रविवार, 29 मार्च 2026

सूनी गादी देखकर

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*॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥*
*॥ दादूराम~सत्यराम ॥*
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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अध्याय १६ -
आचार्य पर्व -
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२- उनके जाने पर केवलरामजी ने अपनी बुद्धि में विचार किया कि राजा का कथन तो सर्वथा सत्य ही है, मुझे गद्दी तो छोड ही देनी चाहिये । फिर वे गद्दी छोड कर बादशाह जहांगीर ने गरीबदासजी के निवास के लिये जो महल बनाया था उसमें आकर रहने लगे । गद्दी पर बैठता छोड दिया । तब सूनी गद्दी देखकर बीसों साधु गद्दी पर बैठने को तैयार हो गये और वे परस्पर कहने लगे मेरा अधिकार है मैं बैठूंगा, मैं बैठूंगा, मैं बैठूंगा । यह होने लगा । 
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केवलराम जी चार वर्ष तक गद्दी पर विराजे थे । कहा भी है-
‘गरीबदास गरीब के शिष्य सु केवलदास । 
 चार वर्ष गादी तपे, पूरण प्रेम प्रकाश ॥’ (वासुदेव )
उक्त गादी पर बैठने की गडबड की बात किसी ने सभाकुमारी जी को सुनाई तब सभाकुमारी ने आकर कहा- 
‘‘सूनी गादी देखकर सभाकुमारी आय ।  
सभाकुमारी बोलिया, सुनियो संत सधीर । 
गादी म्हारा बीर की, तामें म्हारो सीर ॥’’ (दौलतराम) 
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सभाकुमारी जी ने कहा- ‘‘धैर्यमान् संतों- मेरी बात सुनो- गद्दी पर तो बैठ सकता है, जिसका अधिकार हो और समाज जिनको बैठाये । अत: किसी का भी गद्दी पर बैठने का अधिकार नहीं है किन्तु मेरे बडे भ्राता गरीबदासजी की गद्दी है । केवलरामजी  का अधिकार भी था किन्तु समाज उन्हें नहीं चाहता था । अत: उन्होंने गद्दी त्याग दी ।उनके लिये यह श्‍लाघनीय बात है किन्तु अब तो जिसको अधिकार होगा और जिसको समाज एकमत होकर बैठायेगा वही बैठेगा । तब तक गादी का संरक्षण मैं स्वयं करुंगी ।’’ 
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३- सभाकुमारी महान् तपस्विनी गार्गी के  समान तत्वनिष्ठ बाल ब्रह्मचारिणी और दादूजी महाराज की शिष्या, गरीबदासजी की सहोदरा बहिन थी । उनका प्रभाव समाज पर अच्छा था । अत: जब तक समाज में एकता नहीं आई तब तक आचार्य का कार्य सभाकुमारी जी ने किया । 
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तीन वर्ष में सब एकमत हो गये और निश्‍चय किया कि - परम विरक्त दादूजी महाराज के शिष्य और गरीबदासजी के भाई तथा छोटे गुरु भाई मसकीन दासजी ही वास्तव में गद्दी के अधिकारी हैं । उन्हें ही गद्दी पर बैठाना योग्य है । सभाकुमारी जी ने भी यह बात मान ली । 
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कहा भी है- ‘सभाबाई तीन वर्ष’(गुरु पद्धति) । चौथे वर्ष सब समाज ने परम विरक्त भजनानन्दी महान् महात्मा मसकीन जी को आचार्य गद्दी पर विराजमान किया और आनन्द के साथ मसकीनदासजी महाराज समाज का संचालन करने लगे । समाज में भी मत- भेदों के मिट जाने पर परमानन्द की लहर चल पडी । सब ओर अपने भजनानन्दी आचार्य का अनुकरण करके अपना समय भजन ध्यान में ही व्यतीत करने लगे । निष्पक्ष दादूवाणी के प्रवचनों का आनन्द लेने लगे ।
(क्रमशः) 

२२. आपने भाव को अंग १३/१६

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२२. आपने भाव को अंग १३/१६ 
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सुन्दर अपने भाव करि, पूजै देवी देव । 
यह मैं पायौ पुत्र धन, बहुत करी तीं सेव ॥१३॥
पुरुष अपने मन के भावों के कारण ही किसी देवी-देवता की पूजा-आराधना में लगता है तथा अकस्मात् उस का फल(पुत्रोत्पत्ति आदि) मिल जाने पर वह सोचने लगता है कि उस देवी-देवता की अतिशय आराधना के कारण ही मेरे यहाँ यह पुत्र उत्पन्न हुआ है ॥१३॥
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सुन्दर सूकै हाड कौं, स्वान चचोरै आइ । 
अपनौई मुख फोरि कै, लोही चाटै खाइ ॥१४॥ 
जैसे कोई मूर्ख कुत्ता सूखी हड्डी चबाने के कारण उसकी रगड़ से उसके मसूड़ों से निकले हुए रक्त को चूस चूस कर वह समझने लगता है कि यह मधुर स्वाद उस सूखी हड्डी से ही निकल रहा है ॥१४॥
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सुन्दर अपने भाव करि, आप कियौ आरोप । 
काहू सौं सन्तुष्ट ह्वै, काहू ऊपर कोप ॥१५॥
यह मनुष्य अपने मन में उद्भूत विचारों के कारण कभी स्वयं को ही उपालम्भ(आरोप) देने लगता है और कभी किसी से प्रसन्न होता है और कभी दूसरों पर क्रोध करने लगता है ॥१५॥
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अपनौ ई सब भाव है, जो कछु दीसै और । 
सुन्दर समुझै आतमा, तब याही सब ठौर ॥१६॥
यहाँ वस्तुतथ्य(सचाई) यह है कि मनुष्य के ये अपने ही मानसिक विचार हैं जिस से वह अन्यथा(विपरीत) सोचने लगता है । यदि वह यह सब कुछ छोड़कर केवल अध्यात्मचिन्तन करने लगे तो उसकी ये सब भ्रान्तियाँ स्वतः ही मिट जायँ ॥१६॥
(क्रमशः)

मन मूरिखा रे

 
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*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*दादू जग दिखलावै बावरी, षोडश करै श्रृंगार ।*
*तहँ न सँवारे आपको, जहँ भीतर भरतार ॥*
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*सच ॥*
मन मूरिखा रे, कहीं अनत न बहिये ।
मनसा ठौर राखि, केवल राम नाम कहिये ॥टेक॥
ऊपराँ पाणी पखालै, मांहिला मैल न जांहिला ।
न्हायाँ धोयाँ जे तिरै, तौ मींडक पाणी मांहिला ॥
बादि ही मूरिख मूँड मुँडायौ, मन मांहै काती बुरी ।
मूँड मुँडायाँ जे भौ तिरै, तौ भेड़ जाइ सरगापुरी ॥
बहुत दिन लग दूध पीयौ, देही राखी आछियाँ ।
दूधाधारी जे तिरै, तौ पहिली तिरसें बाछियाँ ॥
राम नाम न लियौ काथ पीयौ, अरु अंग न वौढ्यौ कापड़ा ।
इहिं करणीं बैंकुठि जासी, तोही ज म्रिधा बापड़ा ॥
राम नाम तारै राम नाम तिरै, आन मारग मति गहै ।
बषनां कोई बुरौ मानैं, तौ बूझौ जाइ गीता कहै ॥८५॥
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हे मूर्ख मन ! अपनी वृत्ति को केवल राम-राम-स्मरण रूपी सुस्थान, शुभकार्य में लगा कर रख । इसे राम-नाम-स्मरण के अतिरिक्त अन्य किसी भी विषय की ओर मत जाने दे । याद रख, शरीर को ऊपर से पानी से धोने से कुछ भी होने वाला नहीं है क्योंकि अंदर रहने वाले मन के मैल तो पानी से धुलते नहीं हैं ।
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यदि नहाने-धोने से ही मुक्ति मिलती हो तो मैंड़क तो सदैव पानी में ही रहता है । उसकी मुक्ति तो हो ही जानी चाहिये किन्तु होती नहीं है । अतः नहाना-धोना भ्रम है । मूर्ख व्यर्थ ही शिर को मुंडवाता है जबकि मन में बुरा चिंतन करता है । यदि मूंड मुंडाने से ही भवसागर से पार जाना संभव है तो भेड़ सर्वप्रथम मोक्ष को प्राप्त होगी क्योंकि उसके शरीर से तो वर्ष में कई बार बाल काटे जाते हैं ।
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बहुत दिनों तक अन्न का त्याग करके मात्र दूध का आहार किया और शरीर को निरोग रखा । यदि दूधाहारियों की मुक्ति होती है सर्वप्रथम उस बछिया की मुक्ति होगी जो गाय के स्तनों से सीधे ही दूध पीती है । राम-नाम का स्मरण न करके क्वाथ = काढा पिया और अंग पर कपड़े नहीं पहने (क्वाथ का अर्थ शीघ्र दौड़ना भी है । हिरण शीघ्र दौड़ता है तथा वस्त्र नहीं पहनता है । उल्टे उसी की खाल को संत महात्मा कमर में कटिवस्त्र के रूप में पहनते हैं) ।
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यदि शीघ्र दौड़ने = तीर्थ यात्रा करने से तथा वस्त्र न पहनने से ही बैकुंठ की प्राप्ति होती हो तो मृग बेचारा मृग हुआ क्यों दौड़ता फिरता है । क्यों नहीं उसकी मुक्ति हो जाती । हे मन ! हे जीव ! ! रामनाम ही तारता है । रामनाम के स्मरण करने से ही जीव तिरता है । अतः राम-नाम-स्मरण के अतिरिक्त अन्य किसी और साधन का आश्रय मत ले ।
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बषनांजी कहते हैं कि मेरी बातों का कोई बुरा मन मानों । यदि किसी को मेरी बातें कड़वी लगें तो उसे चाहिये कि वह गीता को पढ़े । अर्थात् मैंने जो बातें ऊपर कहीं हैं वे मनगढंत नहीं है । उनका समर्थन गीता करती है ॥८५॥
“अशास्त्रविहितं घोरं तप्यंते ये तपो जनाः ।
दम्भाहंकारसंयुक्ता कामरागबलान्विताः ॥
कर्शयन्तः शरीरस्थं भूतग्रामचेतसः ।
मां चैवान्तः शरीरस्थं तान्विद्धयासुरनिश्चयान् ॥” गीता १७/५-६॥

