शनिवार, 3 अक्टूबर 2026

आत्मारामजी

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*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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*श्रम नहीं सब कुछ करै, यों कल धरी बनाइ ।*
*कौतिकहारा ह्वै रह्या, सब कुछ होता जाइ ॥*
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*२ आत्मारामजी*
आत्मारामजी अलखरामजी महाराज के शिष्य थे । इन्होंने अपना साधन धाम गुहाला में एक पहाड़ी की टेकड़ी पर बनाया और वहां रहकर भजन करने लगे । यह स्थान भी जनता का पूजनीय रहा है । इस स्थान पर विवाह के पश्चात् प्रणाम करने आते हैं । श्रद्धा रखते हैं । आत्मारामजी की समाधि कूप पर स्थान से कुछ ही दूर पर है । इनके चरण वि. सं. १८५२ में चेतनदासजी व लक्ष्मणदासजी ने पधराये हैं ।
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इनकी परम्परा के वर्तमान अधिकारी अपने को ७ वां बताते थे । चौथे लक्ष्मणदासजी पांचवें रामसहायजी छठे नारायणदासजी हुये । ७ वें रामरिछपालजी ने आत्मारामजी की जीवनी तथा अन्य मुझे कुछ भी नहीं बताया । रामसहायजी ने मोहनदासजी अवधूत का चातुर्मास २१ मूर्तियों के सहित वि. सं. १९६७ में कराया था तथा नारायण के आचार्य दयारामजी का चातुर्मास वि. सं. १९७९ में कराया था ।
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*अन्य शिष्य*
*३ मयारामजी* ने सिरोही में अपना साधन धाम बनाया । वहां रहकर ही दादूजी महाराज की वाणी द्वारा बताई गई पद्धति से ब्रह्म भजन करने लगे । यह सिरोही गुहाला के आसपास शेखावाटी में ही है ।
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*४ बलदेवजी* ने मागूकवास में अपना साधनधाम बनाया । वे वहां ही रहकर भजन करने लगे । आप भी अच्छे संत हुये हैं ।
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*कृपारामजी खेतड़ी*
*५ कृपारामजी* अलखरामजी द्वारा स्थापित स्थान खेतड़ी में १ कृपारामजी रहे । कृपारामजी तांत्रिक व वैद्य थे । इनकी खेतड़ी में अच्छी प्रतिष्ठा थी । उनके २ रामरूपजी ३ भक्तावरदासजी ये भी खेतड़ी के प्रसिद्ध वैद्य हुये हैं । ४ जयरामदासजी ये भी वैद्य ही थे । इस स्थान के नीचे अलखरामजी को प्राप्त हुई ५४०) रु. वार्षिक की जायदाद माफी में है । यह खेतड़ी नरेश ने दी थी ।
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*केवलदास जी*
*६ केवलदासजी* ने जैंतूसर(रींगस के पास) में अपना साधनधाम बनाया । प्रथम कुछ दिन रींगस में भी रहे थे । जैंतूसर के पास गूढ़ा ग्राम है, उसके अर्जुनसिंह राजपूत के भीखासिंह नामक एक ही पुत्र था । वह किसी भयंकर बीमारी में फंस रहा था । बहुत इलाज कर चुके थे । किन्तु ठीक नहीं होता था । जब मरणासन्न हो गया तब केवलदासजी को बुलाया ।
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पहले तो केवलदासजी नट गये किन्तु जब अति आग्रह किया तब वे बुलाने वाले के साथ गये और ग्राम के पास पहुंचे तब वह मर चुका था । ग्रामवालों ने कहा- वह तो मर गया । केवलदासजी ने कहा- फिर भी मैं आया हूं तो उसे देखना तो चाहता हूं । घर वाले रो रहे थे । केवलदासजी ने कहा- चुप रहो, यह तो सो रहा है । फिर सबको शव के पास से बाहर निकाल दिया और एक मात्र आप शव के पास एक घण्टा रहे । उस घण्टे में उसे जीवित कर दिया और उससे पूछा- क्या खायेगा ? उसने कहा- लड्डू । तब कपाट खोलकर उसे लड्डू देने को कहा । फिर तो सब परिवार में तथा ग्राम में आनन्द की लहर दौड़ गई ।
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फिर केवलदासजी उसी समय जैंतूसर पधार गये । बीमार के परिवार वालों ने भेंट देने का बहुत आग्रह किया किन्तु केवलदासजी ने कुछ भी नहीं लिया ।वि. सं. १८९० में जैंतूसर में आश्रम के पास कूप बनवाने लगे थे । कूप खोदना आरम्भ करने लगे तब लोगों ने कहा- हनुमानजी की पूजा करो । तब केवलदासजी ने कहा- हम दादूजी की पूजा करेंगे, उसी पूजा में सब की पूजा हो जायगी ।
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केवलदासजी की प्रतिष्ठा अधिक हो जाने से कुछ तांत्रिक इनसे ईर्ष्या करते थे । कारण- उनकी केवलदासजी के आगे कुछ भी शक्ति नहीं चलती थी । जो रोग तांत्रिकों के तंत्र-मंत्रादि उपायों से दूर नहीं होते थे उनको केवलदासजी विभूति देकर ही शीघ्र दूर कर देते थे । इससे वे लोग इनसे रुष्ट रहते थे और इनको मारने के लिये मूठादि प्रयोग भी उन लोगों ने किये थे किन्तु मूठादि भी केवलदासजी को मारने में सफल नहीं हुये थे । केवलदासजी वि.सं. १९२० के लगभग ब्रह्मलीन हुये थे । केवलदासजी की शिष्य परम्परा- १ केवलदासजी, २-प्रयागदासजी, ३-रामबगसजी, ४-गिरधारीरामजी, ५-कालीदासजी वर्तमान में हैं ।
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*दयारामजी*
*७- दयारामजी* ने उदयपुर(शेखावाटी) में टीटैड़ा पर अपना साधन धाम बनाया जो उदयपुर से जसात में जाने के मार्ग में पड़ता है । उक्त प्रकार अलखरामजी महाराज तथा उनके ७ शिष्यों का परिचय यथा प्राप्त दिया गया है । बाईजी के थांभा के स्थान- १- नारायणा, २- हरमाड़ा, ३- चूरू, ४- चौकड़ी, ५- गुहाला, ६- उदयपुर(शेखावाटी), ७- माणकवास, ८- खेतड़ी ९- सिरोही(शेखावाटी), १०- जैंतूसर, ११- भोवतपुरा, १२- सिकन्दरा, १३- रामगढ़ शहर, १४- रामतलाई कोटा(राजस्थान) ।
(क्रमशः)

*४७. अध्यातम कौ अंग ९७/१००*

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*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
*श्रद्धेय श्री Tapasvi @Ram Gopal Das की प्रेरणा से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Meta AI*
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*४७. अध्यातम कौ अंग ९७/१००*
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अण अक्षर व्यंजन सरस, घ्रित तत बस्त७ बिचार ।
कहि जगजीवन दूध दधि, गोरस हरि गुन सार ॥९७॥
(७-७. तत वस्त=मूल तत्त्व)
जैसे अक्षरों में व्यंजन में रस छिपा है, विचार करके देखो तो दूध, दही, गोरस में घी रूप मूल तत्व छिपा है, जगजीवन दास जी कहते हैं कि वैसे ही इस सारे संसार में दूध-दही के घी की तरह हरि के गुणों का सार ही सार रूप में बसा हुआ है ।
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रांम कह्या तिन सब लह्या, रांम गह्या निज मूल ।
कहि जगजीवन रांम तहां, सहज थंभ्या अस्थूल८ ॥९८॥
{८. अस्थूल=स्थूल बाह्य जगत्)} 
जिसने राम नाम कह लिया, उसने सब कुछ पा लिया, जिसने राम को अपने मूल रूप में पकड़ लिया । जगजीवन दास जी कहते हैं कि जहाँ राम हैं वहाँ बाहरी स्थूल जगत का भटकाव सहज ही थम जाता है, रुक जाता है ।
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देहि चलै ना मन चलै, जे रस प्यावै रांम । 
कहि जगजीवन पिछांणै, परम पुरिश सब ठांम ॥९९॥
जिसे राम अपने प्रेम-भक्ति का रस पिला देते हैं, फिर उसकी देह सांसारिक विषयों में नहीं चलती और मन भी नहीं भटकता । जगजीवन दास जी कहते हैं कि ऐसा भक्त फिर सब जगह परम पुरुष परमात्मा को ही पहचानने लगता है ।
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रवि ससि९ दोऊ षं करि, प्रेम डोर१० ल्यौ लाइ ।
कहि जगजीवन आतमां, तहँ झूलै सुख पाइ ॥१००॥
(९-९.रवि ससि=इडा, पिंगला नाड़ी)   (१०. प्रेम डोर=प्रेमा भक्ति)
इड़ा-पिंगला रूपी सूर्य-नाड़ी और चंद्र-नाड़ी दोनों को रोककर, अर्थात प्राणों को सुषुम्ना में स्थिर करके, प्रेम-भक्ति की डोरी से लौ लगाती है । जगजीवन दास जी कहते हैं कि तब आत्मा उसी प्रेम के झूले में सुख पाकर झूलती है, आनंद में मगन हो जाती है ।
(क्रमशः)

