मंगलवार, 19 मई 2026

*२५. अवस्था कौ अंग २५/२८*

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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*२५. अवस्था कौ अंग २५/२८*
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सुपिनै मैं जाग्रत बहै, बचन कहै मुख द्वार । 
ज्वाब देत हैं और कौं, सुन्दर शुद्धि न सार ॥२५॥
तथा कभी कभी मनुष्य स्वप्नावस्था में भी जाग्रदवस्था के समान बोलने(प्रलाप करने) लगता है । वह किसी अन्य को ऐसा उत्तर देने लगता है जिसमें न कोई सचाई होती है, न कोई सार(तत्त्व) ॥२५॥

स्वप्नै माहैं स्वप्न है, देखै नाना रूप । 
जागैं तैं सब कहत है, सुन्दर छाया धूप ॥२६॥
कभी कभी मनुष्य पर स्वप्नावस्था में ही स्वप्नावस्था आरूढ हो जाती है, उस अवस्था में वह ऐसे ऐसे रूप देखता है कि जागने पर उन्हें धूप एवं छाया का खेल बताता है ॥२६॥
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सुन्दर ऐसैं जानियें, सुषुपति स्वप्ना मांहिं । 
स्वप्नै ही मैं अनुभवै, जागै जानैं नांहिं ॥२७॥
परन्तु जब स्वप्नावस्था में सुषुप्ति अवस्था पहुँच जाती है तो वह पुरुष स्वप्न में अनुभूत किसी भी घटना को स्मरण नहीं कर पाता ॥२७॥
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सुषुपति मैं जाग्रत उहै, जानी करि अनुमांन । 
जागें ते ततपर भयौ, सब इन्द्रिनि कौ ज्ञांन ॥२८॥
सुषुप्ति अवस्था में जब जाग्रत् अवस्था पहुँच जाती है तो वह पुरुष, अनुमान का सहारा लेकर, उन सब घटनाओं का स्मरण कर लेता है; क्योंकि जाग्रदवस्था में सभी इन्द्रियों का ज्ञान यथाभूत(तत्पर) रहता है ॥२८॥
(क्रमशः)

*राग गुंड ॥८॥ साधुमहिमा ॥*

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*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*दादू निरंतर पीव पाइया, जहँ आनन्द बारह मास ।*
*हंस सौं परम हंस खेलै, तहँ सेवक स्वामी पास ॥*
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*राग गुंड ॥८॥ साधुमहिमा ॥*

धनि रे दिहाड़ौ आजि कौ रे लोइ ।
हरिजन आया म्हारै हरि जस होइ ॥टेक॥ 
ज्याँह कौ मारग हेरता हरि । सो जन आया म्हारै कृपा करी ॥ 
भाव भगति रुचि उपजी घणी । हिरदै आया म्हारै त्रिभुवन धणी ॥  
परफूलित अति कवल बिगास । मन का मनोरथ पुरवी आस ॥
बषनां महिमा बरणी न जाइ । राम सहित जन मिलिया आइ ॥१२५॥  
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हे लोगों ! आज का दिन धन्य है । मेरे घर पर हरि के जन = भक्त पधारे हैं और उनके पधारने से आज मेरे घर में हरि के गुणों का गान हो रहा है । जिन संतो-भक्तों के आने के रास्ते को स्वयं हरि देखा करते थे, वे ही ब्रह्मनिष्ठ साधु संत कृपा करके मेरे घर पधारे हैं । 
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“अनुब्रजाम्यहं येषां पूयायेंत्घ्रिरेणुभिः” उनके आने से मेरे मन में भाव = श्रद्धा तथा भक्ति परमात्मा के प्रति अत्यधिक मात्रा में उत्पन्न हो गई है । परिणामस्वरूप मेरे हृदय में त्रिभुवन का स्वामी विराजमान हो गया है । 
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मेरा हृदय-कमल आनंद में निमग्न हुआ विकसित हो गया है = खिल गया । मेरे मन की समस्त कामनाएँ, मनोरथ पूर्ण हो गये हैं । बषनां कहता है, रामजी के भक्तों के सहित रामजी स्वयं आकर मेरे से मिले हैं । इस सुखद व आनंददायक अवसर की महिमा का वर्णन करना संभव नहीं है ॥१२५॥ 

*१३. विरह विभग्ङका अंग ~५/७*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*१३. विरह विभग्ङका अंग ~५/७*
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*रसना रस हि न लाइये, हिरदै नाँहीं हेत ।*
*रज्जब राम हिं क्या कहैं, हम ही भये अचेत ॥५॥*
न तो रसना इन्द्रिय को उसके चिन्तन रस में लगाते, न हृदय में प्रेम ही करते, अत: हम ही असावधान हो रहे हैं, राम को कहैं भी क्या ?
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*पिंड प्राणि रोगी नहीं, औषधि नाम न लेहि ।*
*तो वैद्य विधाता क्या करै, दारू दर्शन देहि ॥६॥*
प्राणी का शरीर रोगी न हो तो वह औषधि का नाम भी नहीं लेता, फिर उसे वैद्य औषधि देकर क्या करेगा ? वैसे ही प्राणी में विरह-व्यथा है ही नहीं और वह प्रभु दर्शन का नाम भी नहीं लेता, फिर उसे प्रभु दर्शन देकर क्या करेंगे ? अर्थात जो जिस का पात्र होता है उसकी प्राप्ति से उसे लाभ होता है अन्य को नहीं होता ।
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*दारू चाहे दर्द वंद, निरोग सु नहिं लेय ।*
*औषधि अरथी आतमा, जो माँगे सो देय ॥७॥*
जिसके रोगजन्य दर्द होता है, वही औषधि चाहता है । जो भली प्रकार निरोगी है वह तो औषधि वह तो औषधि मिलने पर नहीं खाता, जो औषधि का इच्छुक प्राणी है वह तो औषधि का जो मूल्य माँगे वही देकर लेता है, वैसे ही जिसके वियोगजन्य व्यथा है, वही हरि-दर्शन चाहता है और सर्वस्व देकर भी लेने को तैयार रहता है ।
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इति श्री रज्जब गिरार्थ प्रकाशिका सहित “१३. विरह विभंग का अंग” समाप्त ॥
(क्रमशः)‬

*१३. विरह विभग्ङका अंग ~१/४*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*१३. विरह विभग्ङका अंग ~१/४*
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*दर्द नहीं दीदार का, तालिब१ नाँहीं जीव ।*
*रज्जब विरह वियोग बिन, कहाँ मिले सो पीव ॥१॥*
न तो जीव जिज्ञासु१ है और न हरि-दर्शनार्थ उसके हृदय में पीड़ा ही है, फिर विरह वियोग व्यथा बिना वे प्रियतम प्रभु कहां मिलते हैं ? अर्थात नहीं मिलते ।
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*दर्द बिना क्यों देखिये, दर्शन दीन दयाल ।*
*रज्जब विरह वियोग बिन, कहां मिले सो लाल ॥२॥*
दीनदयालु परमात्मा का साक्षात्कार बिना साधन कष्ट उठाये कैसे किया जा सकता है । विरहजन्य वियोग व्यथा के बिना वे प्रियतम कहां मिलते हैं ? अर्थात नहीं मिलते ।
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*श्रवणों सुरति न पीव की, प्रेम न लेहि समाय ।*
*रज्जब रुचि माँही नहीं, कहां मिले सो आय ॥३॥*
न तो कान से भगवद् यश सुनने की वृत्ति ही बनती है, न प्रभु -प्रेम को अपनाकर हृदय में धारण करता है, जब हृदय में प्रभु से मिलने की रुचि ही नहीं तब वे कहां आकर मिलेंगे ? अर्थात वे हृदय में ही प्रकट होकर मिला करते हैं, तो हृदय उनके प्रकट होने योग्य है नहीं ।
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*नयनों नेह न नाह१ का, वहिं दिशि दृष्टि न जाँहिं ।*
*रज्जब राम हि क्यों मिले, तालिब२ नाँहीं माँहिं ॥४॥*
न तो नेत्रों में ही प्रभु१ का स्नेह है, न उन प्रभु की और विचार दृष्टि ही जाती है, अर्थात प्रभु मिलन सम्बन्धी विचार ही नहीं होता । जब जिज्ञासु२ जैसी भावना ही मन में नहीं है, तो फिर राम कैसे मिलेंगे ।
(क्रमशः)

