मंगलवार, 22 सितंबर 2026

युगलबाईजी की भेंट के सवैये

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷*卐 श्री दादूदयालवे नम:  卐*🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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*आत्म बोधी अनुभवी, साधु निर्पख होइ ।*
*दादू राता राम सौं, रस पीवेगा सोइ ॥*
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*युगलबाईजी की भेंट के सवैये =* 
अब युगलबाईजी पर छोटे सुन्दरदासजी की श्रद्धा का परिचय देते हैं, देखिये~ मनहर~
दादूजी के पीछे तो चलाई है गरीबदास, 
ताके पीछे बाईजी चलावत है चौगनी । 
जोई आवे भेट भाव कोउ लेहु कोई खाय, 
राखिये को नाहीं चाव देने ही की सुनी ॥ 
अति ही गंभीर धीर शीतल ज्यों गंगनीर, 
पायो है जु पुरो पीर परम महामुनी । 
सुन्दर विराजै जोर दरबार दोउ ओर, 
संत बैठे-ठौर ठौर दर्शन करे दुनी ॥१॥ 
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उक्त मनहर से ध्वनित होता है कि गरीबदासजी के शिष्य केवलरामजी ने जब गद्दी त्याग दी थी तब बाईजी ने गरीबदासजी से भी चौगनी आचार्य की रीति नीति का निर्वाह किया था । आप गद्दी के बराबर बैठ कर आचार्य का सब कार्य करती रहीं थीं । जब संतों का दरबार लगता था तब गद्दी के दोनों ओर बाइयां बैठकर समाज सम्बन्धी सब विचार किया करती थीं और सबको आचार्य के समान ही आज्ञा देकर समाज को स्थिर रखा था । 
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भगति मुकती भरपूर है भंडार मांहीं, 
रिद्धि और सिद्धि कोउ चाहै सो तहां लहै । 
गुण तो समूह संग ठौर-ठौर राग रंग, 
प्रेम मांहिं भीजे अंग गंग सो गिरा बहै ॥ 
संतन को व्यूह सब आगे बैठो देखियत, 
सभाजी विराजमान सुन्दर कहा कहै । 
वरष वरष प्रति होय जात जै जै कार, 
दादूजी के दरबार दौलत सदा रहै ॥२॥ 
उक्त मनहर में सभाबाईजी के संचालन समय की दादूद्वारे की स्थिति का परिचय दिया है ।
देश देश ही तैं दौरे आवत सेवक जन, 
दादूजी के दरबार देखन मिलाप जूं । 
जैसे काशी कुरुक्षेत्र मथुरा प्रयाग हेत, 
जात है जगत सब काटन का पाप जू ॥ 
परम पुनीत ठौर ऐसो न तीरथ और, 
जहां के आये से जांहिं संताप जू । 
सुन्दर शोभा अनन्त निशि दिन गावें संत, 
बाईजी विराजें गुरु गादी आपै आप जू ॥३॥ 
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उक्त मनहर में नारायणा दादूधाम को परम पुनीत तीर्थ बताते हुए कहा है कि-बाईजी को आचार्य के अभाव में गादी का संरक्षण करने के लिये समाज ने गादी के पास नहीं बैठाया था किन्तु बाईजी स्वयं ही अपने तप तेज से तब तक गादी का संरक्षण करती थीं, जब तक समाज आचार्य बैठाने पर एक मत नहीं हुआ था । यही अर्थ उक्त मनहर के “बाईजी विराजै गुरुगादी आपै आपजू” से ध्वनित होता है । 
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जब समाज मसकीनदासजी को आचार्य पद पर बैठाने में एक मत हो गया तब बाईजी सभाकुमारीजी अपने साधन धाम बाईजी की पालकां में बैठ कर निर्गुण ब्रह्म की भक्ति करने लग गई थीं । रूपकुमारीजी तो सभाकुमारीजी की अनुगामिनी ही थीं, वह भी उनके साथ ही रहती थीं । दोनों बाईजी की पालकां में ही भजन करती थीं । 
(क्रमशः)

*४७. अध्यातम कौ अंग ५३/५६*

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*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
*श्रद्धेय श्री Tapasvi @Ram Gopal Das की प्रेरणा से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Meta AI*
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*४७. अध्यातम कौ अंग ५३/५६*
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कहि जगजीवन कंवल मंहि, करम रहित करतार ।
उलटि सुरति१ तहां राखिये, निरखि निरंजन सार ॥५३॥
१. सुरति=स्मृति ।
जगजीवन जी कहते हैं, हृदय-कमल में वह करतार बैठा है जो कर्मों से परे है । अपनी सुरति को संसार से उलट कर वहाँ लगाओ और उस सार रूपी निरंजन को देखो ।
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कहि जगजीवन च्यारि जुग, हरि चरचा चित्त राखि ।
हरि चिंतामणि चरचिये, प्रेम सुधारस चाखि ॥५४॥
चारों युगों में बस हरि की चर्चा को ही चित्त में रखो । उस चिंतामणि रूपी हरि का स्मरण प्रेम के अमृत रस को चखते हुए करो ।
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छप्पन भोग लगाइ तहां, जहां निरंजन देव ।
कहि जगजीवन आतमा, परमातम की सेव ॥५५॥
छप्पन भोग वहीं लगते हैं जहाँ निरंजन देव है । आत्मा से परमात्मा की सेवा ही सच्चा भोग है ।
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एहि जुगति अरपै भगति, एहि भाव एहि भेद ।
कहि जगजीवन जागि जन, बिन स्वासा पढ़ि बेद ॥५६॥
इसी युक्ति से, इसी भाव और भेद से भक्ति अर्पण करो । हे जन जागो और बिना श्वास के ही वेद को पढ़ो, अर्थात अजपा जाप करो ।
("बिन स्वासा पढ़ि बेद" का अर्थ, किताब वाला वेद पढ़ना नहीं है । इसका अर्थ है अजपा जाप । 
१. हम लोग माला से या मुँह से जो जाप करते हैं, उसमें श्वास खर्च होती है । 
२. जब सुरति भीतर गगन मंडल में टिक जाती है, तब जाप अपने आप चलने लगता है - बिना जपे । 
३. वहाँ श्वास की डोरी टूट जाती है, प्राण स्थिर हो जाते हैं । 
उसी स्थिरता में वेद का असली भेद समझ में आता है । वही चारों वेदों का सार है - सोऽहम्, तत्त्वमसि । जगजीवन जी महाराज कहना चाहते हैं कि - बाहर के श्वास को रोक कर नहीं, बल्कि भीतर की सुरति को स्थिर करके उस धुन को सुनो जो बिना बजाए बज रही है । वही बिना श्वास का वेद-पाठ है । जैसे मछली पानी में रहते हुए पानी को नहीं जपती, बस उसी में रहती है - वैसे ही जीव राम में रह जाता है)
(क्रमशः) 

