रविवार, 12 जुलाई 2026

*२१. भजन भेद का अंग ~१३/१६*

*🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏*
*🌷卐 सत्यराम सा 卐🌷*
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
.
*२१. भजन भेद का अंग ~१३/१६*
.
*एक बंदगी विश्व में, एकै ब्रह्म सु होय ।*
*रज्जब श्रावण स्वाति की, वारि बूंद गुण दोय ॥१३॥*
श्रावण के जल की बिन्दु और स्वाति नक्षत्र के जल की बिन्दु एक जैसी होती है किन्तु गुण भिन्न है, स्वाति से मोती बनता है श्रावण की से नहीं, वैसे ही संसारिक प्रीति और ब्रह्म की भक्ति भी भिन्न गुण वाली है, संसारिक प्रीति से बन्धन और ब्रह्म भक्ति से मुक्ति प्राप्त होती है ।
.
*तन सुमिरण ढिकू चड़स, रहट रूप उनहार ।*
*रज्जब सुमिरन शून्य मन, वर्षा विपुल अपार ॥१४॥*
हाथ में माला फेरना तथा शरीरधारी का स्मरण करना, ढिकली, चड़स और रहट माला के समान है, जैसे इनसे माप का जल आता है, वैसे ही उक्त भजन से सीमित फल ही मिलता है और मन के द्वारा सर्व विकार शून्य ब्रह्म स्मरण भारी वर्षा के समान है । भारी वर्षा के अपार जल मिलता है वैसे ही ब्रह्म भजन से आपार ब्रह्मानन्द तथा ब्रह्म पद प्राप्त होता है ।
.
*अराध अराधहु अंतरा, भजन भजन बहु भेद ।*
*रज्जब पावे एक को, नर निज नाम न खेद ॥१५॥*
आराधना, आराधना में भी निष्कामता और सकामता रूप बहुत अंतर है तथा भजन, भजन में भी निर्गुण, सगुण, चित्त स्थैर्यता, चपलतादि रूप बहुत रहस्य है । कोई विरला नर ही जिसके चिन्तन में दु:ख नहीं है, ऐसे निज नाम का भजन कर पाता है ।
.
*भगवंत भजन सब विधि भला, पाये मानुष जूनि१ ।*
*रज्जब सुमिरन सो सही, जापर स्रवे२सु शूनि३ ॥१६॥*
मनुष्य जन्म१ पाने पर वैसे तो भगवान का भजन सभी प्रकार का अच्छा ही है किन्तु सच्चा सुमिरण तो वही है, जिस पर विकार शून्य राम२ जी कृपामृत गिरावें ।
(क्रमशः)

*२१. भजन भेद का अंग ~९/१२*

*🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏*
*🌷卐 सत्यराम सा 卐🌷*
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
.
*२१. भजन भेद का अंग ~९/१२*
.
*नाम निरंजन लीजिये, तन मन आतम माँहिं ।*
*जन रज्जब यूं सुमिरतों, परम पुरुष मिल जाँहिं ॥९॥*
तन, मन और बुद्धि को परमात्मपरायण करके निरंजन ब्रह्म का नाम चिन्तन करना चाहिये, इस प्रकार स्मरण करने से परम पुरुष परमात्मा मिल जाते हैं ।
.
*सु स्थिर आतम एक पल, रज्जब भज ही राम ।*
*मन मोती ज्यों नीपजे, स्वाति नक्षत्री नाम ॥१०॥*
एक क्षण भी बुद्धि को स्थिर करके राम का भजन किया जाय तो जैसे स्वाति नक्षत्र के जल से शुक्ति में मोती उत्पन्न होता है, वैसे ही मन ज्ञान उत्पन्न हो जाता है ।
.
*नहीं सु निकसे आरसी, छति१ सु गायब होय ।*
*रज्जब दरपन सती के, प्रत्यक्ष दीसे दोय ॥११॥*
सती होने वाली माता के अंगुष्ठ से आरसी नामक भूषण तो नहीं निकलता, वह होता१ हुआ भी लुप्त हो जाता है, किन्तु सती का अन्त:करण-दर्पण है उससे यह लोक और परलोक दोनों ही दीखते हैं । वैसे ही साधक का इन्द्रिय ज्ञान तो लुप्त हो जाता है किन्तु भजन द्वारा प्राप्त ज्ञान-दर्पण से उसे ब्रह्म के सगुण और निर्गुण दोनों ही रूप प्रत्यक्ष दीखते हैं ।
.
*रज्जब साधु सती रामहि कहै, पर हरि तन मन धन प्रीति ।*
*इष्ट अभ्यासे उभय को, तज भजणी रस रीति ॥१२॥*
सती तन धनादि की प्रीति को त्यागकर अपने अभीष्ठ पतिदेव में ही मन को स्थिर रखती है, चिता की ज्वाला को देखकर भागने का विचार नहीं करती, वैसे ही साधु तन धनादि की प्रीति तथा दौड़कर विषयों में जाने की रस रीति को त्याग कर अपने इष्ट निरंजन ब्रह्म में वृत्ति स्थिर रखता है ।
(क्रमशः)

शनिवार, 11 जुलाई 2026

२९. अद्वैत ज्ञान कौ अंग ४५/४७

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
.
२९. अद्वैत ज्ञान कौ अंग ४५/४७
.
ज्यौं रवि के उद्योत तें, अंधकार भ्रम दूरि । 
सुन्दर ब्रह्म बिचार तें, ब्रह्म रह्या भरपूरि ॥४५॥ 
जैसे सूर्य के उदित होते ही अन्धकार सर्वथा नष्ट हो जाता है, वैसे ही ब्रह्म पर विचार करते हुए उस का साक्षात्कार होने पर, जगत् का भ्रम सर्वथा मिट जाता है और उसे सब कुछ ब्रह्ममय ही दिखायी देता है ॥४५॥
.
सुन्दर "सर्वं खलु इदं, ब्रह्म" कहतु हैं वेद । 
चतुर श्लोकी मांहिं पुनि, सकल मिटायौ भेद ॥४६॥ 
वेदादि सब शास्त्रों में एकमात्र ब्रह्म का ही निरूपण : यदि श्रुति को प्रमाण माना जाय तो वह कहती है - 'सर्वं खल्विदं ब्रह्म नेह नानास्ति किञ्चन' (यह सब कुछ दृश्यमान ब्रह्म ही है, दूसरा कोई नहीं है) । चतुःश्लोकी भागवतपुराण भी इसी मत को पुष्ट करता है ॥४६॥
.
सुन्दर कह्यौ वसिष्ठ पुनि, रामचन्द्र सौं ज्ञांन । 
ब्रह्म बतायौ एक ही, दूरि कियौ भ्रम आंन ॥४७॥
योगवाशिष्ठ ग्रन्थ में वसिष्ठ मुनि ने भी श्रीरामचन्द्र को ब्रह्मज्ञान का ही उपदेश कर ब्रह्म को एक बताते हुए जगत् को भ्रान्तिमय ही सिद्ध किया है ॥४७॥
(क्रमशः)

