शुक्रवार, 17 जुलाई 2026

*२१. भजन भेद का अंग ~२५/२७*

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*🌷卐 सत्यराम सा 卐🌷*
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*२१. भजन भेद का अंग ~२५/२७*
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*जन रज्जब विछुड़त मरहिं, जिनके अमल अराध ।*
*मनसा वाचा कर्मना, साखी सद्गुरु साध ॥२५॥*
जिनके हृदय में स्वार्थ-मल रहित परमात्मा की भक्ति है, वे प्रभु के वियोग दु:ख से व्यथित होकर मर जाते हैं । यह बात हम मन, वचन, कर्म से सत्य ही कहते हैं, इसमें सद्गुरु और संतों की भी साक्षी है ।
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*निति निवृत्ति प्रभुता प्रभु, चतुर स्थान कर गौन ।*
*रज्जब पावे प्राण पति, भृत्य भगवंत सु भौन ॥२६॥*
व्यवहारिक नीति, वैभव स्वामीपना और वैराग्य का अभिमान, इन चारों से दूर रहने वाला भक्त ही भगवान के भवन को जाकर प्राणपति परमेश्वर को प्राप्त करता है ।
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*शरीअत सेव शरीर की, तरीकते दिल राह ।*
*माँहिं मारफत कीजिये, हकीकत मिल जाह ॥२७॥*
मुसल्मानी धर्म की चार अवस्थाओं द्वारा भजन-रहस्य बता रहे हैं - दोनों कानून रूप शरीअत में तो भजन द्वारा भी शरीर की ही सेवा में लगा रहता है । शुद्धाचरण रूप तरीकत में मन से प्रभु का मार्ग पकड़ता है । अध्यात्म विद्या रूप मारफत में ईश्वरीय ज्ञान का विचार करता है । मूल तत्त्व ब्रह्म में निष्ठा रूप हकीकत में पहुँचने पर ब्रह्म में ही मिल जाता है । इस प्रकार अवस्था भेद से भजन भेद भी होता है ।
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*धर्म योग ब्रह्मांड मध्य, कर्म योग पिंड माँहिं ।*
*भक्ति योग सो प्राण घर, अगम योग ठहराँहि ॥२८॥*
धर्म योग सभी ब्रह्माण्ड में व्याप्त है वा धर्म योग का साधक ब्रह्मांड में ही रहता है । कर्म योग व्यक्ति की भावना से भिन्न-भिन्न होने से शरीर में ही है वा शरीर से होता है भक्ति योग प्राणी के हृदय रूप घर में होता है । उक्त तीनों योगों से प्राणी गतिशील रहता है किन्तु ब्रह्मचिन्तन द्वारा प्राप्ति रूप अगम योग से योगी ब्रह्म में स्थिर होकर ब्रह्म रूप ही हो जाता है । अत: ब्रह्म चिन्तन ही रहस्यमय भजन है ।
(क्रमशः)

सुखासक्ति का त्याग

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*सुख मांहि दुख बहुत हैं, दुख मांही सुख होइ ।*
*दादू देख विचार कर, आदि अंत फल दोइ ॥*
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*॥ श्रीहरि: ॥*
दिनांक 17.7.26.
वि. सं. 2083, 'रौद्र' नाम संवत्सर, आषाढ़ मास, शुक्ल पक्ष, तृतीया, शुक्रवार। (गीता दैनन्दिनी अनुसार)।
1- परम श्रद्धेय स्वामीजी श्री रामसुखदासजी महाराजका प्रवचन—
दिनांक— 13.9.95, सांय 5.0 बजे।
स्थान— गांधी मैदान, जोधपुर।
*विषय— सुखासक्ति का त्याग।*
2- गीता पाठ— गीता पाठ अध्याय 17 श्लोक संख्या 21 से 28 तक।
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*🕉️ संसारमें जो सुख सामग्री दिख रही है, यह सब धोखा है और परमात्मा सबको आनन्द देने वाले हैं। धोखे वाली चीज आपका निरन्तर त्याग कर रही है और परमात्माका और आपका संबंध नित्य-निरन्तर है, परमात्मा कभी किसीका साथ छोड़ते ही नहीं। जो आपसे नित्य निरन्तर अलग हो रहा है, उस शरीर-संसारसे अलग होना है और जो परमात्मा नित्य निरन्तर आपके साथ रह रहे हैं, उन्हीं परमात्माको प्राप्त करना है। यह सत्संगकी खास बात है।*
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*🕉️ रुपये आ जाय, अनुकूल पदार्थ मिल जाय, मैं सुख पूर्वक जीता रहूँ— ये खास मोह है, आदर, मान, सत्कार अच्छा लगता है, ऐसी रूचि पतन करने वाली है। संसारको, नाशवान् वस्तुओंको सत्ता-महत्ता दे दी है, यह बाधा है। ये सब वस्तुएँ तो रहेगी नहीं और इनकी आशा, विश्वास, भरोसा रखा तो दुःख पाना पड़ेगा, रोना पड़ेगा। मनुष्य मरनेसे डरते हैं, वह मृत्यु प्रतिक्षण नजदीक आ रही है। आप यदि अपना कल्याण चाहते हैं, तो भोगोंका और अनुकूलताकी इच्छाका विषके समान त्याग कर देना चाहिए। भोग पदार्थ, आराम, मान-बड़ाई अच्छे लगते हैं, यह खास खतरा है।*
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*🕉️अनुकूलता जितना बांधती है, प्रतिकूलता उतना नहीं बांधती। अनुकूलताका सुख बेहोश कर देने वाला है, लेकिन प्रतिकूलता होशमें लाने वाली है। सावधान रहने वाला अनुकूलता-प्रतिकूलता, दोनोंमें नहीं फँसता है। भोग पदार्थ, मान-बढ़ाई, आदर-सत्कार, आराम— ये बांधने वाले हैं; अपमान, निन्दा, तिरस्कार, पैसोंका घाटा आदि बुरे लगते हैं, लेकिन ये दुखदाई परिस्थितियाँ आपको कल्याणकी तरफ अग्रसर कराने वाली हैं। खेड़ापाके श्रीरामदास जी महाराजको जोधपुरके राजाने देश-निकाला दे दिया, हुक्म मिला जब वे मकानके बाहर दातुन कर रहे थे, उसी समय वहाँसे चल दिए, गुरु महाराजका दिया हुआ गुटका और छड़ी साथमें ली, उसीमें आनन्द मान लिया, मकान, रुपये-पैसों आदिकी तरफ देखा ही नहीं।*
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*🕉️श्रीमद्भागवतमें भगवान् कहते हैं— 'जिस पर मैं कृपा करता हूँ, उसका धन हर लेता हूँ, भाई-बंधुओंसे संबंध विच्छेद करा देता हूँ, सब तरफसे उसके ऊपर दुःख आ जाते हैं— फिर भी वह मेरा भजन नहीं छोड़ता है, तो मैं उस भक्तका दास हो जाता हूँ।' जैसे वैद्य कड़वी दवाई रोगीका रोग दूर करनेके लिए देता है, ऐसे ही भगवान् प्रतिकूलता हमें जन्म-मरणसे रहित करनेके लिए, अपना प्रेम प्रदान करनेके लिए देते हैं, इसलिए प्रतिकूलतामें दु:खी नहीं होकर परम आनन्द मनाना चाहिए।*
बहुत श्रेष्ठ प्रवचन है।