सोमवार, 21 सितंबर 2026

*युगल बाइयों का दृढ निश्चय =*

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*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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*दादू पूरणहारा पूरसी, जो चित रहसी ठाम ।*
*अन्तर तैं हरि उमग सी, सकल निरंतर राम ॥*
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*= पद =* 
आप आपणे में खोजो रे भाई, वस्तु अगोचर गुरु लखाई ॥ टेक ॥ 
ज्यौं मही विलोये माखण आवे, त्यों मन मथियाँ तैं तत पावे ॥१॥ 
काष्ट हुताशन रह्या समाई, त्यों मन मांहि निरंजन राई ॥२॥ 
ज्यों अवनी में नीर समाना, त्यों मन माहिं साँच सयाना ॥३॥ 
ज्यों दर्पण के नहिं लागे काई, त्यों मूरति मांहीं निरख लखाई ॥४॥ 
सहजैं मन मथिया तैं तत पाया, दादू उन तो आप लखाया ॥५॥ 
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उक्त उपदेश के अनुसार साधना करके युगल बाइयाँ गार्गी सुलभा के समान योगिनियां हो गई थीं और आजन्म शीलव्रत से ही रही थीं । आमेर में वहाँ पंडितों ने बाइयों का विवाह कराने के लिये आंदोलन किया था तथा आमेर नरेश मानसिंह को प्रेरित किया था और आग्रह किया था कि आप दादूजी को कहकर बाइयों का विवाह करावें । 
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पंडितों के आग्रह से आमेर नरेश मानसिंह ने दादूजी महाराज से प्रार्थना की कि स्वामिन् ! बाइयों का विवाह संस्कार तो करा ही देना चाहिये । तब दादूजी महाराज ने कहा~ बाइयों से पूछ लो । फिर राजा मानसिंह ने बाइयों के पास जाकर उनसे प्रार्थना की~ बाइयों ! आपको विवाह संस्कार अवश्य करा ही लेना चाहिये । तब राजा को बाइयों ने दादूजी महाराज की यह साखी सुनाई~ 
‘जे था कंत कबीर का, सोई वर बरहूँ । 
मनसा वाचा कर्मना, मैं और न करहूँ ॥ 
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कहा भी है~
नृप पूछी आमेर के, बाइयों को दो व्याहि । जो
पति वरयो कबीरजी, सो करि वियो१ न जाहि ॥  
पूर्वकाल के कबीरादि संतों ने जो वर वरा था, उसी परमात्मा को हम वर बनायेंगी । हम मन वचन कर्म से कहती हैं~ अन्य१ किसी को भी स्वामी नहीं बनायेंगी । हमारा स्वामी तो एक परब्रह्म परमात्मा ही है । 
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*युगल बाइयों का दृढ निश्चय =* 
फिर सभाकुमारीजी ने कहा~ राजन्  ! हमारे आगे यह प्रस्ताव रखने से पहले आपको कुच्छ विचार कर लेना चाहिये था । यह प्रस्ताव यदि संसार दशा की बाइयों के पास रक्खा जाता तब तो उचित ही समझा जाता किन्तु हमारे आगे रखना व्यर्थ है, हमारा मन तो परब्रह्म के चिन्तन में लीन रहता है । हमारे मन में विषय सुख संबन्धी संकल्प ही नहीं है । हमें विषयानन्द से अति श्रेष्ठ भजनानन्द मिल रहा है । 
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अम्रित पान करने वाले खाटी छाछ से बनी हुई राबड़ी पीने की इच्छा करेंगे क्या ? वैसे ही जिनको भजनानन्द प्राप्त होता है, वें विषय सुख की इच्छा कभी भी नहीं करते हैं । विषय सुख संबन्धी विचार प्रभु भक्ति से हीन प्राणियों में ही उठते हैं । प्रभु भक्ति ह्रदय में आने पर तो विषय सुख से उपराम हो जाता है । यदि विषय सुख श्रेष्ठ होता तो अनेक राजा महाराजाओं ने उसे त्याग करके भगवद् भक्ति सुख के लिये राज्य का भी त्याग करके वनवासी नहीं बनते । 
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आपको जो इस कार्य में प्रवृत्त करने वाले हैं, वे तो विषय जल की मीन बने हुये हैं । उनको विषय से भिन्न कुछ नहीं भासता । वे संसार दशा के लोग हैं किन्तु हमारी स्थिति उनसे भिन्न ही है । जो सांसारिक प्राणी होते हैं, वे अपने मन के समान ही भक्तों का मन भी समझते हैं, यह उनका अज्ञान ही है । भक्तों के मन में अज्ञानियों के समान विचार नहीं होते हैं । भक्तों के मन में विवेक होता है । वे भलीभांति समझते हैं कि ये सांसारिक विषय सुख हमने प्रति जन्म में भोगे हैं, इनसे आज तक तृप्ति नहीं हुई तो अब क्या होगी । 
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भोग भोगने से तो भोगों की आशा अधिक ही बढ़ती है । घृत डालने से अग्नि शान्त नहीं होती है उलटी बढ़ती ही है । अतः वे संसार के विषय सुख भक्तों के आगे कोई महत्व नहीं रखते हैं । भक्तों को नीरस प्रतीत होते हैं ।इससे उनका त्याग करके ही भक्त लोग भजनानन्द प्राप्त करते हैं और सांसारिक प्राणी तो कुत्ते के समान होते हैं । जैसे कुत्ता खाकर उलटी कर देता है फिर उस उलटी को भी खा जाता है, वैसे ही ये संसार के सभी विषय प्राणी के भोगे हुये हैं । प्रत्येक जन्म में इनको भोगता आया है फिर भी उन झूंठे पदार्थों को ही भोगता रहता है और अपने मन में फूलता रहता है । 
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अतः हमारे विवाह संबन्धी विचार तुम मन से निकाल दो और अपने करने योग्य कार्य करो । किसी के बहकाने से बिना विचार ऐसे प्रश्न नहीं उठाओ । फिर दोनों बाइयां राजा को सिंह रूप में दीखने लगी, तब राजा डर गया । इससे दोनों बाइयों को प्रणाम करके राजा दादूजी के पास आ गया । इस उकर प्रसंग से सिद्ध होता है कि बाइयां योग युक्त तथा दृढ़ निश्चय वाली थीं । युगल बाइयों ने अपना साधनधाम नारायणा ही रखा था । आपका स्थान नारायणा दादूद्वारे में बाईजी की पालकां के नाम से प्रसिद्ध है ।
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केवलरामजी जब गद्दी का मोह छोड़कर अलग हो गये थे, तब अनेक साधु गद्दी पर बैठने को तैयार हुये थे । उस समय सभाकुमारीजी बाईजी ने ही गद्दी की रक्षा की थी । सभाकुमारीजी ने साधु समाज में खड़े होकर कहा था कि~ गद्दी का अधिकारी होगा और समाज एक मत होकर जिसे बैठायेगा, वही गद्दी पर बैठ सकेगा । बाईजी का उक्त वचन सुनकर सब शांत हो गये थे । कारण- बाईजी का तप का तेज ऐसा ही था, वे महान् महात्मा थीं । फिर जब समाज एक मत होकर मसकीनदासजी को बैठाने में राजी हो गया  तब ही आपने गद्दी का संरक्षण छोड़ा था । इससे सूचित होता है कि बाईजी की आज्ञा को सब मानते थे । कारण वे महान् संत थीं । 
(क्रमशः)