*चक्रवर्ती संत-सम्राट*

*#daduji*
*॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥*
*॥ दादूराम~सत्यराम ॥*
*साभार सौजन्य ~ “श्रीमद्‌ दादू पंथ प्रकाश”*
*श्रीमद्दादूपीठाधीश्वर(२०) श्री गोपालदासजी महाराज का संक्षिप्त जीवन दर्शन~*
.
आपके निरन्तर देशाटन में श्री दादू पंथ से इत्तर अनेक संत सम्प्रदायों- निम्बार्क, कबीर, रामस्नेही, नाथ, उदासीन, जिनी, सन्यासी, वैरागी, प्रभूति, सभी संत, मतानुयायी, पीठाधीश्वर व संत-महंतों के आश्रमों मठों द्वारों में आपका सादर अपूर्व प्रवेश, भेंट, संत-संस्कृति के अनुरूप सर्वथा सम्पृक्त-व्यवहार, ऐतिहासिक व युगानुकूल उच्चादर्श प्रस्तुत करते हैं ।
.
आपने मनसा वाचा कर्मणा निरन्तर अहर्निश असंख्य जनों को 'संतमत' में दीक्षित करते हुये निस्सीम व निर्वाध रूपेण विनियोजित किया है तथा शाश्वत-संत-शरणि के अव्याहत पवित्र-प्रवाह में जन-जन को अवगाहित कर उन्हें परम-प्रांजल ज्ञान प्रदान किया है ।
.
श्री मद्दादपीठ की जगद्विताय सार्वभौमिकता की संसिद्धि के निमित्त आपने' जगद्‌गुरुत्व' को व्यावहारिक रूपेण संस्थापित करते हुये 'संत-मत' को सर्वोपरि व सर्वोत्कृष्ट संसाध्य सिद्ध किया है ।
.
श्री दादूपंध की मौलिक निहंग-परम्परा व संवैधानिकता को अक्षुण्ण रखने का सत्य-संकल्प लेते हुए जाति वर्ग वर्गातीत 'संत-पथ' को अंगीकार किया । सभी संत-सम्प्रदायों में पारस्परिक सामञ्जस्य व साम्य तथा पीठाधिपतियों की गुरुमत प्रचारार्थ संदर्शित व सम्मान्य अवधारणा को सर्वग्राह्य रखने के उद्देश्य की परिपालनार्थ आपका साग्रह कर्तव्य-बोध तथा सक्रिय योगदान आपकी हार्दिकता को प्रकट करता है । यही मूलभूत *जगद् गुरुत्व* की सार्थक व पूर्ण परिभाषा है. जो पूज्याचार्य चरित्रनायक श्री(पीठाधीश्वर 20) में सिद्धान्ततः विद्यमान है । परिणाम स्वरूप सभी संत समुदाय व पीठों ने आपको *चक्रवर्ती संत-सम्राट* इस गरिमामय सम्मान्य अलंकरण से अलंकृत किया है ।
(क्रमशः)

२९. अद्वैत ज्ञान कौ अंग ३१/४४

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
.
२९. अद्वैत ज्ञान कौ अंग ३१/४४
.
जगत जगत सब को कहै, जगत कहा किंहिं ठौर । 
सुन्दर यह सब ब्रह्म है, नाम धर्यौ फिरि और ॥४१॥
इस जगत् के विषय में सभी विद्वान् बहुत कुछ लिखते बोलते हैं; परन्तु यह कोई नहीं बताता कि यह जगत् है कहाँ ? अरे ! यह सब दृश्यमान पदार्थसमूह तो वस्तुतः ब्रह्म है; केवल व्यवहार के लिये लोगों ने इन पदार्थों के पृथक् पृथक् नाम रख लिये हैं ॥४१॥
.
खोज करत ही जगत कौ, जगत बिलै ह्वै जाइ । 
सुन्दर यह सब ब्रह्म है, जगत कहां ठहराइ ॥४२॥
जैसे जैसे जहाँ जहाँ हम जगत् को खोजने का प्रयास करते हैं, वहाँ वहाँ से वह हमें लुप्त ही प्रतीत होता है । जिसे जिसे हम देखते हैं वह वह हमें ब्रह्म ही ज्ञात होता है, हम उसे 'जगत्' नहीं मान सकते ! ॥४२॥
.
जगत कहें तें जगत है, सुन्दर रूप अनेक । 
ब्रह्म कहें तें ब्रह्म है, बस्तु बिचारें एक ॥४३॥
क्यों कि हम इन दृश्यमान पदार्थों के अनेक रूप होने के कारण इन को अनेक नामों से व्यवहृत कर लेते हैं, अतः सब इसे 'जगत्' कहने लगते हैं । वस्तुतः ये सभी पदार्थ ब्रह्ममय हैं । इसी पर यदि हम ब्रह्म की दृष्टि से यथार्थतः विचार करें तो ये सर्वथा ब्रह्ममय ही हैं ॥४३॥
.
प्रगट भयौ भ्रम जगत कौ, करतें जगत बिचार । 
सुन्दर ब्रह्म बिचार तें, जगत न रह्यौ लगार ॥४४॥
जिज्ञासु साधक को, 'जगत्' पर विचार करने पर, समस्त जगत् भ्रम ही प्रतीत हुआ; परन्तु 'ब्रह्म' पर विचार करते हुए उसको ब्रह्म में जगत् का लेशमात्र भी नहीं दिखायी दिया ॥४४॥
(क्रमशः)

पीठारोहण

*#daduji*
*॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥*
*॥ दादूराम~सत्यराम ॥*
*साभार सौजन्य ~ “श्रीमद्‌ दादू पंथ प्रकाश”*
*श्रीमद्दादूपीठाधीश्वर(२०) श्री गोपालदासजी महाराज का संक्षिप्त जीवन दर्शन~*
.
शिक्षा-अध्ययन के उपरान्त श्री दादू द्वारे की अहर्निश सेवा की । और श्री दादू द्वारे के सर्वाधिकारी बने । दिनाङ्ग श्रावण कृष्ण ११(एकादशी) वि.सं. २०५८ तदनुसार 17 जुलाई सन् 2001 को पीठाचार्य श्री हरिरामजी महाराज के आकस्मिक निधन उपरान्त दादूपंथ के सर्वोच्च पद पर पीठारोहण हुआ ।
.
आपने पीठासीन होकर विभिन्न अंचलों व स्थानों पर ज्ञानयज्ञ के रूप में प्रतिवर्ष निरन्तर "चातुर्मास अनुष्ठान" कर 'संतमत' का अविरल प्रचार प्रसार किया ~
(१) सांगानेर(जयपुर) था. हनुमानदास जी स्वामी, सन्त कुटीर, सांगानेर
(२) पोहधाम(मारवाड़) महंत पोकरदासजी स्वामी
(३) करड़ालाजी संत भानुदासजी स्वामी
(४) भैराणाधाम वैद्य संत रामविलासदासजी स्वामी
(५) पोहधाम साध्वी मैना बाई
(६) सावड़(हरियाणा) महंत जगदीशदास जी स्वामी
(७) निवाई श्री दयाल आश्रम बाबा रामपालदासजी बाबा प्रसाददासजी स्वामी
(८) मेडता सिटी(छतरी पूज्याचार्य 6 श्री किशनदेव जी महाराज) बेमचा, महंत श्री रामनिवासदासजी पोहधाम व मारवाड़ क्षेत्र के संतभक्त ।
(९)सांधडिया(हरियाणा) संत किशनदासजी ।
(१०) विद्याद, नागौर महन्त श्री रामनिवासदासजी सुखदेव दासजी ।
(११) माण्डल(भीलवाडा) के बिरला परिवार द्वारा
(१२) भोजपुरा दादूद्वारा के सन्त वैद्य श्री शीतलदासजी हनुमानदासजी स्वामी ।
(१३) श्री दाद पन्थ प्रकाश संस्था, नरायना ।
(१३) श्री नन्दलाल जी सेपट, कालख बाँध द्वारा ।
(१४) पौह धाम, नागौर महन्त श्री रामनिवास दासजी महाराज ।
(१५) श्री दादू द्वारा मेहलाणा, भोपालगढ़, जोधपुर सन्त मोहनदासजी महाराज
.
आपने श्रीमद्दादूब्रह्मधाम नरायना के पूरे परिसर को सभी आधुनिक सुविधात्मक संसाधनों से परिपूर्ण, भव्य एवं दर्शनीय बनाते हये उसकी ऐतिहासिकता को धरोहर के रूप में अक्षुण्ण रख कर पुरातत्व के सभी अवशेषों को सजा-संवार कर रखा है। जिससे समागत दर्शनार्थी व शोधकर्ता लाभान्वित हो मुख्य पीठ धाम की गरिमा से अभिभूत होते हैं ।
(क्रमशः) 

