शनिवार, 21 मार्च 2026

*७.आज्ञाकारी आज्ञा भंगी का अंग ~ ९/१२*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*७.आज्ञाकारी आज्ञा भंगी का अंग ~ ९/१२*
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*आज्ञा में अनमोल१ है, अन आज्ञा अढ़२ आघ३ ।*
*रज्जब रंग५ सु रजा४ में, विरच्यों६ बाल्हे७ बाघ८ ॥९॥*
गुरुजनों की आज्ञा में रहने से व्यक्ति अति उत्तम१ माना जाता है । आज्ञा४ में न रहने से उसकी उत्तमता३ में कमी२ आ जाती है । सम्यक आज्ञा में रहने से ही आनन्द५ मिलता है । गुरुओं की आज्ञा मानने से विरक्त६ होने पर तो बहिमुर्ख७ होकर सिंह८ के समान भय-प्रद होता है ।
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*गुरु की आज्ञा में रहै, सो शिष्य कोई एक ।*
*रज्जब रहे वन रोझ मन, आज्ञा भंग अनेक ॥१०॥*
गुरु की आज्ञा में रहने वाला शिष्य तो कोई विरला ही होता है । वन में रहने वाले रोझों के समान बहिमुर्ख मन आज्ञा भंग करने वाले, अनन्त मिलते हैं ।
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*असली आज्ञा में चलैं, बाहर धरैं न पाँव ।*
*रज्जब कपटी कम असल, खेलैं अपना दाँव ॥११॥*
सच्चे शिष्य आज्ञा में ही चलते हैं, आज्ञा के बाहर एक पैर भी चलते अर्थात कुछ भी नहीं करते । जो कपट से सच्चे बने हुये और वास्तव में झूठे, वे तो अपने स्वार्थ का दाँव खेलते हैं अर्थात स्वार्थ सिद्धि के लिए ही सब कुछ करते हैं, कल्याण के लिये कुछ नहीं ।
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*रज्जब रहिये रजा में, गुरु गोविन्द हजूर ।*
*इनकी आज्ञा मेट तैं, देखत पड़िये दूर ॥१२॥*
गुरु और गोविन्द की आज्ञा में रहोगे तभी गुरु और गोविन्द समीप रह सकोगे, इनकी आज्ञा से बाहर जाने से तो देखते ही इनसे दूर पड़ जाओगे ।
(क्रमशः)

शुक्रवार, 20 मार्च 2026

*७.आज्ञाकारी आज्ञा भंगी का अंग ~ ५/८*

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*🌷卐 सत्यराम सा 卐🌷*
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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*७.आज्ञाकारी आज्ञा भंगी का अंग ~ ५/८*
*रज्जब रमणी२ रासभा१, कपट सु कठ३ गढ़ माँहिं ।*
*शिष सिंह खात पलाइगे४, गुरु गिरि दूषण नाँहिं ॥५॥*
गधा१ काष्ठ३ के पिंजरे में है और नारी२ कपट के किले में है । यदि सिंह पिंजरे में घुसेगा१ तो उसे गधा ही खाने को मिलेगा, इसमें पर्वत का क्या दोष हे ? नहीं घुसता तब तो पर्वत में वन्य मृग मिल सकता था । वैसे ही शिष्य गुरु की आज्ञा न मानना रूप कपट-किले में घुसेगा तो उसे नारी का उपभोग ही मिलेगा । इसमें गुरु का क्या दोष है ? कपट नहीं करता, यथार्थ रूप से गुरु आज्ञा में रहता तो अवश्य ब्रह्मानंद प्राप्त होता ।
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*गुरु अगस्त उर१ चढ़त ही, शिष समुद्र नभ जाँहिं ।* 
*जन रज्जब उतरे तहाँ, सो खारे क्षिति२ माँहिं ॥६॥*
६ में आज्ञाकारी और आज्ञा भंगी का परिचय दे रहे हैं - अगस्त्य ऋषि के हृदय१ में समुद्र शोषण की बात आते ही समुद्र नभ में चला गया अर्थात सूख गया और जो जल पृथ्वी२ पर उतरा वह खारा हो गया । वैसे ही जो गुरु आज्ञा में रहते हैं, वे शिष्य तो ब्रह्म में लय हो जाते हैं, और आज्ञा में नहीं रहते वे पृथ्वी पर कामादि क्षार से युक्त होते हैं ।
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*आज्ञा भंगी मन मुखी, व्यभिचारी व्रत नाश ।*
*रज्जब रीता रती बिन, नाँहिं चरण निवास ॥७॥*
७ में आज्ञा भंगी का परिचय दे रहे हैं - गुरुजनों की आज्ञा न मानने वाला मन की इच्छा के अनुसार चलता है, सदव्रतों का नाश करके, व्यभिचारी बनता है किन्तु आज्ञा मानना रूप रती बिना भक्ति ज्ञानादि से रहित ही रहता है । प्रभु के चरणों में निवास नहीं कर सकता ।
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*आज्ञा में आगे रहैं, गुरु गोविन्द हजूर ।*
*जन रज्जब दिल दूसरे, द्वै ठाहर तैं दूर ॥८॥*
८-१२ में आज्ञाकारी तथा आज्ञा भंगी का परिचय दे रहे हैं - जो गुरुजनों की आज्ञा मानने में आगे रहता है, वह गुरु और गोविन्द के अति निकट रहता है । जिसका मन आज्ञा मानने से विमुख रहता है, वह गुरु के ज्ञान रूप स्थान से और गोविन्द के साक्षात्कार रूप स्थान से दूर ही रहता है अर्थात न उसे ज्ञान होता है और न गोविन्द मिलते हैं ।
(क्रमशः)

‘युगोत्सव’

*#daduji*
*॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥*
*॥ दादूराम~सत्यराम ॥*
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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दादूधाम में ‘सन्त साहित्य’ ~
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आपके समय में ‘युगोत्सव’ दादूजी महाराज के चार सौ १२ वर्ष होने पर मनाया गया उत्सव हुआ । जिस में राजर्षि श्री पुरुषोत्तमदास टण्डन भी पधारे थे । वह उत्सव भी नारायणा दादूधाम में आप के समय में हुआ था । प्रथम कभी नहीं हुआ था । उक्त उत्सवों के आयोजन तो दादू दयालु महासभा के द्वारा होते थे । 
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महासभा के मंत्री उस समय महामना भिषगाचार्य जयरामदासजी महाराज दादूजी के परम भक्त थे । उन्हीं के द्वारा प्रेरित होकर समाज उक्त उत्सव मनाने में तत्पर होता था । वैसे भी आपके समय में देश के महान् नेता समाज सेवी समाजवादी व विचारक  डा. राममनोहर लोहिया, हरिभाऊ  उपाध्याय, जयपुर नरेश की महाराणी गायत्री देवी आदि अनेक महानुभाव आपके समय में नारायणा दादूधाम के दर्शनार्थ आये और आचार्य प्रकाशदेव जी के दर्शन तथा सौजन्यता पूर्ण व्यवहार से सभी ही प्रसन्न होकर गये ।
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प्रकाशदेव जी की योग्यता का परिचय उच्च कोटि के संतों को तो आचार्य पद से पूर्व भी था । सुनते हैं कलकत्ता में एक दिन वैद्य कृपाराम जी भिवानी और सेवादास काले कपडे वाले एक स्थान में मिल गये थे । 
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उस समय प्रसंग वश कृपाराम ने कहा- आचार्य रामलालजी के ब्रह्मलीन होने के पश्‍चात् खालसा में गद्दी के योग्य कौन व्यक्ति है ? तब सेवादासजी ने कहा- मेरे विचार से तो एक प्रकाश ही है । इसके कुछ दिन पश्‍चात् आचार्य रामलाल जी ब्रह्मलीन हो गये और प्रकाशदेव जी को आचार्य पद पर बैठाया गया । इससे सूचित होता है कि उज्चकोटि के संत तो प्रकाशदेवजी की योग्यता को आचार्य पद प्राप्ति से पूर्व भी जानते थे ।  
(क्रमशः) 

