सोमवार, 9 मार्च 2026

वाणीपाठ ~

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*॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥*
*॥ दादूराम~सत्यराम ॥*
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
वाणीपाठ ~  
शताब्दी उत्सव के कार्यक्रम में एक अंग ‘श्रीदादूवाणी’ के  ४०१ पाठ भी थे । पाठों का आरंभ माघ शुक्ला ५ को नारायणा दादूधाम में किया गया । इसके लिये १५ संत नियुक्त किये गये । एक पाठ अखण्ड दिन रात चलता था । शेष खुले होते थे । संत लोग उत्साह पूर्वक पाठ करने लगे ।  
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सभा मण्डप ~ 
शताब्दी उत्सव समिति ने सभा मण्डप योजना स्वीकृत की थी । तद्नुसार- तपस्वी चौक, विरक्तों की बारहदरी, छतरियें, बागर तथा तालाब के बीच का मैदान सभा के लिये चुना गया । तालाब से पश्‍चिम की ओर थोडी जगह छोडकर १५० फुट चौ़डाई व तीन सौ फुट लम्बाई का चौक उपयोग में लाया गया । 
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पंडाल के लिए राव राजा जी सीकर, डिग्गी ठाकुर साहब, दूदू ठाकुर साहब, चौमू साहब, बडे गाँव ठाकुर साहब व नारायणा दादूधाम के तम्बू डेरे, छोलदारी कनातों का सामान प्राप्त हुआ था । इसी सामग्री से उत्तम व सुन्दर सभा मंडप की रचना हो गई थी । सभा मंडप का पूरा स्थान इतना था कि उसमें करीब सात आठ हजार व्यक्ति बैठ सकते थे । 
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मंडप में एक मुख्य द्वार पश्‍चिमाभिमुख तथा दो लघु द्वार उत्तर दक्षिण थे । मंडप में बल्ली, बांस, रस्सी, सफाई व मजदूरी का ही व्यय हुआ था । वस्त्र संबन्धी व्यय बिल्कुल नहीं हुआ था । बल्लियों में भी सौ बल्ली माधवलालजी फुलेरे वालों ने उपयोग में लाने के लिए ऐसे ही दी थी । 
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मंडप के दो भाग थे । प्रमुख(मंच) भाग, साधारण भाग । प्रमुख भाग के लिए एक चबूतरा दो फुट ऊंचा, १५० फुट लम्बा ५० फुट चौडा बनाया गया था । शेष भाग भूमि के धरातल का था । मंडप के मध्य में माननीय सन्त श्री किशनदासजी बीकानेर निवासी के सुयोग्य शिष्य स्वामी नारायणदासजी आयुर्वेदाचार्य संचालक दादूदयाल फार्मेसी बीकानेर द्वारा इस आयोजन के लिए बनवाया हुआ श्री दादूजी महाराज का छ: फुट तीन फुट का सुन्दर चित्र शोभायमान था । चित्र दादूजी महाराज का वृद्ध भगवान से उपदेश ग्रहण करते समय का था ।
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दादू वाणी की महत्व पूर्ण साखियों के बोर्ड स्थान- २ पर लगे हुये थे । बावन थामों की नामावली व सिद्ध महात्मा योगी, तपस्वी, शूरवीर, विद्वान, भजनीक, मंडलेश्‍वर, कला- विदों की सूचियें सम्प्रदाय के महान् अतीत की स्मृति को जाग्रत कर रही थी । मंडप की चार दिवारी कनातों की थी । इसकी सब कनातें दूदू ठाकुर साहब से प्राप्त हुई थीं । 
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सभा मंडप के निर्माण में सबसे अधिक सहायता दूदू ठाकुर साहब से प्राप्त हुई थीं । मंडप के आगे, पश्‍चिम में, दक्षिण में व उत्तर में तम्बू डेरे थे व छोल दारियों की पंक्तियें लगाई गई थीं । विशेष अतिथियों के लिये कानडदासजी के चौभीते में डेरे, छोलदारियों का प्रबन्ध किया था । 
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गृहस्थ अतिथियों के लिए व गणमान्य अतिथियों के लिए अन्य कई स्थानों की व्यवस्था की गई थी । कानडदासजी का चौभीता, महात्मा हरजीरामजी का महल, तपस्वी चौक से स्वामी रतिरामजी की हवेली तक के सम्पूर्ण स्थानों तक शताब्दी उत्सव व्याप्त था । सभा मंडप से राम चौक तक ध्वजा पताकायें लहरा रही थीं । माघ शु. १३ से फा. शु. ३ तक  सभा मंडप बन गया था । 
(क्रमशः)

२०. विपर्यय कौ अंग ४५/४७

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२०. विपर्यय कौ अंग ४५/४७
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सुन्दर बरिखा अति भई, सूकि गई सब साख । 
नींव फल्यौ बहु भांति करि, लागे दाड्यौं दाख ॥४५॥
अमृतमय गुरुज्ञानापेदश की अतिशय वृष्टि के प्रभाव से, साधक द्वारा साधनचतुष्टय करने से, उस के विषयभोगादिक की खेती सूख गयी । परन्तु वहाँ भी यह अतिशय आश्चर्यमय घटना हुई कि जहाँ कटु रस से परिपूर्ण नीम का वृक्ष फला फूला(हरा भरा) ही खड़ा रह गया तथा अब उस में अनार, अमरूद, अंगूर(दाख) आदि(अमानित्व, अदम्भित्व, अहिंसा, क्षान्ति) फल दिखायी देने लगे ॥४५॥ (इस साषी का सवैया में व्याख्यान नहीं हुआ ।) ॥
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मिष्ट सु तौ करवौ लग्यौ, करवो लाग्यौ मीठ । 
सुन्दर उलटी बात यह, अपनै नैंनहि दीठ ॥४६॥
अब महात्मा श्रीसुन्दरदासजी अधोलिखित तीन साषियों से इस 'विपर्यय' पर अपना अनुभव सुनाते हैं -उस गुरुज्ञानोपदेश का हम पर भी यह प्रभाव हुआ कि पहले(गुरुपदेश सुनने से पूर्व) हमें जो सांसारिक भोग मधुर(अनुकूल) प्रतीत होते थे, वे ही अब(गुरु से ज्ञानोपदेश प्राप्ति के बाद) वे ही कटु(त्याज्य) लगने लगे, जिन त्याग, वैराग्य आदि से उपेक्षा या घृणा(कटुता) थी वे ही गुण अब मधुर(ग्राह्य) लगने लगे । हमारे जीवन में भी, उस ज्ञानोपदेश के प्रभाव के कारण, यह विपरीत घटना हुई । इतना ही नहीं; हमने स्वयं यह वैपरीत्य अपने गुरुजनों की पवित्र चर्चा में भी अपनी आंखों देखा है ॥४६॥
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मित्र सु तौ बैरी भये, बैरी हूये मिंत । 
सुन्दर उलटी बात सौं, भागी सबही चिंत ॥४७॥
इस ज्ञानोपदेश के हमारी बदली हुई जीवनचर्या के कारण पहले जो मोह, ममता, मित्र कलत्र आदि हमारे अनुकूल(प्रिय) थे वे आज हमारे बैरी(विरोधी) बन गये; तथा उस समय जो(साधु, सन्त, सच्छास्त्र आदि) वैरी प्रतीत होते थे वे ही अब हमारे मित्र(सुहृत्) बन गये । तथा सबसे बड़ी बात यह हुई कि उस गुरुपदेश के प्रभाव से हमारी सर्वविध सांसारिक चिन्ताएँ(वासना) पूर्णतः निवृत्त हो गयीं ॥४७॥
(क्रमशः)

