बुधवार, 22 अप्रैल 2026

२३. स्वरूप विस्मरण को अंग ३३/३६

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२३. स्वरूप विस्मरण को अंग ३३/३६ 
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यौं भ्रम तें बहु दिन भए, बीति गयौ चिरकाल । 
सुन्दर लह्यौ न आपुकौं, भूलि पर्यौ भ्रमजाल ॥३३॥
आत्मा को इस भ्रमात्मक स्थिति में रहते हुए बहुत दिन बीत गये । अधिक काल होने के बाद भी यह आत्मा स्वरूप ज्ञान की स्थिति में न आ सका और इस भ्रमजाल में अधिक गहरा फैलता ही चला गया ॥३३॥
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देह मांहिं ह्वै देह सौ, कियौ देह अभिमांन । 
सुन्दर भूलौ आपु कौं, बहुत भयौ अज्ञांन ॥३४॥
देह का अध्यास रखने पर देहाभिमान होना अनिवार्य हो जाता है । अतः यह आत्मा देहाभिमानी होकर, अज्ञान से आवृत होने से स्वरूप को भूल जाता है ॥३४॥
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कामी हूवौ काम रत, जती हुवौ जत साधि । 
सुन्दर या अभिमान तें, दोऊ लागी ब्याधि ॥३५॥
उस देहाभिमान के कारण, कभी यह आत्मा कामभोगों में रत रहकर कामी हो जाता है; कभी उस कामवासना को त्याग कर इन्द्रियसंयमी होकर साधना करने लगता है । इस देहाभिमान के कारण, इस के ये दोनों उपर्युक्त कर्म(भोग एवं त्याग) इस(आत्मा) के गले पड़ जाते हैं ॥३५॥
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कतहू भूलौ नीच ह्वै, कतहू ऊंची जाति । 
सुन्दर या अभिमांन करि, दोनौं ही कै राति ॥३६॥
देहभिमान से स्मृतिभ्रंश होने के कारण, कभी वह प्रमादवश स्वयं को नीच जाति का मान बैठता है; कभी उच्च जाति का; इस उभय प्रमाद का कारण एकमात्र देहाभिमान ही है जिससे उत्पन्न अज्ञान उस की स्मृति को आवृत कर बैठा है । (राति = अज्ञानन्धकार) ॥३६॥
(क्रमशः)

*विचार, ब्रह्मस्वरूप-निर्णय ॥*

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*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*कवल निरन्तर नरहरी, प्रकट भये भगवंत ।*
*जहँ विरहनी गुण वीनवे, खेले फाग बसन्त ॥*
*वर आयो विरहनी मिली, अरस परस सब अंग ।*
*दादू सुन्दरी सुख भया, जुगि जुगि यहु रस रंग ॥*
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*विचार, ब्रह्मस्वरूप-निर्णय ॥*
आज सहेली म्हारै मंगलचार । 
अम्ह घरि आये राजा राम भरतार ॥टेक॥
जाकै सागर सप्त अष्टकुल पर्वत, छ्यानवे कोटि मेघमाला ।
अठारह भार बिरख बहू बिधि के, गुणचास कोटि धरचाला ॥
अरध उरध मधि जल थल महियल, चारि खानि चारि वाणी ।
धरती गगन पवन अरु पाणी, यहु आरँभ अहिनाणी ॥
अपरम्पार पार परमेसुर, परापरी परभेवा ।
ब्रह्मा बिष्न महेस्वर सुर नर, सकल साध सिध सेवा ॥
वो उपजै खपै मरै नहिं जामैं आवागवण न होई । 
अबिहड़ अमर अखै अबिनासी, जिनबर हेर्यौ सोई ॥  
चंद सूर जाकै घरि दीपक, जोति करै परकासी ।
चारि पदारथ आग्याकारी, रिधि सिधि दोऊ दासी ॥
जुगि जुगि राज करै जुगि जीवै, परगट जोति न छानी ।
सोइ बर ल्याया म्हारा सतगुर, जिहिं की या रजधानी ॥
जिहिं कौ मारग निसदिन हेरौं, सो म्हारै घरि आयौ ।
अगर चँदणि म्हारै आँगणा लीप्यौ, मोतियाँ चौक पुरायौ ॥
बाजा बाजि निसाणाँ घाई, झालरि झालर लायौ ।
आज उछाह मांड है मंगल, तोरणि कलस बंदायौ ॥
पाँच सहेली मंगल गावैं, घरि घरि रली बधाई ।
आरति साजि आतमाँ आगैं, धूप दीप ले आई ॥
नैणा स्यूँ नैण बैण बैणा स्यूँ, निर्मल नूर निहारै ।
तन मन धन नौछावरि करि करि, ऊपर लूण उतारै ॥
निर्मल नाहा निर्मल साहा,निर्मल बेद उचेरा ।
चित चौंरी ऊपरि चढ़ि लीया, आतम सुंदरि फेरा ॥
प्रेम प्रीति की येकै दीनीं, दूजी दई न काई ।
सहज डोरड़ो कदे न छूटै, गुर त्यूँ गाँठि धुलाई ॥
अरस परसपर दूलह दुलहनि, खेल भलौ बणि आयौ ।    
गुरि म्हारै हथलेवो जोड्यौ, जू वै राम रमायौ ॥ 
पंच अभूषण सजि पतिबरता, प्रेम प्रीति पट धारी । 
सील सँतोष सुहागणि भागणि, नख सख साजि सँवारी ॥  
खिमा सहेली पाई हेली, दया सरीषी दाई । 
भाव सरीषा भाई मिलकरि, पिव के गौंणैं आई ॥
परणि पधार्याँ कारिज सार्या, हुई निसाणाँ घाई ।
वारि वारि परआतम ऊपरि, दीजे घणी बधाई ॥
जेता पाव धर्या धरणी परि, सो म्हारै सिरि धार्या ।
लगन महूरत आज भलौ दिन, भीतरि महलि पधार्या ॥
जिहाँ कोमल कवल पालिकौ निर्मल, हिरदा मांहि बिछायौ ।
सकल सिरोमणि सुख कौ सागर, सेज हमारी आयौ ॥
पाव पलौटूँ बिजणा ढोलौं, धाइ धाइ चरणा लागूँ । 
हूँ म्हारा साँई की सेजाँ, क्यौं सोऊँ क्यौं जागूँ ॥
वो जाणराइ हूँ बाली भोली, थोड़ी सी बतलावैं ।
सेज हसै घरि थंभा बोलै, दिवलै जोति न मावै ॥
चारि पहर बासौ बसि केसौ, सुंदरि नैं सुख दीजै । 
अरस परस ऐकै सेज्या परि, रोम रोम रस भीजैं ॥
असी रैंणि मोलि नहिं लाभै, मांग्याँ मिलै न साँई ।
घणाँ दिनाँ की हूँ तरसै थी, आज का दिन कै ताँई ॥
सषी सहेली बूझै हेली, तैं काँइ सुकृत कीन्हौं ।
हरि निर्मल तूँ मैल कुचीली, कहि बिधि आदर दीन्हौं ॥
हूँ गुरि म्हारै मोटै घरि दीन्हीं, भाव भलेरौ कीनौं ।
हथलेवा की लाज वही हरि, इहिं बिधि आदर दीनौं ॥
दादू कै परसादि दमोदर, दीन दया करि आयौ ।
बारबार बषनौं बलिहारी, घर बर रूड़ौ पायौ ॥९७॥

हे सखी ! आज मेरे घर पर मेरे प्रियतम राजा राम पधारे हैं  । अतः मेरे यहाँ आज मंगलाचार है = आनंदोत्सव है । मेरे प्रियतम अवर्णनीय है तथापि तुझको उसकी कुछ विशेषताएँ बताती हूँ जिससे तू उसके ऐश्वर्यमय रूप की कुछ झलक शब्दों में जान सके । उसके अधीन सात असीम अथाह सागर हैं; अष्ट्कुली पर्वत हैं; छयानवे कोटि मेघमाला (मेघों का समूह) हैं, अठारह भार नाना प्रकार के वृक्ष-वनस्पति हैं; और गुनचास कोटि योजन व्यासात्मक पृथिवी तथा उसके ऊपर अनेकों विशाल पर्वत हैं; ऊपर, नीचे और मध्य में आकाश, जल तथा स्थल है । 
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चार प्रकार की जीव जन्तुओं की कोटि हैं = उद्भिज, अण्डज, जरायुज, स्वेदज; चार प्रकार की वाणियाँ हैं परा, पश्यंति, मध्यमा, वैखरी । भूमि, आकाश, वायु और जल इन सभी के आरम्भ होने का स्त्रोत भी वही है । (वेदों में इनकी उत्पत्ति का क्रम नाना प्रकार से बताया गया है तथापि आचार्य शंकर ने ब्रह्मसूत्रकार के मंतव्यानुसार तैत्तरीयश्रुति के मत को मानकर इनका उत्पत्ति क्रम आकाश, पवन, अग्नि, जल व् भूमि बताया है । संतों ने भी इसी क्रम को मान्यता दी है । 