शुक्रवार, 2 अक्टूबर 2026

गरीबों का पेट

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*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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*सांई कारण सब तजै, जन का ऐसा भाव ।*
*दादू राम न छाड़िये, भावै तन मन जाव ॥*
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उनकी उक्त प्रार्थना सुनकर अलखरामजी ने आसन से उठकर अपनी लंगोट को फटकारते हुये हिम वर्षा को चौकड़ी की सीमा से अलग भेज दिया । तभी से आसपास के सभी किसानों ने अलखरामजी के डूंगरी के मंदिर की पूली बांध दी । एक किसान की एक पूली में १०-१२ किलो गेहूँ निकल आते हैं, पूली एक गेहूँ की ही बांधी गई थी, वही आती है ! तब से आजतक चौकड़ी की सीमा में हानिकारक ओले नहीं पड़े हैं । 
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एक समय जयपुर नरेश ईश्वरीसिंह के पेट में दर्द रहने लगा था । वैद्य आदि ने बहुत चिकित्सा की किन्तु दर्द नहीं मिटा । तब किसी ने राजा को कहा - चौकड़ी में एक छोटी-सी डूंगरी पर अलखरामजी संत निवास करते हैं । यदि वे यहाँ आजायें तो उनकी कृपा से आपका दर्द अवश्य मिट सकता है । तब राजा ने सवारी भेजकर अलखरामजी को बुलवाया । अलखरामजी पधार गये । 
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राजा ईश्वरीसिंह ने मर्यादा पूर्वक उनको प्रणाम करके और सामने बैठकर कहा - महाराज मेरा पेट बहुत दुखता है, बहुत इलाज करा लिये किन्तु दुखना नहीं मिटा । अतः कृपा करके मेरे पेट का दुखना मिटा दें । राजा की उक्त प्रार्थना सुनकर अलखरामजी ने कहा - तुम यदि अब से आगे गरीबों का पेट नहीं दुखाओ तो तुम्हारा पेट भी अब नहीं दुख सकेगा । राजा ने अलखरामजी महाराज के आगे प्रतिज्ञा की कि - "मैं गरीबों का पेट कभी नहीं दुखाऊंगा ।" बस इतना कहते ही राजा के पेट का दर्द मिट गया । 
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फिर राजा ने अलखरामजी महाराज के ११००) ग्यारह सौ रु. भेंट किये । अलखरामजी ने वे रुपये उसी समय गरीबों को बांट दिये । राजा को ज्ञात हुआ कि अलखरामजी ने तो सब रुपये गरीबों को बांट दिये कुछ नहीं रखा । तब राजा ने पुनः प्रार्थना की - भगवन् ! आपके स्थान पर मैं कुछ सेवा करता रहूँ, ऐसी आज्ञा दीजिये । अलखरामजी ने कहा - तुम स्थान पर रोशनी का प्रबन्ध कर दो । राजा ने १०) रु. मासिक रोशनी के लिये बांध दिये । उस समय १०) रु. का तेल बहुत आता था । वे १०) रु. अब तक मिलते हैं । 
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एक वर्ष में १२ मण सांभर का नमक भी पहले जयपुर राज्य की ओर से आता था । वह भी राजा ईश्वरीसिंह का ही बांधा हुआ था । एक समय खेतड़ी नरेश अभयसिंह राजावतों से बबाई ग्राम छीनने के लिये युद्ध की तैयारी कर रहे थे । सुना जाता है कि राजावतों के पक्ष में एक नाथ संप्रदाय का सिद्ध संत था । उसकी करामात से युद्ध में विजय पाना कठिन समझा जा रहा था । अतः उस सिद्ध की शक्ति को कुंठित करने के लिये खेतड़ी नरेश अभयसिंह को भी एक सिद्ध संत की सहायता की आवश्यकता पड़ी और पूरां करामाती महात्मा की खोज होने लगी । 
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तब मुलकपुरिये सरदार जो खेतड़ी नरेश के उस समय के वीर सैनिकों में मुख्य थे, वे अलखरामजी की शक्ति से परिचित थे और उनको ही अपना पूजनीय गुरु भी मानते थे । अतः खेतड़ी नरेश अभयसिंह को उन्होंने अलखरामजी की शक्ति का परिचय दिया । तब राजा ने कहा - आप जाकर उन्हें खेतड़ी लाओ । राजाज्ञा से मुलकपुरिये ठाकुर अलखरामजी के पास गये और खेतड़ी पधारने की प्रार्थना की । 
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अलखरामजी महाराज ने प्रार्थना स्वीकार करके कहा - तुम चलो मैं तुमको आगे मिलूंगा । मुलकपुरिये ठाकुर ने पूछा - आगे कहां मिलेंगे ? अलखरामजी ने कहा - खेतड़ी में पहाड़ी पर श्मशान भूमि है, वहां एक सती की मंढ़ी है, उसी में मुझे देख लेना । ऐसा कहकर ठाकुर को विदा कर दिया । ठाकुर खेतड़ी पहुंचकर श्मशान भूमि में गया और सती की मंढ़ी में अलखरामजी महाराज को भजन करते हुये देखा । देखते ही ठाकुर को अति आश्चर्य हुआ । फिर अलखरामजी महाराज की शक्ति से नाथ सिद्ध की शक्ति कुंठित हो गई और यथा समय खेतड़ी की सेना ने हमला करके विजय प्राप्त की । उसी समय अलखरामजी महाराज ने खेतड़ी के स्थान की स्थापना की थी । 
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अलखरामजी महाराज अपने समय के महान् सिद्ध संत थे । अलखरामजी महाराज के सात शिष्य थे - १- आत्मारामजी २- मयारामजी ३- बलदेवदासजी ४- कृपारामजी ५- दयारामजी ६- रामधनजी ७- केवलदासजी । अलखरामजी महाराज वि. सं. १८९१ भादवा सुदि ९ शुक्रवार को ब्रह्मलीन हुये । उनकी गद्दी पर चौकड़ी में उनके शिष्य रामधनजी विराजे । चौकड़ी स्थान की परंपरा इस प्रकार है १- चेतनदासजी २- क्षेमदासजी ३- सुखरामजी ४- अलखरामजी ५- रामधनजी ६- रामदासजी ७- रामरतनजी ८- बालदासजी ९- हीरादासजी १०- श्यामदासजी वर्तमान हैं ।
(क्रमशः)

*४७. अध्यातम कौ अंग ९३/९६*

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*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Meta AI*
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*४७. अध्यातम कौ अंग ९३/९६*
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मूल चक्र इन्द्री चक्र, नाभि चक्र निज ठांम ।
कहि जगजीवन ह्रिदै चक्र मंहिं, बिन रसनां रटि रांम ॥९३॥
संत जगजीवन दास जी कहते हैं कि मूलाधार, स्वाधिष्ठान(इन्द्री) चक्र और नाभि चक्र - ये तीनों अपने-अपने स्थान पर स्थित हैं । ये साधना की प्रारम्भिक सीढ़ियाँ हैं । इनसे ऊपर उठकर जब साधक हृदय चक्र में आता है, तब वहाँ जीभ से नहीं, बल्कि बिना रसना के ही - अजपा जाप से - निरन्तर राम नाम का स्मरण चलने लगता है । यही सच्चा आंतरिक भजन है ।
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कंठचक्र करतार हरि, भंवरचक्र पिव पास ।
ए षट चक्र निवास हरि, सुकहि जगजीवनदास ॥९४॥
कंठ चक्र में सृष्टि के करतार - सृजनहार - हरि का निवास है, वहाँ वाणी शुद्ध होती है । और भँवर चक्र - आज्ञा चक्र / सहस्रार - में पहुँचकर जीव अपने प्रियतम परमात्मा के अत्यंत निकट, उसके पास पहुँच जाता है । जगजीवन दास जी सुखपूर्वक कहते हैं कि इस प्रकार ये जो षट् चक्र हैं, वे और कुछ नहीं, बल्कि उस एक हरि के ही निवास स्थान हैं ।
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यहु परंपरा१ सुद्धता बांण, हरि भजि रांम पिछांण ।
कहि जगजीवन ऊपजै, आनंद सौं चित आंण ॥९५॥
(१. परंपरा=वाणी की शुद्धता हेतु योगियों की परम्परा)
यह योगियों की परम्परा से चली आई वाणी की शुद्धता का मार्ग है । हे जीव ! हरि को भज और राम को पहचान । जगजीवन दास जी कहते हैं कि इससे चित्त में आनंद के साथ(परमात्मा का) प्राकट्य होता है ।
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मायाधर२ मनसा रमण, विद्याधर३ विद्वांस४ ।
कहि जगजीवन ग्यांनधर५, पारब्रह्म के अंस६ ॥९६॥
(२. मायाधर=पाषण्डी पुरुष)   (३. विद्याधर=विद्याप्रेमी) 
(४. विद्वांस=शास्त्रज्ञ)    (५. ग्यांनधर=ज्ञानी)   (६. पारब्रह्म के अंस=परब्रह्म के अंग हो जाते हैं)
इस दोहे में चार प्रकार के पुरुष बताये हैं -
मायाधर - जो माया में रमण करने वाला पाखण्डी है, विद्याधर - जो केवल विद्या से प्रेम करने वाला है, विद्वांस - जो केवल शास्त्रों को जानने वाला है, और ज्ञानधर - जो सच्चा ज्ञानी है ।
जगजीवन दास जी कहते हैं कि इनमें से ज्ञान को धारण करने वाला ज्ञानी ही पारब्रह्म का अंश - अंग - बन जाता है, उसी में लीन हो जाता है ।
(क्रमशः)