*२१. भजन भेद का अंग ~५/८*

*🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏*
*🌷卐 सत्यराम सा 卐🌷*
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
.
*२१. भजन भेद का अंग ~५/८*
.
*जन रज्जब जगदीश भज, आतम के अस्थान ।*
*सुख सागर संबूह१ की, अंतर उघड़े खान ॥५॥*
जीवात्मा के आदि स्थान जगदीश्वर का भजन करना चाहिये, भजन करने से भीतर ही सर्व१ रूप सुख-समुद्र रूप ब्रह्मानन्द की खान निकल आती है ।
.
*रज्जब भज भगवन्त को, तन मन भीतर पैठ ।*
*निर्मल नैनों निरख निधि, नाभि निरंतर बैठ ॥६॥*
मन को शरीर के भीतर स्थिर करके भगवान का भजन करना चाहिये, निरन्तर नाभिस्थान में वृत्ति को टिकाकर भजन द्वारा प्राप्त निर्मल ज्ञान-नेत्रों से ब्रह्म रूप निधि को देखना चाहिये ।
.
*नाभि निरंतर नाम बिन, राखे भाखे नाँहिं ।*
*रज्जब सब पड़दे उठे, जाके यहु मत माँहिं ॥७॥*
जो निरंतर नाभि स्थान में नाम को रखता है, अन्य बातें न तो हृदय में रखता और नहीं कहता, ऐसा ही जिसके हृदय में निश्चय है उसके और ब्रह्म के बीच जो अविद्यादि पड़दे हैं, वे सब हट जाते हैं ।
.
*नाम निरंजन लीजिये, तन मन आपो गाल ।*
*तो रज्जब रामहिं मिले, बैठे सलहिं साल ॥८॥*
तन और मन के अंहकार को नष्ट करके निरंजन ब्रह्म का नाम चिन्तन करना चाहिये, चिन्तन करने से आत्मा परमात्मा से मिल कर जैसे पिलंग के फागों में छिद्रों में लकड़ी बैठ जाती है, वैसे ही आत्मा परमात्मा दोनों एक ही हो जाते हैं ।
(क्रमशः)

शुक्रवार, 10 जुलाई 2026

*२१. भजन भेद का अंग ~१/४*

*🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏*
*🌷卐 सत्यराम सा 卐🌷*
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
.
*२१. भजन भेद का अंग ~१/४*
इस अंग में भगवद्-भजन संबन्धी रहस्य का विचार कर रहे हैं ~
.
*सब करणी साधन किये, त्यागी शूर सुजान ।*
*जो रज्जब राम हिं भजे, मन मनसा घर आन ॥१॥*
जो साधक शूर विषयाशा को त्याग कर तथा मन और बुद्धि अपने स्थान में स्थिर करके राम को भजता है, उसने सभी कर्तव्य पालन और सभी साधन कर लिये अर्थात भजन से साधक के सभी काम हो जाते हैं ।
.
*जन रज्जब जंजाल तज, मन मनसा कर ठाँम ।*
*करने को कहु क्या रह्या, यूं लागा जब नाम ॥२॥*
जग-जाल को तजकर तथा मन बुद्धि को अपने आदि परमात्मा के स्वरूप में लीन करके नाम चिन्तन में लगा है, तब कहो ? क्या करना शेष रहा ।
.
*रज्जब राखो नाम में, पंच पचीसौं मन्न ।*
*सब समेट सुमिरन करे, सोई साधू जन्न ॥३॥*
पंच ज्ञानेन्द्रियाँ, पच्चीस प्रकृतियाँ और मन को नाम में लगाये रक्खो, उक्त प्रकार सबको नाम में एकत्र करके सुमिरन करता है वही जन साधु है ।
.
*रज्जब सुमिरे राम को, रोक दशों दिशि द्वार ।*
*नख शिख राखे नाम में, यों ही पैला१ पार ॥४॥*
अनुचित विषयों की और जाने के दश इन्द्रिय रूप दश द्वारों को रोककर नख से शिख पर्यंत शरीर का नाम परायण रखना चाहिये, ऐसा करने से ही संसार के पर१ पार जाकर प्रभु से मिलना होता है ।
(क्रमशः)

२९. अद्वैत ज्ञान कौ अंग ३७/४०

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
.
२९. अद्वैत ज्ञान कौ अंग ३७/४०
.
जगत नाम सुनि भ्रम भयौ, मान्यौ सत्य स्वरूप । 
सुन्दर मृग जल देखिये, है सूरय की धूप ॥३७॥
व्यवहार में लोगों की मिथ्या बातें सुन सुनकर हम भ्रम में पड़ते गये और उसे ही सत्य मान बैठे । जैसे कि किसी पशु को मृत्तिका पर सूर्य की किरणें देखकर मृगमरीचिका से जल का भ्रम हो जाता है ॥३७॥
.
जैसैं महदाकाश तैं, घटाकाश नहिं भिन्न । 
यौं आतम परमातमा, सुन्दर सदा प्रसन्न ॥३८॥
जैसे महाकाश एवं घटाकाश में कोई भेद नहीं होता, वे दोनों परस्पर एक ही हैं; वैसे ही आत्मा एवं परमात्मा भी सदा स्वच्छ(शुद्ध = प्रसन्न) रहने के कारण परस्पर अभिन्न(एक) ही हैं ॥३८॥
.
आतम अरु परमातमा, कहन सुनन कौं दोइ । 
सुन्दर तब ही मुक्त है, जबहिं एकता होइ ॥३९॥
आत्मा एवं परमात्मा - ये दोनों शब्द बोलने एवं सुनने में अवश्य भिन्न प्रतीत होते हैं; परन्तु साधक द्वारा, गुरुपदिष्ट ज्ञान की साधना के माध्यम से, अज्ञानावरण हटा देने पर मुक्त आत्मा का परमात्मा के साथ तादात्म्य(एकता) हो जाता है ॥३९॥
.
देह धरैं यह जीव हैं, ईश्वर धरैं बिराट ।
कारज कारन भ्रम गयें, सुन्दर ब्रह्म निराट ॥४०॥
इन दोनों में जीवात्मा यह(प्राणियों का) शरीर धारण करता तथा ईश्वर(परमात्मा) विराट्(विश्व) रूप है । कार्य कारण मात्र से ही हम को यह भेद(द्वैत भ्रम) प्रतीत हो रहा है, यथार्थ में तो वे दोनों एक(विराट) ही है ॥४०॥
(क्रमशः)

श्रीमद्दादूपीठाधीश्वर(२०)

*#daduji*
*॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥*
*॥ दादूराम~सत्यराम ॥*
*साभार सौजन्य ~ “श्रीमद्‌ दादू पंथ प्रकाश”*
*श्रीमद्दादूपीठाधीश्वर(२०) श्री गोपालदासजी महाराज का संक्षिप्त जीवन दर्शन~*
.
*ब्रह्मधाम-यशः श्रीमान्, संत-सम्राट् जगद्गुरुः ।*
*निस्मीमो निर्गुणः पंथी, गोपालाचार्य संस्तुतिः ॥*
.
राजस्थान के सीकर जिलान्तर्गत कंवरपूरा ग्राम के जाट परिवार(बिजारणिया गौत्र) में पिता श्री सुखदेवारामजी तथा माता श्रीमती महादेवी के पुत्र के रूप में श्री गोपालदासजी का जन्म *वैशाख कृ. १, २०२० वि.सं, गुरुवार* (दिनांक 9 मई 1963) को हुआ । इस परिवार में कई पीढियों से एक पुत्र श्री दादू द्वारा बीदासर(झुंझुनूं) में देने की परम्परा है ।
.
इसी क्रम में श्री गोपालदासजी को इस दादूद्वारे में दिया गया । वहीं पधारे श्रीदादू धाम नरायना के पीठाधीपति ‘आचार्य श्री हरिरामजी महाराज’ । आचार्य श्री हरिरामजी महाराज को श्री गोपालदासजी नरायना पीठ के लिये योग्य लगे । और वो उन्हें अपने साथ लेकर आ गये । और सन् 1969 को अपना विधिवत शिष्य बना लिया ।
.
श्री दादूद्वारा नरायना के ‘भण्डारी सन्मान दासजी’ ने इनका विद्याध्ययन तथा पंथीय संस्कारों हेतु उनका प्रवेश श्री दादू आचार्य संस्कृत महाविद्यालय में करवा दिया । अपन आपने यहाँ विद्यार्जन कर श्रेष्ठ स्नातकों में अपनी गरीमामयी उपस्थि करवायी । आप ने वेदान्त, संस्कृत साहित्य के अतिरिक्त हिन्दी साहित्य व सन्त वाणियों के मर्मज्ञ गुरुओं व मनीषियों से ज्ञानार्जन किया । तथा समस्त शास्त्रों के प्रकाश को अपने में संधारित किया ।
.
आपने देश के मूर्धन्य प्रकाण्ड विद्वज्जनों के चरणों में बैठकर ज्ञानार्जन किया जिसमें प्रमुख है आचार्य सुरजनदासजी दास जी, आचार्य मंगलदास जी, आचार्य बलरामजी स्वामी, श्री गोपालाचार्य जी, पं. श्री दयारामजी, श्री बालानन्दजी महाराज इत्यादि शिक्षा गुरुओं के चरणों में बैठकर आपने श्रीमद दादूवाणी से लेकर विविध सन्त साहित्य, श्रीमद् भागवत कथा गीता, उपनिषद् का तात्विक अध्ययन किया ।
(क्रमशः)

