बुधवार, 11 फ़रवरी 2026

जीन्द नरेश द्वारा सत्कार ~

*#daduji*
*॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥*
*॥ दादूराम~सत्यराम ॥*
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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१५ आचार्य हरजीराम जी ~ 
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जीन्द नरेश द्वारा सत्कार ~ 
जीन्द राज्य की राजधानी संगरुर के पास जाकर आचार्यजी ने अपने आने की सूचना दी । तब जीन्द नरेश रणवीरसिंहजी अपने राजकीय ठाट बाट से आचार्य हरजीरामजी की अगवानी करने आये । मर्यादा पूर्वक भेंट चढाकर प्रणामादि शिष्टाचार के पश्‍चात् बाजे गाजे से संकीर्तन करते हुये भक्त मंडल के साथ आचार्यजी को नगर में लाये 
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और नगर के मुख्य बाजार से नियत स्थान पर ले गये । वहाँ प्रसाद बाँटकर शोभायात्रा समाप्त कर दी । सत्संग भी होने लगा । संगरुर की जनता ने सत्संग में अच्छा भाग लिया । राजा रणवीरसिंहजी ने आचार्य हरजीरामजी का बहुत सत्कार किया । कुछ दिन वहाँ ठहर कर जाने लगे तब राजा प्रजा सभी ने सस्नेह भेंट देकर आचार्यजी को विदा किया ।
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फरीदकोट पधारना ~  
संगरुर से विदा होकर आचार्य हरजीरामजी फरीदकोट के राजा विक्रमसिंहजी के निमंत्रण पर फरीदकोट पधारे । तब फरीदकोट के नरेश विक्रमसिंहजी ने आचार्यजी की सम्मान सहित अगवानी करके अति सत्कार पूर्वक आचार्यजी को ठहराया और अच्छी सेवा की । 
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फिर वहाँ से जाने लगे तब राजा विक्रमसिंहजी तथा फरीदकोट की जनता ने आपको भेंट देकर अति सत्कार सहित विदा किया । उक्त प्रकार भ्रमण करके  आचार्य हरजीरामजी महाराज शनै: शनै: नारायणा दादूधाम की ओर चले और कुछ समय में नारायणा दादूधाम में पधार गये ।
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बुरहानपुर पधारना ~ 
वि. सं. १९५१ में बुरहानपुर के सेवकों के आग्रह से आचार्य हरजीरामजी महाराज शिष्य संत मंडल के सहित बुरहानपुर पधारे । बुरहानपुर के सेवकों ने बाजे गाजे से संकीर्तन करते हुये आकर आचार्यजी की अगवानी की  । मर्यादापूर्वक  भेंट प्रणाम सत्यराम आदि शिष्टाचार के पश्‍चात् बाजे गाजे से संकीर्तन करते हुये नगर में लाकर अच्छे स्थान पर ठहराया । 
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सेवा का सुन्दर प्रबन्ध कर दिया । सत्संग होने लगा । बुरहानपुर में आचार्यजी के सेवक तथा अन्य धार्मिक  जनता दादूवाणी के प्रवचनों से अति प्रभावित हुई । उन्हें प्रवचन श्रवण करने के समय परम सुख व परम शांति का अनुभव होता था । एक दिन एक सेवक के बच्चे का पेट बहुत दुखा था । आचार्यजी ने उसे दादूवाणी के आले का कौणा जल में डुबोकर दिया उससे दर्द मिट गया था । 
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बुरहानपुर में अच्छा सत्संग हुआ । कुछ दिन वहाँ ठहरकर आचार्यजी जब नारायणा दादूधाम के लिये प्रस्थान करने लगे तब वहां के सेवकों ने मर्यादानुसार भेंट देकर सस्नेह विदा किया । वहाँ से विदा होकर आचार्य हरजीरामजी महाराज नारायणा दादूधाम में पधार गये ।  
(क्रमशः) 

*१९. साधु कौ अंग ३३/३६*

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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*१९. साधु कौ अंग ३३/३६*
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कोइ आइ स्तुती करै, कोइ निंदा करि जाइ । 
सुन्दर साधु सदा रहै, सबही सौं सम भाइ ॥३३॥
कभी कोई सांसारिक पुरुष उस साधक के सम्मुख आकर उस की प्रशंसा(स्तुति) करता है, तो कभी दूसरा आकर उस का अपमान या निन्दा करता है; परन्तु वह साधक सन्त इन दोनों के प्रति साधुभाव रखता हुआ उनसे सदा सद्व्यवहार ही करता है ॥३३॥
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कोऊ तौ मूरख कहै, कोऊ चतुर सुजांन । 
सुन्दर साधु धरै नहीं, भली बुरी कछु कांन ॥३४॥
ऐसे साधक के पास आने वाला कोई पुरुष उस की निन्दा करता हुआ उसे 'मूर्ख' कहता है, तथा कोई उसकी प्रशंसा करता हुआ उसको 'चतुर'(कुशल) कहता है । परन्तु वह(साधक) इन निन्दा स्तुति के वाक्यों से निरपेक्ष(उदास) रहता हुआ सबसे समान प्रेमपूर्ण व्यवहार ही करता है ॥३४॥
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कबहू पंचामृत भखै, कबहूं भाजी साग । 
सुन्दर संतनि कै नहीं; कोऊ राग बिराग ॥३५॥
ऐसे साधक को कभी भिक्षा में दूध, दही, घी, शक्कर, मधु आदि(पञ्चामृत) मिल जाता है; कभी उसे साक भाजी से ही पेट भरना पड़ता है; परन्तु उस साधक सन्त को इन दोनों ही स्थितियों से कोई राग(आसक्ति) या विराग(ग्लानि) नहीं होता ॥३५॥
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सुखदाई सीतल हृदैय, देखत सीतल नैंन । 
सुन्दर ऐसै संतजन, बोलत अमृत बैंन ॥३६॥
ऐसे पहुँचे हुए सन्त जनों का हृदय सब के प्रति सदा शीतल(शान्तिमय) एवं सुखमय रहता है तथा उन की दृष्टि भी सब के प्रति सदा स्नेहमय ही रहती है । वे सदा सब से मधुर वचनों से ही संवाद करते हैं ॥३६॥
(क्रमशः) 

नाममहिमा ॥

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*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*साहिब जी के नांव में, सब कुछ भरे भंडार ।*
*नूर तेज अनन्त है, दादू सिरजनहार ॥*
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नाममहिमा ॥
भाई भूख मुवाँ गति नाहीं ।
ताथैं समझि देखि मन माहीं ॥टेक॥
आगै साध सबै ही हूवा, भूखाँ कोई न मूवा ।
जिनि पाया तिन सहजैं पाया, राम रूप सब हूवा ॥
धू प्रहलाद कबीर नामदे, पाखँड कोइ न राख्या ।
बैठि इकंत नाऊँ निज लिया, बेद भागौत यौं भाख्या ॥
देव देहुरा सहबी माया, याँह मैं राम न पाया ।
भरमि भरमि सबही जग मूवा, यौंही जनम गँवाया ॥
जा जन कौं गुर पूरा मिलिया, अलख अभेव बताया ।
गुर दादू तैं बषनां तिरिया, बहुड़ि न संकुटि आया ॥४७॥
अशास्त्रविहितः घोरं तप्यंते ये तपो जनाः ।
दम्भाहंकारसंयुक्ताः कामराग बलान्विताः ॥५॥
कर्शयन्तः शरीरस्थं भूतग्राममचेतसः ।
मां चैवान्तः शरीरस्थं तान्विद्ध्यासुरनिश्चयान् ॥गीता १७॥”
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बषनांजी उन लोगों को सावधान करते हुए कहते हैं, जो शरीर को नाना क्लेश देकर तपस्यादि करते हैं । वे कहते हैं, भाई ! भूखे मरने से मोक्ष की प्राप्ति नहीं होती । अतः इस तथ्य को अच्छी तरह जानकर हृदय में भली भाँति स्थापित कर लो ।
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आज से पूर्व जितने भी साधक संत हुए हैं, वे भगवत्प्राप्त्यर्थ कोई भी भूखे नहीं मरे थे । वस्तुतः जिन्हें भी भगवत्प्राप्ति हुई है उन सभी को रामजी की प्राप्ति राम-नाम का सहज में स्मरण करने से ही हुई हैं और वे सभी रामरूप हो गये हैं, उनका रामजी से तादात्म्य हो गया है ।
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ध्रुव, प्रह्लाद, कबीर, नामदेव आदि किसी ने भी उक्त किसी भी पराक्र के पाखंड = झूठे साधनों का आश्रय नहीं लिया था । उन्होंने तो एकान्त = विषयभोगों से अनासक्त होकर अनन्यभावेन निजनाम राम का ही स्मरण किया था इसकी साक्षी वेद, भागवत तथा भक्तमालादि ग्रंथों में मिलती है । देव और देवों की पूजास्थली सभी माया = भ्रम = असत्य हैं । उनमें रामजी की प्राप्ति नहीं होती ।
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जगत् के अज्ञानी जीव इन मायामय मंदिरवासी देवताओं की सेवा-पूजा रूप भ्रमों में ही भ्रमित हुए देवदुर्लभ मनुष्यजन्म को व्यर्थ ही बर्बाद करके मर जाते हैं । जीव भक्तों को अलेख-अभेव पूर्णब्रह्म परमात्मा को बताने वाले गुरु दादू जैसे सद्गुरु मिल जाते हैं वे इस संसार से तिर जाते हैं, वे पुनः जन्म-मरण के चक्र में नहीं पड़ते ॥४७॥
(क्रमशः)

