बुधवार, 26 अगस्त 2026

*४६. परमारथ कौ अंग ५३/५६*

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*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
*श्रद्धेय श्री @महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी, @Rgopaldas Tapsvi, बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ @Premsakhi Goswami*
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*४६. परमारथ कौ अंग ५३/५६*
मेघ मया करि बूढ़ा तूटा३, हरी दूब बन राइ ।
कहि जगजीवन जे जस मनसा४, तस फल५ भुगतै भाइ ॥५३॥
(३. बूढ़ा तूटा-झंझावत की वर्षा में पुराने वृक्ष टूट करगिर जाते हैं)
(४. जस मनसा-जैसा संकल्प होता है)  {५. तस फल-वैसा ही उस का फल (परिणाम) होता है} 
संत जगजीवन जी कहते हैं कि वर्षा व मेघ झंझावात में पुराने बूढे पेड़ भी टूट जाते हैं ये सब संसारिक क्रियाओं का प्रभाव है । जिनके प्रभास से बड़े बड़े दृढ जन भी लक्ष्य से हट जाते हैं । और सूक्ष्म होने से हरि दूब फलती है जो अहम् से रहित  हो दीन हो रहता है प्रभु उनका पोषण करते हैं । जैसी जिसकी भावना होती है वैसा ही फल मिलता है ।
कहि जगजीवन भजन कौं, उद्दिम कीजै मांहि६ ।
रांम भगति गुर बंदगी, कोइ दुख ब्यापै नांहि ॥५४॥
(६. मांहि-ह्रदय में)
संत जगजीवन जी कहते हैं कि भजन सप्रयास करना चाहिये प्रभु की भक्ति व सेवा से कोइ दुख नहीं होता है ।
उद्दिम अध्यातम भजन, रांम भगति तत सार ।
कहि जगजीवन हरि परमारथ, सब जन पहुँचैं पार ॥५५॥
संत जगजीवन जी कहते हैं कि हमारा परिश्रम अध्यात्म व भजन हो यह ही तत्व राम भक्ति का सार है । परमार्थ परमात्मा को साध कर सभी जन भव पार हो जाते हैं ।
परमारथ कै कारणैं, उद्दिम कीजै ऊठि१ ।
रांम ह्रिदै रसनां रटिन, साध न फेरै मूंठि२ ॥५६॥
(१. उद्दिम कीजै ऊठि-उत्साहपूर्वक उद्योग करना चाहिये) 
(२. मूंठि-साधु के मंत्र तंत्र के चक्कर में नहीं पड़ना चाहिये)
संत जगजीवन जी कहते हैं कि परमार्थ के कारण सप्रयास उठ कर काम करना चाहिये । राम ह्रदय में हों ओर जिह्वा पर प्रभु का नाम हो । साधु जन को तंत्र मंत्र से परे होना चाहिये ।
(क्रमशः)

*जोबनेर स्थान की परम्परा*

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*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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*सतगुरु संतों की यह रीत,*
*आत्म भाव सौं राखैं प्रीत ।*
*ना को बैरी ना को मीत,*
*दादू राम मिलन की चिंत ॥*
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*जोबनेर स्थान की परम्परा* = आचार्य चैनरामजी महाराज के शिष्य सहजरामजी ने अपना साधनधाम जोबनेर बनाया । उनकी शिष्य परम्परा इस प्रकार है-१-सहजरामजी २ से ७ तक के नाम ज्ञात नहीं हो सके । ८- खूबरामजी ९- विजैरामजी १०- परमेश्वरदासजी ११- नरसीदासजी १२- कनीरामजी १३- जेलदासजी १४- रामनारायणदासजी १५- मंगलदासजी १६- प्रभुदासजी ८- खूबरामजी का नारायणा दादू द्वारा में व बाहर बगीची व बड़ा स्थान है ।
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खूबदासजी अच्छे संत हुये हैं । आप दादूद्वारे के भंडारी रहे हैं । समाज सेवी महात्मा थे । १- सहजरामजी अधिकारी आचार्य चैनरामजी के शिष्य थे और प्रतिष्ठित संत थे । इनकी अधिकारी संज्ञा थी । भेष को चवन्नी पूजा बांटी थी जयपुर नरेश माधवसिंह प्रथम ने इनका अच्छा सम्मान किया था । इस समय जयपुर में उदयपुर जमात की हवेली है, इसके सामने ही सहजरामजी ने अपना अस्थल भी स्थापित किया था ।
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इन्होंने उतराध में रामत की थी । भेंट पूजा लेते थे । रथ सवारी आदि मूर्तब साथ लेकर चलते थे । इनकी समाज में अच्छी प्रसिद्धि व प्रतिष्ठा थी । उए उच्चकोटि के संत थे । इन्होंने अनन्त प्राणियों को निर्गुणराम की भक्ति में लगाया था । इनके मुख्य दो ही काम थे भगवद् भजन और उपदेश करना रूप उपकार ही थे । इन्होंने अपना साधनधाम जोबनेर में भी बनाया था । मुख्य स्थान नारायणा में ही था । ये बहुत ही प्रभावशाली संत हुये हैं ।
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*जयपुर स्थान* = जयपुर पुराणी वस्ती का स्थान नूंनन्दरामजी भंडारी के शिष्य मोहनदासजी ने बनवाया था । उसकी परम्परा १- मोहनदासजी २- जमनादासजी ३- वक्षीराम जी । आगे नहीं चला समाप्त हो गया । यह स्थान नारायणा कुंड वाले स्थान की शाखा रूप था । वि. स. १९०० के लगभग जयपुर का स्थान बना था । इसके संस्थापक मोहनदासजी बहुत अच्छे संत हुये हैं । तत्कालीन जयपुर नरेश से भी इनका अच्छा संपर्क था । ये प्रतिष्ठित महात्मा थे । भजन, विचार, उपदेश ही इनके मुख्य कार्य थे ।
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*नावां का स्थान* = आचार्य चैनरामजी महाराज के शिष्य १-गोविन्ददासजी २- श्योजीरामजी ३- रामवल्लभदासजी ४- मोतीरामजी ५- वैद्य कृपारामजी ६-पं. भूधरदासजी वर्तमान हैं । ४- नावां में प्रसिद्ध संत मोतीरामजी ने अपना साधनधाम बनाया था । महात्मा मोतीरामजी का जन्म नावां नगर में ही हुआ था । आपका बचपन में भगवद् भजन में अनुराग था । आप बाल ब्रह्मचारी थे ।
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बचपन में ही संतों का संग होने से आप काशी चले गये थे । वहां अध्ययन करके फिर रामस्वरूपजी महाराज सीहावालों के पास जाकर साधन का अभ्यास करते रहे थे । पश्चात् नावां नगर में आकर भजन करने लगे थे । आप स्थान से बाहर बहुत कम निकलते थे । सब कार्य स्थान में ही कर लेते थे । स्थान के द्वार पर कूप था । जल भी आप स्थान की छत से ही भर लेते थे । स्थान से कूप तक एक पुल बना रखा था । उस पर से भर लेते थे । स्थान का द्वार बन्द ही रखते थे । महान् अन्तर्मुख योगी संत थे ।
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उनके अनेक चमत्कारों की बातें नावां में प्रसिद्ध है । आपके के पास कोई भी आता था, उसके मन की कल्पना आप जान जाते थे और उसके कहे बिना ही उसके मनकी बात उसे बता देते थे । कोई आपके दर्शन करने आता था तो उसे छत पर से ही दर्शन देते थे । कोई रोग पीड़ित आता तो उसे अपने निवास स्थान के पास की बेरड़ी के पत्ते खाने की आज्ञा देते थे । फिर यदि वह उस बेरड़ी के पत्ते खा लेता था तो अवश्य रोग से मुक्त हो जाता था । किसी से बात करना उचित समझते थे तो विशेष बात भी करते थे । अन्यथा सब से बातें नहीं करते थे । 
(क्रमशः)

