सोमवार, 12 अक्टूबर 2026

*अचला गिरी पर पधारना*

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷*卐 श्री दादूदयालवे नम:  卐*🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
.
*धनि धनि साहिब तू बड़ा, कौन अनुपम रीत ।*
*सकल लोक सिर सांइयां, ह्वै कर रह्या अतीत ॥*
================
*अचला गिरी पर पधारना*
द्वन्द्वपुरि से चलकर सुन्दरदासजी महाराज ने द्वन्द्वपुरी से दो मिल दूर तिलवाड़ा के पास पर्वत की चट्टान पर गुफा में कुछ समय ब्रह्म भजन किया था । इस गुफा के पास अब भी धूप की सुगंध आती रहती है । उक्त गुफा से विचरकर तिलवाड़ा से लगभग चार मील रामकुंड स्थान है । वहाँ जल का कुंड भरा रहता है और इस रामकुंड से जल का भरगा भी चलता रहता है । वहां गुफा भी है । उस गुफा में भी सुन्दरदासजी ने ब्रह्म भजन किया था । 
.
इस गुफा में आगे एक खो आता है, वहां भी पानी वहता है । आज से लगभग ६० वर्ष पहले मांगू नामक एक गूजर एक संत के साथ आगे चला गया था । इससे उसने खो और पानी का नाला प्रत्यक्ष देखा था और उसी ने सवको सुनाया था । वहां के लोगों की धारणा है कि इस गुफा में जो दर्शन के योग्य होता है उसे सुन्दरदासजी का दर्शन होता है और कई भक्त सज्जनों को हुआ है । ऐसा वहां के निवासी वृद्ध लोग कहते हैं । इस स्थान से योगेश्वर संत सुन्दरदासजी हिमालय के अचला गिरी को पधार गये । कहा भी है-
“अचलागिरि वासो कियो, जपैं निरंजन जाप ।
अव भाषों जिन सुधि दिई, पद परसे रु मिलाप ॥२५॥ त.८ सुन्दरोदय
.
अचला गिरि पर निवास की सूचना जिसने दी उसका परिचय दे रहे हैं- एक रामानन्दी वैष्णव साधु रसायन प्राप्ति की इच्छा लेकर १२ वर्ष से घूम रहा था । वह पर्वतों को खोजता हुआ उत्तर दिशा के पर्वतों में चला गया । वहां चारों ओर पर्वत ही पर्वत दृष्टि आ रहे थे । मनुष्य तो वहां दृष्टि में आता ही नहीं था । किन्तु एक दिन उन साधुजी ने अकस्मात एक योगी संत को देखा । तब उन्हें प्रसन्नता हुई । फिर वे योगी संतजी के पास गये और जय सीताराम बोलकर उनके चरणों में प्रणाम किया । 
.
तब योगी संतजी ने इनसे पूछा— यहां कैसे आये हो ? साधुजी ने कहा— भगवन् ! मैं रसायन प्राप्ति की आशा से घूमता हुआ यहां आ गया हूँ । यह सुनकर योगी संत को उन साधुजी पर दया आ गई । इससे पास खड़ी हुई सिद्ध रसायन बूटी उनको बताई और साधु के शरीर पर उस बूंटी का रस मसला । उससे साधु का शरीर युवक के समान दिव्य हो गया । वृद्धावस्था चली गई । फिर योगी संत ने साधु को एक भस्म देते हुये कहा- इसको सदा पास में रखना, यह रसायन है । इससे ताम्र स्वर्ण हो जाता है । स्वर्ण बनाकर सद् उपयोग करना ।
.
फिर उस योगी संत से उस साधु ने पूछा- भगवन् ! आप कौन हैं ? कहां रहते हैं ? आप कोई देवता हैं क्या ? मैं आपके चरणों में प्रणाम करके पूछता हूँ । आप सत्य-सत्य बताने की कृपा अवश्य करें । योगी संत ने कहा- मैं रामानन्दजी के पौत्र शिष्य और अनन्तानन्दजी के शिष्य कृष्णदासजी पयाहारी का शिष्य हूँ और उनके पास ही उनकी सेवा में रहता हूँ । योगी संत के उक्त वचन सुनकर साधु अति प्रसन्न होकर बोला- भगवन् ! मैं कृष्णदासजी पयाहारी की संप्रदाय का साधु हूँ । आप कृपा करके मुझे भी पयाहारीजी का दर्शन अवश्य करायें । 
.
योगी संत ने कहा- तुम वहां चल नहीं सकते । साधु ने फिर बहुत दीनता पूर्वक प्रार्थना की तव योगी संत ने उसे अपने कंध पर बैठाकर आकाश मार्ग से थोड़ी ही देर में कृष्णादासजी पयाहारी की गुफा पर ले जाकर उतार दिया और कहा कि जो सामने शिला पर विराजे हुये हैं वे ही कृष्णादासजी पयाहारी हैं । साधु ने सप्रेम कृष्णादासजी पयाहारी को दंडवत किया और उनके चरणों की रज को अपने मस्तक पर धरा और अपने को कृतार्थ मानने लगा । 
.
किन्तु कृष्णादासजी पयाहारी के माला तिलकादि न देखकर बोला— भगवन् ! आपके दिये हुये माला तिलकादिक हम धारण करते हैं किन्तु आपके तो वे नहीं दिखाई दे रहे हैं और न यहां ठाकुरजी की मूर्ति ही है, यह क्या बात है ? आपके ये सब होने ही चाहिये । साधु का उक्त वचन सुनकर कृष्णादासजी पयाहारी ने कहा- अब हम आन्तर साधना करते हैं । उक्त चिन्हों की आवश्यकता नहीं रही । 
.
हमारे परम गुरुदेव रामानन्दजी महाराज ने भी मानस पूजा का उपदेश दिया है । माला जप की संख्या करने के लिये रक्खी जाती है । अब हम जप संख्या नहीं करते निरंतर ही जप करते हैं । तिलक संप्रदाय का चिन्ह है किन्तु अब हम संप्रदायवाद से ऊपर उठ गये हैं । अतः गुरु उपदेश ही शिर पर धारण करते हैं, वही हमारा तिलक है, शरीर ही मंदिर है इसमें आत्म-स्वरूप ठाकुरजी विद्यमान हैं उनकी पूजा निरंतर करते हैं । इससे बाह्य मूर्ति-पूजा की आवश्यकता अब हमारे को नहीं रही है । उच्चकोटि के संतों को उक्त चिन्हों की आवश्यकता नहीं रहती है । 
(क्रमशः)

*४८. सतगुरु कौ अंग १०/१३*

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
*श्रद्धेय श्री Tapasvi @Ram Gopal Das की प्रेरणा से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Meta AI*
.
*४८. सतगुरु कौ अंग १०/१३*
.
सतगुरु साषी सौ कही, सकल ग्रंथ जा मांहि ।
कहि जगजीवन रांमजी, दूजा भावै४ नांहि ॥१०॥
(४. भावै=रुचिकर)
सतगुरु ने साखी के द्वारा जो कहा, वह सब ग्रंथों में है । संत जगजीवनजी कहते हैं, हे रामजी, मुझे और दूसरा कुछ भी अच्छा नहीं लगता ।
.
सतगुर साखी सौ कही, रही सकल घट छाइ ।
कहि जगजीवन सुनत हरि, मिटि गइ चित की चाहि ॥११॥
सतगुरु ने जो साखी कही, वह हम सब जीवों में छाई हुई है । संत जगजीवनदासजी कहते हैं, हरि को सुनते ही चित्त की सारी चाह मिट गई ।
.
सतगुर साषी सौ कही, भाखी दास कबीर ।
कहि जगजीवन करि रहे, गुरु दादू तहं सीर१ ॥१२॥
(१. सीर=मेल)
सतगुरु की साखी कबीर दास ने भी कही, और उसी में गुरु दादू ने मेल मिलाया । एवं वे उसी में लीन होकर रह रहे हैं यह बात जगजीवनदास जी महाराज कहते हैं ।
.
सतगुर साखी सौ कही, जे भाई सब साध ।
कहि जगजीवन बिचारै, बांणी अगम अगाध ॥१३॥
सतगुरु की साखी जो कही, वह सब साधुओं को अच्छी लगी । संत जगजीवन कहते हैं, वे इस अगम और अगाध वाणी का विचार करते हैं ।
(२. भाई=अच्छी लगी ।)
 इति सतगुरु कौ अंग संपूर्ण ॥४८॥
(क्रमशः)

