सोमवार, 6 जुलाई 2026

२९. अद्वैत ज्ञान कौ अंग २५/२८

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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२९. अद्वैत ज्ञान कौ अंग २५/२८
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चीर मांहिं ज्यौं चूनरी, गिलम मांहि बहु भांति । 
ऐसै सुन्दर देखिये, जगत ब्रह्म नहिं द्वांति ॥२५॥
जैसे किसी नारी द्वारा साड़ी पर ओढी हुई चुनरी के मुलायम(मृदु = गिलम) बेलबूटे या किसी ऊनी गलीचे के मुलायम बेलबूटे परस्पर अभिन्न लगते हैं; उसी प्रकार ब्रह्म एवं जगत् की अभिन्नता(अद्वैतता) भी समझनी चाहिये ॥ (द्र०-सवैया : ३२/१८ छ०)
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राजा प्रजा तुरंग गज, पशु पंखी बहु जन्त । 
सुन्दर पट ज्यौं आतमा, जग चित्राम अनंत ॥२६॥
जैसे किसी विस्तृत पट(वस्त्र) पर राजा, प्रजा(जनता), पशु पक्षी एवं विविध प्राणियों का चित्र खींच दिया जाय तो इस उदाहरण में पट को आत्मा तथा उस पर खिंचे हुए राजा आदि के चित्रों को जगत् के सदृश समझना चाहिये ॥२६॥
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इक क्रीडहिं इक मारियंहिं, बस्तर कौं कछु नांहिं । 
सुन्दर जग चित्राम ज्यौं, पट आतम के मांहिं ॥२७॥
जैसे किसी वस्त्र पर कुछ खिलाडियों का, कुछ योद्धाओं का चित्र बना दिया जाय तो उस क्रीडा एवं युद्ध का वस्त्र से इतना ही सम्बन्ध है कि वे चित्र पट पर बने हैं इसी प्रकार आत्मा में इस जगत् का सामञ्जस्य समझें ॥२७॥
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कोट कांगुरे एक हैं, देखत दीसहिं दोइ । 
ऐसैं सुन्दर ब्रह्म तें, जगत भिन्न नहिं होइ ॥२८॥
जैसे किसी नगर के किले पर ऊँचे ऊँचे कंगूरे(गुम्बद, बुर्ज) बना दिये जायँ जो दीखने में भले ही ये कंगूरे एवं किला दो(द्वैत) दिखायी दें; परन्तु यथार्थतः उन दोनों में कोई भेद नहीं है । इसी प्रकार ब्रह्म एवं जगत् की स्थिति समझनी चाहिये ॥२८॥ (द्र० - सवैया : ३२/१८ छ०)
(क्रमशः)

अप्रतिम प्रवक्ता

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*॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥*
*॥ दादूराम~सत्यराम ॥*
*साभार सौजन्य ~ “श्रीमद्‌ दादू पंथ प्रकाश”
*श्रीमद्दादूपीठाधीश्वर(१९)श्री हरिरामजी महाराज का संक्षिप्त जीवन दर्शन~*
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षट्दर्शनी सन्त वाङ्मय के अध्येता व अधिकारी ~
शनैः शनैः संत वाणी के साधिकार कथा-वाचस्पति एवं विविध सात्संगिक विषयों के उद्बोधक तथा समस्त षट्दर्शनी-संत सरणि के वाङ्मय के कुशल अध्येता व प्रवक्ता हो गये ।
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अप्रतिम प्रवक्ता ~
आपको देश के महान् विद्वान् प्रखर प्रवक्ताओं को सुनने का बड़ा चाव था एतदर्थ जहाँ भी उनका उद्बोधन होता आप पहुँच जाते और वापस आकर अपने विद्वान् साथियों संतो व जानकारों को वहाँ सुने उद्बोधन को यथावत सुनाकर उनके भाषण या प्रवचन की व्याख्या कर हृदयंगम करते थे - यह आपके सद्‌गुणों में सर्वश्रेष्ठ नैपुण्य लिए वैशिष्ट्य था ।
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वे देश के मूर्धन्य प्रमुखतम वक्ताओं का क्रम इस प्रकार निर्धारण कर उन्हें सुनते ~
1. प.पूज्य माधवराव-सदाशिवराव-गोल्वल्कर महोदय ‘गुरूजी’
2. माननीय श्री अटलबिहारी जी वाजपेयी(प्रखर वक्ता)
३, महामण्डलेश्वर पूज्य श्री गंगेश्वरानन्द जी महाराज(प्रज्ञाचक्षु)
4. परम साध्वी सुश्री ऋतंभरा जी
“उच्च विश्लेषणात्मक निर्णय व धारणा उनके जीवन को महान् व उन्नत करने वाली सिद्ध हई, और वे संतसमाज में एक सच्चे अप्रतिम प्रतिभावान् प्रवक्ता बने ।”
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पीठारोहण~
परमपूज्य श्रीमद्दाददू पीठाधीश्वर(18) श्री प्रकाशदेव जी महाराज ने 20 वर्ष पर्यन्त मनसा वाचा-कर्मणा श्रीमद्दादूपीठ पर अधिष्ठित रहकर समाज का सुचारु संचालन और निष्ठा व नियम से अपने दायित्व का निर्वहन किया ।
चरित्र नायक युवा संत श्री हरिरामजी को श्री दादूमन्दिर की व्यवस्था सेवा व अध्ययन में तल्लीनता के लिए विविध ग्रन्थों के अध्ययन व मंथन का सुयोग मिलता रहा, और प्रत्येक संत-विधा व ज्ञानालोक का प्रकाश विस्तीर्ण होता गया, उस प्रगाढ़-पात्रता व विद्या योग्यता की ही समाज भगवान को अपेक्षा थी - “वे प्रखर व्यक्तित्व लिये सर्वथा गुण सम्पन्न संत” प.पू. स्व. पीठाचार्य(18) श्री प्रकाशदेव जी महाराज के ब्रह्मलीन होने पर श्रावण शुक्ला 5 शनिवार में 2023 वि. को पंथ की गरिमामय गुरुगद्दी पर अधिष्ठित हुये ।
(क्रमशः)

*२०. सुमिरण का अंग ~८१/८४*

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*🌷卐 सत्यराम सा 卐🌷*
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*२०. सुमिरण का अंग ~८१/८४*
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*सब सुकृत हैं, शुन्य सम, एका एक सु नाम ।*
*पृष्ट लाग दश गुण सबै, नहीं तो नाँहिं ठाँम ॥८१॥*
संपूर्ण शुभ कर्म शून्य(०) के समान हैं और अकेला हरि नाम एका(१) के समान है, जैसे एका पर अनुस्वार लगते ही १० हो जाते हैं और नहीं लगे तो कुछ नहीं, वैसे ही शुभ कर्म रूप शून्य एका की पीठ पर लग जायें अर्थात नाम स्मरण के साथ शुभ कर्म किये जायँ तो उसका दस गुण फल हो जाता है और नाम-स्मरण न करके शुभ कर्म करने से कर्त्ता को भगवद् धाम में स्थान नहीं मिलता ।
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*रज्जब भव समुद्र शिर धरी, नाम निरंजन नाव ।*
*जाया चाहे पार को, सो प्राणी चढ़ जाव ॥८२॥*
संसार -समुद्र के शिर पर राम नाम रूप नौका रक्खी है, जो प्राणी इसके पार जाना चाहे, वह इस पर चढ़ कर जा सकता है ।
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*जप जहाज जलनिधि जगत, जीव चढो कोई आय ।*
*रज्जब पारस परम गुरु, सो पद परसे जाय ॥८३॥*
राम नाम का जप ही जहाज है, उस पर चाहे कोई भी जीव चढे अर्थात जप करे, वही संसार- समुद्र से पार होकर जीव-लोह को ब्रह्मरूप सुवर्णता की प्राप्ति कराने वाले परमगुरु-पारस से मिलकर ब्रह्मरूप परमपद को प्राप्त करता है ।
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*रज्जब अज्जब देखिये, जप जगदीश जहाज ।*
*प्राणी पहुँचे पार चढ़, सरे१ सु आतम काज ॥८४॥*
जगदीश्वर के नाम का जप अद्भुत जहाज रूप देखा जाता है, प्राणी उस पर चढ़ कर अर्थात जप करके संसार-समुद्र से पार पहुँच जाता है और जीवात्मा का परब्रह्म प्राप्ति रूप कार्य सिद्ध१ हो जाता है ।
(क्रमशः)  

