ram Gopal Das की प्रेरणा से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Meta AI*
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*४९. भ्रम विधवंस कौ अंग ५७/६०*
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*परमेसुर का देहुरा, परमेसुर का साध ।*
*कहि जगजीवन देव हरि, अबिगत रांम अगाध ॥५७॥*
संत जगजीवन दास जी कहते हैं कि यह मानव शरीर ही परमात्मा का सच्चा मंदिर है, और इस शरीर में रहने वाला साधक-हृदय ही परमात्मा का सच्चा सेवक है । हरि रूपी देवता कोई बाहर नहीं, वह अव्यक्त और अगाध राम ही सबके भीतर विराजमान है । इसलिए बाहर के मंदिर से बड़ा मंदिर तुम्हारा अपना शरीर है ।
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*जहँ पत्थर का देहुरा, पत्थर मांही देव ।*
*कहि जगजीवन बेद मत, पंच२ सुहाई सेव२ ॥५८॥*
(२-२. पंच सुहाई सेव=पंचों को अपनी सेवा की आवश्यकता थी, अतः उन ने वेदों का अर्थ अपने अनुकूल प्रचारित कर दिया)
जहाँ पत्थर का मंदिर बनाकर पत्थर की ही मूर्ति को देव मान लिया जाता है, वहाँ भक्ति केवल बाहरी रह जाती है । संत जगजीवन साहेब कहते हैं कि वेद का सच्चा मत यह है कि वह निर्गुण परमात्मा पाँचो तत्वों में, पाँचो प्रकार से सेवने योग्य है, केवल पत्थर में ही नहीं । अर्थात चेतन को जड़ में मत ढूंढो ।
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*मगहर क्षेत्र तीरथ गया, कासी किया निवास ।*
*जगन्नाथ डोरी खैंची, सु कहि जगजीवनदास ॥५९॥*
कोई मगहर जैसे अपवित्र माने जाने वाले क्षेत्र में जाकर, कोई गया जैसे तीर्थ में जाकर, कोई काशी में निवास करके, तो कोई जगन्नाथ पुरी में जाकर डोरी खींचकर समझता है कि उसे मोक्ष मिल जाएगा । संत जगजीवन दास जी कहते हैं कि तीर्थ-स्थान बदलने से मुक्ति नहीं मिलती, मुक्ति तो मन की निर्मलता से मिलती है । कबीर साहेब ने भी मगहर में ही देह त्याग कर यही बताया था ।
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*पांचौं इंद्री जीत मन, आदि बरै भरतार ।*
*ए सब त्यागै रांम रमि, अस्म३, पंक, जलधार३ ॥६०॥*
(३-३. अस्म मूर्तिपूजा, पंक=गंगा की मिट्टी का शिव लिंग बना कर पूजना, तथा जलधार=शिवलिंग पर चढ़ाना । इन तीनों ही कर्मो को त्याग कर रामभजन में मन लगाना चाहिये) 
जो साधक पाँचो इंद्रियों को जीत लेता है और मन रूपी पति को आदि पुरुष, सच्चे भरतार परमात्मा में लगा देता है, वही सच्चा सुहागन है । संत जगजीवन साहेब कहते हैं कि जो राम में रम जाता है, वह इस अस्थिर संसार को, जो कीचड़ और पानी की धारा के समान क्षणभंगुर है, त्याग देता है ।
(क्रमशः) 

मंगलवार, 27 अक्टूबर 2026

*३१. साधु संगति परम लाभ का अंग ~१/४*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*३१. साधु संगति परम लाभ का अंग ~१/४*
इस अंग में सन्त संगती ही प्राणी के लिए परम लाभ रूप है, यह कहेंगे -
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*साधु संगति सुठि१ भली, घड़े२ माँहिं घड़३ लेय ।*
*रज्जब सौंज४ सँवारि कर, जीव माँहिं जिव५ देय ॥१॥*
संतों की संगति अच्छी से भी अच्छी१ है, ईश्वर के बनाये२ हुये शरीर में भी भक्ति ज्ञानादि सुखद साधन उत्पन्न३ कर देती है और कर्मेन्द्रिय, ज्ञानेन्द्रिय, अन्त:करणादि सभी सामग्री४ सुधार कर जीव में भी जीव देती है अर्थात ब्रह्म प्राप्ति व परमशांति५ देती है ।
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*जैसे चन्दन बावना, वेधि१ गया वनराय२ ।*
*त्यों रज्जब पलटे सबै, साधु संगति आय ॥२॥*
जैसे बावने चन्दन की सुगंध से सभी वन पंक्ति२ विद्ध१ हो जाती है अर्थात सभी वृक्ष चन्दन बन जाते हैं वैसे ही साधु संगति में आकर सभी बदल जाते हैं, अर्थात संत बन जाते हैं ।
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*लोहा पारस परसतों, रूद्र१ रूप ह्वै जाय ।*
*रज्जब गत२ ज्ञाता भया, साधु संगति आय ॥३॥*
लोहे के भयंकर शस्त्र को पारस का स्पर्श मिलता है तब उसका भयंकर१पना चला जाता है और वह प्रिय दर्शन सुवर्ण रूप बन जाता है, वैसे ही साधु संगति में आने से जीव का जो ब्रह्म से भिन्न ज्ञातापना है वह चला२ जाता है, वह ब्रह्म का ज्ञाता अपने को न मानकर ब्रह्म रूप ही मानता है ।
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*पारस परसत लोह, सौंधे१ सौं महँगा भया ।*
*तो क्यों न करीजे मोह, रज्जब साँचे साधु सौं ॥४॥*
लोहा पारस से मिलते ही सस्ते१ से महँगा बन जाता है, वैसे ही सन्तों की संगति से जीव की उन्नति होती है, फिर संतों से प्रेम क्यों नहीं करना चाहिये ? अवश्य करना चाहिये ।
(क्रमशः)

