सोमवार, 20 अप्रैल 2026

२३. स्वरूप विस्मरण को अंग २५/२८

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२३. स्वरूप विस्मरण को अंग २५/२८
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विप्र ह्वै रह्यौ शूद्र सौ, भूलि गयौ ब्रह्मत्व । 
सुन्दर ईश्वर आपही, मांनि लियौ जीवत्व ॥२५॥
आत्मा के उस आचरण से ऐसा ज्ञात होता है कि मानो किसी ब्राह्मण ने अपना ब्राह्मणत्व भुला कर शूद्रत्व ग्रहण कर लिया हो । इसी प्रकार यह आत्मा भी अपना ब्रह्मत्व भूल गया है । इसने भी अपना ईश्वरत्व त्याग कर जीवत्व ग्रहण कर लिया है ॥२५॥
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राजा सोयौ सेज परि, भयौ स्वप्न मंहिं रंक । 
सुन्दर भूल्यौ आप कौं, देह लगाई पंक ॥२६॥
जैसे किसी राजा को, रात्रि में शय्या पर सोते हुए, स्वप्न में अपना दरिद्र रूप दिखायी दे जाय । वैसे ही इस आत्मा ने अपने पर देह का त्रिगुणात्मक पङ्क(कीचड़) लगा लिया है ॥२६॥
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ज्यौं नर बहुत स्वरूप है, भ्रम तें कहै कुरूप । 
सुन्दर भूलौ आपुकौ, आतम तत्व अनूप ॥२७॥
जैसे किसी रूपवान् मनुष्य को अपने कुरूप होने का भ्रम हो जाय; उसी प्रकार इस अनुपम आत्मतत्त्व को भी भ्रम हो गया है ॥२७॥
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बनिया मूंधौ ह्वै रह्यौ, ढूंगै फेर्यौ हाथ । 
सुन्दर ऐसौ भ्रम भयौ, मेरै तौ नहिं माथ ॥२८॥ 
जैसे किसी ओंधे लेटे हुए बणिये ने अपने नितम्बों(चूतड़ों = ढूंगों) पर हाथ फेरा तो उसे ज्ञात हुआ कि यह तो नितम्ब हैं, मेरा शिर(माथा) नहीं है, तब उसको भ्रम हो गया कि अरे मेरा शिर नहीं है । यही दशा अब इस आत्मा की है ॥२८॥
(क्रमशः)  

बिचालै अंतरौ रे

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*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*पास पीव, परदेश है रे, जब लग प्रकटै नांहि ।*
*बिन देखे दुख पाइये, यहु सालै मन मांहि ॥*
*कहा करूँ कैसे मिले रे, तलफै मेरा जीव ।*
*दादू आतुर विरहनी, कारण अपने पीव ॥*
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विरह ॥
बिचालै अंतरौ रे, हरि हम भागौ नाहिं ।
को जाणैं कदि भाजिसी, म्हारौ पछितावो मन माहिं ॥टेक॥
आडा डूंगर बन घणाँ, नदियाँ बहै अनंत ।
सो पंखड़ियाँ पंजर नहीं, हौं मिलि मिलि आऊँ नित्त ॥
चरणाँ पाखैं चालिबौ रे, धरती पाखैं बाट ।
परबत पाखैं लंघणाँ, बिषमी औघट घाट ॥
जाताँ जाताँ ध्यौंहड़ा, म्हारै मनि पछितावौ होइ ।
जीवत मेलो हे सषी, मुवाँ न मिलसी कोइ ॥
हरि का दर्सन कारिण हे सषी, म्हारा नैंन रह्या जल पूरि ।
सो साजन अलगा हुवा, भ्वैं भारी घर दूरि ॥
पाती प्यारा पिव की, हुँ क्युँ बाँचूँ कर लेइ ।
बिरह महाघण ऊमट्यौ, म्हारा नैंण न बाँचण देइ ॥
बटाऊ उहिं बाट का, म्हारौ संदेसौ तिहि हाथि ।
आऊँली नांहीं रहूँ, काहु साधु जन के साथि ॥
ज्युँ बन कै कारणि हस्ती झूरै, चकवी पैली पार ।
यौं बषनां झूरै नाम कौं, ज्युं उलिगाणा की नारि ॥९५॥
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हरि और मेरे बीच में विद्यमान अन्तर(दूरी) अभी तक समाप्त नहीं हुआ है कौन जाने, यह अंतर = दूरी कब भागेगी । मेरे मन में तो बस इसी बात को लेकर नाना प्रकार की ऊहापोह होती रहती है । (पछितावौ = पश्चाताप का वाचक न होकर असमंजस = ऊहापोह की स्थिति का वाचक है ।) मेरे और परमात्मा के बीच दूरी होने के कारण = प्रतिबंधक अग्रांकित रूप से हैं ।
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सबसे बड़ा प्रतिबंधक अहंकार रूपी पर्वत है तथा मन की नाना वृत्तियों रूपी बीहड़ जंगल है और पाँच कर्मेन्द्रिय, पाँच ज्ञानेन्द्रिय तथा एक उभयात्मक मन रूपी इंद्रियों की नाना भोगों में आसक्ति ही नाना नदियों का बहना है । इन दुर्लघ्यों को लांघना शक्य नहीं जानकर मैंने सोचा कि मैं विवेक-विराग रूपी पंख लगाकर उड़कर प्रियतम से मिल लूँ किन्तु मेरे पंजर = शरीर में वैराग्य और विवेक रूपी पंख भी नहीं हैं कि मैं उड़कर प्रतिदिन प्रियतम से मिल कर आ जाऊँ ।
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धरती पर बिना राजमार्ग, पगडंडी के चलना, उस पर भी बिना पैरों के चलना, फिर दुर्गम पहाड़ों को बिना रास्ते व बिना पैरों के लांघना अत्यन्त ही ऊबड़ खाबड़ = बेतरतीब तथा विषमी =कष्टदायक है । दिन पर दिन जाते जा रहे हैं जिसके कारण मेरे मन में भारी असमंजस पड़ गया है कि जीते जी मेरा प्रियतम से मेल होगा अथवा नहीं । क्योंकि मरने के पश्चात् तो उससे मिलना संभव नहीं है, वह मिलेगा ही नहीं ।
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(यहाँ जीवन्मुक्ति की बात कही गई है) हे सखी ! प्रियतम हरि के दर्शन नहीं मिलने के कारण मेरे दोनों नेत्र रो-रो कर जल से भर गये हैं और मेरा वह प्रियतम मेरे से दूर परदेश में है । यदि तुम कहो कि मैं ही उसके घर चली जाऊँ तो हे सषी ! इसमें भी मेरी मजबूरी है क्योंकि भ्वैं-भूमि बहुत लम्बी-चौड़ी है जिसमें उसका घर बहुत दूरी पर बना हुआ है । मेरे हृदय में विरह रूपी महाघन अनवरत उमड़ता रहता है, बरसता रहता है जिससे मेरे नेत्रों से अजस्त्र अश्रुधारा गिरती रहती है जो प्रियतम की पत्रिका को बाँचने ही नहीं देती है ...
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(नेत्रों में तो विरह का जल भरा रहता है, फिर अक्षरों को कौन पढ़े । अथवा यदि बलपूर्वक अश्रुयुक्त आंखों से प्रियतम के पत्र को पढ़ने का प्रयत्न भी करूँ तो अश्रु पत्र पर गिरकर अक्षरों को मिटा देते हैं जो मुझे सह्य नहीं है क्योंकि प्रियतम का पत्र भी प्रियतम के समान ही है जिसे मिटाना मुझे अभीष्ट नहीं हैं । अतः प्यारे प्रियतम की चिट्ठी हाथ में लेकर कैसे बाँच सकती हूँ । )
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जिस स्थान पर मेरा प्यारा प्रियतम रहता है, उसी स्थान को जाने वाले राहगीर(गुरुमहाराज, साधु संत) के हाथों मैंने मेरा संदेशा प्रियतम को भेज दिया है कि हे प्रियतम ! तू कहीं भी किसी भी रूप में छिपकर मुझसे दूर हो जा किन्तु मैं किसी साधु = सज्जन पुरुष के साथ तेरे पास अवश्य आऊंगी (पहले के जमाने में औरतें अकेली यात्राएँ नहीं करती थीं । अत आपातकाल में वे ऐसे सज्जन पुरुषों के साथ यात्राएँ करती थीं जिनके साथ उनके शील भंग होने की संभावना बिलकुल नहीं रहती थी । यहाँ पर साधु महात्मा ही सज्जन पुरुष हैं ।)
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बषनांजी कहते हैं मैं रामजी को प्राप्त करने के लिये ठीक उसी प्रकार विरह निमग्न हूँ जिस प्रकार परदेशी(उलिगाणा) की पत्नी पति के लिये, जंगल से हटा राजप्रसादों की कैद में बंद हाथी बन के लिये तथा चकवी-चकवे के लिये रात भर दूसरी पार = तीर पर बैठी-बैठी मिलने की राह देखती है ॥९५॥