२९. अद्वैत ज्ञान कौ अंग २१/२४

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२९. अद्वैत ज्ञान कौ अंग २१/२४
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सुन्दर मैं सुन्दर जगत, सुन्दर है जग मांहिं । 
जल सु तरंग तरंग जल, जल तरंग द्वै नांहिं ॥२१॥
ब्रह्म एवं जगत् की अभिन्नता : जैसे लोक में हम देखते हैं कि जल में तरंग और तरंगविकार(बुलबुला) में जल - दोनों में अभिन्नता है; वैसे ही जगत् एवं ब्रह्म की अभिन्नता समझनी चाहिये ॥२१॥ (द्र० सवैया : ३२/१४ छ०)
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सुन्दर ब्रह्म अखंड पद, सुन्दर यह बिस्तार । 
ज्यौं सागर मैं बुद्बुदा, फेन तरंग अपार ॥२२॥
महात्मा सुन्दरदासजी इसी बात को अन्य विधि से विस्तार से कह रहे हैं - यह जगत् उस अखण्ड ब्रह्म का ही विस्तार है । जैसे कि सागर के जल में बुलबुले, फेन(झाग) तथा अपार(असीम) तरङ्गे होती हैं ॥२२॥
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सुन्दर मैं जग देखिये, जग मैं सुन्दर सोइ । 
कुंजर मैं नारी प्रगट, नारी कुञ्जर होइ ॥२३॥
श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - जिज्ञासु को इस जगत् की सुन्दरता ब्रह्म में ही देखनी चाहिये तथा ब्रह्म की सुन्दरता को ब्रह्म में देखने का प्रयास करना चाहिये । जैसे कि मथुरा में होने वाली गोपीकुञ्जर नामक रासलीला में गोपियों में कृष्ण एवं कृष्ण में गोपियाँ दिखायी देती थी । [कहते हैं - अतिशय प्रेमवश अनेक गोपियों ने मिलकर अपने शरीरों से हाथी का आकार बना कर उस पर श्रीकृष्ण को आरूढ कराया था । इस दशा में गोपी एवं कृष्ण - दोनों ही सुन्दर(दर्शनीय) लग रहे थे । साथ ही वह गोपियों के शरीर का हस्तिमय आकार भी गोपियों से अभिन्न तथा गोपियाँ उस हाथी के आकार से अभिन्न लग रही थीं] ॥२३॥
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जैसै बुनत महीर मैं, फुलरी परती जांहिं । 
ऐसैं सुन्दर ब्रह्म तें, जगत भिन्न कछु नांहिं ॥२४॥ 
जैसे किसी सूक्ष्म वस्त्र को बुनते समय उसमें डाले गये फूल(बेलबूटे - फुलरी) उस वस्त्र से अभिन्न लगते हैं; उसी प्रकार ब्रह्म एवं जगत् भी अभिन्न हैं ॥२४॥ (द्र० - सवैया : ३२/१८ छ०)
(क्रमशः)

पंथ में दीक्षा

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*॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥*
*॥ दादूराम~सत्यराम ॥*
*साभार सौजन्य ~ “श्रीमद्‌ दादू पंथ प्रकाश”
*श्रीमद्दादूपीठाधीश्वर (१९)श्री हरिरामजी महाराज का संक्षिप्त जीवन दर्शन~*
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पंथ में दीक्षा ~
आपका जन्म भोजपुरा(जोबनेर, जयपुर) ग्राम में ब्राह्मण कुल में हुआ ।  बाल्यकाल से ही “श्रीदादूद्वारा नारायना” के महान् संत श्री भूरादास जी स्वामी(खालसा) से आपने दीक्षा ली और अक्षराभ्यास के साथ प्राथमिक शिक्षा व संताश्रम के नियमानुसार सदाचरण तथा श्री दादूवाणी व अन्यान्य सन्त कृत्तियों से अपने अध्ययन को प्रारंभ किया । 

विद्याध्ययन ~
किशोरवस्था में आपको दादू समाज के सर्वोच्च गुरुकुल श्रीदादूमहाविद्यालय, जयपुर में शिक्षार्थ प्रवेश दिया और कुछ समय महाविद्यालय छात्रावास में रहते हए वहीं पूज्य त्यागमूर्ति स्वामी मंगलदास जी महाराज के सान्निध्य में रहकर गुरुवर्य सम्माननीय पं. श्री दयाराम जी महाराज से संस्कृत शिक्षा प्राप्त करना प्रारंभ किया ।  तत्कालीन श्री दादपीठाधीश्वर(17) श्री रामलाल जी महाराज की विशेषकृपा व स्वयं की कहीं अन्यत्र विशिष्ट-विद्वान व मनीषी के पास विद्याध्ययन को इच्छा से इन्हें शेखावाटी-अंचल के इंडलोद नगर के संस्कृत विद्यालय में अध्ययनार्थ भेजा गया, वहां के ख्यातनाम निदान व प्रकाण्ड पण्डितवर्य पूज्य श्री रामधारी जी महाराज के द्वारा आपने संस्कृत वाङ्मय की समुचित शिक्षा ग्रहण की । 
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पुनः गुरुधाम में सेवा पूजा व अध्ययन ~
पीछे गुरुधाम श्रीदादूद्वारा नरायणा से सहसा “अतिशीघ्र लौट आने के सन्देश” से आप हत-प्रभ हुए और शीघ्र तो लौटने पर ज्ञात हुआ कि प.पू. परमकृपालु श्रीदादूपीठाधीश्वर श्री रामलालजी महाराज ब्रह्मलीन हो गये हैं ।  यह व्यथा-कथा उन्हें विशेष विषादकारी लगी, किंतु विधि के विधान को स्वीकार करना ही होता है ।  
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यह जानकर आपने स्थान से दूर अध्ययन करने का संकल्प त्याग दिया, और गुरुधाम श्री दादूद्वारा में ही रहकर मुख्यपीठस्थ श्रीदादू मन्दिर(नारायना) हो व्यवस्था सेवापूजा तथा साथ ही स्वकीय अध्ययन-मनन का क्रम प्रारंभ किया ।  क्योंकि दीक्षा-गुरु प.पू. श्री भूरादास ही महाराज तो स्व. आचार्यश्री से कई वर्ष पूर्व ब्रह्मलीन हो चुके थे ।  अतः इनका सब प्रकार का योग-क्षेम पूर्ण आत्मीयता से.पू. आचार्य प्रवर ही करते और वे इन्हें सुयोग्य विद्वान व नैष्ठिक साधु-पुरुष बनाना चाहते थे ।
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स्वर्गीय आचार्यश्री का सारा दायित्व नव प्रतिष्ठित पू. पीठाधीश्वर(18) अनंतश्री प्रकाशदेव जी महाराज पर आ गया तो उन्होंने इन्हें पूर्ण आत्मीयता व गुरुभाई के नाते स्नेह से सेवा के साथ विद्याध्ययन के लिए प्रश्रय दिया ।  अतः आपने गुरुधाम में रहते हुए सत्‌पुरुषों की संगति से भेषभगवान् की समस्त पारंपरिक सेवाविधियों को जानकर स्वकीय अध्ययन के साथ परमगुरु श्री व‌जी महाराज की वाणी का दैनन्दिन पठन, विशेष अध्ययन व अनुशीलन किया और श्री दादूमन्दिर की सेवा व व्यवस्था करते हुए सच्चे ईष्ट-निष्ठ व अन्यान्य संतवाणियों तथा आध्यात्म ग्रन्थों के कुशलअध्येता व अनुभवशील संत बन गये । 
(क्रमशः)

