शुक्रवार, 5 जून 2026

२६. बिचार कौ अंग ३७/४०

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२६. बिचार कौ अंग ३७/४०
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कै दुख अंतहकरण कौं, मन बुधि चित अहँकार । 
सुन्दर कै दुख त्रिगुन कौं, यह तुम कहौ बिचार ॥३७॥
या इसका अन्तःकरण, मन, बुद्धि या चित्त या अहङ्कार अथवा इसके ये त्रिगुण - सत्व, रज, तम - इन में इस दुःख का अनुभव करते हैं ? यह भी बताइये ॥३७॥
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कै दुख है महतत्व कौं, कै दुख प्रकृति हि मांनि । 
सुन्दर कै दुख पुरुष कौं, श्री गुरु कहौ बखांनि ॥३८॥
या यह दुःख यहाँ महत् तत्त्व को होता है ? या यह प्रकृति इसका अनुभव करती है ? या यह दुःख पुरुष अनुभव करता है ? इस विषय को विस्तृत रूप से मुझ को समझाइये ॥३८॥
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बहु बिधि देख्यौ सोच करि, कछु जान्यौ नहिं जाइ । 
सुन्दर यह दुख कौंन कौं, सद्‌गुरु कहि संमुझाइ ॥३९॥ 
हे गुरुदेव ! मैंने इस विषय पर बहुत चिन्तन मनन कर लिया, मुझे तो यह कुछ समझ में आया नहीं, अब आप ही इस विषय में मुझे मार्ग दिखावें ॥३९॥
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सुन्दर दुख नहिं देह कौं,  इंद्रिनि कौं दुख नांहिं । 
दुख नहिं दीसै प्रान कौं, स्वास चलै तनु मांहिं ॥४०॥ 
उत्तर : श्रीगुरुदेव कहते हैं - हे जिज्ञासो ! यह दुःख न देह को होता है, न इन्द्रियों या प्राण को ही यह दुःख होता है; क्योंकि हम देखते हैं कि उस दुःख के समय भी प्राणी का श्वास चलता रहता है ॥४०॥
(क्रमशः) 

मेरै केवल रामजी

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*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*दादू नीका नांव है, आप कहै समझाइ ।*
*और आरम्भ सब छाड़ दे, राम नाम ल्यौ लाइ ॥*
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विश्वास ॥
को काहू कै आसिरै, काहु का व्है रहिया ।
मेरै केवल रामजी, मैं सरणाँ गहिया ॥टेक॥
को तीरथ को बरत के, को जप तप साजै ।
मेरै केवल रामजी, यहु बरत न भाजै ॥
एक मूनि गहि नागा रहै, एक दूधाधारी ।
मेरै केवल रामजी, ये पैज हमारी ॥
कोई राजा कोई परजा, कोई मेरा तेरा ।
मेरै केवल रामजी, आगै आगेरा ॥
काहु कै बल कुल जाति कौ, कोइ पढिया जोसी ।
बषनां कै केवल रामजी तूँ, करै सु होसी ॥१४२॥
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अन्य बहुत से लोग रामजी से अतिरिक्त अन्य देवी-देवताओं का आश्रय लेकर उन्हीं के भक्त बने हुए हैं किन्तु मुझ बषनां के तो परमाश्रय एक परात्पर-परब्रह्म रामजी ही हैं और मैंने उन्हीं का आश्रय ग्रहण कर रखा है । कोई तीर्थ का सेवन, कोई व्रत का, कोई जप का तथा कोई तप का अनुष्ठान करते हैं किन्तु मेरे तो केवल एक रामजी का ही व्रत = अनुष्ठान, भजन-स्मरण है जो कभी भी छूटता नहीं है ।
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कोई मौंन धारण करके नंगे रहकर साधना करते हैं, कोई अन्नादि का त्याग करके केवल दूध का ही आहार करके तपस्या करते हैं किन्तु मेरे तो केवल एक रामजी की आराधना करने की पैज = प्रतिज्ञा=प्रण है । कोई राजा की खुशामद करता है, कोई प्रजाजनों की ही सेवा-चाकरी करते हैं किन्तु मेरे तो मात्र रामजी की ही सेवा-चाकरी का काम है जो आगे से = पूर्व से मेरे पूर्वज = साधु-संत करते आ रहे हैं ।
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किसी के पास तो कुल और जाति का बल है तथा किसी के पास जोशीजी के पास पढ़ी हुई विद्या का बल है किन्तु मुझ बषनां के पास तो मात्र एक रामजी का बल है । अतः हे रामजी ! तू जो, जैसा करेगा, वैसा ही होगा और वही मुझे स्वीकार होगा । मैं तेरी शरण में जो आ पड़ा हूँ ॥१४२॥

*१५. विरक्त् का अंग ~३७/४०*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*१५. विरक्त् का अंग ~३७/४०*
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*पंच विषय पंचौ रहत१, मन से मनोरथ त्याग ।*
*रज्जब लायक राम की, यहु उत्तम वैराग ॥३७॥*
पंच ज्ञानेन्द्रिय आसक्ति पूर्वक पांचों विषयों में जाने से रह१ जाय और मन से मनोरथ रूप विषयों का त्याग हो जाय, तब समझना चाहिये कि अब बुद्धि ब्रह्म प्राप्ति के योग्य हुई है और इस अवस्था को ही उत्तम वैराग कहते हैं ।
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*मनसा पंच भरतार तज, जे वैरागिनि होय ।*
*रज्जब पावे परम घर, जहाँ न सुख दुख दोय ॥३८॥*
यदि बुद्धि पंच विषय रूप पंच भरतारों को त्याग करके विरक्त हो जाय, तो जहाँ विषयजन्य सुख और दुख दोनों ही नहीं है, उस पर ब्रह्म रूप श्रेष्ठ घर को प्राप्त कर लेती है ।
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*जन रज्जब तन सौ तरक१, मन की माने नाँहिं ।*
*सो विरक्त ब्रह्मांड में, बैठा निज मत२ माँहिं ॥३९॥*
जिसने शरीर का राग त्याग१ दिया है, मन की अनुचित बात भी नहीं मानता है जो अपने सिद्धान्त२ में अडिग स्थिर रहता है, ब्रह्मांड में वही विरक्त कहलाता है ।
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*माया मोह मदन मन मारे, काया कसणी दण्ड ।*
*सो रज्जब विरकत सही, घर ही में वन खण्ड ॥४०॥*
जो आत्मज्ञान द्वारा मायिक मोह को और वस्तु विचार द्वारा काम को नष्ट करता है तथा शरीर को साधन- कष्ट रूप दण्ड देता है, वही सच्चा विरक्त है, उसके लिये घर में ही वन निवास की-सी स्थिति बन जाती है ।
(क्रमशः)