रविवार, 11 अक्टूबर 2026

*घाटड़े पधारना*

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷*卐 श्री दादूदयालवे नम: 卐*🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
.
*दादू गोविन्द के गुण बहुत हैं, कोई न जाणै जीव ।*
*अपणी बूझै आप गति, जे कुछ किया पीव ॥*
================
*घाटड़े पधारना*
फिर एक दिन धीरावत ठाकुरों के अति आग्रह से सुन्दरदासजी और प्रहलाददासजी ने ठाकुरों के साथ घाटड़ा के लिये प्रस्थान किया और ब्रह्मभजन करते हुये दोनों महात्मा घाटड़े पहुँचकर जिसको अब बड़ाबाग बोलते हैं, उसके कूप के पास जो जालका वृक्ष है और अब भी अच्छी स्थिति में विद्यमान है, उसकी छाया में जाकर विराजे और ठाकुरों को कहा—हम यहां ही रहेंगे बस्ती में नहीं चलेंगे । ठाकुरों ने कहा—बहुत अच्छा ।
.
फिर ठाकुरों ने वहां ही सब प्रकार की सेवा का प्रबन्ध कर दिया और स्वयं सेवा में रहने लगे । फिर एक दिन ठाकुरों ने प्रार्थना की कि—कृपया अब आज्ञा करें, आपके लिये कुटिया किस स्थान पर बनवाई जाय । तब सुन्दरदासजी महाराज ने जिस पर्वत के नीचे घाटड़ा बसता है, तथा वर्तमान प्रहलादशाल के पश्चिम और दक्षिण में दो पर्वत शिखर पास ही पड़ते हैं. उनमें से पश्चिम के शिखर पर कुटिया बनाने की आज्ञा दी ।
.
ठाकुरों ने कहा—बहुत अच्छा, अब वहां ही आपकी इच्छानुसार शीघ्र ही कुटिया बनवा दी जायगी । जब तक कुटिया तैयार नहीं हो तब तक आपकी रुचि हो तो यहां वा जहां आप कहें वहीं ही सेवा का सब प्रबन्ध हो जायगा । सुन्दरदासजी महाराज ने कहा— कुटिया तैयार होगी तब तक हम यहां ही ब्रह्म भजन करेंगे ।फिर धीरावत ठाकुरों ने उक्त पर्वत शिखर पर रहने योग्य अच्छी कुटिया बनवाने की योजना शीघ्रातिशीघ्र बनाकर कार्य आरंभ कर दिया ।
.
प्रथम उस शिखर पर १२ फुट ऊंचा २५ फुट लम्बा और २० फुट चौड़ा पक्का चबूतरा बनवाया और उस चबूतरे पर दो कुटिया बनवाई, एक सुन्दरदासजी के लिये और दूसरी प्रहलाददासजी के लिये । कुटिया से लगभग २० गज दूर पर एक जलाशय = छोटी तलई बनवा दी गई जिस से पानी वहां मिलता रहे । जब आश्रम तैयार होकर सूख गया तब ठाकुरों ने प्रार्थना की महाराज ! आश्रम तैयार हो गया है । अब आपकी इच्छा हो तब ही पधार सकते हैं । वहां विराजेंगे तब भी सब प्रकार की सेवा जैसे यहां होती रही है वैसे ही वहां भी होती रहेगी । आपके ब्रह्म भजन में किसी भी प्रकार का विघ्न नहीं होने दिया जायगा ।
.
सुन्दरदासजी महाराज की जिस दिन उक्त आश्रम में पधारने की आज्ञा हुई उस दिन वहां उत्सव मनाने की योजना बनाई गई और आसपास के भक्त लोग भी महाराज के आश्रम प्रवेश के महोत्सव में सत्संग के लिये आये । फिर उक्त शिखर के आश्रम में पधार कर दोनों संत निर्विघ्न ब्रह्म भजन करने लगे । घाटड़ा के धीरावत ठाकुर लोग सेवा का पूरा-पूरा ध्यान रखते थे । दोनों ही संत परम विरक्त थे । अतः एकान्त स्थान में निरंतर ब्रह्म भजन ही करते रहते थे । आसपास के प्रदेश के लोग उक्त आश्रम को सुन्दरदासजी प्रहलाददासजी की मैड़ी बोलते हैं ।
.
चिरकाल तक उक्त आश्रम में दोनों संतों ने ब्रह्म भजन किया । (खादू में रायसिंह ने दादूजी पर हाथी छोड़ा था तव सुन्दरदासजी ने वहां प्रकट होकर रायसिंह को समझाया था ।) फिर वहां से सुन्दरदासजी महाराज विचरने लगे तव प्रहलाददासजी भी अपने गुरुदेव के साथ ही उस आश्रम से नीचे उतर आये । प्रहलाददासजी को सुन्दरदासजी द्वन्द्वपुरी में बैठा कर अचलागिरी जाने के लिये आगे चल दिये फिर धीरावत प्रहलादजी को घाटड़ा में ले आये । घाटड़ा ग्राम के धीरावतों की कोटड़ियों के पास ठहरकर वे भजन करने लगे । सुन्दरदासजी अन्यत्र पधार गये और प्रहलादजी को घाटड़ा में रहकर भजन करने की आज्ञा दे गये थे, अतः प्रहलाददासजी वहां ही रहे ।
(क्रमशः)

*४८. सतगुरु कौ अंग ७/९*

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
*श्रद्धेय श्री Tapasvi @Ram Gopal Das की प्रेरणा से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Meta AI*
.
*४८. सतगुरु कौ अंग ७/९*
.
जै जै जै जै जयं जय, जै जै जै जगदीस ।
कहि जगजीवन जज तज जन, सतगुरु सौंपित सीस ॥७॥
जय जय जय जय, जय हो, हे जगदीश तुम्हारी जय हो । संत जगजीवन जी कहते हैं, भक्त अपना यज्ञ, अहंकार त्याग कर, अपना शीश सतगुरु को सौंप देता है ।
.
सतगुरु पहरि३ सरीर हरि, तेज पुंज करि राखि ।
कहि जगजीवन रांमजी, तो एह साँची साखि ॥८॥
{३. पहरि-प्रहरी(संरक्षक)}
सतगुरु शरीर में पहरेदार बनकर हरि की ज्योति की रक्षा करते हैं, और उसे तेज पुंज बनाकर रखते हैं । जगजीवन जी महाराज कहते हैं, हे रामजी, यही सच्ची साक्षी है ।
.
कहि जगजीवन रांमजी, तेज पुंज तन होइ ।
तुम सरणागति आतमा, तुम हरि राखौ मोहि ॥९॥
जगजीवन जी महाराज कहते हैं, हे रामजी, मेरा तन आपका तेज पुंज बन जाये । मेरी आत्मा आपकी शरण में है, हे हरि, आप ही मेरी रक्षा करो ।
(क्रमशः)

*२८. साधु असाधु परीक्षा का अंग ~२१/२४*

*🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏*
*🌷卐 सत्यराम सा 卐🌷*
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
.
*२८. साधु असाधु परीक्षा का अंग ~२१/२४*
.
*निर्मोल नगन में ताग ज्यों, ईख चढे विष वेल ।*
*रज्जब अहि चन्दन मिले, गुण गति१ औरै खेल ॥२१॥*
जैसे बहुमूल्य नगों में धागा, ईख-वृक्ष पर विष-वेलि और चन्दन पर सर्प लिपटने पर भी उनके गुणों के स्वरूप१ रूप खेल भिन्न भिन्न ही रहते हैं, अर्थात धागा नग के गुण नहीं लेता, विष वेली ईख के गुण नहीं लेती सर्प चन्दन के गुण नहीं लेता, वैसे ही असाधु साधुओं में रहने पर भी उनके गुण ग्रहण नहीं करता ।
.
*उलटा चले सु औलिया१, सूधी गति संसार ।*
*जन रज्जब यूं जान ले, इनका यही विचार ॥२२॥*
संसार में विपरीत परमात्मा की ओर ध्यानादि द्वारा गमन करते हैं, वे ही संत१ हैं और संसार प्रवाह के साथ सीधे चलते हैं अर्थात विषयों के लिये ही प्रयत्नशील हैं, इनके पहचानने का यही उपाय है कि उक्त कही हुई गतियों को विचार द्वारा देखकर इन्हें जाने ।
.
*विषय वायु वश ह्वै बहैं, वपु बादल वित१ नाश ।*
*जन रज्जब उलटे बहैं, तिनकी उर धर आश ॥२३॥*
जो बादल वायु के वश होकर चलते हैं, तो समझो उनका जल रूप धन१ नष्ट हो गया है और जो बादल वायु के उलटे, अर्थात सामने चलते हैं, उनके वर्षने की आशा हृदय में रक्खो, उनमें जल है, वैसे ही जो विषयों में आसक्त हैं उनके शरीर में ज्ञान-धन नहीं है, वे असाधु हैं और जो विषयों को त्याग कर उलटे अर्थात ध्यानादि द्वारा परमात्मा की और चलते हैं, उनमें ज्ञान धन है वे ही संत हैं, उनकी ऐसी आशा हृदय में रक्खो कि ये उपदेश द्वारा हमारा उद्धार कर सकेंगे ।
.
*संसारी१ अरु साधु का, पाया भेद विनान२ ।*
*रज्जब पारस जल तिरे, बूडे सोइ पषान ॥२४॥*
असाधु१ और साधु के भेद का विज्ञान२ हमने जान लिया है कि उनमें क्या भेद है, जैसे जल पर तिरने वाला पत्थर तो पारस होता है और डूबने वाला पत्थर । वैसे ही संसार से ऊपर परमात्मा के स्वरूप में जिसकी वृत्ति रहती है वही संत है और जिसकी वृत्ति संसार के विषयों में रहती है, वह असंत है ।
(क्रमशः)