रविवार, 5 जुलाई 2026

*२०. सुमिरण का अंग ~७७/८०*

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*🌷卐 सत्यराम सा 卐🌷*
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*२०. सुमिरण का अंग ~७७/८०*
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*घट दीपक बाती पवन, ज्ञान ज्योति सु उजास ।*
*रज्जब सीचे तेल ले, प्रभुता पुष्टि प्रकाश ॥७७॥*
शरीर दीपक है, प्राण वायु बत्ती है, ज्ञान ज्योती है, उसका सत्ता प्रकाश सुन्दर है, जैसे तेल सींचने से प्रकाश की वृद्धि होती है, वैसे ही हरि-स्मरण करने से प्रभुता की और ज्ञान ज्योति के सत्ता प्रकाश की भी वृद्धि होती है, अर्थात ब्रह्म को सर्वत्र व्यापक देखने लगता है ।
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*नाम निरंजन नीर है, सब सुकृत वनराय१ ।*
*जन रज्जब फूले फले, सुमिरन सलिल सहाय ॥७८॥*
निरंजन ब्रह्म का नाम जल है, और संपूर्ण शुभ कर्म वन पंक्तियाँ१ है, जैसे जल वर्षने से सब वन फूलते फलते हैं, वैसे ही नाम-स्मरण की सहायता से संपूर्ण सुकृतों की वृद्धि होती है ।
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*सुमिरन सेवा मूल है, सब सुकृत श्रृंगार ।*
*रज्जब शोभा सकल की, देखो सुमिरन हार ॥७९॥*
हरि-नाम-स्मरण ही भक्ति का मूल है, अर्थात नाम-स्मरण से ही भक्ति होती है और संपूर्ण शुभ कर्मों का श्रृंगार है । लोक में भी प्रसिद्ध है, नाम-स्मरण करने वाले संत सभी की शोभा बढ़ाता है ।
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*नाम नाक बिन कुछ नहीं, सुकृत सबै श्रृंगार ।*
*रज्जब रुचे न राम वर, तामें फेर न सार ॥८०॥*
जिस नारी के नाक नहीं उसके सभी श्रृंगार - बेकार है, वह अपने स्वामी को प्रिय नहीं लगती, वैसे ही नाम-स्मरण के बिना संपूर्ण सुकृत भी कुछ नहीं, नाम सुमिरण बिना साधक राम को प्यारा नहीं लगता, यह बात यर्थात है ।
(क्रमशः)

२९. अद्वैत ज्ञान कौ अंग १७/२०

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२९. अद्वैत ज्ञान कौ अंग १७/२०
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कारन तैं कारज भयौ, कारन कारज एक । 
जैसैं कंचन तैं कियौ, सुन्दर घाट अनेक ॥१७॥
यद्यपि कारण से कार्य होता है तो भी यथार्थतः कारण एवं कार्य हैं तो एक ही । जैसे एक सुवर्ण रूप कारण से आभूषणादि अनेक कार्य कर लिये जाते हैं ॥१७॥ (द्र० - सवैया : ३२/१४ छ०)
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जैसे कीये मैंन के, हय हाथी बहु जन्त । 
सुन्दर ऐसैं ब्रह्म है, आदि मध्य अरु अन्त ॥१८॥
जैसे एक ही मोम से हाथी आदि घोड़ा की अनेक आकृतियाँ बना ली जाती हैं; उसी प्रकार इस समस्त जगत् के आदि, मध्य एवं अन्त में एकमात्र ब्रह्म ही दिखायी देता है ॥१८॥ (द्र०- सवैया : ३२/१६ छ० )
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जैसैं मनिका सूत के, बीचि सूत कौ तार । 
ऐसै सुन्दर ब्रह्म सब, या ही है निरधार ॥१९॥
जैसे माला की सभी मणियाँ बीज में पड़े हुए सूत पर आधृत होती है; उसी प्रकार इस समस्त जगत् के आदि, मध्य एवं अन्त में एकमात्र ब्रह्म ही दिखायी देता है - ऐसा समझें ॥१८॥ (द्र०- सवैया : ३२/१६ छ०)
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सुन्दर तानां सूत का, बानै बुनियां सूत । 
नाव धर्यौ फिरि और ही, यथा बाप तैं पूत ॥२०॥
किसी वस्त्र के निर्माण के लिये ताना एवं वाना का सूत एक ही होता है; परन्तु व्यवहार में उसे 'ताना' एवं 'वाना' कह देते हैं । या पिता से ही पुत्र होता है; परन्तु व्यवहार में उन को 'पिता' एवं 'पुत्र' कह देते हैं । यही स्थिति जगत् के विषय में ब्रह्म की भी समझनी चाहिये ॥२०॥ (द्र०- सवैया ३२/६ छ०)
(क्रमशः) 

श्रीमद्‌ दादू पंथ प्रकाश(१)

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*॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥*
*॥ दादूराम~सत्यराम ॥*
*साभार सौजन्य ~ “श्रीमद्‌ दादू पंथ प्रकाश”
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आज यहाँ हम कुछ प्रसंग वर्तमान में प्रकाशित ग्रंथ “श्रीमद्‌ दादू पंथ प्रकाश” से ले रहे हैं ~
*श्रीमद्‌ दादू पंथ प्रकाश(१)*
*श्रीमद्दादूपीठाधीश्वर (१९)श्री हरिरामजी महाराज का संक्षिप्त जीवन दर्शन~*
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ध्येय मंत्र-
दादू सुकृत मारग चालतां, बुरा न कबहुँ होय ।
अमृत खाता प्राणियाँ, मुवा न सुणियाँ कोय ॥
श्रीदादूवाणी ॥13/127 ॥
“सुकृत मार्ग पर चलते हुए कभी बुरा अर्थात् अनिष्ट नहीं होता । जैसे अमृत खाने से कभी कोई मरा हुआ नहीं सुना गया ।”
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“इस स्वीकृत ‘ध्येय मंत्र’(सद्‌गुरु श्री दादूजी के उपदेश) पर अत्यन्त दृढ़ता से चलने वाले प.पू. पीठाधीश्वर (19) अनंत श्री हरिरामाचार्य जी महाराज ने अपने जीवन का लक्ष्य संधारित किया और गुरु गद्दी पर बैठने से अवसान पर्यन्त इस ‘ध्येय मंत्र’ का मनसा वाचा-कर्मणा पालन किया ।”
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इस ध्येय मंत्र को विविध प्रमाणों से सुनिश्चित एवं हृदयंगमकर जैसा कि श्रीमद्भगवद् गीता में अध्याय 6 में भगवान् श्रीकृष्ण ने कहा है~
‘पार्थ ! नैवेह नामुत्र, विनाशस्तस्य विद्यत ॥
न हि कल्याण कृत कश्चित्, दुर्गतिं तात ! गच्छति ॥’गीता 6/40
हे पुत्र ! कल्याण कार्यों में निरत योगी का न तो इस लोक में और न परलोक में ही नाश होता है । हे प्रिय ! भलाई करने वाला कभी बुराई से पराजित नहीं होता ।
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अन्यच्च~ श्रीमद्भागवत (1.5.97) में श्री नारदमुनि व्यासदेव को इस प्रकार उपदेश देते हैं~ “त्यक्त्वा स्वधर्मं चरणाम्बुजन्नपक्वोऽथ पतत्ततो यदि ।”
“यदि कोई समस्त भौतिक आशाओं को त्यागकर भगवान् की शरण में जाता है तो इसमें न तो कोई क्षति होती है और न पतन ।”
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“इस ‘ध्येय मंत्र’ का यावज्जीवन पालन करने वाले परम आचार्य श्री हरिरामजी महाराज(चरित्र नायक) दादूपंध के 19 वें पीठाधीश्वर का संक्षिप्त जीवन-दर्शन प्रस्तुत करते हुये संतोषानुभूति होती है ।”

