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*॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥*
*॥ दादूराम~सत्यराम ॥*
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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अथ अध्याय १३ ~
१६ आचार्य दयारामजी ~
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आचार्य हरजीरामजी महाराज के ब्रह्मलीन होने पर वि. सं. १९५५ में वैशाख शुक्ला १२ मंगल को दादूपंथी समाज ने मिलकर दयाराम जी को आचार्य पद पर विराजमान किया । दयारामजी शरीर से सामलपुरा के खंडेलवाल ब्राह्मण थे ।
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दूसरे दिन ५२ धामों के पंचों को साथ लेकर गरीबदासोतों के महल में पधारे । गद्दी पर चौका बिछा कर आपको बैठाया गया तथा बोलतारामजी ने सामने खडे होकर ५१) रु. भेंट किये । आचार्य दयारामजी महाराज ने उनको शाल उढाई ।
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आचार्य दयारामजी के टीका ~
आचार्य दयारामजी के टीका का दस्तूर इस प्रकार आया था - जयपुर नरेश माधवसिंहजी ने १००) रु. १ घोडा और दुशाला । अलवर नरेश जयसिंहजी ने - विजय लक्ष्मी नामक हथिनी झूल सहित, दुशाला, मलमल पार्चाथान । उदयपुर महाराणा फतेहसिंहजी ने - दुशाला । जीन्द नरेश रणधीरसिंहजी ने १२५) रु. दुशाला । किशनगढ नरेश शार्दूलसिंहजी ने दुशाला । खेतडी नरेश अजीतसिंहजी ने- २५) रु. दुशाला । सीकर नरेश माधोसिंहजी ने १००) रु. दुशाला भेजा ।
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भजनादि व्यवहार ~
आचार्य दयारामजी महाराज का अधिक समय भजन में ही व्यतीत होता था । अर्धरात्रि के पश्चात् आप शय्या छोड कर छत पर भ्रमण करते हुए ४-५ घंटे नाम जपते रहते थे । दिन में भी गद्दी पर विराज कर उपनिषद् ग्रन्थों का मनन करते थे । संत महात्मा एवं सेवक - सती आपके तपोमय शरीर का दर्शन करके तथा आपके मुख से उपदेश सुनकर बहुत ही प्रसन्न होते थे और अपने को कृतकृत्य समझते थे ।
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भजन और तपस्या के प्रभाव से आपके शब्दों में ऐसी आर्कषण शक्ति थी कि कोई भी व्यक्ति दुर्भावना लिये हुये भी आपके सामने आता था, वह आपके २-४ शब्द सुनकर ही अपने असद् विचारों के लिये मन में लज्जित एवं विनीत होकर अनुकूल हो जाता था । आपका स्वभाव बहुत शांत था । आपके आशीर्वाद से अनेकों के क्लेश दूर हुये थे । आपकी शिक्षा न मानने वालों की हानि ही होती थी ।
(क्रमशः)














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