२६. बिचार कौ अंग ३३/३६

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२६. बिचार कौ अंग ३३/३६ 
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प्रान वोर जो देखिये, सबकौ एकै प्रान । 
सुन्दर क्षुधा तृषा लगै, सबकौं एक समान ॥३३॥
यदि प्राण पर विचार किया जाय तो यह भी सब प्राणियों का समान ही प्रतीत होता है; क्योंकि सभी प्राणियों को भूख प्यास आदि कष्टीं का समान रूप से अनुभव होता है ॥३३॥
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मनहूं कौ जो देखिये, मन सबहिन कौ एक । 
सुन्दर करै बिकल्पना, अरु संकल्प अनेक ॥३४॥
यदि इन के मन के विषय में विचार किया जाय तो यह मन भी सभी प्राणियों का समान ही प्रतीत होता है; क्योंकि सभी प्राणियों का मन विविध सङ्कल्प विकल्प ही करता रहता है ॥३४॥
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सुन्दर एकै आतमा, जब यह करै बिचार । 
तब कछु भ्रम दीसै नहीं, एक रहै निरधार ॥३५॥
अब प्राणियों की आत्मा के विषय में विचार किया जाय तो उसमें कहीं कोई भ्रम नहीं दिखायी देता; क्योंकि वह तो निश्चित रूप से सब प्राणियों का एक ही है ॥३५॥
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कै दुख पावै देह यह, कै इन्द्रिनि दुख होइ । 
सुन्दर कै दुख प्रान कौ, यह संमुझावौ कोइ ॥३६॥
प्रश्न : हे गुरुदेव ! संसार को दुःखमय कहा जाता है, तो यह दुःख प्राणी का शरीर अनुभव करता है ? या इस की इन्द्रियाँ ? या इस के प्राणों को यह दुःख होता है ? - यह मुझे स्पष्टतः समझावें ॥३६॥
(क्रमशः) 

*रे चित चिंता जिनि करै, हरि चिंता करसी ।*

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*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*दादू राजिक रिजक लिये खड़ा, देवे हाथों हाथ ।*
*पूरक पूरा पास है, सदा हमारे साथ ॥*
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विश्वास ॥
*रे चित चिंता जिनि करै, हरि चिंता करसी ।*
भांडा घड़ि मुहड़ा किया, सोइ भलै भरसी ॥टेक॥
जठर अगनि मैं जीव की, जिनि करी संभाला ।
अब नाऊँ नांहीं करै, ओ दीन दयाला ।
आगाँ ही आगाँ लगैं, यौं करता आया ।
भुवंग पिटारा मांहि था, भख मारग पाया ॥
खूँहणि खपी अठारहुँ, भारथ बहुतेरा ।
अंडा राख्या घंट दे, सो साहिब मेरा ॥
सुरंजाम तिहूँ लोक का, ताकै करि छांड्या ।
सो मांहैं छिटकाइसी, बषनां मुख मांड्या ॥१४१॥
 
चित्त को विश्वास दिलाते हुए देते हुए कहते हैं, हे चित्त ! तू अपनी चिंता क्यों करता है । जिस हरि ने तुझे संसार में भेजा है, वह अपने आप चिंता करके तेरी सारी व्यवस्थाएँ करेगा । उस परात्पर-परब्रह्म-परमात्मा ने शरीर रूपी भांडा बनाकर उसमें खाने के लिये मुँह बनाया है, तो वही उसको भरेगा भी । 
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जिस दीनदयाल ने माँ की जठराग्नि में जीव की पूरी सार-संभाल की थी, अब बाहर आ जाने पर सार-संभाल करने को मना नहीं करेगा । क्योंकि वह दीनों पर दया करने के स्वभाव वाला है । पूर्वकाल के पूर्वकाल से ही वह सारे ब्रह्माण्ड का उक्त प्रकार से ही भरण पोषण करता आ रहा है । अब उसके लिये यह कोई नहीं चीज नहीं है । 
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एक सर्प पिटारी में बंद था । कई दिनों से उसे भोजन नहीं मिला था । वह उस पिटारे से निकलना भी चाहता था तथा भोजन भी चाहता था । एक चूहे ने उस पिटारे को यह समझकर कुतर डाला कि इसमें खाद्यान्न होगा । सो उसने उसको कुतरा और भीतर घुस गया । सर्प को उसका भोज्य चूहा मिल गया । उसने उसे आराम से खाया तथा चूहे द्वारा किये गये छेद में से होकर वह बाहर भी निकल गया । 
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महाभारत के युद्ध से पूर्व कुरुक्षेत्र में एक टीटोड़ी ने अंडे देकर मिट्टी में दबा रखे थे । परमात्मकृपा से जिस जगह अंडे दब रहे थे उसी जगह हाथी के लटकी रहने वाली बड़ी घंटी = घंटा टूटकर गिर गया और वह पूरे अठारह दिन तक अठारह अक्षोहिणी सेना व उसमें लड़ने वाले समस्त वीरों के समाप्त होने तक वैसे के वैसे उन अंडों पर छत्र की भाँति पड़ा रहा जिससे वे सारे के सारे अंडे सुरक्षित रह गये । 
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बषनांजी कहते हैं, जो परमात्मा इस प्रकार की अनहोनी करने में समर्थ है, वही मेरा इष्ट है । तीनों लोकों की माकूल सुरंजाम = व्यवस्था उस परब्रह्म-परमात्मा ने एक व्यवस्थित तरीके से कर रखी है । इसी आशा से मैं बषनां ने अपना मुँह खोल रखा है, वह उसमें अपने आप छिटकाइसी = भोजन डालेगा । अर्थात् मैं पूर्णरूप से उसके आश्रय पर बैठा हुआ हूँ । वह अपने आप मेरी व्यवस्था करेगा ॥१४१॥

गुरुवार, 4 जून 2026

*१५. विरक्त् का अंग ~३३/३६*

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*🌷卐 सत्यराम सा 卐🌷*
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*१५. विरक्त् का अंग ~३३/३६*
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*रज्जब निकसे पूत ह्वै, पैठे पुरुष न होय ।*
*नाता माता का रह्या, सो जन विरला कोय ॥३३॥*
जो पुत्र होकर निकला ओर पुन: पुरुष होकर प्रवेश नहीं किया उसी का माता का संबन्ध रहा है ऐसा पुरुष कोई विरला ही होता है ।
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*नारी नींद न विलसिये, सुन्दरि स्वप्ने त्याग ।*
*जन रज्जब जग वह यती, वन्दनीय१ वैराग ॥३४॥*
विरक्त को नारी संग सोते समय स्वप्न में भी नहीं करना चाहिये, जो स्वप्न में भी नारी से बचा रहता है, वह सच्चा यती है और उसी का वैराग्य माननीय१ है ।
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*मनसा नारी त्याग कर, मन वैरागी होय ।*
*रज्जब राखे जतन यहु, जती कहावे सोय ॥३५॥*
जिसका मन भोगाशा रूप नारी को त्याग कर विरक्त हो जाय और पुन: भोगाशा मन में नहीं आ जाये इसका यत्न रक्खे, ऐसा साधक ही यती कहलाता है ।
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*रज्जब दारा देह को, परसे पुरुष न प्राण ।*
*बालक व्यसन न उपजे, सो वैरागी जाण ॥३६॥*
जो प्राणधारी पुरुष देह रूप नारी का स्पर्श न करे अर्थात देहाध्यास त्याग दे और जिसके मादक पदार्थ सेवन वा कामादि कोई भी प्रकार का व्यसन रूप बालक नहीं उत्पन्न हो, उसी को विरक्त जानना चाहिये ।
(क्रमशः)

