मंगलवार, 24 मार्च 2026

काल ॥ साषी लापचारी की ॥

🌷🙏 🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
.
*गर्वै भाव न ऊपजै, गर्वै भक्ति न होइ ।*
*गर्वै पिव क्यों पाइये, गर्वै करै जनि कोइ ॥*
*गर्वै बहुत विनाश है, गर्वै बहुत विकार ।*
*दादू गर्व न कीजिये, सन्मुख सिरजनहार ॥*
==============
काल ॥ साषी लापचारी की ॥१ (१ इनका अर्थ “काल कौ अंग” की साषियों में देखें)
जाकै सूरिज तपै रसोई, पवन अँगना जु बुहारै । 
नौ ग्रह बंध्या पाइ, मींच कूँ कुवै उसारै ॥
बिह जाकै दाँणौं दलै, बंदि बांध्या तेतीस ।
बषनां वै भी काल गिरासिया, जाकै दस माथा भुज बीस ॥
जाकै जल था जंघ सवाँणाँ । सागर मथिया करि मेर मथाणाँ ॥
हाथाँ धरि धरि पर्वत ल्याये । बषनां काल उसे नर खाये ॥ 
.   
पद ॥
मनिखा मान न कीजै, गहिला गर्ब न कीजै ।
पल पल जाइ अवधि दिन आवै, आव घटै दिन छीजै ॥टेक॥
एकै घूँट समँद जिनि सोख्या, हाथौं परबत ल्याये ।
लंका छोडि प्रलंका पहुँचे, ते भी कालहि खाये ॥
धरि चाँपी धरि गई पयालाँ, एक दाढ परि ल्याये ।
जाकी मापी भई एक डग, ते भी अंति बिलाये ॥
लंका सा कोट समद सी खाई, मंदोदरि सी राणी ।
दस मस्तक बीस भुज जाकै, सो मारि किया धुल धाणी ॥
दाणौं देखि दलै बिह बैठी, रावण तणाँ घराँ ।
वाकै माथैं कौणैं लिखिया, वा लिखती औराँ ॥
चंद कलंक समद पणि खारौ, सीता राम बिजोगा ।
ग्रब काहू कौ रहण न पावै, गरव करौ जिनि लोगा ॥
बडाँ बड़ी कौ डोरू बाजै, बेद पुराणाँ साषी ।
क्रिष्नदेव की गोपी लूटी, अरजन सक्यौ न राखी ॥
कैरौं कहाँ कहाँ पँच पांडौं, भारत भिड़ते भाई ।
दिन दोइ चारि आपणी नौबति, केते गये बजाई ॥
सुर नर मुनिजन पीर पैकंबर, चंद सूर पणि गहिये ।
बषनौं कह हरि गर्ब प्रहारी, जाथैं डरता रहिये ॥७९॥
.
मानव ! अभिमान मत कर, हे मूर्ख ! गर्व मत कर । तेरे जीवन की निश्चित आयु की अवधि पल-पल क्षीण हो रही है तथा मृत्यु का समय नजदीक आता जा रहा है । आयु दिनों-दिन घट रही है । दिनों पर दिन व्यतीत हो रहे हैं । जिन अगस्त्य ऋषि ने संपूर्ण सागर के जल को एक घूँट के समान पी लिया; जो पवनपुत्र हनुमान लंका को छोड़कर लंका के बाहर से द्रोणगिरि पर्वत को उखाड़कर हाथ में उठा लाये वे भी काल के ग्रास बन गये । 
.
जिस हिरण्याक्ष राक्षस के द्वारा पृथिवी को दबाने पर पृथिवी पाताल में चली गई, उसे शूकर शरीरधारी भगवान् एक दाढ पर रखकर ले आये और उसी पृथिवी को जिन वामनावतार भगवान् ने एक ही ढग में माप डाली वे भी अंत में मर गये, अमर नहीं रह सके । जिस रावण के पास लंका सा किला, उस किले की सुरक्षा के लिये समुद्र सी खाई, मंदोदरी जैसी पतिव्रता पत्नी, दस मस्तक और बीस भुजाएँ थीं उसे भी रामजी ने मारकर नेस्तनाबूद कर दिया ।
.
जिस रावण के घर में अनाज के एक-एक दाने को देखकर बिधना बैठी-बैठी पीसा करती थी, बताइये उस बिधना के ललाट पर किसने दाना पीसना लिखा था जबकि वह स्वयं ही सबके ललाटों पर जन्म के छटे दिन भाग्य लिखती है ? चंद्रमा के परस्त्रीगमन का कलंक लगा जो आज भी प्रत्यक्ष दीखता है, जल की निधि समद्र का जल खारा हो गया, सीता और राम का वियोग हुआ । 
.
अतः हे मनुष्यों ! अपने धन, जन, बल का गर्व मत करो । गर्व किसी का भी रहता नहीं है क्योंकि परमात्मा गर्वप्रहारी है । वह गर्व करने वालों के गर्व को स्थिर नहीं रहने देता है । अनेकों बड़े-बड़े = महान् स्त्री-पुरुषों के गौरव-गान के ढोल बजते रहे हैं जिनकी साक्षी वेद-पुराणादि में सुरक्षित हैं । उनमें कृष्ण और अर्जुन का नाम अन्यतम है । फिर भी उन्हीं कृष्ण की गोपियों को भीलों द्वारा लूट लिया गया और उनकी रक्षा में चल रहा उनके साथ अर्जुन उनकी तनिक सी भी रक्षा नहीं कर सका । 
.
आज वे बलशाली कौरव और पांडव कहाँ हैं जिन्होंने महाभारत जैसा युद्ध लड़ा था । अर्थात् वे सभी दो चार दिन अपनी-अपनी नोबत बजाकर = अपना-अपना कार्य करके मर गये । उनमें से कोई भी शेष नहीं बचा । चाहे देवता, मनुष्य, मुनिजन, पीर, पैगंबर, चंद्रमा और सूर्य हों चाहें और कोई हों, किसी के भी गर्व को भगवान् रहने नहीं देता । वह गर्वप्रहारी, गर्वगंजन है । अतः गर्व कभी मत करिये । गर्व करने से बचते रहिये ॥७९॥ 

सोमवार, 23 मार्च 2026

*७.आज्ञाकारी आज्ञा भंगी का अंग ~ १७/१९*

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
.
*७.आज्ञाकारी आज्ञा भंगी का अंग ~ १७/१९*
.
सीता सुरति उलंधिया, राम लीक गुरु बैन ।
रज्जब रावण काल कर, चढ़या न पावे चैन ॥१७॥
१७-१८ में आज्ञा भंगियों के उदाहरण कह रहे हैं - सीता ने राम के भाई लक्ष्मण की लीक का उलंधन किया तब रावण के हाथ में आकर कष्ट उठाया । वैसे ही शिष्य की वृत्ति गुरु के वचनों को उलंधन करती है तब शिष्य काल के हाथ में आकर व्यथित होता है ।
.
रज्जब रजा१ रजानिकर२, आजाजील शैतान ।
हुआ फजीहत फरिश्ता३, मेट अलह फरमान ॥१८॥
ईश्वर ने आदि मानव आदम को रचकर अप्सराओं तथा फरिश्ताओं को कहा, इसे प्रणाम करो, अन्य सबने तो आदम को प्रणाम किया किन्तु शैतान अजालील ने ईश्वर की यह आज्ञा१ नहीं मानी । इस ईश्वर के हुक्म को न मानने२ से ही उस ईश्वर दूत३ को बेइज्जत पूर्वक फरिश्ताओं से निकाल दिया गया । बड़ों की आज्ञा न मानने से ऐसा ही होता है । अत: गुरुजनों की आज्ञा अवश्य माननी चाहिये । यह कथा छप्पय ग्रंथ के आज्ञा भंग अंग १५ छप्पय एक की टीका में विश्तार से है ।
.
रज्जब गुरु गोविन्द की, मया१ मेघ प्रतिपाल ।
इन बिरच्यूं२ राचे३ विघन, केवल आतम काल ॥१९॥
१९ में आज्ञा मानने, न मानने का लाभालाभ दिखा रहे हैं - और गोविन्द की कृपा१ रूप मेध से पालन होता है । इन दोनों में उपराम२ होने से केवल विध्न ही होते३ हैं और जीवात्मा को यम-यातना भोगनी पड़ती है । अत: सदा गुरु और गोविन्द की आज्ञा में ही रहना चाहिये ।
इति श्री रज्जब गिरार्थ प्रकाशिका सहित “७. आज्ञाकारी आज्ञा भंगी का अंग” समाप्त ॥
(क्रमशः)