*९. गुरु संयोग वियोग माहात्म्य का अंग~६१/६४*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*९. गुरु संयोग वियोग माहात्म्य का अंग~६१/६४*
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*कबीर सोई अक्षर सोई बयन१, जण२ जू६ जूवा३ चवंति४ ।*
*कोई जु मेल्है५ केलिवणी७, अमी रसायन हुंति८ ॥६१॥*
वही अक्षर और वही वचन१ सब बोलते हैं किन्तु जो६ कोई ज्ञानी जन२ उनमें होने वाली८ ज्ञानामृत रसायन को टपकाता४ है वह दूसरा३ ही होता है और कोई विरला साधक ही उसे अपनी विचार-शक्ति७ से हृदय में धारण५ करता है । इसमें कबीरजी के वचन से अपना विचार प्रमाणिक है यह बताया है ।
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*दादू कहँ आशिक१ अल्लाह के, मारे अपने हाथ ।*
*कहँ आलम२ औजूद३ सौं, कहैं जबाँ४ की बात ॥६२॥*
जो अपने साधन रूप हाथों से निजी इन्द्रिय, मन, देहाध्यास आदि पर विजय प्राप्त की है, ऐसे प्रभु के प्रेमी१ गुरु कहाँ, और जो सांसारिक२ भोगों में आसक्त देहाध्यास३ से बँधे हुये हैं, केवल मुख से४ ज्ञान की बातें करते हैं वे कहाँ, अर्थात सच्चे गुरु के संयोग से ही जीव का कल्याण होता है, झूठे गुरु के संयोग से नहीं ।
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देवे किरका१ दरदका, टूटा जोड़े तार ।
दादू साँधे२ सुरति को, सो गुरु पीर३ हमार ॥६३॥
जब से तू भगवद् विमुख हुआ है, तब से दु:ख ही दु:ख पा रहा है ऐसा उपदेश करके भगवद् - विरह दु:ख का कण१ प्रदान करे और अज्ञान वश विषयों में आसक्त होने से जो तार टूट गया है, उसे जोड़ दे अर्थात प्राणी को भजन में लगा दे । वृत्ति भंग के कारण-प्रमाण, विकल्प, विप्पर्य, निद्रा, स्मृति से वृत्ति को बचाकर आत्म-स्वरूप में जोड़२ दे । उक्त लक्षणों से युक्त, सिद्ध३ सन्त है, वही हमारा गुरु है । ६२-६३ में गुरुजी के विचारों द्वारा अपना विचार प्रमाणिक सिद्ध किया है ।
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*साँचे सद्गुरु की कथा, जैसा दीपक राग ।*
*रज्जब वाणी स्वर सुनत, जड़ दिल दीपक जाग ॥६४॥*
जैसे दीपक राग होता है, वैसे ही सच्चे सद्गुरु की कथा होती है । दीपक राग को यर्थात रूप से गाने वाला राग-सिद्ध गायक जब दीपक राग गाता है तब उसके मुख से दीपक राग के स्वर निकलते ही दूर पड़ा जड़ दीपक बिना ही अग्नि के अपने-आप प्रज्वलित हो जाता है । वैसे ही सच्चे सद्गुरु के मुख से निकली हुई वाणी को सुनने से अज्ञानी के हृदय में भी ज्ञान-दीपक जग जाता है ।
इति श्री रज्जब गिरार्थ प्रकाशिका सहित “९. गुरु संयोग वियोग माहात्म्य” समाप्त ॥
(क्रमशः)

रविवार, 19 अप्रैल 2026

२३. स्वरूप विस्मरण को अंग २१/२४

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२३. स्वरूप विस्मरण को अंग २१/२४
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सुन्दर चेतनि आतमा, जड सौं कियौ सनेह । 
देह खेह सौं मिलि रह्यौ, रतन अमोलक येह ॥२१॥
श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - इस चेतन आत्मा ने जड शरीर में अध्यास कर लिया; परन्तु समय आने पर वह देह तो धूल में मिल गया, पर यह आत्मा चेतन रूप होने से अमूल्य रत्न के समान यथावस्थित रह गया ॥२१॥
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दौरि दौरि जड देह कौं, आपुहि पकरत आइ । 
सुन्दर पेच पर्यौ कठिन, संक नहीं सुरझाइ ॥२२॥
यह मुग्ध(अज्ञानावृत्त) आत्मा बार बार दौड़ कर स्वयं ही इस देह में आसक्त होकर इसे पकड़ने का प्रयास करता है । यह उसके सम्मुख विशेष समस्या उपस्थित हो गयी, जिसे यह अध्यास के कारण सुलझा नहीं पा रहा है ॥२२॥
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सूवा पकरि नली रह्यौ, वह कहुं पकर्यौ नांहि । 
ऐसैं सुन्दर आपु सौं, पर्यौ पींजरा मांहि ॥२३॥
कोई शुक(तोता) स्वयं नली से चिपका हुआ है, उसको किसी ने नहीं पकड़ रखा है; इसी प्रकार वह चेतन आत्मा भी इस देह में स्वयं अध्यस्त है । इस(अध्यास) के परिणामस्वरूप यह शुक रूप आत्मा संसाररूप पिंजरे में फंसा हुआ है ॥२३॥
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ज्यौं गुंजनि को ढेर करि, मरकट मांनै आगि । 
ऐसैं सुन्दर आपही, रह्यौ देह सौं लागि ॥२४॥
जैसे कोई मूढ वानर, वर्ण में समानता के कारण, गुञ्जाओं को अग्नि का कण मान कर उनको एकत्र कर मुख से फूंक मार कर प्रज्वलित करने का व्यर्थ प्रयास करता है; इसी प्रकार यह आत्मा भी देह के साथ आसक्त होकर मूर्खता ही कर रहा है ॥२४॥
(क्रमशः) 