*हरिदासजी की वाणी*

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*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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*जब द्रवो तब दीजिये, तुम पै मांगूं येहु ।*
*दिन प्रति दर्शन साधु का, प्रेम भक्ति दृढ़ देहु ॥*
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फिर राजा ने हरिदासजी से प्रार्थना की—कि भगवन् ! श्यामदासजी को तो यहां रहने की आज्ञा दीजिये । वे आपके सुयोग्य शिष्य हैं उनसे ही हम संतोष धारण करेंगे । फिर हरिदासजी महाराज ने राजा के अधिक आग्रह पर श्यामदासजी, चतुरदासजी, केवलरामजी, को वहां ही छोड़ दिया था, उनके भोजन-वस्त्र का प्रबन्ध राजद्वार मे ही होता था किन्तु आगे चलकर हृदयरामजी सूर्य की किरण जैसे सब घरों में जाती है, वैसे सब घरों से भिक्षा करके ही भोजन करते थे ।
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इस प्रकार तीन संत आमेर रहने लगे, शेष सब हरिदासजी के साथ ही रम गये । हरिदासजी महाराज अपने शिष्य मंडल के साथ इच्छानुसार भ्रमण करते हुये हिंडौन में पधारे तब उनको हिंडौन में अनुकूलता प्रतीत हुई तथा भ्रमण विशेष कर चुके थे और हिंडौन में भक्तों का भी अति आग्रह था । इससे आप हिंडौन में ही रह गये । वहां ही भक्तों ने आपके लिये सेवा का सब प्रकार का प्रबन्ध कर दिया फिर वे वहां ही रहने लगे ।
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*हरिदासजी की वाणी*
हरिदासजी हापाजी के २५ छप्पय कवित और कुछ साखी भी देखने में आई हैं । २५ में से १८ तो दादूजी की महिमा के हैं । २ में गरीबदासजी की महिमा की है । २ बड़े सुन्दरदासजी की भेंट के हैं । शेष तीन प्रहलाददासजी की भेंट के हैं । इनकी रचना का एक उदाहरण भी देखिये—
छप्पय-
‘गुरु दादू अरु राम, एक कुछ अन्तर नांहीं ।
कीये आप समान, चरण शरणे जे आहीं ॥
आप करें रस पान, सोई सब आत्म पावें ।
निराकार को नाम लेय, संतन सुमिरावें ॥
आतम अनन्त उधारि जग, कर्म काट कर ब्रह्मवत ।
हरिदास पार न लहै, विदित थके मो मति भ्रमित ॥५॥’
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*हरिदासजी हापा के शिष्य*
एक टेक हरि नाम की, हापाजी के शिषन के ।
टीके ऊधोदास, धर्म धीरज की आगर ।
रथ राधो के राम, बैठ उन कियो उज गर ॥
दीरघ दिन न कल्याण, उदयचंद ईश्वर अर्जुन ।
आनन्द लाल दयाल, श्याम गोविन्द यश गर्जन ॥
तुलसी है हरिराम, पार्वती जानो वाई ।
टीकू दो भगवान, सकल जानी गुरु भाई ॥६६॥ भक्त माल
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हरिदासजी हापा के शिष्यों के एक हरिनाम चिन्तन करने की ही टेक थी । हापाजी की गद्दी पर हिंडौन में उद्धवदासजी बिराजे थे । उद्धवदासजी धर्म और धैर्य की तो खानि ही थे अर्थात् धर्म और धैर्य उद्धवदासजी के मन में निरंतर रहते थे । राघवदासजी के आशा रूप रथ पर रामजी बिराजे थे अर्थात् उनकी इच्छा अधूरी नहीं रही थी । इच्छानुसार उनसे कार्य कराकर उनको प्रकट किया था । 
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कल्याणदासजी दिनों में तो बड़े नहीं थे, तो भी ज्ञान ध्यानादि में बहुत बड़े थे । उदयचन्दजी, ईश्वरजी, अर्जुनजी, आनन्दजी, लालजी, दयालजी और श्यामजी ये सब गोविन्द का यश गर्जन करते थे अर्थात् उच्च स्वर से गाया करते थे । तुलसीजी, हरिरामजी, पार्वती बाईजी, टीकूजी और दो भगवानजी, ये सभी गुरु भाई ज्ञानी थे । ज्ञान पूर्वक प्रभु का भजन करते थे ।
(क्रमशः)

