रविवार, 21 जून 2026

*२०. सुमिरण का अंग ~२९/३२*



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*🌷卐 सत्यराम सा 卐🌷*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*

*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*

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*२०. सुमिरण का अंग ~२९/३२*

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*नाम अनेकों एक है, तो भज राम रहीम ।

*ज्यों ज्यों सुमिरै सांइयाँ, जन रज्जब सु फहीम१ ॥२९॥*

एक ईश्वर के नाम अनेक हैं, तब नामों में भेद बुद्धि न रख कर दयालु राम के कोई भी नाम का स्मरण करना चाहिये । ज्यों ज्यों स्मरण बढ़ता जायगा त्यों त्यों ही समझदार१ होता जायगा और प्रतिष्ठित हो जायगा ।

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*नाम अनन्त अनन्त के, सो सब एक समानि ।*

*रज्जब जाणे सो सुमिर, मन वच कर्म उर आनि ॥३०॥*

अनन्त स्वरूप परमात्मा के नाम भी अनन्त है और निष्काम भाव से स्मरण करने से सभी ब्रह्म प्राप्ति रूप समान फल देते हैं, अत: मन, वचन, कर्म से हृदय में नाम का स्मरण करके उस पर ब्रह्म के स्वरूप को जानने का यत्न करो ।

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*नाम अनेकों एक गुण, ज्यों बहु बूंद हुँ वारि१ ।*

*जन रज्जब जान रु कही, नर निरखहु सु निहारि॥३१॥*

जैसे बहुत जल बिन्दुओं में एक जल१ होता है, वैसे ही ईश्वर के नाम अनेक हैं किन्तु उनमें स्मरण करने पर इच्छा पूर्ति करना रूप गुण एक ही है । यह बात हमने अच्छी प्रकार जानके कही है, हे साधक नर ! तू भी ध्यानपूर्वक देख ।

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*ज्यों आतम अरवाह इक, त्यों ही राम रहीम ।*

*उदक आब कछु द्वै नहीं, रज्जब समझ फहीम१ ॥३२॥*

जैसे उदक और आब दोनों जल के ही नाम है, आत्मा और अरवाह दोनों आत्मा के ही नाम है । वैसे ही राम और रहीम दोनों ईश्वर के ही नाम हैं । ज्ञानीजनों१ की यही समझ है ।

(क्रमशः)

२८. आत्म अनुभव कौ अंग १७/२०

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२८. आत्म अनुभव कौ अंग १७/२०
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नां वह सूक्षम स्थूल है, नां वह एक न दोइ । 
सुन्दर ऐसौ आत्मा, अनुभव ही गमि होइ ॥१७॥
वह आत्मा न सूक्ष्म है, न स्थूल; न वह एक है, न अनेक । ऐसी विशेषताओं वाला वह आत्मा एकमात्र स्वकीय अनुभव से ही जानने योग्य हो सकता है ॥१७॥
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नां वह रूप अरूप है, नां वह मूल न डाल । 
सुन्दर ऐसौ आतमा, नां वह बृद्ध न बाल ॥१८॥
उस आत्मा को न रूपवान् कह सकते हैं, न नीरूप(रूपरहित); न उसे मूल(जड) कह पाते हैं, न शाखा; न उस पर किसी वृद्धावस्था या युवावस्था का प्रभाव न बाल्यावस्था का ही । यह आत्मा ऐसी ही विशेषताओं वाला है ॥१८॥
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लघु दीरघ दीसै नहीं, नां वह भीत अभीत । 
सुन्दर ऐसौ आतमा, कहिये बचनातीत ॥१९॥
न उस आत्मा को लघु(छोटा) कह सकते हैं, न दीर्घ(बड़ा) ही । न वह किसी से भीत(डरा हुआ) है, न निर्भय(भयरहित) । अतः ऐसी विशेषताओं वाले आत्मा को हम वाणी से अवर्णनीय(वचनातीत = अनिर्वचनीय) ही कह सकते हैं ॥१९॥
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इन्द्रिय पहुंचि सकै नहीं, मन हू की गमि नांहिं । 
सुन्दर जानै आयु कौं, आपु आपु ही मांहिं ॥२०॥
क्योंकि उसकी वास्तविकता जानने में न किसी की इन्द्रियाँ ही समर्थ हैं, न किसी का मन ही समर्थ हो सकता है । वह तो स्वयं ही तन्मय होने पर स्व(अपने) को जान सकता है ॥२०॥
(क्रमशः) 

*आत्मा-परमात्मा ॥*

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*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*आगो पीछो परिमित नांहिं,*
*केते पारिख आवहिं जाहिं ॥*
*आदि अन्त मधि कहै न कोइ,*
*दादू देखै अचरज होइ ॥*
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*आत्मा-परमात्मा ॥*
हंसा एक काया मैं रहै, ताका बरण न कोई लहै ॥टेक॥
हर्या न नीला स्याम न सेत ।  गुर गमि बिना न पावै भेद ॥
जब यहु हंसा उडि करि जाइ । बहुरि न सरवरि बैठे आइ ॥
कितेक ग्याता किताक ग्यान । न जाणैं वाका उनमान ॥
एक अचंभा आवै मोहिं । है तौ सही लहै नहिं कोइ ॥
अैसा कोई साध न चौर । अैसी प्यारी बस्त न और ॥
जब लग घट मैं बाकी लोइ ॥ तब लग घर मैं आनन्द होइ ॥ 
ना सो हलका न सो भार । धनि हो धंनि उपावनहार ॥
जिनि अैसी कल मेल्ही लाइ । जब बषनां ताके गुण गाइ ॥१५५॥
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“न रूपमस्येह तथोपलभ्यते नान्तो न चादिर्न च संप्रतिष्ठा । 
अश्वत्थमेनं सुविरूढमूलमसंग शस्त्रेण दृढेन छित्वा ॥”१५|३॥ 
यद्यपि इस श्लोक में संसार रूपी वृक्ष का वर्णन है जबकि बषनांजी के पद में अरूपा, अवर्णा, अनामा, अशरीरी परमात्मा का वर्णन है तथापि संसार का नाशवान होने के कारण एकरूपा न होना तथा परमात्मा का अरूप होने से रूपहीन होना एक जैसा ही है । “रूप न रंग रेख नहिं जाकै, है तैसा ही देख ॥”
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शरीर में एक हंस रूपी आत्मा रहता है उसका वर्ण कोई नहीं जानता है । वह न हरा है, न नीला है, न काला है और न सफेद है । उसका रहस्य गुरुज्ञान के बिना जानना असंभव है । एकबार जब यह आत्मा शरीर में से निकलकर चली जाती है तब पुनः उसी शरीर में आकर निवास नहीं करती है । कितने ही वेदशास्त्रों के ज्ञाता और कितने ही ज्ञान की चर्चा करने वाले ज्ञानी इस आत्मा का सही उनमान=अनुमान भेद नहीं जान पाते हैं । 
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बषनांजी कहते हैं, मुझे एक बात आश्चर्यजनक लगती है कि आत्मा वास्तव में है काल्पनिक नहीं है फिर भी इसका वास्तविक बोध किसी को भी नहीं हो पाता है । चौर प्रियवस्तु को चुरा लेता है किन्तु इस आत्मा जैसी प्रियवस्तु को चौर भी नहीं चुरा पाता । कोई साधु भी ऐसा नहीं है जो इसको चुराकर अपने पास रख सका हो । जब-तक इस आत्मा का प्रकाश = सत्ता (लोइ) शरीर में रहता है तब-तक हृदय में आनंद होता है, शरीर में हलचल तथा आत्मानंद अनुभव होता है । यह आत्म तत्व न हल्का है और न भारी ही है । इसके उपजाने वाले को अनेकों धन्यवाद है । 
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वास्तव में आत्मा न उत्पन्न होती है और न मरती ही है~ 
“न जायते म्रियते वा कदाचिन्नायं भूत्वा भविता वा न भूय । 
अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे ॥”२|२०॥ 
बस, अपने अंशी से मिलती बिछुड़ती है । बषनांजी ने इस मिलने-बिछुड़ने को उपजना कहा है । जिस परमात्मा ने ऐसी अद्भुत कल = यंत्र = वस्तु बनाई है(आत्मा जैसी) उसके बषनां गुणों को गाता है ॥१५५॥

