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🌷*卐 श्री दादूदयालवे नम: 卐*🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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*श्रम नहीं सब कुछ करै, यों कल धरी बनाइ ।*
*कौतिकहारा ह्वै रह्या, सब कुछ होता जाइ ॥*
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*२ आत्मारामजी*
आत्मारामजी अलखरामजी महाराज के शिष्य थे । इन्होंने अपना साधन धाम गुहाला में एक पहाड़ी की टेकड़ी पर बनाया और वहां रहकर भजन करने लगे । यह स्थान भी जनता का पूजनीय रहा है । इस स्थान पर विवाह के पश्चात् प्रणाम करने आते हैं । श्रद्धा रखते हैं । आत्मारामजी की समाधि कूप पर स्थान से कुछ ही दूर पर है । इनके चरण वि. सं. १८५२ में चेतनदासजी व लक्ष्मणदासजी ने पधराये हैं ।
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इनकी परम्परा के वर्तमान अधिकारी अपने को ७ वां बताते थे । चौथे लक्ष्मणदासजी पांचवें रामसहायजी छठे नारायणदासजी हुये । ७ वें रामरिछपालजी ने आत्मारामजी की जीवनी तथा अन्य मुझे कुछ भी नहीं बताया । रामसहायजी ने मोहनदासजी अवधूत का चातुर्मास २१ मूर्तियों के सहित वि. सं. १९६७ में कराया था तथा नारायण के आचार्य दयारामजी का चातुर्मास वि. सं. १९७९ में कराया था ।
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*अन्य शिष्य*
*३ मयारामजी* ने सिरोही में अपना साधन धाम बनाया । वहां रहकर ही दादूजी महाराज की वाणी द्वारा बताई गई पद्धति से ब्रह्म भजन करने लगे । यह सिरोही गुहाला के आसपास शेखावाटी में ही है ।
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*४ बलदेवजी* ने मागूकवास में अपना साधनधाम बनाया । वे वहां ही रहकर भजन करने लगे । आप भी अच्छे संत हुये हैं ।
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*कृपारामजी खेतड़ी*
*५ कृपारामजी* अलखरामजी द्वारा स्थापित स्थान खेतड़ी में १ कृपारामजी रहे । कृपारामजी तांत्रिक व वैद्य थे । इनकी खेतड़ी में अच्छी प्रतिष्ठा थी । उनके २ रामरूपजी ३ भक्तावरदासजी ये भी खेतड़ी के प्रसिद्ध वैद्य हुये हैं । ४ जयरामदासजी ये भी वैद्य ही थे । इस स्थान के नीचे अलखरामजी को प्राप्त हुई ५४०) रु. वार्षिक की जायदाद माफी में है । यह खेतड़ी नरेश ने दी थी ।
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*केवलदास जी*
*६ केवलदासजी* ने जैंतूसर(रींगस के पास) में अपना साधनधाम बनाया । प्रथम कुछ दिन रींगस में भी रहे थे । जैंतूसर के पास गूढ़ा ग्राम है, उसके अर्जुनसिंह राजपूत के भीखासिंह नामक एक ही पुत्र था । वह किसी भयंकर बीमारी में फंस रहा था । बहुत इलाज कर चुके थे । किन्तु ठीक नहीं होता था । जब मरणासन्न हो गया तब केवलदासजी को बुलाया ।
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पहले तो केवलदासजी नट गये किन्तु जब अति आग्रह किया तब वे बुलाने वाले के साथ गये और ग्राम के पास पहुंचे तब वह मर चुका था । ग्रामवालों ने कहा- वह तो मर गया । केवलदासजी ने कहा- फिर भी मैं आया हूं तो उसे देखना तो चाहता हूं । घर वाले रो रहे थे । केवलदासजी ने कहा- चुप रहो, यह तो सो रहा है । फिर सबको शव के पास से बाहर निकाल दिया और एक मात्र आप शव के पास एक घण्टा रहे । उस घण्टे में उसे जीवित कर दिया और उससे पूछा- क्या खायेगा ? उसने कहा- लड्डू । तब कपाट खोलकर उसे लड्डू देने को कहा । फिर तो सब परिवार में तथा ग्राम में आनन्द की लहर दौड़ गई ।
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फिर केवलदासजी उसी समय जैंतूसर पधार गये । बीमार के परिवार वालों ने भेंट देने का बहुत आग्रह किया किन्तु केवलदासजी ने कुछ भी नहीं लिया ।वि. सं. १८९० में जैंतूसर में आश्रम के पास कूप बनवाने लगे थे । कूप खोदना आरम्भ करने लगे तब लोगों ने कहा- हनुमानजी की पूजा करो । तब केवलदासजी ने कहा- हम दादूजी की पूजा करेंगे, उसी पूजा में सब की पूजा हो जायगी ।
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केवलदासजी की प्रतिष्ठा अधिक हो जाने से कुछ तांत्रिक इनसे ईर्ष्या करते थे । कारण- उनकी केवलदासजी के आगे कुछ भी शक्ति नहीं चलती थी । जो रोग तांत्रिकों के तंत्र-मंत्रादि उपायों से दूर नहीं होते थे उनको केवलदासजी विभूति देकर ही शीघ्र दूर कर देते थे । इससे वे लोग इनसे रुष्ट रहते थे और इनको मारने के लिये मूठादि प्रयोग भी उन लोगों ने किये थे किन्तु मूठादि भी केवलदासजी को मारने में सफल नहीं हुये थे । केवलदासजी वि.सं. १९२० के लगभग ब्रह्मलीन हुये थे । केवलदासजी की शिष्य परम्परा- १ केवलदासजी, २-प्रयागदासजी, ३-रामबगसजी, ४-गिरधारीरामजी, ५-कालीदासजी वर्तमान में हैं ।
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*दयारामजी*
*७- दयारामजी* ने उदयपुर(शेखावाटी) में टीटैड़ा पर अपना साधन धाम बनाया जो उदयपुर से जसात में जाने के मार्ग में पड़ता है । उक्त प्रकार अलखरामजी महाराज तथा उनके ७ शिष्यों का परिचय यथा प्राप्त दिया गया है । बाईजी के थांभा के स्थान- १- नारायणा, २- हरमाड़ा, ३- चूरू, ४- चौकड़ी, ५- गुहाला, ६- उदयपुर(शेखावाटी), ७- माणकवास, ८- खेतड़ी ९- सिरोही(शेखावाटी), १०- जैंतूसर, ११- भोवतपुरा, १२- सिकन्दरा, १३- रामगढ़ शहर, १४- रामतलाई कोटा(राजस्थान) ।
(क्रमशः)








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