“परथम पवन पवन से आभा, आभा जल बरसाया है । 
गाजै-बीजै नभ नहिं भीजै, अैसी अद्भुत माया है ॥ 
भीगी भोमि भई हरियाली, जीवाँ गुजर चलाया है ।”
(स्वामी रामचरणजी की वाणी) वह प्रियतम स्वरूप परमेश्वर = सर्वप्रधान अपरम्पार है । उसका पार = रहस्य आज तक किसी ने नहीं जाना है । परापरी = परा-चेतन प्रकृति (जीव) तथा अपरा = जड़ प्रकृति = माया से परभेवा = पृथक है, वह परमेश्वर । 
“भूमिरापोनलो वायुः खं मनोबुद्धिरेव च । 
अहंकार इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा ॥४॥ 
अपरेयमितस्वन्यां प्रकृतिं विद्धि में पराम् । 
जीवभूतां महाबाहो ययेदं धार्यते जगत् ॥५॥” 
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ब्रह्मा, विष्णु, महेश, सुर, नर, साधु, सिद्ध सभी उसकी सेवा में संलग्न रहते हैं । वह न जन्मता है, न कम ज्यादा होता है, न मरता है और न अवतार ही लेता है । वस्तुतः उसका इस भूमि पर आना जाना होता ही नहीं है । वह अबिहड़ = अपरिवर्तनीय, अमर, अक्षय, अविनाशी है । मैंने उक्त लक्षणों वाले पति को ही ढूंढा है, पाया है । मेरे प्रियतम के घर में चंद्रमा और सूर्य दीपक बनकर प्रकाश का आलोक करते हैं । 
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धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष रूपी चारों पुरुषार्थ उसकी आज्ञा में रहते हैं तथा रिद्धि और सिद्धि दोनों उसके यहाँ दासी का काम करती हैं । (परमात्मा को अकर्ता कहा गया है । फिर उसका पुरुषार्थों से क्या सम्बन्ध, सृष्टि का उत्पादन कैसे करता है । इन प्रश्नों का उत्तर गीता के इस श्लोक में खोजा जा सकता है 
“न मे पार्थास्ति कर्तव्यं त्रिषु लोकेषु किंचन । 
नानावाप्तमवाप्तप्यं वर्त एवं च कर्मणि ॥३|२२॥” 
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वह युग-युगान्तरों तक इस ब्रह्मांड पर शासन करता है तथा युग-युगान्तरों तक तक जीता है । उसकी ज्योति = जीवन सदैव विद्यमान रहने से सदैव प्रकट ही रहती है, कभी भी अदृश्य नहीं होती तथा छिपी भी हुई नहीं रहती । जब भी भक्त उसको याद करते हैं, वह तत्काल प्रकट हो जाता है ।  जिस परमात्मा की उक्त प्रकार की राजधानी है, सद्गुरु महाराज ने मेरे लिये ऐसे ही पति को खोजकर उससे मेरा सम्बन्ध जोड़ा है । जिसके आने के रास्ते को मैं प्रतिदिन ढूंढा करती थी कि वह किस मार्ग से आयेगा, वह आज स्वयं ही मेरे घर आ गया है । 
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उसके स्वागतार्थ मैंने मेरे आंगन को अगर और चंदन से लीपा है । मोतियों से चौक को पूरा है = शुभ संकेत युक्त मांडने मांडे हैं । द्वार पर बाजे बज रहे हैं, निसाण = नगारे पर डंकों की मिलवाँ चोटें पड़कर मधुर ध्वनि हो रही है । आज विवाह होगा, इसका बड़ा भरी उछाह = उत्साह है । इसीलिए द्वार पर तोरण बांदा गया है । पाँचों ज्ञानेन्द्रियों रूपी सखियाँ मंगल गीत गा रही हैं । घर-घर में = इंद्री-इन्द्री में बधाई = आनंद का रली = संचार हो गया है । 
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आत्मा रूपी दुल्हन आरती करने के लिये वर की दीप, धूप, थाली में रखकर तैयार हो गई है । वह नयनों से नयनों को निहारती है, वचनों से वचनों के द्वारा वार्तालाप करती है तथा उस परमात्मा के अमंद निर्मल नूर को निहारती है । दुल्हन तन, मन, धन, सर्वस्व समर्पण करते हुए दूल्हे के ऊपर नमक राई उतारती है कि कहीं किसी की नजर उसे न लग जाये । दूल्हा भी निर्मल है । साहा = विवाह का मुहूर्त भी निर्मल = निर्दोष है । ब्राह्मण वेद मंत्रों का उच्चारण कर रहे हैं । 
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आत्मा रूपी सुंदरी ने चित्त रूपी चौंरी(विवाह मंडप) में परमात्मा रूपी वर के साथ फेरे ले लिये । दूल्हे-दुल्हन ने प्रेम-प्रीति रूपी एक ही फेरा खाया । दूसरा फेरा खाने की उन्हें आवश्यकता ही अनुभूत नहीं हुई । गुरुमहाराज रूपी सवासनी ने सहज रूपी डोरे से दोनों का गठबंधन ऐसी गाँठ लगाकर किया है कि वह खुलने का नाम ही नहीं ले सकती । एक दूसरे का एक दूसरे से परस = मिलने का = दूल्हे आर दुल्हन का बढ़िया खेल बन गया ।(अरस  = मिलना; परस = स्पर्श, छूना ।) 
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गुरु महाराज स्वयं जिस प्रकार सभी में रमने वाले राम में रमण करते हैं, वैसे ही मैं रम सकूँ, एतदर्थ उन्होंने मेरा हाथ प्रियतम के हाथों में दे दिया । दोनों को एक कर दिया । पतिव्रता पत्नी पाँच आभूषणों को प्रेम-प्रीति की साड़ी के सहित धारण करके सुसज्जित हो गई है । उस भाग्यशाली सौभाग्यवती ने शील संतोष आदि सद्गुणों से अपने आपको नख से शिख तक सजाकर सँवारा है । उसने क्षमा रूपी सहेली को मित्र के रूप में प्राप्त किया है तो दया जैसी दाई प्राप्त की है । भाव = श्रद्धा विश्वास रूपी भाई के साथ प्रियतम के यहाँ मुकलावा होकर आई है । 
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विवाहित होकर प्रियतम के घर आने पर सारे मनोरथ पूर्ण हो गये । द्वार पर रखे नगारों पर मिलवाँ चोट लगाकर समस्त नगरवासियों को आगमन की सूचना दी गई । प्रियतमा प्रियतम पर बार-बार न्यौछावर होती है और प्रभूत मात्रा में बधाई = धन्यवाद देती है कि परमात्मा की असीम अनुकंपा से हमारा एकाकार हो गया ।  प्रियतमा प्रियतम से कहती है, हे प्रियतम ! मेरे यहाँ पधारते समय जितने पैर भी आपने पृथिवी पर रखे(जितने भी डग भरे) वे समझिये मेरे शिर पर ही रखे हैं अर्थात् मैं उतनी ही बार आपके उपकारों के नीचे दब गई हूँ । 
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आज की लग्न, मुहूर्त, दिन अतीव ही उत्तम हैं कि आप मेरे महल में पधार आये हैं । इस घर में(शरीर में) कोमल कमलों से निर्मित निर्मल = अत्यन्त स्वच्छ बिछौना सहित ह्रदय रूपी पलँग बिछाया है । क्योंकि हमारी सेज = शय्या = पर्यक पर सर्वशिरोमणि समस्त सुखों को देने वाला परम प्रियतम जो आया है । मैं प्रियतम के पाँवों को दबाती हूँ = पगचंपी करती हूँ । गर्मी लगने पर पंखा झलती हूँ । दौड़-दौड़ कर पाँवों पर पड़ती हूँ = अनुनय विनय करते हुए शरणागत होती हूँ । 
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मेरे साँई की शय्या पर मैं कभी तो सोती हूँ और कभी उसकी सुख-सुविधाओं को जुटाने में लग जाने से जागती हूँ । वह पूर्ण यौवन युक्त सब कुछ जानने-समझने वाला है जबकि मैं अभी भोली भाली यौवन की संधि पर अग्रसर हुई बाला मात्र हूँ । इस कारण मैं उससे अधिक बातें न करके कुछ ही बातें करती हूँ । मेरी और प्रियतम की अनुपम जोड़ी को देखकर शय्या हँसती है, प्रफुल्लित होती है, घर और उसमें लगे स्तंभ बोलते हैं और कहते हैं कि हम आज धन्य हो गये हैं, जो हमें ऐसे आदर्श मालिक-मालकिनी मिले हैं । 
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दीपक रात्री भर ज्योंति = प्रकाश करते-करते खुशी के मारे फूला नहीं समाता है । केशव रूपी पति ने चार प्रहरात्मक पूरी रात्री भर सेज पर सोकर व घर में रहकर आत्मा रूपी सुन्दरी को पूर्ण सुख प्रदान किया । दोनों अरस-परस एक शय्यापर हुए और दोनों की रोम-रोम रस = आनंद में भीनें = निमग्न हो गई । उक्त वर्णित जैसी रात्री किसी को मूल्य देकर नहीं मिल सकती । इतना ही नहीं यह मांगने से भी नहीं मिलती है । मैं स्वयं ही बहुत दिनों से आज की रात्री के आनंद को प्राप्त करने के लिये तरस रही थी । 
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मुझे रात्री भर प्रियतम के सान्निध्य का लाभ मिला जानकर मेरी समस्त सखियाँ मुझसे पूछती हैं कि हे सषी ! तूने ऐसा कौनसा पुण्य किया है कि निर्मल हरि ने तुझ जैसी मैली-कुचीली = पापिष्ट व् दुराचारणी को अपने सान्निध्य का गौरव प्रदान किया । प्रिया सषियों की बातें सुनकर उत्तर देते हुए कहती है, मुझे मेरे गुरुमहाराज ने राम-नाम-स्मरण रूपी उत्तम घर में = उत्तम साधना में विवाहित की = संलग्न की । 
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मैंने उत्तम भावभक्ति का संपादन किया । परिणामस्वरूप परमप्रभु-परमात्मा ने मेरी उक्त साधना रूपी शादी की लाज रखी और मुझे सान्निध्य रूपी साक्षात् दर्शन देने का आदर-सत्कार दिया । बषनांजी कहते हैं दादूजी महाराज की कृपा से मुझ बषनां के हृदय रूपी घर में दामोदर जो अकारण दयालु-कृपालु है दया करके आया है । मैं उस पर बार-बार न्यौछावर होता हूँ = समर्पित होता हूँ क्योंकि मैंने घर = शरीर(मनुष्य शरीर = “दुर्लभो मानुषो देहो देहिनां क्षणभंगुर ॥” भागवत्) और वर = पति = परमात्मा दोनों ही रूडौ = उत्तम प्राप्त किये हैं ॥९७॥ 

