रविवार, 18 अक्टूबर 2026

*प्रहलादजी की वाणी की महिमा*

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🌷*卐 श्री दादूदयालवे नम:  卐*🌷
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*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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*दादू तन मन लाइ कर, सेवा दृढ़ कर लेइ ।*
*ऐसा समर्थ राम है, जे मांगै सो देइ ॥*
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*प्रहलाददासजी के संग से तरने वाले नर नारी*
रट रामट बस सदा, भक्त भगवत को राघो ।
सुनत नरायण गोविन्द, धर्म धार्यो जिन आघो¹ ॥
भीमराज निर्वाण, राम यश नीको गावे ।
नीको लक्ष्मीदास, हरियो हरि धर्म चलावे ॥
किशनाई पार्वती, बीना दुरगा गोरिजा ।
पारस रूपी परसि, गुरु मेट्यो दिल गोरिजा² ॥
राघव हरि यश रात दिन, सुन सुन परमारथ करें ।
ये परम पुरुष प्रहलाद की, संगति नर नारी तिरें ॥६५॥
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भगवान् के भक्त राघवजी रामट ग्राम में सदा बसते हुये राम रटते थे । नारायण और गोविन्दजी भागवद्द धर्म को सुनते थे और उन्होंने आदर¹ पूर्वक धारण भी किया था । निर्वाण गोत्र के भीमराजजी क्षत्रिय रामजी का यश अच्छी प्रकार प्रीति से गाते थे । लक्ष्मीदासजी भी अच्छे भक्त थे । हरियाजी भी हरिभक्ति रूप धर्म अच्छी प्रकार चलाते थे । किशनाई, पार्वती, बीना, दुरगा(दुरशा भी पाठान्तर है) और गौरिजा, इन बाइयों ने भी पारसरूप प्रहलादजी को गुरु बनाया था । गुरुजी ने इनके हृदय का अज्ञान रूप दारिद्र² अपने ज्ञान धन को देकर मिटा दिया था । ये उक्त सब ही नर-नारी रातदिन हरियश सुन सुनकर परमार्थ करते थे । इस प्रकार परम पुरुष प्रहलादजी की संगति से ये उक्त नरनारी संसार-सागर से पार हो गये थे । 
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*प्रहलादजी की वाणी की महिमा*
प्रहलाददासजी के शिष्य प्रशिष्य तथा सेवकों ने प्रहलादजी की वाणी की महिमा कही है । उसका निर्देश भी करना यहां उचित समझकर किया जाता है-
श्री गुरुदेव प्रहलाद की वाणी सवा हजार ।
सुने सुनावे पाठ उर, "श्याम" सहज भव पार ॥ श्यामदास कृत ।
श्रीवाणी प्रहलाद की, वाणी ब्रह्म गियान ।
हृदय हरि प्रकाश हो, हरिदास भ्रम भान ॥ हरिदास कृत ।
प्रेम प्रीति हरि हित बढ़े, होय ब्रह्म पद वास ।
वाणी पढ़ प्रहलाद की, केशव कर्म विनाश ॥ केशवदास कृत
उद्धव आदि रु अंत मधि, जो उर धारे संत ।
वाणी गुरु प्रहलाद की, तारण जीव अनन्त ॥ उद्धवदास कृत ।
वाणी गुरु प्रहलाद की, राघव ब्रह्म विलास ।
जिन हृदय धारण करी, ताके दोष विनास । राघवदास कृत ।
नव षट् ठारह चार ग्रन्थ, मथि अनुभव ले घीव ।
प्रहलाद कृत धर श्याम उर, प्राण पुष्ट पद पीव ॥ श्यामदास कृत ।
कह हरिराय सहाय जग, वाणी गुरु प्रहलाद ।
जिन पढ़ उर धारण करी, ताके मिटे विषाद ॥ हरिराय कृत ।
रतनाई रत राम से, आठों पहर अखंड ।
जप वाणी प्रहलाद को, छूटे जमको दंड ॥ रतनाई बाई कृत ।
वाणी गुरु प्रहलाद की, हृदय सु धारे कोय ।
केशी कर्म नवारि है, लीन अमर पद होय ॥ केशीबाई कृत ।
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*प्रहलाददासजी की समाधि*
प्रहलाददासजी की समाधि घाटड़ा में ही बड़ा बाग के कूप के पास है । समाधि की अच्छी मानता है । चरण चिन्हों को धोकर आसपास के लोग  ले जाते हैं और रोगी को देने से रोग में शांति आती है । पशु आदि को देने से पशु ठीक होते हैं नजर लगी पर देने से बच्चे ठीक होते हैं । कामना करके बोल्यारी बोलने वालों की कामनायें पूर्ण होती हैं । घाटड़ा में वर्षा नहीं हो तो प्रहलाददासजी की समाधि पर जाकर प्रार्थना करने पर हो जाती है । समाधि पर जात, जडूला, सवामणी आती हैं । प्रहलाददासजी की समाधि से पूर्व की ओर कुछ ही दूर पर प्रहलाद दह है उसमें १२ मास पानी रहता है । प्रहलाददासजी की समाधि के पास ही इनकी शिष्य परंपरा के महन्तों की समाधिया हैं । 
(क्रमशः)

४९. भ्रम विधवंस कौ अंग २१/२४

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*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
*श्रद्धेय श्री Tapasvi @Ram Gopal Das की प्रेरणा से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Meta AI*
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*४९. भ्रम विधवंस कौ अंग २१/२४*
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*कंचन की सरभरी८ तुलै, पुनि करै कुरु छेत्र ।*
*कहि जगजीवन भोग भ्रम, हरि मंहि खुलै न नेत्र ॥२१॥*
(८. कंचन की सरभरी=सोने के बराबर)
कोई व्यक्ति सोने की मेरु पर्वत जैसी बड़ी ढेरी को तराजू पर तोल कर दान कर दे, और उसके बाद कुरुक्षेत्र जैसे महातीर्थ में जाकर भी दान-पुण्य करे, तो भी उससे मुक्ति नहीं मिलती । जगजीवन साहेब कहते हैं कि यह सब केवल भोग की इच्छा और भ्रम ही है, इससे हरि में प्रेम के नेत्र नहीं खुलते । सच्चा लाभ तो तब है जब मन हरि में लगे, केवल सोना दान करने से भगवान नहीं मिलते ॥२१॥
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*गंग गया गोदावरी, कटै न तन का मैल ।*
*कहि जगजीवन जग धरम९, ज्यूं तेली का बैल ॥२२॥*
(९. जग धरम=जगत का दैनिक कर्म)
गंगा, गया, गोदावरी जैसे पवित्र तीर्थों में बार-बार नहाने से शरीर का मैल भी पूरी तरह नहीं कटता, तो मन का मैल कैसे कटेगा । जगजीवन जी कहते हैं कि बिना प्रेम के जो जगत का धर्म यानी केवल बाहरी तीर्थ-व्रत किया जाता है, वह तेली के बैल जैसा है । बैल आँख पर पट्टी बाँध कर दिन भर कोल्हू के चारों ओर घूमता है, पर वहीं का वहीं रहता है, आगे नहीं बढ़ता । वैसे ही जीव भी तीर्थों में घूमता रहता है पर माया से बाहर नहीं निकलता ॥२२॥
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*तीरथ व्रत करि करि मुए, सेवा पूजा पाक ।*
*जगजीवन जग का धरम, ज्यूं कुलाल का चाक ॥२३॥*
अनेक लोग तीर्थ, व्रत, सेवा, पूजा, पवित्र भोजन और नियम आदि करते-करते ही मर गए, पर भीतर की मुक्ति नहीं मिली । जगजीवन जी कहते हैं कि संसार का यह केवल बाहरी धर्म कुम्हार के चाक जैसा है । चाक लगातार घूमता ही रहता है, कभी स्थिर नहीं होता, और उसी पर बर्तन बनते-बिगड़ते रहते हैं । वैसे ही जीव भी इन बाहरी कर्मों के चक्कर में जन्म-मरण के चक्कर में ही घूमता रहता है ॥२३॥
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*बदरी फिरि केदार फिरि, जगन्नाथ फिरि जोइ ।*
*गंगा सागर द्वारिका, सब तीरथ गमि१ होइ ॥२४॥*
{१. गमि=गति(जाना)}
चाहे तुम बदरीनाथ फिर आओ, केदारनाथ फिर आओ, जगन्नाथ पुरी, गंगा सागर और द्वारिका, सारे तीर्थ घूम लो, तो भी मन को कहीं सच्चा ठिकाना नहीं मिलता । सब तीर्थ घूम लेने पर भी अगर भीतर हरि से प्रेम नहीं जगा, तो मन भटकता ही रहता है । बाहर की यात्रा से पैर थकते हैं, मन शांत नहीं होता, शांति तो भीतर के तीर्थ में मिलती है ॥२४॥
(क्रमशः)