२१. समर्थाई आश्चर्य को अंग ३७/४०

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२१. समर्थाई आश्चर्य को अंग ३७/४०
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एक सीस चहुं सीस पुनि, पंच सीस षट सीस ।
दश सिर और सहस्त्र सिर, नमत सकल जगदीस ॥३७॥
हे प्रभो ! हे जगदीश ! आप की इस असीम सामर्थ्य के प्रभाव से आप के सामने सभी अपना शिर झुकाये रहते हैं, सभी आप को दण्डवत् प्रणाम करते हैं । भले ही उन में, वह एक शिर वाला कोई बलवान् पुरुष हो या चार शिर वाला अतिशय सामर्थ्यशाली ब्रह्मा हो, या फिर दश शिर वाला महाबली रावण हो, या हजार शिर वाला शेषनाग ही क्यों न हो ! ॥३७॥
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सूरति तेरी खूब है, को करि सकै बखांन ।
बानी सुनि सुनि मोहिया, सुन्दर सकल जिहांन ॥३८॥
आप की आकृति(रूप) इतनी मनोरम एवं नयनाभिराम है कि कोई भी इस की अनुपम सुन्दरता का यथातथा वर्णन करने में कथमपि समर्थ नहीं है । आप की वाणी भी इतनी मधुर एवं प्रभावशाली है कि समस्त जगत् इसे सुनते ही मुग्ध हो जाता है ॥३८॥
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पलक मांहि परगट करै, पल मैं धरै उठाइ ।
सुन्दर तेरै ख्याल की, क्यौं करि जांनी जाइ ॥३९॥
आप के सामर्थ्य को यथार्थ रूप से कौन जान सकता है; क्योंकि आप में ही ऐसी सामर्थ्य है कि आप किसी भी अदृश्य वस्तु को क्षणमात्र में प्रत्यक्ष(प्रकट) कर सकते हैं और किसी प्रत्यक्ष दिखायी दे रही वस्तु को क्षणमात्र में लुप्त भी कर सकते हैं ॥३९॥
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ज्यौं का त्यौं ही देखिये, सुन्दर सब ब्रह्मंड ।
यह कोई जांनै नहीं, कब की मांडी मंड ॥४०॥
अतः आप के प्रति सभी श्रद्धालु जनों का यही कर्तव्य है कि वे आप के द्वारा रचित सृष्टि को उसी रूप में देखें जैसा कि आप ने उसको बनाया है; उस में कोई मीन मेष(ननु, नच, शङ्का, सन्देह) न करे । सचाई यह है कि इन में से कोई यह भी नहीं जान पाया कि आपने इस सृष्टि को कब बनाया । अतः आप के द्वारा रचित सृष्टि को अनादि मान लेने में ही हमें सुविधा है !१ ॥४०॥
(१ तु० -श्रीभगवद्‌गीता : 
आश्चर्यवत् पश्यति कश्चिदेनमाश्चर्यवद् वदति तथैव चान्यः । 
आश्चर्यवच्चैनमन्यः शृणीति श्रुत्वाप्येनं वेद न चैव कश्चित् ॥ 
- अध्याय २, श्लो० २९.)
(क्रमशः)

काति बहुड़िया सूत हजारी

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*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*एकै अक्षर पीव का, सोई सत्य करि जाण ।*
(राम नाम सतगुरु कह्या, दादू सो परवाण ॥*
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*मन ॥*
काति बहुड़िया सूत हजारी ।
तकुला कौ बलै काढ्यौ गुरि सतधारी ॥टेक॥
सूंबणि एक रु ताड़ी तीस । चरखौ भलौ घड़्यौ जगदीस ॥
चमरख दोइ र खूँटी चारि । मनसा दाँवणिं माल सँवारि ॥
सो बडी बहू नैं कातणि दीयौ । तिहि मारि ताकुलौ बाँकौ कीयौ ॥
पाछै ले ल्हौड़ी नैं दीनौं । तिहि नींठि बापुड़ी सूधौ कीनौं ॥
रहटा कौ सबद अनाहद रुणकै । राम नाम बाणी बोलै भुणकै ॥
जे कतवारी कात्यौ लोड़ै । तौ जोबनि माती तार जिनि तोड़ै ॥
सूत जुलाहा कै मनि भावै । कपड़ौ नाऊँ रामौंति पावै ।
ल्हौड़ी बहुटल कातण लागी । तौ बषनां घर की नाग्यौं भागी ॥७६॥
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बहुड़िया = जीव । सूत काति = रामनाम-स्मरण रूपी साधना कर । हजारी = जो सूत हजारों रुपयों में बिक सके । समाजशास्त्रियों के लिये यहाँ यह शब्द अत्यधिक महत्व का है । इससे ज्ञात होता है कि बषनांजी के समय में एक हजार रूपये का मूल्य = महत्व आज के करोड़ों के बराबर था ।
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कुछ समय पूर्व तक लाख का महत्व काफी था तथा व्यवहार में “लक्खा” “लखपति” जैसे शब्दों का व्यवहार उनके लिये होता था जिनकी गिनती धनिक लोगों में हुआ करती थी । ‘हजारीलाल’ नाम भी तबही प्रचलन में आया होगा जब किसी के पास हजारों रुपये रहे होंगे और उसकी गिनती धनिकों में होती रही होगी । धीरे-धीरे यह उपाधि नाम के रूप में रूढ हो गयी ।
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यहाँ हजारी से ‘बहुमूल्य’ का तात्पर्य है । तकुला = तकुआ, जिस पर कता हुआ सूत लिपटकर कूकड़ी के रूप में तैयार होता है । बल = वक्रपना = टेढापना । मन का विषयासक्त होना ही वक्र होना है । सत्स्वरूप परमत्मा में जिसकी स्थिति है ऐसे सद्गुरु महाराज ने नित्यानित्य तत्त्व का निश्चयात्मक बोध कराकर उस आसक्ति को समाप्त करवा दी ।
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तूंबणि = वह लोहे की छड़ जिस पर चरखे के दोनों चक्र घूमते हैं । यह बीच में लगी होती है तथा इतनी महत्वपूर्ण होती है कि यदि चरखे में से इसे निकाल दीया जाए तो चरखे का काम करना ही बंद हो जाए । बषनांजी ने शरीर में परिव्याप्त चैतन्य तत्व को तूंबणि माना है ।
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जब तक शरीर में चैतन्य रहता है तब तक हो शरीर की स्थिति है । अन्यथा शरीर की संज्ञा मृतक कहलाने लगती है । अतः चैतन्य का महत्त्व सर्वविदित ही है । तिस ताड़ी = चरखे में दो चक्र होते हैं । इन दोनों का निर्माण लकड़ी की जिन पट्टिकाओं से होता है वे ही ताड़ी कही जाती है इनकी संख्या बषनांजी ने तीस बताई है ।
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अष्टधा प्रकृति = प्रकृति, महतत्व, अहंकार, पंचमहाभूत; पंच तन्मात्रा, पंच ज्ञानेन्द्रिय, पंच कर्मेन्द्रिय उभयात्मक मन, पंच विषय = शब्द स्पर्श, रस गंध तथा प्राण । इन सभी का संघात शरीर है । इस चरखे रूपी शरीर के लिये रर ममा = राम रूपी दो चमरख तथा वैखरी, मध्यमा, पश्यंती, परा नामक चार वाणी अथवा, वैराग्य, भक्ति, ध्यान व ज्ञान रूपी चार खूँटियों का निर्माण जगदीश ने किया है ।
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मनसा = वृत्ति । दावणिं = चरखे के दोनों चक्रों को क्रौस रूप में सूत की मोटी रस्सी से बांधकर एक करते हैं उसे दाँवणि कहते हैं । जिस प्रकार पैरों की ओर खाट में दाँवण होती है । माल = सूत के धागे की रस्सी जो दांवण के ऊपर चढ़ी रहती है तथा जिसका संबंध तकुवे से भी होता है । जैसे-जैसे हत्थे को घुमाया जाता है, चक्र घूमते हैं । चक्र के साथ-साथ माल(वैल्ट) भी घूमती है जो तकुवे को भी घुमाती है जिससे सूत का निर्माण होता है ।
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यहाँ मनसा = वृत्ति को दांवण माना है । बड़ी बहू = बिगड़ैल वृत्ति, कुसंसस्कारी वृत्ति । बाँकौ = विषयासक्ति किया । ल्हौड़ी = छोटी = भगवद् उन्मुख वृत्ति । नींठ = मुश्किल से “असंशयं महावाहो मनोदुर्निग्रहंचलं ॥ अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते ॥
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बापुड़ी = बेचारी = वृत्ति । सूधौ = भगवदुन्मुख । रहटा = रटन = निरंतर राम नाम का स्मरण । अनाहद = बिना सीमा के, निरंतर । रुणकै = भगवन्नाम जप होता है । झुणकै = गुंजारित होती है । कतवारी = सूत कातने वाली, वृत्ति । कात्यौ = चरखा । लोड़ै = घुमावे अर्थात् साधना करे । जोवनमाती = साधनारत । तार = लय = साधना । जिनि = नहीं । टल = बचकर = विषयों से टलकर । नांग्यौ = जन्म-मरण रूपी नादारी = गरीबी = दुःख ।
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इस पद में मन की वृत्ति को लक्ष्य किया गया है । वस्तुतः जीव जैसे कर्म करता है, उन कर्मों के सूक्ष्म संस्कार मन पर वैसे ही जमा होते हैं । जैसे संस्कार होते हैं, व्यक्ति बलात् वैसे ही कर्म करने को पुनः प्रेरित होता है यह चक्र चलता रहता है । इसीलिए कहा गया है, मन ही मनुष्य को डुबोता तथा मन ही मनुष्य को तारता है । “मन एवं मनुष्याणां कारणं बन्ध मोक्षयो” इन्हीं विचारों को बषनांजी ने चरखे, कातने वाली कतवारी आदि को प्रतीक बनाकर व्यक्त किये है ॥
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जगदीश ने तीस तत्वों को मिलाकर मनुष्य शरीर बनाया है जो अत्यन्त भला = उत्तम है क्योंकि इसमें वह स्वयं अपने अंश के रूप में निवास करता है । “ईश्वर अंस जीव अविनासी । चेतन अमल सहज सुखरासी ॥” अतः हे जीव ! तू ऐसा भजनकर जो तुझे तेरे अंशी स्वरूप परमात्मा से मिलाकर तेरा उससे एकाकार करा दे ।
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इसमें सतस्वरुप परमात्मा का अपरोक्ष प्राप्त सद्गुरु महाराज तेरे मन में अनेकों जन्मों की जमा विषयासक्ति को मिटाकर सहायता करेंगे । परमात्मा ने तुझे उसको प्राप्त करने के लिये ‘ररा’ ‘ममा’ = राम नामक दो चमरख तथा राम नाम की रटने के लिये चार प्रकार की वाणी रूपी चार खूँटिया प्रदान की हैं । अतः मनसा = वृत्ति रुपी दाँवण तथा माल को संभाल कर रख ।
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निश्चय ही तुझे तेरे अंशी स्वरूप परमात्मा की प्राप्ति हो जायेगी । वस्तुतः परमात्मा स्वरूप आत्मा मिलता नहीं है क्योंकि वह परमात्मा आत्मा के अतिरिक्त और कोई दूसरा तत्व नहीं है । प्राप्ति दूसरे की होती है जबकि बोध स्वयं का होता है । अतः आत्मा स्वरूप परमात्मा का बोध ही होता है । जीव ने सर्वप्रथम साधना रूपी सूत कातने को चरखा रूपी शरीर बड़ी बहु = संसारासक्त मन को दिया । उसने जीव को और अधिक विषयी बना दिया ।
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तत्पश्चात् जीव ने छोटी बहुरूपी परमात्मोन्मुख मन की वृत्ति को शरीर रूपी चरखा राम-नाम की साधना रूपी सूत कातने को दिया । उसने विषयासक्त मन को बहुत ही मुश्किल से विषयों से हटाकर परमात्मोन्मुख किया । परिणामस्वरूप रटन = स्मरण के दौरान रामनाम रूपी शब्द निस्सीम रूप में रुणकने = ध्वनि करने लगा । वाणी से रामनाम की अनवरत झंकार होने लगी । पुनः सावधान करते हुए कहते हैं, हे साधक ! एक बार साधना में लग जाने के उपरान्त साधना को बीच में ही मत छोड़ देना ।
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“निज सरूप निरखै नहीं, जब लग राम पुकारि । रामचरण घर क्यूँ लहै, जो पँथ मैं बैठे हारि ॥” यदि साधना पूरे जोश के साथ अनवरत करते रहोगे तो तुम्हारी साधना रूपी सूत परमात्मा रूपी जुलाहे को पसन्द आ जायेगा और वह तुम्हारा नाम अपने भक्तों में शुमार कर लेगा । तुम्हारा नाम “रामौती” रामजी का दास रख देगा, हो जायेगा । जबसे परमात्मोन्मुख वृत्ति रूपी छोटी बहु परमात्मा की भक्ति करने लगी तब ही से विषयों में आसक्ति रूपी गरीबी मिट गई और आमदनी रूपी परमात्मा से समीपता होने लगी ॥७६॥