मंगलवार, 25 अगस्त 2026

*२६. भजन प्रताप का अंग ~३३/३६*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*२६. भजन प्रताप का अंग ~३३/३६* 
*गुण तारे माया तिमिर, शीत भरम मन चंद ।* 
*रज्जब सुमिरन सूर सौं, सहज पड़े सब मंद ॥३३॥* 
जब निरंजन नाम-स्मरण रूप सूर्य उदय होता है तब उससे क्रोधादि गुण रूप तारे, माया रूप अँधेरा, श्रम रूप शीत, ये सभी अनायास ही मंद पड़ जाते हैं ।
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*रज्जब भजन भानु उर उदित ही, अस्त होय गुण चारि ।*
*तम तारे शशि शीत गत, नर देखो सुनिहारि ॥३४॥* 
सूर्य उदय होते ही तम, तारे, चन्द्रमा और शीत ये चारों ही अस्त प्राय: हो जाते हैं, वैसे ही भजन का प्रताप उदय होते ही काम क्रोधादि गुण, माया, श्रम और मन की चपलता ये चारों गुण हृदय में चले जाते हैं । हे विचारशील नरो ! तुम विचार द्वारा देखो यह बात सत्य है । 
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*नाम निरंजन उर बसे, तो कोउ गुण व्यापे नाँहिं ।* 
*जन रज्जब ज्यों सर्प विष, गरुड़द्वार मुख माँहिं ॥३५॥* 
जैसे गरुड़द्वार(मोर की पंखों से निकला हुआ ताँबा) मुख से होने में शरीर पर सर्प विष का प्रभाव नहीं पड़ता, वैसे ही निरंजन राम का नाम हृदय में रहने पर कामादि कोई भी मायिक गुण हृदय में व्याप्त नहीं होता अर्थात हृदय को व्यथित नहीं करता । 
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*अहि इन्द्र आतम१ डसी, विष नख शिख रह्यो छाय ।*
*रज्जब मंत्र सु राम रट, तब ही ऊतर जाय ॥३६॥* 
इन्द्रिय रूप सर्प ने अन्त:करण१ को काटा है, उसका विषय रूप विष नख से शिखा पर्य्यन्त व्याप्त हो गया है । जैसे सर्प विष मन्त्र से उतरता है, वैसे ही यह विष निरंतर राम के नाम, राम मंत्र की रटन लगावे तब उतरता है ।
(क्रमशः)

*भंडारी राजारामजी*

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*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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*पूरण ब्रह्म विचारिये, तब सकल आत्मा एक ।*
*काया के गुण देखिये, तो नाना वरण अनेक ॥*
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*भंडारी राजारामजी* = भंडारी राजारामजी नारायणा दादूद्वारे के भंडारी वर्षों रहे । आप भी प्रख्यात संत थे । आप के बड़े गुरु भाई रामरतनजी थे । रामरतनजी अपने स्थान का काम संभालते थे । रामरतनजी के चरण नानूरामजी ने और राजारामजी के चरण रामलालजी ने हाथी भाटा स्थान पर तिवारे में वि. स. १९५३ मिति जेष्ठ बदि १३ को पधराये थे । 
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*भंडारी वस्तीरामजी कुंडवाले* = वस्तीरामजी कुंडवालों की परम्परा में हैं । आप आचार्य रामलालजी के समय में १५ वर्ष, आचार्य प्रकाशदेवजी महाराज के समय में २३ वर्ष, वर्तमान आचार्यजी के समय में ६ वर्ष भंडारी रहे । आपका संयमी जीवन है । आप ठीक दो बजे उठकर भजन करते हैं । चार बजे आसन छोड़कर शारीरिक क्रियाओं से निवृत होकर अरुणोदय होने पर श्री दादूमंदिर का दर्शन करने जाते हैं । 
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इस समय आपकी लगभग ९३ वर्ष की आयु है । फिर भी आप स्वाध्याय करते रहते हैं । आस पास के ग्रामों के व नारायणा के जिनके बच्चे नहीं जीते हैं, वे लोग आपके शरीर से उतरे हुये कपड़े बच्चों को पहनाते हैं, उससे से उन लोगों के मनोरथ पूर्ण हो जाते हैं । आप पक्षियों को नित्य दाना चुगाते हैं, आपका जीवन सादा है । 
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इनके शिष्य कनिरामजी भी मिलनसार महानुभाव हैं । अच्छे शिक्षित हैं  । सामाजिक कार्यों में भाग लेते हैं । आपने ‘स्वाध्याय संग्रह’ ग्रंथ का संपादन भी किया है । उक्त कुंडवाले स्थान की परंपरा है । इस स्थान की परम्परा में भंडारी नूंनन्दरामजी के १- शिष्य भंडारी सेवादासजी, मोहनदासजी भी हुये हैं । रामलालजी के शिष्य-पांचूरामजी उनके बालदासजी व वस्तीरामजी हुये । बालदासजी के रामधनदास और रामदास दो शिष्य थे । 
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भंडारी नूंनन्दरामजी के शिष्य मोहनदासजी जयपुर पुराणी वस्ती में अपना साधन धाम बनाकर वहां ही भजन करने लगे थे । उनके गंगादासजी और गंगादासजी के शिष्य वक्षीरामजी हुये । फिर समाप्त । उक्त प्रकार आचार्य चैनरामजी महाराज के शिष्य टीकमदासजी की शिष्य परम्परा का परिचय है । इस परम्परा के संत सभी दादूवाणी के अनुसार भजन करते थे । 
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आचार्य चैनरामजी की शिष्य परम्परा में = नारायणा बाग़ के स्थान की परम्परा~ आचार्य चैनरामजी के शिष्य १- टीकमदास भंडारी सं. १८५३ उनके शिष्य २- धर्मदासजी सं.१८९९ ३- रूपदासजी सं. १९३३ ४- जगरामजी ५- रामनारायणजी ६- रामलालजी ७- धनीरामदासजी ८- भगवान् दासजी ९- तोलारामजी सं. १९७०-२०२५ । 
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तोलारामजी बाईजी के थांबे के स्थान महल में चले गये । उक्त स्थान की परम्परा समाप्त हो गई । उक्त स्थान के स्थानधारी सभी आचार्यों की चरण सेवा में हजूर रहते थे । इससे इस स्थान के संतों का उपनाम हजूरी हुआ है । इस स्थान के सभी संत आचार्यों की सेवा में रहने से आचार्यों के कृपा पात्र रहे हैं । 
(क्रमशः)

*४६. परमारथ कौ अंग ४९/५२*

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*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
*श्रद्धेय श्री @महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी, @Rgopaldas Tapsvi, बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ @Premsakhi Goswami*
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*४६. परमारथ कौ अंग ४९/५२*
प्रव्रिति१ धरम अनेक हैं, निव्रिति२ धरम मंहि नाम ।
कहि जगजीवन हरि भगत, दया धरम कहै रांम ॥४९॥
(१. प्रव्रिति धरम-लोक में प्रवृत्ति मार्ग)   (२. निव्रिति धरम-संन्यास मार्ग)     
संत जगजीवन जी कहते हैं कि प्रवृति मार्ग में अनेक धर्म साधन हैं, निवृत्ति मार्ग में केवल नाम स्मरण है जो प्रभु के भक्त हैं वे दया धर्म को ही प्रभु स्वरुप मानते हैं ।
असली साध अगाध हरि, भगति पुंज भजि नांम ।
कहि जगजीवन जानिये, जस करनी तस नांम ॥५० 
संत जगजीवन जी कहते हैं कि असली साधु वे ही हैं जो भक्ति पुंज हैं व परमात्मा के स्वरूप को ही अगाध मानते हैं । जैसी जिसकी करणी होती है वेसा ही उसका नाम होता है ।
परमारथ हरि क्रित सिरै, सब कोइ समझै साखि ।
कहि जगजीवन रांम कहै, रांम ह्रिदा मंहि राखि ॥५१॥
संत जगजीवन जी कहते हैं कि परमार्थ भी प्रभु कृपा करने से ही होता है । इस बात को सभी प्रमाणिक मानते हैं । संत कहते हैं कि कहो भी राम और राम को ही ह्रदय में रखो ।
स्वारथ घट मंहि को नहीं, परमारथ है नांम ।
कहि जगजीवन तन मन हरि हरि, बदन प्रकासै रांम ॥५२॥
संत जगजीवन जी कहते हैं कि मन में कोइ स्वार्थ न हो तो परमार्थ ही प्रभु स्मरण है । ऐसे जीव के तन मन स्मरण से प्रभु नाम ध्वनित होता है व मुख से राम नाम का प्रकाश उद्भासित होता है ।
(क्रमशः) 

