रविवार, 10 मई 2026

*१०. विरह का अंग~ ५७/५९*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*१०. विरह का अंग~ ५७/५९*
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*चकवी को चकवा मिले, बीते यामिनि१ याम२ ।* 
*रज्जब रजनी आयु बिहाई, मिले न आतम राम ॥५७॥* 
रात्रि१ की चारों पहर२ व्यतीत होने पर चकवी को तो चकवा मिल जाता है किन्तु हमारी आयु-रात्रि व्यतीत होने पर भी हमें अपने आत्मास्वरूप राम नहीं मिल नहीं मिल पा रहे हैं अत: खेद है । 
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*विरह अग्नि एकै सबहुं, हृद१ हाँडी सु अनेक ।* 
*भाव भिन्न भोजन विविध, रज्जब रंधैहिं विवेक ॥५८॥* 
हृदय१ रूप हँडिया बहुत हैं, प्रेमपात्र संबन्धी भाव रूप भोजन भी सबके विचित्र प्रकार के हैं, उन भाव-भोजनों को पकानेवाला विरह रूप अग्नि एक ही है किन्तु उन भावों को विवेकपूर्वक पका कर हरि को प्राप्त करना ही विशेषता है । 
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*एक विरह बहु भांति का, भाव भिन्न बिच होय ।* 
*रज्जब रोवे राम को, सो जन बिरला कोय ॥५९॥* 
विरह तो एक ही प्रकार का होता है किन्तु विरहीजनों के मन में प्रेम-पात्र सम्बन्धी भाव विभिन्न होते हैं अर्थात भगवद् भिन्न के भी विरही होते हैं किन्तु वह जन कोई बिरला ही होता है जो रात्रि दिन भगवान् के लिये ही रोता है ।
(क्रमशः)

२४. सांख्य ज्ञान कौ अंग ४९/५२

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२४. सांख्य ज्ञान कौ अंग ४९/५२
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बहुत सुगंध द्रुगंध करि, भरिये भाजन अंबु । 
सुन्दर सब मैं देखिये, सूरय कौ प्रतिबिंबु ॥४९॥
आत्मा की समानता : जैसे किसी पात्र में भले ही सुगन्धित जल भरा हो या किसी पात्र में दुर्गन्धमय; परन्तु दोनों में सूर्य का प्रतिबिम्ब तो समान भाव से ही दिखायी देता है ॥४९॥
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देह भेद बहु विधि भये, नाना भांति अनेक । 
सुन्दर सब मैं आतमा, बस्तु बिचारैं एक ॥५०॥ 
आत्मा की एकता : इस संसार में प्राणियों के देह विविध प्रकार के या नाना रूप में दिखायी देते हैं; परन्तु वहाँ वस्तुतत्त्व के विचार की दृष्टि से आत्मा की सत्ता सर्वत्र एक ही दिखायी देती है ॥५०॥
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तिलनि माहिं ज्यौं तेल है, सुन्दर पय मैं घीव । 
दार माहिं है अग्नि ज्यौं, देह माहिं यौं सीव ॥५१॥
आत्मा की व्यापकता : लोक में जैसे हम देखते हैं कि तिलों में तैल, दूध में घी, या काष्ठ में अग्नि सर्वत्र व्याप्त रहती है; उसी प्रकार, यह प्राणियों के देहों में यह शिवस्वरूप(मङ्गलमय) ब्रह्म सर्वत्र व्यापक है ॥५१॥
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फूल माहिं ज्यौं बासना, इक्षु माहिं रस होइ । 
देह माहि यौं आतमा, सुन्दर जानै कोइ ॥५२॥ 
या जैसे फूलों में गन्ध, ईख में रस सर्वत्र व्याप्त रहता है; उसी प्रकार इस आत्मा को भी सभी प्राणियों की देह में व्याप्त समझना चाहिये ॥५२॥
(क्रमशः)

*मनमुखी शिष्य ॥*

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*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*गुरु अंकुश मानैं नहीं, उदमद माता अंध ।*
*दादू मन चेतै नहीं, काल न देखे फंध ॥*
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*मनमुखी शिष्य ॥*
गुर बरजै सिष खोटा खाइ । जनम अमोलिक यौंही जाइ ॥टेक॥
जूवौ चोरी बरजी दोइ । परत्रिय संग करै जिनि कोइ ॥
सीख दियंताँ मानैं रोष । कुवै पड़ तौ किहिनैं दोस ॥
घड़ै चीकणैं जल की धार । भीतर भेदी नहीं लगार ।
जेती कही तेती बीसरी । इहिं कानि सुणी वहि कानि नीसरी ॥
सुणताँ कथा न कीयौ चेत । अठै नहीं कहींठै हेत ॥
ज्यूँ बूझ्या त्यूँ या गति भई । नौसै कीड़ी इहि बिलि गई ॥
सीष न मानैं येक लगार । ते सिख बूडा काली धार ॥
बषनां सीख न मानैं घणाँ । ते पाईसैं किया आपणाँ ॥११५॥
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मनमुखी शिष्य के आचार-विचारों का चित्रण करते हुए बषनांजी कहते हैं । गुरुमहाराज गलत मार्ग पर चलने के लिये मना करते हैं किन्तु कुशिष्य कुमार्ग पर ही चलता है । उसका अमूल्य मानव तन योंही व्यर्थ चला जाता है । जुवा खेलना, परस्वत्वापहरण रूपी चोरी करना-इन दोनों ही कुकर्मों को न करने के लिये कहा गया है । परस्त्रीगमन कोई भी न करे, यह भी विधि वाक्य है ।
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किन्तु मनमुखियों को उक्त शिक्षा जब दी जाती है तब वे इनको मानने के बजाय उल्टे बुरा मानते हैं, क्रोध करते हैं । बषनांजी कहते हैं कि यदि कोई जानबूझकर ही कूवे में पड़े तो दोष किसको दिया जाये ? अर्थात् किसी अन्य को नही दिया जा सकता । दोष तो स्वयं जानबूझकर गिरने वाले का ही माना जायेगा ।
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मनमुखी शिष्य की स्थिति ठीक वैसी ही होती है जैसी चिकने घड़े पर गिरने वाली जल की धरा की होती हैं जो गिरकर भी उसके अंदर प्रवेश नहीं कर पाती है । ऐसा कुशिष्य उन समस्त अच्छी बातों को विस्मृत कर देता है जितनी उससे कही जाती है । वह इस कान में सुनना है और दूसरे कान में से निकाल देता है ।
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सत्संग में बैठाकर ज्ञानचर्चा सुनाते समय भी चैतन्य = सावधान होकर ज्ञानचर्चा नहीं सुनी । वस्तुतः शरीर वहाँ था किन्तु मन किसी और तत्व के चिंतन में लगा था, कहीं और था । जब सुने हुए के बारे में सुनाने वाला पूछता है, भाई ! आपने क्या सुना; तब कुशिष्य की ठीक वैसी ही शून्य सी स्थिति होती है जैसे किसी बिल में नौ सौ चींटी घुसें फिर भी वहाँ जरासी भी आवाज न हो ।
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जो शिष्य गुरु की किञ्चितमात्र भी शिक्षा नहीं मानते वे काली धार = जन्म-मरण रूपी भयानक जलधारा में डूब मरते हैं । बषनां कहता है, जो बहुत से कुशिष्य गुरुमहाराज की सुशिक्षा नहीं मानते वे अपना किया स्वयं ही भुगतते हैं ॥११५॥