दादूधाम में ‘सन्त साहित्य’ ~

*#daduji*
*॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥*
*॥ दादूराम~सत्यराम ॥*
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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दादूधाम में ‘सन्त साहित्य’ ~
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उसी दिन मेरा लिखित ‘‘संत सुन्दरदासजी और उनकी वाणी’’ पद्यात्मक  निबन्ध भी विनोबा भावे आदि के सामने मेरे द्वारा पढा गया । उसमें २५ पद्य थे और १८ शीर्षक थे - ‘प्रणति’ १ मनहर । ‘बाल कवि’ १ दोहा । ‘हंस कवि’ दो मनहर । ‘कलाकार’ एक  मनहर । ‘काव्य किला’ एक  मनहर । ‘सिद्ध सिरताज’ एक मनहर । ‘सवैया सरित’ एक  मनहर । ‘सुन्दर सरोज’ एक मनहर । ‘गुरु भक्ति ’ एक रोलाछंद । ‘ईश्‍वर भक्ति ’ एक चौपाई । ‘योग साधन’ एक चौपाई । ‘विद्वता’ एक मनहर । ‘संत शिरोमणि’ एक दोहा । ‘सुन्दर शिक्षा’ एक किरीट सवैया । ‘संबन्ध से इतने धन्य’ एक रोलाछंद । ख्वाणी’ चार मनहर । ‘लेखक का वाणी प्रेम’ एक जलहरन कवित्त । ‘उपसंहार’ चार दोहे थे । 
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अन्त में विनोबा भावे का ओज पूर्ण सुन्दर भाषण हुआ । आज नारायणा तथा आस पास के ग्रामों से लोग भी विनोबा भावे आदि संतों के दर्शन और सत्संग के लिये बहुत आये थे । आज की सभा का कार्य बहुत सुन्दर रहा । दूसरे दिन कार्तिक शु. ९ को सभा कार्य संत साहित्य के प्रेमी वियोगी हरिजी के सभापतित्व में आरंभ हुआ । आज भी अनेक विद्वानों के सुन्दरदासजी तथा उनकी रचनाओं की विशेषताओं की महत्ता का द्योतक सभापति का भाषण हुआ । 
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दोनों दिनों के सभी भाषण सुन्दरदास जी के व्यक्तित्व तथा उनकी रचना के महत्व को बताने वाले होने से सब को ही प्रिय हुये थे । आचार्य प्रकाशदेव जी महाराज के समय ‘सुन्दर जयन्ती’ उत्सव भी एक विशेष महत्व का उत्सव था । उस उत्सव में आने वाले अन्य समाजों के महानुभाव भी आचार्य जी की सौम्य मूर्ति का दर्शन करके अति प्रसन्न हुये थे । 
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आचार्य प्रकाशदेवजी के समय में ही नारायणा दादूधाम के दादू मंदिर को अधिक सुन्दर बनाने का कार्य संपन्न हुआ । जिसकी बाह्य शोभा को देखकर ही दर्शक लोग अति प्रसन्न हो जाते हैं । नारायणा दादूधाम में ‘सन्त साहित्य’ व कलात्मक  संग्रह का कार्य भी आचार्य प्रकाशदेव जी महाराज के समय में ही हुआ । 
(क्रमशः) 

२१. समर्थाई आश्चर्य को अंग ३३/३६

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२१. समर्थाई आश्चर्य को अंग ३३/३६
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उभै बाहु चहु बाहु पुनि, अष्ट बाहु भुज बीस । 
सहस्त्र बाहु नहिं लिखि सकै, सुन्दर गुन जगदीस ॥३३॥
हे जगदीश्वर प्रभो ! आपका गुणानुवाद(महिमागान) कोई मनुष्य(उभयबाहु = दो भुजाओं वाला), या देव(चतुर्बाहु), या देवी(अष्टभुजा), या रावण(बीस बाहु वाला), या(सहस्रबाहु) अर्जुन भी लिखने में पूर्णतः समर्थ नहीं है ॥३३॥
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एकानन चतुराननं, पंचानन षटगीस । 
दश सहस्त्रानन कहि थके, सुन्दर गुनि जगदीस ॥३४॥
इसी प्रकार कोई एक मुख वाला(मनुष्य), या चार मुख वाला(ब्रह्मा), या पाँच मुख वाला(महादेव) या छह मुख वाला(षटगीस कार्तिकेय), या दश मुख वाला(रावण), या सहस्रमुख वाला(शेषनाग) भी आपके महिमागान में समर्थ नहीं हुआ । इन के सम्मुख मुझ अकिञ्चन भक्त सुन्दरदास की तो कथा ही क्या है ! ॥३४॥
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उभै अष्ट दश द्वादशा, अरु कहिये पुनि बीस । 
द्वै सहस्त्र लोचन थके, सुन्दर ब्रह्म न दोस ॥३५॥
इसी प्रकार, दो नेत्रों वाला कोई मनुष्य या आठ नेत्रों वाला ब्रह्मा, या दश नेत्रों वाला महादेव, बारह नेत्रों वाला कार्तिकेय, या बीस नेत्रों वाला रावण एवं दो हजार नेत्रों वाला शेषनाग भी साधना(कठोर तपस्या) करते करते थक गया; परन्तु वह भी आप निरञ्जन निराकार प्रभु का यथार्थतः गुणगान नहीं कर पाया ॥३५॥
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एक रसन चहुं रसन पुनि, पंच षष्ट दश आहि । 
द्वै सहस्त्र सुनि सेस के, बरनि सकै नहिं ताहि ॥३६॥
इसी प्रकार, कोई एक जिह्वा वाला मनुष्य, चार जिह्वा वाला ब्रह्मा, पाँच जिह्वा बाला महादेव, छह जिह्वा वाला कार्तिकेय, दश जिह्वा वाला रावण या दो हजार जिह्वा वाला शेषनाग भी आप का यथार्थतः वर्णन नहीं कर सकता ॥३६॥
(क्रमशः)