३०. ज्ञानी कौ अंग १३/१६

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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३०. ज्ञानी कौ अंग १३/१६
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बंध मोक्ष जाकै नहीं, स्वर्ग नरक नहिं दोइ । 
सुन्दर ज्ञानी ज्ञानमय, संशय रह्यौ न कोइ ॥१३॥
महाराज श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - ऐसी उच्चतम अवस्था वाले ज्ञानी के लिये संसार में न कहीं कोई बन्धन है, न मोक्ष । न कोई स्वर्ग तक पहुँचाने वाला पुण्य कर्म रह जाता है और न कोई नरक में गिराने वाला पापकर्म । वह(ज्ञानी) उस स्थिति में पहुँच कर निरन्तर ज्ञानमय अवस्था में ही लीन रहता है ॥१३॥
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घर बन दोऊ सारिखे, नां कछु ग्रहण न त्याग । 
सुन्दर ज्ञानी ज्ञानमय, नां कहुं राग बिराग ॥१४॥
इस स्थिति में पहुँच कर उस ज्ञानी का न घर(गृहस्थ धर्म) के प्रति राग(आसक्ति) रह जाता है, न वन(संन्यास) के प्रति मोह । वह इन दोनों(घर एवं वन) को न ग्रहण(स्वीकार) करता है न छोड़ता है; क्योंकि उसकी दृष्टि में न कहीं राग का महत्त्व रह गया है न वैराग्य का । अतः वह अब निरन्तर ज्ञानमय स्थिति में ही स्थित रहता है१ ॥१४॥ 
(१ तु० श्रीदादूवाणी : 
दादू जिन प्रांणी करि जाणियां, घर बन एक समान । 
घर मांहै बन ज्यौं रहै, सोई साध सुजान ॥१६/२९)
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निंदा स्तुती देह की, कर्म शुभाशुभ देह । 
सुन्दर ज्ञानी ज्ञानमय, कछू न जानै येह ॥१५॥
उस की दृष्टि में सांसारिक निन्दा एवं स्तुति तथा ये लौकिक शुभ या अशुभ कर्म देह से होते हैं, अतः वही इन के प्रति उत्तरदायी है । अतः, ज्ञानी इन सब की उपेक्षा करता हुआ निरन्तर ब्राह्मी स्थिति में ही स्थित रहता है ॥१५॥
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काहू सौं घटि बढि नहीं, काहू निकट न दूरि । 
सुन्दर ज्ञानी ज्ञानमय, ब्रह्म रह्या भरपूरि ॥१६॥
वह ज्ञानी न वह किसी से अल्प प्रेम ही करता है और न अधिक द्वेष ही(घटि बढि) । न वह किसी से घनिष्ठ सम्बन्ध बनाता है और न बहुत दूर तक किसी से द्वेष ही रखता है । वह तो एकमात्र निरञ्जन निराकार प्रभु को सर्वव्यापक मानता हुआ सर्वदा उसी में लीन रहता है ॥१६॥
(क्रमशः) 

खेड़ापा रामस्नेही संप्रदाय

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🌷*卐 श्री दादूदयालवे नम: 卐*🌷
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*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
*जे जन बेधे प्रीति सौं, सो जन सदा सजीव ।*
*उलट समाने आप में, अन्तर नांही पीव ॥*
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लालदास जी के विषय में वहां यह भी प्रसिद्ध है कि खेड़ापा के रामस्नेही संप्रदाय के प्रवर्तक रामदासजी ने खेड़ापा से आकर मलाणा में एक दिन जागरण किया था । वे रात्री भर उच्च स्वर से गाते रहे थे । इससे भजनानन्दी लालदासजी के भजन में उस रात को विघ्न ही रहा ।
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प्रातःकाल लालदासजी ने भावूदास ब्राह्मण से पूछा~ आज रात्रि भर ऊंचे स्वर से कौन गाता रहा था । भावूदास ने कहा~ खेड़ापा के रामदासजी तीन दिन से यहां आये हुये हैं । आज रात्रि को वामियों के वास में उन्होंने जागरण किया था, अतः वे ही गाते थे । लालदासजी ने भावूदास को कहा~ तुम रामदासजी को मेरे पास बुला लाओ । भावूदास ने जाकर रामदासजी को कहा~ आपको लालदासजी महाराज बुला रहे हैं ।
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रामदासजी भावूदास के साथ लालदासजी के पास आये । तब लालदासजी ने उनको कहा~ रामदास ! जितनी लगन से तुम रात्रि भर ऊंचे स्वर से गाते रहे उतनी लगन से रामजी का भजन करते तो तुम्हारा कल्याण हो जाता और तुम्हारे संग से अन्यों का भी कल्याण होता । लालदासजी का उक्त वचन सुनकर रामदास जी बोले~ फिर आप ही मुझे शिष्य बनाकर रामजी के भजन की मुक्ति बताइये । तब लालदासजी ने कहा~ तुम सिंहस्थल में जाकर हरिरामदासजी के शिष्य हो जाओ ।
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लालदासजी की आज्ञा मानकर रामदास सिंहस्थल में हरिरामदासजी के पास गये । हरिरामदासजी ने उनको शिष्य बनाकर राम भजन में लगा दिया । फिर वे भजन करके उच्चकोटि के संत हो गये थे । उन्हीं से खेड़ापा रामस्नेही संप्रदाय चला है । रामदासजी ने लालदासजी के विषय में कहा भी है~
"लालदास लागा गुरु घाटी, कीन्ही दूर भरम की टाटी ।"
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विराही के संत सुखरामजी भी पहले लालदासजी के सत्संग में जाते थे और उनसे साधन संबन्धी परामर्श भी करते थे । यह विराही की परंपरा के संत भी सुनाते हैं । मलाणा के स्थान में दो संतों से अधिक संख्या नहीं होती है । लालदासजी ने ही ऐसी मर्यादा इसलिये बाँध दी थी कि अधिक होने से भजन में विघ्न पड़ेगा ।
(क्रमशः)

गुरुवार, 16 जुलाई 2026

३०. ज्ञानी कौ अंग ९/१२

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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३०. ज्ञानी कौ अंग ९/१२
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काइक बाइक मानसी, कर्म न लागै ताहि । 
सुन्दर ज्ञानी ज्ञानमय, देह-क्रिया सब आहि ॥९॥
ज्ञानी की सभी क्रियाएँ ज्ञानमय : महाराज श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - ऐसे साधक को, अतिशय ज्ञानवान् होने के कारण, उस के शरीर वाणी एवं मन से होने वाली क्रियाओं(कर्मों) का कोई शुभ या अशुभ फल स्वीकार नहीं होता; क्यों कि उस के मत में ये तीनों ही प्रकार के कर्म उसके देह से होते हैं; अतः जीवात्मा से इन का सम्बन्ध कैसे हो सकता है ! ॥९॥
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पहलैं कियौ न अब करौं, आगै की नहिं आस । 
सुन्दर ज्ञानी ज्ञान करि, काटे बंधन पास ॥१०॥
उस ज्ञानी साधक के मत में - जीवात्मा ने न पहले(भूतकाल में) कोई कर्म किया था, न वर्तमान में कोई कर्म कर रहा है, और न वह भविष्य में ही कोई कर्म करेगा । ज्ञान के आश्रय से यह उत्तम साधक अपने सभी भवबन्धन उच्छिन्न कर चुका है ॥१०॥
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बिधि निषेद जाकै नहीं, नां कछु पाप न पुंन्य । 
सुन्दर ज्ञानी ज्ञानमै, सब करि जानै शुंन्य ॥११॥
ऐसे उत्तम साधक के लिये, ज्ञान की इस उच्च भूमि में पहुँचने पर, न कोई शास्त्रोक्त विहित कर्म करणीय रह जाते हैं, और न कोई निषेधात्मक(अविहित) कर्म त्याज्य रह जाते हैं । न उस के लिये पुण्यकर्म या पापमय कर्म ही ग्राह्य या त्याज्य रह जाता है । ऐसा ज्ञानी समस्त संसार को निराकार निरञ्जन प्रभु से ही व्याप्त मानता है ॥११॥
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हर्ष शोक उपजै नहीं, राग द्वेष पुनि नांहिं । 
सुन्दर ज्ञानी देखिये, गरक ज्ञान के मांहिं ॥१२॥
ऐसी स्थिति में पहुँचने पर, उस ज्ञानी के लिये इस संसार में न कोई हर्षोत्पादक घटना रह जाती है, न कोई शोकमय समाचार । न कहीं उस का राग(प्रेम) रह जाता है, न द्वेष । वह तो इन सब(हर्ष शोक, राग द्वेष आदि) से ऊपर उठकर निरन्तर ज्ञानमय अवस्था(ब्राह्मी स्थिति) में ही स्थित रहता है ॥१२॥
(क्रमशः) 