*३. श्री गुरुदेव का अंग ~१६९/१७१*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी* टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*३. श्री गुरुदेव का अंग ~१६९/१७१*
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*रज्जब कागज पूजिये, वेद वचन बिच आथि१ ।*
*तो गुरु को किन२ पूजिये, जाके गोविन्द साथि ॥१६९॥*
१६९ में गुरु की पूजा करने की प्रेरणा कर रहे हैं - वेद-वचन रूप पूंजी१ जिन कागजों में होती है, वे कागज भी पूजे जाते हैं, तब जिनके साथ भगवान हैं उन गुरुदेव की पूजा क्यों न२ की जाय ? गुरु की पूजा अवश्य करनी चाहिये ।
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*जड़ मूरति उर नाम बिन, तापर मंगलाचार ।*
*तो रज्जब कर आरती, गुरु पर बारंबार ॥१७०॥*
१७० में गुरु की आरती बारम्बार करने की प्रेरणा कर रहे हैं - जो पत्थर, काष्ठ, मिट्टी, सुवर्ण आदि धातुओं की बनी जड़ मूर्ति जिसके हृदय में हरि नाम भी नहीं होता, उसके लिये मंगल कार्य करते हुए उसकी आरती करते हैं, तब चेतन और हरि नाम चिन्तन युक्त हृदय वाले गुरुदेव की आरती तो बारम्बार करनी चाहिये ।
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*शिला सँवारी राज नें, ताहि नवै सब कोय ।*
*रज्जब शिष सद्गुरु गड़े, सो पूजा किन होय ॥१७१॥*
१७१ में गुरुदेव की पूजा करने की प्रेरणा कर रहे हैं - राज जब साधारण शिला की मूर्ति बना देता है तब सब उसको प्रणाम करते हुये उसकी पूजा करते हैं, फिर सद्गुरु तो अपने उपदेश द्वारा शिष्यों को ठीक करके परमात्मा से मिला देते हैं, वे पूजा के पात्र क्यों न होंगे ? सद्गुरु की पूजा अवश्य करनी चाहिये ।
इति श्री रज्जब गिरार्थ प्रकाशिका सहित “३. गुरुदेव का अंग” समाप्त ॥
(क्रमशः) 

मन रे चरणाँ ही चित राखि

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🌷🙏 *#बखनांवाणी* 🙏🌷
*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Ram Gopal Das*
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*सपने सब कुछ देखिये, जागे तो कुछ नांहि ।*
*ऐसा यहु संसार है, समझ देखि मन माँहि ॥*
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राग आसावरी ॥३॥उपदेश॥
मन रे चरणाँ ही चित राखि ।
पूजि परमानंद प्राणी, दूरि दुरमति नाखि ॥टेक॥
कलि कठिन उपाव को करि, नाऊँ लै निरबाहि ।
भजन करि नर भूलि जिनि जै, सबल सरणैं साहि ॥
समझि सोचि बिचारि जिय मैं, सुरति करि जिव जागि ।
लुबधि लालच लोभ तजि करि, पलटि चरणौं लागि ॥
आन सौं मति मोह बाँधै, भरमसी भरपूरि ।
काल पासी जीव जासी, राम रहसी दूरि ॥
हरि सुमिरि दुख हरण हिरदै, तरण तारण सोइ ।
बरणि बषनां नाऊँ निज तत, और नाहीं कोइ ॥४६॥
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मन = अंतःकरण की उपाधि वाले हे जीव ! अपनी चित्तवृत्ति को स्वात्मतत्त्व-चिंतन में ही लगाकर रख । हे प्राणी ! परमानन्द स्वरूप स्वात्मतत्त्व का बोध प्राप्त करने का प्रयत्न कर और दुर्मति = अविवेक को दूर कर डाल । कलिकाल अति कठिन समय है । इस कठिन समय में स्वात्मतत्त्व का बोध प्राप्त करने का कोई न कोई उपाय कर ।
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मेरी सम्मति में भगवन्नामजप करते हुए जीवन का निर्वाह करना सर्वोत्तम उपाय है । अतः हे मनुष्य ! भगवद्भजन कर । इसको किसी भी स्थिति में, किसी भी काल में और किसी भी देश में मत भूल और सर्वशक्तिशाली, परमैश्वर्यवान परब्रह्मपरमात्मा की शरण का आश्रय ले । मेरी सलाह को सुनकर उसे भलीप्रकार समझने का प्रयत्न कर ।
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समझने पर सोच = चिंतन कर, विचार = मनन कर, बार-बार स्मरण कर और हृदय में उतार ले । लुबधि = आसक्ति, लालच और लोभ का सर्वथा परित्याग कर दे और संसार में संलग्न चित्त के प्रवाह को संसार से उलटाकर परमात्माभिमुख कर ले । परमात्म-तत्वातिरिक्त अन्य किसी से भी राग मत कर, मोह मत बाँध, अन्यथा तू जन्म-जन्मान्तरों तक भ्रमता ही फिरेगा ।
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क्योंकि तेरे से मुक्ति प्रदान करने वाला राम तो दूर ही रह जायगा और अन्त समय में तेरा जीव काल द्वारा फाँसी में बांधकर शुभाशुभ कर्म-फल भुगताने को ले जाया जायेगा । अशेष दुःखों को हरण करने वाले हरि का स्मरण कर क्योंकि वह इस दुस्तर संसार-सागर से तारने वाला है । भगवन्नाम रूपी निजतत्त्व का ही वरण क्योंकि वरण करने योग्य और दूसरा कुछ है ही नहीं ॥४६॥
(क्रमशः)

उतराध की रामत ~

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*॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥*
*॥ दादूराम~सत्यराम ॥*
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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१५ आचार्य हरजीराम जी ~ 
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उतराध की रामत ~ 
चान्दसीन चातुर्मास करके उतराधे संतों के आग्रह से आचार्य हरजीरामजी महाराज शिष्य संत मंडल के सहित उतराध की रामत करने पधारे । उतराध के स्थानधारी संतों तथा सेवकों का आतिथ्य ग्रहण करते हुये तथा दादूवाणी का उपदेश करते हुये उतराध में भ्रमण करने लगे । 
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फिर शनै: शनै: पटियाला के पास पहुँचे तब अपनी मर्यादा के अनुसार अपने आने की सूचना पटियाला नरेश को दी । सूचना मिलने पर पटियाला नरेश राजेन्द्रसिंहजी राजकीय लवाजमा लेकर आचार्य हरजीरामजी महाराज की अगवानी करने बडे ठाट बाट से आये ।  
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पटियाला सत्संग ~ 
पटियाला नरेश राजेन्द्रसिंहजी ने आचार्य हरजीरामजी महाराज के पास जाकर भेंट चढाकर, प्रणाम की और सामने बैठ गये और आवश्यक  प्रश्‍नोत्तर हो जाने के पश्‍चात् आचार्यजी को अति सत्कार से लेकर बाजे गाजे के साथ संकीर्तन करते हुये नगर में प्रवेश किया और नगर के मुख्य बाजार से जनता को आचार्यजी तथा संत मंडल का दर्शन कराते हुये नियत स्थान पर ले जाकर ठहराया । 
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प्रसाद बांट कर शोभा यात्रा समाप्त की । फिर पटियाला में सत्संग आरंभ हो गया । प्रात: दादूवाणी की कथा, मध्यदिन में विद्वान् संतों के भाषण होने लगे । पटियाला की जनता ने सत्संग में बहुत रुचि दिखाई । ठीक  समय पर आकर कथा श्रवण करते थे और मर्मवेधी प्रवचनों को सुनकर अपने मन को भगवदाकार बनाने में परिश्रम करते थे । जिज्ञासु अपनी शंकाओं का समाधान होने से अत्यन्त हर्षित होते थे ।
गायक  संतों द्वारा उच्चकोटि के संतों के पदों को सुनकर अति प्रभावित होते थे । पटियाला नरेश राजेन्द्रसिंहजी तथा राज परिवार के सत्संगी भी दादूवाणी की ज्ञान गरिमा से बहुत प्रभावित होते थे । उक्त प्रकार कुछ समय तक पटियाला में अच्छा सत्संग चला और आचार्यजी वहां से जाने लगे तब राजा राजेन्द्रसिंहजी ने तथा नगर के सत्संगी वर्ग ने आचार्यजी को अति सम्मान के साथ भेंट देकर सस्नेह विदा किया । 
नाभा गमन ~ 
पटियाला से विदा होकर आचार्य हरजीरामजी महाराज नाभा नरेश हीरासिंहजी के निमंत्रण पर नाभा पधारे । आचार्य हरजीसिंहजी ने अपने आने की सूचना नाभा नरेश को दी । तब नाभा नरेश हीरासिंहजी राजकीय लवाजमा तथा भक्त मंडल के सहित संकीर्तन करते हुये आचार्य हरजीरामजी महाराज की अगवानी करने आये । 
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मर्यादा के अनुसार भेंट चढाकर प्रणाम की और आवश्यक  प्रश्‍नोत्तर के पश्‍चात् बाजे गाजे से संकीर्तन करते हुये नगर में ले गये और नियत स्थान पर ले जाकर ठहराया । सत्संग आरंभ हुआ । यहाँ की धार्मिक जनता ने भी सत्संग में अच्छी रुचि दिखाई । कुछ दिन नाभा में ठहरे फिर जाने लगे तब नाभा नरेश हीरासिंहजी तथा धार्मिक जनता ने आचार्य हरजीरामजी को मर्यादा पूर्वक भेंट देकर सस्नेह विदा किया । नाभा से ही विदा होकर आचार्य जीन्द नरेश रणवीरसिंहजी के निमंत्रण पर उनके यहाँ पधारे ।  
(क्रमशः) 