*साधु-जोगी ॥*

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*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*दादू जे तूं जोगी गुरुमुखी, तो लेना तत्त्व विचार ।*
*गह आयुध गुरु ज्ञान का, काल पुरुष को मार ॥*
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*साधु-जोगी ॥*
सो जोगी बैरागी रे । जाकै अंगि बिभूति न लागी रे ॥टेक॥
जिनि जोग लियौ मन माहीं रे । माटी की मुद्रा नाहीं रे ॥
तिहि सँगि जोगणि बाली रे । सो रुणझुण कीगरि वाली रे ॥
नाद बजावै लावै ताली रे । जोगी की जुगति निराली रे ॥
एक अबिनासी ब्रतधारी रे । तिहिं कै आगै मढी हमारी रे ॥
तहाँ अणभै भिख्या कूँ धावै रे । बषनौं जहाँ अलख जगावै रे ॥७५॥
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वही वैराग्यवान योगी है, जिसके शरीर पर, मन पर माया रूपी विभूति = भस्म न लगी हो । ऐसे योगी कपड़े पहनकर योगी नहीं बनते बल्कि मन से समस्त रागों को निकाल कर योग धारण करते हैं । ये योगी कानों में मिट्टी की मुद्रा नहीं पहनते । ये तो निरन्तर अनहदनाद श्रवण रूपी मुद्राएँ कानों में धारण करते हैं ।
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बाली = युवावस्थायुक्त = प्रतिक्षण वर्धमान अनन्यप्रेम युक्त रामनाम स्मरण रूपी भक्ति में निमग्न जोगणि = योगिनी रूपी सुरति = चित्तवृत्ति इन योगियों के साथ रहती है । वह सुरति रामनाम स्मरण धीमी-धीमी पायल की सी ध्वनि से युक्त हुई करती है । “आसण अडिग जमाय कै, कह सास उसासाँ राम । अपणाँ ही श्रवणाँ सुणैं, तब सुरति रहै इक ठाम ॥ दूजा कोई ना सुणैं, भल बैठ्या रहौ पास । रामचरण ई रैस सूँ, दृढ़ता गह्या उपास ॥” परिणामस्वरूप तालयुक्त अनहदनाद बजता है और योगी उसको सुनकर उसमें निमग्न हो जाता है ।
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वास्तव में योगी की युक्तियाँ = जीवनशैली सामान्यजनों से सर्वथा निराली = विलक्षण = न्यारी है । ये योगी मात्र एक अविनाशी परमात्मा की ही उपासना करने के व्रत को धारण करने वाले होते हैं । जिस स्थान पर इन योगियों के रहने की कुटिया है अर्थात् जिस सहजावस्था में ये निवास करते हैं, उसी के आगे = सामने = सदृश ही हमारा (मुझ बषनां की) कुटिया = लक्ष्य है । उस कुटिया पर अणभै भिक्षा = अपरोक्षसाक्षात्कार प्राप्त करने को ही मैं धावै = जाता हूँ, प्रयत्न करता हूँ । मैं बषनां साधना करके उसी स्थान पर अलख जगाता हूँ = परमात्मा स्वरूप आत्मा का अपरोक्ष करता हूँ ॥७५॥

गुरुवार, 19 मार्च 2026

*७.आज्ञाकारी आज्ञा भंगी का अंग ~ १/४*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*७.आज्ञाकारी आज्ञा भंगी का अंग ~ १/४*
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गुरु मुख कसौटी अंग के अनन्तर गुरुजनों की आज्ञा मानने वालों और न मानने वालों का परिचय देने के लिये तथा आज्ञा मानने न मानने से होने वाले लाभ-हानि का प्रदर्शन करने के लिये आज्ञाकारी आज्ञा भंग का अंग कह रहे हैं -
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आज्ञा गुरु गेविन्द को, चलै सु चेला चार ।
रज्जब रम१ तों२ मन मुखी, पग पग पूरी मार ॥१॥
१-३ में आज्ञाकारी, आज्ञा भंगी का परिचय दे रहे हैं - गुरु की आज्ञा में शिष्य व गोविन्द की आज्ञा में दास चलते हैं तब तो आनन्द रहता है और मन की इच्छानुसार चलने१ से२ पद-पद पर चिन्ता, काम, क्रोधादि की खूब मार खानी पड़ती है ।
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आज्ञा में आतम रहै, आज्ञा भाने भंग ।
रज्जब सगुरा सीख में, निगुरा अपने रंग१ ॥२॥
गुरुजनों की आज्ञा पालन करने से जीवात्मा जन्मादि संसार में भ्रमण करने से रुक जाता है । आज्ञा न मानने से बारंबार मरता है । जिसको गुरु प्राप्त हुआ है, वही श्रेष्ठ शिक्षा द्वारा आज्ञा में रहता है । जिसे गुरु नहीं मिला वह अपनी वासना१ के अनुसार चलता है ।
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पिता पूत नर नारि के, गुरु शिष आज्ञा रंग ।
रज्जब राजा चाकर हु, हुक्म हते मन भंग ॥३॥
पिता की आज्ञा में पुत्र, पति की आज्ञा में पत्नी, गुरु की आज्ञा में शिष्य, राजा की आज्ञा में सेवक रहते हैं, तब आनन्द रहता है । आज्ञा न मानने से पितादि के मन का प्रेम पुत्रादि से टूट जाता है ।
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सद्गुरु सरवर क्या करै, जे शिष सफरी१ मन खोट ।
रज्जब बंसी२ वाम३ लग, खेंच लई यम चोट ॥४॥
४-५ में आज्ञा न मानने वाले का परिचय दे रहे हैं - जब मच्छी१ स्वयं ही अपने मन के लालच रूप दोष से काँटे२ को जा पकड़े तब सरोवर क्या करे ? फिर तो पकड़ने वाला खेंचकर सरोवर के बाहर ले आता है और वह मर जाती है । वैसे ही शिष्य भी गुरु-आज्ञा न मान कर स्वयं ही पर नारी३ में आसक्त होता है तब सद्गुरु क्या करे ? फिर तो यातना भोगेगा ही ।
(क्रमशः)

बुधवार, 18 मार्च 2026

सुन्दर जयन्ती ~

*#daduji*
*॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥*
*॥ दादूराम~सत्यराम ॥*
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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१८ आचार्य प्रकाशदेव जी ~
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आचार्य प्रकाशदेव जी महाराज का जीवन आचार्य पद से पूर्व भी भजन साधन में ही व्यतीत हुआ था । आप बाल ब्रह्मचारी थे । छोटी अवस्था में दीक्षित हो गये थे और दादू मंदिर के पुजारी थे । अत: इन का कार्य साधन रुप ही था । आचार्य पद पर विराजने पर आपके तप त्याग, साधुता आदि विशेषताओं का विशेष परिचय समय समय पर समाज को मिलने लगा । उस से समाज की आप पर अटूट श्रद्धा हो गई । समाज में सुख शांति का विस्तार हुआ ।
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आपकी कोमलता और सद्व्यवहार परम श्‍लाघनीय था । आपके पास महन्त, सन्त, सामान्य साधु नेता, राज्य के अधिकारी व सेवक जो भी आते थे आप उनका अधिकारानुसार समादर करते थे । एक बार जो आपके पास आ जाता था, उसकी इच्छा बारंबार आपके पा आने की होती थी । आप की साधुता सौम्यता में ऐसा विचित्र आकर्षण था कि आपके दर्शन सत्संग से सबको यही अनुभव होता था - कि ये तो मेरे परम हितेषी हैं । सभी आपके दर्शन तथा सत्संग से परम प्रसन्न होते थे और अपना परम सौभाग्य समझते थे ।
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सुन्दर जयन्ती ~
आपके आचार्य काल वि. सं. २००५ के कार्तिक शुक्ला ८ व ९ को नारायणा दादूधाम में दादूजी महाराज के सुयोग्य शिष्य राजस्थान के परम प्रधान संतकवि स्वामी सुन्दरदासजी का जयन्ती उत्सव भी दादू पंथी समाज ने मनाया था ।
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इस ‘सुन्दर जयन्ती’ उत्सव में अन्य समाजों के महानुभाव भी पधारे थे । उत्सव के प्रथम दिन कार्तिक शुक्ल ८ को महात्मा विनोबा भावे के सभापतित्व में महामंडलेश्‍वर असंगानन्दजी उदासीन आदि विद्वानों के भाषण महाकवि सुन्दरदासजी की विशेषताओं को लक्ष्य करके हुये थे ।
(क्रमशः)