*२५. अवस्था कौ अंग २१/२४*

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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*२५. अवस्था कौ अंग २१/२४*
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एक अवस्था कै विषै, तीनहुं बर्तैं आई । 
जाग्रत स्वप्न सुषोपती, सुन्दर कहत सुनाइ ॥२१॥
४. अवस्था का अन्य भेद : कभी कभी ऐसा भी होता है कि जाग्रत्, स्वप्न एवं सुषुप्ति - इन तीनों अवस्थाओं के व्यापार का एक ही अवस्था में समन्वय हो जाता है । श्रीसुन्दरदासजी महाराज अब यही भेद बता रहे हैं ॥२१॥ 
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जाग्रदवस्था जानिये, सब इन्द्रिय ब्यापार । 
अपने अपने अर्थ कौं, सुन्दर करै विहार ॥२२॥
सामान्यतः सभी इन्द्रियाँ अपने अपने विषयों की खोज में ही अपनी चेष्टाएँ सीमित रखती हुईं स्व स्व व्यापार में लीन रहती है ॥२२॥
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जाग्रत मैं स्वप्ना बहै, करै मनोरथ आंन । 
नैंन न देखै रूप कौं, शब्द सुनै नहिं कांन ॥२३॥
कभी कभी जाग्रदवस्था में ही स्वप्नावस्था प्रवेश कर जाती है तो मनुष्य अन्य(चक्षु की) क्रिया करता हुआ शब्दक्रिया का चिन्तन करने लगता है । अर्थात् उस समय न उस के नेत्र अपना कर्म करते हुए किसी रूप को देख पाते हैं और न श्रोत्रेन्द्रिय ही अपना कर्म करती हुई भी कोई शब्द सुन पाती है ॥२३॥
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जाग्रत मैं सुषुपति भई, जबहिं तंवारौ होइ । 
सुन्दर भूले देह कौं, सुधि बुधि रहै न कोइ ॥२४॥
तथा कभी कभी विश्रान्त अवस्था में ऐसा भी होता है कि मनुष्य को जाग्रदवस्था में ही सुषुप्ति अवस्था आवृत कर(घेर) लेती है तब वह उसी समय निःसंज्ञ(बेहोश = तंवारौं) होकर अपने शरीर का भी विस्मरण कर बैठता है(और वह तत्काल गाढ निद्रा में पहुँच जाता है) ॥२४॥
(क्रमशः)

सरवरि मरजीवौ डुबकी देइ

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*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*सुरति सदा साबति रहै, तिनके मोटे भाग ।*
*दादू पीवैं राम रस, रहैं निरंजन लाग ॥*
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*साधु ॥*
सरवरि मरजीवौ डुबकी देइ । राम रसन मंझा थैं लेइ ॥टेक॥
डोरी लागौ आवै जाइ । सुखसागर मैं डूभी खाइ ॥
अघट सरोवर सुख सागरा । मुक्ता मोती रतनांवरा ॥
सुर नर हंसा केलि कराहिं । मुनि जन मंछा मांहि रहाहिं ॥
चित चकवा मनि आनंद होइ । उदै अस्त पख नाहीं कोइ ॥
बिगस्यौ कँवल कियौ परकास । भवर गुंजारै बीध्यौ बास ॥
नींची थाघ न ऊँचौ थाइ । सागर महिमा कही न जाइ ॥
बिलसै बस्त समद की आणि । बषनां सो मरजीवौ जाणि ॥१२४॥
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मरजीवा रूपी साधक रामनाम-साधना रूपी सागर में डुबकी लगाता है = परमात्मा की अनन्यभावेन साधना करना प्रारम्भ करता है । फिर उस रामनाम को रसना से अंतःकरण से एकाकार करके रटता है । जिसप्रकार मरजीवा रस्सी के सहारे सरोवर में उतरता है ऐसे ही साधक लै = अखण्डाकारवृत्ति के साथ रामनाम का स्मरण करता है ।
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जिस प्रकार मरजीवा सरोवर में नीचे तक जाकर वस्तु को ढूंढता है ऐसे ही साधक परमात्मा में सर्वतोभावेन डूबकर = निमग्न होकर साधना करता है । वह सरोवर रूपी निराकार परमात्मा सुखों का असीम सागर है । उसमें मुक्ता-मोती, रत्नों का अंबार = खजाना है । परमात्मा में डूबने से मुक्ति रूपी मोती, रत्न मिलती है । उस परमात्मा रूपी समुद्र में सुर और नर रूपी हंस केलि करते हैं = रसानंद लेते हैं ।
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मुनिजन रूपी मत्स्य सदैव उसी में निवास करते हैं =निमग्न रहते हैं । चित्त रूपी चकवा परमानन्दित हो जाता है क्योंकि प्रतिबंधक रूपी चन्द्रमा का न उदय होता है और न वह अस्त ही होता है । सहस्त्रदल कमल खुल जाता है । अनंत कोटि सूर्यों के समान वहाँ प्रकाश हो जाता है । जहाँ साधक रूपी भँवरा परमात्मदर्शन = अनुभव रूपी सुगंधि में बीध्यौ = निमग्न हो जाता है ।
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उस परमात्मा रूपी सागर की न नीचे की सीमा का पता लगता है और न ऊपरी सतह का ही भान हो पाता है । उस परमात्मा रूपी सागर की महिमा वर्णन नहीं की जा सकती । बषनां कहता है, यथार्थ मरजीवा वह है जो समुद्र में से वस्तु = रत्न ले आवे और उसका उपयोग करे । साधक वह है जो साधना करके परमात्मा का अपरोक्षानुभव कर ले और सदैव उसी में अखंड रूपेण निमग्न हुआ रहे ॥१२४॥

