रविवार, 31 मई 2026

*१५. विरक्त् का अंग ~१७/२०*

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*🌷卐 सत्यराम सा 卐🌷*
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*१५. विरक्त् का अंग ~१७/२०*
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*मनसा वाचा कर्मना, गहै न त्यागन हार ।*
*रज्जब रुचे न ऊगले, उर अबला रु आहार ॥१७॥*
जो मन, वचन, कर्म से त्याग देता है, वह पुन: ग्रहण नहीं करता, जैसे वमन करे हुये आहार को ग्रहण करने की इच्छा नहीं होती, वैसे ही त्यागी हुई नारी की इच्छा नहीं होती ।
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*रज्जब रवि को दरशते, अरुचि छींक चखि नीर ।*
*शक्ति सुन्दरी सन्मुखै, सो गति साधू वीर१ ॥१८॥*
सूर्य के समाने देखने से देखने की रूचि नहीं होती, छींकै आने लगती है और नेत्रों में पानी आने लगता है, देखने वाले की स्थिति बिगड़ जाती है, वैसे ही हे भाई१ स्वर्णादि माया और नारी के सामने देखने से विरक्त की स्थिति भी बिगड़ जाती है ।
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*कायर कोट२ हुं सौ गिर हिं, कंध न लेहि करवाल१ ।*
*त्यों अधपति३ अबल४ हुं सु डरि, गहै गरीबी हाल ॥१९॥*
कायर कंधे पर तलवार१ रखकर युद्ध में नहीं जाते तो भी किले२ पर से युद्ध करने वाले वीरों की तलवारों की चमक देख के भय से चक्कर खाकर नीचे गिर जाते हैं, वैसे ही राजा३ लोग विरक्तों के समान काम से युद्ध तो कहां सकते हैं, केवल काम के शस्त्र नारी४ से ही डरकर गरीबी दशा में आ जाते हैं, अर्थात दीन गरीब प्राणी के समान नारी के आगे उसकी गुलामी करते हैं ।
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*साधु सुत के जावणै२, हरि सिद्धि नहिं हेत ।*
*पूत नीपजे मात मरि, खोटा३ खच्चर बेत१ ॥२०॥*
खच्चरी के पेट रूप स्थान१ से जब खच्चर जन्मता है तब पेट को फाड़कर माता के मरने पर ही जन्मता है, अत: माता की दृष्टि से बुरा३ है । वैसे ही परमात्मा के विरक्त संतरूप पुत्र जन्मता२ है तब उसका हरि सिद्धि(माया) से प्रेम नहीं होता है, वह माया को नष्ट करके अर्थात मिथ्या समझ कर के ही होता है ।
(क्रमशः)

शनिवार, 30 मई 2026

२६. बिचार कौ अंग १३/१६

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२६. बिचार कौ अंग १३/१६ 
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सुन्दर ब्रह्म बिचारि है, सब साधन कौ मूल । 
याही मैं आये सकल, डाल पान फल फूल१ ॥१३॥ 
(१ तु० श्रीदादूवाणी : ८/७४
सब आया उस एक में, डाल पांन फल फूल । 
दादू पीछे क्या रह्या, जब निज पकड्या मूल ॥ 
(निज-ब्रह्मविचार))
सूक्ष्म विचार करते करते हम को यही समझ में आया कि ब्रह्मचिन्तन ही भगवत्साक्षात्कार का एकमात्र उपाय है । अन्य छोटे बड़े उपाय तो इसी में डाल, पान, फल फूल के समान सम्पृक्त हो जायँगें ॥१३॥
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कीयौ ब्रह्म बिचार जिनि, तिनि सब साधन कीन । 
सुन्दर राजा कै रहै, प्रजा सकल आधीन ॥१४॥
बात को सरलता से ऐसे समझिये - जिस जिज्ञासु ने भगवत्साक्षात्कार हेतु ब्रह्मचिन्तन उपाय का उपयोग कर लिया, समझ लो कि उसने सभी उपायों(साधनों) का प्रयोग कर लिया; क्योंकि लोक में हम देखते हैं कि समस्त प्रजा एक राजा के ही अधीन होती है । यह ब्रह्मचिन्तन उपाय भी भगवत्प्राप्ति के सब उपायों का राजा ही है ॥१४॥
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परा पश्यंति मध्यमा, हृदये होइ बिचार । 
सुन्दर मुख तैं बैखरी, बांणी कौ बिस्तार ॥१५॥
चतुर्विध वाणी में से परा, पश्यन्ती एवं मध्यमा - इन तीन वाणियों से हृदय में ब्रह्म का चिन्तन होता है और चतुर्थ वैखरी वाणी से उस ब्रह्म का विस्तार(व्याख्यान) होता है ॥१५॥ (तु०- सवैया : २६/८)
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सुन्दर रूप रहै नहीं, रूप रूप मिलि जाइ । 
एक अखंडित आतमा, सब मैं रह्यौ समाइ ॥१६॥
लौकिक रूप, विनाशी होने के कारण, स्थायी नहीं है; वह एक न एक दिन विश्वरूप में मिल ही जायगा । तब शेष में अखण्ड आत्मा रहेगा जो सर्वत्र व्यापक(समाया हुआ) है ॥१६॥
(क्रमशः)

अैसौ गरीब निवाज रमइयौ गाइये

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*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*साहिब जी के नांव में, मति बुधि ज्ञान विचार ।*
*प्रेम प्रीति स्नेह सुख, दादू ज्योति अपार ॥*
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सुमिरण ॥
*अैसौ गरीब निवाज रमइयौ गाइये ।* 
अखै अभै दान ता घरि पाइये ॥टेक॥
ऊपरि वासै तागू तागू, नीचै रइयौ न्हाइ ।
चरणाँ थैं गंगा फिरी, जल विप्राँ मैं जाइ ॥
उत्तिम बाह्मण बाणिया, उत्तिम हरि कौ थान ।
तामैं मद्धिम नामदेव, जिनि मल्यौ विप्राँ कौ मान ॥
अष्टादस व्याकरण बषाणैं, अैसे जीमणहार ।
संख पंचाइण बाजियौ, बालमीक की बार ॥
वै जालै वै गाडण लागे, दुह मैं झगड़ौ येह ।
अदग कबीरा राखियौ, ताकी दगी न देह ॥ 
ज्याँह हरि ध्यायौ त्याँह हरि पायौ, निरफल रह्यौ न कोइ ।
बषनां रमइयौ गाइये, गायाँ या गति होइ ॥१३६॥
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गरीबों पर, दीनों पर दया करने वाले ऐसे रमैयाराम का स्मरण करिये जिसके घर पर कभी भी वापिस न लिये जाने वाला अक्षय, अभय दान मिलता है, अभय शरण मिलती है । 
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गंगा के उपरी भाग में तागू-तागू = यज्ञोपवीतधारी ही यज्ञोपवीतधारी ब्राह्मण स्नान कर रहे थे जबकि एक ओर गहरे जल में भक्तप्रवर रैदास स्नान कर रहे थे । जैसे ही ब्राह्मणों को ज्ञात हुआ कि गहरे जल में रैदास चमार स्नान कर रहा है, उन्होंने रैदास को एक ओर चले जाने को कहा । जैसे ही रैदास ने और दूर जाने का प्रयास किया, गंगा का जल रैदास के चरणों का स्पर्श करके ब्राह्मणों के नहाने के जल की ओर जाने लगा । 
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पंढरपुर में नामदेव पंढरीनाथ के दर्शनार्थ गये । ब्राह्मणों ने अछूत समझकर नामदेव से कहा, भगवान का मंदिर उत्तम है पुजारी व दर्शनार्थी भी ब्राह्मण-बनिये हैं । तुम अधर्मवर्ण वाले कैसे मंदिर में  भगवद्दर्शन करने आ गये । तुम एक ओर चले जाओ । नामदेव मंदिर के पार्श्वभाग में चले गये । तत्काल पंढरीनाथ का मुख मंदिर के पिछवाड़े की ओर हो गया । नामदेव ने समस्त ब्राह्मणों के ब्राह्मणत्व के मान का मर्दन कर दिया ।  
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अठारह व्याकरणों को पढ़ने वाले, शास्त्रों के ज्ञाता ब्राह्मण युधिष्ठिर के यज्ञ में जींमे किन्तु उनके भोजन करने से पंचायण शंख नहीं बजा । पंचायण शंख तो वाल्मीकि सरगरा के भोजन करने पर ही बजा ।  हिन्दू कबीर की देह को जलाने के लिये जिद्द करने लगे जबकि मुसलमान गाड़ने की जिद करने लगे । दोनों के अपने-अपने आग्रहों पर दृढ़ रहने के कारण झगडा होने लगा । 
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परमात्मा ने कबीर की देह को बिना दाग किये ही अपने यहाँ बुला लिया । उसकी देह का दाग ही नहीं हुआ । जिन्होंने भी परात्पर-परब्रह्म-परमात्मा का स्मरण किया है, उन्होंने ही उस परमात्मा को पाया है । कोई की भी भक्ति निष्फल नहीं हुई है । बिना साक्षात्कार के कोई भी रहा नहीं है । बषनां कहता है रमैयाराम का अहर्निश स्मरण करो । स्मरण करने से ऊपर वर्णित भक्तों जैसी गति होती है ॥१३६॥

