शनिवार, 22 अगस्त 2026

*२६. भजन प्रताप का अंग ~२५/२८*

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*🌷卐 सत्यराम सा 卐🌷*
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*२६. भजन प्रताप का अंग ~२५/२८*
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*रज्जब अज्जब काम है, जे सुमिरे कोउ जंत१ ।*
*सकल लोक शिर कीजिये, उर सेवक भगवंत ॥२५॥*
परमात्मा का स्मरण अदभुत कार्य है यदि कोई जीव१ निरंतर अपने हृदय में स्मरण करता है, तो उस भक्त को भगवान् संपूर्ण लोकों के शिरोमणि अपने स्वरूपमय ही कर लेता है ।
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*सब विधि नर के काम को, नाम निरंजन सत्ति१ ।*
*जन रज्जब जो ज्यों भजे, ताकि मोटी मत्ति२ ॥२६॥*
मनुष्य की कार्य सिद्धि के लिये सब प्रकार निरंजन राम का नाम ही सच्चा१ हेतु है, जो मनुष्य जैसे तैसे भी निरंजन का भजन करता है, तो उसकी बुद्धि२ विशाल ही कही जाती है ।
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*पति परमेश्वर वीरज नाम, अबला आतम रति१ रुचि ठाम ।*
*मेला या सम कोई नाँहिं, विगति२ बाल ब्रह्म उपजे माँहिं ॥२७॥*
परमेश्वर पति है, नाम वीर्य है, आत्मा नारी है, आत्मा का परमात्मा से प्रेम ही काम-क्रीड़ा१ के स्थानापन्न है, उक्त मिलन के समान संसार में कोई भी मिलन नहीं हो सकता है, इस मिलन से ही हृदय में मुक्ति-प्रदाता२ ब्रह्म-ज्ञान रूप बालक उत्पन्न होता है ।
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*नाम निधारे१ धार बहु, काटे साँकल कोङि ।*
*रज्जब हद हथियार यहु, हथियारहु की वोङि२ ॥२८॥*
निरंजन नाम अज्ञानियों को धाररहित१ भासता है, किन्तु उसके बहुत तीक्ष्ण धार है, तभी तो ज्ञान द्वारा कोटि कर्म रूप जंजीरों को काट डालता है, इस नाम रूप हथियार ने तो हद्द कर दी है, यह हथियारों की सीमा२ का हथियार है, अर्थात सर्व श्रेष्ठ हथियार है ।
(क्रमशः)

शुक्रवार, 21 अगस्त 2026

*४६. परमारथ कौ अंग ३७/४०*

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*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
*श्रद्धेय श्री @महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी, @Rgopaldas Tapsvi, बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ @Premsakhi Goswami*
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*४६. परमारथ कौ अंग ३७/४०*
उतपति ए सब रांम थैं, प्रलै काल मन जोइ ।
कहि जगजीवन रांम बिन, खाली ठौर१ न कोइ ॥३७॥
(१. खाली ठौर=रिक्त स्थान)
संत जगजीवन जी कहते हैं कि सब उत्पत्ति सेहोती है व मन द्वारा प्रलय होती है । हर स्थान पर प्रभु है उनके बिना कोइ स्थान नहीं है ।
रांम धरा धर ब्योम धर, रांम सकल धर धीर ।
कहि जगजीवन रांम अधर हरि, रांम निरंजन थीर ॥३८॥
संत जगजीवन जी कहते हैं कि राम धरती आकाश व सर्वत्र विराजते हैं राम बिना आधार है और सब राम से ही आधार पाते हैं । वे निरंजन स्थिर हैं ।
पाप परहिंडौ२ परसतां, मारजनी३ कर साह ।
कहि जगजीवन खंडणी४, चाकी५ चूल्ही६ चाह ॥३९॥
(२. परहिंडो=घर में पेय जल रखने का स्थान)   {३. मारजनी=मार्जनी(झाड़ू)} (४. षंडणी=मिर्च मसाला पीसने की शिला या ओखली)  (५. चाकी=गेहूँ पीसने की चक्की)   (६. चूल्ही=रोटी, दाल, भात बनाने का स्थान)
संत जगजीवन जी कहते हैं कि जहां के परिंडे में पाप स्पर्श हो जहाँ झाडूसाह के हाथ हो जो सब साफ करदे चाहे पुण्य हो या पाप वहां कैसी चौका चूल्हा व  सिला हो ।
ए पंच दोष७ तब ऊतरै, जब ग्रिहि भोजन ले साध ।
कहि जगजीवन हरि भगत, सुमिरै अलख अगाध ॥४०॥
(७. पंच दोष=पाँच सूना । १. चूल्हा, २, चक्की, ३. ओखली, ४. घड़ा, ५. झाड़ू) -गृहस्थ धर्म में ये पाँचों हिंसा के स्थान है । यदि कोई गृहस्थ किसी साधु को नित्य भिक्षा दे तो उसके ये दोष नष्ट होते रहते हैं ।  
संत जगजीवन जी कहते हैं कि परिंडा जहाँ पीने योग्य जल है चूल्हा चक्की ओखली व झाड़ू ये पांच के हिंसात्मक दोष साधुजन को नित्य भोजन या भिक्षा कराने से नष्ट हो जाते हैं ।
(क्रमशः)  

दीपराम जी

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🌷*卐 श्री दादूदयालवे नम:  卐*🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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*दादू जे साहिब कौं भावै नहीं,*
*सो हम थैं जनि होइ ।*
*सतगुरु लाजै आपणा, साध न मानैं कोइ ॥*
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दीपराम जी = दीपरामजी हरजीरामजी गुढ़ा वालों के शिष्य थे । आप भी भजनानन्दी महान् तितिक्षु संत थे । दीपरामजी के समय में एक राजपूत पहाड़ी पर खैरी काटने लगा, तब दीपरामजी ने कहा~इस झाड़ी के खैरी क्यों काटते हैं । यह बाबाजी हरजीरामजी के नाम से रक्षित है । उस राजपूत ने कहा~ चलरे मोडे, यह तो कटेगी । तब दीपरामजी महाराज वहां से चल दिये । उनके चले जाने के पश्चात् भारी हिमपात और जोर से आँधी आई । सब शाखें नष्ट हो गईं  । फिर ग्राम के सब लोग दीपरामजी के पास गये । खैरी काटने वाले राजपूत ने क्षमा माँगी फिर अति अनुनय विनय करके दीपरामजी को लौटा कर आश्रम लाये । दीपरामजी महान् संत थे । 
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जयरामदासजी =  जयरामदासजी उक्त दीपरामजी के ही शिष्य थे । खंडेलावाटी में डूक्यागोवटी के पास बड़सींगपुरे में हुये हैं । कुकणवाली ग्राम में भी उनका जाना आना था । आप भी अपने गुरुदेव दीपरामजी के समान ही भजनानंदी थे । त्यागी तथा तत्त्ववित् महात्मा थे । दादूवाणी का विचार करते रहते थे । निर्गुण ब्रह्म की उपासना करते थे । 
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५ तोलारामजी ~ तोलारामजी गोड़जी का गुढ़ा में ही रहते थे । हरजीरामजी के समकालीन ही थे । हरजीरामजी को भी कभी २ सचेत किया करते थे । परमविरक्त भजनानन्दी थे । आप भविष्य की बात भी जान जाते थे । खेतड़ी नरेश की मृत्यु की बात आपने हरजीरामजी को पहले ही कह दी थी और कहा~ यदि अपनी आयु देकर जीवित करना हो तो जाना और जीवित करने का सामर्थ्य नहीं हो तो नहीं जाना । जीवित नहीं कर सकोगे तो साधुओं की बदनामी होगी । 
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अन्य भी हरजीरामजी और तोलारामजी की  गोष्टीकी बात गौड़जी के गुढ़ा में प्रचलित है । वहां के लोग तोलारामजी को हरजीरामजी का गुरु भाई ही बताते हैं । वहां तोलारामजी की बगीची प्रसिद्ध है : मैं वहां गया था तब शौच स्नानादि के लिये तोलारामजी की बगीची पर ही गया था । बगीची में तोलारामजी के चरणचिन्ह भी हैं किन्तु चरणों की पूजा करने वालों की कृपा से अक्षर पढ़ने लायक नहीं रहे अतः समय का ठीक ज्ञान नहीं हो सका । 
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हरजीरामजी की शिष्य परम्परा के संत किशनदासजी ने अपनी संपत्ति चौथका खीचड़ा नारायणा दादूद्वारा के मेले के समय बनता रहे, इसलिये नारायणा के वर्तमान आचार्य को दे थी । आचार्य कृष्णदेवजी महाराज की शिष्य परम्परा के स्थान~१- गौड़जी का गुढ़ा २- मेड़ता शहर ३- जयपुर शहर घाट चौकड़ी रास्ता मोतीसिंह भौमिया ४- नारायणा ५- बोराबड । इति श्री तृतीय अध्याय समाप्तः ३ । 
(क्रमशः)