*४७. अध्यातम कौ अंग ४९/५२*

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*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
*श्रद्धेय श्री Tapasvi @Ram Gopal Das की प्रेरणा से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Meta AI*
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*४७. अध्यातम कौ अंग ४९/५२*
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कहि जगजीवन खोजि तन, खसम३ लहै तजि खाख४ ।
खिजमत कीजै खरी५ खरि, तौ तन कोड़ी लाख ॥४९॥
(३. खसम=पति)   (४. खाख=धूल या राख)    (५. खिजमत खरी खरि=शुद्ध निष्कलंक सेवा)
संत जगजीवन जी कहते हैं, इस शरीर के अंदर ही खोज कर अपने मालिक, अपने पति रूपी परमात्मा को पा लो, और इस शरीर की धूल, राख जैसी ममता को छोड़ दो । अगर तुम शुद्ध, निष्कलंक भाव से उसकी सेवा करोगे, तो ये कौड़ी जैसा तुच्छ शरीर भी लाखों-करोड़ों जैसा अनमोल हो जाएगा ।
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कहि जगजीवन गाइ गुन, गहरी बात बिचारि ।
गगन मंडल मैं मगन ह्वै, गुनसागर गहि जारि ॥५०॥
संत जगजीवन जी कहते हैं, हरि के गुणों को गाओ और इस गहरी बात पर विचार करो । इस संसार से ऊपर उठकर, गगन मंडल में मगन हो जाओ, और उस गुणों के सागर परमात्मा को पकड़कर, संसार की माया को जला डालो ।
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कहि जगजीवन धणी कर, काया धासै नाम ।
जो घर घेरै पंच६ ऐ, तौ रस प्यावै राम ॥५१॥
(६. पंच=पाँचों इन्द्रियों पर संयम)
संत जगजीवन जी कहते हैं, जो अपने मालिक राम के नाम से इस काया को सुवासित कर लेता है, और जो अपने घर रूपी शरीर में पाँचों इंद्रियों को वश में करके रखता है, तो राम स्वयं उसे अपने प्रेम का रस पिलाते हैं ।
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कहि जगजीवन नाद मंहि, निहचल राखै ब्यंद ।
जोग जुगति जीवन ग्रहै, तौ जक७ पावै ज्यंद८ ॥५२॥
(७. जक=संतोष, तृप्ति)    (८. ज्यंद=प्राण)
संत जगजीवन जी कहते हैं, जो साधक भीतर के अनहद नाद में अपने बिंदु, अपने मन को स्थिर रखता है, और योग की युक्ति से जीवन को संभालता है, तो उसके प्राणों को सच्चा संतोष और तृप्ति मिल जाती है ।
(क्रमशः)  

रविवार, 20 सितंबर 2026

*= युगलबाईजी थांभा =*

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*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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*श्रम न आवै जीव को, अनकिया सब होइ ।*
*दादू मारग महर का, बिरला बूझै कोइ ॥*
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*अथ अध्याय ६* 
*= युगलबाईजी थांभा =* 
खालसे में तीसरा और चौथा थांबा युगलबाईजी का है । ईश्वर की प्रेरणा से दादूजी द्वारा दिए गये लवंग एवं काली मिर्च प्रसाद से वि. सं. १६३६ श्रावण शुक्ला द्वितीया को युगल{एक साथ दो} बाइयों का जन्म दामोदर व्यास की पत्नि उमा के गर्भ से हुआ था, इससे उनकी संज्ञा युगल बाई प्रसिद्ध थी । वैसे उनके नाम सभाकुमारी और रूप- कुमारी थे । आगे चल कर उनको संतगण रामकुमारी, श्यामकुमारी नामों से बोलते थे । 
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लवंग फल स्वरूप में द्विज नारी ने प्राप्त कर गर्भ धारण किया और समय पाकर क्रमशः गरीब व मसकीन नामक बालकों को जन्म दिया, फिर एक-दो वर्ष के अन्तराल के बाद काली मिर्च प्रसाद- प्रभाव से नौवें मांस युगल कन्याऔं को जन्म दिया । गुरुदेव की कृपा से द्विज दामोदर के घर सुन्दर चार सन्ताने खेलने लगी । संत-प्रसाद पाकर उसके आनन्द का वारपार नहीं था ।

अविगत अगोचर परमेश्वर की लीला कौन जान सकता है? उसके गुणों का व्याख्यान कौन कर सकता है? जब साधारण बाजीगर की लीला कोई नहीं समझ सकता, तो फिर श्री हरि जैसे जगत् को नचाने वाले महान् बाजीगर की माया साधारण जन भला कैसे जान सकता है । जैसे ब्रह्मा की मानसिक संकल्प शक्ति से सनकादिक उत्पन्न हु ए। वैसे ही दादूजी महाराज के (वरदान) प्रसाद से विप्र कन्या उमा ने चार सन्ताने गरीबदास, मस्कीन दास, रामा और श्यामा बाईयां वरदान स्वरूप प्रगट हुए। विक्रम समवत् १६३२ में गरीब दास और १६३४ में मस्कीन दास, १६३६ में दोनों युगल कन्यायें(रामाकुमारी व श्यामा कुमारी) ने जन्म लिया । 
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भगवत स्वरूप दादू जी महाराज द्वारा देव कुसुम (लवंग) प्रसाद व वरदान पाकर द्विज सेवक दामोदर एवं उमा अत्यन्न हर्षित रहने लगे । उक्त चारों सन्तान हरि आज्ञा से दादू जी के वर देने पर महा योगेश्वर दादू जी की इच्छा मात्र से हुई थी । कैसे? जैसे ब्रह्मा ने सनकादि आदि की सृष्टि मन की इच्छा मात्र से ही मानस सृष्टि की थी और विश्वामित्र ने अपनी इच्छा से तपो बल द्वारा सृष्टि रची थी । 
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एक हजार कन्याओं के सहित अद्भूत विमान को कर्दम ने मानसी सृष्टि तपोबल से ही की थी । वसिष्ठ ने नभ में मानसी सृष्टि रूप कुटिया तपो बल से ही रचि थी । मत्सेन्द्रनाथ जी ने गोरक्षनाथ की उत्पत्ति तपो बल से मनके द्वारा ही की थी । युवनाश्व के पेट से मानधाता का जन्म इतिहास में अति प्रसिद्ध है । महाभारत वनप. १२६, २७, २८ । वैसे ही दादू जी ने भी भगवत् आज्ञा से उक्त चार व्यक्ति योग रूप तपोबल से ही उत्पन्न किये थे । 
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योगियों में यह सामर्थ्य हो इसमें तो कहना ही क्या है ? राक्षस भी अपनी मायिक सृष्टि रच देतें हैं । द्रोपदी और धृष्टद्युम्न भी बिना बिन्दु के ही उत्पन्न हुये थे । वे मायिक भी नहीं थे । मत्सेन्द्रनाथ भी योग बल से मत्स्य से मानव बने थे । यह इतिहास पुराणादि में प्रसिद्ध है । ईश्वर की तथा ब्रह्मरूप संतों की शक्ति विचित्र होती है । उनके लिए ऐसी बात असम्भव नहीं है ।
(क्रमशः) 