*७.आज्ञाकारी आज्ञा भंगी का अंग ~ १३/१६*

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
.
*७.आज्ञाकारी आज्ञा भंगी का अंग ~ १३/१६*
.
*गुरु धरती गोविन्द जल, शिष तरुवर मधि पोष *
*रज्जब सरके ठौरतैं, देखि दुहुं दिशि दोष ॥१३॥*
१३-१५ में आज्ञाकारी और आज्ञा भंगी की होने वाली उन्नति तथा हानि दिखा रहे हैं - गुरु पृथ्वी के समान हैं और गोविन्द जल के समान हैं । वृक्ष पृथ्वी में लगा रहता है तब तो जल से उसका पोषण होता है और पृथ्वी से उखड जाने पर जल से गल जाता है । वैसे ही शिष्य गुरु की आज्ञा में रहता है तब तो निष्काम गोविन्द भजनादि से परमार्थ की आज्ञा में रहता है तब तो निष्काम गोविन्द भजनादि से परमार्थ उसका पोषण होता रहता है और गुरु आज्ञा में नहीं रहता तब सकाम साधना द्वारा संसार में ही पड़ता है ।
.
*शिष्य गुडी१ सुरति डोरी में, गुरु खिलार हित हाथ ।*
*तंतू टूटे तैं गई, साबित२ सांई साथ ॥१४॥*
पतंग१ डोरी में बँधकर उड़ाने वाले खिलारी के हाथ में है तब तक तो उसके साथ है और डोरी टूट जाय तो उसके हाथ से चला जाता है । वैसे ही शिष्य आज्ञा मानना रूप वृत्ति-डोरी में बँधकर गुरु के स्नेह-हाथ में है तब तक तो ठीक२ रूप से परमात्मा के साथ है और आज्ञा मानना रूप वृत्ति टूट जाय तो वह भी प्रभु से दूर हो जाता है ।
.
*ज्यों धोडा असवार वश, चलै पराये भाय१ ।*
*रज्जब अड़२ अपनी गहै, तभी मार बहु खाय ॥१५॥*
अश्व अश्वारोही के वश में है तथा अपने से भिन्न अश्वारोही के भावानुसार१ चलता है तब तक तो ठीक है और जब वह अपनी टेक२ पकडता है तब खूब मार खाता है । वैसे ही शिष्य गुरु आज्ञा में चलता है तब तक तो ठीक है और अपने हट से यमन की इच्छानुसार चलता है तब भारी यम यातना भोगता है ।
.
*अणी१ अग्नि अहि सौं असह२, गुरु आज्ञा में गौन ।*
*जन रज्जब तन त्रास तुच्छ, मन हिं मरावे कौन ॥१६॥*
१६ में कहते हैं - गुरु आज्ञा पालन कठिन होने पर भी, उसका फल देखते हुये कष्ट अति कम है - भाला आदि का अग्र२ भाग चुभन से, अग्नि के ताप से और सर्प से होने वाले दु:ख से भी गुरु आज्ञा पालन करने का दु:ख असह्य२ है तो भी इसका जो मन को जीतना रूप महाफल है, उसके आगे इससे होने वाला शारीरिक कष्ट अति तुच्छ है । कारण - गुरु को छोडकर और कौन मन को मारने में सहायता करता है ?
(क्रमशः)

रविवार, 22 मार्च 2026

मारवाड की रामत

*#daduji*
*॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥*
*॥ दादूराम~सत्यराम ॥*
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
.
३- एक दिन प्रात: पं. धनीराम जी परमहंस और कनिराम जी स्वामी को आचार्य प्रकाशदेव जी ने कहा - आज तो कलकत्ते के भगतबाबू कालीचरण आने चाहिये । वे गुरु द्वारे के दर्शनार्थ मार्ग में आ रहे हैं । कुछ समय के बाद ही कलकत्ते के भगत विश्‍वभंर दयाल शांति भवन वाले आ गये । वे मंदिर में दर्शन करके आचार्य प्रकाशदेव जी महाराज के पास बारहदरी में आये । 
.
भेंट करके प्रसाद ग्रहण किया फिर सब संतों को प्रसाद करा कर वे तो लौट गये । फिर धनीरामजी तथा कनीराम जी ने आचार्य को कहा - महाराज आपने आज प्रात: कहा कि - कलकत्ते के भगत कालीचरण आज आने चाहिये । सो भगत तो अवश्य आ गया किन्तु कालीचरण तो नहीं आये । तब आचार्य प्रकाशदेवजी महाराज ने कहा - मार्ग में चल रहे हैं, आने वाले ही हैं । 
.
इसके कुछ ही पश्‍चात् भगत कालीचरण नाथद्वारा कांकरोली की यात्रा करके मांजी आदि के साथ मोटर से दादू द्वारे में आ पहुँचे । इसके साक्षी धनीरामजी तथा कनिरामजी हैं । बाबू कालीचरण दादूधाम नारायणा की यात्रा करके  कुंभ मेले में गये । उनके साथ ही धनीरामजी तथा पुजारी बसन्तीराम जी भी कुंभ मेले में गये थे ।
.  
४- आचार्य प्रकाशदेव जी महाराज का वि. सं. २००३ का चातुर्मास स्वनाम धन्य बाबा गंगारामजी प्याऊ(मारवाड) वालों ने अपने यहाँ करवाया था । उस चातुर्मास में मारवाड की भक्त जनता का आना जाना बहुत रहा था । इससे महाराज प्रकाशदेव जी की साधुता, सिद्धि, व्यवहारिकता तथा प्रेम की छाप मारवाड की धरा के भक्तों पर बहुत अच्छी लगी थी । वे आचार्य प्रकाशदेव जी महाराज के व्यक्तित्व से बहुत प्रभावित हुये थे । 
.
गंगादासजी महाराज की श्रद्धा तो आचार्य प्रकाशदेव जी पर इतनी थी कि वे तो आचार्य जी को दादू जी महाराज का स्वरुप ही मानते थे । चातुर्मास के पश्‍चात् गंगाराम जी महाराज ने आचार्य जी को साथ लेकर मारवाड की रामत करवाई थी । जोधपुर नरेश के राजगृह तक आपको ले गये थे तथा जितने भी अपने मुख्य - २ भक्त थे उनके घर आचार्य प्रकाशदेव जी के चरणों से पवित्र करवाये थे । गंगारामजी महाराज जैसे उच्चकोटि के संतों की इतनी श्रद्धा भी आचार्य प्रकाशदेवजी की महानता की द्योतक है ।
(क्रमशः)

२१. समर्थाई आश्चर्य को अंग ४५/४८

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
.
२१. समर्थाई आश्चर्य को अंग ४५/४८
.
उतपति सांई तैं किया, प्रथम हि वो ऊंकार । 
तिसतें तीनौं गुन भये, सुन्दर सब बिस्तार ॥४५॥ 
सृष्टिरचना : हे स्वामिन ! आप ने सर्वप्रथम ॐ का उच्चारण किया । उस से तीन गुण(सत्त्व, रज, तम) उत्पन्न हुए । उन ही से इस महत् तत्त्व आदि समस्त सृष्टि का विस्तार हुआ है१ ॥४५॥ 
(१ तु० - श्रीमद्भगवद्‌गीता : ॐ तत् सदिति निर्देशो ब्रह्मणस्त्रिविधः स्मृतः । - अ० ५, श्लो० २३.)
.
तिनका रच्या सरीर यह, महल अनूपम एक । 
चौरासी लख जूनु ये, सुन्दर और अनेक ॥४६॥
आपने उन सब के सङ्घात(समन्वय) से अनुपम एवं दर्शनीय प्रासाद(महल) के सदृश इस शरीर की रचना की । इस में चौरासी लाख योनियों के छोटे बड़े अनेक प्रकार के शरीरधारी जीव दिखायी देते हैं ॥४६॥
.
आपन बैठा गोपि ह्वै, सुन्दर सब घट मांहि । 
करता हरता भोगता, लिपै छिपै कछु नांहिं ॥४७॥ 
इतनी विशाल रचना के बाद आप स्वयं प्रत्येक प्राणी के हृदय में विराजमान हुए१ । इस प्रकार आप उस प्राणी के रचयिता, पालयिता एवं कर्मफलभोक्ता भी हुए । अतः उस प्राणी का कोई भी कर्म आप से गुप्त(छिपा हुआ) नहीं रह सकता ॥४७॥ 
(१ तु० - श्रीमद्भगवद्‌गीता : ईश्वरः सर्वभूतानां हद्देशेऽर्जुन तिष्ठति । - अ० १८, श्लो० ६१.)
.
ऐसी तेरी साहिबी, जांनि न सक्कै कोइ । 
सुन्दर सब देखै सुनै, काहू लिप्त न होइ ॥४८॥
इस समस्त पृथ्वी के प्राणियों पर आप का ऐसा कठोर अनुशासन(स्वामित्व = साहिबी) है कि उसे कोई साधारणतः समझ नहीं पाता । यह आप के विषय में कैसी आश्चर्यमयी बात है कि आप इस सृष्टि के सब कुछ(कर्ता धर्ता) होकर उसके किसी भी कर्म में लिप्त नहीं होते२ ॥४८॥ 
(२ तु० - श्रीमद्भगवद्‌गीता : नादते कस्यचित्पापं न चैव सुकृतं विभुः । - अ०५, श्लो० १५.)
(क्रमशः) 

