शुक्रवार, 15 मई 2026

*१२. ब्रह्म अग्नि का अंग ~१/४*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*१२. ब्रह्म अग्नि का अंग ~१/४*
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*ब्रह्म अग्नि सु विचार है, मैल दहै मन माँहिं ।*
*रज्जब रज यूं उतरे, अभि अंतरि अघ जाँहिं ॥१॥*
भली प्रकार ब्रह्म-विचार ही ब्रह्माग्नि है, वह मन के भीतर के मल विक्षेपादि मैल को जलाता है । इस प्रकार ही मन की मोह रूप रज और आन्तर पाप नष्ट होते हैं ।
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*काया कर्म काष्ठ जरहिं, ब्रह्म अग्नि बिच आन ।*
*पावक प्राण२ खुले पावक सौं, रज्जब शून्य१ समान ॥२॥*
काष्ठ में अग्नि डाला जाता है तब काष्ठ जलकर काष्ठ में बद्ध अग्नि मुक्त हो जाता है और दोनों अग्नि आकाश१ में अदृश्य होकर व्यापक अग्नि में मिल जाते हैं, वैसे ही गुरु उपदेश द्वारा अन्त:करण में ब्रह्मज्ञान आने पर कर्म समूह जलकर अज्ञान से आच्छादित स्वस्वरूप आत्मा आज्ञान से मुक्त हो जाता है । फिर आत्मा२ तथा ज्ञान दोनों ही सर्व-विकार शून्य ब्रह्म में समा जाते हैं ।
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*काया काष्ठ गुण घुण कर्म, प्राणी पावक पाया मर्म१ ।*
*गुरु मुख अग्नि ब्रह्म गियान, रज्जब वह्नी२ वह्नी खुलान ॥३॥*
काष्ठ में घुण रहते हैं और काष्ठ को ही खाते हैं, किन्तु उस काष्ठ में अग्नि डाला जाय तो काष्ठ के भीतर बँधा हुआ अग्नि मुक्त हो जायेगा और घुणों को भी भस्म कर डालेगा । वैसे ही शरीर में गुण तथा कर्म हैं और शरीर को दु:खी सुखी करते हैं, किन्तु गुरु मुख से सुने हुये ब्रह्म ज्ञान रूप अग्नि को मुख से सुने हुये ब्रह्म-ज्ञान रूप अग्नि को अन्त:करण में लाया जाय तो अज्ञान के द्वारा काया में बद्ध आत्मा रूप अग्नि२ मुक्त हो जायेगा और गुण तथा कर्मों को नष्ट कर देगा । उक्त प्रकार ही अग्नि से अग्नि मुक्त होता है । यह रहस्य१ हमको श्री गुरुदेव के उपदेश द्वारा ही प्राप्त हुआ है ।
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*प्रभु प्रभाकर१ अंश है, आतम तन तिनु२ आग ।*
*रज्जब संकट शोभ तैं३, सोइ मुक्त जब जाग ॥४॥*
सूर्य१कान्तमणि(आतशी शीशा) के नीचे तृण२ हों और उस मणि में सूर्य की किरण पड़े, तो तृणों में अग्नि प्रगट हो जाता है और तृण भस्म हो जाता है, अग्नि अपने अंशी में मिल जाता है, वैसे ही आत्मा ईश्वर का अंश है और शरीर में वद्ध है जब गुरु-उपदेश द्वारा अन्त:करण में ब्रह्म-ज्ञान आता है तब तब आत्मा अज्ञान निद्रा से जाकर गुण कर्मादि से मुक्त हो जाता है । इस प्रकार तनाध्यास, गुण-विकार और कर्मों के नाश रूप संकट से३ ही आत्मा की शोभा होती है, वह ब्रह्म को प्राप्त होकर ब्रह्म रूप ही हो जाता है ।
(क्रमशः)

*२५. अवस्था कौ अंग ५/८*

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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*२५. अवस्था कौ अंग ५/८*
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सुन्दर जागत भींत महिं, लिख्यौ जगत चित्रास । 
स्वप्न घौंट सनमुख भई, दृसैं सकल घट नास ॥५॥
१. अवस्था का अन्य भेद : श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - जिस किसी पुरुष ने अपनी जाग्रत् अवस्था में दीवाल पर कोई सांसारिक चित्र बनाया हो । वही चित्र उस की स्वप्न या सुषुप्ति अवस्था में उस को लुप्त हुआ दिखायी दे । इसी प्रकार हमें यह सम्पूर्ण जगत् भासता है ॥५॥
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चित्र कछू नहिं देखिये, जबहिं अंधेरौ होइ । 
सुन्दर सुषुपति मैं गये, जाग्रत स्वप्ना दोइ ॥६॥
इसी प्रकार, वह चित्र हम को अन्धकार में भी नहीं दिखायी देता है । इस से स्पष्ट है कि संसार की दो स्थितियाँ दिखायी देती हैं - जाग्रत अवस्था में अन्य, और स्वप्न एवं सुषुप्ति अवस्था में अन्य ॥६॥
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तीन अवस्था तैं जुदौ, आतम ब्योम समान । 
भीति चित्र पुनि घौंट तम, लिप्त नहीं यौं जान ॥७॥
इस तरह, एक ही चित्र तीन प्रकार का दिखायी देता है - (क) कभी आकाश के समान स्वच्छ दिखायी देता है, (ख) कभी अन्धकार में लुप्त और पुनः स्पष्ट दिखायी देता है, (ग) और कभी स्वप्न और सुषुप्ति अवस्था में पूर्णतः लुप्त दिखायी देता है ॥७॥
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सुन्दर जाग्रत धूप है, स्वप्न जौन्ह ज्यौं जानि । 
दोऊ माहैं देखिये, रूप सकल पहिचानि ॥८॥
२. अवस्था का अन्य भेद : वही चित्र (क) दोपहर की धूप में दूसरे प्रकार का दीखता है और (ख) चान्दनी रात में दूसरे प्रकार का । इस प्रकार एक ही रूप दो अवस्थाओ में दो प्रकार से दिखायी देता है । यहाँ धूप को जाग्रत् अवस्था समझो और चान्दनी रात को स्वप्न अवस्था ॥८॥
(क्रमशः) 

