रविवार, 26 जुलाई 2026

३१ ईश्वरदासजी

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🌷*卐 श्री दादूदयालवे नम: 卐*🌷
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*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
*दादू सिरजनहारा सबन का, ऐसा है समरत्थ ।*
*सोई सेवक ह्वै रह्या, जहँ सकल पसारैं हत्थ ॥*
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३१ ईश्वरदासजी = ईश्वरदासजी १२ वर्ष स्थान में रहे । सवाईसिंह मारोठ के ठाकुर के पुत्र नहीं था । उसने ईश्वरदासजी से प्रार्थना की । ईश्वरदासजी ने उसको पुत्र होने का वर दिया । पुत्र हो गया । पुत्र होने पर सवाईसिंह ईश्वरदासजी के पूर्ण भक्त हो गये थे और ईश्वरदासजी की तन मन वचनादि से सेवा करते थे । ईश्वरदासजी जंगली औषधियाँ भी जानते थे ।
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शौच जाते थे तब पास के काला पर्वत पर से कुछ बूटियाँ लाया करते थे । अपने पास आने वाले रोगियों को स्वरोदय का विचार करके उचित समझते तो देते थे । सर्प तथा गोहरे का विष भी बूटियों से उतार देते थे । औषधि जिनको देते थे वे निश्चय रूप से ठीक ही हो जाते थे । स्वरोदय के विचार से उचित ज्ञात नहीं होता उसे औषधि नहीं देते थे । फिर वह मर ही जाता था ।
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मारोठ की जनता ईश्वरदासजी को बहुत मानती थी । ईश्वरदासजी भूत व भविष्य को भी जान जाते थे । एक दिन कुचामन के ठाकुर केशरीसिंह आपके दर्शन करने आये थे । उन्होंने पूछा~ मैं पूर्व जन्म में कौन था ? ईश्वरदासजी ने कहा काशी के भंगी । ठाकुर - भंगी से कुचामन नरेश कैसे बना ? ईश्वरदासजी - प्रयाग कुंभ से बहुत से संत काशी गये थे, कुछ के हैजा हो गया था उनकी सेवा के पुण्य से । ठाकुर - इसमें विश्वास कैसे हो ? ईश्वरदास- अब तुम्हारे देह में अदीठ होगा, वह हो जाय तो सत्य मानना । फिर अदीठ होया । इससे ज्ञात होता है, वे भूत भविष्य के ज्ञाता योगी थे ।
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ब्रह्मलीन होना व समाधि = ईश्वरदासजी वि. सं.१९५६ में ब्रह्मलीन हुये हैं, ऐसा उनकी छत्री के शिलालेख से ज्ञात होता है । ईश्वरदासजी की समाधि एक अच्छी छत्री के रूप में एक पर्वत की टेकड़ी पर है । चरण चौकी पर यह शिलालेख अंकित है- वि. सं. १९५६ मार्गशीर्ष कृष्णा ३ सोमवार । हो सकता है यही उनके ब्रह्मलीन होने का समय हो अथवा चरण प्रतिष्ठा का भी हो सकता है । चरण प्रतिष्ठा का हो तो भी कुछ दिनों का ही फरक हो ससकता है । क्योंकि वे वहां अति प्रतिष्ठित थे, अतः उनकी छत्री शीघ्र ही बन गई होगी ।
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चौकी में एक छप्पय भी है, वह भी देखिये~
नगर रम्य मारोठ, बन्या अतिशय कर पावन ।
तहं पंडित ईश्वरदास, भये सज्जन मन भावन ॥
योग स्वरोदय ज्ञान भानु, सोइ तिमिर नशावन ।
प्रकट देत उपदेश, सकल जन दुःख मिटावन ॥
मुख एक कीरति बहुत, कहं लग वर्ण नित नवी ।
आतम निश्चय धार के, ब्रह्मलोक गे तज भुवि ॥१॥
दोहा~ईश्वरदास ईश्वर मिले, काट जगत का मोह ।
विद नाद मन सदन में, मोक्ष पदारथ जोह ॥२॥
ईश्वरदासजी की समाधि की छत्री पर आने वाले भावुकों की कामनायें अब भी पूर्ण होती हैं । भाव से चरण जल पान करने से रोग मिटते हैं । आप मारोठ के प्रतिष्ठित संत माने जाते हैं ।
(क्रमशः)

*२२. अजपा जाप का अंग ~१७/२०*

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*🌷卐 सत्यराम सा 卐🌷*
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*२२. अजपा जाप का अंग ~१७/२०*
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*रज्जब जप जप जन थके, अजपा जपा न जाय ।*
*अगह अंभ ज्यों आरसी, आख्यूं सो न गहाय ॥१७॥*
जैसे न ग्रहण करने योग्य दर्पण का पानी आँखों से दिखता तो है किन्तु पकड़ा नहीं जाता, वैसे ही बहुत से भक्त जन जप करते २ थक तो गये है किन्तु उनसे अजपा नहीं जपा जाता अर्थात वह तो स्वत: ही होता रहता है ।
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*स्वपने मन सुमिरन करे, लगे नहीं तन ताप ।*
*अचेत उदर अरभक१ वधै, यूं ह्वै अजपा जाप ॥१८॥*
स्वप्न में मन शरीर में अग्नि लगने का स्मरण करता है तब स्थूल शरीर को कहां ताप लगता है तथा माता के पेट में बालक१ बढ़ता है तब माता को कब पता लगता है कि किस क्षण में कितना बढ़ा, ऐसे ही अनजान में निरंतर अजपा जाप होता रहता है ।
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*मन पवन अरु सुरति को, आतम पकङै आप ।*
*रज्जब लावै तत्त्व सौं, यूं ही अजपा जाम ॥१९॥*
जब साधक आत्मा मन और बुद्धि वृत्ति को स्वयं निग्रह करके परब्रह्म रूप तत्त्व के चिन्तन में लगता है तब जैसे चिन्तन निरंतर होता रहता है, वैसे ही अजपा जाप होता है ।
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*ब्रह्माण्ड पिण्ड मन प्राण तज, सुख में सुरति समाय ।*
*रज्जब अजपा जाप यहु, नर देखो निरताय ॥२०॥*
ब्रह्माण्ड, शरीर, मन, प्राण इन सबको त्याग कर बुद्धि - वृत्ति सुख स्वरूप ब्रह्म में समा जाय, इसका नाम अजपा जाप है । हे साधक नरो ! विचार करके देखो, तुम्हें भी भली भांति ज्ञात होगा ।
(क्रमशः)

३०. ज्ञानी कौ अंग ५२/५६

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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३०. ज्ञानी कौ अंग ५२/५६ 
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अंत्यज ब्राह्मण आदि दै, दार मथै जो कोइ । 
सुन्दर भेद कछू नहीं, प्रगट हुतासन होइ ॥५३॥
[अब श्रीसुन्दरदासजी महाराज ५३ से ५६ तक की चार साषियों से ज्ञान की भेद - भावरहित व्यापकता एवं सब के लिये समान रूप से पवित्रकरण के सामर्थ्य में चार अकाट्य तर्क देकर उसे स्पष्ट कर रहे हैं - ]
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अभेद ज्ञान की व्यापकता के चार उदाहरण : श्रीसुन्दरदासजी महाराज कहते हैं - सब जानते हैं कि दो काष्ठों की रगड़ से अग्नि उत्पन्न हो जाती है । अब वे दो काष्ठ किसी ब्राह्मण से मिलें या किसी अन्त्यज(हीन जातिज) से, इससे उस अग्नि की उत्पादनक्रिया में कोई अन्तर नहीं आयगा । उन दोनों काष्ठों को रगड़ने से अग्नि उत्पन्न होगी; ऐसे ही वह अभेदज्ञानोपदेश किसी ब्राह्मण से मिले या अन्त्यज से; उस से ज्ञानप्राप्ति होगी ही - यह निश्चित मानिये ॥५३॥ (१)
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दीपग जोयौ बिप्र घर, पुनि जोयौ चंडाल । 
सुन्दर दोऊ सदन कौ, तिमिर गयौ ततकाल ॥५४॥
इसी प्रकार, सब जानते हैं कि दीपक के प्रकाश से अन्धकार नष्ट होता ही है । अब वह दीपक किसी ब्राह्मण के घर में हो या किसी अन्त्यज के, दीपक के प्रकाश में क्या अन्तर आयगा ! इसी प्रकार इस ज्ञानोपदेश के विषय में भी समझना चाहिये ॥५४॥ (२)
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अंत्यज कै जल कुम्भ मैं, ब्राह्मन कलस मंझार । 
सुन्दर सूर प्रकाशिया, दुहुंवनि मैं इकसार ॥५५॥
सभी जानते हैं कि किसी ब्राह्मण के घर में रखे हुए घट के जल में या किसी अन्त्यज के घर में रखे हुए घट के जल में सूर्य का प्रकाश समान(एक सा) ही पड़ता है । ऐसा नहीं होता कि ब्राह्मण के घट में सूर्य का प्रकाश दूसरा तथा अन्त्यज के घर वाले कुम्भ के जल में सूर्य का कोई दूसरा प्रकाश पड़ता हो; यही स्थिति अभेदज्ञानोपदेश के विषय में भी समझनी चाहिये ॥५५॥ (३)
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अंत्यज ब्राह्मन आदि दे, किंवा रंक कि भूप । 
सुन्दर दर्पन हाथ लै, सो देखै निज रूप ॥५६॥
जैसे किसी ब्राह्मण या अन्त्यज को, किसी राजा या दरिद्र को अपने हाथ में लिये हुए दर्पण में अपना ही रूप दीखता है; उसी प्रकार किसी भी अभेदज्ञानोपदेश से ब्रह्मज्ञान ही होगा, अन्य ज्ञान नहीं ॥५६॥ (४)
(क्रमशः) 