 

*१५. विरक्त् का अंग ~ १३/१६*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*१५. विरक्त् का अंग ~ १३/१६*
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*रज्जब तूटी त्रिभुवन, करतों त्रिय तिरस्कार ।*
*सो योगी यशवंत जग, जग में जै जै कार ॥१३॥*
नारी का त्याग करते ही तीनों भुवनों के विषय सुखों से वृत्ति हट जाती है, जो तन मन से नारी का त्याग कर देता है, वह योगी जगत् में यश का भागी होता है और उसकी जगत् में जय ध्वनी होती है ।
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*रज्जब आये रहत१ में, उर अबला अनमेल ।*
*तन से तिय तिरस्कार कर, खेल चले यह खेल ॥१४॥*
जो शरीर से नारी का त्याग करके मन से भी नारी से नहीं मिले वे ही यह वैराग्य का खेल खेलकर तथा संसार से चलकर ब्रह्म स्वरूप में आये हैं, अर्थात ब्रह्म१ रूप हुये हैं ।
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*नर नारी न्यारा भया, निकस गया नौ खंड ।*
*रज्जब रखता राम सौं, रही सु माया मंड१ ॥१५॥*
विरक्त नर तन मन से नारी से अलग हो जाता है, उसी समय नौ खंड के विषय सुखों से निकल जाता है और राम में अनुरक्त होकर ब्रह्म रूप हो जाता है, फिर माया उसका क्या कर सकती है ? वह तो ब्रह्मांड१ में ही रह जाती है । ब्रह्म में माया का अभाव है ।
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*रज्जब त्यागी घर घरनि, पर नारी न सुहाय ।*
*अहि अपनी तज काँचुली, का की पहरे जाय ॥१६॥*
जो विरक्त निज नारी का त्याग देता है, उसे पर नारी अच्छी नहीं लगती, सर्प काँचुली त्यागकर किसी अन्य सर्प की पहनने कब जाता है ?
(क्रमशः)

२६. बिचार कौ अंग ९/१२

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२६. बिचार कौ अंग ९/१२
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जैसैं जल महिं कंवल है, जल तैं न्यारौ सोइ । 
सुन्दर ब्रह्म बिचार करि, सब तैं न्यारौ होइ ॥९॥ 
या इस रूप से सोचिये कि जैसे कमल जल में रहता हुआ भी व्यवहार में उससे पृथक् ही रहता है; ऐसे ही उत्तम जिज्ञासु प्राणी, ब्रह्मचिन्तन करता हुआ, संसार से अपना पृथग्भाव बनाये रख सकता है ॥९॥
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मनि अहि कै मुख मैं सदा, बिष नहिं लागै ताहि । 
सुन्दर ब्रह्म बिचारि तैं, सब सौं न्यारौ आहि ॥१०॥
लोक में हम देखते हैं कि विषधर सर्प के मुख में मणि रहने के कारण, उस सर्प पर अपने विष का कोई प्रभाव नहीं होता; इसी प्रकार, उत्तम जिज्ञासु, निरन्तर ब्रह्मचिन्तन करता हुआ, अपने को लोकासक्ति से बचाये रखे ॥१०॥
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सुन्दर एक बिचार तैं, सुख दुख होइ समांन । 
राग दोष उपजै नहीं, तजै मान अपमांन ॥११॥
यदि हम एकमात्र ब्रह्मचिन्तन करते रहें तो हमारे लिये सुख-दुःख को सहन करना एक साधारण बात हो जायगी, राग द्वेष से भी हम दूर हो जायेंगें, तथा लौकिक मान अपमान का भी हम पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा ॥११॥
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सुन्दर एक बिचार सौं, बुद्धि तजै नानत्व । 
जानै एकै आतमा, उपजै भाव समत्व ॥१२॥
जो जिज्ञासुभक्त निरन्तर ब्रह्मचिन्तन करने लगेगा, तो शनैः शनैः उसकी बुद्धि का जगद्विषयक नानात्व भ्रम स्वतः मिट जायगा । साथ ही वह सभी प्राणियों में एक ही आत्मा समझता हुआ सर्वत्र समबुद्धि भी हो जायगा ॥१२॥
(क्रमशः)