शनिवार, 9 मई 2026

१०. विरह का अंग~ ५३/५६

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साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das
श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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१०. विरह का अंग~ ५३/५६
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शूर सती का जुध जलन, एक हि समय सु नाश । 
ता ऊपर चार्यों पहर, पहले किये विनाश ॥५३॥ 
वीर का युद्ध के द्वारा और सती नारी का चिता में जलने के द्वारा एक समय ही नाश होता है किन्तु उस विरही पर तो चारों पहर ही विरह रूप विपति पड़ी रहती है, उसके सुखों का तो पहले ही विरह विनाश कर देता है । 
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रज्जब कायर कामिनी, रही विपति के रंग । 
सती चली सल१ चढ़न को, पहर पटम्बर अंग ॥५४॥ 
डरपोक नारी सती न होकर पति वियोग का दु:ख भोगने के लिये रह जाती है, किन्तु सती नारी तो शरीर पर श्रेष्ठ वस्त्र पहनकर चिता१ पर चढ़ने को चल पड़ती है । इसी प्रकार भगवद-विरही भक्त विरहाग्नि से नहीं डरते अभक्त ही डरते हैं । 
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रे प्राणी पति परिहर्या, बेहरि जाय क्यों नांहिं । 
जन रज्जब ज्यों जल गये, पंक२ तिड़ी३ सर१ माँहिं ॥५५॥ 
हे प्राणी तूने परमात्मा रूप स्वामी को त्याग दिया है, अत: जैसे तालाब१ का जल सूखने से कीचड़२ फट३ जाता है वैसे ही प्रभु वियोग से तेरा हृदय क्यों नहीं फट जाता ? 
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चकई ज्यों चक्रित१ भई, रैनी परी बिच आय । 
जन रज्जब हरि पीव को, क्यों कर परसौं२ जाय ॥५६॥ 
रात्रि आ जाने से चकवा से चकवी का वियोग होने पर जैसे चकवी चकित होती है वैसे ही आत्मा का अज्ञान होने से हरि-वियोग से विरही की बुद्धि चकित१ होकर सोचती है कि - मैं अपने प्रियतम हरि से किस साधन मार्ग से जाकर मिल२ सकूंगी ? सूर्योदय पर चकवा चकवी का मिलन होता है, वैसे ही आत्म ज्ञानोदय पर विरही और भगवान का मिलन होता है । 
(क्रमशः) 

२४. सांख्य ज्ञान कौ अंग ४५/४८

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२४. सांख्य ज्ञान कौ अंग ४५/४८
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काष्ट सु जोरे जुगति करि, कीया रथ आकार । 
हलन चलन जातें भया, सो सुन्दर ततसार ॥४५॥ 
जैसे कोई कुशल रथकार काष्ठ के खण्डों को जोड़ जोड़ कर उन को 'रथ'(चार पहियों की गाड़ी) का आकार दे दे, जिसमें चलन क्रिया होने लगे तो उस की भी कोई सत्ता नहीं है । वह भी उक्त पंच महाभूतों का सङ्घात ही है१ ॥४५॥ {१ बौद्ध दार्शनिकों में भी, देह की असत्यता-सिद्धि में, यह 'रथ' का उदाहरण बहुत प्रसिद्ध है । उनकी यह गाथा बहुत प्रसिद्ध है - 
"यथा हि अङ्गसम्भारा, होति सद्दो 'रथो' इति । 
एवं खन्धेसु सन्तेसु, 'पुग्गलो' होति विस्सुतो ॥"- 
मिलिन्दपञह, पृ० ३४; सं० नि० ५/१०/६ यहाँ 'पुग्गल' (पुद्‌गल) का अर्थ 'देह' (भूतसङ्घात) ही है ।}
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तत्व कहे इकतीस लौं, मत जू जुवा बखांनि । 
सुन्दर जल कौनैं पिया, मृगतृष्णा घर आंनि ॥४६॥
तत्त्वों की सङ्ख्या : विभिन्न शास्त्रकारों ने अपने अपने मत से इन तत्त्वों की संख्या ३१(इकतीस) बतायी है । ये सभी तत्त्व ब्रह्म(चेतन) के विना वैसे ही निःसार हैं जैसे मृगमरीचिका में दिखायी पड़ने वाला जल । क्या किसी ने आज तक मृगमरीचिका के जल से अपनी प्यास बुझायी है ! ॥ [५ + तत्त्व (महाभूत) + ५ तन्मात्राएँ + ५ ज्ञानेन्द्रिय + ५ कर्मेन्द्रिय + ४ अन्तःकरण + ३ गुण + १ प्रकृति + १ जीव + १ ईश्वर + १ परमात्मा (ब्रह्म) = ३१] ॥४६॥ 
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देह स्वर्ग अरु नरक है, बंध मुक्ति पुनि देह । 
सुन्दर न्यारौ आतमा, साक्षी कहियत येह ॥४७॥ 
स्वर्ग एवं नरक, बन्ध या मुक्ति में देह(जनित कर्म) कारण है । आत्मा इन सब से भिन्न हैं । इसको इन सब का साक्षी ही समझना चाहिये ॥४७॥
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सुन्दर नदी प्रवाह मैं, चलत देखिये चन्द । 
तैसें आतम अचल है, चलत कहैं मतिमंद ॥४८॥
प्रतिबिम्ब के कारण भ्रम : जैसे नदी के प्रवाहित जल में पतित चन्द्रमा के प्रतिबिम्ब को चलता हुआ देखकर कोई जडमति(अज्ञ) पुरुष चन्द्रमा को ही चलता हुआ समझ लेता है, वैसे ही देहस्थ आत्मा भी 'अचल' है; परन्तु बुद्धिहीन पुरुष उस आत्मा को, देहसंसर्ग के कारण, 'चल' समझने लगते हैं ॥४८॥
(क्रमशः)

*मन-वशीकरण-उपाय ॥*

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*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*जहाँ मन उठि चलै, फेरि तहां ही राखि ।*
*तहाँ दादू लैलीन करि, साध कहैं गुरु साखि ॥*
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*मन-वशीकरण-उपाय ॥*
हेरिले फेरिले घेरिले पाछौ । 
राम भगति करि होइ मन आछौ ॥टेक॥
जाणि ताणि अपूठौ आणि । जै बाणैं तौ हरि स्यूँ बाणिक ॥
बावरौ भयौ कि लागी बाइ । रीति तलायाँ झूलण जाइ ॥ 
साध संगति मैं रहु रे भाई । बषनां तूँ नैं राम दुहाई ॥११४॥
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मन के अधीन मानव मात्र को उपदेश देते हुए कहते हैं, मन एक जगह टिकता नहीं है । अतः सर्वप्रथम उस तत्त्व को ढूंढ लेना चाहिये जिस पर वह एक बार स्थिर हो जाने पर पुनः अस्थिर न हो ? अतः सर्वप्रथम इसके लिये आलम्बन ढूंढ लेना चाहिये । 
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चंचल होने से वह बार-बार सांसारिक विषयों की ओर दौड़ता है क्योंकि जन्म-जन्मान्तरों से इसे उनमें ही रमण करने की आदत पड़ी हुई है । अतः इसे बार-बार उन विषयों से फेर = उल्टा ला लाकर स्वात्मतत्त्व चिंतन में लगा । 
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जब बार-बार मोड़कर लाने से यह कुछ-कुछ स्थिर होने लगे तब सर्वप्रथम जिस तत्व को ढूंढा था उसमें इसको घेरि = पूर्णरुपेण संयोजित कर दे । चारों ओर से इसको हटाकर एकतत्व पर केन्द्रित कर दे । यही प्रक्रिया है, मन को वश में करने की । 
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योगशास्त्राकार ने भी यही प्रक्रिया बताई है “अभ्यास वैराग्याभ्यां तन्निरोधः ।” गीता में श्रीकृष्ण ने भी इसी प्रक्रिया का उल्लेख किया है “असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहंचलं । अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते ॥” वह आलम्बन क्या है जिसकी चर्चा ‘हेरि ले’ से की गई है । वह तत्व है ‘राम’ और उस राम को प्राप्त करने का साधन भक्ति है । 
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अतः कहते हैं, मन को राम की भक्ति में लगा दे ताकि वह चंचलता छोड़कर परमात्मतत्व में स्थिर होकर अच्छा हो जाये । मन को विषयों में बारबार जाता हुआ जानकर विवेक-वैराग्य रूपी चाबुक से बार-बार ताणि=समझा-बुझाकर स्वात्मतत्त्व रूपी आलम्बन पर पुनः पुनः वापिस लाकर स्थिर कर । 
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यदि हे मन ! तुझे किसी से बाणि = मित्रता करनी ही है, किसी में रमना ही है तो परात्पर-परब्रह्म-परमात्मा से ही मित्रता करके क्यों नहीं उसी में रमण करता है । अरे ! तू पागल हो गया है अथवा तुझे भूत-प्रेत लग गये हैं जो सूखी तलाई में स्नान करने जा रहा है । 
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अर्थात् परमात्मा रूपी सजल तालाब को छोड़कर विषयभोग रूपी तलाई में रमण करने जा रहा है । हे भाई ! हे सुहृद ! तू सदैव साधुओं = सज्जनों की संगति में रह । साधुसंगति को छोड़कर विषयवासनाओं में जायेगा तो तुझे बषनां की ओर से रामजी की सौगंध है ॥११४॥ 