*७.आज्ञाकारी का अंग ~ १७/२०*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*७.आज्ञाकारी का अंग ~ १७/२०*
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चेला चेतन चाहिये, ज्यों अक्षर१ शब्द हि लेय ।
रज्जब शिष श्रद्धा यही, गुरु मत जान न देय ॥१७॥
शिष्य को गुरु-वचन ग्रहण करने में इस प्रकार सावधान रहना चाहिये, जिस प्रकार अक्षरों को ग्रहण करने में शब्द रहता है । शब्द में एक मात्रा की कमी हो तो भी अखरती है । वैसे ही शिष्य को भी अपनी कमी अखरना चाहिये वा जैसे भी शब्दों द्वारा अविनाशी१ ब्रह्म का स्वरूप समझ सके वैसे ही शिष्य को सावधान रहना चाहिये । शिष्य की उत्तम श्रद्धा की यही पहचान है कि वह गुरु के सिद्धांत को अपने हृदय से नहीं जाने दे ।
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बावन अक्षर सेवका, सद्गुरु शब्द समान ।
रज्जब दुहुँ सों एक व्है, सो गुरु शिष्य प्रमान ॥१८॥
१८ में गुरु-शिष्य की प्रमाणिकता बता रहे हैं - जैसे वर्णमाला के बावन अक्षर और शब्द मिलाकर एक हो जाते हैं । वैसे ही गुरु और शिष्य दोनों मिलने पर ब्रह्म रूप में एक हो जावें वे ही गुरु-शिष्य प्रामाणिक हैं ।
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शिष श्रद्धा जंतर घटी, सद्गुरु जंत्रक जान ।
रज्जब रहिये कंध चढ़, सकल कला उर ठान ॥१९॥
शिष्य की श्रद्धा सितार घटिका के समान है और गुरु सितार बजाने वाले के समान हैं । सितार आदि वाद्यों की तुम्बी जो उनके ऊपर होती है, वह जब बजाने वाले के कंधे पर जाकर वहां ठहरती है तब गायन सम्बन्धि सभी कलायें उससे निकलती हैं । वैसे ही शिष्य की श्रद्धा जब गुरु में होती है, तब उसके हृदय में सभी अध्यात्म विषय अवगत हो जाते हैं ।
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तेल लौण आफु१ रु गुड़, पय२ पाणी सौं मेल ।
त्यों रज्जब गुरु ज्ञान में, शिष्य सुमति का खेल ॥२०॥
२०-२३ में सुमति शिष्य का परिचय दे रहे हैं - जैसे एक ही जल के मेल से तिल में तेल, भूमि में लवण, अफीम१ के डोडे में अफीम, ईख में गुड़ और दूध वाले वृक्षों में दूध२ होता है । वैसे ही एक गुरु के उपदेश से अनेक प्रकार के शिष्य तैयार होते हैं किन्तु ब्रह्म-प्राप्ति रूप खेल का आनन्द किसी सुमति शिष्य को ही प्राप्त होता है, सब को नहीं ।
(क्रमशः)

शनिवार, 28 मार्च 2026

‘‘करामात कलंक है’’

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*॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥*
*॥ दादूराम~सत्यराम ॥*
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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अध्याय १६ -
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आचार्य प्रणाली की कुछ घटनायें  जिन २ आचार्यों का जो२ वृत्तान्त मुझे प्राप्त हो सका है, वह मैंने इस आचार्य पर्व में अंकित कर दिया है । किन्तु कुछ आचार्य प्रणाली में न आने वालों के नाम भी कुछ ग्रंथों में आचार्य गद्दी पर समाज की इच्छा के बिना भी कुछ कुछ ने अपना अधिकार रक्खा है । अत: उनका परिचय देना भी उचित समझकर अब उनका परिचय दिया जाता है-  
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१- गरीबदासजी महाराज ने रज्जबजी द्वारा कहे हुये अपने भेंट के सवैया ‘दादू के पाट दिपे दिन दिन ही’ में मारक गणों का प्रयोग देखकर समझ लिया कि मेरा शरीर अब अधिक दिन नहीं रहेगा । अत: मुझे अब शीघ्र ही गद्दी छोड देनी चाहिये । फिर उन्होंने अपने निश्‍चय के अनुसार वि. सं. १६९२ मार्गशीर्ष शुक्ला १३ को गद्दी छोड दी और भैराणे जाकर भजन करने लगे । 
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कुछ जन श्रुति ऐसी भी सुनने में आई है कि वे नारायणा दादूधाम से दक्षिण की और मालपुर, जूनिया, होडोलाई की ओर पधार गये थे । किन्तु दौलतराम जी ने महन्त लीला प्रकरण में भैराणे जाकर भजन करने का उल्लेख किया है । हो सकता है भैराणे से उक्त ग्रामों के भक्त उनको ले गये हों । गद्दी छोडने के समय गरीबदासजी के मुख्य शिष्य केवलरामजी नारायणा दादूधाम में नहीं थे । बीजराणा के सेवकों के साथ गये हुये थे । 
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आगे जब उन्हें ज्ञात हुआ कि महाराज यहाँ नहीं हैं, सदा के लिए गद्दी का त्याग करके पधार गये । तब केवलराम जी उक्त ग्रामों की ओर जाकर गुरुदेव जी की सेवा में उपस्थित हुये । उधर कुछ बणजारे भक्तों को गरीबदासजी का सत्संग प्राप्त होने से वे गरीबदासजी के भक्त बन गये और सेवा करने लगे । और उधर ही आप वि. सं. १६९३ पौष कृष्णा १३ बृहस्पतिवार को ब्रह्मलीन हुये । 
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फिर केवलरामजी उनके शरीर को लेकर भैराणे आये । ऐसी जन श्रुति कनिरामजी स्वामी नारायणा ने सुनाई है किन्तु किसी भी ग्रंथ में यह विवरण मुझे नहीं मिला है । भैराणे जाकर भजन करने का उल्लेख मिला है । फिर केवलराम जी भैराणे से नारायणा दादूधाम में आये । गद्दी पर तो कोई था ही नहीं अत: अपने आप ही केवलराम जी गद्दी पर बैठ गये । 
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इस समय सभाकुमारी जी ने भी इनको गद्दी पर बैठने से नहीं रोका । कारण- ये गरीबदासजी के मुख्य शिष्य थे ही । फिर जब अजमेर के एक कायस्थ सज्जन सूबा अजमेर के भय से भाग कर केवलराम जी की शरण आये और उनको पकडने कुछ सैनिक आये । उनसे उक्त कायस्थ सज्जन की रक्षा के समय आपके विलक्षण चमत्कार से कई सैनिकों के प्राण गये । 
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उस घटना को सुनकर तत्कालीन किशनगढ नरेश केवलरामजी महाराज के दर्शन करने आये और अजमेर के कायस्थ सज्जन जो अब केवलरामजी के शिष्य होकर ‘रामदास’ बन गये थे, उनका प्रसंग चलने पर किशनगढ नरेश ने हाथ जोडकर केवलरामजी को कहा- स्वामिन् ! दादूजी महाराज ने कहा है- ‘‘करामात कलंक है’’ किन्तु आपने दादूजी के कथन को न मानकर अपनी करामात से कई मानवों के प्राणान्त करवा ही दिये । 
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दूसरे आप समाज की इच्छा न होने पर भी गद्दी पर अपनी शक्ति के बल पर ही तो विराजे हुये है । आप जैसे समर्थ संतों को यह व्यवहार शोभा नहीं देता है । आपका विरोध भी कौन कर सकता है । आपको ही सोचना चाहिये । जिससे समाज में एकता बनी रहे ऐसा ही व्यवहार आपको करना चाहिये । किशनगढ नरेश उक्त प्रार्थना करके चले गये ।  
(क्रमशः)