शनिवार, 4 जुलाई 2026

भगवत्प्रदत्त विवेकका आदर

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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
* दादू सांई को संभालतां, कोटि विघ्न टल जांहि ।*
* राई मन बैसंदरा, केते काठ जलांहि ॥*
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*॥ श्रीहरि: ॥*
दिनांक 4.7.26.
वि. सं. 2083, 'रौद्र' नाम संवत्सर, आषाढ़ मास, कृष्ण पक्ष, चतुर्थी, शनिवार। (गीता दैनन्दिनी अनुसार)।
1- परम श्रद्धेय स्वामीजी श्री रामसुखदासजी महाराजका प्रवचन—
दिनांक— 10.8.95, प्रातः 5.18 बजे।
स्थान— जयपुर।
*विषय— भगवत्प्रदत्त विवेकका आदर करनेसे भगवत्प्राप्ति।*
2- गीता पाठ— गीता पाठ अध्याय 12 श्लोक संख्या 11 से 20 तक।
* जो मनुष्य अपने ज्ञानका, अपनी समझका, अपने अनुभवका आदर नहीं करता है, वह न शास्त्रोंका, न ईश्वरका, न गुरुजनोंका— किसीका भी आदर नहीं कर सकेगा। मनुष्योंको कम-से-कम अपनी समझ, अपनी जानकारीका आदर तो करना ही चाहिए। यह बात सब जानते हैं कि शरीर पैदा हुआ है और समय होने पर निश्चित ही मरेगा, फिर भी इस ज्ञानका आदर नहीं करते हैं। इस बातका अर्थ है कि यह मनुष्य शरीर भगवान् ने जिस विशेष उद्देश्यके लिए दिया है, मनुष्य शरीरमें भगवत्प्राप्तिका मौका दिया है, उसे शरीरके रहते प्राप्त कर लेना चाहिए। ऐसा नहीं करके मनुष्य शरीरमें नहीं करने योग्य कार्य करते हैं, यह अपने विवेककी हत्या है।*
* गांधीजीका एक पत्र अखबारमें छपा, जिसमें लिखा था— 'मैं एक सौ आठ वर्ष तक जीवित रहूँगा।' सेठजी श्री जयदयाल जी, जो गीता प्रेसके उत्पादक, संस्थापक, संरक्षक, संचालक— सब कुछ थे, इस बात पर बोले कि एक सौ आठ वर्ष तक न गांधीजी जीयेंगे, न इतने वर्षों तक मैं जीऊंगा, लिख लो। ऐसे अपने जीवित रहनेका भरोसा किसीको है? यदि नहीं, तो फिर मनुष्य शरीरमें करने लायक असली कामसे क्यों वंचित हो रहे हैं। 'मानहिं मातु पिता नहिं देवा। साधुन्ह सन करवावहिं सेवा॥ जिन्ह के यह आचरन भवानी। ते जानेहु निसिचर सब प्रानी॥'*
* जीनेका तो भरोसा नहीं है और मरनेकी तैयारी नहीं है, और तीसरा कोई मार्ग है नहीं। मनुष्य शरीरमें आकर जो काम करने लायक था, वह कर लिया, अब शरीर रहे या जावे, अपने इसकी गर्ज नहीं रही। 'रज्जब धोखा को नहीं फल दे सूखा खेत।' मनुष्य शरीरमें आकर जो काम करना चाहिए, वह कर लिया, अब मृत्युका भय नहीं है। मृत्युका भय तभी तक रहता है, जब तक मनुष्य शरीरमें जो काम करने आये हैं, वह नहीं किया हो। ऐसी निश्चिन्तता जिसके आ गई है, तो बढ़िया है और जिसके ऐसी निश्चिन्तता नहीं है, उसे तत्परता पूर्वक भगवान् में लग जाना चाहिए। 'नवग्रह चौंसठ जोगनी बावन वीर पर्जंत। काल भक्ष सबको करै, हरि शरणै डरपंत॥'*
* जड़ चीजोंकी जो चाहना है, वह कामना है और चिन्मय तत्त्वकी इच्छा आवश्यकता है। स्वयंकी जो मांग है, वह आवश्यकता है और शरीर, इन्द्रियाँ, मन-बुद्धिको लेकर जो मांग है, वह कामना है। कामनाकी तो निवृत्ति ही होती है और आवश्यकताकी पूर्ति ही होती है, आवश्यकता अधूरी रहती ही नहीं। मनुष्य मात्रको परमात्मप्राप्ति हो सकती है, यह बात मुझे सन्तोंसे मिली है, शास्त्रोंमें नहीं मिली है। 'जो जिव चाहे मुक्ति को तो सुमरीजे राम। हरिया गैले चालतां जैसे आवे गांव॥' सन्तोंने वाणीमें अपना अनुभव लिख दिया है, ऐसे मनुष्य शरीरको प्राप्त कर अपना उद्धार कर ही लेना चाहिए।*

२९. अद्वैत ज्ञान कौ अंग १३/१६

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२९. अद्वैत ज्ञान कौ अंग १३/१६
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सुन्दर घृतई बंधि गयौ, धर्यौ डरी सौ नाम । 
ऐसैं रामहि जगत है, जगत देखिये राम ॥१३॥
ब्रह्म एवं जगत् की एकता के प्रतिपादक कुछ दृष्टान्त : जैसे लोक में दही के बिलोने पर डली(ग्रन्थि) रूप में निकले घी को 'मक्खन' कहते हैं, उसी को तप्त होने पर पिघल जाने पर 'घृत' कहने लगते हैं; उसी प्रकार यह राम(ब्रह्म) ही जगत् है तथा जगत् ही राम है ॥१३॥ (प्र०- सवैया : ३२/१५ छ०)
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सुन्दर पांनी तैं कछू, पाला भिन्न न होइ । 
ऐसैं जगत सु ब्रह्म है, जगत ब्रह्म नहिं दोइ ॥१४॥
जैसे शीत के कारण जमा हुआ जल ही 'वर्फ'(हिम) कहलाता है; उसी प्रकार इस जगत् एवं ब्रह्म में कोई द्वैत नहीं है ॥१४॥ (द्र० - सवैया : ३२/१५ छ०)
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सुन्दर नीर समुद्र कौ, जमि करि हूवौ लौंन । 
तैसैं यह सब ब्रह्म है, दूजा कहिये कौंन ॥१५॥
जैसे समुद्र का जल वायु के कारण जमकर 'सैन्धव लवण'(सैन्धा नमक) बन जाता है; वैसे यह ब्रह्म ही जगत् के रूप में परिवर्तित हो जाता है ॥१५॥ (द्र० - सवैया : ३२/१६ छ०)
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सुन्दर जैसैं लोह के, किये बहुत हथियार । 
ऐसैं यहु सब ब्रह्म है, जौ दीसै बिस्तार ॥१६॥
जैसे एक लोह धातु के अनेक शस्त्र अस्त्र बना लिये जाते हैं, वैसे ही यह समस्त जगद्विस्तार भी एक ब्रह्म से ही हुआ है ॥१६॥
(क्रमशः) 

*करि आरती आतमा ऊजली ।*

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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*तन मन चन्दन प्रेम की माला,*
*अनहद घंटा दीन दयाला ।*
*ज्ञान का दीपक पवन की बाती,*
*देव निरंजन पाँचों पाती ।*
*आनन्द मंगल भाव की सेवा,*
*मनसा मन्दिर आतम देवा ।*
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आरती ॥
*करि आरती आतमा ऊजली ।*
रामजी पधार्यौ म्हारै पुरवन रली ॥टेक॥
तीस समाणा ऊपरि चाढ़ी । चवर ढुलावै इक पग ठाढी ॥
पंच सबद घंटा निरबाणी । झालरि बाजै राम नाम बाणी ।
पाँच तत्व कौ दीपक धार्यौ । जोति सरूपी ऊपर बार्यौ ॥
दसवें द्वारै देव मुरारी । सन्मुख सुंदरि पूजणहारी ॥
मन पंडौ तिहि सेवा मांहीं । बषनां बारै आवै नांहीं ॥
इति श्रीबषनांजी की बाणी संपूर्ण भवेत् ॥
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घट-घट में रमने वाला राम मेरी मनोऽभिलाषाओं की पूर्ति करने हेतु मेरे हृदय रूपी घर में आया है । अतः हे निष्कल्मष उज्जवल आत्मा ! उसकी प्रसन्न मन से आरती उतार । उज्जवल आत्मा तेतीस कोटि देवताओं का शमन करके सर्वोच्चसत्ता सच्चिदानंदस्वरूप राम के स्थान में पहुँची है जहाँ वह अकेली अपने एक आश्रय से ही खड़ी-खड़ी चँवर ढोल रही है ।
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पाँच ज्ञानेन्द्रियों का समवेत राम नाम उच्चारण करना ही वहाँ बाण = कल्मष रहित घंटा ध्वनि है और रामनाम की अखंडध्वनि ही झालरों का बजना है । जल-पृथिवी-वायु-अग्नि-आकाशात्मक पंचतत्वों का ही वहाँ दीपक है(शरीर ही दीपक है) जिसको ज्योतिस्वरूप परब्रह्म-परमात्मा पर न्यौछावर किया गया है ।
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दशमद्वार = ब्रह्मरंध्र में मुरारी रूप परात्पर-परब्रह्म-परमात्मा विराजमान है जिसके सन्मुख आत्मा रूपी सुन्दरी पूजा हेतु खड़ी है । निष्पाप मन रूपी पुजारी उसकी सेवा में हाजिर है । बषनां कहता है, मैं सच्चिदानंद हुआ अब उस सच्चिदानंद के यहाँ से वापिस नहीं आ सकता । वह और मैं अब दो नहीं एक हैं ॥१६८॥
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इति श्रीबषनांजी की बाणी जयपुर नगर वास्तव्य प्रकाश-ताराचंद-सुत ब्रजेन्द्रकुमार सिंहल कृत “बखनां-वचनामृत-वर्षणी” टीका सहित सम्पूर्ण ॥ दिनाङ्क १०.०१.२००५ ई. तदनुसार पौष कृष्णा ३०, वि. सं. २०६१ सोमवार, प्रातःकाल ११ बजे ॥
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बषनां बाणी होय सरल टीका कै सारै ।
यौं कर मन संकल्प पाठ सोधन चित धारै ॥
दो पुस्तक मंगवाय पाठ कौ सोधन कीनौं ।
फिर टीका कौ काम कर्यौ सबकौ मन भीनौं ॥
ब्रजेन्द्र सिंहल नाम मम राम नाम बिसवास ।
प्रकास ताराचंद सुत मानसरोवर बास ॥१॥
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टीका के सहारे बषनांजी की वाणी को समझना सरल हो जायेगा, ऐसा मन में संकल्प उठा । एतदर्थ सर्वप्रथम पाठ शोधन करने का विचार मन में आया । तदर्थ दादूराम नरायना से वि. सं. १७८० व १७८५ में लिखी दो पुस्तकें मंगवाकर पाठ का शोधन किया । ततपश्चात् सभी के मन को भाने वाली टीका लिखी । रामनाम-विश्वासी मुझ टीकाकार का नाम ब्रजेन्द्रकुमार सिंहल है । मेरी माता प्रकाशदेवी तथा पिता ताराचंद सिंहल है । मेरा निवास मानसरोवर, जयपुर में है ॥१॥

