शुक्रवार, 20 फ़रवरी 2026

भिवानी चातुर्मास ~

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*॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥*
*॥ दादूराम~सत्यराम ॥*
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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१६ आचार्य दयारामजी ~ 
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भिवानी चातुर्मास ~ 
वि. सं. १९६३ में आचार्य दयारामजी महाराज को चातुर्मास का निमंत्रण भिवानी के मुखरामजी ने दिया । आचार्य दयारामजी महाराज शिष्य संत मंडल के सहित पधारे । भिवानी का चातुर्मास शहर के अनुरुप ही बहुत अच्छा हुआ । भिवानी के चातुर्मास से उठकर आचार्य दयारामजी महाराज ने उतराध मंडल की रामत की । रामत में उतराध मंडल के स्थानधारी साधुओं ने तथा सेवकों ने आचार्यजी का अच्छा सम्मान किया । उतराध की रामत करके  शनै: शनै: भ्रमण करते हुये नारायणा दादूधाम में पधार गये । 
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उदयपुर जमात में चातुर्मास ~ 
वि. सं. १९६४ में आचार्य दयारामजी महाराज का चातुर्मास उदयपुर जमात हुआ । चातुर्मास के सभी कार्यक्रम अच्छी प्रकार चलते रहे । संतों का समागम अच्छा रहा । इस चातुर्मास में चातुर्मास की मर्यादाओं का पूर्णत: निर्वाह होता रहा । समाप्ति पर आचार्यजी को उनकी मर्यादा के अनुसार भेंट तथा शिष्य संत मंडल को यथा योग्य वस्त्रादि देकर सस्नेह विदा किया गया ।  
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लालसोट जमात में चातुर्मास ~ 
वि. सं. १९६५ में आचार्य दयारामजी महाराज का चातुर्मास जमात लालसोट में मोहनदासजी के यहाँ नियत हुआ । चातुर्मास के समय आचार्यजी शिष्य संत मंडल के सहित पधारे तब जमात ने आचार्यजी का सामेला बडे ठाट बाट से किया । चातुर्मास भी बहुत अच्छा हुआ । मोहनदासजी ने संतों की सेवा अच्छी की । समाप्ति पर भी आचार्यजी को भेंट मर्यादानुसार देकर तथा शिष्य संत मंडल को वस्त्रादि देकर सबका अच्छा सम्मान किया और सस्नेह विदा किया । 
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गूलर में चातुर्मास ~ 
वि. सं. १९६६ में आचार्य दयारामजी महाराज को चातुर्मास का निमंत्रण रामरतनजी गूलर वालों ने दिया । आचार्य दयारामजी महाराज शिष्य संत मंडल के सहित गूलर पधारे । गूलर के ठाकुर साहब, रामरतनजी और वहाँ की जनता ने मिलकर आचार्यजी की अगवानी बाजे गाजे से कीर्तन करते हुये की । ग्राम में लाकर ठहराया । रामरतनजी अच्छे महात्मा थे । उनका प्रभाव उस प्रदेश पर अच्छा था । अत: यह चातुर्मास भी अच्छा हुआ । सभी कार्यक्रम मर्यादापूर्वक  हुये थे । अंत में आचार्यजी को मर्यादानुसार भेंट तथा शिष्य संत मंडल को यथा योग्य वस्त्रादि देकर सस्नेह विदा किया । 
(क्रमशः)

२०. विपर्यय कौ अंग ९/१२

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२०. विपर्यय कौ अंग ९/१२
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कमल मांहिं पांणी भयौ, पाणी मांहे भांन ।
भांन मांहि ससि मिलि गयौ, सुंदर उलटौ ज्ञांन ॥९॥
मन या हृदय रूप कमल से भगवद्भक्ति रूप जल प्रकट हुआ । उस प्रेमा भक्ति रूप जल से ब्रह्मज्ञान रूप सूर्य प्रकट हुआ । उस सूर्य से त्रिविध ताप का नाश होकर स्थायी शान्तिरूप शीतल चन्द्र उत्पन्न हुआ । उस शीतल शान्ति से साधक को पूर्ण ब्रह्मानन्द का अनुभव हुआ । अर्थात् मन के शुद्ध होने से उत्पन्न प्रेमाभक्ति द्वारा ज्ञान के प्रकट होने पर सांसारिक त्रिविध ताप निवृत्त हो गया । उसके फलस्वरूप साधक को ब्रह्मसाक्षात्कार का अक्षय सुख अनुभूत होने लगा ॥९॥ (द्र० सवैया : २२/छ० सं० ७) ॥
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धोबी कौं उज्जल कियौ, कपरै बपुरौ धोइ ।
दरजी कौं सीयौ सुई, सुन्दर अचिरज होइ ॥१०॥
साधक का मन रूप धोबी जब निर्मल (निर्विकार) हुआ तो उस निर्मल मन ने साधक की काया को भी निर्विकार कर दिया१ । अर्थात् ज्ञानप्राप्ति से साधक की मननशक्ति बढी तो इस मननशक्ति ने मन को निर्मल कर दिया ।
(१ तु.- श्रीदादूवाणी - मन निर्मल तन निर्मल भाई, आन उपाइ विकार न जाई । (२८वाँ शब्द)
इसी प्रकार, सुरति रूप सूक्ष्म स्थान में भी प्रवेश करने वाली सूई ने जीव रूपी दर्जी को (ब्रह्म के साथ) सी दिया । (उस के साथ ब्रह्म की एकता कर दी ।) इस छोटी सी सूई ने इतना बड़ा काम किया ! ॥१०॥ (द्र० सवैया : २२/छ० सं० ९) ।
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सोनै पकरि सुनार कौं, काढ्यौ ताइ कलङ्क ।
लकरी छील्यौ बाढई, सुन्दर निकसी बंक ॥११॥
यह कैसा आश्चर्य हुआ कि उलटे स्मरण रूप सुवर्ण ने ही मन रूपी सुनार को तपश्चर्या आदि साधनों से तपा कर निष्कलङ्क कर दिया ।
इसी प्रकार, लय समाधि रूप लकड़ी ने बढई (खाती) को छील कर (निर्विकार = निर्दोष) उस का बांका टेढ़ापन (मद) निकाल दिया । अर्थात् प्रभुस्मरण में मग्न कर साधक का कर्मों से संसर्ग मिटा दिया । (ज्ञान द्वारा कर्मों की निवृत्ति से उस की जन्ममरण की परम्परा समाप्त हो गयी ॥११॥) (द्र० सवैया : २२/छ० सं० ९) ॥
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जा घर मैं बहु सुख किये, ता घर लागी आगि ।
सुन्दर मीठौ ना रुचै, लौंन लियौ सब त्यागि ॥१२॥
साधक ने, अज्ञानावस्था में जिस घर (काया) में विविध सुखों का भोग किया था, वही घर अब ज्ञानाग्नि से दग्ध हो (जल) गया । अर्थात् अब देहाभिमान तथा वासनाओं की निवृत्ति हो गयी । अब साधक को मीठा या नमकीन (विषयभोग) रुचिकर नहीं लगते; अतः उन सब का सर्वथा त्याग कर उसने स्वयं को भगवद्भजन में ही एकान्ततः लगा लिया है ॥१२॥ (द्र० सवैया : २२/छ० सं० १०) ॥
(क्रमशः)