सोमवार, 24 अगस्त 2026

भंडारी नानकदासजी

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*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
*दादू मारग साधु का, खरा दुहेला जान ।*
*जीवित मृतक ह्वै चलै, राम नाम नीशान ॥*
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भंडारी नानकदासजी ~ नानकदासजी टीकमदासजी के शिष्य थे । ये भी दादू द्वारे के भंडारी रहे । ये प्रतिष्ठित, श्रीमान् साधू थे । इनकी समाधि मकराने पत्थर की स्टेशन रोड नारायणा में हाथी भाटा के पास है । वहां तिवारा व कूवा भी है । इनके चरण इनके शिष्य नूं नंदराम(नौनिधि) जी ने पधराये थे । इनके तीन शिष्य थे~ १- नूं नंदरामजी २- बुधराम ३- भक्तराम । इनकी छत्री में अंकित शिलालेख~ 
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“कूप खण्यो छतरी करी, परमारथ हितधाम । 
चरण सु श्रीगुरुदेव के, धरे सु नौनन्दराम ॥१॥ 
श्रीनिर्भय रणछोड़ के, टीकम टीकूदास । 
भंडारी भक्तन बड़े, तत् शीश नानकदास ॥२॥ 
अठारह सै सित्यासिये, म्हा सुदि सातें बार । 
सुर गुरु दिन नामक चले, भव जल उतरे पार ॥३॥
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भंडारी नूं नंदरामजी = नूं नन्दरामजी दादूद्वारा नारायणा के भंडारी रहे । कर्तव्य परायण और राज्यकार्य में प्रवीण थे । आपने नारायणा नगर में कुंड पर अपना स्वतन्त्र विशाल स्थान बनवाया था । यह स्थान वि. सं. १८८५-८६ में बनवाया था । स्थान पर २५ सों साधू निवास करते थे । स्थान के नीचे वि. स. १८९३ में भूमि व कूप भी लगा दिये थे । जिससे स्थान में रहने वाले साधुओं का योग-क्षेम चलता रहे । आपके दो गुरुभाई और थे । १- बुधरामजी २-भक्तरामजी । तीनों के चरण एक साथ आपके उत्तराधिकारी शिष्य रामरतनजी ने पधराये थे । 
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तीनों के चरणों का परिचय~दोहा~ 
कार्तिक शुक्ला सप्तमी उगणीसै अरु एक । 
नूंनन्दराम जु हरि मिले, गही नाम की टेक ॥१॥ 
भे भण्डारी उग्रजश, संतसभा गुण गाय । 
नूंनंन्दरामजी भक्तिकर, मिले ब्रह्म में जाय ॥२॥ 
श्रावण शुक्ला पूर्णिमा, बुधि सागर बुधराम । 
अठारह सौ सत्यानवे, जाय मिले निज धाम ॥१॥ 
कार्तिक कृष्णा सप्तमी, भक्तराम गुण गाय । 
उगणी सै सोडस अधिक, हरिपुर पहुँचे जाय ॥१॥ 
गुरु भक्ता स्व गुरु चरण, शुभ मूर्ति सर्व मान । 
रामरतन जु मानचित्त, पधराये निज मान ॥२॥
मिति वैशाख सुदी ३ शुक्रवार वि. सं. १९२२ का ।  
(क्रमशः)

रविवार, 23 अगस्त 2026

*४६. परमारथ कौ अंग ४५/४८*

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*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
*श्रद्धेय श्री @महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी, @Rgopaldas Tapsvi, बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ @Premsakhi Goswami*
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*४६. परमारथ कौ अंग ४५/४८*
कहि जगजीवन आश्रम, करम रहत क्रित धांम ।
सोइ सुफल ग्रिह देखिये, जहां साध बिराजै रांम ॥४५॥  
संत जगजीवन जी कहते हैं कि जहाँ आश्रम हो वहां हेतू किये गये कार्य किसी तीर्थ की सेवा से होते हैं । और उनके सुफल ही है कि वहां सकल मनोरथ दायक साधुजन विराजते हैं ।
पत्र पुहुप फल जल हि करि, साध समागम आइ ।
कहि जगजीवन भाव हरि, रांम भगति रस पाइ ॥४६॥
संत जगजीवन जी कहते हैं कि साधु जन के सत्संग समागम के बाद भी यदि जीव बाह्य साधन पत्र पुष्प फल जल जैसे साधनों से ही तुष्ट हो जाये यह उचित नहीं हैं साधु संगति से तो हरि भाव आते हैं भक्ति रसरुप सार मिलता है ।
जे कुछ करै या खावै पीवै, दे लै देखै आइ ।
कहि जगजीवन रांम समरपै, परमेसुर के भाइ ॥४७॥
संत जगजीवन जी कहते हैं कि सारी क्रियाओं को जो प्रभु समर्पित हो कर करे वह प्रभु को अति प्रिय है ।
कहि जगजीवन धरम रस, धरम ग्यांन जस नांम ।
धरम भाव निरमल भगति, जा थैं परसै रांम ॥४८॥
संत जगजीवन जी कहते हैं कि धर्म का सार, ज्ञान यश नाम धर्म का तो भाव ही निर्मल है उस भक्ति से प्रभु सानिध्य मिलता है ।
(क्रमशः)

*२६. भजन प्रताप का अंग ~२९/३२*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*२६. भजन प्रताप का अंग ~२९/३२*
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*रज्जब एकहि जाप में, जल ज्वाला गुण दोय ।*
*अठारह भार आतम१ उदय, जम सु जवासा जोय ॥२९॥*
जैसे जल में पोषक और शोषक दो गुण दिखाई देते हैं - जल अठारह भारत वनस्पतियों को उत्पन्न करके उनका पोषण करता है किन्तु जवासे को जला डालता है, वैसे ही नाम भी शोषण और पोषण दो गुणों से युक्त है - नाम चिन्तन करने से, नाम अन्त:करण१ में दैवी गुणों को उत्पन्न करके उसका पोषण करता है और आसुर गुणों को नष्ट कर देता है ।
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*रज्जब भागे भजन सुन, अध इन्द्रिय गुण चोर ।*
*ज्यों भुजंग चन्दन तजैं, तरु शिर बोले मोर ॥३०॥*
चन्दन वृक्ष की डाली पर बैठकर मोर बोलता है तब चन्दन पर लिपटे हुये सर्प चन्दन को छोड़कर दूर भाग जाते हैं, वैसे ही भजन की ध्वनी सुनकर पाप, इन्द्रियों के विषयों की आसक्ति, ज्ञान-धन को चुराने वाले काम-क्रोधदि गुण रूप चोर हृदय से भाग जाते हैं ।
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*जन रज्जब राम हीं भजे, पाप रहे नहिं संग ।*
*ज्यों तुपक१ की त्रास सुन, तरुवर तजे विहंग२ ॥३१॥*
जैसे बन्दूक१ की आवाज सुनकर वृक्ष पर बैठे हुये पक्षी वृक्ष२ को छोड़कर उड़ जाते हैं, वैसे ही राम के भजन करने से प्राणी के संग पाप नहीं रहते ।
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*पाले के पर्वत गलहि, देख सूर की ताप ।*
*ऐसी विधि अध ऊतरहिं, जन रज्जब हरि जाप ॥३२॥*
सूर्य की ताप से बर्फ के पर्वत गल जाते हैं, उसी प्रकार हरि नाम के जप से हृदय के पाप उतर जाते हैं ।
(क्रमशः) 