मंगलवार, 21 अप्रैल 2026

२३. स्वरूप विस्मरण को अंग २९/३२

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२३. स्वरूप विस्मरण को अंग २९/३२
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ज्यौं मनि कोऊ कंठ की, भ्रम तैं पावै नांहिं । 
पूछत डोलै और कौं, सुन्दर आपुहि मांहिं ॥२९॥
जैसे किसी जडमति(अज्ञ) को अपने कण्ठ में पहनी हुई माला के विषय में भ्रम हो जाय कि उसके गले में माला नहीं है और वह दूसरों से उस माला के विषय में पूछने लगे । वही स्थिति देहाध्यास के कारण इस आत्मा की भी हो गयी है ॥२९॥
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सुन्दर चेतनि आपु यह, चालत जड की चाल । 
ज्यौं लकरी के अश्व चढि, कूदत डोलै बाल ॥३०॥
महाराज श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं कि देहाध्यास के कारण यह आत्मा ऐसी चेष्टाएँ कर रहा है मानो कोई बालक काठ के घोड़े पर चढकर उछल कूद मचा रहा हो ! ॥३०॥
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भूतनि मांहें मिल रह्यौ, तातें हूवौ भूत । 
सुन्दर भूलौ आपु कौ, उरझ्यौ नौ मण सूत ॥३१॥
यह पाँच महाभूतों(से सम्पृक्त देह) में मिल गया(अध्यास कर लिया) है अतः यह भी भूत बन गया है । इसलिये इस के सम्मुख भी नौ मन सूत के सुलझाने जैसी कठिन समस्या खड़ी हो गयी; क्यों कि नौ मन सूत को कोई सावधान चित्त वाला, धैर्यवान् एवं विवेकी पुरुष ही सुलझा सकता है१ ॥३१॥ 
{१ तु० - श्रीदादूवाणी : जीव जंजालौं पड़ि गया, उलझ्या नौ मण सूत ।
कौ इक सुलझै सावधान, गुरु बाइक औधूत ॥ (१/८३)}
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आपुहि इंद्री प्रेरि कै, आपुहि मांनै सुक्ख । 
सुन्दर जब संकट परै, आपु हि पावै दुक्ख ॥३२॥ 
उस देहाध्यास का दुःखद परिणाम यह होता है आत्मा स्वयं को इन्द्रियों का प्रेरक मानकर उन के विषय-सम्पर्क से होने वाले सुख को अपना सुख मानने लगता है; परन्तु जब कभी विषम स्थिति आने पर उन से उद्भूत दुःख से इस का सामना होता है तो यह स्वयं को दुःखी मानने लगता है ॥३२॥
(क्रमशः)

वो घर वोलगी उलगाणौं

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*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*ऐसो राजा सेऊँ ताहि,*
*और अनेक सब लागे जाहि ॥*
*तीन लोक ग्रह धरे रचाइ,*
*चंद सूर दोऊ दीपक लाइ ।*
*पवन बुहारे गृह आँगणां,*
*छप्पन कोटि जल जाके घरां ॥*
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*विचार, ब्रह्मस्वरूप ॥*
वो घर वोलगी उलगाणौं ।
जिहिं धू प्रहिलाद निवाजियौ,बैंकुंठ तणौं दियौ थाणौं ॥टेक॥
जिहिं घरि नींव घणेरी, औरां थैं अधिकेरी ।
जिहिं थंभ खंभ नहिं लाया, बिन थंभा गगन छाया ॥
जाकै दीपक चंद र सूरा, वो तेज सरूपी पूरा । 
वाकी जोति अलेषै, संसार सबाया देखै ॥
भरिया भरपूर भँडारा, तहाँ लक्षमी अनँत अपारा ।
चारि पदारथ सारा, तिहि घरि नित प्रति जैजैकारा ॥
जाकै रिधि सिधि दोऊ दासी । आप तहाँ अबिनासी ।
जहाँ नारद सारद गावैं । वहिं घरि अनहद बेणि बजावैं ॥
जाकै बैकुंठ सी चित्रसाली, सुख सेज्याँ बनमाली ।
कलपब्रिच्छ की छाया, तहाँ मोह न ब्यापै माया ॥
जहाँ लिपै पुन्नि न पापै, वो करम सबाया कापै ।
मुकति वोलग्याँ आपै, करि आप सरीखा थापै ॥
जाकै अठार भार बनमाला, गुणचास कोटि धरचाला ।
पर्वत मेर सुमेरा, तिहिं घरि बाव बरण बहुतेरा ॥
जाकै सात समद बिन थाघा, वो कार न लोपै आघा ।
छ्यानवैं कोटि मेघ माला, सब उहिं घरि पाणी वाला ॥
जाकै ब्रह्मा बिष्न महेसा, सुर नर संकर सेसा ।
तेतीस कोड़ि देव दाणा, सब उहिं घर का उलिगाणा ॥
जाकै तीनि लोकि बिस्तारा, सारूँ का पूरणहारा ।
जिव जंत सब राया, सब उहि घरि पलता आया ॥
जाकै नख सुरसरी धारा, जाकै अंत न आवै पारा ।
चारि बेद मुखि बाणी, जाकी गति जाइ न जाणी ॥ 
जाकै भींव भींछ हणवंता, अैसे जोधा बहुत अनंता ॥
धरमराइ पड़दारा, द्वारै चित्र बिचित्र लेखारा ॥
जाकै सुषदेव जैदेवा, करै भाव की सेवा ।
अंमरीक हितकारी, जिनि द्रौप अहल्या तारी ॥
जाकै नामाँ सेन कबीरा, पीपा धनाँ अहीरा ।
सूरदास रैदासा, सगलाँ की पूरै आसा ॥  
जाकै दत गोरख स्यौ आदू, गोपीचँद भरथरि दादू । 
सोझा बीझल हरिदासा, जन नानक चरन निवासा ॥
जाकै भगत सिरोमणि सारा, तहाँ दीसै दै दै कारा ।
सब मांहीं राम बिराजै, तिहिं घरि सदा बधावा बाजै ॥
जिहिं घरि बतरणि ऐति, सो जाणी जाइ न केती ।
सस सहस मुख गावै, ते भी पार न पावै ॥
सो अनतालोक कौ राजा, घणहर सा बाजैं बाजा ।
अबिनासी राजा कहिये, बषनां तिहिं घरि ओलग रहिये ॥९६॥ 