*साषी लापचारी की ॥ पतिव्रता-व्यभिचारणी ॥*

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*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*दादू तज भरतार को, पर पुरुषा रत होइ ।*
*ऐसी सेवा सब करैं, राम न जाने सोइ ॥*
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*साषी लापचारी की ॥ पतिव्रता-व्यभिचारणी ॥*
जल पोसौं का आभरण, पहरि किया टुक कोड ।
बषनां बांदी क्यूँ करै, पतिबरता की होड ॥
रांडाँ मिलि मंगल कियौ, मुणिस नहीं घर माँहिं ।
करि सिंगार हसती फिरै, रूली बिगूचै काँहिं ॥१
(१.इनका अर्थ ‘भेष को अंग’ की साषी १ व ३ में देखें ।)
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आसरड़ी मुख देखि, भेष बणायौ रे ।
कामणि कियौ सिंगार, पीव नहिं भायौ रे ॥टेक॥
पति को बरत निवाहि, निकटि बिराजै रे ।
दुराचारणि थैं दूरि, अलगौ भाजै रे ॥
पतिबरता कै देखि, बदनि उजालौ रे ।
दुराचारणी देखि, मुहड़ौ कालौ रे ॥
लोगाँ माँहिं सुहागणि, कहती डोलै रे ।
कंत न बूझै बात, फीकी बोलै रे ॥
सखियाँ माँहिं सुहाग, महल मैं हूँथी रे ।
मेल्ही माथै मारि, आँजी गूँथी रे ॥
तीरथ बरत अनेक, त्याँह सँगि रलसी रे ।
सत मुणसी ले काठ, कौंण सँगि बलसी रे ॥
पतिबरता कौ बरत, जिहि धन धार्यौ रे ।
बषनां त्याँह की सेज, राम पधार्यौ रे ॥५६॥
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“एकइ धर्म एक व्रत नेमा । कायँ बचन मन पति पद प्रेमा ॥
उत्तम के अस बस मन माहीं । सपनेहुँ आन पुरुष जग नाहीं ॥
मध्यम परपति देखइ कैसे । भ्राता पिता पुत्र निज जैसे ।
धर्म बिचारि समुझि कुल रहई । सो निकृष्ट त्रिय श्रुति अस कहई ॥
बिनु अवसर भय तें रह जोई । जानेहु अधम नारि जग सोई ।
पति बंचक परपति रति करई । रौरव नरक कलप सत परई ॥
छन सुख लागि जनम सत कोटी । दुख न समुझ तेहि सम मो खोटी ॥” 
मानस ३/५/५-९ ॥
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बषनांजी ने जिन विचारों को इस पद में व्यक्त किया है, उनका समर्थन मानस की उक्त पंक्तियाँ बहुत ही उत्तम रीति से करती हैं । वस्तुतः पतिव्रता वह है जो निज इष्ट को ही अपना सर्वस्व समझकर उसी की मन, वचन एव कर्म से भक्ति करता है । इसके विपरीत जो जग दिखावे के लिये नाना वेश बनाकर अनेक देवी-देवों की उपासना करता है, वह व्यभिचारी है ।
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दर्पण में मुख निहार कर व्यभिचारणी कामिनी भेष = अलंकृत कपड़े पहनती तथा अन्यान्य श्रृंगार करती है किन्तु मन में पति के प्रति अनन्य अनुराग नहीं रखती है । पति अपने कर्तव्य का निर्वाह करते हुए रहता तो व्यभिचारणी के साथ घर में ही है (परमात्मा रूपी पति संसारियों के मायासक्त हो जाने पर भी संसारियों पर अकारण दया-कृपा करते हुए उनकी सार-संभार करता है) किन्तु पति, ऐसी व्यभिचारणी पत्नी से अलग रहता हुआ दूर-दूर ही भागता है अर्थात् ऐसी पत्नी से न स्नेह करता है और न संसर्ग ही करता है “ये यथा मां प्रपद्यंते तांस्तथैव भजाम्यहं ।”
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इसके विपरीत जो पतिव्रता पत्नी होती है उसका मुख पातिव्रतधर्म के तेज से आलोकित रहता है जबकि व्यभिचारणी का मुख काला = तेजहीन रहता है । (तेज युक्त = समाज में आदर, श्रद्धा, सम्मान का प्रतीक जबकि तेजहीन = तिरस्कार, अश्रद्धा का प्रतीक) व्यभिचारणी स्त्री अपने आपको समाज में सौभाग्यवती स्त्री के नाम से प्रचारित करती है (सौभाग्यवती = सपतिका, पति-प्रिया) किन्तु पति उससे संसर्ग तो क्या बात तक नहीं करता है जिसके कारण ऐसी व्यभिचारणी पति से फीकी = उल्टी-सुल्टी बोलती है, लड़ाई-झगड़ा करती है ।
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व्यभिचारणी स्त्री अपनी सखियों में सौभाग्यवती स्त्री के रूप में जानी जाती है क्योंकि वह पति के ही महल = मकान में निवास करती है, हूँथी = सोती है । वह सौभाग्यवती स्त्रियों की भाँति आँजी = चोटी गूँथती है तथा माथे में मांग भरती है । (सिंदूर लगाती है) तीर्थ-व्रत रूपी अनेक पुरुषों के संग रलसी-रति प्रसंग करती है ।
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ऐसी सतमुणसी = सौ पुरुषों की स्त्री अनेक पुरुषों से प्रसंग करने वाली व्यभिचारणी स्त्री, बताइये कितने पुरुषों के साथ अथवा किस पुरुष के साथ जल कर अपने सतीत्व को सिद्ध कर सकती है ! जिन स्त्रियों ने पातिव्रत धर्म रूपी धन को अपने जीवन में धारण किया है उन्हीं की सेज रूपी हृदय में परमात्मा का निवास होता है, परमात्मा का प्राकट्य होता है ॥५६॥
(क्रमशः)

*५. गुरु-शिष्य निदान निर्णय का अंग ~ २१/२४*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*५. गुरु-शिष्य निदान निर्णय का अंग ~ २१/२४*
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*काँसी कणजा१ काच लग, बधैं तताई२ माहिं ।*
*जन रज्जब शीतल समय, अस्थल छोड़ै नाँहिं ॥२१॥*
काँसी लाख१ काच यह गर्म२ ही बढ़ते हैं, शीतल होने पर नहीं बढ़ते टूट जाते हैं । वैसे ही शिष्य भी साधन में लग कर साधन संताप से ही ब्रह्म की ओर बढ़ते हैं, साधन न करने से देहाध्यासादिरूप स्थान को नहीं त्यागते, मर ही जाते हैं ।
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*जीव जल हिमगिरि होत है, शक्ति शीत के संग ।*
*सो पाषाण पानी भया, गुरु ग्रीष्म के अंग ॥२२॥*
जैसे शीत से जल हिमालय पर हिम बन जाता है और ग्रीष्म ऋतु में पुन: जल हो जाता है, वैसे ही माया के सम्पर्क से जीव संसारी बन जाता है और गुरु के संग से पुन: ज्ञानी होकर परब्रह्म को प्राप्त हो जाता है ।
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*ज्यों श्रावण सीगणि१ फिर हि, त्यों शठ सुरति संसार ।*
*रज्जब सूधी होय सो, कमणीगर गुरु द्वार ॥२३॥*
श्रावण में वर्षा की आर्द्रता से धनुष१ का काष्ठ कुछ टेढा होता है, फिर आश्विन मास में कमान बनाने वाला कमणीगर उसे सीधा कर देता है, वैसे ही मूर्ख प्राणी की वृत्ति संसार में काम क्रोधाधि विकार रूप वक्रता को प्राप्त होती है, तब गुरु द्वारा ही सीधी की जाती है ।
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*हाथा जोडी गुरु हुं सूं, मूसल मन सु मिलाँहि ।*
*ये इकठे ये ही कर हिं, और हुँ किये न जाँहिं ॥२४॥*
धान कूटते समय मूसल दोनों हाथों को मिला देता है, वैसे ही गुरु भिन्न विचारधारा के दो व्यक्तियों के मन विचार साम्यता द्वारा मिला देते हैं वा मन को ईश्वर में जोड देते हैं, दोनों हाथों को मन ईश्वर को जैसे मूसल और गुरु मिलाते हैं वैसे अन्य कोई भी नहीं मिला सकता ।
(क्रमशः)