बुधवार, 3 जून 2026

२६. बिचार कौ अंग २९/३२

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२६. बिचार कौ अंग २९/३२
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आयौ कर्म खवास चलि, नृपति जगावन हेत । 
सुंदर दीनी पुटपरी, अतिगति भयौ अचेत ॥२९॥
उसी समय उस राजा का कर्मरूप विशिष्ट सेवक राजा को जगाने के लिये वहाँ आया, परन्तु वह राजा को सोया हुआ देख कर उस के शरीर को सहला कर चला गया और राजा पहले की अपेक्षा अधिक सुखपूर्वक सो गया ॥२९॥
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देख्यौ भक्त प्रधान जब, राजा जाग्यौ नांहिं । 
सुन्दर संक करी नहीं, पकरि झंझोरी बांहिं ॥३०॥
परन्तु राजा के परम हितैषी विवेकरूप आत्मा ने जब देखा कि राजा अभी तक जागे नहीं हैं तो वह स्वयं निःसङ्कोच राजा के शयनगृह में पहुँचा और उस ने राजा को बाहु पकड़कर उठा दिया । तब राजा की निद्रा खुली ॥३०॥
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तव उठि करि बैठौ भयौ, बहुरि जंभाई खात । 
सुंदर कियौ बिचारि जब, तब जाग्यौ साक्षात ॥३१॥
वह उठकर बैठ गया । फिर जम्हाई(उबासी) ली । तब उसने सावधान होकर देखा तो समझ गया कि वह अब वस्तुतः जग गया है ॥३१॥
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देह वोर जो देखिये, पंच तत्त्व कौ देह । 
सुन्दर ब्रह्मा कीट लौं, करहु बिचार सु येह ॥३२॥
तब सर्वप्रथम उसने अपने देह के विषय में विचारा, उस के यही समझ में आया कि ब्रह्मा से आरम्भ कर कीटपर्यन्त सभी प्राणियों का शरीर पञ्च तत्त्वों से ही बना हुआ है ॥३२॥
(क्रमशः) 

*राम भजन तैं भलौ भयौ ।*

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*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*जिसमें सब कुछ सो लिया, निरंजन का नांउँ ।*
*दादू हिरदै राखिए, मैं बलिहारी जांउँ ॥*
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राग बिलावल ॥१३॥ भक्तमहिमा ॥
*राम भजन तैं भलौ भयौ ।*
अठसिधि नौनिधि द्वारै आई, घर कौ सब दालिद्र गयौ ॥टेक॥
एक समैं धू खेलत होते, राजा अपणी गोद लयौ ।
सरब सुहागणि गरब कियौ अति, बाँह पकड़ि धु उठाइ दयौ ॥
रोवत धू माता पैं आये, मात कहै हरि नांहि भज्यौ ।
सबद सुणत धू बन कौं चाले, सब माया कौ मोह तज्यौ ॥
आगैं जात मिले रिषि नारद, ग्यान ध्यान उपदेस दयौ ।
गुर कौ सब्द ह्रदा मैं राख्यौ, जब तैं मधुबन जाइ छयौ ॥
ध्यान धरे धू सुमिरण लागे, अंतरजामी मानि लियौ ।
लोक प्रलोकि दोउ तिनि पाये, राज दियौ धू अटल कियौ ॥ 
सूत कौ त्रास दई हरिनाकसि, जन प्रहलाद सौं बैर ठयौ ।
मनसा बाचा हरि हरि भाखे, अपणे बैर सौं आप हयौ ॥ 
घन घोरें बरिखा रुति आई, जो बरस्यौ सो मांहि चयौ । 
नामदेव कै बेठियौ बीठल, छानि छवन कौं आप ठयौ ॥ 
बेचन गयौ गजी गुदरी मैं, महापुरिष कहूँ बैठि रह्यौ ।
जन कबीर के बारदि आई, भाँति भाँति कौ नाज नयौ ॥ 
छानि छपरवा सरकी टाटी, “पींजण हूँतौ ताँति तयौ” । 
गरीबदास से गरीब निवाजे, दादू कौ दीदार दयौ ॥ 
भजन उजागर सुख कौ सागर, जिनहि भज्यौ तिन बहुत भयौ ।
बषनां बहुत गरीब निवाजे, ताथैं ग्रीबनिवाज कह्यौ ॥१४०॥
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पाठान्तर “पींजणहूँतौ ताँति तयौ” के स्थान पर मंगलदासजी महाराज द्वारा संपादित पुस्तक में “ताको पलट र महल भयो” पाठ है ।  हस्तलिखित दोनों पुस्तकों में उक्त पाठ ही है । रामजी का भजन करने से ही सर्वविध भला हुआ । घर में अठसिद्धि और नवनिधि आई तथा घर का सारा दारिद्र्य समाप्त हो गया । 
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एक बार बालक ध्रुव खेलते-खेलते अपने पिता के दरबार में चले गये । राजा ने उन्हें गोद में उठा लिया । विमाता सुरुचि को यह सह्य न हो सका । उस सर्व सौभाग्यशालिनी ने भारी गर्व करते हुए बाँह पकड़कर बालक ध्रुव को गोदी में से नीचे उतार दिया । रोते हुए ध्रुव अपनी माता सुनीति के पास आये और गोद में से नीचे उतार देने का कारण पूछने लगे । 
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माता ने कहा, बेटा ! तुमने हरि का भजन नहीं किया । इसलिये तुम्हें पिता की अंक = गोद से उतरना पड़ा । माता के शब्दों को सुनते ही सारी माया का मोह त्यागकर ध्रुव भगवद्भजन करने को वन में चल दिये । रास्ते में जाते हुओं को नारद ऋषि मिले जिन्होंने गुरुज्ञान = मंत्र तथा भगवद्ध्यान की विधि का उपदेश दिया । जब से बालक ध्रुव तपस्या करने को मधुवन(मथुरा) में जाकर रहे तब से उन्होंने गुरु प्रदत्त सब्द = उपदेस को हृदय में पूर्णरूपेण धारण करके रखा । 
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परमात्मा का ध्यान करते हुए ध्रुव परमात्म-स्मरण में लग गये और अन्तर्यामी परमात्मा ने उस भजन-ध्यान को स्वीकार कर लिया । परिणामस्वरूप उन्होंने लोक और परलोक दोनों के ही सुख प्राप्त किये । भगवान ने उन्हें पृथिवी का ३६००० वर्ष तक का राज दिया और परलोक में इसके उपरान्त अटल राज प्रदान किया । 
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हिरण्यकश्यपु ने पुत्र प्रहलाद को नाना कष्ट दिये जिससे उसका अपने पुत्र से स्थाई बैर हो गया । प्रहलाद मनसा, वाचा ‘हरि-हरि’ का जाप करते रहे । हिरण्यकश्यपु अपने किये पापों से आप ही मारा गया । 
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घनघोर जल वर्षा करने वाली वर्षाऋतु आई जिसका जितना भी पानी बरसा वह सारा का सारा घर के भीतर ही गिरा । एक बूंद भी छान से ढलक कर घर के बाहर नहीं गिरी । नामदेव के पास छान छाने को कोई भी सहायक नहीं था । अतः स्वयं विट्ठल परमात्मा ही बैठिया = छान छाने वाला बुनकर आया और छान छाकर चला गया । 
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कबीर रेजी बेचने को गुदरी = बाजार में गया । ठंड का समय था । कोई भजनानंदी महात्मा ठंड से काँप रहा था । कबीर ने उस रेजी को उस महापुरुष संत को ओढ़ने को दे दी । इधर विद्वेषी ब्राह्मणों ने मौका देखकर पूरे शहर में डोंडी पिटवा दी कि आज कबीर के यहाँ षड्दर्शन भंडारा है । अतः सभी प्रसाद पाने को पधारें । 
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कबीर घर में कुछ भी व्यवस्था न होने से जंगल में जाकर छुप गया । परमात्मा ने तरह त्र के अन्नों से लदी हुई बालद कबीर के घर भेज दी जिससे षड्दर्शन भंडारा आनंदपूर्वक सम्पन्न हो गया । छान, छप्पर, शिर की टाटी और पींजने की पींजणी सभी कुछ तार-तार हो गये । ऐसे गरीबदास जैसे गरीबों को भी आपने अपनी कृपा से दादू रूप में दर्शन देकर कृतार्थ किया । 
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परमात्मभजन उजागर होता है, प्राप्त होता है । वह अखंड सुख का सागर है । जिन्होंने भी उसको भजा है, उन्होंने ही उससे अखंडानंद की प्राप्ति ही है । बषनां कहता है, परमात्मा ने अनेकों गरीबों, दीनों पर कृपा की है, उनको कृतार्थ किया है । इसलिये मैंने उसको गरीबनवाज  नाम से पुकारा है ॥१४०॥

