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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२४. सांख्य ज्ञान कौ अंग ४१/४४
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सुन्दर सूरय कै उदै, कृत्य करै संसार ।
ऐसैं चेतनि ब्रह्म सौं, मन इंद्रिय आकार ॥४१॥
लोक में यही देखा जाता है कि समस्त संसार सूर्य के उदित होने पर अपना कार्य अपने मन इन्द्रिय एवं शरीर से आरम्भ करता है । इन कर्मों में आत्मा साक्षीमात्र होता है ॥४१॥
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ब्योम वायु पुनि अग्नि जल, पृथवी कीये मेल ।
सुन्दर इनतें होइ का, चेतनि खेलै खेल ॥४॥
आकाश, वायु, अग्नि, जल एवं पृथ्वी - इन पाँच(महाभूतों) का सङ्घात ही 'शरीर' कहलाता है; परन्तु ये पाँचों ही जड(अचेतन) है, इन से कोई कर्म होना कैसे सम्भव है ! जब चेतन आत्मा का उन पर प्रभाव पड़ता है तब शरीर की चेष्टाएँ(कर्म) आरम्भ होती हैं । (चेतन खेलै खेल) ॥४२॥
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सुन्दर तत्व जुदे जुदे, राख्या नाम शरीर ।
ज्यौं कदली के खंभ मैं, कौंन बस्तु कहि बीर ॥४३॥
श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - इन पृथक् पृथक् तत्त्वों के सङ्घात(समूह) का नाम ही शरीर(देह) रख दिया गया है । इसके लिये कदली(केला) वृक्ष का उदाहरण लीजिये । तुम ही बताओ क्या उसमें कोई सङ्घात(ठोस) पदार्थ है जिसे 'केला' नाम से संकेतित किया जा सके ! ॥४३॥
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देह आप करि मांनिया, महा अज्ञ मतिमंद ।
सुन्दर निकसै छीलकै, जबकि उचेरे कंद ॥४४॥
कुछ महान् मूर्ख जडमतियों ने अपने देह में ही अध्यास कर उसमें ही ममत्व कर लिया है । उनसे पूछना चाहिये कि रे मूर्खों ! कभी किसी ने कन्द(प्याज) में कोई ठोस पदार्थ देखा है क्या ! उस में भी केले की तरह छिलके ही होते हैं । यही स्थिति हमारे इस देह की भी है ॥४४॥
(क्रमशः)






