*४९. भ्रम विधवंस कौ अंग ५३/५६*

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*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
*श्रद्धेय श्री Tapasvi @Ram Gopal Das की प्रेरणा से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Meta AI*
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*४९. भ्रम विधवंस कौ अंग ५३/५६*
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*बेद बतावै बिषै रस, सौ क्यों मान्या जाइ ।* 
*कहि जगजीवन प्रेम रस, सतगुरु चवै जस आइ ॥५३॥*  
वेद क्या बताता है, तो कहते हैं वेद बिषै रस बताता है । प्रवृत्ति मार्ग में यह करो तो स्वर्ग मिलेगा, यह रस मिलेगा, ऐसे विषय रस का वर्णन करता है । तो वह क्यों मान्य किया जाए, वह तो बंधन में डालता है । संत जगजीवन कहते हैं, सच्चा प्रेम रस तो सतगुरु चवै, सतगुरु बताते हैं । जब सतगुरु के मुख से जस आइ, यानी यश आता है, हरि के प्रेम की बात आती है, वही सच्चा रस है ।
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*प्रव्रिति९ रूप प्रकास करि, बेद चवै जस साखि९ ।*
*कहि जगजीवन हरि भगति, रांम रटै रस राखि ॥५४॥*
(९-९. वेदों की सभी शाखाओं में केवल लौकिक प्रवृत्तिमार्ग का ही विस्तृत वर्णन है)
प्रव्रिति रूप प्रकाश करि, वेद जो है वह प्रवृत्ति मार्ग का ही प्रकाश करता है, उसी का विस्तार से वर्णन करता है, जैसा कि टीका में आपने दिया है, वेद की सभी शाखाओं में लौकिक प्रवृत्ति मार्ग ही है । संत जगजीवन कहते हैं, पर हरि भक्ति तो इससे न्यारी है । वह है राम रटै रस राखि, राम नाम को रटते हुए उसके रस को हृदय में रखना, यह निवृत्ति का मार्ग है, प्रेम का मार्ग है ।
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*सोहं१ हंसा जे कहै, सो गति लखै न बेद१ ।*
*कहि जगजीवन नांम भजि, कोइ जन पावै भेद ॥५५॥*
{१-१. वह(वेद) योगियों के क्रियाकलाप को भी कोई महत्त्व नहीं देता}
सोहं हंसा, जो योगी सोहं, हंस का जाप करते हैं, अजपा जाप करते हैं, वेद उनकी गति को भी नहीं लख पाता, नहीं देख पाता । वेद योगियों के क्रियाकलाप को भी महत्व नहीं देता । संत जगजीवन कहते हैं, वेद से परे की गति है । नाम भजने से कोई बिरला जन ही उसका भेद पाता है । नाम ही वेद से आगे ले जाता है ।
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*बेद नाद धुनि विप्र करि, प्रव्रिति मांही मन ।*
*कहि जगजीवन नांम भजि, सतगुरु राखै तन ॥५६॥*
वेद नाद और धुनि बताता है, विप्र लोग कर्मकांड करके प्रव्रिति मांही मन लगाते हैं, मन को प्रवृत्ति में ही उलझा देते हैं । संत जगजीवन कहते हैं, तुम नाम भजो, सतगुरु तन राखै, यानी सतगुरु तुम्हारे तन को, तुम्हारी असली स्थिति को संभाल लेगा । वेद मन को बाहर भटकाता है, नाम और सतगुरु मन को ठहराते हैं ।
(क्रमशः) 