मोहि सबल भरोसा राम का

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*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*श्रम नहीं सब कुछ करै, यों कल धरी बनाइ ।*
*कौतिकहारा ह्वै रह्या, सब कुछ होता जाइ ॥*
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भक्तमहिमा ॥
मोहि सबल भरोसा राम का ।
परचा सूँ सेवियै परमेसुर, आन धरम किस काम का ॥टेक॥
नामाँ परि सुलतानी कोपे, ले गये मांडौ मीर का ।
मूई गाइ जिवाई कैसौ, बडा मता बै बीर का ॥
कासी मांहि सिकन्दर तमक्यौ, गल मैं डालि जंजीर का ।
जिनिकौं आइ मिले परमेसुर, बंधन काटि कबीर का ॥
पंडित कोपि सबै खड़ि आये, ठाकुर लिया रैदास का ।
ऊपरि करिकैं गोद पधारे, पंडित गये निरासका ॥
जब न्रिप खिजे ढील क्यूँ लाई, पठ्यौ दूत कहि बैंन का ।
जन कै बदलै तेल लगायौ, कारिज सार्यौ सैंन का ॥
भवन भगत परि घाट घड़ी मिलि, काठ पलटि भयौ सार का ।
पीपा नैं दोइ देही दीनी, इक टोडै इक द्वारका ॥
धनाँ भगत कौ खेत निपायौ, खाटू हस्त झुकाइका ।
रह्यौ ठग्यौ सौ निकसे स्वामी, दादूजी गछ नाइका ॥
साट महोछा श्रीसांभरि मैं, द्वारै द्वारै ब्यौति का ।
जन अपना कौ बिड़द बुलायौ, सबकै जीमें न्यौंति का ॥
तुलसी बाह्मणि चुगली कीन्हीं, दादू है आंबेरि का ।
अकबर कहै बेगि ले आवौ, दरस करौं तीन केरि का ॥
जोर करै ताही कौं मारै, ठाकुर है लघु लीन का ।
बषनां कहै सूनौं भाइ संतौं, यहु मारग है दीन का ॥१३५॥
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बषनांजी कहते हैं, मुझे सबल = सर्वसमर्थ ‘कर्तुंअकर्तुंअन्यथाकर्तुम्’ समर्थ परात्पर-परब्रह्म-परमात्मा की भक्तवत्सलता पर पूर्ण विश्वास है । अतः उस परमेश्वर को ही पूर्णनिष्ठा, श्रद्धा-विश्वास के साथ भजिये । उसके भजन स्मरण के अतिरिक्त अन्य धर्मों का अनुष्ठान किस काम का है ? अर्थात् अन्यों से प्रयोजन रखना व्यर्थ है ।
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स्वयं मुसलमानों ने गाय मारकर नामदेव पर इल्जाम लगा दिया कि नामदेव ने गाय मार दी । मांडूगढ़ का मीर शिकायत मिलने पर नामदेव पर क्रोधित हुआ । सेवकों द्वारा नामदेव को पकड़कर अपने दरबार में बुलाया । नामदेव से कहा, यदि तुमने गाय नहीं मारी है तो इसे जीवित कर दो अन्यथा तुम्हें गाय मारने का दंड भुगतना पड़ेगा । तत्काल केशव ने मृत गाय को जिला दी । उस नामदेव नामक भक्त का मता = विश्वास, सिद्धान्त अटल था जिसके वशीभूत होकर भगवान् ने उसकी लाज मांडूमीर के दरबार में रखी ।
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काशी में सिकन्दर कबीर के ऊपर क्रोधित हुआ । उसने कबीर के गले में वजनी जंजीर डाल कर गंगा में डुबो दिया किन्तु तत्काल परमात्मा कबीर से आकर मिले और उन्होंने जंजीर के बंधनों को काटकर कबीर को गंगा के बाहर सुरक्षित पहुँचा दिया ।
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काशी के समस्त पंडित क्रोधित होकर अपने अपने स्थानों से निकलकर रैदास के घर पहुँच गये और उन्होंने रैदास द्वारा पूजित विग्रह को छीन लिया । राजा की सभा में से वह देवविग्रह बीच में से उठकर आकाश मारग में होकर तत्काल रैदास की गोदी में आकर बिराज गये । इससे सारे पंडित लज्जित होकर अपने अपने घरों को निराश ही लौट गये ।
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सेन नाई द्वारा तैल मदनार्थ समय पर न पहुँचने पर जब बांधवगढ़ का राजा सेन पर क्रोधित हुआ तथा लाने को दूत भेजे गये तब भक्त सेन के बदले में भगवान् स्वयं ने तैलमर्दन करके भक्तप्रवर सेन नाई को राजा का कोपभाजन बनने से बचा लिया ।
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भक्त भुवन चौहान पर जब चितौड़ दरबार में अन्य दरबारियों ने षंड्यंत्र रचकर आरोप लगाया कि वह लोहे की तलवार न रखकर काठ की तलवार रखता है । राजर्षि पीपा को भगवान ने एक द्वारिका में चंदोवे में लगी आग को बुझाने को तथा दूसरी टोड़ा के जागीरदार की सभा में उपस्थित रहने के लिये दो शरीर प्रदान किये थे । भगवान् ने ही धनाँ भक्त का खेत बिना बीज बोये ही निपजाया था ।
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खाटू में दादूजी महाराज पर दुष्टों ने मदमस्त हाथी को झुकाया = मारने के छोड़ा किन्तु वह मदमस्त हाथी ठग्यौ सो = हतप्रभ हुआ खड़ा ही रहा । उसने दादूजी पर कोई प्रहार नहीं किया । वे स्वामी दादूजी आराम से उसके सामने से निकल गये । सांभर में सात व्यक्तियों ने अपने अपने घरों पर महोत्सव किये और दादूजी महाराज को सभी ने अपने यहाँ पधारने का निमंत्रण दिया । परमात्मा ने अपने भक्त की महिमा सातों स्थानों पर एक साथ पधार व जींमकर बढ़ाई, प्रकट की ।
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तुलसी नामक ब्राह्मण ने अकबर से चुगली खाई कि निर्गुण-निराकार-परमात्मा का प्रचार-प्रसार करने वाला दादू आंबेर में रहता है । तब अकबर ने कहा उसे तत्काल बुलावो । मैं उसका दर्शन करना चाहता हूँ, वार्तालाप करना चाहता हूँ ।
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दादूजी व अकबर ४० दिन तक सत्संग हुआ और वह परम संतुष्ट हुआ । जो भी भक्तों पर जोर जुल्म करता है उन्हीं को परमात्मा दंडित करता है क्योंकि वह लघु लीन = निर्बल भक्तों का रक्षक है । बषनां सभी संतों से कहता है, हे भाइयों ! परमात्मा की भक्ति करना, उसकी शरण का आश्रय ग्रहण करना तथा उसके शरणागतवत्सलत्व पर पूर्ण विश्वास करना ही सच्चा धर्म है । इसके अतिरिक्त सारे धर्म व्यर्थ हैं ॥१३५॥

शुक्रवार, 29 मई 2026

*१५. विरक्त् का अंग ~९/१२*

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*🌷卐 सत्यराम सा 卐🌷*
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*१५. विरक्त् का अंग ~९/१२*
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*पाइ परी पाई नहीं, ऋद्धि सिद्धि निधि ऐन१ ।*
*रज्जब त्यागी ते पुरुष, संतति शक्ति न सैन ॥९॥*
जो नाना प्रकार के ऐश्वर्य, अष्टसिद्धि, नौ निधि साक्षात्१ पैरों में पड़ने पर भी उनको नहीं प्राप्त के समान ही समझते हैं अर्थात उससे उपराम ही रहते हैं । संतान तथा मायिक सुख प्राप्ति के लिये संकेत मात्र ही नहीं करते, उद्योग तो कैसा, वे ही त्यागी पुरुष हैं ।
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*मुख की सिलक गूदा की ढीमा,*
*त्यागत सोच नहीं कुछ जीमा ।*
*त्यों विभूति बरतणि ले डारी,*
*यूं माया मुनिवर सौ न्यारी ॥१०॥*
मुख की लार पंक्ति वा वमन और गुदा का मल इनको त्यागने से मन में कुछ भी चिन्ता नहीं होती, वैसे ही विरक्त पुरुष माया को कार्य में लेकर पटक देते हैं, उसमें राग नहीं करते, इसी से माया मुनिवरों से अलग ही रही है ।
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*सोने मुख पीला किया, रूपे किया सुश्वेत ।*
*जन रज्जब सु वियोग ही, साधु किया नहीं हेत ॥११॥*
संतों ने प्रेम नहीं किया, संतों के वियोग दु:ख के कारण ही सोना पीला पड़ गया और चाँदी श्वेत हो गई ।
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*जोड़े के सुख से रह्या, जड़ काटी जग माँही ।*
*रे रज्जब संसार में, सो फिर आवे नाँहिं ॥१२॥*
जो नारी पुरुष के जोड़े से होने वाले सुख से अलग रहा है और जगत के धनादि में जो अपनी आसक्ति रूप जड़ जमी थी उसे वैराग्य से काट दी है, वह पुन: संसार में नहीं आता ब्रह्म में लीन हो जाता है ।
(क्रमशः)