*४७. अध्यातम कौ अंग ४५/४८*

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*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
*श्रद्धेय श्री Tapasvi @Ram Gopal Das की प्रेरणा से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Meta AI*
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*४७. अध्यातम कौ अंग ४५/४८*
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कहि जगजीवन सांस मंहि, रांम निरंजन वास ।
ज्यूं चात्रिग२ जल बूंद कों, यों जन पिव पिव प्यास ॥४५॥
(२. चात्रिग=चातक पक्षी, जो स्वाति नक्षत्र में मेघवृष्टि का जल ही पीता है)
संत जगजीवन जी कहते हैं साँसों में ही निरंजन राम का वास है । जैसे चातक पक्षी को स्वाति की बूंद की प्यास लगी रहती है, वैसे ही भक्त जन पिय-पिय की रट लगाए रहता है ।
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कहि जगजीवन खेलतां, खाता पीता राम ।
हंसतां रोवतां बोलतां, एक निरंजन नाम ॥४६॥
संत जगजीवन जी कहते हैं, ज्ञानी भक्त के लिए तो खेलते हुए, खाते-पीते हुए, हँसते हुए, रोते हुए, बोलते हुए - हर क्रिया में बस एक ही निरंजन राम का नाम रहता है । वह हर काम करते हुए भी राम को नहीं भूलता, उसका हर श्वास ही राम-नाम हो जाता है ।
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कहि जगजीवन जोग मंहि, भाव भगति रस भोग ।
ए अध्यातम अलख हरि, तिहि तन हरष न सोक ॥४७॥
संत जगजीवन जी कहते हैं, सच्चा योग तो वही है जहाँ भाव-भरी भक्ति का रस भोगा जाए । जो अध्यात्म के द्वारा उस अलख हरि को पा लेता है, उसके शरीर में न तो ज्यादा खुशी रहती है, न ज्यादा दुःख । वह हर हाल में एक समान रहता है ।
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कहि जगजीवन कंवल मंहि, किरण अनंत कहंत ।
केवल करता बिसंभर, अबिगत आप रहंत ॥४८॥
संत जगजीवन जी कहते हैं, हमारे हृदय-कमल के अंदर उस परमात्मा की अनंत किरणें चमक रही हैं । वही एक करतार सबका भरण-पोषण करने वाला है, वही बिसंभर है, जो खुद अव्यक्त रूप से सबमें रहता है ।
(क्रमशः) 

शनिवार, 19 सितंबर 2026

*४७. अध्यातम कौ अंग ४१/४४*

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*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
*श्रद्धेय श्री Tapasvi @Ram Gopal Das की प्रेरणा से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Meta AI*
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*४७. अध्यातम कौ अंग ४१/४४*
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कहि जगजीवन संजमी, हरी भजि रांम अगाध ।
सात द्वीप नौ खंड मैं, एक कोइ कै आध ॥४१॥
संत जगजीवन जी कहते हैं संयमी बन कर अगाध राम-हरि को भजो । सात द्वीप और नौ खंड में ऐसा कोई बिरला ही है जो आधा भी भजता हो, अर्थात् सच्चा भक्त बहुत ही दुर्लभ है ।
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कहि जगजीवन जुगत मंहि, भाव भगति जस जोग ।
रांम ह्रिदै महिं राखि हरि, कदै न व्यापै रोग ॥४२॥
संत जगजीवन जी कहते हैं युक्ति के साथ भाव-भक्ति जैसा योग करो । हरि राम को हृदय में रखो, तो कभी कोई रोग नहीं व्यापेगा ।
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कहि जगजीवन तेज मंहि, सेज तिरै ज्यूं नांव ।
भगति अखंडित सो करै, जा के पूरे भाव ॥४३॥
संत जगजीवन जी कहते हैं तेज के भीतर वह इस प्रकार है जैसे पानी पर नाव तिरती है । अखण्ड भक्ति वही कर पाता है जिसके भाव पूरे होते हैं ।
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कहि जगजीवन उनमनी१, उपजै जोग जुगति ।
कोइ जन जाणैं जौहरी, हरि भजि हरि की गति ॥४४॥
(१. उनमनी=चित्त की एकाग्र अवस्था)
संत जगजीवन जी कहते हैं उनमनी अवस्था में योग की युक्ति उपजती है । कोई जौहरी जैसा पारखी जन ही हरि को भज कर हरि की गति को जानता है ।
(क्रमशः) 

शुक्रवार, 18 सितंबर 2026

*२८. साधु असाधु परीक्षा का अंग ~५/८*

*🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏*
*🌷卐 सत्यराम सा 卐🌷*
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*२८. साधु असाधु परीक्षा का अंग ~५/८*
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*आकार भार दौन्यों द्रसहिं, कंकर पुन: कपूर ।*
*उभय चढे आकाश दिशि, उभय मधि धूर ॥५॥*
ककंर तथा कपूर में आकार और भार दोनों ही दिखाई देते हैं किन्तु कपूर का तो आकार-भार आकाश में चढ़ता है और ककंर का पृथ्वी में मिल कर धूलि हो जाता है, वैसे ही साधु का आत्मा ब्रह्म में लय हो जाता है, असाधु का आकार-भार संसार में रहता है ।
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*आभे१ अवनि२ सु देखिये, त्यों साधु संसार ।*
*एक समाये शून्य में, एक रहै आकार ॥६॥*
जैसे बादल१ और पृथ्वी२ का आकार दिखाई देता है, वैसे ही साधु और सांसारिक असाधु प्राणी का आकार दिखाई देता है, किन्तु जैसे बादल का आकार आकाश में मिल जाता है, वैसे ही साधु ब्रह्म में मिल जाता है और जैसे आकार बना रहता है, वैसे ही असाधु का संसार बना रहता है ।
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*पाणी अरु पाषाण के, पर्वत पृथ्वी माँहिं ।*
*एक समाये सूर में, इक अवनि सु छाडे नाँहिं ॥७॥*
पृथ्वी में बर्फ और पत्थर दोनों ही प्रकार के पर्वत हैं किन्तु बर्फ के पर्वत तो सूर्य में समा जाते हैं, अर्थात गलकर किरणों द्वारा ऊँचे चढ़ जाते हैं, किन्तु पत्थर के पृथ्वी को नहीं छोड़ते, वैसे ही संत तो ब्रह्म में मिल जाते हैं किन्तु असंत संसार को नहीं छोड़ते ।
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*रज्जब पानी पृथ्वी पर पड़या, पृथ्वी पानी माँहिं ।*
*ज्यों सलिल समाना शून्य में, त्यों अवनि आकाश न जाँहिं ॥८॥*
जल पृथ्वी पर पड़ा है और पृथ्वी जल में है, किन्तु जैसे जल आकाश में चला जाता है, वैसे ही पृथ्वी आकाश में नहीं जाती, वैसे ही संत-असंतों के शरीर भी परस्पर मिले रहते हैं, किन्तु संत तो ब्रह्म में लय हो जाते हैं असंत नहीं होते ।
(क्रमशः) 