*२०. सुमिरण का अंग ~२५/२८*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*२०. सुमिरण का अंग ~२५/२८*
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*ररै रीझ्या राम जी, अलिफ अलह अस नाँव ।*
*रज्जब दोनों एक हैं, मन वच कर्म करि गाव ॥२५॥*
राम मंत्र के पहले "राँ" के स्मरण से रामजी और अल्लाह के पहले "अ" से अल्लाह प्रसन्न होते रहे हैं, नाम का महत्व ऐसा ही है । राम और अल्लाह ये शब्द ही तो हैं, इनका नामी ईश्वर एक ही है, अत: मन वचन कर्म से नाम का गायन करते रहना चाहिये ।
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*रज्जब राम रहीम कहि, आदि पुरुष कर याद ।*
*सदा सनेही सुमिरिये, जन्म न जावे बाद ॥२६॥*
दयालु राम का नाम मुख से बोल, आदि पुरुष प्रभु का स्मरण कर सदा अपने प्रेमी प्रभु का स्मरण करते रहना चाहिये, जिससे यह मानव जन्म व्यर्थ न जाय ।
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*अल्लह अल्लह कहत ही, अलह लह्या सो जाय ।*
*रज्जब अज्जब हरफ है, हिरदै हित चित लाय ॥२७॥*
अल्लह, अल्लह नाम करते करते जो न प्राप्त होने योग्य है वह अल्लाह भी प्राप्त हो जाता है यह अल्लाह नाम अदभुत अक्षरों से बना है । अत: मुसल्मानों के हृदय में प्रेमपूर्वक चित्त लगा कर स्मरण कहते रहना चाहिये।
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*सकल नाम जिव के सगे, जाप जिकर रट जंत ।*
*रज्जब राम रहीम रत, मिल्या सु निर्मल मंत ॥२८॥*
चिन्तन करने से ईश्वर के सभी नाम जीव के हितकारक संबन्धी हैं, अत: हे जीव ! नाम जाप करके, नाम संबन्धी चर्चा करके, नाम की रट लगा करके, दयालु राम में अनुरक्त हो, संत शास्त्रों से यही निर्मल और सुन्दर परामर्श मिला है ।
(क्रमशः)

शनिवार, 20 जून 2026

*२०. सुमिरण का अंग ~२१/२४*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*२०. सुमिरण का अंग ~२१/२४*
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*एक अलिफ में सब इलम१, कुल२ कतेब कुरान ।*
*हत्या३ तज हाफिज४ भया, जन रज्जब सब जान ॥२१॥*
सबसे प्रथम एक ऊँ अक्षर उत्पन्न होता है वही ईश्वर का आदि नाम है और वेदादि संपूर्ण विद्यायें सूक्ष्म रूप से उसमें रहती हैं, वैसे ही फारसी का प्रथम अक्षर अलिफ है, ईश्वर का पहला नाम है उस एक अक्षर में संपूर्ण विद्यायें१ तथा कुरानादि सब२ किताबें सूक्ष्मरूप से रहती हैं, ईश्वर नाम जप से ही प्राणी सब कुछ जान जाता है और हिंसा३ त्यागकर सबका संरक्षक४ बन जाता है ।
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*सब इल्मों शिर अलिफ१ है, कुल कामिल२ इस माँहिं ।*
*तू तामें पैवस्त३ हो, और कह्या कुछ नाँहिं ॥२२॥*
संपूर्ण विद्याओं में शिरोमणि ईश्वर का पहला नाम ही है, इस नाम१ में संपूर्ण प्रकार की पूर्णता२ है । हे साधक ! तू नाम-स्मरण रूप साधना में ही प्रवेश३ कर ईश्वर साक्षात्कार के लिये अन्य कोई भी साधन नाम से श्रेष्ठ नहीं कहा गया है ।
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*रंकार अलिफ चहुँ१ वेद में, है आतम अरवाहि२ ।*
*रट रज्जब कण लीजिये, भूल न कूकस३ खाहि ॥२३॥*
राम मंत्र का पहला बीज "राँ " उसका लक्ष्य अर्थ रूप ब्रह्म चारों१ वेदों में व्याप्त है और संपूर्ण जीवात्माओं२ में आत्म रूप से है । अत: हे साधक ! "राँ" का स्मरण करके ब्रह्म रूप कण को प्राप्त कर और विषयरूप भूसे३ को भूल से भी मत खा ।
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*रं कार अलिफ रोटी बड़ी, रज्जब रुचि सौं खाय ।*
*भूख भंग भगवंत लग, यह धापण की राह ॥२४॥*
राम मंत्र का पहला "राँ" चिन्तन द्वारा तृप्ति का हेतु होने से महान रोटी के समान है, जो प्रीतिपूर्वक खाता है, अर्थात चिन्तन करता है । उसकी आशा रूप भूख नष्ट हो जाती है और वह भगवान के स्वरूप में अभेद भाव से लग जाता है । जीवात्मा के तृप्त होने का मार्ग यह स्मरण ही है ।
(क्रमशः)  

२८. आत्म अनुभव कौ अंग १३/१६

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२८. आत्म अनुभव कौ अंग १३/१६
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जाकै अनुभव होत है, ताही कै सुख चैन । 
सुन्दर मुदित रहै सदा, पूछै बोलै बैन ॥१३॥
हम वास्तविक आत्मानन्दानुभवी उसी साधक को कह सकते हैं जिस के हृदय में आत्मज्ञान प्रस्फुटित हो चुका हो । ऐसा साधक उस आनन्द से सदा प्रमुदित रहता है । तथा अधिकारी जिज्ञासु को उस आत्मज्ञान का कुछ उपदेश भी करता है ॥१३॥
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सुन्दर डुबकी मारि कै, सुख मैं रहै समाइ । 
वह सब कौं देखत फिरै, वह नहिं देख्यौ जाइ ॥१४॥
सच्चा साधक इस ज्ञानसागर में गहरा गोता (डुबकी) लगाकार उसी ज्ञानानन्द के अनुभव में ही निमग्न रहता है; क्योंकि व्यवहार में वह सब की यथार्थता जान चुका है, जबकि उसकी यथार्थता कोई भी नहीं जान पाया ॥१४॥
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अनुभव करिकै आतमा, जानैं ज्यौं आकास । 
सदा अखंडित एकरस, सुन्दर स्वयं प्रकास ॥१५॥
परिमाणरहित आत्मा : क्योंकि वह आत्मज्ञान द्वारा यह जान चुका है कि उसका ही आत्मा, आकाश के समान, सर्वत्र व्यापक है । वह आत्मा अखण्ड एवं सदा एक ही स्थिति में रहने वाला और स्वयम्प्रकाश (स्वसंवेद्य) है ॥१५॥
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ताकौ आदि न अंत है, मध्य कह्यौ नहिं जाइ । 
सुन्दर ऐसौ आतमा, सब मैं रह्यौ समाइ ॥१६॥
आकाश के समान, इस आत्मा का भी न आदि है, न अन्त और न मध्य ही है । अतः इन विशेषताओं वाला यह आत्मा ही सर्वत्र व्यापक है ॥१६॥
(क्रमशः) 