गुरुवार, 1 अक्टूबर 2026

योग-शक्ति बलवान

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*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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*दादू सिरजनहारा सबन का, ऐसा है समरत्थ ।*
*सोई सेवक ह्वै रह्या, जहँ सकल पसारैं हत्थ ॥*
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एक दिन अलखरामजी कुछ भक्तों के साथ डूंगरी पर विराज रहे थे कि सहसा आकाश से कुछ गेहूं के दाने सबके बीच में पड़े । तब भक्तों ने पूछा - भगवन् ! गेहूं के दाने आकाश से किसने डाले ? अलखरामजी ने कहा - एक सेवड़ा अपनी मंत्र शक्ति से गेहूं की राशि आकाश मार्ग द्वारा उड़ा कर ले जा रहा है । उसी राशि से ये दाने यहां पड़ गये हैं । अलखरामजी की डूंगरी पर आते ही गेहूं की राशि की उड़ान मंद पड़ गई थी । इससे कुछ दाने वहां पड़ गये थे यह बात अलखरामजी ने भक्तों को बताई ।
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तब वहां बैठे हुए सभी भक्तों ने प्रार्थना की कि महाराज ! यह गेहूं की राशि यहां से आगे नहीं जानी चाहिये । चौकड़ी की सीमा से आगे जाने पर आप जैसे संतों का अपमान होगा । भक्तों की प्रार्थना से अलखरामजी ने गेहूं की राशि को अपनी योग शक्ति से वहां ही गिरा ली । कारण - मंत्र शक्ति से योग-शक्ति बलवान होती है । कहा भी है -
मंत्र शक्ति से योग की, शक्ति अधिक दिखलाय ।
अलखराम ने नाजकी, राशि लिई पटकाय ॥२७॥ह.त.१०॥
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अतः सेवड़ा की मंत्र शक्ति गेहूं राशि को आगे नहीं ले जा सकी । गेहूं की राशि की नियत समय पर जब उस सेवड़े के पास नहीं पहुँची और इधर यह बात भी अति शीघ्र चारों ओर फैल गई थी कि अलखरामजी ने आकाश मार्ग से जाती हुई गेहूं की राशि अपने स्थान डूंगरी पर गिरा ली है, वे अति समर्थ संत हैं । सेवड़ा के पास भी यह बात शीघ्र ही पहुँच गई । सेवड़ा यह सुनकर अति क्रुद्ध हो गया और उसने अलखरामजी को मारने के लिये ३ फुट लम्बी, दो फुट चौड़ी और दो फुट मोटी शिला अपनी मंत्र शक्ति से अलखरामजी पर चलाई ।
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वह शिला अलखरामजी की डूंगरी पर आई तब उसके आने का भारी शब्द हुआ । अलखरामजी बैठे भजन कर रहे थे । उनको ज्ञात हो गया कि यह शिला सेवड़ा की चलाई हुई आई है । वे अपनी योग शक्ति से उसे पीछे लौटाकर सेवड़ा को मार सकते थे किन्तु वे संत थे । ऐसा कैसे कर सकते थे । उन्होंने शिला को कहा - यहां ही गिरजा क्यों चक्कर काट रही है ? कारण - अलखरामजी पर तो पड़ नहीं सकती थी । इससे वहां चक्कर काट रही थी ।
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अलखरामजी की आज्ञा से वहां ही जिस स्थान पर गिरने का हाथ से संकेत किया वहां ही गिर गयी । उसे देखकर अलखरामजी ने कहा - अच्छी आई हमारे स्नान के लिये काम आयेगी ऐसी शिला यहां थी भी नहीं । वह शिला अभी तक वहां ही पड़ी है । फिर अपनी शक्तियों को कुंठित देखकर सेवड़ा डर गया तथा सोचा अब तो अलखरामजी की शरण जाना ही अच्छा है । वह अलखरामजी महाराज की शरण में आया और प्रणाम करके दीन भाव से क्षमा मांगने लगा ।
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अलखरामजी ने कहा - क्षमा तो तब करेंगे जब तुम आगे ऐसा काम न करने की प्रतिज्ञा करोगे । तुमने कुछ भी नहीं सोचा कि जिस किसान ने कितना परिश्रम करके गेहूं तैयार किया था, उसके लिये कुछ भी नहीं छोड़ा सब उड़ा लाये, यह कितना अन्याय है । सेवड़े ने कहा - आज्ञानुसार ही करूंगा । आगे मैं ऐसा कभी भी नहीं करूंगा । फिर अलखरामजी ने पूछा - कहां से और किसका उड़ाया था ? उसका पता हम को बताओ या इस गेहूं राशि को जहां से उड़ाई थी वहां ही पहुँचा दो ।
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फिर अलखरामजी को उसने कहा - बताने से तो मेरे पर विपत्ति आयेगी, सरकार मुझे तंग करेगी । अतः मैं इसको जहां से लाया वहां ही पहुँचा देता हूं । आप तो सर्वज्ञ हैं सब जानते हैं किन्तु मेरे हित के लिये ही मुझे कह रहे हैं । अतः इसको गुप्त ही रहने दें किसी को नहीं बतावें कि - अमुक के गेहूं थे और अमुक ने उड़ाये थे । अलखरामजी ने कहा - इस गेहूं राशि को ठिकाने भेज दो ।
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सेवड़ा ने भेज दी और अलखरामजी ने अपनी योग शक्ति से जान लिया कि जिसके गेहूं थे उसके पास पहुँच गये और सेवड़ा अलखरामजी को प्रणाम करके अपने घर आ गया । एक दिन अलखरामजी भक्तों व शिष्यों के सहित डूंगरी के स्थान में विराज रहे थे और दादूराम मंत्र की ध्वनि कर रहे थे । फाल्गुण का महीना था । उस समय गुहाला की ओर से ओलों की वर्षा आने लगी । ध्वनि करने वाले भक्तों ने जब उसे देखा तो घबरा कर बोले - महाराज ! इन ओलों से सारी खेती नष्ट हो जायेगी और किसान बुरी तरह मारे जायेंगे । अतः आपसे प्रार्थना है - आप इस विपत्ति से चौकड़ी को तो अवश्य बचावें ही ।
(क्रमशः)

*४७. अध्यातम कौ अंग ८९/९२*

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*४७. अध्यातम कौ अंग ८९/९२*
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आधारे आधार हरि, स्वाधिष्टांन हरि ग्यांन ।
मणिपूर पूरण ब्रह्म हरि, अनाहद धरि ध्यानं ॥८९॥
संत श्री जगजीवन दास जी कहते हैं कि मूलाधार चक्र में आधार स्वरूप परमात्मा हरि का निवास है । स्वाधिष्ठान चक्र में उसी हरि को ज्ञान स्वरूप में जानो । मणिपूर चक्र में वे ही पूर्ण ब्रह्म के रूप में स्थित हैं और अनाहत चक्र में उन्हीं का ध्यान धरना चाहिये । अर्थात् प्रत्येक चक्र में उसी एक हरि की ही अनुभूति करनी है ।
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कहि जगजीवन विसुद्ध शुद्ध मन, आग्या अम्रित पांन ।
पार ब्रह्म सूँ प्रीति करि, रांम परसि तजि आंन ॥९०॥
विशुद्ध चक्र में मन को पूर्ण रूप से शुद्ध करके और आज्ञा चक्र में अमृत का पान करके, अर्थात् कुण्डलिनी को ऊपर उठाकर ब्रह्मरंध्र के अमृत का अनुभव करके, उस पारब्रह्म परमात्मा से ही सच्ची प्रीति जोड़ो । एक श्री राम के स्पर्श - भजन में ही लगो और अन्य सभी आसक्तियों को छोड़ दो ।
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षट चक्र पिछांण धरि, हरि भजि रांम निवास ।
परम जोति तन मन बिलै५, सु कहि जगजीवनदास ॥९१॥
{५. बिलै=लीन(अन्तर्भूत) कर}
इस प्रकार इन षट् चक्रों को पहचान कर, इनमें स्थित रहस्य को धारण करके, जो हरि का भजन करता है और राम के निवास - स्वरूप में लीन रहता है, उसका तन और मन दोनों परम ज्योति स्वरूप ब्रह्म में लीन हो जाते हैं - बिलय हो जाते हैं । ऐसा संत जगजीवन दास जी कहते हैं ।
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तेज पुंज प्रकास हरि, रंध्र रोधि६ रस चाखि ।
कहि जगजीवन भगति करि, अनहद बांणी भाखि७ ॥९२॥
(६. रोधि=नव द्वारों पर संयम कर)   (७. भाखि=बोले) 
जब साधक नव द्वारों पर संयम करके - इन्द्रियों को रोककर - ब्रह्मरंध्र में स्थित तेज के पुंज, प्रकाश स्वरूप हरि के दिव्य रस को चख लेता है, तब उसके हृदय में अनहद नाद की वाणी स्वयं प्रकट होने लगती है । जगजीवन दास जी कहते हैं कि यही सच्ची भक्ति है ।
(क्रमशः) 