हर रस महगै मोलि लियौ रे

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*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*दादू सचु बिन सांई ना मिलै, भावै भेष बनाइ ।*
*भावै करवत उर्ध्वमुख, भावै तीरथ जाइ ॥*
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*भ्रमविध्वंश पूर्वक भक्तिमहिमा ॥*
साषी लापचारी की ॥
हरि रस महगौ मोलि को, बषनां लियौ न जाइ  ।
तन मन जोबन सीस दे, सोई पीवौ आइ ॥१ 
(१ . इस साषी का अर्थ “सूरातन कौ अंग” में देखें ।)
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पद ॥
हर रस महगै मोलि लियौ रे ।
तन मन धन जोबन सिर साटै, साधाँ आघ कियौ रे ॥टेक॥
दूधाधारी पवन अहारी, खणि खाइ कंद जियौ रे ।
राम रसाइण लियौ न जाई, बिड़वौ रस्स पियौ रे ॥
लुंचित मुंचित मोनि जटाधर, हीवालै धसियौ रे ।
परमेसुर नैं जाणैं नांहीं, बनखँडि कौ बसियौ रे ॥
करवत घाती झंपापाती, लेकरि मुवौ हियौ रे ।
जोग जग्गि जप तप के बदलै, देखण हू न दियौ रे ॥
हैंवर गैंवर भोमि कुलातन, येतौ दैन कह्यौ रे ।
याकै बदलै राम रसाइण, मासौ हू न लहयौ रे ॥   
दिली दलाल दरीबै मिलियौ, चोखौ बणिज कियौ रे । 
गुर परसादि साध की संगति, बषनां मांगि पियौ रे ॥९४॥ 
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साटै = बदले में ।आघ = सम्मान । बिड़वौ = कड़वा, निम्नस्तरीय । लुंचित = बालों का उखाड़ने वाले जैनी साधू । मुंचित = मूंड मुंड़ाने वाले संन्यासी । मोनि = न बोलने वाले । 
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करवतघाती =  अंग्रेजों के राज के पहले काशी में एक बहुत ही गहरा कुवा था । उसके मुँह पर एक विशाल आरा हुआ था । बहुत से लोग “जीवनमुकति हेतु जनु कासी”, “कासी मरत परमपद लहही” ‘काशी मरणान्मुक्ति’ काशी में मरने से मुकति हो जाती है, विधिवाक्य पर विश्वास करके बहुत ऊँची दीवार से उस आरे पर कूद पड़ते थे जिससे उनका शरीर कटकर उस अंध कूप में गिर जाता था । इसे ही करवत-कासी के नाम से जाना जाता है । अंग्रेजों ने इस प्रथा को बंद करवा दिया ।
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झंपापाती = पहाड़ से पात होना = लुड़ककर, गिरकर मरना । हैंवर = हय = घोड़ा । गँवर = गय = हाथी । कुलातन = शरीर की वलि । दिली दलाल = परमात्मा से मिलाने वाले गुरु । दिल में निवास करने वाला परमात्मा दिली है । दरीबै = बाजार में, बिना प्रयत्न के, अनायास ही गुरुमहाराज मिल गए । साधना रूपी विणज = व्यापार प्रभूत मात्रा में किया । 
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बषनांजी अपनी स्थिति स्पष्ट करते हुए कहते हैं, मैंने परात्पर-परब्रह्म-हरि रूपी रसायन बहुत मूल्य देकर = बहुत कुछ त्यागकर(परमात्मा को प्राप्त करने के लिये ब्रह्मा के लोक के सुख ही नहीं उनको प्राप्त करने की स्पृहा तक त्यागनी पड़ती है । यह त्याग त्यागने के पुर्व तक बड़ा लगता है किन्तु जब परमात्मा का साक्षात्कार हो जाता है तब यह अत्यंत तुच्छ  लगता है ।) प्राप्त किया है । 
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मैंने तन, मन, धन, यौवन तथा अपने शिर = आपा = अहंकार के बदले ,में इस रसायन को प्राप्त किया है । जिसकी(इस त्याग की) साधू संतों ने बहुत ही प्रशंसा की है । अधिकांश साधक या तो दूध का आहार करके या निराहार रहते हुए मात्र पवन का आहार करके या कंद-मूल खोदकर खाते हुए परमात्मा को प्राप्त करने के प्रयत्न कटे हैं । उने राम-नाम स्मरण रूपी रसायन तो किया नहीं जाता उल्टे वे उक्त निम्नकोटि के उपाय रूपी कड़वे रसायनों को पीते रहते हैं । 
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बहुत से साधक अपने शरीर के बालों को उखाड़कर फैंकते हैं । बहुत से मोनी मूंड को मुंडवाते हैं । कुछ मोनी मौन धारण करने रूपी साधना करते हैं तो कुछ बालों को बढ़ाकर जटाधारी बन साधना करते हैं । कुछ साधक ऐसे भी हैं जो हिमालय की कुन्दराओं में घुसकर एकांत में साधना करते हैं । किन्तु इन साधनाओं के बल पर वनखण्ड में निवास करने वाले ये परमात्मा का साक्षात्कार नहीं कर पाते हैं । 
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बहुत से लोग काशी में मरने से मुक्ति होती है की बात को ध्यान में रखकर आरे पर गिरकर घात करते हैं तथा कुछ पर्वत से गिरकर अपना प्राणांत करते हैं । कुछ मोनी योग, यज्ञ, जप-तप के बदले में परमात्मा को प्राप्त करने का प्रयत्न करते हैं किन्तु उनको परमात्मा ने अपना दर्शन देखने मात्र को भी नहीं दिया उनके हृदय में हमेशा-हमेशा के लिये विराजित हो जाना तो आगे की बात है । 
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कुछ लोग परमात्मा के सामने हठी, घोड़े, भूमि आदि का दान देने व् नरवलि आदि करने की बात निवेदन करते हैं किन्तु इनके बदले में वे मासा मात्र = तुच्छातितुच्छ मात्रा में भी राम-रसायन की प्राप्ति नहीं कर पाते हैं । (मासा = पुराने समय में चलने वाले माप का नाम ।  तौला, माशा, रत्ती आदि) 
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मुझ बषनां को परमात्मा से मिलाने वाले दलाल = गुरु दरीबै = बाजार में = अनायास ही मिल गये जिन्होंने मुझे राम-रसायन के व्यापर करने की युक्ति रूपी साधना बता दी जिससे मैंने अच्छी मात्रा में व्यापार किया = राम नाम की साधना करी । परिणामस्वरूप मैं बषनां ने गुरुमहाराज के प्रसाद(कृपा) से और साधुओं की संगति से राम रसायन को मांग-मांगकर खूब पिया है । साधना कर करके राम रसायन का खूब रसास्वादन किया है ॥९४॥ 

*९. गुरु संयोग वियोग माहात्म्य का अंग~५७/६०*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*९. गुरु संयोग वियोग माहात्म्य का अंग~५७/६०*
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*कह्या सु आया शिष कने१, अकह रह्या गुरु माँहिं ।*
*रज्जब वह कहिं और है, जो शब्द समावे नाँहिं ॥५७॥*
जो गुरु द्वारा शब्दों से कहा गया, वह शब्दार्थ रूप ज्ञान तो शिष्य के पास२ आ गया और जो न कहा गया वह गुरु में ही रहा, किन्तु जो ब्रह्म शब्दों में नहीं समाता वह तो शब्दार्थो से भिन्न कहीं और ही स्थिति में है अर्थात शब्द सदभाव से रहित निर्विकल्पावस्था में ही उसका आत्मरूप से साक्षात्कार होता है ।
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*गुरु वकील निज ब्रह्म कने१, शब्द रहै संसार ।*
*बहु बचनों बहुते मिलैं, विरला सद्गुरु लार ॥५८॥*
ब्रह्म रूप न्यायाधीश के पास१ जीवात्मा का सद्गुरु रूप निजी वकील रहता है, और शब्द तो संसार में रहते हैं, विविध प्रकार के प्रवचनों रूप शब्दों द्वारा तो ब्रह्म से बहुत मिलते हैं अर्थात शब्दों द्वारा तो ब्रह्मज्ञानी बहुत बनते हैं, किन्तु सद्गुरु के बताये हुये साधनों द्वारा सद्गुरु के साथ लगकर कोई विरला साधक ही ब्रह्म का साक्षात्कार करता है । जैसे वकील न्यायाधीश के पास अपने मुवक्कल का समर्थन करता है, वैसे ही सद्गुरु अपने शिष्य का ब्रह्म के पास समर्थन करता है अर्थात संशय विपर्य्य से रहित अद्वैत स्थिति में लाता है ।
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*ओंकार आतमा क्षीरं१, ताहि जमाया मथै घृत वीरं२ ।*
*वाणी तक्र३ जुदे जीव जाणी, उलटि मिले जाँवण पय४ पाणी ॥५९॥*
दूध१ को जमाकर मन्थन करते हैं तब घृत छाछ३ से अलग हो जाता है और वह छाछ का जल जामन के रूप में पुन: दूध४ में मिल जाता है किन्तु घृत नहीं मिलता । हे भाई२ ! वैसे ही ओंकार के चिन्तन द्वारा जीवात्मा का अन्त:करण स्थिर होता है, फिर स्थिर बुद्धि के द्वारा विचार किया जाता है तब अपरोक्ष ज्ञान होता है, अपरोक्ष ज्ञान होने पर जीव ओंकारादि शब्द रूप वाणी को और अपने स्वरूप में भिन्न जानकर स्व-स्वरूप ब्रह्म में ही स्थित होता है, फिर संसार में नहीं आता और शब्द पुन: संसार में मिल जाते हैं ।
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*सीखी साखी विसाह्या१ बरा२, नाथ बोले खोटा३ न खरा४ ॥६०॥*
६०-६३ में अपने कथित विचारों पर प्रमाण दे रहे हैं - संतों की साखी तो सीखली और और लोगों को सुनाकर उससे बड़ा२ मोल लिया१ अर्थात उसका फल भोग ही प्राप्त किया । कारण - गुरु बिना अपने-आप सीखे हुवे साखी शब्दों से ब्रह्म-बोध नहीं होता, यह हम मिथ्या३ नहीं बोलते, सत्य४ ही कहते हैं ।
६० का पद्य गोरक्ष नाथादि में से किसी श्रेष्ठ नाथ संत का ज्ञात होता है ।
(क्रमशः)