वह घर = परमात्मा का घर, वोलगी = प्रवासियों तथा  उलगाणौं = प्रवासी परमात्मा का है । (संसार में रहने वाले लोग संसार के अतिरिक्त अन्यत्र रहने वालों को दूर देश का निवासी न कहें तो और क्या कहें । परमात्मा के भक्त शरीर त्यागकर परमात्मस्वरूप होकर परमात्मा के सानिध्य में ही रहते हैं । अतः वे भी परदेशी = दूर देश के निवासी ही हैं । परमात्मा और उसके भक्त दोनों एक रूप हैं । उनमें भेद लेशमात्र भी नहीं है ।) 
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वह दूर देश वासी परमात्मा वही है जिसने ध्रुव और प्रह्लाद पर निवाजियौ = कृपा करके उन्हें वैकुण्ठ में निवास प्रदान किया । उस परमात्मा की नींव अत्यन्त गहरी है । अन्य देवी-देवों से अधिक गहरी, मजबूत और प्रभावशाली है । वह परमात्मा सर्वोच्च = उस जैसा वो ही है क्योंकि उसको सहारा देने वाली खंभ, स्तंभ रूपी कोई भी और दूसरी शक्ति नहीं है । उसको बनाने वाला और दूसरी कोई  नहीं है । वह बिना किसी स्तंभ-सहारे के सबका सहारा बनकर सर्वोच्च स्थान(गगन) में अवस्थित है । 
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उस परमात्मा के यहाँ चन्द्रमा और सूर्य दीपक = प्रकाश करने का काम करते हैं । ये दोनों उस स्वयंप्रकाशी पूर्ण तेजपुंज परमात्मा से ही प्रकाश प्राप्त करके प्रकाश करते हैं । उस परमात्मा की ज्योति अलक्ष्य है = समग्रतः उसको कोई नहीं देख सकता किन्तु वह सबको देखता है । उसके यहाँ अन्नादि के भरपूर भण्डार भरे हैं । लक्ष्मी = धन-सम्पत्ति अनंत अपार है । 
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चारों पदारथ अर्थ, धर्म, काम मोक्ष, सम्पूर्णतः उसके यहाँ विराजमान हैं । उसके यहाँ सदैव जय जयकार की ही ध्वनि होती रहती है । चारों पदारथों के भरपूर मात्रा में होने से वहाँ कभी कोई कमी होती ही नहीं है जिससे सदैव जैजैकार = आनंद ही आनंद है । रिद्धि = धन-सम्पत्ति, सिद्धि = सदैव बढ़ती है, घटती नहीं है । ऐसी रिद्धि-सिद्धि उसके यहाँ दासी हैं आप स्वयं अविनाशी परमात्मा राजा हैं । 
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उस परमात्मा के यहाँ नारद और शारदा अपनी अपनी वीणाओं को सदैव अनहदनाद = निस्सीम नाद के लिये बजाते रहते हैं । उस परमात्मा के पास निवास करने के लिये वैकुण्ठ जैसा चित्रंशाली = महल है ।  वनमाला की वहाँ सुखसेज = शय्या है । कल्पवृक्ष की वहाँ छाया है । उस स्थान में माया-मोह का प्रवेश नहीं है । वहाँ रहने वालों पर पाप-पुण्य का प्रभाव नहीं होता । सारे कर्मों को वह तत्काल कापै = काट डालता है । वहाँ पर निवास करने वाले प्रवासियों को वह मुक्ति आपै = प्रदान करता है और उन्हें अपने जैसा बनाकर वहीँ का स्थाई निवासी बना लेता है ।  
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उस परमात्मा के यहाँ अठारह भार वनस्पतियों से युक्त वनप्रदेश है । (एक भार में अढाई मण वजन होता है । एक-एक वनस्पति का एक-एक पत्ता एकत्रित करके उन्हें तौला जाये तो उन सबका वजन १८ भार = ४५ मण होता है । यही १८ भार का परिमाण है ।) गुनचास करोड़ योजन वाली भूमि है जिस पर सुमेरु जैसे पर्वत के साथ-साथ अनेकों और भी पर्वत हैं । 
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उस  विशाल भूमण्डल में नानावर्णों = प्रकार वाली बाव = वायु है । (वायु भी ४९ प्रकार की ही बताई गई है । गुनचास कोटि मरुद्गण देवता कहे जाते हैं । कोटि=प्रकार ॥ वैसे वायु शीतल, मंद, और सुगंध = तीन प्रकार की होती है ।) उस परमात्मा के यहाँ असीम सात समुद्र हैं । वे अपनी सीमा में ही रहते हैं । अर्थात् उनमें भरा जल, दूध आदि सीमा लांघकर बाहर नहीं आते । उसके यहाँ छियानवे कोटि मेघ हैं । वे सब के सब उसके घर में पानी भरते हैं । अर्थात् समस्त मेघ पृथिवी पर जल वर्षा करते हैं । 
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गुनचास कोटि योजन वाली पृथिवी ही उसका घर है । ब्रह्मा, विष्णु, महेश, तेतीस करोड़ देवता, मनुष्य, शंकर, शेषनाग, तेतीस करोड़ देवता, दानव ये सभी उसी के घर में निवास करते हैं । (उलिगाणा =निवासी) उसका तीनों लोकों में(भूमि, आकाश और पाताल) में निवास है । वह तीनों लोकों में फैला हुआ = समाया हुआ है । तीनों ही लोकों को पूरने वाला=भरण-पोषण करने वाला है । जितने भी जीव-जन्तु हैं वे सभी उसी घर से पालित-पोषित होते आ रहे हैं । 
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जिसके पैर के अंगूठे के नख से सुरसरी=गंगा की धारा का उद्गम हुआ है जिसके जल का अंत नहीं है, आर-पार नहीं है । चारों वेद उसके मुख से निकली हुई उसही की वाणी है जिनका रहस्य जानने में नहीं आता है । जिसके यहाँ भीम, भीष्म, हनुमान जैसे अनेकों योद्धा हैं । पड़दा लगाने हटाने के लिये जिनके यहाँ धर्मराज जैसे व्यक्ति हैं । जिसके घर के द्वार पर विचित्र चित्र चित्रित है । जिसके शुकदेव तथा जयदेव जैसे भावभक्ति युक्त सेवाधारी हैं । 
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उस परमात्मा ने राजर्षि अंबरीष की रक्षा की तथा द्रोपदी तथा अहिल्या का जिसने उद्धार किया । जिसके नामदेव, सेन, कबीर, पीपा, धना, सूरदास, रैदास जैसे भक्त हैं । वह इन सभी की मनोकामनाओं को पूरी करता है । जिसके चरणों में दत्तात्रेय, गोरख आदि शिव, गोपीचन्द, भर्तृहरि, दादू, सोझा, बीझल, हरदास, नानक जैसे भक्तों का निवास है । उसके सभी भक्त शिरोमणि-महान हैं । वहाँ देने की आवाज आती है, लेने की नहीं । 
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वहाँ निवास करने वाले सभी में रामजी विराजते हैं । उसके घर में सदा मंगलाचार ही मंगलाचार के बधावे गाये जाते हैं । वहाँ दुःख का नाम तक नहीं है । जिसके घर का व्यवहार=वैभव उक्त प्रकार का है उसका कैसे वर्णन किया जा सकता है । यदि शेष अपने एक हजार मुखों से भी वर्णन करने लग जाये तो कर नहीं सकता क्योंकि उसकी महिमा का पार नहीं पाया जा सकता । वह परमात्मा अनंत लोकों का राजा है । उसके यहाँ बादलों की गर्जन जैसा बाजा बजता रहता है । वह अविनाशी नाम का राजा है । बस, उसके घर में ही ओलगि=प्रेम-प्रीतियुक्त होकर निवास करना चाहिए ॥९६॥

*१०. विरह का अंग~१/४*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*१०. विरह का अंग~१/४*
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गुरु संयोग वियोग अंग के अनन्तर वियोग और वियोगियों का परिचय देने के लिये विरह का अंग कह रहे हैं -
*कबहुँ सो दिन होयगा, पीव मिलेगा आय ।*
*रज्जब आनंद आतमा, त्रिविधि ताप तन जाय ॥१॥*
वह दिन कब उदय होगा ? जिस दिन परब्रह्मका साक्षात्कार होने से शरीर के त्रय ताप दूर होकर जीवात्मा को ब्रह्मानन्द प्राप्त होगा ।
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*प्राण पिंड रग रोम सब, हरि दिशि रहे निहारि ।*
*ज्यों वसुधा१ वनराय२ सौं, विरही चाहै वारि३ ॥२॥*
जैसे पृथ्वी१ वन पंक्तियों२ से अलग होने लगती है अर्थात वनस्पतियाँ सूखने लगती हैं तब जल३ वृष्टि चाहती है । वैसे ही विरही के प्राण, शरीर, रग, रोम आदि सभी अंग उपांग हरि दर्शनार्थ हरि की ओर ही देखते रहते हैं ।
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*साधु शब्द श्रवणों सुने, विरह वियोगी बैन ।*
*तब तैं वेधी आतमा, रज्जब परे न चैन ॥३॥*
विरही ने जबसे विरह सम्बधी संतों के शब्द सुने हैं, तब से ही जीवात्मा उनके शब्द-बाण से विद्ध हो गया है, लव मात्र भी शान्ति नहीं मिल रही है ।
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*बादल विरह वियोग के, दर्द दामिनी१ माँहिं ।*
*रज्जब घट२ ऐसी घटा, भैझड़३ भागे नाँहिं ॥४॥*
वियोगी के अन्त:करण२ में निम्नलिखित प्रकार घटा चढ़ रही है - वियोग के अनुभव द्वारा विरह रूप बादल चढ़ रहे हैं, व्यथा रूप बिजली१ चमक रही है, और भयंकर झड़३ लग रहा है, बन्द नहीं होता ।
(क्रमशः)

सोमवार, 20 अप्रैल 2026

२३. स्वरूप विस्मरण को अंग २५/२८

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२३. स्वरूप विस्मरण को अंग २५/२८
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विप्र ह्वै रह्यौ शूद्र सौ, भूलि गयौ ब्रह्मत्व । 
सुन्दर ईश्वर आपही, मांनि लियौ जीवत्व ॥२५॥
आत्मा के उस आचरण से ऐसा ज्ञात होता है कि मानो किसी ब्राह्मण ने अपना ब्राह्मणत्व भुला कर शूद्रत्व ग्रहण कर लिया हो । इसी प्रकार यह आत्मा भी अपना ब्रह्मत्व भूल गया है । इसने भी अपना ईश्वरत्व त्याग कर जीवत्व ग्रहण कर लिया है ॥२५॥
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राजा सोयौ सेज परि, भयौ स्वप्न मंहिं रंक । 
सुन्दर भूल्यौ आप कौं, देह लगाई पंक ॥२६॥
जैसे किसी राजा को, रात्रि में शय्या पर सोते हुए, स्वप्न में अपना दरिद्र रूप दिखायी दे जाय । वैसे ही इस आत्मा ने अपने पर देह का त्रिगुणात्मक पङ्क(कीचड़) लगा लिया है ॥२६॥
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ज्यौं नर बहुत स्वरूप है, भ्रम तें कहै कुरूप । 
सुन्दर भूलौ आपुकौ, आतम तत्व अनूप ॥२७॥
जैसे किसी रूपवान् मनुष्य को अपने कुरूप होने का भ्रम हो जाय; उसी प्रकार इस अनुपम आत्मतत्त्व को भी भ्रम हो गया है ॥२७॥
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बनिया मूंधौ ह्वै रह्यौ, ढूंगै फेर्यौ हाथ । 
सुन्दर ऐसौ भ्रम भयौ, मेरै तौ नहिं माथ ॥२८॥ 
जैसे किसी ओंधे लेटे हुए बणिये ने अपने नितम्बों(चूतड़ों = ढूंगों) पर हाथ फेरा तो उसे ज्ञात हुआ कि यह तो नितम्ब हैं, मेरा शिर(माथा) नहीं है, तब उसको भ्रम हो गया कि अरे मेरा शिर नहीं है । यही दशा अब इस आत्मा की है ॥२८॥
(क्रमशः)  