शुक्रवार, 9 अक्टूबर 2026

*सुन्दरदासजी का भविष्य बताना*

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷*卐 श्री दादूदयालवे नम:  卐*🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
.
*नाद विन्दु से घट भरे सो जोगी जीवे ।*
*दादू काहे को मरे, रामरस पीवे ।*
================
*सुन्दरदासजी का भविष्य बताना*
फिर दादूजी महाराज ने सुन्दरदासजी को कहा- सुन्दरदासजी ! तुम तो गोपीचन्द, भरतरी, गोरक्षनाथ आदि के समान चिरंजीवी होगे । अतः सदा निर्गुण भक्ति करते हुये प्रायः गुप्त ही रहना । जो पुण्यवान और दर्शन के अधिकारी हों, उन्हें दर्शन देकर कृतार्थ करते रहना- ‘पुण्यवान को दर्शन दीज्यो, नहिं तो गुप्त जगत में रहिज्यो ।” सुन्दरदासजी ने पूछा- भगवन् ! चिरंजीवी होने का साधन क्या है ? दादूजी ने कहा-“नाद विन्दु से घट भरे सो जोगी जीवे । दादू काहे को मरे, रामरस पीवे ।” 
.
सुन्दरदासजी ने उक्त साखी में कथित साधना प्रारंभ करदी । सांभर में लगभग एक वर्ष रहे तव भी सुन्दरदासजी सत्संग और भोजन करके भैराणा की गुफा में भजन करते थे । प्रतिदिन सत्संग के समय प्रातःकाल आ जाते थे और भोजन करके चले जाते थे । फिर प्रहलादजी भी सुन्दरदासजी के शिष्य बनकर प्रहलाददासजी कहलाने लग गये । दोनों ही इच्छानुसार सांभर में सत्संग करके फिर दादूजी महाराज की आज्ञा लेकर घाटड़ा की ओर चले गये । 
.
*द्वन्द्वपुरी निवास*
घाटड़ा से कुछ दूर द्वन्द्वपुरी में पहुंचकर वहां भजन करने लगे । द्वन्द्वपुरी से पराशर आश्रम तीन मील है । वहां पराशर गुहा है, पानी का नाला चलता है । आसपास के लोग इस आश्रम को तीर्थ मानते हैं । घाटड़ा से पराशर आश्रम पांच मील है । खोह से एक मील है और दरीबा से लगभग तीन मील है । सुन्दरदासजी व प्रहलाददासजी जब द्वन्द्वपुरी में भजन कर रहे थे तव घाटड़ा के धीरावत ठाकुरों को ज्ञात हुआ कि बीकानेर नरेश जैतसिंहजी के पुत्र भीमराजजी और उनके पुरोहित प्रहलादजी संत होकर सुन्दरदासजी तथा प्रहलाददासजी नाम से बोले जाते हैं और आजकल द्वन्द्वपुरी में भजन कर रहे हैं । 
.
उस समय घाटड़ा में ३५० कोटड़ियां धीरावत ठाकुरों की थीं । सभी सरदारों ने मिलकर एक दिन अपनी सभा की और उसमें यह प्रस्ताव रखा कि-“सुन्दरदासजी और प्रहलाददासजी को अपने यहां घाटड़ा में लाकर दोनों महात्माओं की सेवा का लाभ उठावें ।” सभा के सभी सरदारों ने उक्त प्रस्ताव का समर्थन करते हुये मान लिया । 
.
फिर मुख्य २ सरदार सुन्दरदासजी के पास द्वन्द्वपुरी में गये और सुन्दरदासजी को अति नम्रता से कहा- भगवन् ! हमारी प्रार्थना है कि आप घाटड़े में पधार कर दर्शन तथा उपदेशों से हम लोगों को कृतार्थ करें । महाराज सुन्दरदासजी ने उनकी प्रार्थना सुनी और कहा- हमें एकान्त स्थान चाहिये । सरदारों ने कहा— जहां आप आज्ञा देंगे, वहां आपकी इच्छानुसार कुटीर बना दी जायगी । धीरावत ठाकुरों के श्रद्धा-भाव को देखकर सुन्दरदासजी महाराज ने कहा-अच्छी बात है ।
(क्रमशः)

*४८. सतगुरु कौ अंग ४/६*

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
*श्रद्धेय श्री Tapasvi @Ram Gopal Das की प्रेरणा से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Meta AI*
.
*४८. सतगुरु कौ अंग ४/६*
.
रांम नांम गुरु बचनं, स्नानं देह पवित्र कृतं ।
हरि रस अम्रित नीरं, जगजीवन समुद्र घृतं ॥४॥
राम नाम ही गुरु का वचन है, उसके स्मरण रूपी स्नान से देह पवित्र हो जाती है । हरि रस ही अमृत जल है, संत जगजीवनदास जी कहते हैं, वही समुद्र की तरह सब जगह भरा है ।
.
रांम नांम सुरति मुरत्यं, सु सबद उच्रितं तनं ।
कहि जगजीवन तस्य वचनं, सतगुरु रीझै तज्जनं ॥५॥
राम नाम में ही सुरति और मूर्ति दोनों हैं, और वही सुंदर शब्द तन में गूंजता है । संत जगजीवनदास जी महाराज कहते हैं, ऐसे वचन सुनकर सतगुरु अपने जन पर रीझ जाते हैं ।
.
रांम नांम प्रसाद सौं, त्रिपति१ पंच भू एह ।
कहि जगजीवन प्रेम रस, सतगुरु पोषी२ देह ॥६॥
{१. त्रिपति-तृप्ति(सन्तोष)}   (२. पोषी-पाली गयी)
राम नाम के प्रसाद से ही पाँच तत्वों से बनी यह देह तृप्त होती है । जगजीवनदास जी महाराज कहते हैं, सतगुरु ने प्रेम रस से इस देह का पोषण किया है ।
(क्रमशः)