शनिवार, 18 अप्रैल 2026

उपसंहार ~

*#daduji*
*॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥*
*॥ दादूराम~सत्यराम ॥*
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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अध्याय १६, आचार्य पर्व -
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उपसंहार ~  
दोहा- 
दादू पंथ आचार्यों के, लिख करके गुण ग्राम ।
‘आचार्यपर्व’ पूरण करत, ‘नारायण’ सुख धाम ॥१॥
प्राप्त हुये जो जो मुझे, उन्हें सहित अनुराग ।
अंकित इसमें कर दिये, पढें सुजन बडे भाग ॥२॥
ब्रह्म रुप आचार्यों की, गुण गाथा सु महान । 
संपूरण किमि लिख सके, ‘नारायण’ अनजान ॥३॥
अत: कृपा मुझ पर करें, ब्रह्म रुप आचार्य । 
आदर पावे पंथ में, मुझ बालक का कार्य ॥४॥
बाल विनय यह मानकर, करैं अनुग्रह आप ।
जिससे पढ कर पर्व यह, होंय मनुज निष्पाप ॥५॥
इति श्री १६ वाँ अध्याय समाप्त: १६ ।  
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महात्मय ~
चित्त लगाकर पढेगा, जो आचार्य पर्व । 
सुख रु शांति सो पायगा, क्षोभ हटा कर सर्व ॥१॥ 
दोष दृष्टि को त्याग कर, प्रीति सहित जो कोउ । 
आचार्य पर्व पढेगा, भक्ति पायगा सोउ ॥२॥
पढे पर्व आचार्य को, कोउ कामना लेय ।  
दीर्घ काल तक प्रति दिवस, ईश्‍वर उसको देय ॥३॥
जगदीश्‍वर अरु संत का, चरित समहिं फल देत ।  
अत: पढे इस पर्व को, ले मानव अभिप्रेत ॥४॥ 
आचार्य पर्व पढे से, सु कार्य होंगे पूर्ण ।  
अरु कु भावना हृदय से, निकल जायगी तूर्ण ॥५॥
आचार्य पर्व पढे से, ईश्‍वर में दॄढ प्रेम । 
होगा निश्‍चय अंत में, पावें पाठक क्षेम ॥६॥
परब्रह्म परात्परं, सो मम देव निरंजनम् । 
निराकार निर्मलं, तस्य दादू, वन्दनम् ॥
इति श्री दादूपंथ परिचय का आचार्य पर्व १ समाप्त: ।

२३. स्वरूप विस्मरण को अंग १७/२०

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२३. स्वरूप विस्मरण को अंग १७/२०
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जे गुन उपजै देह कौं, सुख दुख बहु संताप । 
सुन्दर ऐसौ भ्रम भयौ, ते सब मांनै आप ॥१७॥
सुख दुःख आदि सन्तापदायक कष्ट देह को होते हैं; यह जीवात्मा भ्रम में पड़ कर उन सब कष्टों को अपना मान बैठा है ॥१७॥
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शीत उष्ण क्षुधा तृषा, मोकौं लागी आइ । 
सुन्दर या भ्रम की नदी, ताही मैं बहि जाइ ॥१८॥
वह समझता है कि ये शीत उष्ण, क्षुधा तृषा(भूख प्यास) मुझ(आत्मा) को लग रहे हैं । यह तो भ्रम की नदी है, जिस में आज यह जीवात्मा बहा जा रहा है ॥१८॥
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अंध बधिर गूंगौ भयौ, मेरौ कौंन हवाल । 
सुन्दर ऐसौ मांनि करि, बहुत फिरै बेहाल ॥१९॥
वह इस भ्रमनदी में बहता हुआ यही सोच रहा है कि अब मेरी क्या गति होगी ! ऐसा सोचते हुए उस को न इस नदी के पार जाने का कोई उपाय सूझ(दीख) रहा है, न उसे दूसरों(गुरु आदि) का हितोपदेश ही सुनायी दे रहा है, और न वह अपनी व्यथा कथा ही किसी अन्य हितचिन्तक को कह पा रहा है । इस प्रकार वह अन्धा, बहरा एवं गूंगा होकर अपने लिये व्यथित हो रहा है ॥१९॥
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मिलि करि या जड देह सौं, रह्यौ तिसौ ही होइ । 
सुन्दर भूलौ आपु कौं, सुधि बुधि रही न कोइ ॥२०॥
यह जीवात्मा इस जडप्रकृतिक देह से सम्पृक्त होकर स्वयं भी जड होकर रह गया है । इस स्थिति में इसको स्वकीय वास्तविक रूप की कोई सुध बुध(होश = चेतना) नहीं रह गयी है ॥२०॥
(क्रमशः)