गुरुवार, 9 जुलाई 2026

२९. अद्वैत ज्ञान कौ अंग ३३/३६

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
.
२९. अद्वैत ज्ञान कौ अंग ३३/३६
.
सुन्दर ज्यौं आकाश मैं, अभ्र होइ मिटि जांहिं । 
त्यौं आतम तैं जगत है; ता ही मध्य समांहि ॥३३॥
श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - जैसे आकाश में बादल आते हैं और चले जाते हैं, वैसे ही यह संसार भी आत्मा में समा जाता है ॥३३॥
.
जहं सुन्दर तहं जग नहीं, जग तहं सुन्दर नित्य । 
जहं पृथ्वी तहं घट नहीं, घट तहं पृथ्वी सत्य ॥३४॥
जहाँ संसार की सत्ता हो वहाँ ब्रह्म नित्यरूप से रहता है; परन्तु यह आवश्यक नहीं कि जहाँ ब्रह्म की सत्ता हो वहाँ संसार की सत्ता भी रहे ही ॥३४॥
.
वोहं सोहं एक ही, तूं ही हूं ही एक । 
कहिबे ही कौ फेर है, सुन्दर संमुझि बिबेक ॥३५॥
वह(ब्रह्म) और मैं एक ही हैं । इसी प्रकार तूं(जिज्ञासु) और मैं(सद्‌गुरु) भी एक ही हैं । केवल कथनव्यवहार में भिन्नता दिखायी दे सकती है; परन्तु विवेकपूर्वक चिन्तन करने पर वे एक ही ज्ञात होंगे ॥३५॥
.
ज्यौं माता हाऊ कहै, बालक मांनै त्रास । 
त्यौं सुन्दर संसार है, मिथ्या बचन बिलास ॥३६॥
जैसे कोई माता अपने शिशु को भय दिखाने के लिये उस के सामने 'हाउ' ऐसा भयदायक शब्द बोले तो उसे सुन कर वह बालक, भय के कारण काँपने लगता है; वैसे इस संसार का समस्त वाग्विलास(वाणीविस्तार) मिथ्या(भ्रमोत्पादक) ही समझना चाहिये ॥३६॥
(क्रमशः)

*ब्रह्मलीन~*

*#daduji*
*॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥*
*॥ दादूराम~सत्यराम ॥*
*साभार सौजन्य ~ “श्रीमद्‌ दादू पंथ प्रकाश”*
*श्रीमद्दादूपीठाधीश्वर(१९)श्री हरिरामजी महाराज का संक्षिप्त जीवन दर्शन~*
.
*विभिन्न स्थानों पर चातुर्मास महोत्सव ~*
आप देश के प्राय: सभी महानगरों-नगरों व जहाँ-जहाँ आमंत्रण मिला वहाँ गये तथा जहाँ-जहाँ चातुर्मास आयोजित किये गए, वहाँ जाकर संतमत श्रीदादूवाणी जी तथा आध्यात्म को जन-जन में हृदयस्थ कर पीठ व पंथ की गरिमा को सर्वथा विवर्धित किया । आपके निम्रांकित स्थानों पर “चातुर्मास्य-महा-सत्संगोत्सव” सम्पन्न हुए~
.
+ सौंखिया परिवार, जयपुर शहर
+ महरवाल परिवार, ग्राम - आँधी
+ भैराणा मोक्षधाम पालकांजी
+ नयी नाड़ी रामपुरा(टोंक)
+ टांका स्थान भैराणाजी
+ गेटोर ग्राम(जयपुर) दादूद्वारा
+ कलकत्ता महानगर दादूसेवकों द्वारा
+ सोनीपत म.म.श्री भूरादासजी द्वारा
+ इन्दावड़(मेडता) संत भूरादासजी
+ मेड़ता सिटी छत्तरी भक्तों द्वारा
+ ओसियाँ ग्राम रामनारायणजी स्वामी द्वारा(जोधपुर) गीजगढ़ दादूद्वारा में ।
+ भोजपुरा कलां(जोबनेर) संत शीतलदासजी द्वारा
+ निवाई श्री दयालआश्रम निवाई द्वारा
.
*धाम का परिष्कार~*
आपने श्री दादूद्वारा धाम के सैकड़ो टूटे-फूटे स्थानों के जीर्णोद्धार का काम प्रारंभ कर उन्हें आधुनिक सुविधाओं - से युक्त संतो व भक्तजनों के आवास योग्य बनाने का संकल्प लिया और संपूर्ण 101 बीघा में फैले हुए दादूधाम की योजनाबद्ध रीति से संरक्षण का श्रीगणेश कर धाम के परिष्कार को गति प्रदान की ।
.
*संत साहित्य का संरक्षण~*
दादूसमाज के अनेकानेक स्थानों व धामस्थ असंख्य हस्त लिखित संत-साहित्य को एकत्र कर सुरक्षित करने का जो कार्य गुरुवर्य पूर्वाचार्य श्री ने प्रारंभ किया था उसे आपने मूर्त रूप देकर तदर्थ विशाल प्रदर्शनीकक्ष के निर्माण कार्य सहित संत कृतियों को संरक्षण दिया । साथ ही पुरावशेष दर्शनीय वस्तुओं के संग्रह को लिपिबद्ध तथा आधुनिक रीत्या प्रदर्शित करने और उन्हें जीर्ण-शीर्णता से बचाने के उपाय किये ।
आपने अपने पीठकाल में असंख्य सद्गृहस्थ भक्तों-सेवकों तथा श्रद्धालुओं की श्रृंखला तैयार कर धाम की शोध को विवर्धित किया । साथ ही दीक्षा गुरुमंत्र तथा पांथिक पद्धति से अनुयायिजनों की अगणित संख्या बढ़ाई ।
.
*देश-प्रदेश के महान-मनीषियों का आगमन~*
आपके पीठासीन रहते देश की महान् नेत्री श्रीमती इन्दिरा जी गांधी ने मुख्य धामों की गणना में इस गुरुधाम को चुन कर पूजा-अर्चना के साथ आचार्यश्री से आशीर्वाद ग्रहण किया । तथा राजस्थान प्रदेश के लोकप्रियनेता माननीय श्री भैरोंसिंह जी शेखावत ने अनेकों बार धाम दर्शन कर नमन किया व आशीर्वाद लिया ।
.
*ब्रह्मलीन~*
आपने ब्रह्मलीन होने से कुछ काल पूर्व ही अपने पीठ के लिए सुयोग्य प्रतिनिधि का विधिवत् चयन कर संभावित सुभविष्य को सुस्थिर कर पीठ व समाज को अपने रहते ही सर्वथा आश्वस्त करते हुए अपना उत्तरदायित्व पूर्ण किया औ अन्तिम समय के व्यामोह से निश्चिंत हो प्रभुचिंतन सद्‌गुरुवंदन तथा समाज भगवान को नमन कर दिनाङ्क श्रावण कृष्ण(एकादशी) सं. 2058 वि. तदनुसार 17 जुलाई सन् 2001 को परब्रह्म में लीन हुये ।

*२०. सुमिरण का अंग ~९३/९५*

*🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏*
*🌷卐 सत्यराम सा 卐🌷*
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
.
*२०. सुमिरण का अंग ~९३/९५*
.
*लिख्या पढ्या सीख्या सुण्या, जीव कह्या जब राम ।*
*मनसा वाचा कर्मना, येता१ ही है काम ॥९३॥*
जिस जीव ने अपने जीवन में निरंतर राम-नाम स्मरण कर लिया तो समझना चाहिये, उसने सब कुछ लिख लिया, पढ़ लिया, सीख लिया और सुन लिया । हम तो मन, वचन, कर्म से कहते हैं कि उक्त प्रकार स्मरण करके राम को प्राप्त करले बस, जीवन के लिये इतना१ ही कर्तव्य कर्म है ।
.
*पाव नाम छाडै संसारा, अर्ध नाम शरीर विसारा ।*
*पौंण नाम जीव वृत्ति त्यागी, सेर नाम साँई सुरति लागी ॥९४॥*
संसार भावना छुट जाय तब पाव भर स्मरण, शरीर की आसक्ति त्याग दे तब आध सेर, जीवपने की वृत्तियों को त्याग दे तब तीन पाव और निरंतर परब्रह्म में वृत्ति लगी रहे तब समझना चाहिये सेर भर स्मरण हुआ है अर्थात यही स्मरण की पूर्णावस्था है ।
.
*नींद लागि होई निरमूलै, तो सुमिरण संग क्यों न सब भूलै ।*
*पास पसारा परसे नाँहीं, यूं रज्जब न्यारा है माँहीं ॥९५॥*
घोर निद्रा आने पर अपने सब संसार का अभाव हो जाता है, सुषुप्ति में सम्पूर्ण अपना घरादि मायिक विस्तार पास ही है, तो भी उससे संयोग नहीं होता, वैसे ही हरि स्मरण के समय भी सब संसार को क्यों नहीं भूलते अर्थात भूलना चाहिये । साधक स्मरण द्वारा सुषुप्ति के समान संसार के भूलकर संसार में रहता हुआ भी संसार से न्यारा रहता है ।
.
इति श्री रज्जब गिरार्थ प्रकाशिका सहित “२०. स्मरण का अंग” समाप्त ॥
(क्रमशः)