विनती ॥


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*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*दादू दरिया यहु संसार है, तामें राम नाम निज नाव ।*
*दादू ढील न कीजिये, यहु औसर यहु डाव ॥*
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विनती ॥
भौ जल तिरणाँ भार भारी । 
लोह की नाव कैसैं तिरै मुरारी ॥टेक॥
लोह की नाव लोह भरि हाकी । 
खेवट बिना बिचालै थाकी ॥
थाग नहीं भौसागर मांही । 
वार पार क्युँह सूझै नांहीं ।
लोभ लहरि बषनां बलिहारी । 
ज्यूँ ज्यूँ भीजै त्यूँ त्यूँ भारी ॥१२०॥
हे मुरारी ! मुझे भव रूपी सागर से पार होना है किन्तु पापों के भार से मैं इतना भारी हो गया हूँ कि अपने बल पर इसको लांघ नहीं सकता । मेरे पास भाव भक्ति रूपी लकड़ी से निर्मित नाव नहीं है कि जिसमें बैठकर पार हो जाऊँ । मेरी नाव तो कर्मादि जन्य पाप रूपी लोहे की बनी हुई है । अतः बताइये हे मुरारी ! मेरी नाव कैसे तिर सकती है । मैंने पापकर्म रूपी लोहे की नाव में विषयवासना रूपी लोहे को ही भरकर समुद्र में पार होने की चला दी किन्तु बिना गुरु रूपी खेवट के वह नाव मध्य में आकर रुक गई ।
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भवसागर की कोई थाघ नहीं है, गहराई का पता नहीं है । फिर वह कितना लम्बा चौड़ा है इसका भी पूरा अनुमान नहीं लग पा रहा है । इतने के ऊपर लोभ रूपी लहर बीच में अटकी नाव को डगमगाती है । जैसे-जैसे वह नाव विषयभोगों रूपी जल से भीगती है वैसे-वैसे वह भारी होती जाती है । अर्थात् डूबने की ओर अग्रसर हो रही है । अतः हे मुरारी ! कोई ऐसा उपाय बताइये जिससे मैं भवसागर से तिर जाऊँ ॥१२०॥   

गुरुवार, 14 मई 2026

*११. एकांगी प्रीति का अंग ~९/११*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*११. एकांगी प्रीति का अंग ~९/११*
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*आत्म औषधि क्या करे, आगे रोग असाध्य ।*
*बहु विधि बूटी बन्दगी, लागे नाँहिं आराध्य ॥९॥*
यदि शरीर में असाध्य रोग हो, तो बहुत प्रकार की बूटी आदि औषधियाँ भी उसको दूर नहीं रख सकेंगी, वैसे ही प्रेमपूर्वक नाना भांति से सेवा पूजा करने पर भी आराध्य देव के हृदय में भक्त सम्बन्ध प्रेम नहीं लगे, तो यह एकांगी प्रीति दु:खप्रद ही होगी ।
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*वज्र१ न वेधी बींधणी, ब्रह्म बन्दगी तेम२ ।*
*रज्जब करुणा३ कर थके, रीझे नहीं सु नेम ॥१०॥*
काष्ठादि में छेद करने वाली बींधनी हीरा१ में छेद नहीं कर सकती त्योंहि२ सेवा - पूजादि साधन ब्रह्म पर प्रभाव नहीं डाल सकते । बहुत ही भक्त दु:खपूर्वक३ विनय करते हुये थक गये हैं किन्तु ब्रह्म नियमादि साधनों से प्रसन्न नहीं होते । अत: वे जब तक भक्त से प्रेम न करें तब तक एकांगी प्रीति क्लेशप्रद ही है ।
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*अकल कलहुँ कलिये१ नहीं, सब भागे जिव जोर ।*
*रज्जब रही सु एक ही, दर्श दया प्रभु ओर ॥११॥*
कला रहित ब्रह्म से बाह्य साधन रूप कलाओं द्वारा संबन्ध१ नहीं किया जाता, उससे सम्बन्ध करने में जीव के सभी बल हार मान कर भाग गये हैं, उस प्रभु के दर्शनार्थ एक मात्र उनकी दया ही सफल रही है ।
इति श्री रज्जब गिरार्थ प्रकाशिका सहित “११. एकांगी प्रीति का अंग” समाप्त ॥
(क्रमशः)
 

२५. अवस्था कौ अंग १/४

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२५. अवस्था कौ अंग १/४
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एक अंग सो आतमा, सुंन अवस्था तीन । 
सुंदर मिलि करि बांचिये, न्यारे न्यारे कीन ॥१॥
अवस्था का निरूपण : अङ्कशास्त्र(गणितविद्या) में प्रसिद्ध एक(१) सङ्ख्या को आत्मा समझिये तथा वहाँ वर्णित शून्य(०) को तीन अवस्था समझिये । यदि उस शून्य को एक से पृथक् पृथक् सम्पृक्त किया(साथ लिखा) जाय तो वे पढने पर पृथक् पृथक् तीन सङ्ख्या दिखायी देंगीं ॥१॥
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एक सुंन मैं दस भये, दूजी सत ह्वै जाहिं । 
तीजी सुंन सहस्त्र ह्वै, एक बिना कछु नाहिं ॥२॥
जैसे - एक के आगे एक शून्य लगा दिया जाय तो वह १०(दश) पढा जायगा । यदि वहीं एक के आगे दो शून्य लगा दिये जाय तो वही १००(एक सौ) पढ़ा जायगा । और उस एक के आगे तीन शून्य लगाये जाँय तो वह १००० अर्थात् एक हजार पढा जायगा ।
यहाँ एक आश्चर्य यह भी है कि यदि इन सङ्ख्याओं में से(पहले लगे हुए) एक को हटा दिया जाय तो वह सङ्ख्या निरर्थक हो जायगी । (इसी प्रकार इस देह में से एक आत्मा निकल जाय तो यह देह भी सर्वथा निरर्थक हो जायगा !) ॥२॥
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सुंन सुंन दस गुन बधै, बहु बिधि ह्वै बिस्तार । 
सुंदर सुंन मिटाइये, एक रहै निरधार ॥३॥
श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - जैसे उस एक सङ्ख्या के आगे एक शून्य लगा दिया जाने से उस का व्यावहारिक मूल्य दश गुणा बढ जाता है, वैसे ही उस शून्य को बढ़ाते हुए सङ्ख्या का यथेच्छ विस्तार कर सकते हैं; परन्तु उस शून्य को हटा दिया जाय तो वहाँ एक की सङ्ख्या निराधार(आलम्बनरहित स्वतन्त्र हो जाती है ।) वैसे ही जड प्रकृति(शून्य) को हटा देने से यह चेतन परमात्मा एकाकी(स्वतन्त्र) रह जाता है । (प्रकृति को जीतना ही आत्मसाक्षात्कार कहलाता है ।) ॥३॥
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तीनि अवस्था मांहिं है, सुन्दर साक्षीभूत । 
सदा एकरस आतमा, ब्यापक है अनुस्यूत ॥४॥
इस देह में जाग्रत्, स्वप्न एवं सुषुप्ति - इन तीन अवस्थाओं के मध्य आत्मा केवल साक्षी का कार्य निष्पन्न करता है; क्योंकि वह आत्मा एक समान स्थिति में रहने वाला तथा सर्वव्यापक एवं सर्वत्र अनुस्यूत(ग्रथित = सम्बद्ध) है ॥४॥
(क्रमशः)  