मनोवृत्ति ॥

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*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*कामधेनु घट घीव है, दिन दिन दुर्बल होइ ।*
*गौरू ज्ञान न ऊपजै, मथि नहिं खाया सोइ ॥*
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मनोवृत्ति ॥ साषी लापचारी की ॥
खैंचों तौ आवै नहीं, जे छोडौं तौ जाइ ॥
बषनां मनसा पूछ्ड़ै, प्राण टटीबा खाइ१ ॥(१ इसका अर्थ ‘मन कौ अंग’ की साषियों में देखें ।)
पद ॥
पहिलै ब्याइति ब्याई गाइ । कौंण दुहै कौंण मेलण जाइ ॥
लाताँ मारै बाँटौ खाइ । जाका बाछा बडी बलाइ ॥
काजल पीयल बरण अबरणी । तीनि लोक मैं फिरि फिरि चरणी ॥
बनि बनि फिरै सँमदि जल पीवै । धरणि गगन मैं पल फिरि आवै ॥
अंमृत सरवै भूखाँ मरती । धाई फिरै मछरता करती ॥
घेरि घारि कैं करौं उपाइ । तौ मारगि छाड़ि कुमारगि जाइ ॥
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साषी ॥
दूध की न मूत की, गाइ कहै सब कोइ
अैसि गाइ घर बारणैं, बैरी कै मति होइ ॥१॥
पद ॥
दूजै ब्याइति ब्याई गाइ । तिहि नैं गूजर दुहिबा जाइ ॥
सावणि ब्यावै हाथि न आवै । तिहि का माछर कौंण उडावै ॥
ले ले ठींगा दिहूँ ठहोड़ै । चरिबा तैं मन रती न मोड़ै ॥
खाँट इसी छींका का फोड़ै । तिहि नैं बषनां दुहिवा लोड़ै ॥
चंचल चपल चहूँ दिसि दोड़ै । मगरै जाती कौंण बहोड़ै ॥
बागि न मिलै हिली हरिहाई । भागी फिरै नहीं ठहराई ॥
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साषी ॥
बाँटौ ध्यौं नीरौं घणाँ, देखि घणाँ चराइ ।
माथै कीयाँ पूछड़ौ, या पहली खेताँ जाइ ॥२॥
पद ॥
तीजै ब्याइति अजहूँ ब्याई ॥ दूध घणाँ पणि हाथि न आई ॥
रात्यूँ दिहौं चराई प्याई । दूहौं कहा डोलै मछराई ॥
इसका थणाँ हाथ को लावै । तौ साम्हीं व्है मारण कूँ धावै ।
बछड़ा आठौं पहर खबावै । थण में लिसक रहण नहिं पावै ॥
रहै न हटकी रामैं जावै । खाली खरक न बैठक आवै ।
इनि मेरी छाती घणी पचाई । या गाइ मरै तौ करौ बधाई ॥
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साषी ॥
पहिलाँ तौ सूनी चरी, अब क्यौं आवै हाथि ।
दौड़ि दौड़ि केता मुवा, इस ढांढी कै साथि ॥३॥
पद ॥
चौथैं अब ऊन्हालै ब्याई ॥ भूखाँ मुई हाथि तब आई ।
सहजि सहजि जाइ बैठक बैठी । घेरी तब घर माँहैं पैठी ॥
गुर का ग्यान रासड़ी लाधी । बुचकारी ले खूँटै बांधी ॥
राम नाम धुणि धूणी लाइ । माछर दीना दूरि उडाई ॥
तब तिहि ढांढी धणी सुहाया । न्याणैं न्यूजि रु हाथ व लाया ॥
लात न मारै सदा दुहावै ॥ भूछ गूजरी महरि कहावै ॥
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साषी ॥
थण काटै था केरड़ा, सो तौ दिया बिडारि ।
ठींगै मारी पासवै, दूझै घर कै बारि ॥४॥
पद ॥
धेनि मिली तब दूधाँ धाया । दोइ दुहारा दुहिबा लाया ॥
बछड़ा घेरि अपूठा दीया । कनक कवल माँहै दुहि लीया
काम किरोध बलीतै बालौं । ऊफणि जासी बेगि सम्हालौं ॥
ताता सीला भेला कीया । तब गुरि मेरै जाँमण दीया ॥
सुन्दरि सहजि बिलोवण लागी । तब गहरै सादि मथाणी बागी ॥
मन मथिया तब माखण आया । साधौं हरि तत इहिं बिधि पाया ॥
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साषी ॥
गुजरी कै आनँद हुवा, दूझण लागी गाइ ।
अब बषणां रोटी घीव सौं, चोपड़ि चोपड़ि खाइ ॥५॥१५४॥
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चौपायों द्वारा बच्चों को जन्म देना उनका ब्याना कहलाता है । प्रसवावसर को ब्याइति, ‘ब्याँत’ आदि कहा जाता है । बषनांजी ने पूर्व पद की भाँति ही इस पद में भी गाय को मनोवृत्ति का प्रतीक मानकर मनोवृत्ति के नाना व्यापारों का चित्रण किया है । वे कहते हैं, गाय पहली बार ब्याई जिसका बछड़ा बहुत बड़ी बला = आफतें पैदा करने वाला है । मन की वृत्तियों ने स्वतंत्र रूप में पहले पहल विषयों का भोग करना प्रारम्भ किया ।
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इसके पूर्व बाल्यावस्था में) वे माता-पिता द्वारा उपलब्ध कराये विषयभोग बालक के रूप में भोगती थीं किन्तु जवान होने पर वे अपनी इच्छानुसार भोगों को भोगती हैं । यही गाय का पहली बार ब्याना तथा बछड़ा देना है । मनोवृत्ति की सहायक इंद्रियाँ ही बछड़ा है । वह प्रथम बार ब्याने वाली गाय खूब खाती है = अनियंत्रित रूप में विषयों का भोग करती है । रोकने पर लातें मारती है = रोकने वालों से भला-बुरा कहती है । ऐसी उच्छ्रंकल गाय का कौन तो दूध निकाले तथा कौन मेलण = नियंत्रित करे ।
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भगवद्भक्ति करना ही दूध निकालना है । वह मनोवृत्ति रूपी गाय काले-पीले रंगों वाली ही नहीं अनेकों रंगों वाली है । तीनों लोकों में भ्रमण करके अपने इच्छित भोगों को भोगती है । मनोवृत्ति रूपी गाय वन-वन में घूमती है, एक स्थान पर व एक विषय पर टिकती नहीं है । संसार रूपी समुद्र का जल पीती है ।
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घूमने-फिरने की गति इतनी क्षिप्र है कि वह पल भर में पूरी पृथ्वी, पूरा आकाश घूम-फिर आती है । जब इसको विषय भोग रूपी चारा पानी खूब मिलता है तब यह छँटाक भर दूध भी नहीं देती है । इसके विपरीत जब इसको खाने-पीने को नहीं मिलता है तब वह भगवत्स्मरण करने रूपी दूध प्रभूत मात्रा में देती है । जब खाने को खूब मिलता है तब मौज-मस्ती करती फिरती है ।
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बषनांजी कहते हैं, चूँकि भगवद्भक्तिमार्ग में यह नितांत नई है । अतः मैं इसे घेर-घारकर इधर-उधर से लाने का प्रयत्न करता हूँ किन्तु यह भगवद्भकति मार्ग छोड़कर पूर्वाभ्यास के अनुसार तत्काल विषय भोगों की ओर दौड़ जाती है । वस्तुतः यह संसारोन्मुखी मनोवृत्ति न भगवद्भक्ति मार्ग के लिये उपयोगी है और न संसार के लिये ही उपयुक्त है ।
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क्योंकि संसार में भी उस ही व्यक्ति को शोभा होती है जो अपना लोक सुधारते हुए परलोक सुधारने के प्रयत्न में लगा रहता है जबकि यह तो बस, लाओ-खाओ-मौज करो का सिद्धान्त अपनाए हुए रहती है । इसके बावजूद भी यह गाय कहलाती है । बषनांजी कहते हैं, ऐसी उच्छ्रंकल गाय रूपी मनोवृत्ति स्वयं के यहाँ तो क्या दुश्मन के दरवाजे पर भी नहीं होनी चाहिये ॥१॥
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दूसरी बार गर्भवती होने के उपरान्त गाय पुनः ब्याई जिसको साधक रूपी गूजर दुहने का प्रयत्न करता है । चूँकि दूसरी बार गाय श्रावण मास में ब्याई है । अतः उसको खाने को हरा-हरा मिलता है । वह गौशाला में बिलकुल ही रुकने का प्रयत्न नहीं करती । हर समय नये-नये भोग रूपी हरी-हरी घास खाने को दौड़ती-फिरती है । फलस्वरूप पकड़ में नहीं आती । जो सदैव भागती रहती है उसके मच्छरों को कौन उड़ा सकता है ।
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अर्थात् जो सदैव विषयभोगों में ही रमती फिरती है उस मनोवृत्ति द्वारा किये गये पापों कोन समाप्त कर सकता है ? जब उसको उसके दोनों श्रृंगों से पकड़कर नियंत्रित करने का प्रयत्न किया जाता है तब वह दोनों और माथा हिलाकर रोकने वालों को ही घायल करने का प्रयत्न करती है । गुरु रोकने वाला है । गरु की अवज्ञा करना ही दोनों ओर माथा हिलाना है ।
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वस्तुतः गुरूपदेश को न मानने वाली मनोवृत्ति विषयों में रमने से जरा भी अपने को विमुख नहीं करती है । यह मनोवृत्ति इतनी भारी खाँट = बदमाश है कि पूर्वजन्मार्जित पुण्य जो छींके में = संचितकर्म रूपी संदूक में = सुरक्षित जमापूंजी के रूप में जमा थे को भी नहीं छोड़ती । उन्हें भी दुष्कृत = दुष्कर्म करके समाप्त कर डालती है । ऐसी बदमाश = उच्छ्रंकल = विषयभोगों में आकंठ डूबी मनोवृत्ति को बषनां दुहिबा = दोहन करने का प्रयत्न करता है ।
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यह चंचल और चपल है, चारों ओर दौड़ती-फिरती है । मगरै = अतः विषयभोग रूपी जंगल में जाती हुई को कौन वापिस ला सकता है । बाग-बगीचों में हरियाली मिलती है । अतः वहाँ ही जाने के लिए हिल = गीद रही है । मिलती भी उन्हीं विषयभोग रूपी बगीचों में ही है । खूँटे पर तनिक देर के लिये भी रुकती नहीं है ।
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बषनांजी कहते हैं, मैंने सोचा, एक बार इसको छकाकर खिला दूँ । फिर स्वतः ही इसकी विषयभोगों में आसक्ति कम से कम होती चली जायेगी । एतदर्थ मैंने इसको खूब बाँट (खल, काँकडा, दलिया आदि) खिलाया । खूब चारा पानी नीरा (चारा पानी पशु के समक्ष खाने के लिये रखने को चारा नीरना कहते हैं) और देखा कि इसमें क्या कुछ परिवर्तन आया है । किन्तु यह तो विषयों में जाने से रुकने के बजाय उल्टे मस्तमौला होकर पूँछ ऊपर करके = उत्साहपूर्वक विषयभोग रूपी जंगलों में ही सबसे पहले भागती है ॥२॥
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तीसरी बार शीतकाल में ब्याई है । इस बार इसके नीचे दूध तो खूब है किन्तु गूजर(राजस्थान में गूजर जाति को गाय भैसों को पालने वाली जाति माना जाता है ।) को उस दूध में से कुछ मिलता नहीं है । गूजर ने रात-दिन इसको खूब चारा खिलाया और खूब पानी पिलाया जिससे यह आनंदमग्न हुई मौजमस्ती करती फिरती है । ऐसी स्थिति में इसके नीचे के दूध को कैसे दुहा जा सकता है ।
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यदि कोई इसके स्तनों के हाथ भी लगाता है तो वह हाथ लगाने वाले को हाथोंहाथ मारने को दौड़ती है । बछड़े को आठोंपहर खिलाती-पिलाती है जिससे इसके स्तनों में दूध की एक बूंद भी रहने नहीं पाती । मना करने पर रुकती नहीं, जंगल में चरने को भाग जाती है । गौशाला खाली पड़ी रहती है । उसमें बैठने को जंगल में से वापिस आती ही नहीं है । इस उच्छ्रंकल मनोवृत्ति ने मुझे खूब परेशान किया है । यदि यह मनोवृत्ति मर जाये = नियंत्रण में आजाए तो मैं अत्यधिक प्रसन्न होऊँ ।
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बषनांजी कहते हैं, पहले तो यह सूनी = बिना किसी रुकावट के ही चरती थी = मनोवृत्ति बिना नियंत्रण के ही विषयों को भोगती थी । सो अब कैसे नियंत्रण में आ सकती है । क्योंकि इसको भोगों को भोगने का अभ्यास जो पड़ गया है । इस ढांढी = धूर्त के साथ दौड़ दौड़कर = इसके अनुसार चल चलकर अनेकों मनुष्य मर चुके हैं किन्तु यह अपनी धूर्तता छोड़कर सज्जन = भगवदुन्मुख होने का प्रयत्न नहीं करती है ॥३॥
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इसबार उष्णकाल में ब्याई है । भगवद्भक्ति साधनकाल रूपी उष्णकाल में विषयभोग रूपी चारे की न्यूनता रहती है । अतः भूखों मरने लगी जिससे नियंत्रण में आ गई । धीरे-धीरे गौशाला में रहने लगी । सत्संग सुनने लगी, भजन-ध्यान करने की इच्छा करने लगी । जबसे इसको विषयों से एकदम विमुख कर दी, कहीं जाकर तबसे भगवान के ध्यान में स्थिर होने लगी है ।
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गुरु-ज्ञान रूपी रस्सी साधक को मिल गई जिससे समझाबुझाकर धीरज बंधाया कि अधीर होने की आवश्यकता नहीं है । परमात्ममार्ग पर चलने से लौकिक पारलौकिक दोनों सुख मिलते हैं और परमात्मा रूपी खूँटे से बांध दी । राम-राम की ध्वनि रूपी धूणी(कण्डों को जलाकर धुवाँ कर देने से मच्छर भाग जाते हैं) जला दी जिससे चंचलत्व उत्पन्न करने वाले समस्त विघ्न-कष्ट, पाप=कल्मष रूपी मच्छर भाग गये । तब उस बदमाश-धूर्त गाय = मनोवृत्ति को परमात्मा रूपी मालिक अच्छा लगने लगा ।
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परिणामस्वरूप दूध दुहने के काम आने वाली न्याणें की न्यूज = नेज = रस्सी हाथ में आ गई । अर्थात् अब काम में लेने की जरुरत नहीं रही । अब लात नहीं मारती प्रत्युत आराम से दूध भी दुहने देती है । परिणामस्वरूप संसारी जीव महात्मा(महरी = गूजर की पत्नी का सम्मानास्पद सम्बोधन) कहलाने लगी । पहले बत्स स्तनों को दूध न मिलने के कारण काटा करते थे सो उनको तो अब भगा दिया गया । उनके स्थान पर ठींगा मारने से ही पावस जाती है = दूध देने की इच्छुक हो जाती है और घर के द्वार पर बंधी बंधी दूध देती है ॥४॥
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परमात्मोन्मुख मनोवृत्ति जब परमात्मप्राप्ति के रास्ते पर चल पड़ी तब भगवद्भक्ति रूपी दूध प्रभूत मात्रा में स्तनों में आने लगा । विवेक-वैराग्य रूपी दो दुहने के पात्र बना लिये । मन रूपी बछड़े को संसार से उल्टाकर परमात्मा की ओर मोड़ दिया । निर्मल हृदय रूपी सोने के पात्र में दूध को निकाल लिया । काम-क्रोध रूपी लकड़ियों को जलाकर दूध को गर्म किया ।
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गुरुज्ञान रूपी सावधानी के बल पर तुरन्त ही उफनने = फिसलने रूपी पुनः संसार में जाने से रोक लिया । काम क्रोधादि दुर्गुण दुराचारों को और गुरु ज्ञान को एक स्थान पर एकत्रित करके दुर्गुण दुराचारों को दूर भगा दिया । तब गुरुमहाराज ने कृपा करके मुझे भगवद्भक्ति का रहस्य रूपी जामण देकर भगवद्धयान में स्थिर का दिया ।
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सुरति रूपी सुंदरि उस दही रूपी एकाग्रता में घूमने लगी = निमग्न हो गई । परिणामस्वरूप मथाणी = रई रूपी जिव्हा राम राम रटन रूपी गंभीर शब्द ध्वनि करने लगी । मन को मथ डाला । मक्खन रूपी परमात्मा की प्राप्ति हो गई । साधक ने इसप्रकार साधना करके परात्पर-परब्रह्म-हरि को प्राप्त किया । आत्मा रूपी गूजरी के अब परमानन्द हो गया क्योंकि अब मनोवृत्ति रूपी गाय भगवद्भक्ति रूपी दूध देने लग गई है । अतः बषनां परमात्मा की भक्ति रूपी घी से परमात्मएकाकारं रूपी रोटी को चोपड़-चोपड़ कर खाता है ॥१५४॥