*उपदेश ॥*

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*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल**साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*मेरी मेरी करत जग खीना, देखत ही चल जावै ।*
*काम क्रोध तृष्णा तन जालै, तातैं पार न पावै ॥टेक॥*
*मूरख ममता जन्म गमावै, भूल रहे इहिं बाजी ।*
*बाजीगर को जानत नांही, जन्म गंवावै वादी ॥*
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*उपदेश ॥*
देखि जनम ज्यूँ हार्यौ रे ।
मेरी मेरी करि करि बौरे, राम बिसार्यौ रे ॥टेक॥
राचि माचि रह्यौ मैं बड मैं बड, कारिज न सार्यौ रे ।
पूत कलित धन जोबन माया मैं, गरबि गलार्यौ रे ॥
इंद्र्याँ कौं स्वारथ बहु कीनौं, पेट पसार्यौ रे ।
परधन परदारा परपँच तैं, मन नहिं मार्यौ रे ॥
गरब सरब सुख संपति माँहीं, हरि न निहार्यौ रे ।
मरती बार बिसूरण लागौ, धरणि उतार्यौ रे ॥
बालापणि तरणापैं बुढपणि, हरि न संभार्यौ रे ।
बषनां पहली बात बिगाड़ी, पछै पुकार्यौ रे ॥६५॥
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संसारासक्त जीव को उपदेश देते हुए कहते हैं, हे मूर्ख जीव ! उन बातों पर गंभीरतापूर्वक विचार कर जिनके कारण तूने देवदुर्लभ मनुष्य जन्म व्यर्थ ही बर्बाद कर दिया है । वस्तुतः हे बौरे = बावरे = मूर्ख मनुष्य ! तूने इस नश्वर संसार को जो न हमारा था, न है और न आगे होगा को अपना कह-कहकर, मान-मानकर उस परमात्मा को बिसार दिया है जो हमारा था, है और सदैव रहेगा ।
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मैं पैसेवाला हूँ, मैं धनवान हूँ, मैं जनवान हूँ, मैं समाज में प्रतिष्ठित व्यक्ति हूँ, मैं बुद्धिमान हूँ आदि नाना प्रकार के बडप्पन जन्य अहंकारों में राचि-माचि = आकंठ = पूर्णरूपेण डूबा हुआ है जिसके कारण उस कार्य को संपादित नहीं कर पाया जिसके लिये परमातमा ने अहैतुकी कृपा करके मनुष्य जन्म दिया है ।
“कबहुँक करि करुणा नर देही ।
देत ईस बिनु हेतु सनेही ॥”
“एहि तन करि फल विषय न भाई ।
स्वर्गउं स्वल्प अंत दुखदाई ॥”
असौ मया हतः शत्रुर्हनिष्ये चापरानपि ।
ईश्वरोऽहमहं भोगी सिद्धोऽहं बलवान्सुखी ॥
आढ्योऽभिजनवानस्मि कोऽन्योऽस्ति सदृशो मया ।
यक्ष्ये दास्यामि मोदिस्य इत्यज्ञानविमोहिताः ॥ गीता १६/१४-१५॥
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वस्तुतः हे मूर्ख मनुष्य ! तू तो पुत्र, पत्नी, धन, यौवन, माया = ऐश्वर्यादि के मद में मस्त होकर गर्जता फिर रहा है । इन्द्रियों को तृप्त करने के लिये ही तूने नाना विस्तारवाले अनेक व्यापार = धन्धे, कार्य-व्यवहार कर रखे हैं । दूसरों के धन व स्त्रियों को हड़पने के लिये प्रपंच-पाखंड से तूने मन को विरत कभी किया ही नहीं है ।
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सर्वरूपेण सुख संपति के गर्व में ही गरक हुआ पड़ा है । हरि = परात्पर-परब्रह्म को जानना तो दूर जानने का प्रयत्न तक तूने नहीं किया है । जब मरने लगता है और घरवालों द्वारा चारपाई पर से धरती पर उतार लिया जाता है तब अपने पूर्वकृत कर्मों को स्मरण कर-करके दहाड़ दे-देकर रोने लगता है कि हाय ! जिनको मैं अपना मानता था, जिनको प्राप्त करने में मैंने इतना भारी परिश्रम किया है, वे सभी मेरे से छूट रहे हैं । हाय मैं क्या करूँ ? जिस शरीर को मैं अपना समझता था, वह भी मेरे साथ नहीं जाकर यहीं छूटे जा रहा है । हाय ! हाय !! मेरे प्रयत्न व्यर्थ हुए जा रहे हैं ।
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कितना मूर्ख रह गया मैं कि मैंने न बालकपन में, न युवावस्था में, न जवानी में और न ही वृद्धावस्था में परमात्मा का भजन-स्मरण किया है । बषनांजी कहते हैं अवसर रहते भजन-स्मरण न करके पहले ही मूर्ख मनुष्य ने अपनी बात को बिगाड़ ली जिसके कारण अंत समय में उसे पुकारना पड़ रहा है, पश्चाताप करना पड़ रहा है । “समय चुके पुनि का पछिताने ॥” ६५॥

*५. गुरु-शिष्य निदान निर्णय का अंग ~ ५७/६०*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*५. गुरु-शिष्य निदान निर्णय का अंग ~ ५७/६०*
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*पान फूल फल तरु लगै, त्यों त्रिविधि भांति गुरु शिख्य१ ।*
*फूल वास तरु गुरु लिये, रज्जब सब विधि पिख्य२ ॥५७॥*
५७-५९ में गुरु तथा शिष्य निर्णय का विचार कर रहे हैं - जैसे वृक्ष के पत्ते, फूल और फल लगते हैं, वैसे ही तीन प्रकार के शिष्य१ गुरु के होते हैं, उनकी भिन्न पद्धति अब सब देखें२ । फूल वृक्ष से सुगन्ध लेता है फूल के समान शिष्य गुरु से ज्ञान लेता है ।
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*बात१ पात छाया लिये, ज्ञान सु गुल२ सम वास ।*
*करणी३ फल गुरु तरु गहैं, त्रिविधि भांति परकास४ ॥५८॥*
जैसे पत्ता वृक्ष से छाया देने की योग्यता प्राप्त करता है, वैसे ही एक प्रकार का शिष्य गुरु से कथा१ करने की योग्यता प्राप्त करता है । जैसे पुष्प२ वृक्ष से सुगन्ध लेता है, वैसे ही दूसरे प्रकार का शिष्य गुरु से आत्म ज्ञान लेता है । जैसे फल वृक्ष से तृप्ति प्रदान करने की शक्ति लेता है, वैसे ही तीसरे प्रकार का शिष्य ज्ञान के अनुसार निष्ठा रूप कर्त्तव्य३ प्राप्त कर के अन्यों को भी तृप्ति प्रदान करता है । उक्त रीति से गुरु से शिष्य तीन प्रकार का ज्ञान४ प्राप्त करते हैं ।
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*गुरु तरु शिष लागे सु यूं, ज्यों डाल पान फल फूल ।*
*बात घात इक झड पडै, एक न छाडैं मूल ॥५९॥*
जैसे वृक्ष के डाल, पत्ते, फूल, फल लगते हैं, वैसे ही गुरु के साथ शिष्य लगते हैं । जैसे पत्ते, फूल और फल तो वृक्ष को किंचित वायु के वेग से छोड देते हैं किन्तु डाल वृक्ष के मूल को किंचित वायु के आधात से नहीं छोडती । वैसे ही कुछ शिष्य तो गुरु के कठोर शब्दों को श्रवण कर के गुरु का संग छोड देते हैं और कुछ गुरु के उपकार की महानता को देखते हुये कटु उपदेश से चलायमान नहीं होते और आजीवन गुरु का संग तथा सेवा को नहीं छोडते ।
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*रज्जब गृह गृह गुरु दीपक दशा, तिनहुँ न पूरे आश ।*
*गुण तारे भ्रम शीत का, सद्गुरु सूरज नाश ॥६०॥*
६०-६१ में सद्गुरु की विशेषता बता रहे हैं - घर घर में दीपक जलते हैं किंतु उनसें तारों के अदर्शन और ठंडी के अभाव की आशा पूर्ण नहीं होती । सूर्य उदय होता है तभी तारों का अदर्शन और ठंडी का अभाव होता है वैसे ही गुरुओं की दशा है, गुरु घर - घर में घूमते हैं किन्तु उनसे काम-क्रोधादि गुण और अज्ञान नाश नहीं होता । गुण और अज्ञान का नाश रूप कार्य तो सद्गुरु से ही होता है ।
(क्रमशः)

रविवार, 1 मार्च 2026

आचार्य रामलालजी के चातुर्मास

 

