🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷*卐 श्री दादूदयालवे नम: 卐*🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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*समता के घर सहज में, दादू दुविध्या नांहि ।*
*सांई समर्थ सब किया, समझि देख मन मांहि ॥*
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*अथ अध्याय ७*
*बाईजी श्यामकुमारीजी की परम्परा*
श्यामकुमारी(रूपकुमारी) जी का स्थान बाईजी की पालकां व पालिकां के ऊपर के दो मंजिल दो मकानात् भी हैं । आपके शिष्य बालवेणी जी थे-"श्री बाईजी रूपकुमारी के बालवेणि पिख" रा. भक्तमाल मू. ६५७ में लिखा है । आपकी परम्परा का मुख्य स्थान वर्तमान में चोकड़ी(शेखावाटी) में है और वर्तमान में अलखरामजी की इंगरी के नाम से प्रसिद्ध है ।
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वि. सं. १७७६ के लगभग नारायण दादूधाम बाईजी की पालकां के संत चेतनदासजी और उनके शिष्य क्षेमदासजी भ्रमण करते हुये चौकड़ी पधारे थे और चौकड़ी से दक्षिण तालाब पर हनुमानजी के स्थान पर विराजे थे । दोनों ही गुरु शिष्य भजनानन्दी विरक्त महात्मा थे । चौकड़ी ग्राम से एक समय मध्यदिन में भिक्षा ले आते थे और भोजन करके भजन करते रहते थे ।
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उक्त प्रकार भिक्षा से निर्वाह करते हुये ६ मास उस स्थान पर भजन करते रहे । गुरु चेतनदासजी तो वृद्ध थे, वे तो स्थान पर ही बैठकर भजन करते रहते थे । क्षेमदासजी ही भिक्षा लाते और कभी इधर उधर घन्टा दो घन्टा भ्रमण करने भी निकल जाते थे । एक दिन घूमते हुये एक छोटी सी पहाड़ी के पास जा पहुँचे । उसके सघन वृक्षों को देखकर प्रसन्न हुये और ऊपर चढ़े तो एक छोटा-सा हनुमानजी का मंदिर दीख पड़ा । हनुमानजी को प्रणाम करके क्षेमदासजी वहां ही हनुमानजी के पास ही बैठकर भजन करने लगे ।
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थोड़ी ही देर में उनको राम राम की ध्वनि सुनाई देने लगी किन्तु ध्वनि करने वाला कोई भी नहीं दीख पड़ा । तब क्षेमदासजी ने प्रार्थना की- भगवन् ! राम राम की ध्वनि करने वाले आप कौन महानुभाव हैं, कृपा करके दर्शन दीजिये । क्षेमदासजी की उक्त प्रार्थना पर वहां क्षेमदासजी के सामने ही एक संत प्रकट हो गये । उनके एक हाथ में एक रोटी थी और दूसरे हाथ में जल का कमंडलु था । उनका दर्शन होते ही क्षेमदासजी ने उनको सत्यराम बोल- कर प्रणाम किया।
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फिर उन संतजी ने कहा- क्षेमदास ! अब तुम यहां पर रह कर भजन करो । मैंने यहां साढे तीन सौ वर्ष रहकर भगवद् भजन किया है । अब मैं यहां से जाऊंगा । क्षेमदासजी उक्त सिद्ध संत का वचन सुनकर बोले- भगवन् ! मेरे गुरुदेव वृद्ध हैं और भ्रमण भी करते रहते है । अतः मैं उनकी सेवा को छोड कर यहां कैसे रह सकता हूँ । सिद्ध संतजी ने कहा- गुरुजी को भी यहां ही रख कर सेवा करो । अब तुमको यहां ही रहना होगा । सिद्ध संतजी का अति आग्रह देखकर क्षेमदासजी ने संतजी की बात मानली । तब सिद्ध संत ने अपने हाथ की रोटी क्षेमदासजी के हाथ में दे दी ।
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क्षेमदासजी ने इस रोटी का चौथा भाग तो वहां बैठी हुई चिड़िया आदि पक्षियों को दे दिया और शेष रोटी के दो भाग सिद्ध संतजी का प्रसाद मानकर स्वयं पा गये एक भाग रख लिया । तब सिद्ध संत ने कहा- जैसे तुमने रोटी चिड़िया आदि पक्षियों को दे कर खाई है, वैसे ही तुम्हारे शिष्य प्रशिष्य परोपकार भी करते रहेंगे । और तुमने दो भाग खाये वैसे ही तुम्हारे शिष्य प्रशिष्य खाते पीने रहेंगे और तुमने एक भाग बचा कर रख लिया है, वैसे ही तुम्हारे स्थान में कमी नहीं आयेगी किन्तु विशेष श्रीमान् भी नहीं होंगे ।
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इतना कहकर सिद्ध संत वहां ही अन्तर्धान हो गये । फिर क्षेमदासजी हनुमानजी को प्रणाम करके अपने विश्राम स्थान की ओर चल दिये और गुरुजी के पास जाकर उक्त सब घटना सुनादी । तब गुरुजी ने कहा- ठीक है सिद्ध संत ने आज्ञा दी है तो वहां अवश्य निवास करना ही चाहिये । फिर क्षेमदासजी ने अपने पास आने वालों को कहा कि हम उस हूं'गरी पर निवास करेंगे । अतः उस पर हनुमानजी के मंदिर के पास एक फूस की इनती बड़ी कुटिया बनवादी जाय जिसमें हम गुरुजी के साथ आराम से निवास कर सकें ।
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भक्तों ने उनकी इच्छानुसार कुटिया तैयार करवा दी फिर क्षेमदासजी अपने वृद्धगुरु चेतनदासजी को लेकर डूंगरी पर चले गये और वहां ही रहकर भजन करने लगे । यहां भी अपना निर्वाह भिक्षावृत्ति से ही करने लगे । उक्त प्रकार श्यामकुमारी बाईजी की परम्परा चौकड़ी की डूंगरी पर गई । श्यामकुमारीजी के खास शिष्य का नाम बालवेणि था । चेतनदासजी तो पौत्र शिष्य ही होंगे इसका पूर्ण निर्णय नहीं हो सका है । भक्तमाल में खास शिष्य का नाम बालवेणि ही दिया है ।
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उक्त प्रकार डूंगरी पर निवास करके भजन करते हये वि. सं. १७०८ में चेतनदासजी महाराज ब्रह्मलीन हो गये । कुछ दिन के पश्चात् क्षेमदासजी के एक शिष्य हुये, उनका नाम सुखरामजी रक्खा गया । वे भी अपने दादा गुरु चेतनदासजी तथा गुरु क्षेमदासजी के समान भजनानन्दी महात्मा हुये । उक्त तीनों संतों ने ही अपना मन ईश्वर भजन में लगाया था, अन्य कुछ भी नहीं किया था। कारण वे तीनों विरक्त थे ।
(क्रमशः)
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