सोमवार, 18 मई 2026

*१२. ब्रह्म अग्नि का अंग~ ८/१०*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*१२. ब्रह्म अग्नि का अंग~ ८/१०*
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*तप्त कुण्ड ब्रह्म अग्नि है, जीव जल सदा गर्म ।*
*वासदेव१ बल हीन विरह की, उन्हैं२ शीत सु मर्म ॥८॥*
ब्रह्म ज्ञानरूप अग्नि तप्त कुंड की उष्णता के समान है, जैसे तप्त कुंड का जल सदा उष्ण रहता है, वैसे ही ब्रह्म ज्ञानाग्नि से जीव सदा उष्ण रहता है, अर्थात उसमें मैं जन्मता हूँ मरता हूँ, कर्ता हूँ, भोगता हूँ इत्यादिक शीतलता नहीं आती और विरहरूप अग्नि१ बलहीन है, प्रियतम मिलन पर शान्त हो जाता है । यही ब्रह्म ज्ञानाग्नि और विरहग्नि के उष्ण२ तथा शीतलता का सुरहस्य है ।
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*ब्रह्म अग्नि श्रुति१ सार२ में, ताव सहे गुण दोय ।*
*रज्जब रज तज नीकसे, वस्तू अनूप होय ॥९॥*
लोह२ में अग्नि डाला जाता है और लोह उसके तप को सहन करता है तब उसमें एक तो उसका मैल जल जाने से निर्मलता आती है दूसरे उसकी जो भी वस्तु बनाओ वह अनुपम सुन्दर बनती है । वैसे ही प्राणी के कानों१ में ब्रह्म ज्ञान गुरु उपदेश द्वारा पड़ता है, तब वह रजोगुणादि गुणों को त्यागकर सांसारिक भावनाओं से निकलता है और ब्रह्म रूप अनुपम वस्तु बन जाती है ।
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‪*पंच एक पच्चीस उभय को, माया माखी खाय ।*
*ब्रह्म अग्नि संयोग ताप तैं, अजरी१ तहां न जाय ॥१०॥*
आकाशादि पंचभूत, उनसे बना एक शरीर, पच्चीस प्रकृति, मन मति दोनों इन सबको माया रूप मक्खी खा जाती है, किन्तु जैसे मक्खी अग्नि के पास नहीं जाती है, वैसे ही ब्रह्म ज्ञानाग्नि का संयोग जिसके अन्त:करण में होता है, वहां उसके ताप के भय से वह माया मक्खी१ नहीं जाती ।
इति श्री रज्जब गिरार्थ प्रकाशिका सहित “१२. ब्रह्म अग्नि का अंग” समाप्त ॥
(क्रमशः)‬

*२५. अवस्था कौ अंग १७/२०*

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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*२५. अवस्था कौ अंग १७/२०*
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अब सुनि सुषुपति की कथा, सुन्दर भ्रम कछु नांहि । 
काठ कर्म कौ खेल सब, धर्यौ पिटारा मांहिं ॥१७॥
मनुष्य की सुषुप्ति अवस्था आने पर, वह जाग्रत् का स्वप्न में आभास, बाजीगर के खेल के समान, सब कुछ लुप्त हो जाता है । वहाँ भ्रमात्मक स्थिति नहीं रह जाती; क्योंकि वह जान जाता है कि पिटारे में(पर्दे के पीछे) रखी हुअी काष्ठनिर्मित पुतलियों के खेल की तरह भ्रममात्र ही है ॥१७॥
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सुन्दर बाजीगर जुदौ, खेल करै दिन राति । 
वहै खेल रजनी करै, वह खेल परभाति ॥१८॥
वह जान गया है कि वह बाजीगर दिन एवं रात्रि का खेल पृथक् पृथक् दिखाता है; परन्तु यहाँ सचाई यह है कि वह बाजीगर जो खेल दिन में करता है, उसे ही रात्रि में भी दिखाता है ॥१८॥
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जाग्रत स्वप्न सु जमुनिका, सुषुपति भई पिटार । 
सुन्दर बाजीगर जुदौ, खेल दिखावन हार ॥१९॥
यहाँ जाग्रत् एवं स्वप्न अवस्था को बाजीगर के पर्दे(यवनिका) के समान समझिये तथा सुषुप्ति अवस्था को बाजीगर की पिटारी समझिये । तथा खेल दिखाने वाले बाजीगर को पृथक्(भिन्न) समझिये ॥१९॥
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तीन अवस्था कै परै, चौथी तुरिया जांनि । 
सुन्दर साक्षी आतमा, ताहि लेहु पहिचांनि ॥२०॥
इन तीन - जाग्रत्, स्वप्न एवं सुषुप्ति अवस्थाओं के आगे चतुर्थ तुर्य अवस्था जाननी चाहिये । इस अवस्था में पहुँच कर आत्मा को स्व रूप का साक्षात्कार करना चाहिये ॥२०॥
(क्रमशः)

*परमात्मा की दयालुता ॥*

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*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*दया तुम्हारी दर्शन पइये ।*
*जानत हो तुम अंतरजामी,*
*जानराय तुम सौं कहा कहिये ॥*
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*परमात्मा की दयालुता ॥*
हरि बिन जीव दया कौंण पालै । मिहर करै तो मूँवा जीवालै ॥टेक॥
जल बिन जीव दुखी उन्हालै । छाजाँ छाजाँ पाणी रालै ॥
आनि दुखी तब साम्हौं न्हालै । धर फरफूलै धानि धपालै ॥
जीव दुखी अधियारै होवै । तौ सूर सारिखा दीपक जोवै ।
जीव गरम जब अंग अघोलै । तब पवन बीजणौं दिन कौ ढोलै
ज्यूँ दिन कियौ कमावण नैं । त्यूँ राति करी सुख पावण नैं ॥
ज्यूँ मनिख किया रस लेबा नैं । त्यूँ ब्रिच्छ किया फल देबा नैं ॥
राजिक रिजक सबनि कौं स्वामी । जल थल पूरै अंतरजामी ॥
दीन दयाल सदा ही माधौ । बषनां भूलाँ भेद न लाधौ ॥१२३॥

“मूकं करोति वाचालं पंगुं लंघयते गिरिम् । 
यत्कृपा तमहं वंदे परमानंद माधवम् ॥” 
“मूक होइ बाचाल, पंगु चढ़ै गिरिवर गहन । 
जासु कृपा सो दयालु, करहुँ कृपा मर्दन मयन ॥” 
हरि के बिना जीवों पर अकारण ही दया कौन कर सकता है । उसकी तनिक सी दया मृतक को भी तत्काल जीवित कर देती है । 
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ग्रीष्मऋतु में जल की कमी के कारण चर-अचर समस्त जीव दुखी हो जाते हैं किन्तु वह अकारण दयालु परमात्मा किसी को भी जलाभाव में मरने नहीं देता । वह उनको सुखी करने के लिये छाजाँ-छाजाँ = स्थान-स्थान पर जल की वर्षा करता है । जब वे दुखी होने लगते हैं तथा करुण क्रंदन करते हैं तब जल उनके सम्मुख ही वर्षा देता है जिससे भूमि प्रफुल्लित = हरी भरी हो जाती है तथा धानि = अन्न प्रभूत मात्रा में उपज जाता है । 
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अंधकार के कारण जब जीव दुखित हो जाते हैं तब वह परमात्मा सूर्य जैसे अपरिमित प्रकाशपुंज के दीपक को जलाकर उजाला कर देता है । जब अत्यधिक उष्ण के कारण समस्त जीव अधीर होकर उघाड़े अंग रहने लगते हैं तब वह परमात्मा पंखा रूपी शीतल-मंद-सुगंधित मलय चला देता है । परमात्मा ने यदि दिन परिश्रम करके कमाने खाने को बनाया तो रात्रि सुख पाने के लिये भी बनाई है । 
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जिस प्रकार मनुष्यों को नाना वनस्पतियों का रसास्वादन करने को बनाया है वैसे ही उस परमात्मा ने अठारह भार वनस्पति फल-फूल, रसादि-पंच स्कंधात्मक अपने उत्पाद देने को बनाई है । वह परमात्मा राजिक = पालक-पोषणकर्त्ता, रिजक = कामधंधा आदि सभी का स्वामी है । वह अंतर्यामी जल और थल पर रहने वाले सभी को पूरता है । वह माधव सदा ही दीनों पर दया करने वाला है । 
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बषनां कहता है जो उसको भूल जाता है, वे उसके रहस्य को, उसकी दया के रहस्य को जान नहीं पाते हैं । दादूवाणी~
“पूरि रह्या परमेसुर मेरा, अणमांग्या देवै बहुतेरा ॥टेक॥ 
सिरजनहार सहज मैं देइ । तौ काहे धाइ मांगि जन लेइ ॥ 
बिसंभर सब जग कौं पूरै । उदर काज नर काहे झूरै ॥ 
पूरिक पूरा है गोपाल । सब की चिंत करै दरहाल ॥ 
समरथ सोई है जगनाथ । दादू देखि रहे संग साथ ॥४८॥” ॥१२३॥