साथनि सहेलड़ी हे

🌷🙏 🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
.
*सहज सहेलड़ी हे, तूँ निर्मल नैन निहारि ।*
*रूप अरूप निर्गुण आगुण में,*
*त्रिभुवन देव मुरारि ॥*
==============
*विरह ॥*
साथनि सहेलड़ी हे, हेली म्हारौ रँग भरि राम रमाइ ।
मुख माँहैं दस आंगुला, हूँ इहिं बिधि लागौ पाइ ॥टेक॥
येकैं घर मांहै रहै, बासौ येकैं ठाँइ ।
हूँ तौ इहि दुख दूबली, यौ बोलै नहीं सु काँइ ॥
काया बन मैं हूँ गई, जदि कौ रह्यौ रिसाइ ।
मरिये हे नणद अबोलणैं, हूँ रही मनाइ मनाइ ॥
पाड़ौसणि म्हारी बुरी, जिहि की घाली राँति ।
साँई म्हारौ भरिषवौं, पणि मन मैं पड़ी भिराँति ॥
नीड़ौ ही अलगौ जिसौ, जे आवै नाहीं भाइ ।
हरि बिन दूभर क्यूँ भरौं, मोनैं रैंणि छमासी जाइ ॥
कामण मोहण बहु किया, मैं कीया बहुत उपाय ।
यहु क्याँही कै बसि नहीं, क्यूँ ही लीयौ न जाइ ॥
घणाँ दिनाँ कौ रुसणौं, जे अबकै भागौ नाहिं ।
कूवा केरी छाँह ज्यूँ, म्हारा मुवा मनोरथ माहिं ॥
कबहुँक हित चित चूनड़ी, कबहुँक परहरि जात ।
कहि बषनां काँयौं कहूँ, म्हारा ये ठाकुर की बात ॥७८॥  
.
साथनि-सहेलड़ी = सदैव साथ में रहने वाली सहेली, मित्र = मनसा = वृत्ति । रंगभरि = प्रियतम के अनन्य प्रेम में सराबोर । राम रमाय = राम का साक्षात्कार । दस आंगुला = दसों इन्द्रियाँ । मुख माँहै = बहिर्मुख । लागौं पाइ = अन्तर्मुखी । एकैं घर = शरीर में ही आत्मा-परमात्मा दोनों का निवास है । काया बन = विषयों में अनुरक्ति । अबोलणैं = आपस में वार्तालाप न होना, परमात्मा शरीर ही में है फिर भी उसका साक्षात्कार नहीं होता । नणद = मनसा, वृत्ति । पाड़ौसणि = इंद्रियाँ । राँति = अंतर । भरिषवौं = सहनशील । पणि = किन्तु । भिराँति = भ्रांति, भ्रम, सत्य कुछ हो किन्तु सत्य समझ कुछ और लिया जाये । भाइ = भावपूर्वक, उत्साह-उमंग के साथ । दूभर = असह्य अमिलन, दुख । भरौं = सहन करूँ । मोनैं = मुझे (हाड़ौती क्षेत्र की बोली में मूँने, मोनैं मुझे के अर्थ में बोला जाता है) कामण-मोहण = वशीकरण आदि तांत्रिक क्रियाएं ।  
.       
हे सहेली रूपी मनसा मेरे प्रियतम रमैयाराम से अनन्य अनुराग करना प्रारम्भ कर दे ताकि मुझे उसका साक्षात्कार हो जाये, मैं उससे जी भरकर रम सकूँ । इस समय दसों इंद्रियाँ बहिर्मुख हैं । नाना विषयों का रसास्वादन करती हैं । जब तक ये अन्तर्मुख न होंगी, तब तक प्रियतम से मिलना कठिन है । अतः मैं इन्हें अंतर्मुख करके प्रियतम से मिलूँगी । 
.
मैं और प्रियतम एक ही काया रूपी घर में रहते हैं । हमारा रात्रि निवास भी एक ही पर्यंक पर है । किन्तु वह न तो मुझ से कुछ भी बोलता है और न रमण ही करता है । बस, मैं इस अबोलणैं = वार्तालापहीनता के दुःख से दुखित हूँ, पतली हुई जाती हूँ । वस्तुतः जब से मैंने अपने आपको आत्मा न मानते हुए शरीर मानकर विषय भोगों से सम्पृक्त कर लिया है, तबही से वह परमात्मा मुझसे रूठ गया है । 
.
हे वृत्ति ! उसके द्वारा मेरे से न बोलने के कारण मेरा मरना हो रहा है, मरती तो नहीं हूँ किन्तु जीवित भी नहीं हूँ । इसीलिये मैं बार-बार उसको बोलने = दर्शन देने के लिये मना रही हूँ = उसकी भावभक्ति से साधना कर रही हूँ । मेरे और उस प्रियतम के मध्य अंतर डालने वाली मेरी पड़ोसन रूपी इन्द्रियाँ ही हैं जिन्होंने बहिर्मुखता रूपी भ्रांति के कारण हमारे मध्य पड़दा डाल रखा है । 
.
वैसे प्रियतम परम सहिष्णु = दयालु-कृपालु हैं किन्तु हमारे बीच में भ्रांति जो पड़ गई है । मनों में एक दूसरे के प्रति एक दूसरे का अविश्वास जो जम गया है । (विषयों की ओर आकर्षण ही भ्रांति है । जैसे ही बहिर्मुखता मिटकर अन्तर्मुखता होती हैं, वैसे ही परमात्मा का संस्पर्श होना प्रारम्भ हो जाता है) वास्तव में प्रियतम घर में भाव के साथ न आवे तो उसका घर में रहना, दूर रहने के समान ही है । 
.
बिना परमात्म-दर्शन-लाभ के मेरी एक-एक रात्रि छः-छः महिने की रात्रि के समान व्यतीत हो रही है और मैं इस सह्य दुख से दुखती हूँ । मेरे से कैसे भी इस दुःख के कारण जीवित रहना संभव नहीं हो पा रहा है । मैंने प्रियतम को अपने वश में करने के लिये वशीकरणादि अनेक तांत्रिक क्रियाएँ की । 
.
इनके अलावा श्रुंगारादि भी अनेक प्रकार की क्रियाएँ करके उसको रिझाने का प्रयत्न किया (अनन्य-अनुरागमयी राम-नाम-स्मरण रूपी भक्ति के अतिरिक्त अन्य सभी साधनाएँ, अन्य उपाय हैं जो परमात्मा को रिझाने में नाकाफी हैं ।) किन्तु वह प्रियतम किसी भी उपाय से वशीभूत नहीं हुआ, कैसे भी प्राप्त नहीं किया जा सका । 
.
यदि अनंत जन्मों का परमात्मा से अलगाव इस जन्म में समाप्त नहीं हुआ तो मेरी मनोकामना ठीक वैसे ही मेरे मन में रह जायेगी जैसे कुवे की छाया कुवे में ही समाप्त हो जाती है । वह बाहर आकर किसी का उपकार नहीं कर पाती । बषनांजी कहते हैं, मैं मेरे ठाकुर की विचित्र बातें किससे कहूँ, किसप्रकार कहूँ क्योंकि वह कभी तो प्रेम-प्यार करता हुआ चूंदड़ी ओढ़ाता है और कभी छोड़कर दूर चला जाता है ॥७८॥ 

. जीवन की घटनायें

*#daduji*
*॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥*
*॥ दादूराम~सत्यराम ॥*
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
.
जीवन की घटनायें ~
.
१- वि. सं. २०१४ की घटना है - कथा वाचक  धनीरामजी स्वामी ने सुनाई कि - एक दिन कथा के पश्‍चात् परंपरा के अनुसार मंदिर से आचार्य प्रकाशदेवजी महाराज के साथ साथ हम लोग खेजडाजी का दर्शन व प्रणाम कर छत्रियों के दर्शन करने गये । छत्रियों के दर्शन व प्रणाम करके बारहदरी पधार गये । 
.
आचार्य प्रकाशदेवजी महाराज गद्दी पर विराज गये और मैं शीघ्रता से मंदिर के नीचे की ड्यौढी होकर इधर उधर घूमा और स्थानीय ब्राह्मण पंडित दादूराम से कुछ बातें करी फिर लगभग २० मिनट में मैं बारहदरी पहुँच गया । आचार्य प्रकाशदेव जी महाराज के पास बैठा तो महाराज ने मेरी २० मिनट की संपूर्ण चर्या जहाँ गया वह तथा नानूराम पंडित से बात करी वह सब अक्षरश: मुझे सब सुना दी । 
.
उनको सुनकर मेरे को अति आश्‍चर्य हुआ कि यह तो मानों मेरे साथ- २ सुन रहे हों वैसे की सब सुना दी हैं । यह क्या बात है ? अंत में मैंने सोचा ये महान् संत हैं इनके लिये यह कोई आश्‍चर्य की बात नहीं है । तब से महाराज पर मेरी अनन्य श्रद्धा हो गई थी । इस घटना से भी सूचित होता है कि - आचार्य प्रकाशदेव जी महान् संत थे । यह सब भजन का ही प्रताप था । 
२- परमहंस धनीरामजी प्राय: आचार्य प्रकाशदेवजी के साथ ही रहते थे । वि. सं. २०१४ की ही घटना है कि - एक दिन आचार्य जी ने जो बारहदरी में कपडे से ढका हुआ आचार्य जी के बैठने का मुड्डा पडा रहता है उसकी ओर हाथ करके विनोद में ही धनीराम जी को कहा- आप इस पर सो सकते हैं ? धनीराम जी ने कहा - महाराज यह बैठने ही योग्य है, सोने योग्य है ही नहीं । फिर सोना कैसे बन सकता है ? 
.
तब आचार्य प्रकाशदेव जी ने कहा- मैं सो सकता हूँ देखो- फिर आचार्य प्रकाशदेवजी उस मु़ढे पर विराजकर बच्चे के समान छोटा शरीर बनाकर सो गये । धनीरामजी को यह देखकर अति आश्चर्य हुआ । उन्होंने उसी समय साष्टांग दंडवत करके प्रार्थना की- महाराज ! आपतो अपने रुप में आ जाओ, इस माया को शीघ्र समेट लो । फिर आचार्य जी अपने रुप में आ गये । उक्त घटना से ज्ञात होता है कि  आश्‍चर्य प्रकाशदेव जी को शरीर छोटा व बडा बनाने की शक्ति भी प्राप्त थी । यह धनीराम जी ने प्रत्यक्ष देखा था ।
(क्रमशः)  