गुरुवार, 19 फ़रवरी 2026

किशनगढ पधारना ~

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*॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥*
*॥ दादूराम~सत्यराम ॥*
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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१६ आचार्य दयारामजी ~ 
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किशनगढ पधारना ~  
वि. सं. १९६० में आचार्य दयारामजी महाराज किशनगढ पधारे और अपनी मर्यादा के अनुसार अपने आने की सूचना किशनगढ नरेश को दी । तब किशनगढ नरेश ने अपनी कुल परंपरा के अनुसार आचार्यजी की अगवानी का प्रबन्ध कर दिया । 
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राजाज्ञा से बाबू श्यामसुन्दरलालजी आदि मुसाहिब राजकीय पूरे लवाजमे के साथ आचार्य दयारामजी की अगवानी करने आये और मर्यादापूर्वक  बडे ठाट बाट से ले जाकर घेवर बाग में ठहराया । फिर एक दिन आचार्य दयारामजी महाराज को किशनगढ नरेश ने राज महलों में पधारने का निमंत्रण दिया ।
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आचार्यजी ने स्वीकार कर लिया, तब राजा ने अपने मंत्री को कहा- आचार्य दयारामजी महाराज को राजकीय पूरा लवाजमा और सवारी ले जाकर राजमहल में लाओ । मंत्री ने वैसा ही किया । फिर आचार्यजी को सवारी पर विराजमान कराके किशनगढ नरेश में पहुँचा दिया । दिवान खाने में चौके पर विराजमान करके किशनगढ नरेश ने आचार्यजी के भेंट चढाकर प्रणाम की और अति श्रद्धा भक्ति से हाथ जोडकर आचार्यजी के सामने बैठ गये । 
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नम्र भाव से उपदेश श्रवण किया और शिष्य संत मंडल के सहित आचार्यजी को भोजन कराकर मर्यादापूर्वक घेवर बाग पहुँचा दिया । आचार्यजी कुछ दिन किशनगढ की धार्मिक जनता को उपदेश करते रहे । जनता ने भी आचार्यजी की श्रद्धा भक्ति से सेवा की । फिर किशनगढ से विदा होकर भ्रमण करते हुये नारायणा दादूधाम में पधार गये ।  
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दहलोद चातुर्मास ~ 
वि. सं. १९६१ में आचार्य दयारामजी महाराज को चातुर्मास का निमंत्रण भगवानदासजी दहलोद वालों ने दिया । आचार्यजी ने स्वीकार कर लिया । चातुर्मास का समय समीप आने पर अपने शिष्य संत मंडल के साथ आचार्य दयारामजी महाराज दहलोद पधारे । भगवान्दासजी मर्यादा पूर्वक आचार्यजी की अगवानी करके आचार्यजी को स्थान पर लाये । चातुर्मास मर्यादापूर्वक  आनन्द के साथ समाप्त हो जाने पर आचार्यजी को मर्यादानुसार भेंट तथा संतों को वस्त्र देकर सस्नेह विदा किया  ।
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बीकानेर का चातुर्मास ~ 
वि. सं. १९६२ में महन्त सूरतरामजी बीकानेर वालों ने आचार्य दयारामजी महाराज को चातुर्मास का निमंत्रण दिया । आचार्यजी ने स्वीकार किया और समय पर अपने शिष्य संत मंडल के सहित भ्रमण करते हुये बीकानेर पहुँचे । महन्त सूरतरामजी ने बडे ठाट बाट से आचार्यजी की अगवानी की और स्थान पर ले गये । चातुर्मास आरंभ हो गया । 
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चातुर्मास के कार्यक्रम ठीक समय पर होने लगे । बीकानेर की श्रद्धालु भक्त जनता सत्संग में आकर अति प्रेम से दादूवाणी का प्रवचन सुनती थी । नगर के सेठ रसोइंया देते थे । शिष्य संत मंडल के सहित आचार्यजी को अपने घरों पर मर्यादापूर्वक पूर्ण सम्मान से ले जाकर भोेजन कराते थे । भेंट देते थे और सम्मान से आसन पर पहुँचा देते थे । चातुर्मास समाप्ति पर महन्त सूरतरामजी ने आचार्यजी को उनकी मर्यादानुसार भेंट तथा शिष्य संत मंडल को यथायोग्य वस्त्रादि देकर सस्नेह विदा किया था ।
(क्रमशः)

२०. विपर्यय कौ अंग ५/८

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२०. विपर्यय कौ अंग ५/८ 
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समद समानौं बून्द मैं, राइ मांहे मेर । 
सुन्दर यह उलटी भई, सूरज कियौ अन्धेर ॥५॥
नाम-साधना द्वारा साधक का अतिसुक्ष्म जीवात्मा (बूंद) महान् अप्रमेय ब्रह्म (समुद्र) में समा गया । अर्थात् एवं ब्रह्म की एकता हो गयी । इसी प्रकार, अतिसूक्ष्म ब्रह्माकार वृत्ति रूप राई में अतिशय विशाल मिथ्या जगद्रूप सुमेरु पर्वत समा गया । अर्थात् ब्रह्माकार वृत्ति होते ही जगत् का लय हो गया ।
इसी प्रकार, साधक के हृदय में ब्रह्मज्ञान रूप प्रकाशमय सूर्य के उदित होते ही अज्ञानरूप जगत् के अभाव का अन्धकार छा गया । अर्थात् इस ज्ञानसूर्य ने उथल पुथल किया कि उसके उदय के साथ ही अब तक भासमान संसार का नाश (निवृत्ति) हो गया । (द्र० सवैया : २२/छ० सं० ४) ॥५॥
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मछली बुगला कौं ग्रस्यौ, देखहु याके भाग ।
सुन्दर यह उलटी भई, मूसै खायौ काग ॥६॥
विवेक बुद्धि रूप मछली ने दम्भ (वृथाभिमान) रूप बगुला को अपना भक्ष्य बना लिया । अर्थात् शुद्ध मन हो जाने से, जिज्ञासु की जगद्‌भ्रान्ति मिट गयी । यह उसका सौभाग्य ही है ।
साथ ही, यह भी उलटी रीति हो गयी कि सदा चंचल चपल मन रूप मूषक (चूहा) ने अपनी सब दुर्वासना रूप काक (कौआ) का भक्षण कर लिया । अर्थात् मन की सर्वविध चंचलता मिट जाने से जिज्ञासु की सभी दुर्वासनाएँ निवृत्त हो गयीं ॥६॥ ((द्र० सवैया : २२/छ० सं० ५ पूर्वार्ध) ।
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सुन्दर उलटी बात है, समुझै चतुर सुजांन । 
सूवै काढे पकरि कै, या मिनिकी के प्रांन ॥७॥
साधक की साधना से यह भी लोकव्यवहार के विपरीत ही घटना हो गयी कि उसके सुवासनायुक्त चित्त रूप तोते ने दुर्वासना (तृष्णा) रूप बिल्ली को मार दिया । अर्थात् अन्तःकरण शुद्ध होने से उस साधक की सभी तृष्णाएँ (लौकिक कामनाएँ) विनष्ट हो गयीं तथा उसको ब्रह्मानन्द का सहज अनुभव होने लगा । इस बात को कोई चतुर (साधनाकुशल) ज्ञानी ही समझ सकता है ॥७॥ ((द्र० सवैया : २२/छ० सं० ५)
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गुरु शिष के पायनि पर्यौ, राजा हूवौ रंक । 
पुत्र बांझ के पंगुला, सुंदर मारी लङ्क ॥८॥
वहाँ हुई एक अन्य घटना का श्रीसुन्दरदासजी सङ्केत कर रहे हैं - अब तक अज्ञानावस्था में निमग्न उस साधक का चित्त गुरुपदेश से प्राप्त ज्ञान बल के प्रभाव से उस को सत् शिक्षा देने लगा । अर्थात् सन्मार्ग की ओर प्रवृत्त करने लगा । इसका परिणाम यह हुआ कि राजा प्रजा (रंक) के रूप में परिणत हो गया । अर्थात् ज्ञान प्राप्त होने से जीवात्मा (रंक) पुनः मन (राजा) पर शासन करने लगा ।
साथ ही, एक बात यह भी हुई कि सात्विक बुद्धि रूप बांझ (बन्ध्या) नारी से उत्पन्न ज्ञान रूप पंगुल (लंगड़ा) पुत्र उत्पन्न हुआ, उसने ऊंचे प्राकार (परकोटे) से सुरक्षित लङ्का रूप इस माया मोह से सुरक्षित संसार को जीत लिया । अर्थात् निर्मल बुद्धि के कारण उत्पन्न हुए ज्ञान से साधक का समस्त भ्रमात्मक जगत् नष्ट हो गया ॥८॥ (द्र० सवैया : २२/छ० सं० ६) ॥
(क्रमशः)