शुक्रवार, 19 जून 2026

*२०. सुमिरण का अंग ~१७/२०

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*२०. सुमिरण का अंग ~१७/२०
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साधु वेद सारे कहैं, सब तज सुमिरण लाग ।*
*रज्जब रत रं कार यूं, मस्तक आया भाग ॥१७॥*
सम्पूर्ण संत तथा सभी वेद यही कहते हैं कि सबको त्याग कर परमेश्वर के नाम स्मरण में ही लगो । इस प्रकार जो सबको छोड़कर राम मंत्र के बीज "राँ" स्मरण में ही अनुरक्त है, तो समझना चाहिये कि उसका भाग्योदय ही हुआ है ।
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*रज्जब टीका नाम को, वेद कुरान सु देहिं ।*
*यू तत्त्ववेता त्याग सब, हरि सुमिरण कर लेहिं ॥१८॥*
वेद तथा कुरान भी ईश्वर के नाम स्मरण को ही सब साधनों में श्रेष्ठ होने का वचन देते हैं । इसलिये भली भांति तत्त्व को जानने वाले सब कुछ त्यागकर हरि-स्मरण रूप साधन ही करते हैं ।
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नाम लाग नर निस्तरहिं, हिन्दू मुसलमान ।*
उभय ठौर एकहि कही, रज्जब वेद कुरान ॥१९॥*
वेद तथा कुरान रूप दोनों ही स्थानों में यह एक ही बात कही है कि क्या हिन्दू और क्या मुसलमान दोनों ही धर्म वाले नर ईश्वर नाम-स्मरण में लग कर संसार-सिन्धु से पार हो जाते हैं ।
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*गगन गुडी कुंभ कूप ह्वै, त्यों व अगम नर नाथ ।*
*तो तीनों क्या दूर है, जे रज्जब रजु हाथ ॥२०॥*
आकाश में पतंग है, घड़ा कुएँ में है, वैसे ही नरनाथ परमेश्वर दूर है, फिर भी यदि हाथ में रस्सी है, तो क्या दूर हैं ? पतंग उतारा जा सकता है, घड़ा बाहर निकाला जा सकता है, वैसे ही ईश्वर - स्मरण रूप डोरी अन्त:करण रूप हाथ में है, तो उन्हें प्राप्त करने में भी क्या देरी लगती है ?
(क्रमशः)

२८. आत्म अनुभव कौ अंग ९/१२

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२८. आत्म अनुभव कौ अंग ९/१२
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सौ जानै जाकै भयौ, आतम अनुभव ज्ञान । 
मुख सौं कहें बनै नहीं, सुन्दर जानै जान ॥९॥
अतः इस अनुभवज्ञान की वास्तविकता(यथार्थता) वही ज्ञानी जान सकता है जिस को ऐसे साक्षात्कार का अनुभव हुआ हो । पुनरपि इस का मुख से वर्णन होना असम्भव ही है ॥९॥ 
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सुन्दर जिनि अमृत पियौ, सोई जानै स्वाद । 
बिन पीये करतौ फिरै, जहां तहां बकवाद ॥१०॥
अमृत का यथार्थ स्वाद(माधुर्य) वही जान सकता है जिसने कभी वह अमृत पीया हो । अवशिष्ट लोग तो सुनी सुनायी बात को ही जहाँ तहाँ सुना कर केवल प्रलाप(=बकवाद) ही करते हैं ॥१०॥

सुन्दर जाकै बित्त है, सो वह राखै गोइ ।
कौडी फिरै उछालतौ, जो टटपुंज्यौ होइ ॥११॥ 
ऐसी गोपनीयता में एक उदाहरण : लौकिक धन सम्पत्ति की महत्ता वही समझ सकता है, जिस के पास उस का असीम कोष(खजाना) हो । वह टटपूंजिया(= दरिद्र, निर्धन) उस का महत्त्व क्या समझेगा जिसके पास अपनी दैनिक जीवनयात्रा चलाने के लिये भी सम्पत्ति सुलभ न हो, भले ही वह अपने पास के स्वल्प धन(कौड़ी) का कितना भी बखान क्यों न करे ! ॥११॥
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जाकै घट अनुभव नहीं, ताकै सुख नहिं लेश । 
सुन्दर बहु बकवाद करि, करतौ फिरै क्लेश ॥१२॥
जिस साधक के हृदय में आत्मज्ञान का कुछ भी अंश न हो, उस को वह सुख कैसे और कहाँ मिलेगा ! भले ही वह लोक में अपने आत्मज्ञानी होने का कितना ही ढिंढोरा(ढोल) पीटता रहे ॥१२॥
(क्रमशः) 

