शनिवार, 24 अक्टूबर 2026

*हरिदासजी(हापा)*

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🌷*卐 श्री दादूदयालवे नम: 卐*🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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*दादू साधन सब किया, जब उनमन लागा मन ।*
*दादू सुस्थिर आत्मा, यों जुग जुग जीवैं जन ॥*
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*मोतीदासजी*
घाटड़े की शाखा रूप स्थान बलदेवगढ़ के बावड़ी वाले स्थान के साधु मोतीदासजी को एक दिन एक गुप्त संत के दर्शन होने से सहसा वैराग्य हो गया । तब उन्होंने अपने भाई हनुमानदासजी को कहा— अब मैं सब कुछ छोड़कर एकान्त स्थान में ही बैठूंगा । फिर वे ग्राम के स्थान के एक कमरे में प्रविष्ट हो गये । अपनी शरीर संबंधी सभी क्रिया वहां ही करते थे । किसी से विशेष बात नहीं करते थे निरंतर भजन ही करते थे । कोई उनके पास आ भी जाता तो कह देते थे ‘दादूराम करो ।’ उक्त प्रकार उनका कार्यक्रम निर्विघ्न १४ वर्ष चलता रहा ।
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फिर उन्होंने अपने साधन धाम पर एक सत्संग सम्मेलन करवाया । संतों के भजन बोलने वाले संतों को निमंत्रण देकर बुलवाये । भक्तों को भी सत्संग सम्मेलन की सूचना दी । रात्रि को बहुत अच्छा जागरण हुआ । प्रातः दादूवाणी की पूजा आरती आदि कार्य किये सब के भोजन करने के पश्चात् सब आये हुये संतों को भेंट देकर कहा— अब आपको मेरी यह अन्तिम सत्यराम ही समझ लेना चाहिये । फिर तो मिलन हो या नहीं भी हो, अब मेरा शरीर केवल तीन मास ही रहेगा ।
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संतों ने भी समझ लिया कि भजनानन्दी संत हैं । इनको देहान्त के समय का ज्ञान हो गया है । फिर उन्होंने ठीक तीन मास होने पर वि. सं. २०३१ ज्येष्ठ सुदि ६ को देहत्याग दिया । आप अच्छे भजनानन्दी संत थे । आपकी समाधि बलदेवगढ़ में बावड़ी वाले स्थान में है । श्रद्धालु भक्त आप की समाधि को मानते हैं और भावनानुसार लाभ भी प्राप्त करते हैं । उक्त प्रकार प्रहलाददास जी और उनकी घाटड़ा की शिष्य परम्परा का जो परिचय प्राप्त हो सका है, वह यहां अंकित कर दिया गया है । इति श्री द्वितीय अध्याय समाप्त: २
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*अथ अध्याय ३*
*हरिदासजी(हापा)*
हरिदासजी हापा पूर्वाश्रम में आमेर नरेश भगवतदासजी के छठे पुत्र थे । १- मानसिंह २- माधवसिंह ३-सूरसिंह ४-वनमाली ५-कान्हा ६-हरिसिंह हापा थे । हरिसिंहजी हापाजी के नाम से अधिक प्रसिद्ध थे । जब दादूजी राहोरी पधारे थे तब दादूजी के दर्शन करने हापाजी भी राहोरी गये थे । ऐसा भी उल्लेख कहीं-कहीं मिलता है । ये कूर्मवंशी हापाजी जब बालक थे तब भी इनका व्यवहार वृद्धों के समान था । इन में हंसी करना आदि चपलता तो लेश मात्र भी नहीं थी ।