*भक्तमहिमा ॥*

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*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*साधु संगति अंतर पड़े, तो भागेगा किस ठौर ।*
*प्रेम भक्ति भावै नहीं, यहु मन का मत और ॥*
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*भक्तमहिमा ॥*
हरि कौं भजै सु हरि का होइ । नींच ऊँच अंतर नहिं कोइ ॥टेक॥ 
आसंक्या एक उपजी मनि आइ, अरजन कह्यौ किसन सौं जाइ ।
कोड़ि एक ब्रामण जगि मैं जींव्या, पूरयौ नहीं सु कौणैं भाइ ॥  
किसन कहै सुणौं हो अरजन, बात कहँ एक ब्यौरि बिचारि । 
जिहि जेव्याँ जगि पूरौ होई, सो साध न जेव्याँ थाँकै द्वारि ॥ 
म्हे तौ पूजि पूजि पणि पूज्या, म्हे जाण्याँथे निर्मल भाइ ।
याँही थैं को निरमल छै, म्हे भूला थे देहु बताइ ॥ 
छै तौ साध पणि सुपच सरगरौ, अरजन त्याँह कै आप पधारि ।
उहि जेव्याँ जगि पूरौ होसी, बाजा बाजैं देव दुवारि ॥ 
अरजन भीम निकुल अरु सहदेव, राजा सहित पहूँता धाइ ।
साध सनमुखे ठाढे हूये, बालमीक के लागे पाइ ॥ 
पाँचौं पांडौं करैं बीनती, दीन बचन जोड़ै कर दोइ ।
दरस तुम्हारौ सबहीं पावैं, भवन हमारौ पावन होइ ॥ 
थे तौ ऊँच ऊँच कुल जनम्याँ, म्हे तौ नीच नीलकुल माहिं ।
नीच ऊँच की मन मैं आणौं, तौ हूँ थारै चालौं नांहि ॥ 
थे तौ साध सकल्ल सिरोमणि, थाँ समि तुल्लि और नहिं कोइ ।
थे हरि भगत हमारै आवो, थाँ आयाँ जगि पूरौ होइ ॥ 
बालमीक राजा कै आयौ, भोग लगाइ र लियौ अहार ।
जेता गास जेवताँ उठाया, संख बाजियौ तेती बार ॥ 
भूधर कहै हाथ तैं भजसी, रूडाँ काँइ न बाज्यौ मति कौ रुड़ ।
साध जेवताँ गासाँ बाग्यौ, कणि कणि काँइ न बाग्यौ कूड़ ॥
देव देव मोहि दोस न दीजै, दोस जको सो द्रोपति माहिं ।
नीच ऊँच की मन मैं आणी, ताथैं कणि बागौ नांहिं ॥ 
पारिख पड़ी पारख्या लाधी, जगि मैं न्यौंति जिमाया दोइ ।
जिहि जेव्याँ संख पँचाइण बाग्यौ, बषनां कहै सिरोमणि सोई ॥११९॥ 
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“मत्कर्मकृन्मत्परमो मद्भक्तः सङ्गवर्जितः । 
निर्वैरः सर्वभूतेषु यः स मामेति पाण्डव ॥”
११|५५ गीता ॥ 
जो परात्पर-परब्रह्म-परमात्मा के परायण हो गया है, वह परमात्मा का अपना ही है । उसको अन्य का कहना उचित नहीं है । इन्हीं विचारों को इस पद में व्यक्त किया गया है । एक चौपाई प्रायः सुनने में आया करती है “ऊँच नीच जाणैं नहिं कोई । हरि कौं भजै सो हरि का होई ॥” संभवतः यह चौपाई बषनांजी के इस पद की टेक की ही छाया है । 
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गीता का ही एक अन्य श्लोक है जिसमें कहा गया है कि परमात्मा की भक्ति करने में न लिङ्गभेद, न वर्णभेद और न कर्मभेद ही आड़े आते हैं । 
“मां हि पार्थ व्यपाश्रित्ययेऽपि स्युः पापयोनयः । 
स्त्रियो वैश्यास्तथा शूद्रास्तेऽपि यान्ति परां – गतिम् ॥” 
९|३२॥गीता॥   
जो हरि को भजता है, वह हरि का हो जाता है । हरि की भक्ति करने में ऊँच और नीच का अंतर आड़े नहीं आता है । 
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अर्जुन ने कृष्ण से जाकर कहा, हे भगवन् ! मेरे मन में एक शंका उत्पन्न हो गई है । यज्ञ में एक करोड़ ब्राह्मणों ने भोजन किया है फिर भी यज्ञ सफलतापूर्वक सम्पन्न हो गया है इसकी साक्ष्य भरने को शंख अभी तक बजा नहीं है । सो, न बजने का कारण क्या है । श्रीकृष्ण ने कहा, हे अर्जुन ! पूर्वापर बातों पर विचार करके मैं एक बात कहता हूँ । ध्यान देकर सुनो । जिसके जीमने से यज्ञ पूर्ण होगा वह ब्राह्मण = साधु अभी तक तुम्हारे द्वार पर आकर जींमा नहीं है । 
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इसपर अर्जुन बोला, अन्तर्यामिन् ! हमने तो प्रत्येक ब्राह्मण को पूजनीय, वंदनीय और शुद्धान्तकरण वाला जानकर, मानकर पूजा है और हमारी यह धारणा है कि ये भगवद्भजन आदि के द्वारा मल-विक्षेपादि समस्त दोषों से रहित शुद्धात्मा हैं । इनसे भी और अधिक कोई और निर्मल पवित्रात्मा है तो आप हमें उन्हें बता दें । हम भूल रहे हैं = हम नहीं जानते कि ऐसा कौन सा पवित्रात्मा जींमने से छूट गया है ।  
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श्रीकृष्ण ने कहा, वह साधु तो है किन्तु है भंगी सरगरा । अर्जुन ! तुम स्वयं उसके घर उसको निमंत्रित करने जाओ । उसके जीमने के उपरान्त ही तुम्हारा यज्ञ पूरा होगा तथा यज्ञमंडप में, देवलोक में बाजा बजेगा = शंख ध्वनि करेगा । अर्जुन, भीम, नकुल, सहदेव तथा राजा युधिष्ठिर सभी तत्काल उस भक्त के घर पहुँच गये । साधु के समक्ष = सेवा में पाँचों खड़े हो गये तथा वाल्मीकि नामक उस स्वपच भक्त के पैरों पड़कर वंदना करने लगे । 
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पाँचों पांडव दीन वचन युक्त वाक्यावली१ में वाल्मीकि से विनती करने लगे । भक्त-प्रवर ! आपका दर्शन करके हम सब तो कृतार्थ हो गये किन्तु यज्ञ में पधारे अन्य लोग भी आपके दर्शनों का लाभ ले सकें, एतदर्थ आप हमारे घर पर पधारें । हमारा घर भी पवित्र हो जायेगा । वाल्मीकि भक्त बोले, हे राजन् ! आप बड़े व्यक्ति हैं और उच्चकुल में जन्मे हैं । इसके विपरीत मैं बहुत ही छोटा व्यक्ति हूँ तथा नीच जाति में जन्मा हूँ । यदि आप ऊँच-नीच का विचार मन में रखते हों तो मैं आपके साथ आपके घर चलने को तैयार नहीं हूँ । 
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इस पर पांडवों ने निवेदन किया, आप सकल शिरोमणि साधु हैं, आपके समान और कोई महान् भक्त नहीं है । 
“संताँ कै कुल दीसै नांहीं । राम राम कह राम समांही ॥ 
ऊँच नीच कुल भेद बिचारै । सो तौं जनम आपणौं हारै ॥” 
श्रीरामचरण वाणी ॥ 
हे हरिभक्त ! आप तो हमारे घर पर पधारो । आपके आने से ही हमारा यज्ञ पूरा होगा । वाल्मीकि राजा के यहाँ आया । भोजन सामने आने पर उसने उसे भगवान को अर्पण किया और भोजन करने लगा । 
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जितनी बार उसने जीमते हुए थाली में से ग्रास उठाये उतने ही बार शंख बजा । राजा ने कहा, मैं इस शंख को हाथ से तोड़ डालूंगा । हे बुद्धिमान श्रीकृष्ण ! यह भली प्रकार क्यों नहीं बज रहा है । रुक-रुक कर क्यों बज रहा है । साधु महाराज के ग्रास-ग्रास जीमने पर तो यह बजा किन्तु एक-एक कण के ऊपर यह दुष्ट क्यों नहीं बजा अर्थात् लगातार बिना रुके क्यों नहीं बजा । 
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इतने में ही शंख कहने लगा, हे देव ! हे देवाधिदेव ! मुझे दोष मत दीजिये । जो भी दोष है वह रानी द्रौपदी के कारण है । उनके मन में भक्ति का विचार न आकर जाति के ऊँच-नीच का विचार आ गया । इसकारण कण-कण (ग्रास-ग्रास) पर नहीं बजा । पहचान मिल गई कि किस कारण से शंख लगातार नहीं बज रहा है । तत्काल पांडवों ने द्रौपदी से पूछा । उसने स्वीकार किया । समझाने पर द्रौपदी का भ्रम समाप्त हो गया । उसने उन भक्तराज को बुलाकर भोजन कराया । भोजन करते ही पंचायण शंख जोर से लगातार ध्वनि करता हुआ बजने लगा । बषनां कहता है, वही शिरोमणि ही जो भगवद्भक्ति करता है । ऊँचे वर्ण में जन्म ले लेने से व्यक्ति ऊँचा नहीं बनता । ऊँचा भक्ति करने से होता है ॥११९॥ 