*१५. विरक्त् का अंग ~२९/३२*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*१५. विरक्त् का अंग ~२९/३२*
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*नारी नैन न देखिये, श्रवण हुं सुनिये नाँहिं ।*
*बैयर वचन न बोलिये, रज्जब रस भंग माँहिं ॥२९॥*
कामुक दृष्टि से नारी को मत देखो । कामुक भावना रख कर नारी का चरित्र तथा वचन न सुनो, कामुक भावना से नारी शब्द मत बोलो वा कामुक भावना से नारी से मत बोलो कारण, कामुक भावना से देखने, सुनने और बोलने से हृदय का भजन-रस नष्ट हो जाता है अत: माता, बहिन, पुत्री को आत्म दृष्टि से ही देखो, सुनो और बोलो ।
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*माता मेरी सकल ही, जो जन्म जग आय ।*
*जन रज्जब जननी सबै, कासौं विषय कमाय ॥३०॥*
जगत में जो भी नारी जन्मी है, वह मेरी माता है, जब सब ही माता है तब किसके विषय सुख प्राप्त किया जाय ?
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*जा माता में हम भये, सो माता सब ठौर ।*
*रज्जब विरच्या यूं समझ, नहीं भजन कोई और ॥३१॥*
जिस माता से हम जन्मे हैं, वह माता सब स्थानों में है, यही समझ हम विरक्त हुये हैं । हमारे मन में माता रूप भावना से भिन्न अन्य का कोई भी चिन्तन नहीं होता ।
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*सब ही माता सब बहिन, सब पुत्री कर जान ।*
*रज्जब के रमणी नहीं, समझा सद्गुरु ज्ञान ॥३२॥*
जो अपने से अवस्था में बड़ी हो उन सब को माता, समान अवस्था की हो उन सब को बहन और छोटी हो उन सब को पुत्री समझना चाहिये । सद्गुरु के ज्ञान से यही हमने समझा है, अत: हमारी दृष्टि से भोगने योग्य नारी कोई भी नहीं है ।
(क्रमशः)

२६. बिचार कौ अंग २५/२८

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२६. बिचार कौ अंग २५/२८ 
जन्म मरण बहु भांति के, आगै जम की त्रास । 
चौरासी के दुःख सुंनि, सुंदर भयौ उदास ॥२५॥
और यह भी बताया कि इस संसार में जन्म-मरण की परम्परा बहुत लम्बी है । इस में किये गये हीन(पाप) कर्मों के कारण यमराज के यहाँ जाकर कठोर दण्ड भी भोगना पड़ता है । तथा इसी कारण प्राणी को चौरासी लाख योनियों में घूमते रहना पड़ता है । यह सुनकर वह जिज्ञासु उदास(निराश) हो गया ॥२५॥
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बादल गये बिलाइ कैं, तारनि कैं उजियार । 
देख्यौ रजु कौं सर्प तब, सुन्दर बिना बिचार ॥२६॥
परन्तु गुरुपदेश के पुण्य प्रभाव से उस विषयासक्त जिज्ञासु के पापकर्म विलीन हो गये तथा उस के अल्प पुण्यों के प्रभाव से उस के हृदय में तारागण के समान सात्त्विक मध्यम प्रकाश हो गया । उस समय उसने संसार के विषय में सामान्य चिन्तन किया तो उसे रज्जु में सर्प की भ्रान्त प्रतीति होने लगी ॥२६॥
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सुंदर कियौ बिचार जब, प्रगट भयौ तब भान । 
अंधकार रजनी गई, सर्प मिट्यौ रजु जान ॥२७॥
जब गुरुकृपा से उस मुमुक्षु ने इस संसार पर पुनः विवेकपूर्वक चिन्तन किया तब उसके हृदय में ज्ञान का प्रकाश आविर्भूत हुआ । उस की पापमय अन्धकार से आवृत रात्रि समाप्त हो गयी । उसकी भी ज्ञान के प्रकाश में सर्प की भ्रान्ति नष्ट हो गयी तथा रज्जु की वास्तविकता स्पष्ट दिखायी देने लगी ॥२७॥(१)
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सूतौ जीव नरेस यह, सुख सज्जा परि आइ । 
बडी अबिद्या नींद मैं, सुंदर अति सुख पाइ ॥२८॥
भ्रान्तिविषयक दूसरा उदाहरण : कोई जीव रूपी राजा, कभी अज्ञाननिद्रा के वश होकर, सुखशय्या पर सो गया ॥२८॥
(क्रमशः) 

मेरे मन कै मानें मोहनलाल

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*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*दादू पीवै एक रस, बिसरि जाइ सब और ।*
*अविगत यहु गति कीजिये, मन राखो इहि ठौर ॥*
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राग बसंत ॥१२॥रहति(रहनी) ॥
मेरे मन कै मानें मोहनलाल ।
तोहि मिलन का मोहि बहुत ख्याल ॥टेक॥
भवर भवैं बन रवैं नाहिं । वाकी निरति निवासै कवल माहिं ॥
यौं मेरा मन लागा तोहि । नैंकक मिलणैं दीजै मोहि ॥ 
कुंज चितारै धरणि छेव । सित नित राखै करै सेव ॥ 
यौं मेरा मन चरन जाइ । लालचि लागौ रहै लुभाइ ॥ 
सीप  समदाँ जल मँझारि । वा जल सौं नांहीं हेत प्यारि ॥
स्वाति बूंद की रटै प्यास । यौं मेरा मन हरि की आस ॥
चातृग कै चित बहुत चाइ ।  रटतौ डौलै तिस न जाइ ।
यौं बषनां बोलै बारबार । मोहि दरस दिखावौ एक बार ॥१३९॥ 
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मन को मोहित कर लेने वाले हे मोहनलाल मेरे मन ने अब तुझको सर्वांश में अपना मान लिया है; तुझे अपना करके स्वीकार कर लिया है । तुझसे मिलने की मेरी बहुत भारी इच्छा है । जिस प्रकार भौंरा पूरे बन में भ्रमण करता है किन्तु उसमें कहीं भी रमता = स्थिर होकर टिकता नहीं है क्योंकि उसकी चित्तवृत्ति तो कमल में अटकी रहती है । इसी प्रकार मेरा मन तुझमें लग गया है । मुझको मिलने का किञ्चित अवसर तो प्रदान कर । 
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कुंजी नामक पक्षी अपने अंडों को समुद के किनारे मिटटी में दबा देती है और स्वयं इधर-उधर भ्रमण करने चली जाती है किन्तु उसकी चित्तवृत्ति उन अंडों में ही लगी रहती है । वह दूर रहकर भी अपनी चित्तवृति की तन्मयता से उन्हें सेती रहती है = पकाती रहती है । ठीक इसी प्रकार मेरा मन भी आपके चरणों में लगा रहता है । वह आपके दर्शनों के लालच से ललचाया हुआ सदैव आपके चरण कमलों के चिंतन में ही निमग्न रहता है । 
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सीप समुद्र के जल में रहती है किन्तु उस जल से तनिक सा भी हेत प्रेम नहीं करती है । वह तो स्वाति नक्षत्र के जल-वर्षा की ही आशा करती रहती है । ठीक इसी प्रकार मेरा शरीर रहता तो संसार में है किन्तु मेरा मन सदैव आपके चित्त में लगा रहता है । सदैव आपके दर्शनों की आशा करता रहता है । 
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चातक के चित्त में स्वाति नक्षत्र के जल प्राप्त करने की अत्यधिक चाह होती है । वह सर्वत्र सर्वकाल में “पिऊ” “पिऊ” की ध्वनि ही करता फिरता है । फिर भी उसकी जलतृषा बुझती नहीं है । ऐसे ही मैं भी बारबार आपके नाम का स्मरण करता फिरता हूँ । हे प्यारे मनमोहन एकबार मुझको अपना दरस दिखा दे ॥१३९॥