७ चैनरामजी की शिष्य परम्परा

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*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
*सोई बड़भागी सदा सुहागी,* 
*परगट प्रीतम संग भये ।*
*दादू भाग बड़े वर वर कर,* 
*सो अजरावर जीत गये ॥३॥*
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अथ अध्याय ४ = ७ चैनरामजी की शिष्य परम्परा =
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आचार्य चैनरामजी महाराज के सुनते हैं कि शिष्य बहुत थे किन्तु ६० शिष्य तो मुख्य २ थे । आपकी शिष्य परम्परा के मुख्य २ स्थान ये हैं । १- नारायणा में कुंड वाले भंडारीजी का, २- नावाँ में, ३- इन्दावड़(मेड़ता), ४- हरमाड़ा में(गुडिया), ५- जोबनेर में भंडारी का स्थान, ६- नारायणा का स्थान बाग़ में, ७- फुलेरा में, ८- मेड़ता शहर में, ९- रेण में(मारवाड़), १०- बूडसू(मारवाड़) में, ११- खंडेल में, १२- तिलोनिया में, १३- मडावरिया, १४- झीटयां ग्राम, १५- जूनिया में, १६- राजगढ़(अलवर) में, १७- आखतड़ी में, १८- नारायणा से जयपुर पुराणी बस्ती में, १९- नारायणा में है ।
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कुंड वाले स्थान की परम्परा = १- भंडारी टीकमदासजी- आप आचार्य चैनरामजी महाराज के शिष्य थे और ऊपर के भंडारी थे । रोकड़ा रुपया लेन देन व राजकार्य, लिखा पढ़ी आदि कार्य करने वाले को ऊपर भंडारी कहते हैं । आचार्य निर्भयरामजी के समय में सं १८३७ से ६८ तक निरंतर पीठाचार्य स्थान का कार्य किया था । टीकमदासजी आचार्य निर्भयरामजी के अत्यधिक विश्वास पात्र थे तथा प्रेमी भी थे । जहाँ भी आचार्य निर्भयरामजी जाते थे वहां टीकमदासजी भी अवश्य ही साथ २ जाते थे ।
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टीकमदासजी भंडारी राजगढ़ में अत्यधिक बीमार हुये तब आचार्य निर्भयरामजी उनके पास गये और पूछा तुम्हारी इच्छा क्या है । टीकमदासजी ने कहा~ मेरी इच्छा प्रतिक्षण आपकी सेवा में ही रहने की है । तब आचार्य निर्भयरामजी ने कहा~ ऐसा ही होगा । फिर वि. सं. १८६८ कार्तिक कृष्णा ५ मीं सोमवार को राजगढ़ में ही भंडारी टीकमदासजी का देहान्त हो गया । फिर आचार्य निर्भयरामजी ने उनकी स्मृति में एक तिबारा और एक कुई बनवाई थी । वह कुई मनी कुई के नाम से अद्यापि प्रसिद्ध है ।
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नारायणा में आचार्यों की स्मारक क्षत्रियों के सामने भंडारी टीकमदासजी की स्मारक छत्री बनवाई थी । उक्त प्रकार निर्भयरामजी महाराज ने अपने भक्त तथा गुरु भाई का सन्मान किया था । मैं सदा आपकी दृष्टि के नीचे रहूं, यह इच्छा पूर्णकर दी । इनकी छत्री से निर्भयरामजी महाराज की छत्री दीखती है । आपने आचार्य निर्भयरामजी की तथा दादू द्वारे की अच्छी सेवा की थी । आचार्य निर्भयरामजी का चातुर्मास भी टीकमदासजी भंडारी ने वि सं. १८५३ में करवाया था । टीकमदासजी ईश्वर भक्त, गुरु भक्त, श्रीमान्, समाज प्रिय, संत हुये हैं ।
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टीकमदासजी की समाधि पर शिला लेख इस प्रकार है ।
दोहा~ चढ़ि विमान टीकम चले, वसे जाय वैकुण्ठ ।
फल अपने सुकृत किये, लए एक ही उंठ ॥१॥
कार्तिक वदि शशि पंचमी, कर सुकृत दे दान ।
अष्टादश शत अडसठै, टीकम कियो पयान ॥२॥
सोरठा~ तत् शिष नानकदास, तिनके अब नौनिधी प्रकट ।
प्रफुल्लित सु प्रकाश, भंडारी भलपन भये ॥३॥
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इनका नाम कहीं टीकूदासजी और कहीं टीकमदासजी मिलता है । इनकी परम्परा के वर्तमान स्वामी कनिरारामजी ने मुझे टीकूदासजी ही लिखकर भेजा है किन्तु मुझे अन्यतर टीकमदासजी मिला था । अतः मैंने टीकूदासजी नहीं लिखा । कारण चरणों के शिलालेख में टीकमदासजी रक्खा है । इस भेद को केवल बोलने का ही भेद समझें, व्यक्ति भेद नहीं समझना है ।
(क्रमशः)

*४६. परमारथ कौ अंग ४१/४४*

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*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
*श्रद्धेय श्री @महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी, @Rgopaldas Tapsvi, बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ @Premsakhi Goswami*
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*४६. परमारथ कौ अंग ४१/४४*
कहि जगजीवन जमीं पर, दरखत जमैं अनेक ।
कहै सुगंधै नांम दे, सो हरि चंदन एक ॥४१॥                           
संत जगजीवन जी कहते हैं कि पृथ्वी पर अनेक वृक्ष हैं पर खुशबू में चन्दन सा कोइ नहीं ऐसे ही मनुष्य तो अनेक हैं पर यश रुपी सुगंधि संतो के पास ही होती है ।
हरि देवै सौ लीजिये, सिर चढाइ सौ बार ।
कहि जगजीवन ह्वै८ तो दीजै, सिर थैं उतरै भार ॥४२॥
(८. ह्वै=हो)
संत जगजीवन जी कहते हैं कि जो प्रभु दे वह सो बार उनकी कृपा मान कर शिरोधार्य करें अगर आप कुछ दे सकते हैं तो अवश्य दीजिये जिससे आप उऋण हो जायेंगे ।
लीजै दीजै रांम धन, परमारथ तहँ होइ ।
कहि जगजीवन स्वारथ दुनियां, दीन९ गमावै सोइ ॥४३॥
{९. दीन-पालनीय सदाचार(धर्म)}
संत जगजीवन जी कहते हैं कि लेनदेन राम नाम का ही कीजिये जिससे परमार्थ होता है । शेष तो भजन के बिना जीव स्वार्थ वशीभूत हो अपना धर्म ही खो देते हैं ।
कहि जगजीवन जांहि सब, रहसी१० रांम अगाध ।
कै कोइ हरिजन हरिभगत, हरिसेवक हरि साध ॥४४॥
(१०. रहसी=सदा रहेगा)
संत जगजीवन जी कहते हैं कि संसार में सब जायेगा स्थिर तो राम का नाम ही है । जिसकी कोइ सीमा नहीं है, या फिर हरिभक्त या प्रभु सेवक या साधुजन रहेंगे ।
(क्रमशः)  

शनिवार, 22 अगस्त 2026

*२६. भजन प्रताप का अंग ~२५/२८*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*२६. भजन प्रताप का अंग ~२५/२८*
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*रज्जब अज्जब काम है, जे सुमिरे कोउ जंत१ ।*
*सकल लोक शिर कीजिये, उर सेवक भगवंत ॥२५॥*
परमात्मा का स्मरण अदभुत कार्य है यदि कोई जीव१ निरंतर अपने हृदय में स्मरण करता है, तो उस भक्त को भगवान् संपूर्ण लोकों के शिरोमणि अपने स्वरूपमय ही कर लेता है ।
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*सब विधि नर के काम को, नाम निरंजन सत्ति१ ।*
*जन रज्जब जो ज्यों भजे, ताकि मोटी मत्ति२ ॥२६॥*
मनुष्य की कार्य सिद्धि के लिये सब प्रकार निरंजन राम का नाम ही सच्चा१ हेतु है, जो मनुष्य जैसे तैसे भी निरंजन का भजन करता है, तो उसकी बुद्धि२ विशाल ही कही जाती है ।
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*पति परमेश्वर वीरज नाम, अबला आतम रति१ रुचि ठाम ।*
*मेला या सम कोई नाँहिं, विगति२ बाल ब्रह्म उपजे माँहिं ॥२७॥*
परमेश्वर पति है, नाम वीर्य है, आत्मा नारी है, आत्मा का परमात्मा से प्रेम ही काम-क्रीड़ा१ के स्थानापन्न है, उक्त मिलन के समान संसार में कोई भी मिलन नहीं हो सकता है, इस मिलन से ही हृदय में मुक्ति-प्रदाता२ ब्रह्म-ज्ञान रूप बालक उत्पन्न होता है ।
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*नाम निधारे१ धार बहु, काटे साँकल कोङि ।*
*रज्जब हद हथियार यहु, हथियारहु की वोङि२ ॥२८॥*
निरंजन नाम अज्ञानियों को धाररहित१ भासता है, किन्तु उसके बहुत तीक्ष्ण धार है, तभी तो ज्ञान द्वारा कोटि कर्म रूप जंजीरों को काट डालता है, इस नाम रूप हथियार ने तो हद्द कर दी है, यह हथियारों की सीमा२ का हथियार है, अर्थात सर्व श्रेष्ठ हथियार है ।
(क्रमशः)

