शनिवार, 14 फ़रवरी 2026

ब्रह्मलीन होना ~

*#daduji*
*॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥*
*॥ दादूराम~सत्यराम ॥*
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
.
१५ आचार्य हरजीराम जी ~ 
.
ब्रह्मलीन होना ~ 
उक्त  प्रकार आचार्य हरजीरामजी महाराज ६ वर्ष ४ मास २५ दिन गद्दी पर विराज कर वि. सं. १९५५ वैशाख शुक्ला १० रविवार को ब्रह्मलीन हुये थे । आप महान् संत थे । गद्दी पर विराजने से पूर्व भी आपने अपना जीवन ब्रह्म भजन में व्यतीत किया था और आचार्य पद प्राप्ति के पश्‍चात् भी आप ने ब्रह्म भजन, उपदेश आदि परमार्थ के कार्यों में ही मन रखा था । आप सर्व हितेषी महात्मा थे । आपने अपने अधार्मिक जनता को भी ईश्‍वर की ओर लगाया था ।
.
गुण गाथा दोहा- 
हरि में हरजीराम का, चित रहा सब काल ।  
इस से शरणागतों को, करते रहे निहाल ॥१॥
हरजिरामजी के रहे, उन्नत सदा विचार । 
इस कारण उनका चला, सम्यक् सब व्यवहार ॥२॥
आचार्य हरजिराम की, बुद्धि ब्रह्म में लीन ।
रही इसी से वे हुये, परमार्थ सु प्रवीन ॥३॥ 
अपने जीवन काल में, ले दादू आधार ।  
हरजिराम करते रहे, दादूवाणि प्रचार ॥४॥
दादूवाणी का सदा, हिय में धरा विचार ।
इस से हरजीराम जी, संतत रहे उदार ॥५॥
हर रु राम की एकता, हरजिराम में देख ।
‘नारायण’ निश्‍चय हुआ, सब में एक अलेख ॥६॥
हर रु राम का भेद तो, है अबोध से जान । 
क्षय कर अबोध इक हुये, हरजीराम सुजान ॥७॥
ब्रह्म ज्ञान हो जाय तब, भेद रहे नहिं लेश । 
ज्ञानी हरजीराम ने, हता द्वैत का क्लेश ॥८॥ 
हरजिराम आचार्य की, निष्ठा और विचार । 
लख ‘नारायण’ करत है, वन्दन बारंबार ॥९॥
इति श्री द्वादश अध्याय समाप्त: १२ 
(क्रमशः)

*१९. साधु कौ अंग ४५/४८*

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
.
*१९. साधु कौ अंग ४५/४८*
.
सुन्दर कृष्ण प्रगट कहै, मैं धारी यह देह । 
संतनि कै पीछै फिरौं, सुद्ध करन कौं येह ॥४५॥ 
भगवान् कृष्ण ने तो साक्षात् अपने श्रीमुख से कहा है कि मैंने अपने यह शरीर शुद्ध(निष्कलंक) करने के लिये ही यह अवतार लिया है ॥४५॥
.
संतनि की महिमा कही, श्रीपति श्रीमुख गाइ । 
तातें सुन्दर छाडि सब, सन्त चरन चित लाइ ॥४६॥
इस प्रकार, जब लक्ष्मीपति भगवान् ने स्वयं श्रीमुख से सन्तों की चरणपूजा की महिमा बखान की है तो श्रीसुन्दरदासजी भी साधक को यही सत्परामर्श दे रहे हैं कि तूं भी समस्त सांसारिक प्रपन्च त्याग कर केवल सन्तों की सङ्गति में ही अपना ध्यान लगा ॥४६॥
.
संतनि की सेवा किये, श्रीपति होहि प्रसन्न । 
सुन्दर भिन्न न जानिये, हरि अरु हरि के जन्न ॥४७॥
श्रीसुन्दरदासजी सत्सङ्गति का एक अन्य लाभ भी बता रहे हैं - इस सत्सङ्गति(सन्तों की सेवा) से देवाधिदेव(श्रीपति) भगवान् भी प्रसन्न होते हैं । अतः उन दोनों को अभिन्न जान कर तूं भी उन(सन्तों) के चरणों की सेवा कर ॥४७॥
.
सुन्दर हरि जन एक हैं, भिन्न भाव कछु नांहि । 
संतनि माहें हरि बसै, संत बसै हरि मांहिं ॥४८॥
हरि एवं हरिभक्त - दोनों एक हैं, उन को भिन्न(पृथक) न समझ; क्योंकि सन्तों के हृदय में हरि का वास है और हरि के हृदय में सन्तों(भक्तों) का वास है ॥४८॥
(क्रमशः)