*४७. अध्यातम कौ अंग ३७/४०*

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*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
*श्रद्धेय श्री Tapasvi @Ram Gopal Das की प्रेरणा से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Meta AI*
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*४७. अध्यातम कौ अंग ३७/४०*
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सहंस किरण३ सप्त बिराजै, कोटि किरण रवि तेज ।
कहि जगजीवन मद्धि जन, खेलैं* पिव की सेज* ॥३७॥
{३. सहंसकिरण=सहस्त्र किरण(हजार किरणों वाला)}
(**-**. खेलैं पीव की सेज=मध्यम मार्गी साधक ही ब्रह्मसाक्षात्कार की साधना कर सकते हैं)
जहाँ हजार किरणों वाले चंद्रमा और करोड़ किरणों वाले सूर्य का तेज विराजमान है । संत जगजीवन जी कहते हैं मध्यम मार्ग के साधक ही वहाँ प्रियतम की सेज पर अर्थात ब्रह्म के साक्षात्कार में खेलते हैं ।
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रेचक पूरक कुम्भक४ त्राटक५, तुरीया ध्यांन६ समाधि ।
कहि जगजीवन सब लहै, अकाल पुरिष आराधि ॥३८॥
(४. ४-४. रेचक, पूरक, कुम्भक=प्राणायाम की क्रियाएँ)
(५. त्राटक=हटयोग के अनुसार किसी बिन्दु पर दृष्टि को स्थिर करना)
(६. तुरीय ध्यान=चतुर्थ ध्यान)  
रेचक, पूरक, कुम्भक, त्राटक और तुरीय ध्यान समाधि । संत जगजीवन जी कहते हैं ये सब साधन अकाल पुरुष की आराधना से ही प्राप्त होते हैं ।
ए अध्यातम अगम गति, कोइ जन जांनै जांन ।
कहि जगजीवन सबद मैं, सोहं सबद समांन ॥३९॥
यह अध्यात्म की अगम गति है, कोई बिरला ज्ञानी जन ही इसे जानता है । संत जगजीवन जी महाराज कहते हैं शब्द में ही सोहं शब्द समाया हुआ है ।
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सोहं हंसा जाप जपि, हरिजन परसै रांम ।
कहि जगजीवन बसत मैं, मस्त रहै सब ठांम ॥४०॥
सोहं-हंस का जाप जप कर हरि का जन राम को प्राप्त कर लेता है । संत जगजीवन जी कहते हैं वह संसार में रहते हुए भी सब जगह मस्त रहता है । 
(सोहं-हंस का जाप = यह कोई माला से किया जानेवाला जाप नहीं है, यह तो हमारी साँस के साथ अपने आप चल रहा है । 
१. हंस क्या है ? जब हम साँस लेते हैं तो हं की ध्वनि होती है, और छोड़ते हैं तो स: की ध्वनि होती है । इसी हंस: - सोऽहम् को उल्टा करने से सोहं बनता है । शास्त्रों में इसे अजपा जाप कहते हैं - जो बिना जपे ही जपा जा रहा है । दिन-रात में २१६०० बार यह अपने आप चलता है ।
२. सोहं का अर्थ क्या है ? सो = वह(परमात्मा) अहं = मैं हूँ, अर्थात् "वह ब्रह्म मैं ही हूँ" ।
३. साधना कैसे होती है ? साधक कुछ नहीं जपता, वह केवल होशपूर्वक अपनी आती-जाती साँस को देखता है । साँस अंदर आई तो सुना - सो, साँस बाहर गई तो सुना - हं । संत जगजीवन जी कहते हैं, जब यह सुना-सुनी पक्की हो जाती है, तब - हरिजन परसै राम - जीव राम को छू लेता है । फिर उसे जपना नहीं पड़ता, वही जाप अपने आप होने लगता है । इसी को सहज अवस्था कहते हैं ।)
(क्रमशः)