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*॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥*
*॥ दादूराम~सत्यराम ॥*
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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१७ आचार्य रामलालजी ~
आचार्य रामलालजी के चातुर्मास१- १ - संत गोपालदासजी नारनौल । २- संत लच्छीरामजी लालसोट । ३- रामदयालजी गरीबदासोत मोटलास । उक्त तीनों के स्थानों पर जाकर चातुर्मास किये । आडारामजी खालसा वालों ने तथा महन्त दयारामजी अलेवा वालों ने नारायणा दादूधाम में चातुर्मास करवाये । 
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उक्त सभी चातुमासों में मर्यादा के अनुसार अच्छे रुप से आचार्य रामलालजी महाराज का सत्कार हुआ । जब भी आप रामत करने पधारे तभी मकानधारी शिष्य मंडल तथा जागीरदार व सेठ साहूकारों ने बहुत श्रद्धा से आपका आतिथ्य सत्कार किया ।
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श्री दादू दयाराम विद्यालय ~  
आचार्य रामलालजी ने अपने गुरुदेव की पुण्य स्मृति को चिरस्थायी बनाने के लिये एक हजार रुपया वार्षिक के खर्च से ‘श्रीदादू दयाराम संस्कृत विद्यालय’ स्थापित किया था । किन्तु वह चिरकाल तक नहीं चल सका । आचार्य रामलालजी महाराज के समय में सबसे महान कार्य ‘श्रीदादू चतु: शताब्दी महोत्सव’ हुआ था । वह भी दादूपंथी समाज के इतिहास का अंग है । अत: उसका संक्षिप्त परिचय यहाँ दिया जा रहा है देखिये ।
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श्रीदादू चतु: शताब्दी- महोत्सव ~ 
श्रीदादू चतु: शताब्दी महोत्सव मनाने का संकल्प प्रथम आयुर्वेद मार्तण्ड स्वामी लक्ष्मीरामजी महाराज को हुआ था । उनका संकल्प ही शताब्दी मनाने में मूल सूत्र है । १९९४- ९५ में दादूदयालु महासभा के सदस्यों में शताब्दी उत्सव का विचार उक्त वैद्यजी महाराज के द्वारा ही खडा हुआ था । किन्तु वि. सं. १९९७ में उक्त  वैद्यजी महाराज का देहान्त हो गया । 
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फिर महासभा के ‘स्थान संरक्षण’ प्रस्ताव पर आपसी मतभेद हो जाने से महासभा ने उक्त उत्सव कार्य अपने हाथ में नहीं लिया । वि. सं. १९९९ के नारायणा दादूधाम के वार्षिक मेले पर समाज में उक्त उत्सव का प्रस्ताव रक्खा गया । तब कई दिन के विचार विमर्श के पश्‍चात् संप्रदाय के सभी प्रमुख महानुभावों ने ‘शताब्दी’ मनाने का निश्‍चय किया । फिर उत्सव के लिये चंदा की योजना बनाई गई । सभी समाज ने अपनी- अपनी शक्ति अनुसार चंदा दिया । उत्सव की रुप रेखा बनाई ।  
(क्रमशः) 

२०. विपर्यय कौ अंग ४१/४४

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२०. विपर्यय कौ अंग ४१/४४
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बन में एक अहेरिये, दीनी अग्नि लगाइ । 
सुन्दर उलटै धनुष सर, सावज मारै आइ ॥४१॥
एक शिकारी(साथक सन्त) ने विषय भोग रूप वन में ज्ञान की अग्नि प्रज्वलित कर दी । तथा वहाँ उसने अपना ध्यान रूप धनुष वाण सजा कर चित्त वृत्ति रूप लक्ष्य के समीप आने वाले दुष्ट पशु(सावज) रूप क्राम क्रोध आदि विकारों को मारना आरम्भ किया ॥४१॥ (द्र० – सवैया : २२/छ० २९) ।
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मार्यौ सिंह महा बली, मार्यौ व्याघ्र कराल । 
सुन्दर सबही घेरि करि, मारी मृग की डाल ॥४२॥
वहाँ उस साधनाकाल में उस साधक ने शिकारी के रूप में अपने अहङ्कार एवं कामवासना रूप महाबली सिंह को मार(निगृहीत कर) दिया । भयङ्कर व्याघ्र रूप बहिर्मुख मन को भी नियन्त्रित किया । इतना ही नहीं, उस साधनावस्था में मृग-समूह रूप अपने दुर्गुणों को भी नष्ट कर दिया । ऐसे उसने स्वचित्त को साधना में लगाया ॥४२॥ (द्र० – सवैया २२/छ० २९) ॥ 
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सुन्दर सरवर सूकतें, कंवल प्रफुल्लित होइ । 
हंस तहां क्रीडा करै, पंखी रहै न कोइ ॥४३॥
महाराज श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - तब उस साधक के लिये भवसागर रूप मानसरोवर(तृष्णा रूप जल न होने से) सूख जाने पर साधक का हृदयकमल प्रमुदित(शुद्ध) हो गया । वहाँ हंस रूप साधक सन्त भक्तिरस का आनन्दानुभव करने लगे, परन्तु संसारी जीवरूप अन्य पक्षी की चित्तवृत्ति वहाँ नहीं पहुँच सकी ॥४३॥ (द्र० - सवैया : २२/छ० ३०) ॥
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कूप उसार्यौ कुंभ मैं, पानी भर्यौ अटूट । 
सुन्दर तृषा सबै गई, धापे चार्यौं खूंट ॥४४॥
श्रीसुन्दरदासजी की इस उलटवांसी का आध्यात्मिक अर्थ यह है - साधक में वासनारूप जल से परिपूर्ण विषय भोग रूप कूप(कुआ) को अपने शुद्ध मन रूप घट(कुम्भ) में उतार दिया । वह ज्ञान रूप जल से परिपूर्ण होने के कारण अतिशय शुद्ध था, अतः वह विषयादिक से रहित होने से तृष्णाओं से दूर हो चुका था । उस जल से सभी पिपासुओं की तृष्णा दूर हो गयी । तथा उस जल को पी कर अन्तःकरणचतुष्टय(= चारों खूंट) तृप्त हो गये ॥४४॥
(क्रमशः)