*२६. भजन प्रताप का अंग ~२१/२४*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*२६. भजन प्रताप का अंग ~२१/२४*
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*पंसेरी पिछले पले, अगले वित्त१ व्यवहार ।*
*फड़का२ माँडहिं कौन दिशि, वेता३ करो विचार ॥२१॥*
तुला से वस्तु तोलते हैं तब पंसेरी तो पिछले पलड़े में रहती है और वस्तु अगले पलड़े में, धन१ देने का व्यहवार लेने देने का व्यवहार अगले पलड़े की वस्तु लेने के लिये किया जाता है और वस्तु लेने वाला पल्ला२ भी किस ओर बिछाता है ? अर्थात वस्तु वाले पलड़े की ओर ही बिछाता है । हे ज्ञानी३ ! इसका विचार करो, वस्तु तोलने में निमिति होने पर भी पंसेरी का विशेष महत्त्व नहीं, वस्तु का ही है । वैसे ही मूर्ति आदि के निमित्त से भजन किया जाता है, तो भी मूर्ति आदि का विशेष महत्व नहीं, भजन का ही है । जैसे धन से वस्तु मिलती है, वैसे ही भजन से भगवान के दर्शन मिलते हैं ।
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*रज्जब अंडे भाव के, पंखी प्राण सु दीन ।*
*सेवा के बल सुत भये, ठाहर कछू न कीन ॥२२॥*
पक्षी जिस स्थान में अंडे देता है, उस स्थान का विशेष महत्व नहीं । कारण स्थान तो कुछ भी नहीं करता, वे तो पक्षी की सेवा के बल से ही बच्चे बनते हैं । वैसे ही साधक प्राणी किसी तीर्थ स्थान में रहकर भगवान में भाव करता है तब तीर्थ स्थान भाव का पोषण नहीं करता, वह तो साधक की भक्ति के बल से ही आगे भगवत् साक्षात्कार रूप अवस्था को प्राप्त होता है वह भजन का ही प्रताप है स्थान का नहीं ।
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*तृण तरु बेली अग्नि बिन, वह्नि१ ताखे२ व्याल३ ।*
*पावक प्रकटे सकल मध्य, सो पन्नग४ पर जाल ॥२३॥*
धास, वृक्ष, लता और अग्नि के बिना ही तक्षक१ सर्प२ में विषग्नि३ उत्पन्न होता है और वह सर्प४ उसी से अन्य को जलाता है, वैसे ही तीर्थ स्नान, माला, मूर्ति आदि बाह्म साधनों के बिना ही अन्तरंग साधना रूप भजन से सभी साधकों में ज्ञानाग्नि प्रकट होता है और स्वरूप से भिन्न अज्ञानादि को जला देता है, यह भजन का ही प्रताप है, अन्य का नहीं ।
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*साधू सविता१ की कला२, शब्द सदा परकाश ।*
*वहि सुनतों वहि देखतों, उर आँख्यों तम नाश ॥२४॥*
संत सूर्य१ के तेज२ के समान हैं, जैसे सूर्य का प्रकाश आँखों से देखने पर देखने वालों के अँधकार को सदा ही हर लेता है, वैसे ही संत का शब्द सुनने वालों के हृदय का अज्ञान सदा के लिये नष्ट कर देता है ।
(क्रमशः) 

*२६. भजन प्रताप का अंग ~१७/२०*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*२६. भजन प्रताप का अंग ~१७/२०*
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*सूखी शूली सौं हरि, भई भरथरी भाय ।*
*जन रज्जब ता जुगल में, पर हिं कौन के पाय ॥१७॥*
भर्तृहरि के सच्चे भाव से शूली सूखी होने पर भी हरी हो गई, यह देखकर शूली और भर्तृहरि इन दोनों में से लोग किस के चरणों में पड़ते हैं ? अर्थात भर्तृहरि के भजन का प्रताप से ही हरी हुई थी, अत: भर्तृहरि के चरणों में प्रणाम किया जाता है ।
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*जल थल महियल१ खंभ खँग२, विष वह्नि३ अहि४ लाय ।*
*रज्जब इष्ट५ न अष्ट में, बन्दहिं६ वन्दे७ भाय८ ॥१८॥*
प्रह्लाद जल में नहीं डूबा, पर्वत से नीचे स्थल में डालने से नहीं मरा, पृथ्वी१ में दबाने से, तलवार२ से काटने से विष देने से, अग्नि३ में डालने से, सर्प४ कटाने से भी नहीं मरा, खंभ से नृसिंह प्रकट हुए, इन उक्त अष्ट में से किसी का भी पूज्य५ भाव नहीं हुआ, सभी भक्त८ के भजनयुक्त सुन्दर भाव७ को ही प्रणाम६ करते हैं, अर्थात उक्त सभी कार्य भजन के प्रताप से ही सिद्ध हुये हैं ।
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*शिला तिराई समुद्र शिर, बँधी वरूण पर पाज ।*
*पै रज्जब वन्दन समय, रामचंद्र सौं काज ॥१९॥*
नल नीर ने समुद्र पर शिला तिराई, समुद्र पर सेतु बाँधा गया, किन्तु इसमें नल नील तथा समुद्र की विशेषता जानकर कोई नल नीर वा समुद्र को प्रणाम नहीं करते ! इस कार्य के लिये प्रणाम करते समय रामचन्द्रजी को ही प्रणाम करते हैं, इसी प्रकार भक्त के जीवन में जो भी विशेष घटना घटित होती है, वह उसके भजन के प्रताप से ही होती है और उसके लिये धन्यवाद भक्त को ही दिया जाता है ।
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*लोह तेल दिब१ ना दहै, सतवादी सु शरीर ।*
*तो रज्जब तिहुं तत्त्व२ में, कौन वन्दिये वीर३ ॥२०॥*
प्राचीन काल में उष्ण लोह चिपकाने तथा गर्म तेल के कहाड़ में डालने का कठोर दंड दिया जाता था, तब निर्दोषी सत्यवादी के शरीर को वे नहीं जलाते थे और सत्यासत्य का निर्णय करने के लिये पीपल का पत्ता हाथ पर रखके वा कच्चे धागे हाथ पर लपेट के उस पर अति गर्म लोहा का गोला१ रखते थे । वह निर्दोषी सत्यवादी के हाथ पर लपेट के उस पर अति गर्म लोह का गोला रखते थे । वह निर्दोषी सत्यवादी के हाथ को नहीं जलाता था, तो हे भाई३ ! अब सोचिये उक्त उष्ण लोह, तेल और लोह का गोला इन तीन वस्तुओं२ में किस की पूजा जाय ? अर्थात पूज्य तो सत्यवादी ही है, उसके सत्य के कारण उक्त तीनों नहीं जलाते, असत्यवादी और दोषी को तो जलाते ही हैं । वैसे ही भक्त के जीवन की विशेषताओं में भक्त का भजन ही हेतु है, अत: वह भजन का ही प्रताप है ।
(क्रमशः)