३०. ज्ञानी कौ अंग ४९/५२

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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३०. ज्ञानी कौ अंग ४९/५२
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चौपरि खेलहिं द्वै जने, सुन्दर बाजी लाइ । 
जीतै सु तौ खुसाल ह्वै, हारै सौ मुरझाइ ॥४९॥
संसार में विजय-पराजय भी एक प्रकार से क्रिया ही है । जैसे - कोई दो खिलाड़ी चौपड़ खेलते हों, उन में अन्त में एक जीतता है और एक हारता है । जीतने वाले को प्रसन्नता होती है और हारने वाले को खिन्नता ॥४९॥
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एक जनौ दुहुं वोर कौं, चौपरि खेलै आंनि । 
सुन्दर हार न जीत कछु, ऐसैं ज्ञानी जांनि ॥५०॥
परन्तु वहाँ एक तीसरा पुरुष भी उनका खेल देखने के लिये दर्शक रूप में आ बैठे । खेल के अन्त में हार जीत के बाद उस हार जीत से न उसको प्रसन्नता होती है, न खिन्नता ही । संसार में यही तटस्थता की स्थिति ज्ञानी की भी समझनी चाहिये ॥५०॥
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सुन्दर देख्या आपुकौ, सुने आपुनै बैंन । 
बूझ्या अपनी बूझि कौं, समुझ्या अपनी सैंन ॥५१॥
वह ज्ञानी ब्राह्मी स्थिति में पहुँचने के बाद, ब्रह्म को सर्वव्यापक समझता हुआ, संसार के सभी रूपों को अपना ही रूप, संसार के सभी शब्दों को अपना ही शब्द, संसार के सभी विचारों एवं संकेतों को अपना ही विचार एवं संकेत समझता है ॥५१॥
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सुन्दर भाया आपु कौं, आया अपुनी ठांम ।
गाया अपने ज्ञान कौं, पाया अपना धांम ॥५२॥
श्रवण मनन निदिध्यासन करते करते उस को सर्वत्र स्व रूप का ही भान हुआ, अतः वह अन्त में स्वरूप में ही स्थित हो गया । इस स्वरूपस्थिति का चिन्तन मनन करता हुआ वह निर्वाण(परम तत्त्व का साक्षात्कार) को प्राप्त हो गया ॥५२॥
(क्रमशः) 

परमार्थी महात्मा

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*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
*दादू शब्दैं ही सूक्ष्म भया, शब्दैं सहज समान ।*
*शब्दैं ही निर्गुण मिले, शब्दैं निर्मल ज्ञान ॥*
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२५. प्रेमदासजी =
प्रेमदासजी गरीबदासजी के थांभे के छापरी ग्राम में दीक्षित हुये थे । वे परमार्थी महात्मा थे । उन्होंने तालाब, कूप आदि बनवाये तथा अन्य भी परमार्थ के कार्य किये थे । वे ईश्वर भजन, श्री दादू वाणी का पाठ व विचार और परोपकार इनको ही अच्छा मानते थे । दादूजी महाराज ने भी तो परोपकार भजन ही बताया है~
"हरिभज साफिल जीवना, परोपकार समाय ।
दादू मरणा तहँ भला, जहँ पशु पक्षी खाय ॥
प्रेमदासजी का देहान्त वि . सं . १८७५ के आस पास हुआ था । वे अच्छे संत थे ।
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२६ रामकादासजी =
रामकादासजी गरीबदासोत गिधाणी ग्राम में दीक्षित हुये थे । आप परम भजनीक संत थे । जैसे दादूजी महाराज ने कहा है कि रात दिन भजन ही करना चाहिये~
"दादू नीका नाम है, हरि हृदय न विसार ।
रात दिवस रटबो करी, रे मन यही विचार ॥"
वैसे ही रामकादासजी रात दिन हरि भजन में ही लगे रहते थे । अधिकतर ध्यान में लगे रहने से लोग उन्हें ध्यानीजी नाम से भी बोलने लग गये थे ।
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इनके दो शिष्य थे, वे भी गुरुजी के उपदेश तथा गुरुजी को निरंतर भजन में लगे रहते देखकर दोनों ही हरि भजन में ही लगे रहते थे । आप वि.सं. १९५६ के आसपास ब्रह्मलीन हुये थे । आपके शिष्य भी एक वि.सं. १९६२ के व दूसरा १९७० के आसपास ब्रह्मलीन हो गये थे । इन तीनों ही महानुभावों ने वैराग्य पूर्वक भजन ही किया था । अन्य सांसारिक प्रपंच में वे लेशमात्र भी मन नहीं लगाते थे ।
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२७. किशोरदासजी = किशोरदासजी अतीत स्थान बीलू में दीक्षित हुये थे । आप पौराणिक विद्वान् तथा अच्छे चिकित्सक थे । आपकी कथा शैली बहुत अच्छी थी । आपकी लिखी हुई भागवत बीलू में तथा बड़ाउ में थी । आपके अक्षर सुन्दर होते थे । आपने भागवत तथा दादूवाणी के प्रवचनों द्वारा भक्त जनता को परमानन्द प्रदान किया था । आप अच्छे विद्वान् संत थे । वि .सं . १९२५ में नारायणा दादूधाम में ही आप ब्रह्मलीन हुये थे ।
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२८ सेवारामजी = सेवारामजी मोटलास ग्राम के निवासी थे । मोटलास दांता रामगढ़ के पास है । ये गरीबदासजी महाराज के तीन पीढ़ी बाद हुये हैं । सुना जाता है, इनके हनुमानजी का इष्ट था । ये बड़े सिद्ध संत थे । बादशाही शासन तथा शाहपुर मनोहर के रावजी द्वारा इनके १२ अस्थ्लों में कोठी कुये जीविका के रूप में निकले हुये थे ।
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२९.३०. नवलदालजी, लक्ष्मणदासजी~
नवलदासजी व लक्ष्मणदास जी ने मारोठ में साधन धाम ने बनाया था । दोनों संत भजनानन्दी थे । उनकी सेवा के लिये मारोठ के तत्कालीन ठाकुर ने ९९ बीघा १७ विसवा भूमि भेंट की थी । लक्ष्मणदासजी के शिष्य रघुनाथदासजी गरीबदासोत मारोठवाले भैराणे की यात्रा करने गये थे । वहां उनको संत श्रेष्ठ ईश्वरदासजी का दर्शन हुआ । ईश्वरदासजी जमात उदयपुर में दीक्षित हुये थे किन्तु थोड़े दिन के पश्चात ही जमात छोड़कर विरक्त रूप में विचरते थे ।
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ईश्वरदासजी की विद्वत्ता, वैराग्य, शील स्वभाव आदि से प्रभावित होकर रघुनाथदासजी ने ईश्वरदासजी से प्रार्थना की- भगवन् ! हमारे यहां मारोठ पधारिये । ईश्वरदासजी ने कहा~ चल तो सकता हूं किन्तु वहां मेरी सेवा उचित रूप से नहीं हो सकेगी । रघुनाथदासजी ने पूछा~ आपकी ऐसी क्या सेवा है ? जिसे हम नहीं कर सकेंगे । ईश्वरदासजी ने कहा~ मैं स्वर साधना तथा हठ योग साधना में लगा हुआ हूँ । अतः भोजन भी स्वर के हिसाब से ही करता हूँ ।
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भोजन के समय आप कहेंगे भोजन करो किन्तु मेरा स्वर उस समय भोजन करने योग्य नहीं होगा तो मैं भोजन नहीं कर सकूंगा । इत्यादिक व्यवहार आप को अच्छा नहीं लगेगा तथा योग साधना में भी पूरा-पूरा बन्धन रहता है । उक्त बातें सुनकर रघुनाथदासजी ने कहा~ सेवा की चिन्ता तो आप छोड़ दें, सेवा तो सभी प्रकार की हो जायगी । फिर ईश्वरदासजी रघुनाथदासजी के साथ मारोठ आ गये । उनकी सभी प्रकार की सेवा सुचारू रूप से होती रही ।
(क्रमशः)