*साँच ॥*

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*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*सूरज कोटि प्रकास है,*
*रोम रोम की लार ।*
*दादू ज्योति जगदीश की,*
*अंत न आवै पार ॥*
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*साँच ॥*
धीरौ रे धीरौ मन, अहींठै सै जोइलौ ।
काया माँहैं गुर बतायौ, तिहीं ठाहर होइलौ ॥टेक॥
ग्यान के उजालै देखि, दीपक बालि के ।
बाहिरै क्याँहनैं ढूंढै, घर ही मैं न्हालि रे ॥
जहाँ आसण तहाँ बासण, रह्यौ भरपूरि रे ।
गुर गम बाहिरौ, नेड़ा ही तैं दूरि रे ॥
अहूँ कै पैलै कानैं, धरती कै छेव रे ।
वैलै कानैं गुण गली, पैलै कानैं देव रे ॥
जहाँ जीव तहाँ सीव, ऐकणि बासि रे ।
ब्रह्म बतायौ गुरि, सास कै पासि रे ॥
पाणी पाखै कवल फूल्यौ, चाँद कै परगासि रे ।
दसवैं दवारि देखी, हरि की रहासि रे ॥
लिपै नाहीं छिपै नांहीं, सब थैं न्यारौ रे ।
घटि घटि रमि रह्यौ, सो राम हमारौ रे ॥
जे बाहरि सोइ भीतरि, निहचै करि जाणि रे ।
बषनां बिनाणी बाबौ, लै नैं पिछाणि रे ॥५५॥
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“बधुरात्मात्मनस्तस्य येनात्मैवात्मना जितः ।
अनात्मनस्तु शत्रुत्वे वर्तेतात्मैव शत्रुवत् ॥१६/६ गीता॥
मन को धीरौ = स्थिर कर; मन को निश्चल कर । निश्चल मन में ही परमात्मा को देखा जा सकता है । (हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति) परमात्मा इस शरीर में ही निवास करता है, तीर्थ, मन्दिरादि में नहीं और गुरुमहाराज ने भी काया में ही परमात्मा का निवास बताया है ।
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विवेक रूपी दीपक को जला = जागृत करके = ज्ञान = ब्रह्मात्म्यैक्यात्मक ज्ञान के प्रकाश में उस परमात्मा को देख = जान । उस परमात्मा को बाहर क्यों ढूंढ़ता है, उसे तो घर में ही = घट में ही देख । परमात्मा देश अथवा काल अथवा परिस्थिति के परिच्छेदों से हीन है । अतः उसे ढूंढ़ने इधर-उधर न जाना चाहिये ।
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जहाँ हमारा निवास है, परमात्मा वहीँ वास करता है क्योंकि वह जर्रे-जर्रे में परिव्याप्त है “हरि व्यापक सर्वत्र समाना । प्रेम तैं प्रगट होइ मैं जाना ॥” हाँ, जो लोग गुरु के ज्ञान को ग्रहण नहीं करते उनके लिये परमात्मा अत्यन्त निकट होते हुए भी दूर से दूर है । जिनमें अहंकार की मात्रा अत्यधिक है (एक किनारे से दूसरे किनारे तक अर्थात् प्रारम्भिक बिन्दु से अन्तिम बिन्दु तक) उनके लिये परमात्मा उतनी ही दूर है जितना पृथिवी का दूसरा छोर (पृथिवी गोल है, अतः उसका दूसरा छोर ही नहीं । इसी प्रकार जिनमें अहंकार का प्राबल्य है उनके लिये परमात्मा की प्राप्ति असंभव है । “क्लेशोऽधिकतरस्तेषामव्यक्तासक्त चेतसाम् । 
अव्यक्ता हि गतिर्दुःखं देहवद्भिरवाप्यते ॥ गीता १२/५)
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संसार का पहला कौना त्रिगुणों की सँकरी गली है जिसमें चलने पर जीव उसी में फँस मरता है जबकि दूसरा किनारा राजमार्ग है जिसपर चलने पर देव = परमात्मा की प्राप्ति होती है । जहाँ पर जीव है, वही पर सीव = ब्रह्म है । दोनों एक हैं और एक होने से ब्रह्म ही शरीर में निवास करता है । (जीव और ब्रह्म की एकता चैतन्य के आधार पर है, शरीर के आधार पर नहीं)
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गुरुमहाराज ने ब्रह्म का स्थान श्वास के पास बताया है । (यहाँ श्वास के पास ही में ब्रह्म है, से हठयोग विवक्षित प्राणादि शोधन न होकर श्वास-प्रतिश्वास रामनाम स्मरण है) रामनाम साधना से बिना पानी के ही चंद्रमा के प्रकाश से कमल खिल उठता है । (व्यवहार में सूर्य के प्रकाश में ही जल में कमल खिलता है) हरि का निवासस्थान दसवें द्वारि = ब्रह्मरंध्र में है । वहीं उस हरि को निवास करते हुए दसवें द्वार = ब्रह्मरंध्र में देखा ।
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वह किसी से छिपता नहीं है अर्थात् स्वयं प्रकाशवान है । संसार के जर्रे जरे में परिव्याप्त होते हुए भी निष्काम होने से अलिप्त है “मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्त मूर्तीना । मत्स्थानि सर्वभूतानि न चाहं तेष्ववस्थितः । गीता ९॥४॥ वह परमात्मा सब में होते हुए भी सब से पृथक है । वह राम घट-घट = शरीर-शरीर में व्याप्त है ।
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ऐसा राम ही मेरा इष्ट राम हैं । जो बाहर है, वही भीतर है इसे निश्चित रूप से जान ले । बषनां कहता है अलख, अगोचर परमात्मा को जान ले, प्राप्त कर ले । “सीय राम मय सब जग जानी” मानस ॥५५॥
(क्रमशः)

* ५. गुरु-शिष्य निदान निर्णय का अंग ~ १७/२०*

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*श्री रज्जबवाणी* टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
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* ५. गुरु-शिष्य निदान निर्णय का अंग ~ १७/२०*
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*ओले अंडे मोतियहुँ, घड़े सँवारे कौन ।*
*त्यों रज्जब शिष नीपजे, मन वच कर्म गुरु भौन ॥१७॥*
आकाश से वर्षने वाले ओलों को, अंडो को और सींप के मोतियों को कौन घड़कर सुधारता है ? वे अपने आप ही समयानुसार बन जाते हैं, वैसे ही शिष्य गुरु के द्वार पर रहने से मन वचन कर्म से उपदेश धारण करते हैं तब अपने भावनानुसार आप ही श्रेष्ठ बन जाते हैं ।
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*रज्जब सद्गुरु स्वाति गति, बैन बूंद निज वारि ।*
*मन मुक्ता निपजे तहाँ, नर निरखो सु निहार ॥१८॥*
सद्गुरु स्वाति नक्षत्र के समान हैं, उनके अपने वचन ही बिन्दु के समान हैं, देखो स्वाति बिन्दु सींप में पड़ती है तब ही मोती उत्पन्न होता है, वैसे ही ध्यानपूर्वक देखो, श्रवणों द्वारा गुरु वचन शिष्य के मन में जाते हैं तब ही ज्ञान उत्पन्न होता है ।
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*सद्गुरु चम्बुक रूप हैं, शिष सूई संसार ।*
*अचल चले उनके मिल्यूं, ता में फेर न सार ॥१९॥*
संसार में सद्गुरु चम्बुक के समान है, और शिष्य सूई के समान हैं । जैसे चम्बुक के द्वारा अचल सूई में गति होती है, वैसे ही सांसारिक भावना से ऊपर उठना रूप गति जिसमें नहीं होती, उस शिष्य में सद्गुरु के संग से परब्रह्म की ओर गति होने लगती है । यह कथन सार रूप है, इसमें परिवर्तन नहीं हो सकता ।
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*पावक रूपी परम गुरु, लाखमयी सब लोय१ ।*
*रज्जब दर्शन तिन हुँ के, कठिन से कोमल होय ॥२०॥*
सद्गुरु अग्नि रूप है, अन्य सब लोक१ लाख रूप हैं । जैसे अग्नि की समीपता से कठिन लाख कोमल हो जाती है, वैसे ही सद्गुरु के संग से सब प्राणियों का कठोर हृदय भी कोमल हो जाता है ।
(क्रमशः) 