रविवार, 17 मई 2026

*२५. अवस्था कौ अंग १३/१६*

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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*२५. अवस्था कौ अंग १३/१६*
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सुन्दर चेतनि शक्ति बिन, नाचि सकै नहिं कोइ । 
त्यौं यह जाग्रत जानिये, जो कछु जाग्रत होइ ॥१३॥
सभी जानते हैं कि चेतनशक्ति की सहायता के विना किसी जड वस्तु में कोई क्रिया(हलचत) नहीं हो सकती; अतः इस अवस्था को जाग्रत् समझना चाहिये; क्योंकि यहाँ जो कुछ देखा जाता है वह सब कुछ जाग्रदवस्था के समान ही है ॥ १३॥
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बहुरि वहै रजनी बिषै, परदा करै बनाइ । 
सुन्दर बैठा गोपि ह्वै, बाहरि खेल दिशाइ ॥१४॥
वही बाजीगर जब रात्रि में दर्शकों को अपनी बाजीगरी(तमाशा = खेल) दिखाना चाहता है तो वह एक पर्दा लगाकर, उस के पीछे गुप्तरूप से बैठकर, बाहर(खुले स्थान में) नाना प्रकार के खेल दिखाता है ॥१४॥
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नर पशु पंखी चर्म कै, दीसहिं रूप अनेक । 
सुन्दर चेतनि शक्ति करि, नांच नचावै एक ॥१५॥
वहाँ बैठे दर्शक उस छिपे हुए बाजीगर के हाथ की अंगुलियों के संकेत से सञ्चालित चाम से बनी मनुष्य पशु एवं पक्षियों की पुतलियों के विविध खेल देखते हैं ॥१५॥
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यौं यह स्वप्नै देखिये, जाग्रत कौ आभास । 
सुन्दर दोऊ भ्रम भये, जाग्रत स्वप्न प्रकास ॥१६॥
बाजीगर का यह खेल उसी प्रकार का है जैसे हम जाग्रत् अवस्था में कृत कर्मों का स्वप्न में आभास देखते हैं । बाजीगर का वह खेल और स्वप्न में जाग्रत अवस्था का यह आभास - दोनों को ही भ्रमात्मक अवस्था कहा जा सकता है ॥१६॥
(क्रमशः)

बहुगुण तेरा औगुण मेरा

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*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*तिल तिल का अपराधी तेरा, रती रती का चोर ।*
*पल पल का मैं गुनही तेरा, बख्शो अवगुण मोर ॥*
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*विनती ॥*
बहुगुण तेरा औगुण मेरा, जे देखौं तौ खोटा हो । 
दोस किसा द्यौं परखणहारै, जे आढ आपणा खोटा हो ॥टेक॥
मेघ जु बरसै बारामासी, चात्रिग प्यास न भागी हो । 
कर्म छत्र मेरा माथा ऊपरि, ताथैं बूंद न लागी हो ॥
सर्व लोक मैं भया उजाला, एक तमासा अैसा हो ।
जे घूघू कौं सूझै नांहीं, तौ दिन कौं दूसण कैसा हो ॥
भार अठारा कूँपल मेल्है, सदा रहै बन मांहीं हो ।
पान करीर न लागै कोई, तौ रिति कौं दूषण नांहीं हो ॥  
जै दूखौं तौ औगुण मेरा, तौ गुण तेरा चिति आवै हो ।
तूँ औगुण का मेटणहारा, ताथैं बषनौं गावै हो ॥१२२॥
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हे परात्पर-परब्रह्म-परमात्मा ! तुझमें अनंतानंत गुण हैं जबकि मुझमें अवगुण ही अवगुण भरे पड़े हैं । जब मैं मेरे अन्दर झाँककर देखता हूँ तो मैं अपने आपको सर्वथा अवगुणी ही पाता हूँ । 
“मैं अवगुण का पूतला, तुम गुणवन्ताँ राम । 
औगुण दिसी निहारियौ, तौ तीन लोक नहिं ठाम ॥” 
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हे परमात्मन् ! बताइये जब मैं स्वयं ही अवगुणी हूँ तब आप भी मुझे अवगुणी कहें और मानें तो मैं दोष आपको कैसे दे सकता हूँ क्योंकि कमी तो मुझ स्वयं ही में है । जैसे अपने स्वयं का आढ = सिक्का ही खोटा हो तो परखने वाले जौहरी को मैं कैसे दोष दे सकता हूँ कि उसको सिक्का परखना नहीं आता । एक आश्चर्यजनक बात और बताता हूँ ।
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सूर्योदय होने के साथ ही सारे ब्रह्मांड में उजाला हो जाता है किन्तु उल्लू को उस विराट् प्रकश में भी कुछ नहीं दीखता है । तो क्या इस आधार पर प्रकाश को दोषी ठहराया जा सकता है । नहीं । क्योंकि दोष प्रकाश का नहीं उल्लू स्वयं का है जिसको उजाले में दीखता ही नहीं है । 
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इसी प्रकार, जो वृक्ष, पौधे, जंगलों में, खेतों में होते हैं वे सभी अपनी-अपनी प्रकृति के अनुसार अपनी-अपनी ऋतुओं में नये-नई पत्ते धारण करते हैं जिनका वजन करने पर अठारा भार होता है किन्तु करीरी = कैर के वृक्ष के पत्ते लगते ही नहीं है तो क्या इसके लिये ऋतु को दोषी ठहराया जा सकता है । नहीं । क्योंकि कैर के वृक्ष के पत्ते लगते ही नहीं हैं । 
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अतः हे परमात्मन् ! यदि मैं दुखित हूँ तो अपने अवगुणों के ही कारण हूँ । इसमें तेरा कोई दोष नहीं है । तू गुणवान है । अकारण दयालु है । अतः मुझे बार-बार तेरे गुण स्मरण हो आते हैं कि तू अवगुणों को मिटानेवाला है । तेरा स्मरण करते रहने से तू किसी न किसी दिन मेरे अवगुणों को नष्ट कर देगा । इसीलिये मैं बषनां दिन-रात तेरे गुणों का गान करता रहता हूँ ॥१२२॥