२२. आपने भाव को अंग ९/१२

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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२२. आपने भाव को अंग ९/१२ 
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सुन्दर याकै ऊपजै, काम क्रोध अरु मोह । 
याही कै ह्वै मित्रता, याही कै ह्वै द्रोह ॥९॥
अतः श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - इन उपर्युक्त तीन उदाहरणों से स्पष्ट हो जाता है कि काम, क्रोध, और मोह, मित्रता एवं वैर(द्रोह) पुरुष अपने मन में ही उत्पन्न होते हैं, अन्य किसी से इसका कोई लेना - देना नहीं है । विद्वानों का भी कहना है - मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः ॥९॥
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आपु हि फेरी लेत है, फिरते दीसै आंन । 
सुन्दर ऐसै जानि तूं, तेरौ ही अज्ञांन ॥१०॥
जैसे भ्रमिचक्र(हिंडोला) में बैठा हुआ पुरुष स्वयं घूमता है; परन्तु उस को दूसरे लोग घूमते हुए प्रतीत होते हैं; ऐसे ही जिज्ञासु को जानना चाहिये कि उस को दूसरे में दिखायी देने वाले राग द्वेष आदि के भाव उस के अपने हृदय के अज्ञान की ही उपज हैं ॥१०॥
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सुन्दर याकै संक ह्वै, याही ह्वै निहसंक । 
याही सुधौ ह्वै चलै, याही पकरै बंक ॥११॥
पुरुष को अपने ही मन में विविध शङ्काएँ उद्भूत होती हैं तथा उन के उत्तर भी उसी मन से मिलते हैं । उसका अपना मन कभी सीधा(सात्त्विक भाव से) चलता है या कभी वही मन बांकापन(द्वेष भाव) ग्रहण कर लेता है ॥११॥
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सुन्दर याकै अज्ञता, याही करै बिचार । 
याही बूडै धार मैं, याही उतरै पार ॥१२॥
श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - पुरुष के ही मन में अज्ञता(अज्ञान या मूर्खता) उद्भूत होती है तो कभी यही मन विचार(विवेक) पूर्वक ज्ञान का व्यवहार करने लगता है । यही कभी अपने विचारों से प्रबल जलधारा(गम्भीर सङ्कट) में डूबने लगता है तो कभी यही स्वयं अपने विचारों से उसके पार पहुँच जाता है ॥१२॥
(क्रमशः)

*चांणक उपदेश ॥*

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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*दादू माया मगन जु हो रहे, हमसे जीव अपार ।*
*माया माहीं ले रही, डूबे काली धार ॥*
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*चांणक उपदेश ॥*
मन रे हरत परत दुवै हार्या ।
रामचरण जौ तैं हिरद्यौं बिसार्या ॥टेक॥
माया मोह्यौ रे क्यूँ चीति न आयौ । 
मनिख जमारौ तैं अहलौ गमायौ ॥
कण छाड्यौ निकणैं चित लायौ । 
थोथिरौ पिछौड़्यौ क्यूँ हाथि न आयौ ॥
साच तज्यौ झूठै मन मान्यूँ । 
बषनां भूलौ रे तैं भेद न जान्यूँ ॥८४॥
हरत-परत = गिरते-पड़ते, दुनियावी कामों को करते करते “गृह कारिज नाना जंजाला । ते अति दुर्गम सैल बिसाला ॥” दुवै = दोनों-लोक तथा परलोक । अहलौ = व्यर्थ ही । निकणैं = अतत्व । थोथिरौ = पोला, खाकला । पिछौड्यौ = गाहा, कूटा, दाँय की ।
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हे मन ! तूने रामजी के चरण-कमलों को हृदय में से विस्मृत कर देने व सांसारिक काम-काजों को करते रहने के कारण, विषयों को भोगते रहने के कारण दुवै = लोक और परलोक दोनों को ही हार दिया है । तू माया में ही मोहित हुआ रहा । उसके अतिरिक्त कुछ और भी है, इसका तूने जरा भी चिंतन नहीं किया । 
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देवों को भी दुर्लभ मनुष्य शरीर तूने यौंही = व्यर्थ ही बर्बाद कर दिया । तूने कण रूपी परमात्मा को छोड़कर निकण = खाकले रूपी माया में अपना मन लगाये रखा । वस्तुतः तू जीवन भी खाकले को ही कूटता रहा जिससे तेरे हाथ कण का लेश भी नहीं आया । तूने त्रिकालावाधित सतस्वरूप परमात्मतत्व को छोड़ दिया और झूठै = केवल मध्य में ही दीखने वाली माया को अंगीकृत कर लिया । 
“अव्यक्तादीनि भूतानि व्यक्तमध्यानि भारत । 
अव्यक्त निधनान्येव तत्र का परिदेवना ॥गीता २/२८॥” 
बषनां कहता है, हे मनुष्य तू भ्रम में पड़ गया । तूने सच-झूठ का, नित्य-अनित्य का, अपने-पराये का रहस्य नहीं जाना ॥८४॥

*७.आज्ञाकारी का अंग ~ १३/१६*

*🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏*
*🌷卐 सत्यराम सा 卐🌷*
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*७.आज्ञाकारी का अंग ~ १३/१६*
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*आज्ञा में ऊभा रहै, एक मना इकतार ।*
*रज्जब उज्वल अनन्य ह्वै, वह उतरेगा पार ॥१३॥*
जिसका हृदय उज्वल है और जो एक मन से सदा गुरु-गोविन्द की आज्ञा में ही खड़ा रहता है, वह अनन्य दशा को प्राप्त होकर संसार-सागर से अवश्य पार हो जायगा ।
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*आज्ञा में अघ ऊतरैं, आज्ञा पावन प्राण ।*
*सो आज्ञा आठों पहर, जन रज्जब उर आन ॥१४॥*
गुरु-गोविन्द की आज्ञा में चलने से पाप नष्ट हो जाते हैं, प्राणी पवित्र हो जाता है, उस गुरु-गोविन्द की आज्ञा को अष्ट पहर हृदय में रखना चाहिये ।
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*आज्ञा में ऊंची दशा, आज्ञा उत्तम ठौर ।*
*उभय एक आज्ञा चल्यों, सो आज्ञा शिर मौर ॥१५॥*
गुरु-गोविन्द की आज्ञा में चलने में उच्च अवस्था और उत्तम स्थान प्राप्त होता है, जीव-ब्रह्म दोनों एक हो जाते हैं । यह आज्ञा पालन रूप साधन सभी साधनों में शिरोमुकुट के समान है ।
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*शिष श्रद्धा यों चाहिये, ज्यों वसुधा रतिवन्त ।*
*रज्जब वर्षा गुरु वयन, लिया दशों दिश कन्त ॥१६॥*
१६-१७ में शिष्य को प्रेरणा कर रहै हैं - जैसे पृथ्वी की श्रद्धा इन्द्र में होती है तब वर्षा रूप से पृथ्वी अपने स्वामी इन्द्र को प्राप्त करती है । वैसे ही शिष्य की श्रद्धा गुरु वचनों में होनी चाहिये तभी दशों दिशा में परमात्मा का साक्षात्कार होता है ।
(क्रमशः)