*उपदेश-चेतावनी ॥*

🌷🙏 🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
.
*ब्रह्म सरीखा होइ कर, माया सौं खेलै ।*
*दादू दिन दिन देखतां, अपने गुण मेलै ॥*
==============
*उपदेश-चेतावनी ॥*
सीख गुराँ की मानौं रे, क्यूँही सीख बडाँ की मानौं ।
साधाँ त्यागि छिया करि छाडी, तिहि थैं दीजै कानौं ॥टेक॥
कर दीपक ले कूप पड़ीजै, एक बड़ौ हैरानौं ।
पैसि पतालि बुरौ जे कीजै, पाछैं होइ न छानौं ॥
कान खुजालै नीचौ न्हालै, पाड़ौसणि दे तानौं ।
थारा किया किरत कौ कागद, जम लिखि लीयौ पानौं ॥
बिषै बिकार माँहैं अपराधी, आठौं पहर दिवानौं ।
लजमारा लाजाँ काँइ मारै, परमेसुर कौ बानौं ॥
जाकी बिरति रु ब्रह्म कहावै, खोटौ देखि जमानौं ।
सिष साषाँ सुधौ बिषै कीनै मैं, बहि जासी गैबानौं ॥
जत अर सत दीयौं परमेसर, लिखि ल्यायौ परवानौं ।
बषनौं कहै भला ते दीसै, सुमिरण मैं सावधानौं ॥५०॥
.
गुरुमहाराज के उपदेशों को मानौं = सुनकर आचरण में आचरित करो । जो आयुवृद्ध तथा ज्ञानवृद्ध हैं उनकी अनुभवयुक्त शिक्षा को कैसे भी करके मानो । (यहाँ क्यूँही = कैसे भी करके का आशय “भाव कुभाव अनख आलसहूँ । नाम जपत मंगल दिस दसहूँ ॥” से है । भाव-कुभाव ही आगे चलकर भाव = श्रद्धा-भक्ति में परिवर्तित हो जाते हैं । अतः प्रारम्भिक अवस्था में भगवद्मार्ग का जैसे भी हो, वैसे ही अनुसरण करना चाहिये । क्योंकि “नेहाभिक्रमनाशोस्ति प्रत्यवायो न विद्यते । स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात् ॥” गीता २/३९॥)
.
साधु-सज्जन पुरुषों ने त्यागने योग्य छिया = माया, भ्रम को त्याग दिया है । अतः तुमको भी भ्रम-जंजालों का त्याग कर देना चाहिये (कानैं =एक ओर कर देना) । जिस व्यक्ति के हाथ में दीपक हो, फिर भी वह कूवे में पड़ जाये तो इससे बड़ा आश्चर्य और क्या होगा ? जिसके पास श्रोत्रिय-ब्रह्मनिष्ठ गुरु का उपदेश रूपी पूंजी उपलब्ध है । फिर भी वह विषय-भोगों में आसक्त हो जाये तो यह आश्चर्यचकित करने वाले तथ्य से कम नहीं है । पाताल = बिलकुल एकान्त में बुरा करने पर भी बुरा कृत्य छिपता नहीं है, कभी न कभी किसी न किसी निमित्त से उसका उद्घाटन हो ही जाता है ।
.
जब उस बुरे कृत्य का उद्घाटन होता है और पाड़ौसन = परिचितों द्वारा उलाहना दिया जाता है तब कान खुजाने तथा नीचे की ओर देखने रूप शर्मिंदगी के अतिरिक्त और कुछ शेष बचता नहीं है । वस्तुतः बुरा आचरण करने वाला सोचता है, मैं नितान्त एकान्त में इस कार्य को कर रहा हूँ, मुझे कोई नहीं देख रहा है किन्तु सर्वज्ञ-परमात्मा सर्वत्र किये सर्व कार्यों को देखता हैं और मनुष्य द्वारा किये कृत्यों को अपनी बहियों में लिख लेता है ।
.
परब्रह्म-परमात्मा की सत्ता से स्फूर्तमान जम = यमराज तेरे किये कृत्यों को अपनी बहियों के पन्नों में लिख लेता है । हे मनुष्य ! तू आठों-पहर विषयविकारों में डूबा हुआ अपराध दर अपराध करता जाता है; हे लजमार = जिन कृत्यों को करने में लज्जा आती है, ऐसे कृत्यों को करने वाले मनुष्य ! परमेश्वर द्वारा अहैतुकी कृपा करके प्रदान किये मनुष्य बानौं = शरीर को क्यों लज्जित करने में लगा हुआ है, क्यों लाजें मारता है ।
.
“कबहुँक करि करुणा नर देही । देत ईस बिनु हेत सनेही ॥” मानस ॥ 
“लख चौरासी भुगतताँ, बीत जाइ जुग च्यारि ।
पीछै नरतन पाइगा, ताते राम सँभारि ॥ श्रीरामचरणवाणी ॥
बषनांजी आश्चर्य व्यक्त करते हुए कहते हैं, देखो, कितना बुरा जमाना आ गया है कि जिसकी वृत्ति के कारण विरति = विरक्त और ब्रह्म कहा जाता है, वही साधु अपने शिष्य-प्रशिष्यों के सहित(सुधौ) विषय-भोगों में आसक्त है और गर्वता हुआ उन्हीं विषय-भोगों में बहा जाता है ।
.
परमेश्वर द्वारा मनुष्य जन्म प्रदान करते समय जत = इन्द्रियनिग्रह तथा सत = सतस्वरूप परमेश्वर की भक्ति करने का परवानो = परवाना लिख कर दिया जाता है(यात्रा करते समय आगामी कार्यक्रम को लिखकर जिस कागज पर दिया जाता है वह परवाना कहलाता है) बषनांजी कहते हैं, वे ही भले मनुष्य प्रतीत होते हैं जो परवाने में लिखे समाचार रूपी भगवन्नाम स्मरण को करने में सावधान = होशियार हैं ? स्मरण-भजन करते हैं ॥५०॥
(क्रमशः)

*४. गुरु-शिष्य निगुर्ण का अंग ~९/१३*

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी* टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
.
*४. गुरु-शिष्य निगुर्ण का अंग ~९/१३*
.
*बैयर सौं बैयर मिल्यों, कहो पूत क्यों होय ।*
*त्यों रज्जब सद्गुरु बिना, सब खोजों२ की जोय१ ॥९॥*
कहो ? नारी१ से नारी मिले तब पुत्र कैसे होगा ? वैसे ही सद्गुरु के बिना सभी शिष्य नपुँसकों२ की नारियों के समान है । जैसे नपुँसक की नारी से संतान नहीं होती वैसे ही सद्गुरु बिना शिष्यों को ज्ञान नहीं होता ।
.
*अजा१ कंठ कुच पय२ नहीं, क्या पीवे दुहि ग्वाल ।*
*त्यों रज्जब शिष सूम गति, गुरु भूखा बेहाल ॥१०॥*
बकरी१ के गले के स्तनों में दूध२ नहीं होता, वे तो देखने मात्र के ही होते हैं । उनको ग्वाला दुह करके पीना चाहै तो क्या पीयेगा ? वैसे ही यदि शिष्य सूम मिल जाय और गुरु आशा द्वारा भूखा मिल जाय तो उक्त अजागलस्तन और ग्वाला की-सी ही दुखद गति उनकी होगी ।
.
*घर घर दीक्षा देहिं गुरु, शिष्य न सुलझे कोय ।*
*जन रज्जब सब लालची, ताथैं भला न होय ॥११॥*
स्वार्थी गुरु घर घर पर जाकर दीक्षा देते हैं किन्तु उनके उपदेश से कोई भी शिष्य अज्ञान बन्धन से नहीं निकलता, कारण - गुरु और शिष्य दोनों ही सांसारिक विषयों के लोभी हैं, इसलिये दोनों का ही मुक्ति रूप भला नहीं होता ।
.
*शिष सारे गुरु को गिलैं, गुरु सेवक सब खाय ।*
*रज्जब दोनों यूँ मिले, हरि में कौन समाय ॥१२॥*
शिष्य तो सभी गुरु के धनादि को खाना चाहता हैं और गुरु सभी सेवकों का खाना चाहता है इस प्रकार दोनों ही सांसारिक आशाओं से घिरे हुये है तब दोनों में से हरि में कौन समायेगा ? अर्थात दोनों ही मुक्त न हो सकेंगे ।
.
*कुल चेले चीणा भये, गुरु को यह गम१ नाँहिं ।*
*रज्जब पैठा प्रीति कर, बूडि मुवा यूँ माँहिं ॥१३॥*
चीणा नामक अनाज चपटा और चिकना होता है, उसकी राशि पर कोई कूद पड़े तो उसमें डूब जाता है । वैसे ही शिष्य तो सब चीणा के समान हैं, किन्तु गुरु को यह ज्ञान१ नहीं कि यह मुझे ही दबा लेंगे, वह तो प्रेम से उनमें प्रवेश करता है परन्तु अन्त में उनके जाल से उन्हीं में समाप्त हो जाता है अर्थात गुरु का सर्वस्व वे ही खा जाते हैं ।
.
इति श्री रज्जब गिरार्थ प्रकाशिका सहित “४. गुरु-शिष्य निर्गुण का अंग” समाप्त ॥
(क्रमशः)