शुक्रवार, 3 जुलाई 2026

*२०. सुमिरण का अंग ~७३/७६*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*२०. सुमिरण का अंग ~७३/७६*
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सप्त धातु पलटे सुतन, परसे पारस नाँउ ।
रज्जब कटे कलंक कुल, प्रभु प्रभुता बलि जाँउ ॥७३॥
जाति पारस के स्पर्श से सातों ही धातु सब दोषों से रहित होकर बदल जाती है, वैसे ही परमात्मा के नाम-स्मरण से संपूर्ण दोष नष्ट होकर उभय शरीर में शुद्धता रूप परिवर्तन हो जाता है, अत: उस प्रभु की प्रभुता की बलिहारी जाता हूँ ।
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हरि सुमिरण संशय हरे, पाप जाप सौं जाँहिं ।
जन रज्जब जगदीश भज, नौ निधि है जा माँहिं ॥७४॥
हरि नाम जप से पाप नष्ट हो जाते हैं, हरि-स्मरण ज्ञान द्वारा संशय हर लेता है, जिसके भजन में नौ निधि भी स्थित है, उस जगदीश्वर का ही निरन्तर भजन कर ।
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कर्म हुँ कर्म सु नाम निज, जम का जम हरि जाप ।
रज्जब रटतों ना रहे, प्राणी पिंड के पाप ॥७५॥
राम नाम का स्मरण अपने श्रेष्ठ कर्मों से भी श्रेष्ठ कर्म है, यम का भी यम है, अर्थात यम को भी दंड देने वाला है । राम नाम - स्मरण करने से प्राणी के शरीर के पाप नष्ट हो जाते हैं ।
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रज्जब बीरज नाम निज, रिधि सिधि डाल बतीस ।
पहुप पत्र प्रभुता अनन्त, राम नाम फल शीस ॥७६॥
साधना वृक्ष का निज नाम बीज है, अठारह सिद्धियों और चौदह रत्न रूप ऋद्धि ये ३२ डाल हैं, और भी जो अनन्त प्रकार की प्रभुता हैं, वे ही पत्र पुष्प हैं, इसके शिर पर पुन: राम नाम रूप ही फल आता है, अर्थात साधन के आरम्भ में भी नाम और अंत में भी नाम स्मरण ही रहता है, यह नाम की महान् की विशेषता है ।
(क्रमशः)

२९. अद्वैत ज्ञान कौ अंग ९/१२

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२९. अद्वैत ज्ञान कौ अंग ९/१२
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दीप मसाल चिराक बहु, दौं लागी घर लाइ ।
सुन्दर पावक एक ही, ऐसैं ब्रह्म दिखाइ ॥९॥
जैसे दीपक, मशाल(लाठी पर तेल से भीगा कपड़ा लपेट कर जलाया जाने वाला प्रकाशस्तम्भ) एवं चिराग(लैम्प) की अग्नि तथा घ्घ्र को जलाने वाली सब एक ही हैं तो भी व्यवहार में वे भिन्न भिन्न कहलाती हैं; वैसे ही यह समस्त ब्रह्माण्ड में व्यापक ब्रह्म भी एक ही है ॥९॥ (द्र० - सवैया : ३२/४ छ०)
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सुन्दर यहु सब ब्रह्म है, नाम धर्यौ संसार ।
एक बीज तें पलटि कैं, हूवौ बृक्षाकार ॥१०॥
जैसे लोकव्यवहार में बीज के अंकुरित होते ही उस को वृक्ष कह दिया जाता है उसी प्रकार इस समस्त संसार की भी ब्रह्म से ही उत्पत्ति है । केवल व्यवहार में जनसाधारण इसे 'संसार' कहने लगता है ॥१०॥ (५० सवैया ३२/६ छ०)
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सुन्दर सबकी आदि है, सुन्दर सबका मूल ।
यथा बृक्ष मैं देखिये, डाल पांन फल फूल ॥११॥
महाराज श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - वह ब्रह्म ही इस समस्त संसार का आदि है, तथा इस का मूल(जड) भी यही है । जैसे बीज से ही वृक्ष के शाखा, पत्र, पुष्प एवं फल दिखायी देते हैं; वही स्थिति इस ब्रह्माण्ड के लिये ब्रह्म की भी समझनी चाहिये ॥११॥ (द्र० - सवैया : ३२/६ छ०)
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भयौ सरकरा ईक्षु रस, ब्यापि मिठाई मांहिं ।
सुन्दर ब्रह्म सु जगत है, जगत ब्रह्म द्वै नांहिं ॥१२॥
जैसे सभी मिठाइयों में ईख का मीठा रस(शक्कर) सर्वत्र व्याप्त रहता है, वैसे इस समस्त संसार में ब्रह्म व्याप्त है । अतः इस संसार एवं ब्रह्म में कोई द्वैत नहीं है । दोनों एक ही हैं ॥१२॥ (द्र० - सवैया : ३२/१५ छ०)
(क्रमशः)

परिचय आत्मसाक्षात्कार ॥

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*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*सांई दीया दत घणाँ, तिसका वार न पार ।*
*दादू पाया राम धन, भाव भक्ति दीदार ॥*
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परिचय आत्मसाक्षात्कार ॥
तहाँ मन भयौ रे अड़ोल ।
म्हारै मनि बसियौ रे, गुर म्हारा कौ बोल ॥टेक॥
थित्ति मांहि थित्ति पाई, अगम थी सो गुरि बताई ॥
तहाँ लागौ मंन लाई, तहाँ उपजै नहिं और काई ॥
चंचल था निहचल कीया, जाइ था सो फेरि लीया ।
अैसा गुरि उपदेस दीया, तिहिं आलंबनि लागि जीया ॥
सबद माँहैं संतोष पाया, मंन था सो तहाँ लाया ।
कह्या था सो हाथ आया, राम राम सहजि समाया ॥
जहाँ गुरि थापना थापी, जप करै जहाँ पंच जापी ।
प्रगट्यौ तहाँ आप आपी, निरखि बषनां सकल ब्यापी ॥१६७॥
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मेरे मन में मेरे गुरुमहाराज के उपदेश रूपी बोल बस गये हैं जिनको साधने से उस शब्दस्वरूपी परमात्मा में मेरा मन निश्चल हो गया है । निश्चय मन में थिति = निधिस्वरूप परमात्मा का बोध पाया । बोध पाना सर्वथा अगम्य था किन्तु गुरुमहाराज ने उसको प्राप्त करने की युक्ति बता दी जिससे मुझे बोध हो गया । अब मेरा मन उस अद्वितीय तत्व में लग गया है, जहाँ उसके अतिरिक्त अन्य कुछ सूझता ही नहीं है, उपजता ही नहीं है । 
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मन पहले अतीव चंचल था जिसको निश्चल कर लिया । वह विषयभोगों में दौड़ा करता सो उसे वहाँ से उल्टाकर स्वात्मतत्त्व-चिंतन में लगा लिया । गुरुमहाराज ने “निश्चल मन करके रामजी का स्मरण करना चाहिये” यह उपदेश दिया जिसका आश्रय लेकर ही मैंने स्वात्मतत्त्व का बोध प्राप्त कर जीवन प्राप्त किया है । 
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गुरुमहाराज के उपदेशों को सुनकर ही मैंने संतोषवृत्ति धारण की है और मन को संतोषवृत्ति से जोड़ दिया है । गुरुमहाराज ने जो कुछ कहा था वह मुझे प्राप्त हो गया । राम-नाम में रम कर, रामनाम से एकाकार होकर मैं सहजावस्था में समा गया । गुरुमहाराज ने जिस ब्राह्मीस्थिति की स्थापना की थी अब वहाँ जाप करने वाली पाँचों ज्ञानेन्द्रियाँ जाप करती हैं । उस स्थान में आत्मा ही परमात्मा के रूप में प्रकट हुआ है । बषनां उस सकलब्यापी को देखता है ॥१६७॥