बुधवार, 8 जुलाई 2026

*२०. सुमिरण का अंग ~८९/९२*

*🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏*
*🌷卐 सत्यराम सा 卐🌷*
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
.
*२०. सुमिरण का अंग ~८९/९२*
.
*निश्चय पर नावै२ नहीं, करणी बड़ा करार१ ।*
*जन रज्जब सब शोध कर, काढ्या सुमिरण सार ॥८९॥*
कर्तव्य भावना रूप विशाल किनारे१ वाली संसार-सरिता को पार करने के लिए ब्रह्म में अभेद निश्चय से अधिक श्रेष्ठ नाव२ कोई भी नहीं है । संतों ने उस अभेद निश्चचय के लिये सभी साधनों में से विचार द्वारा खोजकर सब साधनों का सार ब्रह्म चिन्तन ही निकाला है ।
.
*रज्जब निश्चय नीव पर, भाव भक्ति की भीति ।*
*सौ सृदृढ़ निश्चल रहै, और सबै भय भीति ॥९०॥*
जिस साधक में यह निश्चय है कि - "भगवद् -भजन बिना प्राणी का कल्याण नहीं हो सकता," इस निश्चय रूप नीव पर ही श्रद्धा भक्ति रूपी दीवाल उठती है, जिसमें अडिग श्रद्धा भक्ति होती है, वह किसी प्रकार भी डिगता नहीं, अपने साधन में सदृढ़ और निश्चल रहता है, अन्य सब कालादि से भयभीत रहते हैं ।
.
*भक्ति भावली१ ठाहरे, चल चावली२ जाय ।*
*रज्जब समझ असमझ का, भजन भेख निरताय ॥९१॥*
भक्ति-भाव-वाली१ वृत्ति ही स्मरण में ठहरती है, चंचलता रूप उत्साह-वाली२ विषयों में जाती है । अत: ज्ञान, अज्ञान, भजन और भेष का विचार करोगे तो ज्ञान पूर्वक भजन ही श्रेष्ठ ज्ञात होगा, चंचलता युक्त भेष नहीं, इसलिये भाव भक्ति युक्त स्मरण ही कर्तव्य है ।
.
*रज्जब रत रंकार१ सौं, ममै२ मनसा३ नाँहिं ।*
*सदा सुखी सुमिरन करै, महा मग्न मन माँहिं ॥९२॥*
जिसकी बुद्धि३ माया२ में नहीं जाती, राम मन्त्र के बीज "राँ"१ में ही अनुरक्त रहती है और निरंतर नाम स्मरण करता रहता है, उसका मन महान् स्मरण रस में निमग्न होकर सदा सुखी रहता है ।
(क्रमशः)

२९. अद्वैत ज्ञान कौ अंग २९/३२

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
.
२९. अद्वैत ज्ञान कौ अंग २९/३२
.
लोक हाथ पर देखिये, ज्यौं सीतला सरीर । 
ऐसैं सुन्दर ब्रह्म तें, जगत भिन्न नहिं बीर ॥२९॥
जैसे हाथ पर हस्तरेखाएँ खिंची रहती हैं, या किसी के शरीर पर शीतलारोग(चेचक) के चिह्न(दाग) होते हैं, वहाँ हाथ का हस्तरेखाओं से तथा शरीर का चेचक के दाग से शरीर का भेद द्वैत नहीं है, यही तुलना ब्रह्म एवं जगत् में करनी चाहिये ॥२९॥ (द्र० - सवैया : ३२/१८ छ०)
.
सुन्दर मैं संसार है, ज्यौं सरीर मैं अंग । 
हस्त पांव मुख नासिका, नैंन श्रवन सब संग ॥३०॥
इसी प्रकार ब्रह्म में संसार का तथा शरीर में अङ्गों का समन्वय समझना चाहिये; क्योंकि हाथ, पैर, मुख, नासिका, कान आदि ये सब शरीर के ही अङ्ग(अवयव) हैं ॥३०॥
.
हस्त पांव अरु अंगुली, नैंन नासिका कांन । 
सुन्दर जगत सरीर ज्यौं, निंदै कौंन स्थांन ॥३१॥
अतः शरीर के इन अवयवों के समान जगत् की भी निन्दा कैसे की जा सकती है, जब कि जगत् भी ब्रह्म का ही अंश है ॥३१॥
.
सुन्दर जिह्वा आपुनी, अपने ही सब दंत । 
जौ रसना बिदलित भई, तौ कहा बैर करंत ॥३२॥
श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - जब कि इस शरीर में जिह्वा(जीभ) भी अपनी है, और दाँत भी अपने ही हैं; फिर भी कभी कभी दाँत जिह्वा को काट लेते हैं । अब वैर की बात किससे की जाय ! ॥३२॥
(क्रमशः)

वैदुष्यपूर्ण धाराप्रवाही प्रवक्ता

*#daduji*
*॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥*
*॥ दादूराम~सत्यराम ॥*
*साभार सौजन्य ~ “श्रीमद्‌ दादू पंथ प्रकाश”*
*श्रीमद्दादूपीठाधीश्वर(१९)श्री हरिरामजी महाराज का संक्षिप्त जीवन दर्शन~*
.
*वैदुष्यपूर्ण धाराप्रवाही प्रवक्ता~*
आपके प्रखर वैदुष्य, साधना तथा कृतित्व का सर्वत्र प्रकाश हुआ और आपने श्रीमद्दादूवाणी, श्रीमद्भगवद्‌गीता ।  तथा श्रीमद्भागवत प्रभृति की कथाओं से जिज्ञासु व श्रोताओं की पिपासा को शान्त किया ।  अनेक प्रकाण्ड पण्डितों धर्माचार्यों जगद्‌गुरु शंकराचार्य पीठस्थ गुरुओं तथा अन्यान्य प्रबुद्ध मनीषियों के समुच्चय सम्मेलनों में आपने हर विषय को छुआ व पूर्ण प्रगल्भता, विद्वत्ता तथा संतवाणियों के माध्यम से समन्वयात्मक धाराप्रवाह उद्घोष किये, जिन्हें हृदयंगम का मंचस्थ धर्माचायों को भी कहना पड़ा~ “दादू पंथ के आचार्य इतने विद्वान् वक्ता तथा समन्वयक विवेचक तथा धाराप्रवाही है ? – यह हमें आज ही आचार्य श्री हरिराम जी महाराज का भाषण सुनकर ज्ञात हुआ ।” श्रोता समुदाय मंचासीन धर्माचार्यों की तालियों की बारम्बार गड़गड़ाहट आपके वक्तव्य की धारा को बाधित जरूर करती किन्तु साथ ही जय-जय ध्वनि से आपका अजस्त्र उ‌द्बोधन उल्हास भर देता । 
.
*दादूवाणीश्री के सशक्त वाचस्पति~*
आपने मध्यकालीन भक्तिधारा के महान् साधक संत सद्‌गुरु श्री दादूदयालजी महाराज की अनुभववाणी के सर्वाधिक वैशिष्ठ्य को सर्वत्र संत व विद्वत्समाज तथा आम जिज्ञासुजनों तक पहुँचाया ।  श्रीदादूवाणी में प्रयुक्त समस्त 10-12 भाषाओं के प्रयोजन को स्पष्ट करते हुये उन्होंने बताया कि जो भी भाषाभाषी सद्‌गुरुदेवश्री के पास जिज्ञासा से प्रश्न लेकर आया सद्‌गुरुदेव श्री ने उसे उसी की भाषा व भाव में उत्तर देकर उसके अन्तस् तो सन्तृप्त किया, अतएव वाणी श्री में विविध भाषाओं को स्थान मिला ।  यह सद्‌गुरुदेव श्रीदादूजी महाराज की उपदेश विधा की अप्रतिम सर्वग्राही शैली थी ।
.
*दादूवाणीश्री की भाषा वैशिष्ठ्य का समाधान~*
श्रीदादूवाणी में प्रयुक्त प्रत्येक भाषा-यथा संस्कृत, हिन्दी, गुजराती, मराठी, सिंधी, पंजाबी, उर्दू, पारसी, मारवाड़ी, ब्रज तथा ढूँढड़ी के प्रकरणों को आप उसी वाक् विधा में उच्चारण कर तत्सम उसी भाषा के शब्दों के प्रयोग के साथ विशुद्ध व सर्वगम्य हिन्दी भाषा में व्याख्यायित कर विद्वत्समाज व जिज्ञासुजनों को हतप्रभ करते और पूर्ण आश्वस्त करते ।  आपका वाणी, भाषा तथा उच्चारण पर पूर्ण अधिकार था और बड़ी से बडी सभा के सभी श्रोताओं को सुस्पष्ट वाणी श्रवण के साथ ही श्रोता टस से मस न हों यह अनूठा-स्वाभाविक आकर्षण आपकी व्यक्तृत्व शैली में था । 