बिचालै अंतरौ रे

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*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*पास पीव, परदेश है रे, जब लग प्रकटै नांहि ।*
*बिन देखे दुख पाइये, यहु सालै मन मांहि ॥*
*कहा करूँ कैसे मिले रे, तलफै मेरा जीव ।*
*दादू आतुर विरहनी, कारण अपने पीव ॥*
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विरह ॥
बिचालै अंतरौ रे, हरि हम भागौ नाहिं ।
को जाणैं कदि भाजिसी, म्हारौ पछितावो मन माहिं ॥टेक॥
आडा डूंगर बन घणाँ, नदियाँ बहै अनंत ।
सो पंखड़ियाँ पंजर नहीं, हौं मिलि मिलि आऊँ नित्त ॥
चरणाँ पाखैं चालिबौ रे, धरती पाखैं बाट ।
परबत पाखैं लंघणाँ, बिषमी औघट घाट ॥
जाताँ जाताँ ध्यौंहड़ा, म्हारै मनि पछितावौ होइ ।
जीवत मेलो हे सषी, मुवाँ न मिलसी कोइ ॥
हरि का दर्सन कारिण हे सषी, म्हारा नैंन रह्या जल पूरि ।
सो साजन अलगा हुवा, भ्वैं भारी घर दूरि ॥
पाती प्यारा पिव की, हुँ क्युँ बाँचूँ कर लेइ ।
बिरह महाघण ऊमट्यौ, म्हारा नैंण न बाँचण देइ ॥
बटाऊ उहिं बाट का, म्हारौ संदेसौ तिहि हाथि ।
आऊँली नांहीं रहूँ, काहु साधु जन के साथि ॥
ज्युँ बन कै कारणि हस्ती झूरै, चकवी पैली पार ।
यौं बषनां झूरै नाम कौं, ज्युं उलिगाणा की नारि ॥९५॥
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हरि और मेरे बीच में विद्यमान अन्तर(दूरी) अभी तक समाप्त नहीं हुआ है कौन जाने, यह अंतर = दूरी कब भागेगी । मेरे मन में तो बस इसी बात को लेकर नाना प्रकार की ऊहापोह होती रहती है । (पछितावौ = पश्चाताप का वाचक न होकर असमंजस = ऊहापोह की स्थिति का वाचक है ।) मेरे और परमात्मा के बीच दूरी होने के कारण = प्रतिबंधक अग्रांकित रूप से हैं ।
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सबसे बड़ा प्रतिबंधक अहंकार रूपी पर्वत है तथा मन की नाना वृत्तियों रूपी बीहड़ जंगल है और पाँच कर्मेन्द्रिय, पाँच ज्ञानेन्द्रिय तथा एक उभयात्मक मन रूपी इंद्रियों की नाना भोगों में आसक्ति ही नाना नदियों का बहना है । इन दुर्लघ्यों को लांघना शक्य नहीं जानकर मैंने सोचा कि मैं विवेक-विराग रूपी पंख लगाकर उड़कर प्रियतम से मिल लूँ किन्तु मेरे पंजर = शरीर में वैराग्य और विवेक रूपी पंख भी नहीं हैं कि मैं उड़कर प्रतिदिन प्रियतम से मिल कर आ जाऊँ ।
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धरती पर बिना राजमार्ग, पगडंडी के चलना, उस पर भी बिना पैरों के चलना, फिर दुर्गम पहाड़ों को बिना रास्ते व बिना पैरों के लांघना अत्यन्त ही ऊबड़ खाबड़ = बेतरतीब तथा विषमी =कष्टदायक है । दिन पर दिन जाते जा रहे हैं जिसके कारण मेरे मन में भारी असमंजस पड़ गया है कि जीते जी मेरा प्रियतम से मेल होगा अथवा नहीं । क्योंकि मरने के पश्चात् तो उससे मिलना संभव नहीं है, वह मिलेगा ही नहीं ।
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(यहाँ जीवन्मुक्ति की बात कही गई है) हे सखी ! प्रियतम हरि के दर्शन नहीं मिलने के कारण मेरे दोनों नेत्र रो-रो कर जल से भर गये हैं और मेरा वह प्रियतम मेरे से दूर परदेश में है । यदि तुम कहो कि मैं ही उसके घर चली जाऊँ तो हे सषी ! इसमें भी मेरी मजबूरी है क्योंकि भ्वैं-भूमि बहुत लम्बी-चौड़ी है जिसमें उसका घर बहुत दूरी पर बना हुआ है । मेरे हृदय में विरह रूपी महाघन अनवरत उमड़ता रहता है, बरसता रहता है जिससे मेरे नेत्रों से अजस्त्र अश्रुधारा गिरती रहती है जो प्रियतम की पत्रिका को बाँचने ही नहीं देती है ...
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(नेत्रों में तो विरह का जल भरा रहता है, फिर अक्षरों को कौन पढ़े । अथवा यदि बलपूर्वक अश्रुयुक्त आंखों से प्रियतम के पत्र को पढ़ने का प्रयत्न भी करूँ तो अश्रु पत्र पर गिरकर अक्षरों को मिटा देते हैं जो मुझे सह्य नहीं है क्योंकि प्रियतम का पत्र भी प्रियतम के समान ही है जिसे मिटाना मुझे अभीष्ट नहीं हैं । अतः प्यारे प्रियतम की चिट्ठी हाथ में लेकर कैसे बाँच सकती हूँ । )
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जिस स्थान पर मेरा प्यारा प्रियतम रहता है, उसी स्थान को जाने वाले राहगीर(गुरुमहाराज, साधु संत) के हाथों मैंने मेरा संदेशा प्रियतम को भेज दिया है कि हे प्रियतम ! तू कहीं भी किसी भी रूप में छिपकर मुझसे दूर हो जा किन्तु मैं किसी साधु = सज्जन पुरुष के साथ तेरे पास अवश्य आऊंगी (पहले के जमाने में औरतें अकेली यात्राएँ नहीं करती थीं । अत आपातकाल में वे ऐसे सज्जन पुरुषों के साथ यात्राएँ करती थीं जिनके साथ उनके शील भंग होने की संभावना बिलकुल नहीं रहती थी । यहाँ पर साधु महात्मा ही सज्जन पुरुष हैं ।)
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बषनांजी कहते हैं मैं रामजी को प्राप्त करने के लिये ठीक उसी प्रकार विरह निमग्न हूँ जिस प्रकार परदेशी(उलिगाणा) की पत्नी पति के लिये, जंगल से हटा राजप्रसादों की कैद में बंद हाथी बन के लिये तथा चकवी-चकवे के लिये रात भर दूसरी पार = तीर पर बैठी-बैठी मिलने की राह देखती है ॥९५॥

*९. गुरु संयोग वियोग माहात्म्य का अंग~६१/६४*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*९. गुरु संयोग वियोग माहात्म्य का अंग~६१/६४*
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*कबीर सोई अक्षर सोई बयन१, जण२ जू६ जूवा३ चवंति४ ।*
*कोई जु मेल्है५ केलिवणी७, अमी रसायन हुंति८ ॥६१॥*
वही अक्षर और वही वचन१ सब बोलते हैं किन्तु जो६ कोई ज्ञानी जन२ उनमें होने वाली८ ज्ञानामृत रसायन को टपकाता४ है वह दूसरा३ ही होता है और कोई विरला साधक ही उसे अपनी विचार-शक्ति७ से हृदय में धारण५ करता है । इसमें कबीरजी के वचन से अपना विचार प्रमाणिक है यह बताया है ।
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*दादू कहँ आशिक१ अल्लाह के, मारे अपने हाथ ।*
*कहँ आलम२ औजूद३ सौं, कहैं जबाँ४ की बात ॥६२॥*
जो अपने साधन रूप हाथों से निजी इन्द्रिय, मन, देहाध्यास आदि पर विजय प्राप्त की है, ऐसे प्रभु के प्रेमी१ गुरु कहाँ, और जो सांसारिक२ भोगों में आसक्त देहाध्यास३ से बँधे हुये हैं, केवल मुख से४ ज्ञान की बातें करते हैं वे कहाँ, अर्थात सच्चे गुरु के संयोग से ही जीव का कल्याण होता है, झूठे गुरु के संयोग से नहीं ।
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देवे किरका१ दरदका, टूटा जोड़े तार ।
दादू साँधे२ सुरति को, सो गुरु पीर३ हमार ॥६३॥
जब से तू भगवद् विमुख हुआ है, तब से दु:ख ही दु:ख पा रहा है ऐसा उपदेश करके भगवद् - विरह दु:ख का कण१ प्रदान करे और अज्ञान वश विषयों में आसक्त होने से जो तार टूट गया है, उसे जोड़ दे अर्थात प्राणी को भजन में लगा दे । वृत्ति भंग के कारण-प्रमाण, विकल्प, विप्पर्य, निद्रा, स्मृति से वृत्ति को बचाकर आत्म-स्वरूप में जोड़२ दे । उक्त लक्षणों से युक्त, सिद्ध३ सन्त है, वही हमारा गुरु है । ६२-६३ में गुरुजी के विचारों द्वारा अपना विचार प्रमाणिक सिद्ध किया है ।
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*साँचे सद्गुरु की कथा, जैसा दीपक राग ।*
*रज्जब वाणी स्वर सुनत, जड़ दिल दीपक जाग ॥६४॥*
जैसे दीपक राग होता है, वैसे ही सच्चे सद्गुरु की कथा होती है । दीपक राग को यर्थात रूप से गाने वाला राग-सिद्ध गायक जब दीपक राग गाता है तब उसके मुख से दीपक राग के स्वर निकलते ही दूर पड़ा जड़ दीपक बिना ही अग्नि के अपने-आप प्रज्वलित हो जाता है । वैसे ही सच्चे सद्गुरु के मुख से निकली हुई वाणी को सुनने से अज्ञानी के हृदय में भी ज्ञान-दीपक जग जाता है ।
इति श्री रज्जब गिरार्थ प्रकाशिका सहित “९. गुरु संयोग वियोग माहात्म्य” समाप्त ॥
(क्रमशः)