*आत्मनिवेदन ॥*

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*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*महा अपराधी एक मैं, सारे इहि संसार ।*
*अवगुण मेरे अति घणे, अन्त न आवैं पार ॥*
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*आत्मनिवेदन ॥*
मींया मेरे अैसा भोजन भावै ।
बीबी बड़ी सालना कीया, ताका टाँक सवाद न आवै ॥टेक॥
खारी हुइ खांड लूण हुवा मीठा, दूध थे काँजी फारा ।  
मिसरी माँहैं मेवा भेल्या, खाताँ लागै खारा ॥
सौक्याँ सौकि लड़ाई हूई, दुहुँ मैं एक न लरजै ।
सासूँ का क्यूँह सारा नाँहीं, नाटी नणदल बरजै ॥
ऐकै घर मैं तेरह माणस, सात पुरिष छह नारी ।
पाँच डबोवैं पाँच तिरावैं, येक अचंभा भारी ॥
तेरह पाछैं दोइ भँडारी, पूरा पाँच सवादी ।
तू राखै त्यूँ रहूँ केसवा, जन बषनां अपराधी ॥६४॥ 
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मींया = मन । भोजन = विषयभोग । बीबी बड़ी = कुबुद्धि । सालणा = भोजन, विषयभोगों को प्राप्त कराती है, उनमें आसक्ति उत्पन्न करती है । टाँक = तनिक सा । खारी = बुरी, अरुचिकर । खांड = खरा परमात्मा का नाम । लूण = कुकर्म । दूध = मन । काँजी = माया, कर्म । मिश्री = परमात्मा का मीठा नाम । मेवा = अनन्यप्रीति, अनुराग । भेल्या = मिलाया । बुरा = अरुचिकर । सौक्याँ सौकि = सौतों-सौतौं में लड़ाई हुई = सुबुद्धि और कुबुद्धि में आपस में लड़ाई होती है किन्तु उन दिनों में से, न लरजै = कोई भी झुकती नहीं, समझौता नहीं करती है । सारा = सहारा, सहयोग, मदद । क्यूँह = कुछ भी । बरजै = रोके । तेरह माणस = तेरह द्वार । घर = काया । सात पुरिख = ब्रह्मरंध्र, दो कान, दो आँख, दो नासिका । छहनारी = मुख, दो स्तन, नाभि, शिश्नेन्द्रिय और गुदा । भंडारी = मुख तथा शिश्न । सासू = सुरति । नाटी नणदल = नकटी = बेशर्म विषयासक्ति, सुरति-वृत्ति को सहयोग करने से मना करती है । इसीलिये वह असहाय है । तेरह माणस = दूसरे विकल्प के अनुसार पाँच कर्मेन्द्रिय, पाँच ज्ञानेन्द्रिय, मन, बुद्धि और अहंकार । पाँच ज्ञानेन्द्रिय मन और अहंकार पुरुष जबकि पांच कर्मेन्द्रिय व बुद्धि स्त्री हैं । दोइ भँडारी = (विकल्प से), जीव व जीव का मन । 
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बषनांजी इस पद में अपने आपको विषयी जीव मानते हुए भगवद्भजन न करने के कारण भगवान् का अपराधी मानकर भगवच्छरणागति की याचना करते हैं । उन्होंने अपने विचार सपाट शैली में व्यक्त न करके कूट शैली में व्यक्त किये हैं जिसके लिये प्रतीकों का प्रयोग किया है । 
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वे आत्मनिवेदन करते हुए कहते हैं, हे केशव ! मेरे विषयी मन रूपी मींया को विषयभोग रूपी भोजन ही रुचिकर लगता है । उसे तेरी भक्ति में जरा भी रूचि नहीं है । सांसारिक विषयों में आसक्त दुष्ट बुद्धि इस मन को नाना भोगों को भोगने के लिये प्रेरित करती है । मन उन भोगों को भोगता है । फिर भी वह उनसे जरा सा भी संतुष्ट नहीं होता तथा और भोग भोगूँ, और भोग भोगूँ, इसी उहापोह में लगा रहता है । 
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फलस्वरूप उसको आपका खरा = निष्कलंक नाम अरुचिकर लगने लगा है जबकि विषयभोग, माया-धन, नाना सकामकर्म प्रिय लगने लगे हैं । क्योंकि काँजी = माया, कुकर्मों रूपी काँजी ने दूध रूपी मन को फाड़ दिया है, अपने आप में पूर्णरूपेण आसक्त कर लिया है । आपने जीवों के कल्याण के लिये, मेरे कल्याण के लिये भक्ति रूपी मिश्री को मेवा रूपी अनन्य अनुराग के साथ सुलभ करवाया है .....
“सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं ब्रज । 
अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुच ॥” 
गीता १८/६५ ॥ 
किन्तु इस भक्तिरूपी भोजन को खाना = भक्ति की साधना करना सर्वथा खारा = रसहीन = अरुचिकर लगता है । 
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सुबुद्धि और कुबुद्धि अथवा मन तथा निजमन रूपी सौतों में गंभीर लड़ाई होती है किन्तु दोनों में से कोई भी लड़ाई से विरत नहीं होती । एक दूसरी, एक दूसरी को पछाड़ देने के कुचक्र में ही लगी रहती है किन्तु कोई भी हार मानकर शांत नहीं होती उल्टे पूरे जोश के साथ अनवरत लड़ती रहती हैं ।  इस लड़ाई में सुरति रूपी सास कुछ भी मदद नहीं कर पाती क्योंकि बेशर्म नणदल रूपी विषयों में आसक्ति सुरति को ऐसा करने के लिये रोकती है । अर्थात् विषयों में आसक्ति इस कदर हो चुकी है कि वह सुरति को कुछ भी मात्रा में सहयोग नहीं करने देती । 
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इस एक ही घर रूपी शरीर में पाँच ज्ञानेन्द्रिय, पाँच कर्मेन्द्रिय, मन, बुद्धि, अहंकार रूपी तेरह मनुष्य रहते हैं । जिनमें से सात पुरुष तथा छह स्त्रियाँ हैं । पाँच कर्मेन्द्रिय दुष्कर्म, सकामकर्म करके डुबोने में सहायक बनती हैं जबकि पांच ज्ञानेन्द्रियाँ सत्संग द्वारा ज्ञान का संपादन करके उबारने का प्रयत्न करती हैं । एक ही घर के सदस्यों का उक्त प्रकार का विपरीत आचरण निसंदेह आश्चर्य उत्पन्न करने वाला है । 
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इन तेरह मनुष्यों को सहयोग देने वाले मुख तथा शिश्नेन्द्रिय नामक दो आहार लेने वाले भंडारी हैं । जिस प्रकार भंडार का प्रधान सभी को आवश्यक सामग्री उपलब्ध कराकर संतुष्ट करता है । मन इन्हीं द्वारों के माध्यम से भोगों को भोगता है । ये दोनों द्वार रूप, रस, गंध, स्पर्श व शब्द रूपी पाँचों के पक्के स्वादी हैं । हे केशव ! मैं बषनां उक्त प्रकार का अतीव विषयी होने से आपका अपराधी हूँ । अतः आपको जैसा भी उचित लगे, मेरे लिये वैसा ही करें । क्योंकि मैं आपकी शरण में आ पड़ा हूँ । मैं सर्वथा और सर्वथा आपका हूँ ॥६४॥ 

शनिवार, 28 फ़रवरी 2026

*५. गुरु-शिष्य निदान निर्णय का अंग ~ ५३/५६*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*५. गुरु-शिष्य निदान निर्णय का अंग ~ ५३/५६*
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*आदम१ करि आदम उदय, सीप ही निपजे सीप ।*
*पै मन मुक्ता गुरु इन्द्र करि, सद्गुरु स्वाति समीप ॥५३॥*
मनुष्य१ से मनुष्य और सीप से सीप उत्पन्न होती है किन्तु मन में ज्ञान सद्गुरु के समीप रहकर उपदेश सुनने से और सीप में मोती स्वाति बिन्दु पड़ने से ही होता है ।
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*सद्गुरु श्रावण की कला१, ता में मौज२ सु स्वाति ।*
*तब मोती मन नीपजे, जन रज्जब इहिं भाँति ॥५४॥*
श्रावण के दिनों१ में स्वाति नक्षत्र की बिन्दु से सीप में मोती उत्पन्न होता है, इसी प्रकार सद्गुरु के समीप रहने के दिनों में उपदेश सुनने का आनन्द२ मिलता है, तब मन में ज्ञान उत्पन्न होता है ।
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*जन रज्जब गुरु धरणि पर, शिष सारे वनराय१ ।*
*घट२ प्रमाण३ रस सब पिवें, अपणे अपणे भाय४ ॥५५॥*
५५-५६ में शिष्यों के भाव का परिचय दे रहें हैं - पृथ्वी पर की वन-पंक्तियों१ के वृक्ष अपने आकार और शक्ति२ के समान३ ही जल पान करते हैं । वैसे ही गुरु के आश्रय रहने वाले शिष्य भी सब अन्त:करण की वृत्ति से अपने-अपने भाव४ के समान ही ज्ञान, भक्ति, योगादि के उपदेश रस का पान करतें हैं ।
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*जन रज्जब गुरु ज्ञान जल, सींचे शिष वनराय१ ।*
*लघु दीरध अरु स्वाद विध, ह्वै अंकूर स्वभाय ॥५६॥*
बादल वन-पंक्तियों१ के सभी वृक्षों के बीजों को समान ही जल सींचते हैं किन्तु सबके अंकुर भिन्न भिन्न प्रकार के होते हैं, कोई छोटा, कोई बडा, और कटु मधुरादि स्वाद भी सबके भिन्न भिन्न होते हैं । वैसे ही गुरु तो उपदेश सबको समान ही देते हैं किन्तु शिष्य सभी अपने अपने स्वभाव के अनुसार ही योग्यता प्राप्त करते हैं ।
(क्रमशः)  