*२६. भजन प्रताप का अंग ~१३/१६*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*२६. भजन प्रताप का अंग ~१३/१६*
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*मंदिर सह मूरति फिरी, मुई जिलाई गाय ।*
*नामदेव के भजन की, जन रज्जब बलि जाय ॥१३॥*
मंदिर के सहित मूर्ति फिर गई तथा मरी हुई गाय को जीवित करदी, अत: नामदेव के भजन की मैं बलिहारी जाता हूँ । विशेष ईष्यार्लु व्यक्तियों ने गाय को मार के नामदेव के द्वार पर पटक दी थी और नामदेव ने गाय मार दी यह प्रचार किया था, फिर नामदेव ने संकीर्तन करते हुये गाय को जीवित कर दिया था ।
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*नामदेव दिब१ साचे देखो, भरथरि शूली धना सुखेत ।*
*चार्यों चेतन पूजिये, रज्जब जड़ों न हेत ॥१४॥*
नामदेव के लिये मंदिर फिरा तब मंदिर की महिमा न होकर नामदेव की ही हुई । सत्यासत्य का निर्णय करने पर लोह-गोला१ की महिमा नहीं होती किन्तु सच्चे मनुष्य की ही होती है । भर्तृहरि को चोर मानकर शूली लगाई, तब शूली हरी होकर न लगने से शूली की महिमा नहीं हुई, भर्तृहरि की ही हुई । बिना बीज खेत उत्पन्न होने से खेत की महिमा नहीं हुई, धन्ना की ही हुई । परिवर्तन रूप चमत्कार उक्त मंदिरादि चार जङों में दिखाई देता है किन्तु पूजे जाते हैं नामदेवादि चेतन ही, उनकी पूजा में जड़ मंदिरादि हेतु नहीं है उनका भजन ही है ।
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*दास भाव निज दास का, दीपक राग व्यवहार ।*
*अश्मदेव तमहर जगे, धन्य जगावन हार ॥१५॥*
भगवान के निजी भक्त के दास भाव का व्यवहार दीपक राग के समान है, जैसे यर्थात रूप में दीपक राग गाने से अंधकार हटाने वाला दीपक जग जाता है, वैसे ही भक्त के यर्थात भाव से पत्थरमय परमात्मादेव की उपासना से भी अज्ञानांधकार को नष्ट करने वाला आता है ज्ञान जग जाता है, इस पर पत्थरमय देव को धन्यवाद नहीं मिलता, किन्तु उसे जगानेवाला उपासक को ही दिया जाता है ।
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*जे बिन बीजहिं खेती भई, तो खेतहिं क्या अधिकार ।*
*जन रज्जब धनि धनि धना, कहै सकल संसार ॥१६॥*
यदि बिना बीज बोय ही खेती उत्पन्न हो गई तो खेत को उसके उत्पन्न होने के धन्यवाद का क्या अधिकार है ? अर्थात नहीं, सब संसार धन्ना भक्त को ही धन्य कहते हैं, कारण धन्ना के भजन के प्रताप से ही खेत निपजा है ।
(क्रमशः)

हरजीरामजी

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🌷*卐 श्री दादूदयालवे नम: 卐*🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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*दादू जे नांही सो सब कहैं, है सो कहै न कोइ ।*
*खोटा खरा परखिये, तब ज्यों था त्यों ही होइ ॥*
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हरजीरामजी ने तोलारामजी की बात मान ली । हरजीरामजी जीवित राजा से नहीं मिल पाये । वह इनके पहुँचने से कुछ पहले ही मर गया था । फिर हरजीरामजी ने अपनी शक्ति से या अपनी आयु देकर किसी भी प्रकार राजा को जीवित कर दिया था । इससे खेतड़ी नरेश तथा खेतड़ी राज परिवार की आप पर बहुत श्रद्धा थी । इत्यादिक चमत्कार की कथा ये गौड़जी के गुढ़े में प्रसिद्ध है ।
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उस समय उस प्रदेश में दादू पंथी तीन संत सिद्ध पुरुष थे १~ हरजीरामजी २~ तोलारामजी और ३~ गौड़जी के गुढ़े से कुछ ही दूर भोड़की के परमहंसजी भी भी महान् संत थे । जब हरजीरामजी परमहंसजी से मिलने अपने स्थान से चलते तो महान् योगेश्वर परमहंसजी को अपनी योगशक्ति से ज्ञात हो जाता तब वे अपनी कालीभर से चल देते । दोनों की कुटियाओं के बीच मार्ग में नीम्बावाली स्थान पर मिल जाते । फिर कुछ देर हरिचर्चा सत्संग करके जाने लगते तब हरजीरामजी एक पैर ऊंचा उठाते और परमहंसजी मुख फाड़ देते । फिर अपने २ मार्ग से चल देते ।
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एक समय एक सत्संगी सज्जन ने जो कई बार आपके उक्त व्यवहार को देख चुका था, परमहंसजी से पूछा~ भगवन् ! हरजीरामजी के पैर ऊपर उठाने का और आपके मुख फाड़ने का आशय क्या है ? कृपा करके बताइये । परमहंसजी ने कहा~ हरजीरामजी का तात्पर्य है कि इस पैर को ऊंचा करता हूं इतनी देर में ही प्राण निकल जाता है । इसलिये कृपा रखना फिर मिलन का तो क्या भरोसा है । मेरा मुख फाड़ना का भी यही तात्पर्य है मैं मुख फाड़ कर उनका समर्थन करता हूँ कि आप ठीक ही कहते हैं, मुख फाड़ते हैं इतनी देर में श्वास निकल जाता है । अतः आप भी कृपा रखना ।
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इससे सूचित होता है कि दोनों ही संत परम विरक्त थे । विरक्त संतों की यही भावना रहती है । स्थान- प्रथम स्थान मालपर्वत की थूमड़ी(कुटिया) हैं । गढ़ी चोमू ठाकुर ने, बीच का महल, दादू मंदिर राजा रामसिंह जयपुर ने, जल के कुंड महारावल समोद ने बनाये । गुढ़ा ग्राम में तीन हवेली हैं, दस दुकानें हैं । ये सब भी भक्तों की ही बनाई हुई हैं । नारायणे में हरजीरामजी का चौभीता महल भी प्रसिद्ध है । हरजीरामजी के ब्रह्मलीन होने पर उनकी समाधि स्मारक रूप विशाल छत्री खेतड़ी नरेश ने बनवाई थी ।
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उस छत्री में शिलालेख है~
श्रीरामजी,
दोहा~ “सागर नागर कुल विषै, शुभ तनु परम उदार ।
श्री दादू भू विमल यश, भये अंस अवतार ॥१॥
ताके पंथ में अवतरे, सिद्ध दिगंबर धीर ।
वर श्री हरजीरामजी, नृप कुल अद्भुत वीर ॥२॥
भये तपो धन तेज धन, शोभा भई अपार ।
लोक राज पूजत भये, जानि धर्म निजसार ॥३॥
वृद्ध भये तन त्यागियो, भज श्री पति सुख सार ।”
इसका अगला पाठ ठीक पढ़ने में नहीं आया । हरजीरामजी की समाधि पर भादवा में मेला भरता है ।
(क्रमशः)

*४६. परमारथ कौ अंग ३३/३६*

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*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
*श्रद्धेय श्री @महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी, @Rgopaldas Tapsvi, बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ @Premsakhi Goswami*
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*४६. परमारथ कौ अंग ३३/३६*
कहि जगजीवन रांमजी, दया धरम जहँ होइ ।
प्रेम भगति फूलै फलै, दुक्ख न व्यापै कोइ ॥३३॥
संत जगजीवन जी कहते हैं कि हे प्रभु जी जहाँ दया व धर्म होता है वहां भक्ति प्रेम फलता फूलता है और कोइ दुख नहीं व्यापता है ।
पर उपकारी गगन धर, पर उपकारी नीर ।
कहि जगजीवन पर उपकारी, दादूदास कबीर ॥३४॥
संत जगजीवन जी कहते हैं कि संत जन गगन जैसै परोपकारी होते हैं जो सब पर आवृत होता है जल प्रकाश वायु सभी देता है जल भी परोपकारी है संत दादू जी महाराज व कबीर साहिब भी परोपकारी संत है जो लोककल्याण की बात करते हैं ।
पर उपकारी आप हरि, अबिगत अलख अगाध ।
कहि जगजीवन पर उपकारी, रांम कहावै साध ॥३५॥
संत जगजीवन जी कहते हैं कि प्रभु परोपकारी है वे दिखते नहीं है वे जाने नहीं जा सकते उनका पार नहीं पा सकते, साधुजन भी परोपकारी हैं प्रभुमय हैं ऐसा मानते हैं ।
कहि जगजीवन बड़ ब्रिक्ष९. अलख उपावै१० आप ।
औरन कौं छाया करै, आप सहै सिर ताप११ ॥३६॥
(९. बड़ व्रिक्ष=बड़ा वृक्ष; २. वट वृक्ष)   (१०. उपावै=उत्पन्न करे)   (११. ताप=गरमी)      
संत जगजीवन जी कहते हैं कि वटवृक्ष जैसे लोक को प्रभु आप स्वयं उत्पन्न करते हैं, जो ऐसा परोपकारी है कि सबको शीतल छाया देकर स्वयं ताप सहता है ।
(क्रमशः) 