२१. समर्थाई आश्चर्य को अंग ४१/४४

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
.
२१. समर्थाई आश्चर्य को अंग ४१/४४
.
सांई तेरी अगम गति, हिकमति की कुरबांन । 
सब सिरजै न्यारा रहै, सुन्दर यह हैरान ॥४१॥
श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - हे स्वामिन् ! आप के बुद्धिमत्ता(हिकमत) एवं चतुरता युक्त कर्म किसी के लिये भी समझ से बाहर हैं, अतः मैं आप की बलिहारी जाता हूँ कि आप इतनी विशाल सृष्टि की रचना कर के भी इस से पृथक् ही हैं । यह देखकर मैं आश्चर्यचकित(हैरान) हूँ ॥४१॥ 
.
शेख मसाइक औलिया, सिध साधिक मुख मौंन ।
वै भी बैठे थाकि करि, सुन्दर बपुरा कौंन ॥४२॥ 
वास्तविकता यह है कि शेख, मसाइक, औलिया आदि मुस्लिम साधक सन्त एवं सिद्ध साधक आदि आर्यमतानुयायी सन्त ही जब आप के यथार्थ वर्णन में थक कर मौन रहते आ रहे हैं तो मुझ अकिञ्चन सुन्दरदास की कौन गणना है ! ॥४२॥
.
प्रीतम मेरा एक तूं, सुन्दर और न कोइ । 
गुप्त भया किस कारनै, काहि न परगट होइ ॥४३॥
इन ही सब कारणों से अब मैं केवल आपको अपना प्रियतम(इष्टदेव) मानता हूँ, अन्य किसी(देवता) को नहीं । इतना होने पर भी आप मुझ से क्यों छिपे बैठे हैं, मेरे सम्मुख आप प्रकट क्यों नहीं होते ! (मुझको दर्शन क्यों नहीं देते!) ॥४३॥
.
धन्य धन्य मोटा धनी, रच्या सकल ब्रह्मंड । 
सुन्दर अद्भुत देषिये, सप्त दीप नौ खंड ॥४४॥ 
श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - हे मेरे सर्वशक्तिमान् स्वामी ! आपने यह बहुत ही आश्चर्यमय सकल ब्रह्माण्ड बनाया है कि जिसमें अद्भुत सात द्वीप एवं नौ खण्ड पृथक् पृथक दिखायी दे रहे हैं ॥४४॥
(क्रमशः) 

*आत्मसाक्षात्कार ॥*

🌷🙏 🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
.
*प्राण कवल मुख राम कहि, मन पवना मुख राम ।*
*दादू सुरति मुख राम कहि, ब्रह्म शून्य निज ठाम ॥*
==============
*आत्मसाक्षात्कार ॥*
सुरति बँधी मेरी सुरति बंधी । बहुत ठौर तैं तूटी संधी ॥टेक॥
तीनि टूक ले चौथैं सांधी । ऊँची अलग अलगाले बांधी ॥
बाव बिकार न झोला काई । निहचल रहै गुरू की लाई ॥
खूँटी एक गगन धरणि दूजा जाण्याँ । दुहुँ खूँटा बिचि ताणाँ ताण्याँ ॥  
गुर तैं गुढी अलूझणि भागी । बषनां सुरति ब्रह्म स्यौं लागी ॥७७॥
.
संसार के अनेकों विषयों में मेरी चित्तवृत्ति अटकी पड़ी थी । अब सद्गुरु महाराज की क्रिया से उन समस्त विषयों से वृत्ति की आसक्ति मिट गई है और उसका नित्य सम्बन्ध एक परात्पर-परब्रहम-परमात्मा से हो गया है । यह परमात्मा में पूर्णरूप से अटक गई है । 
.
इस वृत्ति को राम-नाम से संयुक्त करके जिव्हा, हृदय तथा नाभि नामक तीनों स्थानों से निकालकर चौथे स्थान पर स्थापित कर दी है । वह चौथा स्थान ब्रह्मरंध्र सर्वोच्च तथा सबसे अलग एक ओर है । “चौकी भजन प्रताप की, संत कह गये च्यारि । रामचरण या सत्ति है, दूजा भरम असार ॥१॥ रसन कंठ रस पीय कैं, हिरदै सुक्ख बिलास । नाभ कँवल सूँ उलटि कै, सुरति गई आकास ॥२॥” 
.
वहाँ विषयों में आसक्ति रूपी हवा के झौंके (विषयों को पुनः पुनः भोगने की इच्छा) नहीं आते । वहाँ तो सुरति गुरुमहाराज के उपदेश से शब्दमयी हो जाने के कारण निश्चल रहती है । सुरति का निवास, अंत में शब्द के साथ आकाश = ब्रह्मरंध्र में तथा प्रारम्भिक अवस्था में मूलाधार चक्र में होता है । इसी के बीच इसका संचरण होता है । 
.
बषनांजी इस बात को कहते हैं, सुरति ने मूलाधार चक्र जहाँ कुण्डलिनी सुषुप्तावस्था में सर्प की भाँति कुंडली मारकर पड़ी रहती है तथा ब्रह्मरंध्र दोनों बिन्दुओं के मध्य अपना निवास बना रखा है । उसने मूलाधार से लेकर ब्रह्मरंध्र तक अपना साम्राज्य जमा रखा है । गुरुमहाराज की कृपा से कुंडलिनी की गुढी = घुंडी = कुंडली मिट गई और वह सीधी होकर शब्द के साथ ब्रह्मरंध्र में पहुँच गई । उसका सीधा सम्बन्ध ब्रह्म से हो गया ।
.
सुरति रूपी जीव और शब्द सरूपी ब्रह्म का एकाकार हो गया । वस्तुतः कुंडलिनी वृत्ति ही है । उसका साढे तीन वलयों में कुंडली मारकर सोना तीनों गुणों में आसक्त होना ही है । जब सुरति गुणों को त्यागकर ब्रह्म को अंगीकार कर लेती है तब उसको जागृत हुआ कहते हैं । जागृत होने पर कुण्डलिनी का एक छोर मूलाधार में तथा दूसरा ब्रह्मरंध्र में पहुँचता है यही सुरति का शब्द से इस शरीर के रहते एकाकार होना है ॥७७॥ 

शनिवार, 21 मार्च 2026

*७.आज्ञाकारी आज्ञा भंगी का अंग ~ ९/१२*

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
.
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
.
*७.आज्ञाकारी आज्ञा भंगी का अंग ~ ९/१२*
.
*आज्ञा में अनमोल१ है, अन आज्ञा अढ़२ आघ३ ।*
*रज्जब रंग५ सु रजा४ में, विरच्यों६ बाल्हे७ बाघ८ ॥९॥*
गुरुजनों की आज्ञा में रहने से व्यक्ति अति उत्तम१ माना जाता है । आज्ञा४ में न रहने से उसकी उत्तमता३ में कमी२ आ जाती है । सम्यक आज्ञा में रहने से ही आनन्द५ मिलता है । गुरुओं की आज्ञा मानने से विरक्त६ होने पर तो बहिमुर्ख७ होकर सिंह८ के समान भय-प्रद होता है ।
.
*गुरु की आज्ञा में रहै, सो शिष्य कोई एक ।*
*रज्जब रहे वन रोझ मन, आज्ञा भंग अनेक ॥१०॥*
गुरु की आज्ञा में रहने वाला शिष्य तो कोई विरला ही होता है । वन में रहने वाले रोझों के समान बहिमुर्ख मन आज्ञा भंग करने वाले, अनन्त मिलते हैं ।
.
*असली आज्ञा में चलैं, बाहर धरैं न पाँव ।*
*रज्जब कपटी कम असल, खेलैं अपना दाँव ॥११॥*
सच्चे शिष्य आज्ञा में ही चलते हैं, आज्ञा के बाहर एक पैर भी चलते अर्थात कुछ भी नहीं करते । जो कपट से सच्चे बने हुये और वास्तव में झूठे, वे तो अपने स्वार्थ का दाँव खेलते हैं अर्थात स्वार्थ सिद्धि के लिए ही सब कुछ करते हैं, कल्याण के लिये कुछ नहीं ।
.
*रज्जब रहिये रजा में, गुरु गोविन्द हजूर ।*
*इनकी आज्ञा मेट तैं, देखत पड़िये दूर ॥१२॥*
गुरु और गोविन्द की आज्ञा में रहोगे तभी गुरु और गोविन्द समीप रह सकोगे, इनकी आज्ञा से बाहर जाने से तो देखते ही इनसे दूर पड़ जाओगे ।
(क्रमशः)

शुक्रवार, 20 मार्च 2026

*७.आज्ञाकारी आज्ञा भंगी का अंग ~ ५/८*

*🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏*
*🌷卐 सत्यराम सा 卐🌷*
.
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
.
*७.आज्ञाकारी आज्ञा भंगी का अंग ~ ५/८*
*रज्जब रमणी२ रासभा१, कपट सु कठ३ गढ़ माँहिं ।*
*शिष सिंह खात पलाइगे४, गुरु गिरि दूषण नाँहिं ॥५॥*
गधा१ काष्ठ३ के पिंजरे में है और नारी२ कपट के किले में है । यदि सिंह पिंजरे में घुसेगा१ तो उसे गधा ही खाने को मिलेगा, इसमें पर्वत का क्या दोष हे ? नहीं घुसता तब तो पर्वत में वन्य मृग मिल सकता था । वैसे ही शिष्य गुरु की आज्ञा न मानना रूप कपट-किले में घुसेगा तो उसे नारी का उपभोग ही मिलेगा । इसमें गुरु का क्या दोष है ? कपट नहीं करता, यथार्थ रूप से गुरु आज्ञा में रहता तो अवश्य ब्रह्मानंद प्राप्त होता ।
.
*गुरु अगस्त उर१ चढ़त ही, शिष समुद्र नभ जाँहिं ।* 
*जन रज्जब उतरे तहाँ, सो खारे क्षिति२ माँहिं ॥६॥*
६ में आज्ञाकारी और आज्ञा भंगी का परिचय दे रहे हैं - अगस्त्य ऋषि के हृदय१ में समुद्र शोषण की बात आते ही समुद्र नभ में चला गया अर्थात सूख गया और जो जल पृथ्वी२ पर उतरा वह खारा हो गया । वैसे ही जो गुरु आज्ञा में रहते हैं, वे शिष्य तो ब्रह्म में लय हो जाते हैं, और आज्ञा में नहीं रहते वे पृथ्वी पर कामादि क्षार से युक्त होते हैं ।
.
*आज्ञा भंगी मन मुखी, व्यभिचारी व्रत नाश ।*
*रज्जब रीता रती बिन, नाँहिं चरण निवास ॥७॥*
७ में आज्ञा भंगी का परिचय दे रहे हैं - गुरुजनों की आज्ञा न मानने वाला मन की इच्छा के अनुसार चलता है, सदव्रतों का नाश करके, व्यभिचारी बनता है किन्तु आज्ञा मानना रूप रती बिना भक्ति ज्ञानादि से रहित ही रहता है । प्रभु के चरणों में निवास नहीं कर सकता ।
.
*आज्ञा में आगे रहैं, गुरु गोविन्द हजूर ।*
*जन रज्जब दिल दूसरे, द्वै ठाहर तैं दूर ॥८॥*
८-१२ में आज्ञाकारी तथा आज्ञा भंगी का परिचय दे रहे हैं - जो गुरुजनों की आज्ञा मानने में आगे रहता है, वह गुरु और गोविन्द के अति निकट रहता है । जिसका मन आज्ञा मानने से विमुख रहता है, वह गुरु के ज्ञान रूप स्थान से और गोविन्द के साक्षात्कार रूप स्थान से दूर ही रहता है अर्थात न उसे ज्ञान होता है और न गोविन्द मिलते हैं ।
(क्रमशः)