*रामभजनजी =*

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*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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*जीवित मृतक साधु की, वाणी का परकास ।*
*दादू मोहे रामजी, लीन भये सब दास ॥*
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*विदुरवाणी =* 
संत विदुरजी की वाणी भी है । मुझे बनादासजी खालसा के संत नारायणा दादूधाम वालों ने कुछ पत्र दिये थे । उनके अन्त में २१८ पद्य संख्या लिखी है । इनमें दोहे, सवैया, कवित्त आदि छंद हैं । यहां एक उदाहरण दिया जाता है, देखिये—कवित्त- 
सत्य है सिद्धांत वाको झूट ही बतावे नर, 
उर में अज्ञान जाके ज्ञान नहीं होत है । 
वाद रु विवाद करे सत्य को न माने सत्य, 
मन है मलीन मूढ़ खात बहु गोत है ॥ 
कामना के भाव से भजनकर विपरीत, 
निज रूप लखे बिना जीवन को खोत है । 
विदुर विचार कहै वाको दुख मिटे कैसे, 
सतगुरु महर करे मन पाप धोत है ॥३१॥ 
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१७ वें *आचार्य रामलालजी* के खालसे में कोई नहीं है । इनका कोई शिष्य स्थानधारी नहीं हुआ है । इससे इनका खालसा नहीं चला । १८ वें *आचार्य प्रकाशदेवजी* के शिष्य तो कई हुये थे किन्तु स्थानधारी नहीं होने से पृथक परंपरा के रूप में नहीं चली । १९ वें *आचार्य हरिरामजी* वर्तमान में हैं । अतः इनके खालसे के विषय में अभी तो कुछ लिखने का प्रसंग ही नहीं है । 
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*रामदासजी =*
रामदासजी मसकीनदासजी के थांमे के स्थान जोधपुर में दीक्षित हुये थे । आप अच्छे विद्वान् संत थे । जोधपुर में आपके समान आपके समय में साधुओं में अन्य कोई विद्वान् नहीं था । आप अच्छे भजनानन्दी महात्मा हो गये हैं । 
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*रामभजनजी =* 
सनोद्या(खंडेल के पास) में निरंजनदासजी खालसा वालों के शिष्य रामभजनजी अच्छे भजनानन्दी संत सनोद्या के एक नाडा पर हुये हैं । वह नाडा रामभजनजी का ही कहलाता है । भैसलाणा में अमृती के वास में रामभजनजी के भजन करने की मंढी है । सनोद्या में नाड़ा पर आपकी समाधि है । समाधि को जनता मानती है, धडी पूली आती है । 
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मंढा के ठाकुर भीमसिंह ने रामभजनजी के भजन साधन से प्रभावित होकर नाडा(तालाब) के लिये ६ बीघा और ११ विसवा भूमि उनको दी थी । वहां ही स्थान कृषि योग्य एक कूप है । सिद्ध संत रामभजनजी नाडा से एक दिन भेसलाणा जा रहे थे । मार्ग में उक्त कूप आया तो उसके किसानों को बोले भाई दोपहर के समय बैलों को खोल दिया करो । किसान बोले- आप तो साधु हैं किन्तु हमारे पीछे कुटुम्ब लगा है, इससे खोलना नहीं बन सकता । । तब रामभजनजी ने कहा—अच्छा । फिर वहां अपना हाथ की तूंबी का जल डालकर भैंसलाणा चले गये । 
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थोड़ी देर में कूप का पानी सूख गया । तब वे किसान नाडा पर स्थान में गये । वहां के संतों से कहा । संतों ने कहा- उधर रामभजनजी आये थे क्या ? किसान बोले आये थे और कहा था कि दोपहर में कूप बन्द करके बैलों को विश्राम दिया करो किन्तु हमने उनकी बात नहीं मानी थी । तब संतों ने कहा~ फिर तो उनके पास ही जाओ । फिर किसान भैंसलाणे गये और प्रार्थना की । तब रामभजनजी ने कहा—दोपहर में सूखेगा आगे पीछे नहीं सूखेगा । फिर वैसा ही होता था । नाडा पर चरण चौकी घासीरामजी वि. सं. १९२५ कार्तिक सुदी ९ की है । निरंजनदासजी और अर्जुनदासजी की चरण चौकी वि. सं. १९३९ की है । निरंजनदासजी के शिष्य रामभजनजी थे । 
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*भक्तावरदासजी* 
भक्तावरदासजी घासीरामजी के शिष्य थे । ये महान् तपस्वी थे । ये एक घंटा प्रतिदिन ऊंधे झूला करते थे । नाडा का स्थान में वि. सं. १९७४ तक शिवरामजी थे । तब तक अच्छी स्थिति में था । वि. सं. २०३१ में मैं वहां गया था तब भी एक साधु वहां था । वह भिक्षा से निर्वाह करता था और कुछ समाधि पर आने वाले यात्रियों से उसे प्राप्त होता था । 
{इति श्री पंचम अध्याय समाप्तः ५} 
(क्रमशः) 

गुरुवार, 17 सितंबर 2026

*२८. साधु असाधु परीक्षा का अंग ~१/४*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*२८. साधु असाधु परीक्षा का अंग ~१/४*
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*सब गुण सधहि तु१ साध है, अन साधे सु असाध ।*
*रज्जब पाई प्राण ने, पूरी पारिख२ लाध३ ॥१॥*
सभी दैवी गुण रूप साधना सिद्ध कर लेता है, तो१ वही साधु कहलाता है और नहीं सिद्ध कर पाता है तब तक असाधु है । बुद्धिमान प्राणियों ने साधु असाधु की यही पूरी परीक्षा२ उपलब्ध३ की है ।
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*भगवंत न भूले सो भला, बुरा बिसारे सोय ।*
*रज्जब काढे मांड में, भले बुरे चुन दोय ॥२॥*
जो भगवान को नहीं भूले वही साधु है और भूलता है वही असाधु है, सभी ब्रह्माण्ड में खोज करने पर ये दो ही चुनकर साधु असाधु निकाले गये है ।
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*त्रिगुण तुला ऊपर तुले, कंकर पुन: कपूर ।*
*एक समाने शून्य में, एक धरा मधि धूर ॥३॥*
तुला पर तोलने से कंकर और कपूर बराबर उतर जाते हैं, किन्तु कंकर तो धरा की धूली में मिलता है और कपूर आकाश में मिलता है, वैसे ही त्रिगुणात्मक संसार में चाहे साधु - असाधु का शरीर बराबर मान लिया जाय किन्तु, साधु तो ब्रह्म को प्राप्त करता है और असाधु मायिक संसार में मिलता है ।
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*धरे माँहिं सौं धर्या ऊपजे, सो धरती ह्वै जाय ।*
*रज्जब साधु कपूर शून्य सुत, शून्यहिं माँहिं समाय ॥४॥*
धरती पर धरे पर्वत का कंकर धरती ही बन जाता है और आकाश की स्वाति बिन्दु से बना कपूर आकाश में ही समाता है, वैसे ही मायिक प्रपंच में फंसा हुआ असाधु संसार में ही रहता है और साधु ब्रह्म में समा जाता है, यही साधु असाधु की परीक्षा है ।
(क्रमशः)

*२७. साधु परीक्षा का अंग ~२०/२२*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*२७. साधु परीक्षा का अंग ~२०/२२*
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*तन योगी मन भोगिया, रहति१ रुपइये खोट ।*
*स्वप्ने के सूलाक२ में, उघड़ी पत्री ओट३ ॥२०॥*
तांबे के रुपये के उपर चांदी की पत्री लगा दे, तो उसमें छेद२ करते ही पत्री की आड३ हट जाती है और खोट सिद्ध होकर पोल खुल जाती है, वैसे ही तन से तो जो योगी बना है और मन से भोगी है, उसकी विरक्ता वा ब्रह्मचर्य१ में दोष है और वह तन के योगीपने की आड३ स्वप्न में हटकर उसकी पोल खुल जाती है ।
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*मन मुक्ता काचे बुरे, माँहिं मनोरथ नीर ।*
*रज्जब राम जु जौहरी, पाड़ा२ लागे वीर१ ॥२१॥*
जब तक मोती में जल रहता है तब तक वह कच्चा है, जौहरी के पास उसके मूल्य में बट्टा२ लगाता है वैसे ही हे भाई१ ! जब तक विषय-मनोरथ मन में है, तब तक रामजी के पास उसके संतपने में बट्टा२ लगता है, अर्थात उसे पूरा संत नहीं मानते ।
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*मन की मिटी न लालसा, तन करि परसे नाँहिं ।*
*रहति१ रुपये खोट है, तुछ मति तामा माँहिं ॥२२॥*
मन की विषयाशा तो नष्ट हुई नहीं, किन्तु शरीर से कामिनी को नहीं छूता तो उसकी विरक्तता१ वा ब्रह्माचर्य रूप रुपये में तुच्छ बुद्धि रूप ताँबा का खोट है ।
इति श्री रज्जब गिरार्थ प्रकाशिका सहित “२७. साधु परीक्षा का अंग” समाप्त ॥
(क्रमशः)