*२८. साधु असाधु परीक्षा का अंग ~१७/२०*

*🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏*
*🌷卐 सत्यराम सा 卐🌷*
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
.
*२८. साधु असाधु परीक्षा का अंग ~१७/२०*
.
*ऊपर संत असंत सम, अंतरि अंतर होय ।*
*रज्जब पाणी ईख का, रूप एक रस दोय ॥१७॥*
जैसे जल और ईख के रस का रूप समान सा दिखाई देते हैं, किन्तु पान करने पर दोनों के रस ज्ञात होंगे, वैसे ही ऊपर के भेषादि से तो संत और असंत समान दिखाई देते हैं, किन्तु भीतर अन्तकरण के भावों को देखने पर बहुत भेद ज्ञात होता है ।
.
*साधु मिश्री मधुर मत, फोकट१ फटक२ पषान ।*
*जन रज्जब रंग एक से, चाख्यों भिन्न विनान३ ॥१८॥*
मिश्री और स्फटिक२ पत्थर का रंग एक सा दिखाई देता है, किन्तु चखने से उनके भिन्नत्व का ज्ञान३ होगा, अर्थात मिश्री मधुर और स्फटिक निरस१ ज्ञात होगा, वैसे ही साधु और असाधु भेषादि से एक से दिखाई देते हैं, किन्तु प्रसंग पड़ने पर उनके भिन्न मत दिखाई देंगे, उनमें साधु का सर्वप्रिय और असाधु का विक्षेप-प्रद सिद्ध होगा ।
.
*साधु पारस परम निधि, और शिला संसार१ ।*
*जन रज्जब वपु एक से, गुण गति२ भिन्न विचार ॥१९॥*
साधु तो परम धन पारस के समान है और असाधु१ साधारण शिला के समान हैं, पारस और शिला दोनों पत्थर होने से आकार में सामान हैं, वैसे ही साधु और असाधु के शरीर समान हैं, किन्तु उनके गुणों का स्वरूप२ विचारा जाय, तो पारस-शिला और साधु-असाधु भिन्न भिन्न ही सिद्ध होते हैं ।
.
*साधु कोयल काग जग, दर्श एक उनमान ।*
*जन रज्जब बोले विगति१, अरु खान पान पहचान ॥२०॥*
कोयल और काक दोनों के रंग देखने से तो अनुमान होता है कि दोनों ही एक जाति के पक्षी होंगे, किन्तु उनकी आवाज, विशेष प्रकार की गति१, खान पानादि से ही उनकी पहचान होती है, वैसे ही संत असंत भी समान ही दिखते हैं, किन्तु उनके वचन, विशेष भाव१ विचार और खान पानादि व्यवहार से ही उनकी पहचान होती है ।
(क्रमशः)

*२८. साधु असाधु परीक्षा का अंग ~१३/१६*

*🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏*
*🌷卐 सत्यराम सा 卐🌷*
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
.
*२८. साधु असाधु परीक्षा का अंग ~१३/१६*
.
*साधु सोने में जड्या, खोटा पीतल प्राण ।*
*जनरज्जब भोले१ बिके, परख्यू भिन्न विनाण२ ॥१३॥*
सोने में पीतल मिल जाता है तब भूल१ से तो वह सोने के भाव बिक सकता है, किन्तु परीक्षा करने पर वह भूल रूप अज्ञान२ मिटते ही पीतल सोने के भाव नहीं बिक सकता भिन्न भाव से बिकेगा, वैसे ही असाधु साधु का भेष बनाकर साधुओं में मिल जाता है और जब तक परीक्षक न मिले तब तक साधु ही माना जाता है परीक्षा होने पर नहीं ।
.
*रज्जब रत्नों में फटक१, रूप रंग मिल जाय ।*
*आगे आध२ न एक ह्वै, बिके न सो सम भाय३ ॥१४॥*
स्फटिक१(काँच जैसा पत्थर) रूप -रंग से रत्नों में मिल जाता है, किन्तु आगे जौहरी के पास उसका आदर२ रत्नों के समान नहीं होता और न रत्नों के भाव३ सम बिकता, वैसे ही असंत भेषादि द्वारा संतों मिल जाता है किन्तु परीक्षा होने पर वह संत के समान नहीं सिद्ध होता ।
.
*खेचर पैठे बंस ह्वै, साधु मिश्री माँहिं ।*
*जन रज्जब जल मिल जुदे, भिन्न भिन्न ह्वै जाँहिं ॥१५॥*
मिश्री में बाँस की सींक मिली रहती है, किन्तु जल में मिलने पर दोनों अलग अलग होते हैं, वैसे ही असाधु साधुओं में मिल जाता है किन्तु परीक्षा करने पर वह साधु सिद्ध नहीं होता । जैसे मिश्री अब धागों पर जमाते हैं, वैसे ही रज्जबजी के समय में मिश्री बाँस की सींको पर जमाई जाती थी ।
.
अरिल -
*संतों माँहिं असंत न भूल समाव ही ।*
*कपटी दीजे काढि कपट नहिं भाव ही ॥*
*ज्यों पानों में पान चुनौती१ आँनरे ।*
*परि हां रज्जब दीजे डार लगे जब खान रे ॥१६॥*
जैसे पानों में लगी हुई सींक१ को पान खाते समय निकाल कर पृथ्वी पर डाल देते हैं, वैसे ही संतों में असंत भूल से भी नहीं समाता, सच्चे सत्संगियों को कपट अच्छा नहीं लगता, वे कपटी असंत का संतपना अपने हृदय से निकाल देते हैं, अर्थात उसे संत नहीं मानते ।
(क्रमशः)

*२८. साधु असाधु परीक्षा का अंग ~९/१२*

*🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏*
*🌷卐 सत्यराम सा 卐🌷*
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
.
*२८. साधु असाधु परीक्षा का अंग ~९/१२*
.
*रज्जब सोना शैल१ सुत, तुले बराबर तोल ।*
*तो कुछ आघन एक ह्वै, लहै न समसरि मोल ॥९॥*
सोना और पर्वत१ का पुत्र पत्थर तुला में तोल में बराबर तुलने पर भी पत्थर का आदर सोने के समान नहीं होता और न सोने के समान पत्थर का मूल्य मिलता, वैसे ही साधु-असाधु के शरीर भेष के द्वारा समान दीखने पर भी असाधु साधु के समान नहीं हो सकता ।
.
*दोय भाव के दो पले, तुला हाथ हरि माँहिं ।*
*जड़ चेतन सुत तहँ चढे, मोल एक सो नाँहिं ॥१०॥*
दो प्रकार की भावना वाले दो पलङों वाला तुला हरि के हाथ में है, असाधु भावना वाले पलड़े पर जड़ बाट के समान असाधु पुत्र चढ़ता है और साधु भावना वाले पलड़े पर चेतन पदार्थ अर्थात ज्ञानी साधु पुत्र चढ़ता है उन दोनों का मूल्य एक नहीं हो सकता, अर्थात हरि के पास साधु की समता असाधु नहीं कर सकता ।
.
*वस्तु बाट दोऊ तुलहिं, लिपैं छिपैं सो नाँहिं ।*
*रज्जब कही विचार कर, ताको१ तुला सु माँहिं ॥११॥*
तुला में देखो१, वस्तु और बाट दोनों तुल रहे हैं, वे किसी प्रकार छिपते नहीं, कारण वस्तु युक्त है और बाट गुण हीन है, वैसे ही हमने भी विचार करके ही कहा कि साधु दैवी गुण युक्त है, असाधु शुभ गुण हीन है, अत: साधु अपने गुण के कारण न तो किसी में लिपायमान होता और न असाधुओं से छिपता है ।
.
*प्राण पले१ है प्राण-पति, पिंड पले सु पषान२ ।*
*भाव भार भेला३ तुला, विगता४ वस्तु बखान५ ॥१२॥*
विवेक रूप तुला का एक पलड़ा तो प्राणी रूप है और दूसरा शरीर रूप है, प्राणी रूप पलड़े१ प्राणपति-परमात्मा रूप वस्तु है और शरीर रूप पलड़े में बाट का पत्थर२ है, प्राणी का परमात्मा में जो भाव बाट का भार साथ३ तुल रहे हैं, अर्थात दोनों पलड़े बराबर हैं, किन्तु जिस मनुष्य को परमात्मा-रूप वस्तु का यथार्थ ज्ञान हो गया है वह परमात्मरूप वस्तु को बाट से अधिक समझता है और ज्ञानी४ संत कहा५ जाता है, बराबर समझता है वही अज्ञानी और असंत कहा जाता है ।
(क्रमशः)