‘युगोत्सव’

*#daduji*
*॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥*
*॥ दादूराम~सत्यराम ॥*
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
.
दादूधाम में ‘सन्त साहित्य’ ~
.
आपके समय में ‘युगोत्सव’ दादूजी महाराज के चार सौ १२ वर्ष होने पर मनाया गया उत्सव हुआ । जिस में राजर्षि श्री पुरुषोत्तमदास टण्डन भी पधारे थे । वह उत्सव भी नारायणा दादूधाम में आप के समय में हुआ था । प्रथम कभी नहीं हुआ था । उक्त उत्सवों के आयोजन तो दादू दयालु महासभा के द्वारा होते थे । 
.
महासभा के मंत्री उस समय महामना भिषगाचार्य जयरामदासजी महाराज दादूजी के परम भक्त थे । उन्हीं के द्वारा प्रेरित होकर समाज उक्त उत्सव मनाने में तत्पर होता था । वैसे भी आपके समय में देश के महान् नेता समाज सेवी समाजवादी व विचारक  डा. राममनोहर लोहिया, हरिभाऊ  उपाध्याय, जयपुर नरेश की महाराणी गायत्री देवी आदि अनेक महानुभाव आपके समय में नारायणा दादूधाम के दर्शनार्थ आये और आचार्य प्रकाशदेव जी के दर्शन तथा सौजन्यता पूर्ण व्यवहार से सभी ही प्रसन्न होकर गये ।
.
प्रकाशदेव जी की योग्यता का परिचय उच्च कोटि के संतों को तो आचार्य पद से पूर्व भी था । सुनते हैं कलकत्ता में एक दिन वैद्य कृपाराम जी भिवानी और सेवादास काले कपडे वाले एक स्थान में मिल गये थे । 
.
उस समय प्रसंग वश कृपाराम ने कहा- आचार्य रामलालजी के ब्रह्मलीन होने के पश्‍चात् खालसा में गद्दी के योग्य कौन व्यक्ति है ? तब सेवादासजी ने कहा- मेरे विचार से तो एक प्रकाश ही है । इसके कुछ दिन पश्‍चात् आचार्य रामलाल जी ब्रह्मलीन हो गये और प्रकाशदेव जी को आचार्य पद पर बैठाया गया । इससे सूचित होता है कि उज्चकोटि के संत तो प्रकाशदेवजी की योग्यता को आचार्य पद प्राप्ति से पूर्व भी जानते थे ।  
(क्रमशः) 

२१. समर्थाई आश्चर्य को अंग ३७/४०

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
.
२१. समर्थाई आश्चर्य को अंग ३७/४०
.
एक सीस चहुं सीस पुनि, पंच सीस षट सीस ।
दश सिर और सहस्त्र सिर, नमत सकल जगदीस ॥३७॥
हे प्रभो ! हे जगदीश ! आप की इस असीम सामर्थ्य के प्रभाव से आप के सामने सभी अपना शिर झुकाये रहते हैं, सभी आप को दण्डवत् प्रणाम करते हैं । भले ही उन में, वह एक शिर वाला कोई बलवान् पुरुष हो या चार शिर वाला अतिशय सामर्थ्यशाली ब्रह्मा हो, या फिर दश शिर वाला महाबली रावण हो, या हजार शिर वाला शेषनाग ही क्यों न हो ! ॥३७॥
.
सूरति तेरी खूब है, को करि सकै बखांन ।
बानी सुनि सुनि मोहिया, सुन्दर सकल जिहांन ॥३८॥
आप की आकृति(रूप) इतनी मनोरम एवं नयनाभिराम है कि कोई भी इस की अनुपम सुन्दरता का यथातथा वर्णन करने में कथमपि समर्थ नहीं है । आप की वाणी भी इतनी मधुर एवं प्रभावशाली है कि समस्त जगत् इसे सुनते ही मुग्ध हो जाता है ॥३८॥
.
पलक मांहि परगट करै, पल मैं धरै उठाइ ।
सुन्दर तेरै ख्याल की, क्यौं करि जांनी जाइ ॥३९॥
आप के सामर्थ्य को यथार्थ रूप से कौन जान सकता है; क्योंकि आप में ही ऐसी सामर्थ्य है कि आप किसी भी अदृश्य वस्तु को क्षणमात्र में प्रत्यक्ष(प्रकट) कर सकते हैं और किसी प्रत्यक्ष दिखायी दे रही वस्तु को क्षणमात्र में लुप्त भी कर सकते हैं ॥३९॥
.
ज्यौं का त्यौं ही देखिये, सुन्दर सब ब्रह्मंड ।
यह कोई जांनै नहीं, कब की मांडी मंड ॥४०॥
अतः आप के प्रति सभी श्रद्धालु जनों का यही कर्तव्य है कि वे आप के द्वारा रचित सृष्टि को उसी रूप में देखें जैसा कि आप ने उसको बनाया है; उस में कोई मीन मेष(ननु, नच, शङ्का, सन्देह) न करे । सचाई यह है कि इन में से कोई यह भी नहीं जान पाया कि आपने इस सृष्टि को कब बनाया । अतः आप के द्वारा रचित सृष्टि को अनादि मान लेने में ही हमें सुविधा है !१ ॥४०॥
(१ तु० -श्रीभगवद्‌गीता : 
आश्चर्यवत् पश्यति कश्चिदेनमाश्चर्यवद् वदति तथैव चान्यः । 
आश्चर्यवच्चैनमन्यः शृणीति श्रुत्वाप्येनं वेद न चैव कश्चित् ॥ 
- अध्याय २, श्लो० २९.)
(क्रमशः)