२६. बिचार कौ अंग ५/८

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२६. बिचार कौ अंग ५/८
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सुन्दर एक बिचार तें, हिरदौ निर्मल होइ ।
फिरत रहै जौ मसक लौं, काटन लागै कोइ ॥५॥
श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - इसी एकमात्र विचाररूप साधना से ही जिज्ञासु प्राणी का हृदय निर्मल(विकार रहित) हो सकता है । अन्यथा वह जगत् में मच्छर के समान घूमता रहेगा और मत मतान्तर के प्रतिपादन द्वारा वाद विवाद करता हुआ साधु सन्तों को डंक ही मारता रहेगा(कष्ट ही देता रहेगा) ॥५॥

सुन्दर साधन सब किया, बरकति दीसै नांहिं । 
आयौ हृदय बिचार जब, तब संमुझै हरि मांहिं ॥६॥
हमने भगवत्प्राप्ति के लिये अन्य सभी उपाय कर के देख लिये, हमें किसी भी उपाय से सफलता या लाभ(बरकत) नहीं मिला । जब हम को यह भगवच्चिन्तन रूप विचार सूझा तो हम को यह आश्वासन मिला कि हम एक न एक दिन उस प्रभु का साक्षात्कार कर ही लेंगे ॥६॥
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करत देह के कृत्य सब, जौ उर होइ बिचार । 
सुन्दर न्यारौ ई रहै, लिपै न एक लगार ॥७॥
इस उपाय के माध्यम से हम को समझ में आया कि भले ही हम व्यावहारिक दृष्टि से सभी लौकिक कर्म करते रहें; परन्तु वहाँ हम इतना ही करें कि उन से लिप्त न हों, उन में आसक्त न हों ॥७॥
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दधि मथि घृत कौं काढि करि, देत तक्र मंहिं डार । 
सुन्दर बहुरि मिलै नहीं, ऐसैं लेहु बिचार ॥८॥ 
लोक में हम देखते हैं कि दही को मथ कर उसमें से घृत(मक्खन) निकालने के बाद, शेष बचे तक्र में वह घृत पुनः मिलाना चाहें तो नहीं मिलता; इसी प्रकार चिन्तन द्वारा एक बार लौकिक सम्पर्कों से पृथक् होने के बाद पुनः उन में लिप्त होना या आसक्त होना उत्तम साधक के लिये असम्भव हो जाता है ॥८॥
(क्रमशः) 

*अपना ब्रिद की लाज वही ।*

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*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*दादू जिन को सांई पाधरा, तिन बंका नांही कोइ ।*
*सब जग रूठा क्या करै, राखणहारा सोइ ॥*
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विनती ॥
*अपना ब्रिद की लाज वही ।* 
अनाथनाथ दीनबंधू, या तेरी निबही ॥टेक॥
हाथि कै हाथि कहा जप माला, का गनिका ब्रत धार्यौ ।
पुत्र हेत हरि नाम लियौ दिज, जम कौ डंड निवार्यौ ॥
हिरदै लिख्यौ लिख्यौ पाटी मैं, राम राम ब्रत धार्यौ ।
गिर तैं गेरि अग्नि मैं डार्यौ, जन प्रहलाद उबार्यौ ॥ 
कस्यौ कबीर कसौटी दीन्हीं, हाथी आगे नाख्यौ ।
जहाँ तहाँ भीड़ पड़ी भगतनि कौं, तहाँ तहाँ पन राख्यौ ॥ 
पतित उधारन बिरद तुम्हारौ, परतंग्या निबही ।
सबल जानि सरनाई आयौ, बषनैं बोट गही ॥१३४॥
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हे परमात्मा ! कहा जाता है, तू अनाथों का नाथ तथा दीनों का बन्धु है । तेरे इस बिड़द की मर्यादा का निर्वाह करने पर ही तेरी प्रतिज्ञा, वचन का निर्वाह होगा । अतः अपने विरुद की मर्यादा का निर्वहन कर । 
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हाथी के हाथ में तेरा नामस्मरण करने के लिये कौनसी माला थी । गणिका ने कौनसा पातिव्रतधर्म धारण किया था । फिर भी तूने उनका उद्धार किया । अजामिल नामक पतित ब्राह्मण ने तेरा नामस्मरण पुत्र के नाम के बहाने से किया था फिर भी तूने उसे यमदंड से बचाकर अपने लोक में बुला लिया था । 
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भक्तप्रवर प्रहलाद ने “राम-राम” अपने हृदय में लिखा था, गुरुमहाराज के यहाँ पढ़ते समय पाटी में भी लिखा था और आजीवन राम-राम रटने का व्रत भी धारण किया था । इससे क्रुद्ध होकर हिरण्यकश्यपु द्वारा उसे पर्वत से गिराया गया, अग्नि में जलाया गया, किन्तु आपने उसका बाल भी बाँका न होने दिया । उसका उद्धार कर दिया ? 
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संतसम्राट कबीर को जंजीरों से बांधकर गंगा में बहाया गया । कुचल डालने के लिए हाथी के आगे डाला गया किन्तु सिंकदरशाह उसका कुछ भी बिगाड़ न सका । 
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हे परमात्मन् ! जब-जब, जहाँ-तहाँ जिस-जिस रूप में भी भक्तों पर संकट आये वहाँ-वहाँ तूने उनके प्रणों का निर्वाह करवाया । “तू पतितों का उद्धार करने वाला है” इस विरुद की महिमा तूने अपनी प्रतिज्ञा का निर्वाह करके सदैव सुरक्षित रखी है । मैं बषनां ने तुझे सबल शरणागतवत्सल जानकर ही तेरी शरण का आश्रय लिया है ॥१३४॥

गुरुवार, 28 मई 2026

*१५. विरक्त का अंग ~५/८*

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*🌷卐 सत्यराम सा 卐🌷*
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*१५. विरक्त का अंग ~५/८*
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*बपु१ वसुधा२ सौं वैर विधि, विरच्या३ लग बैकुण्ठ ।*
*रज्जब रूचे न विनशती४, यहु उर अंतर अण्ट५ ॥५॥*
विरक्त का मन शरीर१ तथा पृथ्वी२ के भोगों से और बैकुण्ठ तक से जैसे वैर के द्वारा वैरी से उपराम होता है, वैसे ही उपराम३ हो जाता है, उसे विनाशी४ माया रुचि कर नहीं लगती, विरक्त के हृदय में यह वैराग्य की गाँठ५ ही लग जाती है, अर्थात वह वैराग्य को नहीं छोड़ता ।
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*माया काया मन मतैं१, विरच्या प्राण प्रचण्ड२ ।*
*रज्जब न्यारा नाम बल, नजर नहीं नौ खंड ॥६॥*
तीव्र२ वैराग्य युक्त प्राणी माया, शरीर और सांसारिक मन के विचारों२ से उपराम हो जाता है, निरंजन राम के नाम चिन्तन के बल से सबसे ही अलग रहता है, इस नौ खंड वाली पृथ्वी के किसी भी पदार्थ पर उसकी रागयुक्त दृष्टि नहीं पड़ती ।
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*विरच्या बरते बरतणिहिं, तन मनत्रितिरस्कार ।*
*जन रज्जब रत नाम सौं, यहु विरक्त व्यवहार ॥७॥*
उपरामता से सब कार्य करता है, तीनों लोकों के भोगों का तन - मन से अनादर करता है और निरंतर निरंजन राम के नाम में अनुरक्त रहता है, वही विरक्त पुरुष का व्यवहार है ।
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*रज्जब रूठा ऋद्धि सौं, सिद्धि सुहावे नाँहिं ।*
*इन आगे इसका धणी, सो बैठा मन माँहिं ॥८॥*
विरक्त पुरुष ऐश्ववर्य से उपराम रहता है, सिद्धियाँ उसे प्रिय नहीं लगती, इन सिद्धि आदि से परे इनका स्वामी परमात्मा है, वही विरक्त के मन में निरंतर स्थिर रहता है ।
(क्रमशः)

