
🌷🙏 🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*ब्रह्म सरीखा होइ कर, माया सौं खेलै ।*
*दादू दिन दिन देखतां, अपने गुण मेलै ॥*
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*उपदेश-चेतावनी ॥*
सीख गुराँ की मानौं रे, क्यूँही सीख बडाँ की मानौं ।
साधाँ त्यागि छिया करि छाडी, तिहि थैं दीजै कानौं ॥टेक॥
कर दीपक ले कूप पड़ीजै, एक बड़ौ हैरानौं ।
पैसि पतालि बुरौ जे कीजै, पाछैं होइ न छानौं ॥
कान खुजालै नीचौ न्हालै, पाड़ौसणि दे तानौं ।
थारा किया किरत कौ कागद, जम लिखि लीयौ पानौं ॥
बिषै बिकार माँहैं अपराधी, आठौं पहर दिवानौं ।
लजमारा लाजाँ काँइ मारै, परमेसुर कौ बानौं ॥
जाकी बिरति रु ब्रह्म कहावै, खोटौ देखि जमानौं ।
सिष साषाँ सुधौ बिषै कीनै मैं, बहि जासी गैबानौं ॥
जत अर सत दीयौं परमेसर, लिखि ल्यायौ परवानौं ।
बषनौं कहै भला ते दीसै, सुमिरण मैं सावधानौं ॥५०॥
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गुरुमहाराज के उपदेशों को मानौं = सुनकर आचरण में आचरित करो । जो आयुवृद्ध तथा ज्ञानवृद्ध हैं उनकी अनुभवयुक्त शिक्षा को कैसे भी करके मानो । (यहाँ क्यूँही = कैसे भी करके का आशय “भाव कुभाव अनख आलसहूँ । नाम जपत मंगल दिस दसहूँ ॥” से है । भाव-कुभाव ही आगे चलकर भाव = श्रद्धा-भक्ति में परिवर्तित हो जाते हैं । अतः प्रारम्भिक अवस्था में भगवद्मार्ग का जैसे भी हो, वैसे ही अनुसरण करना चाहिये । क्योंकि “नेहाभिक्रमनाशोस्ति प्रत्यवायो न विद्यते । स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात् ॥” गीता २/३९॥)
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साधु-सज्जन पुरुषों ने त्यागने योग्य छिया = माया, भ्रम को त्याग दिया है । अतः तुमको भी भ्रम-जंजालों का त्याग कर देना चाहिये (कानैं =एक ओर कर देना) । जिस व्यक्ति के हाथ में दीपक हो, फिर भी वह कूवे में पड़ जाये तो इससे बड़ा आश्चर्य और क्या होगा ? जिसके पास श्रोत्रिय-ब्रह्मनिष्ठ गुरु का उपदेश रूपी पूंजी उपलब्ध है । फिर भी वह विषय-भोगों में आसक्त हो जाये तो यह आश्चर्यचकित करने वाले तथ्य से कम नहीं है । पाताल = बिलकुल एकान्त में बुरा करने पर भी बुरा कृत्य छिपता नहीं है, कभी न कभी किसी न किसी निमित्त से उसका उद्घाटन हो ही जाता है ।
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जब उस बुरे कृत्य का उद्घाटन होता है और पाड़ौसन = परिचितों द्वारा उलाहना दिया जाता है तब कान खुजाने तथा नीचे की ओर देखने रूप शर्मिंदगी के अतिरिक्त और कुछ शेष बचता नहीं है । वस्तुतः बुरा आचरण करने वाला सोचता है, मैं नितान्त एकान्त में इस कार्य को कर रहा हूँ, मुझे कोई नहीं देख रहा है किन्तु सर्वज्ञ-परमात्मा सर्वत्र किये सर्व कार्यों को देखता हैं और मनुष्य द्वारा किये कृत्यों को अपनी बहियों में लिख लेता है ।
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परब्रह्म-परमात्मा की सत्ता से स्फूर्तमान जम = यमराज तेरे किये कृत्यों को अपनी बहियों के पन्नों में लिख लेता है । हे मनुष्य ! तू आठों-पहर विषयविकारों में डूबा हुआ अपराध दर अपराध करता जाता है; हे लजमार = जिन कृत्यों को करने में लज्जा आती है, ऐसे कृत्यों को करने वाले मनुष्य ! परमेश्वर द्वारा अहैतुकी कृपा करके प्रदान किये मनुष्य बानौं = शरीर को क्यों लज्जित करने में लगा हुआ है, क्यों लाजें मारता है ।
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“कबहुँक करि करुणा नर देही । देत ईस बिनु हेत सनेही ॥” मानस ॥
“लख चौरासी भुगतताँ, बीत जाइ जुग च्यारि ।
पीछै नरतन पाइगा, ताते राम सँभारि ॥ श्रीरामचरणवाणी ॥
बषनांजी आश्चर्य व्यक्त करते हुए कहते हैं, देखो, कितना बुरा जमाना आ गया है कि जिसकी वृत्ति के कारण विरति = विरक्त और ब्रह्म कहा जाता है, वही साधु अपने शिष्य-प्रशिष्यों के सहित(सुधौ) विषय-भोगों में आसक्त है और गर्वता हुआ उन्हीं विषय-भोगों में बहा जाता है ।
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परमेश्वर द्वारा मनुष्य जन्म प्रदान करते समय जत = इन्द्रियनिग्रह तथा सत = सतस्वरूप परमेश्वर की भक्ति करने का परवानो = परवाना लिख कर दिया जाता है(यात्रा करते समय आगामी कार्यक्रम को लिखकर जिस कागज पर दिया जाता है वह परवाना कहलाता है) बषनांजी कहते हैं, वे ही भले मनुष्य प्रतीत होते हैं जो परवाने में लिखे समाचार रूपी भगवन्नाम स्मरण को करने में सावधान = होशियार हैं ? स्मरण-भजन करते हैं ॥५०॥
(क्रमशः)