१५ लालदासजी

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🌷*卐 श्री दादूदयालवे नम: 卐*🌷
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*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
*समर्थ सो सेरी समझाइनैं, कर अणकर्ता होइ ।*
*घट घट व्यापक पूर सब, रहै निरंतर सोइ ॥*
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१२ वें चेतनदेवजी अच्छे विद्वान् और विरक्त थे । इन्होंने दादूजी का जीवन चरित्र भी लिखा है । उसमें ५२ विश्राम हैं । इन्होंने जीवितावस्था में ही गद्दी त्याग दी थी । ये एकान्त में रहकर भगवद् भजन ही करते थे । शांत स्वभाव के अच्छे संत थे । १४ वें भजनदासजी भी अच्छे विद्ववान्, वैद्य व संगीतज्ञ थे । इनके पश्चात् कोई महन्त नहीं है ।
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१५ लालदासजी - केवलरामजी के पाटवी शिष्य रामदासजी, उनके शिष्य हरिभक्तजी उनके हरिदासजी, उनके लालदासजी हुये हैं । इस प्रकार दादूजी से ७ वें लालदासजी हैं । लालदासजी महान् संत हुये हैं । ये लालदासजी मलाणा वालों के नाम से जोधपुर के आस पास प्रसिद्ध हैं । इनका स्थान मलाणा धाम नाम से पुकारा जाता है ।
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आपके स्थान में एक लाल पत्थर की सवामण की विशाल कुंडी है । लालदासजी के नाम का एक नारेल चढ़ाकर वहां के विशाल जल के कुंड में कुंडी को छोड़ देते हैं । वह जल पर तैरती रहती है । तैरते समय दो इंच पानी के बाहर रहती है, शेष पानी में डूबी रहती है । कुंडी में पानी नहीं भरता है । कहा भी है~
भक्त नाम से पाठ पर, पत्थर भी तिर जाय ।
महलाणे कुंडी तिरे, बहुते लोग सुनाय ॥दृ. त. ६॥
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स्थान में लालदासजी की खड़ाऊ हैं, उनको धोकर पिलाने से हिड़के(पागल) कुत्ते का विष उतरता है । इसके लिये आस पास के लोग वहां ही जाते हैं । अन्य इलाज नहीं कराते हैं । कहा भी है~
संतन के तन संग से जड़ में भी बल आत ।
लालदास की पादुका, अब भी रोग गमात ॥१९३॥दृ. त. ११॥
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लालदासजी को जोधपुर नरेश विजयसिंहजी ने कहा~ कूंडी तैरती है, तब तो शिला भी तैरनी चाहिये । तब लालदासजी जोधपुर के गुलाब-सागर में सागर के पास पड़ा एक पत्थर का स्तंभ तिरा दिया था । लालदास जी के स्थान मलाणा में अब भी प्रति मास की पूर्णिमा को जागरण सत्संग होता है ।
(क्रमशः)

बुधवार, 15 जुलाई 2026

*२१. भजन भेद का अंग ~२१/२४*

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*🌷卐 सत्यराम सा 卐🌷*
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*२१. भजन भेद का अंग ~२१/२४*
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*रज्जब भय भगवन्त के, रोम कहें उठ राम ।*
*अऊंट१ कोङि रट एक फल, एक हिये कहि राम ॥२१॥*
ह्रदय में एक राम का चिन्तन करने से राम का वियोग अनुभव होकर राम वियोग भय के द्वारा रोम खङे होकर राम-राम करने लगते हैं, इस प्रकार साढे तीन१ कोटि राम-नाम का जाप एक साथ होता रहता है, उसका एक अद्वैत ब्रह्म की प्राप्ति ही फल होता है ।
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*ऊँचा नीचा होय जग, कर डंडौत निमाज ।*
*रोम रोम रज्जब भया, गुरु गोविन्द के काज ॥२२॥*
जगत् के मनुष्य ऊँचे तथा नीचे होकर दंडवत और नमाज द्वारा उपासना करते हैं किन्तु हमारे तो गोविन्द और गुरु की कृपा रूप कार्य से रोम रोम से ही उपासना हो रही है ।
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*अठारहभार ऊभी भई, आये अविगत१ नांउ२ ।*
*रज्जब जीये रोम रस, सो बेला३ बलि जांउ॥२३॥*
मन इन्द्रियों के विषय परमात्मा१ का नाम२ हृदय में आने से रोमावलि खड़ी हो गई और जिस समय में रोम रोम से चिन्तन द्वारा रसपान करते हुये जीवित रहे, संतों के उस समय३ की मैं बलिहारी जाता हूँ ।
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*रज्जब माया ब्रह्म का, रोम रोम रस पीन ।*
*सो विहड़े१ तिन विछुड़तै, जैसे जल बिन मीन ॥२४॥*
जो माया का चिन्तन रूप रस रोम रोम से पान करता है, वह माया से बिछुड़ने से और जो ब्रह्म का चिन्तन रूप रस-रोम रोम से पान करता है, वह ब्रह्म के वियोग१ से जैसे जल बिन मच्छी मर जाती है, वैसे ही वह भी शरीर का त्याग देता है ।
(क्रमशः)

मंगलवार, 14 जुलाई 2026

३०. ज्ञानी कौ अंग ५/८

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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३०. ज्ञानी कौ अंग ५/८
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बोलत ही अनबोलता, मिलता ही अनमेल । 
सोवत ही अनसोवता, सुन्दर ऐसा खेल ॥५॥
ज्ञान के इस अलौकिक प्रभाव से उस ज्ञानी की ऐसी उच्च स्थिति हो जाती है कि उस की भाषण, मिलन, शयन आदि सभी क्रियाएँ लोक के प्रति उपेक्षा ही प्रकट करती रहती हैं ॥५॥
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बैठैं तैं बैठा नहीं, ऊठत उठ्या न मांनि । 
चलतैं सो चालै नहीं, सुन्दर ज्ञानी जांनि ॥६॥
इसी कारण, सांसारिक जन भी उस ज्ञानी के बैठने को साधारण 'बैठना' नहीं मानते । नहीं उसके खड़े होने को सामान्य 'खड़ा होना' मानने को तय्यार होते हैं । और न उस की चलनक्रिया को ही लौकिक 'चलन क्रिया' मानने की भूल करते हैं ॥६॥
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देत कछू नहिं देत है, लेत कछू नहीं लेइ । 
यह सब जानै स्वप्न करि, सुन्दर ज्ञानी सेइ ॥७॥
उस ज्ञानी के दान में कोई मोह नहीं होता, न ग्रहण(लेना) में कोई लोभ ही होता है । वह तो इन ‘दान’ एवं ‘ग्रहण’ – दोनों ही क्रियाओं को स्वप्न के समान(मिथ्या) ही समझता है । इसी लिये(यथार्थज्ञ होने के कारण ही) ऐसे साधक को ‘ज्ञानी’ मानना चाहिये ॥७॥
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काज अकाज भलौ बुरौ, भेदाभेद न कोइ । 
सुन्दर ज्ञानी ज्ञानमय, देह-क्रिया सब होइ ॥८॥ 
ऐसे ज्ञानवान् साधक की दृष्टि में सभी लौकिक कर्तव्य या अकर्तव्य, शुभ या अशुभ क्रियाओं में कोई भेद या अभेद नहीं होता; क्योंकि वह इन सब को मिथ्या ही मानता है । उस के मत में ये सब क्रियाएँ देह से होती हैं अतः इन का जीवात्मा से क्या सम्बन्ध माना जा सकता है ! ॥८॥
(क्रमशः) 