बुधवार, 19 अगस्त 2026

जयपुर नरेश रामसिंहजी

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*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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*दादू एता अविगत आप थैं,*
*साधों का अधिकार ।*
*चौरासी लख जीव का, तन मन फेरि सँवार ॥*
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पश्चात् सामोद के रावलजी तथा जयपुर नरेश रामसिंहजी भी हरजीरामजी के पास आने लगे । पर्वत के ऊपर दादू मंदिर तथा अच्छा स्थान जयपुर नरेश और समोद रावलजी ने ही हरजीरामजी के त्याग, तपस्या और चमत्कारों से प्रभावित होकर बनवाया था । स्थान के पास ही जल के कुंड हैं । बड़ा सुन्दर स्थान है । पर्वत के ऊपर वाले मंदिर में हरजीरामजी के सामने बैठे हुये जयपुर नरेश रामसिंहजी और सामोद रावल का चित्र भी था किन्तु कुछ समय स्थान सूना रहा इससे उस चित्र को कोई ले गया ।
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सामोद के तत्कालीन रावल की रक्षा अंग्रेजों से हरजीरामजी ने की थी । इससे हरजीरामजी पर बहुत श्रद्धा रखते थे और उस समय सामोद रावलजी जयपुर नरेश के मंत्री थे । जयपुर नरेश रामसिंहजी तथा जयपुर राज्य के सामन्त हरजीरामजी पर अत्यन्त श्रद्धा रखते थे । हरजीरामजी की कई चमत्कार पूर्ण कथायें भी गौड़जी के गुढ़े में प्रसिद्ध है~
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१~ तोलारामजी संत गौड़जी के गुढ़े में ही रहते थे । तोलारामजी की बगीची वहां अब भी है । एक दिन तोलारामजी के पास कई सज्जन बैठे थे । उनमें एक सज्जन की अंगुली में विष का कांटा निकल रहा था । वह उसकी पीड़ा से बहुत दुःखी था । उसने तोलारामजी से प्रार्थना की । तब तोलारामजी ने कहा- जाकर कालिया(हरजीरामजी) की गुदा में दे दे ठीक हो जायगा । फिर वह हरजीरामजी के पास गया किन्तु संकोचवश कह न सका । तब सिद्ध हरजीरामजी ने ही कहा तुम अपनी अंगुली मेरी गुदा में दे दो । तब तत्काल उसने अपनी अंगुली हरजीरामजी के नितम्बों के बीच में दे दी । फिर तो उसी समय उसका विषकांटा जन्यकष्ट नष्ट हो गया । फिर वह धन्यवाद देते हुये अपने घर चला गया ॥
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२~ एक दिन हरजीरामजी भजन कर रहे थे । उस समय कुछ व्यक्ति उनके पत्थर मारने लगे । पहले तो हरजीरामजी ने सोचा अबोध मनुष्य हैं रुक जायेंगे । किन्तु वे मारते ही रहे । तब हरजीरामजी ने कहा~भाइयों तुम दूसरों पर पत्थर डाल रहे हो, इसका फल यही होगा कि तुम्हारे पर पत्थर ही पड़ेंगे । फिर उन पत्थर डालने वालों की खेती पर भारी बर्फ के पत्थर पड़े जिनसे सब खेती नष्ट हो गई । तब वहां के लोग हरजीरामजी से डरने लगे थे । फिर हरजीराम के भजन के समय कोई विघ्न नहीं हुआ ।
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३~ तत्कालीन चोमू ठाकुर साहब और सामोद के तत्कालीन रावलजी पर १४ के गदर में अंग्रेजों के मरवाने का दोष लगाया गया था । जयपुर नरेश रामसिंहजी ने उन दोनों को कहा हरजीरामजी के शरण जाओ । अंग्रेजों के कोप से हरजीरामजी की कृपा से ही बचोगे । वे गये । हरजीरामजी ने उनको आश्वासन दिया था और वे सर्वथा बाख गये थे । हरजीरामजी ने वाइसराय की मेम को स्वपन में दोनों निर्दोष हैं बताकर बचाया था । अतः उनकी हरजीरामजी पर अत्यन्त श्रद्धा थी ।
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४~ चोमू ठाकुर साहब ने गुफा वाली गढ़ी बनाई उसके विषय में गौड़जी के गुढ़ा के वृद्ध पुरुष कहते हैं । चोमू ठाकुर की कुछ भूमि जयपुर नरेश रामसिंहजी ने खालसे करली थी । उसको पुनः प्राप्त करने की इच्छा से चोमू ठाकुर हरजीरामजी के पास गुढ़ा गये थे । हरजीरामजी ने उनको आश्वासन दिया था कि शीघ्र ही तुमको मिल जायगी । वह मिल गई तब चोमू ठाकुर कुछ धन लेकर आये थे । हरजीरामजी ने धन लेना स्वीकार नहीं किया किन्तु विशेष आग्रह करने से कह दिया कि यहां कुछ बना दे । इससे चोमू ठाकुर ने गुफा वाली गढ़ी बनवाई थी । फिर उस गुफा में हरजीरामजी भजन करते थे ।
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५~ रिणी राजगढ़ का आयकर तत्कालीन बीकानेर नरेश हरजीरामजी के सेवा में गौड़जी के गुढ़े भेजा करते थे । यह किस चमत्कार से भेजना आरंभ किया था, इसका पता नहीं लगा । किन्तु यह तो निश्चय ही है कि बिना किसी कारण विशेष के तो राजा लोग ऐसा करते नहीं हैं ।
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६~ तत्कालीन खेतड़ी नरेश बहुत बीमार हो रहे थे । जब औषधियों से कुछ लाभ नहीं हुआ तो राजा ने हरजीरामजी को बुलाने घुड़सवार और उनको लाने के लिये सवारी भेजी । घुड़सवार तथा सवारी हरजीरामजी के पास आये तब ग्राम में यह बात शीघ्र ही फ़ैल गई । तोलारामजी के पास भी पहुँच गई । हरजीरामजी जब खेतड़ी जाने लगे तब उनके गुरु भाई तोलारामजी ने हरजीरामजी को एक मानव के द्वारा कहलाया~ कि हरजीरामजी को मेरी ओर से कहो- कि आप जाते तो हैं किन्तु आपके पहुँचने के पहले ही राजा मर जायगा । अतः अपनी आयु में से कुछ आयु उसे देकर जीवित करके ही आना । मरा छोड़कर आओगे तो साधुओं की बदनामी होगी ।
(क्रमशः)