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फिर ये प्रहलाददासजी के शिष्य होकर हरिदास हो गये थे तब तो गुरुदेव प्रहलाददासजी के उपदेश के अनुसार साधन करके अपने कुल, कर्म, संपत्ति, बल आदि का अभिमान छोड़कर शम दम द्वारा मन इन्द्रियों को रोककर निरंतर हरि स्मरण ही करते रहते थे । इन्होंने गुरुवर प्रहलादजी के द्वारा प्राप्त योग युक्ति से मोक्ष पद को प्राप्त करने का अच्छा प्रयत्न किया था । इन्होंने निरन्तर निदिध्यासन करके ज्ञान प्राप्त कर लिया था । उस ज्ञान से अपने हृदय के अज्ञान को नष्ट करके अपनी वृत्ति को ब्रह्म स्वरूप में ही स्थिर रखते थे । कुछ ही वर्षों में हरिदासजी उच्च कोटि के संत हो गये थे । इन हरिदासजी के सेवक विशेष करके- कछवाहा, खींची, चौहान आदि क्षत्रिय ही अधिक थे ।
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*आमेर पधारना*
शनै: शनै: आपके अनेक शिष्य हो गये थे । ये आमेर नरेश के पुत्र होने पर भी सब भोगों का त्याग करके संत बने थे । अत: उनका वैराग्य साधना और शील स्वभाव आदि को देखकर स्वत: ही लोगों की रुचि इनका सत्संग करने की होती थी । इससे इनके शिष्य तथा अनेक सेवक साथ रहते थे । उस मंडल के सहित ही आप जहां तहां पवित्र स्थानों में भ्रमण करते रहते थे ।
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शिष्य होने के १२ वर्ष पश्चात् भ्रमण करते हुये अपनी जन्म भूमि आमेर के पास आ गये थे । अत: शिष्य मंडल के सहित जन्म भूमि का दर्शन करने आमेर पधारे । दिल्ली दरवाजे के पास के बाग में ठहरे । कथा, कीर्तन, सत्संग होने लगा । नगर की जनता सत्संग का लाभ लेने लगी । उस समय हरिदासजी के शिष्य(भक्त माल के कर्ता) राघवदासजी कथा करते थे ।
“शिष्य प्रशिष्य जन संग बहु, हरि आये आमेर ।
कथा दास राघव करे, सकल ज्ञान धन लेर ॥” वंशदीपिकाप्र. ५।
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फिर आमेर नरेश मानसिंह को ज्ञात हुआ कि-मेरे लघु भ्राता हरिसिंह हापा हरिदास बनने के पश्चात् प्रथम बार ही आमेर में आये हैं तब मानसिंह उनके दर्शन करने बाग गये । पास जाकर प्रणाम की । सत्यराम बोलकर फिर सामने बैठ गये । मानसिंह ने हरिदासजी का त्याग प्रत्यक्ष देखा । वे शरीर आच्छादन के लिये साधारण वस्त्र धारण किये हुये थे । उनके मस्तक पर साधन जन्य ब्रह्मतेज चमक रहा था । वाणी में अति मधुरता थी, स्वभाव परम शांत था, वे निरंतर हरि स्मरण कर रहे थे, प्रत्येक शब्द बोलते थे, तब ॐ हरि, राम आदि ईश्वर के नाम साथ बोलते ही थे । राजा मानसिंह को अपने लघु भ्राता का तप तेज देखकर अति प्रसन्नता हुई ।
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फिर आमेर नरेश मानसिंह ने हरिदासजी को नम्र भाव से प्रार्थना की—भगवन्! कुछ दिन अपने शिष्य मंडल के सहित राजभवन में विराज कर राजभवन के सभी प्राणियों को सत्संग का सुख प्रदान करें । कारण राजभवन की महिलायें यहां आपका सत्संग करने प्रतिदिन नहीं आ सकतीं हैं । आप राजभवन में विराजेंगे तब सभी को प्रतिदिन सत्संग का आनन्द प्राप्त होगा । राज परिवार आपके दर्शनों की इच्छा कर रहा है । अत: आप हम सब पर अनुग्रह करके अवश्य कुछ दिन राजभवन में विराजें ।
(क्रमशः)