*२२. अजपा जाप का अंग ~१३/१६*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*२२. अजपा जाप का अंग ~१३/१६*
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*वक्र बैन वायू रहित, होय सु अजपा जाप ।*
*रज्जब मन उनमनि लगे, प्रकटे आपे आप ॥१३॥*
अजपा जाप मुख, वचन और प्राण वायु से रहित ही होता है, अजपा जाप से मन समाधि में लग जाता है और अपने आत्म-स्वरूप का साक्षात्कार अपने आप ही हो जाता है ।
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*मिहरि पतिव्रत मीन मत, दोनों नाम न लेहिं ।*
*पै होत इष्ट अलाहिदे, नेह माग जीव देहिं ॥१४॥*
पतिव्रता नारी मुख से तो पति का नाम नहीं लेती किन्तु उसके मन में पति ही बसा रहता है, मछली मुख से तो पानी नहीं पीती किन्तु रोम रोम से पीती ही रहती है, वैसे ही अजपा जाप करने वाला मुख से तो नाम उच्चारण नहीं करता किन्तु भीतर निरंतर करता ही रहता ही रहता है । उक्त तीनों अपने प्रियतमों के अलग होने से प्रेम के मार्ग में अपना प्राण भी त्याग देते हैं ।
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*कछी पंछी हेत ले, अंडे क्यों उपजंत ।*
*रज्जब राम कहे बिन ऐसे, अजपा जाप करन्त ॥१५॥*
कछुवी अपने अंडे दूर जल तट पर रखती है, उसी से वे पककर फूट जाते हैं । कुंज पक्षी हिमालय पर अंडा रखता है, उस पर भारी बर्फ राशि जम जाती है, कूंज उन्हें उन में वृत्ति रख कर पालता है । देखो ये उक्त अंडे माताओं के दूर रहने पर भी स्नेह से बच्चे के रूप में कैसे उत्पन्न हो जाते हैं, वैसे ही राम नाम बोले बिना ही साधक स्नेह से अजपा जाप करते हैं ।
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*हरि जी गाहक हेत के, नारायण लेहिं नेह ।*
*तो मनसा वाचा कर्मना, संतों करो सनेह ॥१६॥*
हरि तो प्राणी के प्रेम के ग्राहक हैं, नारायण हृदय के स्नेह को ही लेते हैं, तब हे संतों ! मन, वचन और कर्म से प्रभु से प्रेम ही करो, प्रेम से ही अजपा जाप होता है ।
(क्रमशः) 

शुक्रवार, 24 जुलाई 2026

३०. ज्ञानी कौ अंग ४५/४८

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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३०. ज्ञानी कौ अंग ४५/४८
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बन तैं घर आवै नहीं, घर तैं बन नहिं जाइ । 
सुन्दर रवि उद्दोत तैं, तिमिर कहां ठहराइ ॥४५॥
एक बात और, ब्रह्मज्ञान होने पर यदि ज्ञानी वन में रह रहा हो घर में आना(गृहस्थ होना) उसके लिये आवश्यक नहीं और यदि ज्ञानावस्था में वह घर में है तो उसे वन में जाने(संन्यासी होने) की आवश्यकता ही नहीं हैं; क्योंकि सभी जानते हैं कि सूर्य के प्रकाश के सम्मुख अन्धकार कहीं भी नहीं ठहर पाता ! ॥४५॥
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पंखी की पर टूट कैं, भूमि पर्यौ जिहिं ठौर । 
सुन्दर उडिबे तें रह्यौ, मिटी सकल ही दौर ॥४६॥
सचाई यह भी है - जैसे किसी पक्षी के पंख टूट जाने पर वह जहाँ गिरता है, वहाँ पड़ा रह जाता है वहाँ से उड़ नहीं पाता । यही स्थिति ज्ञानी की भी होती है । उस की स्थिति पक्षविहीन पक्षी के तुल्य हो जाती है । उस की भी जब समस्त जन्मपरम्परा नष्ट हो जाती है, तब वह अवशिष्ट प्रारब्ध कर्म भोग कर निर्वाण(मुक्ति) प्राप्त कर लेता है ॥४६॥
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एक क्रिया खेती करै, बंधन होत अपार । 
एक क्रिया भोजन करत, बंधन उतनी बार ॥४७॥
मनुष्यों का एक कर्म(क्रिया) कृषि(खेतन में अन्न पैदा करना) है । जिस में 'यह करो, यह न करो' आदि अनेक विधि - निषेध रूप बन्धन लगे होते हैं । इसी प्रकार, मनुष्यों का एक कर्म भोजन भी है; उसमें भी समाज ने उतने ही प्रकार के विधि - निषेधात्मक बन्धन लगा रखे हैं ॥४७॥
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एक क्रिया मल मूत्र कौं, तजत नहीं कछु प्यार । 
सुन्दर ज्ञानी की क्रिया, बंधन नहीं लगार ॥४८॥
मनुष्यों के साथ एक नित्य(दैनिक) क्रिया बन्धन के रूप में मल मूत्र के त्याग की भी लगी हुई है जिसको वे किसी राग के विना ही प्रतिदिन करते हैं । श्रीसुन्दरदासजी के कहने का तात्पर्य यह है कि संसार की छोटी बड़ी सभी क्रियाएँ बन्धन रूप हैं । केवल ज्ञानी की ज्ञानक्रिया ही एक ऐसी क्रिया है जिसमें किसी प्रकार का बन्धन नहीं है ॥४८॥
(क्रमशः) 

संत प्रतिष्ठा

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*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
*आत्मदेव आराधिये, विरोधिये नहीं कोइ ।*
*आराधे सुख ऊपजै, विरोधे दुख होइ ॥१२॥*
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अथ अध्याय २ =
२१. तोलारामजी = दांतारामगढ़ के पास वाय ग्राम में तोलारामजी का साधन धाम था । ये भजनानन्दी महात्मा थे । इनके गुरु महाराज ने एक कूप बनवाया था किन्तु उसमें पानी बहुत कम आया । तब एक दूसरा कूप बनवाया उसमें भी जल पर्याप्त नहीं निकला तब तोलारामजी के गुरुजी को बहुत चिन्ता हुई कि दूसरा कूप बनवाने पर इसमें भी यथेष्ट जल नहीं मिल सका अब क्या किया जाय ?
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तब तोलारामजी अपने गुरुजी का चिन्ता जन्य दुख देखकर अपना कमंडलु लेकर उन कूपों पर गये और दोनों कुओं में अपने कमंडलु का पानी थोड़ा २ डाल आये । पानी डालते ही उन दोनों कुओं में यथेष्ट जल आ गया था । फिर उक्त चमत्कार से जनता उनके पास बहुत आने लगी तब उन्होंने अपने भजन में विघ्न मानकर वाय ग्राम छोड़ दिया था और भैराणे में आकर भजन करने लगे थे । भैराणे में ही इनका देहान्त होने पर ब्रह्मलीन हुये थे ।
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ये अच्छे संत थे कहा भी है~
संतन की लव वस्तु भी, बढ़ती सहज सुजान ।
तोलाराम जल कूप में, देखत बढ़ा महान ॥२०३॥दृ.त. ११
संत प्रतिष्ठा स्थान को, त्याग अन्य थल जाय ॥
तोलाराम तज कर रहे, भैराणे में आय ॥२०५॥दृ.त. ११
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२२. हरिभक्तजी =
हरिभक्तजी पचार स्थान के अतीत थे अर्थात् स्थान के महन्त नहीं थे, स्थान में दीक्षित थे । हरिभक्तजी सामान्यतः सभी शास्रों के ज्ञाता थे । इनको पौराणिक ज्ञान विशेष था । श्रीमद्भागवत् की कथा आप उत्तम करते थे । गरीबदासोतों के महन्त सूरतरामजी ने हरिभक्तजी से अध्ययन किया था । हरिभक्तजी को छन्द शास्त्र का ज्ञान विशेष रूप से था । कन्हीरामजी बुवाणी वालो ने छंद शास्त्र का ज्ञान हरिभक्तजी से ही प्राप्त किया था । हरिभक्तजी अच्छे विद्वान् संत थे । वि.सं. १९१५ में ब्रह्मलीन हुये थे ।
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२३. चरणदासजी = चरणदासजी नारायणा दादूधाम के गरीबदासजी के थांभे में दीक्षित थे । ये संगीत में अच्छे प्रवीण थे । विशेषतः साम्प्रदायिक भजनों की लय के आप विशिष्ट ज्ञाता थे । खालसे के गाने वालों ने आपसे ही यह गुण प्राप्त किया था । भगवानदासजी, सूरतरामजी, रामनारायणजी इन तीन गरीबदासोत महन्तों के आगे चरणदासजी ने गायन का कार्य किया था । वि.सं. १९२० में आप ब्रह्मलीन हुये थे । इनके चरण गरीबदासोत महन्तों के बराबर भैराणे में पधराये हुये हैं । इससे प्रतीत होता है कि इनका समाज में बहुत समादर था । ये अच्छे गायक संत थे ।
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२४. रामरतनजी = रामरतनजी गरीबदासोतों के किशनगढ़ के स्थान में दीक्षित हुये थे । आपने भी संगीत का अच्छा अभ्यास किया था । ये सितार बहुत अच्छा बजाते थे । चरणदासजी के पश्चात् आपने भी तीन गरीबदासोत महन्तों के काल में गायन कार्य किया था । वे महन्त~ १-रामनारायणजी, २- गोविन्ददासजी, ३- बोलतारामजी थे । आप वि.सं. १९४८ के आसपास ब्रह्मलीन हुये थे ।
(क्रमशः)