शुक्रवार, 8 मई 2026

२४. सांख्य ज्ञान कौ अंग ४१/४४

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२४. सांख्य ज्ञान कौ अंग ४१/४४
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सुन्दर सूरय कै उदै, कृत्य करै संसार । 
ऐसैं चेतनि ब्रह्म सौं, मन इंद्रिय आकार ॥४१॥
लोक में यही देखा जाता है कि समस्त संसार सूर्य के उदित होने पर अपना कार्य अपने मन इन्द्रिय एवं शरीर से आरम्भ करता है । इन कर्मों में आत्मा साक्षीमात्र होता है ॥४१॥
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ब्योम वायु पुनि अग्नि जल, पृथवी कीये मेल । 
सुन्दर इनतें होइ का, चेतनि खेलै खेल ॥४॥
आकाश, वायु, अग्नि, जल एवं पृथ्वी - इन पाँच(महाभूतों) का सङ्घात ही 'शरीर' कहलाता है; परन्तु ये पाँचों ही जड(अचेतन) है, इन से कोई कर्म होना कैसे सम्भव है ! जब चेतन आत्मा का उन पर प्रभाव पड़ता है तब शरीर की चेष्टाएँ(कर्म) आरम्भ होती हैं । (चेतन खेलै खेल) ॥४२॥
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सुन्दर तत्व जुदे जुदे, राख्या नाम शरीर । 
ज्यौं कदली के खंभ मैं, कौंन बस्तु कहि बीर ॥४३॥
श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - इन पृथक् पृथक् तत्त्वों के सङ्घात(समूह) का नाम ही शरीर(देह) रख दिया गया है । इसके लिये कदली(केला) वृक्ष का उदाहरण लीजिये । तुम ही बताओ क्या उसमें कोई सङ्घात(ठोस) पदार्थ है जिसे 'केला' नाम से संकेतित किया जा सके ! ॥४३॥
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देह आप करि मांनिया, महा अज्ञ मतिमंद । 
सुन्दर निकसै छीलकै, जबकि उचेरे कंद ॥४४॥
कुछ महान् मूर्ख जडमतियों ने अपने देह में ही अध्यास कर उसमें ही ममत्व कर लिया है । उनसे पूछना चाहिये कि रे मूर्खों ! कभी किसी ने कन्द(प्याज) में कोई ठोस पदार्थ देखा है क्या ! उस में भी केले की तरह छिलके ही होते हैं । यही स्थिति हमारे इस देह की भी है ॥४४॥
(क्रमशः)

निकमौं बैठौ नाँव ले नांहीं

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*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*दादू देह जतन कर राखिये, मन राख्या नहीं जाइ ।*
*उत्तम मध्यम वासना, भला बुरा सब खाइ ॥*
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*मन ॥* 
निकमौं बैठौ नाँव ले नांहीं । औरै घाट घड़ै घट मांहीं ॥टेक॥
कुबधि कुदाली घट ही मांही । कूप खणैं पड़िबा कै ताँई ॥
घट मैं झाँखै आल जंजाल । कबहुँक पाताँ कबहुँक डाल ॥
घट मैं घड़ै जिसी ही बात । जिन बातनि थैं नरकहिं जात ॥
कहींक जाइ कहीं की आणैं । गली पांगली सबही जाणैं । 
घाट घडंताँ ही दिन जावै । बषनां हरि गुण कबहुँ न गावै ॥११३॥ 
जो मनुष्य मन के अधीन हैं, उनको मन रूप मानते हुए बषनांजी कहते हैं । मन रूपी निकम्मा मनुष्य स्थिर होकर परमात्मा के नाम का स्मरण तो नहीं करता है उल्टे बैठा-बैठा मन में नाना प्रकार के खयाली संकल्प-विकल्प करता है । 
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कुबुद्धि रूपी कुदाली भी शरीर के अंदर ही मन की सहायता करने को तत्पर रहती है जिसके सहकार से नाना सकाम-कर्म =बंधनकारीकर्म रूपी कूप को गिर पड़ने के लिये खोदता है = नरक में जाने के लिये नाना रागयुक्त सकाम-कर्म करता है । मन में नाना प्रकार के संकल्प-विकल्पों को करने में ही झांखै = व्यस्त रहता है । कभी सूक्ष्मविषयों के चिंतन और कभी स्थूल विषयों के चिंतन में लगता है । 
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वस्तुतः मन में मनुष्य जिन सांसारिक बातों के बारे में चिंतन-मनन करता है उनसे चित्त विषयाकार होने से वह नरकों में ही जाता है । मन इतना चंचल है कि जाता कहीं है और खबर कहीं की लाता है । अर्थात् संलग्न किसी एक विषय पर किया जाता है किन्तु बिना पूरा किये ही वह दूसरे कार्य को करने लग जाता है । 
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मन इतना सूक्ष्म है कि उसकी गति प्रत्येक स्थान, गली-कूँचे में है । अर्थात् वह हर विषय में अपने आपको नियोजित कर लेता है । मन का सारा समय व्यर्थ के नाना संकल्प-विकल्प करने में ही चला जाता है किन्तु काम आने वाले हरि के नाम-गुणों का चिंतन-स्मरण कभी भी नहीं करता है ॥११३॥

गुरुवार, 7 मई 2026

*१०. विरह का अंग~ ४९/५२*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*१०. विरह का अंग~ ४९/५२*
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*रज्जब ज्वाला विरह की, कबहूं प्रकटे मांहि ।*
*तो सींचो घृत सौचसौं, कर्म काष्ट जरि जाँहिं ॥४९॥*
हृदय में कभी विरहाग्नि की ज्वाला प्रकट हो जाय, तो उसे भगवद्-वियोगजन्य संताप रूप घृत से सींचना चाहिये । ऐसा करने से कर्म रूप काष्ठ जल जायेंगे और निष्काम होकर निष्कर्म ब्रह्म को प्राप्त हो जाओगे ।
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*अठार भार विधि आदमी, बिरही बंस विशेष ।*
*हरे हुताशन हरि प्रकट, रज्जब अचरज देख ॥५०॥*
अन्य मानव तो संपूर्ण वनस्पतियों के समान हैं और भगवद्-विरही विशेष करके बांस के समान है । जैसे बाँस में अग्नि प्रकट होकर बाँस को जलाता है, तब वह प्रथम से सुन्दर हो जाता है वैसे ही विरही के हृदय में ज्ञान रूप में हरि प्रकट होकर उसके अज्ञान को जला देते हैं फिर वह आश्चर्य रूप अपने स्वरूप को देखता है ।
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*पंख पटम्बर पिण्ड परि, माँहिं पपीहे प्राण ।*
*जन रज्जब दोऊ दहै, दिली दोस्त बिन जान ॥५१॥*
ताप से बचने के लिये चातक पक्षी के शरीर पर पंख और विरही के शरीर पर श्रेष्ठ वस्त्र होते हैं, तो भी चातक का मन अपने दिली प्रेमी स्वाति बिन्दु के अभाव में और हरि-विरही का मन अपने दिली मित्र हरि दर्शन के अभाव में जलता रहता है यह सत्य ही जानो ।
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*साधू सारस शोक की, स्वांग रहित सत शूल ।*
*जन रज्जब जग जुगल बिन, त्यागैं जीव सु मूल ॥५२॥*
संत और सारस पक्षी दोनों के सुन्दर भेष न होने पर भी उनकी विरह जन्य शोक की पीड़ा सत्य होती है । सारस अपनी जोड़ी के पक्षी बिना अपने जीवन के मूल प्राणों को त्याग देता है और संत अपने प्रभु के दर्शन बिना जगत् में नहीं रहना चाहता अपने प्राणों का त्याग कर देता है ।
(क्रमशः) 