बुधवार, 30 सितंबर 2026

*सिद्ध संत अलखरामजी*

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*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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*साचा सांई शोध कर, साचा राखी भाव ।*
*दादू साचा नाम ले, साचे मारग आव ॥*
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*संत सुखरामजी*
फिर जैसा सिद्ध संत ने क्षेमदासजी को कहा था- तुम्हारे शिष्य तथा पौत्र शिष्य सिद्ध संत होंगे। उनके कथनानुसार ही क्षेमदासजी के शिष्य सुखरामजी सिद्ध संत ही हुये । क्षेमदासजी का देहान्त वि. सं. १७९७ में हो गया और उनकी गद्दी पर सुखरामजी महाराज विराजे । उनकी उस प्रदेश में अच्छी प्रतिष्ठा हुई । उनको मानने वाले भक्तों की भी संख्या बहुत हो गयी थी । आपके साधन भजन के द्वारा आपकी कीर्ति दूर दूर तक फैल गई थी ।
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खंडेला नरेश वृन्दावनदास के पुत्र नहीं होता था, इससे वे बहुत व्यथित रहते थे । उन्होंने संत सुखरामजी की महिमा सुनी तब अपनी अभिलाषा पूति के लिये वे संत सुखरामजी के पास चौकड़ी की डूंगरी पर आये और मर्यादा पूर्वक प्रणामादि करके हाथ जोड़े हुये सामने बैठे गये और अवकाश देखकर सुखरामजी से प्रार्थना की- भगवन् ! मेरे पुत्र नहीं है इससे मैं व्यथित रहता हूं और इस अभाव की पूति के लिये ही आपके पास आया हूं आप तो सर्व हितैषी संत हैं । अतः मुझे आशा है मेरी इच्छा आप अवश्य पूरी कर देंगे । 
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सुखरामजी ने उनको पुत्र होने का वर दे दिया । फिर उस वर से धीरज का जन्म हुआ । पुत्र प्राप्ति पर खंडेला नरेश वृन्दावनदास ने दो कृषि भूमि युक्त कूप भेंट किये । एक दूधवालों के बास में और एक नागल बैपुस में दिया तथा वैसे भी वे आपकी सेवा अनेक समय किया करते थे। उस समय सुखरामजी की शेखावाटी में बहुत प्रतिष्ठा थी और सुखरामजी महान् संत थे । उनका मन ब्रह्म भजन में ही प्रायः रहता था। सुखरामजी के शिष्य अलखारामजी हुये । सुखरामजी वि. सं. १८२७ श्रावण सुदि १२ गुरुवार को ब्रह्मलीन हुये थे ।
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*सिद्ध संत अलखरामजी*
सुखरामजी की गद्दी पर उनके शिष्य अलखरामजी विराजे । ये महान् सिद्ध संत हुये । अलखरामजी के समय से वह डूंगरी अलखरामजी की ही कहलाने लग गई है और अब तक अलखरामजी की ही कहलाती है । सारी पहाड़ी पर ही स्थान बना हुआ है । वह महान तपोभूमि है । अभी भी वहां की मर्यादा पूर्वक सेवा पूजा होती है । 
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खेतड़ी नरेश अमरसिंह के भोजन करने का रत्नजटित स्वर्णथाल खोया गया था । नरेश ने उसका पता लगाने का बहुत प्रयत्न किया किन्तु उसका कुछ भी पता नहीं लगा । उसका पता लगाने के लिए उसने सोचा अलखरामजी महाराज सिद्ध पुरुष हैं । अतः उनके पास जाने से पता लग सकता है । फिर वे अलखरामजी के पास डूंगरी पर गये और श्रद्धा पूर्वक प्रार्थना करके उनको खेतड़ी लाये । 
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पांच दिन तक अलखरामजी के पास बैठ कर सत्संग करते रहे । छठे दिन अमरसिंह का मुख मंडल उदास देखकर अलखरामजी ने पूछा- "राजन् ! आज आपका मुख उदास क्यों है ? क्या सोच रहे हो ? सत्य कहो ।" खेतड़ी नरेश ने कहा- भगवन् ! मेरे भोजन करने का रत्न जटित स्वर्णथाल खोया गया । उसका पता लगाने का बहुत यत्न भी किया किन्तु उसका कुछ भी पता नहीं लगा । उसे याद कर मेरे मन में यह विचार प्रकट हुआ कि जब मेरे थाल का भी मैं पता नहीं लगा सका तब प्रजा की वस्तुयें कहीं खोई जायें उनका पता क्या लगा सकूंगा ? यह सोच करके ही मेरा मुख उदास है । 
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राजा की उक्त बात सुनकर अलखरामजी कुछ मौन रहे फिर बोले- राजन् ! चिन्ता मत करो थाल तो राज भवन में ही है । यह मैंने अपनी योगशक्ति से जान लिया है । राजा ने पूछा कहां है ? अलखरामजी ने कहा- राजभवन में जो कूप है उसमें पड़ा है । चुराने वाली ने भय के मारे डाल दिया था । फिर उसी क्षण अपनी योगशक्ति से कूप से निकालकर जल से भरा थाल राजा के सम्मुख रख दिया । उसे देखकर राजा को अति आश्चर्य हुआ । फिर उसके मन में संशय हुआ यह कूप से आया है इसमें क्या प्रमाण । 
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उसका निश्चय करने के लिये राजा विचार कर रहे थे कि उन्हें स्मरण आया कि एक दिन स्मरण करने की मेरी माला भी कूप में पड़ गई थी । यदि वह भी मेरे पास आ जाय तो मुझे निश्चय हो जायगा कि यह थाल भी कूप से आया है । अलखरामजी महान् योगीराज थे, राजा के मन की बात उसी क्षण जान गये । फिर राजा ने कहा — महाराज मेरी स्मरण करने की माला भी कूप में गिर गई थी । उसे भी मंगवा दीजिये । अलखरामजी ने कहा — तुम्हारी स्मरणी तुम्हारी जेब में देखो । 
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राजा ने जेब में देखी तो वह स्मरणी जो कूप में गिरी थी जेब में मिल गई । फिर राजा के आश्चर्य और आनन्द की सीमा भी नहीं रही अर्थात् अति आश्चर्य और आनन्द हुआ  ।फिर तो खेतड़ी नरेश अमरसिंह की सिद्ध संत अलखरामजी महाराज पर बहुत श्रद्धा हो गई । फिर राजा ने अलखरामजी की इच्छानुसार अलखरामजी की डूंगरी पर अच्छा मन्दिर बनवाया और इस डूंगरी के मन्दिर के तीसरे मंजिल पर चेतनदासजी तथा क्षेमदासजी की स्मारक छत्री बनवाई । 
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वह मन्दिर अब भी अच्छी स्थिति में है । खेतड़ी नरेश ने स्थान की सेवा के लिये सात कूप कृषि के योग्य भूमि वाले अलखरामजी के भेंट किये और वैसे भी राजा अमरसिंह अपने जीवनकाल में डूंगरी के मन्दिर की व वहां के संतों की सेवा करते ही रहते थे । चौकड़ी के ठाकुर भक्तसिंह के पुत्र जवानीसिंह के पुत्र नहीं हुआ था । इससे उन्होंने अलखरामजी से प्रार्थना की । फिर सिद्ध संत अलखरामजी ने उनको पुत्र प्राप्ति का वर देकर प्रसन्न किया था । 
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अलखरामजी के वर से उनके अर्जुनसिंह और भीमसिंह दो पुत्र हुये । अपनी अभिलाषा पूर्ण होने से प्रसन्न होकर चौकड़ी ठाकुर साहब ने अलखरामजी महाराज के ३५१ बीघा भूमि भेंट की थी और भी सेवा करते ही रहते थे । अलखरामजी महाराज दादूवाणी का विचार करते ही रहते थे । उस वाणी द्वारा बताई गई साधन पद्धति से वे सिद्धावस्था को प्राप्त हुये थे । उनकी दिव्य दृष्टि हो गई थी । सिद्धियां प्राप्त होने पर भी वे निर्गुण ब्रह्म की भक्ति में ही संलग्न रहते थे तथा जिज्ञासु साधकों को उपदेश भी करते थे ।
(क्रमशः)