शुक्रवार, 21 अगस्त 2026

*४६. परमारथ कौ अंग ३७/४०*

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*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
*श्रद्धेय श्री @महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी, @Rgopaldas Tapsvi, बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ @Premsakhi Goswami*
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*४६. परमारथ कौ अंग ३७/४०*
उतपति ए सब रांम थैं, प्रलै काल मन जोइ ।
कहि जगजीवन रांम बिन, खाली ठौर१ न कोइ ॥३७॥
(१. खाली ठौर=रिक्त स्थान)
संत जगजीवन जी कहते हैं कि सब उत्पत्ति सेहोती है व मन द्वारा प्रलय होती है । हर स्थान पर प्रभु है उनके बिना कोइ स्थान नहीं है ।
रांम धरा धर ब्योम धर, रांम सकल धर धीर ।
कहि जगजीवन रांम अधर हरि, रांम निरंजन थीर ॥३८॥
संत जगजीवन जी कहते हैं कि राम धरती आकाश व सर्वत्र विराजते हैं राम बिना आधार है और सब राम से ही आधार पाते हैं । वे निरंजन स्थिर हैं ।
पाप परहिंडौ२ परसतां, मारजनी३ कर साह ।
कहि जगजीवन खंडणी४, चाकी५ चूल्ही६ चाह ॥३९॥
(२. परहिंडो=घर में पेय जल रखने का स्थान)   {३. मारजनी=मार्जनी(झाड़ू)} (४. षंडणी=मिर्च मसाला पीसने की शिला या ओखली)  (५. चाकी=गेहूँ पीसने की चक्की)   (६. चूल्ही=रोटी, दाल, भात बनाने का स्थान)
संत जगजीवन जी कहते हैं कि जहां के परिंडे में पाप स्पर्श हो जहाँ झाडूसाह के हाथ हो जो सब साफ करदे चाहे पुण्य हो या पाप वहां कैसी चौका चूल्हा व  सिला हो ।
ए पंच दोष७ तब ऊतरै, जब ग्रिहि भोजन ले साध ।
कहि जगजीवन हरि भगत, सुमिरै अलख अगाध ॥४०॥
(७. पंच दोष=पाँच सूना । १. चूल्हा, २, चक्की, ३. ओखली, ४. घड़ा, ५. झाड़ू) -गृहस्थ धर्म में ये पाँचों हिंसा के स्थान है । यदि कोई गृहस्थ किसी साधु को नित्य भिक्षा दे तो उसके ये दोष नष्ट होते रहते हैं ।  
संत जगजीवन जी कहते हैं कि परिंडा जहाँ पीने योग्य जल है चूल्हा चक्की ओखली व झाड़ू ये पांच के हिंसात्मक दोष साधुजन को नित्य भोजन या भिक्षा कराने से नष्ट हो जाते हैं ।
(क्रमशः)  

दीपराम जी

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🌷*卐 श्री दादूदयालवे नम:  卐*🌷
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*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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*दादू जे साहिब कौं भावै नहीं,*
*सो हम थैं जनि होइ ।*
*सतगुरु लाजै आपणा, साध न मानैं कोइ ॥*
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दीपराम जी = दीपरामजी हरजीरामजी गुढ़ा वालों के शिष्य थे । आप भी भजनानन्दी महान् तितिक्षु संत थे । दीपरामजी के समय में एक राजपूत पहाड़ी पर खैरी काटने लगा, तब दीपरामजी ने कहा~इस झाड़ी के खैरी क्यों काटते हैं । यह बाबाजी हरजीरामजी के नाम से रक्षित है । उस राजपूत ने कहा~ चलरे मोडे, यह तो कटेगी । तब दीपरामजी महाराज वहां से चल दिये । उनके चले जाने के पश्चात् भारी हिमपात और जोर से आँधी आई । सब शाखें नष्ट हो गईं  । फिर ग्राम के सब लोग दीपरामजी के पास गये । खैरी काटने वाले राजपूत ने क्षमा माँगी फिर अति अनुनय विनय करके दीपरामजी को लौटा कर आश्रम लाये । दीपरामजी महान् संत थे । 
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जयरामदासजी =  जयरामदासजी उक्त दीपरामजी के ही शिष्य थे । खंडेलावाटी में डूक्यागोवटी के पास बड़सींगपुरे में हुये हैं । कुकणवाली ग्राम में भी उनका जाना आना था । आप भी अपने गुरुदेव दीपरामजी के समान ही भजनानंदी थे । त्यागी तथा तत्त्ववित् महात्मा थे । दादूवाणी का विचार करते रहते थे । निर्गुण ब्रह्म की उपासना करते थे । 
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५ तोलारामजी ~ तोलारामजी गोड़जी का गुढ़ा में ही रहते थे । हरजीरामजी के समकालीन ही थे । हरजीरामजी को भी कभी २ सचेत किया करते थे । परमविरक्त भजनानन्दी थे । आप भविष्य की बात भी जान जाते थे । खेतड़ी नरेश की मृत्यु की बात आपने हरजीरामजी को पहले ही कह दी थी और कहा~ यदि अपनी आयु देकर जीवित करना हो तो जाना और जीवित करने का सामर्थ्य नहीं हो तो नहीं जाना । जीवित नहीं कर सकोगे तो साधुओं की बदनामी होगी । 
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अन्य भी हरजीरामजी और तोलारामजी की  गोष्टीकी बात गौड़जी के गुढ़ा में प्रचलित है । वहां के लोग तोलारामजी को हरजीरामजी का गुरु भाई ही बताते हैं । वहां तोलारामजी की बगीची प्रसिद्ध है : मैं वहां गया था तब शौच स्नानादि के लिये तोलारामजी की बगीची पर ही गया था । बगीची में तोलारामजी के चरणचिन्ह भी हैं किन्तु चरणों की पूजा करने वालों की कृपा से अक्षर पढ़ने लायक नहीं रहे अतः समय का ठीक ज्ञान नहीं हो सका । 
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हरजीरामजी की शिष्य परम्परा के संत किशनदासजी ने अपनी संपत्ति चौथका खीचड़ा नारायणा दादूद्वारा के मेले के समय बनता रहे, इसलिये नारायणा के वर्तमान आचार्य को दे थी । आचार्य कृष्णदेवजी महाराज की शिष्य परम्परा के स्थान~१- गौड़जी का गुढ़ा २- मेड़ता शहर ३- जयपुर शहर घाट चौकड़ी रास्ता मोतीसिंह भौमिया ४- नारायणा ५- बोराबड । इति श्री तृतीय अध्याय समाप्तः ३ । 
(क्रमशः)