काति बहुड़िया सूत हजारी

🌷🙏 🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
.
*एकै अक्षर पीव का, सोई सत्य करि जाण ।*
(राम नाम सतगुरु कह्या, दादू सो परवाण ॥*
==============
*मन ॥*
काति बहुड़िया सूत हजारी ।
तकुला कौ बलै काढ्यौ गुरि सतधारी ॥टेक॥
सूंबणि एक रु ताड़ी तीस । चरखौ भलौ घड़्यौ जगदीस ॥
चमरख दोइ र खूँटी चारि । मनसा दाँवणिं माल सँवारि ॥
सो बडी बहू नैं कातणि दीयौ । तिहि मारि ताकुलौ बाँकौ कीयौ ॥
पाछै ले ल्हौड़ी नैं दीनौं । तिहि नींठि बापुड़ी सूधौ कीनौं ॥
रहटा कौ सबद अनाहद रुणकै । राम नाम बाणी बोलै भुणकै ॥
जे कतवारी कात्यौ लोड़ै । तौ जोबनि माती तार जिनि तोड़ै ॥
सूत जुलाहा कै मनि भावै । कपड़ौ नाऊँ रामौंति पावै ।
ल्हौड़ी बहुटल कातण लागी । तौ बषनां घर की नाग्यौं भागी ॥७६॥
.
बहुड़िया = जीव । सूत काति = रामनाम-स्मरण रूपी साधना कर । हजारी = जो सूत हजारों रुपयों में बिक सके । समाजशास्त्रियों के लिये यहाँ यह शब्द अत्यधिक महत्व का है । इससे ज्ञात होता है कि बषनांजी के समय में एक हजार रूपये का मूल्य = महत्व आज के करोड़ों के बराबर था ।
.
कुछ समय पूर्व तक लाख का महत्व काफी था तथा व्यवहार में “लक्खा” “लखपति” जैसे शब्दों का व्यवहार उनके लिये होता था जिनकी गिनती धनिक लोगों में हुआ करती थी । ‘हजारीलाल’ नाम भी तबही प्रचलन में आया होगा जब किसी के पास हजारों रुपये रहे होंगे और उसकी गिनती धनिकों में होती रही होगी । धीरे-धीरे यह उपाधि नाम के रूप में रूढ हो गयी ।
.
यहाँ हजारी से ‘बहुमूल्य’ का तात्पर्य है । तकुला = तकुआ, जिस पर कता हुआ सूत लिपटकर कूकड़ी के रूप में तैयार होता है । बल = वक्रपना = टेढापना । मन का विषयासक्त होना ही वक्र होना है । सत्स्वरूप परमत्मा में जिसकी स्थिति है ऐसे सद्गुरु महाराज ने नित्यानित्य तत्त्व का निश्चयात्मक बोध कराकर उस आसक्ति को समाप्त करवा दी ।
.
तूंबणि = वह लोहे की छड़ जिस पर चरखे के दोनों चक्र घूमते हैं । यह बीच में लगी होती है तथा इतनी महत्वपूर्ण होती है कि यदि चरखे में से इसे निकाल दीया जाए तो चरखे का काम करना ही बंद हो जाए । बषनांजी ने शरीर में परिव्याप्त चैतन्य तत्व को तूंबणि माना है ।
.
जब तक शरीर में चैतन्य रहता है तब तक हो शरीर की स्थिति है । अन्यथा शरीर की संज्ञा मृतक कहलाने लगती है । अतः चैतन्य का महत्त्व सर्वविदित ही है । तिस ताड़ी = चरखे में दो चक्र होते हैं । इन दोनों का निर्माण लकड़ी की जिन पट्टिकाओं से होता है वे ही ताड़ी कही जाती है इनकी संख्या बषनांजी ने तीस बताई है ।
.
अष्टधा प्रकृति = प्रकृति, महतत्व, अहंकार, पंचमहाभूत; पंच तन्मात्रा, पंच ज्ञानेन्द्रिय, पंच कर्मेन्द्रिय उभयात्मक मन, पंच विषय = शब्द स्पर्श, रस गंध तथा प्राण । इन सभी का संघात शरीर है । इस चरखे रूपी शरीर के लिये रर ममा = राम रूपी दो चमरख तथा वैखरी, मध्यमा, पश्यंती, परा नामक चार वाणी अथवा, वैराग्य, भक्ति, ध्यान व ज्ञान रूपी चार खूँटियों का निर्माण जगदीश ने किया है ।
.
मनसा = वृत्ति । दावणिं = चरखे के दोनों चक्रों को क्रौस रूप में सूत की मोटी रस्सी से बांधकर एक करते हैं उसे दाँवणि कहते हैं । जिस प्रकार पैरों की ओर खाट में दाँवण होती है । माल = सूत के धागे की रस्सी जो दांवण के ऊपर चढ़ी रहती है तथा जिसका संबंध तकुवे से भी होता है । जैसे-जैसे हत्थे को घुमाया जाता है, चक्र घूमते हैं । चक्र के साथ-साथ माल(वैल्ट) भी घूमती है जो तकुवे को भी घुमाती है जिससे सूत का निर्माण होता है ।
.
यहाँ मनसा = वृत्ति को दांवण माना है । बड़ी बहू = बिगड़ैल वृत्ति, कुसंसस्कारी वृत्ति । बाँकौ = विषयासक्ति किया । ल्हौड़ी = छोटी = भगवद् उन्मुख वृत्ति । नींठ = मुश्किल से “असंशयं महावाहो मनोदुर्निग्रहंचलं ॥ अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते ॥
.
बापुड़ी = बेचारी = वृत्ति । सूधौ = भगवदुन्मुख । रहटा = रटन = निरंतर राम नाम का स्मरण । अनाहद = बिना सीमा के, निरंतर । रुणकै = भगवन्नाम जप होता है । झुणकै = गुंजारित होती है । कतवारी = सूत कातने वाली, वृत्ति । कात्यौ = चरखा । लोड़ै = घुमावे अर्थात् साधना करे । जोवनमाती = साधनारत । तार = लय = साधना । जिनि = नहीं । टल = बचकर = विषयों से टलकर । नांग्यौ = जन्म-मरण रूपी नादारी = गरीबी = दुःख ।
.
इस पद में मन की वृत्ति को लक्ष्य किया गया है । वस्तुतः जीव जैसे कर्म करता है, उन कर्मों के सूक्ष्म संस्कार मन पर वैसे ही जमा होते हैं । जैसे संस्कार होते हैं, व्यक्ति बलात् वैसे ही कर्म करने को पुनः प्रेरित होता है यह चक्र चलता रहता है । इसीलिए कहा गया है, मन ही मनुष्य को डुबोता तथा मन ही मनुष्य को तारता है । “मन एवं मनुष्याणां कारणं बन्ध मोक्षयो” इन्हीं विचारों को बषनांजी ने चरखे, कातने वाली कतवारी आदि को प्रतीक बनाकर व्यक्त किये है ॥
.
जगदीश ने तीस तत्वों को मिलाकर मनुष्य शरीर बनाया है जो अत्यन्त भला = उत्तम है क्योंकि इसमें वह स्वयं अपने अंश के रूप में निवास करता है । “ईश्वर अंस जीव अविनासी । चेतन अमल सहज सुखरासी ॥” अतः हे जीव ! तू ऐसा भजनकर जो तुझे तेरे अंशी स्वरूप परमात्मा से मिलाकर तेरा उससे एकाकार करा दे ।
.
इसमें सतस्वरुप परमात्मा का अपरोक्ष प्राप्त सद्गुरु महाराज तेरे मन में अनेकों जन्मों की जमा विषयासक्ति को मिटाकर सहायता करेंगे । परमात्मा ने तुझे उसको प्राप्त करने के लिये ‘ररा’ ‘ममा’ = राम नामक दो चमरख तथा राम नाम की रटने के लिये चार प्रकार की वाणी रूपी चार खूँटिया प्रदान की हैं । अतः मनसा = वृत्ति रुपी दाँवण तथा माल को संभाल कर रख ।
.
निश्चय ही तुझे तेरे अंशी स्वरूप परमात्मा की प्राप्ति हो जायेगी । वस्तुतः परमात्मा स्वरूप आत्मा मिलता नहीं है क्योंकि वह परमात्मा आत्मा के अतिरिक्त और कोई दूसरा तत्व नहीं है । प्राप्ति दूसरे की होती है जबकि बोध स्वयं का होता है । अतः आत्मा स्वरूप परमात्मा का बोध ही होता है । जीव ने सर्वप्रथम साधना रूपी सूत कातने को चरखा रूपी शरीर बड़ी बहु = संसारासक्त मन को दिया । उसने जीव को और अधिक विषयी बना दिया ।
.
तत्पश्चात् जीव ने छोटी बहुरूपी परमात्मोन्मुख मन की वृत्ति को शरीर रूपी चरखा राम-नाम की साधना रूपी सूत कातने को दिया । उसने विषयासक्त मन को बहुत ही मुश्किल से विषयों से हटाकर परमात्मोन्मुख किया । परिणामस्वरूप रटन = स्मरण के दौरान रामनाम रूपी शब्द निस्सीम रूप में रुणकने = ध्वनि करने लगा । वाणी से रामनाम की अनवरत झंकार होने लगी । पुनः सावधान करते हुए कहते हैं, हे साधक ! एक बार साधना में लग जाने के उपरान्त साधना को बीच में ही मत छोड़ देना ।
.
“निज सरूप निरखै नहीं, जब लग राम पुकारि । रामचरण घर क्यूँ लहै, जो पँथ मैं बैठे हारि ॥” यदि साधना पूरे जोश के साथ अनवरत करते रहोगे तो तुम्हारी साधना रूपी सूत परमात्मा रूपी जुलाहे को पसन्द आ जायेगा और वह तुम्हारा नाम अपने भक्तों में शुमार कर लेगा । तुम्हारा नाम “रामौती” रामजी का दास रख देगा, हो जायेगा । जबसे परमात्मोन्मुख वृत्ति रूपी छोटी बहु परमात्मा की भक्ति करने लगी तब ही से विषयों में आसक्ति रूपी गरीबी मिट गई और आमदनी रूपी परमात्मा से समीपता होने लगी ॥७६॥

दादूधाम में ‘सन्त साहित्य’ ~

*#daduji*
*॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥*
*॥ दादूराम~सत्यराम ॥*
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
.
दादूधाम में ‘सन्त साहित्य’ ~
.
उसी दिन मेरा लिखित ‘‘संत सुन्दरदासजी और उनकी वाणी’’ पद्यात्मक  निबन्ध भी विनोबा भावे आदि के सामने मेरे द्वारा पढा गया । उसमें २५ पद्य थे और १८ शीर्षक थे - ‘प्रणति’ १ मनहर । ‘बाल कवि’ १ दोहा । ‘हंस कवि’ दो मनहर । ‘कलाकार’ एक  मनहर । ‘काव्य किला’ एक  मनहर । ‘सिद्ध सिरताज’ एक मनहर । ‘सवैया सरित’ एक  मनहर । ‘सुन्दर सरोज’ एक मनहर । ‘गुरु भक्ति ’ एक रोलाछंद । ‘ईश्‍वर भक्ति ’ एक चौपाई । ‘योग साधन’ एक चौपाई । ‘विद्वता’ एक मनहर । ‘संत शिरोमणि’ एक दोहा । ‘सुन्दर शिक्षा’ एक किरीट सवैया । ‘संबन्ध से इतने धन्य’ एक रोलाछंद । ख्वाणी’ चार मनहर । ‘लेखक का वाणी प्रेम’ एक जलहरन कवित्त । ‘उपसंहार’ चार दोहे थे । 
.
अन्त में विनोबा भावे का ओज पूर्ण सुन्दर भाषण हुआ । आज नारायणा तथा आस पास के ग्रामों से लोग भी विनोबा भावे आदि संतों के दर्शन और सत्संग के लिये बहुत आये थे । आज की सभा का कार्य बहुत सुन्दर रहा । दूसरे दिन कार्तिक शु. ९ को सभा कार्य संत साहित्य के प्रेमी वियोगी हरिजी के सभापतित्व में आरंभ हुआ । आज भी अनेक विद्वानों के सुन्दरदासजी तथा उनकी रचनाओं की विशेषताओं की महत्ता का द्योतक सभापति का भाषण हुआ । 
.
दोनों दिनों के सभी भाषण सुन्दरदास जी के व्यक्तित्व तथा उनकी रचना के महत्व को बताने वाले होने से सब को ही प्रिय हुये थे । आचार्य प्रकाशदेव जी महाराज के समय ‘सुन्दर जयन्ती’ उत्सव भी एक विशेष महत्व का उत्सव था । उस उत्सव में आने वाले अन्य समाजों के महानुभाव भी आचार्य जी की सौम्य मूर्ति का दर्शन करके अति प्रसन्न हुये थे । 
.
आचार्य प्रकाशदेवजी के समय में ही नारायणा दादूधाम के दादू मंदिर को अधिक सुन्दर बनाने का कार्य संपन्न हुआ । जिसकी बाह्य शोभा को देखकर ही दर्शक लोग अति प्रसन्न हो जाते हैं । नारायणा दादूधाम में ‘सन्त साहित्य’ व कलात्मक  संग्रह का कार्य भी आचार्य प्रकाशदेव जी महाराज के समय में ही हुआ । 
(क्रमशः) 