*४७. अध्यातम कौ अंग ८५/८८*

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*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
*श्रद्धेय श्री Tapasvi @Ram Gopal Das की प्रेरणा से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Meta AI*
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*४७. अध्यातम कौ अंग ८५/८८*
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ए ही गोरख भरथरी, ए ही संकर दत्त ।   
कहि जगजीवन रांम रटि, जे रहैं रांम सौं रत्त ॥८५॥
जो भी राम के रंग में रंगा रहता है और राम नाम रटता है, वही सच्चा गोरख है, वही भरथरी है, वही शंकर और वही दत्तात्रेय है । जगजीवन साहब कहते हैं कि जाति-वेश से नहीं, राम से प्रेम में ही जीव महापुरुष बनता है ।
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मूल चक्र मन मांहि हरि. इन्द्री चक्र अगाध ।
नाभि चक्र बिसतरि बस्त, हरि हरि सुमिरैं साध ॥८६॥
संत जगजीवनदास जी महाराज कहते हैं कि मूलाधार चक्र में मन को लगा कर हरि को देखो, स्वाधिष्ठान जो इन्द्रियों का अगाध चक्र है, और नाभि चक्र में जो सृष्टि का विस्तार बसा है - इन सब में साधु जन हरि-हरि का ही सुमिरन करते हैं ।
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रिदा चक्र मंहि रांमजी, कंठ चक्र रस बाधि ।
कहि जगजीवन भ्रुवों चक्र मांहि, परम जोति घर लाधि ॥८७॥
हृदय चक्र में राम जी का वास है, कंठ चक्र में भक्ति के रस को बाँधो, और संत जगजीवन जी कहते हैं कि दोनों भौंहों के बीच वाले आज्ञा चक्र में ही परम ज्योति का घर मिल जाता है ।
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ए षट चक्र सिद्धांत सिधि३, बिरह अगनि तन दाधि४ ।
कहि जगजीवन जन मिलै, अबिगत कौं आराधि ॥८८॥
(३.सिद्धांत सिधि=योगशास्त्र पर प्रसिद्ध ग्रन्थ सिद्धसिद्धान्तपद्धिति)
(४. दाधि=जल कर)
ये छहों चक्र सिद्ध-सिद्धान्त-पद्धति ग्रन्थ का सार हैं । जो इनमें विरह की अग्नि से तन को जला देता है - अर्थात तपाता है, संत जगजीवनदास जी महाराज कहते हैं कि - वही जन अवगत - उस अगम्य राम की आराधना कर के उससे मिल पाता है ।
(क्रमशः) 

मंगलवार, 29 सितंबर 2026

*बाईजी श्यामकुमारीजी की परम्परा*

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*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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*समता के घर सहज में, दादू दुविध्या नांहि ।*
*सांई समर्थ सब किया, समझि देख मन मांहि ॥*
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*अथ अध्याय ७*
*बाईजी श्यामकुमारीजी की परम्परा*
श्यामकुमारी(रूपकुमारी) जी का स्थान बाईजी की पालकां व पालिकां के ऊपर के दो मंजिल दो मकानात् भी हैं । आपके शिष्य बालवेणी जी थे-"श्री बाईजी रूपकुमारी के बालवेणि पिख" रा. भक्तमाल मू. ६५७ में लिखा है । आपकी परम्परा का मुख्य स्थान वर्तमान में चोकड़ी(शेखावाटी) में है और वर्तमान में अलखरामजी की इंगरी के नाम से प्रसिद्ध है ।
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वि. सं. १७७६ के लगभग नारायण दादूधाम बाईजी की पालकां के संत चेतनदासजी और उनके शिष्य क्षेमदासजी भ्रमण करते हुये चौकड़ी पधारे थे और चौकड़ी से दक्षिण तालाब पर हनुमानजी के स्थान पर विराजे थे । दोनों ही गुरु शिष्य भजनानन्दी विरक्त महात्मा थे । चौकड़ी ग्राम से एक समय मध्यदिन में भिक्षा ले आते थे और भोजन करके भजन करते रहते थे ।
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उक्त प्रकार भिक्षा से निर्वाह करते हुये ६ मास उस स्थान पर भजन करते रहे । गुरु चेतनदासजी तो वृद्ध थे, वे तो स्थान पर ही बैठकर भजन करते रहते थे । क्षेमदासजी ही भिक्षा लाते और कभी इधर उधर घन्टा दो घन्टा भ्रमण करने भी निकल जाते थे । एक दिन घूमते हुये एक छोटी सी पहाड़ी के पास जा पहुँचे । उसके सघन वृक्षों को देखकर प्रसन्न हुये और ऊपर चढ़े तो एक छोटा-सा हनुमानजी का मंदिर दीख पड़ा । हनुमानजी को प्रणाम करके क्षेमदासजी वहां ही हनुमानजी के पास ही बैठकर भजन करने लगे ।
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थोड़ी ही देर में उनको राम राम की ध्वनि सुनाई देने लगी किन्तु ध्वनि करने वाला कोई भी नहीं दीख पड़ा । तब क्षेमदासजी ने प्रार्थना की- भगवन् ! राम राम की ध्वनि करने वाले आप कौन महानुभाव हैं, कृपा करके दर्शन दीजिये । क्षेमदासजी की उक्त प्रार्थना पर वहां क्षेमदासजी के सामने ही एक संत प्रकट हो गये । उनके एक हाथ में एक रोटी थी और दूसरे हाथ में जल का कमंडलु था । उनका दर्शन होते ही क्षेमदासजी ने उनको सत्यराम बोल- कर प्रणाम किया।
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फिर उन संतजी ने कहा- क्षेमदास ! अब तुम यहां पर रह कर भजन करो । मैंने यहां साढे तीन सौ वर्ष रहकर भगवद् भजन किया है । अब मैं यहां से जाऊंगा । क्षेमदासजी उक्त सिद्ध संत का वचन सुनकर बोले- भगवन् ! मेरे गुरुदेव वृद्ध हैं और भ्रमण भी करते रहते है । अतः मैं उनकी सेवा को छोड कर यहां कैसे रह सकता हूँ । सिद्ध संतजी ने कहा- गुरुजी को भी यहां ही रख कर सेवा करो । अब तुमको यहां ही रहना होगा । सिद्ध संतजी का अति आग्रह देखकर क्षेमदासजी ने संतजी की बात मानली । तब सिद्ध संत ने अपने हाथ की रोटी क्षेमदासजी के हाथ में दे दी ।
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क्षेमदासजी ने इस रोटी का चौथा भाग तो वहां बैठी हुई चिड़िया आदि पक्षियों को दे दिया और शेष रोटी के दो भाग सिद्ध संतजी का प्रसाद मानकर स्वयं पा गये एक भाग रख लिया । तब सिद्ध संत ने कहा- जैसे तुमने रोटी चिड़िया आदि पक्षियों को दे कर खाई है, वैसे ही तुम्हारे शिष्य प्रशिष्य परोपकार भी करते रहेंगे । और तुमने दो भाग खाये वैसे ही तुम्हारे शिष्य प्रशिष्य खाते पीने रहेंगे और तुमने एक भाग बचा कर रख लिया है, वैसे ही तुम्हारे स्थान में कमी नहीं आयेगी किन्तु विशेष श्रीमान् भी नहीं होंगे ।
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इतना कहकर सिद्ध संत वहां ही अन्तर्धान हो गये । फिर क्षेमदासजी हनुमानजी को प्रणाम करके अपने विश्राम स्थान की ओर चल दिये और गुरुजी के पास जाकर उक्त सब घटना सुनादी । तब गुरुजी ने कहा- ठीक है सिद्ध संत ने आज्ञा दी है तो वहां अवश्य निवास करना ही चाहिये । फिर क्षेमदासजी ने अपने पास आने वालों को कहा कि हम उस हूं'गरी पर निवास करेंगे । अतः उस पर हनुमानजी के मंदिर के पास एक फूस की इनती बड़ी कुटिया बनवादी जाय जिसमें हम गुरुजी के साथ आराम से निवास कर सकें ।
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भक्तों ने उनकी इच्छानुसार कुटिया तैयार करवा दी फिर क्षेमदासजी अपने वृद्धगुरु चेतनदासजी को लेकर डूंगरी पर चले गये और वहां ही रहकर भजन करने लगे । यहां भी अपना निर्वाह भिक्षावृत्ति से ही करने लगे । उक्त प्रकार श्यामकुमारी बाईजी की परम्परा चौकड़ी की डूंगरी पर गई । श्यामकुमारीजी के खास शिष्य का नाम बालवेणि था । चेतनदासजी तो पौत्र शिष्य ही होंगे इसका पूर्ण निर्णय नहीं हो सका है । भक्तमाल में खास शिष्य का नाम बालवेणि ही दिया है ।
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उक्त प्रकार डूंगरी पर निवास करके भजन करते हये वि. सं. १७०८ में चेतनदासजी महाराज ब्रह्मलीन हो गये । कुछ दिन के पश्चात् क्षेमदासजी के एक शिष्य हुये, उनका नाम सुखरामजी रक्खा गया । वे भी अपने दादा गुरु चेतनदासजी तथा गुरु क्षेमदासजी के समान भजनानन्दी महात्मा हुये । उक्त तीनों संतों ने ही अपना मन ईश्वर भजन में लगाया था, अन्य कुछ भी नहीं किया था। कारण वे तीनों विरक्त थे ।
(क्रमशः)