केवलरामजी के शिष्य

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🌷*卐 श्री दादूदयालवे नम: 卐*🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
*सत गुरु किया फेरि कर, मन का औरै रूप ।*
*दादू पंचों पलटि कर, कैसे भये अनूप ॥*
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२- रामदासजी रामदासजी अजमेर से जो केवलरामजी की शरण कायस्थ सज्जन आये थे वे ही केवलरामजी के शिष्य हो गये थे । तब उनका ही नाम रामदासजी रखा था और वे ही केवलरामजी की गद्दी पर विराजे थे ।
७ वें महन्त भगवान् दास जी जोधपुर के अस्थल से आकर गादी पर विराजे थे । ये बड़े प्रारब्धी संत थे ।
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८ वें सूरतरामजी विद्वान् और कवि हुये हैं ।
९वें रामनारायणजी १४ विद्याओं के ज्ञाता थे । उस समय उनके समान कोई अन्य विद्वान् ज्ञात नहीं होता था । कहा भी है~
"पंडित चबदा विद्या निधाना, रामनारायण सदृश न आना ।" आप अच्छे संगीतज्ञ थे । आपका पत्र व्यवहार पंडित निश्चलदासजी महाराज से भी होता रहता था ।
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१० गोविन्ददासजी अच्छे श्रीमान् हुये हैं ।
११ वें बोलतारामजी ख्याती प्राप्त हुये हैं । ये महाराज ध्यानदासजी के शिष्य थे । जाति के क्षत्रिय थे । शिकार करते समय एक बार एक गर्भवती हिरणी के इन्होंने गोली मारी थी । उससे गर्भ का बच्चा और हिरणी दोनों मर गये थे । उससे इनको अति ग्लानि हो गई फिर ये साधु हो गये ।
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वि सं. १९२५ में २५ वर्ष की आयु में साधु हुये थे । परबतसर के पास श्यामपुरा ग्राम के थे । साधु भेष लेने के पश्चात् १५ वर्ष तक तपस्वी रहे । साधु होने के पश्चात् किसी साधु के कुछ कहने पर आपने अपनी मूत्रेन्द्रिय काट दी थी । आपने प्रति दिन सवा लाख जप बहुत समय तक किया था । सुनते हैं आपने चार निस्संतान व्यक्तियों को संतानें दी थीं ।
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महन्त जुगलदासजी के प्राण कई दिन से नहीं निकल रहे थे, वे बहुत कष्ट पा रहे थे । आपने दादूवाणी के अचले का एक कौणा पानी में धोकर उनको पिलाया फिर उनका अनायास देहान्त हो गया था । आपकी कोटा, संगरूर, जयपुर आदि राजघरानों में अति प्रतिष्ठा थी । आप समाधि सिद्ध योगी थे ।
कहा भी है~
"पाछे भये बोलता रामा, ताका प्रसिद्ध जग में नामा ।
योगी भये समाधि लगाई, ताकी कीर्ती जग में छाई ॥"
इनकी गादी पर बैठने वाले महन्त चेतनजी ने उक्त पद्य अपने रचित दादू चरित्र के अन्त में लिखा है । वि.सं. १९७३ में मगसिर सुदि १३ को ब्रह्मलीन हुये । आपकी समाधि बीलू ग्राम में है ।
(क्रमशः)

अथ खालसा पर्व २

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🌷*卐 श्री दादूदयालवे नम:  卐*🌷
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*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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अथ खालसा पर्व २ ~
दादू नमो नमो निरंजनं, नमस्कार गुरुदेवत: ।
वन्दनं सर्व साधवा, प्रणामं पारंगत: ॥
अथ अध्याय १ = श्री गरीबदासोतों का परिचय~ 
इनमें ४ थामें हैं~ १ मांदी, २ गिदाणी, ३ खाचरिया वास, ४ जोधपुर । 
महन्त गादी नारायणा में है । 
गरीबदासजी के गद्दी के महन्त १-केवलरामजी, २- रामदासजी, ३- आनन्दीरामजी, ४-कृपारामजी, ५- जादूरामजी, ६- खेमदासजी, ७- भगवानदासजी, ८- सूरतरामजी, ९- रामनारायणजी, १०- गोविन्ददासजी, ११- बोलातारामजी, १२- चेतनदासजी, १३- गोवर्धनदासजी, १४- भजनदासजी । 
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१- गरीबदासजी के जीवितावस्था में  ही दादूजी की गद्दी त्याग देने से उनकी गद्दी अलग हो गई । गरीबदासजी  के मुख्य शिष्य केवलरामजी थे, जो बड़े सिद्ध पुरुष थे । उनकी सिद्धि का एक उदाहरण आचार्य पर्व के अध्याय १ के अन्त में दिया जा चुका है । केवलरामजी किशनगढ़ नरेश के सुझाव से दादूजी महाराज की गद्दी का मोह त्यागकर जहांगीर के बनाये हुये गरीबदासजी के महल में रहने लग गये थे । 
इन केवलरामजी आदि गरीबदासजी के शिष्यों की जो आगे शिष्य परंपरा चली उसी के संत गरीबदासोत कहलाते हैं । केवलरामजी के मुख्य ३६ शिष्य थे और भी थे । ३६ की परंपरा के ३६ स्थान अलग अलग थे, यह स्थान-परिचय में देंगे । केवलरामजी जैसे सिद्ध पुरुष थे वैसे वाणीकार संत कवि भी थे । 
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भक्तमालकार राघवदासजी ने लिखा है~
छप्पय~
प्रेम भक्ति को पुंज, रचे पद साखी नीके । 
करुणा विरह वियोग, सुनत उद्धारक जीके ॥
जो चल आवे साधु, बहुत तिन आदर करही । 
भजन भाव सतशील, देख सब का मन ढरही ॥
राघव महिमा करत जो, सुख पावैं नारि नर । 
स्वामी गरीबदास के, टीके केवलराम वर ॥६२०॥
उक्त पद से ज्ञात होता है कि इनकी वाणी में साखी तथा गेय पद हैं । 
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उदाहरण पद~
कहा करूं मेरो लाल रिसायो,
मैं मन्द भागन मर्म न जानो, मनमोहन से मन न लगायो ॥टेक॥
मोहि यह जन्म कहा दियो माई, जो मोरे श्यामसुन्दर नहिं आयो । 
धृक यह जन्म मिले नहिं माधव, जननी जन्मत विष किन पायो ॥१॥
सुनरी सखी सब अवगुण मेरे, तातैं पीव परदेश हि छायो । 
आतुर भई दशोंदिशि हेरूं, कौन सुहागिन जिन विलमायो ॥२॥
धरकत हृदय धीर नहिं धरही, ज्यूं ज्यूं अवसर जात सिरायो । 
कहूँ कौन से कहो मेरी सजनी, परम सनेही महल न आयो ॥३॥
मैं उनकी वे प्रीतम मेरे, यह मन जाके हाथ बिकायो । 
'केवल' जन्म सफल उन देख्यों, नाहिं ता यह तन बादि गमायो ॥४॥
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अकल पुरुष की आरती कीजे, युग युग राम अमर पद लीजे ॥टेक॥
चित चंदन मनसा की माला, ध्यान धूप मन पहुप रसाला ॥१॥
अखंड ब्रह्म सो इष्ट हमारा, सकल लोक जाका विस्तारा ॥२॥
ज्योति स्वरूप जगत उजियारा, ताहि सुमिर जन उतरे पारा ॥३॥
झिलमिल झिलमिल नूर प्रकाशा, तहँ केवल को देहु निवासा ॥४॥
(क्रमशः)

३०. ज्ञानी कौ अंग १/४

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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३०. अथ ज्ञानी कौ अंग
[इस अङ्ग का यथार्थ(मर्म) समझने के लिये जिज्ञासु को "सवैया" ग्रन्थ का ज्ञानी का अंग(२९) भी हृदयङ्गम कर लेना चाहिये ।]
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सुन्दर ज्ञानी जगत मैं, बिचरै सदा अलिप्त । 
यह गुन जानै देह कै, भूखो रहै क तृप्त ॥१॥
जिस साधक के शुद्ध हृदय में निरञ्जन निराकार प्रभु का साक्षात्कार(प्रत्यक्ष दर्शन) हो जाता है वह ज्ञानी साधक, इस स्थिति में पहुँचने पर, इस संसार के माया मोह से दूर हो जाता है, उसमें उस की कोई आसक्ति नहीं रह जाती; क्योंकि वह अपनी देह(शरीर) की अशुभ, अनित्य एवं असुख आदि न्यूनताएँ भली भाँति पहचान चुका होता है । अतः वह भूख, प्यास, शीत उष्ण, मान अपमान आदि आनुषङ्गिक कष्टों की उपेक्षा ही करता रहता है ॥१॥
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खाइ पिवै देखै सुनै, सुन्दर ले पुनि स्वास । 
सांधै तीर पताल कौं, फिरि मारै आकास ॥२॥
ज्ञानी की सांसारिक व्यवहारों में उपेक्षा : अतः वह ज्ञानी साधक खाता पीता हुआ, उठता बैठता हुआ, श्वास लेता हुआ भी इन क्रियाओं की उपेक्षा ही करता रहता है । कभी कभी तो उसकी दैहिक क्रियाओं में विरोधाभास(प्रतिकूलता) भी दिखायी देता है । जैसे - उस की किसी क्रिया से ऐसा प्रतीत होता है कि उसका लक्ष्य पाताल(नीचे) की ओर है; परन्तु वस्तुतः वह लक्ष्य होता है आकाश(ऊपर उच्चतम साधना) की ओर ॥२॥
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देखै परि देखै नहीं, सुनता सुनै न कांन । 
जानै सब जानै नहीं, सुन्दर ऐसा ज्ञांन ॥३॥
तब वह ज्ञानी किसी दृश्य को देखता हुआ इसमें कोई ज्ञान नहीं रखता, कानों से कुछ सुनता हुआ भी उसमें कोई आसक्ति प्रकट नहीं करता । महाराज श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - उस स्थिति में पहुँचने पर, ज्ञानी का लौकिक ज्ञान व्यवहारमात्र रह जाता है उसमें उसका कुछ भी रागानुषङ्ग(वास्तविकता) नहीं रहता ॥३॥
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भक्ष करै न भखै कछू, सूंघत सूंघै नांहिं । 
ऐसै लक्षण देखिये, सुन्दर ज्ञानी मांहिं ॥४॥
वह संसार में लौकिक पुरुषों के समान ही खाता हुआ या सूंघता हुआ दिखायी देता है; परन्तु उसकी जिह्वा या श्रवण इन्द्रियाँ उन खाद्य या श्रव्य पदार्थों के स्वाद(रस) में आसक्त नहीं होतीं - यही उस ज्ञानी के ज्ञान का अलौकिक लक्षण(चमत्कार) है ! ॥४॥
(क्रमशः)