बुधवार, 13 मई 2026

*११. एकांगी प्रीति का अंग ~५/८*

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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*११. एकांगी प्रीति का अंग ~५/८*
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*देखहु विरह विवेक बिन, उपज्या अहमक१ अंग२ ।*
*दीपक के दिल ही नहीं, रज्जब पचन३ पतंग ॥५॥*
देखो, दीपक के तो हृदय भी नहीं है फिर भी मूर्ख१ पंतग के शरीर२ में बिना विवेक दीपक का प्रेम उत्पन्न हो जाता है । इससे दीपक के विरह से व्यथित होकर पंतग दीपक की अग्नि में ही जल३ मरता है ।
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*रज्जब माया ब्रह्म दिशि, जीव आप सौं जाय ।*
*उभय१ सु वेपरवाह वे, नर देखो निरताय ॥६॥*
हे नरो ! विचार करके देखो तो ज्ञात होगा, जीव अपने आप ही माया तथा ब्रह्म की और जाते हैं माया और ब्रह्म तो दोनों१ ही बेपरवाह हैं, उन्हें जीवों की आवश्यता नहीं ।
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*रज्जब जलना मड़े१ संग, त्यों एकांगी प्रीत ।*
*दुख सुख की पूछे नहीं, यह देखो विपरीत ॥७॥*
जो दु:ख की बात नहीं पूछता उस मुरदे१ के साथ जलने के समान ही एकांगी प्रीति है । देखो, इसका फल अपने से विपरीत ही दु:ख ही होता है ।
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*औषधी कीजे आयु बिन, सो लागे कोइ नाँहिं ।*
*त्यों एकांगी प्रीति है, समझ देख मन माँहिं ॥८॥*
मन में विचार करके देखो, आयु समाप्त होने पर कटु कषायादि औषधि खाने से कोई लाभ नहीं, दु:ख ही होता है, वैसे ही एकांगी प्रीति से कोई लाभ नहीं दु:ख ही होता है ।
(क्रमशः)

२४. सांख्य ज्ञान कौ अंग ५९/६१

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२४. सांख्य ज्ञान कौ अंग ५९/६१ 
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जाग्रत स्वप्न सुषोपती, इनितैं न्यारौ होइ । 
सुन्दर साक्षी तुरियतत, रूप आपनौ जोइ ॥५९॥
तब वह जीव जाग्रत्, स्वप्न एवं सुषुप्ति - इन तीनों अवस्थाओं से आगे बढ़ कर तुरीयावस्था में पहुँच कर स्वकीय साक्षी रूप में पहुँच जाता है ॥५९॥
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तीन अवस्था जड कही, ये तौ है भ्रमकूप । 
सुन्दर आप बिचारि तूं, चेतनि तत्व स्वरूप ॥६०॥
श्रीसुन्दरदासजी उपदेश करते हैं - इन चार अवस्थाओं में जाग्रत्, स्वप्न एवं सुषुप्ति - ये तीन अवस्था 'जड'(अचेतन) कहलाती है । इन को भ्रमजाल ही समझो । तुम तो तुरीयावस्था में पहुँच कर चेतन तत्त्व के साक्षात्कार हेतु एकान्ततः साधना करो ॥६०॥
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जाग्रत स्वप्न सुषोपती, तीनि अवस्था गौंन । 
सुन्दर तुरिय चढ्यौ जबहिं, खरी चढै तब कौंन ॥६१॥ 
इति सांख्य ज्ञान को अंग ॥२४॥
तुम जाग्रत्, स्वप्न एवं सुषुप्ति - इन तीनों अवस्थाओं को गौण(मध्यम) ही समझो । अतः तुम तुरीयावस्था में पहुँच कर उसी के आधार पर साधना करो । यही तुम्हारे लिये शाश्वत आनन्दप्रदायिनी होगी । लोक में भी हम देखते हैं कि जो उत्तम घोड़े की सवारी का आनन्द अनुभव कर चुके हैं उनमें से कोई भी गधे की सवारी के लिये कभी अपनी उत्सुकता नहीं दिखाता ॥६१॥
इति साङ्ख्य ज्ञान का अंग सम्पन्न ॥२४॥
(क्रमशः) 