शनिवार, 17 अक्टूबर 2026

प्रहलादजी ब्रह्म स्वरूप में

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*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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*सब चतुराई देखिये, जे कुछ कीजे आन ।*
*मन गह राखै एक सौं, दादू साधु सुजान ॥*
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निरंतर निदिध्यासन रूप रटन करके प्रहलादजी ब्रह्म स्वरूप में ही प्रवेश कर गये थे ।
परम पुरुष प्रहलाद के, इतने शिष्य सब धर्म धुर¹ ॥
तिन मधि बड़ बानैत हेत² हापोजी होई ।
धीरध और अनन्त, बुरो जनि मानो कोई ॥
चरणदास भजनीक, तिलकधारी है केशो ।
हरीदास पुनि पाट, कियो हरि घर सु प्रवेशो ॥
कान्हड़दास कल्यारा, पुन. परमानन्द धमंडी ।
रामदास हरदास, भक्त भगवद्द की मंडी³ ।
राघव को रुचि रात दिन, भर्यौ भक्त भगवंत गुरु ॥
परम पुरुष प्रहलाद के, इतने शिष्य सब धर्म धुर ॥६६२॥
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परम पुरुष प्रहलादजी के, इतने शिष्य भागवद्द धर्म रूप रथ की धुरी¹ को धारण करने वाले थे । उनमें प्रेमाभक्ति² रूप बाण चलाने वाले बानैत और महान १- हापाजी ही थे । इस बात से कोई बुरा न मानें और भी अनन्त बड़े थे । २- भजनीक चरणदासजी और ३- तिलकधारी केशवजी । गद्दी पर हरिदासजी ही बिराजे थे और उन्होंने हरिधाम(स्वरूप) में ही प्रवेश किया था ।
(उक्त छंद के "तिन मधि से प्रवेशो" तक के चार पादों ने समाज में विवाद खड़ा कर रखा है । इनमें यह कह कर कि- सबसे बड़े हापाजी थे, फिर कहते हैं कि कोई मेरी इस बात पर बुरा नहीं मानें, और भी अनन्त बड़े थे अर्थात् हरिदासजी से बहुत बड़े थे । चरणदासजी भजन करने में बहुत बड़े थे । और केशवदासजी तिलक गुरु गादीधारी होने से बहुत बड़े थे । फिर भी हरिदासजी पाट अर्थात् गद्दी धारण करते थे अर्थात् उनकी स्वयं की गद्दी हिन्डौन में लगती थी और उन्होंने हरिस्वरूप में प्रवेश किया था इससे बड़े थे । राघवदासजी हरिदासजी के शिष्य थे अतः अपने गुरुदेव की महिमा करना भी उनका कर्तव्य था ही । किन्तु उनका तात्पर्य पाटड़ा गद्दी पर वे बिराजे थे ऐसा मानले तो पाटड़ा की गद्दी के महन्तों में हरिदासजी का नाम आना चाहिये सो तो आता नहीं, केशवदासजी का ही आता है । "हरिदास पुनि पाट" यह राघवदास जी का पाद भी यही ध्वनि करता है कि- प्रहलाददासजी की गद्दी पर तो केशवदास ही बैठे थे फिर भी हरिदासजी गद्दी पर ही बिराजते थे । ऐसा मान लेने पर संगति बैठ जाती है । कारण वे हिन्डौन में गद्दी पर ही विराजते थे । हिन्डौन उनकी स्वयं की गादी थी ही । उक्त पदों के प्रयोग से मुझे तो ऐसा ही ज्ञात हो रहा है । वास्तविकता क्या है, यह तो भगवान् ही जाने)
४- कान्हड़दासजी ५- कल्यारादासजी ६- परमानन्दजी ७- धमंडीजी ८- रामदासजी कहीं कहीं "धमंडी रामू" भी पाठ मिलता है । अतः धमंडी रामदास का विशेषण भी हो सकता है । ९- हरदासजी । इन सब ने ही भगवान् की भक्ति की³ थी । राघवदासजी कहते हैं- मेरे हृदय में रात दिन यही रुचि रहती है कि भक्त, भगवान् और गुरु का यश कहता ही रहूँ ।
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दो माधव दो सूर, दो नारायण नापो ।
चतुरदास दो सन्त, नहीं जिनके अंग आपो ॥
श्यामदास चरणदास, मतो नरहरि को न्यारो ।
किशनो मोहन मान, रामजी सबको प्यारो ॥
भाषा में भौरे नहीं, राघव ज्यों की त्यों कही ।
परम पुरुष प्रहलाद की, पैज प्रकट पंथ सु रहो ॥६६३॥
उक्त सभी प्रहलादजी के शिष्यों में देहाभिमान नहीं रहा था और सबको ही रामजी प्रिय लगते थे । राघवदासजी कहते हैं- यह मैंने भूल में नहीं कहा है, जैसा था वैसा ही कहा है । दादू पंथ में प्रहलादजी की श्रेष्ठता की टेक अच्छी प्रकार रही थी अर्थात् दादूपंथ में वे महान् माने जाते हैं ।
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*प्रहलादजी के सेवक शिष्य*
ये स्वामी प्रहलाद के, राघव सेवक शिष्य बरणि ॥
सेवक बडव कुरेत, प्रथम धीरावत सारे ।
खान पान से रहित, नाम तिनके निरवारे¹ ॥
भरतोजी बड़ भक्त, छओं दर्शन में जारां ।
वेणीदास बखान, भावे आदर अन्त पारगौ² ॥
रामसाहि धन धर्म, धुर³ गुरु आज्ञा अंत बणी ।
भई भक्ति गोविन्ददास, कुल दीपक कीरति घणि ॥
भांझू भक्ति जुंभारखां, देवकरण हरि की शरणि ।
ये स्वामी प्रहलाद के, राघव सेवक शिष बरणि ॥६६४॥
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प्रथम बड़े कुरेत(कुरीति वाले) थे । वे सब घाटड़ा के धीरावत आपके सेवक बन गये थे । मांस मदिरा का खान पान छोड़ दिया था । फिर तो वे मांसादि के नाम उच्चारण करने से भी छूट गये¹ थे । घाटड़ा के धीरावतों में भरतजी बड़े भक्त थे । उनको छःओं दर्शन- (योगी, जंगम, सेवड़े, बौद्ध, सन्यासी, शेष) ये छः प्रकार के भेषधारी सब जानते थे । वेणीदासजी भी कथन करने योग्य हो गये हैं । वे आये अतिथियों का अति आदर करते थे और प्रेम से अन्न जल² देते थे ।
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रामसाहजी ने तो अपना धन धर्म में ही लगाया था और अंत³ तक गुरु आज्ञा का पालन किया था । उनकी अन्त में अच्छी स्थिति बन गई थी । गोविन्ददासजी भी भक्ति की अच्छी अवस्था को प्राप्त हो गये थे । ये भी कुल दीपक माने जाते थे । इनकी कीर्ति भी बहुत फैल गई थी । झांझूजी जुंझारखांजी और देवकरणजी ये सब भक्ति करके हरि की शरण में आ गये थे । उक्त प्रकार प्रहलाददासजी के सेवक शिष्य भी अच्छे भक्त हुए हैं । यह भक्तमालकार ने आंखों देखी ही बातें लिखी हैं ।
(क्रमशः) 