२१. समर्थाई आश्चर्य को अंग २९/३२

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२१. समर्थाई आश्चर्य को अंग २९/३२
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आज्ञा मांहीं लच्छमी, ठाढी है कर जोरि । 
सुन्दर प्रभु सनमुख रहै, दृष्टि सकै नहिं चोरि ॥२९॥
धन की देवी लक्ष्मी भी उन प्रभु के सम्मुख आज्ञापालन - हेतु उन के सम्मुख हाथ जोड़कर खड़ी रहती है । वह इस अज्ञापालन में कभी आँख नहीं चुरातीं (आज्ञापालन से मुख नहीं मोड़तीं) ॥२९॥
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आज्ञा मांहैं तत्व सब, होइ देह कौ संग । 
सुन्दर बहुरि जुदे रहैं, आज्ञा करै न भंग ॥३०॥
'पञ्चतत्त्व' या 'पञ्च महाभूत' कहलाने वाले पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु एवं आकाश, उन महाप्रभु के आदेश से, प्राणियों के देह में सङ्घात रूप से एकत्र होते हैं । तथा उन का जब आदेश होता है तो वे उस देह को छोड़कर यथास्थान चले जाते हैं । वे उस महाप्रभु की आज्ञा कभी भङ्ग नहीं करते ॥३०॥
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आज्ञा मांहैं रहत हैं, सप्त दीप नौ खंड । 
सुन्दर प्रभु की त्रास तें, कंपै सब ब्रह्मंड ॥३१॥
सप्तद्वीप - जम्बुद्वीप, शाकद्वीप, सूक्ष्मद्वीप, क्रौञ्चद्वीप, गोमयद्वीप, श्वेतद्वीप एवं लक्षद्वीप एवं नव खण्ड(पृथ्वी के नौ भाग) - भारत, इलावृत्त, किम्पुरुष, भद्र, केतुमाल, हरि, हरिण्य, रम्य एवं कुश - ये सभी उस प्रभु की आज्ञा में रहते हैं । संक्षेप में यह कह सकते हैं कि यह समस्त संसार(ब्रह्माण्ड) उस प्रभु के भय से काँपता रहता है(कि वे रुष्ट न हो जायँ) ॥३१॥
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ऐसै प्रभु की त्रास तें, कंपै सब ही लोक । 
बार बार करि कहत हैं, सुन्दर तुम कौं धोक ॥३२॥
ऐसे आप सर्वशक्तिसम्पन्न उस निरञ्जन निराकार प्रभु के क्रोध से सभी संसारी जीव भय मानते हैं; अतः हे प्रभो ! आप का परम भक्त यह सुन्दरदास आप को बार बार प्रणाम(= धोक) करता है ॥३२॥
(क्रमशः) 

*विरह, आत्मसाक्षात्कार ॥*

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*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*अति आतुर ये खोजत डोलैं,*
*बान परी वियोगिनि बोलैं ॥*
*सब हम नारी दादू दीन,*
*दे सुहाग काहू संग लीन ॥*
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*विरह, आत्मसाक्षात्कार ॥* 
आपणा रमइया कारणि, जोगणि ह्वै हूँ रे ।
पहिरूँ रे भसमी मुद्राली, बनखँडि जैहूँ रे ॥टेक॥
बिरह बिभूति भई तनि मेरै, सींगी सुरति हमारै रे ।
बैरागनि ह्वै वनखँडि जैहूँ, दरसन काज तुम्हारै रे ॥
सोइ बैराग एकटक आगैं, पलभरि पलक न लागै रे ।
रावल कै कारणि रौलानी, चेतनि पहरै जागै रे ॥
ग्यानि गुफा मैं रहणि हमारी, उनमनि ताली लाऊँ रे ।
अनहद बाजे बाजैं रावल, कींगरड़ी झुणकाऊँ रे ॥
अणभै भिख्या घर अबिनासी, चल तहाँ करै प्रवेसा रे ।
बषनां दरसन देषि करीजै, वा आइस कौं आदेसा रे ॥
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अपनी भावना व्यक्त करते हुए बषनांजी कहते हैं । मैं अपने प्रियतम रमैयाराम को प्राप्त करने के लिये योगियों की भस्म, मुद्रा, सींगी, सेली आदि लगाकर व पहनकर योगिनी बनूंगी । मैं शरीर पर भस्म लगाऊंगी, कानों में मुद्रा पहनूंगी तथा प्रियतम को रिझाने के लिये एकान्त बनखंड में चली जाऊंगी । 
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परम प्रियतम के अमिलन से उत्पन्न चित्त में आकुलता-व्याकुलता रूपी विरह की भस्म ही मेरे शरीर पर रमी होगी । चित्त की वृत्ति = सुरति का प्रियतम से सदैव तादात्म्य ही गले में लटकने वाली सींगी होगी । प्रियतम का सदैव नाम श्रवण ही कानों मुद्रा होगी । संसार तथा संसार के समस्त पदार्थों, सुखों से तन और मन से अनासक्ति रूपी वनखंड में निवास करने को जाउंगी । 
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यह सब मैं इसलिये करूंगी कि हे प्रियतम ! आपके दर्शन हो जाएँ, आपसे मेरा चिरसंयोग हो जाये । इस एकान्तिकी, अनन्य वैराग्य के सामने एक पल के लिये भी मेरी आँखों की पलकें नीचे को नहीं गिरेंगी । क्योंकि आप रावल(योगियों का एक भेद) के कारण मैं रौलानी = जोगन पूर्ण सावधान होकर(चेतनि) आपके जाने के रास्ते में पहरा देती रहूंगी । अर्थात् मैं अपलक जागकर आपके आने की, दर्शन देने की प्रतिक्षा करूंगी । 
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इस समय मेरी रहनी = दिनचर्या = क्रियाकलाप ज्ञानमय होंगे । (आत्मा अपने आपको परमात्मा जानकर परमात्मा ही अनुभव करे, दोनों को एक अनुभव करे, यही ज्ञान है । गुफा = आवरण । यहाँ ‘ज्ञान के आश्रय में’ से तात्पर्य है । अर्थात् इस समय मेरे सारे क्रियाकलाप ज्ञानमय होंगे) तथा मैं उनमनि = सहजावस्था = निर्विकल्प समाधि अवस्था से ताली = सम्बन्ध स्थापित कर लूंगी अर्थात् समस्त द्वन्द्वों से अतीत होकर निर्विकल्प सहजावस्था में स्थिर हो जाऊंगी । 
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इस समय रावल = परमप्रियतम अनहदनाद रूपी बाजे के रूप में तथा मैं पायल की झुनकार के रूप में बजूंगी अर्थात् हम दोनों इस अवस्था में दो न रहकर एक नाद स्वरूप हो जायेंगे । पाठकों को ज्ञात हो, ब्रह्मरंध्र में जब शब्द-सुरति का एकाकार होता है तब वहाँ परमप्रकाश हो जाता है तथा अनहदनाद होता है । वहाँ मूर्ति, आकृति आदि कुछ नहीं होती । 
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सुषुम्ना से अमृत की धारा का प्रवाह भी यहाँ अनवरत चलता रहता है । “स्त्रवै सुषुम्ना नीर फुवारा । सुन्य सिखर का यह व्यवहारा ॥” बषनांजी अपने आपको संबोधित करते हुए कहते हैं, अब हमें चलकर अविनाशी परमात्मा के घर में प्रवेश करना चाहिये जहाँ उसकी अणभै = अपरोक्ष साक्षात्कार रूपी भिक्षा मिलती है । उस आइस = योगी = परमप्रियतम का दर्शन = अपरोक्ष साक्षात्कार प्राप्त करके उसका अभिवादन करूंगा ॥७४॥