बुधवार, 18 फ़रवरी 2026

नाभा गमन ~

*#daduji*
*॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥*
*॥ दादूराम~सत्यराम ॥*
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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१६ आचार्य दयारामजी ~ 
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नाभा गमन ~
पटियाला से विदा होकर आचार्य दयारामजी महाराज धार्मिक जनता को निज दर्शन और उपदेशों से हर्षित करते हुये नाभा के पास पहुँचे । तब अपनी मर्यादा के अनुसार नाभा नरेश हीरासिंहजी को अपने आने की सूचना दी । सूचना मिलने पर नाभा नरेश हीरासिंहजी ने अपनी परंपरा के अनुसार राजकीय लवाजमा तथा भक्त मंडल के साथ संकीर्तन करते हुये जाकर आचार्य दयारामजी की अगवानी की । 
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मर्यादानुसार भेंट चढाकर प्रणाम किया । फिर बाजे गाजे के साथ संकीर्तन करते हुये आचार्यजी को नगर के मुख्य बाजार से ले जाकर नियत स्थान पर ठहराया । सेवा का सुन्दर प्रबन्ध कर दिया । सत्संग होने लगा । धार्मिक जनता सत्संग से लाभ प्राप्त करने लगी । राजा व राज परिवार आदि के बडे - बडे सज्जन भी आचार्यजी के दर्शन करने तथा दादूवाणी का प्रवचन सुनने आते थे । 
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नाभा में अच्छा सत्संग चला । फिर आचार्य दयारामजी नाभा से पधारने लगे तब नाभा नरेश हीरासिंहजी ने ३२५) रु. भेंट आचार्यजी को दी । राजा बलवीरसिंहजी ने २००) रु. भेंट करके अति श्रद्धा भक्ति से उपदेश भी श्रवण किया । धार्मिक जनता ने श्रद्धानुसार संतों की सेवा की तथा भेंटें भी दीं तथा सब ने सस्नेह विदा किया । आचार्य दयारामजी महाराज शिष्य संत मंडल के सहित नाभा से विदा होकर भ्रमण करते हुये नारायणा दादूधाम में पधार गये ।  
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मुंगध़डा में चातुर्मास ~ 
वि. सं. १९५९ में आचार्य दयारामजी महाराज को चातुर्मास का निमंत्रण मुंगध़डा के मगनीरामजी ने दिया । आचार्यजी ने स्वीकार कर लिया । चातुर्मास का समय समीप आने पर शिष्य संत मंडल के सहित आचार्य दयारामजी महाराज का अति आदर से सामेला किया और स्थान पर लाकर ठहराया । सत्संग आरंभ हो गया । अच्छा सत्संग चला । समाप्ति पर मर्यादानुसार आचार्यजी को भेंट तथा शिष्य संत मंडल को यथायोग्य वस्त्र देकर सस्नेह विदा किया ।
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शेखावटी की रामत ~ 
मुंगध़डा से विदा होकर आचार्य दयारामजी महाराज ने शेखावटी की रामत की । इस रामत में शेखावटी के नगरों के धनी मानी साहूकारों ने, जागीरदार ठाकुरों ने, स्थानधारी साधुओं ने तथा धार्मिक साधारण जनता ने आचार्य दयारामजी महाराज का अच्छा सत्कार किया । 
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शिष्य संत मंडल के सहित आचार्यजी की सेवा भी बहुत अच्छी की, सत्संग भी स्थान-२ पर अच्छा हुआ । आचार्य दयारामजी महाराज शेखावटी में भक्तों को दादूवाणी के उपदेशों द्वारा शांति सुख प्रदान करके नारायणा दादूधाम में पधार गये ।   
(क्रमशः)

२०. अथ विपर्यय कौ अंग १/४

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२०. अथ विपर्यय कौ अंग १/४ 
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[विपर्यय = विपरीत(उलटा) । जो शब्द वाक्य(साषी एवं पद) लोकव्यवहार में सुनने में असंगत, असम्भव या बेढ़ंगा(अटपटा) प्रतीत हो; परन्तु अध्यात्म विचार से चिन्ता करने पर जिसका अर्थ उचित, यथार्थ एवं चमत्कारयुक्त लगे - ऐसे शब्द या वाक्य सन्तों की भाषा में विपर्यय कहलाते हैं । इनको ही वे उलटबाँसी भी कहते हैं । ऐसी उलटवाँसियाँ लिखने में कबीर, सन्त श्रीदादूदयाल, रज्जब जी, श्रीसुन्दरदासजी आदि सन्त सिद्धहस्त माने गये हैं ।
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श्रीसुन्दरदासजी को इस विपर्ययपद्धति से लिखना अतिशय मनोनुकूल था, अतः एव इन ने अपने सवैया ग्रन्थ में विपर्यय को अङ्ग नाम से एक दीर्घकाय प्रकरण लिखा है । उसी प्रकरण को उसी नाम से यहाँ क्रमशः पुनः संक्षिप्त(साषी) सूत्र रूप से लिख रहे हैं । अतः हम इन सभी साषियों का वाच्यार्थ स्पष्ट करते हुए अन्त में समानार्थक सवैया का संख्याबोधक अङ्ग भी दे रहे हैं । जिससे जिज्ञासु वहाँ इसका विस्तार देख सकें ।]
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सुन्दर कहत बिचारि करि, उलटी बात सुनाइ । 
नीचे कौ मूंडी करै, तब ऊंचे कौ पाइ ॥१॥
(श्रीसुन्दरदासजी इस अंग में विपरीत शब्दों के माध्यम से जिज्ञासु को हितोपदेश कर रहे हैं, जिन को जिज्ञासु विवेकपूर्वक यथार्थ में जान कर अपना हित सम्पादन कर सकेंगे । उन में प्रथम उपदेश है -)
कोई भी साधक, व्यवहार एवं साधक में नीचा शिर(नम्र हो) कर के ही उच्च(परम निर्वाण) पद प्राप्त कर पाता है ।
साषी में प्रयुक्त नीची मुंडी शब्द का यदि शीर्षासन अर्थ किया जाय तो जिज्ञासु के लिये योगशास्त्र का अभ्यास भी आवश्यक है । तभी उसे परम पद की प्राप्ति सुगम हो पायगी ॥१॥ (द्र० - सवैया : २२/छ० १ तथा परिशिष्ट में इसी छन्द की टीका ।)
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अन्धा तीनौं लोक कौं, सुंदर देखै नैंन । 
बहिरा अनहद नाद सुनि, अति गति पावै चैंन ॥२॥ 
जब कोई साधक साधना द्वारा अपनी बाह्य(लौकिक) दृष्टि(चक्षुरिन्द्रिय) पर नियन्त्रण कर लेता है तब उसकी अन्तर्दृष्टि(अध्यात्मदृष्टि) खुल जाती है । तभी वह साधक समस्त संसार(तीनों लोकों को) दिव्य(यथार्थ) दृष्टि से देख पाता है ।
इसी प्रकार, साधना करते हुए जब कोई साधक अपनी श्रवणेन्द्रिय से बाहर के सांसारिक प्रलाप सुनना रोक देता है, तब उस को ऐसा दिव्य अन्तर्नाद(अनहद नाद) सुनायी देने लगता है कि वह उसके प्रभाव से ब्रह्मानन्द सुख का अनुभव करने लगता है ॥२॥ (द्र० – सवैया : २२/छन्द सं० २)
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नकटा लेत सुगन्ध कौं, यह तौ उलटी रीति । 
सुन्दर नाचै पंगुला, गूंगा गावै गीति ॥३॥
कोई भी साधक साधना करते हुए लोक लाज का बन्धन तोड़कर(नकटा होकर) जब साधना की उच्च भूमिका में पहुँच जाता है तब वह ब्रह्मानन्द रूप कमल के पराग की सुगन्ध का अनुभव करने लगता है । (यद्यपि लौकिक दृष्टि से यह बात अयथार्थ लगती है कि कोई नासिकाविहीन पुरुष कमल की गन्ध ले सके ।)
इसी प्रकार, कोई साधक साधना द्वारा अपने मन को पंगुल(चञ्चलता रहित) बना दे तो वह इस स्थिति में पहुँच कर भगवद्भक्ति में उन्मत्त होकर अपने प्रभु के सम्मुख आत्मानन्द का अनुभव करता हुआ नृत्य करने लगता है ।
इसी प्रकार, कोई साधक साधना द्वारा अपनी वैखरी वाणी पर निग्रह कर(लौकिक दृष्टि से गूंगा होकर), परा पश्यन्ती वाणी के द्वारा ब्रह्मविचारमय सङ्गीत गाने लगता है, भगवद्भजन गाने लगता है ॥३॥ (द्र० – सवैया : २२/छ० २) ॥३॥
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कीडी कूंजर कौं गिलै, स्याल सिंह कौं खाइ । 
सुन्दर जल तैं माछली, दौरि अग्नि मैं जाइ ॥४॥
साधक के अध्यात्मविद्या में मग्न होने पर उसकी अतिसूक्ष्म चिन्तक शुद्ध ब्रह्मानन्दमय बुद्धि(कीरी = चींटी) उसके काम क्रोध आदि उन्मत्त विकारों(हाथियों) को निगल गयी । (अर्थात् साधक ने अपने अध्यात्म ज्ञान के बल से इन विकारों को नष्ट कर दिया ।)
आत्मस्वरूप को भूलकर सुप्त साधक(श्रुगाल = गीदड़) ने गुरुपदेश से प्राप्त साधनोपदेश के बल पर अपनी स्मृति को जाग्रत् कर संशय-विपर्यय रूप अध्यास(सिंह) को खा डाला । (नष्ट कर दिया) । (आत्मानुभव द्वारा उसको जगन्मिथ्यात्व स्पष्ट हो गया ।)
इसी प्रकार, पहले जीवरूपी मछली अज्ञानवश इस काया रूप जल में प्रसन्न थीं; परन्तु ब्रह्मज्ञान के उत्पन्न होते ही वह ज्ञानाग्नि में जा गिरी तब उसे यथार्थ सुख मिला । अर्थात् सत्यज्ञान के उदित होने के साथ ही अधोगतिमय संसार से मुक्त होकर उसे ऊर्ध्व गति(ब्रह्मानन्द) की प्राप्ति हो गयी ॥४॥ (द्र०- सवैया : २२/छ० ३)
(क्रमशः) 