४९. भ्रम विधवंस कौ अंग १७/२०

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*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
*श्रद्धेय श्री Tapasvi @Ram Gopal Das की प्रेरणा से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Meta AI*
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४९. भ्रम विधवंस कौ अंग १७/२०
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गया प्रयाग बनारसी, इहाँ ही जगन्नाथ३ ।
जगजीवन इस जीव का, जे हरि पकड़ै हाथ ॥१७॥
(३. जगन्नाथ=जगन्नाथपुरी का मन्दिर)
गया, प्रयाग, बनारस और जगन्नाथ धाम सब यहीं इसी घट में मिल जाते हैं, अगर हरि कृपा करके इस जीव का हाथ पकड़ ले । संत जगजीवन जी कहते हैं कि भगवान के मिलते ही सारी तीर्थ यात्रा पूरी हो जाती है, फिर कहीं बाहर जाने की आवश्यकता नहीं रहती ।
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जगजीवन पटु४ कर ह्रिदै, सब तीरथ का राइ ।
सकल साध पावन भए, जीवन जांनै ताहि ॥१८॥
(४. पटु=सत्कर्म में कुशल, स्वच्छ, निर्दोष)
संत जगजीवन जी कहते हैं कि अपने हृदय को ही पवित्र कर लो, वही सब तीर्थों का राजा है । जो इस हृदय रूपी तीर्थराज को पहचान लेता है, उसका जीवन पावन हो जाता है, और सभी साधु संत भी उसे पवित्र मानते हैं, सबसे बड़ा तीर्थ अपना शुद्ध हृदय ही है ।
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अड़सठ तीरथ सब करै, फिर फिर बार हजार ।
जगजीवन हरि भगति बिन, अंट पड़ै मुझ छार५ ॥१९॥
(५. छार=धूल) 
कोई व्यक्ति अड़सठ तीर्थों की यात्रा हजार-हजार बार भी कर ले, फिर भी क्या होगा । सांय जगजीवन जी कहते हैं कि हरि भक्ति के बिना वह सब राख में मिल जाता है, व्यर्थ चला जाता है । भाव ये है कि गिनती से मुक्ति नहीं मिलती, एक बूंद सच्ची भक्ति हजार तीर्थों से भारी होती है ।
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बासी६ बस्या बनारसी, मांहि विषै की प्यास ।
(तौ) मगहर मरण गति सोभई७, सुकहि जगजीवनदास ॥२०॥
{६. बासी=पुराने समय से(चिर काल से)}   (७. सोभई=शोभा देना)
कोई व्यक्ति बनारस जैसे पवित्र धाम में बरसों से बसा हुआ है, पर भीतर अभी भी विषयों की प्यास लगी है, तो उसका बनारस में रहना व्यर्थ है । संत जगजीवनदास जी कहते हैं कि उससे तो मगहर में वैराग्य और हरि नाम के साथ मरना भी ज्यादा शोभा देता है, क्योंकि स्थान बड़ा नहीं होता, मन की पवित्रता ही बड़ी होती है ।
(क्रमशः) 

शुक्रवार, 16 अक्टूबर 2026

*२९. साधु महिमा का अंग ~९/१२*

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*🌷卐 सत्यराम सा 卐🌷*
साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*२९. साधु महिमा का अंग ~९/१२*
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*आकार भार छाया अरु वास, जन कपूर के चार्यों नास ।*
*अंजन१ पलट निरंजन होई, यह गति बूझे विरला कोई ॥९॥*
जैसे कपूर का आकार, भार, छाया और गंध चारों ही वायु के संग से चले जाते हैं, वैसे ही संत के भी चारों परमार्थ विचार द्वारा चले जाते हैं, वह मायिक१, आकार से बदलकर निरंजन ब्रह्म को प्राप्त होता है, इस निरंजन ब्रह्म की प्राप्ति रूप गति को कोई विरला ज्ञानी ही समझता है ।
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*साहिब सौं साधु बड़े, साधु बड़ा न कोय ।*
*रज्जब देख्या गुरु दृष्टि, सब नीके कर जोय१ ॥१०॥*
परमात्मा से संत बड़े हैं, संतों से बड़ा कोई नहीं है, यह हमने गुरदेव की ज्ञान-दृष्टि द्वारा देखा है, हे साधक ! तू भी सबको अच्छी प्रकार विचार करके देख१ ।
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*सेवक स्वामी एक ह्वै, ता ऊपरि अधिकार ।*
*यथा बुदबुदा वारि शिर, देखे सब संसार ॥११॥*
सेवक स्वामी के साथ एक हो जाता है, उस एकता पर भी जैसे जल का बुदबुदा जल रूप होने पर भी जल के ऊपर रहता है, इसको सब संसार देखता है वैसे ही सेवक का अधिकार स्वामी के ऊपर रहने का होता है ।
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*स्वामी सेवक शिर धर्या, आदू अदभुत बंध ।*
*रज्जब पेख्या पुहमि पर, पुत्र पिता के कंध ॥१२॥*
स्वामी ने सेवक को शिर पर ही धारण किया है, यह अदभुत संबन्ध आदि काल का ही है, हमने वर्तमान में भी पृथ्वी में पुत्र को पिता के कंधे पर देखा है । अत: संत हरि से अधिक है ।
(क्रमशः)

*२९. साधु महिमा का अंग ~५/८*

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साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*२९. साधु महिमा का अंग ~५/८*
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*साधु अगाध अगस्त्य है, सांई सुधा समुंद ।*
*उभय समाने उभय उर, रज्जब रही न बुंद ॥५॥*
संत तो अपार महिमा वाले अगस्त्य ऋषि के समान हैं और परमात्मा अमृतमय समुद्र के समान हैं । जैसे समुद्र पान के समय समुद्र अगस्त्य में समा गया था, एक बिन्दु भी शेष न रही थी और समुद्र के अभिमानी देवता के हृदय में अगस्त्य का आकार बस रहा था, वैसे ही संत के हृदय में हरि और हरि के हृदय में संत रहते हैं ।
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*वृक्ष बीज मीश्रित सदा, सेवक स्वामी तेम१ ।*
*पाला पानी होत हैं, पुनि पानी तैं हेम२ ॥६॥*
जैसे बीज में वृक्ष है और वृक्ष में बीज, वैसे ही१ सेवक में स्वामी है और स्वामी में सेवक है । जैसे बर्फ२ जल बन जाता है और जल ही पुन: बर्फ बन जाता है वैसे ही परमात्मा संत बन जाते हैं और संत परमात्मा बन जाते हैं ।
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*माया ब्रह्म ने जो किया, सो उन बाहर नाँहिं ।*
*रज्जब साधु अगाध दिल, उभय समाने माँहिं ॥७॥*
माया और ब्रह्म ने जो संसार रचा है, वह उनके बाहर नहीं है, किन्तु संत का हृदय तो महान् अगाध है कारण, माया और ब्रह्म दोनों उसमें समाये हुये हैं, यद्यपि संत माया का चिन्तन नहीं करते किन्तु माया ब्रह्म से अलग नहीं रह सकती । अत: वह संत के हृदय में है किन्तु संत को मोहित नहीं कर सकती, संत उसे मिथ्या समझते हैं ।
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*साधु शक्ति१ कपूर गति, अकल कला इहि भौन२ ।*
*सह गुण निर्गुण होत है, मिल परमारथ पौन३ ॥८॥*
साधु की माया१ की गति कपूर के आकार की गति के समान होती है, जैसे कपूर में भार और गंध रूप कला दिखाई देती है, किन्तु वायु३ मिलने पर वह अकल हो जाती है, अर्थात भार और गंध दोनों ही कपूर के स्थान में नहीं रहते, वैसे ही संसार-भवन२ में संत की सगुणता रूप शरीरादि माया परमार्थ विचार होने पर नहीं रहती, वे निर्गुण ब्रह्म-रूप ही हो जाते हैं ।
(क्रमशः)