रविवार, 19 अप्रैल 2026

२३. स्वरूप विस्मरण को अंग २१/२४

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२३. स्वरूप विस्मरण को अंग २१/२४
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सुन्दर चेतनि आतमा, जड सौं कियौ सनेह । 
देह खेह सौं मिलि रह्यौ, रतन अमोलक येह ॥२१॥
श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - इस चेतन आत्मा ने जड शरीर में अध्यास कर लिया; परन्तु समय आने पर वह देह तो धूल में मिल गया, पर यह आत्मा चेतन रूप होने से अमूल्य रत्न के समान यथावस्थित रह गया ॥२१॥
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दौरि दौरि जड देह कौं, आपुहि पकरत आइ । 
सुन्दर पेच पर्यौ कठिन, संक नहीं सुरझाइ ॥२२॥
यह मुग्ध(अज्ञानावृत्त) आत्मा बार बार दौड़ कर स्वयं ही इस देह में आसक्त होकर इसे पकड़ने का प्रयास करता है । यह उसके सम्मुख विशेष समस्या उपस्थित हो गयी, जिसे यह अध्यास के कारण सुलझा नहीं पा रहा है ॥२२॥
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सूवा पकरि नली रह्यौ, वह कहुं पकर्यौ नांहि । 
ऐसैं सुन्दर आपु सौं, पर्यौ पींजरा मांहि ॥२३॥
कोई शुक(तोता) स्वयं नली से चिपका हुआ है, उसको किसी ने नहीं पकड़ रखा है; इसी प्रकार वह चेतन आत्मा भी इस देह में स्वयं अध्यस्त है । इस(अध्यास) के परिणामस्वरूप यह शुक रूप आत्मा संसाररूप पिंजरे में फंसा हुआ है ॥२३॥
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ज्यौं गुंजनि को ढेर करि, मरकट मांनै आगि । 
ऐसैं सुन्दर आपही, रह्यौ देह सौं लागि ॥२४॥
जैसे कोई मूढ वानर, वर्ण में समानता के कारण, गुञ्जाओं को अग्नि का कण मान कर उनको एकत्र कर मुख से फूंक मार कर प्रज्वलित करने का व्यर्थ प्रयास करता है; इसी प्रकार यह आत्मा भी देह के साथ आसक्त होकर मूर्खता ही कर रहा है ॥२४॥
(क्रमशः) 

हर रस महगै मोलि लियौ रे

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*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*दादू सचु बिन सांई ना मिलै, भावै भेष बनाइ ।*
*भावै करवत उर्ध्वमुख, भावै तीरथ जाइ ॥*
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*भ्रमविध्वंश पूर्वक भक्तिमहिमा ॥*
साषी लापचारी की ॥
हरि रस महगौ मोलि को, बषनां लियौ न जाइ  ।
तन मन जोबन सीस दे, सोई पीवौ आइ ॥१ 
(१ . इस साषी का अर्थ “सूरातन कौ अंग” में देखें ।)
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पद ॥
हर रस महगै मोलि लियौ रे ।
तन मन धन जोबन सिर साटै, साधाँ आघ कियौ रे ॥टेक॥
दूधाधारी पवन अहारी, खणि खाइ कंद जियौ रे ।
राम रसाइण लियौ न जाई, बिड़वौ रस्स पियौ रे ॥
लुंचित मुंचित मोनि जटाधर, हीवालै धसियौ रे ।
परमेसुर नैं जाणैं नांहीं, बनखँडि कौ बसियौ रे ॥
करवत घाती झंपापाती, लेकरि मुवौ हियौ रे ।
जोग जग्गि जप तप के बदलै, देखण हू न दियौ रे ॥
हैंवर गैंवर भोमि कुलातन, येतौ दैन कह्यौ रे ।
याकै बदलै राम रसाइण, मासौ हू न लहयौ रे ॥   
दिली दलाल दरीबै मिलियौ, चोखौ बणिज कियौ रे । 
गुर परसादि साध की संगति, बषनां मांगि पियौ रे ॥९४॥ 
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साटै = बदले में ।आघ = सम्मान । बिड़वौ = कड़वा, निम्नस्तरीय । लुंचित = बालों का उखाड़ने वाले जैनी साधू । मुंचित = मूंड मुंड़ाने वाले संन्यासी । मोनि = न बोलने वाले । 
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करवतघाती =  अंग्रेजों के राज के पहले काशी में एक बहुत ही गहरा कुवा था । उसके मुँह पर एक विशाल आरा हुआ था । बहुत से लोग “जीवनमुकति हेतु जनु कासी”, “कासी मरत परमपद लहही” ‘काशी मरणान्मुक्ति’ काशी में मरने से मुकति हो जाती है, विधिवाक्य पर विश्वास करके बहुत ऊँची दीवार से उस आरे पर कूद पड़ते थे जिससे उनका शरीर कटकर उस अंध कूप में गिर जाता था । इसे ही करवत-कासी के नाम से जाना जाता है । अंग्रेजों ने इस प्रथा को बंद करवा दिया ।
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झंपापाती = पहाड़ से पात होना = लुड़ककर, गिरकर मरना । हैंवर = हय = घोड़ा । गँवर = गय = हाथी । कुलातन = शरीर की वलि । दिली दलाल = परमात्मा से मिलाने वाले गुरु । दिल में निवास करने वाला परमात्मा दिली है । दरीबै = बाजार में, बिना प्रयत्न के, अनायास ही गुरुमहाराज मिल गए । साधना रूपी विणज = व्यापार प्रभूत मात्रा में किया । 
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बषनांजी अपनी स्थिति स्पष्ट करते हुए कहते हैं, मैंने परात्पर-परब्रह्म-हरि रूपी रसायन बहुत मूल्य देकर = बहुत कुछ त्यागकर(परमात्मा को प्राप्त करने के लिये ब्रह्मा के लोक के सुख ही नहीं उनको प्राप्त करने की स्पृहा तक त्यागनी पड़ती है । यह त्याग त्यागने के पुर्व तक बड़ा लगता है किन्तु जब परमात्मा का साक्षात्कार हो जाता है तब यह अत्यंत तुच्छ  लगता है ।) प्राप्त किया है । 
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मैंने तन, मन, धन, यौवन तथा अपने शिर = आपा = अहंकार के बदले ,में इस रसायन को प्राप्त किया है । जिसकी(इस त्याग की) साधू संतों ने बहुत ही प्रशंसा की है । अधिकांश साधक या तो दूध का आहार करके या निराहार रहते हुए मात्र पवन का आहार करके या कंद-मूल खोदकर खाते हुए परमात्मा को प्राप्त करने के प्रयत्न कटे हैं । उने राम-नाम स्मरण रूपी रसायन तो किया नहीं जाता उल्टे वे उक्त निम्नकोटि के उपाय रूपी कड़वे रसायनों को पीते रहते हैं । 
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बहुत से साधक अपने शरीर के बालों को उखाड़कर फैंकते हैं । बहुत से मोनी मूंड को मुंडवाते हैं । कुछ मोनी मौन धारण करने रूपी साधना करते हैं तो कुछ बालों को बढ़ाकर जटाधारी बन साधना करते हैं । कुछ साधक ऐसे भी हैं जो हिमालय की कुन्दराओं में घुसकर एकांत में साधना करते हैं । किन्तु इन साधनाओं के बल पर वनखण्ड में निवास करने वाले ये परमात्मा का साक्षात्कार नहीं कर पाते हैं । 
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बहुत से लोग काशी में मरने से मुक्ति होती है की बात को ध्यान में रखकर आरे पर गिरकर घात करते हैं तथा कुछ पर्वत से गिरकर अपना प्राणांत करते हैं । कुछ मोनी योग, यज्ञ, जप-तप के बदले में परमात्मा को प्राप्त करने का प्रयत्न करते हैं किन्तु उनको परमात्मा ने अपना दर्शन देखने मात्र को भी नहीं दिया उनके हृदय में हमेशा-हमेशा के लिये विराजित हो जाना तो आगे की बात है । 
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कुछ लोग परमात्मा के सामने हठी, घोड़े, भूमि आदि का दान देने व् नरवलि आदि करने की बात निवेदन करते हैं किन्तु इनके बदले में वे मासा मात्र = तुच्छातितुच्छ मात्रा में भी राम-रसायन की प्राप्ति नहीं कर पाते हैं । (मासा = पुराने समय में चलने वाले माप का नाम ।  तौला, माशा, रत्ती आदि) 
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मुझ बषनां को परमात्मा से मिलाने वाले दलाल = गुरु दरीबै = बाजार में = अनायास ही मिल गये जिन्होंने मुझे राम-रसायन के व्यापर करने की युक्ति रूपी साधना बता दी जिससे मैंने अच्छी मात्रा में व्यापार किया = राम नाम की साधना करी । परिणामस्वरूप मैं बषनां ने गुरुमहाराज के प्रसाद(कृपा) से और साधुओं की संगति से राम रसायन को मांग-मांगकर खूब पिया है । साधना कर करके राम रसायन का खूब रसास्वादन किया है ॥९४॥ 