मंगलवार, 2 जून 2026

*१५. विरक्त् का अंग ~२५/२८*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*१५. विरक्त् का अंग ~२५/२८*
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*विरक्तताप हुं पौणि१ की, सो सम कही न जाय ।*
*बीज२ बुहारी की पङिणीं३, नर देखो निरताय४ ॥२५॥*
हे नरो ! विचार४ करके देखो, घर में बिजली२ के पड़ने३ से और बुहारी के पड़ने से एक सा ही संताप होता है क्या ? अर्थात नहीं, वैसे ही भगवद् वियोग जन्य ताप विरक्त संत की और पशु१ समान अज्ञानी प्राणी की समान नहीं कही जाती ।
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*धौ गति टूटे एक को, सालर गति सब कोय ।*
*रज्जब टूटा सो भला, जो फिर हर्या१ न होय ॥२६॥*
सालर वृक्ष की डाली टूट कर पृथ्वी के संबंध से पुन: हरी हो जाती है, ऐसे ही विरक्त होकर पुन: विषयों में अनुरक्त होने वाले तो सभी हैं अर्थात दोष दृष्टि से सभी को वैराग्य होता रहता है किन्तु वे पुन: राग में फंस जाते हैं । धोकड़ा वृक्ष की डाली टूट जाने पर पुन: हरी नहीं होती, ऐसे ही जो विरक्त होकर पुन: विषयों में राग नहीं करता ऐसा कोई विरला ही होता है और जो विरक्त होकर पुन: अनुरक्त१ नहीं होता वही विरक्त श्रेष्ठ होता है ।
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*मिहरी मूंगोड़ी भई, साधू मन भया काग ।*
*जन रज्जब जो यूं तजे, ताके मोटे भाग ॥२७॥*
जैसे मूंगोड़ी को काक पक्षी नहीं खाना चाहता, वैसे ही संत का मन नारी संग नहीं चाहता । जैसे काक ने मूँगोड़ी तजी वैसे ही जो नारी को तज देता है उसका विशाल भाग्य है ।
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*मूंगोड़ी वायस तजी, त्यों वैरागी तज वाम१ ।*
*पंखी की पर२ लीजिये, रज्जब सरे सु काम ॥२८॥*
जैसे काक पक्षी ने मूंगोड़ी तजी है वैसे ही हे विरक्त तू नारी१ को त्याग दे । पक्षी की यह श्रेष्ठ२ शिक्षा धारण कर वा पक्षी जैसे अपने पंख२ को त्याग कर पुन: धारण नहीं करता, वैसे ही नारी को त्याग कर पुन: उसे धारण मत कर तभी तेरा मुक्ति रूप कार्य सम्यक सिद्ध होगा ।
(क्रमशः)

*१५. विरक्त् का अंग ~२१/२४*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*१५. विरक्त् का अंग ~२१/२४*
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*बादल वायु वारि नर मोती, सगुण निर्गुण राखे राग ।*
*केलि कपूर बहुरि नहिं आवे, यूं रज्जब बींधा वैराग ॥२१॥*
बादल, वायु, जल, नर मोती और सगुण हैं, किन्तु निर्गुण में प्रेम रखते हैं । बादल, आकाश में ही रहता है, वायु आकाश में ही चलता है, पृथ्वी पड़ा जल आकाश में ही चढ़ता है । आकाश में इन्हें धारण करने का कोई गुण भी नहीं है किन्तु फिर भी उक्त तीनों का प्रेम आकाश में है । नर गुणों से युक्त होने पर भी निर्गुण ब्रह्म से प्रेम करता है । मोती बहु गुण युक्त होने पर भी हीन गुण वाली सीप में ही प्रेम करता है, अन्य में नहीं बनता, किन्तु फिर भी ये कपूर और विरक्त के समान नहीं हो सकते । कपूर केले में बनता है फिर भी केले से उड़ जाने के पीछे पुन: केले में नहीं आता, वैसे ही विरक्त संसार में जन्मता है किन्तु वह वैराग से इतना विद्ध हो जाता है कि पुन: संसार में नहीं जन्मता । अत: विरक्त का ही निर्गुण प्रेम सफल है, बादल आदि का नहीं कारण वे पुन: पुन: सगुण संसार में आते रहते हैं ।
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*धन्य जु निकस्या धोम ज्यों, रह्या शून्य१ कर सीर२ ।*
*रज्जब तीर कमान ज्यों, निकसि फिरै बहु वीर ॥२२॥*
धनुष से बाण जाता है और पुन: वीर के द्वारा कमान पर चढाया जाता है ऐसे विरक्त तो संसार में बहुत हैं जो घरादि को त्याग देते हैं और पुन: भोग-वासना के द्वारा जन्मादि संसार में आते हैं, किन्तु जैसे रसोई से निकला हुआ धूआँ पुन: रसोई में नहीं आता है, आकाश१ में लीन२ हो जाता है, वैसे ही संसार भावना से निकल कर पुन: भोग-भावना से जन्मादि संसार में नहीं आता है, ब्रह्म१ में लीन हो जाता है वही विरक्त वीर धन्य है ।
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*प्राणी पारे परि१ रमहिं२, वामा३ वैद्य न दूर ।*
*उभय न पावे उभय कर, जो ह्वै गये कपूर ॥२३॥*
अग्नि संस्कार करते समय जब तक वैद्य पास रहता है तब तक पारा उड़ नहीं सकता, वैद्य के वश में पड़ने१ से अपने आधार पात्र में ही विचरता२ है । वैसे ही जब तक प्राणी नारी३ के वश में पड़ा रहता है तब तक तो घर में रहता है । वैद्य दूर चला जाय और पारा कपूर के समान उड़ जाय तो फिर वैद्य के हाथ नहीं आता । वैसे ही जो पुरुष नारी के दूर रहने पर सत्संग द्वारा परम विरक्त होकर घर से निकल जाय तो वह भी उड़े हुये कपूर के समान फिर नारी के हाथ नहीं आता ।
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*पारे प्राणि कपूर है, उभय उडै सम साथ ।*
*एक सु वामा वैद्य कर, एक सु नाम हिं हाथ ॥२४॥*
पारा और प्राणी कपूर के समान हैं, जैसे कपूर उड़ जाता है वैसे ही उक्त दोनों ही उड़ जाते हैं किन्तु जैसे काली मिरचों के साथ रहने पर कपूर नहीं उड़ पाता है वैसे ही वैद्य के अधीन पारा नहीं उड़ पाता है और नारी के अधीन प्राणी विरक्त नहीं हो पाता । पारा वैद्य के हाथ के हाथ में रहता है और पुरुष नारी के हाथ में रहता है, किन्तु जो पारा अपनी ख्याति के हाथ में आ जाता है अर्थात् पारा उड़ने वाला है, यह प्रसिद्ध है अत: जो उड़ जाता है वह वैद्य के अधीन नहीं रहता तथा जो पुरुष भगवान् नाम के हाथ आ जाता है अर्थात निरंतर नाम चिन्तन करता है वह विरक्त हो जाता है और जैसे कपूर उड़ कर आकाश में मिल जाता है वैसे ही भोग-वासना को त्याग कर ज्ञान ब्रह्म में मिल जाता है, वह नारी के अधीन नहीं रहता ।
(क्रमशः)