२६. बिचार कौ अंग १/४

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२६. अथ बिचार कौ अंग १/४
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सुन्दर साधन सब थके, उपज्यौ हृदय बिचार । 
श्रवन मनन निदिध्यास पुनि, याही साधन सार ॥१॥
श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - जब हमारे द्वारा किये जा रहे भगवत्-साक्षात्कार साधना के सभी उपाय निष्फल हो गये, तब हमारे हृदय में यह विचार उद्भूत हुआ कि श्रवण, मनन एवं निदिध्यासन द्वारा निराकार निरञ्जन प्रभु का चिन्तन ही उस की प्राप्ति का एकमात्र उपाय है ॥१॥
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सुन्दर या साधन बिना, दूजौ नहीं उपाइ । 
निस दिन ब्रह्म बिचार तें, जीव ब्रह्म ह्वै जाइ ॥२॥
इस साधना के विना भगवत्प्राप्ति का अन्य कोई उपाय नहीं है । यदि इस उपाय से निरन्तर ब्रह्मचिन्तन किया जाय तो जीव-ब्रह्म की एकता सहजता से सुलभ हो सकती है ॥२॥
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सुन्दर एक बिचार है, सुरझावन कौं सूत । 
उरझि रह्यौ संसार मैं, नखशिख प्रानी भूत ॥३॥
यही एकमात्र उपाय ऐसा है जिससे जन्म-मरण परम्परा की यह उलझी हुई समस्या का सरलता से समाधान हो सकता है । नख से शिखा तक संसार के विषयभोगों में डूबा हुआ प्राणी इसी उपाय से मुक्त हो सकता है ॥३॥
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उपजै एक बिचार जब, तब यह पावै ठौर । 
भरमावन कौं जगत महिं, सुन्दर साधन और ॥४॥
जब किसी भाग्यवान् प्राणी को यह विचार(भगवच्चिन्तन) रूप उत्तम उपाय सूझता है तभी यह प्राणी उस निरञ्जन निराकार प्रभु तक पहुँच सकता है । अन्यथा इस जगत् में विभिन्न मतवादियों ने, उस प्राणी को बहकाने के लिये, अपना अपना मत प्रतिपादन करते हुए, नाना भ्रमजाल फैला रखे हैं ॥४॥
(क्रमशः) 

भौं मैं भजियौ राम

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*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*एकै अक्षर पीव का, सोई सत्य करि जाण ।*
*राम नाम सतगुरु कह्या, दादू सो परवाण ॥*
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*सुमिरण ॥*
भौं मैं भजियौ राम, यौं भौ भागौ रे । 
निसदिन हरि की नाँइ, सुमिरण लागौ रे ॥टेक॥
दोवड़ तेवड़ मैं करी रे, हरि सुमिरण की बाड़ि ।
ज्याँह कै पहरै को नहीं, ते नर मुसिया झाड़ि ॥
म्हारा घर कै आंगणैं रे, चेतन पहरा देइ ।
निधड़क सोवै कुम्हारड़ी रे, चोर न मटिया लेइ ॥
ज्याँह चोराँ चोरी करी रे, पर घर किया प्रवेस ।
सो चोर भया फिरि पाहरू, म्हारै गुर दीन्हौं उपदेस ॥ 
सूता था सुणि जागिया रे, सुण्याँ सहर मैं सोर ।
कहि बषनां बाथाँ पड़ी, म्हारी बहुटल मार्यौ चोर ॥१३३॥ 
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भू = संसार । भौ = भय, जनम-मरण का भय । दोवड़-तेवड़ = दोहरी (द्वंद्व = राग-द्वेष, सुख-दुःख आदि), तिहरी (सत, रज, तम गुण) । बाड़ि = पुराने समय में घर के चारों ओर काँटों से अहाता बनाया जाता था जिसे बाड़ लगाना कहा जाता था । मुसिया = लूट लिये गये । झाड़ि = झाड़-पौंछकर सब कुछ ले लेना, सर्वस्व को छीन लेना । आगणैं = चारों ओर । चेतन = सावधान मन, ज्ञान, विवेक । कुम्हारड़ी = कुम्हार की पत्नी, आत्मा । मटिया = मिटटी = मन । चौराँ = इंद्रियाँ । सहर = शरीर । बाथाँ = युद्ध । बहुटल = बुद्धि ।
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योगशास्त्र में पाँच क्लेशों का उल्लेख है । उनमें से पाँचवा क्लेश अभिनिवेश नाम्ना है जिसका तात्पर्य है, मृत्यु का भय कि कहीं मुझे मृत्यु आकर दबोच न ले । जिस व्यक्ति के मन में मृत्यु का भय समा जाता है, वह इससे अभय होने का प्रयत्न भी करता है । 
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यहाँ बषनांजी यही कह रहे हैं । मृत्यु के भय से भयभीत होकर मृत्यु से छुड़ा देने वाले रामजी को मैंने भजा । परिणामस्वरूप मेरा भय भाग गया । मैं निशिदिन आठों पहर हरि के नाम के स्मरण में लग गया हूँ । मैंने समस्त द्वंद्वों तथा तीनों गुणों को वशीभूत करके राम-नाम-स्मरण-का-अहाता = कवच मेरे शरीर रूपी घर के चारों ओर लगा लिया है । 
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जिन मनुष्यों ने राम – नाम की बाड़ नहीं लगाई है वे पूर्ण रूप से काल द्वारा लूट लिये गये हैं । वे पुनरपि जननं पुनरपि मरणं के चक्र में ही गोता खाते रहेंगे । मेरे घर रूपी शरीर के घट रूपी आंगन में चेतन रूपी ज्ञान पहरा देता है । हृदय में ज्ञान विराजता है जिससे आत्मा रूपी कुम्हारी अभय होकर सोती है, परमात्मा में एकरस स्थित रहती है क्योंकि इंद्रिय रूपी चौर मन रूपी मिटटी को अब चोर सकने में = संसाराभिमुख करने में समर्थ नहीं है । 
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जिन इंद्रियों रूपी चौरों ने ही विषयभोग रूपी चोरी करी थी तथा जिस मन में परमात्मा का निवास होना था उसमें प्रवेश करके उसको बिगाड़ा था, अब वे ही इंद्रियाँ पहरेदार बन गई हैं, मन को विषयों में जाने नहीं देती हैं । जो श्रवणेन्द्रिय पहले दुनियावी बाते सुनती थीं वे अब भगवद्गुण सुनने लगी हैं । जो आंखें परस्त्री, परधन की ओर देखा करती थीं वे अब संत-भगवंत दर्शन करने लगी हैं । जो त्वचा पहले कामोपभोग करने में आनंदानुभव करती थी अब वह संत-चरण स्पर्श में आनंद का अनुभव करती है । आदि आदि । 
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यह सब गुरु महाराज के उपदेश के कारण ही संभव हो पाया है । मेरी आत्मा, मन पहले अज्ञाननिद्रा में सोया पड़ा था किन्तु गुरु महाराज के उपदेश रूपी शोर को सारी सहर = शरीरस्थ सभी इंद्रियों ने सुना जिससे वे जागिया = विवेकवान हो गई । सत्यासत्य, नित्यानित्य विवेक सम्पन्न हो गई । 
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बषनां कहता है, मेरी बुद्धि रूपी बहुटल = बहु इन समस्त चौरों से = मनोविकारों से बाथाँ = गुत्थमगुत्था हो गई, युद्धरत हो गई । परिणामस्वरूप सारे दुर्गुण, दुराचार, मनोविकार शरीर में से निकाल कर भाग गये । मैं परमात्मा से एकाकार हो गया ॥१३३॥