*४९. भ्रम विधवंस कौ अंग ४५/४८*

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*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
*श्रद्धेय श्री Tapasvi @Ram Gopal Das की प्रेरणा से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Meta AI*
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*४९. भ्रम विधवंस कौ अंग ४५/४८*
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*बांम बिराजै बांम हरि, अबिगत परसै आइ ।*
*कहि जगजीवन तहां मिलि, तेज पुंज रन थाइ ॥४५॥*
जब हृदय में बांम यानी भक्ति रूपी वामा विराजती है, और बांम हरि यानी वामा सहित हरि, भक्ति सहित भगवान, दोनों हृदय में विराज जाते हैं, तब क्या होता है । तब अबिगत, जो आज तक कभी गत में नहीं आया, जो इन्द्रियों से परे है, ऐसा परमात्मा आकर परसै, स्पर्श करता है । जगजीवन कहते हैं, तहां मिलि, वहीं पर जीव और ब्रह्म का मिलन होता है, और तेज पुंज रन थाइ, वहाँ एक तेज का पुंज प्रकट हो जाता है, और साधक की सुरति वहीं थम जाती है, ठहर जाती है ।
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*तेज पुंज तन तेज मन, तेज सुरति अंग तेज ।*
*कहि जगजीवन तेज जन, तेज पुंज की सेज ॥४६॥*
जब उस तेज पुंज का दर्शन होता है, तब साधक की क्या दशा होती है, यह इस साखी में बताते हैं । उसका तन भी तेजमय हो जाता है, मन भी तेजमय हो जाता है, सुरति भी तेजमय हो जाती है, और अंग-अंग तेजमय हो जाता है । रोम-रोम में प्रकाश भर जाता है । जगजीवन कहते हैं, वह तेज जन, यानी तेज को प्राप्त हुआ जन, तेज पुंज की सेज पर ही विश्राम करता है । अब वह माया की सेज पर नहीं सोता, वह परम प्रकाश की सेज पर सोता है, उसी में जागता है ।
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*कहि जगजीवन अम्रित है मरै नहीं तन सोध ।*
*अम्रित भगति करि ऊधरै, रांम लहै परमोध ॥४७॥*
जगजीवन साहब कहते हैं, यह जो तेज पुंज है, यह जो राम नाम है, यही अमृत है । यह मरता नहीं है, यह अविनाशी है । पर लोग इसको बाहर खोजते हैं, जगजीवन कहते हैं तन सोध, अपने ही तन में, अपने ही शरीर में खोजो । यह अमृत तुम्हारे अंदर ही है । जो अमृत भगति करता है, यानी इस अमृत रूपी राम की भक्ति करता है, वह ऊधरै, यानी संसार से उद्धार पा जाता है, तर जाता है । और उसको रांम लहै परमोध, राम के परम बोध की प्राप्ति हो जाती है, उसे परम ज्ञान मिल जाता है ।
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*कहि जगजीवन अमर रहै, अमर रांम रटि जागि ।*
*अमर संजीवनि रस, अमर पिवै जन लागि ॥४८॥*
अंतिम साखी में फल बताते हैं । जगजीवन कहते हैं, जो अमर राम को रट कर जाग जाता है, जो सोते हुए संसार से जागकर राम नाम में लग जाता है, वह स्वयं अमर रहता है, उसको फिर मृत्यु नहीं मारती । अमर संजीवनि रस, जो मृत को भी अमर कर दे, ऐसा यह राम नाम रूपी रस है । इसको अमर पिवै जन लागि, अमर जन ही पीते हैं । जो राम में लग गए हैं, वही इस रस के अधिकारी हैं, और पीकर वे भी अमर हो जाते हैं ।
(क्रमशः)

शुक्रवार, 23 अक्टूबर 2026

*२९. साधु महिमा का अंग ~३७/३९*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*२९. साधु महिमा का अंग ~३७/३९*
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*स्वर्ग लोक साधु सदन, वेत्ता१ वैकुण्ठ थान ।*
*रज्जब अज्जब ठौर ये, जहां भजन भगवान ॥३७॥*
साधक संत का स्थान स्वर्ग लोक है, ज्ञानी१ संत का स्थान वैकुण्ठ है, जहां भगवान का भजन होता है वे ये उक्त स्थान बड़े अदभुत हैं ।
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*हरि मंदिर साधु हृदय, जहां रहे निज अंग१ ।*
*सो चित्त चित्रशाला बनी, कवि कह सके न रंग ॥३८॥*
संत का हृदय ही हरि मन्दिर है, जहां अपने प्रिय१ परमात्मा रहते हैं, वह सन्त का चित्त जैसे कोई विचित्र चित्रशाला बनी हो ऐसा अनुपम दिखाई देता है, उसका प्रेमरूप रंग कुशल कवि भी नहीं कह सकता ।
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*चौदह विद्या चतुर ही, दहणारथ१ दे२ धाय३ ।*
*साधन कष्ट सभी करे, पर साधु हुआ न जाय ॥३९॥*
मनुष्य चौदह विद्याओं में भी चतुर हो जाता है, दहनार्थ१ अर्थात शरीर को जलाने के लिये भी दौड़३ लगाता२ है, अन्य भी सभी सभी साधन जन्य कष्ट सहन कर लेता है किन्तु उससे सन्त नहीं बना जाता ।
इति श्री रज्जब गिरार्थ प्रकाशिका सहित “२९. साधु महिमा का अंग” समाप्त ॥
(क्रमशः)