पाटण में चातुर्मास ~

*#daduji*
*॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥*
*॥ दादूराम~सत्यराम ॥*
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
.
१५ आचार्य हरजीराम जी ~ 
.
पाटण में चातुर्मास  ~ 
वि. सं. १९५३ में जीवणदासजी पाटण वालों ने आचार्य हरजीरामजी को चातुर्मास का निमंत्रण दिया । आचार्यजी ने स्वीकार कर लिया । चातुर्मास का समय समीप आने पर आचार्य हरजीरामजी महाराज अपने शिष्य मंडल के सहित पाटण पधारे । 
.
जीवणदासजी भक्त मंडल के सहित आचार्य हरजीरामजी की अगवानी करने आये और मर्यादापूर्वक भेंट चढाकर सत्यराम बोलते हुये दंडवत की और आचार्यजी को लाकर नियत स्थान में ठहराया, चातुर्मास आरंभ हो गया । 
.
समाप्ति पर जीवणदासजी ने आचार्यजी को मर्यादा के अनुसार भेंट तथा साधुओं को यथायोग्य वस्त्रादि देकर सस्नेह विदा किया । पाटण से विदा होकर आचार्य हरजीरामजी महाराज शिष्य संत मंडल के सहित मार्ग की धार्मिक  जनता को उपदेश देते हुये नारायणा दादूधाम में पधार गये ।
.
नीमेडा चातुर्मास ~ 
वि. सं. १९५४ में आचार्य हरजीरामजी महाराज को चातुर्मास का निमंत्रण नीमेडा के हरचरणजी ने दिया । आचार्यजी ने स्वीकार कर लिया । चातुर्मास का समय समीप आया तब आचार्यजी शिष्य संत मंडल के सहित नीमेडा पधारे । हरचरणजी ने आचार्यजी की अगवानी की और स्थान लाकर ठहराया चातुर्मास आरंभ हो गया । 
.
चातुर्मास के कार्यक्रम अच्छी प्रकार चलने लगे । अच्छा चातुर्मास हुआ । समाप्ति पर हरचरणजी ने मर्यादानुसार आचार्यजी को भेंट तथा शिष्य संत मंडल को यथायोग्य वस्त्रादि देकर सस्नेह विदा किया । नीमेडा से विदा होकर आचार्य हरजीरामजी महाराज शिष्य संत मंडल के सहित नारायणा दादूधाम में पधार गये ।
(क्रमशः)

 

*१९. साधु कौ अंग ४१/४४*

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
.
*१९. साधु कौ अंग ४१/४४*
.
सूधि माहिं बरतै सदा, और न जानहिं रंच । 
सुन्दर ऐसै संतजन, जिनि कै कछु न प्रपंच ॥४१॥
ऐसे सन्तजन, आठों पहर निरन्तर अपने निरञ्जन निराकार प्रभु की शोध(खोज) में लगे रहते हैं । उन को अन्य सांसारिक प्रपञ्च से कोई सम्बन्ध रखने की कोई इच्छा नहीं रहती । संसार से दूर रहने वाले ऐसे ही साधक वास्तविक 'सन्त' कहलाते हैं ॥४१॥
.
सदा रहै रत राम सौं, मन मैं कोउ न चाह । 
सुन्दर ऐसै संतजन, सबसौं बेपरवाह ॥४२॥
जो साधक निष्काम भाव से 'राम' नाम के चिन्तन में लगे रहते हैं । ऐसे सन्तजन ही संसार से निरपेक्ष व्यवहार करने में समर्थ होते हैं ॥४२॥
.
धोवत है संसार सब, गंगा मांहें पाप । 
सुन्दर संतनि के चरण, गंगा बंछै आप ॥४३॥
श्रीसुन्दरदासजी ऐसे सन्तों का गुणगान करते हुए कहते हैं - जब सांसारिक प्राणी, अपने पापों को धोने के लिये, गङ्गा में डुबकी(गोता) लगाते हैं; तब वही गङ्गा, उन पापों से मुक्ति हेतु, सन्तों के चरणस्पर्श की कामना करती रहती है१ ॥४३॥ (१ तु० करु मन उन संतन को सेवा..... जाके चरणकमल कूं वांछत, गंगा जमुना रेवा ॥ श्रीसुन्दरदासजी का पद)
.
ब्रह्मादिक इंद्रादि पुनि, सुन्दर बंछहिं देव । 
मनसा बाचा कर्मना, करि संतनि की सेव ॥४४॥
इतना ही नहीं; ब्रह्मा, इन्द्र आदि समर्थ देव भी मनसा वाचा कर्मणा उन सन्तों के चरणों की सेवा करने में निरन्तर स्पृहा करते रहते हैं ॥४४॥
(क्रमशः)

*भ्रमविध्वंश ॥*

🌷🙏 🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
.
*दादू नाम निमित रामहि भजै,*
*भक्ति निमित भजि सोइ ।*
*सेवा निमित सांई भजै, सदा सजीवन होइ ॥*
==============
*भ्रमविध्वंश ॥*
उघर्यौ जै चाहै तौ, तूँ राम भजन करि ।
हरि का चरण कवल हिरदै धरि ॥टेक॥
न करसी आन सेवा, सबै झूठ जाणी ।
रीत्याँ तलायाँ झूलै, तहाँ नहीं पाणी ॥
सी कै पहाड़ि पैठा, वोट कैसे राखै ।
धुँवरि धान न होई, ज्यूँ मेहा पाखै ॥
भेड़ कै पूछड़ै लागा, समदि कैसे तारै ।
बाण्याँ की बहु बापड़ी, चौर नैं क्यूँ मारै ॥
छाली के गलि गलथणाँ, दूध न होई ।
बषनां साध बिचारैगा कोई१ ॥४९॥
.
(१ मंगलदासजी महाराज की पुस्तक में इस पंक्ति का पाठ “बषनां यह बात साध, बिचारेगा कोई” है ।)
यदि तू मुक्त होना चाहता है तो रामजी का सतत् तैलधारावत् स्मरण आकर । स्मरण करते समय चित्त-वृत्ति-निरोधार्थ हरि के चरणकमलों को हृदय में स्थापित करके रख । निर्गुणी संतों का राम निराकार है । अतः वे किन चरणकमलों को अपने हृदय में स्थापित करें ?
.
वस्तुतः निर्गुणी संत जब इस प्रकार की बातें करते हैं तब उनका तात्पर्य शब्द स्वरूपी रामजी से होता है और शब्द स्वरूपी रामजी के अर्थ का चिंतन ही उनके रूप-स्वरूप, चरणकँवलों का चिंतन है । स्वामी रामचरणजी महाराज ने स्पष्ट कहा है –
“राखै सुरति सबद ही माँहीं । सबद छाँडि कहुँ अंत न जाँहीं ॥’ योगसूत्रकार का कथन इसकी पुष्टि करता है । तस्य वाचकः प्रणवः ॥२७॥ तज्जपस्तदर्थ भावनम् ॥२८॥” समाधिपाद ॥
.
अन्य समस्त देवी-देवताओं को झूठा जानकर उनकी सेवा-पूजा मत कर । उनकी पूजा करना ठीक वैसे ही व्यर्थ है जैसे बिना जल की ताल में तैरना व्यर्थ हो जाता है क्योंकि उसमें जल का लेश भी नहीं होता है ।
.
शीतकोट = ओस आदि के कारण दीख पड़ने वाले कोट-किले, पहाड़ अपनी छाया में कैसे किसी को रख सकते हैं जबकि वे स्वयं ही मिथ्या हैं क्योंकि जैसे ही सूर्य का उदय होता है, वैसे ही इन शीतकोट, पहाड़ादि का नाश हो जाता है ।
.
इसी प्रकार बिना मेघ-वर्षा के धुँवरि – ओस के कणों से अन्न उत्पन्न नहीं हो सकता । जिन लोगों ने तैरना न जानने वाली भेड़ रूपी माया का आश्रय ले रखा है वे कैसे संसार रूपी समुद्र का लंघन कर सकते हैं । निर्बल बणिकपुत्र की बेचारी स्त्री माया काम-क्रोध-लोभ-मोह एवं त्रिगुणों रूपी चोरों को कैसे मार सकती है ।
.
बकरी के गले के स्तनों से कभी भी दूध की प्राप्ति नहीं हो सकती क्योंकि उनमें दूध होता ही नहीं है । बषनां कहता है तो विचारवान साधु होता वही उक्त झूठे जंजालों को छोड़कर नित्य-सनातन-परब्रहम-परमात्मा का चिंतन-मनन करेगा ॥४९॥
(क्रमशः)