सोमवार, 13 जुलाई 2026

*२१. भजन भेद का अंग ~१७/२०*

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*🌷卐 सत्यराम सा 卐🌷*
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*२१. भजन भेद का अंग ~१७/२०*
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*सुमिरन लागे लोग बहु, पर लही न ठावी ठौर ।*
*रज्जब मिलिये राम सौं, वह अराध कोइ और ॥१७॥*
यद्यपि बहुत लोग स्मरण में लगते रहे हैं किन्तु अपना निश्चित ब्रह्मरूप स्थान सभी को नहीं मिलता, जिस निष्काम आराधना के द्वारा राम से मिला जाता है, वह आराधना सकाम आराधना से भिन्न ही है ।
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*औषधि अकल अराध है, सब संतन की साखि ।*
*रज्जब रोग न तन रहै, कोई ल्यो पछ राखि ॥१८॥*
सभी संत यह साक्षी देते है कि कला विभाग से रहित परमात्मा की उपासना ही औषधि है, उस औषधि को दैवी गुण धारण रूप पथ्य रख करके कोई भी सेवन करे उसके शरीर में काम क्रोधादि रोग नहीं रहेंगे ।
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*नाम नेह बिन लीजिये, ज्यों रूखा खाया नाज ।*
*रज्जब पुष्ट न प्राण ह्वै, मरे न जीवन साज ॥१९॥*
प्रेम बिना नाम का उच्चारण करना रूखा नाज खाने के समान है, रूखे नाज से प्राणी का शरीर पुष्ट नहीं होता, खाने वाला न तो मरता है और न सुखपूर्वक जीवित ही रहता है । वैसे ही बिना प्रेम नाम उच्चारण करने से विशेष लाभ नहीं होता और न वह मुक्त होता है और न विषयों में उसे आनन्द मिलता है ।
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*काचे पाके रूखे सूखे, नाम नाज नहिं दोष ।*
*पै छप्पन भोग सहित जु जीजे१, सो कुछ औरे पोष ॥२०॥*
कच्चा हो वा पक्का हो रूखा हो वा सूखा, नाज से पोषण होने में तो कोई दोष नहीं किन्तु छप्पन भोग सहित भोजन जीमने१ से पोषण होता है वह तो विलक्षण ही होता है, वैसे ही नाम से तो लाभ ही होता है किन्तु विवेक, वैराग्य, चित्त स्थैर्यादि के सहित निज नाम के चिन्तन से जो आनन्द होता है वह कुछ विलक्षण ही होता है ।
(क्रमशः)

२९. अद्वैत ज्ञान कौ अंग ४८/५०

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२९. अद्वैत ज्ञान कौ अंग ४८/५०
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सुन्दर अष्टावक्र ऋषि, ब्रह्म बतायौ एक । 
दूरि कियौ भ्रम सकल ही, जो नानात्व अनेक ॥४८॥
इसी प्रकार, अष्टावक्र ऋषि ने भी अपनी अष्टावक्र गीता में ब्रह्मज्ञान का ही एकान्ततः उपदेश किया है । उस में जगत् के विभेद(नानात्व) का सर्वथा खण्डन ही किया है ॥४८॥
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दत्तात्रय मुनि यौं कह्यौ, ब्रह्म बिना कछु नांहिं । 
सुन्दर सोई कृष्णजी, भाख्यौ गीता मांहिं ॥४९॥
दत्तात्रेय मुनि ने अपने दत्तात्रेयसंहिता ग्रन्थ में यही कहा है कि यह सम्पूर्ण दृश्यमान जगत् सर्वथा ब्रह्ममय है । इसी प्रकार श्रीमद्भगवद्‌गीता में भी श्रीकृष्ण ने प्राधान्यतः ब्रह्मज्ञान का ही सदुपदेश किया है ॥४९॥
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सुन्दर यहै निरूपियौ, बहु विधि करि वेदांत । 
ब्रह्म बिना दूजा नहीं, सबकौ यह सिद्धांत ॥५०॥ 
इति अद्वैतज्ञान कौ अंग ॥२९॥
अधिक क्या कहें ! उपनिषद्, ब्रह्मसूत्र एवं शाङ्करभाष्य आदि वेदान्त के ग्रन्थों में विविध रीतियों से 'ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या' का ही प्रधानतः निरूपण है । अतः उपर्युक्त प्रमाणों से यही सिद्ध हुआ कि इस जगत् में ब्रह्म के अतिरिक्त कुछ भी सत्य नहीं है ॥५०॥
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इति अद्वैतज्ञान का अंग सम्पन्न ॥२९॥
(क्रमशः)