शुक्रवार, 27 फ़रवरी 2026

२०. विपर्यय कौ अंग ३७/४०

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२०. विपर्यय कौ अंग ३७/४०
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पानी फिरै पुकारतौ, उपजी जरनि अपार ।
पावक आयौ पूछनै, सुन्दर वाकी सार ॥३७॥
जब कोई जिज्ञासु अपनी प्रेमा भक्ति से उत्पन्न विरह की अग्नि ज्वाला से सन्तप्त होकर, उस ताप को मिटाने के लिये ज्ञानी जनों को खोजता है तो वे ज्ञानी जन ही उस पर दया कर उसके पास अपनी ज्ञानाग्नि भेजते हैं । उस अवसर पर वह ज्ञानाग्नि ही उस जिज्ञासु की विरहताप से रक्षा(=सार) करती है तो उस का त्रिविध ताप निवृत्त होता है और उसे भगवत्साक्षात्कार हो पाता है ॥३७॥ (द्र० – सवैया : छ० २२/२६)।
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जौ तूं मेरी सीख ले, तौ तूं सीतल होइ ।
फिरि मोही सौं मिलि रहै, सुन्दर दुःख न कोइ ॥३८॥
इस साषी के माध्यम से ज्ञान प्रेम से कहता है - यदि स्वभाव से शीतल तूं मेरी सीख(उपदेश) मान ले तो तूं सदा शीतल रह सकता है । तब हम दोनों एक दूसरे से सम्प्रुक्त हो सकते हैं । (कहने का तात्पर्य यह है - भक्ति की प्रथम अवस्था में जिज्ञासु को अवश्य द्वैतभाव रहता है, जिसके कारण उस को अपने उपास्य के प्रति विह्वलता होती है; परन्तु वह साधना करते करते जब पराभक्ति की साधना की पराकाष्ठा पर पहुँच जाता है, तब वह उसकी ज्ञान दशा होती है । वहाँ पहुंचने पर उसे निरञ्जन निराकार प्रभु का साक्षात्कार हो जाता है । उस समय उसकी उस जलन का कोई ठौर ठिकाना भी नहीं मिलता और वह निरन्तर ब्रह्मानन्द में निमग्न लगता है ।) ॥३८॥ (द्र० – सवैया : २२/छ० २६ उ०) ॥
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पंथी मांहे पंथ चलि, आयौ आकसमात । 
सुन्दर वाही पंथ गहि, उठि चाल्यौ परभात ॥३९॥
पन्थी मुमुक्षु सन्त साधक के पास पन्थ(ज्ञान) स्वयं अकस्मात् पहुँच गया । उस पन्थ के पन्थी में प्रविष्ट होते ही ब्रह्मप्राप्ति का वह विशेष अवसर = प्रातः काल, ब्राह्ममुहूर्त आते ही वह पन्थी उस पन्थ(ज्ञान) पर आरुढ होकर प्रभुसाक्षात्कार हेतु चल दिया(साधना आरम्भ कर दी) ॥३९॥ (द्र० - सवैया २२/छ० २८) ॥
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चलत चलत पहुंच्यौ तहां, जहां आपनौ भौंन । 
सुन्दर निश्चल ह्वै रह्यौ, फिरि आवै कहि कौंन ॥४०॥
चलते चलते(साधना करते करते) वह साधक(पन्थी) प्रभु के उस अविनाशी स्थान पर पहुँच गया जो उसका अपना निजी भवन कहलाता है । जहाँ साधक एक बार पहुँच जाने पर वहाँ से पुनः लौटने की इच्छा ही नहीं करता । (तु०- गीता : "यद् गत्वा न निवर्तन्ते तद् धाम परम सम" - १५/६)। वहाँ निश्चल बैठ कर भगवद्ध्यान में मग्न हो गया ॥४०॥ (द्र० - सवैया २२/छ० २८) ॥
(क्रमशः)

१७ आचार्य रामलालजी

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*॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥*
*॥ दादूराम~सत्यराम ॥*
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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अध्याय १४  
१७ आचार्य रामलालजी ~
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रामलालजी शरीर से शार्दूलपुरा के गूजर गौड़ ब्राह्मण थे । आचार्य दयारामजी महाराज के शिष्य बचपन में ही हो गये थे और गुरु सेवा में तत्पर रहते थे । बडे हो जाने पर कार्य कुशल भी हो गये थे । फिर मुख्य भंडारी भी बन गये थे । गुरु सेवा और कुशलता आदि से ये आचार्य दयारामजी महाराज के विशेष रुप से कृपा पात्र भी बन गये थे । 
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इससे आचार्य दयारामजी महाराज ने इसको अपना उत्तराधिकारी नियत करने से विरोध भी खडा हो गया था । परन्तु अन्त में आचार्य दयारामजी महाराज ब्रह्मलीन होने पर समाज ने सोच विचार करके  वि. स. १९८८ कार्तिक शुक्ल ११ को आचार्य पद पर रामलालजी को ही बैठाया । कारण दादूद्वारे का सर्वस्व रामलालजी के ही हाथ में था । 
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रामलालजी ही सब रहस्यों के तथा मर्यादाओं के जानकार थे । तथा स्थान का संरक्षक अन्य कोई इनके समान उस समय था भी नहीं । अन्य को बैठाने में लाभ के स्थान में हानि की संभावना थी । इत्यादिक  सब बातें सोचकर रामलालजी को ही आचार्य पद पर अभिषिक्त किया गया । 
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चरण प्रतिष्ठा ~ 
आचार्य रामलालजी महाराज ने अपने गुरुदेव पूर्वाचार्य दयारामजी महाराज के चरण प्रतिष्ठा के लिये संगमरमर की विशाल छत्री बनवाई और वि. सं. १९८८ फाल्गुण शुक्ल पक्ष में मेले के समय बडा मेला भरवाकर चरण प्रतिष्ठा करवाई । मेले में आगत सर्व समाज को भोजन कराया और दादूपंथ को पूजा बांटी । उक्त कार्य अति कुशलता से किया गया । 
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सद्व्यवहार ~  
पूर्व में जो विरोध था, वह आचार्य रामलालजी के सद्व्यवहार से समाप्त हो गया । आपने दादूद्वारे के धार्मिक  कार्य सदाव्रत आदि जो सदा से चले आ रहे थे, उन सबको सुचारु रुप से चलाये । आपका अपने इष्ट में दॄढ विश्‍वास था । आपका दिन रात्रि का अधिक समय ब्रह्म भजन में ही व्यतीत होता था । आप प्रत्येक सम्प्रदाय और धार्मिक समाजों को अच्छी दृष्टि से देखते थे । आपके उपदेश में मूल दो बातें थीं - दयाल पर विश्‍वास रक्खो और अपने धर्म में अडिग रहो । आपके निश्‍चय के समान ही आपको सफलता भी मिलती थी ।
(क्रमशः) 

*ज्ञान-विचार ॥*

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*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*दादू देखु दयालु को, रोक रह्या सब ठौर ।*
*घट घट मेरा सांइयाँ, तूँ जनि जानै और ॥*
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*ज्ञान-विचार ॥*
अैसी काहे न बूझै काजी ।
जे तैं एक एक करि जाण्याँ, तौ दूसरि दगाबाजी ॥टेक॥
एकै खाना एकहि माटी, एकहि घडनैंहारा ।
एक चाक परि सबै उतार्या, सारा सकल पसारा ॥
एकहि कूवा एकहि पाणी, जिनि भरि आण्याँ जिसका ।
भरियाँ पछैं अपूठा न्यौड़हिं, तब वो पाणी किसका ॥
जैसी कीड़ी तैसा हाथी, जीव सबै सारीखा ।
जाणैं कौंण जौहरी पाखै, हीरे की पारिखा ॥
पाणी अरु पाखाण माँहि तू, जल थल मैं अँस तेरा ।
बषनौं कहै न देखूँ दूज, सारै साहिब मेरा ॥६३॥
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बूझै = पूछता है; जानता है  बूझना पूछने, जानने, समझने आदि के अर्थ में प्रयुक्त होता है । बषनांजी काजी  = इस्लामधर्म के मर्मज्ञ उपदेशक से प्रश्न करते हुए कहते हैं; हे काजी ! यदि तूने एक = अद्वितीय परमात्मा को अद्वितीय रूप में ही जानकर तदतिरिक्त सभी को दगाबाजी = धोखा = मिथ्या = भ्रमजाल जान लिया है तो फिर क्यों नहीं इस ज्ञान को आचरण में उतारता है तथा क्यों नहीं अपने श्रोताओं को सुनाकर उनसे आचरित करवाता है । 
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कारण, हिन्दू, मुसलमान आदि सभी एक ही प्रकृति रूपी खान के माटी रूपी पंच तत्वों से निर्मित शरीरवाले हैं और इनका कर्त्ता = घड़ने वाला = निमित्त कारण एक अद्वितीय परब्रह्म-परमात्मा ही है । जिस प्रकार घड़ा बनाने वाला कुम्हार सभी घड़ों को एक ही चाक पर बनाता है तथापि उस एक की ही कृति होने पर भी वे भिन्न-भिन्न से लगते हैं जबकि उनका उपादान कारण मिट्टी तथा निमित्तकारण कुम्हार एक ही होता है । वैसे ही सारे सचराचर ब्रह्मांड को उस परमात्मा ने अपनी प्रकृतिरूपी चाक पर ही बनाया है जिससे सारा ब्रह्मांड उस एक की ही रचना है~
“मम योनिर्महद्ब्रह्म तसमिन्गर्भं दधाम्यहम् । 
संभवः सर्वभूतानां ततो भवति भारत ॥” १४/३ ॥ 
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जिस प्रकार एक कूवे में एक ही पानी होता है किन्तु जैसे ही पानी घड़े में भरकर भिन्न-भिन्न व्यक्तियों द्वारा लाया जाकर भिन्न-भिन्न व्यक्तियों का कहलाने लगता है वैसे ही सभी शरीरों में एक ही परमात्मा विद्यमान है किन्तु पूर्वजन्मकृत भिन्न-भिन्न कर्मों के कारण एक ही चैतन्य की भिन्न-भिन्न संज्ञा हो जाती है किन्तु जब भरे हुए जल को वापिस कूवे में डाल दिया जाता है तब वह पानी किसी का भी न रहकर एक हो जाता है । 
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ऐसे ही शरीर रूपी उपाधि के समाप्त चैतन्य तो स्वजातीय, विजातीय तथा स्वगत तीनों भेदों से शून्य है । आत्मा सभी में समान है चाहे वह विशालाकाय हाथी हो चाहे लघुकाय चींटी हो । वस्तुतः हीरे की परख जौहरी के अलावा कौन जान सकता है । ऐसे ही एक आत्मा सभी शरीरों में आत्मज्ञानी के अलावा कौन अनुभव कर सकता है । 
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बषनांजी अपने इष्ट से कहते हैं, हे परमात्मन् ! तू ही पानी और पाषाण में समाया हुआ है तथा तू ही जल-थल में परिव्याप्त है; जल थल तेरे ही अंश हैं । समस्त सचराचर में हे मेरे साहिब ! तू ही है । अतः मैं तो समस्त सचराचर में तेरे अतिरिक्त अन्य किसी को देखता नहीं हूँ ॥ 
“मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना । 
मत्स्थानि सर्वभूतानि न चाहं तेष्ववस्थितः ॥९/४॥” 
“सीयाराम मय सब जग जानी । 
करहूँ प्रनाम जोरि जुग पानी ।” 
“हरि व्यापक सर्वत्र समाना । 
प्रेम तें प्रगट होहिं मैं जाना ॥”