*६. गुरु मुख कसौटी का अंग ~ २५/२९*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*६. गुरु मुख कसौटी का अंग ~ २५/२९*
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*ध्यान१ धनुष गहि सद्गुरु, मारैं वायक२ बाण ।*
*रज्जब सावज३ शर सहित, पड़े परस्पर आण ॥२५॥*
सद्गुरु हृदय-हाथ में विचार१-धनुष लेकर अर्थात अन्त:करण में साधकों के कल्याण को विचार करके साधक-शिकार२ के वचन३-बाण मारते हैं, तब अनेक शिष्य रूप शिकार परस्पर मिलकर वचन-बाण के सहित गुरु के चरणों में आ पड़ते हैं अर्थात वचनों को विचारते हुये गुरुदेव के पास आते हैं ।
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*रज्जब भलका१ भाव का, साँटी२ शब्द सु लाय ।*
*काबिज३ गुरु कमान५ गहि४, मार्या तीर चलाय ॥२६॥*
साधकों का कल्याण करने का विचार रूप धनुष४ ग्रहण३ करने वाले गुरु ने शब्द रूपी लचीली लकड़ी२ पर भाव रूप भल्ल१ लगाकर तैयार किये हुये बाण को उठाया५ और उक्त धनुष पर चढ़ाकर वह तीर साधक-हृदय के मोह-मृग पर मार दिया, मोह नष्ट होते ही साधक का कल्याण हो जाता है ।
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*सद्गुरु शब्द सु मार शर, जो फोड़े त्रयलोक ।*
*रज्जब छेदैं सकल गुण, अइया१ पैनी२ नोक३ ॥२७॥*
जो तीनों लोकों में स्थित साधकों के अज्ञान को तोड़ता है वा अज्ञान नाश द्वारा स्थूल, सूक्ष्म, कारण शरीर रूप तीनों लोकों का अभाव करता है, ऐसा सुन्दर-शब्द रूप बाण मारकर सद्गुरु, शिष्यों के सभी दोष रूप गुणों को नष्ट करके उनकी वृत्ति निर्गुण ब्रह्म में स्थित करते हैं । सद्गुरु के शब्द-बाण का अग्र३ भाग ऐसा१ ही तीखा२ है ।
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*रज्जब रूचे सु रोष रस, सद्गुरु पारस बैन ।*
*प्राणी पलटै लोह ज्यों, लागे कंचन ऐन ॥२८॥*
लोहा पारस की टक्कर लगते ही अपनी पूर्व स्थिति से बदल कर साक्षात् स्वर्ण ही हो जाता है, अत: पारस की टक्कर भी लोह के लिये सुन्दर सिद्ध होती है । वैसे ही सद्गुरु के रोष पूर्ण वचन भी रस-रूप ही भासते हैं, कारण-उनसे प्राणी का हृदय बदल कर ब्रह्म का साक्षात्कार हो जाता है, अत: वे रुचिकर ही सिद्ध होते हैं ।
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*शिष लोहा पारस गुरु, सज्यौं त्यों राम मिलाव ।*
*रज्जब भवै रोष रस, परसे कंचन भाव१ ॥२९॥*
जैसे पारस की टक्कर भी लोह को स्वर्ण की आकृति१ में बदल देती है । वैसे ही सद्गुरु के रोषपूर्ण वचन भी प्राणी को राम से मिलाकर पूर्वावस्था से बदल देते हैं, अत: रस रूप ही भासते हैं और सभी साधकों को प्रिय लगते हैं ।
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इति श्री रज्जब गिरार्थ प्रकाशिका सहित “६. गुरु मुख कसौटी का अंग” समाप्त ॥
‬‬‬‬‬‬‬‬‬‬‬‬‬‬‬‬‬‬‬‬‬‬‬‬‬‬‬‬‬‬‬‬‬‬‬‬‬‬‬‬‬‬‬‬‬‬‬‬‬‬‬‬‬‬‬‬‬‬‬‬‬‬‬‬‬‬‬‬‬‬‬‬‬‬‬‬‬‬‬‬‬‬‬‬‬‬‬‬‬‬‬(क्रमशः)

१८ आचार्य प्रकाशदेव जी ~

*#daduji*
*॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥*
*॥ दादूराम~सत्यराम ॥*
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
अथ अध्याय १५ ~ 
१८ आचार्य प्रकाशदेव जी ~ 
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प्रकाशदेवजी प्रथम पुजारी थे और आचार्यजी के प्रशिष्य थे । जब आचार्य रामलाल जी महाराज ब्रह्मलीन हो गये तब समाज ने प्रकाशदेव जी की गद्दी के योग्य अधिकारी समझ कर वि. सं. २००१ आश्‍विन कृष्ण ११ को आचार्य गद्दी पर विराज मान कर दिया । आचार्य प्रकाशदेव जी महाराज के गद्दी पर विराजने के पश्‍चात् मेरे मुख से भी यह मनहर छंद निकला था-
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पूषण प्रकाश सा प्रकाश राजे पाट पर,
यही वरदान दादूदेव हमें दीजिये ॥
पंथ पाथ - निधि संत पद्म फूलें पेखकर, 
 गुण गंध शत गुण फैले अस कीजिये ॥
 कुगुण कुमुद कुम्हलावें औ पलावे भेद, 
 भ्रमर विवेक थिरताई भल दीजिये ॥
 बावन ही घाट पर आतम विचार पाथ, 
 विश्‍व जीव पीय के अघावें कृपा कीजिये ॥१॥
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अर्थात्- हे दादूदेव दयालु जी ! हमें यही वरदान दें कि - आचार्य प्रकाशदेव जी महाराज आपकी गद्दी पर विराजकर पूषण(सूर्य) प्रकाश के समान ज्ञान प्रकाश प्रदान करें । जैसे सूर्यप्रकाश से सरोवर के कमल खिल जाते हैं, वैसे ही दादू पंथरुप सरोवर के संत रुप कमल आचार्य प्रकाशदेव जी के ज्ञान प्रकाश को देखकर खिल जायें अर्थात् पूर्ण संतत्व को प्राप्त हो जायें । 
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और जैसे कमलों के फूलने पर उनकी गंध फैल कर लोकों को सुख प्रदान करती है, वैसे ही संतों के विचारादि दैवी गुण अधिक लोक कल्याण में सहायक हों, ऐसी व्यवस्था कर दीजिये । और जैसे सूर्य के प्रकाश से चन्द्रमुखी कमल कुम्हला जाते हैं, वैसे ही आचार्य प्रकाशदेव जी के ज्ञान प्रकाश से संतों के हृदय के आसुर गुण कमजोर होकर नष्ट हो जायें और भेद - भ्रांति भाग जाय । 
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जैसे खिले हुये कमलों पर भ्रमर स्थिरता पूर्वक मडराते हैं, वैसे ही संतों के हृदय में विवेक आदि को भली भांति स्थिर कर दीजिये । जैसे सरोवर के जल का पान करके जगत के सभी प्राणी प्यास बुझा कर तृप्त होते हैं, वैसे ही दादू पंथ रुप सरोवर के ५२ थांभे रुप घाटों पर जगत के संपूर्ण मानव प्राणी आत्म विचार(ब्रह्मज्ञान) रुप सुधा पान करके तृप्त होते रहें, ऐसी कृपा अवश्य कीजिये । 
(क्रमशः)

मंगलवार, 17 मार्च 2026

२१. समर्थाई आश्चर्य को अंग २५/२८

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२१. समर्थाई आश्चर्य को अंग २५/२८
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जाकी आज्ञा मैं रहै, सुन्दर सप्त समुंद्र । 
सबही मांनहिं त्रास कौं, देवन सहित पुरंद्र ॥२१॥ 
अधिक क्या कहें, संसार के सातों समुद्र भी इन प्रभु के वशवर्ती(आज्ञाकारी) हैं । सभी देवता तथा उनके स्वामी इन्द्र भी उन प्रभु का भय एवं सङ्कोच मानते हैं ॥२१॥
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जाकी आज्ञा मैं रहै, ब्रह्मा विष्णु महेस । 
सुन्दर अवनि अनादि की, धारि रहे सिर सेस ॥२२॥
देवताओं में श्रेष्ठ तीनों देव - ब्रह्मा, विष्णु एवं शिव भी इन निरञ्जन निराकार प्रभु की आज्ञा के पालन में अपना गौरव समझते हैं । यदि पुराण शास्त्र की बात मानी जाय तो सहस्रमुख शेषनाग अनादि काल से प्रभु का आदेश मान कर इस समस्त पृथ्वी का भार अपने शिर पर ढो रहे हैं ॥२२॥

सुन्दर आज्ञा मैं रहै, काल कर्म जमदूत । 
गण गंधर्व निशाचरा, और जहां लगि भूत ॥२३॥
महाराज श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - जगत् के सञ्चालक काल एवं कर्म तथा यमराज(धर्मराज) देव, गन्धर्वगण, रात्रि में विचरण करने वाले राक्षस, भूत एवं प्रेत भी इनकी आज्ञा में रहना ही अपना प्रथम कर्तव्य समझते हैं ॥२३॥
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सिध साधिक जोगी जती, नाइ रहे मुनि सीस । 
सुन्दर सब ही कहत हैं, जै जै जै जगदीस ॥२४॥
तीनों लोकों में प्रसिद्ध सिद्ध(ज्ञानी), योगी, यति, ऋषि एवं मुनि भी इन प्रभु का जगदीश्वर के रूप में गौरव मानते हुए इनका सदा जय-जयकार ही करते रहते हैं ॥२४॥
(क्रमशः) 