वा रस रीति न जाणैं कोई

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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*फूटी काया जाजरी, नव ठाहर काणी ।*
*तामें दादू क्यों रहै, जीव सरीषा पाणी ॥*
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राग मारू ॥५॥ भ्रमविध्वंश ॥
वा रस रीति न जाणैं कोई, जिहि बिधि हरि की सेवा होई ॥टेक॥
षटक्रम ध्रम ब्रत पूजा पाणी । तामैं पिरथी सकल भुलाणी ॥
जल भरि कुंभ जहाँ थैं ल्याये । मच्छ कच्छ ता भीतरि ब्याये ॥
अंग पखाल्या सौंज षट्याई । मैल रह्या तहाँ खबरि न पाई ॥
चौका चौकि ढोलि जब दीया । जिव का घात घणाँ ही कीया ॥
तुलसी तोड़ी तब जिव मूवा । सुची करी फिरि सूतिग हूवा ॥
ब्रह्म बिचालै दुबिधा होई । पाक कियाँ जिनि भींटै कोई ॥
खाइ नहीं तिहि आगै मेल्है । आतमराम अपूठा ठेलै ॥
ब्रह्म बिरोध्या पाथर पूजै । च्यार् यूँ फूटी तौ क्या सूझै ॥
अपणैं अपणैं चौकै चाढ्या । घर का माणस बाहरि काढ्या ।
पीछैं पांडे कार बुझाणैं । चाड हुई तब घर मैं आणैं ॥
वा रस रीति कोइ यक जाणैं । जिहिं सेवा साहिब भल मानैं ॥
कनक कलस हरि जल भरि लीजै । तिरबैणी तहाँ मंजन कीजै ॥
बुझणि न जाइ घटै नहिं बाढै । निरमल तिलक तहाँ लै काढै ॥
चित चौका दे सेवा साजै । तिहि घर केवल राम बिराजै ॥
संख सबद भरि भरि हरि दाखै । इहिं बिधि चरणाँ अंम्रत चाखै ।
लोभ मोह मद मच्छर बाढै । पहली बार इन्हाँ बिचि काढै ॥
भाव भगति करि भोग लगावै । सो परसाद सही हरि पावै ।
बषनां बात जवै ह्वै लेखै । पूरणब्रह्म सकल मैं देखै ॥९३॥
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षटकर्म = हठयोगानुसारी छः क्रियाएँ नैति, धौती आदि अथवा ब्राह्मणों द्वारा पालनीय षटकर्म पढ़ना-पढ़ाना, दान देना, दान लेना आदि । ध्रम = दान-पुण्य । ब्रत = उपवास । पाणी = तीर्थस्थान । सौंज = सामगी । षट्याई = विन्यास = शरीर पर नाना तरह के कपड़े पहने तथा केशादि को सँवारा ।
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ढोलि = जब चौका लगाया, कच्चे घरों में गोबर-मिट्टी से, भोजन बनाने के पूर्व चौके को लीपा जाता था । पीली मिट्टी से चौका लगाते हुए मैंने बचपन में मेरी दादी माँ व माँ को पक्की रसोईघर में भी देखा है । बिचालै = बीच में ॥ भींटै = स्पर्श करे । अपूठा ठेलै = उल्टा ही भगा देते हैं । बिरोध्या = विरोध करने वाले । च्यार् यूँ = दो आँखें प्रत्यक्ष तथा दो अंतःकरण की विवेक एवं विचार ।
“हाकम नैं संग्राम कहै तू आंधौ मति होइ यार ।
दो दो नेतर सबनि कैं तेरै चहिये चार ॥
तेरैं चहिये चार दोइ देखण कूँ बारै ।
दोइ हिया कै मांहि जकाँ सूँ न्याव निहारै ॥
जस अपजस रहसि अठै समय बार दिन चार ।
हाकम नैं संग्राम कहै तू आंधौ मति होइ यार ॥”
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संग्रामदासजी के कुंडलिया; सम्पादक : ब्रजेन्द्रकुमार सिंहल । सूझै = दीखै । चाढ्या = भोजन बनाना प्रारम्भ किया । कार बुझाणैं = सीमा = प्रतिबन्ध हटाता है । चाड़ = बुलाने की आवाज । कनक कलस = हृदय । हरिजल = परमात्मा के प्रति अनन्य अनुराग । मंजन = स्नान । तिरवेणी = इड़ा, पिंगला और सुषुम्ना का संगम ।
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बुझणि न जाइ = अनन्य अनुराग समाप्त न हो । घटै नहिं = मंद भी न पड़े । बाढै = अहर्निश बढ़े । चित चौका = चित्त में से समस्त कलुषों को निकालना रूपी चौका लगावे । दाखै = बोलै = स्मरण करे । बाढै = काट दे, निकालकर बाहर कर दे । लेखै = उक्त बातें संपादित सससहों, आचरित हों ।
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जिस विधि से परात्पर-परब्रह्म-परमात्मा की सेवा होती है उस रस = प्रेममयी भक्ति की रीति को कोई नहीं जानता । पृथिवी की सारी ही जनता या तो नेति-धोती आदि षट्कर्मों को या पुण्य या व्रत-उपवासादि या मूर्ति-पूजा या तीर्थादि में स्नानादि के करने के ही भ्रमों में उलझी पड़ी है । जिन तीर्थों में से कुंभ में भरकर जल लाये हैं क्या वह पवित्र है ? अरे ! उसमें तो कछुवे और मगरमच्छ प्रजनन करते हैं, मल-मूत्र करते हैं और बच्चे पैदा करते हैं । उन्हीं तीर्थों में जाकर शरीर को नहलाते हैं, फिर उसका(शरीर का) तिलकादि लगाकर, केश विन्यास करके श्रृंगार करते हैं किन्तु जिस मन में मैल = पापादि रहते हैं उसके बारे में तनिक भी विचार नहीं करते हैं ।
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जब चौके को पवित्र करने केलिए गोबर-मिट्टी से लीपते-पोतते हिं तब बहुत से छोटे-छोटे जीवों को मारने की हत्या करते हैं । भोग लगाने के लिये जब तुलसी तोड़ते हैं तब भी जीव करते हैं । जब उस तुलसी को जल से धोकर पवित्र करते हैं, तब भी जीव मरते हैं । जब उस तुलसी को जल से धोकर पवित्र करते हैं, तब भी जीव हिंसा होती है(सूतिग = अस्पृश्यता = हिंसा) ब्रह्म = भगवान् और भक्त के बीच में दूरी(दुविधा) हो जाती है क्योंकि पुजारी कहता है, अब आप इसके हाथ तक मत लगाओ क्योंकि इसे पवित्र कर लिया गया है ।
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जो परमात्मा की मूर्ति भोजन खाती नहीं उसके आगे तो भोग धरते हैं जबकि जिस भिखारी के शरीर में आत्मा रूपी परमात्मा विराजमान है उसे बिना भोजन कराये ही उल्टा भेज देते । परात्पर-परब्रह्म-परमात्मा का विरोध करते हैं जबकि पत्थर को भगवान् मानकर पूजते हैं । क्योंकि इन मूर्खों की चारों ही आँखें फूट गई होती हैं । इन्हें सत्यानृत क भेद ही मालूम नहीं पड़ता ।
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अपने-अपने चौकों में जब भोजन बनाने की तैयारी की जाती है तब उस घर में से(रसोईघर में से) घर के अन्य सभी मनुष्यों को बाहर निकाल दिया जाता है । फिर पांडे(पंडित, आचारी व्यक्ति) भोजन तैयार हो जाने पर सबको आने के लिये आवाज लगाता है । अपनी कार को मिटाता है तब सब लोग घर में प्रविष्ट होते हैं ।
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वस्तुतः परमात्मा जिस सेवा विधि से प्रसन्न होता है उस अनुरागमयी रीति को कोई कोई ही जानता है ।
“मनुष्याणां सहस्त्रेषु कश्चिद्यतति सिद्धये ।
यततामपि सिद्धानां कश्चिन्मां वेत्ति तत्त्वतः ॥”
परमात्मा को प्रसन्न करने की वास्तविक सेवाविधि तो अग्रांकित प्रकार से है । हृदय रूपी कनक कलश में परमात्मनाम में अनन्य प्रीति रूपी जल भरे । फिर उस राम नाम का अखंड जप करे तथा त्रिवेणी घाट पर पहुँचकर उसमें स्नान करे = सरोवर हो जाये । ऐसा प्रयत्न करे कि यह रामनाम का स्मरण छूटे तो बिलकुल ही नहीं, कम भी न हो उल्टे दिनानुदिन बढ़ता ही जाये(प्रतिक्षणवर्धमानं, नारदभक्तिसूत्र) फिर स्नानोपरान्त वहाँ निर्मल तिलक लगावे ।
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चित्त में से सारे कलुषों को निकालने रूपी चौका लगावे और अहर्निश अनन्य अनुरागयुक्त राम-नाम का स्मरण करे । जो इस प्रकार से अपने घर रूपी घट को परमात्मा के लिये तैयार करता है उसमें निश्चय ही परमात्मा विराजमान होता है । शंख में हरि का नाम भरकर बजावे और उसी रामनाम के जप प्रभाव से स्त्रवित सुषुम्ना के अमृत जलरूपी चरणामृत का पान करे । लोभ, मोह, मद = अभिमान, मात्सर्य = चुगलखोरी को समाप्त करे ।
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सर्वप्रथम ही इन्हें अंतःकरण में न आने देने के लिये बाड़(कार = सीमा = बाड़) लगावे । भावभक्ति का भोग लगावे । इस भावभक्ति रूपी प्रसाद को ही परमात्मा ग्रहण करता है ।
“न देवो विद्यते काष्ठे न पाषाणे न मृण्मये ।
भावो हि विद्यते देवो तस्माद् भावो हि कारणं ॥”
बषनांजी कहते हैं, जब उक्त प्रकार से सारी सामग्री तैयार हो जाये = साधना हो जाये तब सचराचर में ही परमात्मा के दर्शन होना प्रारम्भ हो जाता है ॥९३॥