*१९. साधु कौ अंग २९/३२*

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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*१९. साधु कौ अंग २९/३२*
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काम कोध जिनि कै नहीं, लोभ मोह पुनि नांहिं । 
सुन्दर ऐसै संतजन, दुर्लभ या जगु मांहिं ॥२९॥
जिस उत्तम साधक के हृदय में किसी भी प्रकार के काम क्रोध आदि विकार नहीं है, तथा किसी भी प्रकार के लोभ या मोह से भी वह दूर रहता है ऐसा साधक ही 'सन्त' कहलाता है । ऐसा सन्त इस संसार में बहुत दुर्लभ माना जाता है ॥२९॥
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मद मत्सर अहंकार की, दीन्ही ठौर उठाइ । 
सुन्दर ऐसै संतजन, ग्रंथनि कहे सुनाइ ॥३०॥
जिस साधक ने अपने चित्त को मद(स्वकीय शारीरिक रूप आदि का वृथाभिमान) एवं मत्सर(दूसरों से ईर्ष्या) से सर्वथा दूर कर लिया है ऐसे सन्त जनों की ही वेद पुराण आदि सच्छास्त्रों में प्रशंसा की गयी है ॥३०॥
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पाप पुन्य दोऊ परै, स्वर्ग नरक तें दूरि । 
सुन्दर ऐसै संतजन, हरि कैं सदा हजूरि ॥३१॥
जो पाप एवं पुण्य की वासनाओं से सदा दूर रहता है, एवं स्वर्ग एवं नरक कामनाओं से भी दूर रहता है; महाराज श्रीसुन्दरदासजी कहते है - ऐसे सन्तजन ही हरिभक्ति में निरन्तर लगे रहने में(तत्पर रहने में) समर्थ होते हैं ॥३१॥
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आये हर्ष न ऊपजै, गयें शोक नहिं होइ । 
सुन्दर एसै संतजन, कोटिनु मध्ये कोइ ॥३२॥ 
जिस साधक को किसी सांसारिक वस्तु की प्राप्ति पर कोई हर्ष नहीं होता, या उसके नष्ट होने पर कोई कष्ट नहीं होता; श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - ऐसा साधक सन्त करोड़ों साधकों में कोई एक होता है१ ॥३२॥ 
{१ तु० भगवद्‌गीता – यो न ह्रष्यति न द्वेष्टि न शोचति न कांक्षति । (१२/१७)}
(क्रमशः)

मंगलवार, 10 फ़रवरी 2026

*३. श्री गुरुदेव का अंग ~१६५/१६८*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी* टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*३. श्री गुरुदेव का अंग ~१६५/१६८*
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*सद्गुरु को पूगै१ नहीं, यद्यपि स्याणे दास ।*
*रज्जब आभे२ बहु चढैं, तो भी तल आकाश ॥१६५॥*
गुरु के समान शिष्य नहीं हो सकते - बादल बहुत उँचे चढ़ जाते हैं तो भी आकाश२ के तो नीचे ही रहते हैं । वैसे ही यद्यपि शिष्य अति चतुर हो जाते हैं तो भी सद्गुरु के समान१ नहीं हो सकते ।
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रज्जब दीपक लाख पर, कोटि ध्वजा आनन्द ।
तो गुरु की कर आरती, जामें है गोविन्द ॥१६६॥
१६६-१६७ में गुरु की आरती करने की प्रेरणा कर रहे हैं - जब लाख पर दीपक जलाकर और कोटि पर ध्वजा चढाकर सुख का परिचय देते हैं, तब जिन गुरुदेव में गोविन्द विराजमान हैं उनकी आरती अवश्य करनी चाहिये । पूर्व काल में यह प्रथा थी कि - लखपति होने पर अपने घर की छत पर आकाशी दीपक जलाया करते थे और कोटिपति होने पर घर की छत पर ध्वजा चढाई रखते थे, उसी का निर्देश १६६ में किया है ।
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*रज्जब छत्र घरे चौंरों ढ़रैं, जहाँ नृपति नर होय ।*
*तो गुरु उर गोविन्द है, नख शिख आरति जोय१ ॥१६७॥*
जब नर नृपति हो जाता है तब उस पर श्वेत छत्र रहता है, चँवर ढोले जाते हैं, गुरुदेव के हृदय में तो परमात्मा स्थित हैं फिर आरती जो१ कर उनके नख से शिखा तक सभी अंगो की आरती क्यों न की जाय वा अपने नख से शिखा तक के अंगो को ही आरती के समान जो कर अर्थात् सावधान करके गुरुसेवा में संलग्न करना रूप आरती क्यों न की जाय ?
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*यथा गोद परधान के, बालक राजकुमार ।*
*ता को रज्जब सब नवें, उस बालक के प्यार ॥१६८॥*
१६८ में गुरुदेव को नमस्कार करने की प्रेरणा कर रहे हैं - जैसे राजकुमार बालक प्रधानमंत्री की गोद में हो तो उस बालक के प्यार से उसे सभी नमस्कार करते हैं, वैसे ही गुरु के हृदय में गोविन्द होने से वे सभी की नमस्कार के पात्र हैं, उन्हें प्रणति करना चाहिये ।
(क्रमशः) 