*९. गुरु संयोग वियोग माहात्म्य का अंग~५७/६०*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*९. गुरु संयोग वियोग माहात्म्य का अंग~५७/६०*
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*कह्या सु आया शिष कने१, अकह रह्या गुरु माँहिं ।*
*रज्जब वह कहिं और है, जो शब्द समावे नाँहिं ॥५७॥*
जो गुरु द्वारा शब्दों से कहा गया, वह शब्दार्थ रूप ज्ञान तो शिष्य के पास२ आ गया और जो न कहा गया वह गुरु में ही रहा, किन्तु जो ब्रह्म शब्दों में नहीं समाता वह तो शब्दार्थो से भिन्न कहीं और ही स्थिति में है अर्थात शब्द सदभाव से रहित निर्विकल्पावस्था में ही उसका आत्मरूप से साक्षात्कार होता है ।
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*गुरु वकील निज ब्रह्म कने१, शब्द रहै संसार ।*
*बहु बचनों बहुते मिलैं, विरला सद्गुरु लार ॥५८॥*
ब्रह्म रूप न्यायाधीश के पास१ जीवात्मा का सद्गुरु रूप निजी वकील रहता है, और शब्द तो संसार में रहते हैं, विविध प्रकार के प्रवचनों रूप शब्दों द्वारा तो ब्रह्म से बहुत मिलते हैं अर्थात शब्दों द्वारा तो ब्रह्मज्ञानी बहुत बनते हैं, किन्तु सद्गुरु के बताये हुये साधनों द्वारा सद्गुरु के साथ लगकर कोई विरला साधक ही ब्रह्म का साक्षात्कार करता है । जैसे वकील न्यायाधीश के पास अपने मुवक्कल का समर्थन करता है, वैसे ही सद्गुरु अपने शिष्य का ब्रह्म के पास समर्थन करता है अर्थात संशय विपर्य्य से रहित अद्वैत स्थिति में लाता है ।
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*ओंकार आतमा क्षीरं१, ताहि जमाया मथै घृत वीरं२ ।*
*वाणी तक्र३ जुदे जीव जाणी, उलटि मिले जाँवण पय४ पाणी ॥५९॥*
दूध१ को जमाकर मन्थन करते हैं तब घृत छाछ३ से अलग हो जाता है और वह छाछ का जल जामन के रूप में पुन: दूध४ में मिल जाता है किन्तु घृत नहीं मिलता । हे भाई२ ! वैसे ही ओंकार के चिन्तन द्वारा जीवात्मा का अन्त:करण स्थिर होता है, फिर स्थिर बुद्धि के द्वारा विचार किया जाता है तब अपरोक्ष ज्ञान होता है, अपरोक्ष ज्ञान होने पर जीव ओंकारादि शब्द रूप वाणी को और अपने स्वरूप में भिन्न जानकर स्व-स्वरूप ब्रह्म में ही स्थित होता है, फिर संसार में नहीं आता और शब्द पुन: संसार में मिल जाते हैं ।
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*सीखी साखी विसाह्या१ बरा२, नाथ बोले खोटा३ न खरा४ ॥६०॥*
६०-६३ में अपने कथित विचारों पर प्रमाण दे रहे हैं - संतों की साखी तो सीखली और और लोगों को सुनाकर उससे बड़ा२ मोल लिया१ अर्थात उसका फल भोग ही प्राप्त किया । कारण - गुरु बिना अपने-आप सीखे हुवे साखी शब्दों से ब्रह्म-बोध नहीं होता, यह हम मिथ्या३ नहीं बोलते, सत्य४ ही कहते हैं ।
६० का पद्य गोरक्ष नाथादि में से किसी श्रेष्ठ नाथ संत का ज्ञात होता है ।
(क्रमशः)

शनिवार, 18 अप्रैल 2026

उपसंहार ~

*#daduji*
*॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥*
*॥ दादूराम~सत्यराम ॥*
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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अध्याय १६, आचार्य पर्व -
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उपसंहार ~  
दोहा- 
दादू पंथ आचार्यों के, लिख करके गुण ग्राम ।
‘आचार्यपर्व’ पूरण करत, ‘नारायण’ सुख धाम ॥१॥
प्राप्त हुये जो जो मुझे, उन्हें सहित अनुराग ।
अंकित इसमें कर दिये, पढें सुजन बडे भाग ॥२॥
ब्रह्म रुप आचार्यों की, गुण गाथा सु महान । 
संपूरण किमि लिख सके, ‘नारायण’ अनजान ॥३॥
अत: कृपा मुझ पर करें, ब्रह्म रुप आचार्य । 
आदर पावे पंथ में, मुझ बालक का कार्य ॥४॥
बाल विनय यह मानकर, करैं अनुग्रह आप ।
जिससे पढ कर पर्व यह, होंय मनुज निष्पाप ॥५॥
इति श्री १६ वाँ अध्याय समाप्त: १६ ।  
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महात्मय ~
चित्त लगाकर पढेगा, जो आचार्य पर्व । 
सुख रु शांति सो पायगा, क्षोभ हटा कर सर्व ॥१॥ 
दोष दृष्टि को त्याग कर, प्रीति सहित जो कोउ । 
आचार्य पर्व पढेगा, भक्ति पायगा सोउ ॥२॥
पढे पर्व आचार्य को, कोउ कामना लेय ।  
दीर्घ काल तक प्रति दिवस, ईश्‍वर उसको देय ॥३॥
जगदीश्‍वर अरु संत का, चरित समहिं फल देत ।  
अत: पढे इस पर्व को, ले मानव अभिप्रेत ॥४॥ 
आचार्य पर्व पढे से, सु कार्य होंगे पूर्ण ।  
अरु कु भावना हृदय से, निकल जायगी तूर्ण ॥५॥
आचार्य पर्व पढे से, ईश्‍वर में दॄढ प्रेम । 
होगा निश्‍चय अंत में, पावें पाठक क्षेम ॥६॥
परब्रह्म परात्परं, सो मम देव निरंजनम् । 
निराकार निर्मलं, तस्य दादू, वन्दनम् ॥
इति श्री दादूपंथ परिचय का आचार्य पर्व १ समाप्त: ।

२३. स्वरूप विस्मरण को अंग १७/२०

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२३. स्वरूप विस्मरण को अंग १७/२०
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जे गुन उपजै देह कौं, सुख दुख बहु संताप । 
सुन्दर ऐसौ भ्रम भयौ, ते सब मांनै आप ॥१७॥
सुख दुःख आदि सन्तापदायक कष्ट देह को होते हैं; यह जीवात्मा भ्रम में पड़ कर उन सब कष्टों को अपना मान बैठा है ॥१७॥
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शीत उष्ण क्षुधा तृषा, मोकौं लागी आइ । 
सुन्दर या भ्रम की नदी, ताही मैं बहि जाइ ॥१८॥
वह समझता है कि ये शीत उष्ण, क्षुधा तृषा(भूख प्यास) मुझ(आत्मा) को लग रहे हैं । यह तो भ्रम की नदी है, जिस में आज यह जीवात्मा बहा जा रहा है ॥१८॥
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अंध बधिर गूंगौ भयौ, मेरौ कौंन हवाल । 
सुन्दर ऐसौ मांनि करि, बहुत फिरै बेहाल ॥१९॥
वह इस भ्रमनदी में बहता हुआ यही सोच रहा है कि अब मेरी क्या गति होगी ! ऐसा सोचते हुए उस को न इस नदी के पार जाने का कोई उपाय सूझ(दीख) रहा है, न उसे दूसरों(गुरु आदि) का हितोपदेश ही सुनायी दे रहा है, और न वह अपनी व्यथा कथा ही किसी अन्य हितचिन्तक को कह पा रहा है । इस प्रकार वह अन्धा, बहरा एवं गूंगा होकर अपने लिये व्यथित हो रहा है ॥१९॥
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मिलि करि या जड देह सौं, रह्यौ तिसौ ही होइ । 
सुन्दर भूलौ आपु कौं, सुधि बुधि रही न कोइ ॥२०॥
यह जीवात्मा इस जडप्रकृतिक देह से सम्पृक्त होकर स्वयं भी जड होकर रह गया है । इस स्थिति में इसको स्वकीय वास्तविक रूप की कोई सुध बुध(होश = चेतना) नहीं रह गयी है ॥२०॥
(क्रमशः)