मंगलवार, 7 जुलाई 2026

*२०. सुमिरण का अंग ~८५/८८*

*🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏*
*🌷卐 सत्यराम सा 卐🌷*
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
.
*२०. सुमिरण का अंग ~८५/८८*
.
*वोहित बिन क्यों समुद्र लंघिये, औषध बिन क्यों रोग ।*
*त्यों रज्जब निज नाम बिहुना१, कदे न निपजे योग ॥८५॥*
जहाज के बिना समुद्र नहीं लांघा जाता, औषधि सेवन बिना रोग नष्ट नहीं होता, वैसे ही निज नाम(नाम तीन प्रकार के होते हैं - १- गुणज जैसे दयालु, २- कर्मज जैसे - मधुसूदन, ३- निज - गुण, कर्म के बिना ही जो स्वरूप भूत हो जैसे - ॐ, राम ब्रह्म, सत्य आदि) के स्मरण बिना योग कभी भी सिद्ध नहीं होता । योग के नाम स्मरण की मुख्यता रहती है ।
.
*ब्रह्म वृक्ष के सहस जड़, सब ही औषधि आदि ।*
*रज्जब रोग कहाँ रहे, खाय रू दीज्यो दादि१ ॥८६॥*
ब्रह्म रूप वृक्ष के नाम रूप हजारों जड़ हैं और सभी जन्मादि संसार रोग को नष्ट करने के लिये आदि काल से ही औषधी रूप हैं, उनका स्मरण रूप भक्षण करने से जन्मादि रोग कहाँ रह सकता है ? अत: हे साधको ! उनमें से किसी का भी स्मरण रूप का भक्षण करके उससे होने वाले लाभ के विषय में उसकी अवश्य प्रशंसा१ करना ।
.
*देख्या दह दिशि नाँहिं माग, रज्जब उलटा उनमन लाग ।*
*सुमिरन साँच उतर वा१ पार, नौ लख कांवरू एक ही द्वार ॥८७॥*
संतों ने विचार करके सभी ओर देखा है, यर्थात रूप से ब्रह्म चिन्तन किये बिना ब्रह्म प्राप्ति का कोई मार्ग नहीं है । जैसे नौ लाख कावड़ों का जल एकही द्वार से रामेश्वर के चढ़ता है, वैसे ही यर्थात स्मरण द्वारा ही संसार-सिन्धु के उस१ पार जाकर ब्रह्म को प्राप्त किया जाता है ।
.
*समझ सुहागा रूप, साँच सहित सुमिरन करै ।*
*रज्जब युक्ति अनूप, जिहिं कंचन करता गरै ॥८८॥*
सुहागा डालकर अग्नि लगाने से सुर्वण गल जाता है, वैसे ही विचार के सहित यथार्थ रूप से राम नाम स्मरण करना अनुपम युक्ति है, जिस युक्ति के द्वारा सृष्टिकर्ता ईश्वर भी द्रवित हो जाते हैं, अर्थात प्रसन्न हो जाते हैं ।
(क्रमशः)

सोमवार, 6 जुलाई 2026

२९. अद्वैत ज्ञान कौ अंग २५/२८

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
.
२९. अद्वैत ज्ञान कौ अंग २५/२८
.
चीर मांहिं ज्यौं चूनरी, गिलम मांहि बहु भांति । 
ऐसै सुन्दर देखिये, जगत ब्रह्म नहिं द्वांति ॥२५॥
जैसे किसी नारी द्वारा साड़ी पर ओढी हुई चुनरी के मुलायम(मृदु = गिलम) बेलबूटे या किसी ऊनी गलीचे के मुलायम बेलबूटे परस्पर अभिन्न लगते हैं; उसी प्रकार ब्रह्म एवं जगत् की अभिन्नता(अद्वैतता) भी समझनी चाहिये ॥ (द्र०-सवैया : ३२/१८ छ०)
.
राजा प्रजा तुरंग गज, पशु पंखी बहु जन्त । 
सुन्दर पट ज्यौं आतमा, जग चित्राम अनंत ॥२६॥
जैसे किसी विस्तृत पट(वस्त्र) पर राजा, प्रजा(जनता), पशु पक्षी एवं विविध प्राणियों का चित्र खींच दिया जाय तो इस उदाहरण में पट को आत्मा तथा उस पर खिंचे हुए राजा आदि के चित्रों को जगत् के सदृश समझना चाहिये ॥२६॥
.
इक क्रीडहिं इक मारियंहिं, बस्तर कौं कछु नांहिं । 
सुन्दर जग चित्राम ज्यौं, पट आतम के मांहिं ॥२७॥
जैसे किसी वस्त्र पर कुछ खिलाडियों का, कुछ योद्धाओं का चित्र बना दिया जाय तो उस क्रीडा एवं युद्ध का वस्त्र से इतना ही सम्बन्ध है कि वे चित्र पट पर बने हैं इसी प्रकार आत्मा में इस जगत् का सामञ्जस्य समझें ॥२७॥
.
कोट कांगुरे एक हैं, देखत दीसहिं दोइ । 
ऐसैं सुन्दर ब्रह्म तें, जगत भिन्न नहिं होइ ॥२८॥
जैसे किसी नगर के किले पर ऊँचे ऊँचे कंगूरे(गुम्बद, बुर्ज) बना दिये जायँ जो दीखने में भले ही ये कंगूरे एवं किला दो(द्वैत) दिखायी दें; परन्तु यथार्थतः उन दोनों में कोई भेद नहीं है । इसी प्रकार ब्रह्म एवं जगत् की स्थिति समझनी चाहिये ॥२८॥ (द्र० - सवैया : ३२/१८ छ०)
(क्रमशः)