गुरुवार, 22 अक्टूबर 2026

*२९. साधु महिमा का अंग ~३३/३६*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*२९. साधु महिमा का अंग ~३३/३६*
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*लेखे१ में सब आइया, जे कछु उपज्या आय ।*
*रज्जब राम अलेख हैं, अरु साधु लिख्या न जाय ॥३३॥*
जो कुछ भी सृष्टि में उत्पन्न होकर दृष्टि में आये हैं, उन सबका यश लिखने१ में आ गया है किन्तु राम और साधु इन दोनों की महिमा अलेख है अर्थात इनका यश पूर्ण रूप से लिखा नहीं जाता ।
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*रज्जब अगह अगाध अंग१, सांई साधु दोय ।*
*और सु बंधे बंदि में२, चौरासी लख जोय ॥३४॥*
चौरासी लक्ष योनियों में जो भी उत्पन्न हुये हैं वे सभी तो सीमा के बंधन२ में बंधे हुये हैं अर्थात उनके गुण तथा यश पूर्ण रूप से कहे जा सकते हैं किन्तु परमात्मा और संत इन दोनों के लक्षण१ अन्य से ग्रहण नहीं किये जाते तथा दोनों की महिमा भी अगाध है ।
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*वृक्ष बीज वसुधा पड़हिं, बीज रहै वपु जाय ।*
*सत्य साधु गति१ शक्ति२ त्यों, नर देखो निरताय३ ॥३५॥*
वृक्ष और बीज दोनों पृथ्वी पर पड़ते हैं, उनमें वृक्ष तो नष्ट हो जाता है किन्तु बीज रह जाता है, वैसे ही हे नरो ! विचार३ करके देखो, सच्चे संत की मुक्ति१ होने पर भी उनकी ज्ञान२-शक्ति ग्रन्थों द्वारा पृथ्वी पर रह जाती है ।
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*अनेकों मिल एक की, सरभरि१ करी न जाय ।*
*रज्जब साधु सूर सम, पर नक्षत्र निरताय२ ॥३६॥*
संत सूर्य के समान हैं, अन्य नर अन्य नक्षत्रों के समान हैं, विचारों२ जैसे अनेक नक्षत्र मिलकर एक सूर्य के बराबर नहीं हो सकते, वैसे ही अनेक नर मिलकर भी एक संत की समता१ नहीं कर सकते ।
(क्रमशः) 

*२९. साधु महिमा का अंग ~२९/३२*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*२९. साधु महिमा का अंग ~२९/३२*
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*शुक्र सूर विधु१ वृहस्पति, पंचम धू दिशि देख ।*
*वन्दनीक२ सब वन्दिये, अचला चलन विशेष ॥२९॥*
शुक्राचार्य, सूर्य, चन्द्रमा१, वृहस्पति और पंचम ध्रुव की ओर देखो, जो अचल है और शेष चार चलने वाले हैं किन्तु इनमें न्यूनता-विशेषता नहीं सभी पूजनीय२ हैं, सभी को प्रणाम करना चाहिये । संत सभी समान हैं ।
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*साधु सूरज सारिखे१, दृष्टि इष्ट संग देश ।*
*रज्जब रार्यों राजवी२, जहां करहि परवेश ॥३०॥*
साधु और सूर्य समान१ हैं, साधु की दृष्टि अपने ईष्ट परमात्मा के संग और सूर्य की दृष्टि अस्ताचल प्रदेश के साथ लगी रहती है किन्तु फिर भी संत और सूर्य जहां भी प्रवेश करते हैं वहां ही नेत्रों२ को आनन्दित करते हैं । संत ज्ञान नेत्रों को भी खोलते हैं, यह उनमें विशेषता है ।
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*समझे सोने१ सारिखे, सो महँगे महि माँहिं ।*
*रज्जब प्यारे पुहमि२ पर, जहां जगत में जाँहिं ॥३१॥*
पृथ्वी१ में ज्ञानी२ संत सोने के समान हैं, सोना कम होने से महंगा है वैसे ही ज्ञानी कम होने से महंगे हैं । सोना और संत पृथ्वी पर प्यारे ही लगते हैं किन्तु संत तो जगत् में जहां भी जाय वहां सभी को प्यारा लगता है ।
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*साधु उदय सूरज कला१, गुण तारे तम नाश ।*
*रज्जब रारि२ खुलैं सबै, चखि चेतन३ परकाश ॥३२॥*
साधु का जन्म सूर्य की प्रकाश शक्ति१ के समान है, जैसे सूर्य के प्रकाश से तारे और अँधेरे का अभाव हो जाता है और नेत्र२ सबके खुलकर देखने में समर्थ होते हैं, वैसे ही सन्त के संग से आसुर गुण और अज्ञान का नाश हो जाता है तथा ब्रह्म के ज्ञान प्रकाश द्वारा ज्ञान-नेत्र३ खुलकर सत्या-सत्य को देखने में समर्थ होते हैं ।
(क्रमशः)