*२२. अजपा जाप का अंग ~९/१२*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*२२. अजपा जाप का अंग ~९/१२*
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*रज्जब रटतों जीव ही, चित्त चातक सम जाप ।*
*मक्र वक्र बोले नहीं, आप हरत हरि आप ॥९॥*
जैसे चातक पक्षी स्वाति बिन्दु के लिये पीव पीव रटता है, वैसे ही जीव निरन्तर अजपा जाप जपता है । मच्छी मुख से तो पानी नहीं पीती किन्तु उसकी प्यास जल रोम रोम द्वारा उसमें प्रवेश कर के बुझाता है, वैसे ही अजपा जाप का साधक मुख से तो नाम नहीं बोलता, फिर भी हरि उसकी अभिलाषा पूर्ण करते रहते हैं ।
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*रज्जब रसना रहित रस, पीवे प्राण प्रवीन ।*
*वक्त्र बिना ज्यों वारि सुख, रोम रोम से मीन ॥१०॥*
जैसे मच्छी मुख बिना ही रोम रोम से जल पान का सुख लेती है, वैसे ही रसना का उच्चारण करे बिना ही चतुर साधक प्राणी अजपा जाप का रस पान करते रहते हैं ।
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*रज्जब रसना बोल ही, चहुँ इन्द्रिय चुप चाप ।*
*ये पंचों कारज समर्थ, यूं स अबोल्या जाप ॥११॥*
जैसे एक रसना द्वारा वाक् इन्द्रिय बोलती है, अन्य श्रोत्र, चक्षु, ध्राण, और त्वचा चुप रहती है फिर भी पांचो अपना अपना कार्य करने में समर्थ हैं ऐसे ही बिना बोले वह अजपा जाप होता है ।
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*मुख मारुत सेती अगम, सुमिरन सुरति मझार ।*
*रज्जब करसी एक को, अजपा जप व्यवहार ॥१२॥*
वृत्ति से होने वाला स्मरण मुख और प्राण वायु की गति से परे है, यही अजपा जाप है किन्तु अजपा जप करने का व्यवहार कोई विरला ही करेगा ।
(क्रमशः)

गुरुवार, 23 जुलाई 2026

३०. ज्ञानी कौ अंग ४१/४४

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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३०. ज्ञानी कौ अंग ४१/४४
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तवा माहिं नहिं देखिये, सूरय कौ उद्दोत । 
सुन्दर मूंधी आरसी, तामैं कछूक होत ॥४१॥
आप कितना भी प्रयास करें, तवा(रोटी सेकने का लौहपात्र) में मुख का प्रतिबिम्ब नहीं देखा जा सकता । हाँ, आरसी(दर्पण) को अधोमुख करें तो उस में सूर्य की कुछ चमक प्रतीत होती है ॥४१॥
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जब दर्पन सूधौ करै, रवि आभासै आइ ।
सुन्दर दर्पन मिटि गयें, सूरय ई रहि जाइ ॥४२॥
हाँ, दर्पण(शीशा) को यदि आप ऊर्ध्वमुख करें तो उसमें सूर्य की कान्ति(प्रतिबिम्ब) स्पष्ट दिखायी देती है । महाराज श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - वहाँ यदि दर्पण को हटा दिया जाय तो वहाँ केवल सूर्य ही प्रत्यक्ष रह जायगा ॥४२॥
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जीव ब्रह्म मिलि जात है, सुन्दर उपजें ज्ञांन । 
दूर भयौ प्रतिबिंब जब, रह्यौ एक ही भांन ॥४३॥
इसी प्रकार, जीव एवं ब्रह्म के मिलने पर ज्ञान होता है; क्योंकि उस समय जीव में ब्रह्म का प्रतिबिम्ब पड़ता है । यदि वहाँ जीव को हटा दिया जाय तब ब्रह्म एकाकी रह जायगा । इसी स्थिति(एकाकी ज्ञान) को कहते हैं - साक्षाद् दर्शन ॥४३॥
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सुन्दर ज्ञान प्रकास तैं, धोखौ रहै न कोइ । 
भावै घर माहें रहौ, भावै बन मैं होइ ॥४४॥
श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - ऐसे ज्ञानी साधक के हृदय में जब ब्रह्मज्ञान का प्रकाश हो जाता है, तब उस के चित्त में ब्रह्मविषयक कोई भ्रम(धोखा) या सन्देह नहीं रह जाता । उस स्थिति में भले ही वह घर में रहे(गृहस्थ धर्म का पालन करे) या सब कुछ त्याग कर वन में चला जाय(संन्यासी परिव्राजक हो जाय) ॥४४॥
(क्रमशः)

२० ब्रह्मचारी

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*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
*आपा गर्व गुमान तज, मद मत्सर अहंकार ।*
*गहै गरीबी बन्दगी, सेवा सिरजनहार ॥*
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१९ प्रभुदासजी = प्रभुदासजी लालदासजी के अस्थल में दीक्षित हुये थे । प्रभुदासजी ने संगीत का बहुत अच्छा अभ्यास किया था । उनकी संगीत कला से प्रभावित होकर तत्कालीन जैसलमेर नरेश ने उनको अपने पास बुला लिया था । वहां उनको राज्य की ओर से एक रुपया रोज मिलता था । उनका देहान्त जैसलमेर में ही वि. सं. १९३४ के पश्चात् हुआ था ।
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२० ब्रह्मचारी = ब्रह्मदासजी हरनाथजी दादू पंथी के शिष्य थे । ये हरनाथजी लालदासजी के ही शिष्य होंगे । कारण, लालदासजी के शिष्यों में रामनारायण जी जोधपुर अस्थल वालों ने ब्रह्मदासजी को भी गिनाया था । किन्तु ब्रह्मदासजी की भक्त माल के टीकाकार ने ब्रह्मदासजी को हरनाथजी का शिष्य लिखा है अतः ब्रह्मदासजी लालदासजी के पौत्र शिष्य हो सकते हैं ।
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ब्रह्मदासजी पोकरण(मारवाड़) के पास माडवा ग्राम के विठू शाखा के चारण जगा के पुत्र थे । विसनदानजी(विष्णुदान ) इनका पूर्व नाम था । ये अविवाहित थे । चारण होने से कविता करने में इनकी स्वाभाविक ही रुचि थी । ये राजस्थानी डिंगल के अच्छे कवि थे । फिर साधु होने से ईश्वर गुणगान ही उनका कर्तव्य हो गया था । इससे उन्होंने भक्तमाल की रचना की और उसको ६ भागों में विभक्त किया है ।
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उनकी भक्तमाल का सटीक संपादन राजस्थान पुरातत्त्व ग्रंथ माला में ग्रंथांक ४३ में जोधपुर से छपा है । उस भक्तमाल में ११४ भक्तों की कथायें हैं । उन कथाओं में अपने पंथ के संत दादूजी आदि की भी कहायें दी हैं । ब्रह्मदासजी जोधपुर नरेश विजयसिंहजी के समय में बिद्यमान थे । वि. सं. १८१६ में विजयसिंहजी ने पोकरण के वीर बुद्धिमान् ठाकुर देवीसिंहजी आदि चार बड़े सरदारों को किले पर धोका देकर पकड़वाये और मरवा दिये थे ।
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तब स्पष्ट वक्ता ब्रह्मदासजी ने उपालम्भ रूप एक गीत विजयसिंहजी को सुनाया था । राजा ने इनको संत जान कर इतना ही कहा~ अभी आपका चारणपना तो दूर नहीं हुआ है । ब्रह्मदासजी ने अपना साधन धाम ओसियां में पहाड़ी पर सच्चई देवी के मंदिर के पास में बनवाया था । वह अभी भी ब्रह्मदासजी के दादूद्वारे के नाम से ओसियां में प्रसिद्ध है ।
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ब्रह्मदासजी की रचनायें ~ ब्रह्मदासजी रचित १- भक्तमाल प्रकाशित है । २- कुछ गीत भी मिलते हैं । उदाहरण गीत नं.१~
अद्भुत गत राम न तो पै आग्या, इन्द्र चन्द्रमुख संशक आप ।
भाव तणा लादांरो भूखो, बांदारो बांदों मा बाप ॥१॥
कोट अनन्त ब्रहमांडरो करता, कोट अनन्त दईतां चौ काल ।
बोलांरो संचौ निरवाहण, गोलांरो गोलों गोपाल ॥२॥
मोटा धणी अचंभो मोटो, चट सूरापण निपट घणों ।
ठावौ सकल सकलरौ ठाकर, तूं चाकर चांकरां तणों ॥३॥
दास ब्रह्म झूठी नहदाखै, माधव कछु बुरो मत मान ।
तीन लोक घर रह्यो भरतियो(भृत्य), छीपा तणी छवाई छाँन ॥४॥
बाबा तूं पारथ रथ बैठो, दास थकौ मोटो दातार ।
शेष महेश सूर सस(शशि) सांमी(स्वामी) पढ़ता विरदन पावे पार ॥५॥
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यह भक्तमाल के छ्ठे भाग का एक नं. गीत है । ब्रह्मदासजी ने अपनी भक्तमाल के छंदों के समस्त चरणों में वैणय-सगाई अलंकार का अच्छा निर्वाह किया है । इनके ब्रह्मलीन होने का निश्चित पता नहीं ज्ञात हो सका है, किन्तु संभव है विक्रम की १९ वीं शताब्दी के मध्य भाग में ही अपने साधन धाम ओसियां में ही ये ब्रह्मलीन हुये होंगे । ये भी गरीबदासोतों में एक अछे संत कवि हो गये हैं ।
इति श्री प्रथम भाग समाप्तः ॥१॥
(क्रमशः)