परब्रह्म की अनुभूति

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*॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥*
*॥ दादूराम~सत्यराम ॥*
*साभार सौजन्य ~ “श्रीमद्‌ दादू पंथ प्रकाश”*
*श्रीमद्दादूपीठाधीश्वर(२०) श्री गोपालदासजी महाराज का संक्षिप्त जीवन दर्शन~*
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आपके उपदेशादेश उद्बोधन दीक्षा-मंत्र तथा प्रबोधन पूर्ववर्ती महान् आदर्श पूज्य आद्याचार्य परम गुरुवर्य व अनुवर्ती महान् संतों की अनुभूत वाणी श्री से अनुस्यूत सर्वग्राही व प्रवाही रहते हैं, जिन्हें प्रत्येक जिज्ञासु नर-नारी सहजता से हृदयंगम कर अपने को सर्वथा आश्वस्त हो अपने कल्याण के निमित्त प्रवृत्त होता है ।
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सहज संतमार्ग के अनुष्ठाता पूज्याचार्यश्री का सर्वथा सरल, सरस, सौम्य, निर्मल आकर्षक व प्रांजल-स्वभाव, निर्विकार निस्पृह तथा अहं से परे हरिस्मरण में निमार जीवदया व कल्याणकाम वृत्ति 'शाश्वत संत-मत~
'आपा मेटे हरि भजै, तन मन तजै विकार ।
निर्वैरी सब जीव सों, दादू यहु मत सार ।'
(श्रीदादूवाणी) चरमोदेश्य व उपास्य मंत्र है ।
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नवनियुक्त पीठाधीश्वरश्री ने अपनी भक्ति प्रतिभा समर्पण सेवा तथा गुरुभक्ति से समस्त अनुयायी-वर्ग तथा धर्मक्षेत्र में सर्वत्र चहुँमुखी ख्याति एवं कीर्ति अर्जित कर परम पावन पीठ की महिमा को विस्तीर्ण करते हए लोकार्जन व मुख्यधाम श्री दादूद्वारा के सर्वांगीण विकास तथा उत्कर्ष के साथ परमेष्ठदेवश्री की "वाणीश्री" के सिद्धान्त, संतमत तथा संन परम्परानुकूल निःश्रेयस का पथ प्रशस्त किया ।
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समारोहों-संत सम्मेलनों अन्यान्य धार्मिक अनुष्ठानों में संतमतानुसार उपदेशादेश, दीक्षा तथा संस्कारदान के द्वारा असंख्य आप प्रतिवर्ष पारम्परिक चातुर्मास यजों के माध्यम से वाणीश्री का देश में सर्वत्र प्रचार-प्रसार, दैनिक सात्संगिक जिज्ञासुजनों को आश्वस्त कर उनके कल्याण की स‌कामना परमप्रभु से करते रहे हैं ।
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श्रीमद् दादूधाम नरायना आश्रम का अपूर्व परिष्कार जिसमें धाम के भव्य एवं सर्व प्रसाधनयुक्त प्रासादों का निर्माण श्रद्धास्पद पुरा व पावन-प्रासादों की कमनीयता. यंत्रादि तथा विविध सन्त साहित्यिक धरोहर के सुरक्षा के साथ उनका संदर्शन, परम सुरम्य लोकोपकारी प्रयास स्थान के वैभव को चार चांद लगा देता है ।
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सम्प्रति में पिछले 17 वर्षों की अल्पावधि में पीठाधीश्वरश्री ने परमेष्टदेव श्रीमद्दादूदयाल जी महाराज, पूर्ववती समस्त पूज्याचार्यों व गुरुवर्य की कमनीय-कीर्ति के साथ समस्त दादू-समाज, पूज्य व सुसिद्ध स्तंभ-स्थानों एवं अनुयायां देश-विदेशीय भक्तों की श्रद्धा को केन्द्रित कर असंख्य नूतन अनुजनों की अपार श्रृंखला खड़ी कर विदेशों तक एतदर्थ भ्रमण कर "दादूमत" को सर्वज्ञ एवं सर्वस्पर्शिता के साथ सर्वाङ्गीणता प्रदान की है ।
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आपके प्रवचनों आशीर्वादों, कथा प्रसङ्गों तथा उपदेशादेशों में समस्त निर्गुणी संत-श्रेणी के सन्तों की अनुभव वाणी, झंकृत होती हैं । संतवर्य सद्‌गुरु श्री दादूदयाल, सन्त कबीर, गुरुनानक, रैदास, नामदेव, दारिया प्रभृत्ति संतों की परावाणीश्री, सन्त रज्जब, विरही बखना, संत वाजिंद, संतकवि सुंदरदास, श्री जगजीवनदास आदि पंथीय अनुवर्ती संत-शिष्यों के हृदयस्पर्शी संदेश तथा आद्यन्त सकल संतों व भगवद् भक्तों के जीवन-दृष्टांत व वृत्तों से परिपूर्ण आख्यानों से जिज्ञासुजन के हद्देश में सहजभावेन परब्रह्म की अनुभूति कर, उन्हें कृत-कृत्य कर देते हैं ।

रविवार, 12 जुलाई 2026

*२१. भजन भेद का अंग ~१३/१६*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*२१. भजन भेद का अंग ~१३/१६*
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*एक बंदगी विश्व में, एकै ब्रह्म सु होय ।*
*रज्जब श्रावण स्वाति की, वारि बूंद गुण दोय ॥१३॥*
श्रावण के जल की बिन्दु और स्वाति नक्षत्र के जल की बिन्दु एक जैसी होती है किन्तु गुण भिन्न है, स्वाति से मोती बनता है श्रावण की से नहीं, वैसे ही संसारिक प्रीति और ब्रह्म की भक्ति भी भिन्न गुण वाली है, संसारिक प्रीति से बन्धन और ब्रह्म भक्ति से मुक्ति प्राप्त होती है ।
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*तन सुमिरण ढिकू चड़स, रहट रूप उनहार ।*
*रज्जब सुमिरन शून्य मन, वर्षा विपुल अपार ॥१४॥*
हाथ में माला फेरना तथा शरीरधारी का स्मरण करना, ढिकली, चड़स और रहट माला के समान है, जैसे इनसे माप का जल आता है, वैसे ही उक्त भजन से सीमित फल ही मिलता है और मन के द्वारा सर्व विकार शून्य ब्रह्म स्मरण भारी वर्षा के समान है । भारी वर्षा के अपार जल मिलता है वैसे ही ब्रह्म भजन से आपार ब्रह्मानन्द तथा ब्रह्म पद प्राप्त होता है ।
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*अराध अराधहु अंतरा, भजन भजन बहु भेद ।*
*रज्जब पावे एक को, नर निज नाम न खेद ॥१५॥*
आराधना, आराधना में भी निष्कामता और सकामता रूप बहुत अंतर है तथा भजन, भजन में भी निर्गुण, सगुण, चित्त स्थैर्यता, चपलतादि रूप बहुत रहस्य है । कोई विरला नर ही जिसके चिन्तन में दु:ख नहीं है, ऐसे निज नाम का भजन कर पाता है ।
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*भगवंत भजन सब विधि भला, पाये मानुष जूनि१ ।*
*रज्जब सुमिरन सो सही, जापर स्रवे२सु शूनि३ ॥१६॥*
मनुष्य जन्म१ पाने पर वैसे तो भगवान का भजन सभी प्रकार का अच्छा ही है किन्तु सच्चा सुमिरण तो वही है, जिस पर विकार शून्य राम२ जी कृपामृत गिरावें ।
(क्रमशः)

*२१. भजन भेद का अंग ~९/१२*

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*🌷卐 सत्यराम सा 卐🌷*
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*२१. भजन भेद का अंग ~९/१२*
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*नाम निरंजन लीजिये, तन मन आतम माँहिं ।*
*जन रज्जब यूं सुमिरतों, परम पुरुष मिल जाँहिं ॥९॥*
तन, मन और बुद्धि को परमात्मपरायण करके निरंजन ब्रह्म का नाम चिन्तन करना चाहिये, इस प्रकार स्मरण करने से परम पुरुष परमात्मा मिल जाते हैं ।
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*सु स्थिर आतम एक पल, रज्जब भज ही राम ।*
*मन मोती ज्यों नीपजे, स्वाति नक्षत्री नाम ॥१०॥*
एक क्षण भी बुद्धि को स्थिर करके राम का भजन किया जाय तो जैसे स्वाति नक्षत्र के जल से शुक्ति में मोती उत्पन्न होता है, वैसे ही मन ज्ञान उत्पन्न हो जाता है ।
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*नहीं सु निकसे आरसी, छति१ सु गायब होय ।*
*रज्जब दरपन सती के, प्रत्यक्ष दीसे दोय ॥११॥*
सती होने वाली माता के अंगुष्ठ से आरसी नामक भूषण तो नहीं निकलता, वह होता१ हुआ भी लुप्त हो जाता है, किन्तु सती का अन्त:करण-दर्पण है उससे यह लोक और परलोक दोनों ही दीखते हैं । वैसे ही साधक का इन्द्रिय ज्ञान तो लुप्त हो जाता है किन्तु भजन द्वारा प्राप्त ज्ञान-दर्पण से उसे ब्रह्म के सगुण और निर्गुण दोनों ही रूप प्रत्यक्ष दीखते हैं ।
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*रज्जब साधु सती रामहि कहै, पर हरि तन मन धन प्रीति ।*
*इष्ट अभ्यासे उभय को, तज भजणी रस रीति ॥१२॥*
सती तन धनादि की प्रीति को त्यागकर अपने अभीष्ठ पतिदेव में ही मन को स्थिर रखती है, चिता की ज्वाला को देखकर भागने का विचार नहीं करती, वैसे ही साधु तन धनादि की प्रीति तथा दौड़कर विषयों में जाने की रस रीति को त्याग कर अपने इष्ट निरंजन ब्रह्म में वृत्ति स्थिर रखता है ।
(क्रमशः)