भीमराज को शिष्य करना

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷*卐 श्री दादूदयालवे नम: 卐*🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
.
*कछू न कीजे कामना, सहगुण निर्गुण होय ।*
*पलट जीव तैं ब्रह्मगति, सब मिल मानें मोय ॥*
================
तब वे दोनों साधक विराट के पर्वत से चलकर सांभर आये । सांभर में दादूजी का दर्शन करके दोनों अति प्रसन्न हुये । दोनों ने पास जाकर साष्टांग दंडवत प्रणाम किया और हाथ जोड़कर दोनों सामने बैठ गये । दादूजी ने पूछा— आप लोग कहां से आये हैं ? तब भीमराजजी ने अपनी कथा सुनाकर कहा— ये मेरे पुरोहित हैं । मैं वृन्दावन में चतुरा- नागाजी का शिष्य होने गया था । उन्होंने मुझे शिष्य न बनाकर आप का शिष्य होने की आज्ञा दी और कहा— वे सांभर में आने वाले हैं, तुमको उनका दर्शन सांभर में होगा ।
.
फिर हम दोनों वृन्दावन से आकर विराट नगर के पर्वत की गुफा में एक वर्ष रहे । वहां आपके पद भी एक सज्जन ने सुनाये और आपका पता भी दिया कि वे सांभर में पधार गये हैं । तब हम दोनों ही आपकी शरण आये हैं । अब आप हम लोगों पर कृपा करें । दादूजी ने कहा— क्या कृपा चाहते हैं ? भीमराज हाथ जोड़ कर बोले— मुझे अपना शिष्य बनाकर कृतार्थ कीजिये । दादूजी ने कहा— आप तो राज- परिवार में पले हुये हैं, साधु धर्मका निर्वाह आपसे कैसे हो सकेगा ?
.
“दादू मारग साधु का, खरा दूहेला जान ।
जीवत- मूतक हो चले, राम नाम नीशान ॥
दादू मारग कठिन है, जीवत चले न कोय ।
सोई चल है बापरा, जीवत मृतक होय ॥
कायर काम न आव हीं, यह शूरे का खेत ।
तन मन सौंपे रामको, दादू शीश सहेत ॥
मन ताजी चेतन चढ़े, त्यौ की करे लगाम ।
शब्द गुरु का ताजणा, कोइ पहुँचे साधु सुजान ॥”
.
ये शब्द सुनकर भी भीमराजजी ने कहा— यह सब तो आप की कृपा से हो जायगा, आपतो मुझे शिष्य रूप से अपनाइये । मैं आपका ही शिष्य हूँगा, अन्य का कदापि नहीं हूँगा । 
*भीमराज को शिष्य करना, सुन्दरदास नाम देना* 
फिर परमेश्वर ने दादूजी को प्रेरणा दी— तुम इनको शिष्य बनालो । ये उच्चकोटि के संत हो जायेंगे । अन्य को भी जिसको शिष्य करोगे, वह अच्छा ही संत बनेगा । शिष्य बनने वालों को ना नहीं करना चाहिये । शिष्यों द्वारा ही निर्गुण भक्ति का प्रचार होगा ।
.
उक्त ईश्वर की आज्ञा सुनकर दादूजी ने भीमराज को वि. सं. १६२६ फाल्गुण शुक्ला अष्टमी गुरुवार को गुरुमंत्र देकर शिष्य बनाया और सुन्दरदास नाम प्रदान किया । कहा भी है—
“फागुन सुदि गुरु अष्टमी, सौलह सौ छः बीस ।
दादू शिष्य सुन्दर भये, भेष वाक्य जगदीश ।५। तरंग८ सुन्दरोदय
श्री दादू चरितामृत में सुन्दरदासजी का शिष्य होना वि. सं. १६२६ दिया है । किन्तु केदार देश की परची के सम्पादक नारायण स्वामी मास्टर ने मतभेद खड़ा करने लिये उक्त दोहे के “छः बीस” को पच्चीस बनाया है । और सुन्दरोदय में भी लिखा बताया है किन्तु यह सुन्दरोदय तरंग ८ का पंचम दोहा है कोई भी देख ले ।
.
फिर गुरुदेव दादूजी ने शिष्य सुन्दरदासजी को अपनी निर्गुण भक्ति की पद्धति बताई और निष्काम भाव से भजन करने का आदेश दिया । फिर सुन्दरदासजी गुरु प्रदत्त साधना में संलग्न हो गये और आगे चलकर बड़े सुन्दरदासजी के नाम से दादू पंथ में प्रसिद्ध हुये ।
.
*प्रहलादजी को उपदेश*
फिर एक दिन प्रहलादजी ने हाथ जोड़कर दादूजी महाराज से पूछा— मुझे भी आज्ञा दीजिये, मेरा क्या कर्तव्य है ? मैं इन सुन्दरदासजी के साथ रहूँ या अलग रहूँ तथा किस मत को धारण करूँ ? दादूजी ने कहा— तुम्हारा कर्तव्य है, इनके साथ रहकर इनकी सेवा करो । पूर्वाश्रम में भी ये आपको धनादि की सहायता करते थे और अब भी इनके द्वारा ही आपको वैराग्य हुआ है । यहां भी इनके साथ ही आये हो । अतः आप इनको ही अपना गुरु मानकर निष्काम भाव से भजन करो ।
फिर कहा—
.
“कछू न कीजे कामना, सहगुण निर्गुण होय ।
पलट जीव तैं ब्रह्मगति, सब मिल मानें मोय ॥
तन मन ले लागा रहे, राता सिरजन हार ।
दादू कछू मांगे नहीं, ते विरले संसार ॥”
रही मत की बात सो मानने योग्य मत यह है इसी को मानना चाहिये-
“आपा मेटो हरि भजो, तन मन तजो विकार ।
निरवैरी सब जीव से, दादू यह मत सार ॥”
जब तक किसी भी प्रकार का आपा(अहंकार) होता है तव तक भगवान् उस अहंकारी की भक्ति को यथार्थ रूप से नहीं मानते हैं-
“सेवा सुकृत सब गया, मैं मेरा मन मांहि ।
दादू आपा जब लगें, साहिब पानें नांहि ॥”
.
परमात्मा तथा गुरुजनों का उपकार मानते रहोगे तो तुम्हारा साधन रूप धन बढ़ता ही रहेगा-
“किया कृतं मेटे नहीं, गुण ही मांहि समाय ।
दादू बधै अनन्त धन, कव हूँ खूट न जाय ॥”
जब तक तुम्हारी इच्छा हो यहां रहकर सत्संग करो फिर मथुरा से आते समय जहां तुम्हारा संकल्प हुआ था कि यह बैठकर भजन करने का स्थान है, वहां ही जाकर भजन करना । वह स्थान(घाटड़ा के पास का प्रदेश) पराशर के तप करने से पवित्र हो गया है-
.
“चलि जाइयो उहिं ठौड़ सभागी, जो आतां आछी तुम लागी ।
नदी बहै जहां परम पुनीता, जहां पराशर आसण जीता ॥”
(महन्त चेतनजी कृत दादूजीवन चरित्र पंचम विश्राम) मथुरा से आते समय इन्होंने घाटड़ा के पास जो संकल्प किया था, उसको दादूजी महाराज ने अपनी योग शक्ति से जानकर बता दिया और कहा- वहां भजनशाल बनाकर निरंतर भजन करना ।
(क्रमशः)

*४८. सतगुरु कौ अंग १/३*

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
*श्रद्धेय श्री Tapasvi @Ram Gopal Das की प्रेरणा से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Meta AI*
.
*४८. सतगुरु कौ अंग १/३*
.
ॐ नमो* परम पुरिष परमात्मानं, गुरु गम्य सतगुरु लयं ।
जगजीवन जन तस्य शिष्यं, दण्डवत जय जय जयं* ॥१॥
*-*. संस्कृत भाषा में-
परम पुरुष परमात्मा को नमस्कार है, जो गुरु की कृपा से ही प्राप्त होते हैं और सतगुरु में ही लीन हैं । मैं उनका शिष्य जगजीवन, उन्हें बार-बार दण्डवत प्रणाम करता हूँ ।
.
पुरुषं परमात्मानं, गुरुगम्य गुरोर्लयम् ।
जगजीवननामाहं, शिष्यःसन् प्रणमामि तम् ॥१॥
परम पुरुष परमात्मा को नमस्कार है, जो केवल गुरु की कृपा से ही प्राप्त होते हैं और जो सतगुरु में ही लीन हैं । मैं जगजीवन, उनका शिष्य होकर, उन्हें प्रणाम करता हूँ ।
.
नमो रांमं नमो नांमं, नमो सतगुरु बन्दनम् ।
जगजीवन नमो गुरु दादू, कोटि कर्म निकन्दनम् ॥२॥
संत जगजीवनजी महाराज कहते हैं, राम को नमस्कार, राम नाम को नमस्कार, सतगुरु की वंदना को नमस्कार । गुरु दादू को नमस्कार, जो करोड़ों कर्मों का नाश करने वाले हैं ।
.
रांम नांम अक्षर उभयं, गुरु शिष्य उपदेशितं ।
जगजीवन सतगुरु साधनं, प्रणामं पारं गतं ॥३॥
राम नाम के दो अक्षर ही गुरु ने शिष्य को उपदेश रूप में दिए हैं । संत जगजीवनजी कहते हैं, सतगुरु की साधना ही प्रणाम है और यही भव से पार ले जाने वाली है ।
(क्रमशः)