शुक्रवार, 13 फ़रवरी 2026

*४. गुरु-शिष्य निगुर्ण का अंग ~५/८*

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी* टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
.
*४. गुरु-शिष्य निगुर्ण का अंग ~५/८*
.
*रज्जब चेला चक्षु बिन, गुरु मिल्या जाचंध१ ।*
*कूप मयी यहु कुंभिनी२, क्यों पावें प्रभु पंध३ ॥५॥*
जैसे कोई नेत्रहीन मनुष्य आवाज देकर के कहे - कोई मुझे अमुक ग्राम पहुँचा दे तो उसे अमुक पुरस्कार दूंगा । उसे कोई जन्मांध१ कहे - चल मैं पहँचा दूंगा, तो वे दोंनों मार्ग छूट जाने से कूप में ही पड़ेंगे । वैसे ही ज्ञानहीन स्वार्थी शिष्य-गुरु मिल जाते हैं तब उनके लिये यह संपूर्ण पृथ्वी२ ही कूप रूप है अर्थात वे दोनों संसार कूप में ही पड़ते हैं, परब्रह्म प्राप्ति का मार्ग३ उन्हें नहीं मिलता ।
.
*गुरु के अंग१ हुं गुरु नहीं, शिष्य न ले ही सीख ।*
*रज्जब सौदा ना बण्याँ, पेट भरहु कर भीख ॥६॥*
गुरु के लक्षण१ गुरु में नहीं है और शिष्य भी शिक्षा धारण नहीं करता, तब परब्रह्म प्राप्ति रूप व्यापार तो बनता नहीं, केवल भिक्षा करके पेट भरने का मार्ग खुल जाता है ।
.
*रज्जब राम न रहम कर, अक्षर लिखे न भाल ।*
*ताथें सद्गुरु ना मिल्या, गुरु शिष रहे कंगाल ॥७॥*
राम के दया न करने से विधाता ने मुक्ति प्राप्ति के अंक ललाट में नहीं लिखे अर्थात गुरु प्राप्त होने का प्रारब्ध नहीं बना, इसी से सद्गुरु नहीं मिले । सद्गुरु के अभाव से गुरु और शिष्य दोनों ही आत्म ज्ञान न होने से सांसारिक आशाओं द्वारा कंगाल ही रहे ।
.
*गुरु घर धन ह्वै पाइये, शिष्य सुलक्षण ले हि ।*
*उभय अभागी एकठे, कहा लेय कहा देहि ॥८॥*
गुरु के अन्त:करण रूप घर में ज्ञान-धन हो तो शिष्य को प्राप्त हो और शिष्य भी शिष्यपने के सुन्दर लक्षणों से युक्त हो तो ज्ञान-धन ले सके किन्तु जब दोनों ही भाग्यहीन मिल जायँ तब गुरु क्या दे और शिष्य क्या ले ।
(क्रमशः)  

गुरुवार, 12 फ़रवरी 2026

रघुनाथदासजी के चातुर्मास ~

*#daduji*
*॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥*
*॥ दादूराम~सत्यराम ॥*
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
.
१५ आचार्य हरजीराम जी ~ 
.
रघुनाथदासजी के चातुर्मास ~  
वि. सं. १९५१ के चातुर्मास का निमंत्रण आचार्य हरजीरामजी महाराज को रघुनाथदासजी बग्गड(शेखावटी) वालों ने दिया था । आचार्य हरजीरामजी ने स्वीकार कर लिया । चातुर्मास का समय समीप आने पर आचार्यजी अपने शिष्य संत मंडल के सहित मार्ग के स्थानधारी साधुओं का तथा सेवकों का आतिथ्य ग्रहण करते हुये बग्गड पहुँच गये । 
.
रघुनाथजी ने भक्त मंडल के सहित संकीर्तन करते हुये आकर आचार्यजी की अगवानी की तथा मर्यादापूर्वक  संकीर्तन करते हुये ग्राम में लाकर नियत स्थान पर ठहराया । चातुर्मास के कार्यक्रम आरंभ हो गये । सत्संग अच्छा होता रहा । चातुर्मास अच्छा हुआ । समाप्ति पर रघुनाथदासजी ने मर्यादानुसार आचार्यजी को भेंट दी तथा शिष्य संत मंडल को यथायोग्य वस्त्रादि दिये और सस्नेह विदा कर दिये । आचार्य हरजीरामजी महाराज बग्गड से विदा होकर भ्रमण करते हुये नारायणा दादूधाम में पधार गये ।
.
अलवर गमन ~ 
वि. सं. १९५२ में अलवर नरेश के निमंत्रण पर अलवर पधारे । अलवर नरेश ने अति श्रद्धा भाव से राजकीय लवाजमा तथा भक्त मंडल के सहित संकीर्तन करते हुये जाकर आचार्य हरजीरामजी की अगवानी की और अपनी मर्यादा के अनुसार भेंट चढाकर प्रणाम किया  
.
आचार्यजी को हाथी पर बैठाकर बाज गाजे से संकीर्तन करते हुये नगर के मुख्य बाजार से ले जाकर नियत स्थान पर ठहराया । सेवा का प्रबन्ध सुचारु रुप से कर दिया । फिर सत्संग आरंभ हो गया । जितने दिन आचार्यजी अलवर में रहे, उतने दिन राजा, राज परिवार और प्रजा ने मर्यादा पूर्वक भेंट देकर सस्नेह विदा किया । 
मारवाड की रामत ~ 
अलवर से विदा होकर शनै: शनै: आचार्य हरजीरामजी भ्रमण करते हुये मारवाड में पधारे । मारवाड के सरदारों ने व स्थानधारी साधुओं ने तथा सेवकों ने आपका अति आदर सम्मान किया । धार्मिक जनता ने प्रवचनों से लाभ उठाया । जिज्ञासु जनों ने अपनी शंकाओं के समाधान कराके आनन्द प्राप्त किया । 
.
आचार्यजी के प्रवचनों से भक्तों में अति निष्ठा हुई । विरक्तों का वैराग्य दॄढ हुआ । विक्षिप्त हृदय मानवों के हृदयों को आचार्य हरजीरामजी के  दर्शन तथा सत्संग से शांति प्राप्त हुई । आचार्य हरजीरामजी महाराज की मारवाड की रामत मारवाड धार्मिक जनता के लिये वर रुप सिद्ध हुई । उक्त प्रकार मारवाड की रामत करके आचार्यजी नारायणा दादूधाम में पधार गये ।
(क्रमशः)  