*९. गुरु संयोग वियोग माहात्म्य का अंग~५३/५६*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*९. गुरु संयोग वियोग माहात्म्य का अंग~५३/५६*
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*रज्जब शब्द समुद्र मधि, मत१ मुक्ता निज ठौर ।*
*सो गुरु मरजीवे बिना, आनि२ न सकई और ॥५३॥*
समुद्र में मोती अपने स्थान पर है, उसे मरजीवा बिना अन्य कोई भी नहीं ला सकता । वैसे ही शब्दों में विचार हैं किन्तु उसे गुरु बिना अन्य कोई भी नहीं निकाल सकता, गुरु ही निकाल कर शिष्यों को प्रदान करते हैं ।
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*रज्जब शाल१ ताला जङ्या, अर्थ द्रव्य धर माँहिं ।*
*सु गुरु दृष्टि कूंची बिना, हस्त सु आवे नाँहिं ॥५४॥*
शब्द रूप घर१ में अर्थ रूप धन रखकर, अज्ञान रूप ताला लगा दिया है, यह सद्गुरु की युक्ति-युक्त ज्ञान-दृष्टि रूप ताली के बिना अन्त:करण रूप हाथ में नहीं आ सकता ।
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*वायक१ बादल अर्थ जल, गुरु आज्ञा सु निकास ।*
*बिना संयोग वर्षा बिना, चेले चकहु२ निरास ॥५५॥*
बदलों में जल है किन्तु वर्षा के योग बिना खेती२ को नहीं मिलता । वैसे ही शब्दों१ में ज्ञान रूप अर्थ है, किन्तु वह गुरु आज्ञा से ही निकलता है, बिना गुरु संयोग के शिष्य शब्दों से निराश हुये - से ही रहते हैं ।
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*महापुरुष पारस परसि, पलटहिं प्राण सु धात ।*
*मिलतौं मंगल मौन में, रज्जब तहाँ न बात ॥५६॥*
पारस से लोह धातु मिलती है तब तत्काल स्वर्ण रूप में बदल जाती है । वैसे ही महापुरुष से प्राणी मिलता है तब मौन में अखण्ड शांति रूप मंगल होता है, और वहाँ ब्रह्म भिन्न सांसारिक बात नहीं होती ।
(क्रमशः)

शुक्रवार, 17 अप्रैल 2026

आचार्यों की शिष्य परंपरा ~

*#daduji*
*॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥*
*॥ दादूराम~सत्यराम ॥*
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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अध्याय १६, आचार्य पर्व -
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आचार्यों की शिष्य परंपरा ~ 
गद्दी पर बैठने वाले आचार्यों के भी कई शिष्य होते थे । उनमें से एक तो गद्दी का अधिकारी होता था । किन्तु अन्य भी शिष्य होते थे और उनके शिष्यों के भी शिष्य हो जाते थे । वे सब अपने- अपने स्थान बनाकर स्वतंत्र रहते थे । गरीबदासजी महाराज ने जीवितावस्था में गद्दी त्याग दी थी । 
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इससे उनकी शिष्य परंपरा भी चल पडी थी । मसकीनदासजी की शिष्य परंपरा गद्दी पर चलती रही किन्तु आचार्यो के एक से भिन्न शिष्यों की परंपरा भिन्न चली । इस प्रकार आचार्य गद्दी पर बैठने वाले गरीबदासोत और मसकीनदासोत और बाई जी का थांभा ये तीन थांभे खास के होने से ‘खालसा’ कहलाने लगे । 
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इन तीनों के स्थान नारायणा में ही थे । वहाँ ही बढने लगे । जब इनकी संख्या अधिक बढने लगी तब आगे चलकर उक्त तीनों ही थांभों के संत नारायणा दादूधाम से बाहर जाकर अन्य ग्रामों में भी अपने साधन धाम बनाकर भजन करने लगे । तीनों ही थांभों के आदि महात्मा दादूजी महाराज के मानस पुत्र होने से खास थे अत: अन्य थांभों के साधु संत इन तीनों को खालसा कहकर अन्य सब से इन तीनों का अधिक सम्मान करते थे । 
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इन की वृद्धि होती गई त्यों ही इनके स्थान भी बढते गये । नारायणा में भी इनके अनेक स्थान बन गये । इन में अनेक विद्वान, भजनीक, तपस्वी, त्यागी, संगीतज्ञ कथा वाचक तथा परंपरा के जानकार विशेष रुप में हुये हैं । इनका भेष-भूषा पहले कान तक टोपा तथा कपाली टोपी, चौला, और कटि वस्त्र था । किन्तु अब वैसा नहीं रहा है । टोपी के स्थान पर साफा बाँधने लगे हैं । चौले के स्थान पर कोट, कमीज और कटिवस्त्र के स्थान पर धोती बाँधी जाती है । 
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वर्तमान में भी खालसा वर्ग के अनेक स्थान अच्छी स्थिति में हैं । पहले तो इस वर्ग के स्थानों तथा संतों की संख्या बहुत अच्छी थी । इनके स्थान जयपुर, जोधपुर, बीकानेर, अलवर आदि कई राज्यों में हैं । गरीबदासजी की परंपरा का थांभायती स्थान नारायणा दादूधाम में ही है । मसकीनदासजी की परंपरा आचार्य गद्दी पर चल ही रही है । 
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बाईजी के थांभे का मुख्य हरमाडा तथा चुरु में था किन्तु चुरु का स्थान आबाद नहीं है हरमाडे का स्थान है । उक्त तीनों ही थांभों में अच्छे-अच्छे महापुरुष हुये हैं । उनका यथा प्राप्त परिचय ‘खालसा’ पर्व २ में दिया जावेगा । इस आचार्य पर्व में आचार्यों का यथा प्राप्त प्रसंग दे दिया गया है । नारायणा दादूधाम के पीठाचार्यों की गुण गरिमा का परिचय देकर अब आचार्य पर्व १ का उपसंहार किया जा रहा है ।
(क्रमशः)

२३. स्वरूप विस्मरण को अंग १३/१६

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२३. स्वरूप विस्मरण को अंग १३/१६
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मरकट मूठ न छाडई, बंध्यौ स्वाद सौं जाइ । 
सुन्दर गर मैं जेवरी, घर घर नाच्यौ आइ ॥१३॥
या जैसे कोई मूर्ख वानर, चने के लोभ में, घड़े में फंसी हुई अपनी मुट्ठी नहीं खोलता और उसके परिणामस्वरूप बाजीगर द्वारा पकड़ लिया जाता है, और वह बाजीगर इस के गले में रस्सी बांध कर ग्रामों में घर घर ले जाकर नचाता रहता है ॥१३॥ (२)
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जैसैं मदिरा पान करि, होइ रह्या उन्मत्त । 
सुन्दर ऐसैं आपु कौं, भूल्यौ आतम तत्त ॥१४॥
या जैसे कोई मद्य(शराब) पीने वाला मद्यपान के कारण उन्मत्त होकर स्व रूप को भूल जाता है, वैसे ही यह जीवात्मा भी वासनाओं के मद में उन्मत्त होकर स्व रूप को भूल गया है ॥१४॥ (३)
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ज्यौं ठगमूरी खात ही, रहै कछू नहिं बुद्धि । 
यौं सुन्दर निज रूप की, भूलि गयौ सब सुद्धि ॥१५॥
जैसे कोई उन्मादकारी औषध खाते ही किसी की बुद्धि भ्रष्ट हो जाती है, वैसे ही यह जीवात्मा भी भवजाल में फंस कर अपनी स्मृति विलुप्त कर बैठा है ॥१५॥
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जैसैं बालक शंक करि, कंपि उठै भय मांनि । 
ऐसैं सुन्दर भ्रम भयौ, देह आपु कौ जांनि ॥१६॥
जैसे कोई बालबुद्धि(मुर्ख) पुरुष अन्धकार में स्थाणु को देखकर उस में भूत का भ्रम कर भय मान बैठता है; उसी प्रकार इस जीवात्मा ने भ्रम से देह को अपना मान कर उसी में अध्यास कर लिया है ॥१६॥
(क्रमशः)