*२२. अजपा जाप का अंग ~५/८*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*२२. अजपा जाप का अंग ~५/८*
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*रज्जब सहस नाम पंखो, सु परि, आतम जय आकाश ।*
*एक प्राण पारा मई, उडहि नाम पर नाश ॥५॥*
परमात्मा के सहस्त्र नाम रूप पंखों की सकाम चिन्तन रूप उडान द्वारा जीवात्मा ब्रह्म रूप आकाश की ओर जाता है, किन्तु कामना प्राप्ति के लिये पुन: संसार में ही आ जाता है, परन्तु पारा उड़ता है और उड़ने के स्थान पर पुन: नहीं आता, ऐसे ही कोई एक नाम - पंखों से निष्काम चिन्तन रूप उड़ान लगाता है और वह अपना अभाव कर देता है अर्थात ब्रह्म से मिल जाता है ।
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*नर नग गुटिका सिद्ध तन, पंखों बिना उङंत ।*
*तैसे रज्जब नाम बिन, नेह माग तहँ जंत ॥६॥*
जैसे नर गुटिका(पारादि से बनी गोली मुख में रखकर उस) के बल से हीरा - हीरी के वियोग से हीरी के पास जाने के लिये, और सिद्ध शरीर, ये पंखों के बिना ही आकाश में उड़ जाते हैं, वैसे ही नाम-पंख बिना भी जीव स्नेह मार्ग द्वारा उड़कर परब्रह्म के पास पहुच जाता है ।
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*रज्जब हित पर हद हुई, निरख्या नेह निराट१ ।*
*पय पाया पाषाण मुख, करी सु ऊबट२ बाट ॥७॥*
स्नेह की महिमा ऐसी है कि - परमात्मा रूप सीमा तक पहुँचा देता है, स्नेह से भक्तों ने परमात्मा को पूर्ण१ रूप से देखा है, प्रेम के द्वारा ही नामदेव ने पाषाण मूर्ति को दूध पिलाया है, स्नेह अगम२ में भी मार्ग बना देता है ।
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*नाम सूई पट प्राण पति, सुरति सनेही ताग ।*
*रज्जब रज तज काढ़तों, कौन वस्तु बिच लाग ॥८॥*
नाम तो सुई है, प्राण पति परमात्मा वस्त्र है, स्नेह से युक्त सुरति तागा है, वृत्ति रूप तागा साफ करके नाम सुई द्वारा ब्रह्म - वस्त्र से निकालने में किस वस्तु की आवश्यकता पड़ती है ? किसी की भी नहीं । भाव यह है, स्नेह युक्त वृत्ति निरन्तर नाम चिन्तन रूप अजपा जाप द्वारा ब्रह्म को प्राप्त करती है ।
(क्रमशः)

*२२. अजपा जाप का अंग ~१/४*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*२२. अजपा जाप का अंग ~१/४*
इस अंग में अजपा जाप सम्बन्धी विचार कर रहे हैं -
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*शरीर शब्द अरु श्वास करि, हरि समिरन तिहुँ ठाँम ।*
*जन रज्जब आतम अगम, अजपा इसका नाम ॥१॥*
शरीर की प्रत्येक क्रिया द्वारा, नाम रूप शब्द और श्वास द्वारा एक साथ निरंतर स्मरण होता रहता है, तब इसी का नाम अजपा जाप हो जाता है, इस अजपा जाप से आत्मा ब्रह्म स्वरूप ही हो जाता है ।
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*मुख सौ भजै सु मानवी, दिल सौं भजै देव ।*
*जीव सौं जपै सु ज्योति में, रज्जब साँची सेव ॥२॥*
जो मुख से भजन करता है, वह मानव है, दिल से भजन करता है, वह देवता है ओर जो जीव से अर्थात आत्मा को ब्रह्म रूप समझकर भजता है, वह ब्रह्म ज्योती में लीन हो जाता है, यही सच्ची उपासना है ।
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*रज्जब मुख अक्षर मुख सप्त स्वर, मुख भाषा छत्तीस ।*
*एतौं ऊपर उर भजन, अन अक्षर जगदीश ॥३॥*
जोधपुर राज्य के पांचेटिया गांव के चारण दुरशा आडा, यह भावना लिये धूम रहे थे कि चर्चा में मुझे कोई जीत लेगा तो मै उसका शिष्य बन जाऊँगा और मैं जीत लूंगा तो हारने वाले व्यक्ति को मेरी पालकी में जोतकर चलाऊँगा । वह धूमता हुआ साँगानेर में रज्जबजी के पास पहुँचा और बोला -
"बावन अक्षर सप्त स्वर, मुख भाषा छतीस ।
इतने ऊपर जो कथे, तो जानूं कवि ईश ॥
इसी के उत्तर में यह ऊक्त साखी कही थी । साखी का अर्थ - बावन अक्षर, सप्त स्वर और छतीस भाषा, इनका तो मुख से व्यवहार होता है, किन्तु हृदय में ब्रह्म को भजन किया जाता है वह अक्षर, सप्त स्वर और सभी भाषाओं से परे है । यह सुनकर दुरशा आडा ने नत मस्तक होकर रज्जब जी को अपना गुरु मान लिया तथा अपनी पालकी आदि सभी रज्जबजी के चरणों में भेट कर दी ।
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*नेह निनामे१ सौं किया, ध्यान धर्या बिन अंक२ ।*
*रज्जब मनहुँ जहाज बिन, हनुमत पहुँच्या लंक ॥४॥*
नामरहित१ ब्रह्म से प्रेम किया और चिन्ह२ रहित ब्रह्म का ध्यान किया, उक्त प्रकार साधन से परब्रह्म के पास ऐसे पहुँचे, जैसे हनुमान जी बिना ही जहाज के लंका में पहुंचे थे ।
(क्रमशः)

बुधवार, 22 जुलाई 2026

३०. ज्ञानी कौ अंग ३७/४०

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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३०. ज्ञानी कौ अंग ३७/४०
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जानत है सब स्वप्न करि, इन्द्रिनि कौ ब्यवहार । 
सुन्दर ज्ञानी ज्ञान तैं, भिन्न न होइ लगार ॥३७॥
यद्यपि वह ज्ञानी यथार्थतः जानता रहता है कि उस की इन्द्रियों द्वारा कृत ये सभी कर्म स्वप्न के सदृश अयथार्थ(मिथ्या) हैं; क्योंकि ज्ञानी का यह ज्ञानक्रम एक क्षण भी उस से पृथक् नहीं होता ॥३७॥
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सुन्दर ज्ञानी ज्ञान मैं, गरक भयौ निज ठौर । 
दंत दिखावै और गज, दसन खान कै और ॥३८॥
ज्ञानी जिस ब्रह्मज्ञान में सतत निमग्न रहता है वह ब्राह्मी स्थिति कहलाता है२ । उस का लोकाचार का ज्ञान इस से दूसरा है; जैसे कि हाथी के दाँत दिखाने के लिये दूसरे और खाने के लिये दूसरे होते हैं ॥३८॥ (२ ब्राह्मी स्थिति के विस्तृत ज्ञान हेतु द्र० - भ० गी०, अ० २, श्लोक ७१, ७२)
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तम रज गुण करि जगत है, भक्त सतोगुण रुद्ध । 
सुन्दर तीनौं गुन परै, ज्ञानी सात्विक सुद्ध ॥३९॥
एक अन्य भेद यह भी है - जगत् अपना समस्त लोकव्यवहार रज तम में मिश्रित ज्ञान से सम्पन्न करता है; जब कि ज्ञानी का ज्ञान एकमात्र शुद्ध सत्त्वगुण से ही युक्त होता है ॥३९॥
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तवा अधोमुख आरसी, दर्पण सूधै होइ । 
ऐसै तम रज सत्व गुण, सुन्दर देखहु जोइ ॥४०॥
जैसे मुखदर्शन के तीन साधनों में से तवा अधोमुख होकर, तथा आरसी तथा दर्पण ऊर्ध्वमुख होकर ही मुखदर्शन के निमित्त बन पाते हैं, वैसे ही लौकिक ज्ञान रज एवं तमोगुण मिश्रित होकर तथा ज्ञानी का ज्ञान सत्त्वगुणमिश्रित होकर ही ज्ञान कराने में समर्थ हो सकते हैं ॥४०॥
(क्रमशः)