देहली में सत्संग ~

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*॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥*
*॥ दादूराम~सत्यराम ॥*
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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१५ आचार्य हरजीराम जी ~ 
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देहली में सत्संग ~ 
देहली में सत्संग आरंभ हो गया । दादूवाणी का प्रवचन होने लगा । दादूवाणी का सुमधुर प्रवचन सबको रुचिकर ही होता है किन्तु संत साहित्य के जो प्रेमी होते हैं उनके लिये तो वह परमानन्द प्रदाता ही सिद्ध होता है । दादूवाणी का गंभीर प्रवचन भक्त लोग अति श्रद्धा भक्ति से सुनते थे । 
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दादूवाणी संत- साहित्य का रहस्यमय ग्रंथ है । इसमें शास्त्रों के उच्चकोटि के सिद्धांत का प्रतिपादन हुआ है । दादूवाणी के रहस्यमय विचारों को सुनकर सत्संगी सज्जनों के हृदय विकसित होते थे । अति मधुर प्रवचन होता था । श्रोतागण सुनते- सुनते तृप्त नहीं होते थे । 
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उक्त प्रकार धार्मिक  जनता को आनन्द प्रदान करते हुये कुछ समय आचार्यजी देहली में विराजे । फिर जाने लगे तब आपके सेवकों ने तथा धार्मिक जनता ने भेंटादि द्वारा आचार्य हरजीरामजी महाराज का अच्छा सत्कार किया । देहली से विदा होकर आप पंजाब को पधारे । 
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पंजाब की रामत ~ 
पंजाब में स्थानधारी साधुओं का तथा सेवकों का जहां- जहां आग्रह था वहां- वहां पधार कर दादूवाणी के प्रवचनों द्वारा श्रोताओं को सुख शांति प्रदान करते हुये विचरे । सेवकों तथा संतों ने भी अपने प्रिय आचार्यजी की इच्छानुसार सेवा की । फिर पंजाब से शनै: शनै: भ्रमण करते हुये तथा धार्मिक  जनता को उपदेश देते हुये नारायणा दादूधाम में पधार गये ।  
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चांदसीन में चातुर्मास ~ 
वि. सं. १९५० में चान्दसीन जमात के रामरक्षपाल जी ने, आचार्य हरजीरामजी महाराज को चातुर्मास का निमंत्रण दिया । आचार्यजी ने स्वीकार कर लिया । चातुर्मास का समय समीप आने पर आचार्य हरजीरामजी महाराज अपने शिष्य संत मंडल के सहित चातुर्मास करने चान्दसीन पधारे । 
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चान्दसीन जमात ने बडे ठाट बाट से आचार्य हरजीरामजी महाराज का सामेला किया । बाजे गाजे से संकीर्तन करते हुये जमात में ले जाकर रामरक्षपालजी के स्थान में शोभा यात्रा समाप्त की । प्रसाद बांटा गया । चातुर्मास आरंभ हो गया । चातुर्मास के सभी कार्यक्रम अच्छी प्रकार चलने लगे । 
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संतों का समागम अच्छा रहा । सत्संग भी अच्छा चला । समाप्ति पर रामरक्षपालजी ने आचार्य हरजीरामजी महाराज को मर्यादा के अनुसार भेंट दी और शिष्य संत मंडल को यथायोग्य वस्त्रादि दिये । फिर सस्नेह विदा कर दिये । 
(क्रमशः)

*१९. साधु कौ अंग २५/२८*

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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*१९. साधु कौ अंग २५/२८*
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राज साज सब होत है, मन बंछित हू खाइ ।
सुन्दर दुर्लभ संतजन, बड़े भाग तें पाइ ॥२५॥
इसी प्रकार कोई चाहे तो वह राज्यसुख या विपुल ऐश्वर्य का उपभोग भी यथेच्छ प्राप्त कर सकता है; परन्तु ऐसे लोगों के लिये भी सन्त जनों का समागम तो विपुल सौभाग्य से ही अधिगत हो सकता है ॥२५॥
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लोक प्रलोक सबै मिलै, देव इंद्र हू होइ ।
सुन्दर दुर्लभ संतजन, क्यौं करि पावै कोइ ॥२६॥
अधिक क्या कहें, लोक या परलोक का सुखमय जीवन यहाँ तक कि देवलोक का इन्द्रासन भी अपेक्षाकृत सहजता से पाया जा सकता है; परन्तु यह दुर्लभ सन्तसमागम(सत्संग) तो लाखों में किसी एक सौभाग्यशाली साधक को ही मिल पाता है ॥२६॥
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ब्रह्मा शिव कै लोक लौं, ह्वै बैकुंठहु बास ।
सुन्दर और सबैं मिलै, दुर्लभ हरि के दास ॥२७॥
यदि कोई दृढ संकल्प कर ले तो वह ब्रह्मलोक, शिवलोक या वैकुण्ठलोक तक भी पहुँच सकता है । कहने का तात्पर्य यह है कि उसे संसार का दुर्लभ से दुर्लभ पदार्थ मिल सकता है; परन्तु किसी सन्त का मिलना तो उसके लिये भी दुर्लभ ही है ॥२७॥
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राग द्वेष ते रहित हैं, रहित मान अपमान ।
सुन्दर ऐसै संतजन, सिरजे श्री भगवान ॥२८॥
दुर्लभ सन्त के लक्षण : जो सांसारिक राग द्वेष से रहित है, तथा जो समाज में अपने मान अपमान का कोई महत्व नहीं देता; श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं, ऐसा लगता है कि मानों ऐसे सन्त को भगवान् ने स्वयं अपने हाथों बनाया है ॥२८॥
(क्रमशः)

*राम-रसायन ॥*

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*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी*
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*राम रसायन भर भर पीवै,*
*दादू जोगी जुग जुग जीवै ।*
*संयम सदा, न व्यापै व्याधी,*
*रहै निरोगी लगै समाधी ॥*
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*राम-रसायन ॥*
जीवै रे सो जीवै रे । जो राम रसायण पीवै रे ॥टेक॥
जो सकल साधना साधै, घर जाइ बनखँडि बाँधै ।
तटाँ तीरथाँ जे उबरै, तौ कासी बसै सु क्याँहनैं मरै ॥
षणदावण बहु करता, सर्वदेव चित धरता ।
भोपा भोपी बूझै, सो कहीं जीवता सूझै ॥
वोषदि मूली जाकै, पुस्तक पोथी ताकै ।
जड़ियाँ बूटियाँ जे कोइ उबरै, तौ बैद धनंतर क्याँहनैं मरै ॥
आदि अंति जे जीया, त्याँह राम रसायण पीया ।
बषनां जुग जुग जीवै, सो राम रसायण पीवै ॥४५॥
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जो रामनाम रूपी रसायन का पान करता है, वह हमेशा-हमेशा जीवित रहता है, अमर हो जाता है । इसके विपरीत जो अन्य समस्त प्रकार की साधनाओं को साधते हैं; घर से निकलकर वनखंड में जाकर रहते हैं,
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नदियों के तटों और तीर्थों का सेवन करके अमर होने की आशा करते हैं, काशी में निवास करते हैं, ऐसा करने से यदि अमरत्व(उबरै) की प्राप्ति होती हो तो फिर वे मरते क्यों हैं ? अर्थात् उन्हें मरना नहीं चाहिये किन्तु वे मरते हैं ।
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इससे सिद्ध होता है ये सभी साधन अमरत्व प्रदान करने के लिये पर्याप्त नहीं हैं । जो खणदावण = यंत्र-मन्त्रादि की साधना करते हैं: निरंजन-निराकार-स्वात्म-तत्वातिरिक्त अन्य देवी-देवों का भजन-कीर्तन स्मरण करते हैं, देवी-भैरवादि के सेवक, घुड़ले आदियों से नाना प्रश्नादि पूछकर आगामी योजना बनाते हैं उनमें से बताइये, आज कौन जीवित है ?
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अर्थात् उनमें से किसी को भी अमरत्व की प्राप्ति नहीं हुई । जिनके पास पुस्तक पोथी और गुरुपरंपरा से प्राप्त तरह-तरह की औषधियाँ = रस-रसायन, जड़ी-बूँटी हैं । बूँटियों वाले, रस-रसायन वाले अमर हो जाते हों तो धनवंतरि जैसे सिद्ध वैद्यादि क्यों मरते ?
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वस्तुतः जिन्होंने रामनाम का रसायन पीया है, वे ही प्रारम्भ से अंत तक जीवित रहते हैं । बषनां जी कहते हैं वे ही युग-युगों तक जीते हैं जो निरन्तर रामरसायन का पान करते हैं ॥४५॥
(क्रमशः)