*४६. परमारथ कौ अंग २९/३२*

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*४६. परमारथ कौ अंग २९/३२*
कहि जगजीवन धरम की, जिन जिन बांधी मोट२ ।
सिर थैं पटकी पाप की, रहै रांम की ओट३ ॥२९॥
(२. मोट=गठरी)   (३. ओट=शरण)
संत जगजीवन जी कहते हैं कि जिन्होंने धर्माचरण की गठरी बांध ली है प्रभु ने उनके पाप की गठरी दूर उतार फैंकी है व अपनी शरण भी दी है ।
कहि जगजीवन धरम की, साध न छांडै बाणि४ ।
हाणि५ हणै लाहा६ गिणै, परम पुरुष पहिचाणि ॥३०॥
{४. बाणि=स्वभाव(आदत)}   {५. हाणि=हानि(नुक्सान)}
संत जगजीवन जी कहते है कि साधुजन धर्म की प्रवृति को नहीं छोड़ते वे हानि लाभ नहीं गिनते वे सब प्रभु को समर्पित कर देते हैं । वे प्रभु को पहचानते हैं ।
हंस हंसनी पै७ पियौ, धर्यौ धर्या की आस ।
रांम रतन धन परगट्यौ, सु कहि जगजीवनदास ॥३१॥
{७. पै=पय(दूध)} 
संत जगजीवन जी कहते हैं कि संतजन व आत्मा परमात्मा दोनो का मेल है यै धर्म की ही आस रख कल वह ही क्षीर पान करते हैं । जिससे राम रुपी रत्न प्रकट होते हैं ।
सिर चढ़ाइ धरि गुहा में, प्रगट किया सुस्थांन ।
कहि जगजीवन दरिद्दर८, दूर किया गुर ग्यांन ॥३२॥
{८. दरिद्दर=दारिद्र्य(निर्धनता)}   
संत जगजीवन जी कहते हैं कि प्रभु मान देते हैं फिर उचित स्थान पर प्रकट भी होता है । इस प्रकार प्रभु अज्ञान दारिद्र्य को दूर करके ज्ञानधन देते हैं ।
(क्रमशः) 

हरजीरामजी

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*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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*निर्मल तत्त निर्मल तत्त निर्मल तत्त ऐसा ।*
*निर्गुण निज निधि निरंजन, जैसा है तैसा ॥टेक॥*
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हरजीरामजी जोधपुर राज्य के मकराणा के पास के चाडी गांव के मेड़तिया अखैसिंघघोट गोत के क्षत्रिय थे । एक दिन इन्होंने एक सेठ को मार्ग में लूटकर उस धन को अपनी माता के पास ले जाकर डाला । माता ने पूछा- ये धन कहां से लाये हो ? हरजीरामजी ने कहा~ लूटकर लाया हूं । यह सुनते ही माता परम दुःखी हो गई और बोली- “बेटा ! यह काम तुमने अच्छा नहीं किया । यदि कोई मुझे लूटे तो मुझे तथा तुझे कितना दुःख होगा । किसी को दुःखी करके सुख भोगना पाप है । यह धन जिसका है, उसे लौटा दो ।” कहा भी है~ अपने दुख सम सभी का, लखते भक्त सुजान । माता हरजीराम की, धन लख भाई मलान । दृ.त.६।
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माता की उक्त बात सुनकर हरजीरामजी को वैराग्य हो गया । उस धन को उन्होंने धन वाले सेठ को लौटा दिया । फिर नारायणा में जाकर नारायणदासजी के शिष्य हो गये । और भैराणा पर्वत पर जाकर निर्गुणराम की उपासना करने लगे । फिर जब माता ने सुना मेरा सुत साधु हो गया है और भैराणा पर्वत पर तपस्या कर रहा है । तब हरजीरामजी की माता भैराणा पर्वत पर आई और हरजीराम से कहा~ बेटा ! साधु बन गये हो यह तो बहुत अच्छा किया है किन्तु अब श्रेष्ठ संत बनना, केवल कहने मात्र का साधु बनकर मेरा दूध नहीं लजाना । माता का उक्त वचन सुनकर हरजीरामजी ने कहा~ आपके कथनानुसार ही बनूंगा ।
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फिर माता तो अपने पुत्र हरजीराम को उत्तम संत बनने का शुभाशीर्वाद देकर अपने ग्राम को चली गई । फिर हरजीरामजी प्रभु प्रेरणा से भैराणा से विचर गये और भ्रमण करते हुये गुड़ा पूंख के माल के पर्वत पर जहां मनसा देवी का मंदिर है उससे ऊपर जाकर विकट स्थान में तपस्या करने लगे । फिर एक दिन मनसा देवी ने आकर कहा-यहां तो कोई भी नहीं रह सकता है । तुम यहां से चले जाओ । मनसा देवी का उक्त वचन सुनकर हरजीरामजी ने कहा~हरजीराम रहेगा ।
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फिर वे वहां रहकर भजन करने लगे । वे दादू वाणी का पाठ करते थे तब एक प्रेत और सर्प वाणी का पाठ सुनते थे । एक दिन मनसा देवी ने कहा~ आप महातपस्वी हैं तो मेरे कुंड से पानी क्यों ले जाते हैं ? वहां निकाल लें हरजीरामजी ने कहा जैसी हरि इच्छा होगी वैसा ही हो जायगा । फिर एक दिन सर्प और प्रेत ने कहा~ आप रात को भी दादूवाणी का पाठ किया करो । हरजीरामजी ने कहा~ रात को प्रकाश बिना पाठ कैसे हो सकता है ? सर्प ने कहा~ प्रकाश तो मैं कर दिया करूंगा । प्रेत ने कहा~ और कोई आपको कष्ट हो तो कहिये ।
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हरजीरामजी ने कहा~ पानी का कष्ट है । प्रेत ने कहा~ पारस पीपल के नीचे वह पत्थर पड़ा है, उसको उखाड़ डालो, उसके नीचे बहुत अच्छा पानी निकलेगा । फिर हरजीरामजी ने उस पत्थर को उखाड़ डाला । उसके नीचे बहुत अच्छा पानी निकल आया था । वह पानी वि. सं. २०२९ तक तो था किन्तु अब वह पानी वहां नहीं है । फिर मनसा देवी के कुंड से पानी लाना बन्द कर दिया । सर्प अपनी मणि मुख से निकाल कर एक ऊंचे पत्थर पर रख देता था । उसके प्रकाश से हरजीरामजी से रात्रि को भी सर्प और प्रेत दादूवाणी सुनने लगे थे । कहा भी है~
“सर्पादिक भी संत की, सेव करै भलरीति ।
हरजीरामकी करी थी, सुन वाणी सहप्रीति ॥१॥"
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कुछ वर्षों तक हरजीरामजी ने माल के पर्वत में तपस्या की । मनसादेवी के मंदिर से कुछ ऊपर इनका तप स्थल हरजीरामजी की थूमड़ी(कुटिया) के नाम से प्रसिद्ध है । फिर वे वहां से गौड़जी के गुढ़े के पर्वत पर आकर तपस्या करने लगे । यहां पर आने के पश्चात इनकी अच्छी ख्याति हो गई । आप अधिक वस्त्र शरीर पर नहीं रखते थे । एक कौपीन और एक चौंकोंटा रुमाल सिर पर रखते थे । चोमू ठाकुर साहब ने हरजीरामजी की तपस्या तथा चमत्कारों से प्रभावित होकर प्रथम इनके लिये पर्वत पर स्थान बनवाया जिसमें गुफा भी बनवाई गई । उस गुफा में भजन करते थे । उसको अब वहां के लोग गढ़ी कहते हैं ।
(क्रमशः)

मंगलवार, 18 अगस्त 2026

*४६. परमारथ कौ अंग २५/२८*

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*४६. परमारथ कौ अंग २५/२८*
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कहि जगजीवन रामंजी, दया धरम व्रिधि१२ होइ ।
सत संतोष लिया रहै, दुक्ख न व्यापै कोइ ॥२५॥
(१२. व्रिधि-वृद्धि)
संत जगजीवन जी कहते हैं कि स्मरण से दया धर्म की वृद्धि होती है । सत्य व संतोष धारण करनेवाले को कभी कोइ कष्ट नहीं व्यापता है ।
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कहि जगजीवन रांमजी, दया धरम तहां नांम ।
जहां नांम तहां निरंजन, निरख नूर सब ठांम ॥२६॥
संत जगजीवन जी कहते हैं कि हे प्रभु जिस स्थान पर दया है, धर्म है, वहाँ प्रभु नाम भी है । जहाँ प्रभु का नाम है वहां स्वयं निरंजन देव विराजते हैं उनके तेजोमय रुप को सब स्थानों पर देखा जा सकता है ।
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कहि जगजीवन धरम की, धजा निरंजन राइ ।
रांम करावै सौ करै, मन वांछित फल खाइ ॥२७॥
संत जगजीवन जी कहते हैं कि धर्म ध्वज निरंजन देव से ही है वे ही इसके राजा हैं जो प्रभु करवाते हैं वह ही होता हैं और ऐसा माननेवाले सदा मनोवांछित फल पाते हैं ।
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कहि जगजीवन धरम की, वाड़ि१ करी कर बाहि ।
करता पुरिष समीप करि, रोम करावै आइ ॥२८॥
(१. बाड़ि-बांध, रोक)
संत जगजीवन जी कहते हैं कि धर्म प्रवाह को प्रभु प्रमाद से बचाने के लिये बांध बना कर रोकते हैं फिर बहाते हैं, संयम से प्रसार करते हैं । उन परमात्मा की कृपा जब समीप होती है तो रोम जैसे लघु जन भी कर पाते हैं ।
(क्रमशः)