*४७. अध्यातम कौ अंग ८१/८४*

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*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Meta AI*
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*४७. अध्यातम कौ अंग ८१/८४*
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कहि जगजीवन पालती१०, खेती करै किसान ।
प्रेम नीर बीरज भगति, वपु महिं जांनै जांन ॥८१॥
(१०. पालती=खेत में काम करने वाला)
संत जगजीवन जी कहते हैं, जैसे खेत में पालती मजदूर काम करता है और किसान खेती करता है, वैसे ही यह शरीर एक खेत है । इसमें प्रेम रूपी जल से भक्ति रूपी बीज बोना चाहिए । जो ज्ञानी है, वह इस रहस्य को अपने शरीर के अंदर ही जानता है ।
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सात पांच नौ तीन लहै, दस दोइ रवि प्रकास ।
षट अरु षट रस रांम धरि, सुकहि जगजीवनदास ॥८२॥
सात धातु, पांच प्राण, नौ द्वार और तीन गुण - इन सब में वही बसा है । दसवां द्वार और दो आँखों में सूर्य का प्रकाश भी वही है । छह शास्त्र और छह रस सब में राम को ही धारण करो, यही वार्ता संत जगजीवन दास जी सुखद वाणी में कहते हैं ।
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श्रवण नेत्र मुख नासिका, जिभ्या इन्द्री बंधि ।
कहि जगजीवन रांम रटि, लहै नांऊँ सुर संधि ॥८३॥
कान, आँख, मुख, नाक, जीभ - इन पाँचों ज्ञान इन्द्रियों को वश में बाँध कर जो राम नाम रटता है, संत जगजीवनदास जी महाराज कहते हैं कि वह सुरों की संधि को - अर्थात सुरत को शब्द से जोड़ने वाली दिव्य धुन को पा लेता है ।  
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सुध सिधांत१ सुणन की, सिद्ध साधिक की बांणि२ ।
कहि जगजीवन रांम रटि, रांमहि लेइ पिछांणि ॥८४॥
(१. सुध सिधांत=शिव प्रोक्त योगशास्त्र के प्रसिद्ध सिद्धांत)  
{२. बांणि=प्रकृति(आदत=स्वभाव)}
शुद्ध सिद्धांत सुनने की आदत सिद्ध और साधकों का स्वभाव है । पर संत जगजीवन साहब कहते हैं, सब सुन-सुन कर अंत में राम नाम रट कर राम को ही पहचान लेना चाहिए ।
(क्रमशः)

सोमवार, 28 सितंबर 2026

संत भक्तरामजी

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*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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*दादू सोई हमारा सांइयां, जे सबका पूरणहार ।*
*दादू जीवन मरण का, जाके हाथ विचार ॥*
================
फिर संत भक्तरामजी कोलायत तीर्थ की ओर चले गये थे । वहां जागेरी तलाई से कुछ दूर एक गुफा में बहुत समय तक भजन किया था । भक्तरामजी बहुत उच्चकोटि के योगी महात्मा थे । बीकानेर नरेश को ज्ञात हुआ कि आजकल भक्तरामजी महाराज जागेरी तलाई के पास की गुफा में भजन करते हैं । तब राजा एक दिन उनके दर्शन करने वहां गये ।
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राजा को भक्तरामजी के दर्शन से महान् आनन्द प्राप्त हुआ । थोड़ी देर सत्संग चर्चा करने के पश्चात् राजा ने हाथ जोड़ कर प्रार्थना की- भगवन् ! सेवा की आज्ञा दीजिये । भक्तरामजी ने कहा- भगवत् कृपा से सब आनन्द है । फिर राजा ने आग्रह पूर्वक कहा- स्वामिन् ! सेवक को सेवा अवश्य बताइये । भक्तरामजी ने कहा- हम बतायेंगे वह सेवा आप करने में अच्छा नहीं मानेंगे ।
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राजा ने कहा- नहीं महाराज ! अयोग्य सेवा तो संत बताते ही नहीं हैं । योग्य सेवा मेरे करने योग्य होगी और जिसको मैं कर सकता हूं वह अवश्य करूंगा आप अवश्य आज्ञा दें । भक्तरामजी ने कहा- "अच्छा तो लो बता देता हूं । आज से पीछे फिर मेरे पास आप नहीं आना यही हमारी सबसे बड़ी सेवा है ।" राजा भक्तरामजी की बात सुनकर कुछ क्षण मौन रहा फिर हाथ जोड़ कर बोला- मैं तो आपकी आज्ञा अवश्य मानूंगा किन्तु इससे आपका क्या आशय है ? यह भी कृपा करके समझा दें जिससे मेरे हृदय की ग्लानि मिट जाय ।
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भक्तरामजी ने कहा- मेरा आशय है- आपके बारंबार आने से मेरे भजन में विघ्न होगा । देश का राजा जिस संत के पास श्रद्धा से बारंबार जाता है तब उसकी प्रजा भी बहुत आने लगती है और लोगों के बहुत आने जाने से भजन में पूर्ण विघ्न होता है । राजा भक्तरामजी की बात सुनकर समझ गया कि- ये विरक्त संत हैं । इनको लोगों का आना जाना अवश्य ही विघ्न रूप भासता है । अतः इनका कहना सर्वथा उचित ही है ।
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फिर राजा प्रणाम करके बोला- आपकी आज्ञानुसार ही करूंगा । इसमें कुछ भी प्रमाद नहीं करूंगा फिर प्रणाम करके राजा साथियों सहित चला गया ।
कहा भी है-
आश हीन वर भक्त को, जन सम्पर्क न भाय ।
भक्तराम ने भूप से, कहा फिर न इह आय ॥४६६॥ह.त. ९॥
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अंतिम दिनों में एक दिन भक्तरामजी जहां बैठे थे वहां से सहसा उठकर भी लगभग पचास भक्त थे वे भी चल दिये । कानासर के वन में एक टीले के उत्तर की ओर चल दिये । उस समय उनके साथ-विवेकनाथ, सम्पन्ननाथ और पास जाकर सब से बोले "अब हमारे शरीर के त्याग का समय आ गया है. तुम सब यहां ही रुक जाओ आगे मत आओ ।" उक्त वचन सुनकर सब रुक गये । संत भक्तरामजी टीले की उतराई में एक कैर के वृक्ष के पास गये ।
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थोड़ी ही देर में कैर के पास एक शब्द हुआ । तब दोनों नाय संत समझ गये कि कपाल(ब्रह्मरंध्र) भेदन का शब्द हुआ है, अब शरीर त्याग दिया है । फिर वे सब दौड़कर टीले पर चढ़ और शव को भी देख लिया किन्तु उन लोगों के शव के पास पहुँचने से पहले ही आकाश से एक विशाल पक्षी उतरा और शव को उठाकर आकाश में ही ऊंचा चढकर अदृश्य हो गया ।
कहा भी है-
"संत जनों का प्रयाण भी विचित्र ढंग से होय ।
भक्तराम तन तजत ही, पक्षि ले गया सोय ॥१८१८.त.१३॥
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समाधि बनाने के लिए भक्तरामजी निषेध कर गए थे । किन्तु फिर भी उनके भक्त लोग श्रद्धा पूर्वक उस स्थान पर जाते रहते हैं । बीकानेर में सदाणियों के मंदिर के पीछे एक ब्राह्मण के घर में उनकी तस्वीर स्मृति चिन्ह अभी तक है । भक्तरामजी का निर्वाण दिन वि. सं. १९२४ पोष पूर्णिमा है । बीकानेर के दादू पंथी लालदासजी ने भक्तरामजी के चरण अपने स्थान में वि. सं. १९७७ आषाढ़ पूणिमा को पधराये थे सो वहां छत्री में विद्यमान हैं ।
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*रामसुखदासजी*
रामसुखदासजी बाईजी के थांभे के थे । रामगढ़ शहर में दीक्षित हुये थे । आप अच्छे विद्वान संत थे । पंडित रामशरणजी महाराज के साथ आपका अनेक बार संस्कृत में शास्त्रार्थ चला करता था । आपका शरीर वि.सं.१९६० तक धरातल पर था । आप अच्छे विद्वान संत थे ।
(क्रमशः)