सोमवार, 9 फ़रवरी 2026

*३. श्री गुरुदेव का अंग ~१६१/१६४*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी* टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*३. श्री गुरुदेव का अंग ~१६१/१६४*
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*गुरु गंगा ठौर हि रहे, शब्द सलिल ले जाँहिं ।*
*जन रज्जब जग भाव यह, मन मल मंज हि माँहिं ॥१६१॥*
१६१-१६३ गुरु की स्थिरता तथा अपरिवर्तन स्थिति का परिचय दे रहे हैं - जैसे गंगाजी अपने स्थान पर ही रहती हैं किन्तु संसार के भावुक जन भाव पूर्वक जल को ले जाते हैं और आचमन से ही अपने को पवित्र मानते हैं । वैसे ही गुरु तो अपने स्थान पर ही रहते हैं किन्तु उनके शब्द साधक लोक ले जाते हैं और उनको सुनने वाले लोग भी उनके द्वारा अपने मन के भीतर का मल दूर करते हैं । जगत् में यह भावना प्रसिद्ध ही है ।
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*प्राण पत्र गुरु तरु तजहिं, विपद् वात की घात ।*
*सो रज्जब नौ खण्ड में, और न जाति कहात ॥१६२॥*
वायु के आघात से निम्ब वृक्ष अपने पत्तों को त्याग देता है, फिर भी निम्ब वृक्ष ही कहलाता है, किसी अन्य जाति का वृक्ष नहीं । वैसे ही किसी कष्ट के आघात से गुरु भी अपने प्राण को तो त्याग देते हैं, फिर भी वे पृथ्वी के नौओं खण्डों में अपनी वाणी के द्वारा गुरु ही कहलाते हैं, खल नहीं ।
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*चीनी चूड़ी ठीकरी, चौथे आतम अंग ।*
*रज्जब रे जे रज रले, पै पलट्या रूप न रंग ॥१६३॥*
चीनी मिट्टी के बर्तन के टुकड़े, चूड़ी, ठीकरी, ये चाहे रेते में मिल जाँय तो भी अपने रंग-रूप में ही रहते हैं, बदलते नहीं और चौथा आत्मा स्वरूप देहादि के साथ मिला हुआ रहने पर भी देहादि से नहीं मिलता । वैसे ही गुरु का अन्त:करण विषय राग रूप परिवर्तन को प्राप्त नहीं होता ।
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*षड् दशर्न के गुरु हुँ का, आदि गुरु गोविन्द ।*
*सो रज्जब समझे नहीं, तो सभी जीव मति मंद ॥१६४॥*
१६४ में आदि गुरु का परिचय दे रहे हैं - जोगी, जंगम, सेवड़े, बौद्ध, सन्यासी और शेख इन ६ प्रकार के भेषधारियों के गुरुओं के आदि गुरु परमात्मा हैं, उन परमात्मा का यथार्थ स्वरूप न समझे तब तक सभी जीव मन्द बुध्दि माने जाते हैं ।
(क्रमशः)

राजगढ का चातुर्मास ~

*#daduji*
*॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥*
*॥ दादूराम~सत्यराम ॥*
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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१५ आचार्य हरजीराम जी ~ 
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राजगढ का चातुर्मास ~ 
वि. सं. १९४९ में आचार्य हरजीरामजी महाराज को चातुर्मास का निमंत्रण राजगढ के संत बालमुकुन्दजी ने दिया । आचार्यजी ने स्वीकार किया । चातुर्मास का समय समीप आने पर आचार्य हरजीरामजी महाराज अपने शिष्य संत मंडल के सहित राजगढ पधारे । संत बालमुकुन्दजी ने बडे ठाट बाट से आचार्य हरजीरामजी महाराज की अगवानी की । 
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भेंट चढाकर प्रणाम सत्यराम आदि शिष्टाचार के पश्‍चात् बाजे गाजे से संकीर्तन करते हुये स्थान पर लाकर ठहराया । सेवा का प्रबन्ध सब अच्छी प्रकार करा दिया । चातुर्मास के कार्यक्रम सब विधि विधान से होने लगे । अच्छा चातुर्मास हुआ । समाप्ति पर मर्यादानुसार आचार्यजी को भेंट दी तथा शिष्य संत मंडल को यथायोग्य वस्त्रादि देकर सस्नेह विदा किया ।  
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देहली गमन ~राजगढ के चातुर्मास से विदा होकर आचार्य हरजीरामजी महाराज देहली के भक्तों के आग्रह से वि. सं. १९४९ कार्तिक शुक्ला अष्टमी को देहली पधारे । उस समय भारत की राजधानी देहली नगरी के भक्तों ने सरकार से विशेषाज्ञा प्राप्त करके आचार्य हरजीरामजी महाराज की शोभा यात्रा देहली के रेलवे स्टेशन से आचार्य हरजीरामजी महाराज को हाथी पर बैठाकर आरंभ की थी । 
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यह शोभा यात्रा बडे ठाट बाट से बाजे गाजे से संकीर्तन करते हुये आरंभ हुई । मार्ग में भवनों की अटारियों से आचार्यजी पर पुष्प वृष्टि होती जा रही थी । सडक पर भक्त लोग पुष्प मालायें और भेंट समर्पण करते जा रहे थे । आचार्यजी के कर्मचारी भेंट चढाने वालों को प्रसाद देते जा रहे थे । गायक संत लोग महात्माओं के पद गाते हुये साथ- साथ चल रहे थे । 
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भक्त मंडल की अनेक  मंडलियां आगे पीछे ईश्‍वर नामों का संकीर्तन करते हुये चल रही थीं । स्थान- स्थान पर दादूदयालु महाराज की जय ध्वनि होती थी । हाथी की सवारी में रुकावट डालने वाले तार आदि को म्युनिसिपल कमिश्‍नर की आज्ञा से हटा दिये गये थे । यह शोभा यात्रा निर्विध्न हो रही थी । 
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साथ में सरकारी पुलिस चल रही थी । कोई असुविधा होती तो उसे तत्काल मिटा देती थी । यह सुन्दर शोभा यात्रा स्टेशन से चलकर- फतहपुरी, चान्दनी चौक, घन्टाघर आदि प्रमुख बाजारों से होती हुई जहां आचार्यजी को ठहराने का स्थान नियत किया था वहां आ गई । आचार्यजी के दर्शनों से भक्त जनता को अति आनन्द का लाभ हुआ । प्रसाद बांटकर शोभा यात्रा समाप्त की । 
(क्रमशः)  

*१९. साधु कौ अंग २१/२४*

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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*१९. साधु कौ अंग २१/२४*
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जन सुन्दर सतसंग तें, पावै दुर्लभ योग । 
आतम परमातम मिले, दूरि होंहि सब रोग ॥२१॥
श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - यह साधक ऐसा सत्सङ्ग कर दुर्लभ योगविद्या में पारङ्गत हो सकता है । इस विद्या से उपलब्ध राजयोग के सहारे आत्मा का परमात्मा से ऐक्य स्थापित कर सकता है तथा अपनी सभी शारीरिक व्याधियाँ नष्ट कर शरीर से भी नीरोग हो सकता है ॥२१॥
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जन सुन्दर सतसंग तें, उपजै अद्वय ज्ञान । 
मुक्ति होय संसय मिटै, पावै पद निर्बान ॥२२॥
इस सत्सङ्ग के प्रभाव से जब साधक को अद्वैत ज्ञान हो जाता है, उस को एक साथ तीन लाभ होते हैं - १. वह भवप्रपञ्च से मुक्त हो जाता है, २. उस का द्वैतविषयक भ्रम मिट जाता है, तथा ३. उस को निर्वाण प्राप्त हो जाता है ॥२२॥
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सुन्दर सब कछु मिलत है, समये समये आइ । 
दुर्लभ या संसार मैं, संत समागम थाइ ॥२३॥
सन्त का समागम दुर्लभ : इस सत्सङ्गी साधक के सभी सत्सकङ्कल्प क्रमशः शनैः शनैः पूर्ण होते चलते हैं; परन्तु सचाई यह है कि ऐसे साधक को सच्चा सन्त मिलना ही आज दुर्लभ है ! ॥२३॥
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मात पिता सबही मिलैं, भइया बंधु प्रसंग । 
सुन्दर सुत दारा मिलैं, दुर्लभ है सतसंग ॥२४॥
इस संसार में सब कुछ सुगमता से मिल सकता है - माता पिता भी, भाई एवं बन्धु बान्धव भी, पुत्र या पत्नी भी । परन्तु साधुजनों की सङ्गति पूर्व जन्म के किसी विशाल पुण्य के प्रताप से कोई सौभाग्यशाली साधक ही पा सकता है ॥२४॥
(क्रमशः) 