सोमवार, 26 अक्टूबर 2026

१३वीं कोटड़ी

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*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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*साचा सतगुरु जे मिलै, सब साज संवारै ।*
*दादू नाव चढ़ाय कर, ले पार उतारै ॥*
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अपने पूर्व आश्रम के ज्येष्ठ भ्राता आमेर नरेश मानसिंह की प्रार्थना संत हरिदासजी ने मान ली । फिर दूसरे दिन राजकीय स्वागत सामग्री बाजे-गाजे आदि लेकर स्वयं राजा मानसिंह हरिदासजी को लाने गये और बड़ी धूम धाम के साथ संकीर्तन करते हुये नगर के मुख्य मार्ग से जनता को संतमंडल का दर्शन कराते हुये राजभवन में लाये और राठौड़ी राणी कनकावती के भवन में जहां पहले दादूजी महाराज भी कुछ दिन विराजे थे, उसी स्थान में ठहराया और सेवा का सुन्दर प्रबन्ध कर दिया । सेवक नियुक्त कर दिये व उन्हें आज्ञा दी कि जो भी संतों को चाहिये वह वस्तु तत्काल उपस्थित करो । फिर राज भवन में सत्संग आरंभ हो गया ।
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राज-परिवार के सभी नर-नारी सत्संग में भाग लेते थे । पर्दे में बैठने वाली माताओं के लिये इस प्रकार का चिक लगा दिया गया था जिससे उनको वक्ता का दर्शन होता रहे किन्तु वे किसी अन्य नर को नहीं दीख सकें । उस समय राघवदासजी दादू वाणी की कथा करते थे । वे सभी विषयों पर भक्त चरित्र रूप दृष्टान्त दे कर सभी विषयों को सर्वसाधारण के हृदय में अंकित कर देते थे । कारण- उनको भक्त चरित्र बहुत याद थे । राजभवन के नर नारियों पर इस सत्संग का भारी प्रभाव पड़ा ।
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अनेक नर नारियों ने इस सत्संग के प्रभाव में आकर अपने अखाद्य, अपेयों को छोड़ दिया था । भगवद् भजन में मन लगाया था । यह सत्संग बहुत अच्छा हुआ । इस सत्संग में सुन्दर वाणी के प्रवचन और हरिदासजी आदि उच्च कोटि के संतों के दर्शन प्रति दिन अनायास ही प्राप्त हो जाते थे । राज परिवार ने संतों की सेवा भी श्लाघनीय रूप से करी । इन्हीं दिनों में आमेर नरेश मानसिंह और आमेर राज्य परिवार के १२ सरदारों ने कहा- आज तक हम कछवाहाओं की १२ कोटड़ी कहलाती थी । अब से हम हरिदासजी की १३वीं कोटड़ी मानेंगे ।
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उन १२ सरदारों का परिचय वंशदीपिका में मंगलदासजी ने इस प्रकार दिया है-वीकानेर नरेश लूणकरण की पुत्री और आमेर नरेश पृथ्वीराज की पटराणी से १२ पुत्र हुये थे उनके नाम ये हैं । १ भीम, २ बलभद्र, ३ भारमल(ये आमेर के राजा हुये हैं), ४ सांगा, ५ सुरतारण, ६ संस्मल, ७ गोपाल, ८ पचायण, ९ चतुर्भुज, १० जगमाल, ११ रायमल, १२ लसधीर । जिस समय हरिदासजी की १३ वीं कोटड़ी नियत की गई उस समय उक्त सरदारों के वंशजों के ठिकाने थे—१ म्हार, २ बांसखोह, ३ नींदड़, ४ बाटका, ५ चौमू, ६ बगरू, ७ अचरोल, ८ सांमेर, ९ काल्हवाड़, १० स्याहीवाड़, ११ करैंडा, १२ नीमैड़ा । उक्त ठिकानों के सभी सरदारों ने एक स्वर से कहा—कि आज से हमारी १३ कोटड़ी कहलायेंगी ।
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कहा भी है—“बहुर मंडली ध्यान हरि आमेर सु आये ।
सांमेलाले सभा राय धनि धनि गुण गाये ॥
कोटड़ी सु दश दोय, ग्रामावती है कछवाहा ।
हरिदास भक्त, कोटड़ी तैरवीं ताहा ॥
सब मिल कुल तारन कहे, अशन वशन सेवा सरस ।
मंगल हरी हजूर हरि, कनकावती सु महल वस ॥१२॥ वं.प्र.
उक्त प्रकार आमेर राज परिवार के सरदारों ने हरिदासजी महाराज का श्रद्धा से बहुत सम्मान किया था ।
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राजा मानसिंह तो अपने प्रिय लघु भ्राता से ज्ञान गोष्टी करते ही रहते थे । कहा भी है—
युगल भ्रात गोष्टी करें, मान हरी सुख राश ।
कथा कीर्तन सुमिर हरि, सकल सभा हरि प्यास ॥४७॥ वं. प्र.
छप्पय—
हरी भ्रात के रमत, मान नृप शीश नमायो ।
सदा रहो गढ़ एक, गांव पच्चीस सुनायो ॥
हरी कह्यो हरि भजो, अटन करि है जन दर्शन ।
नृप मिल कह्यो विचार, श्याम इत राखो परसन ॥
श्याम चतुर केवल रखे, भूपत्ति भोजन द्वार पट ।
मंगल हृदयराम रवि भीख भोग ले किरंगि अट ॥४८॥ वं.प्र.
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आमेर से हरिदासजी विचरने का विचार करने लगे तब आमेर नरेश मानसिंह ने हाथ जोड़कर मस्तक नमाते हुये कहा—भगवन् ! जाने का विचार क्यों कर रहे हैं ? यहां ही बैठकर भजन कीजिये । यदि आप राज भवन में निवास नहीं करना चाहें तो आपके निवास के लिये आपकी इच्छानुसार एक गढ़ आप को भेंट कर दिया जायगा । उसमें निवास करते हुये अपने शिष्यों के सहित भजन करिये । आपके योग क्षेम के लिये पच्चीस ग्राम आपके भेंट कर दिये जायेंगे । उनकी आय से शिष्यों सहित आपका निर्वाह होता रहेगा तथा आपके पास आने वाले संतों व भक्तों का भी सत्कार होता रहेगा ।
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और भी समय २ पर आपकी सेवा में मैं तथा राज-परिवार के सरदार आते ही रहेंगे । आपको किसी भी प्रकार का विक्षेप नहीं होने दिया जायगा ।आप और आपके शिष्यों का साधन भजन निर्विघ्न चलता रहे । ऐसा ही प्रबन्ध कर दिया जायगा । अत: आप हम परिवार वालों के कल्याण के लिये आमेर राज्य की सीमा में ही विराजिये । यही हम परिवार वालों की प्रार्थना है । आशा है आप हम लोगों की प्रार्थना स्वीकार कर के हम सबको अवश्य कृतार्थ करेंगे ।
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आमेर नरेश मानसिंह की उक्त प्रार्थना सुनकर हरिदासजी महाराज ने कहा—राजन् ! तुम्हारा कहना तो ठीक ही है किन्तु हम तो संत दर्शन के लिये भ्रमण करेंगे यहां नहीं रहेंगे । अब हमको गढ़ तथा ग्रामों की आवश्यकता नहीं रही है । हमारा गढ़ संत समुदाय है । उसी में रहने से हमारी रक्षा होती है गढ़ मे नहीं । ग्राम तो सभी हमारे हैं । हमारा तो सभी देश है । पच्चीस ग्राम ही हम हमारे नहीं मान सकते । हम तो यथा लाभ में संतुष्ट रहते हैं । परमाचार्य दादूजी महाराज की वाणी तथा गुरुदेव प्रहलाददासजी की वाणी के विचार से अब हमारे मन में परम संतोष रहता है ।
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अब हम भोगों में सुख नहीं मानकर संतोष पूर्वक ब्रह्म भजन में सुख मानते हैं । आप लोगों का कल्याण तो हरि भजन से होगा । इतने दिन जो सत्संग किया है उसका मनन करते हुये हरि भजन करो । फिर राजा मानसिंह ने परिवार के सरदारों से मिलकर विचार किया कि हरिदासजी तो नहीं रहेंगे । अधिक आग्रह संतों से करना भी अच्छा नहीं है । अब हमें श्यामदासजी को यहां रखने की प्रार्थना करनी चाहिये । जिससे १३ वीं कोटड़ी भी बनी रहेगी । और श्यामदासजी का मिलन दर्शन तथा उपदेश का लाभ भी मिलता रहेगा ।
(क्रमशः)