सघन खोल(कोकून)

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*साभार : Subhash Jain*
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*मारग को सूझे नहीं,*
*दह दिशि माया जाल।*
*काल पाश कसि बाँधियो,*
*मेरे कोइ न छुड़ावणहार॥*
*राम बिना छूटे नहीं,*
*कीजे बहुत उपाय।*
*कोटि किये सुलझे नहीं,*
*अधिक अलूझत जाय॥*
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एक हरे-भरे शहतूत के वृक्ष पर रेशम के एक छोटे से कीड़े ने जन्म लिया। कोमल पत्तियों को खाते-खाते जब उसका उदर भर गया, तो उसने अपने चारों ओर सुरक्षा और सुख का एक सुंदर संसार रचने का विचार किया।
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उसने अपने ही मुख से एक चमकीला, महीन और अत्यंत चिकना रेशमी धागा निकालना आरंभ किया। वह बड़े आनंद से अपने शरीर के चारों ओर उस सुंदर तार को लपेटने लगा। ज्यों-ज्यों धागा लिपटता गया, उसे वह स्पर्श अत्यंत कोमल, गर्म और सुरक्षित लगने लगा। वह मन ही मन मुदित होकर सोचने लगा— "अहा ! यह तो मेरा अपना राजमहल है। यहाँ न आँधी का डर है, न धूप का कष्ट और न ही किसी शिकारी पक्षी का भय। इस विलासपूर्ण सुख से बढ़कर संसार में और क्या हो सकता है ?"
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क्षणभंगुर सुख और सुरक्षा के इस मोह में पड़कर वह अभागा जीव अपने ही भीतर से धागा निकाल-निकाल कर जाल बुनता रहा। वह इतनी तन्मयता से अपने ही महल की दीवारों को मोटा और घना करता गया कि उसे भान ही नहीं रहा कि वह जिस रचना को अपना आश्रय समझ रहा है, वह धीरे-धीरे उसकी साँसों को अवरुद्ध करने वाला कारागार बनती जा रही है।
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अंततः वह रेशमी धागों के उस सघन खोल(कोकून) के भीतर पूरी तरह कैद हो गया। बाहर निकलने का न कोई मार्ग बचा और न ही पंख फैलाने का कोई स्थान।
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तभी वहाँ रेशम का एक व्यापारी आया। उसने उस खूबसूरत, भारी और चमकीले कोकून को वृक्ष से तोड़ा और रेशम का धागा प्राप्त करने के लिए उसे सीधे खौलते हुए गर्म जल के पात्र में डाल दिया। जिस रेशमी आवरण को उस कीट ने जीवन भर बड़े चाव और जतन से रचा था, उसी के भीतर तड़पकर उसके प्राण समाप्त हो गए।
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संसार का अज्ञानी मनुष्य भी इसी रेशम के कीड़े की भाँति है। वह अपने ही भीतर से कामना, मोह, वासना, परिग्रह और अहंकार के धागे निकालता है और अपने चारों ओर सांसारिक सुख-सुविधाओं का एक सघन जाल बुन लेता है। वह अपनी बनाई इस संकुचित परिधि को ही अपना वास्तविक जीवन और परम सुरक्षा मान बैठता है।
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किंतु वह यह भूल जाता है कि जिन भौतिक बंधनों को वह जीवन भर संवारता रहा, वही आसक्तियाँ अंततः काल और मृत्यु के समक्ष उसकी मुक्ति का सबसे बड़ा अवरोध बन जाती हैं। अपनी ही बनाई आसक्तियों के इस जाल को विवेक की धार से समय रहते काटकर ईश्वर के चरणों में समर्पित हो जाना ही इस भवसागर से पार पाने का सच्चा मार्ग है।

*२६. भजन प्रताप का अंग ~९/१२*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*२६. भजन प्रताप का अंग ~९/१२*
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*तन मन आतम लोह को, मिल्या सु पारस नांउ ।*
*तिन तीन्यों कचंन किये, सत सुमिरन बलि जांउ ॥९॥*
तन, मन और बुद्धि रूप लोह को नाम रूप पारस मिला है । पारस स्पर्श से जैसे लोहा सोना बन जाता है वैसे ही चिन्तन ने तन, मन और बुद्धि इन तीनों को शुद्ध बना दिया है, अत: सत्य स्वरूप परमात्मा के नाम स्मरण की मैं बलिहारी जाता हूँ ।
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*नाम प्रताप पषान तिरे जल, तो प्राणि तिरे क्यों नाँहिं ।*
*रज्जब रार्यों१ देखिये, फहम२ करो मन माँहिं ॥१०॥*
नाम प्रताप से सेतु बाँधते समय पत्थर तिरे हैं, तो फिर प्राणी क्यों न तिरेंगे ? अपने मन में ज्ञान२ धारण करके ज्ञान नेत्रों१ से देखो तभी नाम का प्रताप भली प्रकार भासेगा ।
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*देवल१ फेर्या चक्र ज्यों, प्रतिमा पींडा माँहिं ।*
*भृत्य२ भाव भंजन गढ्या४, कुलाल३ सु चिन्हे नाँहिं ॥११॥*
भजन के प्रताप से नामदेव के लिये मंदिर१ को कुम्हार चक्र को फेरता है वैसे ही फेर दिया था और चक्र फेरने से उस पर धरा मिट्टी का पींडा फिरता है, वैसे ही मूर्ति भी फिर गई थी । इस प्रकार भक्त२-भाव रूप बरतन बनाया४ गया अर्थात भक्त की इच्छानुसार कार्य कर दिया गया, किन्तु मंदिर और मूर्ति ने तो फेरने वाले ईश्वर रूप कुम्हार३ को नहीं जाना, जिसने भजन किया था उन नामदेव ने ही जाना । विशेष-नामदेव की जूतियाँ कीर्तन करते समय कमर से खुलकर सभा में गिर पड़ी थीं, तब सबने बाहर निकाल दिया था, वे रुष्ट होकर मंदिर के पीछे जा बैठा थे, तब भगवान के द्वारा उक्त घटना घटित हुई थी ।
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*रज्जब मंदिर मूर्ति सुई सम, चुंबक चिन्तन नाम ।*
*अचल चले एके मिल्यूं, बधे कौन की माम१ ॥१२॥*
मंदिर और मूर्ति तो सुई के समान है, नाम चिन्तन चुंबक पत्थर के समान है, जैसे चुंबक से सुई हिलने लगती है, वैसे नामदेव के नाम चिन्तन से मिलकर अचल मंदिर और मूर्ति चंचल होकर फिर गये थे । इस घटना में किसकी शक्ति१ रूप महिमा अधिक मानी जायेगी ? नाम चिन्तन की ही मानी जायेगी ।
(क्रमशः)