*५. गुरु-शिष्य निदान निर्णय का अंग ~ ४९/५२*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*५. गुरु-शिष्य निदान निर्णय का अंग ~ ४९/५२*
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*घट१ भण्डार भगवंत का, आतम वित२ तिहिं थान ।*
*भण्डारी भण्डार में, जन रज्जब गुरु ज्ञान ॥४९॥*
शरीर में अन्त:करण१ ही भगवान का भण्डार है, आत्मा ही उस में धन२ है, उस भण्डार के आत्म-धन का भण्डारी गुरु है । उसे गुरु, ज्ञान द्वार दिखाता है, गुरु ज्ञान बिना वह आत्मा नहीं दिखता ।
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*वजूद१ खजाना अलह का, जर२ अंदर अरवाह३ ।*
*रज्जब पीर४ खजानची, दस्त५ न सक ही बाह६ ॥५०॥*
शरीर१ ईश्वर के खजाने हैं, इसके भीतर आत्माएँ२ ही धन३ हैं, सिद्ध४ गुरु ही खजान्ची हैं । किन्तु वे आत्म-धन को अपना समझकर उस पर हाथ५ नहीं डालते अर्थात जीवात्मा को अपनी उपासना में नहीं लगाते । भगवान का समझकर रक्षा करते हुये भगवान में ही लगाते हैं । अत: धन्य६ हैं ।
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*श्रिया२ शक्ति शरीर जीव लौं, वस्तु पराई वीर१ ।*
*जिसकी तिस हिं चढावता, कुण३ माँगे क्या सीर४ ॥५१॥*
हे भाई१ ! लक्ष्मी२, शक्ति, शरीर, जीव तक ये सभी वस्तु पराई हैं । अर्थात ईश्वर की हैं । जिस ईश्वर की है उसको समर्पण करते हुये इन को कौन३ माँगता है, माँगने वाले का इनमें क्या साझा४ है ? अर्थात गुरु का अधिकार इन सबको हजम करने का नहीं है, शिष्य से सेवा लेने का ही है ।
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*शरीर शरीर हुं उपज हिं, सुरति१ सीप के माँहिं ।*
*पै रज्जब गुरु इन्द्र बिन, मन मुक्ता ह्वै नाँहिं ॥५२॥*
५२-५४ में गुरु की विशेषता बता रहे हैं - जैसे सीप से सीप उत्पन्न होती है वैसे नारी-पुरुष के संयोग१ से शरीर तो उत्पन्न हो जाता है परन्तु इन्द्र बिना सीप में मोती और गुरु बिना मन में ज्ञान उत्पन्न नहीं हो सकता ।
(क्रमशः)

गुरुवार, 26 फ़रवरी 2026

२०. विपर्यय कौ अंग ३३/३६

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२०. विपर्यय कौ अंग ३३/३६
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पहराइत घर कौं मुसै, साह न जांनै कोई । 
चोर आइ रक्षा करै, सुन्दर तब सुख होइ ॥३३॥
ज्ञानी पुरुष की ज्ञानेन्द्रियाँ एवं कर्मेन्द्रियाँ काया के नौ(९) द्वारों पर पहरेदार(रक्षक) बैठी हुई अपने रक्षा कर्म से विमुख होकर विषयभोगों के प्रति लोलुपता उत्पन्न कर मन आदि अन्तःकरण रूप घर को इतने दीर्घ काल से नष्ट कर रही थी । इस का काया के स्वामी(जीव) को ज्ञान भी नहीं था । तब प्रसिद्ध चौर(भगवान्) ने उस अपने भक्त पर दया कर, उन कृतघ्न पहरेदारों को निगृहीत कर अन्तःकरण रूप घर की रक्षा की तथा उस के मन को भगवान् की ओर अभिमुख कर दिया । तब वह त्रिविध सांसारिक दुःखों से मुक्त होकर ब्रह्मानन्द का अनुभव करने लगा ॥३३॥ (द्र० - सवैया: २२/छ० सं० २४) ॥
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कोतवाल कौं पकरि कै, काठौ राख्यौ जूरि । 
राजा भाग्यौ गांव तजि, सुन्दर सुख भरपूरि ॥३४॥
इतना ही नहीं, उन भगवान् ने अज्ञानकाल में चञ्चल मन रूप कोतवाल(रक्षक) को निगृहीत कर उसके सङ्कल्प-विकल्प आदि की ओर गमन को दृढता से रोक दिया(काठो राख्यौ जूरि) । ऐसी स्थिति में राजा(रजोगुण) ने भी उस गाँव(अन्तःकरण) को छोड़ना ही उचित समझा; क्योंकि अब तक कोतवाल के बल पर ही राजा राज्य करता था । अतः बल के नष्ट होने पर राजा भी राज्य छोड़ कर भाग गया । अर्थात् चित्तवृत्ति के निरोध से, सद्‌गुण की वृद्धि होने पर, साधक को शान्ति मिली ॥३४॥ (द्र० - सवैया : २२/छ० २४) ॥
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नाइक लाद्यौ उलटि करि, बैल बिचारै आइ ।
गौंन भरी लै बस्तु मैं, सुन्दर हरिपुर जाइ ॥३५॥
बलवान् एवं अहङ्कारी इस जीव ने, अन्त में निष्काम वृत्ति धारण कर, अपना समस्त कर्मभार अपने स्वामी(नायक = ब्रह्म) पर ही लाद दिया(उसको सौंप दिया) । अर्थात् अपने सभी गौण(तीनों गुणों से उत्पन्न) कर्म ब्रह्म को अर्पण कर दिये१ । इसके फलस्वरूप यह साधक ब्रह्मलोक(समाधि की तुरीयावस्था) में पहुंचकर आनन्दानुभव करने लगा ॥३५॥ 
{द्र० – सवैया : २२/छ० २२) 
(१ श्रीमद्भगवद‌गीता – ५/१०)
ब्रह्मण्याधाय कर्माणि संग त्यक्त्वा करोति यः। 
लिप्यते न स पापेन पद्मपत्रमिवाम्भसा ॥}
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सुन्दर राजा बिपति सौं, घर घर मांगै भीख । 
पाय पयादौ उठि चलै, घोरा भरै न बीख ॥३६॥
राजा = रजोगुणयुक्त जीव या मन विविधतृष्णारूप विपत्तियों में लिप्त होने से उन की पूर्ति के लिये घर घर जाकर अनेक शुभाशुभ कर्म करता हुआ भिक्षा माँगता फिरता है । जब उस का घोड़ा(शरीर) थक जाता है तो वह पैदल ही घोड़े के साथ धीरे धीरे चलता(सङ्कल्प करता) हुआ अपने सङ्कल्पों को पूर्ण करने का प्रयास करता है तो भी उसे कोई भी भिक्षा नहीं देता(उसके सङ्कल्प पूर्ण नहीं करता) ॥३६॥ (द्र० - सवैया : २२/छ० सं० २५) ॥
(क्रमशः)