*घाटड़ा में संत दर्शन*

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*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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*दादू खालिक खेलै खेल कर, बूझै बिरला कोइ ।*
*लेकर सुखिया ना भया, देकर सुखिया होइ ॥*
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*घाटड़ा में संत दर्शन*
१- घाटड़ा धाम में कभी २ गुप्त संतों के दर्शन भी होते रहते हैं । वि . सं . १९७९ में पर्वत पर सुन्दरदासजी प्रहलाददासजी के भजनाश्रम(भैंड़ी) पर एक बुढ़िया माता को एक दिव्य संत का दर्शन हुआ था । फिर उस बुढ़िया ने ग्राम में आकर कहा था । तब आस पास के ग्रामों के बड़े बूढ़े लोगों ने कहा था— वे भैंड़ी वाले महाराज सुन्दरदासजी ही थे । जिनके पुण्य होते हैं उनको वे दर्शन दे देते हैं । दादूजी महाराज ने भी सुन्दरदासजी को कहा था— ‘‘पुण्यवान को दर्शन देना’’ ।
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२- वि . सं . २०१५ की घटना है— जयसिंह पुरा का कल्याणा नामक मीणा एक दिन चातुर्मास के समय में प्रहलाद शाल में रह गया था । रात्रि के समय प्रहलाददासजी महाराज के स्नान की शिला जो प्रहलाद शाल के उत्तर पूर्व की छत्तर के साईवान के नीचे एक छोटी चबूतरी पर है उसकी पूजा भी होती है दीपक भी जलाया जाता है । उधर से उसको दो संत आते दिखाई दिये । उनको आते देखकर उसने अपना मुख अपनी धोती से ढक लिया । एक संत ने उसके खड़ाऊ की ठोकर मारकर कहा— चल दे यहां से ।
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वह उठकर भागा और महन्तजी की खटिया में उलझकर गिरा । उसके पड़ने के शब्द से महन्तजी जाग गये । उसने महन्तजी को उक्त घटना सुनाई । महन्तजी ने कहा— तू कोई बुरे विचार कर रहा था क्या ? उसने कहा— हां । उस समय मेरे मन में बुरी बातें ही उठ रही थीं । महन्तजी ने कहा— यह तो महात्मा की तपोभूमि है । इसमें भजन करने वाला शुद्ध विचारों का व्यक्ति ही रह सकता है । जहां उसके खड़ाऊ की ठोकर लगी थी वहां भयंकर दर्द होने लगा । वह अलवर के अस्पताल में गया किन्तु वहां के इलाज से भी ठीक नहीं हुआ । १५ वें दिन उसी खड़ाऊ की चोट के दर्द से उसकी मृत्यु हो गई थी । उक्त घटना से सूचित होता है कि प्रहलाद शाल और उसके द्वार वाले तिवारे में कुविचारों वाला नहीं रह सकता है ।
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३- एक दिन घनश्यामदास को समाधि के तिवारे में एक भूरी लटुरिया वाला संत दंडवत करता हुआ मिला । उनकी दंडवत होने के पश्चात् घनश्यामदास ने उन संतजी को प्रणाम करके भोजन करने के लिये प्रार्थना की । संतजी ने कहा— अभी कोई विशेष आवश्यकता नहीं है । घनश्यामदास ने आग्रह पूर्वक कहा— विशेष नहीं तो भी जितनी आवश्यकता हो उतना ही पाने की कृपा करें । घनश्यामदास ने बहुत आग्रह किया तब वे उनके साथ-२ चले । मार्ग में गुल्लीदंडा खेलने वालों की ओर घनश्यामदास की दृष्टि गई । उसी समय संत वहां ही अंतर्धान हो गये । फिर उनका कहीं भी पता नहीं लगा ।