समाधि के सागर में निमग्न

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🌷 *#श्रीरामकृष्ण०वचनामृत* 🌷
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*मनसा के पकवान सौं, क्यों पेट भरावै ।*
*ज्यों कहिये त्यों कीजिये, तब ही बन आवै ॥*
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साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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मैं श्रीरामकृष्ण की उक्तियों को सुनकर लिख रहा था, उन्होंने कहा - "हाँ देखो, भंग-भंग रट लगाने से कुछ न होगा । भंग ले आओ, उसे घोंटो और पीओ ।" इसके बाद उन्होंने मुझसे कहा - "तुम्हें तो संसार में रहना है, अतएव ऐसा करो कि नशे का गुलाबी रंग रहा करे । काम-काज भी करते रहो और इधर जरा सुखी भी रहो । तुम लोग शुकदेव की तरह तो कुछ हो नहीं सकोगे कि नशा पीते ही पीते अन्त में अपने तन की खबर भी न रहे - जहाँ-तहाँ बेहोश पड़े रहो ।
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"संसार में रहोगे तो एक आम-मुखतारनामा लिख दो । उनकी जो इच्छा, करें । तुम बस बड़े आदमियों के घर की नौकरानी की तरह रहो । बाबू के लड़के-बच्चों का वह आदर तो खूब करती है, नहलाती-धुलाती है, खिलाती पिलाती है, मानो वह उसी का लड़का हो; परन्तु मन ही मन खूब समझती है कि यह मेरा नहीं है । वहाँ से उसकी नौकरी छूटी नहीं कि बस फिर कोई सम्बन्ध नहीं ।
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"जैसे कटहल काटते समय हाथ में तेल लगा लिया जाता है, उसी तरह(भक्तिरूपी) तेल लगा लेने से संसार में फिर न फँसोगे, लिप्त न होओगे ।"
अब तक जमीन पर बैठे हुए बातें हो रही थीं । अब उन्होंने खाट पर चढ़कर लेटे लेटे मुझसे कहा - "पंखा झलो ।" मैं पंखा झलने लगा । वे चुपचाप लेटे रहे । कुछ देर बाद कहा, "अजी, बड़ी गरमी है, पंखा जरा पानी में भिगा लो ।"
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मैंने कहा, "इधर शौक भी देखता हूँ कम नहीं है !" हँसकर उन्होंने कहा, "क्यों शौक नहीं रहेगा ? - शौक रहेगा क्यों नहीं ?" मैंने कहा - "अच्छा, तो रहे, रहे, खूब रहे ।" उस दिन पास बैठकर मुझे जो सुख मिला वह अकथनीय है ।
अन्तिम बार - जिस समय की बात तुमने तीसरे खण्ड में लिखी है*(*ता. २३ मई १८८५ देखिये ।) - मैं अपने स्कूल के हेडमास्टर को ले गया था, उनके बी. ए. पास करने के कुछ ही समय बाद । अभी थोड़े ही दिन हुए उनसे तुम्हारी मुलाकात हुई थी ।
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उन्हें देखते ही श्रीरामकृष्णदेव ने मुझसे कहा - "क्यों जी, तुम इन्हें कहाँ पा गये ? ये तो बड़े सुन्दर व्यक्ति हैं ।
"क्यों जी, तुम तो वकील हो । बड़ी तेज बुद्धि है । मुझे कुछ बुद्धि दे सकते हो ? तुम्हारे पिताजी अभी उस दिन यहाँ आये थे, आकर तीन दिन रह भी गये हैं ।"
मैंने पूछा - "उन्हें आपने कैसा देखा ?"
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उन्होंने कहा - "बहुत अच्छा आदमी है, परन्तु बीच बीच में बहुत ऊल-जलूल भी बकता है ।"
मैंने कहा - "अब की बार मुलाकात हो तो ऊल-जलूल बकना छुड़ा दीजियेगा ।"
वे इस पर जरा मुस्कराये । मैंने कहा- "मुझे कुछ बातें सुनाइये ।"
उन्होंने कहा - "हृदय को पहचानते हो ?"
मैंने कहा - "आपका भाँजा न ? मुझसे उनका परिचय नहीं है ।"
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श्रीरामकृष्ण - हृदय कहता था, 'मामा, तुम अपनी बातें सब एक साथ न कह डाला करो । हर बार उन्हीं उन्हीं बातों को क्यों कहते हो ?' इस पर मैं कहता था, 'तो तेरा क्या, बोल मेरा है, मैं लाख बार अपना एक ही बोल सुनाऊँगा ।'
मैंने हँसते हुए कहा, 'बेशक, आपने ठीक ही तो कहा है ।'
कुछ देर बाद बैठे ही बैठे ॐ ॐ कहकर वे गाने लगे - 'ऐ मन, तू रूप के समुद्र में डूब जा ।...'
दो-एक पद गाते ही गाते सचमुच वे डूब गये । - समाधि के सागर में निमग्न हो गये ।
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समाधि छूटी । वे टहलने लगे । जो धोती पहने हुए थे, उसे दोनों हाथों से समेटते समेटते बिलकुल कमर के ऊपर चढ़ा ले गये । एक तरफ से लटकती हुई धोती जमीन को बुहारती जा रही थी । मैं और मेरे मित्र, दोनों एक दूसरे को टोंच रहे थे और धीरे धीरे कह रहे थे, 'देखो, धोती सुन्दर ढंग से पहनी गयी है ।' कुछ देर बाद ही 'हत्तेरे की धोती' कहकर, उसे उन्होंने फेक दिया ।
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फिर दिगम्बर होकर टहलने लगे । उत्तर तरफ से न जाने किसका छाता और छड़ी हमारे सामने लाकर उन्होंने पूछा, 'क्या यह छाता और छड़ी तुम्हारी है ?' मैंने कहा, 'नहीं ।' साथ ही उन्होंने कहा, "मैं पहले ही समझ गया था कि यह छाता और छड़ी तुम्हारी नहीं है । मैं छाता और छड़ी देखकर ही आदमी को पहचान लेता हूँ । अभी जो एक आदमी आया था, ऊल-जलूल बहुत कुछ बक गया, ये चीजें निस्सन्देह उसी की हैं ।"
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कुछ देर बाद उसी हालत में चारपाई पर वायव्य की तरफ मुँह करके बैठे गये । बैठ ही बैठे उन्होंने पूछा, "क्यों जी, क्या तुम मुझे असभ्य समझ रहे हो ?"
मैंने कहा, "नहीं, आप बड़े सभ्य हैं । इस विषय का प्रश्न आप करते ही क्यों हैं ?"
श्रीरामकृष्ण - अजी, शिवनाथ आदि मुझे असभ्य समझते हैं । उनके आने पर धोती किसी न किसी तरह लपेटकर बैठना ही पड़ता है । क्या गिरीश घोष से तुम्हारी पहचान है ?
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मैं - कौन गिरीश घोष ? वही जो थियेटर करता है ?
श्रीरामकृष्ण – हाँ ।
मैं - कभी देखा तो नहीं, पर नाम सुना है ।
श्रीरामकृष्ण - वह अच्छा आदमी है ।
मैं - सुना है, वह शराब भी पीता है !
श्रीरामकृष्ण - पिये, पिये न, कितने दिन पियेगा ?
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फिर उन्होंने कहा, 'क्या तुम नरेन्द्र को पहचानते हो ?'
मैं - जी नहीं ।
श्रीरामकृष्ण - मेरी बड़ी इच्छा है कि उसके साथ तुम्हारी जान-पहचान हो जाय । वह बी. ए. पास कर चुका है, विवाह नहीं किया ।
मैं - जी, तो उनसे परिचय अवश्य करूँगा ।
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श्रीरामकृष्ण - आज राम दत्त के यहाँ कीर्तन होगा । वहाँ मुलाकात हो जायगी । शाम को वहाँ जाना ।
मैं - जी हाँ, जाऊँगा ।
श्रीरामकृष्ण - हाँ, जाना, जरूर जाना ।
मैं - आपका आदेश मिला और मैं न जाऊँ ! - अवश्य जाऊँगा ।
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फिर वे कमरे की तस्वीरें दिखाते रहे । पूछा - "क्या बुद्धदेव की तस्वीर बाजार में मिलती है ?"
मैं - सुना है कि मिलती है ।
श्रीरामकृष्ण - एक तस्वीर मेरे लिए ले आना ।
मैं - जी हाँ, अब की बार जब आऊँगा, साथ लेता आऊँगा ।
फिर दक्षिणेश्वर में उन श्रीचरणों के समीप बैठने का सौभाग्य मुझे कभी नहीं मिला ।
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उस दिन शाम को रामबाबू के यहाँ गया । नरेन्द्र को देखा । श्रीरामकृष्ण एक कमरे में तकिये के सहारे बैठे हुए थे, उनके दाहिनी ओर नरेन्द्र थे । मैं सामने था । उन्होंने नरेन्द्र से मेरे साथ बातचीत करने के लिए कहा ।
नरेन्द्र ने कहा, 'आज मेरे सिर में बड़ा दर्द हो रहा है । बोलने की इच्छा ही नहीं होती ।'
मैं - रहने दीजिये, किसी दूसरे दिन बातचीत होगी ।
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उसके बाद उनसे बातचीत हुई थी, अलमोड़े में, शायद १८९७ की मई या जून के महीने में ।
श्रीरामकृष्ण की इच्छा पूरी तो होने की ही थी, इसीलिए बारह साल बाद वह इच्छा पूरी हुई । अहा ! स्वामी विवेकानन्दजी के साथ अलमोड़े में वे उतने दिन कैसे आनन्द में कटे थे ! कभी उनके यहाँ, कभी मेरे यहाँ, और कभी निर्जन में पहाड़ की चोटी पर ! उसके बाद फिर उनसे मुलाकात नहीं हुई । श्रीरामकृष्ण की इच्छा-पूर्ति के लिए ही उस बार उनसे मुलाकात हुई थी ।
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श्रीरामकृष्ण के साथ भी सिर्फ चार-पाँच दिन की मुलाकात है, परन्तु उतने ही समय में ऐसा हो गया था कि उन्हें देखकर जी में आता था जैसे हम दोनों एक ही दर्जे के पढ़े हुए विद्यार्थी हों । उनके पास हो आने पर जब दिमाग ठिकाने आता था, तब जान पड़ता था कि बाप रे ! किसके सामने गये थे !
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उतने ही दिनों में जो कुछ मैंने देखा है - जो कुछ मुझे मिला है, उसी से जी मधुमय हो रहा है । उस दिव्यामृतवर्षा हास्य को यत्नपूर्वक मैंने हृदय में बन्द कर रखा है । अजी, वह आश्रयहीनों का आश्रय हैं । और उसी हास्य से बिखरे हुए अमृत-कणों के द्वारा अमरीका तक में संजीवनी का संचार हो रहा है और यही सोचकर 'ह्रष्यामि च मुहुर्मुहुः, ह्रष्यामि च पुनः पुनः' - मुझे रह-रहकर आनन्द हो रहा है ।
(समाप्त)