ब्रह्मलीन होना ~

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*॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥*
*॥ दादूराम~सत्यराम ॥*
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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१६ आचार्य दयारामजी ~
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ब्रह्मलीन होना ~
आचार्य दयारामजी महाराज ने दादूपंथ का यश देश में सब ओर भ्रमण करके फैलाया । राजा महाराजा सेठ साहूकार साधारण जनता आदि सभी को अपने वचनामृत से तृप्त करते हुये गद्दी पर ३३ वर्ष ५ मास २६ दिन विराजकर वि. सं. १९८८ कार्तिक  शुक्ला अष्टमी को ब्रह्मलीन हुये ।
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गुण गाथा ~ दोहा- 
दयाराम आचार्य ने, कीन्हा भ्रमण विशेष । 
जो अपना कर्तव्य था, पूरा किया अशेष ॥१॥
नृप रईस राणादि ने, पूजे बारंबार ।
दयाराम आचार्य का, अधिक हुआ सत्कार ॥२॥
अति विशाल पुर पुरिन में, दादू वाणि प्रचार ।
कर निज सेवक जनों का, करा क्लेश संहार ॥३॥
विकट परिस्थिति में रहे, निश्‍चय प्रभु का धार । 
दयाराम की इसलिये, टेक रखी करतार ॥४॥ 
दादू दीनदयालुका, मत हिय मांहिं विचार ।  
दयाराम भजते रहे, निशि दिन जगदाधार ॥५॥ 
दयाराम की दया का, पात्र हुये जो कोय ।
‘नारायण’ कह लोक में, सुखी हो गया सोय ॥६॥ 
इतिश्री त्रयोदश अध्याय समाप्त: १३
(क्रमशः)

*५. गुरु-शिष्य निदान निर्णय का अंग ~ ४५/४८*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*५. गुरु-शिष्य निदान निर्णय का अंग ~ ४५/४८*
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*एक गुरु है आरसी, शिष चख अटके वार१ ।*
*जन रज्जब चश्मा गुरु, काढै अपने पार२ ॥४५॥*
४५-४६ में गुरु और सद्गुरु का परिचय दे रहे हैं - दर्पण१ में तो नेत्र रुक जाते हैं, दर्पण के पार की वस्तु नहीं देख पाते, चश्मा से नेत्र आगे२ की वस्तुओं को भी देखते हैं । वैसे ही साधारण गुरु तो शिष्य को अपने शरीरादि की सेवा में लगा लेता है शिष्य उसी में रुक जाता है, ईश्वर उपासनादि द्वारा आगे बढ़ कर ब्रह्म साक्षात्कार नहीं कर पाता । और सद्गुरु ज्ञान द्वारा शिष्य को आगे बढ़ाकर परब्रह्म का साक्षात्कार करा देता है ।
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*शब्द शीत गुरु जल मही१, अति गति२ निर्मल माँहिं ।*
*तिन में दीसे परे का, वैला३ दीसे नाँहिं ॥४६॥*
पृथ्वी१ में पड़े किंचित जल में शब्द, शीतलता, गंभीरता, निर्मलता नहीं होती और न दूर की वस्तु ही दिखती, अपने भीतर की वस्तु दिखती है, किन्तु अति गहरे२ जल में शब्द, शीतलता, गंभीरता निर्मलता और प्रतिबिम्ब रूप से दूर के वृक्षादि भी दिखते हैं । वैसे ही साधारण गुरु आत्म - ज्ञानयुक्त शब्द, क्षमारूप शीतलता स्वभाव की गंभीरता, निर्मलता नहीं होती । उसके द्वारा पास३ का मायिक संसार स्वर्गादि वा मायिक मूर्तियाँ ही ईश्वर रूप से दिखाई जाती हैं, माया से परे परब्रह्म को वह नहीं दिखा सकता । सद्गुरु में आत्म-ज्ञानयुक्त शब्द, क्षमारूप शीतलता, अति गंभीरता, निर्मलता होती है, उनके द्वारा पास३ की मायिक मूर्तियाँ परब्रह्म रूप नहीं भासती, वे माया से परे परब्रह्म को ही ध्येय ज्ञेय रूप से बताते हैं ।
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*वित१ वोहित२ सब साह का, सद्गुरु खेवण हार ।*
*धन धणी३ के हि जायगा, रज्जब उतरे पार ॥४७॥*
४७-५१ में गुरु का अधिकार बता रहे हैं - जहाज२ में धन१ तो साहुकार का ही होता है, केवट का नहीं । समुद्र के तट पर पहुँचने पर धन स्वामी३ के ही जायेगा । केवट को केवल उताराई ही मिलेगी । वैसे ही जीवात्मा तो परमात्मा का अंश है, परमात्मा में ही जायगा, उसे गुरु अपनी उपासना में लगावे तो, यह गुरु का प्रमाद है । गुरु को चाहिये कि शिष्य से अपने अधिकार की सेवा लेते हुये उसे ज्ञान द्वारा संसार से पार करके परब्रह्म से मिलावे ।
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*जे काजी काईन१ पढे, तो कुछु खसम न होय ।*
*रज्जब व्याह कराय कर, ब्राह्मण बींद न कोय ॥४८॥*
यदि काजी निकाह१ पढ़ता है और ब्राह्मण व्याह कराता है तो क्या, ये दोनों संबंध पद्धति को पढ़ते हुये उस के द्वारा संबंध कराने से लडकी के स्वामी तो नहीं बन सकते, अपनी दक्षिणा ही लेते हैं, लडकी तो वर को ही प्राप्त होती है । वैसे ही गुरु शिष्य का परमात्मा से संबंध कराता है, शिष्य को परमात्मा की उपासना करनी चाहिये, उपकार प्रर्दशानार्थ गुरु की भी सेवा करनी चाहिये । परमात्मा की उपासना छुडाकर अपनी उपासना कराना गुरु का अधिकार नहीं ।
(क्रमशः)

*अदया ॥*


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🌷🙏 *卐सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*दादू गल काटैं कलमा भरैं, अया विचारा दीन ।*
*पंचों वक्त नमाज गुजारैं, साबित नहीं यकीन ॥*
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*अदया ॥*
अैसा रे मति ज्ञान बिचारै । एकहि कौं दूजा करि मारै ॥टेक॥
जौ तैं पाठ पढ्या रे भाई, सो पाठ सही ले बोडैगा ।
दाँतण फाड़्याँ लेखा लेगा, तो गल काट्याँ क्यौं छोड़ैगा ॥
धोये हाथ पाँव भी धोये, मैल रह्या दिल मांहीं ।
अलह बिसमला करि काटण लागा, साहिब का डर नांहीं ॥
बेमिहराँ कौं मिहर न आवै, स्वाद न छोडै कोई । 
अलह राम बषनां यौं बोल्या, भिस्त कहां थैं होई ॥६२॥
हे प्राणी ! ऐसा ज्ञान मत सीख जिसके सीखने से सचराचर में परिव्याप्त एक ही परमात्मा को अपने से भिन्न मानकर मारा जाता है । अद्वैत वेदान्तानुसार सचराचर में एक ही परमात्मा परिव्याप्त है । शरीरों की भिन्नता से ही वह भिन्न-भिन्न सा लगता है किन्तु वह भिन्न है नहीं क्योंकि जैसे ही शरीर रूपी उपाधि का नाश होता है, वैसे ही व्यष्टि और समष्टि चैतन्य का भेद समाप्त हो जाता है । “ब्रह्मसत्य जगन्मिथ्या जीवौ ब्रह्मैव नापरः ॥” 
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हे प्राणी ! तूने जो अभी तक जीवों को मारकर खाने की शिक्षा प्राप्त की है, वह शिक्षा तुझे निश्चय ही डुबायेगी = नरकों में ले जायेगी । क्योंकि परब्रहम-परमात्मा परम न्यायकारी है । उसके यहाँ राई राई का हिसाब लिखा जाता है । हे प्राणी ! विचारकर जब परमत्मा वृक्ष में से दाँतों को माँजने के लिये तोड़ी गई दाँतुन तक का हिसाब लेता है तब जीवों की गले काटकर की गई हिंसा का हिसाब क्यों नहीं लेगा ? निश्चय ही लेगा !
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(विकल्प से इसका अर्थ होगा, जब यह परमात्मा दाँतों को फाड़ने अर्थात् किसी के ऊपर हँसने तक का हिसाब लेता है तब किसी की हत्या करने पर बिना दण्ड दिये हत्यारे को क्यों छोड़ेगा ।) हे मोमिन ! नमाज पढ़ने के पूर्व तू हाथ तथा पावों को तो धोता है किन्तु हृदय में से कल्मषों को साफ नहीं करता है, उसमें दोष-दुर्गुण विद्यमान रह ही जाते हैं । 
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जिसके कारण अल्लाह का नाम लेकर अन्य जीवों को काटने का विसमिल्ला = प्रारंभ दिन-प्रतिदिन करता रहता है । तुझे ऐसा करते समय परमात्मा का जरा सा भी डर नहीं लगता है कि वह इन हिंसाजन्य पापों का फल मरने पर तुझे अवश्य भुगतायेगा । 
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बषनांजी कहते हैं, इन निर्दइयों को दया बिल्कुल भी नहीं आती है क्योंकि ये जिव्हा के स्वाद को नहीं छोड़ते हैं । हिंसा करते समय अल्लाह अथवा राम बोलने मात्र से इन्हें भिश्त = स्वर्ग = मुक्ति कैसे मिल सकती है क्योंकि इनका न तो आचरण ही और न भाव ही पवित्र है । 
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बिना पवित्र भाव के लिया गया भगवन्नाम न्यूनातिन्यून मात्रा में ही लाभ पहुँचा पाता है जो पापों की तुलना में अत्यधिक कम होता है ॥६२॥ 
“न देवो विद्यते काष्ठे न पाषाणे न मृण्मये । 
भावोहि विद्यते देवो तस्माद्भावोहि कारणं ॥” 
“भाव वस्य भगवान सुख निधान करुणाभवन । 
आय गयउं हनुमान, जिमि करुणा महँ वीररस ॥” 
वस्तुतः प्राधान्य भाव का ही है ॥     
(क्रमशः)