अैसा रे कोई नगर बतावै

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*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*दादू अपणे अपणे घर गये, आपा अंग विचार ।*
*सहकामी माया मिले, निहकामी ब्रह्म संभार ॥*
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*निश्चय ॥*
अैसा रे कोई नगर बतावै । यहु संसार जहाँ थैं आवै ॥टेक॥
आवै अलेख लेखै चालै, बाट बहै दिन राती ।
जिहि नगरी जाइ बासा लीणाँ, सो नगरी लखीं न जाती ॥
खलक सवाई जाइ जाइ आई, तहाँ जाणौं भी कहिये ।
अजूँ नौंध नहीं नगरी का, देखि तमासै रहिये ॥
बूझत बूझत वै भीं बूझे, जे बेद कतेब बखाणैं ।
उन्हौं भी कह्या नहीं रे भाई, मैं जाण्याँ ए जाणैं ॥
अबही थैं ठाई करि राखौं, या मनि आई मेरै ।
बषनां बास बसन के ताँई, हरि नगरी कौन हेरै ॥७३॥
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बषनांजी उस नगर, स्थान, स्त्रोत की चर्चा इस पद में वे करते हैं जहाँ से इस संसार तथा संसार में निवास करने वाले जीवों का उद्गम होता है । वे सभी लोगों के अनभिज्ञ होने के कारण इस निर्णय पर पहुँचते है कि मुझे उस स्थान की पहचान शरीर छोड़ने के पूर्व ही कर लेनी चाहिये जिसस्थान में हरि = परात्पर-परब्रहम-परमात्मा निवास करता है । 
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वस्तुतः इसका तात्पर्य यह है कि परमात्मा किसी के स्थान पर न बसकर जर्रे जर्रे में बसता है । अतः बषनांजी उस रास्ते की खोज में है जिस पर चलकर वे ब्रह्म को जानकर ब्रह्म रूप हो सकें । यहां नगरी का तात्पर्य परब्रह्म-परमात्मा से है । वही जगत का अभिन्न निमित्तोपादन कारण है उसी से जगत की उत्पत्ति होती है ।
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कोई मुझे ऐसा नगर, स्थान, स्त्रोत बता दे जहाँ से इस संसार का(जड़तत्व) तथा संसार में रहने वाले जीवों का(चित तत्त्व) उद्गम होता है । अनेक(अलेख = अलेख्य) जीव इस संसार में जन्मते हैं । जन्मकर निवास करते हैं और अंत में लेखै = निश्चित क्रमानुसार, निश्चित अवधि पूरी करके इस संसार से चले जाते हैं । 
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आने-जाने का यह क्रम दिनरात, अनवरत चलता रहता है । मरने वाले जिस नगरी में जाकर विश्राम करते हैं वह नगरी देखने में नहीं आती क्योंकि वह भूमण्डल पर नहीं है । समस्त खलक = संसार के जीव उस नगरी में जाते हैं, अपने पाप-पुण्यों को भुगतते हैं और वहाँ से पुनः वापिस भी आते हैं । आने के उपरान्त वे यहाँ अचल रूप में नहीं रह पाते । अतः वे आकर पुनः जाने की बात भी कहते हैं । 
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दिन-प्रतिदिन न जाने उस नगरी से कितने जीव आते हैं और उसमें कितने ही जीव जाते हैं तब भी उस नगरी की असली जानकारी(नौंध) किसी को नहीं हुई है । इसकारण इस विषय में इन आने-जाने वाले लोगों के भोलेपन का तमाशा देख सुनकर चुप रह जाना पड़ता है । जब जिज्ञासावश उस नगरी(परब्रह्म-परमात्मा) के बारे में उनसे पूछा जाता है जो वेद तथा कुरान का पठन-पाठन, चिंतन-व्याख्यान करते हैं तो वे भी उसके बारे में बताने में असमर्थ तो रह ही जाते हैं उल्टे जिज्ञासु से ही पूछने लग जाते हैं । 
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वे कहते हैं, हे भाई ! हमने उस नगरी को अभी तक उतना ही नहीं जाना जितना दूसरे(आत्मजिज्ञासु) जानते हैं । इस विचित्र स्थिति को देख व जानकर मैं बषनां के मन में यह विचार आया कि मैं अबही से उस नगरी के बारे में सभी कुछ ज्ञातव्यों की जानकारी कर लूँ । अतः मैं बषनां अचल बास बसने के लिये उस नगरी = हरि की नगरी = परमात्मा को जानने का प्रयत्न कर रहा हूँ, परमात्मा को खोज रहा हूँ ॥७३॥

*६. गुरु मुख कसौटी का अंग ~ २१/२४*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*६. गुरु मुख कसौटी का अंग ~ २१/२४*
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*सतगुरु सीगणि१ हाथ ले, मारे मर्म२ विचार ।*
*जन रज्जब जाके बणैं, सो बैठे तन हार ॥२१॥*
सद्गुरु अपने अन्त:करण रूप हाथ में जीव के कल्याण की भावना रूप धनुष१ लेकर तथा शिष्य-हृदय के दोष-विनाशक-रहस्य२ का विचार करके अर्थात कौन दोष है और किस बाण से नष्ट होगा, ऐसा विचार करके वचन-बाण मारते हैं । बाणघात से जिन शिष्यों के कार्य ठीक बन जाते हैं, वे तो शरीराध्यास को खोकर स्व स्वरूप में स्थित हो जाते हैं ।
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*ज्ञान खङ्ग गुरु देव गहि, दे सेवक शिर आन ।*
*मारत ही मोहन मिले, जे ओडे१ जिव जान ॥२२॥*
गुरुदेव ज्ञान-रूप तलवार को शास्त्रागार से उठाकर लाते हैं और शिष्य के जीवत्व अभिमान रूप शिर पर मारते हैं । यदि शिष्य अपने हृदय में कल्याण-प्रद जानकर उसे झेल१ लेता है, तो मारते ही अर्थात अभिमान के नष्ट होते ही ब्रह्म का साक्षात्कार हो जाता है ।
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*सद्गुरु साँग१ सु शब्द की, रसन हाथ ले देय ।*
*जन रज्जब जगपति मिलै, जे उर श्रवण सु लेय ॥२३॥*
सद्गुरु, ज्ञान युक्त सुन्दर शब्द रूप भाला१ जिह्वा रूप हाथ में लेकर मारते हैं, यदि कोई भली प्रकार श्रवणों द्वारा उसे हृदय में धारण करता है, उसे परब्रह्म मिलते हैं ।
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*ज्ञान गुर्ज१ गुरुदेव गहि, गर्द२ किया रण माँहिं ।*
*जो रज्जब सन्मुख गया, सो फिर आवे नाँहिं ॥२४॥*
गुरुदेव ने ज्ञान रूप गदा१ हृदय-हाथ में ग्रहण करके योग-संग्राम में कामादि शत्रुओं को घूली२ में मिला दिया है अर्थात नष्ट कर दिया है । ऐसे गुरुदेव के सन्मुख जो भी गया है अर्थात उनका ज्ञान धरण किया है, वह फिर जन्मादि संसार में नहीं आता है ।
(क्रमशः)

सोमवार, 16 मार्च 2026

समारोह समाप्ति ~

*#daduji*
*॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥*
*॥ दादूराम~सत्यराम ॥*
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
समारोह समाप्ति ~ 
उत्सव के आयोजन का स्थूल उद्देश्य ‘‘दादूजी महाराज की स्मृति को जागृत करना था ।’’ उसकी अधिकांश रुप में पूर्ति हो गई । यह वैसे ‘‘उत्सव’’ मनाया गया था । ‘‘उत्सवों’’ में जैसा कि उसका स्थूल रुप होना चाहिये, वैसा स्थूल रुप इसका भी बहुत अच्छे रुप में सम्पन्न हो गया । कथा, कीर्तन, जुलूस, भाषण, उपदेश के आवश्यक उपांग होते हैं, वे सब इसमें भी अच्छी प्रकार हुये थे । 
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जनता का समूह बहुत ही पर्याप्त था । बाहरी दृश्य भी बहुत अच्छा था । उत्सव के इस नाते से, समारोह की इस भावना से, शताब्दी उत्सव पूर्णरुप से सफल संपन्न हुआ, इसमें कोई अतिशयोक्ति का भाव नहीं है । इस प्रकार दादू समाज की निर्धारित भावना, परमाचार्य श्रीदादू महाराज की अनुकम्पा से सम्यक् रुप में सफलता के साथ सम्पन्न हो गई । 
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उत्सव मानकर आने वाले व्यक्तियों को किसी प्रकार का असंतोष नहीं रहा था । उत्सव की समाप्ति आनन्द के साथ ही हुई थी ।  उक्त  महान् उत्सव आचार्य रामलालजी महाराज के समय में हुआ था । अत: उनके विवरण के साथ ही दिया गया है । उक्त प्रकार आचार्य रामलाल जी महाराज १२ वर्ष १० माह १३ दिन गद्दी पर विराज कर वि. सं. २००१ आश्‍विन कृष्णा ९ मी को ब्रह्मलीन हो गये ।  
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गुण गाथा ~ दोहा- 
रामलाल आचार्य जी, थे सब भांति प्रवीन ।  
संकट में भी उन्हों का, हुआ न चित्त मलीन ॥१॥
होते भी प्रति पक्ष के, तजा न निज कर्तव्य ।  
इसीलिये ही हो गये, वे सबके मन्तव्य ॥२॥ 
रामलालजी राम के, थे निश्‍चय ही लाल ।  
इसी लिये ही हो सके, सब के पूज्य विशाल ॥३॥
रामलाल आचार्य ने, भजा विश्‍व पति राम ।
इससे ही उनके हुये, सारे पुरण काम ॥४॥
रामलाल आचार्य में, गुण थे उनहि समान ।
सब तो कैसे कह सके, ‘नारायण’ अनजान ॥५॥ 
इति श्री चतुर्दश अध्याय समाप्त: १४ 
(क्रमशः)