शनिवार, 11 जुलाई 2026

२९. अद्वैत ज्ञान कौ अंग ४५/४७

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२९. अद्वैत ज्ञान कौ अंग ४५/४७
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ज्यौं रवि के उद्योत तें, अंधकार भ्रम दूरि । 
सुन्दर ब्रह्म बिचार तें, ब्रह्म रह्या भरपूरि ॥४५॥ 
जैसे सूर्य के उदित होते ही अन्धकार सर्वथा नष्ट हो जाता है, वैसे ही ब्रह्म पर विचार करते हुए उस का साक्षात्कार होने पर, जगत् का भ्रम सर्वथा मिट जाता है और उसे सब कुछ ब्रह्ममय ही दिखायी देता है ॥४५॥
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सुन्दर "सर्वं खलु इदं, ब्रह्म" कहतु हैं वेद । 
चतुर श्लोकी मांहिं पुनि, सकल मिटायौ भेद ॥४६॥ 
वेदादि सब शास्त्रों में एकमात्र ब्रह्म का ही निरूपण : यदि श्रुति को प्रमाण माना जाय तो वह कहती है - 'सर्वं खल्विदं ब्रह्म नेह नानास्ति किञ्चन' (यह सब कुछ दृश्यमान ब्रह्म ही है, दूसरा कोई नहीं है) । चतुःश्लोकी भागवतपुराण भी इसी मत को पुष्ट करता है ॥४६॥
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सुन्दर कह्यौ वसिष्ठ पुनि, रामचन्द्र सौं ज्ञांन । 
ब्रह्म बतायौ एक ही, दूरि कियौ भ्रम आंन ॥४७॥
योगवाशिष्ठ ग्रन्थ में वसिष्ठ मुनि ने भी श्रीरामचन्द्र को ब्रह्मज्ञान का ही उपदेश कर ब्रह्म को एक बताते हुए जगत् को भ्रान्तिमय ही सिद्ध किया है ॥४७॥
(क्रमशः)

*चक्रवर्ती संत-सम्राट*

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*॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥*
*॥ दादूराम~सत्यराम ॥*
*साभार सौजन्य ~ “श्रीमद्‌ दादू पंथ प्रकाश”*
*श्रीमद्दादूपीठाधीश्वर(२०) श्री गोपालदासजी महाराज का संक्षिप्त जीवन दर्शन~*
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आपके निरन्तर देशाटन में श्री दादू पंथ से इत्तर अनेक संत सम्प्रदायों- निम्बार्क, कबीर, रामस्नेही, नाथ, उदासीन, जिनी, सन्यासी, वैरागी, प्रभूति, सभी संत, मतानुयायी, पीठाधीश्वर व संत-महंतों के आश्रमों मठों द्वारों में आपका सादर अपूर्व प्रवेश, भेंट, संत-संस्कृति के अनुरूप सर्वथा सम्पृक्त-व्यवहार, ऐतिहासिक व युगानुकूल उच्चादर्श प्रस्तुत करते हैं ।
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आपने मनसा वाचा कर्मणा निरन्तर अहर्निश असंख्य जनों को 'संतमत' में दीक्षित करते हुये निस्सीम व निर्वाध रूपेण विनियोजित किया है तथा शाश्वत-संत-शरणि के अव्याहत पवित्र-प्रवाह में जन-जन को अवगाहित कर उन्हें परम-प्रांजल ज्ञान प्रदान किया है ।
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श्री मद्दादपीठ की जगद्विताय सार्वभौमिकता की संसिद्धि के निमित्त आपने' जगद्‌गुरुत्व' को व्यावहारिक रूपेण संस्थापित करते हुये 'संत-मत' को सर्वोपरि व सर्वोत्कृष्ट संसाध्य सिद्ध किया है ।
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श्री दादूपंध की मौलिक निहंग-परम्परा व संवैधानिकता को अक्षुण्ण रखने का सत्य-संकल्प लेते हुए जाति वर्ग वर्गातीत 'संत-पथ' को अंगीकार किया । सभी संत-सम्प्रदायों में पारस्परिक सामञ्जस्य व साम्य तथा पीठाधिपतियों की गुरुमत प्रचारार्थ संदर्शित व सम्मान्य अवधारणा को सर्वग्राह्य रखने के उद्देश्य की परिपालनार्थ आपका साग्रह कर्तव्य-बोध तथा सक्रिय योगदान आपकी हार्दिकता को प्रकट करता है । यही मूलभूत *जगद् गुरुत्व* की सार्थक व पूर्ण परिभाषा है. जो पूज्याचार्य चरित्रनायक श्री(पीठाधीश्वर 20) में सिद्धान्ततः विद्यमान है । परिणाम स्वरूप सभी संत समुदाय व पीठों ने आपको *चक्रवर्ती संत-सम्राट* इस गरिमामय सम्मान्य अलंकरण से अलंकृत किया है ।
(क्रमशः)

२९. अद्वैत ज्ञान कौ अंग ३१/४४

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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२९. अद्वैत ज्ञान कौ अंग ३१/४४
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जगत जगत सब को कहै, जगत कहा किंहिं ठौर । 
सुन्दर यह सब ब्रह्म है, नाम धर्यौ फिरि और ॥४१॥
इस जगत् के विषय में सभी विद्वान् बहुत कुछ लिखते बोलते हैं; परन्तु यह कोई नहीं बताता कि यह जगत् है कहाँ ? अरे ! यह सब दृश्यमान पदार्थसमूह तो वस्तुतः ब्रह्म है; केवल व्यवहार के लिये लोगों ने इन पदार्थों के पृथक् पृथक् नाम रख लिये हैं ॥४१॥
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खोज करत ही जगत कौ, जगत बिलै ह्वै जाइ । 
सुन्दर यह सब ब्रह्म है, जगत कहां ठहराइ ॥४२॥
जैसे जैसे जहाँ जहाँ हम जगत् को खोजने का प्रयास करते हैं, वहाँ वहाँ से वह हमें लुप्त ही प्रतीत होता है । जिसे जिसे हम देखते हैं वह वह हमें ब्रह्म ही ज्ञात होता है, हम उसे 'जगत्' नहीं मान सकते ! ॥४२॥
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जगत कहें तें जगत है, सुन्दर रूप अनेक । 
ब्रह्म कहें तें ब्रह्म है, बस्तु बिचारें एक ॥४३॥
क्यों कि हम इन दृश्यमान पदार्थों के अनेक रूप होने के कारण इन को अनेक नामों से व्यवहृत कर लेते हैं, अतः सब इसे 'जगत्' कहने लगते हैं । वस्तुतः ये सभी पदार्थ ब्रह्ममय हैं । इसी पर यदि हम ब्रह्म की दृष्टि से यथार्थतः विचार करें तो ये सर्वथा ब्रह्ममय ही हैं ॥४३॥
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प्रगट भयौ भ्रम जगत कौ, करतें जगत बिचार । 
सुन्दर ब्रह्म बिचार तें, जगत न रह्यौ लगार ॥४४॥
जिज्ञासु साधक को, 'जगत्' पर विचार करने पर, समस्त जगत् भ्रम ही प्रतीत हुआ; परन्तु 'ब्रह्म' पर विचार करते हुए उसको ब्रह्म में जगत् का लेशमात्र भी नहीं दिखायी दिया ॥४४॥
(क्रमशः)

