🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷*卐 श्री दादूदयालवे नम: 卐*🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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*ना हम छाड़ैं ना गहैं, ऐसा ज्ञान विचार ।*
*मध्य भाव सेवैं सदा, दादू मुक्ति द्वार ॥*
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*मेड़ता स्थान*
आचार्य चैनरामजी महाराज के शिष्य परंपरा के मेड़ता स्थान की पूर्व की प्रणाली ज्ञात न होने से नारायणदास वैद्य(वि. सं. १९९७) २~जोहरादासजी वर्तमान हैं । यह स्थान घोसी वाड़ा में था । चिकित्सा के कारण प्रसिद्ध भी था किन्तु अब बिक चुका है । कृष्णदेवजी महाराज की छत्री के पास अनेक संतों के चरण हैं किन्तु ज्ञात नहीं हैं कि वे चैनराम महाराज की शिष्य परंपरा के हैं या नहीं हैं किन्तु चैनरामजी महाराज के पीछे के ही हैं ।
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एक छोटी छत्री जो भण्डार के पास है, उसमें बाईजी रामकुमारीजी के चरण हैं । इसमें वि. सं. १८५५ बदि १४ बुधवार लिखा है~ यह संत सोनारामजी की शिष्या थी । पास की तलाई को डोकरी तलाई भी कहते हैं और वह बाई रामकुमारीजी की बनवाई हुई है, ऐसा सुनते हैं । छत्री में शिला लेख~ दोहा-
“सतगुरु सोनारामजी, नृमल सुनायो नाम ।
लाहो हरि बाई लियो, रामकुवरि भजराम ॥
अष्टादस सौ चौवने, बदि फागुण बुधवार ।
दिन चौदश बाई भया, राम कुवरि भो पार ॥१॥
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यह छत्री आज इस वर्ष वि. सं. २०३२ में १७७ वर्ष पूर्व की है । हो सकता है सोनारामजी चैनरामजी की शिष्य परंपरा के ही हों । एक लम्बे चबूतरे पर भी १८७६ में सुन्दरदासजी के, सं. १८८० में पं. रामदासजी के । सं. १८४६ में श्रीनाथजी के । सं. १८९२ में अमरदासजी के । इत्यादिक चरण हैं किन्तु निश्चय पता नहीं कि ये सब चैनरामजी की शिष्य परंपरा के हैं । चैनरामजी महाराज के ब्रह्मलीन होने के पीछे के हैं और कृष्णदेवजी महाराज के छत्री के पास हैं । अतः उनका यहां संकेत कर दिया है ।
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*फुलेरा स्थान*
फुलेरा में आचार्य चैनरामजी महाराज की शिष्य परंपरा का स्थान था । फुलेरा शहर से उत्तर की ओर नागों की छावणी के पास था । अच्छा प्रतिष्ठित स्थान था । कुवा व कृषि योग्य भूमि भी थी । इस स्थान के दो संतों का ही परिचय प्राप्त होता है~ १- उदयरामजी २- मोहनदासजी । अब स्थान समाप्त है ।
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*रैंण स्थान*
आचार्य चैनरामजी की परंपरा का स्थान रैंण में दादूद्वारा है । इसमें एक~कुशालीरामजी महान् संत हुये हैं । उनके दो शिष्य थे, वीररामजी और चैनरामजी । चैनराजी आचार्य कृष्णदेवजी की सेवा में रहते थे । इससे उनके कृपापात्र हो गये और आगे नारायणा दादूधाम के आचार्य बन गये थे । वीरमदासजी रैंण दादूद्वारा में रहे । २-वीरमदासजी, ३-लालदासजी, ४-बोदूरामजी, ५-रघुनाथदासजी, ६-रामचन्द्रदासजी, ७-नानकदासजी वर्तमान हैं । यह स्थान रैंण के तालाब के पश्चिम तट और ग्राम के दक्षिणी छोर पर है ।
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रघुनाथदासजी तक स्थान ठीक चला । बीच में शिथिलता आ गई थी किन्तु नानकदासजी ने इसे पुनः ठीक स्थिति पर पहुँचाया है । पहले कच्चा स्थान था । नानकदासजी ने पक्का दादू मंदिर बना दिया है । नानकदासजी स्थान की अच्छी सेवा कर रहे हैं । आगत अतिथियों व संतोंकी भी अच्छी सेवा करते हैं । उन्होंने स्थान की प्रतिष्ठा बढ़ाई है ।
(क्रमशः)















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