गुरुवार, 2 जुलाई 2026

*२०. सुमिरण का अंग ~६९/७२*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*२०. सुमिरण का अंग ~६९/७२*
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अर्थ किया उस प्राणी ने, तन मन लाया ठौर ।
रज्जब रह गया राम में, भूल न भासे और ॥६९॥
जिस प्राणी ने अपने तन को परब्रह्म रूप संत सेवा और मन को ब्रह्म चिन्तन रूप स्थान में लगाया है, उसी ने वेदादि का यथार्थ अर्थ समझकर धारण किया है, उसका मन राम के वास्तव स्वरूप में ही स्थिर रहता है, उसे भूल से भी मायिक प्रपंच नहीं भासता है ।
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कौड़ी कौटि न चाहिये, कहतों केवल राम ।
रज्जब दम दम सुमरिये, नहिं दामों से काम ॥७०॥
माया रहित राम का स्मरण करने के लिये न कौटि रुपयों की आवश्यकता है, अत: प्रति स्वास स्मरण करना चाहिये । स्मरण करना रूप कार्य धन से सिद्ध नहीं होता ।
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दया रूप नर सु तरु मय, पै गुण स्वाद न जाँहिं ।
ब्रह्म अग्नि निज नाम बिन, रज्जब सुधि१ नहिं माँहिं ॥७१॥
दयालु नर श्रेष्ठ वृक्ष के समान उदार होता है किन्तु जैसे वृक्ष का कटु कषायादि स्वाद नष्ट नहीं होता, वैसे ही दयालु के भी अंत:करण के गुण दूर नहीं होते, वृक्ष-स्वाद अग्नि से जलने पर ही नष्ट होता है । वैसे ही निज नाम स्मरण द्वारा ब्रह्म ज्ञान रूप अग्नि उत्पन्न होता है । तभी दयालु के गुण नष्ट होते हैं, अन्यथा भीतर स्थिर निजात्मा का अनुभव१ नहीं होता ।
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सप्त धातु तन शुद्ध ह्वै, पड़ पावक प्रभु नाँउ१ ।
रज्जब रज मल ऊतरे, बासदेव२ बलि आँउ ॥७२॥
अग्नि में पड़ने से सात धातुओं का भीतरी मैल तथा बाहर की रज नष्ट होकर वे शुद्ध हो जाती हैं, वैसे ही राम नाम१ चिन्तन द्वारा ब्रह्मज्ञानाग्नि उत्पन्न होकर प्राणी के स्थूल शरीर की हिंसादि रूप रज और सूक्ष्म शरीर का कामादि रूप मैल नष्ट हो जाता है, अत: हम ज्ञानाग्नि२ की बलिहारी जाते हैं ।
(क्रमशः) 

२९. अद्वैत ज्ञान कौ अंग ५/८

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२९. अद्वैत ज्ञान कौ अंग ५/८
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घर कहिये सब भूमि पर, भूमि घरनि मैं होइ ।
सुन्दर एकै देखिये, कहन सुनन कौं दोइ ॥५॥
इसी प्रकार, कोई भी घर(भवन) भूमि पर ही स्थित होता है, जब कि सभी घरों में भूमि भी होती ही है; अतः 'भूमि' एवं 'घर' - दोनों एक ही वस्तु हैं, केवल लोकव्यवहार में सुगमता के लिये उन को पृथक् पृथक् कह दिया जाता है ॥५॥
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सुन्दर घर सब गांव मैं, गांव सकल घर मांहिं । 
घर अरु गांव बिचारिये, तौ कछु दूजा नांहिं ॥६॥
इसी प्रकार, सभी घर ग्राम में ही होते हैं, तथा वह ग्राम भी उन घरों से ही कहलाता है । यदि घर एवं ग्राम की यथार्थता पर विचार किया तो उन में कोई भेद(द्वैत) नहीं दिखायी देता ॥६॥ (द्र० - सवैया : ३२/६ छ०)
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वापी कूप तलाव मैं, सुन्दर जल नहिं और ।
एक अखंडित देखिये, व्यापक सबही ठौर ॥७॥
वापी(बाबडी = चौड़ा कूआ), साधारण कूआ, सरोवर(तालाब), इन सब में एक ही जल होता है, तो भी व्यवहारभेद से भिन्न भिन्न नामों से इन को जाना जाता है; इसी प्रकार समस्त ब्रह्माण्ड में एक अखण्ड एवं व्यापक ब्रह्म ही सर्वत्र ओतप्रोत है ॥७॥ (द्र० – सवैया : ३२/४ छ०) ।
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कोरि किये चित्राम बहु, एक शिला कै मांहिं । 
यौं सुन्दर सब ब्रह्ममय, ब्रह्म बिना कछु नांहिं ॥८॥
जैसे एक ही शिला पर विविध चित्र उकेर दिये जाते हैं; इसी प्रकार यह समस्त ब्रह्माण्ड एक ब्रह्म से ही ओतप्रोत है । यहाँ ब्रह्म के अतिरिक्त अन्य कुछ नहीं है ॥८॥ (द्र० - सवैया : ३२/५ छ०) 
(क्रमशः) 

हरि भजि लाहौ लीज्यौ रे

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*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*आपा पर सब दूर कर, राम नाम रस लाग ।*
*दादू अवसर जात है, जाग सकै तो जाग ॥*
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सुमिरण ॥
हरि भजि लाहौ लीज्यौ रे ।
थारौ जनम सुफल सौ होइ रे । तूँ अहलौ यौंही न खोइ रे ॥टेक॥
लाहौ साधाँ  सेवियाँ  रे, लाहौ भगति कियाँ  ।
जीवनि मुकति फल प्रामियें, हरिजी को नाँव लियाँ ॥
साधाँ सेती गोठडी रे, कोटि कटै अपराध ।
धनि र दिहाड़ौ आज कौ, म्हारै द्वारै आया साध रे ॥
धन जोबन सब पाहूणौं रे, आइ मिल्या दिन दोइ ।
घिरती फिरती छाँहड़ी, जाताँ बार न होइ ॥ 
नैणाँ बैणाँ सरवणाँ रे, रसना रामइयौ गाइ ।
जनम सुफल करि आपणैं, बषनां बिलँब ल लाइ ॥१६६॥
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परात्पर-परब्रह्म-परमात्मा का अहर्निश भजन करके मनुष्य जन्म मिलने का लाभ लीजिये रामभजन करने से हे मनुष्य ! तेरा जन्म सफल हो जायेगा । तू इसे यों ही व्यर्थ मत गँवा । साधुओं का सत्संग करने में लाभ है । रामजी की भक्ति करने में लाभ ही लाभ है । हरिजी का नाम-स्मरण करने से जीते जी ही मुक्ति = जीवन्मुक्ति की प्राप्ति हो जाती है । साधु-संतों से गोष्टि करने पर करोड़ों अपराध कट जाते हैं । 
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बषनां जी कहते हैं, आज का दिन धन्य है कि मेरे द्वार पर साधु-संतों का आगमन हुआ है । धन, यौवन आदि सभी अतिथि तुल्य हैं जो जीव को कुछ समय के लिये मिले हैं । ये ठीक उसीप्रकार अस्थाई संगी-साथी हैं जैसे छाया घिरती फिरती =आती-जाती है, इन्हें नष्ट होते समय नहीं लगता । नैनों से संतों के दर्शन करके, श्रवणों से रामजी का नाम सुनकर तथा रसना से रमतीराम का गायन करके हे मनुष्य ! अपना मनुष्य जन्म सफल कर । बषनां कहता है, इस काम को करने में तनिक सी भी देरी मत कर ॥१६६॥