शनिवार, 16 मई 2026

*१२. ब्रह्म अग्नि का अंग ~५/७*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*१२. ब्रह्म अग्नि का अंग ~५/७*
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*मन मनसा१ तत२ पंच ले, पुनि रज्जब रग रोम ।*
*इह३ जगि४ जग में जगमगै५, ब्रह्म अग्नि मधि होम ॥५॥*
मोह निद्रा से जागकर३ मन-बुद्धि१ के विकार, पाँचों तत्त्व२ से उत्पन्न पंच विषयों का राग और रग-रोम अर्थात स्थूल शरीर का अध्यास इन सबको ब्रह्म-अग्नि में होम दे अर्थात ब्रह्म ज्ञान द्वारा नष्ट कर दे तभी इस४ जगत् में साधक का का ब्रह्म तेज चमकने५ लगता है ।
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*विरह अग्नि की हद्द है, ब्रह्म अग्नि बेहद्द ।*
*रज्जब रोवे दिवस दश, ज्ञान अखंडित गद्द१ ॥६॥*
विरह अग्नि की तो सीमा है, उससे वियोगी दश दिन अर्थत कुछ काल ही रोता है, प्रियतम के प्राप्त होने पर विरहाग्नि शांत हो जाता है किन्तु ब्रह्म-ज्ञान रूप अग्नि बेहद्द है, ब्रह्म प्राप्ति हो जाने पर भी ब्रह्म रूप से अखंडित रहता है और नम्र हृदय में उसकी "अहंब्रह्मास्मि" रूप आवाज१ निरन्तर होती रहती है ।
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*ब्रह्म अग्नि वडवा अनल१, तन तोयों२ को खाय ।*
*इश्क अग्नि काची कहैं, जो वपु वारि बुझाय ॥७॥*
जैसे वडवानल अग्नि१ समुद्र के जल२ समूह को खाता है, वैसे ही ब्रह्मज्ञान रूप अग्नि तनाध्यासादि को खा जाता है । जो प्रियतम के शरीर का संयोग होते ही बुझ जाता है वह विरह-प्रेम रूप अग्नि तो कच्चा ही कहलाता है ।
(क्रमशः)

*२५. अवस्था कौ अंग ९/१२*

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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*२५. अवस्था कौ अंग ९/१२*
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सुषुपति मावस की निसा, अभ्र रहे पुनि छाइ । 
सुन्दर कछु सूझै नहीं, रूप सकल छिपि जाइ ॥९॥
(ग) और अमावस्या की अन्धेरी रात्रि में यदि घनघोर घटा(काले मेघ) छायी हो तो वही चित्र कुछ भी नहीं दिखायी देता । वहां सब कुछ लुप्त ही दिखायी देता है ॥९॥
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धूप जौन्ह तम रूप सौं, नैंन लिपै कहुं नाहिं । 
सुन्दर साक्षी आतमा, तीन अवस्था मांहिं ॥१०॥
यद्यपि इन तीनों ही अवस्थाओं में द्रष्टा के नेत्रों की शक्ति(सामर्थ्य) नष्ट नहीं होती, अपितु यथापूर्व ही रहती है । वहाँ धूप एवं जाग्रत् स्वप्न सुषुप्ति - इन तीन अवस्थाओं के भेद के कारण उस चित्र के तीन रूपभेद दिखायी देते हैं । इसी प्रकार, आत्मा, सर्वदा स्थित रहने पर भी, ज्ञानभेद या अवस्थाभेद के कारण वहाँ नहीं दिखायी देता ॥१०॥
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बाजीगर परदा किया, सुन्दर बैठा मांहिं । 
खेल दिखावै प्रगट करि, आप दिखावै नांहिं ॥११॥
३. अवस्था का तृतीय भेद : श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - जैसे कोई बाजीगर पर्दे के पीछे गुप्त(छिपा हुआ) बैठ कर दर्शकों को विविध प्रकार के खेल दिखावे ॥११॥
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नर पशु पंखी काठ कै, प्रगट दिखावै खेल । 
हस्त क्रिया सब करत हैं, सुन्दर आप अकेल ॥१२॥
वहाँ वह(बाजीगर), स्वयं अकेला होता हुआ भी, अपने हाथ की अंगुलियों के सङ्केत से चालित काष्ठ की बनी मनुष्य पशु एवं पक्षियों की पुतलियों से नाना प्रकार के खेल दिखाता है ॥१२॥
(क्रमशः) 

गुर मिलियौ राम नाम दिढ़ायौ

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*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*भौ सागर में डूबतां, सतगुरु काढे आय ।*
*दादू खेवट गुरु मिल्या, लीये नाव चढाय ॥*
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*गुरमहिमा ॥*  
गुर मिलियौ राम नाम दिढ़ायौ । भू सागर मैं ‘भेलौ’ पायौ ॥टेक॥ 
डूबण दिखायौ तिरण सिखायौ । अगम गवण मैं गमि व्है आयौ ॥
देख्या औघट देख्या घाट । दुह बिच गुरू दिखाई बाट ॥
जहाँ सूझै न बूझै न वार न पार । तहाँ मिलियौ पार उतारहणहार ॥ 
भौसागर की लहरि दिखाली । काई काई बषनैं टाली ॥१२१॥    

मंगलदासजी महाराज की प्रति में ‘भेलौ’ की जगह ‘भैरौ’ पाठ है ।  वि. स. १७८० तथा १७८५ दोनों की पुस्तकों में ‘भेलौ’ पाठ ही है । संसार रूपी सागर मैं भी निवास करता हूँ तथा गुरुमहाराज भी करते हैं । अतः वे मुझे संसार में साथ-साथ रहते हुए ही मिल गये और उन्होंने दुनियादारी के सारे झंझट-झगड़ों से दूर करके मुझे राम-नाम में निमग्न करा दिया । 
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संसार-सागर में जिन कारणों से मनुष्य डूबता है उनको उन्होंने मुझे प्रत्यक्ष में दिखाया । साथ ही मुझे यह सुखाया कि संसार-सागर से कैसे तिरा जाता है । अगम = परमात्मा में गवण = प्रवेश कैसे होता है, परमात्मा की प्राप्ति कैसे होती है, वह भी उन्होंने मुझे बताया जिससे मुझे परमात्मा का प्रत्यक्ष अनुभव हो गया । 
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मैंने साधना करते समय औघट = ऊबड़-खाबड़ रास्ते = नानाप्रकार की तंत्र-मंत्र, पाठ-पूजा आदि की साधनाएँ तथा घाट =राजपथ रूपी नाम की साधना पद्धति को भी देखा । गुरुमहाराज ने दोनों का यथार्थ विवेचन करके मुझे रामनाम की साधना रूपी राजमार्ग का रास्ता बता दिया । गुरुमहाराज रूपी केवट उस भवसागर रूपी संसार में मुझे मिले जहाँ इतना अज्ञानांधकार है कि कुछ दिखाई ही नही देता है । 
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उस संसार-सागर में रहने वाले विषयविकार रूपी जल में इस कदर डूबे हुए हैं कि पूछने पर कोई ऊपर उठने का रास्ता बताने में भी सक्षम नहीं है । संसार-सागर अथाह एवं अपार है । ऐसे संसार-सागर में पार उतारने वाला सद्गुरु महाराज मुझे मिले । उन्होंने भवसागर में विषयभोगों की उठने वाली नानातरंगों को भी दिखाया जिनकी चपेट में आकर जीव अपना संतुलन खोकर डूब मरता है किन्तु मैंने गुरुमहाराज की कृपा से काई-काई = कड़े प्रयत्न के द्वारा उन्हें टाली = अप्रभावी करके अपना लक्ष्य हाँसिल कर लिया ॥१२१॥ 