मन रे प्रीति कहैं सति सोई

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*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*दादू तो पीव पाइये, कर सांई की सेव ।*
*काया मांहि लखाइसी, घट ही भीतर देव ॥*
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*प्रेम-प्रीति ॥*
मन रे प्रीति कहैं सति सोई ।
जाकै जीवताँ सो मूवाँ पाछैं होई ॥टेक॥ 
ज्यूँ सूरै सूरातन कीयौ, तन मन त्याग्यौ लोई ।
पहली थी सो पाछै रही, मारो मार रणौही ॥
देही गइ पणि नेह न भूली, जाली बाली काटी ।
अनलहक अनलहक कहि बोली, मूवाँ पाछै माटी ॥
सरीर गयौ पणि सुरति न भूली, प्रीति सोहि सति जाणी ।
बषनां बिरहणि मरि करि पीयौ, बैरी के मुहि पाणी ॥९२॥
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इतिहास में दो ही व्यक्तियों के उदाहरण ऐसे मिलते हैं जिनके मरने के उपरान्त भी जिनके शरीर से ‘अनहलक-अनहलक’ तथा ‘राम-राम’ की ध्वनि आती रही । पहला उदाहरण मंसूर का है तथा दूसरा स्वामी रामचरण का है । 
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स्वामी रामचरण ने अपनी वाणी में कहा है “राम नाम सूँ प्रीति करि, तन मन सूँज समेत । प्राण गयाँ छूटै नहीं, ज्यूँ बेल बृक्ष कौ हेत ॥” जिस प्रकार सूख जाने पर भी बेल वृक्ष पर ही लिपटी रहती है, ऐसे ही साधक को भी रामनाम से प्रीति इस प्रकार की करनी चाहिये कि शरीर से प्राणों के निकल जाने पर भी निर्जीव शरीर भी उसी प्रकार प्रीति करता रहे जैसे जीवित अवस्था में करता था । 
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स्वामी रामचरण तथा मंसूर के सम्बन्ध में यह बात सर्वथा खरी उतरती है । बषनांजी ने उक्त पद में मंसूर का उदाहरण दिया है । आगे उन्हीं के शब्दों में पढ़िये । स्वामी रामचरणजी के बारे में विशेष जानने के लिये मेरे द्वारा लिखित ‘श्रीरामचरण-चरितामृत’ तथा सम्पादित ‘जगन्नाथ-ग्रन्थावली’ मंगाकर पढ़े । यहाँ मन = मनधारी जीव का वाचक है ।
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हे जीव ! सच्ची प्रीति उसको ही कहते हैं जो जैसी जीवित अवस्था में होती है । वैसी की वैसी ही देह में से प्राणों के निकल जाने के उपरान्त भी विद्यमान रहे । रणौही = रणारोही = युद्धरत शूरवीर जिसप्रकार अपने समस्त लोई = परिचित-अपरिचित लोगों के प्रति तन-मन से रागशून्य होकर रण में सूरातन = युद्ध करते हुए मर जाता है तब भी युद्ध करते समय उसके मुँह से जो शब्द ‘मारो-मारो’ ‘काटो-काटो’ निकलते थे । वे ही मरने के उपरान्त भी निकल रहे होते हैं । वास्तव में ऐसे लोग ही शूरवीर कहलाते हैं । 
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इसी प्रकार पार्थिव शरीर से प्राणों के निकल जाने पर भी माटी = मंसूर का मृतशरीर टुकड़े-टुकड़े करके काट देने व जला-बलाकर भस्म कर देने के उपरान्त भी पूर्व का प्रेम नहीं भूला और अनलहक-अनलहक का उच्चारण करता रहा । यद्यपि मंसूर का शरीर तो नष्ट हो गया किन्तु उसकी वृत्ति अनलहक-अनलहक का उच्चारण करती रही । वास्तव में सच्ची प्रीति करना इसी का नाम है । 
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बषनां कहता है, इतना ही नहीं जब मंसूर का शरीर की राख तक ने अनलहक की ध्वनि करना नहीं छोड़ा तब उसके बैरी बादशाह ने उस राख को नदी में प्रवाहित करा दिया और वह पानी पनिहारी के द्वारा बादशाह के घर में पहुँचकर बादशाह द्वारा पी लिया गया । बादशाह के पेट में भी मंसूर के शरीर की राख जो पानी के साथ प्रविष्ट हो गई थी अनलहक-अनलहक बोलने लगी । 
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तब बादशाह ने कहा, मेरे पेट में से कैसे अनलहक की ध्वनि आती है । तब बुद्धिमानों ने सारा रहस्य खोला जिससे बादशाह भी ‘अनलहक’ वह परमात्मा मैं ही हूँ कहने लग गया (देखें राघवदासजी का भक्तमाल) अंतिम पंक्ति का अर्थ मछली पर भी घटता है । मछली का शरीर चला जाता है किन्तु वह पानी को नहीं भूलती क्योंकि उसने ही सच्ची प्रीति के रहस्य को जाना है । 
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बषनां कहता है, पानी की विरहणी मछली ने मरकर, रंधकर तथा मारने वाले वैरी के द्वारा खा जाने के उपरान्त भी बैरी के मुख से पानी पीकर पानी के प्रति अपने अनन्य अनुराग को सिद्ध कर दिया । मछली रंधती भी पानी में ही है तथा खाने के बाद खाने वाला पीता भी पानी ही है । अतः मछली मरने पर भी पानी ही के सानिध्य में रहती है । 
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यही मछली का सच्चा प्रेम है । 
“मीन उरग दादुर कुरम इनकौ जल मैं बास । 
रामचरण पणि मीन कौ है सांचौ घर वास ॥ 
है साँचौ घर वास नीर बिछड़त तन छाड़ै । 
और गहै जल वौट कामना आनै हाँड़े । 
पतिबरता कै पीव पणि बिभचारिणी दूजी आस । 
मीन उरग दादुर कुरम इनकौ जल मैं बास ।” ॥९२॥