२१. समर्थाई आश्चर्य को अंग २१/२४

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२१. समर्थाई आश्चर्य को अंग २१/२४
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जाकी आज्ञा मैं रहै, सुन्दर सप्त समुंद्र । 
सबही मांनहिं त्रास कौं, देवन सहित पुरंद्र ॥२१॥ 
अधिक क्या कहें, संसार के सातों समुद्र भी इन प्रभु के वशवर्ती(आज्ञाकारी) हैं । सभी देवता तथा उनके स्वामी इन्द्र भी उन प्रभु का भय एवं सङ्कोच मानते हैं ॥२१॥
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जाकी आज्ञा मैं रहै, ब्रह्मा विष्णु महेस । 
सुन्दर अवनि अनादि की, धारि रहे सिर सेस ॥२२॥
देवताओं में श्रेष्ठ तीनों देव - ब्रह्मा, विष्णु एवं शिव भी इन निरञ्जन निराकार प्रभु की आज्ञा के पालन में अपना गौरव समझते हैं । यदि पुराण शास्त्र की बात मानी जाय तो सहस्रमुख शेषनाग अनादि काल से प्रभु का आदेश मान कर इस समस्त पृथ्वी का भार अपने शिर पर ढो रहे हैं ॥२२॥

सुन्दर आज्ञा मैं रहै, काल कर्म जमदूत । 
गण गंधर्व निशाचरा, और जहां लगि भूत ॥२३॥
महाराज श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - जगत् के सञ्चालक काल एवं कर्म तथा यमराज(धर्मराज) देव, गन्धर्वगण, रात्रि में विचरण करने वाले राक्षस, भूत एवं प्रेत भी इनकी आज्ञा में रहना ही अपना प्रथम कर्तव्य समझते हैं ॥२३॥
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सिध साधिक जोगी जती, नाइ रहे मुनि सीस । 
सुन्दर सब ही कहत हैं, जै जै जै जगदीस ॥२४॥
तीनों लोकों में प्रसिद्ध सिद्ध(ज्ञानी), योगी, यति, ऋषि एवं मुनि भी इन प्रभु का जगदीश्वर के रूप में गौरव मानते हुए इनका सदा जय-जयकार ही करते रहते हैं ॥२४॥
(क्रमशः)

*विनती ॥ साषी लापचारी की ॥१*

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*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*दादू हौं बलिहारी सुरति की, सबकी करै सँभाल ।*
*कीड़ी कुंजर पलक में, करता है प्रतिपाल ॥२५॥*
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*विनती ॥ साषी लापचारी की ॥१* 
(१ इस साषी का अर्थ ‘बेसास कौ अंग’ में देखें ।) 
मात पिता का गमि नहीं, तहाँ पिवाया खीर ।
सो गुण थारा रामजी, बषनैं लिख्या सरीर ॥
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पद ॥
हूँ क्यूँ बीसरौं रे, तो गुण दीनदयाल ।   
तूँ म्हारौ औगुण छाँवणौं करणा मैं किरपाल ॥टेक॥
जिहिं उदर माँहिं अधार दियौ, नीर खीर सँजोइ ।
सो थारा किया रामजी, म्हारै कहैं न होइ ॥
जिहिं सिरज्या जल बूंद थैं, बांध्या इस्या बँधाण ।
सोह मनैं क्यूँ बीसरै, जिहिं का ये सहिनाण ॥   
जिहिं सागै ए सहि सगा, मात पिता परिवार ।
जिहिं तूटाँ सहि तूटिसें, कोइ राखै नँहीं लगार ॥
और सबै बीसारस्यौं, कहुँ नहिं म्हारै भाइ ।
जिहिं बिना म्हारै ना सरै, सो क्यूँ बीसार्यौ जाइ ॥
ए गुण थारा रामजी, ए दूजा का नाहिं ।
सो बषनौं क्यूँ बीसरै, म्हारै लिख्या जु हिरदै माहिं ॥७२॥
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हे दीनों पर दया करने वाले दीनदयालु परमात्मन् ! मैं आपके अनंतानंत गुण = उपकारों को क्योंकर विस्मृत करूं क्योंकि आप अकारण ही कृपा करने वाले करुणामय तथा मेरे अवगुणों को छावणौं आच्छादित = ढँकने = विस्मृत कर देने वाले हैं । 
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पदकार परमात्मा के अमित उपकारों में से कुछ का दिग्दर्शन कराते हुए कहते हैं, आपने माता के उदर में जल और खीर = दूध = भोजन की व्यवस्था करके मुझे अधार = जगत् में आने के लिये सुदृढ़ आधार रूपी शरीर प्रदान किया । यह सब आपका ही कृत्य है, कोई भी इसे अपना कृत्य नहीं बता सकता । आपने मेरे शरीर का सृजन जल = वीर्य की एक बूंद मात्र से किया और माता के उदर में खाने-पीने का पूरा प्रबन्ध करके इसप्रकार की व्यवस्था की कि मुझे संसार में आने में किसी भी प्रकार की कोई भी बाधा का सामना नहीं करना पड़ा । 
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जिस परमात्मा के = आपके उक्त प्रकार के सहिनाण = उपकारों के नमूने हैं, वह परमात्मा मुझे क्योंकर भूल सकता है । अर्थात् आपका स्वभाव तो अकारण ही दया-कृपा करना है । अतः मैं चाहे आपको याद करूँ अथवा नहीं करूँ आपतो मुझ पर कृपा करेंगे ही । अतः आपके द्वारा मुझे भूला जाना कैसे भी संभव नहीं है । हे परमात्मन् ! आपका प्रभाव भी अमित है । 
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आपसे सम्बन्ध रहने पर माता, पिता परिवार वाले सभी परिजन भी मधुर सम्बन्ध बनाकर रखते हैं । इसके विपरीत आपसे सम्बन्ध टूटते ही ये सभी सम्बन्ध विच्छेद कर लेते हैं । इनमें से कोई भी लगार = तनिक सा भी प्रेम-सम्बन्ध नहीं रखते हैं । 
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(वेदान्त की दृष्टि से देखें तो ज्ञात होता है, जब तक शरीर का सम्बन्ध चैतन्य से रहता है, तबतक ही सगे सम्बन्ध उससे सम्बन्ध रखते हैं । जैसे ही शरीर से चैतन्य निष्क्रमण करता है वैसे ही सभी परिवारजन मरा-मरा कहकर जलाने को शमशान में ले जाते हैं । अतः पदकार का कहना सर्वथा व्यावहारिक तथ्याधारित है कि असली प्रेम चैतन्य को लेकर ही होता है । फिर क्यों नहीं उसी से एकान्तिकी प्रेम किया जाय । वस्तुतः समष्टिचैतन्य ही ब्रह्म तथा व्यष्टिचैतन्य ही जीव है ।) 
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हे परमात्मन् ! अब मेरा और कहीं भी किसी से भाव = लगाव = राग नहीं रह गया है । फिर भी यदि कहीं किसी से प्रकट, गुप्त रूप में कोई राग-सम्बन्ध है तो उसे भी मैं सर्वथा विस्मृत कर दूंगा । किन्तु जिस परमात्मा के बिना मेरा काम बिलकुल नहीं चल सकता, उस परमात्मा = आपको मैं कैसे विस्मृत कर सकता हूँ । 
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हे रामजी ! उक्त प्रकार के अनिर्वचनीय उपकार आपही कर सकते हैं; दूसरों के द्वारा इस प्रकार के उपकार करना संभव नहीं है । ऐसे उपकारों को मैं बषनां कैसे विस्मृत कर सकता हूँ क्योंकि ये सभी उपकार मेरे हृदय-पटल पर अमिट रूप में अंकित हो चुके हैं ॥७२॥