*१९. साधु कौ अंग ३७/४०*

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
.
*१९. साधु कौ अंग ३७/४०*
.
क्षमावंत धीरज लिये, सत्य दया संतोष । 
सुन्दर ऐसै संतजन, निर्भय निर्गत रोष ॥३७॥
महाराज श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - ऐसे सन्तजन सभी के प्रति क्षमाशील, धैर्यवान् रहते हुए सत्यमय, सन्तोषमय एवं दयामय व्यवहार करते हुए संसार में सर्वत्र निर्भय एवं द्वेषरहित होकर विचरण करते हैं ॥३७॥
.
द्वंद कछू ब्यापै नहीं, सुख दुख एक समान । 
सुन्दर ऐसै संतजन, ह्रदै प्रगट दृढ ज्ञान ॥३८॥
संसार में विचरण करते हुए ऐसे सन्त जनों को सुख दुःख, मान अपमान या जय पराजय आदि का द्वन्द्व कभी विचलित नहीं करता । ऐसे सन्त जन तो साक्षात्कृत निरञ्जन निराकार प्रभु के मनन एवं चिन्तन में ही निरन्तर दृढतया मग्न रहते हैं ॥३८॥
.
घर बन दोऊ सारिखें, सबतें रहत उदास । 
सुन्दर संतनि कै नहीं, जिवन मरन की आस ॥३९॥
ऐसे सन्त जन घर(समाज) या वन(एकान्त) में रहते हुए भी वहाँ कोई आसक्ति नहीं रखते । वे सब के प्रति उदास(उपेक्षा) भाव रखते हुए ही सर्वत्र विचरण करते हैं; क्योंकि उनको अपने जीवन मरण के प्रति भी कोई व्यामोह नहीं रह गया है ॥३९॥
.
रिद्धि सिद्धि की कामना, कबहूं उपजै नांहिं । 
सुन्दर ऐसै संतजन, मुक्त सदा जग मांहिं ॥४०॥
इन सन्तों के हृदय में, सांसारिक व्यवहार चलाने के लिये, किसी प्रकार को ऋद्धि सिद्धि की कामना भी जाग्रत् नहीं होती । संसार में ऐसे ही सन्तजन सदा जीवन्मुक्त रहते हुए विचरण करते हैं ॥४०॥
(क्रमशः)  

राम नाम सुमिरि बारंबार

🌷🙏 🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
.
*दादू नाम निमित रामहि भजै,*
*भक्ति निमित भजि सोइ ।*
*सेवा निमित सांई भजै, सदा सजीवन होइ ॥*
==============
नाम स्मरण ॥
मन मति बीसरै रे, राम नाम सुमिरि बारंबार ।
संसार सागर भजन भेरी, लंघि पैली पार ॥टेक॥
साध बोलै साखि सुणि रे, सब्द कीजै कानि ।
थोघी देखी थाह नाहीं, डूबसे निरवानि ॥
चित चितारि एक सोई, और कोई नाहिं ।
राज संपति विभौ माया, सर्व मेल्ह्या जाहिं ॥
जिहि कारणैं मति मरै मूरिख, जतन करताँ जाइ ।
बिचारि बषनां बिनसि जासी, अरथि ऐकै लाइ ॥४८॥
.
हे मन ! राम-नाम का विस्मरण मत कर । इसका स्मरण बारंबार तैलधारावत् अहर्निश कर । संसार रूपी सागर को दूसरे किनारे तक पार करने के लिये यह भजन ही नाव है । साधु-सद्गुरु द्वारा दिये जाने वाले अपरोक्षज्ञान समन्वित उपदेश को सुन और उसको कानों में से निकाल मत । कानों में ही सुरक्षित करले जिससे कि वह उपदेश तुझे सतत् सावधान करता रहे । इस संसार रूपी सागर की गहराई को थोघि = सीमा देखने के साधन रस्सी, लठ्ठी आदि से देख ।
.
वस्तुतः यह अथाह-निस्सीम है, बिना भगवद्भजन के इसमें निश्चय ही तू डूब जायेगा । चित्त में चिंतन-मनन कर । संसार में एक परमात्मा ही अपना है, वही प्रापणीय है और कोई दूसरा नहीं । उस परमात्मा से व्यतिरिक्त राज, सम्पत्ति, वैभव, धन आदि यहीं रह जाने वाले हैं; इनमें से एक भी साथ चलने वाला नहीं है ।
.
हे मूर्ख ! ऐसा यत्न करता हुआ चल जिसके करने से तेरा पुनः मरना न हो सके । तू अमर हो जाये । बषनां कहता है, विचार कर, जिनको प्राप्त करने में तू प्रपंच रत है वे सभी समय पाकर समाप्त हो जायेंगे । अतः तू अपनी चित्तवृत्ति को एक परमात्मा में ही लगाकर चिंतन-मनन कर ॥४८॥
(क्रमशः)

*४. गुरु-शिष्य निगुर्ण का अंग ~१/४*


🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी* टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
.
*४. गुरु-शिष्य निगुर्ण का अंग ~१/४*
.
गुरुदेव के अंग के अनन्तर अयोग्य गुरु और अयोग्य शिष्यों का परिचय देने के लिये गुरु-शिष्य निर्गुण का अंग कह रहे हैं -
*गुरु शिष भूखे मिले अभागी, दीक्षा नहिं मानहु दौ१ लागी ।*
*संतोष नीर नाहीं सो नीरा२, तृष्णा अग्नि बुझावे बीरा३ ॥१॥*
गुरु प्रतिष्ठा का भूखा और शिष्य विषयों का भूखा दोनों भाग्यहीन मिल जाते हैं तब गुरु द्वारा शिष्य को जो दीक्षा मिलती है सो दीक्षा न होकर मानो दावाग्नि१ लगा है, ऐसा ज्ञात होता है । जैसे समीप जल२ न हो तो वन३ का अग्नि नहीं बुझता वैसे ही इनके मन के समीप संतोष न होने से इनकी उक्त तृष्णा नष्ट नहीं होती, सदा तृष्णा से जलते ही रहते हैं ।
.
*भूखे गुरु शिष यूं मिलैं, ज्यों वैशाखे बँस डार ।*
*जन रज्जब बोलत घसत, दोऊ जर बर छार ॥२॥*
तृष्णा रूप भूख से युक्त गुरु शिष्यों का मिलन वैशाख मास में बाँस की डालों के घिसने के समान होता है । बैशाख में बाँस की डालें वायु के वेग से घिसती हैं तब अग्नि प्रगट होकर बाँस जल जाते हैं, वैसे ही गुरु शिष्य अपनी आपस की बोल-चाल द्वारा क्रोधाग्नि प्रगट होने से जल जल कर मरते हैं ।
.
*चेला चकमक गुरु गति गार१, गोष्टी४ ठणका२ अग्नि अपार ।*
*मिलत महातम३ जलन सुहोय, ऐसे दैई५ न मेली दोय ॥३॥*
चकमक का आघात२ पत्थर१ पर लगता है तब किंचित अग्नि निकल कर बहुत हो जाता है, सूत्र, पट, काष्ठादि को जलाता है । यह चकमक और पत्थर के मिलन का ही महात्म्य३ है । वैसे ही शिष्य और गुरु की बातों४ से क्रोधाग्नि चमक आता है और दोनों के हृदयों को जलाता है, यही उनसे मिलन का माहात्म्य है । ईश्वर५ ऐसे गुरु-शिष्य न मिलावे ।
.
*सद्गुरु सीझ्या पोरसा, शिष शाखों शिर भाग ।*
*रज्जब पूरे पीर बिन, ठाहर उभय अभाग ॥४॥*
सद्गुरु पने को सिध्द पौरषा(सिद्धि युक्त सुवर्ण के पुतले) के समान बताते हुये शिष्य-प्रशिष्यादि शाखाओं का भार शिर पर खड़ा करता है और कहता है - तुम्हारे अच्छे भाग्य थे तभी तो मेरे शिष्य हो सके हो, भाग्य बिना हमारे समान गुरु कहाँ मिलते हैं । शिष्य भी उन कपटी गुरुओं की कपटपूर्ण बातों से उन पर मुग्ध होते हुये तथा गुरु की प्रशंसा के पुल बाँधते हुये संसार के सरल प्राणी को धोखा देते हैं जब तक पूर्ण-अवस्था को प्राप्त सिद्ध गुरु प्राप्त नहीं होते तब तक उक्त प्रकार के गुरु और शिष्य दोनों ही के हृदय स्थान में उक्त प्रकार का दंभ रहता है और यह उनके भाग्यहीनता का चिन्ह है ।
(क्रमशः) 