रविवार, 8 फ़रवरी 2026

१५ आचार्य हरजीराम जी ~

*#daduji*
*॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥*
*॥ दादूराम~सत्यराम ॥*
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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१५ आचार्य हरजीराम जी ~ 
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आचार्य गुलाबदासजी महाराज के ब्रह्मलीन होने पर वि. सं. १९४८ में मार्ग शीर्ष शुक्ला १५ मंगलवार को सर्व समाज ने मिलकर हरजीरामजी महाराज को आचार्य गद्दी पर बैठाया । आपने २२०००) रु. पूजा दादूपंथ को दी थी । 
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आपके  टीके  की भेंट ~
आपके  टीके  के दस्तूर पर जयपुर नरेश ने- घोडा, दुशाला व १००) रु. भेंट भेजी । अलवर नरेश ने- एक हथिनी, पाग, मलमल, पार्चाथान, दुशाला आदि भेजे । जोधपुर नरेश जसवंतसिंहजी द्वितीय ने घोडा, दुशाला भेजे । जीन्द नरेश रणधीरसिंहजी ने एक - दुशाला ५००) रु. भेजे । पटियाला नरेश राजेन्द्रसिंहजी ने दुशाला- पाग आदि भेजे । 
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सीकर नरेश माधवसिंहजी ने- दुशाला और १००) रु. भेजे । किशनगढ नरेश शार्दूलसिंहजी ने- एक दुशाला भेजा । रतलाम नरेश रणजीतसिंहजी ने- दुशाला और १००) रु. भेजे । सूरजगढ के ठाकुर जीवणसिंहजी ने- १००) रु. भेजे । इत्यादिक  बडे छोटे नरेशों व रईसों की टीका रुप भेंट आई । समस्त दादूपंथी समाज ने मर्यादा के अनुसार भेंटें चढाई । उक्त प्रकार टीका की भेंट का संक्षिप्त परिचय है ।
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विशेषतायें ~  आचार्य हरजीरामजी महाराज बाल्यावस्था से ही अपना समय ब्रह्म भजन में ही व्यतीत करते थे । ब्रह्म भजन में ही उनका प्रेम था । अन्य के साथ तो वे कर्तव्य का ही पालन करते थे । अन्य व्यवहारिक कार्य से तो आप सदा उपराम ही रहते थे । आप परम विरक्त एकान्त सवी और मित भाषी थे । ऐसा ही उपदेश अपने पास रहने वाले शिष्यों तथा संतों को देते थे और कहते थे देखो, दादूजी महाराज भी कहते हैं- ‘‘दादू बहु बकवाद से, वायु भूत हो जाय ।’’ 
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आचार्य पद पर विराजने पर भी आपका व्यवहार पूर्ववत ही रहा था । पद प्राप्तिका अभिमान तो आपको लेश मात्र भी नहीं छू सका था । आचार्य पद पर आसीन होने पर आपका अधिक समय ब्रह्मभजन में ही व्यतीत होता था । परमहंसों के लक्षणों से आप संपन्न थे । आप के समकालीन संत आप में परमहंसों के लक्षण प्रत्यक्ष रुप में देखते थे । आप सब में सम रहते थे । 
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आसुर गुणों का प्रभाव आपके  हृदय पर कभी नहीं पडता था । दैवीगुण अवश्य आप में भासते थे । किन्तु वे भी तो अन्त: करण के ही थे । अपने आत्मा को तो वे सदा निर्गुण निर्लेप निर्विकार ही समझते थे तथा कहते थे । किसी वस्तु या व्यक्ति में आपकी आसक्ति लेशमात्र भी नहीं थी । वे सदा निर्द्वन्द्व ही रहते थे । उक्त प्रकार उनके समकालीन संत उनके विषय में कह गये हैं ।  
(क्रमशः) 

*१९. साधु कौ अंग १७/२०*

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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*१९. साधु कौ अंग १७/२०*
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सुन्दर आये संतजन, मुक्त करन कौं जीव । 
सब अज्ञान मिटाइ करि, करत जीव तें सीव ॥१७॥
महाराज श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - भगवान् ने इन सभी सन्तों को इस संसार में जीवों को भवबन्धन से मुक्त कराने के लिये ही भेजा है । ये इन पामर प्राणियों का समस्त अविद्यान्धकार मिटाकर साधारण जीव से शिव(परमात्मा) के रूप में परिवर्तित कर आनन्दमय जीवन बिताने योग्य बना देते हैं ॥१७॥
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जन सुन्दर सतसंग तें, पावै सब कौ भेद । 
वचन अनेक प्रकार के, प्रगट कहे जे बेद ॥१८॥
जब सत्सङ्ग करता हुआ वह जिज्ञासु गुरुमुख से श्रुत ज्ञानोपदेश द्वारा सब भेद(द्वैत) को छिन्न भिन्न कर अद्वैतावस्था में पहुँच जाता है तब वह भी वेद के समान यथार्थ वचन बोलने का अधिकारी बन जाता है । (ब्रह्मविद् ब्रह्मैव भवति) ॥१८॥
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जन सुन्दर सतसंग तें, उपजै निर्गुन भक्ति । 
प्रीति लगै परब्रह्म सौं, सब तें होइ बिरक्ति ॥१९॥
जब साधक(भक्त जन) के हृदय में उस सत्सङ्ग के प्रभाव से निर्गुण(निरञ्जन निराकार) की भक्ति का उदय हो जाता है तो उसका शनैः शनैः निरञ्जन निराकार प्रभु में अनन्य प्रेम हो जाता है । तथा इसके फलस्वरूप, इस को संसार से परम वैराग्य हो जाता है ॥१९॥
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जन सुन्दर सतसंग तें, उपजै निर्मल बुद्धि । 
जांनै सकल बिबेक करि, जीव ब्रह्म की सुद्धि ॥२०॥
अब सत्सङ्ग के प्रभाव से इस साधक(भक्त) की निर्मल(स्वच्छ) बुद्धि में विवेक ज्ञान उद्भूत हो जाता है तो वह उस के माध्यम से जीव ब्रह्म का अभेद ज्ञान प्राप्त कर अद्वैत भाव की ओर बढ़ जाता है ॥२०॥
(क्रमशः) 