शुक्रवार, 27 मार्च 2026

१९ आचार्य हरिराम जी ~

*#daduji*
*॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥*
*॥ दादूराम~सत्यराम ॥*
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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अथ अध्याय १६  
१९ आचार्य हरिराम जी ~ 
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आचार्य हरिराम जी महाराज पूर्वाश्रम में भोजपुरा(जोबनेर) के  गुर्जर गौड़ ब्राह्मण थे । आपने नारायणा दादूधाम दादूद्वारे के  प्रतिष्ठित संत भूरारामजी से छोटी अवस्था में ही दादूमत की दीक्षा ली थी । अक्षराभ्यास करने के पश्‍चात् आपने अध्यायनार्थ श्रीदादू महाविद्यालय जयपुर में प्रवेश किया था । उक्त विद्यालय में आपने व्याकरण शास्त्र में मध्यमा, कलकत्ता विश्‍व विद्यालय की काव्यतीर्थ एवं हिन्दी विशेष योग्यता परीक्षार्थ अच्छी श्रेणी में उत्तीर्ण की थीं । 
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इससे अतिरिक्त आपने दादू महाविद्यालय में रहकर वेदान्त शास्त्री के ग्रंथों का यथावत् अध्ययन किया था । और दो खडों की परीक्षा दी थी । पश्‍चात् नारायणा दादूधाम दादूद्वारे के पीठाचार्य रामलाल जी महाराज के रुग्ण हो जाने से आपको परीक्षा से विरत होना पडा । फिर आप नारायणा दादूधाम दादूमंदिर के पुजारी नियुक्त हुये । आपके पुजारी होने के समय में ही श्रीदादू मंदिर नारायणा का सुन्दर संस्करण हुआ । 
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अब उक्त मंदिर सुन्दर दर्शनीय है । नारायणा में समागत सभ्यों व अतिथियों के स्वागत सत्कार व पुस्तकालय का कार्यभार भी आप ही वहन करते थे । नरेना के सार्वजनिक कार्यों में भी आप प्रमुख रहते थे । नरेना में ‘सुन्दर जयन्ती’ उत्सव के सुन्दर आयोजन का भी श्रेय आपको ही था । इत्यादिक आपके श्‍लाघनीय कार्य हैं । 
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आप सं. २००१ से वि. सं. २०२३ तक श्रीदादू मंदिर के पुजारी बने रहे और अपने कार्य का अच्छा निर्वाह किया । पीठाचार्य प्रकाशदेव जी महाराज के ब्रह्मलीन होने पर दादूपंथी समाज ने वि. सं. २०२३ द्वितीय श्रावण शु. ५ शनिवार को आचार्य गद्दी पर आपको बैठाया । तब से आप आचार्य गद्दी पर विराजकर समाज का संचालन कर रहे हैं । आप श्रीदादूवाणी की कथा करते हैं । 
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दादूवाणी की कथा का तो आचार्य परंपरा से नियम है आचार्य स्वयं करें या अन्य कथावाचक  करें । दादूवाणी की कथा प्रतिदिन बारह मास होती ही है । अत: दादूवाणी, श्रीमद्भपगवत, श्रीद्भगवत गीता आदि की कथायें आप करते हैं, व्याख्यान, प्रवचन भी करते हैं । अच्छे विद्वान हैं । 
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आपने जयपुर तथा आंधी ग्राम के सेवकों व विशेषकर सौंकियों में चातुर्मास करके तथा उन सेवकों में भ्रमण करके उन लोगों को गुरुद्वारा दादूधाम व समाज की सेवा में लगाया है । उक्त सेवकों में दादूद्वारे की विशेष भक्ति का कारण आपकी प्रेरणा ही है । स्वर्गीय जयपुर नरेश मानसिंह जी द्वितीय के स्वर्गवास होने पर महारानी गायत्री देवी के आमंत्रण पर राज्य व समाज पद्धति नियम व सत्कार के अनुरुप राजग्रह में ससम्मान जाकर समयोचित आशीर्वचन आपने दिया था । 
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आपने चातुर्मास किये हैं, वे स्थान ये हैं १- जयपुर शहर २- आंधी ३- भैराणा ४- नई ना़डी रामपुरा ५- टांका श्री दयाल जी ६- गैटोर, गोंदर आदि स्थानों पर आपके चातुर्मास हुये हैं । और अन्याय स्थानों में होते ही रहते हैं । आप समय के अनुसार अच्छे आचार्य हैं । इतना ही आपका सामान्य परिचय मुझे ज्ञात हुआ है सो यह लिख दिया गया है । आप वर्तमान आचार्य हैं । अत: आपका पूर्ण विवरण तो लिखा जाना संभव नहीं हैं । आप के भविष्य में क्या-२ विशेष कार्य होंगे उनका तो ज्ञान भविष्य में ही उनके होने पर ही होगा ।  
(क्रमशः) 

२२. आपने भाव को अंग ५/८

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२२. आपने भाव को अंग ५/८ 
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सुन्दर महल संवारि कै, राख्यौ कांच लगाइ । 
दैव योग सुनहां गयौ, एक अनेक दिखाइ ॥५॥
अन्य तीन उदाहरण : श्रीसुन्दरदासजी एक अन्य उदाहरण भी देते हैं - आप कोई प्रयत्नपूर्वक विशाल शीशमहल बनाइये । उस में ऊपर नीचे सर्वत्र शीशे जड़े हुए हों । भाग्य से यदि उसमें कभी कोई कुत्ता(सुनहा) पहुँच जाय तो वहाँ शीशे में पड़े अपने प्रतिबिम्बों के कारण उस एकाकी को ही अनेक कुत्ते दिखायी देते हैं ॥५॥
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अपनी छाया देखि कै, कूकर जानै आंन । 
सुन्दर अति ही जोर करि, भुसि भुसि मूवौ स्वांन ॥६॥
वहाँ वह उस शीशे में अपनी छाया(प्रतिबिम्ब) देख कर उसे अन्य कुत्ता समझने लगता है । तथा वह, स्वभावगत जातिविरोध के कारण, उस प्रतिबिम्ब को अन्य कुत्ता समझ कर जोर जोर से भोंकने लगता है । परिणामस्वरूप वह कुत्ता भोंकते भोंकते वहीं मर जाता है ॥६॥ (१)
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सिंह कूप परि आइ कैं, देखी अपनी छांहिं । 
सुन्दर जान्यौ दूसरौ, बूडि मुवौ ता मांहिं ॥७॥
इसी प्रकार किसी मूर्ख सिंह का उदाहरण भी आप ले सकते हैं - जैसे कोई सिंह किसी कूए पर जा कर उसके जल में अपनी परछाई(प्रतिबिम्ब) देखे । उसे देख कर वह गर्जन करे । उस गर्जन को भी कूए से प्रतिध्वनि आवे तो उस प्रतिध्वनि प्रतिबिम्बित सिंह को अन्य सिंह समझ कर क्रुद्ध होता हुआ, उस पर आक्रमण के लिये, छलांग लगावे और वह कूए में कूद कर मर जाय ॥७॥ (२)
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फटिक सिला सौं आय करि, कुंजर तोरै दंत । 
आगै देख्यौ और गज, सुन्दर अज्ञ अत्यंत ॥८॥
इसी प्रकार किसी मूर्ख हाथी का भी, इस प्रसङ्ग में, उदाहरण देखें - कोई मूर्ख हाथी किसी स्फटिक शिला के सम्मुख जाय । वहाँ वह उस शिला को अन्य हाथी समझे और उस शिला के कोणों को हाथी दांत समझे और उस पर क्रुद्ध होकर टक्कर मारने लगे । निरन्तर टक्कर मारता हुआ आहत होकर वह मर जाय ॥८॥ (३)
(ये तीनों ही उदाहरण अपने ही भाव से उत्पन्न सङ्कट के स्पष्ट उदाहरण हैं ।)
(क्रमशः)  