वाही रे या वाही रे

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*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*नाना विधि के रूप धर, सब बांधे भामिनी ।*
*जग बिटंब परलै किया, हरि नाम भुलावनी ॥*
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*माया ॥*
वाही रे या वाही रे । तिहि का साध सबाया उगाही रे ॥टेक॥ 
जिहि मछिन्द्र कौ मुह मोड़्यौ रे । जिहि संग ब्रह्मा दौड्यौ रे ॥
जिहि कै पारासुर रंगि राच्यौ रे । जिहि कै आगै ईसर नाच्यौ रे ॥
सींगी रिषि सक्यौ न नासी रे । ल्याइ घालि गला मैं पासी रे ॥
करता नैं घर बारी रे । नारद थैं कीयौ नारी रे ॥
छत्रपति भूपति लोई रे । इहिं स्यूँ राचि रह्यौ सब कोई रे ॥
या सबही का मन मांही रे । इहि नैं कोइ भूलै नांहीं रे ॥
छह दरसन मनि भाई रे । भेट भाव ले आई रे ॥ 
कोई कोई ऊबरिया रे । ज्याँह रामचरण चित धरिया रे ॥
लाधी लखी पिछाणी रे । पणि बखनैं मौड़ी जाणी रे ॥११८॥
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स्थूल माया के कई रूप हैं जिनमें से कनक और कामनी दो प्रमुख हैं ।
“आडा हरि की भगति मैं, कनक कामणी दोइ । 
रामचरण निरणौं कियौ, कनक अपरबल जोइ ॥” 
बषनांजी ने माया के प्रमुख रूप कनक का वर्णन पिछले पद में कर दिया ।  अब इस पद में कामिनी रूपी माया का वर्णन करते हैं । वे कहते हैं । यह कामिनी रूपी माया वही है, निश्चय ही वही है जिसको एक बार साध = साध लेने पर = अंगीकृत कर लेने पर कोई भी छोड़ नहीं पाते, उल्टे सवाया = ज्यादा से ज्यादा उसी में उगाही = अवगाहन = निमग्न हो जाते हैं । 
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मैं बषनां इस बात को योंही मनगढंत नहीं कह रहा हूँ । इससे सम्बन्धित इतिहास-पुराणों में अनेकों प्रसंग लिखे पड़े हैं । उनमें से दो चार का दिग्दर्शन यहाँ कराया जाता है । इस कामिनी ने ही कामरूपक्षेत्र में मत्स्येन्द्रनाथ का योगसाधना से मुँह मुड़ाकर अपने में अनुरक्त कर लिया था । इस कामिनी ने ब्रह्मा को इतना कामातुर बना दिया था कि उसने अपनी पुत्री सरस्वती को ही अपनी पत्नी बना डाला । 
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इस कामिनी के रंग में ही पाराशर ऋषि रंग गये । इस कामिनी के आगे ही ईसर = शिव ने नृत्य किया था । श्रृंगीऋषि जिन्हें ‘स्त्री’ नाम तक पता नहीं था को भी इस कामिनी ने अछूता नहीं छोड़ा और उन्हें भी जंगलों से निकालकर अपने आकर्षण रूपी रस्सी में बांधकर अपने निकट ले आई । कर्त्ता को भी इसने घरबारी = गृहस्थ बनाकर उससे भी प्रधान हो गई । इसीलिये पहले लक्ष्मी फिर नारायण बोला जाता है । 
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नारद को इसी नारी ने बंदर बनने को बाध्य किया था । क्या छत्रपति क्या राजा और क्या सामान्य जनता, सभी इसी में रचे-पचे पड़े हैं । सभी इसके अधीन हुए पड़े हैं  । यह इतनी प्रबल आकर्षणमयी है कि यह सभी के मनों में बसी हुई है । इसको कोई भी भूलता नहीं है । षड्दर्शनियों के मनों को भी यह प्रिय लगती है । वे भी इसको प्राप्त करने को लालायित रहते हैं । यह इन षड्दर्शनियों को दर्शन(भेंट) और श्रद्धा भाव प्रदर्शित करने के बहाने जाकर प्रभावित करती है । 
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जिन्होंने अपने चित्त में रामजी के चरणों को धारण कर लिया है वे ही कोई-कोई इससे बच सके हैं । बषनांजी स्वयं के बारे में बताते हैं मैंने भी पत्नी लाधी = प्राप्त की, लखी = फिर उसको भोगा और अंत में गुरु के आलोक में उसके वास्तविक स्वरूप को पहचाना कि यह स्वात्मतत्व साक्षात्कार के मार्ग में बहुत बड़ी बाधा है । किन्तु यह तत्व मेरे जानने में बहुत बाद में आया । 
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“काम अपरबल जोड़ बोध सबहिन का खोया । 
ब्रह्मा की बुधि हरी काम हित पुतरी जोया ॥ 
सिवकी अकलि भुलाइ भीलड़ी पाछै भागा । 
सुरपति सरति चुकाइ जाइ गौतम घरि लागा ॥ 
सीतापति सूँ तोड़ि काम रावण घर बोयौ । 
देखि मछोदरि रूप काम पारारिषि मोह्यौ । 
छत्रपति क्या नरपति जारि सकै नहिं देव । 
रामचरण कंद्रफ जरै राम भजन गुरदेव ॥”
“नारी नर छोड्या नहीं तीनूं लोकि मंझारि । 
केता घाइल करि रख्या केता लीया मारि ॥ 
बिसन संगि लछमीं भई विधि सावत्री नारि ॥ 
भई महेस घरि गवरिज्या सेस नागणी घारि । 
सींगी रिषि कौं मोहियौ कहीं न चाली हारि । 
रिषि तपसी छोडै नहीं मारै जीती सारि ॥ 
बन बसती हसती फिरै नरां घालती घाव । 
रामचरण जन राम रत जा परि चलै न दाव ॥११८॥”