बुधवार, 6 मई 2026

*१०. विरह का अंग~ ४५/४८*

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*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*१०. विरह का अंग~ ४५/४८*
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*विरही प्राणी चकोर है, विरहा अग्नि अँगार ।*
*रज्जब जारे और को, उनके प्राण अधार ॥४५॥*
विरही प्राणी चकोर पक्षी के समान हैं, विरह अग्नि के अँगारों के समान है । अग्नि के अँगारे अन्य को तो जलाते हैं किन्तु चकोर के भोजन रूप होने से प्राणाधार हैं, वैसे ही विरह अन्य को तो दु:ख-प्रद होता है, किन्तु भगवद्-विरही भक्तों का तो जीवन रूप होता है ।
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*विरही बेहरे विरह बिन, जे उर पावक नांही ।*
*रज्जब यथा समुद्रजिव१, जीवे ज्वाला माँहिं ॥४६॥*
यदि हृदय में विरहाग्नि न हो तो विरही हृदय फटने लगता है, जैसे अग्निकीट१ अग्नि की ज्वाला में ही जीवित रहता है, अग्नि बिना मर जाता है, वैसे ही विरही विरह बिना नहीं जी सकता ।
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*विरही सावित विरह में, विरह बिना मर जाइ ।*
*ज्यों चूंने का कांकरा, रज्जब जल मिल राइ१ ॥४७॥*
चूने के कंकर पर जब तक जल न पड़े तब तक ही वह साबित रहता है । जल पड़ते ही उसमें दरार१ पड़ती है और वह फूट जाता है, वैसे ही विरही भी विरहावस्था में ही ठीक रहता है, विरह न रहने पर मर जाता है ।
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*इश्क अल्लाह मलंग२ मन, दिल दरूंन१ बिच चौक ।*
*रज्जब मंजिल३ आशिकां, अजब४ बिना लद५ शौक ॥४८॥*
हृदय रूप भीतरी१ चौक में परमहंस२ का मन ईश्वर के विरहयुक्त प्रेम में निमग्न रहता है, यह विरह ही प्रेमियों के ठहरने का स्थान३ है । इस विलक्षण४ विरह के बिना विरही-जनों पर महान शोक रूप भार आ पड़ता५ है, जिससे व्यथित होकर रोते रहते हैं ।
(क्रमशः)

२४. सांख्य ज्ञान कौ अंग ३७/४०

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२४. सांख्य ज्ञान कौ अंग ३७/४०   
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देह कृत्य सब करत है, उत्तम मध्य कनिष्ट । 
सुन्दर साक्षी आतमा, दीसै मांहिं प्रविष्ट ॥३७॥
प्रत्यक्ष दिखायी देने वाले हमारे ये लौकिक उत्तम मध्यम हीन कर्म इस देह के द्वारा ही कृत है । हमारे देह में स्थित आत्मा तो केवल इनका द्रष्टा(साक्षी) है, जो कि देह में पृथक् रूप से स्थित है ॥३७॥
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अग्नि कर्म संयोग तें, देह कडाही संग । 
तेल लिंग दोऊ तपै, शशि आतम अभंग ॥३८॥
कर्मरूप अग्नि के संयोग से देहरूप कडाही में स्थूलशरीर एवं कारणशरीर - दोनों के प्रज्वलन से सुख दुःख का अनुभव होता है । श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - इस सुख दुःख के भोग में आत्मा का कोई सम्बन्ध नहीं होता, यह सुख दुःख का भोग केवल देह से सम्बद्ध है, आत्मा से कथमपि नहीं; क्योंकि वह आत्मा चन्द्रमा के समान सदा शीतल रहने कारण कभी न तप्त होने से पृथक्(अभंग) रहता है ॥३८॥
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सूक्षम देह स्थूल कौ, मिल्यौ करत संयोग । 
सुन्दर न्यारौ आतमा, सुख दुःख इनकौ भोग ॥३९॥
सूक्ष्म शरीर(कारण शरीर) का स्थूल शरीर का संयोग होता है । अतः वे ही इस सुख दुःख का भोग करते हैं । आत्मा इन सब से भिन्न है ॥३९॥
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हलन चलन सब देह कौ, आतम सत्ता होइ । 
सुन्दर साक्षी आतमा, कर्मन लागै कोइ ॥४०॥
शरीर की चलन, कम्पन(हिलना डुलना) आदि क्रियाओं(चेष्टाओं) में आत्मा साक्षिमात्र है । अतः उन क्रियाओं का सुख दुःख आदि फल आत्मा से सम्पृक्त नहीं होता ॥४०॥
(क्रमशः)

अैसैं मना रे अैसैं मना

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*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*संझ्या चलै उतावला, बटाऊ वन-खंड मांहि ।*
*बरियां नांहीं ढील की, दादू बेगि घर जांहि ॥*
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*सुमिरण-विधि ॥* साषी लापचारी की ॥१(१ इस साषी का अर्थ ‘सुमिरण कौ अंग’ में देखें ।)  
कौडी रमतौ डाबड़ौ डरतौ सास न लेइ  ।
बषनां साहिब तौ मिलै, यौं लै चरणाँ देइ ॥
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पद
अैसैं मना रे अैसैं मना । जहाँ चलौ साहिब अपना ॥टेक॥ 
बालबुधि ज्यूँ कौडी देइ । रिधि नैं डरता सास न लेइ ॥ 
ज्यूँ साचा सर लेनैं जाइ । जल थैं डरता बिलम न लाइ ॥ 
ज्यूँ पंथी पँथ मांहीं डरै । घर है दूरि रैंणि जिनि परै । 
अैसैं दौरि पहूँचनि करै । तौ बषनां सब कारिज सरै ॥११२॥
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जीव को प्रबोधित करते हुए कहते हैं, हे जीव ! मन को इस प्रकार संचालित कर, उसकी वृत्ति को उस राह पर चला जिस पर चलने से अपना साहिब निजस्वरूप परमात्मा का बोध = साक्षात्कार होता है । जिस प्रकार बालकबुद्धि अपरिपक्व बुद्धि वाले बालक को कोई एक कौड़ी दे देता है तो वह उसे बड़े यत्न से कहीं छिपाकर रखता है तथा उसके होने के बारे में एक श्वास भी न लेता है, किसी को कुछ भी नहीं बताता है । 
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जैसे मरजीवा = गोताखोर साचा मोती को निकालने के लिये सर = तालाब, कूपादि में उतरता है और जल में अधिक समय तक रहने के कारण श्वास रुक न जाये इस भय से उस बहुमूल्य पदार्थ को ढूंढने में जरा भी देरी नहीं करता है । 
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जिस प्रकार पंथ में चलता हुआ पंथी चलने में डरता हुआ शीघ्रता इसलिये करता है कि मेरा घर दूर तथा रास्ता लम्बा है, कहीं रात्रि न हो जाये अन्यथा अनजान रास्ते में ही कहीं रुकना पड़ जायेगा जो खतरे से खाली नहीं होगा । इस प्रकार सोचकर वह पंथी शीघ्र चलकर गंतव्य पर पहुँचता है । 
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बषनां कहता है, जो उक्त प्रकार से लक्ष्यारूढ़ होकर अनन्यभाव से लगातार संसार में निर्लिप्तभाव से रहते हुए रामजी का नाम स्मरण करता है, उसके समस्त मनोरथ पूर्ण हो जाते हैं । अर्थात् उसका लोक और परलोक दोनों सुधर जाते हैं ॥११२॥