गावड़ी राखौ हरिहावड़ी करती

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*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*अवधू ! कामधेनु गहि राखी,*
*वश कीन्हीं तब अमृत स्रवै,*
*आगै चार न नाखी ॥*
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मनोवृत्ति ॥
गावड़ी राखौ हरिहावड़ी करती । बरजौ राति पसर ऊछरती ॥टेक॥
अहनिस खेत पराया खाइ । नीसरि जाइ बड़ी हरिहाइ ।
बाछा बाछी लियाँ संगि धावै । माँहै सांड दडूकतौ आवै ॥
जे न्यूजौ तौ न्याणौं तोड़ै । लाताँ मारि दुहावणौं फोड़ै ।
ठींगै मारै सो पसवावै । यौं खूँटै बांधी धेन दुहावै ॥
दूध घणाँ दे भूखाँ मरती । जाण मति देहु जठै पहली चरती ॥
घेरि घारि बषनौं घरि आणैं । नीसरि जाइ तौ परमेसुर जाणैं ॥१५३॥
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गावड़ी = गाय = वृत्ति । हरिहावड़ी = हरा खाने की आदी = विषयभोगों को भोगने की आदत वाली । राति = रात्रि । विषय भोगों का परिणाम अंधकार है । रात्री भी अंधकारमय ही होती है । हरिहावड़ी गाय प्रायः रात्री के समय में अथवा खेत के मालिक के खेत में न होने पर ही हरे खेत में घुसकर हरा चारा खाती है । पसर = पैस कर = प्रविष्ट होकर । ऊछरती = आनन्दपूर्वक, उत्साह पूर्वक चरती है । विषयभोग भोगती है ।
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पराया = मनसा का निजी काम परमात्मा का भजन करना है जबकि विषयों का भोग करना पराया माल खाना अथवा चौरी करना है । गाय दूसरों के खेत में जबरदस्ती घुसकर उसका खेत खाती है । नीसरि जाइ = आत्मकेन्द्रित करने के उपरांत भी आत्मध्यान छोड़कर विषयभोगों को भोगने को निकल पड़ती है । बाछी-बाछी = पाँचों ज्ञानेन्द्रियाँ तथा पांचों कर्मेन्द्रियाँ ।
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सांड = अहंकार । दडूकतौ = गर्जन करता हुआ । न्यूजौ तौ = बांधने पर, आत्मकेन्द्रित करने पर । न्याणौ = पिछले पैरों को बांधने की रस्सी = भगवद्ध्यान । दुहावणौं = जिसमें दूध निकाला जाता है, वह पात्र । ठींगै मारै = सींगों को पकड़कर चाबुक मारे = अहंकार को चूर्ण करके । पसवावै =स्तनों को धीरे-धरे सहलाने की क्रिया जिससे दूध स्तनों में उतरा आता है । खूँटे बांधै = आत्मकेन्द्रित करे ।
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विषयों की ओर दौड़ती हुई मनोवृत्ति को आत्मा में केन्द्रित करके रखो । विषय-भोगों को उत्साह पूर्वक भोगती हुई मनोवृत्ति को विषय भोगों में जाने से रोको । यह मनोवृत्ति अपना निजी आहार रामनाम का स्मरण-ध्यान न करके पराया आहार विषयभोगों को भोगती है । 
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इसे आत्मकेन्द्रित करने के उपरान्त भी यह टिकती नहीं है, विषयों की ओर दौड़ जाती है क्योंकि इसको विषयभोग करने की आदत पड़ी हुई है । विषयभोग भोगने में यह अकेली ही संलग्न नहीं होती, सभी इंद्रियों को भी अपने साथ में संयोजित करके भोग भोगती है ।
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वस्तुतः मन बिना हाथ पैर वाला पंगु है वह विषयों का चिंतन तो कर सकता है किन्तु उनका भौतिक उपभोग नहीं कर सकता । भौतिक भोग करने के लिये उसे सहायक चाहिये और वे सहायक यहाँ बाछा-बाछी रूपी इंद्रियों के रूप में चित्रित किये गये हैं । ऊपर से अहंकार रूपी सांड हुंकार करता हुआ चारों ओर घूमता है ।
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यदि इस मनोवृत्ति को एक लक्ष्य में केन्द्रित करने का प्रयत्न किया जाता है तो यह भगवद्ध्यान रूपी रस्सी को तोड़कर पुनः विषयोन्मुख हो जाती है । लातें मार-मार कर भगवत्प्रेम के आश्रय हृदय रूपी दुहावणें को भी तोड़ डालती है = छिन्न-भिन्न कर देती है ।
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इस मनोवृत्ति को रास्ते पर लाने का सही तरीका है, अहंकार रूपी सांड के माथे पर चोट करके अर्थात् अहंकार का सर्वथा त्याग करके धीरे-धीरे मनोवृत्ति को भगवदुन्मुख करे । तत्पश्चात मनोवृत्ति रूपी गाय को परब्रह्म-परमात्मा रूपी खूँटे में अटकाकर अहर्निश भजन-ध्यान करे = दूध दुहे । तब विषयभोगों में न जाती हुई मनोवृत्ति भगवतप्रेम रूपी दूध प्रभूत मात में देगी ।
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साधक का कर्तव्य है कि वह फिर उस मनोवृत्ति को पुनः उन विषयभोगों में रमण करने न जाने दे जिनका भोग वह पहले करती थी । बषनां कहता है, जैसे हो, वैसे ही इसको विषयभोगों से हटा-हटा कर आत्मध्यान में लगावे । इतने के उपरान्त भी यदि यह मनोवृत्ति लक्ष्य को छोड़कर विषयों की और भाग जाये तो उस साधक का तो भगवान ही मालिक है ॥१५३॥

बुधवार, 17 जून 2026

२८. आत्म अनुभव कौ अंग ५/८

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२८. आत्म अनुभव कौ अंग ५/८
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सदा रहै आनंद मैं, सुन्दर ब्रह्म समाइ । 
गूंगा गुड कैसैं कहे, मनही मन मुसकाइ ॥५॥
श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - साधक भी इस आत्मानन्द में तन्मय(लीन) हो कर, दिव्य अनुभव वैसे ही करता रहता है जैसे गूंगा मनुष्य स्वयं गुड़ खा कर भी उस का माधुर्य दूसरों को नहीं बता पाता । वह केवल अपने मन में मुसकरा कर रह जाता है ॥५॥
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जाकौ निश्चै ऊपजै, अनुभव आतम ज्ञांन । 
सुन्दर सो बोलै नहीं, सहज भया गलतांन ॥६॥
जिस साधक के हृदय में प्रभु परमात्मा का यह साक्षात्कार(ज्ञान) उद्भूत हो जाता है वह निश्चित ही उसके विषय में कुछ कहने की स्थिति में न रह कर दिन रात उसी में लीन रहता है ॥६॥
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जाकौ अनुभव होत है, सोई जानै सार । 
सुन्दर कहैं बनैं नहीं, मुख तैं एक लगार ॥७॥
जिस साधक ज्ञानी को इस प्रभु परमात्मा के साक्षात्कार का अनुभव हो जाता है वह उस का परम तत्त्व(महत्त्व) समझता है । परन्तु वह इस(अनुभव) को दूसरों को बताने में स्वयं को असमर्थ ही पाता है । इस विषय में उस के मुख से एक भी शब्द बोलने की स्थिति नहीं रह जाती ॥७॥
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कामी जानै काम सुख, सोऊ कह्यौ न जाइ । 
आतम अनुभव परम सुख, सुन्दर बचन बिलाइ ॥८॥
लोक में भी हम देखते हैं कि कोई कामभोगी नाना प्रकार के कामभोगों का आनन्द लेता है, परन्तु वह भी उन स्वयं अनुभूत कामभोगों के सुख का अनुभव दूसरों के सम्मुख यथार्थ रूप से वर्णन नहीं कर पाता; क्योंकि यह अनुभवसुख है ही ऐसा कि जिस का वाणी के माध्यम से वर्णन कथमपि नहीं किया जा सकता । उसको आत्मानुभव के यथार्थ वर्णन हेतु कोई यथार्थ शब्द ही नहीं मिलते ॥८॥
(क्रमशः)