*२६. भजन प्रताप का अंग ~२१/२४*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*२६. भजन प्रताप का अंग ~२१/२४*
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*पंसेरी पिछले पले, अगले वित्त१ व्यवहार ।*
*फड़का२ माँडहिं कौन दिशि, वेता३ करो विचार ॥२१॥*
तुला से वस्तु तोलते हैं तब पंसेरी तो पिछले पलड़े में रहती है और वस्तु अगले पलड़े में, धन१ देने का व्यहवार लेने देने का व्यवहार अगले पलड़े की वस्तु लेने के लिये किया जाता है और वस्तु लेने वाला पल्ला२ भी किस ओर बिछाता है ? अर्थात वस्तु वाले पलड़े की ओर ही बिछाता है । हे ज्ञानी३ ! इसका विचार करो, वस्तु तोलने में निमिति होने पर भी पंसेरी का विशेष महत्त्व नहीं, वस्तु का ही है । वैसे ही मूर्ति आदि के निमित्त से भजन किया जाता है, तो भी मूर्ति आदि का विशेष महत्व नहीं, भजन का ही है । जैसे धन से वस्तु मिलती है, वैसे ही भजन से भगवान के दर्शन मिलते हैं ।
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*रज्जब अंडे भाव के, पंखी प्राण सु दीन ।*
*सेवा के बल सुत भये, ठाहर कछू न कीन ॥२२॥*
पक्षी जिस स्थान में अंडे देता है, उस स्थान का विशेष महत्व नहीं । कारण स्थान तो कुछ भी नहीं करता, वे तो पक्षी की सेवा के बल से ही बच्चे बनते हैं । वैसे ही साधक प्राणी किसी तीर्थ स्थान में रहकर भगवान में भाव करता है तब तीर्थ स्थान भाव का पोषण नहीं करता, वह तो साधक की भक्ति के बल से ही आगे भगवत् साक्षात्कार रूप अवस्था को प्राप्त होता है वह भजन का ही प्रताप है स्थान का नहीं ।
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*तृण तरु बेली अग्नि बिन, वह्नि१ ताखे२ व्याल३ ।*
*पावक प्रकटे सकल मध्य, सो पन्नग४ पर जाल ॥२३॥*
धास, वृक्ष, लता और अग्नि के बिना ही तक्षक१ सर्प२ में विषग्नि३ उत्पन्न होता है और वह सर्प४ उसी से अन्य को जलाता है, वैसे ही तीर्थ स्नान, माला, मूर्ति आदि बाह्म साधनों के बिना ही अन्तरंग साधना रूप भजन से सभी साधकों में ज्ञानाग्नि प्रकट होता है और स्वरूप से भिन्न अज्ञानादि को जला देता है, यह भजन का ही प्रताप है, अन्य का नहीं ।
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*साधू सविता१ की कला२, शब्द सदा परकाश ।*
*वहि सुनतों वहि देखतों, उर आँख्यों तम नाश ॥२४॥*
संत सूर्य१ के तेज२ के समान हैं, जैसे सूर्य का प्रकाश आँखों से देखने पर देखने वालों के अँधकार को सदा ही हर लेता है, वैसे ही संत का शब्द सुनने वालों के हृदय का अज्ञान सदा के लिये नष्ट कर देता है ।
(क्रमशः) 

*२६. भजन प्रताप का अंग ~१७/२०*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*२६. भजन प्रताप का अंग ~१७/२०*
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*सूखी शूली सौं हरि, भई भरथरी भाय ।*
*जन रज्जब ता जुगल में, पर हिं कौन के पाय ॥१७॥*
भर्तृहरि के सच्चे भाव से शूली सूखी होने पर भी हरी हो गई, यह देखकर शूली और भर्तृहरि इन दोनों में से लोग किस के चरणों में पड़ते हैं ? अर्थात भर्तृहरि के भजन का प्रताप से ही हरी हुई थी, अत: भर्तृहरि के चरणों में प्रणाम किया जाता है ।
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*जल थल महियल१ खंभ खँग२, विष वह्नि३ अहि४ लाय ।*
*रज्जब इष्ट५ न अष्ट में, बन्दहिं६ वन्दे७ भाय८ ॥१८॥*
प्रह्लाद जल में नहीं डूबा, पर्वत से नीचे स्थल में डालने से नहीं मरा, पृथ्वी१ में दबाने से, तलवार२ से काटने से विष देने से, अग्नि३ में डालने से, सर्प४ कटाने से भी नहीं मरा, खंभ से नृसिंह प्रकट हुए, इन उक्त अष्ट में से किसी का भी पूज्य५ भाव नहीं हुआ, सभी भक्त८ के भजनयुक्त सुन्दर भाव७ को ही प्रणाम६ करते हैं, अर्थात उक्त सभी कार्य भजन के प्रताप से ही सिद्ध हुये हैं ।
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*शिला तिराई समुद्र शिर, बँधी वरूण पर पाज ।*
*पै रज्जब वन्दन समय, रामचंद्र सौं काज ॥१९॥*
नल नीर ने समुद्र पर शिला तिराई, समुद्र पर सेतु बाँधा गया, किन्तु इसमें नल नील तथा समुद्र की विशेषता जानकर कोई नल नीर वा समुद्र को प्रणाम नहीं करते ! इस कार्य के लिये प्रणाम करते समय रामचन्द्रजी को ही प्रणाम करते हैं, इसी प्रकार भक्त के जीवन में जो भी विशेष घटना घटित होती है, वह उसके भजन के प्रताप से ही होती है और उसके लिये धन्यवाद भक्त को ही दिया जाता है ।
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*लोह तेल दिब१ ना दहै, सतवादी सु शरीर ।*
*तो रज्जब तिहुं तत्त्व२ में, कौन वन्दिये वीर३ ॥२०॥*
प्राचीन काल में उष्ण लोह चिपकाने तथा गर्म तेल के कहाड़ में डालने का कठोर दंड दिया जाता था, तब निर्दोषी सत्यवादी के शरीर को वे नहीं जलाते थे और सत्यासत्य का निर्णय करने के लिये पीपल का पत्ता हाथ पर रखके वा कच्चे धागे हाथ पर लपेट के उस पर अति गर्म लोहा का गोला१ रखते थे । वह निर्दोषी सत्यवादी के हाथ पर लपेट के उस पर अति गर्म लोह का गोला रखते थे । वह निर्दोषी सत्यवादी के हाथ को नहीं जलाता था, तो हे भाई३ ! अब सोचिये उक्त उष्ण लोह, तेल और लोह का गोला इन तीन वस्तुओं२ में किस की पूजा जाय ? अर्थात पूज्य तो सत्यवादी ही है, उसके सत्य के कारण उक्त तीनों नहीं जलाते, असत्यवादी और दोषी को तो जलाते ही हैं । वैसे ही भक्त के जीवन की विशेषताओं में भक्त का भजन ही हेतु है, अत: वह भजन का ही प्रताप है ।
(क्रमशः)

*२६. भजन प्रताप का अंग ~१३/१६*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*२६. भजन प्रताप का अंग ~१३/१६*
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*मंदिर सह मूरति फिरी, मुई जिलाई गाय ।*
*नामदेव के भजन की, जन रज्जब बलि जाय ॥१३॥*
मंदिर के सहित मूर्ति फिर गई तथा मरी हुई गाय को जीवित करदी, अत: नामदेव के भजन की मैं बलिहारी जाता हूँ । विशेष ईष्यार्लु व्यक्तियों ने गाय को मार के नामदेव के द्वार पर पटक दी थी और नामदेव ने गाय मार दी यह प्रचार किया था, फिर नामदेव ने संकीर्तन करते हुये गाय को जीवित कर दिया था ।
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*नामदेव दिब१ साचे देखो, भरथरि शूली धना सुखेत ।*
*चार्यों चेतन पूजिये, रज्जब जड़ों न हेत ॥१४॥*
नामदेव के लिये मंदिर फिरा तब मंदिर की महिमा न होकर नामदेव की ही हुई । सत्यासत्य का निर्णय करने पर लोह-गोला१ की महिमा नहीं होती किन्तु सच्चे मनुष्य की ही होती है । भर्तृहरि को चोर मानकर शूली लगाई, तब शूली हरी होकर न लगने से शूली की महिमा नहीं हुई, भर्तृहरि की ही हुई । बिना बीज खेत उत्पन्न होने से खेत की महिमा नहीं हुई, धन्ना की ही हुई । परिवर्तन रूप चमत्कार उक्त मंदिरादि चार जङों में दिखाई देता है किन्तु पूजे जाते हैं नामदेवादि चेतन ही, उनकी पूजा में जड़ मंदिरादि हेतु नहीं है उनका भजन ही है ।
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*दास भाव निज दास का, दीपक राग व्यवहार ।*
*अश्मदेव तमहर जगे, धन्य जगावन हार ॥१५॥*
भगवान के निजी भक्त के दास भाव का व्यवहार दीपक राग के समान है, जैसे यर्थात रूप में दीपक राग गाने से अंधकार हटाने वाला दीपक जग जाता है, वैसे ही भक्त के यर्थात भाव से पत्थरमय परमात्मादेव की उपासना से भी अज्ञानांधकार को नष्ट करने वाला आता है ज्ञान जग जाता है, इस पर पत्थरमय देव को धन्यवाद नहीं मिलता, किन्तु उसे जगानेवाला उपासक को ही दिया जाता है ।
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*जे बिन बीजहिं खेती भई, तो खेतहिं क्या अधिकार ।*
*जन रज्जब धनि धनि धना, कहै सकल संसार ॥१६॥*
यदि बिना बीज बोय ही खेती उत्पन्न हो गई तो खेत को उसके उत्पन्न होने के धन्यवाद का क्या अधिकार है ? अर्थात नहीं, सब संसार धन्ना भक्त को ही धन्य कहते हैं, कारण धन्ना के भजन के प्रताप से ही खेत निपजा है ।
(क्रमशः)