*१०. विरह का अंग~ ४१/४४*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*१०. विरह का अंग~ ४१/४४*
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*कमान कसौटी१ विरह शर, प्राण चलावन हार ।*
*रज्जब छेदे सकल गुण, यूं अरि हूं हि सु मार ॥४१॥8
साधनजन्य कष्ट१ ही धनुष है, विरह ही बाण है, साधक प्राणी ही बाण चलाने वाला वीर है, उक्त सामग्री द्वारा ही सब गुण नष्ट किये जाते हैं, इस प्रकार ही कामादि शत्रुओं को सम्यक् रीति से मारना चाहिये ।
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*ज्यों चुंबक शिल नाल जटि, अस१ ऊभा रह जाय ।*
*त्यों रज्जब मन को विरह, जे देख्या निरताय२ ॥४२॥*
जैसे चुम्बक की शिला पर अश्व१ का पैर पड़ते ही उसके पैर की लोहे की नाल चुंबक पर भूषण में रत्न के समान जटिल हो जाती है और घोड़ा वहां ही खड़ा हो जाता है, चल नहीं सकता, वैसे ही मन को भगवद्-विरह रोक देता है, विषयों में नहीं जाने देता, जिन साधकों ने विचार२ कर के देखा है, उन्हें यह ठीक ज्ञात हुआ है ।
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*विरह केतकी पैठि कर, मन मधुकर व्है नास ।*
*रज्जब भुगते कुसुम बहु, मरे न तिन की वास ॥४३॥*
भ्रमर बहुत प्रकार के पुष्पों की वास-रस का उपभोग करता है किन्तु उसकी सुगंध से मरता नहीं और केतकी के पुष्प पर जाता है तब उसकी मस्त गंध से मस्तक फटकर मर जाता है । वैसे ही मन अन्य विषयादि से उपभोग से नहीं मरता, भगवद् -विरह व्यथा से ही मरता है ।
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*रज्जब बंशी२ विरह की, देही दरिया१ डारि ।*
*यूं अगस्त्य आरंभ बिन, मन मच्छा ले मारि ॥४४॥*
अगस्त्य के उदय होने पर वर्षाती नदी१ का पानी सुखने से मच्छी मर जाती है वा सूर्य की तीव्र किरणों के द्वारा पानी सूखने से मच्छी मर जाती है (रज्जबजी अगस्त्य शब्द का प्रयोग सूर्य के अर्थ में भी करते हैं) किन्तु अगस्त्य के जल सूखने के आरम्भ बिना भी मच्छी पकड़ने का काँटा२ नदी में डाल कर मच्छी मारी जा सकती है, वैसे ही देह रूप नदी में विरह रूपी बंशी डालकर मन-मच्छर को मारना चाहिये अर्थात विरह से मन मारा जाता है ।
(क्रमशः) 

मंगलवार, 5 मई 2026

*१०. विरह का अंग~ ३७/४०*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*१०. विरह का अंग~ ३७/४०*
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*सप्त धातु अग्नि हिं मिले, अग्नि हिं निकसे काट ।*
*रज्जब अज्जब ठौड़ को, वह्नी विमल सु वाट ॥३७॥*
लोहादि सप्त धातुओं में अग्नि मिलता है, काष्ट से अग्नि निकलता है और परमधाम रूप अदभुत स्थान को जाने के लिये भी विरहाग्नि ही शुद्ध और सुन्दर मार्ग है ।
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*तन मन काष्ट ज्यों जरहिं, हेत हुताशन लागि ।*
*रज्जब रंग भंग बंक बल, जहां विरह की आगि ॥३८॥*
जैसे अग्नि से काष्ठ जल जाता है, वैसे ही प्रेम रूप अग्नि से तनासक्ति और मन का भ्रम नष्ट हो जाता है । जहां विरहाग्नि प्रकट होता है वहां विषय-प्रेम वक्रता तथा आसुर गुणों का बल नष्ट हो जाता है ।
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*विरह चोरी१ पैठि कर, मुसे२, सकल गुण देह ।*
*जन रज्जब कम काढिले, ज्यों चुंबक तज खेह ॥३९॥*
जैसे रेत वा भस्म में छिपकर चुंबक पत्थर रेत तथा भस्म को छोड़कर लोह के कण काढ़ लेता है, वैसे ही, विरह छिपकर१ देह में घुसता है और देह को छोड़कर देह के सभी गुणों को चुरा२ कर निर्गुण स्थिति तक पहुँचा देता है ।
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*विरह बेहरे२ विगति१ से, फाड़े४ पिंड पराण३ ।*
*रज्जब रज५ मा६ काढिले, विरहा चतुर सुजाण ॥४०॥*
विरह विचित्र रीति१ से चीरता२ है, प्राणी३ के शरीर को विषयों से अलग करता है वा प्राण पिंड का वियोग४ कर देता है । और विरह ऐसा चतुर सुजान है कि रजोगुण५ में६ से निकालकर भगवान में लगाता है ।
(क्रमशः)

२४. सांख्य ज्ञान कौ अंग ३३/३६

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२४. सांख्य ज्ञान कौ अंग ३३/३६  
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देह धात माहैं मिलै, आतम कनक कुरूप । 
सुन्दर सांख्य सुनार बिन, होइ न शुद्ध स्वरूप ॥३३॥ 
यदि शुद्ध सुवर्ण रूप आत्मा में देह रूप कोई मलिन धातु मिला दी जाय तो वह कुरूप(मलिन) दिखायी देने लगता है । तब उसे सुनार रूप सद्गुरु(सांख्यशास्त्री) ही अपने ज्ञानरूप उपदेश से निर्मल बना कर उसे पुनः यथावत् तेजस्वी बना सकता है ॥३३॥
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जबहिं कंचुकी होत है, भिन्न न जानै सर्प । 
तैसैं सुन्दर आतमा, देह मिले तें दर्प ॥३४॥
जैसे सर्प को जब कैंचुली उद्भूत होने लगती है तो वह सर्प उस को अपने से भिन्न नहीं मानता; श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं उसी प्रकार हमारा यह आत्मा भी देह में अध्यास करता हुआ देहाभिमान में उन्मत्त हो जाता है ॥३४॥
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सर्प तजै जब कंचुकी, वा दिसि देखै नांहिं । 
सुन्दर संमुझै आतमा, भिन्न रहै तनु मांहिं ॥३५॥
सर्प जब अपनी केंचुली को अपने शरीर से पृथक् कर देता है तो वह घूम कर भी पुनः उस की ओर नहीं देखता; इसी प्रकार आत्मा को भी समझना चाहिये कि वह देह से पृथक् है । अतः उस का देह में आसक्ति का प्रश्न ही कहाँ उठता है ! ॥३५॥
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सुन्दर कला घटै बढै, शशि मंडल कै संग । 
देह उपजि बिनशत रहै, आतम सदा अभंग ॥३६॥
चन्द्रमण्डल का स्वरूप सदा एक समान रहता है; केवल उस की कलाएँ ही प्रतिपक्ष घटती या बढती रहती हैं । उसी प्रकार, जिज्ञासु को भी समझना चाहिये कि केवल देह के ही उत्पत्ति एवं विनाश होते हैं, आत्मा तो स्थायी, अजर, अमर एवं अविनाशी है ॥३६॥
(क्रमशः)