परमात्मा की दयालुता

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*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*दादू जिन पहुँचाया प्राण को, उदर उर्ध्व मुख खीर ।*
*जठर अग्नि में राखिया, कोमल काया शरीर ॥*
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राग सोरठि ॥४॥ परमात्मा की दयालुता 
हरि कौ नाँव न भूलूँ भाई । जिनि अैसी कल लाई ॥टेक॥
जिनि जल मांहिं जल बांध्यौ, पवन गाँठि दे सांध्यौ ।
सांध्यि बांधि तत कीया, ले चलता करि दीया ॥
अगनि मांहि जिनि राख्या, यौं राख्या जालि न नाख्या ।
जिनि नीर खीर पहुँचाया, सो मेरे चिति आया ॥
जिनि धरणि अकास न लाया, धरि ऊपरि अधर चलाया ।
चालनहारा चालै, तब यहु बीख न हालै ॥
जो हसै बुलावै बोलै, हलका भारी तोलै ।
अणबोलता सा मांहीं, ताकुँ बषनां भूलै नांहीं ॥८३॥ 
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कल = यंत्र, शरीर । पवन = प्राण । तत = प्राणवान शरीर, एक इकाई । बीख = पैंड, एक पग भर चलना ॥ मैं उस परात्पर-परब्रह्म हरि के नाम को कदापि नहीं भूल सकता जिसने मनुष्य देह जैसा अदभुत यंत्र बनाया है । जिसने वीर्य को रज में रोककर(जल में जल को रोककर, मिलाकर) पंच तत्त्वात्मक स्थूल शरीर को बनाया । 
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उसमें प्राणों का संचार करके सजीवता प्रदान की । इसप्रकार जल में जल को मिलाकर तथा प्राणों का संचार करके तत = एक इकाई = एक शरीर का निर्माण किया । फिर उसमें अपना अंश प्रविष्ट करके उसे चलता-फिरता कर दिया, चैतन्य कर दिया । उस परमात्मा ने इस शरीर को माता की जठराग्नि में जलाकर भस्म नहीं करके पूर्ण सुरक्षित रखा । 
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उस परमात्मा ने ही माता के गर्भ में ही खाने-पीने की सामग्री पहुँचायी । इसी कारण वह परमात्मा मेरे चित्त में चढ़ गया है, मुझे वह प्रिय लगने लगा है । वह परमात्मा गर्भस्थ शिशु को न पृथिवी पर बनाने के लिये लाया और न आकाश में ले गया । 
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उसने तो उसे आकाश के नीचे और पृथिवी के ऊपर माता के गर्भ में ही जो न पृथिवी है और न आकाश है किन्तु अधर है चलने फिरने लायक बना दिया । माता पृथिवी पर चलती है । अतः पृथिवी पर चलते हुए भी गर्भस्थ शिशु अधर ही चलता है । चलने वाली माँ तो चलती-फिरती है किन्तु माँ के चलते-फिरते समय यह एक पैंड़ भी नहीं चलता है । 
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वह परमात्मा इस जीव को हँसाता है, बुलवाता है, बोलता है तथा हल्का-भारी करता है । फिर भी बाह्य दृष्टि वालों को गर्भस्थ जीव बिना बोलता हुआ सा ही माँ के गर्भ में रहता सा प्रतीत होता है । ऐसे परमात्मा को बषनां कभी भी भूल नहीं सकता ॥८३॥ 

गुरुवार, 26 मार्च 2026

ब्रह्मलीन होना -

*#daduji*
*॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥*
*॥ दादूराम~सत्यराम ॥*
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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ब्रह्मलीन होना - 
आचार्य प्रकाशदेव जी महाराज के ब्रह्मलीन होने का समय समीप आया तब आचार्य जी ज्ञात हो गया था । ऐसा ही अनुमान होता है - कारण आपने अपनी समाधि के लिये स्वयं ने ही स्थान की व्यवस्था कर दी थी । दाह संस्कार के लिये उपयुक्त  स्थान का चयन करके उसको स्वयं अपने हाथों से साफ कर दिया था । इससे उनके भविष्य ज्ञान का परिचय मिलता है । 
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उक्त प्रकार अपनी आध्यात्मिक शक्ति का परिचय देकर २० वर्ष १० मास पीठासन पर रहकर अल्पायु में भी भगवदाज्ञा शिरोधार्य करके श्रावण(द्वितीय) शु. बृहस्पतिवार सं. २०२३ को ५५ वर्ष की अवस्था में ब्रह्मलीन हुये थे । आपका महोत्सव मेला व समाधि संगमरमर की विशाल छत्री ब्रह्म भोजादि सब कार्य आप के परम भक्त, भक्त  कालीचरण जी नवलगढ वर्तमान कलकत्ता ने किया था । सभी कार्य अति सुन्दर रुप से संपन्न हुये थे । आचार्य प्रकाशदेव जी महाराज का उक्त जीवन वृतान्त कनिराम जी स्वामी नारायणा वालों से प्राप्त हुआ ।  
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गुण गाथा~दोहा - 
श्रीप्रकाश ने पंथ की, दीन्हा परम प्रकाश । 
संशय हट कर सहज ही, भागी तम की त्रास ॥१॥ 
अब भी प्रकाश देव का, सुमिरण करें अनन्त ।
सौम्य मूर्ति आचार्य की, श्‍लाघा करते संत ॥२॥
परंपरा मर्यादा का, सुन्दर किया निभाव ।
इसीलिये सब पंथ का, उन पर रहा सु भाव ॥३॥
पीठाचार्य प्रकाश की, कीर्ति कौमुदी आज ।
फैल रही है पंथ में, सुख ले रहा समाज ॥४॥ 
पीठाचार्य प्रकाश की, गुण गाथा सु अनन्त । 
‘नारायण’ किमि पास के, अल्पबुद्धि से अन्त ॥५॥ 
इतना कहकर हृदय में, मैं संतोष सु धार । 
पीठाचार्य प्रकाश को, करता प्रणति अपार ॥६॥
इति श्री पंचदश अध्याय समाप्त: १५ । 
(क्रमशः) 

२२. आपने भाव को अंग १/४

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२२. अथ आपने भाव को अंग १/४ 
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सुन्दर अपनौ भाव है, जे कछु दीसै आंन । 
बुद्धि योग बिभ्रम भयौ, दोऊ ज्ञान अज्ञांन ॥१॥
महाराज श्रीसुन्दरदासजी जिज्ञासु को समझाते हैं - जिस मनुष्य के हृदय में जैसा भाव(विचार) होता है वैसा ही उस को बाहर दिखायी देता है । उस के मन में उत्पन्न होने वाले ज्ञान एवं अज्ञान - दोनों ही उसकी बुद्धि के भ्रममात्र हैं ॥१॥
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जो यह देखै क्रूर ह्वै, तौ वह होत कृतांत । 
सुन्दर जौ यह साधु ह्वै, तौ आगै है सांत ॥२॥
यदि वह सामने वाले को क्रूर(अपने प्रति हिंसक) समझ बैठता है तो उस को सामने वाला यमराज के समान दिखायी देने लगता है । और यदि वह साधु स्वभाव समझता है तो सामने वाला पुरुष भी उसको सन्त(शान्त) ही दिखायी देता है ॥२॥
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सुन्दर जौ यह हंसि उठै, तौ आगै हंसि देत । 
जो यह काहू देत है, तौ वह आगै लेत ॥३॥
यदि यह सामने वाले को देख कर प्रसन्न होता(हंसता) है तो सामने वाला भी उस को प्रसन्न होता हुआ दिखायी देता है । और यदि वह उसे अपनी आकृति(चेहरे) के हाव भाव से कुछ देने का संकेत करता है तो वह सामने वाला भी उसे उसी रूप में लेने को तत्पर हो जाता है ॥३॥
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जो यह टेढौ होत है, आगै टेढौ होइ । 
सुन्दर परतख देषिये, दर्पन मांहे जोइ ॥४॥
यदि यह सामने वाले को अपनी आकृति से बांके(विपरीत) भाव दिखाता है तो वह भी उस भाव को उसी(विरोधी) भाव के रूप में ग्रहण करता है ।
इस का प्रत्यक्ष उदाहरण दर्पण(शीशा) है । दर्पण में आपकी आकृति वैसी ही दिखायी देगी जैसी कि वह वस्तुतः है ॥४॥
(क्रमशः)  

