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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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३०. ज्ञानी कौ अंग ५/८
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बोलत ही अनबोलता, मिलता ही अनमेल ।
सोवत ही अनसोवता, सुन्दर ऐसा खेल ॥५॥
ज्ञान के इस अलौकिक प्रभाव से उस ज्ञानी की ऐसी उच्च स्थिति हो जाती है कि उस की भाषण, मिलन, शयन आदि सभी क्रियाएँ लोक के प्रति उपेक्षा ही प्रकट करती रहती हैं ॥५॥
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बैठैं तैं बैठा नहीं, ऊठत उठ्या न मांनि ।
चलतैं सो चालै नहीं, सुन्दर ज्ञानी जांनि ॥६॥
इसी कारण, सांसारिक जन भी उस ज्ञानी के बैठने को साधारण 'बैठना' नहीं मानते । नहीं उसके खड़े होने को सामान्य 'खड़ा होना' मानने को तय्यार होते हैं । और न उस की चलनक्रिया को ही लौकिक 'चलन क्रिया' मानने की भूल करते हैं ॥६॥
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देत कछू नहिं देत है, लेत कछू नहीं लेइ ।
यह सब जानै स्वप्न करि, सुन्दर ज्ञानी सेइ ॥७॥
उस ज्ञानी के दान में कोई मोह नहीं होता, न ग्रहण(लेना) में कोई लोभ ही होता है । वह तो इन ‘दान’ एवं ‘ग्रहण’ – दोनों ही क्रियाओं को स्वप्न के समान(मिथ्या) ही समझता है । इसी लिये(यथार्थज्ञ होने के कारण ही) ऐसे साधक को ‘ज्ञानी’ मानना चाहिये ॥७॥
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काज अकाज भलौ बुरौ, भेदाभेद न कोइ ।
सुन्दर ज्ञानी ज्ञानमय, देह-क्रिया सब होइ ॥८॥
ऐसे ज्ञानवान् साधक की दृष्टि में सभी लौकिक कर्तव्य या अकर्तव्य, शुभ या अशुभ क्रियाओं में कोई भेद या अभेद नहीं होता; क्योंकि वह इन सब को मिथ्या ही मानता है । उस के मत में ये सब क्रियाएँ देह से होती हैं अतः इन का जीवात्मा से क्या सम्बन्ध माना जा सकता है ! ॥८॥
(क्रमशः)