बुधवार, 11 फ़रवरी 2026

जीन्द नरेश द्वारा सत्कार ~

*#daduji*
*॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥*
*॥ दादूराम~सत्यराम ॥*
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
.
१५ आचार्य हरजीराम जी ~ 
.
जीन्द नरेश द्वारा सत्कार ~ 
जीन्द राज्य की राजधानी संगरुर के पास जाकर आचार्यजी ने अपने आने की सूचना दी । तब जीन्द नरेश रणवीरसिंहजी अपने राजकीय ठाट बाट से आचार्य हरजीरामजी की अगवानी करने आये । मर्यादा पूर्वक भेंट चढाकर प्रणामादि शिष्टाचार के पश्‍चात् बाजे गाजे से संकीर्तन करते हुये भक्त मंडल के साथ आचार्यजी को नगर में लाये 
.
और नगर के मुख्य बाजार से नियत स्थान पर ले गये । वहाँ प्रसाद बाँटकर शोभायात्रा समाप्त कर दी । सत्संग भी होने लगा । संगरुर की जनता ने सत्संग में अच्छा भाग लिया । राजा रणवीरसिंहजी ने आचार्य हरजीरामजी का बहुत सत्कार किया । कुछ दिन वहाँ ठहर कर जाने लगे तब राजा प्रजा सभी ने सस्नेह भेंट देकर आचार्यजी को विदा किया ।
.
फरीदकोट पधारना ~  
संगरुर से विदा होकर आचार्य हरजीरामजी फरीदकोट के राजा विक्रमसिंहजी के निमंत्रण पर फरीदकोट पधारे । तब फरीदकोट के नरेश विक्रमसिंहजी ने आचार्यजी की सम्मान सहित अगवानी करके अति सत्कार पूर्वक आचार्यजी को ठहराया और अच्छी सेवा की । 
.
फिर वहाँ से जाने लगे तब राजा विक्रमसिंहजी तथा फरीदकोट की जनता ने आपको भेंट देकर अति सत्कार सहित विदा किया । उक्त प्रकार भ्रमण करके  आचार्य हरजीरामजी महाराज शनै: शनै: नारायणा दादूधाम की ओर चले और कुछ समय में नारायणा दादूधाम में पधार गये ।
.  
बुरहानपुर पधारना ~ 
वि. सं. १९५१ में बुरहानपुर के सेवकों के आग्रह से आचार्य हरजीरामजी महाराज शिष्य संत मंडल के सहित बुरहानपुर पधारे । बुरहानपुर के सेवकों ने बाजे गाजे से संकीर्तन करते हुये आकर आचार्यजी की अगवानी की  । मर्यादापूर्वक  भेंट प्रणाम सत्यराम आदि शिष्टाचार के पश्‍चात् बाजे गाजे से संकीर्तन करते हुये नगर में लाकर अच्छे स्थान पर ठहराया । 
.
सेवा का सुन्दर प्रबन्ध कर दिया । सत्संग होने लगा । बुरहानपुर में आचार्यजी के सेवक तथा अन्य धार्मिक  जनता दादूवाणी के प्रवचनों से अति प्रभावित हुई । उन्हें प्रवचन श्रवण करने के समय परम सुख व परम शांति का अनुभव होता था । एक दिन एक सेवक के बच्चे का पेट बहुत दुखा था । आचार्यजी ने उसे दादूवाणी के आले का कौणा जल में डुबोकर दिया उससे दर्द मिट गया था । 
.
बुरहानपुर में अच्छा सत्संग हुआ । कुछ दिन वहाँ ठहरकर आचार्यजी जब नारायणा दादूधाम के लिये प्रस्थान करने लगे तब वहां के सेवकों ने मर्यादानुसार भेंट देकर सस्नेह विदा किया । वहाँ से विदा होकर आचार्य हरजीरामजी महाराज नारायणा दादूधाम में पधार गये ।  
(क्रमशः) 

*१९. साधु कौ अंग ३३/३६*

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
.
*१९. साधु कौ अंग ३३/३६*
.
कोइ आइ स्तुती करै, कोइ निंदा करि जाइ । 
सुन्दर साधु सदा रहै, सबही सौं सम भाइ ॥३३॥
कभी कोई सांसारिक पुरुष उस साधक के सम्मुख आकर उस की प्रशंसा(स्तुति) करता है, तो कभी दूसरा आकर उस का अपमान या निन्दा करता है; परन्तु वह साधक सन्त इन दोनों के प्रति साधुभाव रखता हुआ उनसे सदा सद्व्यवहार ही करता है ॥३३॥
.
कोऊ तौ मूरख कहै, कोऊ चतुर सुजांन । 
सुन्दर साधु धरै नहीं, भली बुरी कछु कांन ॥३४॥
ऐसे साधक के पास आने वाला कोई पुरुष उस की निन्दा करता हुआ उसे 'मूर्ख' कहता है, तथा कोई उसकी प्रशंसा करता हुआ उसको 'चतुर'(कुशल) कहता है । परन्तु वह(साधक) इन निन्दा स्तुति के वाक्यों से निरपेक्ष(उदास) रहता हुआ सबसे समान प्रेमपूर्ण व्यवहार ही करता है ॥३४॥
.
कबहू पंचामृत भखै, कबहूं भाजी साग । 
सुन्दर संतनि कै नहीं; कोऊ राग बिराग ॥३५॥
ऐसे साधक को कभी भिक्षा में दूध, दही, घी, शक्कर, मधु आदि(पञ्चामृत) मिल जाता है; कभी उसे साक भाजी से ही पेट भरना पड़ता है; परन्तु उस साधक सन्त को इन दोनों ही स्थितियों से कोई राग(आसक्ति) या विराग(ग्लानि) नहीं होता ॥३५॥
.
सुखदाई सीतल हृदैय, देखत सीतल नैंन । 
सुन्दर ऐसै संतजन, बोलत अमृत बैंन ॥३६॥
ऐसे पहुँचे हुए सन्त जनों का हृदय सब के प्रति सदा शीतल(शान्तिमय) एवं सुखमय रहता है तथा उन की दृष्टि भी सब के प्रति सदा स्नेहमय ही रहती है । वे सदा सब से मधुर वचनों से ही संवाद करते हैं ॥३६॥
(क्रमशः) 