पकड़ि पकड़ि मन कौं बैठाइ

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*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*कह्या हमारा मान मन, पापी परिहर काम ।*
*विषयों का संग छाड़ दे, दादू कह रे राम ॥*
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मन ॥
पकड़ि पकड़ि मन कौं बैठाइ ।
इहि बिधि हरि कैं सुमरणि लाइ ॥टेक॥
मन दौड़ै देही बैसाणी । आसण इसा न होइ रे प्राणी ॥
मन फोरा देही पांगुली । भौ सागर तिरिबा की रली ॥
जौ लग मन बैसै नहिं ठाइ । तौ लग तिल भरि तिर्या न जाइ ॥
मन जाते का करौ गयेसा । बषनां सतगुर कह्यौ संदेसा ॥१५२॥
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मन चंचल है । एक आलम्बन पर टिकता नहीं है । पकड़कर लाओ, फिर भाग जाता है । भागते रहना ही इसकी नियति है । इस पर बषनांजी कहते हैं, साधक का कर्तव्य है, वह भागते हुए चलायमान मन को पकड़-पकड़ कर जाने से रोककर एक लक्ष्य में स्थिर करने का प्रयत्न करे ।
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इसप्रकार से इस चंचल मन को रामस्मरण में संलग्न करे । मन दौड़ता है । देह एक जगह स्थिर रहती है । हे प्राणी ! इस प्रकार से आसन सिद्ध नहीं होता है, रामजी का भजन नहीं होता है । मन विषयविकारों से विनिर्मुक्त होकर हल्का हो जाये तथा शरीर विषयों को भोगे नहीं = पांगुला हो जाये । वास्तव में भव रूपी सागर से पार होने का तरीका यही है ।
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जब तक मन परमात्मा रूपी एकस्थान = लक्ष्य में स्थिर नहीं होता तब तक संसार-सागर की पूरी दूरी में से एक तिलभर की दूरी तक भी पार हुआ नहीं जा सकत । जाते हुए मन को गयेसा = ग्रहण करो = रोको, बषनां कहता है, सद्गुरु महाराज का सर्वप्रथम संदेश = उपदेश यही है ॥१५२॥

*२०. सुमिरण का अंग ~१३/१६*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*.

*२०. सुमिरण का अंग ~१३/१६*
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*षट् दर्शन नाम हि कहैं, नाम हि वेद पुरान ।*
*तो रज्जब नाम हि गहो, पाया भेद विनान१ ॥१३॥*
षड् दर्शन(६ शास्त्र) वा नाथ, जंगम, सेवड़े, बौद्ध, सन्यासी, शेष, ये ६ के नाम स्मरण की प्रेरणा करते हैं और वेद पुराणादि सदग्रंथ भी नामस्मरण साधन को श्रेष्ठ कहकर उसके करने की प्रेरणा करते हैं । उक्त शास्त्रादि तथा सद्गुरु के उपदेश से हमने नाम स्मरण विषयक रहस्यमय विज्ञान१ प्राप्त कर लिया है । अत: साधक को नाम-स्मरण साधन ही करना चाहिये ।
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*सब ही वेद विलोय कर, अंत दृढावें नाम ।*
*तो रज्जब जगदीश भज, इतना ही है काम ॥१४॥*
सम्पूर्ण वेदों का मनन करके विद्वान् संत नामस्मरण रूप साधन ही दृढ़ता से करने की प्रेरणा करते हैं । तब जगदीश्वर का ही भजन करना चाहिये, साधक को अपने कल्याण के लिये नाम स्मरण रूप कार्य ही बहुत है ।
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*साधू वेद बोल हि सु यूं, राम कहे सब कीन ।*
*जन रज्जब जग उद्धरहिं, जो जीव जगपति लीन ॥१५॥*
संत तथा वेद ऐसा ही कहते हैं कि - जिसने राम का स्मरण कर लिया, उसने सब कुछ कर लिया । जो जीव जगतपति परमेश्वर के स्मरण में लीन होते हैं, वे जगत से पार हो जाते हैं ।
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*रज्जब पैठे राम में, सो रट द्वारे होय ।*
*मिलबे को मारग यही, और न दूजा कोय ॥१६॥*
जो भी राम के स्वरूप रूप धाम में प्रवेश करते हैं, वे राम स्मरण रूप द्वार से ही करते हैं, राम से मिलने का मार्ग यही है अन्य कोई भी नहीं है ।
(क्रमशः)

२८. आत्म अनुभव कौ अंग १/४

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२८. आत्म अनुभव कौ अंग १/४
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मुख तैं कह्यौ न जात है, अनुभव कौ आनंद ।
सुन्दर संमुझै आपु कौं, जहां न कोई द्वंद्व ॥१॥
{महात्मा श्रीसुन्दरदासजी इस अङ्ग में उस निरञ्जन निराकार के साक्षात्कार के दिव्य अनुभव से प्राप्त आनन्द का विस्तृत विवरण दे रहे हैं जो उन को श्रीगुरुमुख से श्रुत उपदेश के आश्रयण से की गयी साधना से प्राप्त हुआ था ।}
वे कहते हैं - इस आत्मानन्द के अनुभव का वर्णन हम अपने मुख से नहीं कर सकते; क्योंकि यह अनिर्वचनीय है । यह स्वयं अपने उस हृदय में ही समझने की वस्तु है जहाँ अब किसी प्रकार के द्वैत की भ्रान्ति नहीं रह गयी है ॥१॥
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उमगि चलत है कहन कौं, कछू कह्यौ नहिं जाइ ।
सुन्दर लहरि समुद्र मैं, उपजै बहुरि समाइ ॥२॥
इस दिव्य अनुभव के विषय में जब हम कुछ कहना आरम्भ करते हैं तो हम कुछ भी कहने में असमर्थ हो जाते हैं; क्यों कि हमारे हृदय समुद्र में जब एतद्विषयक आनन्द की लहर(तरङ्ग) उठती है तो वह पुनः वहीं समा जाती(रह जाती) है ॥२॥
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कह्यौ कछू नहिं जात है, अनुभव आतम सुक्ख ।
सुन्दर आवै कंठ लौं, निकसत नांहि न मुक्ख ॥३॥
अतः हम उस आत्मानन्द के उस दिव्य अनुभव के विषय में कुछ भी कहने में स्वयं को असमर्थ पाते हैं । वह वर्णन हेतु हमारे कण्ठ तक आकर भी मुख से नहीं निकल पाता ॥३॥
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सुन्दर जैसें सर्करा, गूंगै खाई होइ ।
मुख सौं कहि आवै नहीं, कांख बजावै सोइ ॥४॥
जैसे कोई गूंगा(वाणीविहीन) पुरुष स्वयं मीठा गुड(शक्कर) खा कर भी उस का स्वाद(जायका) दूसरों के सम्मुख अपनी बाणी के माध्यम से नहीं कह पाता । उस समय वह अपनी कांख(बाहुओं के मूल का गड्ढा) हथेली से बजाता हुआ केवल हर्ष प्रकट करके ही रह जाता है ॥४॥
(क्रमशः)

राम-धन ॥

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*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*राम धन खात न खूटै रे,*
*अपरंपार पार नहिं आवै, आथि न टूटै रे ॥*
*तस्कर लेइ न पावक जालै, प्रेम न छूटै रे ॥*
*चहुं दिशि पसर्यो बिन रखवाले, चोर न लूटै रै ॥*
*हरि हीरा है राम रसायन, सरस न सूखै रे ॥*
*दादू और आथि बहुतेरी, तुस नर कूटै रे ॥*
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राम-धन ॥
सोइ निरधन जाकै राम धन नांहीं ।
राम धन ताकै निधि घर मांहीं ॥टेक॥
नाणा नाँव अमर संसारि । जिनि लीया ते उतरे पारि ॥
चोर न लागै मुसै न कोइ । लियाँ थैं लाभ घणाँ ही होइ 
खर्चताँ खाताँ ओड न आवै । सांच्याँ चारि पदारथ पावै 
आगैं यहु धन जिनकै हूवा । काल दुकालाँ नांहीं मूवा ॥
दूजा धन देखताँ बिलाइ । राम अखै धन कदे न जाइ ॥
चित चरवा भरि मेल्हा पाटि । हिरदै राख्या दिपै लिलाटि ॥
सो बोहरा बोहराँ मैं कहिये । जिहि घटि राम पदारथ लहिये 
आदि अंति लूँ खरचै खाइ । बषनां कै रामधन बिनसि न जाइ ॥१५१॥
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निरधन वह है जिसके पास रामनाम रूपी धन नहीं है । जिसके पास राम-धन है उसके घर में ही धन है, ऐसा मानना चाहिये । रामनाम रूपी नाणा = धन ही संसार में अमर = हमेशा रहने वाला धन है जिन्होंने भी इसका स्मरण किया है, वे ही संसार-सागर से पार उतरे हैं । इस राम-धन को कोई भी चौर चौरी नहीं कर सकता तथा कोई भी घाड़ायती इसको छीन नहीं सकता ।
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इसको लेने से, इसका स्मरण करने से अनेकों लाभ होते हैं । यह ऐसा अक्षय धन है कि खर्चने और खाने से इसका ओड = अंत नहीं आता । इसका संचय करने से धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष रूपी चारों पदार्थों की प्राप्ति होती है ।
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पूर्वकाल में जिनके पास भी यह राम-नाम रूपी धन रहा है वे अकाल और दुष्काल के प्रभावों से सर्वथा अप्रभावित रहे हैं । अर्थात् उन्हें धर्मराज के यहाँ कष्ट भुगतने नहीं जाना पड़ा है । रामधन के अतिरिक्त अन्य सभी धन देखते-देखते ही नष्ट हो जाते हैं जबकि अक्षय रामधन कभी भी खत्म नहीं होता ।
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चित्त रूपी चरवे(चरु = जलादि भरने का पात्र) में इसको भरकर ऊपर से विषय विकार न आने देने रूपी ढक्कन से ढककर रखना चाहए । हृदय में इसको बसा लेने से ललाट देदीप्यमान हो जाता है । धन संचय करने व उधार देने वाले बोहरों में वास्तविक बोहरा यही है जिसके हृदय में राम-नाम रूपी धन विद्यमान होता है । बषनां प्रारम्भ से अब तक रोज इस रामनाम रूपी धन को खर्चता और खाता है फिर भी यह कम नहीं होता है, विनष्ट नहीं होता है ॥१५१॥