शुक्रवार, 15 मई 2026

*१२. ब्रह्म अग्नि का अंग ~१/४*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*१२. ब्रह्म अग्नि का अंग ~१/४*
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*ब्रह्म अग्नि सु विचार है, मैल दहै मन माँहिं ।*
*रज्जब रज यूं उतरे, अभि अंतरि अघ जाँहिं ॥१॥*
भली प्रकार ब्रह्म-विचार ही ब्रह्माग्नि है, वह मन के भीतर के मल विक्षेपादि मैल को जलाता है । इस प्रकार ही मन की मोह रूप रज और आन्तर पाप नष्ट होते हैं ।
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*काया कर्म काष्ठ जरहिं, ब्रह्म अग्नि बिच आन ।*
*पावक प्राण२ खुले पावक सौं, रज्जब शून्य१ समान ॥२॥*
काष्ठ में अग्नि डाला जाता है तब काष्ठ जलकर काष्ठ में बद्ध अग्नि मुक्त हो जाता है और दोनों अग्नि आकाश१ में अदृश्य होकर व्यापक अग्नि में मिल जाते हैं, वैसे ही गुरु उपदेश द्वारा अन्त:करण में ब्रह्मज्ञान आने पर कर्म समूह जलकर अज्ञान से आच्छादित स्वस्वरूप आत्मा आज्ञान से मुक्त हो जाता है । फिर आत्मा२ तथा ज्ञान दोनों ही सर्व-विकार शून्य ब्रह्म में समा जाते हैं ।
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*काया काष्ठ गुण घुण कर्म, प्राणी पावक पाया मर्म१ ।*
*गुरु मुख अग्नि ब्रह्म गियान, रज्जब वह्नी२ वह्नी खुलान ॥३॥*
काष्ठ में घुण रहते हैं और काष्ठ को ही खाते हैं, किन्तु उस काष्ठ में अग्नि डाला जाय तो काष्ठ के भीतर बँधा हुआ अग्नि मुक्त हो जायेगा और घुणों को भी भस्म कर डालेगा । वैसे ही शरीर में गुण तथा कर्म हैं और शरीर को दु:खी सुखी करते हैं, किन्तु गुरु मुख से सुने हुये ब्रह्म ज्ञान रूप अग्नि को मुख से सुने हुये ब्रह्म-ज्ञान रूप अग्नि को अन्त:करण में लाया जाय तो अज्ञान के द्वारा काया में बद्ध आत्मा रूप अग्नि२ मुक्त हो जायेगा और गुण तथा कर्मों को नष्ट कर देगा । उक्त प्रकार ही अग्नि से अग्नि मुक्त होता है । यह रहस्य१ हमको श्री गुरुदेव के उपदेश द्वारा ही प्राप्त हुआ है ।
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*प्रभु प्रभाकर१ अंश है, आतम तन तिनु२ आग ।*
*रज्जब संकट शोभ तैं३, सोइ मुक्त जब जाग ॥४॥*
सूर्य१कान्तमणि(आतशी शीशा) के नीचे तृण२ हों और उस मणि में सूर्य की किरण पड़े, तो तृणों में अग्नि प्रगट हो जाता है और तृण भस्म हो जाता है, अग्नि अपने अंशी में मिल जाता है, वैसे ही आत्मा ईश्वर का अंश है और शरीर में वद्ध है जब गुरु-उपदेश द्वारा अन्त:करण में ब्रह्म-ज्ञान आता है तब तब आत्मा अज्ञान निद्रा से जाकर गुण कर्मादि से मुक्त हो जाता है । इस प्रकार तनाध्यास, गुण-विकार और कर्मों के नाश रूप संकट से३ ही आत्मा की शोभा होती है, वह ब्रह्म को प्राप्त होकर ब्रह्म रूप ही हो जाता है ।
(क्रमशः)

*२५. अवस्था कौ अंग ५/८*

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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*२५. अवस्था कौ अंग ५/८*
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सुन्दर जागत भींत महिं, लिख्यौ जगत चित्रास । 
स्वप्न घौंट सनमुख भई, दृसैं सकल घट नास ॥५॥
१. अवस्था का अन्य भेद : श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - जिस किसी पुरुष ने अपनी जाग्रत् अवस्था में दीवाल पर कोई सांसारिक चित्र बनाया हो । वही चित्र उस की स्वप्न या सुषुप्ति अवस्था में उस को लुप्त हुआ दिखायी दे । इसी प्रकार हमें यह सम्पूर्ण जगत् भासता है ॥५॥
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चित्र कछू नहिं देखिये, जबहिं अंधेरौ होइ । 
सुन्दर सुषुपति मैं गये, जाग्रत स्वप्ना दोइ ॥६॥
इसी प्रकार, वह चित्र हम को अन्धकार में भी नहीं दिखायी देता है । इस से स्पष्ट है कि संसार की दो स्थितियाँ दिखायी देती हैं - जाग्रत अवस्था में अन्य, और स्वप्न एवं सुषुप्ति अवस्था में अन्य ॥६॥
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तीन अवस्था तैं जुदौ, आतम ब्योम समान । 
भीति चित्र पुनि घौंट तम, लिप्त नहीं यौं जान ॥७॥
इस तरह, एक ही चित्र तीन प्रकार का दिखायी देता है - (क) कभी आकाश के समान स्वच्छ दिखायी देता है, (ख) कभी अन्धकार में लुप्त और पुनः स्पष्ट दिखायी देता है, (ग) और कभी स्वप्न और सुषुप्ति अवस्था में पूर्णतः लुप्त दिखायी देता है ॥७॥
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सुन्दर जाग्रत धूप है, स्वप्न जौन्ह ज्यौं जानि । 
दोऊ माहैं देखिये, रूप सकल पहिचानि ॥८॥
२. अवस्था का अन्य भेद : वही चित्र (क) दोपहर की धूप में दूसरे प्रकार का दीखता है और (ख) चान्दनी रात में दूसरे प्रकार का । इस प्रकार एक ही रूप दो अवस्थाओ में दो प्रकार से दिखायी देता है । यहाँ धूप को जाग्रत् अवस्था समझो और चान्दनी रात को स्वप्न अवस्था ॥८॥
(क्रमशः) 

विनती ॥


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*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*दादू दरिया यहु संसार है, तामें राम नाम निज नाव ।*
*दादू ढील न कीजिये, यहु औसर यहु डाव ॥*
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विनती ॥
भौ जल तिरणाँ भार भारी । 
लोह की नाव कैसैं तिरै मुरारी ॥टेक॥
लोह की नाव लोह भरि हाकी । 
खेवट बिना बिचालै थाकी ॥
थाग नहीं भौसागर मांही । 
वार पार क्युँह सूझै नांहीं ।
लोभ लहरि बषनां बलिहारी । 
ज्यूँ ज्यूँ भीजै त्यूँ त्यूँ भारी ॥१२०॥
हे मुरारी ! मुझे भव रूपी सागर से पार होना है किन्तु पापों के भार से मैं इतना भारी हो गया हूँ कि अपने बल पर इसको लांघ नहीं सकता । मेरे पास भाव भक्ति रूपी लकड़ी से निर्मित नाव नहीं है कि जिसमें बैठकर पार हो जाऊँ । मेरी नाव तो कर्मादि जन्य पाप रूपी लोहे की बनी हुई है । अतः बताइये हे मुरारी ! मेरी नाव कैसे तिर सकती है । मैंने पापकर्म रूपी लोहे की नाव में विषयवासना रूपी लोहे को ही भरकर समुद्र में पार होने की चला दी किन्तु बिना गुरु रूपी खेवट के वह नाव मध्य में आकर रुक गई ।
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भवसागर की कोई थाघ नहीं है, गहराई का पता नहीं है । फिर वह कितना लम्बा चौड़ा है इसका भी पूरा अनुमान नहीं लग पा रहा है । इतने के ऊपर लोभ रूपी लहर बीच में अटकी नाव को डगमगाती है । जैसे-जैसे वह नाव विषयभोगों रूपी जल से भीगती है वैसे-वैसे वह भारी होती जाती है । अर्थात् डूबने की ओर अग्रसर हो रही है । अतः हे मुरारी ! कोई ऐसा उपाय बताइये जिससे मैं भवसागर से तिर जाऊँ ॥१२०॥   