*४७. अध्यातम कौ अंग ७७/८०*

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*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
*श्रद्धेय श्री Tapasvi @Ram Gopal Das की प्रेरणा से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Meta AI*
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*४७. अध्यातम कौ अंग ७७/८०*
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नाम भगति निरगुण लहै, ज्ञान सकति गुन गाइ ।
कहि जगजीवन राम भगति जन, रामहि मांहि समाइ ॥७७॥
नाम की भक्ति से निर्गुण ब्रह्म की प्राप्ति होती है, और ज्ञान की शक्ति से सगुण का गुणगान होता है । पर संत जगजीवन दास जी कहते हैं कि राम का भक्तजन तो सीधा राम में ही समा जाता है ।
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सहस बरस साधै पवन८, सोधै सकल सरीर ।
कहि जगजीवन राम भगति बिन, पीवै न अम्रित नीर ॥७८॥
(८. पवन=प्राणायाम)
संत जगजीवनदास जी महाराज कहते हैं कि चाहे हजार वर्ष तक प्राणायाम साधे और सारे शरीर को शोध ले, पर राम की भक्ति के बिना वह अमृत रूपी जल को नहीं पी सकता ।
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कहि जगजीवन एक भजि, आरंभ९ तज्या अनेक ।
राम ह्रिदै रसना रटणि, तन मंहि येही टेक ॥७९॥
(९. आरंभ=लौकिक कर्म)
संत जगजीवनदास जी महाराज कहते हैं कि अनेक प्रकार के लौकिक कर्मों के आरंभ को छोड़ कर एक ही राम को भजना चाहिए । हृदय में राम का वास हो, जीभ पर राम का रटण हो, यही तन का सच्चा आधार है ।
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बिषियां बिहाइ कामनी, जोगी जोग समाधि ।
कहि जगजीवन एक रस, अकाल पुरिष आराधि ॥८०॥
विषयों और कामना को छोड़ दे, योगी जन योग समाधि में लगें, पर जगजीवन कहते हैं कि एक रस होकर केवल अकाल पुरुष की ही आराधना करनी चाहिए ।
(क्रमशः) 

शनिवार, 26 सितंबर 2026

*संत गोपालदासजी*

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*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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*करामात कलंक है, जाकै हिरदै एक ।*
*अति आनन्द व्यभिचारिणी, जाके खसम अनेक ॥*
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*संत गोपालदासजी*
गोपालदासजी बाईजी के थांभे के संत थे । आप सकराय के पास सिकंदरे में बाईजी के थांभे का स्थान था वहां ही दीक्षित हुये थे । एक मत से ये जयपुर में ही दीक्षित हुये थे । आप उच्चकोटि के भजनानन्दी महात्मा थे ! सुना जाता है कि-आपका सम्मान तत्कालीन राजा भी करते थे । आपका देहान्त वि. सं. १८०० में जयपुर में हुआ था ।
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आपके शरीर का जुलूस जयपुर के सांगानेर दरवाजे से निकाला गया । उस समय सांगानेर दरवाजे से किसी का भी शव नहीं निकाला दिया जाता था । यह आपके शव को ही सौभाग्य प्राप्त हुआ था । इससे सूचित होता है कि उस समय जयपुर में आपकी अति प्रतिष्ठा थी । आप महान् भजनानन्दी परम विरक्त संत थे । आपने अपने दर्शन और सत्संग से अनेकों का कल्याण किया था । आपका समय भजन विचार और सत्संग में ही व्यतीत होता था ।
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*महान् योगी संत भक्तरामजी*
भक्तरामजी महाराज बाईजी के थांभे के चूरू के स्थान में दीक्षित हुये थे । प्रारंभ में आप विद्याध्ययन के लिये रामगढ़ गये थे । एक दिन किसी साधारण कारण से ही कुपित होकर पंडित ने इनको कहा- तुम्हारे गुरु ने तो यह उपदेश दिया है- दादू धरती होय रहु । फिर तुम क्यों व्यर्थ इन पानों में माथा मारते हो ? इस वचन से भक्तरामजी को अत्यधिक विचार हुआ । फिर आप उसी समय अध्ययन त्याग कर वहां से विचर गये और विचरते विचरते बीकानेर में आ गये ।
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बीकानेर में नृसिंह सागर के मार्ग पर आपकी गुफा थी वहां ही भजन करते रहे । आप बीकानेर में डागों की पंचायती बगीची में भी रहे थे । एक दिन बगीचे के कमरे के कपाट बन्द होने पर भी आप बाहर आ गये थे और भीतर चले गये थे । इनकी यह सिद्धि देखकर एक कथावाचक पंडित ने कहा-"इन सिद्धियों में क्या रखा है ? महाराज !" पंडित के उक्त वचन से उन्होंने अपना अपमान नहीं माना और बोले-पंडितजी ! आप सत्य ही कहते हैं, ये सिद्धियां अवश्य ही भगवत् मार्ग में बटमार का काम करती हैं ।
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इससे सूचित होता है कि- संत सत्य बात को सत्य ही मानते हैं । अपनी कही हुई बात के लिये हठ नहीं करते और लज्जित भी नहीं होते । कहा भी है-
"संत सत्य को सत्य ही, मानें करें न लाज ।
पंडित वचन से नहिं हुये, भक्तराम नाराज ॥१७२॥ह.त.१३॥
एक समय बीकानेर नगर में भक्तरामजी दादूवाणी की कथा कर रहे थे और नीचे लिखी साखी की व्याख्या कर रहे थे-
"नैनों भर नहिं देखिये, यह सब माया रूप ।
तहं ले नैना राखिये, जहां है तत्व अनूप ॥"
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उस समय एक पंडित ने तर्क की-"दादूजी तो संसार को माया का रूप बताकर देखने का निषेध कर रहे हैं और आप देख रहे हैं यह क्या ? वक्ता को तो कहने के समान ही करना चाहिये ।" भक्तरामजी ने तर्क का उत्तर तर्क से नहीं दिया प्रत्युत उसको उपदेश मानकर बोले-"अब नहीं देखूंगा ।" उस दिन से कथा करना छोड़ दिया । वन में रहकर भजन ही करने लगे । उस दिन के बाद दृष्टि भर किसी को भी नहीं देखते थे । कहा भी है-
संत कुतर्कों से नहीं, क्षुभित होत हैं लेश ।
भक्तराम ने विप्र का, मान लिया उपदेश ॥४२७॥ह.त.११॥
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एक दिन तत्कालीन बीकानेर नरेश संत भक्तरामजी के दर्शन करने वन में उनका पता लगाकर गये थे । वे राजा को वन में एक वृक्ष के नीचे बैठे भजन करते हुये मिले । शीतकाल का समय था । राजा भक्तरामजी के लिये एक बहुमूल्य दुशाला ले गया था । भक्तरामजी को प्रणाम करके उक्त दुशाला उनको ओढ़ा दिया और हाथ जोड़कर सामने बैठ गया । कुछ देर के पश्चात् भक्तरामजी उठे तब वह दुशाला उनके शरीर से नीचे गिर पड़ा और वे चल दिये । राजा आदि की हिम्मत उन्हें रोकने की नहीं हुई । कहा भी है-
"विरत संत श्रीमान अरु, श्री में करें न राग ।
भक्तराम उठ चल दिये, नृप रु दुशाला त्याग ॥१५०॥ह.तं.१३।
(क्रमशः)