सोमवार, 17 अगस्त 2026

*४६. परमारथ कौ अंग २१/२४*

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*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
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*श्रद्धेय श्री @महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी, @Rgopaldas Tapsvi, बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ @Premsakhi Goswami*
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*४६. परमारथ कौ अंग २१/२४*
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धरम हनै अघ७ पाप८ अनंत दुख, धरम हनै सब व्याधि९ ।
कहि जगजीवन धरम करि, पंच तत्त सति साधि ॥२१॥     
(७. अघ-दुष्कर्म) {८. पाप-अधार्मिक कर्म(हिंसा, चौरी आदि)} (९. व्याधि-रोग)
संत जगजीवन जी कहते हैं कि धर्म की हानि से ही पाप है अनंत दुख व बिमारियां हैं धर्म करने से पांचो तत्व धरती, गगन वायु जल अग्नि सभी अनुकूल होते हैं ।
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सतधर्मेसु पुरुषेसु, आपदा विपदा गतं ।
कहि जगजीवन दया धरमं, हरि सरणं आतम रतं ॥२३॥ 
संत जगजीवन जी कहते हैं कि सत्य धर्म के निर्वहन से जीव की आपदायें व विपदाएं मिटती है । दया धर्म धारण करने से से आत्मा प्रभु शरण में लीन रहती है ।
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दया धरमं भगति मरमं, कोटि कर्म निकन्दनं१० ।
कहि जगजीवन रामं नांमं, साच साखि सकन्दनं११॥२४॥
(१०. निकन्दनं-नष्ट करने वाला)  (११ . सकन्दनं-हार्दिक कष्ट के साथ)
संत जगजीवन जी कहते हैं कि दया व धर्म ही भक्ति का सार हैं । जो करोड़ो कर्मों के संशय दूर करते हैं उनके दोष निवारण करते हैं ।  राम नाम तो सत्य की साक्षी है चाहे उसमें कितने ही हार्दिक कष्ट हों ।
(क्रमशः) 

कृपारामजी

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*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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*इब सुख कारण फिर दुख पावै,*
*अजहुँ न चेतै क्यों डहकावै ।
*दादू कहै सीख सुन मेरी,*
*कहु करीम संभाल सवेरी ॥*
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१- कृपारामजी १०७ वर्ष तक धरातल पर रहे । आपकी समाधि की छत्री उक्त परम्परा के कुये व प्राचीन बाग़ में नारायणा ग्राम के दक्षिण पश्चिम की कौंण में ग्राम से बाहर धोबोलाव तलाब के रास्ते पर है । छत्री पर निम्न प्रशस्ति अंकित है । सवैया~ “छाप छपी धरणी धर पै, डरपै अरि देखत हा उठ भाजै । 
कोउ न धीर धरे सनमु खहि, जाय जहां कृपाराम जु गाजै ॥१॥ 
घने घमसान नहीं अवसान सु, आश तजी जहँ जाय विराजै । 
दादूदयाल के भेष प्रसिद्ध सु, ऐसा विरुद कृपाल का बाजै ॥२॥ 
दोहा~  वर्ष एक सौ सात लौं, रहे धरा पर आप । 
पीछे सुरपुर को गये, मेटि सकल सन्ताप ॥१॥ 
वि. सं. १८५७ कार्तिक वदी ७ शुक्रवार । उक्त सवैया इनकी विशेषता का द्योतक है ।
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तुलसीदासजी~  
६- तुलसीदासजी- ये अच्छे संगीतज्ञ थे । आपने बनारस में संगीत का अच्छा अभ्यास किया था । सुनते हैं जब वे स्वरानन्द में निमग्न होकर गाते थे तब चमत्कार देखने वाले लोग तुला में एक ओर रुपये भर देते और दूसरा पलड़ा खाली रखते थे । इनकी स्वरानन्द की पराकाष्ठा होने पर खाली पलड़ा और रुपयों से भरा पलड़ा दोनों बराबर हो जाते थे । यह इनका चमत्कार देखकर दर्शक मंत्र मुग्ध से हो जाते थे । ऐसा चमत्कार दिखाकर भी ये किसी से कुछ भी नहीं लेते थे । निरीह और साधनों में लीन रहने वाले ये महान् योगी संत थे ।
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दयारामजी~  
७- दयारामजी~ ये प्रारब्धी पुरुष थे । इनके पास अत्यधिक सम्पदा थी । ये व्यवहार कुशल तथा पुण्यात्मा संत थे । परोपकार करते ही रहते थे । इन्होंने कई ब्रह्मभोज किये थे और और विप्रों को अच्छी दक्षिणा दी थी । जब भी इच्छा होती तभी ग्राम को, आस पास की बस्तियों, जातियों को जिमा देते थे । अच्छे परोपकारी तथा भजनानन्दी संत हुये हैं । कैरिया का स्थान अब भी अच्छी स्थिति में है । ३- कृष्णदेवजी महराजकी शिष्य परम्परा का स्थान नारायणा दादूधाम की परम्परा इस प्रकार है~ १ सांवलरामजी २- नानकदास जी ३- सुखरामजी ४- शंभूरामजी ५- बालकरामजी वि. सं. १९०७ नारायणा स्थान की परंपरा यहां समाप्त । 
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हरजीरामजी = ४- स्थान गौड़जी का गुढ़ा की परंपरा-आचार्य कृष्णदेवजी महाराज के शिष्य १- भंडारी ब्रह्मदासजी २~ नारायणदासजी ३- हरजीरामजी । हरजीरामजी नारायणदास के शिष्य नारायणा में ही हुये थे । १- भंडारी ब्रह्मदासजी अच्छे महात्मा हुये हैं । इनकी समाधि चरण चौकी नारायणा में हरजीरामजी के महल के सामने एक कुटिया में है । उसमें वि. सं. १८५२ आषाढ़ सुदि १२ सोमवार अंकित है । यह समाधि चमत्कारी है । 
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कुछ समय पहले एक नारायणा का बनियां का लड़का समाधि वाली कुटिया में शौच जाने लगा था । तब बैठते ही उसके सामने श्वेत वस्त्रधारी एक महान् संत प्रकट हो गये । लड़का डर कर भाग गया और छः मास तक उसको ज्वर आता रहा । फिर ब्रह्मदासजी की मन्यत मानने और उनके चरणों की पूजा करने से ठीक हुआ था । ऐसे ही उनके अनेक चमत्कार वर्तमान में महल में रहनेवाले रामप्रसादजी स्वामी सुनाते हैं । उक्क्त समाधि स्थल में हरजीरामजी के चरण भी हैं, उसमें लिखा है ~
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"वर्ष एक नव सोमगुण, जन्म अष्टमी लीन । 
मिथ्या भव निधि जानकर, निजपद मिले प्रवीण ॥१॥
दादू के पथ अवतरे, सिद्ध दिगम्बर वीर । 
वर श्री हरजीरामजी, नृपकुल जानों धीर ॥२॥
शिष जूं दूलहराम तिन, परम भक्ति कर प्यार । 
चरण धरे गुरु के विमल, रचना रचो अपार ॥३॥"
(क्रमशः)

*२६. भजन प्रताप का अंग ~५/८*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*२६. भजन प्रताप का अंग ~५/८*
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*अति गति१ सूधा२ नाम था, सोइ लिया निज दास ।*
*रज्जब छाना३ क्यों रहे, वाणी सुयश सुवास ॥५॥*
मोक्ष१ का सरल२ मार्ग नाम चिंतन ही था, जो भी भगवन का निजी भक्त हुआ है, उसने वही नाम चिंतन रूप मार्ग अपनाया है, अत: वह छिपा३ हुआ कैसे रह सकता है ? उसकी वाणी रूप सुगंध उसके यश को सभी लोकों में फैला देती है ।
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*तन मन तिली१ सामान है, नाम निरंजन फूल ।*
*जन रज्जब सौंधा२ भये, मिल४ सौंधा के मूल३ ॥६॥*
तन मन तो तिलों१ के सामान हैं और निरंजन राम का नाम फूलों के सामान है, जैसे फूलों के संग से तिलों का तेल सुगन्धित२ होजाता है और सुगंध के मूल्य३ में मिलता४ है, वैसे ही निरंजन राम के नाम चिंतन से प्राणी के तन मन भक्त हो जाते हैं और भक्त के सामान सत्कार के पात्र होते हैं ।
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*अठार भार विधि आदमी, चन्दन चिन्तन नाम ।*
*रज्जब सकल सुगंध ह्वै, धन्य संतन विश्राम ॥७॥*
मनुष्य तो अठारह भार वनस्पति के समान है और नाम का चिन्तन चन्दन के समान है, जैसे चन्दन के संग से वनस्पति सुगंधयुक्त हो जाती है, वैसे ही नाम चिन्तन से मनुष्य भगवद् भक्ति से युक्त हो जाते हैं । संतों को विश्राम देने वाले राम नाम को धन्य है ।
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*मन इन्द्रिय पति आतमा, तरुवर नींम्ब स्वरूप ।*
*हरि चितवन चन्दन परसि, रज्जब पलटि अनूप ॥८॥*
मन इन्द्रियों के स्वामी जीवात्मा का स्वरूप नीम्ब वृक्ष के समान है, हरि चिन्तन चन्दन के समान है । जैसे चन्दन की सुगंध से नीम्ब बदल जाता है, वैसे ही नाम चिन्तन से जीवात्मा जीवात्व भाव बदलकर उपमारहित ब्रह्म-भाव को प्राप्त होता है ।
(क्रमशः)