गुरुवार, 14 मई 2026

*११. एकांगी प्रीति का अंग ~९/११*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*११. एकांगी प्रीति का अंग ~९/११*
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*आत्म औषधि क्या करे, आगे रोग असाध्य ।*
*बहु विधि बूटी बन्दगी, लागे नाँहिं आराध्य ॥९॥*
यदि शरीर में असाध्य रोग हो, तो बहुत प्रकार की बूटी आदि औषधियाँ भी उसको दूर नहीं रख सकेंगी, वैसे ही प्रेमपूर्वक नाना भांति से सेवा पूजा करने पर भी आराध्य देव के हृदय में भक्त सम्बन्ध प्रेम नहीं लगे, तो यह एकांगी प्रीति दु:खप्रद ही होगी ।
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*वज्र१ न वेधी बींधणी, ब्रह्म बन्दगी तेम२ ।*
*रज्जब करुणा३ कर थके, रीझे नहीं सु नेम ॥१०॥*
काष्ठादि में छेद करने वाली बींधनी हीरा१ में छेद नहीं कर सकती त्योंहि२ सेवा - पूजादि साधन ब्रह्म पर प्रभाव नहीं डाल सकते । बहुत ही भक्त दु:खपूर्वक३ विनय करते हुये थक गये हैं किन्तु ब्रह्म नियमादि साधनों से प्रसन्न नहीं होते । अत: वे जब तक भक्त से प्रेम न करें तब तक एकांगी प्रीति क्लेशप्रद ही है ।
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*अकल कलहुँ कलिये१ नहीं, सब भागे जिव जोर ।*
*रज्जब रही सु एक ही, दर्श दया प्रभु ओर ॥११॥*
कला रहित ब्रह्म से बाह्य साधन रूप कलाओं द्वारा संबन्ध१ नहीं किया जाता, उससे सम्बन्ध करने में जीव के सभी बल हार मान कर भाग गये हैं, उस प्रभु के दर्शनार्थ एक मात्र उनकी दया ही सफल रही है ।
इति श्री रज्जब गिरार्थ प्रकाशिका सहित “११. एकांगी प्रीति का अंग” समाप्त ॥
(क्रमशः)
 

२५. अवस्था कौ अंग १/४

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२५. अवस्था कौ अंग १/४
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एक अंग सो आतमा, सुंन अवस्था तीन । 
सुंदर मिलि करि बांचिये, न्यारे न्यारे कीन ॥१॥
अवस्था का निरूपण : अङ्कशास्त्र(गणितविद्या) में प्रसिद्ध एक(१) सङ्ख्या को आत्मा समझिये तथा वहाँ वर्णित शून्य(०) को तीन अवस्था समझिये । यदि उस शून्य को एक से पृथक् पृथक् सम्पृक्त किया(साथ लिखा) जाय तो वे पढने पर पृथक् पृथक् तीन सङ्ख्या दिखायी देंगीं ॥१॥
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एक सुंन मैं दस भये, दूजी सत ह्वै जाहिं । 
तीजी सुंन सहस्त्र ह्वै, एक बिना कछु नाहिं ॥२॥
जैसे - एक के आगे एक शून्य लगा दिया जाय तो वह १०(दश) पढा जायगा । यदि वहीं एक के आगे दो शून्य लगा दिये जाय तो वही १००(एक सौ) पढ़ा जायगा । और उस एक के आगे तीन शून्य लगाये जाँय तो वह १००० अर्थात् एक हजार पढा जायगा ।
यहाँ एक आश्चर्य यह भी है कि यदि इन सङ्ख्याओं में से(पहले लगे हुए) एक को हटा दिया जाय तो वह सङ्ख्या निरर्थक हो जायगी । (इसी प्रकार इस देह में से एक आत्मा निकल जाय तो यह देह भी सर्वथा निरर्थक हो जायगा !) ॥२॥
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सुंन सुंन दस गुन बधै, बहु बिधि ह्वै बिस्तार । 
सुंदर सुंन मिटाइये, एक रहै निरधार ॥३॥
श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - जैसे उस एक सङ्ख्या के आगे एक शून्य लगा दिया जाने से उस का व्यावहारिक मूल्य दश गुणा बढ जाता है, वैसे ही उस शून्य को बढ़ाते हुए सङ्ख्या का यथेच्छ विस्तार कर सकते हैं; परन्तु उस शून्य को हटा दिया जाय तो वहाँ एक की सङ्ख्या निराधार(आलम्बनरहित स्वतन्त्र हो जाती है ।) वैसे ही जड प्रकृति(शून्य) को हटा देने से यह चेतन परमात्मा एकाकी(स्वतन्त्र) रह जाता है । (प्रकृति को जीतना ही आत्मसाक्षात्कार कहलाता है ।) ॥३॥
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तीनि अवस्था मांहिं है, सुन्दर साक्षीभूत । 
सदा एकरस आतमा, ब्यापक है अनुस्यूत ॥४॥
इस देह में जाग्रत्, स्वप्न एवं सुषुप्ति - इन तीन अवस्थाओं के मध्य आत्मा केवल साक्षी का कार्य निष्पन्न करता है; क्योंकि वह आत्मा एक समान स्थिति में रहने वाला तथा सर्वव्यापक एवं सर्वत्र अनुस्यूत(ग्रथित = सम्बद्ध) है ॥४॥
(क्रमशः)  

