*🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏*
*🌷卐 सत्यराम सा 卐🌷*
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*२०. सुमिरण का अंग ~८९/९२*
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*निश्चय पर नावै२ नहीं, करणी बड़ा करार१ ।*
*जन रज्जब सब शोध कर, काढ्या सुमिरण सार ॥८९॥*
कर्तव्य भावना रूप विशाल किनारे१ वाली संसार-सरिता को पार करने के लिए ब्रह्म में अभेद निश्चय से अधिक श्रेष्ठ नाव२ कोई भी नहीं है । संतों ने उस अभेद निश्चचय के लिये सभी साधनों में से विचार द्वारा खोजकर सब साधनों का सार ब्रह्म चिन्तन ही निकाला है ।
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*रज्जब निश्चय नीव पर, भाव भक्ति की भीति ।*
*सौ सृदृढ़ निश्चल रहै, और सबै भय भीति ॥९०॥*
जिस साधक में यह निश्चय है कि - "भगवद् -भजन बिना प्राणी का कल्याण नहीं हो सकता," इस निश्चय रूप नीव पर ही श्रद्धा भक्ति रूपी दीवाल उठती है, जिसमें अडिग श्रद्धा भक्ति होती है, वह किसी प्रकार भी डिगता नहीं, अपने साधन में सदृढ़ और निश्चल रहता है, अन्य सब कालादि से भयभीत रहते हैं ।
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*भक्ति भावली१ ठाहरे, चल चावली२ जाय ।*
*रज्जब समझ असमझ का, भजन भेख निरताय ॥९१॥*
भक्ति-भाव-वाली१ वृत्ति ही स्मरण में ठहरती है, चंचलता रूप उत्साह-वाली२ विषयों में जाती है । अत: ज्ञान, अज्ञान, भजन और भेष का विचार करोगे तो ज्ञान पूर्वक भजन ही श्रेष्ठ ज्ञात होगा, चंचलता युक्त भेष नहीं, इसलिये भाव भक्ति युक्त स्मरण ही कर्तव्य है ।
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*रज्जब रत रंकार१ सौं, ममै२ मनसा३ नाँहिं ।*
*सदा सुखी सुमिरन करै, महा मग्न मन माँहिं ॥९२॥*
जिसकी बुद्धि३ माया२ में नहीं जाती, राम मन्त्र के बीज "राँ"१ में ही अनुरक्त रहती है और निरंतर नाम स्मरण करता रहता है, उसका मन महान् स्मरण रस में निमग्न होकर सदा सुखी रहता है ।
(क्रमशः)












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जो मनुष्य अपने ज्ञानका, अपनी समझका, अपने अनुभवका आदर नहीं करता है, वह न शास्त्रोंका, न ईश्वरका, न गुरुजनोंका— किसीका भी आदर नहीं कर सकेगा। मनुष्योंको कम-से-कम अपनी समझ, अपनी जानकारीका आदर तो करना ही चाहिए। यह बात सब जानते हैं कि शरीर पैदा हुआ है और समय होने पर निश्चित ही मरेगा, फिर भी इस ज्ञानका आदर नहीं करते हैं। इस बातका अर्थ है कि यह मनुष्य शरीर भगवान् ने जिस विशेष उद्देश्यके लिए दिया है, मनुष्य शरीरमें भगवत्प्राप्तिका मौका दिया है, उसे शरीरके रहते प्राप्त कर लेना चाहिए। ऐसा नहीं करके मनुष्य शरीरमें नहीं करने योग्य कार्य करते हैं, यह अपने विवेककी हत्या है।*