समाधिमग्न

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🌷 *#श्रीरामकृष्ण०वचनामृत* 🌷
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*सकल भुवन सब आत्मा, निर्विष कर हरि लेइ ।*
*पड़दा है सो दूर कर, कश्मल रहण न देइ ॥*
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साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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घण्टे-डेढ़-घण्टे बाद कीर्तन शुरू हुआ । उस समय मैंने जो कुछ देखा, वह शायद जन्म-जन्मान्तर में भी न भूलूँगा । सब के सब नाचने लगे । केशव को भी मैंने नाचते हुए देखा, बीच में थे श्रीरामकृष्ण, और बाकी सब लोग उन्हें घेरकर नाच रहे थे । नाचते ही नाचते बिलकुल स्थिर हो गये – समाधिमग्न । बड़ी देर तक उनकी यह अवस्था रही ।
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इस तरह देखते और सुनते हुए मैं समझा, ये यथार्थ ही परमहंस हैं । एक दिन और, शायद १८८३ ई. में, श्रीरामपुर के कुछ युवकों को मैं साथ लेकर गया था । उस दिन उन युवकों को देखकर परमहंसदेव ने कहा था, 'ये लोग क्यों आये हैं ?'
मैंने कहा, - 'आपको देखने के लिए ।'
श्रीरामकृष्ण - मुझे ये क्या देखेंगे ? ये सब लोग बिल्डिंग(इमारत) क्यों नहीं देखते जाकर ?
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मैं - ये लोग यह सब देखने नहीं आये । ये आपको देखने के लिए आये हैं ।
श्रीरामकृष्ण - तो शायद ये चकमक पत्थर हैं । आग भीतर है । हजार साल तक चाहे उसे पानी में डाल रखो, परन्तु घिसने के साथ ही उससे आग निकलेगी । ये लोग शायद उसी जाति के कोई जीव हैं ? हम लोगों को घिसने पर आग कहाँ निकलती है ?
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यह अन्त की बात सुनकर हम लोग हँसे । उसके बाद और भी कौन-कौनसी बातें हुई, मुझे याद नहीं । परन्तु जहाँ तक स्मरण है, शायद 'कामिनीकांचन-त्याग' और 'मैं की बू नहीं जाती' इन पर भी बातचीत हुई थी ।
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मैं एक दिन और गया, प्रणाम करके बैठा कि उन्होंने कहा - "वही जिसकी डाट खोलने पर जोर से 'फस्-फस्' करने लगता है, कुछ खट्टा कुछ मीठा होता है - एक वही ले आओगे?" मैंने पूछा – 'लेमोनेड ?' श्रीरामकृष्ण ने कहा- "ले आओ न ।" जहाँ तक मुझे याद है शायद मैं एक लेमोनेड ले आया । इस दिन शायद और कोई न था ।
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मैंने कई प्रश्न किये थे - "आपमें क्या जाति-भेद है ?"
श्रीरामकृष्ण - कहाँ है अब ? केशव सेन के यहाँ की तरकारी खायी । अच्छा, एक दिन की बात कहता हूँ । एक आदमी बर्फ ले आया, उसकी दाढ़ी खूब लम्बी थी, पहले तो खाने की इच्छा न जाने क्यों नहीं हुई, फिर कुछ देर बाद एक दूसरा आदमी उसी के पास से बर्फ ले आया तो मैं दाँतो से चबाकर सब बर्फ खा गया । यह समझो कि जाति-भेद आप ही छूट जाता है ।
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जैसे, नारियल और ताड़ के पेड़ जब बड़े होते हैं तब उनके बड़े बड़े डण्ठलदार पत्ते पेड़ से आप ही टूटकर गिर जाते हैं । इसी तरह जाति-भेद आप ही छूट जाता है । झटका मारकर न छुड़ाना, उन सालों की तरह !
मैंने पूछा - केशवबाबू कैसे आदमी हैं ?
श्रीरामकृष्ण - अजी, वह दैवी आदमी है ।
मैं - और त्रैलोक्यबाबू ?
श्रीरामकृष्ण - अच्छा आदमी है, बहुत सुन्दर गाता है ।
मैं - और शिवनाथबाबू ?
श्रीरामकृष्ण - आदमी अच्छा है, परन्तु तर्क जो करता है - ?
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मैं – हिन्दू और ब्राह्म में अन्तर क्या है ?
श्रीरामकृष्ण - अन्तर और क्या है ? यहाँ शहनाई बजती है । एक आदमी स्वर साधे रहता है, और दूसरा तरह तरह की रागिनियों की करामत दिखाता है । ब्राह्मसमाजवाले ब्रह्म का स्वर साधे हुए हैं और हिन्दू उसी स्वर के अन्दर तरह तरह की रागिनियों की करामत दिखाते हैं ।
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"पानी और बर्फ । निराकार और साकार । जो चीज पानी है, वही जमकर बर्फ बनती है । भक्ति की शीतलता से पानी बर्फ बन जाता है !
"वस्तु एक ही है, अनेक मनुष्य उसे अनेक नाम देते हैं । जैसे तालाब के चारों ओर चार घाट हो । इस घाट में जो लोग पानी भर रहे हैं, उनसे पूछो तो कहेंगे, जल है । उधर के घाट में जो लोग हैं वे पानी कहेंगे । तीसरे घाटवाले कहेंगे, वाटर और चौथे घाट के लोग कहेंगे, एकुआ । परन्तु पानी एक ही है ।"
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मेरे यह कहने पर कि बरीशाल में अचलानन्द अवधूत के साथ मेरी मुलाकात हुई थी, उन्होंने कहा - "वही कोतरंग का रामकुमार न ?" मैंने कहा, 'जी हाँ ।'
श्रीरामकृष्ण - उसे तुम क्या समझे ?
मैं - जी, वे बहुत अच्छे हैं ।
श्रीरामकृष्ण - अच्छा, वह अच्छा है या मैं ?
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मैं - आपकी तुलना उनके साथ ? वे पण्डित हैं, विद्वान् हैं, आप पण्डित और ज्ञानी थोड़े ही हैं ?
उत्तर सुनकर कुछ आश्चर्य में आकर वे चुप हो गये । एक मिनट बाद मैंने कहा, "हाँ, वे पण्डित हो सकते हैं, परन्तु आप बड़े मजेदार आदमी हैं । आपके पास मौज खूब है ।"
अब हँसकर उन्होंने कहा - "खूब कहा, अच्छा कहा ।"
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मुझसे उन्होंने पूछा - "क्या मेरी पंचवटी तुमने देखी है ?"
मैंने कहा, "जी हाँ ।" वहाँ वे क्या करते थे, यह भी कहा - अनेक तरह की साधनाओं की बातें । मैंने पूछा - "उन्हें किस तरह हम पायें ?"
श्रीरामकृष्ण - अजी, चुम्बक जिस तरह लोहे को खींचता है, उसी तरह वे हम लोगों को खींच ही रहे हैं । लोहे में कीच लगा रहने से चुम्बक से वह चिपक नहीं सकता । रोते रोते जब कीच धुल जाता है, तब लोहा आप ही चुम्बक के साथ जुड़ जाता है ।
(क्रमशः)

शनिवार, 7 फ़रवरी 2026

*३. श्री गुरुदेव का अंग ~१५३/१५६*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी* टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*३. श्री गुरुदेव का अंग ~१५३/१५६*
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*रज्जब नर तरु वित्त१ के, मिल रीते सु अयान ।*
*मंगलगोटा२ मुख्य फल, मर्कट मुग्ध न जान ॥१५३॥*
जैसे नारियल२ वृक्ष फल रूप धन१ वाला है तथा उसका फल मंगल द्रव्यों में भी मुख्य है किन्तु मूर्ख वानर उसके फल में रहने वाले खोपरे को नहीं जानता अत: उसके उपभोग से वंचित रह जाता है । वैसे ही सद्गुरु रूप नर ज्ञान-धन से युक्त हैं, वह धन साधन से मुख्य फल मंगल मय ब्रह्म की प्राप्ति का हेतु है, तो भी अज्ञानी प्राणी उनसे मिलकर भी ज्ञान-धन से वंचित ही रह जाता है ।
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*कामधेनु अरु कल्पतरुवर,
बिना कामना शुभग सरोवर ।*
*चाह बिना चिंतामणि क्या दे,
त्यों सेवक स्वामी कने१ क्या ले ॥१५४॥*
बिना इच्छा करे कामधेनु, कल्पवृक्ष, चिन्तामणि और सुन्दर सुधा-तालाब से कुछ भी प्राप्त नहीं होता । वैसे ही शिष्य रूप सेवक बिना प्रश्न किये गुरु-रूप स्वामी से१ क्या ले सकता है ?
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*एरंड बंस लागे नहीं, गुरु चन्दन की वास ।*
*रीते रहे गठीले पोले, रज्जब परिमल पास ॥१५५॥*
सुगंधयुक्त चन्दन के पास रहने पर भी एरण्ड और बाँस गाँठों वाले तथा पोले होने से चन्दन की सुगंध नहीं ग्रहण कर पाते । वैसे ही विवेक हीनता रूप पोल, देहाध्यासादि रूप गाँठे होने से गुरु के पास रहने पर भी साधक गुरु का ज्ञान धारण नहीं कर सकते ।
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*गुरु सिमटे१ गोविन्द भज, शिष सद्गुरु को सेय ।*
*रज्जब बिझुका२ खेत में, चरे न चरने देय ॥१५६॥*
१५६ में योग्य गुरु-शिष्य का परिचय दे रहे हैं - गुरु तो भगवदभजन करके भगवद में स्थित१ होते हैं और शिष्य सेवा करके व्यवस्थित होता है किन्तु जैसे खेत में मृगों को डराने वाला पुतला२ न तो खेत को खाता है और न खाने देता है वैसे ही जो गुरु गोविन्द को न भजता है और न क्रूर स्वभाव के कारण शिष्य को अपनी सेवा ही करने देता है तथा शिष्य भी न गुरु सेवा करता है और न बहिमूर्खता के कारण गुरु को भजन ही करने देता है, वे दोनों ही अयोग्य हैं ।
(क्रमशः)