२६. बिचार कौ अंग २१/२४

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२६. बिचार कौ अंग २१/२४ 
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भोपा भोपी आइ कै, बहुत लगायौ दोष । 
सुन्दर या ऊपर कियौ, देवी देवन रोष ॥२१॥
अविवेकी ओझा(मन्त्रवैद्य) : तब किसी ओझा(भोपा) को या उसकी स्त्री को, वहाँ उस रोगी की चिकित्सा के लिये, बुलाया जाय । वह, आते ही, उस पर किसी देवी या देवता का कोप बताकर उस पर नाना प्रकार के दोष लगावे ॥२१॥
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अपनी अपनी सब कहै, अटकर परै न कोइ । 
सुन्दर बहुत मता सुने, कछू बिचार न होइ ॥२२॥
ये सभी तथाकथित(अविवेकी) ज्ञाता, अपनी अपनी बुद्धि के अनुसार, रोग निवृत्ति के अनेक उपाय बताते हैं; परन्तु उनकी कोई भी युक्ति(अटकल) या उपाय सफल नहीं होते । इस प्रकार, हमने अनेक विद्वानों के अभिमत सुने । किन्तु चिन्तन करने पर इनमें कोई भी मत विचारसरणि पर नहीं चढ सका ॥२२॥
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जे बिषई अत्यंत करि, रहै बिषै फल खाइ । 
सुन्दर मावस की निसा, अभ्र रहे अति छाइ ॥२३॥
भ्रान्ति का एक उदाहरण : कोई लौकिक विषयासक्त पुरुष मेघों से आवृत अमावस्या तिथि को उन विषयों से मुक्ति का उपाय जानने के लिये किसी योग्य गुरु के पास पहुँचा ॥२३॥
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कोऊ एक मुमुक्षु कौं, दीयौ गुरु उपदेश । 
सुन्दर वा सौं यौं कह्यौ, यह संसार कलेश ॥२४॥
गुरुदेव ने उस को विषयभोगों की हीनता बताते हुए इस नश्वर संसार को क्लेशमय(दुःखमय) बताया ॥२४॥
(क्रमशः)

*बाणी बरसै सबद सुहावै ॥*

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*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*वसुधा सब फूलै फलै, पृथ्वी अनंत अपार ।*
*गगन गर्ज जल थल भरै, दादू जै जै कार ॥*
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साधु महिमा ॥ साषी लापचारी की ॥१ 
(१. इन साषियों का अर्थ ‘गुरुदेव कौ अंग’ में देंखे ।)
बषनां बाणी बरसणी, बरसै गहर गँभीर ।
सूका नैं हरिया करै, गुर बाणी कौ नीर ॥
बषनां बाणी बरसणी, अंमृत बरसण लाग ।
बैणाँ पुणिगाँ वोसरी, भीगा ज्याँह सिरि भाग ॥
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पद ॥
*बाणी बरसै सबद सुहावै ॥*
कनरस भरि भरि हरिरस पीवै, हरि भगताँ नैं थावै ॥टेक॥
साध सीप संसार समंदा, तामैं लिपत न थावै । 
स्वाति बूंद सौं हरि रस बरसै, मन मोती होइ आवै ॥
रूँख बिरख बाबा की बाड़ी, केला भेला ठाँई । 
काया केलि मैं हरि रस बरसै, व्है कपूर ता मांहीं ॥ 
डूंगर हरिया सरवर भरिया, नीर निवाणाँ सरिया । 
फूली फली प्रत्थमी सगली, बाबै आनँद करिया 
दादुर मोर बबीहा बोलै, और जलचराँ जीवैं ।
बषनां बाणी हरि रस बरसै, साध सवाया पीवै ॥१३८॥
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परहित-निरत-संत-महात्मा सभी के लिये हितकारी अपरोक्षानुभूतियुक्त उपदेश देते हैं जो सभी सुनने वालों को प्रियकर लगता है । वे संत-महात्मा कानों को प्रिय लगने वाला हरि-गुण-रस स्वयं तो प्याले भर-भर कर पीते ही हैं हरिभक्तों को भी पिलाते हैं जो उन हरिभक्तों को भी प्रिय लगता है ।
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संसार रूपी समुद्र में साध-संत सीप के समान हैं जो संसार में रहते हुए भी संसार के भोगविलासों को ठीक वैसे ही नहीं भोगते हैं जैसे सीप समुद्र में रहकर भी समुद्र-जल का पान नहीं करके स्वाति नक्षत्र का जल ग्रहण करती है । जब हरिरस रूपी स्वाति नक्षत्र का जल बरसता है तब मन मोती हो जाता है । 
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बाबा = परमात्मा की संसार रूपी बाड़ी में केले के वृक्ष के साथ ही अनेकों प्रकार के पेड़ पौधे हैं । अर्थात् संसार में चौरासी लाख प्रकार की जीवा-जोनी साधु-संतों सहित रहती है । जब काया रूपी केले के वृक्ष में हरिरस रूपी वर्षा बरसती है तब वह कपूर में परिणित हो जाती है । 
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उस हरिरस रूपी वर्षा से डूंगर रूपी अहं का शुष्कत्व मिटकर शील, संतोष, क्षमा, दया आदि रूपी घास वृक्षादि से हरा भरा हो जाता है । हृदय रूपी सरोवर रामरस से लबालब भर जाता है । हरिरस रूपी जल, (निवाण = नीची जगह, तलहटी) सुरति रूपी निवाण में अथाह मात्रा में एकत्रित हो जाता है जो आवश्यकतानुसार हृदय रूपी सरोवर को जल से पूरित रखता है । 
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इस हरिरस रूपी वर्षा के जल से शरीर रूपी पूरी पृथिवी ही हरि भरी हो जाती है । वस्तुतः परमात्मा ने साधु-संतों के द्वारा हरिरस का वितरण कराकर आनंद करने का बंदोबस्त कर दिया है । उस हरिरस रूपी वर्षा के जल से कामी, क्रोधी, लोभी, दुराचारी रूपी दादुर, मोर, पपीहा और अनेक जलचर आनंदमग्न होकर हरि गुणों का गान करते हैं और आनंदपूर्वक जगत् में निवास करते हैं । 
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बषनां कहता है ब्रह्मनिष्ठ साधु-संतों की वाणी हरिरस रूपी जल की वर्षा करती है जिसको साधक साधु-संत पूरे उत्साह के साथ सवाया = अधिक से अधिक पीते हैं ॥१३८॥