पीठारोहण

*#daduji*
*॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥*
*॥ दादूराम~सत्यराम ॥*
*साभार सौजन्य ~ “श्रीमद्‌ दादू पंथ प्रकाश”*
*श्रीमद्दादूपीठाधीश्वर(२०) श्री गोपालदासजी महाराज का संक्षिप्त जीवन दर्शन~*
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शिक्षा-अध्ययन के उपरान्त श्री दादू द्वारे की अहर्निश सेवा की । और श्री दादू द्वारे के सर्वाधिकारी बने । दिनाङ्ग श्रावण कृष्ण ११(एकादशी) वि.सं. २०५८ तदनुसार 17 जुलाई सन् 2001 को पीठाचार्य श्री हरिरामजी महाराज के आकस्मिक निधन उपरान्त दादूपंथ के सर्वोच्च पद पर पीठारोहण हुआ ।
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आपने पीठासीन होकर विभिन्न अंचलों व स्थानों पर ज्ञानयज्ञ के रूप में प्रतिवर्ष निरन्तर "चातुर्मास अनुष्ठान" कर 'संतमत' का अविरल प्रचार प्रसार किया ~
(१) सांगानेर(जयपुर) था. हनुमानदास जी स्वामी, सन्त कुटीर, सांगानेर
(२) पोहधाम(मारवाड़) महंत पोकरदासजी स्वामी
(३) करड़ालाजी संत भानुदासजी स्वामी
(४) भैराणाधाम वैद्य संत रामविलासदासजी स्वामी
(५) पोहधाम साध्वी मैना बाई
(६) सावड़(हरियाणा) महंत जगदीशदास जी स्वामी
(७) निवाई श्री दयाल आश्रम बाबा रामपालदासजी बाबा प्रसाददासजी स्वामी
(८) मेडता सिटी(छतरी पूज्याचार्य 6 श्री किशनदेव जी महाराज) बेमचा, महंत श्री रामनिवासदासजी पोहधाम व मारवाड़ क्षेत्र के संतभक्त ।
(९)सांधडिया(हरियाणा) संत किशनदासजी ।
(१०) विद्याद, नागौर महन्त श्री रामनिवासदासजी सुखदेव दासजी ।
(११) माण्डल(भीलवाडा) के बिरला परिवार द्वारा
(१२) भोजपुरा दादूद्वारा के सन्त वैद्य श्री शीतलदासजी हनुमानदासजी स्वामी ।
(१३) श्री दाद पन्थ प्रकाश संस्था, नरायना ।
(१३) श्री नन्दलाल जी सेपट, कालख बाँध द्वारा ।
(१४) पौह धाम, नागौर महन्त श्री रामनिवास दासजी महाराज ।
(१५) श्री दादू द्वारा मेहलाणा, भोपालगढ़, जोधपुर सन्त मोहनदासजी महाराज
.
आपने श्रीमद्दादूब्रह्मधाम नरायना के पूरे परिसर को सभी आधुनिक सुविधात्मक संसाधनों से परिपूर्ण, भव्य एवं दर्शनीय बनाते हये उसकी ऐतिहासिकता को धरोहर के रूप में अक्षुण्ण रख कर पुरातत्व के सभी अवशेषों को सजा-संवार कर रखा है। जिससे समागत दर्शनार्थी व शोधकर्ता लाभान्वित हो मुख्य पीठ धाम की गरिमा से अभिभूत होते हैं ।
(क्रमशः) 

*२१. भजन भेद का अंग ~५/८*

*🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏*
*🌷卐 सत्यराम सा 卐🌷*
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*२१. भजन भेद का अंग ~५/८*
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*जन रज्जब जगदीश भज, आतम के अस्थान ।*
*सुख सागर संबूह१ की, अंतर उघड़े खान ॥५॥*
जीवात्मा के आदि स्थान जगदीश्वर का भजन करना चाहिये, भजन करने से भीतर ही सर्व१ रूप सुख-समुद्र रूप ब्रह्मानन्द की खान निकल आती है ।
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*रज्जब भज भगवन्त को, तन मन भीतर पैठ ।*
*निर्मल नैनों निरख निधि, नाभि निरंतर बैठ ॥६॥*
मन को शरीर के भीतर स्थिर करके भगवान का भजन करना चाहिये, निरन्तर नाभिस्थान में वृत्ति को टिकाकर भजन द्वारा प्राप्त निर्मल ज्ञान-नेत्रों से ब्रह्म रूप निधि को देखना चाहिये ।
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*नाभि निरंतर नाम बिन, राखे भाखे नाँहिं ।*
*रज्जब सब पड़दे उठे, जाके यहु मत माँहिं ॥७॥*
जो निरंतर नाभि स्थान में नाम को रखता है, अन्य बातें न तो हृदय में रखता और नहीं कहता, ऐसा ही जिसके हृदय में निश्चय है उसके और ब्रह्म के बीच जो अविद्यादि पड़दे हैं, वे सब हट जाते हैं ।
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*नाम निरंजन लीजिये, तन मन आपो गाल ।*
*तो रज्जब रामहिं मिले, बैठे सलहिं साल ॥८॥*
तन और मन के अंहकार को नष्ट करके निरंजन ब्रह्म का नाम चिन्तन करना चाहिये, चिन्तन करने से आत्मा परमात्मा से मिल कर जैसे पिलंग के फागों में छिद्रों में लकड़ी बैठ जाती है, वैसे ही आत्मा परमात्मा दोनों एक ही हो जाते हैं ।
(क्रमशः)

शुक्रवार, 10 जुलाई 2026

*२१. भजन भेद का अंग ~१/४*

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*🌷卐 सत्यराम सा 卐🌷*
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*२१. भजन भेद का अंग ~१/४*
इस अंग में भगवद्-भजन संबन्धी रहस्य का विचार कर रहे हैं ~
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*सब करणी साधन किये, त्यागी शूर सुजान ।*
*जो रज्जब राम हिं भजे, मन मनसा घर आन ॥१॥*
जो साधक शूर विषयाशा को त्याग कर तथा मन और बुद्धि अपने स्थान में स्थिर करके राम को भजता है, उसने सभी कर्तव्य पालन और सभी साधन कर लिये अर्थात भजन से साधक के सभी काम हो जाते हैं ।
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*जन रज्जब जंजाल तज, मन मनसा कर ठाँम ।*
*करने को कहु क्या रह्या, यूं लागा जब नाम ॥२॥*
जग-जाल को तजकर तथा मन बुद्धि को अपने आदि परमात्मा के स्वरूप में लीन करके नाम चिन्तन में लगा है, तब कहो ? क्या करना शेष रहा ।
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*रज्जब राखो नाम में, पंच पचीसौं मन्न ।*
*सब समेट सुमिरन करे, सोई साधू जन्न ॥३॥*
पंच ज्ञानेन्द्रियाँ, पच्चीस प्रकृतियाँ और मन को नाम में लगाये रक्खो, उक्त प्रकार सबको नाम में एकत्र करके सुमिरन करता है वही जन साधु है ।
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*रज्जब सुमिरे राम को, रोक दशों दिशि द्वार ।*
*नख शिख राखे नाम में, यों ही पैला१ पार ॥४॥*
अनुचित विषयों की और जाने के दश इन्द्रिय रूप दश द्वारों को रोककर नख से शिख पर्यंत शरीर का नाम परायण रखना चाहिये, ऐसा करने से ही संसार के पर१ पार जाकर प्रभु से मिलना होता है ।
(क्रमशः)

२९. अद्वैत ज्ञान कौ अंग ३७/४०

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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२९. अद्वैत ज्ञान कौ अंग ३७/४०
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जगत नाम सुनि भ्रम भयौ, मान्यौ सत्य स्वरूप । 
सुन्दर मृग जल देखिये, है सूरय की धूप ॥३७॥
व्यवहार में लोगों की मिथ्या बातें सुन सुनकर हम भ्रम में पड़ते गये और उसे ही सत्य मान बैठे । जैसे कि किसी पशु को मृत्तिका पर सूर्य की किरणें देखकर मृगमरीचिका से जल का भ्रम हो जाता है ॥३७॥
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जैसैं महदाकाश तैं, घटाकाश नहिं भिन्न । 
यौं आतम परमातमा, सुन्दर सदा प्रसन्न ॥३८॥
जैसे महाकाश एवं घटाकाश में कोई भेद नहीं होता, वे दोनों परस्पर एक ही हैं; वैसे ही आत्मा एवं परमात्मा भी सदा स्वच्छ(शुद्ध = प्रसन्न) रहने के कारण परस्पर अभिन्न(एक) ही हैं ॥३८॥
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आतम अरु परमातमा, कहन सुनन कौं दोइ । 
सुन्दर तब ही मुक्त है, जबहिं एकता होइ ॥३९॥
आत्मा एवं परमात्मा - ये दोनों शब्द बोलने एवं सुनने में अवश्य भिन्न प्रतीत होते हैं; परन्तु साधक द्वारा, गुरुपदिष्ट ज्ञान की साधना के माध्यम से, अज्ञानावरण हटा देने पर मुक्त आत्मा का परमात्मा के साथ तादात्म्य(एकता) हो जाता है ॥३९॥
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देह धरैं यह जीव हैं, ईश्वर धरैं बिराट ।
कारज कारन भ्रम गयें, सुन्दर ब्रह्म निराट ॥४०॥
इन दोनों में जीवात्मा यह(प्राणियों का) शरीर धारण करता तथा ईश्वर(परमात्मा) विराट्(विश्व) रूप है । कार्य कारण मात्र से ही हम को यह भेद(द्वैत भ्रम) प्रतीत हो रहा है, यथार्थ में तो वे दोनों एक(विराट) ही है ॥४०॥
(क्रमशः)