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४- वि . सं . १९६० में उदयपुर जमात के मनीरामजी के अखाड़ा के सांडकोटड़ा के स्थान के नारायणदासजी ने अपनी इच्छा पूर्ति पर प्रहलाद शाल के पीतल के पत्र युक्त कपाट चढ़ाये थे और तीन ओर चद्दर के साईवान लगाये थे । इससे सूचित होता है कि घाटड़ा धाम की भावना रखने पर कामनायें भी पूर्ण होती हैं ।
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५- वि . सं . २०२४ की घटना— *मृतक भी जीवित* घाटड़े के बोदन कुम्हार की पत्नी रामप्यारी का बच्चा जिसकी अवस्था १२ मास से कम ही थी, एक दिन सहसा मर गया । रामप्यारी की दादूजी महाराज पर अटूट श्रद्धा थी । वह जैसे बच्चा मरने पर मातायें रोती हैं, वैसे रोई तो नहीं और शव को लेकर दादूजी महाराज का ध्यान करती हुई प्रहलाद शाल पर आई ।
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प्रहलाद शाल(दादू वाणी मंदिर) के द्वार पर बैठकर यह बोलते हुये ‘‘दादूजी महाराज ! यह बच्चा आपका ही है और आपका ही रहेगा, आप इसे जीवित कर दें’’ शव को प्रहलाद शाल के भीतर रख दिया । इस समय महन्तजी प्रहलाद शाल के पीछे बगीचे के कूप पर थे । उन्होंने यह सुना तब वे आये और देखा बच्चे का शव शाल में पड़ा है और रामप्यारी बाहर ध्यानस्थ है । महन्तजी ने कहा— बाई ! जीवित को लाकर रखती तब तो ठीक था । अब मृतक को लाकर शाल में पटकने से क्या लाभ है ?
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यह सुनकर भी रामप्यारी कुछ नहीं बोली— वह तो दादूजी का ध्यान कर रही थी । उक्त प्रकार लगभग २० मिनट रामप्यारी के ध्यानस्थ रहने पर बच्चा सहसा जीवित हो गया । फिर रामप्यारी का ध्यान टूटा । उसने बच्चे को जीवित देखा और दादूजी महाराज की जय बोलकर बच्चे को उठा लिया । फिर प्रणामादि करके घर को लौट गई । अब वह बच्चा लगभग ९ वर्ष का है, अच्छी स्थिति में है । बोदन का परिवार दादूजी महाराज को ही मानता है, अन्य देवी देवताओं को नहीं मानता ।
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६- देवादास जी के साथी एक कूबड़दासजी महात्मा थे, ये भी उच्च कोटि के संत थे । उनकी कुटिया प्रहलादशाल के पीछे के बाग के कूप के पास छोटी सी पक्की बनी हुई है और अभी तक अच्छी स्थिति में है । भक्त लोग अपनी इच्छा पूर्ति के लिये— देवादासजी व कूबड़दासजी की सवामणी बोलते हैं और इच्छापूर्ण हो जाने पर करते हैं । उसे भण्डारा बोलते हैं । इस से सूचित है वे कूबड़दासजी भी अच्छे संत थे ।
(क्रमशः)