*४९. भ्रम विधवंस कौ अंग ४९/५२*

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*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
*श्रद्धेय श्री Tapasvi @Ram Gopal Das की प्रेरणा से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Meta AI*
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*४९. भ्रम विधवंस कौ अंग ४९/५२*
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*कहि जगजीवन बंदगी१,नख सिख बिरह जगाइ ।*
*जे कोई करै सो ऊधरै, रांम ह्रिदै गुण गाइ ॥४९॥*
{१. बंदगी=विनय(प्रणति)}
जगजीवन साहब कहते हैं, सच्ची बंदगी१ क्या है । बंदगी का अर्थ आपने दिया है विनय, प्रणति । वह है नख से सिख तक, पूरे शरीर में बिरह को जगाना । जब तक रोम-रोम में परमात्मा के मिलने की विरह नहीं जागती, तब तक बंदगी अधूरी है । जो कोई ऐसी बिरह भरी बंदगी करे, वही ऊधरै, तर जाता है । वह हृदय में राम के गुण गाकर पार हो जाता है ।
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*कहि जगजीवन बेदबी२, गाफिल३ देह गंमार४ ।* 
*हरि भजि पार न पहुँच ही, बीचि लगावै बार५ ॥५०॥*
{२. बेदबी=बेअदबी, अविनय(धृष्टता)}   {३. गाफिल=असावधान} {४. गंमार=गँवार(अज्ञ) मूर्ख}   (५. बार=बिलम्ब) 
संत जगजीवन जी कहते हैं, बेदबी यानी बेअदबी, अविनय, धृष्टता, गाफिल यानी असावधान, गंमार यानी गँवार, मूर्ख । जो देह गंमार है, जो शरीर के अभिमान में गँवार बना हुआ है, जो हरि के प्रति बेअदबी२ करता है, गाफिल३ रहता है, वह हरि को भज कर भी पार नहीं पहुँचता, मूर्खता४ करता रहता है  । वह बीच में ही बार५ लगाता है, यानी बिलम्ब करता है, अटक जाता है । अहंकार और असावधानी भक्ति में सबसे बड़ा रोड़ा है ।

*कहि जगजीवन तूं ही तूं, तुझ बिन और न कोइ ।*
*तूं ही सकल सब ठांम हरि, आदि अंत मधि जोइ ॥५१॥*
यह महावाक्य जैसी साखी है । संत जगजीवन जी कहते हैं, हे हरि, तूं ही तूं है, तुझ बिन और कोई नहीं है । सारे ठांम में, सब जगह तूं ही सकल रूप में है आदि में तूं, अंत में तूं, मध्य में भी तूं ही जोइ, दिखाई देता है । यह अद्वैत की अनुभूति है, जहाँ दूसरा कोई रहा ही नहीं ।
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*बेद भागवते६ देहुरा७, विप्र बिचार८ न देह ।*
*कहि जगजीवन नांम आचरण, हरिजन अलख बिदेह ॥५२॥*
(६. भागवते=भागवत महापुराण)   (७. देहुरा=देवमूर्ति या देवालय)   (८. विप्र बिचार=ब्राह्मणों का कर्मकाण्ड सम्बद्ध मत)
वेद, भागवत क्या बताता है, तो कहते हैं वेद, भागवत बिषै रस बताता है । प्रवृत्ति मार्ग में यह करो तो स्वर्ग मिलेगा, यह रस मिलेगा, ऐसे विषय रस का वर्णन करता है । तो वह क्यों मान्य किया जाए, वह तो बंधन में डालता है । संत जगजीवन जी कहते हैं, सच्चा प्रेम रस तो सतगुरु चवै, सतगुरु बताते हैं । जब सतगुरु के मुख से जस आइ, यानी यश आता है, हरि के प्रेम की बात आती है, वही सच्चा रस है ।
(क्रमशः) 