२१. समर्थाई आश्चर्य को अंग ३३/३६

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
.
२१. समर्थाई आश्चर्य को अंग ३३/३६
.
उभै बाहु चहु बाहु पुनि, अष्ट बाहु भुज बीस । 
सहस्त्र बाहु नहिं लिखि सकै, सुन्दर गुन जगदीस ॥३३॥
हे जगदीश्वर प्रभो ! आपका गुणानुवाद(महिमागान) कोई मनुष्य(उभयबाहु = दो भुजाओं वाला), या देव(चतुर्बाहु), या देवी(अष्टभुजा), या रावण(बीस बाहु वाला), या(सहस्रबाहु) अर्जुन भी लिखने में पूर्णतः समर्थ नहीं है ॥३३॥
.
एकानन चतुराननं, पंचानन षटगीस । 
दश सहस्त्रानन कहि थके, सुन्दर गुनि जगदीस ॥३४॥
इसी प्रकार कोई एक मुख वाला(मनुष्य), या चार मुख वाला(ब्रह्मा), या पाँच मुख वाला(महादेव) या छह मुख वाला(षटगीस कार्तिकेय), या दश मुख वाला(रावण), या सहस्रमुख वाला(शेषनाग) भी आपके महिमागान में समर्थ नहीं हुआ । इन के सम्मुख मुझ अकिञ्चन भक्त सुन्दरदास की तो कथा ही क्या है ! ॥३४॥
.
उभै अष्ट दश द्वादशा, अरु कहिये पुनि बीस । 
द्वै सहस्त्र लोचन थके, सुन्दर ब्रह्म न दोस ॥३५॥
इसी प्रकार, दो नेत्रों वाला कोई मनुष्य या आठ नेत्रों वाला ब्रह्मा, या दश नेत्रों वाला महादेव, बारह नेत्रों वाला कार्तिकेय, या बीस नेत्रों वाला रावण एवं दो हजार नेत्रों वाला शेषनाग भी साधना(कठोर तपस्या) करते करते थक गया; परन्तु वह भी आप निरञ्जन निराकार प्रभु का यथार्थतः गुणगान नहीं कर पाया ॥३५॥
.
एक रसन चहुं रसन पुनि, पंच षष्ट दश आहि । 
द्वै सहस्त्र सुनि सेस के, बरनि सकै नहिं ताहि ॥३६॥
इसी प्रकार, कोई एक जिह्वा वाला मनुष्य, चार जिह्वा वाला ब्रह्मा, पाँच जिह्वा बाला महादेव, छह जिह्वा वाला कार्तिकेय, दश जिह्वा वाला रावण या दो हजार जिह्वा वाला शेषनाग भी आप का यथार्थतः वर्णन नहीं कर सकता ॥३६॥
(क्रमशः)

*साधु-जोगी ॥*

🌷🙏 🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
.
*दादू जे तूं जोगी गुरुमुखी, तो लेना तत्त्व विचार ।*
*गह आयुध गुरु ज्ञान का, काल पुरुष को मार ॥*
==============
*साधु-जोगी ॥*
सो जोगी बैरागी रे । जाकै अंगि बिभूति न लागी रे ॥टेक॥
जिनि जोग लियौ मन माहीं रे । माटी की मुद्रा नाहीं रे ॥
तिहि सँगि जोगणि बाली रे । सो रुणझुण कीगरि वाली रे ॥
नाद बजावै लावै ताली रे । जोगी की जुगति निराली रे ॥
एक अबिनासी ब्रतधारी रे । तिहिं कै आगै मढी हमारी रे ॥
तहाँ अणभै भिख्या कूँ धावै रे । बषनौं जहाँ अलख जगावै रे ॥७५॥
.
वही वैराग्यवान योगी है, जिसके शरीर पर, मन पर माया रूपी विभूति = भस्म न लगी हो । ऐसे योगी कपड़े पहनकर योगी नहीं बनते बल्कि मन से समस्त रागों को निकाल कर योग धारण करते हैं । ये योगी कानों में मिट्टी की मुद्रा नहीं पहनते । ये तो निरन्तर अनहदनाद श्रवण रूपी मुद्राएँ कानों में धारण करते हैं ।
.
बाली = युवावस्थायुक्त = प्रतिक्षण वर्धमान अनन्यप्रेम युक्त रामनाम स्मरण रूपी भक्ति में निमग्न जोगणि = योगिनी रूपी सुरति = चित्तवृत्ति इन योगियों के साथ रहती है । वह सुरति रामनाम स्मरण धीमी-धीमी पायल की सी ध्वनि से युक्त हुई करती है । “आसण अडिग जमाय कै, कह सास उसासाँ राम । अपणाँ ही श्रवणाँ सुणैं, तब सुरति रहै इक ठाम ॥ दूजा कोई ना सुणैं, भल बैठ्या रहौ पास । रामचरण ई रैस सूँ, दृढ़ता गह्या उपास ॥” परिणामस्वरूप तालयुक्त अनहदनाद बजता है और योगी उसको सुनकर उसमें निमग्न हो जाता है ।
.
वास्तव में योगी की युक्तियाँ = जीवनशैली सामान्यजनों से सर्वथा निराली = विलक्षण = न्यारी है । ये योगी मात्र एक अविनाशी परमात्मा की ही उपासना करने के व्रत को धारण करने वाले होते हैं । जिस स्थान पर इन योगियों के रहने की कुटिया है अर्थात् जिस सहजावस्था में ये निवास करते हैं, उसी के आगे = सामने = सदृश ही हमारा (मुझ बषनां की) कुटिया = लक्ष्य है । उस कुटिया पर अणभै भिक्षा = अपरोक्षसाक्षात्कार प्राप्त करने को ही मैं धावै = जाता हूँ, प्रयत्न करता हूँ । मैं बषनां साधना करके उसी स्थान पर अलख जगाता हूँ = परमात्मा स्वरूप आत्मा का अपरोक्ष करता हूँ ॥७५॥

गुरुवार, 19 मार्च 2026

*७.आज्ञाकारी आज्ञा भंगी का अंग ~ १/४*

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
.
*७.आज्ञाकारी आज्ञा भंगी का अंग ~ १/४*
.
गुरु मुख कसौटी अंग के अनन्तर गुरुजनों की आज्ञा मानने वालों और न मानने वालों का परिचय देने के लिये तथा आज्ञा मानने न मानने से होने वाले लाभ-हानि का प्रदर्शन करने के लिये आज्ञाकारी आज्ञा भंग का अंग कह रहे हैं -
.
आज्ञा गुरु गेविन्द को, चलै सु चेला चार ।
रज्जब रम१ तों२ मन मुखी, पग पग पूरी मार ॥१॥
१-३ में आज्ञाकारी, आज्ञा भंगी का परिचय दे रहे हैं - गुरु की आज्ञा में शिष्य व गोविन्द की आज्ञा में दास चलते हैं तब तो आनन्द रहता है और मन की इच्छानुसार चलने१ से२ पद-पद पर चिन्ता, काम, क्रोधादि की खूब मार खानी पड़ती है ।
.
आज्ञा में आतम रहै, आज्ञा भाने भंग ।
रज्जब सगुरा सीख में, निगुरा अपने रंग१ ॥२॥
गुरुजनों की आज्ञा पालन करने से जीवात्मा जन्मादि संसार में भ्रमण करने से रुक जाता है । आज्ञा न मानने से बारंबार मरता है । जिसको गुरु प्राप्त हुआ है, वही श्रेष्ठ शिक्षा द्वारा आज्ञा में रहता है । जिसे गुरु नहीं मिला वह अपनी वासना१ के अनुसार चलता है ।
.
पिता पूत नर नारि के, गुरु शिष आज्ञा रंग ।
रज्जब राजा चाकर हु, हुक्म हते मन भंग ॥३॥
पिता की आज्ञा में पुत्र, पति की आज्ञा में पत्नी, गुरु की आज्ञा में शिष्य, राजा की आज्ञा में सेवक रहते हैं, तब आनन्द रहता है । आज्ञा न मानने से पितादि के मन का प्रेम पुत्रादि से टूट जाता है ।
.
सद्गुरु सरवर क्या करै, जे शिष सफरी१ मन खोट ।
रज्जब बंसी२ वाम३ लग, खेंच लई यम चोट ॥४॥
४-५ में आज्ञा न मानने वाले का परिचय दे रहे हैं - जब मच्छी१ स्वयं ही अपने मन के लालच रूप दोष से काँटे२ को जा पकड़े तब सरोवर क्या करे ? फिर तो पकड़ने वाला खेंचकर सरोवर के बाहर ले आता है और वह मर जाती है । वैसे ही शिष्य भी गुरु-आज्ञा न मान कर स्वयं ही पर नारी३ में आसक्त होता है तब सद्गुरु क्या करे ? फिर तो यातना भोगेगा ही ।
(क्रमशः)