नाममहिमा ॥

🌷🙏 🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
.
*साहिब जी के नांव में, सब कुछ भरे भंडार ।*
*नूर तेज अनन्त है, दादू सिरजनहार ॥*
==============
नाममहिमा ॥
भाई भूख मुवाँ गति नाहीं ।
ताथैं समझि देखि मन माहीं ॥टेक॥
आगै साध सबै ही हूवा, भूखाँ कोई न मूवा ।
जिनि पाया तिन सहजैं पाया, राम रूप सब हूवा ॥
धू प्रहलाद कबीर नामदे, पाखँड कोइ न राख्या ।
बैठि इकंत नाऊँ निज लिया, बेद भागौत यौं भाख्या ॥
देव देहुरा सहबी माया, याँह मैं राम न पाया ।
भरमि भरमि सबही जग मूवा, यौंही जनम गँवाया ॥
जा जन कौं गुर पूरा मिलिया, अलख अभेव बताया ।
गुर दादू तैं बषनां तिरिया, बहुड़ि न संकुटि आया ॥४७॥
अशास्त्रविहितः घोरं तप्यंते ये तपो जनाः ।
दम्भाहंकारसंयुक्ताः कामराग बलान्विताः ॥५॥
कर्शयन्तः शरीरस्थं भूतग्राममचेतसः ।
मां चैवान्तः शरीरस्थं तान्विद्ध्यासुरनिश्चयान् ॥गीता १७॥”
.
बषनांजी उन लोगों को सावधान करते हुए कहते हैं, जो शरीर को नाना क्लेश देकर तपस्यादि करते हैं । वे कहते हैं, भाई ! भूखे मरने से मोक्ष की प्राप्ति नहीं होती । अतः इस तथ्य को अच्छी तरह जानकर हृदय में भली भाँति स्थापित कर लो ।
.
आज से पूर्व जितने भी साधक संत हुए हैं, वे भगवत्प्राप्त्यर्थ कोई भी भूखे नहीं मरे थे । वस्तुतः जिन्हें भी भगवत्प्राप्ति हुई है उन सभी को रामजी की प्राप्ति राम-नाम का सहज में स्मरण करने से ही हुई हैं और वे सभी रामरूप हो गये हैं, उनका रामजी से तादात्म्य हो गया है ।
.
ध्रुव, प्रह्लाद, कबीर, नामदेव आदि किसी ने भी उक्त किसी भी पराक्र के पाखंड = झूठे साधनों का आश्रय नहीं लिया था । उन्होंने तो एकान्त = विषयभोगों से अनासक्त होकर अनन्यभावेन निजनाम राम का ही स्मरण किया था इसकी साक्षी वेद, भागवत तथा भक्तमालादि ग्रंथों में मिलती है । देव और देवों की पूजास्थली सभी माया = भ्रम = असत्य हैं । उनमें रामजी की प्राप्ति नहीं होती ।
.
जगत् के अज्ञानी जीव इन मायामय मंदिरवासी देवताओं की सेवा-पूजा रूप भ्रमों में ही भ्रमित हुए देवदुर्लभ मनुष्यजन्म को व्यर्थ ही बर्बाद करके मर जाते हैं । जीव भक्तों को अलेख-अभेव पूर्णब्रह्म परमात्मा को बताने वाले गुरु दादू जैसे सद्गुरु मिल जाते हैं वे इस संसार से तिर जाते हैं, वे पुनः जन्म-मरण के चक्र में नहीं पड़ते ॥४७॥
(क्रमशः)

*३. श्री गुरुदेव का अंग ~१६९/१७१*

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी* टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
.
*३. श्री गुरुदेव का अंग ~१६९/१७१*
.
*रज्जब कागज पूजिये, वेद वचन बिच आथि१ ।*
*तो गुरु को किन२ पूजिये, जाके गोविन्द साथि ॥१६९॥*
१६९ में गुरु की पूजा करने की प्रेरणा कर रहे हैं - वेद-वचन रूप पूंजी१ जिन कागजों में होती है, वे कागज भी पूजे जाते हैं, तब जिनके साथ भगवान हैं उन गुरुदेव की पूजा क्यों न२ की जाय ? गुरु की पूजा अवश्य करनी चाहिये ।
.
*जड़ मूरति उर नाम बिन, तापर मंगलाचार ।*
*तो रज्जब कर आरती, गुरु पर बारंबार ॥१७०॥*
१७० में गुरु की आरती बारम्बार करने की प्रेरणा कर रहे हैं - जो पत्थर, काष्ठ, मिट्टी, सुवर्ण आदि धातुओं की बनी जड़ मूर्ति जिसके हृदय में हरि नाम भी नहीं होता, उसके लिये मंगल कार्य करते हुए उसकी आरती करते हैं, तब चेतन और हरि नाम चिन्तन युक्त हृदय वाले गुरुदेव की आरती तो बारम्बार करनी चाहिये ।
.
*शिला सँवारी राज नें, ताहि नवै सब कोय ।*
*रज्जब शिष सद्गुरु गड़े, सो पूजा किन होय ॥१७१॥*
१७१ में गुरुदेव की पूजा करने की प्रेरणा कर रहे हैं - राज जब साधारण शिला की मूर्ति बना देता है तब सब उसको प्रणाम करते हुये उसकी पूजा करते हैं, फिर सद्गुरु तो अपने उपदेश द्वारा शिष्यों को ठीक करके परमात्मा से मिला देते हैं, वे पूजा के पात्र क्यों न होंगे ? सद्गुरु की पूजा अवश्य करनी चाहिये ।
इति श्री रज्जब गिरार्थ प्रकाशिका सहित “३. गुरुदेव का अंग” समाप्त ॥
(क्रमशः) 

मन रे चरणाँ ही चित राखि

🌷🙏 🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
🌷🙏 *#बखनांवाणी* 🙏🌷
*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Ram Gopal Das*
.
*सपने सब कुछ देखिये, जागे तो कुछ नांहि ।*
*ऐसा यहु संसार है, समझ देखि मन माँहि ॥*
================
राग आसावरी ॥३॥उपदेश॥
मन रे चरणाँ ही चित राखि ।
पूजि परमानंद प्राणी, दूरि दुरमति नाखि ॥टेक॥
कलि कठिन उपाव को करि, नाऊँ लै निरबाहि ।
भजन करि नर भूलि जिनि जै, सबल सरणैं साहि ॥
समझि सोचि बिचारि जिय मैं, सुरति करि जिव जागि ।
लुबधि लालच लोभ तजि करि, पलटि चरणौं लागि ॥
आन सौं मति मोह बाँधै, भरमसी भरपूरि ।
काल पासी जीव जासी, राम रहसी दूरि ॥
हरि सुमिरि दुख हरण हिरदै, तरण तारण सोइ ।
बरणि बषनां नाऊँ निज तत, और नाहीं कोइ ॥४६॥
.
मन = अंतःकरण की उपाधि वाले हे जीव ! अपनी चित्तवृत्ति को स्वात्मतत्त्व-चिंतन में ही लगाकर रख । हे प्राणी ! परमानन्द स्वरूप स्वात्मतत्त्व का बोध प्राप्त करने का प्रयत्न कर और दुर्मति = अविवेक को दूर कर डाल । कलिकाल अति कठिन समय है । इस कठिन समय में स्वात्मतत्त्व का बोध प्राप्त करने का कोई न कोई उपाय कर ।
.
मेरी सम्मति में भगवन्नामजप करते हुए जीवन का निर्वाह करना सर्वोत्तम उपाय है । अतः हे मनुष्य ! भगवद्भजन कर । इसको किसी भी स्थिति में, किसी भी काल में और किसी भी देश में मत भूल और सर्वशक्तिशाली, परमैश्वर्यवान परब्रह्मपरमात्मा की शरण का आश्रय ले । मेरी सलाह को सुनकर उसे भलीप्रकार समझने का प्रयत्न कर ।
.
समझने पर सोच = चिंतन कर, विचार = मनन कर, बार-बार स्मरण कर और हृदय में उतार ले । लुबधि = आसक्ति, लालच और लोभ का सर्वथा परित्याग कर दे और संसार में संलग्न चित्त के प्रवाह को संसार से उलटाकर परमात्माभिमुख कर ले । परमात्म-तत्वातिरिक्त अन्य किसी से भी राग मत कर, मोह मत बाँध, अन्यथा तू जन्म-जन्मान्तरों तक भ्रमता ही फिरेगा ।
.
क्योंकि तेरे से मुक्ति प्रदान करने वाला राम तो दूर ही रह जायगा और अन्त समय में तेरा जीव काल द्वारा फाँसी में बांधकर शुभाशुभ कर्म-फल भुगताने को ले जाया जायेगा । अशेष दुःखों को हरण करने वाले हरि का स्मरण कर क्योंकि वह इस दुस्तर संसार-सागर से तारने वाला है । भगवन्नाम रूपी निजतत्त्व का ही वरण क्योंकि वरण करने योग्य और दूसरा कुछ है ही नहीं ॥४६॥
(क्रमशः)