सोमवार, 1 जून 2026

२६. बिचार कौ अंग १७/२०

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२६. बिचार कौ अंग १७/२० 
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इनि दुहुंवनि कै मध्य है, नव तत्वनि कौ लिंग । 
सुन्दर करै बिचार जब, उहै होत तब भंग ॥१७॥
लिङ्गशरीर : रूप और आत्मा के मध्य नौ तत्त्वों से निर्मित एक लिङ्गशरीर(कारण शरीर या सूक्ष्म शरीर) भी है । सुन्दरदासजी कहते हैं - जब विवेकपूर्वक चिन्तन किया जाय तो वह भी विनाशी ही ज्ञात होगा ॥१७॥
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पंच तत्व सौं मिलि रह्यौ, सूक्षम लिंग शरीर । 
सुन्दर एक बिचार बिन, चेतन मानत सीर ॥१८॥
यह सूक्ष्म शरीर भी पञ्च तत्त्व(पृथिवी, जल, अग्नि, वायु, आकाश) से मिला हुआ है । श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - (अज्ञानावृत)आत्मा, विवेक न होने के कारण, इसमें आसक्ति कर लेता है ॥१८॥
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ज्यौं काहू कै रोग ह्वै, नाडी देखै बैद । 
सुन्दर अपनी सी कहै, वायु कियौ तन कैद ॥१९॥
अविवेकी वैद्य : जैसे किसी रोगी पुरुष को कोई वैद्य आकर(उसकी नाडी) देखे । वह अपनी बुद्धि के अनुसार, रोगी के शरीर को वात(वायु) रोग से युक्त बता दे ॥१९॥
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बहुरि बुलायौ जोतिषी, उन यह कियौ बिचारि । 
सुन्दर ग्रह लागै सबै, कीये पुन्य उबार ॥२०॥
अविवेकी ज्यौतिषी : पुनः वहाँ किसी ज्यौतिषी को बुलाया जाय । वह उस रोगी को, अपने विचार के अनुसार, अनेक दुष्ट ग्रहों से युक्त बतावे और कुछ पुण्य करने से ही उस के स्वास्थ्य की उन्नति बतावे ॥२०॥
(क्रमशः)

काँयौं डर छै रे घर बार कौ

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*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*सब जग मांही एकला, देह निरंतर वास ।*
*दादू कारण राम के, घर वन मांहि उदास ॥*
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भेष ॥
*काँयौं डर छै रे घर बार कौ ।*
ज्याँह के हिरदै हरि कौ सुमिरण, ता डर नहीं लगार कौ ॥टेक॥
काँयौं घर काँयौं बन मांहीं, यहु छै काम बिचार कौ ।
बैराग लियाँ की कौंण बडाई, जे भार बहै संसार कौ ॥
तनि बैरागी मनि घरबारी, दीठौ ग्यान गवार कौ ।
थोड़ी छोडि घणेरी लागौ, पसारौ सैंवार कौ ॥
चरण चितारै हिरदै धारै, गुर गमि ग्यान अपार कौ ।
तिहि नैं करम न लागै कोई, वो साहिब का दरबारि कौ ॥
सुवा पढावत गनिका तारी, जिहि कै बणिज बिकार कौ ।
अजामेलि से अधम उधारे, जिनि नाम लियौ करतार कौ ॥
घर मैं होते नाम कबीरा, अरु रैदास चमार कौ ।
घर मांहै हरि का गुण गावै, बषनां सिरजनहार कौ ॥१३७॥
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कहते हैं, दादूजी के समतापूर्ण बर्ताव पर उनके शिष्यों में यह चर्चा चली कि बषनांजी गृहस्थ हैं जबकि हम विरक्त हैं ।  फिर भी दादूजी महाराज बषनांजी को भी उतना ही मान सम्मान देते हैं जितना हमको देते हैं । सिद्धांततः महत्व हमको ज्यादा मिलना चाहिये । 
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यद्यपि दादूजी अपने शिष्यों की इस चर्चा से प्रसन्न नहीं थे तथा वे स्वयं भी इसका उचित उत्तर दे सकते थे किन्तु उन्होंने इसका उत्तर बषनांजी से ही उक्त पद के माध्यम से दिलवाया है जिसका स्पष्ट संकेत है कि मात्र स्त्री का परित्याग करके साधु के से वस्त्र पहन लेने से कोई साधु नहीं हो जाता । साधु होने के लिये मन में से विषय-विकारों के प्रति विद्यमान सूक्ष्म से सूक्ष्म राग को भी निकाल देना होता है । 
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विरक्त वह नहीं है जो एक घर को छोड़कर अनेकों मठ मंदिर बनाता और संचालित करता फिरे । वस्तुतः विरक्त तो वह है जिसके मन में से संसार ही नहीं ब्रह्मा के लोक तक के समस्त सुखों के प्रति राग समाप्त हो जाता है । गीता में कहा गया है विषय स्थूल रूप से तो निवृत्त हो जाते हैं किन्तु सूक्ष्म रूप से उसमें राग विद्यमान रह जाता हा जो ही सबसे बड़ा घातक है । यही प्रवृत्ति और निवृत्ति मार्ग की भित्ति है । बषनांज ने इस प्रवृत्ति वाद तथा निवृत्तिवाद पर बहुत ही सुंदर विवेचन इस पद में किया है । 
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“विषया विनिवर्तंते निराहारस्य देहिनः । 
रसवर्जरसोप्यस्य परं दृष्ट्वा निवर्तते ।” 
२|५९ । गीता ॥ 
“कहणी का कहिये भगत, रहणी का संसार । 
रामचरण वै पावसी, जम दरघै बहुमार ॥” 
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घरबार का होना किसी डर का कारण नहीं है । अतः घरबार होने में किस बात का डर है । जिनके हृदय में अहर्निश राम-नाम का स्मरण चलता रहता है, उन्हें घरबार से तनिक भी डर नहीं है । उनके लिये क्या तो घर में रहना और क्या जंगल दोनों ही बंधनकारी भी हो सकते हैं तो अबंधनकारी भी हो सकते हैं । जब अनित्यता का विचार करके घर को छोड़ा जाता है तब तो वह अबंधनकारी होता है किन्तु जब वहीँ घर बिना विचार किये छोड़ा जाता है तब वह बंधनकारी हो जाता है क्योंकि जंगल में रहने पर भी घर गृहस्थ के प्रति राग निवृत्त नहीं होता है । 
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अतः यह विचार का विषय है । भौतिक रूप से त्यागने अथवा न त्यागने का नहीं है । उस वैराग्य धारण करने का क्या महत्व है जिसमें सांसारिक क्रियाकलापों से पीछा नहीं छूटता है । वैरागी संसारी की तरह रामभजन न करके मकान, खेती, धन, दौलत की व्यवस्था करता रहे । वह ज्ञान तो गँवार के ज्ञान के सदृश है जिसमें व्यक्ति शरीर से तो भेष पहनकर वैरागी बन जाता है किन्तु काम से घरबारी ही बना रहता हाउ, प्रवृत्तिमार्ग का अवलम्बन किये रहता है । 
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ऐसा वैरागी एक घर की थोड़ी बहुत सम्पत्ति, शिष्य-प्रशिष्यों का समुदाय एकत्रित कर लेता है । उसका विस्तार सौ गुणा कर लेता है । इसके विपरीत गुरुपदिष्ट ज्ञानानुसार अपार = निर्गुण-निराकार-परमात्मा का जो सदैव चिंतन करते हैं, उसका स्मरण सदैव हृदय से करते हैं, उनको किसी भी प्रकार के परमात्मा द्वारा नियत किये गये कर्मों के फलभोग बंधनकारी नहीं होते है । क्योंकि वे वर्तमान कर्मों को अकर्त्ताभाव से प्रारब्धों को प्रभुप्रसाद समझकर करते भोगते हैं । सचितों ओ समाप्त करने के लिये सदैव भगवद्भजन करते हैं ॥ 
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“क्रीयमाण करिये नहीं, प्रारब्ध कर्म ले भोग । 
संचित ऊपर भजन कर, यौं छूटै भवरोग ॥” 
(श्रीरामजन वीतराग वाणी) 
जिस स्त्री का, गणिका का विषयभोग का व्यापार था, वह भी शुक के साथ राम-नाम का स्मरण करने से मोक्ष पाने की अधिकारिणी हो गई । अजामिल जैसा वेश्यागामी पतितब्राह्माण भी उद्धार को प्राप्त हो गया जिसने परब्रह्म-परमात्मा का नाम स्मरण अपने पुत्र के नाम के बहाने किया । घरबारी ही नामदेव तथा कबीर थे तो घरबारी ही रैदास चमार भी थे । घर में ही बषनां हरि सृजनहार के गुणों का गान करता है ॥१३७॥ 