*२७. साधु परीक्षा का अंग ~१७/१९*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*२७. साधु परीक्षा का अंग ~१७/१९*
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*अचेत अवस्था नींद नर, यहु चूकण की ठौर ।*
*पै सूतों१ स्यावत२ रहै, सो रज्जब शिर मौर ॥१७॥*
मनुष्य की अज्ञान१ अवस्था ही निद्रा है और यही लक्ष्य से भ्रष्ट होने का स्थान है, किन्तु जो सुप्तावस्था२ में भी ब्रह्म रूप लक्ष्य प्राप्ति के लिये सावधान है, वही हमारा शिरोमणी संत है ।
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*ज्यो जागत त्यों सोवतैं, स्वप्ने माँहिं सु होय ।*
*रज्जब पारिख१ प्रीति की, लग्न कहावे सोय ॥१८॥*
जैसी जाग्रतावस्था में लग्न हो, वैसे ही सोते समय स्वप्नावस्था में भी हो, वही प्रिति-परीक्षा१ की लग्न कहलाती है, अर्थात जागते तथा सोते जिसकी वृत्ति निरंतर ब्रह्म परायण रहती है, वही संत है ।
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*तन त्यागी त्रिभुवन भरे, मन त्यागी कोउ एक ।*
*रज्जब रैनि स्वप्न में, लहिये विगति१ विवेक ॥१९॥*
तन से कामिनी का त्याग करने वाले त्यागी तो त्रिभुवन में बहुत भरे हैं, किन्तु मन से त्यागी कोई विरला ही मिलेगा । रात्रि के समय स्वप्न में विवेक-पूर्वक देखने से अपनी विशेष दशा१ का ज्ञान प्राप्त होगा कि मैं त्यागी हूँ या रागी ।
(क्रमशः) 

*२७. साधु परीक्षा का अंग ~१३/१६*

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*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*२७. साधु परीक्षा का अंग ~१३/१६*
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*रज्जब परखे प्राणि को, दिल में देखे जोय ।*
*जैसी ह्वै तैसी कहै, पूरा पारिख सोय ॥१३॥*
जो प्राणी के मन में स्थित दोष-गुणों को देखता है वही उसकी परीक्षा कर सकता है, फिर जैसे मन की स्थिति हो वैसा ही कथन करे, वही पुरा परीक्षक है ।
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*नख शिख काढे नजर में, मन मत१ ले निरताय२ ।*
*जन रज्जब दे हाथ में, खोटी खरी बताय ॥१४॥*
नख से शिखा पर्यन्त दृष्टि से देखे और मन के भाव१ को विचार२ करके देखे, फिर जैसे कोई वस्तु को हाथ में देकर बताते हैं, वैसे ही उसकी बुराई और सच्चाई को बता दे वही साधु की परीक्षा कर सकता है ।
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*जीव की जाणे जौहरी, परखे सौंज१ सराफ ।*
*जन रज्जब जान रु कहै, सो कहना सब माफ ॥१५॥*
जैसे रत्नों की परीक्षा जौहरी जानता है और सुवर्ण की बनी भूषणरूप सामग्री१ की परीक्षा सराफ जानता है, वैसे ही जीव के हृदय की बात तो साधु की परीक्षा करने वाला जानता है । वस्तु को जानकर उसका दोष कहा जाता है तब उसका परीक्षक का कहना सभी माफ होता है, अर्थात दोष बताने पर भी परीक्षक को दोषी नहीं कहा जाता ।
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*रज्जब मन मंडाण१ को, विरला परखणहार ।*
*नग नाणे३ अंग४ अंग२ अनन्त, बहु विधि वित विस्तार ॥१६॥*
मन की सजावट१ की परीक्षा कोई विरला ही कर सकता है । अनन्त शरीरों२ के मनों में सात्त्विक गुण रूप नग राजस-गुण रूप सिक्के३, तामसगुण रूप हीन लक्षण४ अनन्त रहते हैं, इस प्रकार बहुत प्रकार का गुण रूप धन का विस्तार मन में रहता है । अत: उसकी परीक्षा मानव नहीं कर पाता । मन की परीक्षा ही साधु परीक्षा है ।
(क्रमशः) 

*२७. साधु परीक्षा का अंग ~९/१२*

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*२७. साधु परीक्षा का अंग ~९/१२*
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*आतम१ कहीं न बंधही, बिन सांई अरु साध ।*
*जन रज्जब ता संत की, पूरण बुद्धि अगाध ॥९॥*
जिसका मन१ परमात्मा और सिद्ध संतों के बिना अन्य किसी में नहीं बँधता, उस साधक संत की बुद्धि पूर्ण रूप से अगाध है ।
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*ज्यों मुख दोष लहै दर्पण में, फूटा मोती मोती माँहिं ।*
*त्यों रज्जब साधु सौं साधु, मनसा वाचा छाना नाँहिं ॥१०॥*
जैसे मुख का दोष दर्पण में और फूटा मोती मोतियों में दीख जाता है छिपता नहीं, वैसे ही मन तथा वचन से साधु से साधु छिप नहीं सकता ।
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*सब घट में सांई दरसै, बोले भया विनाण१ ।*
*रज्जब साधु परखिये, कहि गुण कहा बँधाण ॥११॥*
आत्मा रूप से परमात्मा सभी शरीरों में दिखाई देते हैं, किन्तु बोलने से उसके विज्ञान१ वा अज्ञान१ का पता चलता है । अत: साधु की परीक्षा जो उसके लक्षण रूप गुण शास्त्र संतों ने कहे हैं तथा जो उसके शरीर की दिनचर्या का बंधान कहा है, उसकी तुलना करके करना चाहिये ।
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*ढोल दमामा१ थाल शिर, डंका एकहि होय ।*
*त्यों वायक बहुगुण भर्या, बूझे विरला कोय ॥१२॥*
ढोल, नगाड़ा१ थाल इन पर एक ही डंका पड़ता है, किन्तु ध्वनि भिन्न भिन्न निकलती है, उस ध्वनि से पहचान होती है कि यह उसकी आवाज है, वैसे ही एक प्रश्न से ही प्राणियों के मुख से अनेक वचन निकलते हैं । और वे बहुत गुणों से भरे रहते हैं, उनको कोई विरला विचार शील मनुष्य ही समझ पाता है और वही साधु की परीक्षा कर सकता है ।
(क्रमशः) 