बुधवार, 1 जुलाई 2026

*२०. सुमिरण का अंग ~६५/६८*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*२०. सुमिरण का अंग ~६५/६८*
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रज्जब नाम नराधिपति, सकल अंग उमराव ।
मिलेहि कारज सिद्ध ह्वै, अमिल मडै१ नहिं पाव ॥६५॥
ईश्वर नाम राजा के समान है, अन्य साधन सरदारों के समान है राजा और सरदार मिलकर कार्य करे तो सुगमता से सिद्ध होता है, नहीं मिलने से सरदारों के पैर कार्य सिद्धि तक नहीं टिक१ सकते, वैसे ही नाम और अन्य साधन मिलकर तो मुक्ति रूप कार्य कर लेते हैं, नाम बिना अन्य साधन मुक्ति रूप कार्य सिद्ध करने में समर्थ नहीं होते ।
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अज्ञान कष्ट अठसठ सहित, सब व्रत रोजे कीन ।
जन रज्जब हरि नाम में, मन वच कर्म जो लीन ॥६६॥
अज्ञानावस्था में अड़सठ तीर्थों के स्नान, सब प्रकार के व्रत, रोजे करे जाते हैं, उन सब का फल उसे प्राप्त हो जाता है, जो मन, वचन और कर्मों से हरि-नाम-सुमिरण में लगा रहता है ।
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सुमिरण करे सु शास्त्र है, बुधि उपजे सो वेद ।
विषया तजे सु व्याकरण, रज्जब पाया भेद ॥६७॥
हरि-नाम-सुमिरण करना ही श्रेष्ठ शास्त्रों का अभ्यास करना है, बुद्धि ब्रह्म ज्ञान उत्पन्न होना ही वेदाध्यायन है, विषयों का त्याग करना ही व्याकरण पढ़ना है । इस प्रकार गुरु कृपा से हमने वेदादी का यथार्थ रहस्य प्राप्त किया है ।
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अस्थूल सु अक्षर अर्थ हरि, काढे पंडित प्राण ।
रज्जब ज्ञाता गुणी सो, समझ्या सोइ सुजाण ॥६८॥
मंत्र के अक्षर तो स्थूल है, उनमें जो अर्थ है, वही हरि है, जो प्राणी पंडित होता है, वही शब्दार्थ रूप हरि को निकाल कर हृदय में धारण करता है, तब वही ज्ञानी, गुणी, समझदार और सुजान कहलाता है ।
(क्रमशः)

२९. अद्वैत ज्ञान कौ अंग १/४

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२९. अद्वैत ज्ञान कौ अंग १/४
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सुन्दर हौं नहिं और कछु, तूं कछु और न होइ ।
जगत कहा कछु और है, एक अखंडित सोइ ॥१॥
श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - हे जिज्ञासु ! मैं कोई दूसरा नहीं हूँ, न तूं ही कोई दूसरा है, न यह संसार ही कोई दूसरा हैं; क्योंकि मुझ में, तुझ में और इस समस्त संसार में एक अखण्ड, सर्वव्यापक वह परमात्मा ही एकान्ततः विद्यमान है ॥१॥
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सुन्दर हौं नहिं तूं नहीं, जगत नहीं ब्रह्मंड ।
हौं पुनि तूं पुनि जगत पुनि, ब्यापक ब्रह्म अखंड ॥२॥
वस्तुतः मैं, तूं या यह समस्त ब्रह्माण्डमय संसार - इनमें कोई भी दूसरा नहीं है; क्योंकि हम सब में एकमात्र वह सर्वव्यापक ब्रह्म ही सर्वत्र व्याप्त है ॥२॥ (द्र० - सवैया : ३२/२ छ०).
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सुन्दर पहली ब्रह्म था, अबहूं ब्रह्म अखंड ।
आगै हूं यह ब्रह्म है, मृषा पिण्ड ब्रह्मंड ॥३॥
भूतकाल में भी हम सब में वह अखण्ड और व्यापक ब्रह्म ही वर्तमान था, और आज भी वही वर्तमान है तथा भविष्य में भी हम सब में उसी की सत्ता रहेगी । इस समस्त ब्रह्माण्ड एवं तेरे और मेरे शरीर में भासने वाला द्वैत ज्ञान तो सर्वथा मिथ्या(भ्रम) ही है ॥३॥
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बृक्षन कौं बन कहत हैं, बन मैं बृक्ष अनेक ।
सुन्दर द्वैत कछू नहीं, बृक्ष रु बन तौ एक ॥४॥
उदाहरणों द्वारा अद्वैत सिद्धि : यद्यपि लोकव्यवहार में हम वृक्षों(के समूह) को 'वन' कहते हैं; परन्तु वहाँ अनेक वृक्ष दिखायी देते हैं; तथापि वहाँ भी वस्तुतः कोई द्वैत नहीं है; 'वृक्ष' और 'वन' तो एक ही वस्तु की दो संज्ञा(नाम) हैं ॥४॥ (द्र० सवैया : ३२/४ छ०)
(क्रमशः)

सुसंगति-कुसंगति

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*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*दादू जिसका दर्पण ऊजला, सो दर्शन देखै मांहि ।*
*जिस की मैली आरसी, सो मुख देखै नांहि ॥*
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सुसंगति-कुसंगति ॥ साषी लापचारी ॥
मनसा डाकणि मन जरख, दौड़ावै दिन राति ।
बषनां कदे न ऊतरै, साँझ जिसी परभाति ॥१
(१ इसका अर्थ ‘मन कौ अंग’ की साषियों में देखे ।)
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पद ॥
आसरड़ी ऊजली रे, तामैं मुखड़ौ दीठौ जाइ ।
जिहि की मैंली आरसी, काट रह्यौ तिहि छाइ ॥टेक॥
काम क्रोध का मोरचा, भरम करम कौ काट ।
आसरड़ी दीठौ नहीं, कबहुँ सिकलीगर कौ हाट ॥
कारीगर सतगुर मिलै, सबद मसकला लाइ ।
आतम कीन्हों ऊजली, तामैं निर्मल दरसन थाइ ॥
एक तवा एक आरसी, ऊह बहन उह बीर ।
उह कुसंगति थैं काली हुवौ, उह कौ निर्मल देखि सरीर ।
एकहि आरणि नीपना, एकहि घड़्या लुहारि ।
दून्यूँ एकै लोह का, बषनां देखि बिचारि ॥१६५॥
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जो आसरड़ी = मन रूपी दर्पण उज्जवल होता है उसमें आत्मा रूपी मुख स्पष्ट रूप से दीखता है । इसके विपरीत जिसका मन पाप रूपी मैल से मलिन है, उसको आत्मदर्शन में काट = जंक रूपी प्रतिबंधक बाधा पहुँचाता है । मन रूपी दर्पण पर काम क्रोधादि का जंक(मोरचा) है । भ्रम और कर्मादि का काट है ।
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क्योंकि ऐसे मन वाले साधकों ने कभी भी गुरु रूपी सिकलीगर की हाट को जाकर देखा तक नहीं है कि जिससे उनके मनों में विद्यमान काम क्रोध, भ्रम, कर्म रूपी जंक हट जाता है । सर्वप्रथम जीव को गुरु रूपी कारीगर = सिकलीगर मिले । वह राम-नाम रटने का उपदेश देवे । जीव राम-राम रटन रूपी रगड़(मसकला) मन रूपी दर्पण पर लगावे । तब कहीं जाकर आत्मा उज्जवल = निर्मल होती है ।
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जो साधक उक्त प्रकार से मन को निर्मल करते हैं, उनको उस निर्मल मन में आत्मस्वरूप परमात्मा का निर्द्वंद्व दर्शन होता है । एक तवा होता है । एक दर्पण होता है । तवा भाई है । दर्पण बहिन है । तवा कुसंगति से काला हो जाता है जबकी सुसंगति से दर्पण निर्मल का निर्मल ही रहता है । दोनों एक ही ऐरण पर तैयार होते हैं । उन दोनों को एक लुहार बनाता है । दोनों में लगी हुई धातु लोहा भी एक ही होता है । फिर भी सुसंगति तथा कुसंगति के कारण दोनों में जमीन आसमान का अंतर पड़ जाता है । बषनां कहता है, जीव को विचार करना चाहिये कि क्या विधेय है तथा क्या निषिद्ध है ॥१६५॥