*प्रहलाददासजी का परिचय*

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷*卐 श्री दादूदयालवे नम: 卐*🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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*दादू मम सिर मोटे भाग, साधों का दर्शन किया ।*
*कहा करै जम काल, राम रसायन भर पिया ॥*
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भक्तमाल में राघवदासजी ने *प्रहलाददासजी का परिचय* इस प्रकार दिया है—
मू. छ.—परम पुरुष प्रहलाद धनि, देव¹ ज्योति द्विजकुल भयो ॥
दिपत देह देदिप्य, दुती² सनकादिक ओपे³ ।
हढ़ दिग्पाल महन्त, परम गुरु थप्यो पछोपे⁴ ॥
दादू दादा गुरु लगे, सर्वज्ञ सुन्दरदास गुरु ।
निराकार को नियमव्रत, पहुँचायो परलोक धुर⁵ ।
राघव राम प्रताप तैं, प्राण मुक्ति पर पद लियो ।
परम पुरुष प्रहलाद धनि, देवज्योति द्विजकुल भयो ॥५६६॥
परमात्मा¹ शोभा² उपमा³ पीछे⁴ ब्रह्म⁵ प्राप्ति तक ।
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मू. म.— दादूजी के पंथ में दरद वंद¹ देव² ज्योति,
प्रणऊ³ प्रहलादजी प्रहलाद के पठंतरे ।
वह प्रेम वह नेम वह प्राण प्रीति रीति,
वह मन मायाजित मगन महन्तरे ॥
बह जत वह सत वह रंग रामरत,
निर्मल निर्दोष सुखदाई महासंतरे ।
राघो कहै मन वच कर्म धर्म धारणा से,
जीवत मुक्त भये उपमा अनन्तरे ॥५६७॥
युक्त¹ ईश्वर² प्रणाम³ करता हूँ ।
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मीठे मुख वचन रु कंचन ज्यों कान्ति वन्त,
दिपत ललाट पाट स्वामी प्रहलाद को ।
हाथ को उदार हरि हेत होते राखे नाहीं,
शुद्ध बुद्ध महा-संत जैसे सनकादि को ॥
भगति को पुंज भगवन्त जु रिझायो जिन,
भूत भविष्य वर्तमान आज्ञाकारी आदि को ।
लोपी नाहीं राम रेख प्रीति सेती पूज्यो भेख,
राघो कहै रामजी निवाह्यो व्रत साधको ॥५६८॥
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मू. इ.- कलि काल में आय निहाल भये, प्रहलाद मिले प्रहलाद कि नांई ।
उदार अपार दया सनमान, इसी विधि से रिझिये जिन सांई ॥
शील संतोष निर्दोष रु निर्मल, सन्तत से न दिई कहूं बांई ।
राघो कहै गुरु के गुरु से मिलियो मुजरो¹ कियो राम के तांई ॥५६६॥
चौथे पाद का अर्थ—अपने गुरु बड़े सुन्दरदासजी के गुरु दादूजी से मिलकर अर्थात् उनके उपदेशों के अनुसार साधन करके रामजी से मिलकर उनको प्रणाम¹ किया अर्थात् अपने को रामजी के समर्पण करके रामजी में ही मिल गये ।
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*प्रहलाददासजी की निष्पक्षता*
प्रहलाददासजी महाराज समता प्राप्त निष्पक्ष संत थे । सभी संत व भक्तों में उन की समान दृष्टि थी । जब प्रहलाददासजी ने सुना कि अग्रदासजी के शिष्य नारायणदास (नाभा) जी ने भक्तमाल की रचना की है, तब वे बहुत प्रसन्न हुये थे । फिर उन्होंने उसे आदि से अंत तक पढ़ा तब उसमें उनको एक महान् कमी का अनुभव हुथा . वह था निर्गुण भक्तों की कथायें उसमें नहीं देना । नाभाजी ने वि. सं. १६७० के आसपास भक्तमाल लिखी थी । उस समय तक अनेक निर्गुण ब्रह्म के भक्त हो गये थे किन्तु उनको नाभाजी ने अपनी भक्तमाल में स्थान नहीं दिया और उन निर्गुण भक्तों के समकालीन होने वाले सगुण भक्तों की उसमें कथायें दी हैं ।
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यह पक्षपात प्रहलाददासजी को अच्छा नहीं लगा । इससे एक दिन अपना सत्संग समाप्त होने पर संत सभा में, सामने बैठे हुये अपने पौत्र शिष्य राघवदासजी को प्रहलाददासजी ने कहा— राघवदासजी आप एक ऐसी भक्तमाल लिखो जिसमें किसी भी प्रकार का पक्ष नहीं हो । अपने परम गुरुजी की आज्ञा को संत सभा में स्वीकार करते हुये राघवदासजी ने कहा— आपकी आज्ञा का पालन अवश्य किया जायगा । फिर राघवदासजी ने भक्तमाल लिखी सो प्रसिद्ध है । नाभाजी की भक्तमाल में लगभग चार सौ भक्तों का उल्लेख हुथा है और राघवदासजी रचित भक्तमाल में १२ सौ भक्तों का उल्लेख है । उक्त कथानक से भी ज्ञात होता है कि प्रहलाददासजी निष्पक्ष संत थे तब ही पौत्र शिष्य को ऐसी आज्ञा दी थी ।
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*प्रहलाददासजी की वाणी*
प्रहलाददासजी की वाणी—साखी भाग में अंग ६९ हैं । साखी ३६७ हैं । अरिल १०९ हैं । चौपाई २७ हैं । सोरठा ६ हैं । निसानी ६ । सवैछंद ४८४ हैं । रागों में पद ९५ । राग ३३ हैं । बत्तीस अक्षर प्रमाण से ग्रंथ संख्या १२५० है ।
उदाहरण परिचय अंग से—
उर प्रहलाद प्रकाशिया, पारब्रह्म का तेज ।
सूरज सेन न संभवे, पीव पियारी सेज ॥१॥
गुरु अंग से—
दादू दादा गुरु दिपै, सद्गुरु सुन्दरदास ।
अंग वाकि इक ज्योति हरि, जन प्रहलाद प्रकाश ॥३॥
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*प्रहलाददासजी के शिष्य*
मू. छ.— परम पुरुष प्रहलाद के, शिष्य हरिदास शिरोमणि भयो ॥
कछवाहा कुल आदि, नाम पहले हो हापो ।
पुन परसि प्रहलाद, तज्यो कुल बल क्रम¹ आपो² ॥
कोमल कछवकुमार, नहीं चंचलता हांसी ।
शम दम सुमिरन करे, मोक्ष पद जुगति उपासी ॥
हदफ³ मार हरि को मिल्यो, जन राघव रट अनहद गयो ।
परम पुरुष प्रहलाद के, शिष्य हरिदास शिरोमणि भयो ॥६६१॥
परमपुरुष प्रहलादजी के शिष्यों में हरिदासजी शिरोमणि हुये हैं । इनका आदि कुल कछवाहा(कूर्म) था । ये आमेर नरेश मानसिंह के भाई थे । इनका नाम पूर्वाश्रम में हापाजी था । फिर ये गुरु प्रहलादजी से मिले तब इनने अपना कुल, कर्म¹ संपत्ति, बल आदि छोड़ दिये थे । कुल बलादि के अभिमान से रहित होकर ही अपना व्यवहार चलाया था । और भी सभी प्रकार का अभिमान² छोड़ दिया था । ये कूर्म कुल के हापाजी जब कुमार थे तब भी इनका व्यवहार वृद्धों का सा था । इनमें हंसी आदि चंचलता की बातें तो लेशमात्र भी नहीं थीं । ये मन और इन्द्रियों को रोककर हरि स्मरण ही करते थे । योग युक्ति पूर्वक मोक्षपद की उपासना करनेवाले उपासक थे । अज्ञान के ज्ञान की चोट³ मारकर अर्थात् अज्ञान को गुरु ज्ञान द्वारा नष्ट करके हरि को प्राप्त हुये थे ।
(क्रमशः)