*बाह्याचरण ॥ साषी लापचारी की ॥*

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*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*दादू उज्जवल निर्मला,*
*हरि रंग राता होइ ।*
*काहे दादू पचि मरै, पानी सेती धोइ ॥ *
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*बाह्याचरण ॥ साषी लापचारी की ॥*
अडसठि पाणियाँ धोइये, अठसठि तीरथ न्हाइ ।
कहु बषनां मन मच्छ की, अजौं कौलांधि न जाइ ॥१
(इसका अर्थ “मन कौ अंग” की साषी क्रमांक १५ में देखें ।)
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पद
भाइ रे क्या न्हाया क्या धोया ।
तीरथाँ तीरथाँ भ्रमताँ भ्रमताँ, तिल भी मैल न खोया ॥टेक॥
करिकरि पाप प्रित्थमी सगली, पाणी माँहै न्हावै ।
माहिकी का माछर की नाँई, लार अपूठौ आवै ॥
गंगा नैं गोदावरि न्हाया, पुहकर तीराँ पैली ।
आँखि उघाड़ि देखै क्यूँ नांहीं, ऊजल हुई कि मैली ॥
जण जण कै गलि बांध्यौ दीसै, ठाकुर बटुवा माँहीं ।
इहिं न छोड़ि पुहकर वाला कै, तूँ चाल्यौ काँह कै ताँई ॥
क्युँहुँ ग्यान बिचार साध की संगति, सेवौ हरि अविनासी ।
बषनां पाप बड़ा ल्होडाँ कौ, राम भजन तें जासी ॥५४॥
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तीर्थ दर तीर्थ धूम-धूमकर खूब स्नान किया, फिर भी मैल = पापों का किञ्चित मात्र भी नाश न हुआ । अतः हे भाई ! जरा चित्त में विचार करके तो देख कि तूने तीर्थों में क्या तो धोया और वहाँ नहाने से तुझे क्या-क्या लाभ हुए । अथवा तीर्थ दर तीर्थ घूमते रहने पर यदि लेशमात्र भी पापों का नाश नहीं हुआ तो नहाने तथा धोने का क्या तात्पर्य ?
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वस्तुतः पृथिवी के समस्त मनुष्य अनेकों पाप करके तीर्थों के पानी में नहाते हैं किन्तु तीर्थों में नहाना ठीक वैसे ही व्यर्थ है जैसे भैंस के पानी में नहाने के उपरान्त भी उसके ऊपर भिनकने वाली मक्खियाँ एक भी न हटकर साथ की साथ वापिस आ जाती है; मनुष्य के तीर्थों में नहा लेने पर भी पाप मनुष्य के साथ ही वापिस आ जाते हैं क्योंकि तीर्थों में नहाने से पापों की निवृत्ति नहीं होती ।
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मनुष्य गंगा और गोदावरी में नहाता है । तीर्थराज पुष्कर के सरोवर में एक तीर से दूसरे तीर तक जाकर स्नान करते हैं किन्तु आँख उघाड़ि = स्वतंत्रतापूर्वक विचार करके नहीं देखते कि वास्तव में तीर्थों में स्नान करने से पापों की निवृत्ति होकर अंतःकरण शुद्ध हुआ अथवा मिला हुआ ।
वस्तुतः तीर्थस्थान के उपरान्त भी यदि मनुष्य अपनी दुष्प्रवृत्तियाँ नहीं छोड़ता तो वे पाप अत्यन्त भयंकर हो जाते हैं और बिना भगवन्नाम के अन्य उपायों से छूटते नहीं है ।
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जने-जने के गले में ही ठाकुर का बटवा = कोथली बंधी हुई रहती है अर्थात् जब ठाकुरजी स्वयं के पास ही उपलब्ध है तब गले के भगवान को छोड़कर = भूलकर पुष्कर स्थित ब्रह्मा = भगवान् का दर्शन करने जाने का क्या तात्पर्य ? तू किसलिये दर्शन करने जाता है । कुछ तो ज्ञान का विचार साधुओं की संगति में प्राप्त करके अविनाशी हरि की सेवा = भजन ध्यान करना चाहिये ? क्योंकि छोटे तथा बड़े सभी प्रकार के पाप तीर्थाटन, तीर्थ स्नान से न कटकर रामभजन से ही कटेंगे ॥५४॥
(क्रमशः)