*२०. सुमिरण का अंग ~६१/६४*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*२०. सुमिरण का अंग ~६१/६४*
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*निर्भय प्राणी नाम में, सौ भूले भय पूरि ।*
*ज्यों रज्जब सुख मीन जल, दुख दीरघ जब दूरि ॥६१॥*
जैसे मछली जल में सुखी रहती है और जल दूर होते ही महान् दुख में पड़ जाती है, वैसे ही हरि-नाम-स्मरण रूप साधन में स्थित रहने से प्राणी निर्भय रहता है और नाम भूलने से अत्याधिक भय प्राप्त होता है ।
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*रज्जब नाम निरंजन नीर है, महा मुनी मन मीन ।*
*सुख सागर माँही सुखी, दुख दीरघ जब भीन१ ॥६२॥*
निरंजन ब्रह्म का नाम रूप जल है, और महा मुनीश्वरो के मन मच्छियाँ है । जैसे मच्छियाँ सागर में सुखी रहती है, वैसे ही मुनियों के मन ब्रह्मानन्द में सुखी रहते हैं मच्छी जल से और मुनि-मन निरंजन के नाम से अलग१ होते ही महान् दुख में पड़ जाते हैं ।
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*नाम नेह सेती भजे, तो कोइ गुण व्यापे नाँहिं ।*
*पै हरि सुमिरण हेत बिन, तो द्वन्द्व हि दग्धे माँहिं ॥६३॥*
यदि प्रेम से हरि नाम का स्मरण किया जाय तो हृदय में कामादि में से कोई भी गुण व्याप्त होकर व्यथित नहीं करता और यदि हरि-स्मरण बिना प्रेम किया जायगा, तो अवश्य हृदय को काम क्रोधादि द्वन्द्व जलायेगा ।
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*नाज नाम की एक गति, पानी प्रेम सु पोष ।*
*इन दोनों के दोय बिन, रज्जब रवि गुण दोष ॥६४॥*
नाज और नाम की एक-सी ही रीति है, नाज का पोषण पानी से और नाम का प्रेम से होता है । नाज और नाम इन दोनों के जल और प्रेम के बिना सूर्य और गुण दोष रूप हो जाते हैं । बिना पानी नाज सूर्य की ताप से जल जाता है और बिना प्रेम नाम का शास्त्र कथित फल नहीं होता ।
(क्रमशः)

मंगलवार, 30 जून 2026

देखी मैं डाकणि जरख चढ़ी

🪷🙏 🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🪷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*दादू माया फोड़े नैन दोइ, राम न सूझै काल ।*
*साधु पुकारैं मेरू चढ़, देखि अग्नि की झाल ॥*
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माया ॥
देखी मैं डाकणि जरख चढ़ी ॥
लेबे का छोडण का नांहीं, कोई अैसौ मंत्र पढ़ी ॥टेक॥
पाँच बीर जाकै सँगि डोलै, सब जोगणि मनि भावै ।
नगिन भई चढिबा कै कारणि, बन में जरख बुलावै ॥
लापसड़ी का लौंदा करि करि, आपण खाइ खुलावै ।
जब यहु लोग सहर कौ सोवै, तबै सिराड़ा ध्यावै ॥
पाड़ोसणि पणि हाँतैं आई, संगि मिली गटकावै ।
भूखी व्है तबहीं भख मांगै, मुवा मसाण जगावै ॥
बहुत सयाणें पचि पचि हारे, कोई मंत्र न लागै ।
जाली जलै न जल मैं बूडै, नीसरि नीसरि भागै ॥
टूनर मंत्र सोकोत्री का सब, हरि कै भजनि उडावै ।
बषनां अैसा गुरु हमारा, डाकणि लियाँ छुडावै ॥१६४॥
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स्वामी श्रीरामचरण ने कहा है,
‘मलिन मंत्र कौ पाठ पढि, जरख बुलावै बाम ।
रामचरण साचै सबद, क्यूँ नहिं आवै राम ॥’
इसीप्रकार के विचार बषनांजी डाकण के रूपक से प्रकट करते हुए कहते हैं । मैंने वासना रूपी जरख पर माया रूपी डाकण को चढे हुए देखा है । यह लेने ही लेने का काम करती है, देने का काम ही नहीं करती है । इसने कोई इसीतरह की शिक्षा अपने गुरु से सीखी है ।
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शब्द, स्पर्श, रूप, रस व गंध रूपी पाँच वीर इसके साथ सदैव घूमते रहते हैं जो सभी इन्द्रियों रूपी योगिनियों को रुचिकर लगते हैं । यह सत्यासत्य विचार रूपी कपड़ों को उतार कर जरख पर चढ़ने कर लिये नग्न हो जाती है और एकांत वन में जाकर वासना रूपी जरख को बुलाती है । विषयभोग रूपी लापसी के बड़े-बड़े ग्रास बनाकर यह स्वयं भी खाती है तथा अपने सहयोगी जरख तथा योगिनियों को भी खिलाती है ।
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जब शहर की जनता अज्ञान रूपी निद्रा में सोयी पड़ी रहती है तब यह अपना प्रभाव सिराड़ा = शीघ्रगति से प्रकट करती है । मनसा रूपी पड़ोसन के जब हाँतैं = कहीं से भोजन आती है तब उसके साथ बैठकर प्रसन्नता पूर्वक उस विषयभोग रूपी भोजन खाती है । जब यह भूखी होती है तब ही वलि मांगती है और शमशान में जाकर मृत बच्चों को जीवित करके खाती है ।
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बहुत से सयाने भोपे रूपी ज्ञानी-ध्यानी इससे बच निकलने के लिये प्रयत्न कर-करके हार गये किन्तु उनका कोई भी मंत्र = उपाय इसको वश में नहीं कर सका । यह जलाने पर जलती नहीं तथा जल में डुबाने से डूबती भी नहीं है । दोनों में से ही निकल-निकल कर बाहर आ जाती है । इस सोकोत्री = शोक देने वाली माया रूपी डाकण के समस्त जादू टोने और मंत्र परात्पर-परब्रह्म-परमात्मा हरि के भजन से प्रभावहीन हो जाते हैं । बषनां कहता है, मेरा गुरु ऐसा है, जो डाकण द्वारा वशीकृत मनुष्य को डाकण के चंगुल से छुड़ा देता है ॥१६४॥

सोमवार, 29 जून 2026

*२०. सुमिरण का अंग ~५७/६०*

*🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏*
*🌷卐 सत्यराम सा 卐🌷*
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*२०. सुमिरण का अंग ~५७/६०*
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*सुमिरन में सुकृत सबै, जे मन वच कर्म होय ।*
*जन रज्जब जगपति मिले, भेद न भासे कोय ॥५७॥*
यदि मन, वचन, कर्म से हो तो, हरि-स्मरण में सभी सुकर्मों का फल स्थित है, स्वयं जगदीश्वर का साक्षात्कार भी होता है और कोई प्रकार का भेद-भाव भी नहीं दिखता ।
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*सब सुकृत सेवक किये, जब जीव जगपति लीन ।*
*रज्जब राम विसार तों, विविध बुराई कीन ॥५८॥*
जब मन जगदीश्वर के स्मरण में लीन हो जाता है, तब समझना चाहिये कि - इस भक्त ने सभी सुकृत कर लिये और राम को भूलता है तो समझो उसने नाना प्रकार की बुराइयाँ कर डाली ।
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*नाम लेत नेकी उदय, बदी विसारत होय ।*
*जन रज्जब जानी जुगति, प्रत्यक्ष दीसे दोय ॥५९॥*
हरि-स्मरण करने से भलाई का जन्म होता है और नाम को भूलने से बुराई का जन्म होता है । भलाई, बुराई के उदय की उक्त युक्ति हमने जान ली है, इससे दोनों प्रत्यक्ष दिखती है ।
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*रज्जब तिरिये राम भज, बूडे राम विसार ।*
*जगपति जाण्यों जीत है, हृदय नहीं तो हार ॥६०॥*
राम के भजन से प्राणी संसार से पार होता है और राम को भूलने से संसार में डूबता है । जगदीश्वर का स्वरूप जानने से तो संसार में प्राणी की जीत होती है और हृदय में राम का चिन्तन नहीं हो तो हार होती है ।
(क्रमशः)