हरजीरामजी

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🌷*卐 श्री दादूदयालवे नम: 卐*🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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*दादू जे नांही सो सब कहैं, है सो कहै न कोइ ।*
*खोटा खरा परखिये, तब ज्यों था त्यों ही होइ ॥*
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हरजीरामजी ने तोलारामजी की बात मान ली । हरजीरामजी जीवित राजा से नहीं मिल पाये । वह इनके पहुँचने से कुछ पहले ही मर गया था । फिर हरजीरामजी ने अपनी शक्ति से या अपनी आयु देकर किसी भी प्रकार राजा को जीवित कर दिया था । इससे खेतड़ी नरेश तथा खेतड़ी राज परिवार की आप पर बहुत श्रद्धा थी । इत्यादिक चमत्कार की कथा ये गौड़जी के गुढ़े में प्रसिद्ध है ।
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उस समय उस प्रदेश में दादू पंथी तीन संत सिद्ध पुरुष थे १~ हरजीरामजी २~ तोलारामजी और ३~ गौड़जी के गुढ़े से कुछ ही दूर भोड़की के परमहंसजी भी भी महान् संत थे । जब हरजीरामजी परमहंसजी से मिलने अपने स्थान से चलते तो महान् योगेश्वर परमहंसजी को अपनी योगशक्ति से ज्ञात हो जाता तब वे अपनी कालीभर से चल देते । दोनों की कुटियाओं के बीच मार्ग में नीम्बावाली स्थान पर मिल जाते । फिर कुछ देर हरिचर्चा सत्संग करके जाने लगते तब हरजीरामजी एक पैर ऊंचा उठाते और परमहंसजी मुख फाड़ देते । फिर अपने २ मार्ग से चल देते ।
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एक समय एक सत्संगी सज्जन ने जो कई बार आपके उक्त व्यवहार को देख चुका था, परमहंसजी से पूछा~ भगवन् ! हरजीरामजी के पैर ऊपर उठाने का और आपके मुख फाड़ने का आशय क्या है ? कृपा करके बताइये । परमहंसजी ने कहा~ हरजीरामजी का तात्पर्य है कि इस पैर को ऊंचा करता हूं इतनी देर में ही प्राण निकल जाता है । इसलिये कृपा रखना फिर मिलन का तो क्या भरोसा है । मेरा मुख फाड़ना का भी यही तात्पर्य है मैं मुख फाड़ कर उनका समर्थन करता हूँ कि आप ठीक ही कहते हैं, मुख फाड़ते हैं इतनी देर में श्वास निकल जाता है । अतः आप भी कृपा रखना ।
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इससे सूचित होता है कि दोनों ही संत परम विरक्त थे । विरक्त संतों की यही भावना रहती है । स्थान- प्रथम स्थान मालपर्वत की थूमड़ी(कुटिया) हैं । गढ़ी चोमू ठाकुर ने, बीच का महल, दादू मंदिर राजा रामसिंह जयपुर ने, जल के कुंड महारावल समोद ने बनाये । गुढ़ा ग्राम में तीन हवेली हैं, दस दुकानें हैं । ये सब भी भक्तों की ही बनाई हुई हैं । नारायणे में हरजीरामजी का चौभीता महल भी प्रसिद्ध है । हरजीरामजी के ब्रह्मलीन होने पर उनकी समाधि स्मारक रूप विशाल छत्री खेतड़ी नरेश ने बनवाई थी ।
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उस छत्री में शिलालेख है~
श्रीरामजी,
दोहा~ “सागर नागर कुल विषै, शुभ तनु परम उदार ।
श्री दादू भू विमल यश, भये अंस अवतार ॥१॥
ताके पंथ में अवतरे, सिद्ध दिगंबर धीर ।
वर श्री हरजीरामजी, नृप कुल अद्भुत वीर ॥२॥
भये तपो धन तेज धन, शोभा भई अपार ।
लोक राज पूजत भये, जानि धर्म निजसार ॥३॥
वृद्ध भये तन त्यागियो, भज श्री पति सुख सार ।”
इसका अगला पाठ ठीक पढ़ने में नहीं आया । हरजीरामजी की समाधि पर भादवा में मेला भरता है ।
(क्रमशः)

*४६. परमारथ कौ अंग ३३/३६*

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*श्रद्धेय श्री @महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी, @Rgopaldas Tapsvi, बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ @Premsakhi Goswami*
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*४६. परमारथ कौ अंग ३३/३६*
कहि जगजीवन रांमजी, दया धरम जहँ होइ ।
प्रेम भगति फूलै फलै, दुक्ख न व्यापै कोइ ॥३३॥
संत जगजीवन जी कहते हैं कि हे प्रभु जी जहाँ दया व धर्म होता है वहां भक्ति प्रेम फलता फूलता है और कोइ दुख नहीं व्यापता है ।
पर उपकारी गगन धर, पर उपकारी नीर ।
कहि जगजीवन पर उपकारी, दादूदास कबीर ॥३४॥
संत जगजीवन जी कहते हैं कि संत जन गगन जैसै परोपकारी होते हैं जो सब पर आवृत होता है जल प्रकाश वायु सभी देता है जल भी परोपकारी है संत दादू जी महाराज व कबीर साहिब भी परोपकारी संत है जो लोककल्याण की बात करते हैं ।
पर उपकारी आप हरि, अबिगत अलख अगाध ।
कहि जगजीवन पर उपकारी, रांम कहावै साध ॥३५॥
संत जगजीवन जी कहते हैं कि प्रभु परोपकारी है वे दिखते नहीं है वे जाने नहीं जा सकते उनका पार नहीं पा सकते, साधुजन भी परोपकारी हैं प्रभुमय हैं ऐसा मानते हैं ।
कहि जगजीवन बड़ ब्रिक्ष९. अलख उपावै१० आप ।
औरन कौं छाया करै, आप सहै सिर ताप११ ॥३६॥
(९. बड़ व्रिक्ष=बड़ा वृक्ष; २. वट वृक्ष)   (१०. उपावै=उत्पन्न करे)   (११. ताप=गरमी)      
संत जगजीवन जी कहते हैं कि वटवृक्ष जैसे लोक को प्रभु आप स्वयं उत्पन्न करते हैं, जो ऐसा परोपकारी है कि सबको शीतल छाया देकर स्वयं ताप सहता है ।
(क्रमशः) 