बुधवार, 7 अक्टूबर 2026

अब तो घर जाउं नहीं

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷*卐 श्री दादूदयालवे नम:  卐*🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
.
*सद्गुरु चरणां मस्तक धरणा,*
*राम-राम कहु दुस्तर तिरणा ।*
*अठ सिधि नव निधि सहजैं पावे,*
*अमर अभय पद सुख में आवे ॥*
================
भीमराजजी के निश्चय और वैराग्य को देखकर प्रहलादजी को भी वैराग्य हुआ किन्तु उनको एक बार घर जाकर सब समाचार कहना था । अतः वे घर गये । सब समाचार कहे । तब घर वाले भीमराज को लाने का विचार करने लगे किन्तु प्रहलादजी ने उन्हें यह कर रोक दिया कि वे अब नहीं आयेंगे । तुम उनके पास मत जाओ जाने से उनके भजन में विघ्न होगा । प्रहलादजी के रोकने पर घरवाले उनको लाने व मिलने नहीं गये किन्तु  प्रहलादजी ने पुनः उनके पास जाने का विचार स्थिर रखा ।
.
इधर भीमराज ने अपने हथियार, घोड़ा और राजसी ठाठ बाट के वस्त्र आदि छोड़कर एक सच्चे जिज्ञासु के समान अपना रहन सहन बना लिया । सोई कहा है—
मू. छ.- देश को लोग मिल्यो मथुरा मधि, आय कहे समचार सती के ।
अब तो घर जाउं नहीं वृह¹ उपज्यो, जाय परू काहु पाय जती के ॥
तजे हथियार तुरी² चढ़बो, सब आयुध छाड़ दिये गृहस्थी के ।
राघो कहै सत सुन्दरदास जि, चाल गये गुरु ज्ञान पती के ॥४८९॥
¹विरह ²घोड़ा । एक दिन भीमराजजी ने अपने पंडे से पूछा— यहां आसपास में कोई उच्च कोटि का सन्त है क्या ? यदि हो तो उसका परिचय मेरे को दो और उनके पास मेरे को ले चलो । पंडे ने कहा— आजकल यहां निम्बार्क सम्प्रदाय के एक संत चतुरानागाजी प्रसिद्ध हैं । ब्रज में वे ही आज- कल सर्वश्रेष्ठ संत माने जाते हैं । 
.
इन्ही दिनों में प्रहलादजी भी लौटकर भीमराज के पास आ गये थे । फिर भीमराजजी ने पंडे को कहा— अब तुम हमको चतुरानागाजी के पास ले चलो । फिर भीमराजजी ने दीक्षा लेने योग्य सामग्री— चादर, प्रसाद, पुष्पादि, पूजा की सभी वस्तुयें मंगवाई और पंडे को साथ लेकर भीमराज तथा प्रहलादजी चतुरानागाजी के पास गये । दर्शन करके दंडवत की और भेंट चढ़ाकर सामने बैठ गये । फिर अवसर देखकर भीमराज बोले— भगवन् मुझे दीक्षागुरु मंत्र देकर कृतार्थ करिये । 
.
तब चतुरा- नागाजी ने भीमराजजी की ओर देखा और थोड़ी देर के लिये ध्यानस्थ हो गये । फिर ध्यान टूटने पर बोले— आपतो संत प्रवर दादूजी की आत्मा हैं, आपको मैं शिष्य नहीं बना सकता । दादूजी के पास जाकर उनके शिष्य बनो । भीमराजजी ने पूछा— दादूजी कौन हैं ? वे कहां मिलेंगे ? चतुरा- नागाजी ने कहा— वे सनक मुनि के अवतार हैं, परमेश्वर की आज्ञा से निर्गुणा ब्रह्म की भक्ति का विस्तार करने के लिये बालरूप धारण करके साबरमती नदी में बहते हुये अहमदाबाद के लोधीराम नागर ब्राह्मण को अहमदाबाद के पास मिले थे । उसी ने उनको पालापोषा था । अतः उसी के पौष्य पुत्र हैं । 
.
वे अब करडाला ग्राम के पर्वत से सांभर आने वाले हैं । तुमको उनका दर्शन सांभर में ही होगा । सांभर आने पर तुम जाकर उनके शिष्य हो  जाना । यह सब वृत्तान्त मैंने अभी ध्यान द्वारा जाना है और यह सब सत्य है । भक्तमाल में भी कहा है—
मू. छ.- परका¹ ले मिठाइ धरी जब आगे, सु नागे कहा सुन बातरे भाई ।
सांभर में प्रकटें सो गुरु कर, दादु के पाय परो तुम जाई ॥
मान प्रतीति चले अति आतुर, प्रान की प्रीति मिले सुखदाई ।
राघो कहै संत सुन्दरदास मिले, वर्ष दोस² हि में सुधि³ पाई ॥४९०॥
.
¹वस्त्र ²दिन ³समाचार चतुरानागाजी से मिलने के पश्चात् एक वर्ष व्यतीत होने पर दादूजी के सांभर आने का समाचार मिला । दादूजी का परिचय प्राप्त होने पर भीमराज अति प्रसन्न हुये और भविष्य में होने वाले गुरुदेव की प्रतीक्षा करने लगे । अपने वस्त्रादि सब सामग्री सेवक को देकर उसे घर जाने की आज्ञा दी और स्वयं ने भगवां वस्त्र धारण कर लिये । भीमराजजी का ये सब व्यवहार देखकर प्रहलादजी को भी वैराग्य हो गया । उन्होंने पुनः घर जाने का विचार छोड़ दिया । 
.
फिर मथुरा, वृन्दावन को त्याग कर दोनों महानुभाव सांभर आने के उद्देश्य से राजस्थान की ओर चल दिये । मार्ग में घाटड़ा ग्राम के पास इन्होंने पर्वत के पास ही बहती हुई नदी को और सुन्दर स्थान को देखकर संकल्प किया— यह स्थान भी बैठकर भजन करने के योग्य है । वहां से विचरते हुये विराट नगर को आये । वहां के पर्वत की एक गुफा में एक वर्ष तक भगवद् भजन करते हुये निवास किया । यहां ही किसी से दादूजी महाराज के कुछ पद सुने, उनपदों में प्रथम पद यह था-
.
“सद्गुरु चरणां मस्तक धरणा, राम-राम कहु दुस्तर तिरणा । टेक ॥
अठ सिधि नव निधि सहजैं पावे, अमर अभय पद सुख में आवे ॥१॥
भक्ति मुक्ति वैकुंठा जाई, अमर लोक फल लेवे आई ॥२॥
परम पदारथ मंगल चार, साहिब के सब भरे भंडार ॥३॥
नूर तेज है जोति अपार, दादू राता सिरजन हार ॥४॥”
.
इसका परिचय भक्तमाल में भी राघवदासजी महाराज ने दिया है, देखिये-
मू. छ.- “भगवां करि भेष रहे वर्ष एकहु, जैसे रहे मणिहीन भुजंगा ।
काहु ने आय पढ़े पद स्वामि के मानो सुमेरु से ऊतरि गंगा ॥
ज्यों धर से सनकादिक अंबर, ऐसे चले जैसे हंस विहंगा ।
राघो कहै संत सुन्दरदास जि, दादुदयालु के शोभित संगा ॥४९१॥”   
पद सुनाने वाले सज्जन से दादूजी का पूरा पता मिल गया कि वे सांभर में ही हैं । 
(क्रमशः)