बुधवार, 27 मई 2026

*२५. अवस्था कौ अंग ५२*

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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*२५. अवस्था कौ अंग ५२*
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छप्पय छंद
प्रथम भूमिका श्रवन चित्त एकाग्रहि धारै । 
दुतिय भूमिका मनन श्रवन करि अर्थ बिचारै । 
तृतिय भूमिका निदिध्यास नीकी बिधि करई । 
चतुर्भूमि साक्षातकार संशय सब हरई ॥ 
अब तासौं कहिये ब्रह्मबिदु बर बरयान बरिष्ट है । 
यह पंच षष्ट अरु सप्तमी भूमि भेद सुन्दर कहै ॥५२॥
इति अवस्था कौ अंग ॥२५॥
७. प्रसङ्गवश ज्ञान की चार भूमिकाओं का वर्णन : 
श्रवण ज्ञान की प्रथम भूमिका है, जिस के माध्यम से जिज्ञासु का चित्त एकाग्र होता है । 
ज्ञान की द्वितीय भूमिका मनन से गुरुपदिष्ट शब्द के अर्थ पर विचार होता है । 
ज्ञान की तृतीय भूमिका निदिध्यासन से उस शब्द एवं अर्थ का सामञ्जस्य बैठाया जाता है(नीकी विधि करई) । 
ज्ञान की चतुर्थ भूमिका है - साक्षात्कार, जिस समस्त द्वैत भ्रम एवं संशय विनष्ट हो जाते हैं । 
और ज्ञान की पञ्चम भूमिका है - ब्रह्मवित्(वर) होना । 
षष्ठ भूमिका है - वरीयान् होना । 
तथा सप्तम भूमिका है - वरिष्ठ होना । 
श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - इस प्रकार शास्त्र में ज्ञान की सात भूमिकाएँ बतायी गयी हैं ॥५२॥
इति अवस्था का अंग सम्पन्न ॥२५॥
(क्रमशः) 

मिसर येक रूड़ी कथा कही

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*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*शब्द दूध घृत राम रस, मथि करि काढ़ै कोइ ।*
*दादू गुरु गोविन्द बिन, घट घट समझि न होइ ॥*
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राग सारंग ॥११॥भ्रमविध्वंश ॥
*मिसर येक रूड़ी कथा कही ।*
ऊंघै थी र बिछायौ लाधौ ता परि सोइ रही ॥टेक॥
मुख की पीक नैंन दिखलावै, अधरनि काजरि कारौ । 
तैं ज कही सो मेरै होती, तिहि मन खुसी हमारौ ॥
कंकन पूठि करन की चूरी, हार बन्यौ बिन तागै । 
जोर सुणैं ताकै यहु उपजै, ध्यान तहीं ठै लागै ॥
मानि मनावौ राधा प्यारी, एतौ हठ क्यूँ कीजै । 
तूँ ब्रिषभान बड़े की बेटी, तेरे ज्यायें जीजै ॥
मन हठ छाड़ि हसौ चित सनमुख, दोउँ घाँ अमृत पीजै ।  
जदपी बैर होइ हिरदा मैं, तौ बैरि कुँ पीठि न दीजै ॥ 
कहै सहेली अहो जसोधा, बात सुणी कै नांहीं । 
बंसी बट की छाँही, गही हठि मेरी बाँहीं ॥
हौं सकुचनि बोली नांहीं, बहु सखियन की भीर । 
गहि अचला मोहि ले चल्यौ, मान सरोवर तीर ॥
तेरै संग की ग्वालनी, मेरे संग के ग्वाल । 
एक एक कौं घेरिहैं, तब व्है है कौंन हवाल ॥
जहाँ जहाँ पग तूँ धरै, तहाँ तहाँ मन साथ । 
आप रहै आधीन व्है, चित बित तेरैं हाथ ॥
हठि बीरी मेरे मुखि दई, ग्रीबाँ मेल्ही बाँह । 
मिसही मिस मोहि ले चल्यौ, गहि अंधियारा माँह ॥
याही ग्यान ध्यान भी याही, नर नारी कौं भावै ।  
बषनां देखि ब्यास की कथणी, साच न हिरदै आवै ॥१३२॥
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कथावाचक मिश्र ने एक सुंदर कथा कही । राधा बैठी-बैठी ऊंघ रही थी कि उसको किसी के द्वारा बिछाया हुआ बिछौना मिल गया जिसपर वह आराम से सो गई । पान खाने से उत्पन्न पीक = लाली उसके होठों पर न दीखकर नयनों में दीख रही थी । इसी प्रकार नेत्रों में लगी काजल नेत्रों में न दीखकर होठों पर दीख रही थी । 
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वस्तुतः ऊंघती हुई राधा संसार और भगवान दोनों के मार्गों पर चलती हुई चित्तवृत्ति है जो न पूर्णतः संसार में ही लगी हुई है और न पूर्णरूपेण परमात्मा में ही अनुरक्त हुई है । गुरु के द्वारा उपदेश ही किसी के द्वारा बिछाया हुआ बिछौना है । परमात्मा में चित्तवृत्ति का पूर्णरूपेण लग जाना ही सुखपूर्वक सोना है । परमात्मा के विरह में आंखों का रो रोकर लाल हो जाना ही मुँह की लाली आँखों में होना है । रोने से आंखों का काजल बहकर अधरों तक आता है यही ‘अधरनि काजरि कारौ’ है । 
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बषनांजी कहते हैं पंडित द्वारा कही गई बात भ्रम है (प्रथम अर्थ) किन्तु हमारे द्वारा अध्यात्मपरक लगाया गया अर्थ ही पंडित को अभिप्रेत है तो हे पंडित ! जो बात तूने कही है, यदि उसी के अनुसार मेरी स्थिति हो जाये तो मेरा मन परमानंद में सरावोर हो जाये । परमात्मा की भक्ति में चित्तवृत्ति के लग जाने से हाथ में पहने जाने वाली चूड़ियाँ और कंगन जो बंधन के प्रतीक है पीछे हो गये, अबंधनकारी हो गये । गले को बांधने वाला हार बिना धागे की लै बन गयी । 
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अर्थात् चित्तवृत्ति का परमात्म-नाम से बिना किसी व्यवधान के तादात्म्य हो गया । जो भी इस रूपक को सुनता है, उसके मन में भी ऐसा ही करने की इच्छा जागृत हो जाती है और उसकी भी चित्तवृत्ति भगवन्मय हो जाती हैं । (तहाँ ठै = उसी स्थान में = परमात्मा में) आगे राधा कृष्ण की लीला का वर्णन है ।  जिसे भी आध्यात्मिक अर्थ में घटाया जा सकता है ।  
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कृष्ण राधा से कहते हैं, हे प्यारी राधा ! अब आप अपने मन को ठंडा करो । इतना अधिक हठ क्यों कर रही हो । अरे ! तुम तो वृषभानु जैसे बड़े गोप की बेटी हो । उनका प्रभाव बहुत भारी है । वे चाहें जिसको जीवनदान दे दें तथा वे चाहें जिसको मरवा देवें । तू है तो उन्हीं की लाड़ली । तेरे पास भी उनके बराबर ही शक्ति है । अतः मैं तो तेरे जिलाने से ही, तेरे द्वारा दिये हुए जीवनदान से ही जीता हूँ ।  मन में से हठ को निकाल दे ।  
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सामने देखते हुए हँस जिससे कि हम दोनों दोनों ओर से = एक दूसरा एक दूसरे के दर्शन लाभ रूपी अमृत का पान कर सकें । हे राधा ! नीति कहती है, हृदय में बैरभाव होने के उपरान्त भी बैरी के सन्मुख हो जाने पर = बैरी के विनीत हो जाने पर उसे पीठ नहीं दी जाती = त्यागा नहीं जाता । प्रत्युत उसको अपना लिया जाता है । अब कृष्ण की लीलाओं के बारे में एक सखी यशोदा से जाकर कहती है । 
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अहो यशोदा ! तूने तेरे पुत्र की अचरजभरी बात सुनी अथवा नहीं । वह वंशीवट की छाया में वह छुपकर खड़ा हुआ था । मैं जैसे ही उधर से गुजरने लगी, कृष्ण ने जबरदस्ती मेरी बाँह पकड़ ली । मेरे साथ में बहुत सी सखियाँ और थीं । इसकारण संकोचवश मैं उससे कुछ भी नहीं कह सकी । श्रीकृष्ण मेरी फरिया का पल्ला पकड़कर मुझे मानसरोवर की तीर पर ले गया । वहाँ वह मेरे से कहने लगा~ 
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तेरे साथ की सारी ग्वालिनों को मेरे साथ के एक-एक ग्वालबाल, एक-एक को पकड़ लेवें तो बता तुम सबका फिर क्या हाल होगा । जहाँ-जहाँ तू जाती है, वहाँ-वहां तेरे साथ ही मेरा मन भी जाता है । यह मेरा मन तेरे अधीन होकर रहेगा और चित्त = वृत्ति तथा धन-माल-खजाना सब तेरे हाथों में रहेगा । अर्थात् जहाँ जहाँ तू रहेगी वहाँ वहाँ ही मेरा मन रहेगा । मेरा मन तेरे अधीन रहेगा । तू स्वामिनी होगी । मन, धन-सम्पत्ति सब तेरी आज्ञा के अनुसार चलने वाले होंगे । इस प्रकार श्रीकृष्ण ने कहते-कहते जबरदस्ती करते हुए पान का बीड़ा मेरे मुख में दे दिया । 
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मेरी गर्दन पर अपनी बाँह रख दी और बातें करता हुआ मिस ही मिस = भुलावे में डाले हुए पकड़कर मुझे गहन अंधकार की ओर लेकर चला गया । नर-नारियों को वस्तुतः इस प्रकार का ही ज्ञान, ध्यान रुचिकर लगता है क्योंकि मिश्र के दृष्टिकोण से भी यही ज्ञान, ध्यान है तथा मिश्र की कथा सुनने वाले श्रोताओं के अनुसार भी यही ज्ञान-ध्यान है । बषनां कहता है व्यास की उक्त कथा को सुनकर कभी भी हृदय में सत्य स्थापित नहीं हो सकता ॥१३२॥ 