४९. भ्रम विधवंस कौ अंग १३/१६

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*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
*श्रद्धेय श्री Tapasvi @Ram Gopal Das की प्रेरणा से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Meta AI*
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४९. भ्रम विधवंस कौ अंग १३/१६
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तीरथाटन१० फल भोगं, सह्कामं सर्वदा दुखं ।
कहि जगजीवन रांम नांमं, निष्कामं त्रिवृति सुखं ॥१३॥
(१०. तीरथाटन=तीर्थयात्रा) 
तीर्थों में घूमने-फिरने का फल सिर्फ भोग मिलना है, और कामना रखकर किया गया कोई भी काम सदा दुख ही देता है । संत जगजीवन जी कहते हैं कि इसलिए राम नाम को बिना किसी कामना के जपना चाहिए, क्योंकि निष्काम राम नाम जपने से तीनों प्रकार के ताप मिट जाते हैं और सच्चा सुख मिल जाता है ।
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मथुरा गंगा गोमती, कहा पखालै१ अंग ।
जगजीवन हरि नांम का, जो नहिं लाया रंग ॥१४॥ 
(१. पखालै=धोवे, स्वच्छ करे)
मथुरा, गंगा, गोमती में जाकर शरीर को धोने से क्या होगा, अगर मन पर हरि नाम का रंग ही नहीं चढ़ा । संत जगजीवन जी कहते हैं कि जैसे कपड़ा केवल पानी में डुबोने से नहीं रंगता, उसे रंग में डुबोना पड़ता है, वैसे ही बाहर के पानी से मन का मैल नहीं धुलता, मन तो हरि नाम के प्रेम के रंग से ही पवित्र होता है ।
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मांही मथुरा परसिये, मांही केसौ राइ ।
बाहर टापा२ दीन कूं, जगजीवन जिन जाइ ॥१५॥
(२. टापा दीन कूं=उछल कूद करने के लिये)
असली मथुरा अपने भीतर ही है, उसी को परस करो जी, और केशव राय यानी कृष्ण भी अपने भीतर ही बैठे हैं । बाहर दौड़-भाग करना तो केवल दीनता और भटकाव है, संत जगजीवन जी ज्ञानी जन इसलिए बाहर नहीं जाता, वह भीतर ही सब तीर्थों को पा लेता है ।
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घट मंहि मथुरा परसिये, घट मंहि गंगतरंग । 
जगजीवन घट खोजतां, नख सिख लागै रंग ॥१६॥
घट के भीतर ही मथुरा का दर्शन होता है, और घट के भीतर ही गंगा की तरंगें बह रही हैं । संत जगजीवन जी कहते हैं कि जब साधक बाहर नहीं, अपने ही घट को खोजता है, अंतर्मुख होता है, तब उसका नख से शिख तक पूरा शरीर हरि के प्रेम के रंग में रंग जाता है ।
(क्रमशः)

गुरुवार, 15 अक्टूबर 2026

प्रहलाददासजी

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*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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*दादू दत्त दरबार का, को साधु बांटै आइ ।*
*तहाँ राम रस पाइये, जहँ साधु तहँ जाइ ॥*
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मू.इ.—राम रजा¹ रजवंशि² बड़ो सत, सुन्दरदासजि पंथ में पूरो ।
गोप्य रह्यो पसरचो न पसारे में, न्यारे³ में ऊपज्या ज्ञान अंकूरो ॥
निज बोध निरोध कियो निश्चै, उतग्यो घट में पट हो गयो दूरो ।
राघो कहै गुरु दादू की दौलत, मोक्ष भयो कर मंगल तूरो⁴ ॥४८६॥ 
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रामजी की इच्छा¹ से राजवंश² में उत्पन्न बड़े सुन्दरदासजी दादूपंथ में पूरे सन्त हुये हैं यह सत्य है । आप प्रायः गुप्त रूप से ही रहे हैं । बाह्य सांसारिक पसारे में अपने मत को आपने नहीं फैलने दिया था । एकान्त³ रहने से ही आपके हृदय में अनुभव ज्ञानरूप अंकुर उत्पन्न हुआ था । आपने अपने ज्ञान का निरोध किया था अर्थात् विशेष रूप से उपदेश नहीं करते थे । आपका मन निश्चय पूर्वक शरीर के भीतर ही परमात्मा के स्वरूप की गहराई में उतर गया था । इससे आप के अन्तः करण का अज्ञान रूप पट सर्वथा दूर हो गया था । 
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राघवदासजी कहते हैं- गुरु दादूजी की ज्ञान रूप सम्पत्ति से आप परमार्थ रूप मांगलिक नगारा⁴ बजाकर जीवन्‍मुक्ति को प्राप्त हो गये थे । आपके शिष्य एक प्रहलाददासजी ही थे ! अन्य कोई शिष्य आपने नहीं किया था । प्रहलाददासजी को भी दादूजी महाराज की प्रेरणा से ही किया था वैसे तो ये परम विरक्त थे । इनकी वाणी भी नहीं है । ये प्रायः अन्तर्मुख वृत्ति रखते हुये ब्रह्म भजन में लीन रहते थे । इति श्री प्रथम अध्याय समाप्तः १
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अथ अध्याय २
प्रहलाददासजी
प्रहलाददासजी पूर्व आश्रम में बीकानेर नरेश के पुरोहित थे किन्तु बीकानेर नरेश जैतसिंहजी के पुत्र भीमराजजी जब दादूजी के शिष्य होकर बड़े सुन्दरदास बन गये तब दादूजी की आज्ञा से प्रहलादजी भी बड़े सुन्दरदासजी के शिष्य होकर प्रहलाददास बन गये । फिर गुरुजी के साथ ही रहने लगे । घाटड़े के पर्वत शिख पर सुन्दरदासजी प्रहलाददासजी की मैंड़ी नामक आश्रम में जब तक सुन्दरदासजी ब्रह्म भजन करते रहे तब तक प्रहलाददासजी भी उनके पास ही रहकर भजन करते रहे । 
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फिर जब सुन्दरदासजी वहां से विचर गये तब प्रहलाददासजी भी पर्वत से नीचे उतर ग्राम में धीरावत ठाकुरों की कोटडियों से कुछ दूर पर आकर विराजे और वहां ही भजन करने लगे । फिर वहां ही भक्तों ने प्रहलादशाल नामक आश्रम बनवा दिया । उसी में रहकर प्रहलाददासजी भजन करने लगे । प्रहलादशाल की चौखट के ऊपर के भाग में प्रहलाददासजी महाराज की मूर्ति भी खुदी हुई है ।
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स्थान का परिचय राघवदासजी ने भी भक्तमाल में दिया है, वह भी यहां देते हैं देखिये-
मू. छ. - वहर¹ वहत्तर देश, छीड़ ताहू में छोटी ।
धन्य स्वामि प्रहलाद, भक्ति तहं थापी मोटी ॥
द्वन्द्वपुरी ग्रति दिपै, तहां स्वामी की शाला ।
संग रह सन्त ग्रनन्त, करें हरिजी प्रतिपाला ॥
शुक्ल² धर्म को धार, मिल्यो धीरावत भरथो ।
सत-संगति से नेह, रचे पद साखी ग्ररथो ॥
दिन प्रति द्वादश कोटड़ी, न्यौतैं दल मंगल करें ।
रंग लागो राघो कहै, गुरु द्वारे सर्वस धरें ॥६६६॥
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वाहर¹ के ७२ देश हैं, उनमें सबसे छोटा छीड़ देश है । उस छीड़ में महान् भगवद् भक्ति की स्थापना की, उन स्वामी प्रहलादजी को धन्य है । उस देश में द्वन्द्वपुरी में स्वामी प्रहलाददासजी की भजन शाला है । इससे वह ग्राम ग्रति प्रकाशित हुथा है . द्वन्द्वपुरी में ही पहले रहे थे । पीछे घाटड़ा गये थे । द्वन्द्वपुरी घाटड़ा के ग्रास-पास ही है । वहां भी प्रहलादजी की शाला है । आपके संग ग्रनन्त संत रहते थे, उन सब का योग-क्षेम रूप पालन भगवान् ही करते थे । 
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आपके संग से शुद्ध² भागवत धर्म को धारण करके धीरावत भरतजी आपके साथ ही मिल गये थे ग्रर्थात् आपके समान ही भजन करने लग गये थे । भरतजी का सत्संग से अति स्नेह था । साखी औरर पदों का ग्रर्थ भरतजी को बहुत रुचिकर होता था । ये भरतजी आदि धीरावत ही द्वन्द्वपुरी से सुन्दरदासजी ग्रौर प्रहलाददासजी को घाटड़े ले गये थे । वैसे तो घाटड़े में धीरावतों के उस समय तीन सौ पचास के लगभग घर थे किन्तु १२ कोटड़ियां मुख्य थीं । प्रतिदिन ही घाटड़े की प्रहलादशाल पर उन १२ कोटड़ियों में से किसी एक का निमंत्रण आता था । 
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इस प्रकार १२ मास ही प्रहलादजी को सब संतों के साथ भोजन करा कर अपने घरों में मंगलाचार करते थे तथा सब ही लोग मांगलिक काम करते थे । गुरुवर स्वामी प्रहलादजी की कृपा से धीरावतों के रामजी का प्रेमरूप रंग लग  गया था । अतः वे लोग सन्त सेवा संबंधी सब ही वस्तुयें ले जाकर अपने गुरु प्रहलादजी के द्वार पर भेंट करते थे ।
(क्रमशः)