अप्रतिम प्रवक्ता

*#daduji*
*॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥*
*॥ दादूराम~सत्यराम ॥*
*साभार सौजन्य ~ “श्रीमद्‌ दादू पंथ प्रकाश”*
*श्रीमद्दादूपीठाधीश्वर(१९)श्री हरिरामजी महाराज का संक्षिप्त जीवन दर्शन~*
.
षट्दर्शनी सन्त वाङ्मय के अध्येता व अधिकारी ~
शनैः शनैः संत वाणी के साधिकार कथा-वाचस्पति एवं विविध सात्संगिक विषयों के उद्बोधक तथा समस्त षट्दर्शनी-संत सरणि के वाङ्मय के कुशल अध्येता व प्रवक्ता हो गये ।
.
अप्रतिम प्रवक्ता ~
आपको देश के महान् विद्वान् प्रखर प्रवक्ताओं को सुनने का बड़ा चाव था एतदर्थ जहाँ भी उनका उद्बोधन होता आप पहुँच जाते और वापस आकर अपने विद्वान् साथियों संतो व जानकारों को वहाँ सुने उद्बोधन को यथावत सुनाकर उनके भाषण या प्रवचन की व्याख्या कर हृदयंगम करते थे - यह आपके सद्‌गुणों में सर्वश्रेष्ठ नैपुण्य लिए वैशिष्ट्य था ।
.
वे देश के मूर्धन्य प्रमुखतम वक्ताओं का क्रम इस प्रकार निर्धारण कर उन्हें सुनते ~
1. प.पूज्य माधवराव-सदाशिवराव-गोल्वल्कर महोदय ‘गुरूजी’
2. माननीय श्री अटलबिहारी जी वाजपेयी(प्रखर वक्ता)
३, महामण्डलेश्वर पूज्य श्री गंगेश्वरानन्द जी महाराज(प्रज्ञाचक्षु)
4. परम साध्वी सुश्री ऋतंभरा जी
“उच्च विश्लेषणात्मक निर्णय व धारणा उनके जीवन को महान् व उन्नत करने वाली सिद्ध हई, और वे संतसमाज में एक सच्चे अप्रतिम प्रतिभावान् प्रवक्ता बने ।”
.
पीठारोहण~
परमपूज्य श्रीमद्दाददू पीठाधीश्वर(18) श्री प्रकाशदेव जी महाराज ने 20 वर्ष पर्यन्त मनसा वाचा-कर्मणा श्रीमद्दादूपीठ पर अधिष्ठित रहकर समाज का सुचारु संचालन और निष्ठा व नियम से अपने दायित्व का निर्वहन किया ।
चरित्र नायक युवा संत श्री हरिरामजी को श्री दादूमन्दिर की व्यवस्था सेवा व अध्ययन में तल्लीनता के लिए विविध ग्रन्थों के अध्ययन व मंथन का सुयोग मिलता रहा, और प्रत्येक संत-विधा व ज्ञानालोक का प्रकाश विस्तीर्ण होता गया, उस प्रगाढ़-पात्रता व विद्या योग्यता की ही समाज भगवान को अपेक्षा थी - “वे प्रखर व्यक्तित्व लिये सर्वथा गुण सम्पन्न संत” प.पू. स्व. पीठाचार्य(18) श्री प्रकाशदेव जी महाराज के ब्रह्मलीन होने पर श्रावण शुक्ला 5 शनिवार में 2023 वि. को पंथ की गरिमामय गुरुगद्दी पर अधिष्ठित हुये ।
(क्रमशः)

*२०. सुमिरण का अंग ~८१/८४*

*🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏*
*🌷卐 सत्यराम सा 卐🌷*
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
.
*२०. सुमिरण का अंग ~८१/८४*
.
*सब सुकृत हैं, शुन्य सम, एका एक सु नाम ।*
*पृष्ट लाग दश गुण सबै, नहीं तो नाँहिं ठाँम ॥८१॥*
संपूर्ण शुभ कर्म शून्य(०) के समान हैं और अकेला हरि नाम एका(१) के समान है, जैसे एका पर अनुस्वार लगते ही १० हो जाते हैं और नहीं लगे तो कुछ नहीं, वैसे ही शुभ कर्म रूप शून्य एका की पीठ पर लग जायें अर्थात नाम स्मरण के साथ शुभ कर्म किये जायँ तो उसका दस गुण फल हो जाता है और नाम-स्मरण न करके शुभ कर्म करने से कर्त्ता को भगवद् धाम में स्थान नहीं मिलता ।
.
*रज्जब भव समुद्र शिर धरी, नाम निरंजन नाव ।*
*जाया चाहे पार को, सो प्राणी चढ़ जाव ॥८२॥*
संसार -समुद्र के शिर पर राम नाम रूप नौका रक्खी है, जो प्राणी इसके पार जाना चाहे, वह इस पर चढ़ कर जा सकता है ।
.
*जप जहाज जलनिधि जगत, जीव चढो कोई आय ।*
*रज्जब पारस परम गुरु, सो पद परसे जाय ॥८३॥*
राम नाम का जप ही जहाज है, उस पर चाहे कोई भी जीव चढे अर्थात जप करे, वही संसार- समुद्र से पार होकर जीव-लोह को ब्रह्मरूप सुवर्णता की प्राप्ति कराने वाले परमगुरु-पारस से मिलकर ब्रह्मरूप परमपद को प्राप्त करता है ।
.
*रज्जब अज्जब देखिये, जप जगदीश जहाज ।*
*प्राणी पहुँचे पार चढ़, सरे१ सु आतम काज ॥८४॥*
जगदीश्वर के नाम का जप अद्भुत जहाज रूप देखा जाता है, प्राणी उस पर चढ़ कर अर्थात जप करके संसार-समुद्र से पार पहुँच जाता है और जीवात्मा का परब्रह्म प्राप्ति रूप कार्य सिद्ध१ हो जाता है ।
(क्रमशः)  

२९. अद्वैत ज्ञान कौ अंग २१/२४

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
.
२९. अद्वैत ज्ञान कौ अंग २१/२४
.
सुन्दर मैं सुन्दर जगत, सुन्दर है जग मांहिं । 
जल सु तरंग तरंग जल, जल तरंग द्वै नांहिं ॥२१॥
ब्रह्म एवं जगत् की अभिन्नता : जैसे लोक में हम देखते हैं कि जल में तरंग और तरंगविकार(बुलबुला) में जल - दोनों में अभिन्नता है; वैसे ही जगत् एवं ब्रह्म की अभिन्नता समझनी चाहिये ॥२१॥ (द्र० सवैया : ३२/१४ छ०)
.
सुन्दर ब्रह्म अखंड पद, सुन्दर यह बिस्तार । 
ज्यौं सागर मैं बुद्बुदा, फेन तरंग अपार ॥२२॥
महात्मा सुन्दरदासजी इसी बात को अन्य विधि से विस्तार से कह रहे हैं - यह जगत् उस अखण्ड ब्रह्म का ही विस्तार है । जैसे कि सागर के जल में बुलबुले, फेन(झाग) तथा अपार(असीम) तरङ्गे होती हैं ॥२२॥
.
सुन्दर मैं जग देखिये, जग मैं सुन्दर सोइ । 
कुंजर मैं नारी प्रगट, नारी कुञ्जर होइ ॥२३॥
श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - जिज्ञासु को इस जगत् की सुन्दरता ब्रह्म में ही देखनी चाहिये तथा ब्रह्म की सुन्दरता को ब्रह्म में देखने का प्रयास करना चाहिये । जैसे कि मथुरा में होने वाली गोपीकुञ्जर नामक रासलीला में गोपियों में कृष्ण एवं कृष्ण में गोपियाँ दिखायी देती थी । [कहते हैं - अतिशय प्रेमवश अनेक गोपियों ने मिलकर अपने शरीरों से हाथी का आकार बना कर उस पर श्रीकृष्ण को आरूढ कराया था । इस दशा में गोपी एवं कृष्ण - दोनों ही सुन्दर(दर्शनीय) लग रहे थे । साथ ही वह गोपियों के शरीर का हस्तिमय आकार भी गोपियों से अभिन्न तथा गोपियाँ उस हाथी के आकार से अभिन्न लग रही थीं] ॥२३॥
.
जैसै बुनत महीर मैं, फुलरी परती जांहिं । 
ऐसैं सुन्दर ब्रह्म तें, जगत भिन्न कछु नांहिं ॥२४॥ 
जैसे किसी सूक्ष्म वस्त्र को बुनते समय उसमें डाले गये फूल(बेलबूटे - फुलरी) उस वस्त्र से अभिन्न लगते हैं; उसी प्रकार ब्रह्म एवं जगत् भी अभिन्न हैं ॥२४॥ (द्र० - सवैया : ३२/१८ छ०)
(क्रमशः)

पंथ में दीक्षा

*#daduji*
*॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥*
*॥ दादूराम~सत्यराम ॥*
*साभार सौजन्य ~ “श्रीमद्‌ दादू पंथ प्रकाश”
*श्रीमद्दादूपीठाधीश्वर (१९)श्री हरिरामजी महाराज का संक्षिप्त जीवन दर्शन~*
.
पंथ में दीक्षा ~
आपका जन्म भोजपुरा(जोबनेर, जयपुर) ग्राम में ब्राह्मण कुल में हुआ ।  बाल्यकाल से ही “श्रीदादूद्वारा नारायना” के महान् संत श्री भूरादास जी स्वामी(खालसा) से आपने दीक्षा ली और अक्षराभ्यास के साथ प्राथमिक शिक्षा व संताश्रम के नियमानुसार सदाचरण तथा श्री दादूवाणी व अन्यान्य सन्त कृत्तियों से अपने अध्ययन को प्रारंभ किया । 