*५. गुरु-शिष्य निदान निर्णय का अंग ~ १३/१६*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाण टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*५. गुरु-शिष्य निदान निर्णय का अंग ~ १३/१६*
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*लोह शिष्य पारस गुरु, मेले मेलनहार ।*
*सौंधे सौं मँहगे भये, अनवांछित व्यवहार ॥१३॥*
जैसे लोहे से पारस से कुछ भी नहीं चाहता किन्तु फिर भी स्पर्श होते ही पारस लोहे को सुवर्ण बना देता है और लोह सौंधे से मँहगा हो जाता है, वैसे ही मिलने वाले भगवान गुरु-शिष्य का मेल बिना ही इच्छा मिला देते हैं और गुरु के निस्पृह व्यवहार युक्त उपदेश से शिष्य महान् बन जाता है ।
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*महन्त मयंक उदीप१ तौं, देखे सब संसार ।*
*रज्जब रार्यों२ रस परै, उन हि न आँखों प्यार ॥१४॥*
चन्द्रमा का प्रकाश१ बढ़ते ही सब संसार उसे देखता है और उसके शीतल प्रकाश से आँखों२ को आनन्द प्राप्त होता है किन्तु चन्द्रमा का तो आँखों से प्रेम नहीं है, वैसे ही गुरु रूप महन्त की महिमा सब संसार देखता है जिज्ञासुओं को आनन्द प्राप्त होता है किन्तु गुरु का कोई स्वार्थ नहीं है ।
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*सद्गुरु सलिता ज्यों बहै, हित१ हरि सागर माँहिं ।*
*रज्जब समदी२ सेवका, सहज संग मिल जाँहिं ॥१५॥*
जैसे बड़ी नदी सागर से मिलकर भी मिलने के लिये बहती है और उसके संग मिलकर छोटे नाले भी समुद्र में पहुँच जाते हैं, वैसे ही सद्गुरु हरि में मिलकर भी मिलने के साधन उपदेशादि करते ही रहते हैं और ईश्वर की भक्ति करने वाले सेवक भी उनके संग से सहज ही ईश्वर से मिल जाते हैं ।
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*रज्जब काया काठ में, प्रकटी आज्ञा आग ।*
*मन शिष निकस्या धूम ज्यों, गया गगन गुरु लाग ॥१६॥*
१६-२६ में गुरु की विशेषता बता रहे हैं - काष्ठ में अग्नि प्रगट होता है तब धूआँ आकाश में जाकर लय हो जाती है, वैसे ही गुरु की उपदेश रूप आज्ञा से ज्ञान प्रगट होता है तब शिष्य का मन शरीराध्यास से निकल कर समाधि में जाता है और ब्रह्म में लय होता हैं ।
(क्रमशः)

मंगलवार, 17 फ़रवरी 2026

*५. गुरु-शिष्य निदान निर्णय का अंग ~ ९/१२*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाण टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*५. गुरु-शिष्य निदान निर्णय का अंग ~ ९/१२*
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*चंद उदय ज्यों चाह बिन, कमल खिले अपभाय ।*
*त्यों रज्जब गुरु शिष्य ह्वै, तो दोष न दीया जाय ॥९॥*
९-१५ तक स्वार्थ रहित गुरु का परिचय दे रहे हैं - चन्द्रोदय होने पर चन्द्रमा की बिना इच्छा ही अपने भाव से चन्द्रमुखी कमल खिलते हैं, वैसे ही सद्गुरु के दर्शन होने पर यदि कोई अपने भाव से शिष्य बनता है तो गुरु को स्वार्थी होने का दोष नहीं दिया जा सकता ।
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*चंदन करि बदले वनी, पारस पलटे लोह ।*
*त्यों रज्जब शिष काज कर, गुरु ज्ञाता निरमोह ॥१०॥*
जैसे चन्दन की सुगन्धि द्वारा वन बदलता है, पारस से लोह बदलता है, वैसे ही शिष्य को बदलने का काम करके भी ज्ञानी गुरु शिष्यों में मोह नहीं करते ।
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*सद्गुरु सूरज शशिहर संदल१, पुनि पेखे त्यों हमाय२ ।*
*रज्जब पंचहुँ प्राण पोषिये, स्वारथ रहित सुभाय३ ॥११॥*
सद्गुरु सूर्य चन्द्रमा, चन्दन१ और हुमा२ पक्षी इन पाँचो को ही देखिये प्राणियों का पोषण करके भी स्वभाव३ से ही स्वार्थ रहित रहते हैं ।
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*जिहिं छाया ह्वै छत्रपति, सो हित रहित हमाय ।*
*त्यों रज्जब गुरु शिष्य गति, दुहुँ में कौन कमाय ॥१२॥*
जिस हुमा पक्षी की छाया शिर पर पड़ने से मनुष्य राजा हो जाता है, वह पक्षी अपने स्वार्थ के लिये तो छाया नहीं पटकता, वैसे ही गुरु भी अपने स्वार्थ के लिए उपदेश नहीं देते । हुमा और गुरु इन दोनों में से कौन- सा क्या कमाता है ? कुछ नहीं, अत: स्वार्थ रहित हैं ।
(क्रमशः)

नाम चिन्तन ही परम सुख

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*॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥*
*॥ दादूराम~सत्यराम ॥*
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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१६ आचार्य दयारामजी ~ 
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एक दिन पटियाला नरेश उपेन्द्रसहजी सत्संग समाप्ति के पश्‍चात् कुछ ठहरे रहे । सब श्रोताओं के चले जाने के पश्‍चात् राजा उपेन्द्रसिंहजी ने पूछा मनुष्य की क्या राशि है ? पास बैठे हुये साधु बोदूरामजी ने कहा- सिंह राशि है । बोदूरामजी का उक्त वचन सुनकर राजा उपेन्द्रसिंहजी ने उनसे कहा- मैं आपसे नहीं पूछ रहा हूँ, महाराज से पूछ रह हूं । 
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यह सुनकर आचार्य दयारामजी महाराज बोले- राजन् ! राशि जेवडी के विचार के लिये हमें दादूजी महाराज ने अवकाश ही नहीं दिया है । उसकी खोज के लिये हमारे को अवकाश होता तो अवश्य बता देते । हमें दादूजी महाराज ने जो कहा हैं, उसी कार्य में अवकाश नहीं मिल रहा है देखिये-  
‘‘दादू नीका नाम है, तीन लोक तत सार ।  
रात दिवस रटबों करी, रे मन यही विचार ॥’’
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अर्थात् दादूजी महाराज कहते हैं- हे सुख की इच्छा करने वाले मानव ! परमात्मा का नाम चिन्तन ही परम सुख का सुन्दर साधन है । अन्य अर्थादि साधन से परम सुख नहीं मिलता, दु:ख से मिश्रित अल्प सुख ही मिलता है । परमेश्‍वर का नाम तीनों लोकों के सार तत्त्व परब्रह्म को प्राप्त करने का श्रेष्ठ उपाय है । अत: अन्य सब उपायों को त्याग करके एक परब्रह्म के नाम का ही चिन्तन करो । 
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रे चपल मन मानव ! भली भाँति विचार करके  यह उक्त उपाय अर्थात् दिन रात नाम चिन्तन ही कर । राजन् ! उक्त प्रकार दादूजी महाराज हमें रात दिन नाम चिन्तन की आज्ञा देते हैं । रात दिन को छोडकर अन्य कौन सा समय है जिस में हम राशि जेवडी का विचार करें । इतना कहकर आचार्य दयारामजी मौन हो गये ।
फिर राजा उपेन्द्रसिंह ने भी नत- मस्तक  होकर मान लिया कि - आपका यह विचार अति उत्तम है । महात्माओं को तो भजन ही करना चाहिये । आगे मैं भी किसी संत से ऐसा प्रश्‍न नहीं करुंगा । फिर राजा प्रणाम करके राजभवन को चला गया । उक्त घटना से दयारामजी महाराज की बुद्धि का परिचय मिलता है । 
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कुछ समय तक पटियाला की जनता को अपने दर्शन तथा उपदेशों से आनन्दित करते हुये पटियाला में निवास किया । पटियाला से पधारने लगे तब पटियाला नरेश उपेन्द्रसिंहजी ने अति श्रद्धा भक्ति से आचार्य दयारामजी महाराज के ७००) रु. भेंट किये । पटियाला की भक्त जनता ने भी अपनी-अपनी श्रद्धा के अनुसार भेंटें दीं और राजा प्रजा ने सस्नेह आचार्य दयारामजी महाराज को विदा किया ।  
(क्रमशः) 

 