मंगलवार, 12 मई 2026

*११. एकांगी प्रीति का अंग ~ १/४*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*११. एकांगी प्रीति का अंग ~ १/४*
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*प्रीति इकंग महा बुरी, दुख दीरघ दिल होय ।*
*काहि पुकारे किस कहै, बेली नाँहीं कोय ॥१॥*
पतंग की प्रीति दीपक में तो है किन्तु दीपक प्रीति पतंग में नहीं, वैसे ही भक्ति की प्रीति भगवान में हो और भगवान की प्रीति भक्त में नहीं हो तो प्रीति एकांगी कहलाती है और इससे महान दु:ख होता है, अत: यह बहुत बुरी है । इस स्थिति में प्रेमी किसको पुकारे ओर किसको कहे । इस स्थिति में कोई भी साथ नहीं देता, किन्तु भगवान के भक्त की यह स्थिति नहीं होती कारण भगवान् सर्वज्ञ हैं वे भक्त के हृदय को जानते हैं, उनका भक्त पतंग के समान नहीं मरता उसे दर्शन हो ही जाते हैं ।
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*प्रीति इकंगी लागतैं, प्राणि परे दु:ख द्वन्द ।*
*मरकट सूवा ज्यों बँधे, बिन बन्धन दृढ़ फंद ॥२॥*
जैसे वानर पृथ्वी में गड़ी हुई संकड़े मुख की चणे की हंडिया में दोनों मूठी चणे की भरकर बन्धन में पड़ता है और शुक पक्षी नलिका पर बैठकर नलिका घूम जाने से भ्रमवश बन्धन में पड़ता है वैसे ही एकांगी प्रीति लगाने से प्राणी महान् दुख की उलझन में पड़ता है वैसे ही एकांगी प्रीति लगने से प्राणी महान दुख की उलझन में पड़ जाता है और बिना ही बंधन दृढ़ फंदे में पड़ जाता है ।
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*चातक मोर पुकार सुन, कछु मेघ न आवे ।*
*तैसे रज्जब रटत है, पिव पीर न पावे ॥३॥*
चातक तथा मयूर पक्षी बहुत पुकारते हैं किन्तु मेध उनकी इच्छानुसार कब आकर वर्षता है, वैसे ही प्रेमी प्रभु को को रटते हैं किन्तु प्रभु तो उनकी हृदय की पीड़ा को भी नहीं देख पाते ।
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*चकोर चाहि चंद न उदय, जीव ब्रह्म त्यों आहि ।*
*नातो एक ही ओर को, यहु दुख कहिये काहि ॥४॥*
चन्द्रमा चकोर की इच्छा से नहीं उदय होता, वैसे ही जीव की इच्छा से ब्रह्म का दर्शन नहीं होता, कारण चन्द्रमा में तथा ब्रह्म में चकोर और जीव के समान प्रीति नहीं है । अत: इस एकांगी प्रीति का दु:ख किससे कहा जाय अर्थात् प्रेमपात्र की कृपा बिना नहीं मिटता ।
(क्रमशः)

सोमवार, 11 मई 2026

२४. सांख्य ज्ञान कौ अंग ५६/५८

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२४. सांख्य ज्ञान कौ अंग ५६/५८
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सुन्दर देह सराव मैं, तेल भर्यौ पुनि स्वास । 
बाती अंतहकरन की, चेतनि जोति प्रकास ॥५६॥ 
(श्रीसुन्दरदासजी उक्त तेज, प्रकाश एवं कल्पना का व्याख्यान कर रहे हैं -)
इस देह को सराब(मिट्टी का पात्र = दीपक) समझिये, श्वास को ही तैल समझिये, अन्तःकरण को बाती समझिये, तथा उस से उद्भुत तेज एवं प्रकाश को चेतना समझिये ॥५६॥
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सुन्दर पंद्रह तत्व कौ, देह भयौ सौ कुंभ । 
नौ तत्वनि कौ लिंग पुनि, मांहिं भर्यौ है अंभ ॥५७॥ 
ऊपर गिनाये गये इकतीस(३१) तत्त्वों में से आरम्भ के पन्द्रह(१५) तत्त्वों से निर्मित स्थूल शरीर को यहाँ कुम्भ घट) समझिये । बाद के नौ(९) तत्त्वों से निर्मित लिङ्गशरीर(कारणशरीर) को उसमें भरा हुआ जल समझिये ॥५७॥
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जीव भयौ प्रतिबिंब ज्यौं, ब्रह्म इंदु आभास । 
सुन्दर मिटै उपाधि जब, जहं के तहां निवास ॥५८॥
जीव को प्रतिबिम्ब समझिये । वह मानों चन्द्र रूप ब्रह्म का आभास है । जब उस जीव की सभी आधि-व्याधियाँ क्षीण हो जायँगीं तब वह जहाँ का तहाँ शुद्ध स्वरूप में स्थित हो जायगा ॥५८॥
(क्रमशः)

मेरी मेरी करतौ मरि ही गयौ

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*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*माया देखे मन खुशी, हिरदै होइ विकास ।*
*दादू यहु गति जीव की, अंत न पूगै आस ॥*
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*माया ॥*
मेरी मेरी करतौ मरि ही गयौ । साध संगति हरि नाम न लयौ ॥टेक॥ 
घणाँ कलापाँ दुख करि खाँटी । रही कहीं धरती मैं डाटी ॥ 
चोर मुसी कै बैसंदरि बाली । राजा डंडै कै ऊपर सिल राली ॥  
साँची थी पर खाण न पाई । तातैं तलब धणी की आई ॥ 
दानि पुंनि कहुँ खरचि न आपी । मरति बैर पछ्तायौ पापी ॥  
मेल्ही धरी रही कहीं बाकी । पूछ्ताँ पहली जीभ पणि थाकी ।
खाइ खरचि हरि अरथि लगाई । कह बषनां त्याहँ की बणिवाई ॥११७॥
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नीतिकारों ने धन की तीन गति मानी है “दानं भोगो नाशस्तिस्त्रो गतयो भवन्ति वित्तस्य । यो न ददाति न भुंक्ते तस्य तृतीया गतिर्भवति ॥नीतिशतक ३९॥ धन की तीन गतियाँ होती हैं (१) दान (२) भोग (३) नाश । जो न दान करता है और न भोगता है उसका धन नष्ट हो जाता है । इन्हीं विचारों का व्याख्यान इस पद में बषनांजी ने किया है । कलापाँ = परिश्रम । खाँटी = एकत्रित की । डाटी = छिपाई, गाडी । मुसी = चोरी की । बैसंदरि = अग्नि । साँची = संचय की । तलब = बुलावा । आपी = दी । बणीयाई = सफल हुई, शोभा प्राप्त हुई ॥  
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कंजूस व्यक्ति मेरी सम्पत्ति, मेरा धन, मेरी भूमि आदि मेरी-मेरी करते-करते ही तो मर गया किन्तु उसने कभी भी रामजी का नाम-स्मरण तथा साधुओं की संगति नहीं की । उसने बहुत परिश्रम व कष्टों के साथ सम्पत्ति अर्जित की किन्तु मरते समय अंत में किञ्चित्मात्र भी उसके साथ में नहीं गई । सारी की सारी यहीं-कहीं भूमि पर पड़ी रह गई, भूमि में गड़ी रह गई। या तो उस सम्पत्ति को चोर चौरी कर लेता हैं या उसे अग्नि जला डालती है अथवा राजा कर; चौरी अथवा अन्य कोई इल्जाम लगाकर अधिगृहित कर लेता  है । 
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इतना नहीं होता तो कंजूस व्यक्ति इन उक्त के भय से धन को भूमि में गाड़कर ऊपर से शिला लगाकर छिपा देता है । कंजूस के धन की उक्त ही गति होती है । वह धन का संचय तो करता है किन्तु उसका सही उपयोग नहीं कर पाता है । इसीलिये परमात्मा का बुलावा आ जाता है कि इस कंजूस व्यक्ति ने धन की दुर्गति कर रखी है । अतः अब इसके पास यह संपत्ति रहने लायक नहीं है । इसे इसके पास से हटाकर उपयुक्त हाथों में देना ही ठीक है और परमात्मा कुछ न कुछ बहाने के मिस उस कंजूस से उस संपत्ति को छीन लेता है । अपनी दी हुई संपत्ति को अपने पास वापिस बुला लेता है । 
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कंजूस व्यक्ति जीवनभर न दान-पुण्य में ही धन को खर्चता है और न किसी उपयुक्त पात्र को ही देता है । जब मरने लगता है तब पश्चाताप करता है, हाय । परिश्रम व कष्ट से संचित धन-सम्पत्ति मुझसे छूटी जा रही है । मैं न दान-पुण्य कर सका, न खा-बिलस सका और न किसी को दे ही सका । 
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कंजूस द्वारा कहीं रखी हुई, गाडी हुई अथवा उधार दी गई में से वापिस आने योग्य संपत्ति के बारे में मरते समय जब परिवारवालों द्वारा पूछा जाता है तब उसकी जिव्हा लड़खड़ा जाती है । वह कुछ भी बता पाने को समर्थ नहीं रह पाता है । बषनां कहता है, जो व्यक्ति अर्जित सम्पत्ति की यथावश्यकता आने में खर्चता है और परमार्थ में लगाता है, उसके द्वारा ही सम्पत्ति का अर्जन, रक्षण और व्यय सफल कहा जाता है ॥११७॥