हरि का भगताँ कै

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*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*दादू बेली आत्मा, सहज फूल फल होइ ।*
*सहज सहज सतगुरु कहै, बूझै बिरला कोइ ॥*
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सुमिरण ॥ साषी लापचारी की ॥१ (१ इसका अर्थ “सुमिरण का अंग” की साषियों में देखें ।)
कुणका बीणत क्यूँ फिरै, पूरी रासि बिठाइ ।
कहि बषनां तिहि दास कौं, कबहूँ काल न खाइ ॥
पद ॥
हरि का भगताँ कै उन्हालू स्यालू नीपनी ।
गुरि म्हारै बोया राम नाम बीज ॥टेक॥
धौला सा दोइ बलद हमारै, रासि पुराणी आरै ।
हाली हाकै मेर न राखै, लार लागौ सूंकारै ॥
मन पवन हल फाल हमारै, जुड़ौ जुगति करि भाई ।
गुर कै सब्द खेत मैं जूतौ, साषि सबै बणि आई ॥
नाड़ि नेह श्रावणाँ नांहीं करि, बीज भात सिष भाकै ।
गुरि कह्यौ जाहि खेत खड़ि भाई, सदा प्रीति सौं हाँकै ॥
हालीड़ा कै मनसा हालाणि, छाक सँवारी ल्यावै ।
पीसै पोवै पाणी आणैं, आगै हुई कमावै ॥
हालीड़ा कै कांधै जाली, जाकै ग्यान कुदाली ।
खेत मांहि तैं खणि खणि काढ़ै, महा पाप की डाली ॥
साध सँगति म्हारै साँवण लागौ, भाव भादवौ आयौ ।
प्राण पपीहौ बोलण लागौ, आछि बांधि झड़ लायौ ॥
बाड़ि बिचार चहूँ दिसि रोपी, सील करै रखवाली ।
बमेक डाँवजा ऊपरि बैठौ, हरिहाई सब टाली ॥
भला कमेत्याँ खेत कमाया, लुणि चुणि कीया भेला ।
तेज का पुंज खला मैं दीसै, हाली सदा सचेला ॥
गुर कै भर्यौ बीज कौ कोठौ, धरम बावड़ौ बाह्यौ ।
सहँसकारि ह्वै सावढ तूठी, लोक सिलैस बधायौ ॥
मनसा मेढि बिचालै गाडी, पाँचाँ बलदाँ गाही ।
बाव सुबाव तूँतड़ा उड़ि गया, कण पति सब घरि आई ॥
ग्यान गाडै करि ढोवण लगा, कोठा भरिबा लागा ।
कहि बषनां म्हारै नौ निधि निपनी, टोटा सगला भागा ॥८२॥
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उन्हालू = गर्मी में बोई जाकर शीतकाल में तैयार होने पर कटने वाली फसल । स्यालू = शीतकाल में बोई जाकर गर्मियों में पककर तैयार होने पर कटने वाली फसल । रासि = रस्सी । पुराणी = लकड़ी की छड़ी जिसके अग्रभाग में बहुधा लोहे की एक पैनी कील लगी रहती है, इसे ही आर भी कहते हैं । इसको बैल की गुदा के पास के हिस्से पर अड़ाकर बैल को जल्दी चलने के लिये प्रेरित किया जाता है । बैल हाँकनेवाला उस-समय मुँह से कुछ शब्द करता है जिसे सूकारौ करना कहा जाता है । 
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हाली = बैलों को हाँकने वाला, खेती करने वाला । मेर = पड़दा, व्यवधान, ढिलाई । फाल = हल के अग्रभाग में लगा लोहे का नुकीला टुकड़ा जो जमीन को चीरता है । जुड़ौ = जूड़ा, जुवा, जिसको बैलों की गर्दन पर रखा जाता है और जूड़े का हल से या गाड़ी से सम्बन्ध कर दिया जाता है जिन्हें बैल खींचता है । जूतौ = जोतना । साषि = फसल । 
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नाड़ी = हल के पिछले हिस्से में एक नाली होती है जिसमें बीज भरा रहता है । जैसे-जैसे हल चलता जाता है इसमें से बीज जमीन में गिरता जाता है । नाहीं = उक्त नाली का गोलाकार ऊपरी भाग जिसमें बीज भरा जाता है, जिसे अंग्रेजी में होपर कहते हैं । खड़ि = खेती कर । हालीड़ा = खेती करने वाला । हालणि = हालीड़ा की पत्नी । छाक = भोजन । कमावै = बिना कहे ही खेती आदि करके धन कमाती है । 
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जाली = जेली = लकड़ी का एक डंडा जिसके सिरे पर त्रिशूल के आकार में तीन लकड़ी होती हैं । खणि-खणि = खोद-खोद कर । डाली घास-फूस, पेड़ पौधे । आछि बांधि = उत्साह, जोश के साथ । बाड़ = डौली, चारदीवारी । सील = ब्रह्मचर्यव्रत । बमेक = विवेक । डाँवजा = मचान ।  हरिहाई = हरा-हरा खाने की आदत वाले पशु जो अनधिकृत रूप से खेत में घुसकर फसल को खा जाते हैं । कमेत्याँ =खेती करने वाले, कमाई करने वाले । 
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लुणि-चुणि = काटकर, लावणी करके । खला = खलियान । सचेला = सावधान । बावड़ौ = खेत । सहँसकारि = संस्कार । सावढ़ तूटी = अच्छी मात्रा में प्राप्त । सिलैस = किसान खेत में से अन्न काटता है तब कुछ न कुछ उसमें से खेत में बिखरता है, उसे ही सिलैस कहते हैं । मेढि = लकड़ी । बिचालै = बीच में । सुबाव बाव = अच्छी हवा में, तेज हवा में बरसाया । 
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गाही = दाँय की, खाकले में से अन्न को निकालने के लिये खाकले युक्त अन्न पर बैलों को चलाया जाता है जिससे खाकला अलग हो जाता है तथा अन्य अलग हो जाता है । तेज हवा में दोनों को ऊपर से नीचे डालने पर हल्का खाकला दूर गिरता है तथा भारी अन्न गिराने वाले के सामने गिरता है । बैलों द्वारा खूंदने को दाँय करना, गाहना कहते हैं तथा ऊपर से नीचे गिराने को बरसाना कहते हैं, कहीं कहीं सलिया करना भी कहते हैं ॥
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मेरे गुरु महाराज ने राम-नाम रूपी बीज हरिभक्तों के हृदय रूपी खेतों में बोया है जिससे उनके स्वात्मतत्व रूपी शीतकालीन तथा उष्णकालीन दोनों ही फसलें भरपूर मात्रा में उत्पन्न हुई है । यह राम-नाम-साधना रूपी खेती कैसे-कैसे, किस-किस का सहकार लेकर की गई है, का विवरण देते हुए पदकार कहते हैं, विवेक और वैराग्य रूपी दो बैल हमारे पास सदैव रहते हैं । इन दोनों का व्यवहार लक्ष्यानुसार हो, एतदर्थ अनासक्ति और त्याग रूपी रस्सी तथा आर से इन्हें नियंत्रित किया जाता है । 
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साधक रूपी हाली इन विवेक-वैराग्य रूपी बैलों को बिना व्यवधान के लगातार संपादित करता है = हाँकता है । यदि कहीं बीच में मन रूपी आलस्य व्यवधान डालने का प्रयत्न करता है तो साधक रूपी हाली सूकारौ रूपी त्याग तथा अनासक्ति के द्वारा पुनः इनको लक्ष्योन्मुख करता है । खेती रूपी साधना करने के लिये मन रूपी हल है । प्राण रूपी फाल है । युक्ति रूपी जुड़ा है । गुरु का उपदेश रूपी जोत हृदय रूपी खेत में सदैव विद्यमान रहता है जिससे साषि = साख = फसल उत्पन्न होने की सारी सामग्री का सरंजाम = इंतजाम हो जाता है । 
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परमात्मा में अनन्य अनुराग ही नाड़ी है । श्रवण ही नाहीं है । श्रद्धापूर्वक भगवन्नाम का उच्चारण ही बीज का बपन = बोना है । गुरु महाराज के आदेश साधक ! आपको साधना करने की विधि सिखा दी गई है, कृपया अब साधना करना प्रारम्भ कर दो” को प्राप्त कर उसके अनुसार श्रद्धा-प्रीति पूर्वक साधना को करे । हाली रूपी साधक के पास हालण रूपी मनसा है जो प्रातः काल होते ही साधक रूपी हाली को भोजन रूपी साधना में उपयोगी सभी सामग्रियाँ, सद्गुणों को उपलब्ध करा देती है । 
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वह सद्गुण-सदाचार रूपी अन्न को पीसती है = संपादित करती है । उससे भोजन बनाती है = उनको आचरित करती है । सद्गुण-सदाचार के सहायक रूपी जल को कूवे रूपी अन्यों, साधकों के जीवनचरित्र = आचरणों को देखकर अपने में भी उत्पन्न करती है और साधक को साधना में निश्चल होकर सहायता करती है = बिना कुछ कहे अपने आप ही धन कमाती है, खेती का काम काज करती है । 
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साधक रूपी हाली के कंधे पर सदैव त्याग रूपी जेली रहती है जो ज्ञान रूपी कुदाली द्वारा अंतःकरण रूपी खेत में से निकाले गये महान पापी दुर्गुण दुर्विचारों रूपी घास-फूस, पेड़-पौधों को अपने में टाँग-टाँग कर बाहर निकाल फैंकती है । साधु-संतों की संगति में प्राप्त होने वाला ज्ञान ही साधक के लिये श्रावण का महीना है जिसमें खेती के लिये जल वर्षा होती है । भावभक्ति का उदय होना ही भाद्रपद मास के समान है । 
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पपीहा भाद्रपद मास में ‘पीव’ ‘पीव’ बोलता है । यहाँ प्राण = प्राणी = साधक पूरे उत्साह = जोश के साथ झड़लायौ = निरंतर भगवन्नाम का जप करने लगा । भजन-स्मरण में किसी प्रकार का कोई भी विघ्न न पड़े एतदर्थ विचार रूपी बाड़ साधक ने चारों ओर लगाई । शील = ब्रह्मचर्य अथवा सदाचरण उस बाड़ की सुरक्षा करता है । साधक विवेक रूपी मचान पर बैठकर विषय-विकारों की ओर सहज ही दौड़ने वाली चित्तवृति रूपी हरहाई जानवरों को आने से रोकता है । 
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इस प्रकार सुधी = लक्ष्यारूढ साधकों रूपी कृषकों ने साधना रूपी अच्छी मात्रा में फसल पैदा की । तेज का पुंज = परमात्मा रूपी अन्न खलियान रूपी हृदय में प्रकट हो गया, दीखने लगा । हाली रूपी साधक सदैव सावधान रहता है, कहीं किसी भी तरह से अन्न रूपी परमात्मा को विषयविकार रूपी चौर, चौरी करके न ले जाये । 
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वस्तुतः गुरु महाराज ने रामनाम रूपी बीज का कोठा = भण्डार जो उनके पास पहले से ही भरा हुआ रखा था = उनके द्वारा परीक्षत था = साधना किया हुआ था, को शिष्य रूपी खेत में अपना धर्म समझकर बोया = को प्रदान किया । शिष्य के पूर्वजन्म के संस्कारों से वह रामनाम की साधना प्रभूत मात्रा में = अच्छी प्रकार सफल हुई । 
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अन्य लोगों ने भी उसके उपदेशों से, साहचर्य से खूब लाभ लिया । साधक रूपी किसान ने अन्तःकरण रूपी खलियान में सुरति रूपी लकड़ी को गाड़ा = पूर्णरूपेण रामनाम मय बनाया । उसके सहारे चलने के लिये पांचों ज्ञानेन्द्रिय रूपी पाँच बैलों को गाहने में लगाया । जब गाहने से खाकला तथा अन्न अलग-अलग हो गये = आत्मा और अनात्मा तत्वों का स्पष्टतः बोध हो गया तथा ज्ञान रूपी हवा से ब्रह्मात्मैक्य का बार-बार अनुभव करने लगे । 
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जिससे कोठों के कोठे भरने लगे = अखंडानंद का अनुभव रूप बरसाने की क्रिया से खाकला उड़कर दूर हो गया तथा कण = अन्न रूपी परमात्मा अंतःकरण रूपी घर में प्रकट हो गया । फिर ज्ञान रूपी गाड़े में अन्नरूपी परमात्मा को ढोने लगे = अनुभव होने लगा । बषनां कहता है, गुरु महाराज की कृपा से मुझे नौनिधि रूपी परमात्मा मिल गया है जिससे जन्म-मरण रूपी सारा टोटा = नुकसान समाप्त हो गया है ॥८२॥

