*🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏*
*🌷卐 सत्यराम सा 卐🌷*
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*२५. नाम निरूप आदम अकलि का अंग ~१३/१७*
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*आकाश अनंग आभै गहै, त्यों अविगत रस नाम ।*
*रज्जब आवे तहां तैं, अवनि सु आतम ठाम ॥१३॥*
आकाश निराकार है फिर भी बादलों को ग्रहण करता है, वैसे ही मन इन्द्रियों के अविषय परमात्मा निराकार हैं, तो भी नाम - चिन्तन रूप रस को ग्रहण करते हैं । जैसे आकाश में स्थित बादलों से जल पृथ्वी पर आता है, वैसे ही नाम - चिन्तन द्वारा आत्मा ब्रह्म स्वरूप-धाम में आता है ।
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*निकुल१ निनामा२ शून्य३ में, आभा४ रूपी नाम ।*
*जन रज्जब चित चातका, जल जीवन जिस ठाम ॥१४॥*
जैसे आकाश में बादल४ होते हैं, वैसे ही कुलरहित१ और नामरहित२ निर्विकार३ ब्रह्म में नाम है । जिस बादल में जीवन रूप जल होता है, उस बादल की ओर ही चातक पक्षी जाता है, वैसे ही जिस नाम में चित्त को रस आता है, उसी नाम रूप धाम की ओर चित्त जाता है ।
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*मही महादेव ते गये, नीर नाम आकाश ।*
*सो सहस गुण हो स्रवे१, समा२ किया फिर तास ॥१५॥*
पृथ्वी से जल आकाश को जाता है और हजार गुणा होकर बर्षता१ है तथा वही पुन: सुकाल२ कर देता है, वैसे ही महादेवजी आदि के द्वारा धरे हुये प्रभु के नाम ब्रह्म रूप आकाश में जाते हैं, अर्थात उनके स्वरूप का वर्णन करते हैं, फिर वे ही चिन्तन द्वारा हजार गुणा आनन्द देकर साधकों को आनन्दित करते हैं ।
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*जे कुछ उपज्या मांड में, नाम सभी के नांहि ।*
*रज्जब काढे ज्ञान सौं, जो लक्षण उन मांहि ॥१६॥*
ब्रह्माण्ड में जो कुछ भी उत्पन्न हुये हैं, उन सभी के पहले नाम न थे, फिर बुद्धिमानों ने अपने ज्ञान बल से जैसे लक्षण उनमें देखे, वैसे ही उनके नाम रख दिये वैसे ही परमात्मा के रक्खे गये हैं ।
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*नाम निनामे पर धर्या, ता पर नर का नेह ।*
*या पर और न सूझ ही, रज्जब देखैं येह ॥१७॥*
नामरहित परमात्मा का ज्ञानीजनों ने नाम रख दिया है, नाम के द्वारा ही मनुष्य का प्रेम प्रभु में होता है । प्रभु प्राप्ति का साधन इस नाम चिन्तन से श्रेष्ठ अन्य नहीं दिखता, हम तो इसे ही सर्वश्रेष्ठ रूप से देख रहे हैं ।
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इति श्री रज्जब गिरार्थ प्रकाशिका सहित “२५. नाम निरूप आदम अकलि का अंग” समाप्त ॥
(क्रमशः)
