४९. भ्रम विधवंस कौ अंग ९/१२

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*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
*श्रद्धेय श्री Tapasvi @Ram Gopal Das की प्रेरणा से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Meta AI*
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४९. भ्रम विधवंस कौ अंग ९/१२
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असम५ अंस उतपति अनल, सुलभा६ निरखि समाइ ।
कहि जगजीवन ऊबरै, रांम रिदै ल्यौ लाइ ॥९॥
{५. असम=अश्म(पत्थर) के अन्दर से अग्नि(अनल) उत्पन्न होती है}   (६. सुलभा=आसानी से मिल जाती है) 
पत्थर से भी अंश निकलता है, अग्नि उत्पन्न होती है, जो सुलभ हो कर उसी में समा जाती है । संत जगजीवनदास जी कहते हैं कि वैसे ही यदि राम को हृदय में लौ लगा कर रखो तो जीव मुक्त हो जाता है, उबर जाता है ।
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कोई बंदै७ चंद्रमा, कोई बंदै सूर ।
हरिजन बंदै एक हरि, जगजीवन निज नूर ॥१०॥
(७. बंदै=प्रणाम करना)
कोई चंद्रमा को पूजता है, कोई सूरज को पूजता है । पर सच्चा हरिजन तो एक हरि को ही भजता है । संत जगजीवनदास जी कहते हैं कि वही हरि ही अपना निज नूर है, अपना प्रकाश है ।
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जिन जिन का जे इष्ट है, तिन कौं तिन की मांन८ ।
कह जगजीवन रांम उपासक, दूजी करै न कांन९ ॥११॥
(८. मांन=मर्यादा)    (९. कांन=संकोच)
जिसका जो इष्ट है, उसे वही मान्य है । संत जगजीवनदास जी कहते हैं कि जो राम का उपासक है, वह दूसरी किसी बात पर कान नहीं देता, वह एकनिष्ठ रहता है ।
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मुख* ना मांथौ सबद कै, गूंगी बांणी ग्यांन ।
कहि जगजीवन रांम तजि, इष्ट कथैं जे आंन* ॥१२॥
(*-*. जो उपदेशक राम के अतिरिक्त अन्य देवता की उपासना का उपदेश करते हैं उन की बातों में न शिर है न पैर और न उनकी वाणी में सार है ॥१२॥)
जो राम को छोड़ कर दूसरे को इष्ट बताते हैं, उनके शब्द का कोई मुख नहीं, कोई सिर नहीं है, वह गूंगी वाणी जैसा अज्ञान है । संत जगजीवनदास जी कहते हैं कि राम को छोड़ कर आन इष्ट की बात करना व्यर्थ है ।
(क्रमशः)

बुधवार, 14 अक्टूबर 2026

*२९. साधु महिमा का अंग ~१/४*

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साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*२९. साधु महिमा का अंग ~१/४*
इस अंग में साधु महिमा सम्बन्धी विचार करेंगे -
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*रज्जब साधु अगाध है, कहिये कौन समान ।*
*देखो शिव शक्ति सहित, सेवक ह्वैं तहँ आन ॥१॥*
संतों की महिमा अगाध है । कहिये, उनकी महिमा के समान किसकी महिमा है, देखो तो सही, संतों के स्थान में आकर माया के सहित ब्रह्म भी सेवक होकर रहते हैं ।
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*सकल धरे ऊपर धर्या, सांई अपना साध ।*
*रज्जब महिमा क्या कहै, अस्थल अगम अगाध ॥२॥*
परमात्मा ने अपने संतों को संपूर्ण मायिक प्रपंच के उपर रक्खा है, हम उनकी महिमा क्या कर सकते हैं ? उनकी महिमा रूप स्थान अति अगम और अगाध है ।
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*कीये में नाँहीं किया, साधु सम कोउ और ।*
*आप समाना इन्हौं में, इनको दी उर ठौर ॥३॥*
ईश्वर ने अपने बनाये हुये संसार में संत के समान अन्य कोई भी नहीं बनाया है, संतों के हृदय में स्वयं भगवान समाये रहते हैं और अपना हृदय रूप स्थान संतों को दिया है अर्थात संतों का विशेष ध्यान रखते हैं ।
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*साधु दिल सांई रहै, हरि हिरदै में साध ।*
*रज्जब महिमा क्या कहै, ठाहर उभय अगाध ॥४॥*
संतों के हृदय में परमात्मा रहते हैं और परमात्मा के हृदय में संत रहते हैं, संत और परमात्मा इन दोनों का ही महिमा रूप स्थान अगाध है, उसका कथन मैं पूर्ण रूप से कैसे कर सकता हूँ ?
(क्रमशः)

बखतावरसिंह खेतड़ी

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*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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*दादू धरती ह्वै रहै, तज कूड़ कपट अहंकार ।*
*सांई कारण सिर सहै, ताको प्रत्यक्ष सिरजनहार ॥*
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यहां पर जिन संतों को दर्शन की अभिलाषा थी उनको दर्शन दिया और आसोज सुदि चौदस को वहां अन्तर्धान हुये थे । अतः आसोज सुदि १४ को उस स्थान में भारी मेला लगता है । हालू के वंशज निर्वाण क्षत्रिय ही उस मंदिर के पुजारी हैं । यह सुन्दरदासजी के मेले के नाम से खेतड़ी के आसपास प्रसिद्ध है । इस मेले में यात्री दूर दूर से आते हैं । जो उनकी कामनायें होती हैं वे पूर्ण होती हैं । मेला में बहुत चढ़ावा आता है । 
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एक समय बखतावरसिंह खेतड़ी ने पूजा का बटाने का प्रस्ताव रखा था । पूजा बांटने से और उसे अपने लेने से बहुत हानि हुई और शरीर में भी रोग हो गया । फिर वहां जाकर चरणों में पड़ा और भेंट का कूप चढ़ाया तब अच्छा हुआ । 
सोई कहा भी है—
बखतावर सिंह खेतड़ी, कहि पूजा बट चाय ।
बहु अफाज तन दुखित बहु, पद परि कूप चढ़ाय ॥ सुन्दरोदय
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उक्त घटना के बहुत पीछे की एक घटना पांचेटिया के दुरसा चारण के वंशज पहाड़दान की मुझे पांचेटिया की दरियाव बाई ने सुनाई थी सो इस प्रकार है— दुरसा चारण रज्जबजी के शिष्य थे । अतः उनके वंशज दादूजी को ही अपना इष्ट मानते आये हैं । उनमें एक पहाड़दानजी उत्तराखंड की यात्रा के लिये गये थे । एक दिन मार्ग भूल गये । इससे वे बहुत व्यथित हुये और उन्होंने व्यथित हृदय से दादूजी महाराज का स्मरण किया तब थोड़ी ही देर में उनको एक संत आते दिखाई दिये । 
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पहाड़दानजी ने संतजी के पास जाकर सत्यराम बोलते हुये प्रणाम किया । फिर कहा— भगवन् ! मैं मार्ग भूल जाने से अत्यन्त व्यथित था अब आपके दर्शन से मुझे शांति मिली है । अपने इष्टदेव दादूजी महाराज का स्मरण करते ही आपका दर्शन हुआ है । इससे मैं उनकी कृपा ही आपके दर्शन में कारण समझ रहा हूँ । अब आप मुझे मार्ग बताने की कृपा करें । संतजी ने उसे अच्छी प्रकार मार्ग बता दिया । फिर उसने पूछा- भगवन् ! आपके शरीर का नाम क्या है ? आप कौन हैं ? 
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संतजी ने कहा- जिनका तुमने स्मरण किया था, मैं उन दादूजी महाराज का शिष्य हूँ, मैंने अपनी योग शक्ति से तुम्हारी स्थिति जान ली थी अतः तुमको मार्ग बताने के लिये ही बहुत दूर से योग शक्ति द्वारा यहां तुम्हारे पास ही प्रकट हुआ हूँ । मेरे शरीर को बड़े सुन्दरदास के नाम से बोलते हैं । इतना कहकर संतजी वहां ही अन्तर्धान हो गये । पहाड़दान सुन्दरदासजी के दर्शन कर अपने को कृतार्थ मानने लगा और दादूजी महाराज  का स्मरण करते हुये मार्ग से पर्वत के नीचे उतर कर यात्रा करता हुआ अपने ग्राम पांचेटिया में आ गया । 
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इस घटना से भी सूचित होता है कि बड़े सुन्दरदासजी हिमालय में अब भी भजन कर रहे हैं । दादूजी महाराज ने उनको कहा था- गुप्त रह कर भजन करना और पुण्यवान को दर्शन देना । वैसे ही वे रहते हैं । बड़े सुन्दरदासजी का समाज में निर्वाण दिन नहीं माना जाता है । इससे भी सूचित होता है कि वे अब तक विद्यमान हैं । 
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बड़े सुन्दरदासजी की स्थिति भक्तमाल के कर्ता राघवदासजी के विचारानुसार बड़े सुन्दरदासजी की स्थिति देखिये- मू. इ.-
दादू दयाल की शाल¹ शिरोमणि, ऐसे घड़े घट उपमा लायक ।
नारद ज्यों निश्चय निर्भय किये, ज्ञान परापरि² बेहद वायक ॥
भीम ज्यूं भर्म उड़ायो आकाश को, ऐसो बली सिध साधु सहायक ।
राघो कहै पुनि वृद्धि पछोप³ की, एक से एक अनूप महायक⁴ ॥४८५॥
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दादू दयालजी की सत्संग रूप श्रेष्ठ टकशाल¹ में बड़े सुन्दरदासजी ऐसे उत्तम सन्त रूप घट बनाये गये हैं जो अति उत्तम उपमा देने योग्य हैं । दादूजी ने अपने सत्संग में अपने शिष्यों को नारदजी के समान भक्ति विषय में निश्चय वाले तथा निर्भय बना दिये थे । दादूजी के परात्पर² परब्रह्म ज्ञान के सम्बन्धी वचन असीम हैं अर्थात् ब्रह्मज्ञान और ब्रह्म को असीम बताने वाले हैं । जैसे भीम ने युद्ध के समय हाथियों को आकाश में उड़ा दिया था, वैसे ही दादूजी ने अपने सत्संग में आने वाले शिष्यों के हृदय से अज्ञान को उड़ा दिया था ।
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दादूजी ऐसे परमार्थ बल से युक्त बली और साधक सन्तों के सहायक सिद्ध सन्त थे । राघवदासजी कहते हैं कि फिर आपके पीछे³ भी आप की शिष्य परंपरा में ऐसे ही सन्तों की वृद्धि हुई जो एक से एक अधिक और अनुपम है । इन बड़े सुन्दरदासजी जैसे अनेक महान्⁴ महात्मा हुये हैं ।
(क्रमशः)