विद्याध्ययन ~
किशोरवस्था में आपको दादू समाज के सर्वोच्च गुरुकुल श्रीदादूमहाविद्यालय, जयपुर में शिक्षार्थ प्रवेश दिया और कुछ समय महाविद्यालय छात्रावास में रहते हए वहीं पूज्य त्यागमूर्ति स्वामी मंगलदास जी महाराज के सान्निध्य में रहकर गुरुवर्य सम्माननीय पं. श्री दयाराम जी महाराज से संस्कृत शिक्षा प्राप्त करना प्रारंभ किया ।  तत्कालीन श्री दादपीठाधीश्वर(17) श्री रामलाल जी महाराज की विशेषकृपा व स्वयं की कहीं अन्यत्र विशिष्ट-विद्वान व मनीषी के पास विद्याध्ययन को इच्छा से इन्हें शेखावाटी-अंचल के इंडलोद नगर के संस्कृत विद्यालय में अध्ययनार्थ भेजा गया, वहां के ख्यातनाम निदान व प्रकाण्ड पण्डितवर्य पूज्य श्री रामधारी जी महाराज के द्वारा आपने संस्कृत वाङ्मय की समुचित शिक्षा ग्रहण की । 
.
पुनः गुरुधाम में सेवा पूजा व अध्ययन ~
पीछे गुरुधाम श्रीदादूद्वारा नरायणा से सहसा “अतिशीघ्र लौट आने के सन्देश” से आप हत-प्रभ हुए और शीघ्र तो लौटने पर ज्ञात हुआ कि प.पू. परमकृपालु श्रीदादूपीठाधीश्वर श्री रामलालजी महाराज ब्रह्मलीन हो गये हैं ।  यह व्यथा-कथा उन्हें विशेष विषादकारी लगी, किंतु विधि के विधान को स्वीकार करना ही होता है ।  
.
यह जानकर आपने स्थान से दूर अध्ययन करने का संकल्प त्याग दिया, और गुरुधाम श्री दादूद्वारा में ही रहकर मुख्यपीठस्थ श्रीदादू मन्दिर(नारायना) हो व्यवस्था सेवापूजा तथा साथ ही स्वकीय अध्ययन-मनन का क्रम प्रारंभ किया ।  क्योंकि दीक्षा-गुरु प.पू. श्री भूरादास ही महाराज तो स्व. आचार्यश्री से कई वर्ष पूर्व ब्रह्मलीन हो चुके थे ।  अतः इनका सब प्रकार का योग-क्षेम पूर्ण आत्मीयता से.पू. आचार्य प्रवर ही करते और वे इन्हें सुयोग्य विद्वान व नैष्ठिक साधु-पुरुष बनाना चाहते थे ।
.  
स्वर्गीय आचार्यश्री का सारा दायित्व नव प्रतिष्ठित पू. पीठाधीश्वर(18) अनंतश्री प्रकाशदेव जी महाराज पर आ गया तो उन्होंने इन्हें पूर्ण आत्मीयता व गुरुभाई के नाते स्नेह से सेवा के साथ विद्याध्ययन के लिए प्रश्रय दिया ।  अतः आपने गुरुधाम में रहते हुए सत्‌पुरुषों की संगति से भेषभगवान् की समस्त पारंपरिक सेवाविधियों को जानकर स्वकीय अध्ययन के साथ परमगुरु श्री व‌जी महाराज की वाणी का दैनन्दिन पठन, विशेष अध्ययन व अनुशीलन किया और श्री दादूमन्दिर की सेवा व व्यवस्था करते हुए सच्चे ईष्ट-निष्ठ व अन्यान्य संतवाणियों तथा आध्यात्म ग्रन्थों के कुशलअध्येता व अनुभवशील संत बन गये । 
(क्रमशः)

रविवार, 5 जुलाई 2026

*२०. सुमिरण का अंग ~७७/८०*

*🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏*
*🌷卐 सत्यराम सा 卐🌷*
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
.
*२०. सुमिरण का अंग ~७७/८०*
.
*घट दीपक बाती पवन, ज्ञान ज्योति सु उजास ।*
*रज्जब सीचे तेल ले, प्रभुता पुष्टि प्रकाश ॥७७॥*
शरीर दीपक है, प्राण वायु बत्ती है, ज्ञान ज्योती है, उसका सत्ता प्रकाश सुन्दर है, जैसे तेल सींचने से प्रकाश की वृद्धि होती है, वैसे ही हरि-स्मरण करने से प्रभुता की और ज्ञान ज्योति के सत्ता प्रकाश की भी वृद्धि होती है, अर्थात ब्रह्म को सर्वत्र व्यापक देखने लगता है ।
.
*नाम निरंजन नीर है, सब सुकृत वनराय१ ।*
*जन रज्जब फूले फले, सुमिरन सलिल सहाय ॥७८॥*
निरंजन ब्रह्म का नाम जल है, और संपूर्ण शुभ कर्म वन पंक्तियाँ१ है, जैसे जल वर्षने से सब वन फूलते फलते हैं, वैसे ही नाम-स्मरण की सहायता से संपूर्ण सुकृतों की वृद्धि होती है ।
.
*सुमिरन सेवा मूल है, सब सुकृत श्रृंगार ।*
*रज्जब शोभा सकल की, देखो सुमिरन हार ॥७९॥*
हरि-नाम-स्मरण ही भक्ति का मूल है, अर्थात नाम-स्मरण से ही भक्ति होती है और संपूर्ण शुभ कर्मों का श्रृंगार है । लोक में भी प्रसिद्ध है, नाम-स्मरण करने वाले संत सभी की शोभा बढ़ाता है ।
.
*नाम नाक बिन कुछ नहीं, सुकृत सबै श्रृंगार ।*
*रज्जब रुचे न राम वर, तामें फेर न सार ॥८०॥*
जिस नारी के नाक नहीं उसके सभी श्रृंगार - बेकार है, वह अपने स्वामी को प्रिय नहीं लगती, वैसे ही नाम-स्मरण के बिना संपूर्ण सुकृत भी कुछ नहीं, नाम सुमिरण बिना साधक राम को प्यारा नहीं लगता, यह बात यर्थात है ।
(क्रमशः)

२९. अद्वैत ज्ञान कौ अंग १७/२०

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
.
२९. अद्वैत ज्ञान कौ अंग १७/२०
.
कारन तैं कारज भयौ, कारन कारज एक । 
जैसैं कंचन तैं कियौ, सुन्दर घाट अनेक ॥१७॥
यद्यपि कारण से कार्य होता है तो भी यथार्थतः कारण एवं कार्य हैं तो एक ही । जैसे एक सुवर्ण रूप कारण से आभूषणादि अनेक कार्य कर लिये जाते हैं ॥१७॥ (द्र० - सवैया : ३२/१४ छ०)
.
जैसे कीये मैंन के, हय हाथी बहु जन्त । 
सुन्दर ऐसैं ब्रह्म है, आदि मध्य अरु अन्त ॥१८॥
जैसे एक ही मोम से हाथी आदि घोड़ा की अनेक आकृतियाँ बना ली जाती हैं; उसी प्रकार इस समस्त जगत् के आदि, मध्य एवं अन्त में एकमात्र ब्रह्म ही दिखायी देता है ॥१८॥ (द्र०- सवैया : ३२/१६ छ० )
.
जैसैं मनिका सूत के, बीचि सूत कौ तार । 
ऐसै सुन्दर ब्रह्म सब, या ही है निरधार ॥१९॥
जैसे माला की सभी मणियाँ बीज में पड़े हुए सूत पर आधृत होती है; उसी प्रकार इस समस्त जगत् के आदि, मध्य एवं अन्त में एकमात्र ब्रह्म ही दिखायी देता है - ऐसा समझें ॥१८॥ (द्र०- सवैया : ३२/१६ छ०)
.
सुन्दर तानां सूत का, बानै बुनियां सूत । 
नाव धर्यौ फिरि और ही, यथा बाप तैं पूत ॥२०॥
किसी वस्त्र के निर्माण के लिये ताना एवं वाना का सूत एक ही होता है; परन्तु व्यवहार में उसे 'ताना' एवं 'वाना' कह देते हैं । या पिता से ही पुत्र होता है; परन्तु व्यवहार में उन को 'पिता' एवं 'पुत्र' कह देते हैं । यही स्थिति जगत् के विषय में ब्रह्म की भी समझनी चाहिये ॥२०॥ (द्र०- सवैया ३२/६ छ०)
(क्रमशः)