मंगलवार, 26 मई 2026

*१५. विरक्त् का अंग ~१/४*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*१५. विरक्त् का अंग ~१/४*
इस अंग में विरक्त विषयक विचार दिखा रहे हैं ~
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*त्यागी ताखे१ की दशा, तहां न माया घास ।*
*जन रज्जब तब जानिये, ब्रह्म अग्नि परकाश ॥१॥*
विरक्त्त पुरुष तक्षक१ जाति के सर्प के समान होता है । तक्षक जाति के सर्प की बाँबी के पास लगभग एक बीधा भूमि में घास नहीं होता, वैसे ही विरक्त के पास माया नहीं रहती । ऐसा विरक्त्त हो तभी समझना चाहिये कि इसमें ब्रह्म ज्ञानाग्नि का प्रकाश हुआ है ।
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*गृह दारा सुत वित्त सों, यहु मन भया उदास ।*
*जन रज्जब राम हिं रच्या, छूटया जगत निवास ॥२॥*
विरक्त्त का यह चंचल मन भी घर, नारी, पुत्र, धनादि से उदास हो जाता है, उसका सांसारिक विषयों में रहना छूट जाता है और वह राम में ही अनुरक्त्त रहता है ।
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*त्याग तेग सौं मारिये, रज्जब लंगर१ लोभ ।*
*मनसा वाचा कर्मना, तो तिहुं लोक में शोभ ॥३॥*
ढीठ१ लोभ को वैराग्य रूप तलवार से मारना चाहिये, हम मन, वचन, कर्म से कहते हैं, लोभ को नष्ट करने से ही तीनों लोकों में शोभा होती है ।
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*रज्जब रह गया राम में, तज रामति का द्वन्द्व ।*
*नभ नीर परसे नहीं, भया सीप का बूंद ॥४॥*
स्वाति जल का बिन्दु सीप में जाकर मोती बन जाता है तब अन्य जल के समान न तो आकाश में जाता और न जल से मिलता, वैसे ही संसार में भ्रमण के हेतु काम, क्रोधादि द्वन्द्वों का त्याग से विरक्त्त का मन राम में ही स्थिर रह जाता है, पुन: सांसारिक विषयों में अनुरक्त्त नहीं होता ।
(क्रमशः)

*२५. अवस्था कौ अंग ४९/५१*

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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*२५. अवस्था कौ अंग ४९/५१*
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निदिध्यास एकादशी, पुनि द्वादशी बदंति । 
आगै होइ त्रयोदशी, चतुर्दशी पर्यंति ॥४९॥
निदिध्यासन : तब एकादशी, द्वादशी, त्रयोदशी एवं चतुर्दशी तिथि में 'निदिध्यासन' द्वारा ज्ञान कला का विस्तार आगे से आगे बढता जाता है ॥४९॥
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तदाकार पूरन कला, पूरनमासी होइ । 
पूरन ज्ञान प्रकाश शशि, भ्रम संदेह न कोइ ॥५०॥
पूर्णिमा तिथि में उस चन्द्रमा के आकार(मण्डल) को पूर्ण करने वाली कला उद्भूत होती है, तब उस आत्मा रूप चन्द्रमा में ज्ञान का प्रकाश भी पूर्णतः उद्भूत होता है । और उस में किसी प्रकार का द्वैत भ्रम या कोई सन्देह नहीं रह जाता ॥५०॥
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ताहि कहत हैं ब्रह्मबिदु, शास्त्र बेद पुरांन । 
सुन्दर या अनुक्रम बिना, और सकल अज्ञांन ॥५१॥ 
ब्रह्मवित् : ऐसे ही आत्मज्ञानी को विविध शास्त्रों, वेदों एवं पुराणों में ब्रह्म का ज्ञाता(ब्रह्मवित्) कहा गया है । शेष संसार तो अज्ञान का भण्डार है ॥५१॥
(क्रमशः) 