शनिवार, 24 अक्टूबर 2026

*हरिदासजी(हापा)*

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*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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*दादू साधन सब किया, जब उनमन लागा मन ।*
*दादू सुस्थिर आत्मा, यों जुग जुग जीवैं जन ॥*
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*मोतीदासजी*
घाटड़े की शाखा रूप स्थान बलदेवगढ़ के बावड़ी वाले स्थान के साधु मोतीदासजी को एक दिन एक गुप्त संत के दर्शन होने से सहसा वैराग्य हो गया । तब उन्होंने अपने भाई हनुमानदासजी को कहा— अब मैं सब कुछ छोड़कर एकान्त स्थान में ही बैठूंगा । फिर वे ग्राम के स्थान के एक कमरे में प्रविष्ट हो गये । अपनी शरीर संबंधी सभी क्रिया वहां ही करते थे । किसी से विशेष बात नहीं करते थे निरंतर भजन ही करते थे । कोई उनके पास आ भी जाता तो कह देते थे ‘दादूराम करो ।’ उक्त प्रकार उनका कार्यक्रम निर्विघ्न १४ वर्ष चलता रहा ।
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फिर उन्होंने अपने साधन धाम पर एक सत्संग सम्मेलन करवाया । संतों के भजन बोलने वाले संतों को निमंत्रण देकर बुलवाये । भक्तों को भी सत्संग सम्मेलन की सूचना दी । रात्रि को बहुत अच्छा जागरण हुआ । प्रातः दादूवाणी की पूजा आरती आदि कार्य किये सब के भोजन करने के पश्चात् सब आये हुये संतों को भेंट देकर कहा— अब आपको मेरी यह अन्तिम सत्यराम ही समझ लेना चाहिये । फिर तो मिलन हो या नहीं भी हो, अब मेरा शरीर केवल तीन मास ही रहेगा ।
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संतों ने भी समझ लिया कि भजनानन्दी संत हैं । इनको देहान्त के समय का ज्ञान हो गया है । फिर उन्होंने ठीक तीन मास होने पर वि. सं. २०३१ ज्येष्ठ सुदि ६ को देहत्याग दिया । आप अच्छे भजनानन्दी संत थे । आपकी समाधि बलदेवगढ़ में बावड़ी वाले स्थान में है । श्रद्धालु भक्त आप की समाधि को मानते हैं और भावनानुसार लाभ भी प्राप्त करते हैं । उक्त प्रकार प्रहलाददास जी और उनकी घाटड़ा की शिष्य परम्परा का जो परिचय प्राप्त हो सका है, वह यहां अंकित कर दिया गया है । इति श्री द्वितीय अध्याय समाप्त: २
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*अथ अध्याय ३*
*हरिदासजी(हापा)*
हरिदासजी हापा पूर्वाश्रम में आमेर नरेश भगवतदासजी के छठे पुत्र थे । १- मानसिंह २- माधवसिंह ३-सूरसिंह ४-वनमाली ५-कान्हा ६-हरिसिंह हापा थे । हरिसिंहजी हापाजी के नाम से अधिक प्रसिद्ध थे । जब दादूजी राहोरी पधारे थे तब दादूजी के दर्शन करने हापाजी भी राहोरी गये थे । ऐसा भी उल्लेख कहीं-कहीं मिलता है । ये कूर्मवंशी हापाजी जब बालक थे तब भी इनका व्यवहार वृद्धों के समान था । इन में हंसी करना आदि चपलता तो लेश मात्र भी नहीं थी ।
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फिर ये प्रहलाददासजी के शिष्य होकर हरिदास हो गये थे तब तो गुरुदेव प्रहलाददासजी के उपदेश के अनुसार साधन करके अपने कुल, कर्म, संपत्ति, बल आदि का अभिमान छोड़कर शम दम द्वारा मन इन्द्रियों को रोककर निरंतर हरि स्मरण ही करते रहते थे । इन्होंने गुरुवर प्रहलादजी के द्वारा प्राप्त योग युक्ति से मोक्ष पद को प्राप्त करने का अच्छा प्रयत्न किया था । इन्होंने निरन्तर निदिध्यासन करके ज्ञान प्राप्त कर लिया था । उस ज्ञान से अपने हृदय के अज्ञान को नष्ट करके अपनी वृत्ति को ब्रह्म स्वरूप में ही स्थिर रखते थे । कुछ ही वर्षों में हरिदासजी उच्च कोटि के संत हो गये थे । इन हरिदासजी के सेवक विशेष करके- कछवाहा, खींची, चौहान आदि क्षत्रिय ही अधिक थे ।
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*आमेर पधारना*
शनै: शनै: आपके अनेक शिष्य हो गये थे । ये आमेर नरेश के पुत्र होने पर भी सब भोगों का त्याग करके संत बने थे । अत: उनका वैराग्य साधना और शील स्वभाव आदि को देखकर स्वत: ही लोगों की रुचि इनका सत्संग करने की होती थी । इससे इनके शिष्य तथा अनेक सेवक साथ रहते थे । उस मंडल के सहित ही आप जहां तहां पवित्र स्थानों में भ्रमण करते रहते थे ।
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शिष्य होने के १२ वर्ष पश्चात् भ्रमण करते हुये अपनी जन्म भूमि आमेर के पास आ गये थे । अत: शिष्य मंडल के सहित जन्म भूमि का दर्शन करने आमेर पधारे । दिल्ली दरवाजे के पास के बाग में ठहरे । कथा, कीर्तन, सत्संग होने लगा । नगर की जनता सत्संग का लाभ लेने लगी । उस समय हरिदासजी के शिष्य(भक्त माल के कर्ता) राघवदासजी कथा करते थे ।
“शिष्य प्रशिष्य जन संग बहु, हरि आये आमेर ।
कथा दास राघव करे, सकल ज्ञान धन लेर ॥” वंशदीपिकाप्र. ५।
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फिर आमेर नरेश मानसिंह को ज्ञात हुआ कि-मेरे लघु भ्राता हरिसिंह हापा हरिदास बनने के पश्चात् प्रथम बार ही आमेर में आये हैं तब मानसिंह उनके दर्शन करने बाग गये । पास जाकर प्रणाम की । सत्यराम बोलकर फिर सामने बैठ गये । मानसिंह ने हरिदासजी का त्याग प्रत्यक्ष देखा । वे शरीर आच्छादन के लिये साधारण वस्त्र धारण किये हुये थे । उनके मस्तक पर साधन जन्य ब्रह्मतेज चमक रहा था । वाणी में अति मधुरता थी, स्वभाव परम शांत था, वे निरंतर हरि स्मरण कर रहे थे, प्रत्येक शब्द बोलते थे, तब ॐ हरि, राम आदि ईश्वर के नाम साथ बोलते ही थे । राजा मानसिंह को अपने लघु भ्राता का तप तेज देखकर अति प्रसन्नता हुई ।
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फिर आमेर नरेश मानसिंह ने हरिदासजी को नम्र भाव से प्रार्थना की—भगवन्! कुछ दिन अपने शिष्य मंडल के सहित राजभवन में विराज कर राजभवन के सभी प्राणियों को सत्संग का सुख प्रदान करें । कारण राजभवन की महिलायें यहां आपका सत्संग करने प्रतिदिन नहीं आ सकतीं हैं । आप राजभवन में विराजेंगे तब सभी को प्रतिदिन सत्संग का आनन्द प्राप्त होगा । राज परिवार आपके दर्शनों की इच्छा कर रहा है । अत: आप हम सब पर अनुग्रह करके अवश्य कुछ दिन राजभवन में विराजें ।
(क्रमशः)