*७.आज्ञाकारी का अंग ~ ९/१२*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*७.आज्ञाकारी का अंग ~ ९/१२*
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नाम मिठाई विविध परि, जहाँ भरे हृद१ हाट ।
रज्जब मिल हिं उडाव तौं, मानुष माँखी ठाट२ ॥९॥
नाना प्रकार की मिठाई पड़ी रहने से हाट में मक्खियाँ उडाने पर भी आती हैं । वैसे ही ईश्वर आज्ञाकारी गुरु के हृदय१ में भगवान के नाना नाम-गुण भरे रहने से गुरु के पास मनुष्यों का समूह२ रहता है, वे हटाने से भी नहीं हटते ।
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रज्जब आज्ञा में ऊभा रहै, आज्ञा बैठे आय ।
आज्ञा में आडा हुआ, आज्ञा ऊठे जाय ॥१०॥
आज्ञाकारी आज्ञानुसार ही उठता है, बैठता है, आता है जाता है, आडा होता है, खड़ा रहता है, सभी व्यवहार आज्ञानुसार करता है ।
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आज्ञा में पति व्रत रहै, आज्ञा में धर्म नेम ।
रज्जब आज्ञा उर चढे, आज्ञा कुशल रु क्षेम ॥११॥
गुरु-गोविन्द की आज्ञा में रहने से ही पतिव्रत धर्म, वर्ण धर्म, आश्रम धर्म और साधन नियमों का पालन होता है । जब गुरु-गोविन्द की आज्ञा हृदय में जम जाती है तब उस आज्ञा द्वारा सदा आनन्द मंगल ही रहता है ।
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आज्ञा में आतम अरथ१, आज्ञा ऊरण२ होय ।
आज्ञा चले सु उद्धरे, साध कहैं सब कोय ॥१२॥
गुरु-गोविन्द की आज्ञा में चलने से ही आत्म-धन१ प्राप्त होता है, सब प्रकार के ऋणों से मुक्त२ होता है संसार से पार होकर परब्रह्म को प्राप्त होता है, ऐसा सब संत कहते हैं ।
(क्रमशः)

बुधवार, 25 मार्च 2026

यथेष्ट आशीर्वाद

*#daduji*
*॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥*
*॥ दादूराम~सत्यराम ॥*
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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आचार्य प्रकाशदेव जी महाराज परम कृपालु थे । इस ग्रंथ के लेखक पर भी उसकी महान कृपा थी । नारायणा दादूधाम के वार्षिक मेले में मैं नारायणा जाता था तब उस  मेले के समय जबकि उनको हजारों महानुभावों के साथ बातों में लगे रहने का प्रसंग रहता था । किन्तु फिर भी मेरे को नहीं भूलते थे । 
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मुझे अपने निवास के महल की छत पर बनी हुई एकान्त की कुटिया में ठहराकर मेरी संपूर्ण व्यवस्था ऊपर ही करा देते थे । उस मेले के समय पर रात्रि की नियत समय पर मेरे लिये दूध भिजवा देते थे । इससे निश्‍चय होता है कि मेरे जैसे साधारण जन का इतना ध्यान रखते थे तो यह उनकी परम कृपालुता का द्योतक कार्य हैं । आचार्य प्रकाशदेव जी महाराज ने अपने मंडल के सहित निम्नलिखित चातुर्मास किये थे । 
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१. बाबाजी गंगादासजी महाराज के यहां प्याऊ पर वि. सं. २००३ में किया था । यह चातुर्मास बहुत ही अच्छा हुआ था । २. संत गोर्धनदासजी महावीर वालों के  ३. राममोला महन्त रामूदास जी के  ४. नारायणा खेजडाजी के बाबा चैनजी की प्रेरणा से । 
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५. संत मांगीदासजी निवाई जमात वालों के वि. सं. २००६ में किया था ६. संत पूर्णदासजी मऊ वालों के  ७. संत भोलारामजी बडू वालों के  ८. संत गोविन्ददास जी रामपुरा वालों के  ९. महन्त दयारामजी गूलर वालों के  १०. राजगढ में रामनाथदासजी नारायणा वालों की ओर से 
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११. मेडता श्री कृष्णदेवजी की छत्री में बाबा गंगादासजी प्याऊ वालों की ओर से १२. विद्याद बाबा गंगादासजी की शिष्या मोहन बाई जी के  १३. बोडावड बाबा गंगादास जी की शिष्या मनोहर बाईजी के  १४. ईन्दावड भंडारी मंगलदासजी के । 
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उक्त सभी चातुर्मास आचार्य प्रकाशदेव जी महाराज के चातुर्मास की संपूर्ण मर्यादाओं से युक्त हुये । सभी में सत्संग, भजन, नाम संकीर्तन आदि साधन अति सुन्दर रीति से होते रहे थे । सभी में मर्यादानुसार भेंट आदि की प्रथा पूर्ण रुप से संतोष जनक रही थी और चातुर्मास कराने वाले मकानभावों को आचार्य जी की ओर से यथेष्ट आशीर्वाद प्राप्त हुये थे ।  
(क्रमशः)