वा रस रीति न जाणैं कोई

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*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*फूटी काया जाजरी, नव ठाहर काणी ।*
*तामें दादू क्यों रहै, जीव सरीषा पाणी ॥*
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राग मारू ॥५॥ भ्रमविध्वंश ॥
वा रस रीति न जाणैं कोई, जिहि बिधि हरि की सेवा होई ॥टेक॥
षटक्रम ध्रम ब्रत पूजा पाणी । तामैं पिरथी सकल भुलाणी ॥
जल भरि कुंभ जहाँ थैं ल्याये । मच्छ कच्छ ता भीतरि ब्याये ॥
अंग पखाल्या सौंज षट्याई । मैल रह्या तहाँ खबरि न पाई ॥
चौका चौकि ढोलि जब दीया । जिव का घात घणाँ ही कीया ॥
तुलसी तोड़ी तब जिव मूवा । सुची करी फिरि सूतिग हूवा ॥
ब्रह्म बिचालै दुबिधा होई । पाक कियाँ जिनि भींटै कोई ॥
खाइ नहीं तिहि आगै मेल्है । आतमराम अपूठा ठेलै ॥
ब्रह्म बिरोध्या पाथर पूजै । च्यार् यूँ फूटी तौ क्या सूझै ॥
अपणैं अपणैं चौकै चाढ्या । घर का माणस बाहरि काढ्या ।
पीछैं पांडे कार बुझाणैं । चाड हुई तब घर मैं आणैं ॥
वा रस रीति कोइ यक जाणैं । जिहिं सेवा साहिब भल मानैं ॥
कनक कलस हरि जल भरि लीजै । तिरबैणी तहाँ मंजन कीजै ॥
बुझणि न जाइ घटै नहिं बाढै । निरमल तिलक तहाँ लै काढै ॥
चित चौका दे सेवा साजै । तिहि घर केवल राम बिराजै ॥
संख सबद भरि भरि हरि दाखै । इहिं बिधि चरणाँ अंम्रत चाखै ।
लोभ मोह मद मच्छर बाढै । पहली बार इन्हाँ बिचि काढै ॥
भाव भगति करि भोग लगावै । सो परसाद सही हरि पावै ।
बषनां बात जवै ह्वै लेखै । पूरणब्रह्म सकल मैं देखै ॥९३॥
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षटकर्म = हठयोगानुसारी छः क्रियाएँ नैति, धौती आदि अथवा ब्राह्मणों द्वारा पालनीय षटकर्म पढ़ना-पढ़ाना, दान देना, दान लेना आदि । ध्रम = दान-पुण्य । ब्रत = उपवास । पाणी = तीर्थस्थान । सौंज = सामगी । षट्याई = विन्यास = शरीर पर नाना तरह के कपड़े पहने तथा केशादि को सँवारा ।
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ढोलि = जब चौका लगाया, कच्चे घरों में गोबर-मिट्टी से, भोजन बनाने के पूर्व चौके को लीपा जाता था । पीली मिट्टी से चौका लगाते हुए मैंने बचपन में मेरी दादी माँ व माँ को पक्की रसोईघर में भी देखा है । बिचालै = बीच में ॥ भींटै = स्पर्श करे । अपूठा ठेलै = उल्टा ही भगा देते हैं । बिरोध्या = विरोध करने वाले । च्यार् यूँ = दो आँखें प्रत्यक्ष तथा दो अंतःकरण की विवेक एवं विचार ।
“हाकम नैं संग्राम कहै तू आंधौ मति होइ यार ।
दो दो नेतर सबनि कैं तेरै चहिये चार ॥
तेरैं चहिये चार दोइ देखण कूँ बारै ।
दोइ हिया कै मांहि जकाँ सूँ न्याव निहारै ॥
जस अपजस रहसि अठै समय बार दिन चार ।
हाकम नैं संग्राम कहै तू आंधौ मति होइ यार ॥”
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संग्रामदासजी के कुंडलिया; सम्पादक : ब्रजेन्द्रकुमार सिंहल । सूझै = दीखै । चाढ्या = भोजन बनाना प्रारम्भ किया । कार बुझाणैं = सीमा = प्रतिबन्ध हटाता है । चाड़ = बुलाने की आवाज । कनक कलस = हृदय । हरिजल = परमात्मा के प्रति अनन्य अनुराग । मंजन = स्नान । तिरवेणी = इड़ा, पिंगला और सुषुम्ना का संगम ।
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बुझणि न जाइ = अनन्य अनुराग समाप्त न हो । घटै नहिं = मंद भी न पड़े । बाढै = अहर्निश बढ़े । चित चौका = चित्त में से समस्त कलुषों को निकालना रूपी चौका लगावे । दाखै = बोलै = स्मरण करे । बाढै = काट दे, निकालकर बाहर कर दे । लेखै = उक्त बातें संपादित सससहों, आचरित हों ।
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जिस विधि से परात्पर-परब्रह्म-परमात्मा की सेवा होती है उस रस = प्रेममयी भक्ति की रीति को कोई नहीं जानता । पृथिवी की सारी ही जनता या तो नेति-धोती आदि षट्कर्मों को या पुण्य या व्रत-उपवासादि या मूर्ति-पूजा या तीर्थादि में स्नानादि के करने के ही भ्रमों में उलझी पड़ी है । जिन तीर्थों में से कुंभ में भरकर जल लाये हैं क्या वह पवित्र है ? अरे ! उसमें तो कछुवे और मगरमच्छ प्रजनन करते हैं, मल-मूत्र करते हैं और बच्चे पैदा करते हैं । उन्हीं तीर्थों में जाकर शरीर को नहलाते हैं, फिर उसका(शरीर का) तिलकादि लगाकर, केश विन्यास करके श्रृंगार करते हैं किन्तु जिस मन में मैल = पापादि रहते हैं उसके बारे में तनिक भी विचार नहीं करते हैं ।
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जब चौके को पवित्र करने केलिए गोबर-मिट्टी से लीपते-पोतते हिं तब बहुत से छोटे-छोटे जीवों को मारने की हत्या करते हैं । भोग लगाने के लिये जब तुलसी तोड़ते हैं तब भी जीव करते हैं । जब उस तुलसी को जल से धोकर पवित्र करते हैं, तब भी जीव मरते हैं । जब उस तुलसी को जल से धोकर पवित्र करते हैं, तब भी जीव हिंसा होती है(सूतिग = अस्पृश्यता = हिंसा) ब्रह्म = भगवान् और भक्त के बीच में दूरी(दुविधा) हो जाती है क्योंकि पुजारी कहता है, अब आप इसके हाथ तक मत लगाओ क्योंकि इसे पवित्र कर लिया गया है ।
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जो परमात्मा की मूर्ति भोजन खाती नहीं उसके आगे तो भोग धरते हैं जबकि जिस भिखारी के शरीर में आत्मा रूपी परमात्मा विराजमान है उसे बिना भोजन कराये ही उल्टा भेज देते । परात्पर-परब्रह्म-परमात्मा का विरोध करते हैं जबकि पत्थर को भगवान् मानकर पूजते हैं । क्योंकि इन मूर्खों की चारों ही आँखें फूट गई होती हैं । इन्हें सत्यानृत क भेद ही मालूम नहीं पड़ता ।
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अपने-अपने चौकों में जब भोजन बनाने की तैयारी की जाती है तब उस घर में से(रसोईघर में से) घर के अन्य सभी मनुष्यों को बाहर निकाल दिया जाता है । फिर पांडे(पंडित, आचारी व्यक्ति) भोजन तैयार हो जाने पर सबको आने के लिये आवाज लगाता है । अपनी कार को मिटाता है तब सब लोग घर में प्रविष्ट होते हैं ।
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वस्तुतः परमात्मा जिस सेवा विधि से प्रसन्न होता है उस अनुरागमयी रीति को कोई कोई ही जानता है ।
“मनुष्याणां सहस्त्रेषु कश्चिद्यतति सिद्धये ।
यततामपि सिद्धानां कश्चिन्मां वेत्ति तत्त्वतः ॥”
परमात्मा को प्रसन्न करने की वास्तविक सेवाविधि तो अग्रांकित प्रकार से है । हृदय रूपी कनक कलश में परमात्मनाम में अनन्य प्रीति रूपी जल भरे । फिर उस राम नाम का अखंड जप करे तथा त्रिवेणी घाट पर पहुँचकर उसमें स्नान करे = सरोवर हो जाये । ऐसा प्रयत्न करे कि यह रामनाम का स्मरण छूटे तो बिलकुल ही नहीं, कम भी न हो उल्टे दिनानुदिन बढ़ता ही जाये(प्रतिक्षणवर्धमानं, नारदभक्तिसूत्र) फिर स्नानोपरान्त वहाँ निर्मल तिलक लगावे ।
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चित्त में से सारे कलुषों को निकालने रूपी चौका लगावे और अहर्निश अनन्य अनुरागयुक्त राम-नाम का स्मरण करे । जो इस प्रकार से अपने घर रूपी घट को परमात्मा के लिये तैयार करता है उसमें निश्चय ही परमात्मा विराजमान होता है । शंख में हरि का नाम भरकर बजावे और उसी रामनाम के जप प्रभाव से स्त्रवित सुषुम्ना के अमृत जलरूपी चरणामृत का पान करे । लोभ, मोह, मद = अभिमान, मात्सर्य = चुगलखोरी को समाप्त करे ।
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सर्वप्रथम ही इन्हें अंतःकरण में न आने देने के लिये बाड़(कार = सीमा = बाड़) लगावे । भावभक्ति का भोग लगावे । इस भावभक्ति रूपी प्रसाद को ही परमात्मा ग्रहण करता है ।
“न देवो विद्यते काष्ठे न पाषाणे न मृण्मये ।
भावो हि विद्यते देवो तस्माद् भावो हि कारणं ॥”
बषनांजी कहते हैं, जब उक्त प्रकार से सारी सामग्री तैयार हो जाये = साधना हो जाये तब सचराचर में ही परमात्मा के दर्शन होना प्रारम्भ हो जाता है ॥९३॥