मंगलवार, 16 जून 2026

*२०. सुमिरण का अंग ~९/१२*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*२०. सुमिरण का अंग ~९/१२*
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*अकलि१ उजास२ अनन्त बल, ऋद्धि सिद्धि मधि नाम ।*
*रज्जब आवहिं शिव शक्ति, सत सुमिरण जिहिं ठाम ॥९॥*
ज्ञान१ के प्रकाश२ से देखो तो नाम स्मरण में अनन्त बल है, ऋद्धि सिद्धि नाम स्मरण से मिलती है, जिस स्थान में सत्य ब्रह्म का सम्यक् स्मरण होता है वहाँ माया ओर ब्रह्म दोनों ही आते हैं । अर्थात ब्रह्म साक्षात्कार होता है और मायिक पदार्थों की भी कमी नहीं रहती है ।
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*रज्जब अज्जब राम धन, विध्न रहित बहु माल ।*
*वित१ बे हद जाको मिले, भाग्य भले तिहिं भाल ॥१०॥*
राम स्मरण रूप अदभुत धन विघ्न रहित है, इसे कोई लूट नहीं सकता, इससे इच्छानुसार बहुत माल मिलता है, जिसको यह असीम धन१ मिलता है, उसका भाग्य विशाल समझना चाहिये ।
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*तीन लोक चौदह भुवन, अरु ब्रह्माण्ड इक्कीस ।*
*सब ठाहर सीझें१ सुमरि, रज्जब रट जगदीस ॥११॥*
तीनों लोक चौदह भुवन और इक्कीस ब्रह्माण्ड, इन सभी स्थानों में रहने वाले प्राणी ईश्वर स्मरण द्वारा ही सिद्धावस्था१ को प्राप्त हुये हैं । अत: निरंतर जगदीश्वर का स्मरण करना चाहिये ।
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*चार युग चहुँ वेद मुख्य, सबै डिढावहिं नाम ।*
*रज्जब सिध साधक कहै, यहु सीजण की ठाँम ॥१२॥*
चारों युगों के प्राणियों के उद्धारार्थ चारों वेदों ने विशेषकर नाम स्मरण रूप साधन ही दृढ़ता से करने को कहा है तथा और साधक संत भी मुक्ति रूप सिद्धावस्था को प्राप्त करने के लिये ईश्वर का नाम स्मरण रूप स्थान श्रेष्ठ बताते हैं ।
(क्रमशः)

*२०. सुमिरण का अंग ~५/८*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*२०. सुमिरण का अंग ~५/८*
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*रज्जब भजन भण्डार में, दीरघ दौलत१ दोय ।*
*इहां सुखी संसार मधि, आगे आनँद होय ॥५॥*
भजन रूप भण्डार में दो प्रकार का महान धन१ है एक तो वैराग्य और दूसरा आत्मज्ञान । वैराग्य से व्यक्ति राग रहित व्यवहार करता है, अत:वह संसार में सुखी रहता है और आत्मज्ञान से आगे आनन्द स्वरूप हो जाता है । भजन करने से वैराग्य और ज्ञान स्थिर रहते हैं ।
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*रैणाइर१ रंकार२ मधि, मुकता३ रिधि सिधि माँहिं ।*
*जन रज्जब मथ जापकर, रत्नहुं टोटा नाँहिं ॥६॥*
समुद्र१ में रत्न रूप धन बहुत था, देव दानवों ने मन्थन करके निकाला, वैसे ही हे साधक ! राम के बीज मंत्र "राँ"२ में ऋद्धि सिद्धि रूप धन बहुत३ है, जाप रूप मन्थन कर, फिर तेरे पास भी कमी नहीं रहेगी ।
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*साहिब के घर सौंज१ बहु, सुमिरन सम कोइ नाँहिं ।*
*रज्जब भज भगवंत ह्वै, सकल बोल ता माँहिं ॥७॥*
ईश्वर के घर में नाना प्रकार की सामग्री१ है किन्तु स्मरण के समान कोई भी नहीं है । भजन करने से प्राणी भगवान् बन जाता है, संपूर्ण शास्त्र तथा सभी संतों का वचन उसे भगवत् स्मरण में लगाने की ही प्रेरणा करते हैं ।
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*रज्जब बंदा बंदगी, कियों सरे सब काज ।*
*सेवक सेवा कर लहै, श्री सहित शिर-ताज ॥८॥*
भक्त जब भक्ति करता है तब ही उसके विक्षेप निवृत्तिपूर्वक सभी कार्य सिद्ध होते हैं । इस कारण सेवक सेवा करके माया और माया पति परमात्मा को भी प्राप्त करता है ।
(क्रमशः)

सोमवार, 15 जून 2026

२७. अक्षर बिचार कौ अंग १७/२०

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२७. अक्षर बिचार कौ अंग १७/२०  
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आपुन लघु ह्वै जात है, और हि दे सनमांन । 
सुन्दर रीति बडेन की, जानहिं संत सुजांन ॥१७॥ 
लोक में भी हम देखते हैं कि भले लोगों की यह परिपाटी(परम्परागत स्वभाव) है कि वे स्वयं साधारण(सत्सङ्गति एवं गुरुभक्ति से संयुक्त = लघु) होते हुए भी दूसरे(अपने अनुगामियों) का सम्मान ही करते हैं । यह बात सभी सज्जन जानते हैं ॥१७॥
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जो कोउ आइ बडौ कहै, धरैं बडाइ सीस । 
तौ हू आप समा करै, सुन्दर बिस्वा बीस ॥१८॥ 
ऐसे सज्जनों का यह स्वभाव ही होता है कि उनके पास आकर उन से बड़ा कोई कुछ कहता है तो वे उस के महत्त्व(बडप्पन) को ध्यान में रखते हुए, स्वयं समता रखकर उन को पूर्णतः(बीस विस्वा) सन्तुष्ट करते हैं ॥१८॥
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सुन्दर लघुता गहि रहै, दूरि करैं जब गर्ब ।
गुरु ताही कौं देत है, बित्त आपनौ सर्ब ॥१९॥ 
जो शिष्य गुरु के सम्मुख अपना सब सांसारिक अभिमान त्याग कर लघुता(नम्रता) ग्रहण किये रहता है, गुरुदेव प्रसन्न होकर ऐसे गुणी शिष्य को ही अमूल्य ब्रह्मज्ञानोपदेश प्रदान करते हैं ॥१९॥
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जौ गुरु कै पीछे रहै, तौ लघु दीरघ होइ । 
आगै लघु कौ लघु रहै, सुन्दर पुस्तक जोइ ॥२०॥
इति अक्षर बिचार को अंग ॥२७॥
छन्दःशास्त्र के अनुसार जैसे जो लघु वर्ण गुरु वर्ण का अनुगमन करता है वह समय पा कर स्वयं गुरुत्व धारण कर लेता है । गुरु वर्ण से आगे रहने वाला लघु वर्ण सदा लघु ही रह जाता है; इसी प्रकार गुरुदेव का अनुगमन करने वाला शिष्य कभी न कभी समय पाकर (साधना पूर्ण होने पर) स्वयं गुरु हो जाता है; परन्तु जो शिष्य होकर भी गुरु से अभिमान करता है वह सदा लघु(साधनाहीन) ही रह जाता है । उसकी साधना कभी सफल नहीं हो सकती । उस का तत्त्वज्ञानी(ब्रह्मसाक्षात्कार) होना तो असम्भव हो समझिये ॥२०॥
इति अक्षरविचार का अंग सम्पन ॥२७॥
(क्रमशः) 