२१. समर्थाई आश्चर्य को अंग ५७/६१

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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२१. समर्थाई आश्चर्य को अंग ५७/६१
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वचन तहां पहुंचै नहीं, तहां न ज्ञान न ध्यांन । 
कहत कहत यौं ही कह्यौ, सुन्दर है हैरांन ॥५७॥
आपके यथातथ वर्णन करने में न किसी की वाणी समर्थ है और न उसकी ज्ञानमय एवं ध्यानमय गम्भीर साधना ही । आपके विषय में शास्त्रों में भी जो कुछ कहा गया है वह भी पूर्ण नहीं है । आपका यह भक्त सुन्दरदास इसी से चकित(हैरान) है ! ॥५७॥
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नेति नेति कहि थकि रहे, सुन्दर चार्यौं बेद । 
अगह अकह अविशेष कौं, कोउ न पावै भेद ॥५८॥
बहुत साहस कर आपका वर्णन करना चाहने वाले समर्थ विद्वान् कुछ न्यूनाधिक कह कर अन्त में आप को 'नेति नेति'(अनिर्वचनीय = अवर्णनीय) कह कर मौन हो गये । वेद शास्त्र भी आप असाधारण को किसी भी प्रकार 'न जानने योग्य', 'न ग्रहण करने(समझने योग्य)’ कहकर चुप हैं । कहने का अभिप्राय यही है कि आप का वास्तविक भेद(ज्ञान) कोई भी नहीं जान पाया ॥५८॥
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किनहूं अंत न पाइयौ, अब पावै कहि कौंन । 
सुन्दर आगें होहिंगे, थाकि रहे करि गौंन ॥५९॥
इस प्रकार कोई भी शास्त्र या विद्वान् आज तक आप को 'इदमित्थम्'(आप यह हैं या ऐसे हैं) कर के नहीं पहचान सका । आगामी काल में भी आप को कोई यथातथ रूप से पहचान सकेगा - यह भी सम्भव नहीं दीखता । अतः हम भी थक कर इस विषय को यहाँ छोड़‌कर आगे बढ़ते हैं१ ॥५९॥ 
(१ तु० श्रीमद्भगवद्‌गीता : अच्छेद्योऽयमदाह्योऽयमक्लेद्योऽशोष्य एव च ॥
नित्यः सर्वगतः स्थाणुरचलोऽयं सनातनः ॥
अकोऽयमचिन्त्योऽयमविकार्योऽयमुच्यते। अ० २, श्लोक २४, २५.
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लौंन पूतरी उदधि मैं, थाह लेन कौं जाइ । 
सुन्दर थाह न पाइये, बिचि ही गई बिलाइ ॥६०॥
आप के विषय में पूर्ण ज्ञान करना तो ऐसा ही है जैसे कोई नमक की पुतली(मूर्ति) समुद्र की गहराई जानने के लिये उसमें फैंकी जाय । वह उसकी गहराई का पार तो क्या पायगी, अपितु वह स्वयं पिघल कर तद्रूप हो जायगी । यही स्थिति मेरे जैसे आपके सभी साधकों की हुई है ॥६०॥
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अनल पंखि आकाश मैं, उडै बहुत करि जोरि । 
सुन्दर वा आकास कौ, कहूं न पायौ छोर ॥६१॥
इति समर्थाई को अंग ॥२१॥
यहाँ श्रीसुन्दरदासजी एक अन्य उदाहरण भी देते हैं - जैसे कोई अनलपक्षी जीवनपर्यन्त अपनी पूर्ण शक्ति तथा वेग से आकाश में उड़ता रहता है तो भी वह उस आकाश का आदि(आरम्भ) या अन्त(समापन भाग) नहीं बता सकता; क्योंकि क्या कभी किसी ने उस आकाश के आदि या अन्त के किनारे का ज्ञान प्राप्त किया है ! ॥६१॥
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इति समर्थाई आश्चर्य का अंग सम्पन्न ॥२१॥
(क्रमशः) 

तहाँ भरै माली एक पाली

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🌷🙏 *卐सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*बहुगुणवंती बेली है, मीठी धरती बाहि ।*
*मीठा पानी सींचिये, दादू अमर फल खाहि ॥*
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*परिचय ॥*
तहाँ भरै माली एक पाली, सहज सींचै बेलि रे ।
बांध्यौ चड़स आवै, त्रिबेणी चढ़ि झेलि रे ॥टेक॥
नीर निरमल सिर सीतल, सहज कील्यौ सांधि रे ।
गगनि कूवा धरणिबाड़ी, ध्यान धोरा बांधि रे ॥
भोमि भीनीं बाह दीनीं, कमाई करि खाँति रे ।
पंच संगी सहजि लागे, नीपनी बहु भाँति रे ॥
गुरि बीज बाह्यौ ऊगि आयौ, बिरख बधतौ जाइ रे ।
तिहि बिरखि फल अमर लागौ, सो फल सूवौ खाइ रे ॥ 
रंगि रातौ रहै मातौ, भँवर बाड़ी मैं रमैं ।
फूल नाहीं बास आवै, मंन मधुकर जहाँ रमैं ॥ 
अमर फलियाँ हुई रलियाँ, पूगी मनह जगीस रे ।
रमैं बषनौं राम सेती, तहाँ बिसवावीस रे ॥८१॥
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माली = गुरु । पाली = क्यारी = चित्तवृति, हृदय । सीचैं बेलि = गुरूपदेशानुसार साधना करे । चित्त बांध्यौ = चित्त रूपी चड़स को लय रूपी रस्सी से बांधकर साधना रूपी कूवे में डुबोकर पुनः राम-नाम रूपी जल के साथ बाहर निकाले । सीर = स्त्रोत । कील्यौ = कीली, चड़स के पास चड़स को खींचने वाली रस्सी में लगी रहती है और जो चड़स को रोकने का काम करती है । 
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कूवा = सुषुम्ना का जल ऊपर से नीचे की ओर आता है । “स्त्रवै सुषुम्ना नीर फवारा । सून्य सिषर का यह व्यवहारा ॥” (श्रीरामचरणजी की वाणी) धरणि = हृदय, योग ग्रंथों के अनुसार मूलाधारचक्र जहाँ कुंडलिनी रहती है । धोरा = जिसमें होकर जल प्रवाहित होता है, नाली । भीनीं = भीग गई । बाह = बीज बो दिया । 
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खाँति = प्रेम के साथ, उत्साह-उमंग के साथ । पंचसंगी = पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ । नीपनी = खेती अच्छी उपजी, साधना निर्विघ्न पूर्ण हो गई । जगीस = जिजिविषा = मुमुक्षु ।  जहाँ माली रूपी सद्गुरु आत्मजिज्ञासु के पाली = क्यारी रूपी हृदय को जल रूपी उपदेश से भर देता है और आत्मजिज्ञासु सहजभाव से बेलि = वृक्ष रूपी साधना को सहज रूप में = जिस विधि से गुरु ने साधना करनी बताई है, उसी विधि से सींचै = करता है । 
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चित्त रूपी चड़स(कूवे में से पानी निकालने का पात्र जो चमड़े का बना होता है) को लै रूपी रस्सी से बांधकर निकालता है तथा त्रिवेणी(इड़ा-पिंगला तथा सुषुम्ना का मिलन स्थल, भ्रूमध्यस्थ) रूपी ढाणें = (कूवे का ऊपरी भाग जहाँ खड़े होकर चड़स को कूवे में उतारा व निकाला जाकर पानी में डाला जाता है । फिर वहीँ से पानी धोरों में होकर क्यारियों में जाता है) पर खड़े होकर लय = वृत्ति को झेलता = पकड़ता है । 
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वहाँ रामजी की प्रेममयी भक्ति रूपी शीतल = अजस्त्रस्त्रोत युक्त निर्मल नीर प्राप्त होता है । उसे सहज रूपी कील से रोक लेना चाहिये । कूप में बापिस नहीं जाने देना चाहिये । ब्रह्मरंध्र रूपी कूप, हृदय रूपी बाड़ी तथा ध्यान रूपी धोरे को भली प्रकार बना लेना चाहिये जिससे हृदय रूपी भूमि सिंचित हो जायेगी । फिर उसमें भक्ति रूपी बीज बो देना चाहिये और उस भक्ति को उत्साह के साथ प्रेमपूर्वक करनी चाहिये । 
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साधना में पांचों ज्ञानेन्द्रियाँ सहज ही सहयोग करने लगेंगी जिससे साधना रूपी खेती अच्छी मात्रा में उत्पन्न होगी । साधना अच्छी तरह परिपक्व होगी । गुरुमहाराज का उपदेश रूपी बीज = राम नाम जो उन्होंने प्रदान किया था को बो देने पर वह उग आया और साधना रूपी वृक्ष दिनानुदिन बढ़ता ही जाता है । 
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उस साधना रूपी वृक्ष के अमर = स्वात्मानंद रूपी फल लगता है जिसे जीव रूपी तोता खाता = भोगता है । वह जीव रूपी तोता स्वात्मानंद रूपी फल में ही रत है, उसी में मस्त रहता है । उस बाड़ी रूपी परमानंद = आत्मानंद रूपी बाड़ी में जीव रूपी भँवरा रसास्वादन करता हुआ रमता है । उस बाड़ी में न फूल रूपी विषयसुख है और न उनकी चाहना रूपी गंध है । 
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वहाँ आत्मानंद रूपी फल ही फल है जहाँ मन रूपी भँवरा सदैव मंडराता रहता है । अमर फल रूपी आत्मानंद के प्राप्त होते ही रलियाँ = आनंद ही आनंद रूपी सम्मिलन होता है । वस्तुतः अनेकों जन्मों की परमानंद को प्राप्त करने की जगीस = इच्छा पूर्ण हो गई । बषनां बिसवाबीस = पूर्णरूप से ऐसे अखंडानंद स्वरूप राम में रमण करता है ॥८१॥