*४९. भ्रम विधवंस कौ अंग ४५/४८*

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*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
*श्रद्धेय श्री Tapasvi @Ram Gopal Das की प्रेरणा से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Meta AI*
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*४९. भ्रम विधवंस कौ अंग ४५/४८*
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*बांम बिराजै बांम हरि, अबिगत परसै आइ ।*
*कहि जगजीवन तहां मिलि, तेज पुंज रन थाइ ॥४५॥*
जब हृदय में बांम यानी भक्ति रूपी वामा विराजती है, और बांम हरि यानी वामा सहित हरि, भक्ति सहित भगवान, दोनों हृदय में विराज जाते हैं, तब क्या होता है । तब अबिगत, जो आज तक कभी गत में नहीं आया, जो इन्द्रियों से परे है, ऐसा परमात्मा आकर परसै, स्पर्श करता है । जगजीवन कहते हैं, तहां मिलि, वहीं पर जीव और ब्रह्म का मिलन होता है, और तेज पुंज रन थाइ, वहाँ एक तेज का पुंज प्रकट हो जाता है, और साधक की सुरति वहीं थम जाती है, ठहर जाती है ।
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*तेज पुंज तन तेज मन, तेज सुरति अंग तेज ।*
*कहि जगजीवन तेज जन, तेज पुंज की सेज ॥४६॥*
जब उस तेज पुंज का दर्शन होता है, तब साधक की क्या दशा होती है, यह इस साखी में बताते हैं । उसका तन भी तेजमय हो जाता है, मन भी तेजमय हो जाता है, सुरति भी तेजमय हो जाती है, और अंग-अंग तेजमय हो जाता है । रोम-रोम में प्रकाश भर जाता है । जगजीवन कहते हैं, वह तेज जन, यानी तेज को प्राप्त हुआ जन, तेज पुंज की सेज पर ही विश्राम करता है । अब वह माया की सेज पर नहीं सोता, वह परम प्रकाश की सेज पर सोता है, उसी में जागता है ।
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*कहि जगजीवन अम्रित है मरै नहीं तन सोध ।*
*अम्रित भगति करि ऊधरै, रांम लहै परमोध ॥४७॥*
जगजीवन साहब कहते हैं, यह जो तेज पुंज है, यह जो राम नाम है, यही अमृत है । यह मरता नहीं है, यह अविनाशी है । पर लोग इसको बाहर खोजते हैं, जगजीवन कहते हैं तन सोध, अपने ही तन में, अपने ही शरीर में खोजो । यह अमृत तुम्हारे अंदर ही है । जो अमृत भगति करता है, यानी इस अमृत रूपी राम की भक्ति करता है, वह ऊधरै, यानी संसार से उद्धार पा जाता है, तर जाता है । और उसको रांम लहै परमोध, राम के परम बोध की प्राप्ति हो जाती है, उसे परम ज्ञान मिल जाता है ।
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*कहि जगजीवन अमर रहै, अमर रांम रटि जागि ।*
*अमर संजीवनि रस, अमर पिवै जन लागि ॥४८॥*
अंतिम साखी में फल बताते हैं । जगजीवन कहते हैं, जो अमर राम को रट कर जाग जाता है, जो सोते हुए संसार से जागकर राम नाम में लग जाता है, वह स्वयं अमर रहता है, उसको फिर मृत्यु नहीं मारती । अमर संजीवनि रस, जो मृत को भी अमर कर दे, ऐसा यह राम नाम रूपी रस है । इसको अमर पिवै जन लागि, अमर जन ही पीते हैं । जो राम में लग गए हैं, वही इस रस के अधिकारी हैं, और पीकर वे भी अमर हो जाते हैं ।
(क्रमशः)