*४७. अध्यातम कौ अंग ७३/७६*

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*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
*श्रद्धेय श्री Tapasvi @Ram Gopal Das की प्रेरणा से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Meta AI*
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*४७. अध्यातम कौ अंग ७३/७६*
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जल बिछुटी१ जल करि भखी, वो जीव इसमैं सीर२ ।
कहि जगजीवन प्रीति हरि, सो फिर मांग्या नीर ॥७३॥
(१. जल बिछुटी=जल से वियुक्त)    (२. सीर=आकर मिले)
जैसे मछली जल से बिछुड़ जाती है, तो भी वह जल को ही याद करती है और उसी में जीती है, और अंत में फिर उसी जल में आकर मिल जाती है । वैसे ही हरि से बिछुड़ा हुआ जीव अंत में फिर हरि के प्रेम रूपी जल को ही माँगता है ।
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कहि जगजीवन मही३ मथि, राम नाम घ्रित खाइ ।
प्राण पुष्टि पावै तहां, चित मंहि हरि रस भाइ४ ॥७४॥
(३. मही=छाछ)   (४. भाइ=रुचिकर लगे)
जैसे छाछ को मथ कर घी निकाला और खाया जाता है, वैसे ही इस संसार को मथ कर राम नाम रूपी घी को खाना चाहिए । इससे प्राणों को पुष्टि मिलती है और चित्त में हरि का रस रुचिकर लगने लगता है ।
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कहि जगजीवन ध्यान धरि, सिध साधक मुनि जान ।
जैसी व्यापत५ सरीर मंहि, तैसा करै बखान६ ॥७५॥
(५. व्यापत=वासना)   (६. बखान=बोलना)
सिद्ध, साधक और मुनि जन ध्यान करके जानते हैं कि जिसके शरीर में जैसी वासना व्याप्त है, वह वैसी ही वाणी बोलता है ।
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पवन सकति प्रिथवी भजै, सबद सकति सब कोइ ।
कहि जगजीवन हरि सकति, हरि मंहि बासा७ होइ ॥७६॥
(७. बासा=निवास)
पवन की शक्ति पृथ्वी का आश्रय लेती है, और शब्द की शक्ति सब में बसती है । पर जो हरि की शक्ति है, उसका निवास केवल हरि में ही होता है ।
(क्रमशः)

*संत दूलजी*

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*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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*सूधा मारग साच का, साचा होइ सो जाइ ।*
*झूठा कोइ न चलै, दादू दिया दिखाइ ॥*
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*संत दूलजी*
संत दूलजी का समय लगभग वि . सं . १८८५ से १९७४ तक है । आप बाईजी रामकुमारीजी की परम्परा में महलकां महन्तों के अतीत(छुट भाइयों में) में थे । शरीर से हृष्ट पुष्ट तेजस्वी संत थे । नारायणा दादूधाम में खेजड़ाजी के स्थान पर प्रह्लादजी की शाल के बाहर बालकों को निःशुल्क पढ़ाया करते थे ।
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उस समय काष्ठ के पाटों पर मुरड़(श्वेत) मिट्टी पोत कर उसके सूख जाने पर खोर(लाल ईंट की मिट्टी) बिछाकर पराश वृक्ष की टहनियों को पैंसिल नुमा बनाकर उक्त पाटे पर अक्षर लिखाये जाते थे । पढ़ाते समय पास में एक लम्बा वांस रखते थे । उस वांस से आप बैठे ही जिस बच्चे का प्रमाद देखते उसे सचेत करते थे । अक्षर ज्ञान प्राप्त हो जाने पर दादूपंथी संतों के शिष्यों को दादूवाणी, सुन्दरविलासादि ग्रंथ भी पढ़ाया करते थे ।
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प्रति दिन खेजड़ा के आस पास की भूमि पर बुहारी निकालकर साफ रखते थे । आपके अंतिम दिनों की एक घटना भी विचित्र है, वह देखिये । यह आचार्य दयारामजी महाराज के समय की है । उन दिनों में दूलजी तालाव की पाल वाले महलकां वाल महन्तों के मकान के नीचे शाल में निवास करते थे । आप इससे पूर्व हर व्यक्ति को सीधी खाने या बिना परिश्रम मिलने वाली बात के प्रसंग में कहते थे—
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"भाया सीधी सनेती पर सोवाला हो" । तब सुनने वाले लोक कहते थे कि— "बाबाजी हम क्या सभी और आप भी सीधी सनेती पर सोवेंगे" तब संत दूलजी कहते थे- "नहीं भाया मैं तो म्हारी सनेती बांधकर उस पर सोकर ही मरूंला । जैसा वे कहते थे वैसा ही उन्होंने किया भी था । आपने अपनी मृत्यु के समय के दिन से पहले ही सब सामग्री तैयार करली थी । संस्कार के योग्य छोटी मोटी सभी वस्तुयें लाकर शाल में रख दी थी ।
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सनेती बांध कर खड़ी कर दी थी । कफन भी उस पर रख दिया था । लकड़ियां अपने कंधे पर लेजा लेजाकर श्मशान में डाल आये थे । स्नान के लिये जल का घड़ा भरकर रख दिया था । एक थैली में टक्के पैसे भी रख दिये थे, मृत्यु के कुछ समय पूर्व ही दादूमंदिर में जाकर दंडवत की फिर आचार्य दयारामजी महाराज के पास बारहदरी में गये । उनको दंडवत सत्यराम करके तथा हाथ जोड़कर प्रार्थना की कि महाराज, मेरा राम का शरीर अब थोड़ी ही देर में छूटने वाला है ।
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अन्तिम संस्कार के लिये मैंने सब तैयारी कर दी है, अब जाकर स्नान करके शरीर को छोड़ दूंगा । अतः आप चार साधुओं को भेजदें । वे श्मशान में पहुँचाकर देह को जला आयेंगे । आचार्य दयारामजी ने कहा— अभी तो आप का शरीर ठीक है, ऐसा क्यों कह रहे हैं ? संत दूलजी ने कहा— महाराज ! मैं सत्य ही कह रहा हूँ । ऐसा कहकर दूलजी अपने निवास स्थान पर आये और स्नान करके कफन की चादर ओढ़ अविचल मंत्र का जप करते हुये सनेती पर सो गये और उसी क्षण ब्रह्मलीन हो गये ।
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आपके जीवन में यह भी एक नियम रहा था कि किसी व्यक्ति के मरने की खबर सुनते तो उसके दाह संस्कार में अवश्य जाते थे और चिता आदि की सब विधि स्वयं करते थे । थोड़ी देर के पश्चात् आचार्य दयारामजी महाराज ने एक साधु को कहा- दूलजी के पास जाओ और देखकर आओ कि वे क्या कर रहे हैं? साधु ने जाकर देखा तो ज्ञात हुआ वे तो सनेती पर सोये हुये हैं और शरीर को छोड़ चुके हैं ।
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फिर सब संतों ने तथा भक्तों ने उनका देह शमशान में ले जाकर दाह संस्कार किया । उनके देहान्त के दिन मैं भी नारायणा दादूधाम में ही था ।
कहा भी है-
"संत न पर दुःख सह सके, आप करैं निज काम ।
दूलदास काष्ठादि भी, धरे दाग के धाम ॥१६१॥ह.त.१२॥
(क्रमशः)

*४७. अध्यातम कौ अंग ६९/७२*

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*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
*श्रद्धेय श्री Tapasvi @Ram Gopal Das की प्रेरणा से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Meta AI*
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*४७. अध्यातम कौ अंग ६९/७२*
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नित अध्यातम नाम रत, काम क्रोध तजि एह ।
कहि जगजीवन हरि भगत, हरि मंहि राखै देह ॥६९॥
जो नित्य अध्यात्म और नाम में रत रहता है और काम-क्रोध को छोड़ देता है, वही हरि-भक्त अपनी देह को हरि में रखता है ।
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नौ खिड़की११ ताला जड़ै, दसमी पोलि निकास१२ ।
हरि मारग लहै राम घर, सु कहि जगजीवनदास ॥७०॥
(११. नौ खिड़की=नव द्वार बंद कर)    (१२. दसमी पोलि निकास=दशम द्वार खोलना)
शरीर की नौ खिड़कियों, नौ द्वारों पर ताला लगा दो और दसवें द्वार को खोलो । जो सातों को दृढ़ता से बंद करके दसवें में प्रवेश कर निकल जाता है, उसने राम का नाम रट कर अपना किला सजा लिया ।
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सात उभै गाढ़ा जड़ै, दसमैं पैठि निकास ।
तिहिं गढ़ सज्यौ राम रटि, सु कहि जगजीवनदास ॥७१॥
शरीर में नौ खिड़कियाँ हैं - दो आँख, दो कान, दो नाक, मुख, गुदा और इंद्रिय - इन नौ द्वारों पर ताला जड़ दो, यानी इनको बाहर की ओर जाना बंद कर दो । और दसवीं जो पोल है - दसवाँ द्वार, जो सिर के भीतर गगन-मंडल में है - उससे निकल जाओ । वही हरि का मार्ग है, वही राम का घर है, ऐसा जगजीवन दास कहते हैं ।
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दुनियां मांही दुइ सरग१३, देव असुर बिसतार ।
कहि जगजीवन हरि भजि सुलझै उलझै मैंमत१४ मार ॥७२॥
(१३. सरग=सृष्टि)   (१४. मैंमत=अभिमान)
जगजीवन जी कहते हैं, दुनिया में दो ही सृष्टि हैं - देव और असुर का विस्तार। हरि को भजने से ये उलझन सुलझ जाती है और अहंकार में उलझने से जीव मारा जाता है ।
(क्रमशः)