*४७. अध्यातम कौ अंग ११७/१२०*

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
*श्रद्धेय श्री Tapasvi @Ram Gopal Das की प्रेरणा से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Meta AI*
.
*४७. अध्यातम कौ अंग ११७/१२०*
.
कहि जगजीवन रांमजी, उत्तम सबद अगाध ।
सतगुर दीजै दया करि, सकल२ बिचारै साध ॥११७॥
(२. सकल=समस्त)
संत जगजीवनदास जी महाराज कहते हैं रामजी का उत्तम शब्द बहुत गहरा और अगाध है । हे सतगुरु, दया करके यह मंत्र दीजिए, जिसे सभी साधु विचार कर अपनाते हैं ।
.
त्रिय३ संगी त्रिय देवता, ब्रह्मा बिषनु महेस ।
कहि जगजीवन तहां बसि, निरखै रांम नरेश ॥११८॥
(३. त्रिय=तीन) 
तीन गुणों के साथ तीन देवता ब्रह्मा, विष्णु और महेश हैं । संत जगजीवन जी कहते हैं कि साधक वहीं बस कर, उनसे परे राम रूपी राजा के दर्शन करता है ।
.
नख सिख हरि हरि बिदेही४, रांम नांम रस देह ।
कहि जगजीवन निहकाम अष्टांग, जोग धारनां एह ॥११९॥
(४. विदेही=ब्रह्म)
नख से शिखा तक हर अंग में हरि ही बसे हैं, विदेही ब्रह्म रूप हो गया है और देह राम नाम के रस से भरी है । संत जगजीवन जी कहते हैं कि यही निष्काम अष्टांग योग की सच्ची धारणा है ।
.
न्यौली५ बांधी भुयंगड़६, कुम्भक पूरक सास ।
करम अष्टांग जोग७ धारनां, सु कहि जगजीवनदास ॥१२०॥
(५. न्यौली=नेती, धोती आदि योग के षट् कर्मों में से एक)
{६. भुयंगड=भुजंग (सर्प) (कुण्डली)}  (७. अष्टांग जोग=यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, ध्यान, धारणा, समाधि- ये योग के आठ साधन हैं)
नेती-धोती आदि षट्कर्म से शरीर शुद्ध करके, कुण्डलिनी रूपी सर्प को बांध कर, कुम्भक और पूरक प्राणायाम द्वारा श्वास को साध कर कर्म करना ही अष्टांग योग की धारणा है, ऐसा संत जगजीवन दास जी कहते हैं ।
इति अध्यातम कौ अंग संपूर्ण ॥४७॥
(क्रमशः)

नारि सती सुन विरत भये

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷*卐 श्री दादूदयालवे नम:  卐*🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
.
*दादू सोई हमारा सांइयां, जे सबका पूरणहार ।*
*दादू जीवन मरण का, जाके हाथ विचार ॥*
================
जोधपुर नरेश मालबदेव ने बीकानेर पर आक्रमण कर दिया था । उस युद्ध में भीमराज के पिता जैतसिंह की मृत्यु हो गई तथा बीकानेर मालबदेव के अधिकार में आ गया । सब सरदारों ने जैतसिंह के परिवार को कल्याणमल और भीमराज के साथ सुरक्षित सिरसा में पहुँचा दिया । मालबदेव बीकानेर का प्रबन्ध सरदार कूं पा और पंचायण को देकर मेड़ता चला गया । 
.
इधर सिरसा से भीमराज मंत्री नगराज के साथ दिल्ली में शेरशाह के पास गया । मालबदेव ने वीरमदेव से मेड़ता छीन लिया तब वीरमदेव भी कल्याणमल के पास सिरसा होता हुआ भीमराज के पास दिल्ली चला आया । फिर भीमराज और वीरमदेव की सहायता के लिये शेरशाह ने एक विशाल सेना लेकर उन दोनों के साथ मालबदेव पर चढ़ाई की । मार्ग में कल्याणमल भी मिल गये । इनकी विशाल शक्ति जानकर मालबदेव ने कूं पा के पास सूचना भेजी कि— बीकानेर के गढ़ को खाली करके तुरन्त चले आओ । तब वह गढ़ को खाली करके जोधपुर चला गया । 
.
भीमराज ने अपने चाचा रावत किशनसिंह की सहायता से बीकानेर के गढ़ पर अधिकार करके अपने भाई कल्याणमल की दुहाई फेर दी । उक्त प्रकार भीमराज ने बीकानेर के गये हुये राज्य पर अपने भाई का पुनः अधिकार कराया । इससे कल्याणमल ने भीमराज को वि. सं. १६०२ में भीमसर की जागीर और “गई भूमिका बाहुड़” का विरुद देकर सम्मानित किया । भीमराज की वीरता से प्रभावित होकर अकबर बादशाह ने भीमराज और चिन्दरागीपुर के राजा चन्द्रसेन को सैन्यदल के साथ काबुल के मिर्जा हाकिम को जय करने के लिये भेजा था । 
.
भीमराज ने बड़ी वीरता से युद्ध करके मिर्जा हाकिम को हराया किन्तु युद्ध में वे स्वयं भी घायल होकर गिर पड़े और मूर्च्छित हो गये थे । जब मिर्जा अपने दल सहित इनसे सन्धि करने जा रहा था, तब भीमराज के सैनिकों ने समझा कि मिर्जा हाकिम पुनः आक्रमण करने के लिये आ रहा है । अतः वे भीमराज को मृत समझ कर भाग गये । यही राघवदासजी ने अपनी भक्तमाल में संक्षेप में मू. छ. ४८७ में कहा है, देखिये -                                    
.
मू. छ.- उत्तर देश नरेश को बालक, आय मिल्यो पतिशाह के तांई ।
पेल¹ दिये मजबूत मवासे² में, जातहि रारि³ परी⁴ परघो घांईं ॥
चाकर लोग चम्मकि गये भज, ठाकुर खेत रह्यो उहि ठांई ।
राघो कहै सत सुन्दरदासजि, के रक्षपाल भये तहं सांई ॥४८७॥¹
भेज ²रक्षा ³युद्ध ⁴हुआ ⁵घाव । अन्य शब्द सब सरल हैं ।
फिर जब चिन्दरागीपुर के सैनिकों को यह ज्ञात हुआ तब वे भीमराज को उठाकर महाराज चन्द्रसेन के डेरे में ले गये । भीमराज को छोड़कर भागे हुये सैनिकों ने भीमराज के घर को उनके वीरगति पाने की सूचना दे दी । फिर जब भीमराज होश में आये तब भीमराज ने काबुल के मिर्जा हाकिम को दिल्लीपति की अधीनता स्वीकार करने की सलाह दी । मिर्जा हाकिम ने भीमराज की सलाह मान ली । 
.
फिर एक पक्ष तक चिन्दरागीपुर के राजा- चन्द्रसेन ने भीमराज की सेवा की और अच्छे हो गये तब मार्ग के लिये खर्च, कपड़ा, हथियार और एक घोड़ा देकर घर को भेज दिया । वे बादशाह के पास आये । बादशाह ने प्रसन्न होकर इनका मुजरा माफ कर दिया । फिर ये बीकानेर जा रहे थे तब मार्ग में मथुरा में स्नान करने आये । यही भक्तमाल में संक्षेप से राघवदासजी ने मू. छ. ४८८ में कहा है, देखिये—
मू. छ.- करतार सुनी करुणा जनकी, जन चार¹ विचार रु ले घर आये ।
रीति बड़ों कि बड़ो पहचानत, सार² करी बहु भांति जिमाये ॥
कपड़ा हथियार तुरंग³ खरची, दिड यूं करके घर को पहुँचाये ।
राघो कहै सत सुन्दर दास जि, आवत ही मथुरा मधि न्हाये ॥४८८॥¹
सेवक ²सेवा ³घोड़ा ।
.
मथुरा में भीमराजजी को अपने राजपुरोहित प्रहलादजी अपने साथियों के साथ मिले । वे भीमराजजी का ही गया श्राद्ध कराकर आये थे । प्रहलादजी ने जब इनको देखा तो उनको अति आश्चर्य हुआ । उन्होंने सोचा जिनका मैं गया श्राद्ध करा कर आया हूँ वे तो ये सामने जीवितावस्था में दीख रहे हैं । फिर उनके मन में संकल्प हुआ कोई और हो सकते हैं । कभी एक समान आकृति के मिल भी जाते हैं । फिर भी बात करने से पूरा निर्णय होगा । 
.
प्रहलादजी पास आये तब भीमराजजी ने उनको प्रणाम किया और  पूछा— आप यहां कैसे पधारे हैं ? यात्रा करने आये हैं या और किसी कार्य- वश आये हैं ? तब प्रहलादजी का कंठ रुक गया, वे बोल न सके और उनके नेत्रों से अश्रु भी टपकने लगे । भीमराजजी ने पूछा— गुरुजी ! ऐसी क्या बात है ? जो आपकी ऐसी स्थिति हो गई है । प्रहलादजी बोले— महाराज ! क्या कहूँ कहा नहीं जाता है । भीमराजजी बोले— कहना तो पड़ेगा ही, क्यों संकोच करते हो ? कह दो । 
.
प्रहलादजी बोले— हमको आपकी वीरगति का समाचार मिला था । इससे महारानी आपकी कुल परम्परा के अनुसार सती हो गई है और आप के पुत्र नारायणदास को आपकी गद्दी पर बैठा दिया है तथा मैं आपका गया— श्राद्ध कराकर लौटा हूँ । यहां आते ही आपका दर्शन हुआ है । इससे मुझे हर्ष और दुःख दोनों ने घेर लिया है । हर्ष तो आपके मिलने का है । दुःख महारानी के सती होने का है । इतना कहकर प्रहलादजी मौन हो गये । 
.
फिर भीमराजजी ने कहा— अच्छा, जो हरि इच्छा होती है, वही होता है । जितने दिन का संस्कार था उतने दिन संयोग रहा, फिर वियोग तो होना ही था । दोनों में से एक तो जाता ही है । आप क्यों दुःखी होते हैं ? प्रहलादजी ने कहा— ठीक है महाराज जो होना था सो हो गया, अब राज-धानी को पधारें । घर पर चलकर सबको हर्षित करें । तब भीमराजजी ने कहा— अब घर जाकर क्या करना है ? घर तो गृहणी तक ही होता है । अब मैं घर नहीं चलूंगा, अब तो किसी उच्चकोटि के संत की शरण होकर भजन ही करूंगा, आप जाओ । कहा भी है-
कभी कभी तो होत है, दुःख से भी वैराग ।
नारि सती सुन विरत भये, सुन्दर तज अनुराग ॥१६०॥ ह. त. अ।
(क्रमशः)