शुक्रवार, 23 अक्टूबर 2026

*२९. साधु महिमा का अंग ~३७/३९*

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*🌷卐 सत्यराम सा 卐🌷*
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*२९. साधु महिमा का अंग ~३७/३९*
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*स्वर्ग लोक साधु सदन, वेत्ता१ वैकुण्ठ थान ।*
*रज्जब अज्जब ठौर ये, जहां भजन भगवान ॥३७॥*
साधक संत का स्थान स्वर्ग लोक है, ज्ञानी१ संत का स्थान वैकुण्ठ है, जहां भगवान का भजन होता है वे ये उक्त स्थान बड़े अदभुत हैं ।
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*हरि मंदिर साधु हृदय, जहां रहे निज अंग१ ।*
*सो चित्त चित्रशाला बनी, कवि कह सके न रंग ॥३८॥*
संत का हृदय ही हरि मन्दिर है, जहां अपने प्रिय१ परमात्मा रहते हैं, वह सन्त का चित्त जैसे कोई विचित्र चित्रशाला बनी हो ऐसा अनुपम दिखाई देता है, उसका प्रेमरूप रंग कुशल कवि भी नहीं कह सकता ।
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*चौदह विद्या चतुर ही, दहणारथ१ दे२ धाय३ ।*
*साधन कष्ट सभी करे, पर साधु हुआ न जाय ॥३९॥*
मनुष्य चौदह विद्याओं में भी चतुर हो जाता है, दहनार्थ१ अर्थात शरीर को जलाने के लिये भी दौड़३ लगाता२ है, अन्य भी सभी सभी साधन जन्य कष्ट सहन कर लेता है किन्तु उससे सन्त नहीं बना जाता ।
इति श्री रज्जब गिरार्थ प्रकाशिका सहित “२९. साधु महिमा का अंग” समाप्त ॥
(क्रमशः)

गुरुवार, 22 अक्टूबर 2026

*२९. साधु महिमा का अंग ~३३/३६*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*२९. साधु महिमा का अंग ~३३/३६*
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*लेखे१ में सब आइया, जे कछु उपज्या आय ।*
*रज्जब राम अलेख हैं, अरु साधु लिख्या न जाय ॥३३॥*
जो कुछ भी सृष्टि में उत्पन्न होकर दृष्टि में आये हैं, उन सबका यश लिखने१ में आ गया है किन्तु राम और साधु इन दोनों की महिमा अलेख है अर्थात इनका यश पूर्ण रूप से लिखा नहीं जाता ।
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*रज्जब अगह अगाध अंग१, सांई साधु दोय ।*
*और सु बंधे बंदि में२, चौरासी लख जोय ॥३४॥*
चौरासी लक्ष योनियों में जो भी उत्पन्न हुये हैं वे सभी तो सीमा के बंधन२ में बंधे हुये हैं अर्थात उनके गुण तथा यश पूर्ण रूप से कहे जा सकते हैं किन्तु परमात्मा और संत इन दोनों के लक्षण१ अन्य से ग्रहण नहीं किये जाते तथा दोनों की महिमा भी अगाध है ।
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*वृक्ष बीज वसुधा पड़हिं, बीज रहै वपु जाय ।*
*सत्य साधु गति१ शक्ति२ त्यों, नर देखो निरताय३ ॥३५॥*
वृक्ष और बीज दोनों पृथ्वी पर पड़ते हैं, उनमें वृक्ष तो नष्ट हो जाता है किन्तु बीज रह जाता है, वैसे ही हे नरो ! विचार३ करके देखो, सच्चे संत की मुक्ति१ होने पर भी उनकी ज्ञान२-शक्ति ग्रन्थों द्वारा पृथ्वी पर रह जाती है ।
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*अनेकों मिल एक की, सरभरि१ करी न जाय ।*
*रज्जब साधु सूर सम, पर नक्षत्र निरताय२ ॥३६॥*
संत सूर्य के समान हैं, अन्य नर अन्य नक्षत्रों के समान हैं, विचारों२ जैसे अनेक नक्षत्र मिलकर एक सूर्य के बराबर नहीं हो सकते, वैसे ही अनेक नर मिलकर भी एक संत की समता१ नहीं कर सकते ।
(क्रमशः)