हिरदै राम रहै जिहि रासी

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*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*चार पदार्थ मुक्ति बापुरी, अठ सिधि नव निधि चेरी ।*
*माया दासी ताके आगे, जहँ भक्ति निरंजन तेरी ॥*
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*सुमिरण-माहात्म्य ॥*
हिरदै राम रहै जिहि रासी । रहै तौ काटै जम की पासी ॥टेक॥
जिहिं घटि सुमिरण बारहमासी । अठ सिधि नव निधि ताकै दासी ॥
साध पहूँता तिहि घरि जासी । भरमैं नाहीं लख चौरासी ॥
लोक प्रलोक परम पद पासी । बिनसै नहीं सदा अबिनासी ॥
बषनां राम भज्याँ यूँ थासी । सेवग स्वामी एक कहासी ॥१११॥
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जिसके हृदय में राम-नाम का स्थाई निवास रहता है, उसकी यम-फाँसी रामजी के हृदय में निवास करने के कारण कट जाती है, रामजी जम की फाँसी को काटकर निजस्वरूप में अवस्थित कर देते हैं ।
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“तदा दृष्टु स्वरूपेऽवस्थानं” । योगसूत्र जिसके हृदय में रामनाम का स्मरण बारहों-मास = अहर्निश चलता रहता है, आठों सिद्धियाँ तथा नव निद्धियाँ उसकी दासी हो जाती हैं, आज्ञानुसार चलने लग जाती है “रामचरण अैसि आरति ताकै । अठ सिधि नौ निधि चेरी जाकै ।” राम नाम की साधना करने वाला उसी स्थान को उसी स्थिति को प्राप्त करता है जहाँ राम-नाम की साधना करने वाले अन्य संत गये हैं ।
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ऐसा साधक पुनरपि जन्म-मरण के चक्र में भ्रमण नहीं करता क्योंकि वह मुक्त हो जाता है । जब तक राम-नाम-साधक लोक में जीता है तब तक सुख भोगता है और मरने पर परमपद की प्राप्ति करता है । वस्तुतः वह नहीं मरता है, उसका शरीर मरता है क्योंकि वह सदा-सदा के लिये अविनासी = विनष्ट न होने वाला हो जाता है ।
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(आत्मा तो हमेशा ही अजर अमर है किन्तु कर्मों के कारण बार-बार जन्मने-मरने की अपेक्षा से ही विनाशी होना कहा जाता है ।) बषनां कहता हैं, रामजी का भजन करने का प्रभाव उक्त प्रकार से तो होता ही है अंत में भक्त और भगवान्, सेवक और स्वामी दोनों एक हो जाते हैं ।
“सेवक स्वामी भया समाना । रामहि राम और नहिं आना ॥”॥१११॥

सोमवार, 4 मई 2026

२४. सांख्य ज्ञान कौ अंग २९/३२

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२४. सांख्य ज्ञान कौ अंग २९/३२ 
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पावक लोह तपाइये, होइ एकई अंग ।
तैसैं सुन्दर आतमा, दीसै काया संग ॥२९॥
जैसे लोह के दो खण्डों को अग्नि से अत्यधिक तपाया जाय तो प्रयास करने पर वे दोनों खण्ड एक हो(मिल) जाते हैं; वैसे ही यह आत्मा भी, देह में अतिशय आसक्ति के कारण, देह से मिला हुआ दीखता है ॥२९॥
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चोट परै घन की जबहिं, पावक भिन्न रहाइ । 
सुन्दर दीसै प्रगट हौ, लोहा बधता जाइ ॥३०॥
जब उष्ण लोह पर घन की चोट पड़ती है तो हम प्रत्यक्ष देखते हैं कि अग्नि चमक कर उस से पृथक् हो जाती है और न्यूनता या वृद्धि आदि लौह में आती हैं; उसी प्रकार रागादि विकार देह को ही होते हैं, आत्मा को नहीं ॥३०॥
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सुन्दर पावक एकरस, लोहा घटि बढि होइ । 
तैसैं सुख दुख देह कौं, आतम कौं नहीं कोइ ॥३१॥
जैसे वहाँ अग्नि सदा समस्थिति में रहने वाला है, हानि या वृद्धि लोह में ही होती है; वैसे ही ये शीत उष्ण, सुख दुःख भी देह को सताते हैं; आत्मा को नहीं ॥३१॥
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नीर क्षीर ज्यौं मिलि रहे, देह आतमा दोइ । 
सुन्दर हंस बिचार बिन, भिन्न भिन्न नहिं होइ ॥३२॥
जैसे दूध में जल मिला दिया जाता है वैसे ही देह में आसक्ति के कारण यह आत्मा उस से मिला हुआ दिखायी देता है । वहाँ जैसे किसी विवेकी हंस के विना कोई अन्य दूध को जल से पृथक् नहीं कर सकता; उसी प्रकार कोई ज्ञानी साधक ही इस देह से आत्मा को पृथक् रूप से जान सकता है ॥३२॥
(क्रमशः)

हिरदै राम बसाईला

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*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*मिश्री मांही मेल कर, मोल बिकाना बंस ।*
*यों दादू महँगा भया, पारब्रह्म मिल हंस ॥*
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परिचय ॥ साषी लापचारी की ॥१ (१ इन साषियों का अर्थ ‘सुसंगति कौ अंग’ में देखें ।) 
ज्यूँ तिल बास्या फूल सँगि, यौं हिरदै राम बसाइ ।
तौ बषनां त्याँह की बासना, जुग जाताँ नहिं जाइ ॥
तिल फूलाँ की बास लै, दुहूँ काठाँ बिचैं पिड़ाइ । 
यौं बषनां मन पीड़िये, तौ कबहूँ बास न जाइ ॥  
.
पद ॥ १
हिरदै राम बसाईला । 
फूलौं की बास तिलौं मैं आई, तिल फुलेल कहाईला ॥टेक॥
तेल बासना सभा सारी मैं, नासा परखि सराहीला । 
साध बासना दूरि दिसंतरि, महलि महलि महकाईला ॥ 
कोमल पुहुप बासना सूषिम, तिल मैं सहजि समाईला । 
अैसै हिरदैं राम हमारै, भाग बड़े सो आईला ॥
हरि हिरदै कस्तूरी डावै, अैसा भेद लखाईला । 
बषनां ज्याँ कस्तूरी बासी, तिहि डाबै बासना जाईला ॥११०॥  
.
बषनांजी आत्मसाक्षात्कार की अपनी स्थिति को बताते हुए कहते हैं, मेरे हृदय में रामजी बस गया है । जिसप्रकार फूलों की सुगंधि तैल में मिलकर या फूल तिलों के साथ पेरे जाने पर फुलेल = इत्र कहाने लगता है, ऐसे ही रामनाम की साधना द्वारा मेरे अंदर रामजी का निवास हो गया है और मैं नित्य-शुद्ध-बुद्ध आत्मस्वरूप = रामजीस्वरूप अपने आपको अनुभव करने लगा हूँ । 
.
तेल = फुलेल की सुगंधि सभा में लगाकर जाने पर सभाजनों द्वारा नासिका में सुगंधि आने पर सराही जाती है । इसीप्रकार रामनाम साधना की सुगंधि अथवा साधु-संतों की संगति की सुगंधि देश-देशान्तरों तक घर-घर को सुगंधित = राममय बना देती है । जिस प्रकार की कोमल पुष्पों की सूक्ष्म सुगंधि तिलों में सहज में ही समाहित हो जाती है । वैसे ही निःवासनामय मेरे हृदय में शुद्ध सच्चिदानंदमय राम बड़े भाग्य से प्रकट हो गया है । 
.
मेरे हृदय को परात्पर-परब्रह्म-परमात्मा ने उसीप्रकार सुगंधित कर दिया है जैसे डिब्बे को कस्तूरी सुगंधित कर देती है और परमात्मा मेरे हृदय में ठीक उसीप्रकार स्थाई रूप में बस गया है जैसे जिस डिब्बे में कस्तूरी रखी जाती है उसमें से उस कस्तूरी को निकालने के उपरांत भी उसकी सुगंधि कभी भी जाती नहीं है । जिसप्रकार डिब्बे में कस्तूरी की सुगंधि रहती है, ऐसे ही हृदय में रामजी रहते हैं, यह रहस्य मुझे ज्ञात हो गया है ॥११०॥  