*१९. साधु कौ अंग ५७/६०*

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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*१९. साधु कौ अंग ५७/६०*
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सुन्दर कोऊ साधु की, निंदा करै लगार । 
जन्म जन्म दुख पाइ है, ता महिं फेर न सार ॥५७॥
श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - यदि कोई दुष्ट आदमी 'सन्त' की निरन्तर निन्दा करता है तो वह उसके फलस्वरूप अनेक जन्मों तक दुःख पाता रहेगा । मेरी इस बात में तुम कुछ भी मिथ्या न समझना ॥५७॥
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सुन्दर कोऊ साधु की, निंदा करै कपूत । 
ताकौं ठौर कहूं नहीं, भ्रमत फिरै ज्यौं भूत ॥५८॥ 
यदि कोई कुपुत्र(कपूत) साधु की निन्दा करता है तो समझ लो कि ऐसे निकृष्ट आदमी को, खोजने पर भी, कोई शरणस्थल नहीं मिलेगा । वह इस संसार में, मरणपर्यन्त, भूत के समान इधर से उधर चक्कर लगाता ही रह जायगा ॥५८॥
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संतनि की निंदा कियें, भलौ होइ नहिं मूलि । 
सुन्दर बार लगै नहीं, तुरत परै मुख धूलि ॥५९॥
सन्तों की निन्दा करने वाले का कभी कुछ भी भला नहीं हो सकता । ऐसे सन्तों के निन्दक की समाज में अप्रतिष्ठा होने में कोई विलम्ब नहीं लगता । जिस के कारण उस को अन्त में लज्जित ही होना पड़ता है ॥५९॥
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संतनि की निंदा करै, ताकौ बुरौ हवाल । 
सुन्दर उहै मलेछ है, उहै बडौ चण्डाल ॥६०॥
इति साधु की अंग ॥१९॥
समाज में जो सन्तों की निन्दा करेगा, अन्त में उस की दुर्दशा ही होगी । समाज या तो उसे म्लेच्छ(= अनार्य = अनाड़ी) कहेगा या निकृष्ट(गया गुजरा) चाण्डाल(हीन समाज या वर्ग में जन्मा) कहेगा । अतः सन्त की निन्दा कभी नहीं करना चाहिये ॥६०॥
इति साधु का अंग सम्पन्न ॥१९॥ 
(क्रमशः) 

*भक्ति माहात्म्य ॥*

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*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*अंधे अंधा मिल चले, दादू बंध कतार ।*
*कूप पड़े हम देखतां, अंधे अंधा लार ॥*
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*भक्ति माहात्म्य ॥*
न्यारी रे न्यारी रे गोबिंदा की भगती, न्यारी रे ।
काँही काँही निर्मलै हिरदै धारी रे ॥टेक॥
माँहे मैलौ मंनि कालौ, ऊपराँ पाणी पखालै ।
सुचि असी हसती न्हबालै, तिती पाछै धूल रालै ॥
बिषै गावै बिषै सुनावै, बिषै की देसि दिखावै ।
बेद नैं साखी बुलावै, क्याँहनैं पिरथी भरमावै ॥
बकता जो बाकि सुणाई, सुरता कै हिरदै आई ।
तामैं जाण न दीन्हीं काई, मन मैं राखी सवाई ॥
आंधा की बाँह आँधै झाली, तिहि कै सँगि सब दुनिया चाली ।
ले डबोई बिषै माँहीं, नीसरतौ को दीसै नाँहीं ॥
तीनि गुण थैं निर्मल न्यारी, सो परमेस्वर नैं भगति पियारी ।
बषनां साधाँ विचारी, बेदो गति गीता पुकारी ॥५३॥ 
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गोविन्द की अनन्य, अहैतुकी भक्ति उस भक्ति से सर्वथा विलक्षण = न्यारी है, जिसको जगत् के भ्रमित लोग करते हैं । कोई-कोई निर्मल चित्त वाले भक्त ही इस विलक्षण भक्ति को धारण करते हैं । भ्रमित लोग जिस प्रकार की भक्ति करते हैं, उसका विवरण देते हुए कहते हैं, ऊपर से शरीर को जल से स्नान कराकर उज्जवल = मल रहित करते हैं किन्तु अंदर में, मन में काम-क्रोध-लोभ-मोह-मद-मात्सर्य, दुराचार भरे होने से मैला = मल सहित ही रहते हैं । 
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इनकी पवित्रता ठीक वैसी ही है जैसी हाथी की, जो खूब मल-मल कर नहलाने के उपरांत भी अपनी सूंड से अपने ऊपर मिट्टी डाल लेता है । ये लोग विषय = श्रृंगार रस का ही गायन करते हैं और उसी को दूसरों को गा गाकर सुनाते हैं तथा विषयों की ओर दृष्टि जाये, ऐसा ही मार्ग बताते हैं । अपनी बातों की पुष्टि में साक्षी के रूप में वेदों का उद्धरण देते हैं और विषयभोगों के लिये पूरी पृथिवी पर भ्रमते-फिरते हैं । 
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ऐसे भ्रमित वक्ता जिस विषय का कथन करते हैं, विषयी श्रोता उसी को यथातथ्य मानकर अपने हृदय में धारण कर लेते हैं । विषयी श्रोता उन कामुक और विषयभोगों से युक्त बातों को मन में सवागुनी संचित करके रखते हैं; उनमें से त्यागते तो एक बात को भी नहीं हैं । वस्तुतः इन लोगों की स्थिति ठीक वैसी ही होती है जैसी किसी अंधे ने अंधे की बाँह पकड़ ली हो और मार्ग दिखाने का उपक्रम कर रहा हो । 
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यथार्थ में इन अविवेकी उपदेशकों-मार्गदर्शकों के मार्गदर्शन में ही सारी दुनिया चल रही है । इन्होंने सारी दुनिया को विषय भोगों में डुबो दिया है । उनमें से कोई उन विषय भोगों रूपी समुद्र में से निकलता हुआ नहीं दिखाई देता । परमेश्वर को वह भक्ति प्रिय है जो तीनों गुणों से असम्पृक्त हुए निर्मल मन से की जाये । बषनां कहता है, साधु-संतों ने उसी भक्ति को अंगीकार किया है जिसका कथन वेदों में, गीता में किया गया है ॥५३॥    
(क्रमशः)

सोमवार, 16 फ़रवरी 2026

उतराधों के चातुर्मास ~

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*॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥*
*॥ दादूराम~सत्यराम ॥*
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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१६ आचार्य दयारामजी ~ 
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उतराधों के चातुर्मास ~
आचार्य दयारामजी महाराज का प्रथम चातुर्मास वि. सं. १९५५ का संपूर्ण उतराधे साधु मंडल ने करवाया । वह चातुर्मास मर्यादा पूर्वक बहुत अच्छा हुआ था । उतराधों को पूजा का दस्तूर भी चातुर्मास के अन्त में ही दिया गया था । चातुर्मास करके  भ्रमण करते हुये नारायण दादूधाम पधारे ।
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छोटाराम जी के चातुर्मास ~  
वि. सं. १९५६ में आचार्य दयारामजी को चातुर्मास का निमंत्रण छोटारामजी ने दिया था । आचार्य दयारामजी महाराज ने अपने मंडल के सहित जाकर चातुर्मास किया था । चातुर्मास मर्यादा पूर्वक अच्छा हुआ था । चातुर्मास के पश्‍चात् शेखावटी की रामत में पधारते हुये आचार्य दयारामजी महाराज को शेखावटी की निजामत के नाजिम व सभी सामलात के अहलकारों ने आकर भेंट की थी ।
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उतराध की रामत ~ 
वि. सं. १९५७ में उतराध की । रामत की उतराधे स्थानधारी साधुओं व सेवकों ने सभी स्थानों में आपका अच्छा सम्मान किया व सेवा की । उतराध की रामत करते करते आचार्य दयारामजी महाराज पटियाला की ओर आगे बढे और पटियाला के पास जाकर परंपरा की मर्यादा के अनुसार पटियाला नरेश को अपने आने की सूचना दी । 
पटियाला प्रवेश ~
सूचना मिलने पर अपनी कुल परंपरा के अनुसार पटियाला नरेश उपेन्द्रसिंहजी राजकीय लवाजमा व भक्त मंडल के साथ संकीर्तन करते हुये आचार्य दयारामजी की अगवानी करने आये । 
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मर्यादा के अनुसार भेंट चढाकर प्रणामादि शिष्टाचार करके बाजे गाजे के साथ संकीर्तन करते हुये बडे ठाट बाट से नगर के मुख्य बाजार से होकर नियत स्थान पर ले जाकर ठहराया । सेवा का सुन्दर प्रबन्ध राजा उपेन्द्रसिंहजी ने करवा दिया । राजा भी सत्संग के लिये आता था और प्रजा भी अच्छा संख्यामें सत्संग करने आती थी । 
(क्रमशः)