उतराध की रामत ~

*#daduji*
*॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥*
*॥ दादूराम~सत्यराम ॥*
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
.
१५ आचार्य हरजीराम जी ~ 
.
उतराध की रामत ~ 
चान्दसीन चातुर्मास करके उतराधे संतों के आग्रह से आचार्य हरजीरामजी महाराज शिष्य संत मंडल के सहित उतराध की रामत करने पधारे । उतराध के स्थानधारी संतों तथा सेवकों का आतिथ्य ग्रहण करते हुये तथा दादूवाणी का उपदेश करते हुये उतराध में भ्रमण करने लगे । 
.
फिर शनै: शनै: पटियाला के पास पहुँचे तब अपनी मर्यादा के अनुसार अपने आने की सूचना पटियाला नरेश को दी । सूचना मिलने पर पटियाला नरेश राजेन्द्रसिंहजी राजकीय लवाजमा लेकर आचार्य हरजीरामजी महाराज की अगवानी करने बडे ठाट बाट से आये ।  
.
पटियाला सत्संग ~ 
पटियाला नरेश राजेन्द्रसिंहजी ने आचार्य हरजीरामजी महाराज के पास जाकर भेंट चढाकर, प्रणाम की और सामने बैठ गये और आवश्यक  प्रश्‍नोत्तर हो जाने के पश्‍चात् आचार्यजी को अति सत्कार से लेकर बाजे गाजे के साथ संकीर्तन करते हुये नगर में प्रवेश किया और नगर के मुख्य बाजार से जनता को आचार्यजी तथा संत मंडल का दर्शन कराते हुये नियत स्थान पर ले जाकर ठहराया । 
.
प्रसाद बांट कर शोभा यात्रा समाप्त की । फिर पटियाला में सत्संग आरंभ हो गया । प्रात: दादूवाणी की कथा, मध्यदिन में विद्वान् संतों के भाषण होने लगे । पटियाला की जनता ने सत्संग में बहुत रुचि दिखाई । ठीक  समय पर आकर कथा श्रवण करते थे और मर्मवेधी प्रवचनों को सुनकर अपने मन को भगवदाकार बनाने में परिश्रम करते थे । जिज्ञासु अपनी शंकाओं का समाधान होने से अत्यन्त हर्षित होते थे ।
गायक  संतों द्वारा उच्चकोटि के संतों के पदों को सुनकर अति प्रभावित होते थे । पटियाला नरेश राजेन्द्रसिंहजी तथा राज परिवार के सत्संगी भी दादूवाणी की ज्ञान गरिमा से बहुत प्रभावित होते थे । उक्त प्रकार कुछ समय तक पटियाला में अच्छा सत्संग चला और आचार्यजी वहां से जाने लगे तब राजा राजेन्द्रसिंहजी ने तथा नगर के सत्संगी वर्ग ने आचार्यजी को अति सम्मान के साथ भेंट देकर सस्नेह विदा किया । 
नाभा गमन ~ 
पटियाला से विदा होकर आचार्य हरजीरामजी महाराज नाभा नरेश हीरासिंहजी के निमंत्रण पर नाभा पधारे । आचार्य हरजीसिंहजी ने अपने आने की सूचना नाभा नरेश को दी । तब नाभा नरेश हीरासिंहजी राजकीय लवाजमा तथा भक्त मंडल के सहित संकीर्तन करते हुये आचार्य हरजीरामजी महाराज की अगवानी करने आये । 
.
मर्यादा के अनुसार भेंट चढाकर प्रणाम की और आवश्यक  प्रश्‍नोत्तर के पश्‍चात् बाजे गाजे से संकीर्तन करते हुये नगर में ले गये और नियत स्थान पर ले जाकर ठहराया । सत्संग आरंभ हुआ । यहाँ की धार्मिक जनता ने भी सत्संग में अच्छी रुचि दिखाई । कुछ दिन नाभा में ठहरे फिर जाने लगे तब नाभा नरेश हीरासिंहजी तथा धार्मिक जनता ने आचार्य हरजीरामजी को मर्यादा पूर्वक भेंट देकर सस्नेह विदा किया । नाभा से ही विदा होकर आचार्य जीन्द नरेश रणवीरसिंहजी के निमंत्रण पर उनके यहाँ पधारे ।  
(क्रमशः) 

*१९. साधु कौ अंग २९/३२*

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
.
*१९. साधु कौ अंग २९/३२*
.
काम कोध जिनि कै नहीं, लोभ मोह पुनि नांहिं । 
सुन्दर ऐसै संतजन, दुर्लभ या जगु मांहिं ॥२९॥
जिस उत्तम साधक के हृदय में किसी भी प्रकार के काम क्रोध आदि विकार नहीं है, तथा किसी भी प्रकार के लोभ या मोह से भी वह दूर रहता है ऐसा साधक ही 'सन्त' कहलाता है । ऐसा सन्त इस संसार में बहुत दुर्लभ माना जाता है ॥२९॥
.
मद मत्सर अहंकार की, दीन्ही ठौर उठाइ । 
सुन्दर ऐसै संतजन, ग्रंथनि कहे सुनाइ ॥३०॥
जिस साधक ने अपने चित्त को मद(स्वकीय शारीरिक रूप आदि का वृथाभिमान) एवं मत्सर(दूसरों से ईर्ष्या) से सर्वथा दूर कर लिया है ऐसे सन्त जनों की ही वेद पुराण आदि सच्छास्त्रों में प्रशंसा की गयी है ॥३०॥
.
पाप पुन्य दोऊ परै, स्वर्ग नरक तें दूरि । 
सुन्दर ऐसै संतजन, हरि कैं सदा हजूरि ॥३१॥
जो पाप एवं पुण्य की वासनाओं से सदा दूर रहता है, एवं स्वर्ग एवं नरक कामनाओं से भी दूर रहता है; महाराज श्रीसुन्दरदासजी कहते है - ऐसे सन्तजन ही हरिभक्ति में निरन्तर लगे रहने में(तत्पर रहने में) समर्थ होते हैं ॥३१॥
.
आये हर्ष न ऊपजै, गयें शोक नहिं होइ । 
सुन्दर एसै संतजन, कोटिनु मध्ये कोइ ॥३२॥ 
जिस साधक को किसी सांसारिक वस्तु की प्राप्ति पर कोई हर्ष नहीं होता, या उसके नष्ट होने पर कोई कष्ट नहीं होता; श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - ऐसा साधक सन्त करोड़ों साधकों में कोई एक होता है१ ॥३२॥ 
{१ तु० भगवद्‌गीता – यो न ह्रष्यति न द्वेष्टि न शोचति न कांक्षति । (१२/१७)}
(क्रमशः)