रविवार, 31 मई 2026

*१५. विरक्त् का अंग ~१७/२०*

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*🌷卐 सत्यराम सा 卐🌷*
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*१५. विरक्त् का अंग ~१७/२०*
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*मनसा वाचा कर्मना, गहै न त्यागन हार ।*
*रज्जब रुचे न ऊगले, उर अबला रु आहार ॥१७॥*
जो मन, वचन, कर्म से त्याग देता है, वह पुन: ग्रहण नहीं करता, जैसे वमन करे हुये आहार को ग्रहण करने की इच्छा नहीं होती, वैसे ही त्यागी हुई नारी की इच्छा नहीं होती ।
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*रज्जब रवि को दरशते, अरुचि छींक चखि नीर ।*
*शक्ति सुन्दरी सन्मुखै, सो गति साधू वीर१ ॥१८॥*
सूर्य के समाने देखने से देखने की रूचि नहीं होती, छींकै आने लगती है और नेत्रों में पानी आने लगता है, देखने वाले की स्थिति बिगड़ जाती है, वैसे ही हे भाई१ स्वर्णादि माया और नारी के सामने देखने से विरक्त की स्थिति भी बिगड़ जाती है ।
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*कायर कोट२ हुं सौ गिर हिं, कंध न लेहि करवाल१ ।*
*त्यों अधपति३ अबल४ हुं सु डरि, गहै गरीबी हाल ॥१९॥*
कायर कंधे पर तलवार१ रखकर युद्ध में नहीं जाते तो भी किले२ पर से युद्ध करने वाले वीरों की तलवारों की चमक देख के भय से चक्कर खाकर नीचे गिर जाते हैं, वैसे ही राजा३ लोग विरक्तों के समान काम से युद्ध तो कहां सकते हैं, केवल काम के शस्त्र नारी४ से ही डरकर गरीबी दशा में आ जाते हैं, अर्थात दीन गरीब प्राणी के समान नारी के आगे उसकी गुलामी करते हैं ।
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*साधु सुत के जावणै२, हरि सिद्धि नहिं हेत ।*
*पूत नीपजे मात मरि, खोटा३ खच्चर बेत१ ॥२०॥*
खच्चरी के पेट रूप स्थान१ से जब खच्चर जन्मता है तब पेट को फाड़कर माता के मरने पर ही जन्मता है, अत: माता की दृष्टि से बुरा३ है । वैसे ही परमात्मा के विरक्त संतरूप पुत्र जन्मता२ है तब उसका हरि सिद्धि(माया) से प्रेम नहीं होता है, वह माया को नष्ट करके अर्थात मिथ्या समझ कर के ही होता है ।
(क्रमशः)

शनिवार, 30 मई 2026

२६. बिचार कौ अंग १३/१६

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२६. बिचार कौ अंग १३/१६ 
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सुन्दर ब्रह्म बिचारि है, सब साधन कौ मूल । 
याही मैं आये सकल, डाल पान फल फूल१ ॥१३॥ 
(१ तु० श्रीदादूवाणी : ८/७४
सब आया उस एक में, डाल पांन फल फूल । 
दादू पीछे क्या रह्या, जब निज पकड्या मूल ॥ 
(निज-ब्रह्मविचार))
सूक्ष्म विचार करते करते हम को यही समझ में आया कि ब्रह्मचिन्तन ही भगवत्साक्षात्कार का एकमात्र उपाय है । अन्य छोटे बड़े उपाय तो इसी में डाल, पान, फल फूल के समान सम्पृक्त हो जायँगें ॥१३॥
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कीयौ ब्रह्म बिचार जिनि, तिनि सब साधन कीन । 
सुन्दर राजा कै रहै, प्रजा सकल आधीन ॥१४॥
बात को सरलता से ऐसे समझिये - जिस जिज्ञासु ने भगवत्साक्षात्कार हेतु ब्रह्मचिन्तन उपाय का उपयोग कर लिया, समझ लो कि उसने सभी उपायों(साधनों) का प्रयोग कर लिया; क्योंकि लोक में हम देखते हैं कि समस्त प्रजा एक राजा के ही अधीन होती है । यह ब्रह्मचिन्तन उपाय भी भगवत्प्राप्ति के सब उपायों का राजा ही है ॥१४॥
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परा पश्यंति मध्यमा, हृदये होइ बिचार । 
सुन्दर मुख तैं बैखरी, बांणी कौ बिस्तार ॥१५॥
चतुर्विध वाणी में से परा, पश्यन्ती एवं मध्यमा - इन तीन वाणियों से हृदय में ब्रह्म का चिन्तन होता है और चतुर्थ वैखरी वाणी से उस ब्रह्म का विस्तार(व्याख्यान) होता है ॥१५॥ (तु०- सवैया : २६/८)
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सुन्दर रूप रहै नहीं, रूप रूप मिलि जाइ । 
एक अखंडित आतमा, सब मैं रह्यौ समाइ ॥१६॥
लौकिक रूप, विनाशी होने के कारण, स्थायी नहीं है; वह एक न एक दिन विश्वरूप में मिल ही जायगा । तब शेष में अखण्ड आत्मा रहेगा जो सर्वत्र व्यापक(समाया हुआ) है ॥१६॥
(क्रमशः)