भजनानन्दी

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*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
*शब्दों मांहिं राम-रस, साधों भर दीया ।*
*आदि अंत सब संत मिलि, यों दादू पीया ॥*
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८. वें महन्त परशुरामजी अच्छे भजनानन्दी हुये हैं । ९. वें रामनारायणजी गायक व वैद्य हैं ।
१८ बालकदासजी = बालकदासजी हेमदासजी के ही एक अन्य शिष्य थे । इनका एक लघु ग्रन्थ "गुरु महिमा" है । उसमें प्रथम एक दोहा है, शेष १३ छप्पय, इन्दव, मनहर है । यह १४ पद्यों में है । इसमें दादू जी २- गरीबदासजी ३- केवलरामजी ४- रामदासजी ५- हरिभक्तजी ६- हरिदासजी ७- लालदासजी और अपने गुरु ८- हेमदासजी ।
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इन आठ संतों की महिमा कही है- उदाहरण~ सवैया~
दास गरीब के पाट विराजत,
केवलरामजी केवल ध्यावें ।
केवल लै रु समाधि हु केवल,
केवल ध्यान रु केवल भावें ॥
केवल ज्ञान गिरा पुनि केवल,
केवल ब्रह्महि विश्व दिखावें ।
बालकदास कहै निज केवल,
केवल है अरु केवल गावें ॥७॥
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मनहर~
केवल राम के पाट सुख से विराजे सो तो,
रामजी के प्यारे रामदास जी कहाये हैं ।
नैना राम वैनाराम आशैराम इष्ट राम,
राम ही उपासना सु मत ठहाराये हैं ॥
एक समै द्वारिका में सैल सु करत जाय,
राखे रणछोड़ रहो वचन सुनाये हैं ।
वैना करवाये गुण गावे एक राम ही के,
कहत बालकदास राम मन भाये हैं ॥८॥
उक्त कवित्त के अन्तिम दो पादों से ज्ञात है कि~ रामदासजी भ्रमण करते हुये द्वारकापुरी में गये तब भगवान् कृष्ण ने यह कह कर कि यहां भी कुछ दिन रहो, द्वारिका में रामदास जी को रोका था और उनसे वैना अर्थात् व्याख्यान करवाते थे, तब रामदासजी एक राम ही के गुण गाते थे । क्योंकि उनके मन को एक राम ही प्रिय लगते थे ।
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बालकदास जी की ज्ञान, भक्ति, वैराग्यादि संबन्धी अन्य रचनायें भी मिलती हैं और अच्छी भी हैं किन्तु कितनी हैं, यह निर्णय नहीं हो सका है । इनकी रचना को देखते हुये ये अच्छे कवि ज्ञात होते हैं । अतः इनकी रचनायें अधिक ही होनी चाहियें । अन्य रचना का उदाहरण~ मनहर~
"कुंजन के बाल सो तो हिम से हरत राखे,
टीटोड़ी के बाल राखे भारत विशाल से ।
बालक प्रह्लाद हु की शासना अनेक टारी,
मंजारी के बाल राखे पावक की झाल से ॥
बालखिल्यादिक प्रभु तुम ने उधारे आय,
कुन्ति हु के पंच बाल राखे हैं दयाल तैं ।
कहत बालकदास बालक दयालु तेरा,
आय कर बालक को क्यों न राखें काल तैं ॥"
बालकदासजी वि. सं. १८५९ में ब्रह्मलीन हुये थे । इनकी समाधि लालदासजी की समाधि के पास गवा की पहाड़ी पर है । वहां अन्य भी बहुत से दादूपंथी संतों के चरण चिन्ह हैं ।
(क्रमशः)

मंगलवार, 21 जुलाई 2026

३०. ज्ञानी कौ अंग ३३/३६

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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३०. ज्ञानी कौ अंग ३३/३६
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अज्ञ क्रिया कछु करत है, अहं बुद्धि कौं आंनि ।
सुन्दर ज्ञानी करत है, अहंकार बिनु जांनि ॥३३॥
इसमें वास्तविक कारण यह है कि अज्ञानी पुरुष सभी सांसारिक कृत्यों को अहं बुद्धि से(मैं कर रहा ' - ऐसा मान कर) करता है; जब कि ज्ञानी अपने सभी सांसारिक कृत्यों में अहंबुद्धि त्याग कर उनको ईश्वरार्पण बुद्धि से पूर्ण करता है । अतः जब यह अपने को किसी कर्म का कर्ता ही नहीं मानता तो उसे उन से होने वाला दुःख क्या और क्यों सन्तप्त करेगा ! ॥३३॥
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अज्ञानी सुख दुखनि कौं, जानत अपने मांहिं ।
सुन्दर ज्ञानी आपु मैं, सुख दुख मानैं नांहिं ॥३४॥
यही कारण है कि अज्ञानी जहाँ स्वयं को उन कर्मों का कर्ता मान कर स्वयं को उन कर्मों के फल का भोक्ता मान लेता है, वहीं ज्ञानी स्वयं को उन सुख दुःखात्मक कर्मों का अकर्ता, अभोक्ता मान कर सुखी एवं सन्तुष्ट तथा सन्तृप्त रहता है ॥३४॥
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सुन्दर अज्ञ रु तज्ञ कै, अंतर है बहु भांति ।
वाकै दिवस अनूप है, वाहि अंधेरी राति ॥३५॥
महाराज श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - इसी प्रकार, ज्ञानी एवं अज्ञानी में अन्य भी अनेक भेद हैं । जैसे - जो साधनाकाल ज्ञानी के लिये अनुपम दिवस के रूप में माना जाता है वहीं अज्ञानी के लिये घोर अन्धकारमय रात्रि के रूप में प्रतीत होता है१ ॥३५॥
(१ तु० श्रीमद्भगवद्‌गीता : या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी ।
यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुनेः ॥ - अ० २, ६९)
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ज्ञानी शुभ कर्मनि करै, लोक आचरन हेत ।
बहुत भांति के शब्द कहि, सुन्दर शिक्षा देत ॥३६॥
दूसरा भेद यह है - जहाँ ज्ञानी अपने सभी आचरण लोकाचार निभाने के लिये करता है । वह अपने उपदेशों में भी, शिष्यों को समझाने के लिये, विविध लौकिक उदाहरण प्रस्तुत करता रहता है ॥३६॥
(क्रमशः)

सिद्धि रूप प्रपंच

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*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
*प्रेम पियाला राम रस, हमको भावै येहि ।*
*रिधि सिधि मांगैं मुक्ति फल, चाहैं तिनको देहि ॥*
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सिद्धि के कारण राजारामजी के पास जनता का आना जाना बहुत बढ़ गया था । उस आवागमन से तोलारामजी आदि संतों के भजन में विघ्न होने लगा था । इससे एक दिन तोलारामजी ने कहा~राजाराम ! तुम्हारे पास जनता का आना जाना अधिक रहता है । इससे हमारे साधन भजन में विघ्न होता है । अतः तुम स्थान बदल लो, अन्य स्थान पर रहा करो । फिर गुरूजी की आज्ञा से तोलारामजी के प्रथम स्थल से पश्चिम की ओर पास ही राजारामजी ने स्थान बनवा लिया । राजारामजी के स्थल के नाम से प्रसिद्ध हुआ । फिर उसी में रहकर भगवद् भजन करने लगे वह स्थान राजाराम जी के स्थल के नाम से अब भी प्रसिद्ध है ।
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तोलारामजी के अन्य शिष्य थे उन्होंने जोधपुर के खाँडा पलसा में स्थान बनवाया था जो अब घोसियों के मोहल्ले में है । दादूपंथियों के नोहरे के नाम से प्रसिद्ध है । राजारामजी को दादू वाणी के पाठ से सिद्धि प्राप्त हो गई थी । उनको भविष्य का ज्ञान भी पहले ही हो जाता था । एक दिन कुचामण ठाकुर साहब राजारामजी के दर्शन करने गये थे ।
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वे राजारामजी को प्रणाम करके घर को जाने लगे तब राजारामजी ने कहा~ घर से आधी फर्लांग दूर पर बग्गी से उतर जाना । ठाकुर साहब की राजारामजी पर श्रद्धा थी । उन्होंने कहा~ जो आज्ञा उतर जाऊंगा । फिर वे राजारामजी की आज्ञानुसार उतर गये । घर के पास आते ही बग्गी उलट गई । यह बात जब राजारामजी के गुरु तोलारामजी ने सुनी तब राजारामजी को कहा~ तूं इस सिद्धि रूप प्रपंच में क्यों पड़ा है ? यह तो भगवत् प्राप्ति में विघ्न और दुःखदाता है ।
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कहा भी है~
विघ्न मानते संत जन, सिद्धिन का संयोग ।
किस प्रपंच में पड़ गया, सिद्धि क्लेशप्रद रोग ॥१२१॥दृ. त. १३
उक्त प्रकार ही पोकरण आदि के कई ठाकुरों को उन्होंने चमत्कार दिखाये थे । महाराज तखतसिंहजी भी राजारामजी के पास आते थे । अधिक राजा व प्रजा व आने के राजारामजी के पास बहुत संपत्ति संग्रह हो गई थी । उनके पास आने वाले लोग संपत्ति संबधी बात उनसे करते थे तब वे यह उत्तर दिया करते थे-
'राजाराम माया जोडी, क्यों परमोधो लोको ।
या माया यूं जायसी, होको आरे फोको ॥'
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अर्थात् राजाराम ने माया जोड़ ली यह अच्छा नहीं किया । हे लोगों यह प्रबोध मुझे क्यों देते हो ? तुमको ज्ञान नहीं है ! यह किस के लिये जुड़ी है । किन्तु मुझे ज्ञात है इसीलिये मैं माया के विषय में मौन रहा हूं । यह माया तो ऐसे जायगी, जैसे वायु का झोंका आने पर आरे से काटने पर निकाला हुआ बुरादा, हल्का होने से उड़ जाता है वैसे ही यह शीघ्र ही यहां से चली जायगी । हुआ भी वैसा ही । राजारामजी के शिष्य अर्जुनदासजी ने उस माया का विनाश बहुत शीघ्र ही कर डाला । राजारामजी का शरीरान्त वि. स. १९४४ में हुआ था ।
(क्रमशः)