*२७. साधु परीक्षा का अंग ~५/८*

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*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*२७. साधु परीक्षा का अंग ~५/८*
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*नर नक्षत्र१ दोऊ दिपहिं३, नाम ध्वजा२ जिन शीश ।*
*सो रज्जब कैसे छिपहिं, प्रकट किये जगदीश ॥५॥*
जिस तारे१ के शिर पर चोटी२ होती है और जिस नर के हृदय में भगवान का नाम-स्मरण होता है वे दोनों ही प्रकाश तथा यश से प्रदीप्त३ होते हैं, जिनको जगदीश्वर ने ही प्रकट किया है, वे कैसे छिप सकते हैं ?
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*हरि हीरा हृदय रहे, सो घट छाना नाँहिं ।*
*रज्जब दीसे दूर सों, ज्यों दीपक भोडल माँहिं ॥६॥*
जिसके हृदय में हरि रूप हीरा रहता है, अर्थात निरंतर हरि का ध्यान रहता है, वह शरीर छिप कैसे रह सकता है ? वह तो जैसे भोडल में जलने वाला दीपक दूर से ही दिखता है वैसे ही दूर देश से भी यश रूप प्रकाश द्वारा दीख जाता है ।
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*दुर्बल देही दीन मत१, रहे राम के संग ।*
*जन रज्जब जग सौं जुदे, ये संतन के अंग ॥७॥*
शरीर दुर्बल होना, विचार१ में दीनता होना, सांसारिक भावनाओं से अलग रहते हुये निरंतर नाम-स्मरण द्वारा राम के संग रहना ये ही संतों के लक्षण हैं ।
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*सकल धरे१ सौं धूत२ गति, कहीं न बाँधे मन्न ।*
*जन रज्जब जग सौं जुदे, सोई साधु जन्न ॥८॥*
संपूर्ण मायिक१ प्रपंच से कांपते२ रहते हैं, अर्थात डरते रहते हैं । किसी भी वस्तु वा व्यक्ति में आसक्ति रज्जू द्वारा मन को नहीं बाँधते, इस प्रकार सांसारिक भावनाओं से अलग रहते हैं, वे ही जन संत हैं ।
(क्रमशः) 

*२७. साधु परीक्षा का अंग ~१/४*

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*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*२७. साधु परीक्षा का अंग ~१/४*
इस अंग में साधु की परीक्षा संबन्धी विचार कहेंगे -
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*रज्जब नर नग सो सही, तम त्रासन रु उजास ।*
*जग जल में बूडे नहीं, सो हीरा हरिदास ॥१॥*
नर वही है जो अंधेरे को नष्ट करके प्रकास करे, नर वही है जो अज्ञान को दूर कर ज्ञान प्रकट करे, हीरा वही है जो जल में नहीं डूबे१, संत२ वही है जो जगत में न डूबे अर्थात ब्रह्मरूप हो जाय ।
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*महा पुरुष पारस परखि, निश्चय रूप न रंग ।*
*प्राण पषाण सु मानिये, रज्जब पलटे अंग ॥२॥*
पारस और संत की परीक्षा, रूप वा रंग से नहीं होती, लोहे को सुवर्ण व जीव को ब्रह्म बना देने से होती है जो प्राणी केवल भेषादि द्वारा रूप-रंग बदलते हैं, वे तो साधारण पत्थर के समान हैं जो साधन द्वारा संत बनते हैं, वे पारस के समान हैं ।
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*तन मन तेल कड़ाह विधि, तपता शीतल होय ।*
*सो साधु स्रक१ बावना२, रज्जब लीजे जोय ॥३॥*
कड़ाह के तपे हुये तेल में फूल माला१ डालने से तेल शीतल हो जाय, तो समझना चाहिये यह माला बावने चन्दन२ के फूलों की है, वैसे ही दुखों से संतप्त तन मन को अपने उपदेश से शीतल करदे वही संत है यही संत और बावने चन्दन की परीक्षा है ।
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*रज्जब रचना रहित की, दर्श परस दर्शन्त ।
वपु संयम वाणी विमल, वदन३ ज्योति१ झलकन्त२ ॥४॥*
अज्ञानादि विकार रहित संत की चेष्टादि रचनायें, दर्शन तथा मिलन से आप ही ज्ञात हो जाती हैं, उनके शरीर में पूर्ण संयम, वाणी में पवित्रता और मुख३मंडल पर ब्रह्म तेज१ चमकता२ रहता है ।
(क्रमशः) 

*२६. भजन प्रताप का अंग ~८२/८५*

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*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*२६. भजन प्रताप का अंग ~८२/८५*
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*काया कुंभनि१ पैठ तों, जीव जल स्वाद अनेक ।*
*रज्जब भगवंत भानु मिल, उभय रूप रस एक ॥८२॥*
पृथ्वी१ में जल प्रवेश करता है तब उसके अनेक स्वाद हो जाते हैं, वैसे ही शरीर में जीव प्रवेश करता है तब उनमें भी अनेक विषयों की आशा प्रकट होती है, किन्तु सूर्य की किरण द्वारा जल आकाश में जाता है और जीव को भजन द्वारा भगवान् की प्राप्ति होती है, तब दोनों के स्वरूप में एक ही रस और जीव में आत्मा स्थिति रूप रस रहता है ।
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*शूद्र वैश्य क्षत्रिय ब्रह्म, चतुर वर्ण बे काम ।*
*जन रज्जब मध्यम सभी, जो सुमिरैं नहिं राम ॥८३॥*
शुद्र वैश्य क्षत्रिय और ब्राह्मण चारों वर्णो में जो राम का स्मरण नहीं करते हैं वे सभी बेकार हैं तथा उत्तम नहीं कहे जाते ।
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*मुख भुज उपजै पेट पग, पड़ धरती धर१ होय ।*
*दंत केश विष्टा रु नख, रज्जब बिछुड़े जोय२ ॥८४॥*
जैसे शरीर के मुख के दांत, भुजा के केश, पेट का मल और पैर के नख, जब तक शरीर के लगे हैं तब तक तो उत्तम हैं, किन्तु देखो२ शरीर से अलग होकर पृथ्वी पर पड़ने से अछूत हो जाते हैं वैसे ही ईश्वर के मुख से ब्राह्मण, भुजा से क्षत्रिय, पेट से वेश्य पैर से शूद्र उत्पन्न होते हैं, किन्तु ईश्वर के भजन को त्यागकर माया१ के उपासक हो जाते हैं, तब उत्तम नहीं रहते ।
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*पारस मय मूरति प्रभू, चतुर वर्ण लोह भाय ।*
*रज्जब कंचन होत है, ठाहर कहीं लगाय ॥८५॥*
पारस की मूर्ति के मुख, भुजा, पेट, पैरों में से चाहे कैसे भी स्थान पर लोह लगा दो, वह तो सुवर्ण हो ही जायगा, वैसे ही चारों वर्ण भगवान के स्वरूप में लगने से तो उत्तम हो ही जायेंगे नहीं लगे तो अधम ही हैं ।
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इति श्री रज्जब गिरार्थ प्रकाशिका सहित “२६. भजन प्रताप का अंग” समाप्त ॥
(क्रमशः)