*४७. अध्यातम कौ अंग ११३/११६*

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
*श्रद्धेय श्री Tapasvi @Ram Gopal Das की प्रेरणा से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Meta AI*
.
*४७. अध्यातम कौ अंग ११३/११६*
.
कहि जगजीवन सब रही, प्रेम प्रीति पिव प्यास ।   
 दूर गई सब अविद्या१, परम पुरिष की आस ॥११३॥
(१. अविद्या=अज्ञान)
संत जगजीवन दास जी कहते हैं कि प्रियतम परमात्मा के लिए प्रेम, प्रीति और प्यास बनी रहे जी । जब परम पुरुष की सच्ची आस लगती है, तो सारी अविद्या / अज्ञान अपने आप दूर हो जाता है ।
.
कहि जगजीवन सब रही, दूर गई सब आंन ।
परम पुरिष सौं प्रीति करि, रांम कहैं गुरु ग्यांन ॥११४॥ 
संत जगजीवन दास जी कहते हैं कि जब परम पुरुष से सच्ची प्रीति लग जाती है, तो दूसरी सब आन-उपासना दूर हो जाती है । गुरु का सच्चा ज्ञान यही है कि केवल राम-नाम में ही रम जाओ ।
.
कहि जगजीवन सब रही, देह गई हरि मांहि ।
तेज पुंज मंहि तेज तन, कोइ गुन व्यापै नांहि ॥११५॥
संत जगजीवन दास जी कहते हैं कि साधक की देह हरि में लीन हो गई है । अब वह सब जगह उसी को देखता है । उसका शरीर तेज के पुंज में तेज रूप हो गया है, अब उस पर कोई गुण, माया का विकार, असर नहीं करता है ।
.
कहि जगजीवन रांमजी, अनहद सबद अगाध ।
परम गुरु परगट कहैं, जाहि पिछांणै साध ॥११६॥
संत जगजीवन जी कहते हैं कि रामजी का नाम अनहद, असीम और अगाध शब्द है । परम गुरु इसे प्रत्यक्ष रूप में बताते हैं, और सच्चा साधु ही इसे पहचान पाता है ।
(क्रमशः) 

मंगलवार, 6 अक्टूबर 2026

*बड़े सुन्दरदासजी*

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷*卐 श्री दादूदयालवे नम:  卐*🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
.
*समता के घर सहज में, दादू दुविध्या नांहि ।*
*सांई समर्थ सब किया, समझि देख मन मांहि ॥*
================
फिर श्यामदास चौड़का भालाना(जयपुर के पास जहां अब दुर्गापुरा है उसके पास) में आकर भजन करने लगे थे और वहां ही अपना साधन धाम बना लिया था । एक समय इनके भक्तों ने भालाना में संत सम्मेलन भी करवाया था । उसमें दादूजी के अनेक शिष्य प्रशिष्य तथा अन्य संत भी पधारे थे । टहटड़ा से नागर निजामजी भी पधारे थे । 
.
भोजन के समय जब नागर निजामजी को पंक्ति में पधारने को कहा तब उन्होंने कहा - हम तो दादूजी महाराज के दिये हुये सिद्ध पात्र में आया हुआ भोजन ही पाते हैं, पंक्ति में नहीं आयेंगे । फिर उन्होंने प्रतिदिन के समान भोजन के समय पात्र रखा किन्तु उसमें आज भोजन नहीं आया । कारण-दादूजी महाराज की आज्ञा केवल टहटड़ा ग्राम में रह कर भजन करोगे तो तुमको इस पात्र में भोजन मिल जाया करेगा । किन्तु आज तो टहटड़ा न होकर चौड़का भालाना था । 
.
भोजन नहीं आया तब नागरजी ने कहा -
“नागर कहै निजाम से, चड़ो टहटड़े ग्राम ।
टूक मिले टापां मिटे, खाय भजें नित राम ॥”
उक्त संत सम्मेलन से ज्ञात होता है इनके ऊपर भालाणा के आस-पास की जनता का भी इनके भजन द्वारा इन पर अच्छा भाव था । भक्तमाल में श्यामदासजी का नाम मात्र ही दिया है विशेष चरित्र नहीं दिया है । 
.
“भालाणा में श्यामदास” मू. ५६५ भक्तमाल के मूल छप्पय ६५८ में- “श्यामदास के राघव पुनि कल्याणे आंहीं ।” अर्थात श्यामदासजी के दो शिष्य थे- राघवदासजी और कल्याणदासजी । इन श्यामदासजी की समाधि दुर्गापुरा(जयपुर) के पास चौड़के भालाणा में नदी के किनारे पर थी । एक तिबारा तथा चरण चौकियां भी थीं । इससे अधिक श्यामदासजी का व उनकी परंपरा का परिचय नहीं मिल सका । अतः प्राप्त हो सका वही यहां लिख दिया गया है ।
.
*बड़े सुन्दरदासजी*
मू. छप्पय- 
गुरु दादू बड़ शिष्य भयो, लघु नृप बीकानेर को ॥
बादशाह कर हुकुम, पठायो काबुल जाई ।
युध कर घावां पड़चो, समभ किन लियो उठाई ॥
ताजा¹ हो राठौड़ तुरी² चढ़ मथुरा आया ।
मिल्यो देश को लोग, सती समचार सुनाया ॥
राघव, मिल चतुरे कहा, मग ले सांभर शहर को ।
गुरु दादू बड़ शिष्य भयो, लघु नृप बीकानेर को ॥४८४॥
.
राघवदासजी ने अपनी भक्तमाल में ४८४ के मूल छप्पय में भीमराजज का संक्षिप्त परिचय दिया है । इस कवित्त की गद्य टीका में विदासर नरेश भीमसिंह सुन्दरदास हुये, वह गलत है । इतिहास का पूरा ज्ञान न होने से तथा भक्तमाल पढ़ाने वालों के कहने से व जनश्रुति के आधार पर वह गलती हो गई है । बड़े सुन्दरदासजी का पूर्वाश्रम का नाम भीमराज था । 
.
बीकानेर के राजा जैतसिंह का विवाह अमरकोट के राजा जैतपाल की पुत्री कश्मीरदे से हुआ था । कश्मीरदे के जैतसिंह से पांच पुत्र हुये थे- १- कल्याणमल २- भीमराज ३- ठाकुरसी ४- मालदे ५- कान्हा । इनमें द्वितीय पुत्र भीमराज ही दादूजी के शिष्य बड़े सुन्दरदास हुये थे । भीमराज का जन्म वि. सं. १५७९ फागुण सुदि २ गुरुवार को हुआ था । 
.
भीमराज जब युवा हुये तब उनकी वीरता तथा सुन्दरता की ख्याति दूर दूर तक फैल गई थी । इससे उनके विवाह के लिये अनेक राजवंशों ने वार्ता की किन्तु भीमराज का विचार भगवद् भक्ति करने का था अतः वे विवाह नहीं करना चाहते थे । अंत में माता-पिता के आग्रह से उन्हें विवाह करना स्वीकार करना ही पड़ा । फिर महाराणा उदयसिंह की छोटी बहिन राजकुंवरी के साथ भीमराज का विवाह वि. सं. १५९८ में हो गया । राजकुंवरी से भीमराज के एक पुत्र हुआ । जिसका नाम नारायणदास था । 
(क्रमशः)