*२१. भजन भेद का अंग ~४१/४३*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*२१. भजन भेद का अंग ~४१/४३*
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*सब अक्षर सांई सुमिर, रे दिव्य दृष्टि दास ।*
*रज्जब रत रह राम में, त्यों ही प्राण पचास ॥४१॥*
हे दिव्य दृष्टि भक्त ! सभी अक्षरों के द्वारा प्रभु का स्मरण कर, जैसे 'राम' इन दो अक्षरो में भक्त प्राणी रत रहते हैं, वैसे ही अन्य पचास अक्षरों में रत रहना चाहिये अर्थात ईश्वर के विभिन्न नामों में सभी अक्षर आते हैं, उन नामों से स्मरण करना ही अन्य पचास अक्षरों से स्मरण करना है ५२ ही अक्षर हैं ।
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*बावन अक्षर करि भजे, वेत्ता बावन वीर ।*
*जन रज्जब सुध बुद्धि का, ररै ममै में सीर ॥४२॥*
बावन अक्षरों से बनने वाले विविध शब्दों को समझने में वीर ज्ञानी जन तो बावन अक्षरों के द्वारा प्रभु का भजन करते हैं, किन्तु जो सरल, शुद्ध बुद्धि के अधिकारी जन हैं उनका तो रकार मकार से बने राम नाम के स्मरण में ही साझा है अर्थात अधिकार है ।
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*रज्जब रहे न नाम बल, नेह बिना मन थीर ।*
*ज्यों चूने बिन पाथरहुं रोक्या रहै न नीर ॥४३॥*
जैसे चूना लगाये बिना केवल पत्थरों की दीवाल से पानी नहीं रुकता, निकलता रहता है, वैसे ही प्रभु में प्रेम किये बिना केवल नाम-स्मरण के बल से ही मन प्रभु में स्थिर नहीं रहता ।
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इति श्री रज्जब गिरार्थ प्रकाशिका सहित “२१. भजन भेद का अंग” समाप्त ॥
(क्रमशः)

*२१. भजन भेद का अंग ~३७/४०*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*२१. भजन भेद का अंग ~३७/४०*
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*रज्जब उर१ कर२ के भजन, कछु पाड़ा३ पड़ जाय ।*
*यथा रुपया ठौर बिन, गैरी४ नाम कहाय ॥३७॥*
जैसा रुपया जिस देश का होता है उससे भिन्न राज्य में अन्य४ देश का कहलाता है, वैसे ही हृदय१ के भजन और हाथ२ से माला फेरने के भजन में कुछ अन्तर३ पड़ ही जाता है, दोनों सम नहीं होते हृदय का भजन ही श्रेष्ठ कहलाता है ।
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*रज्जब उर१ कर२ के भजन, अंतर ह्वै द्वै हाथ ।*
*आतम अबला३ धाम में, वर४ बाहर निज नाथ ॥३८॥*
हृदय१ के भजन और हाथ२ से माला फेरने के दो हाथ जितना अंतर है अर्थात भेद रहता है । नारी३ तो घर में हो और उसका स्वामी४ बाहर हो तब नारी को स्वामी के पास रहने का सा सुख नहीं मिलता, वैसे ही जीवात्मा के हृदय में चिन्तन होने से जो आनन्द मिलता है, वैसा माला फेरने से नहीं मिलता, कारण माला फेरने से हृदय में प्रभु की अनुभूति नहीं होती ।
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*रंग महल रंकार मध्य, रहे जु आतम राम ।*
*सो सुख मुख नहिं कहि सकै, सुरति लहै विश्राम॥३९॥*
राम मंत्र के बीज "राँ" रूप रंग महल में आत्म स्वरूप राम रहते हैं अर्थात "राँ" का जप करने से राम का दर्शन होता है और दर्शन से होने वाला सुख मुख से नहीं कहा जाता, किन्तु मनोवृत्ति को पूर्ण शांती मिलती है ।
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*रज्जब सुमिरन सदन१ मध्य, धरे२ अधर३ के सु:ख ।*
*जे कोइ पैठे प्राणियाँ, कदे न पावे दु:ख ॥४०॥*
प्रभु-स्मरण रूप धाम१ मायिक२ सुख तथा ब्रह्म३ सुख दोनों ही है, जो कोई प्राणी उसमें प्राणी उसमें प्रवेश करता है, वह कभी भी दु:ख नहीं पाता अर्थात परमात्मा का स्मरण करने से दोनों प्रकार का ही सुख प्राप्त हो जाता है ।
(क्रमशः)

३०. ज्ञानी कौ अंग २९/३२

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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३०. ज्ञानी कौ अंग २९/३२
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भावै तनु काशी तजौ, भावै बागड मांहिं । 
सुन्दर जीवन मुक्त कै, संसय कोऊ नांहिं ॥२९॥
उस ज्ञानी का देहपात भले ही काशी जैसे पवित्र क्षेत्र में हो, या मरुभूमि(बागड देश) में हो - इस की चिन्ता ज्ञानी को नहीं होती; क्योंकि वह, ब्रह्मज्ञान के कारण, जीवन्मुक्त हो चुका है । जीवन्मुक्त को ऐसे हीन(निकृष्ट) शङ्का - सन्देह नहीं हुआ करते ॥२९॥ (तु० : कासी तजि मगहर गयौ, कबीर भरोसै रांम - श्रीदा०वा० १९/५३)
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जैसौ कासी क्षेत्र है, तैसौ बागड देस । 
सुन्दर जीवन मुक्त कै, संक नहीं लवलेस ॥३०॥
उस ज्ञानी के लिये काशी जैसा पवित्र देश एवं मरुभूमि जैसा हीनदेश - दोनों समान ही हैं । जीवन्मुक्तावस्था में ज्ञानी को ऐसी शङ्काएँ कभी नहीं उद्भूत होती ॥३०॥
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अज्ञानी कौ जगत सब, दीसै दुख संताप । 
सुन्दर ज्ञानी कै सकल, ब्रह्म बिराजै आप ॥३१॥
अज्ञानी एवं ज्ञानी में भेद - अज्ञानी को समस्त संसार दुःख, शोक एवं सन्ताप से परिपूर्ण एवं भयजनक लगता है, जब कि ज्ञानी के वे तथाकथित सांसारिक दुःख, शोक एवं सन्ताप भय आदि ब्रह्मज्ञान के नीचे दब जाते हैं ॥३१॥
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अज्ञानी कौ जगत यह, दुखदाइक भै त्रास । 
सुन्दर ज्ञानी कै जगत, है सब ब्रह्म बिलास ॥३२॥
यही कारण है कि अज्ञानी को वे सांसारिक शोक सन्ताप एवं भय जहाँ दुःखदायक हो जाते हैं; वहीं ज्ञानी इन शोक, सन्ताप आदि को ब्रह्मलीला मान कर मौन रहता है ॥३२॥
(क्रमशः) 