तीधोधो भाई तीधोधो

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*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*दादू मोह संसार को, विहरै तन मन प्राण ।*
*दादू छूटै ज्ञान कर, को साधु संत सुजाण ॥*
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राग भैरूँ ॥१७॥माया
तीधोधो भाई तीधोधो, चिति परै तौ तीधोधो ।
मुध परै तौ तीधोधो, दुहुँ पवाड़ाँ तीधोधो ॥टेक॥
ज्याँह कै नाँहीं त्याँहनैं रोज रुवावै, छै तो बहुत पचावै ।
संपति बिपति दोउ तीधोधो, इहि बिधि नाच नचावै ॥
एकाँ कै आगै व्है निकसी, सो सँगि लागा जावै ।
एकाँ कै बासै बसि चाली, तिनकौं चित्त लगावैं ॥
जे राची तौ तीधोधो, बिरची तौ तीधोधो ।
बषनां बहुत नचाया आगैं, जे उबर्या तो कोई को ॥१५०॥
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“तीधोधो” का सही शाब्दिक अर्थ क्या है, पता नहीं किन्तु प्रसंगानुसार ‘बुरा है’ अर्थ अमझ में आता है । स्वामी मंगलदासजी महाराज ‘ठीक है’ अर्थ की कल्पना करते हैं । यदि वे पूरे पद की व्याख्या करके ‘ठीक है’ अर्थ से संगति बैठाते तो हमें सुविधा होती । खैर ! पाठक अर्थ पढ़ें । इस पद में बषनांजी ने माया के धन-सम्पत्ति रूप को हेय बताया है । उनके अनुसार माया के अर्जन, रक्षण और व्यय तीनों में ही अनेक कष्टों को सहन करना पड़ता है । अतः उनके विचार से माया हरतरह से ही बुरी है । इन्हीं विचारों की प्रतिध्वनि है इस पद में ।
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माया बुरी है, हे भाई ! माया सर्वथा त्याज्य है । यदि इस माया के न होने पर इसके प्राप्त्यर्थ चिति परै = चित्त में चिंतन चलता है तो वह भी बुरा है । इसके विपरीत यदि माया के होने पर चित्त इसमें मुध = मुग्ध = आसक्त हो जाता है तो भी बुरा है क्योंकि इस मिथ्या माया का न होने पर चिंतन तथा होने पर इसमें आसक्ति दोनों ही बुरे हैं ।
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जिसके पास माया नहीं होती वे नित्य ही माया की प्राप्ति हेतु रोते हैं कि हाय ! हम हतभाग्य हैं जो हमारे पास फूटी कौड़ी भी नहीं है । इसके विपरीत जिनके पास माया है उन्हें भी यह पचावै = परेशान करती है । राजा कर के रूप में, चोर चोरी करके, बलवान जबरदस्ती करके इस माया को छीन लेने का प्रयत्न करते हैं । अतः जिसके पास माया है, वह सदैव चिंता निमग्न रहता है कि कोई मुझसे इसे छीनकर न ले जाये । अतः सम्पत्ति तथा विपत्ति दोनों ही बुरी है । क्योंकि दोनों ही मनुष्य को नाना नाच नचाती हैं ।
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एकाँ कै =जिनके सामने से माया चली जाती ही वे इस माया के ही पीछे-पीछे दौड़ते हैं कि कैसे भी यह उनके घर में रुक जाये, आ जावे । इसके विपरीत जिनके घर में निवास करके वह चली जाती है वे भी अहर्निश इसके चिंतन में ही लगे रहते हैं । अतः यदि यह माया घर में रहती है तब भी बुरी है । और चली जाती है तब भी बुरी है इस माया ने पूर्वकाल में भी अनेकों को अनेक नाच नचाये हैं । कोई भगवद्भक्त ही इससे बच पाये हैं, वे विरले ही हैं ॥१५०॥

रविवार, 14 जून 2026

*२०. सुमिरण का अंग ~१/४*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*२०. सुमिरण का अंग ~१/४*
इस अंग में स्मरण संबंधी विचार दिखा रहे हैं -
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*राम नाम मूल मंत्र, सत्य नाम निरंजनं ।*
*यथा ध्यावै तथा पावै, भजे भरिये भाजनं ॥१॥*
राम नाम ही मूल मंत्र है, सत्य नाम ही निरंजन ब्रह्म है, जो जैसी उपासना करता है, वैसा ही फल पाता है । भजन करने से अवश्य ही अन्त:करण रूप पात्र आनन्द से भर जाता है ।
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*रज्जब रटि जटि नामसौं, आठों पहर अखण्ड ।*
*सुमिरण सम सौदा नहीं, निरख देख नौ खंड ॥२॥*
आठों पहर अखंण्ड नाम रटते हुये, जैसे जङिया भूषण में नग को जड़ता है, वैसे ही वृत्ति नाम में जड़ दे । हे साधक ! चाहे तू पृथ्वी के नौओं खंण्ड में दृष्टि फैलाकर देखले, स्मरण के समान श्रेष्ठ साधन रूप व्यापार नहीं मिलेगी ।
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*इस माया मंडाण मधि, सुमिरण सम कछु नाँहिं ।*
*सो आधार उर राखिये, जन रज्जब जिव माँहिं ॥३॥*
इस माया रचित संसार में कल्याण का साधन हरि स्मरण के समान अन्य कोई भी नहीं है । अत: हे जीव ! उसीको अपने कल्याण का आधार समझकर निरंतर हृदय में रखना चाहिये ।
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*बावन अक्षर वारिनिधि, मध्य रत्न रंकार ।*
*रज्जब लिया विलोय वित, आतम का आधार ॥४॥*
जैसे समुद्र में रत्न हैं, वैसे ही वर्णमाला के ५२ अक्षरों में "राँ" है ।देव दानवों ने समुद्र का मंथन करके १४ रत्न रूप धन निकाला था, वैसे ही संतों ने वर्णमाला से "राँ" निकाला है, जो कल्याण मार्ग में जीवात्मा का आश्रय है, अर्थात नाम चिन्तन से ही कल्याण होता है ।
(क्रमशः)

२७. अक्षर बिचार कौ अंग १३/१६

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२७. अक्षर बिचार कौ अंग १३/१६ 
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देखत दीसै एक ही, अरथ बिचारय दोइ । 
सुन्दर अद्भुत बात है, संमुझै पंडित कोइ ॥१३॥
जैसे स्वरसहित व्यञ्जन सामान्य दृष्टि से एक ही दीखते हैं, परन्तु विचार करने पर व्यञ्जन स्वर का पृथक् विभाजन भी ज्ञात हो जाता है; उसी प्रकार ब्रह्म समस्त जगत् में व्याप्त है, परन्तु विवेकशून्य पुरुष इसे अनुभव नहीं कर पाता । अतः विवेकी के लिये यही विवेक का फल है कि वह विवेक के आश्रयण से ब्रह्मज्ञानी हो पाता है ॥१३॥
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सोरठा
विंजन होइ तकार, तालिब होइ शकार जो । 
सुन्दर होइ छकार, उभय बरन नहिं देखिये ॥१४॥
ज्ञान के संस्कार का माहात्म्य : जैसे किसी शब्द में 'त्' के सम्मुख तालव्य 'श' हो तो वे दोनों मिल कर, व्याकरण शास्त्र के संस्कार के आधार पर, 'च्छ' हो जाते हैं । वहाँ पहले वाले 'त्' एवं 'श' दोनों व्यञ्जन नहीं दिखायी देते१ ॥१४॥ {१ द्र० - शश्छोऽटि (पा० सू० ८.४.६.३)}
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यौं द्विज सूद्र सु एक, ज्ञान बिषैं नहिं भेद है । 
उभय बरन तजि टेक, ब्रह्म रूप सुन्दर भये ॥१५॥
इसी प्रकार ब्रह्मज्ञान से पूर्व ब्राह्मण एवं शूद्र जातियों में दिखायी देने वाला द्वैत भाव ब्रह्मज्ञान के बाद नहीं दिखायी देता । श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - क्योंकि ब्रह्मज्ञान के बाद किसी भी प्रकार के द्वैत(जातिभेद) की कहीं कोई कल्पना ही नहीं रह जाती । तब समस्त संसार ब्रह्म की सुन्दरता में मग्न हो जाता है । यही संस्कार का माहात्म्य है ॥१५॥
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दोहा
दीरघ कै पीछे भये, ह्वै अनयास गुरुत्व । 
सुन्दर लघु दीरघ करै, ज्यौं अक्षर संयुत्व ॥१६॥
छन्दःशास्त्र के माध्यम से आत्मतत्त्वविवेक : अब श्रीसुन्दरदासजी छन्दः शास्त्र (काव्यशास्त्र) के अनुसार देवनागरी वर्णमाला के वर्णों के माध्यम से आत्मतत्त्व पर अपने विचार प्रस्तुत कर रहे हैं । छन्दःशास्त्र का यह सिद्धान्त२ है कि यदि काव्यपाठ में पठित किसी शब्द में कोई अनुस्वार () युक्त, दीर्घ या संयुक्त वर्ण हो, या विसर्ग (:) युक्त वर्ण हो तो उससे पूर्व का वर्ण दीर्घ(गुरु) माना जाता है । इसके अनुसार वे कहते हैं‌‍‍ - दीर्घ(अपने से बड़े) - का अनुगमन करने पर लघु(छोटे) को भी अनायास ही गुरुत्व(महत्त्व) प्राप्त हो जाता है । जैसे काव्यपाठ में कोई संयुक्त(मिले हुए) वर्ण, स्वयं लघु होते हुए भी, अपने से पीछे वाले वर्ण को गुरुत्व(महत्त्व) प्रदान कर देता है ॥१६॥ 
(२ सानुस्वारश्च दीर्घश्च, विसर्गी च गुरुर्भवेत् । 
वर्णः संयोगपूर्वश्च, तथा पादान्तगोऽपि वा ॥ - छन्दः शास्त्र ।)
(क्रमशः)