२४. सांख्य ज्ञान कौ अंग २५/२८

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२४. सांख्य ज्ञान कौ अंग २५/२८
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सूक्षम तें सूक्षम परै, सुन्दर आपुहि जांनि ।
तो तें सूक्षम नांहिं कौ, याही निश्चय आंनि ॥२५॥
श्रीसुन्दरदासजी अपनी आत्मा को समझा रहे हैं - हे आत्मन् ! अभी बतायी गयी गणनाओं में सिद्ध सूक्ष्मतम तत्त्व से भी तुम पर(अग्र) हो । यही निश्चित समझ लो कि यहाँ तुम से सूक्ष्मतम तत्त्व अन्य कोई नहीं है ॥२५॥
(तु०- भगवद्‌गीता -अणोरणीयांसमनुस्मरेद् यः-८/९) ॥
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इन्द्रिय मन अरु आदि दे, शब्द न जानै तोहि ।
सुन्दर तौतें चपल ये, तूं इनितें क्यौं होहि ॥२६॥
हे आत्मन् ! इन्द्रिय या मन आदि के साथ तो तुम्हारी एक अंश की भी समानता नहीं है । वे तो सभी तेरी अपेक्षा बहुत अधिक चञ्चल(चपल) है; जब कि तूं उन सब की अपेक्षा सर्वथा शान्त है । अतः इन में तुम्हारी गणना कैसे हो सकती है ! ॥२६॥
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धूलि धूम अरु मेघ करि, दीसै मलिनाकाश ।
सुन्दर मलिन शरीर संग, आतम शुद्ध प्रकाश ॥२७॥
यद्यपि आकाश स्वभावतः स्वच्छ एवं निर्मल होता है; परन्तु वह धूलि, धूम या बादलों के कारण आवृत या मलिन दीखता है, ऐसे ही शुद्ध तेजोमय आत्मा भी, मलिन देह का सङ्ग कर, मलिन दिखायी देता है ॥२७॥
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देहनि कै ज्यौं द्वार मैं, पवन लिपै कहुं नाहिं ।
तैसैं सुन्दर आतमा, दीसै काया माहिं ॥२८॥ 
जैसे प्राणियों के देह में, देह की अपेक्षा आकाश, पवन आदि पदार्थ सूक्ष्म होने के कारण न कहीं लिप्त होते हैं और न कहीं रुकते ही हैं; उसी प्रकार श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं कि आत्मा भी, अतिशय सूक्ष्म होने के कारण, देह में न कहीं लिप्त होता है और न कहीं रुकता ही है ॥२८॥
(क्रमशः)

कलि ब्यापी त्याँहनैं ब्यापी

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*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*सतगुरु बरजै सिष करै, क्यूँ कर बंचै काल ।*
*दहदिश देखत बह गया, पाणी फोड़ी पाल ॥*
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*कृतघ्नशिष्य ॥*
कलि ब्यापी त्याँहनैं ब्यापी ।
गुर तैं पलटि दूसरा हूवा, आपौ थापै पापी ॥टेक॥
ज्ञान सिखाया ध्यान सिखाया, पढिया पोथी पाटी ।
गुरि जाण्यौ थौ सेवा करसी, सिख ले दौड्यौ लाठी ॥
गुर की भेट भूंगडा मेल्है, सिख नैं लोंग सुपारी ।
जै बाबौ सिख स्वामजी कौ, माता सिखि छै म्हारी ॥
कीयौ कृत्य परायौ मेटै, पलट्या उलटी धारी ।
धरती कहै कृत्यघण सेती, इहि हूँ भार्याँ मारी ॥
दोइ दोइ गुराँ दोइ दोइ जीभाँ, दोइ दोइ दुरमति वाला ।
सटक्या फिरै साँप की नाँई, बाहरि भितरि काला ॥
गुर सूँ हेत भाव नहिं कोई, सिख साखा सूँ मोहा ।
बषनौं कह ते लूणहरामी, साधन ही सैं द्रोहा ॥१०९॥
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जो कृतघ्न शिष्य गुरुमहाराज से विमुख होकर अपने महत्त्व की स्थापना करते हैं, उन्हें निश्चय ही कलियुग व्याप गया है; उन पर कलियुग प्रभावी हो गया है । गुरुमहाराज ने यह जानकर कि पढ़-लिखकर शिष्य सेवा करेगा, सेवा कराने में लालच में आकर गुरु ने शिष्य को ज्ञान सिखाया, परमात्मा का ध्यान करना सिखाया, पुस्तकें पढ़ना सिखाया, लिखना सिखाया किन्तु शिष्य ने सेवा तो कुछ की नहीं उल्टे गुरु की लट्ठी को ही ले दौड़ा (गुरु की आय के स्त्रोत रूप लाठी को ही ले भागा)।
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कृतघ्नशिष्य गुरुमहाराज को सिके चने = भूंगड़ों की भेंट चढ़ाता है जबकि शिष्यों को लौंग सुपारी की बक्षीस करता है । अर्थात् गुरुमहाराज का माहात्म्य कम करता है तथा स्वयं की प्रतिष्ठा बढ़ाता है । कोई जब उससे पूछता है कि तुम्हारा पिता ही जब स्वामीजी का शिष्य है तो तू भी तो उनका शिष्य हुआ कि नहीं हुआ । तब वह कृतघ्न शिष्य कहता है, ऐसा है तो क्या हो गया, माता तो मेरी ही शिष्या है ।
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कृतघ्नशिष्य दूसरों के अच्छे कार्यों को मिटा देने को तत्पर रहता है । जो उसके प्रति उपकार करते हैं पलटकर उनका वह अपकार ही करता है । ऐसे कृतघ्नी लोगों को अपने ऊपर रहते देखकर पृथिवी कहती है, मुझे ऐसे ही कृतघ्न पापियों ने अपने भार से बोझिल कर रखी है । संसार में असली नकली दो प्रकार के गुरु हैं । शरीर में दो प्रकार की एक रामनाम स्मरण करने वाली तथा दूसरी जागतिक वार्तालाप करने वाली जिव्हाएँ हैं ।
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इसी प्रकार दो प्रकार की दुर्मति = दुर्बुद्धि = कृतघ्न लोग होते हैं जो संसार में माता-पिता-गुरु-बन्धु-बांधवों का अपमान करते हैं तथा परमार्थ में परमात्मा का भजन नहीं करके परमात्मा की अवहेलना करते हैं । ऐसे मानव सर्प की भाँति हैं जो बाहर-भीतर दोनों ही रूप में काले है तथा धन, मान, प्रतिष्ठा के लिये इधर-उधर दौड़ते फिरते हैं । कृतघ्न शिष्य गुरु के प्रति किंञ्चितमात्र भी श्रद्धा-प्रेम नहीं रखता जबकि शिष्यगणों से मोह = रागात्मक सम्बन्ध बनाकर रखता है क्योंकि उनसे सम्बन्ध रखने से उसे धन, मान, प्रतिष्ठा मिलती है । बषनां कहता है ऐसे शिष्य निश्चय ही लूणहरामी = कृतघ्न हैं, जो साधन = सज्जनपुरुषों से, सुहृदयों से अकारण ही वैर करते हैं ॥१०९॥