लालदासजी की शिष्य परंपरा

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*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
*दादू पूरणहारा पूरसी, जो चित रहसी ठाम ।*
*अन्तर तैं हरि उमग सी, सकल निरंतर राम ॥*
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लालदासजी की शिष्य परंपरा ~
१~लालदासजी, २~हेमदासजी, ३~तोलारामजी, ४~स्वरूपदासजी, ५~रामरतनजी, ६~समर्थरामजी ७~रामदयालजी, ८~परशरामजी, ९~रामनारायणजी वर्तमान हैं, यह जोधपुर अस्थल की परंपरा है ।
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२ हेमदासजी = भी अपने गुरु देव लालदासजी के समान भजनानन्दी महात्मा थे । स्थान इनने भी नहीं बनाया था । 
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(१६) ३ तोलारामजी = लालदासजी के पौत्र शिष्य तोलारामजी से उनके भक्तों ने प्रार्थना की कि- स्वामिन् ! सन्तों के भजन करने के लिये स्थान अवश्य ही बनना चाहिये । आप हम लोगों को स्थान बनाने की आज्ञा अवश्य दें । स्थान होने से हम लोग भी स्थान पर आकर संतों के दर्शन, सत्संग भजन, कीर्तन का लाभ लेते रहेंगे । अतः भक्तों के आग्रह से स्थान बनाने की स्वीकृति तोलारामजी ने दे दी और स्थान बन गया ।
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तोलारामजी के एक गुरु भाई ह्रदयरामजी भी अच्छे सन्त थे । हृदयरामजी अत्यन्त दयालु थे । वे पशु पक्षी को भी दुःखी देखते थे तो उसकी सेवा में तन, मन, धन से लग जाते थे और जब तक उसका दुःख न मिटे तब तक सेवा करते रहते थे । तोलारामजी के पास एक छोटी सी तुम्बी थी । वे उसे आवश्यकतानुसार रुपये आदि निकालते रहते थे । लगातार निकालने पर भी वह खाली कभी भी नहीं होती थी । तोलारामजी ने गरीबदासोत महन्तों के १८ चातुर्मास करवाये थे । उस तुम्बी से द्रव्य निकाल २ कर ।
कहा भी है~
"संत सम्पदा अल्प भी, होती परम अपार ।
तूम्बी तोलाराम की, देती थी इकतार ॥३५८॥ दृ. त. ११॥
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तोलारामजी के अस्थल में एक दिन रात्रि को एक चोर घुस गया और अन्न भंडार से अन्न की पोट बांध ली । लोभवश अधिक अनाज बांध लेने से वह पोट उससे उठती नहीं थी । तोलारामजी भजन कर रहे थे । उन्होंने उसे पोट बांधते देख लिया था किन्तु बोले नहीं थे । जब पोट नहीं उठी तब उसे दुःखी देखकर आये और बोले-"लो उठाओ मैं उठवाता हूँ ।"
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संत को पास आया देख कर चोर डरा किन्तु संतजी ने कहा~ डरो मत तुम्हारे यहां इसकी आवश्यकता है, और यहां कोई कमी नहीं है । तुम ले जाओ । अधिक बोलने से दूसरे लोग जग जायेंगे । उसे पोट उंचाकर झट भेज दिया । कहा भी है~
"श्रेष्ठ संत सब से रखें, सहानुभूति दे क्षेम ।
पोट ऊंचाई चोर को, तोलाराम सप्रेम ॥११७॥दृ. त. १३ ।१७
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राजारामजी = तोलारामजी के मुख्य शिष्य राजारामजी जाति से वैश्य थे और नेत्रहीन थे । इससे बचपन में ही इनको तोलारामजी का शिष्य होने का सौभाग्य मिल गया था । इनके माता पिता ने इनको महात्मा तोलारामजी की भेंट कर दिया था । तोलारामजी ने इनको संपूर्ण दादूवाणी कंठस्थ करवादी थी तथा नियम दिला दिया था कि~प्रति दिन संपूर्ण दादूवाणी का पाठ कर के ही भोजन करना । अतः ये गुरुजी की आज्ञानुसार संपूर्ण दादूवाणी का पाठ कर के ही भोजन करते थे ।
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राजारामजी प्रतिदिन रात के दो बजे उठ कर पाठ आरंभ करते थे और आठ बजे वाणी का पाठ पूरा कर देते थे । यह नियम इनका जीवन पर्यन्त सुचारू रूप से चलता रहा था । वाणी पाठ के प्रताप से इनको वचन सिद्धि प्राप्त हो गई थी अर्थात् इनका वचन सत्य ही होता था । कहा भी है~
संत गिरा के पाठ से सिद्धावस्था होय ।
बोले राजारामजी, मिथ्या होत न कोय ॥११६ दृ. त. १३
(क्रमशः)

सोमवार, 20 जुलाई 2026

३०. ज्ञानी कौ अंग २५/२८

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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३०. ज्ञानी कौ अंग २५/२८
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भूत हु भब्य हु बर्त्तते, दूजा नांहीं आंन । 
सुन्दर ज्ञानी कै सदा, कहिये केवल ज्ञांन ॥२५॥
ज्ञान की दिक्कालाद्यनवच्छिन्नता : उस के लिये साधनावस्था के भूतकाल में ब्रह्म के अतिरिक्त अन्य कोई चिन्तनीय विषय था ही नहीं, न भविष्य में होगा; आज(वर्तमान में) भी उसके मन की वही स्थिति है । वह तो सदा(निरन्तर) ब्रह्मचिन्तन में ही सुख मानता है ॥२५॥
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अध ऊरध दश हूं दिशा, पूरन ब्रह्म समांन । 
सुन्दर ज्ञानी कै सदा, कहिये केवल ज्ञांन ॥२६॥
उस के लिये पूर्व पश्चिम, उत्तर, दक्षिण, ऊपर, नीचे आदि दशों दिशाओं में ब्रह्म समान रूप से व्याप्त(पूर्ण) है । अतः वह कहीं भी ब्रह्म के अतिरिक्त अन्य कुछ भी नहीं देख पाता ॥२६॥
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घटाकाश ज्यौं मिलि गयौ, महदाकाश निदांन । 
सुन्दर ज्ञानी कै सदा, कहिये केवल ज्ञांन ॥२७॥
शास्त्र में जैसे घटाकाश को महाकाश का ही अङ्ग माना जाता है; उसी प्रकार वह ज्ञानी संसार के सभी सुखों को ब्रह्मसुख का ही अङ्ग मानता है ॥२७॥
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मुक्ति शिला मूयें कहै, ते तौ अति अज्ञांन । 
सुन्दर ज्ञानी कै सदा, कहिये केवल ज्ञांन ॥२८॥
'मनुष्य का मोक्ष मुक्तिशिला पर ही होता है' - यह भ्रान्त लोगों(जैनों) का कथन है । ज्ञानी तो एकमात्र ब्रह्मज्ञान को ही मोक्ष का श्रेष्ठ उपाय मानता है ॥२८॥
(क्रमशः)  

लालदास जी मलाणा की वाणी

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*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
*दादू राम रसायन भर धर्‍या, साधुन शब्द मंझार ।*
*कोई पारखि पीवै प्रीति सौं, समझै शब्द विचार ॥*
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लालदासजी वि.सं. १८३० के लगभग जोधपुर में ही ब्रह्मलीन हुये थे । उनकी समाधि गवा की डूंगरी पर तेजानन्दजी की समाधि के पास ही है ।
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लालदास जी मलाणा की वाणी~
वि.सं. १६३९ की लिखी हुई लालदासजी के अस्थल जोधपुर नागौरी गेट के वर्तमान महन्त रामनारायणजी के पास बड़ी पुस्तक में निम्न वाणी देखने में आई, साखी ७६ । अरिल ३ । पद ७ देखने में आये ।
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इनके लघु ग्रंथ~
१~ ब्रह्म स्त्रोत युग्म, इसमें १८ पद्य हैं आदि में एक दोहा और अंत में एक छप्पय है । शेष सब मोतिदाम छंद है । उदाहरण~ मोतीराम-
पुरातन आदि अनंत अपार ।
अखंड अडंड अतीत अधार ॥
अछेद अभेद अलेख अन्नवे ।
नमो परब्रह्म निरंजन देव ॥१॥
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२~ "नाम माला" इनका यह प्रसिद्ध है । इसमें दादूजी के १५२ शिष्यों के नाम तथा मुख्य २ चरित्र दोहों में हैं । चरित्र किसी का एक किसी का दो और किसी का तीन दोहों में दिया है ।
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३~ एक "भयानक चितावनी" ग्रंथ भी लालदासजी का मिलता है और भी कोई रचना इनकी होनी चाहिये । कारण, इनकी रचना से ये अच्छे कवि ज्ञात होते हैं । अतः अन्य रचना भी होनी चाहिये । इनकी वाणी के उदाहरण भी देखिये~
साखी~
'तन त्यागी तरकां करे, मन माया के मांहिं ।
यह लोग दिखावा लालदास, सो साहिब माने नांहिं ॥१॥
अरिल~
"सूता सारी रात लगा नहिं पीव से,
संकट पड़सी सोच बनेगी जीव से ।
स्वाद बाद से श्वास गमाया बादरे,
परिहां लाल कहै समझाय सु अब तो जागरे ।
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पद~ 
राम भक्ति नहिं जानी प्राणी, सोवत रैनि विहाणी ॥टेक॥
जब लग सूता तब लग देखे, जागत किनहुन मानी ।
यह संसार इसो रे प्राणी, ज्यूं अंजली का पानी ॥१॥
यह संसार इसा रे प्राणी, ज्यूं तरवर की छाया ।
धन जीवन है धूम गृह ज्यों, ज्यों सपने की माया ॥२॥
हस्ती घोड़ा देश परगना, आणि मिले रजधानी ।
मेरी मेरी कर नर फूले, हो गई झूठ निधानी ॥३॥
झूठ सांच जिन कीन्ह निबेड़ा गुरु गम ज्ञान विचारी ।
लाल कहै जन कहि कहि हारे, ममता किनहु न मारी ॥४॥
(क्रमशः)