*भक्तमहिमा ॥*

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*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*साधु संगति अंतर पड़े, तो भागेगा किस ठौर ।*
*प्रेम भक्ति भावै नहीं, यहु मन का मत और ॥*
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*भक्तमहिमा ॥*
हरि कौं भजै सु हरि का होइ । नींच ऊँच अंतर नहिं कोइ ॥टेक॥ 
आसंक्या एक उपजी मनि आइ, अरजन कह्यौ किसन सौं जाइ ।
कोड़ि एक ब्रामण जगि मैं जींव्या, पूरयौ नहीं सु कौणैं भाइ ॥  
किसन कहै सुणौं हो अरजन, बात कहँ एक ब्यौरि बिचारि । 
जिहि जेव्याँ जगि पूरौ होई, सो साध न जेव्याँ थाँकै द्वारि ॥ 
म्हे तौ पूजि पूजि पणि पूज्या, म्हे जाण्याँथे निर्मल भाइ ।
याँही थैं को निरमल छै, म्हे भूला थे देहु बताइ ॥ 
छै तौ साध पणि सुपच सरगरौ, अरजन त्याँह कै आप पधारि ।
उहि जेव्याँ जगि पूरौ होसी, बाजा बाजैं देव दुवारि ॥ 
अरजन भीम निकुल अरु सहदेव, राजा सहित पहूँता धाइ ।
साध सनमुखे ठाढे हूये, बालमीक के लागे पाइ ॥ 
पाँचौं पांडौं करैं बीनती, दीन बचन जोड़ै कर दोइ ।
दरस तुम्हारौ सबहीं पावैं, भवन हमारौ पावन होइ ॥ 
थे तौ ऊँच ऊँच कुल जनम्याँ, म्हे तौ नीच नीलकुल माहिं ।
नीच ऊँच की मन मैं आणौं, तौ हूँ थारै चालौं नांहि ॥ 
थे तौ साध सकल्ल सिरोमणि, थाँ समि तुल्लि और नहिं कोइ ।
थे हरि भगत हमारै आवो, थाँ आयाँ जगि पूरौ होइ ॥ 
बालमीक राजा कै आयौ, भोग लगाइ र लियौ अहार ।
जेता गास जेवताँ उठाया, संख बाजियौ तेती बार ॥ 
भूधर कहै हाथ तैं भजसी, रूडाँ काँइ न बाज्यौ मति कौ रुड़ ।
साध जेवताँ गासाँ बाग्यौ, कणि कणि काँइ न बाग्यौ कूड़ ॥
देव देव मोहि दोस न दीजै, दोस जको सो द्रोपति माहिं ।
नीच ऊँच की मन मैं आणी, ताथैं कणि बागौ नांहिं ॥ 
पारिख पड़ी पारख्या लाधी, जगि मैं न्यौंति जिमाया दोइ ।
जिहि जेव्याँ संख पँचाइण बाग्यौ, बषनां कहै सिरोमणि सोई ॥११९॥ 
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“मत्कर्मकृन्मत्परमो मद्भक्तः सङ्गवर्जितः । 
निर्वैरः सर्वभूतेषु यः स मामेति पाण्डव ॥”
११|५५ गीता ॥ 
जो परात्पर-परब्रह्म-परमात्मा के परायण हो गया है, वह परमात्मा का अपना ही है । उसको अन्य का कहना उचित नहीं है । इन्हीं विचारों को इस पद में व्यक्त किया गया है । एक चौपाई प्रायः सुनने में आया करती है “ऊँच नीच जाणैं नहिं कोई । हरि कौं भजै सो हरि का होई ॥” संभवतः यह चौपाई बषनांजी के इस पद की टेक की ही छाया है । 
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गीता का ही एक अन्य श्लोक है जिसमें कहा गया है कि परमात्मा की भक्ति करने में न लिङ्गभेद, न वर्णभेद और न कर्मभेद ही आड़े आते हैं । 
“मां हि पार्थ व्यपाश्रित्ययेऽपि स्युः पापयोनयः । 
स्त्रियो वैश्यास्तथा शूद्रास्तेऽपि यान्ति परां – गतिम् ॥” 
९|३२॥गीता॥   
जो हरि को भजता है, वह हरि का हो जाता है । हरि की भक्ति करने में ऊँच और नीच का अंतर आड़े नहीं आता है । 
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अर्जुन ने कृष्ण से जाकर कहा, हे भगवन् ! मेरे मन में एक शंका उत्पन्न हो गई है । यज्ञ में एक करोड़ ब्राह्मणों ने भोजन किया है फिर भी यज्ञ सफलतापूर्वक सम्पन्न हो गया है इसकी साक्ष्य भरने को शंख अभी तक बजा नहीं है । सो, न बजने का कारण क्या है । श्रीकृष्ण ने कहा, हे अर्जुन ! पूर्वापर बातों पर विचार करके मैं एक बात कहता हूँ । ध्यान देकर सुनो । जिसके जीमने से यज्ञ पूर्ण होगा वह ब्राह्मण = साधु अभी तक तुम्हारे द्वार पर आकर जींमा नहीं है । 
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इसपर अर्जुन बोला, अन्तर्यामिन् ! हमने तो प्रत्येक ब्राह्मण को पूजनीय, वंदनीय और शुद्धान्तकरण वाला जानकर, मानकर पूजा है और हमारी यह धारणा है कि ये भगवद्भजन आदि के द्वारा मल-विक्षेपादि समस्त दोषों से रहित शुद्धात्मा हैं । इनसे भी और अधिक कोई और निर्मल पवित्रात्मा है तो आप हमें उन्हें बता दें । हम भूल रहे हैं = हम नहीं जानते कि ऐसा कौन सा पवित्रात्मा जींमने से छूट गया है ।  
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श्रीकृष्ण ने कहा, वह साधु तो है किन्तु है भंगी सरगरा । अर्जुन ! तुम स्वयं उसके घर उसको निमंत्रित करने जाओ । उसके जीमने के उपरान्त ही तुम्हारा यज्ञ पूरा होगा तथा यज्ञमंडप में, देवलोक में बाजा बजेगा = शंख ध्वनि करेगा । अर्जुन, भीम, नकुल, सहदेव तथा राजा युधिष्ठिर सभी तत्काल उस भक्त के घर पहुँच गये । साधु के समक्ष = सेवा में पाँचों खड़े हो गये तथा वाल्मीकि नामक उस स्वपच भक्त के पैरों पड़कर वंदना करने लगे । 
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पाँचों पांडव दीन वचन युक्त वाक्यावली१ में वाल्मीकि से विनती करने लगे । भक्त-प्रवर ! आपका दर्शन करके हम सब तो कृतार्थ हो गये किन्तु यज्ञ में पधारे अन्य लोग भी आपके दर्शनों का लाभ ले सकें, एतदर्थ आप हमारे घर पर पधारें । हमारा घर भी पवित्र हो जायेगा । वाल्मीकि भक्त बोले, हे राजन् ! आप बड़े व्यक्ति हैं और उच्चकुल में जन्मे हैं । इसके विपरीत मैं बहुत ही छोटा व्यक्ति हूँ तथा नीच जाति में जन्मा हूँ । यदि आप ऊँच-नीच का विचार मन में रखते हों तो मैं आपके साथ आपके घर चलने को तैयार नहीं हूँ । 
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इस पर पांडवों ने निवेदन किया, आप सकल शिरोमणि साधु हैं, आपके समान और कोई महान् भक्त नहीं है । 
“संताँ कै कुल दीसै नांहीं । राम राम कह राम समांही ॥ 
ऊँच नीच कुल भेद बिचारै । सो तौं जनम आपणौं हारै ॥” 
श्रीरामचरण वाणी ॥ 
हे हरिभक्त ! आप तो हमारे घर पर पधारो । आपके आने से ही हमारा यज्ञ पूरा होगा । वाल्मीकि राजा के यहाँ आया । भोजन सामने आने पर उसने उसे भगवान को अर्पण किया और भोजन करने लगा । 
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जितनी बार उसने जीमते हुए थाली में से ग्रास उठाये उतने ही बार शंख बजा । राजा ने कहा, मैं इस शंख को हाथ से तोड़ डालूंगा । हे बुद्धिमान श्रीकृष्ण ! यह भली प्रकार क्यों नहीं बज रहा है । रुक-रुक कर क्यों बज रहा है । साधु महाराज के ग्रास-ग्रास जीमने पर तो यह बजा किन्तु एक-एक कण के ऊपर यह दुष्ट क्यों नहीं बजा अर्थात् लगातार बिना रुके क्यों नहीं बजा । 
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इतने में ही शंख कहने लगा, हे देव ! हे देवाधिदेव ! मुझे दोष मत दीजिये । जो भी दोष है वह रानी द्रौपदी के कारण है । उनके मन में भक्ति का विचार न आकर जाति के ऊँच-नीच का विचार आ गया । इसकारण कण-कण (ग्रास-ग्रास) पर नहीं बजा । पहचान मिल गई कि किस कारण से शंख लगातार नहीं बज रहा है । तत्काल पांडवों ने द्रौपदी से पूछा । उसने स्वीकार किया । समझाने पर द्रौपदी का भ्रम समाप्त हो गया । उसने उन भक्तराज को बुलाकर भोजन कराया । भोजन करते ही पंचायण शंख जोर से लगातार ध्वनि करता हुआ बजने लगा । बषनां कहता है, वही शिरोमणि ही जो भगवद्भक्ति करता है । ऊँचे वर्ण में जन्म ले लेने से व्यक्ति ऊँचा नहीं बनता । ऊँचा भक्ति करने से होता है ॥११९॥