ध्रिगि जीवन मेरे मन

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*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*दादू निमिष न न्यारा कीजिये, अंतर थैं उर नाम ।*
*कोटि पतित पावन भये, केवल कहतां राम ॥*
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*उपदेश ॥*
*ध्रिगि जीवन मेरे मन राम बिना* । राम बिना यौं गए दिना ॥टेक॥
रैंणि गई त्यूँ दिन भी जाइ । हरि हिरदै कबहूँ नहिं आइ ॥
हार्यौ जनम राम बिण सोये । जे दिन राम भगति बिन खोये ॥
कलि मैं आइ कर्म ये कीया । कहा भयौ जे बहु दिन जीया ॥ 
ध्रिग ते नर ध्रिगि ध्रिगि ते नारी । बषनां हरि की भगति बिसारी ॥१३१॥

हे मेरे मन ! राम-नाम-स्मरण के बिना जीवन को धिक्कार है । राम-नाम-स्मरण के बिना गया हुआ समय यौं =यौंही = व्यर्थ है । जैसे सोने में रात्री व्यतीत हो जाती है वैसे ही काम-धंधे में दिन व्यतीत हो जाता है किन्तु हरि = परात्पर-परब्रह्म-परमात्मा का चिंतन-स्मरण मन में कभी भी करता नहीं है । 
राम-नाम-स्मरण के बिना सोने में ही सारा जीवन व्यतीत कर दिया है । वे दिन व्यर्थ ही गये के समान हैं जिनमें रामजी की भक्ति का संपादन नहीं किया । कलिकाल में भगवन्नामजाप करने मात्र से ही मुक्ति मिल जाती है । कलिकाल में भगवन्नाम करने मात्र से ही मुक्ति मिल जाती है ~
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“कलिजुग केवल नाम अधारा । सुमिर सुमिर नर उतरहिं पारा ॥” 
कलिजुग केवल हरि गुण गाहा । गावत नर पावहीं भव थाहा ॥” 
“कलौ केशव कीर्तनात् ॥” 
“हरेर्नामैव हरेर्नामैव हरेर्नामैवे केवलं ।” 
“कलौ नास्त्यैव नास्त्यैव नास्त्यैव गतिरन्यथा ॥” 
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किन्तु इस सुगम, सरल और निरापद मार्ग का परित्याग करके संसार में आकर नाना बंधनकारी कर्म किये जिनसे मुक्ति का मारग प्रशस्त हो गया । यदि बंधनकारक कर्मों को करते हुए बहुत दिनों तक जिये भी तो उस जीने से क्या लाभ ? उससे तो उल्टे हानि ही होती है । उन पुरुषों व स्त्रियों को भी धिक्कार है जिन्होंने हरि की भक्ति का विस्मरण किया है ॥१३१॥

सोमवार, 25 मई 2026

*१४. भयभीत भयानक का अंग ~२१/२४*

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*🌷卐 सत्यराम सा 卐🌷*
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*१४. भयभीत भयानक का अंग ~२१/२४*
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*निडर निलज्ज निश्शंक ह्वै, पूरि करे अपराध ।*
*जन रज्जब जग सौं रचे, परिहर संगति साध ॥२१॥*
जो निडर, निलज्ज और निश्शंक होता है, वह पूर्ण रूप से पाप ही करता रहता है और संतों की संगति को छोड़ कर संसार के पापी प्राणियों से ही प्रेम करता है ।
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*भय भाग्यूं भूले भजन, सत संगति रुचि नाँहिं ।*
*जन रज्जब सेवा गई, संशय नाँहिं माँहिं ॥२२॥*
मृत्यु आदि का भय चले जाने से भगवद् भजन करना भी भूल जाता है सत्संग में भी रुचि नहीं रहती, आत्म विषयक संशय मन में नहीं होने से सद्गुरु तथा संतों की सेवा का भाव भी प्राणी के मन से चला जाता है ।
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*अदब२ अकलि१ में पाइये, शर्म साफ दिल माँहिं ।*
*बे अदबी बे शर्म में, रज्जब रजमा३ नाँहिं ॥२३॥*
ज्ञान१ युक्त में आदर२ का भाव रहता है, साफ हृदय में लज्जा रहती है, आदर भाव से रहित और निर्ज्जल में उन्नतिप्रद योग्यता३ नहीं रहती ।
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*जो तन निपजा तीन करि, न नीतिगि१ साज२ ।*
*जन रज्जब सुत पंच का, करे कौन की लाज ॥२४॥*
शुद्ध माता पिता से उत्पन्न होता है उसमें नीति, लज्जा, पाप कर्म से भय रहता है । जिसमें जार का बिन्दु भी पड़ा हो, वह तीन का पुत्र है उसमें नीतिज्ञ१ होने का साधन२ नहीं होता । जिसके चार जार हैं और एक पति उन पांच से उत्पन्न पुत्र किसकी लज्जा करेगा, अर्थात जो भय रहित व्यभिचारणी नारी का पुत्र हो, वह किस को पिता मान कर लज्जा करेगा ?
.
इति श्री रज्जब गिरार्थ प्रकाशिका सहित “१४. भयभीत भयानक का अंग” समाप्त ॥
(क्रमशः) 

*२५. अवस्था कौ अंग ४५/४८*

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
.
*२५. अवस्था कौ अंग ४५/४८*
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मावस अति अज्ञान कै, निसा अंधेरी कीन । 
ससि आतमा दृसै नहीं, ज्ञान कला करि हीन ॥४५॥
६. अवस्था का अन्य भेद : ४५ से ५१ तक की साषियों द्वारा महात्मा श्रीसुन्दरदासजी ने एक अवस्थाभेद १५ तिथियों में चन्द्रमा के प्रकाश के अनुक्रम-व्यतिक्रम के उदाहरण से समझाया है । इसमें अमावस्या को सुषुप्ति अवस्था(अज्ञान) के समान, प्रतिपदा से दशमी तक अल्प प्रकाश को स्वप्न अवस्था के समान तथा एकादशी से पूर्णिमा तक वर्धमान प्रकाश को जाग्रत् अवस्था बताया गया है ॥४५॥
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है अज्ञान अनादि कौ, जीव पर्यौ भ्रम कूप । 
श्रवन मनन निदिध्यास तें, सुन्दर ह्वै चिद्रूप ॥४६॥
यह अज्ञान अनादि माना गया है । यह जीव भ्रमरूप गहरे गर्त में गिरा हुआ है । जब वह(गुरु उपदेश का) श्रवण मनन एवं निदिध्यासन करता है तभी वह स्वकीय चिद्रूप को समझ पाता है ॥४६॥
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श्रवण सु कहिये प्रतिपदा, ज्ञान कला दरसाइ । 
दुतिया तृतिया चतुर्थी, सुनि पंचमी दिखाइ ॥४७॥
श्रवण : इन तीनों में, प्रतिपदा तिथि को 'श्रवण' माना जा सकता है जिसमें ज्ञान की प्रथम कला उद्भूत होती है । द्वितीया, तृतीया एवं चतुर्थी तथा पञ्चमी तिथि में श्रवण द्वारा उसी ज्ञानकला में वृद्धि होती है ॥४७॥
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मनन किये षष्टी दृसै, अर्थ लेइ पहिचांनि । 
होइ सप्तमी अष्टमी, नवमी दशमी जांनि ॥४८॥
मनन : षष्ठी तिथि में 'मनन' को माना जा सकता है जब जिज्ञासु गुरुपदिष्ट के वाच्यार्थ की वास्तविकता पहचान लेता है । तब सप्तमी, अष्टमी, नवमी एवं दशमी तिथि को इसी मनन के द्वारा ज्ञानकला का विस्तार होता है ॥४८॥
(क्रमशः)