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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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३०. ज्ञानी कौ अंग ६१/६५
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इंद्री अर्थनि कौं गृहै, लिप्त न कबहूं होइ ।
सुन्दर ज्ञानी मुक्त है, कर्म न लागै कोइ ॥६१॥
ज्ञानी की इन्द्रियाँ स्वभाववश अपने विषयों को ग्रहण करती रहती हैं, परन्तु ज्ञानी उन कर्मों में लिप्त नहीं होता; क्योंकि वह उन कर्मों के फलाफल से मुक्त हो चुका है ॥६१॥
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रागी त्यागी शांत पुनि, चतुर्थ घोर बखांनि ।
ज्ञानी चारि प्रकार हैं, तिनहिं लेहु पहिचांनि ॥६२॥
ज्ञानीं के चार भेद : अन्त में, श्रीसुन्दरदासजी महाराज ज्ञानियों के चार भेद बता रहे हैं - १. रागी ज्ञानी; २. त्यागी ज्ञानी; ३. शान्त ज्ञानी; तथा ४. घोर(क्रोधी) ज्ञानी । इन चारों के क्रमशः ये लक्षण हैं, इन को समझ लो ॥६२॥
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रागी राजा जनक है, त्यागी शुक सम थोर ।
शांत जानि जमदग्नि कौं, दुर्वासा अति घोर ॥६३॥
१. राज्यसुख भोगते हुए भी ज्ञानी की जीवनचर्या वाले ज्ञानी रागी ज्ञानी कहलाते हैं; जैसे - राजा जनक । २. अपनी समस्त जीवनचर्या त्यागवृत्ति से निभाने वाले शुकदेव मुनि के समान त्यागी ज्ञानी होते हैं । ३. सदा शान्त अवस्था में रहने वाले जमदग्नि ऋषि के समान ज्ञानी शान्त ज्ञानी कहे जाते हैं । तथा ४. दुर्वासा के समान अति क्रोधी तपस्वी घोर ज्ञानी कहे जाते हैं ॥६३॥
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क्रिया सु तिनकी भिन्न है, भिन्न देह ब्यवहार ।
ज्ञान बिषै नहिं भेद है, सुंदर एक लगार ॥६४॥
महाराज श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - यहाँ वास्तविकता यह है कि इन चतुर्विध ज्ञानियों की जीवनचर्या में इन की दैहिक क्रियाएँ भिन्न हो सकती हैं; इनके देहव्यापार भिन्न(पृथक्) हो सकते हैं; परन्तु इनकी ज्ञानावस्था में कोई भेद नहीं होता, सभी का ज्ञान एक समान ही है ॥६४॥
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क्रिया देखि ज्ञानीनि की, सब कोऊ भ्रमि जांहिं ।
सुन्दर देखैं देह कृत, आशय पावै नांहिं ॥६५॥
इति ज्ञानी कौ अंग ॥३०॥
परन्तु लोक में साधारणतः मुर्ख जन इन ज्ञानियों की दैहिक क्रिया देख कर भ्रम में पड़ जाते हैं । वे इन की दैहिक क्रिया देखने तक ही सीमित रहकर इन की वास्तविकता(इनका ज्ञानित्व) नहीं समझ पाते ॥६५॥
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इति ज्ञानी का अंग सम्पन्न ॥३०॥
(क्रमशः)








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