बुधवार, 18 मार्च 2026

सुन्दर जयन्ती ~

*#daduji*
*॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥*
*॥ दादूराम~सत्यराम ॥*
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
.
१८ आचार्य प्रकाशदेव जी ~
.
आचार्य प्रकाशदेव जी महाराज का जीवन आचार्य पद से पूर्व भी भजन साधन में ही व्यतीत हुआ था । आप बाल ब्रह्मचारी थे । छोटी अवस्था में दीक्षित हो गये थे और दादू मंदिर के पुजारी थे । अत: इन का कार्य साधन रुप ही था । आचार्य पद पर विराजने पर आपके तप त्याग, साधुता आदि विशेषताओं का विशेष परिचय समय समय पर समाज को मिलने लगा । उस से समाज की आप पर अटूट श्रद्धा हो गई । समाज में सुख शांति का विस्तार हुआ ।
.
आपकी कोमलता और सद्व्यवहार परम श्‍लाघनीय था । आपके पास महन्त, सन्त, सामान्य साधु नेता, राज्य के अधिकारी व सेवक जो भी आते थे आप उनका अधिकारानुसार समादर करते थे । एक बार जो आपके पास आ जाता था, उसकी इच्छा बारंबार आपके पा आने की होती थी । आप की साधुता सौम्यता में ऐसा विचित्र आकर्षण था कि आपके दर्शन सत्संग से सबको यही अनुभव होता था - कि ये तो मेरे परम हितेषी हैं । सभी आपके दर्शन तथा सत्संग से परम प्रसन्न होते थे और अपना परम सौभाग्य समझते थे ।
.
सुन्दर जयन्ती ~
आपके आचार्य काल वि. सं. २००५ के कार्तिक शुक्ला ८ व ९ को नारायणा दादूधाम में दादूजी महाराज के सुयोग्य शिष्य राजस्थान के परम प्रधान संतकवि स्वामी सुन्दरदासजी का जयन्ती उत्सव भी दादू पंथी समाज ने मनाया था ।
.
इस ‘सुन्दर जयन्ती’ उत्सव में अन्य समाजों के महानुभाव भी पधारे थे । उत्सव के प्रथम दिन कार्तिक शुक्ल ८ को महात्मा विनोबा भावे के सभापतित्व में महामंडलेश्‍वर असंगानन्दजी उदासीन आदि विद्वानों के भाषण महाकवि सुन्दरदासजी की विशेषताओं को लक्ष्य करके हुये थे ।
(क्रमशः)

२१. समर्थाई आश्चर्य को अंग २९/३२

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
.
२१. समर्थाई आश्चर्य को अंग २९/३२
.
आज्ञा मांहीं लच्छमी, ठाढी है कर जोरि । 
सुन्दर प्रभु सनमुख रहै, दृष्टि सकै नहिं चोरि ॥२९॥
धन की देवी लक्ष्मी भी उन प्रभु के सम्मुख आज्ञापालन - हेतु उन के सम्मुख हाथ जोड़कर खड़ी रहती है । वह इस अज्ञापालन में कभी आँख नहीं चुरातीं (आज्ञापालन से मुख नहीं मोड़तीं) ॥२९॥
.
आज्ञा मांहैं तत्व सब, होइ देह कौ संग । 
सुन्दर बहुरि जुदे रहैं, आज्ञा करै न भंग ॥३०॥
'पञ्चतत्त्व' या 'पञ्च महाभूत' कहलाने वाले पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु एवं आकाश, उन महाप्रभु के आदेश से, प्राणियों के देह में सङ्घात रूप से एकत्र होते हैं । तथा उन का जब आदेश होता है तो वे उस देह को छोड़कर यथास्थान चले जाते हैं । वे उस महाप्रभु की आज्ञा कभी भङ्ग नहीं करते ॥३०॥
.
आज्ञा मांहैं रहत हैं, सप्त दीप नौ खंड । 
सुन्दर प्रभु की त्रास तें, कंपै सब ब्रह्मंड ॥३१॥
सप्तद्वीप - जम्बुद्वीप, शाकद्वीप, सूक्ष्मद्वीप, क्रौञ्चद्वीप, गोमयद्वीप, श्वेतद्वीप एवं लक्षद्वीप एवं नव खण्ड(पृथ्वी के नौ भाग) - भारत, इलावृत्त, किम्पुरुष, भद्र, केतुमाल, हरि, हरिण्य, रम्य एवं कुश - ये सभी उस प्रभु की आज्ञा में रहते हैं । संक्षेप में यह कह सकते हैं कि यह समस्त संसार(ब्रह्माण्ड) उस प्रभु के भय से काँपता रहता है(कि वे रुष्ट न हो जायँ) ॥३१॥
.
ऐसै प्रभु की त्रास तें, कंपै सब ही लोक । 
बार बार करि कहत हैं, सुन्दर तुम कौं धोक ॥३२॥
ऐसे आप सर्वशक्तिसम्पन्न उस निरञ्जन निराकार प्रभु के क्रोध से सभी संसारी जीव भय मानते हैं; अतः हे प्रभो ! आप का परम भक्त यह सुन्दरदास आप को बार बार प्रणाम(= धोक) करता है ॥३२॥
(क्रमशः) 

*विरह, आत्मसाक्षात्कार ॥*

🌷🙏 🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
.
*अति आतुर ये खोजत डोलैं,*
*बान परी वियोगिनि बोलैं ॥*
*सब हम नारी दादू दीन,*
*दे सुहाग काहू संग लीन ॥*
==============
*विरह, आत्मसाक्षात्कार ॥* 
आपणा रमइया कारणि, जोगणि ह्वै हूँ रे ।
पहिरूँ रे भसमी मुद्राली, बनखँडि जैहूँ रे ॥टेक॥
बिरह बिभूति भई तनि मेरै, सींगी सुरति हमारै रे ।
बैरागनि ह्वै वनखँडि जैहूँ, दरसन काज तुम्हारै रे ॥
सोइ बैराग एकटक आगैं, पलभरि पलक न लागै रे ।
रावल कै कारणि रौलानी, चेतनि पहरै जागै रे ॥
ग्यानि गुफा मैं रहणि हमारी, उनमनि ताली लाऊँ रे ।
अनहद बाजे बाजैं रावल, कींगरड़ी झुणकाऊँ रे ॥
अणभै भिख्या घर अबिनासी, चल तहाँ करै प्रवेसा रे ।
बषनां दरसन देषि करीजै, वा आइस कौं आदेसा रे ॥
.
अपनी भावना व्यक्त करते हुए बषनांजी कहते हैं । मैं अपने प्रियतम रमैयाराम को प्राप्त करने के लिये योगियों की भस्म, मुद्रा, सींगी, सेली आदि लगाकर व पहनकर योगिनी बनूंगी । मैं शरीर पर भस्म लगाऊंगी, कानों में मुद्रा पहनूंगी तथा प्रियतम को रिझाने के लिये एकान्त बनखंड में चली जाऊंगी । 
.
परम प्रियतम के अमिलन से उत्पन्न चित्त में आकुलता-व्याकुलता रूपी विरह की भस्म ही मेरे शरीर पर रमी होगी । चित्त की वृत्ति = सुरति का प्रियतम से सदैव तादात्म्य ही गले में लटकने वाली सींगी होगी । प्रियतम का सदैव नाम श्रवण ही कानों मुद्रा होगी । संसार तथा संसार के समस्त पदार्थों, सुखों से तन और मन से अनासक्ति रूपी वनखंड में निवास करने को जाउंगी । 
.
यह सब मैं इसलिये करूंगी कि हे प्रियतम ! आपके दर्शन हो जाएँ, आपसे मेरा चिरसंयोग हो जाये । इस एकान्तिकी, अनन्य वैराग्य के सामने एक पल के लिये भी मेरी आँखों की पलकें नीचे को नहीं गिरेंगी । क्योंकि आप रावल(योगियों का एक भेद) के कारण मैं रौलानी = जोगन पूर्ण सावधान होकर(चेतनि) आपके जाने के रास्ते में पहरा देती रहूंगी । अर्थात् मैं अपलक जागकर आपके आने की, दर्शन देने की प्रतिक्षा करूंगी । 
.
इस समय मेरी रहनी = दिनचर्या = क्रियाकलाप ज्ञानमय होंगे । (आत्मा अपने आपको परमात्मा जानकर परमात्मा ही अनुभव करे, दोनों को एक अनुभव करे, यही ज्ञान है । गुफा = आवरण । यहाँ ‘ज्ञान के आश्रय में’ से तात्पर्य है । अर्थात् इस समय मेरे सारे क्रियाकलाप ज्ञानमय होंगे) तथा मैं उनमनि = सहजावस्था = निर्विकल्प समाधि अवस्था से ताली = सम्बन्ध स्थापित कर लूंगी अर्थात् समस्त द्वन्द्वों से अतीत होकर निर्विकल्प सहजावस्था में स्थिर हो जाऊंगी । 
.
इस समय रावल = परमप्रियतम अनहदनाद रूपी बाजे के रूप में तथा मैं पायल की झुनकार के रूप में बजूंगी अर्थात् हम दोनों इस अवस्था में दो न रहकर एक नाद स्वरूप हो जायेंगे । पाठकों को ज्ञात हो, ब्रह्मरंध्र में जब शब्द-सुरति का एकाकार होता है तब वहाँ परमप्रकाश हो जाता है तथा अनहदनाद होता है । वहाँ मूर्ति, आकृति आदि कुछ नहीं होती । 
.
सुषुम्ना से अमृत की धारा का प्रवाह भी यहाँ अनवरत चलता रहता है । “स्त्रवै सुषुम्ना नीर फुवारा । सुन्य सिखर का यह व्यवहारा ॥” बषनांजी अपने आपको संबोधित करते हुए कहते हैं, अब हमें चलकर अविनाशी परमात्मा के घर में प्रवेश करना चाहिये जहाँ उसकी अणभै = अपरोक्ष साक्षात्कार रूपी भिक्षा मिलती है । उस आइस = योगी = परमप्रियतम का दर्शन = अपरोक्ष साक्षात्कार प्राप्त करके उसका अभिवादन करूंगा ॥७४॥