बुधवार, 19 अगस्त 2026

जयपुर नरेश रामसिंहजी

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*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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*दादू एता अविगत आप थैं,*
*साधों का अधिकार ।*
*चौरासी लख जीव का, तन मन फेरि सँवार ॥*
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पश्चात् सामोद के रावलजी तथा जयपुर नरेश रामसिंहजी भी हरजीरामजी के पास आने लगे । पर्वत के ऊपर दादू मंदिर तथा अच्छा स्थान जयपुर नरेश और समोद रावलजी ने ही हरजीरामजी के त्याग, तपस्या और चमत्कारों से प्रभावित होकर बनवाया था । स्थान के पास ही जल के कुंड हैं । बड़ा सुन्दर स्थान है । पर्वत के ऊपर वाले मंदिर में हरजीरामजी के सामने बैठे हुये जयपुर नरेश रामसिंहजी और सामोद रावल का चित्र भी था किन्तु कुछ समय स्थान सूना रहा इससे उस चित्र को कोई ले गया ।
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सामोद के तत्कालीन रावल की रक्षा अंग्रेजों से हरजीरामजी ने की थी । इससे हरजीरामजी पर बहुत श्रद्धा रखते थे और उस समय सामोद रावलजी जयपुर नरेश के मंत्री थे । जयपुर नरेश रामसिंहजी तथा जयपुर राज्य के सामन्त हरजीरामजी पर अत्यन्त श्रद्धा रखते थे । हरजीरामजी की कई चमत्कार पूर्ण कथायें भी गौड़जी के गुढ़े में प्रसिद्ध है~
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१~ तोलारामजी संत गौड़जी के गुढ़े में ही रहते थे । तोलारामजी की बगीची वहां अब भी है । एक दिन तोलारामजी के पास कई सज्जन बैठे थे । उनमें एक सज्जन की अंगुली में विष का कांटा निकल रहा था । वह उसकी पीड़ा से बहुत दुःखी था । उसने तोलारामजी से प्रार्थना की । तब तोलारामजी ने कहा- जाकर कालिया(हरजीरामजी) की गुदा में दे दे ठीक हो जायगा । फिर वह हरजीरामजी के पास गया किन्तु संकोचवश कह न सका । तब सिद्ध हरजीरामजी ने ही कहा तुम अपनी अंगुली मेरी गुदा में दे दो । तब तत्काल उसने अपनी अंगुली हरजीरामजी के नितम्बों के बीच में दे दी । फिर तो उसी समय उसका विषकांटा जन्यकष्ट नष्ट हो गया । फिर वह धन्यवाद देते हुये अपने घर चला गया ॥
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२~ एक दिन हरजीरामजी भजन कर रहे थे । उस समय कुछ व्यक्ति उनके पत्थर मारने लगे । पहले तो हरजीरामजी ने सोचा अबोध मनुष्य हैं रुक जायेंगे । किन्तु वे मारते ही रहे । तब हरजीरामजी ने कहा~भाइयों तुम दूसरों पर पत्थर डाल रहे हो, इसका फल यही होगा कि तुम्हारे पर पत्थर ही पड़ेंगे । फिर उन पत्थर डालने वालों की खेती पर भारी बर्फ के पत्थर पड़े जिनसे सब खेती नष्ट हो गई । तब वहां के लोग हरजीरामजी से डरने लगे थे । फिर हरजीराम के भजन के समय कोई विघ्न नहीं हुआ ।
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३~ तत्कालीन चोमू ठाकुर साहब और सामोद के तत्कालीन रावलजी पर १४ के गदर में अंग्रेजों के मरवाने का दोष लगाया गया था । जयपुर नरेश रामसिंहजी ने उन दोनों को कहा हरजीरामजी के शरण जाओ । अंग्रेजों के कोप से हरजीरामजी की कृपा से ही बचोगे । वे गये । हरजीरामजी ने उनको आश्वासन दिया था और वे सर्वथा बाख गये थे । हरजीरामजी ने वाइसराय की मेम को स्वपन में दोनों निर्दोष हैं बताकर बचाया था । अतः उनकी हरजीरामजी पर अत्यन्त श्रद्धा थी ।
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४~ चोमू ठाकुर साहब ने गुफा वाली गढ़ी बनाई उसके विषय में गौड़जी के गुढ़ा के वृद्ध पुरुष कहते हैं । चोमू ठाकुर की कुछ भूमि जयपुर नरेश रामसिंहजी ने खालसे करली थी । उसको पुनः प्राप्त करने की इच्छा से चोमू ठाकुर हरजीरामजी के पास गुढ़ा गये थे । हरजीरामजी ने उनको आश्वासन दिया था कि शीघ्र ही तुमको मिल जायगी । वह मिल गई तब चोमू ठाकुर कुछ धन लेकर आये थे । हरजीरामजी ने धन लेना स्वीकार नहीं किया किन्तु विशेष आग्रह करने से कह दिया कि यहां कुछ बना दे । इससे चोमू ठाकुर ने गुफा वाली गढ़ी बनवाई थी । फिर उस गुफा में हरजीरामजी भजन करते थे ।
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५~ रिणी राजगढ़ का आयकर तत्कालीन बीकानेर नरेश हरजीरामजी के सेवा में गौड़जी के गुढ़े भेजा करते थे । यह किस चमत्कार से भेजना आरंभ किया था, इसका पता नहीं लगा । किन्तु यह तो निश्चय ही है कि बिना किसी कारण विशेष के तो राजा लोग ऐसा करते नहीं हैं ।
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६~ तत्कालीन खेतड़ी नरेश बहुत बीमार हो रहे थे । जब औषधियों से कुछ लाभ नहीं हुआ तो राजा ने हरजीरामजी को बुलाने घुड़सवार और उनको लाने के लिये सवारी भेजी । घुड़सवार तथा सवारी हरजीरामजी के पास आये तब ग्राम में यह बात शीघ्र ही फ़ैल गई । तोलारामजी के पास भी पहुँच गई । हरजीरामजी जब खेतड़ी जाने लगे तब उनके गुरु भाई तोलारामजी ने हरजीरामजी को एक मानव के द्वारा कहलाया~ कि हरजीरामजी को मेरी ओर से कहो- कि आप जाते तो हैं किन्तु आपके पहुँचने के पहले ही राजा मर जायगा । अतः अपनी आयु में से कुछ आयु उसे देकर जीवित करके ही आना । मरा छोड़कर आओगे तो साधुओं की बदनामी होगी ।
(क्रमशः)

*४६. परमारथ कौ अंग २९/३२*

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*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
*श्रद्धेय श्री @महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी, @Rgopaldas Tapsvi, बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ @Premsakhi Goswami*
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*४६. परमारथ कौ अंग २९/३२*
कहि जगजीवन धरम की, जिन जिन बांधी मोट२ ।
सिर थैं पटकी पाप की, रहै रांम की ओट३ ॥२९॥
(२. मोट=गठरी)   (३. ओट=शरण)
संत जगजीवन जी कहते हैं कि जिन्होंने धर्माचरण की गठरी बांध ली है प्रभु ने उनके पाप की गठरी दूर उतार फैंकी है व अपनी शरण भी दी है ।
कहि जगजीवन धरम की, साध न छांडै बाणि४ ।
हाणि५ हणै लाहा६ गिणै, परम पुरुष पहिचाणि ॥३०॥
{४. बाणि=स्वभाव(आदत)}   {५. हाणि=हानि(नुक्सान)}
संत जगजीवन जी कहते है कि साधुजन धर्म की प्रवृति को नहीं छोड़ते वे हानि लाभ नहीं गिनते वे सब प्रभु को समर्पित कर देते हैं । वे प्रभु को पहचानते हैं ।
हंस हंसनी पै७ पियौ, धर्यौ धर्या की आस ।
रांम रतन धन परगट्यौ, सु कहि जगजीवनदास ॥३१॥
{७. पै=पय(दूध)} 
संत जगजीवन जी कहते हैं कि संतजन व आत्मा परमात्मा दोनो का मेल है यै धर्म की ही आस रख कल वह ही क्षीर पान करते हैं । जिससे राम रुपी रत्न प्रकट होते हैं ।
सिर चढ़ाइ धरि गुहा में, प्रगट किया सुस्थांन ।
कहि जगजीवन दरिद्दर८, दूर किया गुर ग्यांन ॥३२॥
{८. दरिद्दर=दारिद्र्य(निर्धनता)}   
संत जगजीवन जी कहते हैं कि प्रभु मान देते हैं फिर उचित स्थान पर प्रकट भी होता है । इस प्रकार प्रभु अज्ञान दारिद्र्य को दूर करके ज्ञानधन देते हैं ।
(क्रमशः)