बडा मेला ~

*#daduji*
*॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥*
*॥ दादूराम~सत्यराम ॥*
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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१६ आचार्य दयारामजी ~
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बडा मेला ~ 
वि. सं. १९७६ फा. शु. १० मी को आचार्य दयारामजी महाराज ने अपने पूर्वाचार्य श्री गुलाबदासजी महाराज व हरजीरामजी के चरण स्थापन करने की योजना बनाई और इसके उपलक्ष में बडा मेला भराया और उक्त तिथि को चरण स्थापना कराई गई ।
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भोजपुरा चातुर्मास ~ 
वि. सं. १९७७ में आचार्य दयारामजी महाराज को चातुर्मास का निमंत्रण बाखूरामजी हरिरामजी भोजपुरा वालों ने दिया । आचार्य दयारामजी महाराज शिष्य संत मंडल के सहित भोजपुरा पधारे । अच्छा चातुर्मास हुआ । समाप्ति पर मर्यादानुसार आचार्यजी को भेंट तथा संतों को वस्त्रादि देकर विदा किया । सं. १९७७ में ही आचार्य दयारामजी ने अपने मंडल के सहित जगदीश पुरी की यात्र भी अच्छी रही थी । 
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ओंकारदासजी के चातुर्मास ~ 
वि. सं. १९७९ में ओंकारदासजी लालसोट वालों ने आचार्य दयारामजी महाराज को चातुर्मास का निमंत्रण दिया था । आचार्य दयारामजी महाराज शिष्य संत मंडल सहित गये । चातुर्मास अच्छा हुआ ।  
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अन्यान्य चातुर्मास ~ 
वि. सं. १९८१ में धनीरामजी सीतापुरा वालों के । सं. १९८२ में ग्यारसीदासजी लालसोट वालों के । सं. १९८३ में भूरादासजी चान्दसीन वालों के । सं. १९८४ में जगजीवनदासजी लालसोट वालों के । सं. १९८५ में भण्डारी रामलालजी के । सं. १९८७ में बिचूण बाईजी के । सं. १९८८ में सोहनदासजी सुनारा वालों के । उक्त चातुर्मास आचार्य दयारामजी महाराज ने शिष्य संत मंडल के सहित किये थे ।  
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जोधपुर नरेश द्वारा भेंट ~ 
जोधपुर नरेश जब गद्दी पर विराजे तब आचार्य दयारामजी के सत्कारार्थ घोडा आदि कुछ वस्तुऐं भेंट में भेजी ।
(क्रमशः) 

२०. विपर्यय कौ अंग २९/३२

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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२०. विपर्यय कौ अंग २९/३२
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सुन्दर सब ही सौं मिली, कन्या अखन कुमारि । 
बेश्या फिरि पतिब्रत लियौ, भई सुहागनि नारि ॥२९॥
पहले असंस्कृत जिज्ञासु की अपरिपक्व(= अखन) बुद्धि रूप कन्या इस गुरु से उस गुरु के पास या इस शास्त्र से उस शास्त्र को और घर घर जा कर वेश्या के समान सबसे मिलती जुड़ती थी । परन्तु जब उसने अपनी ज्ञानपिपासा की तृप्ति के लिये सच्चे गुरु की खोज की तब उसे पतिव्रता धर्म की सिद्धि मिली और वह सुहागन नारी कहलायी अर्थात् उसे लययोग(समाधि) द्वारा अद्वैत निरञ्जन निराकार प्रभु का साक्षात्कार हुआ ॥२१॥ (द्र० - सवैया छ० सं० २२/२०) ॥
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कलिजुग मैं सतजुग कियौ, सुन्दर उलटी गंग । 
पापी भये सु ऊबरे, धरमी हूये भंग ॥३०॥
तब उस जिज्ञासु की ऐसी स्थिति हो गयी कि मानो उस की मलिन कर्मों से युक्त काया में कलियुग के स्थान पर सतयुग का ही उद्भव हो गया । इसने राजा भगीरथ के समान ज्ञानगङ्गा का प्रवाह उलटा कर दिया; जिससे वह इन्द्रियों एवं विषयों का घातक होने से पापी होकर भी ज्ञानी ही कहलाया और भवसागर को पार कर गया । उधर अपनी इन्द्रियों का विषयभोगों से पालन पोषण करने वाले सांसारिक जीव धर्मी कहलाये; परन्तु उनके भवसागर में डूबते उतराते रहने से अन्त में उनका नाश ही हुआ ३०॥ (द्र० - सवैया : २२/छ० सं० २०) ॥

विप्र रसोई करत है, चौकै काढी कार ।
लकरी मैं चूल्हा दियौ, सुन्दर लगी न बार ॥३१॥
एक अन्य विपर्यय सुनिये - वेदादिशास्त्रों के ज्ञाता किसी विप्र(ज्ञानी पुरुष = जीव) ने भोजन, रसोई(ज्ञानभक्ति) के लिये चौका(अन्तःकरणचतुष्टय में साधनचतुष्टय के लिये बाह्य संसार की निवृत्त के लिये मर्यादा) बना कर लकड़ी(अन्तर्मुखी साधना में तल्लीनता) में चूल्हा(स्वकीय चित्त) को लगा दिया । इतने लम्बे कार्य में उसको कुछ भी विलम्ब(बार) न लगा, वह तत्काल पूर्ण हो गया ॥३१॥ (तु० - क्षिप्रं भवति धर्मात्मा - भगवद्‌गीता) (द्र० – सवैया : २२/छ० सं० २१) ॥
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रोटी ऊपर पोइकै, तवा चढायौ आंनि। 
खिचरी मांहैं हण्डिका, सुन्दर रांधी जांनि ॥३२॥
उसकी पूर्णता में भी विपर्यय देखिये - उस ने रोटी(भगवद्भजन) बनाने के लिये उस पर तवा(तत्त्वज्ञान रूप रक्षा का साधन) रख दिया । उधर उसने खिचड़ी(ज्ञान एवं भक्ति मिश्रित भगवत्प्राप्तिसाधन) में हांडी रूप काया को रांध(लीन कर) दिया । इस से उसकी काया सिद्ध(तेजोमय) हो गयी । सन्त की इसी अवस्था को सन्त रज्जब जी ने "काया भई कपूर" कह कर वर्णित किया है ॥३२॥ (द्र० – सवैया = छ० सं० २२/२१ उत्तरार्ध) ॥
(क्रमशः)