*१०. विरह का अंग~ ६०/६२*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*१०. विरह का अंग~ ६०/६२*
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*सकल बोल विरकत भये, गुरु वाइक मन लाग ।*
*रज्जब रोवे दर्श को, यहु साँचा वैराग ॥६०॥*
विरह उत्पन्न होने पर साधक संपूर्ण वचन विलास से विरक्त हो जाता है, केवल सद्गुरु वचनों में उसका मन लगता है और रात्रि दिन प्रियतम प्रभु के दर्शनार्थ रोता रहता है, वह विरहपूर्वक वैराग्य ही सच्चा वैराग्य है ।
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*वे परवाही बपु१ से, ता२ ऊपर वैराग ।*
*रज्जब रोवे इस मते३, ता शिर मोटे भाग ॥६१॥*
जो शरीर१ पोषणादि की परवाह नहीं करता और उस२ बे परवाह रूप भावना से भी विरक्त रहता है अर्थात उसका अभिमान भी मन में नहीं आने देता । ऐसे विचार३ में स्थिर होकर भी भगवद् दर्शनार्थ रात्रि-दिन रोता है उस महानुभाव का विशाल भाग्य है ।
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*माँहिं बहै बाहर कहै, सो सुन रीझे राम ।*
*रज्जब बातों के विरह, कदे न सीझे काम ॥६२॥*
जैसे विरह भीतर धारण करता है वैसा बाहर भी करता है, उसी को सुन कर रामजी प्रसन्न होते हैं और जो केवल विरह की बातें ही करते हैं, उन बातों से कभी भी भगवान् की प्राप्ति रूप कार्य सिद्ध नहीं होता है ।
इति श्री रज्जब गिरार्थ प्रकाशिका सहित “१०. विरह का अंग” समाप्त ॥
‪(क्रमशः)‬‬

२४. सांख्य ज्ञान कौ अंग ५३/५५

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२४. सांख्य ज्ञान कौ अंग ५३/५५
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पोसत माहिं अफीम है, बृक्षन मैं मधु जांनि । 
देह माहिं यौं आतमा, सुन्दर कहत बखांनि ॥५३॥
जैसे पोस्त(अफीम का पौधा या फूल) में अफीम सर्वत्र व्याप्त रहती है, तथा सभी वृक्षों में सात्त्विक माधुर्य(मिठास) रहता है; इसी प्रकार सभी प्राणियों की देहों में आत्मा व्याप्त रहता है ॥५३॥
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सुन्दर ब्रह्म अबर्न है, ब्यापक अग्नि अबर्न । 
देह दार तें देखिये, पावक अंतहकर्न ॥५४॥
ब्रह्म अनिर्वचनीय : जैसे काष्ठ में सर्वत्र व्याप्त अग्नि का वर्णन(व्याख्यान) नहीं किया जा सकता, या उस का रूप(आकार) नहीं बताया जा सकता; परन्तु काष्ठ को देख कर ही उस का अनुमान किया जा सकता है । इसी प्रकार परमात्मा(ब्रह्म) भी अवर्णनीय(अनिर्वचनीय) है, उस का व्याख्यान नहीं किया जा सकता, न उसका रूप आदि ही बताया जा सकता है । यह तो अन्तःकरण(मन, बुद्धि चेतना एवं अहङ्कार) द्वारा ही जाना समझा जा सकता है ॥५४॥
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तेज प्रकास रु कल्पना, जब लग संग उपाधि । 
जब उपाधि सब मिटि गई, सुंदर सहज समाधि ॥५५॥
जब तक इस जीव को तेज, प्रकाश एवं कल्पना की उपाधियाँ साथ लगी हुई हैं तभी तक इस का ब्रह्म से व्यवधान प्रतीत हो रहा है । जिस दिन से उपाधियाँ मिट जायँगी, उसी दिन उस को सहज समाधि द्वारा ब्रह्म का साक्षात्कार हो जायगा ॥५५॥
(क्रमशः)