रविवार, 3 मई 2026

*१०. विरह का अंग~ ३३/३६*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*१०. विरह का अंग~ ३३/३६*
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*काया काष्ठ मनुवा धोम,*
*इश्क अग्नि मिल जाँहिं सु व्योम ।*
*आदि अंत मधि मुक्ति सुमाग,*
*रज्जब लहिये पूरण भाग ॥३३॥*
जैसे अग्नि के संयोग से काष्ठ की धुआँ आकाश में चली जाती है, वैसे ही विरह-युक्त प्रेम से मन शरीरासक्ति को छोड़ कर परब्रह्म के स्वरूप में लीन होता है । सृष्टि के आदि, मध्य और अन्त में भी यह विरह ही मुक्ति धाम का सुन्दर मार्ग माना जाता है । कोई भाग्यशाली ही इस पूर्णब्रह्म प्राप्ति के साधन मार्ग को ग्रहण करता है ।
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*नर नारी सब नाज, विरहा बारू भाड़ की ।*
*रज्ज्ब अज्जब साज, काचे पाके परसतैं ॥३४॥*
जैसे नाज के कच्चे दाने भाड़ की गरम बालू से मिलकर पक जाते हैं, उनकी उगने की शक्ति नष्ट हो जाती है, वैसे ही नर नारी भगवद् विरह के ताप से पक जाते हैं, उनकी जन्मादि क्लेशदायिनी शक्ति नष्ट हो जाती है । अत: सिद्धावस्था को प्राप्त करने को लिये भगवद्-विरह अद्भुत सामग्री है ।
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*दोस्त नाँहिं दर्द सम, जे दिल अंदर होय ।*
*जीव सीव१ एकै करे, जे ब२ सदा हु ते दोय ॥३५॥*
यदि मन में हो तो विरह-व्यथा के समान जीव का मित्र अन्य कोई भी नहीं है, कारण, जो अब२ अज्ञान दशा में सदा से ही दो भास रहे हैं उन जीव और ब्रह्म१ को एक करता है ।
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*विरह अग्नि व्है युक्ति सौं, आतम सार१ मझार ।*
*कपट कीट कुल काढि दे, तामें फेर न सार ॥३६॥*
लोह१ के युक्ति से अग्नि लगाया जाय तो, लोह का सब मैल निकाल देगा । वैसे ही जीवात्मा में युक्ति पूर्वक विरह प्रकट होगा, तो उसका सब कपट निकाल देगा । उक्त बात सर्वथा सत्य है ।
(क्रमशः)

शनिवार, 2 मई 2026

२४. सांख्य ज्ञान कौ अंग २१/२४

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२४. सांख्य ज्ञान कौ अंग २१/२४
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जे बिकार हैं देह कै, देहहि के सिर मारि । 
सुन्दर यातें भिन्न ह्वै, अपनौ रूप बिचारि ॥२१॥
अतः तुम्हारे लिये हितकर यही होगा कि जो देह के विकार(दोष) हैं, उन को उसी तक सीमित रहने दो; क्योंकि तुम उस से भिन्न हो । स्व रूप पर कुछ तो विचार कर के देखो ! ॥२१॥
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सुन्दर यह नहिं यह नहीं, यह तौ है भ्रम कूप । 
नाहिं नाहिं करते रहैं, सो है तेरौ रूप ॥२२॥
'तुम में देह का यह विकार नहीं है' या 'यह नहीं है' - ऐसा बताने में बहुत समय लगेगा और इससे नाना प्रकार के भ्रमजाल के उद्भव की सम्भावना है; अतः इसके स्थान पर 'नहीं है', 'नहीं है' कहने से भी कार्य सिद्ध हो जायगा । इसी वर्णन में तुम्हारा वास्तविक स्वरूप भी छिपा है ॥२२॥
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एक एक कै एक पर, तत्व गिनैं तै होइ । 
सुन्दर तूं सब कै परै, तौ ऊपरि नहिं कोइ ॥२३॥
पचीस तत्वों की गणना में दूसरा तत्त्व पहले से पर है । इस प्रकार की गणना में तूं इन सब से पर है । तुझ से ऊपर(उत्तम) कोई तत्त्व नहीं है ॥२३॥
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एक एक अनुलोम करि, दीसहिं तत्व स्थूल । 
एक एक प्रतिलोम तें, सुन्दर सूक्षम मूल ॥२४॥
इन तत्त्वों की अनुलोम गणना में भी पहला तत्त्व दूसरे तत्त्व से स्थूल है । इसी प्रकार प्रतिलोम गणना में दूसरा तत्त्व पहले तत्त्व से सूक्ष्म है ॥२४॥
(क्रमशः)

स्वारथ लागै घी गुड़ मीठौ

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*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*भरी अधौड़ी भावठी, बैठा पेट फुलाइ ।*
*दादू शूकर स्वान ज्यों, ज्यों आवै त्यों खाइ ॥*
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*स्वार्थ-परमार्थ ॥*
स्वारथ लागै घी गुड़ मीठौ । और जनम कहु कौंनैं दीठौ ॥टेक॥
स्वारथि कारणि अनरथ कीजै । दई दोस किसा कौ दीजै ॥
सदा रहै स्वारथ के पासै । परमारथ थैं अलगौ नासै ॥
पाप पुंनि की कौंण चलावै । जे खुरदा चहुँ की घर मैं आवै ॥  
मंछ गिलगिलिया जुग मांही । परमेसुर कौ को डर नांहीं ॥
बषनां स्वारथ मैं सह लोई । परमारथ मैं बिरला कोई ॥१०८॥
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चार्वाक मतानुयायियों की खरी आलोचना इस पद में की गई है । चार्वाकों का कथन है .....
“यावज्जीवेत्सुखंजीवेत् ऋणं कृत्वा घृतं पिवेत् । 
भस्मीभूतस्य देहस्य पुनरागमनं कुतः ॥” 
(सर्वदर्शन संग्रह श्लोकांक १८) 
जो देह भस्मीभूत हो जाती है उसका पुनरागमन फल भोगने के लिये क्यों कर हो सकता है । अतः इसी जन्म में जो भी खाना, पीना, मौज-मस्ती करनी हो वह कर लेनी चाहिये । यदि मौज-मस्ती के लिये हाथ में पैसा न भी हो तो कोई बात नहीं, ऋण लेकर ही घी, दूध खाना चाहिये क्योंकि मरने के बाद चुकाने की कोई आवश्यकता नहीं है । इन्हीं विचारों को प्रकारान्तर से बषनांजी कहते हैं ।
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स्वारथ = शरीर पोषणार्थ घी, गुड़ खाना रुचिकर लगता है । खाने वाले कहते हैं, अन्य जन्म किसने देखा है, जो खाना-पीना है, वह इसी जन्म में खा पी लो, मौज मस्ती कर लो । जिसको हमने देखा नहीं, उसके पीछे पड़कर क्यों हम हमारी मौज मस्ती को छोड़ें । इस प्रकार की सोच वालों के संबंध में बषनांजी कहते हैं, स्वार्थ के कारण तो अनर्थ करते हैं, दुराचरण, हिंसा, कपट, पाखंड करते हैं । 
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फिर बताइये ! ये लोग कैसे विधाता को दोष दे सकते हैं जैसा कि प्रायः लोगों को दोष देते हुए देखा गया है 
“सो परत्र दुख पावहीं, सर धुनि धुनि पछिताहिं । 
कालहि कर्महि ईश्वरहि, मिथ्या दोष लगाहिं ॥” 
वस्तुतः ये लोग सदा ही स्वार्थांध हुए रहते हैं । परमार्थ से सर्वथा अलग रहते हैं । समय पड़ने पर उसकी आलोचना भी कर डालते हैं ? इनके लिये पाप और पुण्य का कोई महत्त्व नहीं है । 
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राह, बेराह, उचित-अनुचित जिस भी रास्ते से धन मिलता है उसी को अंगीकृत करके घर में खुरदा = धन-सम्पत्ति कमा कर लाते हैं । फिर सभी घरवाले मिलकर उसका उपयोग करते हैं । जुग = पूरे जीवन भर मद्य, मांस, मछली जैसे निषिद्ध भोज्यों को खाते हैं । परमेश्वर का डर बिल्कुल ही मन में नहीं लाते हैं कि अंत में वह हमें हमारे दुष्कर्मों का दण्ड देगा । बषनां कहता है, सभी लोग स्वारथ के वशीभूत हुए हुए हैं । परमार्थ में किसी-किसी विरले की ही प्रवृत्ति है । 
“मनुष्याणां सहस्त्रेषु कश्चिद्यतति सिद्धये । 
यततामपि सिद्धानां कश्चिन्मां तत्त्वतः”॥१०८॥