रविवार, 16 अगस्त 2026

३१. अन्योन्य भेद कौ अंग ३७/३९

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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३१. अन्योन्य भेद कौ अंग ३७/३९
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बचन जाल उरझै सबै, सुरझावैं गुरु देव । 
नेति नेति करते रहैं, सुन्दर अलख अभेव ॥३७॥
इसी वाग्जाल में समस्त संसार आबद्ध है । अब तो कोई सद्‌गुरु ही अपने अमृतमय ज्ञानोपदेश के द्वारा इस भ्रमजाल को सुलझा सकते हैं । अन्यथा अन्य सभी तथाकथित गुरु उस अलक्ष्य एवं अभेद्य तत्त्व को 'नेति नेति' कह कर अपना पल्ला झाड़ चुके तथा अपने उत्तरदायित्व से मुक्त हो चुके हैं ! ॥३७॥
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एक अखंडित ब्रह्म है, दूसर नांही आंन । 
सुन्दर भ्रम रजनी मिटै, प्रगट होइ जब भांन ॥३८॥
उपसंहार : श्रीसुन्दरदासजी महाराज कहते हैं - हमारे मत में - एक अखण्ड ब्रह्म ही सर्वत्र व्याप्त है, अन्य कोई नहीं । अन्य भ्रमात्मक मतों के विषय में एक ही उदाहरण पर्याप्त होगा कि इस उपर्युक्त मत के विरोधी अन्य भ्रान्त मत उसी प्रकार विलीन हो जायेंगे जैसे सूर्य के उदित होने पर रात्रि का समस्त अन्धकार विलीन हो जाया करता है ॥३८॥
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कठिन बात है ज्ञान की, सुन्दर सुनी न जाइ । 
और कहौं नहिं ठाहरै, ज्ञानी हृदय समाइ ॥३९॥
इति अन्योन्यभेद कौ अंग ॥३१॥
हम लोक में सुनते आ रहे हैं कि सिंहनी का दूध सुवर्णपात्र के अतिरिक्त अन्य किसी पात्र में नहीं ठहरता; उसी प्रकार ब्रह्मज्ञान की साधना भी प्रत्येक साधक के वश की बात नहीं हैं । उसको प्राप्त करने का प्रयास करने वाले हजारों साधकों में कोई एक ज्ञानी ही सफल हो पाता है१ ॥३९॥ 
{१ तु० – श्रीमद्भगवद्गीता : मनुष्याणां सहस्त्रेषु कश्चिद् यतति सिद्धये ।
यततामपि सिद्धानां कश्चिन्मां वेत्ति तत्त्वतः ॥ (७/३)} 
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इति अन्योन्यभेद का अंग सम्पन्न ॥३१॥
अंग समस्त ३१ । साखी संख्या १३५१ ॥
॥ इति श्रीस्वामी सुन्दरदास विरचित साषी ग्रन्थ सम्पन्न ॥

भेष भंडारी कृपारामजी

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🌷*卐 श्री दादूदयालवे नम:  卐*🌷
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*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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*दादू जिस घट दीपक राम का,*
*तिस घट तिमिर न होइ ।*
*उस उजियारे ज्योति के, सब जग देखै सोइ ॥*
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भोजन की पंक्ति में आचार्यजी की चौकी के सामने पत्तल पर उनकी थाली, कटोरी व झारी(जलपात्र) लगती है । सामने पांतिया पर चौकी बिछा, बैठ कर वे प्रसाद पाते हैं । उनकी परम्परा अब तक चली आ रही है । फिर छत्रियों के महन्तों का स्थान नारायणा से पाखर चला गया । वहां के महन्त नारायणा मेले में आते हैं तब उनका उक्त प्रकार ही व्यवहार रहता है । अब छत्रियों के महन्तों का मुख्य स्थान पाखर में ही है । 
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उसकी परम्परा-आचार्य कृष्णदेवजी महाराज के शिष्य १-गंगारामजी छत्रियों के महन्त सं १८१० में बैठे और १८१६-१७ तक रहे । २- जोगीदासजी वि. सं .१८५७ । ३- जीवणदासजी सं. १८५९ । ४- उदयरामजी सं. १८९२ । ५- चरणदासजी । ६- देवदासजी । ७ - रघुनादसजी । ८ - मंगलदासजी । ९- मुरलीदासजी । १०- रामपालदासजी । ११- कनीरामजी वर्तमान हैं । इनके मुस्थान  १~नारायणा २~सावरदा ३~जयपुर में भी पाखर वालों का स्थान है । 
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कृपारामजी =२- भेष भंडारी कृपारामजी~कृपारामजी आचार्य कृष्णदेवजी महाराज के शिष्य तथा मुख्य भंडारी थे । जब जयपुर नरेश जयसिंह द्वितीय ने कृष्णदेवजी का बल से विवाह कराने की आज्ञा निकाली तब वे नारायणा छोड़कर जोधपुर राज्य पधार गये । कारण राजा ने गलते के महन्त का व्यवहार अच्छा न देख उसका विवाह करना चाहा तब उसने कहा~नारायणा के  आचार्य का विवाह करा दोगे तो मैं भी करा लूंगा । 
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कृष्णदेवजी विवाह नहीं कराना चाहते थे । इससे चले गये । फिर राजा ने आज्ञा निकाली कि नारायणा दादू धाम में आचार्य नहीं रहते हैं तब पीछे से गद्दी को संभालता है ओर जो महन्त के स्थान में कार्य करता है, उसका विवाह करा कर गलते के महन्त का विवाह करा दिया जाय । नारायणा दादूधाम की प्रथा है कि आचार्य नहीं रहने पर मुख्य भंडारी को ही आचार्य के समान माना जाता है । मुख्य भंडारी कृपारामजी थे । अतः कृपारामजी के विवाह की योजना बनी । 
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कृपारामजी ने राजा से कहा नारायणा गादी पर विरक्त ही सदा से बैठते आये हैं, मेरे गृहस्थ हो जाने पर समाज मुझे मानेगा नहीं, तब मेरा योग-क्षेम कैसे होगा ? राजा को गलता के महन्त का विवाह कराना था । इससे राजा ने कहा आपका योग-क्षेम सरकार करेगी । राजा ने योग-क्षेम के लिये कृपारामजी को जागीर दे दी और उनका विवाह करा दिया । कहा भी है ~ 
“कृपाराम भंडारी को, गोड़ सुता परनाय । 
जमी दिई जयसिंह ने, राखा उन पर भाय ॥” (दा.च.चन्द्रि) 
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संभव है कृपारामजी जाति से गौड़ ब्रह्मण ही होंगे । अतः उनकी जाति की कन्या से ही उनका विवाह करा दिया । फिर गलता के महन्त को भी विवाह कराना ही पड़ा । वह तो चाहता ही था । केवल ऊपर से ही ऐसा प्रपंच रचा था । फिर आचार्य चैनरामजी नारायणा आये तब कृपारामजी को हटाया नहीं, उनको भेष भंडारी की पदवी दे कर भंडारी ही बनाये रखा । 
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कृपारामजी ने नारायणा दादूधाम की राजकाज करना रूप अच्छी सेवा की थी । वे व्यवहार कुशल महानुभाव थे । नारायणा दादूधाम की महान् सेवा करने से ही समाज में उनकी अच्छी प्रतिष्ठा थी । वे कैरिया वाले भेष भंडारी कहलाते हैं । उनकी परम्परा इस प्रकार है~ १- कृपारामजी(स्व. सं. १८५७), २- वीरमदासजी, ३- निर्भयरामजी, ४- लालदासजी, ५- हरिदासजी, ६- तुलसीदासजी, ७- दयारामजी, ८- नन्दरामजी, ९- छोटूदासजी, १०- हरिनारायणजी, ११- रामदासजी वर्तमान हैं । 
(क्रमशः)