मेरी रे यहु मेरी रे

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*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*मेरी मेरी करत जग खीना, देखत ही चल जावै ।*
*काम क्रोध तृष्णा तन जालै, तातैं पार न पावै ॥*
*मूरख ममता जन्म गमावै, भूल रहे इहिं बाजी ।*
*बाजीगर को जानत नांही, जन्म गंवावै वादी ॥*
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*माया ॥*
मेरी रे यहु मेरी रे । तिहि मेरी प्रीति घणेरी रे ॥टेक॥
मेरी मेरी करतौ हार्यौ रे । मेरी राम बिसार्यौ रे ॥
मनि मेरी करि झाली रे । काहु कै संगि न चाली रे ॥ 
मेरी कौ रस चाख्यौ रे । जिहि हिरदै राम न राख्यौ रे ॥
मेरी ऊपरि मरिस्यूँ रे । तिल पाछै पाव न धरस्यूँ रे ॥
मेरी धर कारणि धारै रे । भाई कूँ भाई मारै रे ॥
मेरी जाण न देस्यूँ रे । पेटि कटारी लेस्यूँ रे ॥
मेरी मेल्हि न जास्यूँ रे । मेरी ऊपरि बिष खास्यूँ रे ॥
मेरी कौ रस मीठौ रे । बषनां जिहिं राम न दीठौ रे ॥११६॥ 
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‘यह मेरी है’. ‘यह मेरी है’, इस ‘मेरी’ से ही अत्यधिक प्रीति है, मानवमात्र की । मैं-मेरी, तू-तेरा ही माया का प्रत्यक्ष दीखने = अनुभव में आने वाला रूप है । “गो गोचर जहँ लगि मन जाई । सो सब माया जानहूँ भाई ॥“ मान-बढ़ाई, धन-दौलत माया के ही सूक्ष्म व् स्थूल रूप हैं । इन्हीं ने जागतिक प्राणियों को अपने चंगुल में उलझा रखा है । 
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जब तक मानव का इनसे रागात्मका सम्बन्ध विच्छेद नहीं होता तब तक परमात्मवबोध असंभव है । इन्हीं बातों को बषनां जी इस पद में व्याख्यायित कर रहे हैं । जीव सदैव यह मेरी है, यह मेरी है ही कहता रहता । उसने इस मेरी से ही प्रितिप्रिती अत्यधिक मात्रा में कर रखी है । मेरी-मेरी करता-करता ही एकदिन मनुष्य मरने के कगार पर पहुँचता जाता है किन्तु मेरी-मेरी से उसका पीछा छूटता नहीं है । 
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वह मेरी, मेरी से हार जाता है । परिणामस्वरूप इस मेरी-मेरी के कारण स्वस्वरूप परब्रह्म-परमात्मा-राम को भूल जाता है । मन ने सांसारिक माया-धन-संपति, विषय-भोगों को मेरे-मेरे करकर दृढ़ता के साथ पकड़ रखे हैं । उन्हें छोड़ता नहीं है । किन्तु यह माया, धन, सम्पति, विषय-भोग साथ में किसी के आज तक गये नहीं हैं । 
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जिसने इस माया का मेरी है, मेरी है करके रस चाखा है, उसने कभी भी रामजी को अपने हृदय में धारण नहीं किया है । जीव इस माय में इतना अधिक आसक्त हो जाता है कि यदि कोई उससे रंचमात्र भी लेना चाहे तो वह कहता है, यह मेरी है । यदि तुम मेरे से इसे छीन लोगे तो मैं इसके ऊपर मर जाऊंगा इसके बिना जी नहीं सकूंगा । मैं इसको तुमसे बचा लेने में तिलमात्र भी कोर-कसर नहीं छोडूंगा । राणसंग्राम में बराबरी से लडूंगा । एक पाव भी पीछे नहीं हटूंगा । इस धरती को मेरी-मेरी करके अपनी-अपनी मानते हैं और भाई से भाई लड़ता है कि यह मेरी है । 
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इस प्रकार यह मेरी धरती है । मैं इसमें से रंचमात्र भी तेरे अधिकार में न जाने दूंगा । कदाचित् चली जायेगी या तू जबरदस्ती लेने का प्रयत्न करेगा तो मैं पेट में कटारी भौंक कर मर जाऊंगा । तेरे माथे मेरी हत्या का इल्जाम व पाप आयेगा । यह संपत्ति मेरी है । मैं इसे यहाँ मेल्हि = ऐसे ही रखकर नहीं जा सकता । कदाचित तुम मेरे से इसे यही छोड़ जाने के लिये तो मैं जहर खाकर प्राण त्याग दूंगा । जिसने एक बर इस मेरी रूपी माया का रस मीठा मानकर चख लिया है उसे कभी भी रामजी में बारे में विचार करने की सूझती ही नहीं है । उसे कभी भी रामजी का साक्षात्कार नहीं होता है ॥११६॥ 

रविवार, 10 मई 2026

*१०. विरह का अंग~ ५७/५९*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*१०. विरह का अंग~ ५७/५९*
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*चकवी को चकवा मिले, बीते यामिनि१ याम२ ।* 
*रज्जब रजनी आयु बिहाई, मिले न आतम राम ॥५७॥* 
रात्रि१ की चारों पहर२ व्यतीत होने पर चकवी को तो चकवा मिल जाता है किन्तु हमारी आयु-रात्रि व्यतीत होने पर भी हमें अपने आत्मास्वरूप राम नहीं मिल नहीं मिल पा रहे हैं अत: खेद है । 
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*विरह अग्नि एकै सबहुं, हृद१ हाँडी सु अनेक ।* 
*भाव भिन्न भोजन विविध, रज्जब रंधैहिं विवेक ॥५८॥* 
हृदय१ रूप हँडिया बहुत हैं, प्रेमपात्र संबन्धी भाव रूप भोजन भी सबके विचित्र प्रकार के हैं, उन भाव-भोजनों को पकानेवाला विरह रूप अग्नि एक ही है किन्तु उन भावों को विवेकपूर्वक पका कर हरि को प्राप्त करना ही विशेषता है । 
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*एक विरह बहु भांति का, भाव भिन्न बिच होय ।* 
*रज्जब रोवे राम को, सो जन बिरला कोय ॥५९॥* 
विरह तो एक ही प्रकार का होता है किन्तु विरहीजनों के मन में प्रेम-पात्र सम्बन्धी भाव विभिन्न होते हैं अर्थात भगवद् भिन्न के भी विरही होते हैं किन्तु वह जन कोई बिरला ही होता है जो रात्रि दिन भगवान् के लिये ही रोता है ।
(क्रमशः)

२४. सांख्य ज्ञान कौ अंग ४९/५२

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२४. सांख्य ज्ञान कौ अंग ४९/५२
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बहुत सुगंध द्रुगंध करि, भरिये भाजन अंबु । 
सुन्दर सब मैं देखिये, सूरय कौ प्रतिबिंबु ॥४९॥
आत्मा की समानता : जैसे किसी पात्र में भले ही सुगन्धित जल भरा हो या किसी पात्र में दुर्गन्धमय; परन्तु दोनों में सूर्य का प्रतिबिम्ब तो समान भाव से ही दिखायी देता है ॥४९॥
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देह भेद बहु विधि भये, नाना भांति अनेक । 
सुन्दर सब मैं आतमा, बस्तु बिचारैं एक ॥५०॥ 
आत्मा की एकता : इस संसार में प्राणियों के देह विविध प्रकार के या नाना रूप में दिखायी देते हैं; परन्तु वहाँ वस्तुतत्त्व के विचार की दृष्टि से आत्मा की सत्ता सर्वत्र एक ही दिखायी देती है ॥५०॥
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तिलनि माहिं ज्यौं तेल है, सुन्दर पय मैं घीव । 
दार माहिं है अग्नि ज्यौं, देह माहिं यौं सीव ॥५१॥
आत्मा की व्यापकता : लोक में जैसे हम देखते हैं कि तिलों में तैल, दूध में घी, या काष्ठ में अग्नि सर्वत्र व्याप्त रहती है; उसी प्रकार, यह प्राणियों के देहों में यह शिवस्वरूप(मङ्गलमय) ब्रह्म सर्वत्र व्यापक है ॥५१॥
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फूल माहिं ज्यौं बासना, इक्षु माहिं रस होइ । 
देह माहि यौं आतमा, सुन्दर जानै कोइ ॥५२॥ 
या जैसे फूलों में गन्ध, ईख में रस सर्वत्र व्याप्त रहता है; उसी प्रकार इस आत्मा को भी सभी प्राणियों की देह में व्याप्त समझना चाहिये ॥५२॥
(क्रमशः)