४९. भ्रम विधवंस कौ अंग ५/८

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*श्रद्धेय श्री Tapasvi @Ram Gopal Das की प्रेरणा से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Meta AI*
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४९. भ्रम विधवंस कौ अंग ५/८
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कहि जगजीवन हरि भगति, हरि भजि करै बिचार ।
रांम नांम भजि रांम मिलि, सहजैं उतरै पार ॥५॥
भावार्थ - जगजीवन दास जी महाराज कहते हैं कि हरि की भक्ति ही सच्चा विचार है, हरि का भजन करो । राम नाम को भज कर, राम में मिल कर जीव सहज ही इस भवसागर से पार उतर जाता है ।
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सेवा पूजा सव करैं, घर घर पूजैं देव ।
जगजीवन निज वस्तु का, कोई बिरला जांनै भेव ॥६॥
सब लोग सेवा-पूजा करते हैं, घर-घर में देवताओं को पूजते हैं । संत जगजीवन दास जी कहते हैं कि अपनी निज वस्तु, अपने भीतर बैठे उस आत्म-राम का भेद कोई विरला ही जान पाता है ।
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गंडक१ रेती आंनि करि, पूजैं सालिगरांम ।
जगजीवन ते क्यौं तिरैं, तिनके रिदैं न नांम ॥७॥
(१. गंडक=नदी की)
गंडक नदी की रेत से निकले पत्थर को ला कर लोग सालिगराम के रूप में पूजते हैं । जगजीवन दास जी महाराज कहते हैं कि जिनके हृदय में राम का नाम ही नहीं है, वे ऐसे पत्थर पूज कर कैसे तरेंगे ।
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असम पूज२ यौं ही रह्या, तूटा३ तुलसी तोडि४ ।
कहि जगजीवन रांम भगति बिन, खोडि भरी इंहिं खोडि ॥८॥
(२. असम पूज=पाषाण पूजक)    (३. तूटा=टूट गया)    (४. तुलसी तोडि=तुलसी के पत्ते तोड़कर उन से पूजा करने वाला)
पत्थर की पूजा तो वैसी ही पड़ी रह गई, और तुलसी के पत्ते तोड़-तोड़ कर बेकार कर दिए । जगजीवन दास जी कहते हैं कि राम की भक्ति के बिना तो जैसे घाव में और घाव भर दिया, एक खोड में दूसरी खोड जोड़ ली ।
(क्रमशः) 

मंगलवार, 13 अक्टूबर 2026

*२८. साधु असाधु परीक्षा का अंग ~२८/३०*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*२८. साधु असाधु परीक्षा का अंग ~२८/३०*
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*अंगहु१ अंग मिले नहीं, गुण लक्षण गत२ गात३ ।*
*तो रज्जब क्यों होयगा, साधु सम कथ बात ॥२८॥*
संत के लक्षणों१ से असंत के लक्षण तो मिलते नहीं, अत:जिसके शरीर३ से शुभगुण और संत के लक्षण तो चले गये२ हैं, फिर वह संत के समान केवल बातें करके ही संत कैसे हो सकेगा ?
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*बादल वन्दे शीश पर, सूखे सजल अपार ।*
*रज्जब रत रीतों नहीं, धन्य जु वर्षनहार ॥२९॥*
शिर पर सूखे और जल-सहित बहुत बादल हैं किन्तु खाली बादलों से कौन प्रेम करता है ? वर्षने वालों को ही धन्यवाद दिया जाता है, वैसे ही शिर पर, अर्थात साधु भेष से युक्त बहुत साधु दिखाई देते हैं, किन्तु ध्यान ज्ञानादि साधनों से खाली पर कौन श्रद्धा करता है ? जो ज्ञानरूप वर्षा वर्षाते हैं, उन्हें ही धन्यवाद दिया जाता है ।
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*आँख उदर ठाहर उभय, एक समान सु नाँहिं ।*
*एकहु रज न समाव ही, उगल गले इक माँहिं ॥३०॥*
शरीर में नेत्र और पेट ये दो स्थान हैं, ये दोनों एक से नहीं हैं, नेत्र में तो किचिंत मात्र रज भी नहीं समाती और पेट खाकर भरता है और खाली भी होता है, वैसे ही विराट् शरीर के साधु और असाधु दोनों स्थानों में से साधु में तो कीचिंत मात्र भी दोष तथा पाप नहीं समाता और असाधु हिंसादि कर्म करके पाप हृदय में भरता है और उसका फल भोगकर उनको हृदय से निकालता भी है ।
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इति श्री रज्जब गिरार्थ प्रकाशिका सहित “२८. साधु असाधु परीक्षा का अंग” समाप्त ॥
(क्रमशः)