*९. गुरु संयोग वियोग माहात्म्य का अंग~४९/५२*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*९. गुरु संयोग वियोग माहात्म्य का अंग~४९/५२*
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*गुरु शिष नर नार्यों मिल्यूं, ब्रह्म बाल विधि होय ।*
*शब्द शुक्र१ सुरति२ सुन्दरि, फल पावे नहिं कोय ॥४९॥*
नर-नारी के मिलन विधि से ही बालक उत्पन्न होता है, विदेश से नारी के पास वीर्य१ भेज दिया जाय, तो बालक रूप फल नहीं मिलता है । वैसे ही गुरु शिष्य से मिलने पर ही ब्रह्म साक्षात्कार होता है, गुरु की पुस्तक पढ़ने से ही शिष्य की वृत्ति२ को अपरोक्ष ब्रह्म - ज्ञान रूप फल नहीं मिलता ।
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*त्रिविध भाँति तरणी१ तपे, तिमिर हंत सम भाय२ ।*
*सविता३ सद्गुरु आथवैं४, पाला५ अघ६ न गराय७ ॥५०॥*
ग्रीष्म, वर्षा और शीत काल इन तीनों समयों में सूर्य१ तीन प्रकार से तपते हैं तथा अंधकार को तीनों ही समय में सम भाव२ से नष्ट करते हैं, किन्तु सूर्य३ छिप४ जाने पर बर्फ५ तो नहीं गलता७ । वैसे ही सद्गुरु भक्ति, योग और ज्ञान के ग्रंथ लिखकर उपदेश तो सबको सम भाव से ही करते हैं, किन्तु साधक के सन्मुख न होने से उसके हृदय का संशय विपर्य्य रूप पाप६ नष्ट नहीं होता ।
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*रज्जब साधु शब्द सुरही१ सु पय२, कीये पलट अशुद्ध ।*
*अब अर्थ घृत काढे बिना, दीपक बले३ न दुद्ध ॥५१॥*
गो१ के दूध२ में जामन देकर उसे दही रूप में बदल दिया जाय तब न तो दूध रहता है और न घृत निकाले बिना उससे दीपक ही जलता३ है । वैसे ही लोक, गुरु-रूप संत के वचन बदल लेते हैं तब न तो वे शुद्ध रूप में रहते हैं और न उनसे यथार्थ अर्थ निकाले बिना ज्ञान-दीपक ही जलता है ।
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*काष्ट लोह पाषाण शब्द सत, अगनी अर्थ प्रकाश ।*
*कौन काम का सौं सरे, सुन हुँ विवेकी दास ॥५२॥*
काष्ट, लोहा, पत्थर इनमे अग्नि होता है और उसका प्रकाश भी होता है किन्तु किस के प्रकाश से कौन सा काम सिद्ध होता है ? अर्थात मनुष्य बिना कुछ भी नहीं होता । वैसे ही हे विवेकी दास सुन ! सत्य शब्दों में अर्थ हैं किन्तु सद्गुरु बिना किसके अर्थ से कौन सा काम होता है ? अर्थात गुरु मुख द्वारा सुने शब्दों से ही ज्ञान द्वारा ब्रह्म प्राप्ति रूप कार्य सिद्ध होता है ।
(क्रमशः) 

गुरुवार, 16 अप्रैल 2026

हरि भजन और परोपकार

*#daduji*
*॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥*
*॥ दादूराम~सत्यराम ॥*
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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अध्याय १६, आचार्य पर्व -
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आचार्य कृष्णदेव जी महाराज मेडता में कुछ वर्ष रहे तो वहां भी सदाव्रत आदि का सम्यक् प्रबन्ध करा दिया गया था । उनके ब्रह्मलीन होने तक तथा आचार्य चैनराम जी जब तक वहाँ रहे तब तक वहाँ का सदाव्रत भी चलता रहा था । उक्त प्रकार सर्व साधारण मानवों के साथ-साथ देश के बडे छोटे राजा तथा रईसों को भी सत्य उपदेश कर निज धर्म में स्थित रहने की चितावनी देते रहते थे । 
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यही कारण था कि राजा महाराजाओं ने उनका भारी स्वागत सत्कार किया था । नारायणा दादूधाम के आचार्यों ने अपने समाज के लाखों साधु- संतों व सेवकों का सम्यक् संचालन किया था । साधु संतों को तथा सेवकों को भी उक्त ‘‘हरि भजन और परोपकार’’ का ही उपदेश निरंतर करते थे । उनके निष्पक्ष उपदेश से ही समाज की वृद्धि तथा समाज में शांति सुख की बाहुल्यता रहती थी । 
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यह तो प्रसिद्ध ही है कि प्राणी मात्र सुख तथा शांति ही चाहता है । किन्तु जो सुख शांति के साधन नहीं होते उनको ही भ्रांतिवश सुख शांति के साधन मानकर करता है और उनका फल सुख शांति के विपरीत दु:ख और अशांति ही प्राप्त करता है । ऐसी स्थिति में आचार्य ही वास्तव में सुख शांति का यथार्थ साधन-मार्ग बताकर उसके करने की प्रेरणा करते हैं । जिसको करके  मानव सदा के लिये आन्तरिक शांति तथा नित्य सुख का भागी होता है । 
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उक्त रीति से आचार्यों के अन्य सब कार्य भी लोक कल्याण की भावना को लेकर ही होते रहे हैं । ऐसा ही उन सर्व हितेषी आचार्यों के जीवन वृतान्त से ज्ञात होता है । कभी किसी आचार्य की किसी किख्यासे किसी प्राणी का अहित होता है, तो वह उसी के पाप से होता है । आचार्य तो केवल निमित्त मात्र ही होता है । क्योंकि आचार्यों के मन में तो कभी किसी प्राणी के अनहित की भावना उठती ही नहीं है और यदि उठती है तो-
‘‘शील नहीं सुमिरण नहीं, नहीं नाम का जाप । 
महन्ताई पाने पडी को पूर्वला पाप ॥’’
(दादू शिष्य जगन्नाथ जी आमेर) । 
वह आचार्य कहलाने योग्य नहीं है । 
‘‘शील बडे, सुमिरण बडे, दया बडे गुणवन्त ।
‘जगन्नाथ’ करणी बडी, ताका नाम महन्त ॥’’ 
उक्त विचारों से सिद्ध होता है कि आचार्यों के संपूर्ण कार्य लोक हित के लिये होते हैं ।
(क्रमशः)  

२३. स्वरूप विस्मरण को अंग ९/१२

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२३. स्वरूप विस्मरण को अंग ९/१२
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सुन्दर पावक दार कै, भीतरि रह्यौ समाइ । 
दीरघ मैं दीरघ लगै, चौरे मैं चौराइ ॥९॥
जैसे छोटे बड़े काष्ठ में अग्नि रहती है, उसी प्रकार यह आत्मा भी लम्बे शरीर में लम्बा आकार तथा तदनुरूप चेष्टाएँ करने लगता है; चौड़े शरीर में चौड़ा(विस्तृत) आकार धारण कर लेता है और लम्बे में लम्बा ॥९॥
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रंचक काढै मथन करि, बहुरि होइ बलवंत । 
सुन्दर सब ही काठ कौं, जारि करै भस्मंत ॥१०॥
यद्यपि काष्ठ के मन्थन से निकलने वाली अग्नि की चिनगारी बहुत छोटी(कम = रंचक) होती है, परन्तु वह इतनी सामर्थ्यशाली होती है कि अवसर मिलने पर बड़े से बड़े काष्ठसमूह(विशाल वन) को भी जला कर भस्म कर सकती है ॥१०॥
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सुन्दर जड कै संग तें, भूलि गयौ निज रूप । 
देखहु कैसौ भ्रम भयौ, बूडि रह्यौ भव कूप ॥११॥
जैसे कोई भला आदमी किसी मूर्ख(जड) का सङ्ग करता हुआ पाप कर्म में प्रवृत्त हो जाता है, उसी प्रकार यह जीवात्मा भी जड(अचेतन = प्रकृति) का सङ्ग कर अपना तटस्थ स्वरूप ही भूल गया ! इस प्रकार वह अविद्या के भ्रम में फंस कर इस विकराल भवकूप में जा डूबा ॥११॥
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सुन्दर इन्द्रिय स्वाद सौं, अति गति बांध्यौ मोह । 
मीन न जानै बावरौ, निगलि गयौ सठ लोह ॥१२॥
वहाँ यह विषय भोगों के स्वाद में मुग्ध होकर कुटुम्ब के प्रबल मोह में फँसता चला गया । और अज्ञानता के कारण यह मूर्ख उस अबोध मछली के समान मांस के लोभ में लोह-कण्टक ही निगल गया ॥१२॥ (१)
(क्रमशः)