*२८. साधु असाधु परीक्षा का अंग ~२५/२७*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*२८. साधु असाधु परीक्षा का अंग ~२५/२७*
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*साधु हिरदा शून्य१ सम, मुक्ता२ मल न रहाय ।*
*और सकल उर धर४ मयी३, बहु विधि विघ्न उपाय ॥२५॥*
संत का हृदय आकाश१ के समान है, जैसे आकाश सभी मलों से मुक्त२ रहता है, उसमें मल नहीं रहता वैसे ही संत का हृदय सब पापादि दोषों से रहित है, उसमें कोई भी दोष नहीं रहता और संपूर्ण असंतों का हृदय पृथ्वी४ रूप३ है, जैसे पृथ्वी विविध प्रकार के उपायों से मैली होती रहती है, वैसे ही असंतों के हृदय बहुत प्रकार के दोष रूप विघ्नों से मलीन होते रहते हैं ।
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*संसारी१ राकेश२ उर, झाँई३ दर्शे माँहिं ।*
*साधु दिल सूरजमयी४, प्रतिविम्ब पड़े सुनाँहि ॥२६॥*
असंत१ का हृदय चन्द्रमा२ के समान है, जैसे चन्द्रमा में पृथ्वी की छाया३ पड़ती है, वैसे ही असाधु के हृदय में विषयों की छाया पड़ती है, अर्थात विषयाशा रहती है । संत का हृदय सूर्य-रूप४ है, जैसे सूर्य पृथ्वी का प्रति-बिम्ब नहीं पड़ता है वैसे ही संत के हृदय में विषयाशा नहीं रहती । यही संत -असंत की परीक्षा है ।
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*दर्पण में दीपक दर्शे, दीवे दर्पण नाँहिं ।*
*यूं संसारी१ अरु साधु के, व्यौरा२ उरहु सु माँहिं ॥२७॥*
दर्पण में दीपक का प्रतिबिम्ब दिखता है, किन्तु दीपक में दर्पण का प्रतिबिम्ब नहीं दिखता, वैसे ही असाधु१ के हृदय में तो विषयाशा भासती है किन्तु साधु के हृदय में नहीं भासती । यही उनके हृदय का समाचार२ है ।
(क्रमशः)

अचला गिरि

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷*卐 श्री दादूदयालवे नम: 卐*🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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*बिन गुण व्यापे सब किया, समर्थ आपै आप ।*
*निराकार न्यारा रहै, दादू पुन्य न पाप ॥*
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इसी समय दादूजी के शिष्य बड़े सुन्दरदासजी अपनी गुफा से किसी कार्यवश बाहर आये थे । कृष्णादासजी पयाहारी के उक्त विचारों को सुनकर वे बोले-
“दादू माला तिलक से कुछ नहीं, काहू सेती काम ।
अन्तर मेरे एक है, अह निशि उस का नाम ॥
स्वांग सगाई कुछ नहीं, राम सगाई सांच ।
दादू नाता नाम का, दूजै अंग न राच ॥”
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उक्त दादूजी की साखी सुनकर उस साधु को अति प्रसन्नता हुई । कारण, वह राजस्थानी था और दादूजी से तथा दादूपंथ से परिचित था । अतः उसने कहा- ये दादूजी महाराज की साखी यहां कौन बोल रहा है ? कृष्णादासजी पयाहारी ने कहा- ये दादूजी के शिष्य बड़े सुन्दरदासजी बोल रहे हैं । फिर वह साधु उठकर सुन्दरदासजी की गुफा के ऊपर गया । वहां अनेक संत साधना में संलग्न थे । सब के दर्शन किये । सुन्दरदास को सत्यराम बोलकर दंडवत करी । फिर कृष्णादासजी पयाहारी के पास आकर बैठ गया ।
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तब कृष्णादासजी पयाहारी ने कहा- अब तुम यहां से अपने देश को चले जाओ । साधु ने कहा- यहां आपकी चरण सेवा में ही रहने दीजिये । कृष्णादासजी ने कहा-यहां आप नहीं रह सकते । फिर उक्त योगी संत को कहा- तुम जहां से इनको लाये हो वहां छोड़कर शीघ्र आ जाओ । वह योगी संत उसको गुरुजी की आज्ञानुसार जहां से ले गये थे, वहां ही छोड़कर मार्ग भी बता गये कि इस मार्ग से चले जाओ आगे तुमको मानव मिलते रहेंगे । उनसे पूछ २ कर देश को चले जाना ।
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उक्त वैरागी साधु राजस्थान में पहुँचकर पहले नारायणा दादूधाम में गये । उस समय वहां के आचार्य चैनरामजी महाराज थे । उसने सुन्दरदासजी की सूचना चैनरामजी महाराज को दी । तब चैनरामजी महाराज ने कहा— तुम ठीक कह रहे हो, हम ध्यान के समय प्रतिदिन सुन्दरदासजी महाराज का दर्शन करते हैं । तुमको जो दर्शन प्राप्त हुआ है वह भी हमें ज्ञात हो गया है । उस वैरागी साधु के विश्वास के लिये फिर चैनरामजी महाराज ने पर्वत व सुन्दरदासजी तथा कृष्णादासजी की गुफा का संपूर्ण वर्णन सुनाया । चैनरामजी से सुनकर साधु को अति आश्चर्य हुआ ।
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साधु ने हाथ जोड़ कर कहा—महाराज ! आपको धन्य है । आपने वहां का विवरण जैसा बताया है, वह वैसा का वैसा ही है । ये सब मैं आंखों देखकर आया हूं । उस समय सुन्दरदासजी की गद्दी पर घाटड़ा में रामदासजी महन्त थे । सुन्दरदासजी महाराज के घाटड़ा से जाने के पश्चात् उनकी यह सूचना २२५ वर्ष बाद प्राप्त हुई । उस समय सभी स्थानों में उत्सव मनाया गया था । फिर दो संत नारायणा दादूधाम के आचार्य चैनरामजी महाराज से आज्ञा लेकर सुन्दरदासजी के दर्शन करने अचला गिरि को चले ।
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वे एक तो आचार्य चैनरामजी महाराज से आज्ञा लेकर चले थे दूसरे वे स्वयं भी समर्थ थे और सुन्दरदासजी में उनका सच्चा स्नेह भी था । अतः वे उक्त कारणों से तथा भगवत् कृपा से निर्विघ्न सुन्दरदासजी के पास पहुंच गये । सुन्दरदासजी के दर्शन करके दोनों संत बहुत प्रसन्न हुये । सुन्दरदासजी ने उन दोनों संतों को पूछा—आप लोग कौन हैं ? कहां से आये हैं ? और यहां कैसे पहुँच सके ? यह तो सर्व साधारण के आने योग्य स्थान नहीं है । संतों ने कहा— हम आप के ही हैं; राजस्थान से आये हैं और आपकी ही कृपा से यहां पहुंच सके हैं ।
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फिर उन दोनों संतों को समझा कर पीछे लौटा दिया । दोनों संत जब देश पहुँचे तो बहुत-संत उनसे परिचय प्राप्त करके सुन्दरदासजी के दर्शन करने के लिये अचलागिरी जाने को तैयार होने लगे । तब योगीराज सुन्दरदासजी ने उनके विचार को अपनी योग शक्ति से अचलागिरि पर रहते ही जानकर सोचा, उन साधुओं के यहां आने से अच्छा नहीं रहेगा किन्तु उन की दर्शन करने की अभिलाषा भी तीव्र है । अतः उनको दर्शन देने के लिये मुझे ही वहां चलना चाहिये ।
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यह विचार करके स्वयं सुन्दरदासजी ही बिबाई ग्राम के पास पिपराणा स्थान में प्रकट हुये । कहा भी है—“सुन्दर प्रकटे आय बिबाई के पिपराणो” जहां प्रकटे थे वहां हालू नामक निर्वाण गोत्र के क्षत्रिये मिले । महाराज का दर्शन कर के हालू अति प्रसन्न हुये और कहा—भगवन् मैं आपकी क्या सेवा करूं ? तब संत सुन्दरदासजी ने कहा—कोई खाने योग्य वस्तु लाओ भूख लगी है ।
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तब हालू ने बाजरा के शिरे से ककर स्वामी सुन्दरदासजी के समर्पण किये । स्वामी सुन्दरदासजी ने उन्हें परमात्मा के समर्पण करके भोजन किया । हालू ने कहा- मेरी गायें रोग आने से मर गई हैं । तब सुन्दरदासजी ने हालू के हाथ से वन में एक बाड़ा बनवाया और कहा इस बाड़े में रोग नहीं आयेगा । उक्त सुन्दरदासजी का वचन ही जंत्र बन गया और उस बाड़े में बैल गाय आदि की वृद्धि हुई—कहा भी है—
“बनवायो बाड़ो बड़ो, आरन हालू हाथ ।
सुन्दर वायक जंत्र बन बड़ै बैल गऊ आथ ।”
(क्रमशः)