*४९. भ्रम विधवंस कौ अंग ४१/४४*

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*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
*श्रद्धेय श्री Tapasvi @Ram Gopal Das की प्रेरणा से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Meta AI*
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*४९. भ्रम विधवंस कौ अंग ४१/४४*
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*गए आए आए गए, रहे रांम ल्यौ लाइ ।*
*कहि जगजीवन रांमरत, रांमहि मांहि समाइ ॥४१॥*
सारे बाहरी धर्मों के झंझट को छोड़ कर, एक ही सच्चा धरम धारण करो - हृदय में राम के गुण गाना । शास्त्रों के विधि-निषेध यह करो, वह मत करो - की माया को त्याग दो । संत जगजीवन जी कहते हैं बस उसी एक को भजो ।
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*सकल धरम परिहरि धरम, रांम ह्रिदै गुण गाइ ।*
*बिधि५ निसेध माया तजै५, जगजीवन भजि ताहि ॥४२॥*
(५-५. बिधि निसेध माया तजै=व्रतों के विषय में शास्त्रों में कथित नियम एवं अपवाद का भ्रम त्याग कर)
सारे बाहरी धर्मों के झंझट को छोड़ कर, एक ही सच्चा धरम धारण करो - हृदय में राम के गुण गाना । शास्त्रों के विधि-निषेध यह करो, वह मत करो - की माया को त्याग दो । संत जगजीवन जी कहते हैं बस उसी एक को भजो ।
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*सकल साध सिध देव मुंनि, नांम दिढावैं रांम ।*
*कहि जगजीवन रांम रटि, सरि आवै सब कांम ॥४३॥*
सभी साधु, सिद्ध, देवी-देवता और मुनिजन यही कहते हैं कि राम-नाम को हृदय में दृढ़ कर लो । संत जगजीवन जी कहते हैं - रामनाम रटते रहने से सब काम सध जाते हैं, सँवर जाते हैं ।
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*कांम सरै करतार भजि, नांउ ठिकाणैं रांम ।*
*कहि जगजीवन रांम घरि, सेज बिराजै बांम६ ॥४४॥*
(६. बांम=स्व पति से बाम भाग में बैठने के कारण स्त्री को ‘वामा’ कहा जाता है) 
सारे काम सृष्टि के रचने वाले करतार को भजने से ही सँवरते हैं, और जीव का सच्चा ठिकाना-आश्रय केवल राम-नाम है । संत जगजीवन जी कहते हैं - जो जीवात्मा रूपी वामा - सुहागिन - राम के घर में रहती है, वह ही प्रेम की सेज पर शोभती है, धन्य होती है ।
(क्रमशः) 

*महन्त लच्छीरामजी*

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*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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*रहै नियारा सब करै, काहू लिप्त न होइ ।*
*आदि अंत भानै घड़ै, ऐसा समर्थ सोइ ॥*
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उक्त प्रकार देवादासजी की अनेक घटनायें घाटड़ा में प्रसिद्ध हैं । वि. सं. १९६९ आसोज वदि १० को संत देवादासजी घाटड़ा में ही ब्रह्मलीन हुए थे । देवादासजी के स्मारक चरण चिन्ह समाधि के तिवारे की एक ताक में हैं । उक्त सं. चरणों पर अंकित है । अभी भी उनके ऊपर जनता श्रद्धा रखती है । दो नागे साधु अलवर राज्य की पर्वतमाला से घाटड़ा जा रहे थे । एक दिन पहाड़ी के मार्ग में उनके सामने सिंह आ गया और मार्ग रोककर खड़ा हो गया ।
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साधुओं ने भयभीत होकर देवादासजी महाराज का स्मरण करके प्रार्थना की कि -- हे देवादासजी महाराज ! इस सिंह से बचाइये । प्रार्थना करते ही तत्काल वह सिंह जैसे कान पकड़ कर हटाया गया हो वैसे हट गया । मार्ग छोड़कर पर्वत पर चढ़ गया । कहा भी है -
‘‘दूर देश से भी भले, रक्षा भक्त करन्त ।
देवादास के नाम से, हटा सु सिंह तुरन्त ॥३६१॥ ह. त.६’’
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*महन्त लच्छीरामजी*
घाटड़ा के महन्त लच्छीरामजी अच्छे विद्वान् संत थे । शांत स्वभाव के थे । मेरा राम भी एक समय ग्रीष्म ऋतु में महन्त लच्छीरामजी के पास घाटड़ा में रहा था । वे अच्छे महन्त थे । एक दिन अलवर नरेश जयसिंह जी प्रहलादशाल व महन्तजी के दर्शन करने बिना सूचना दिये ही अकस्मात आ गये थे । उस समय द्वार के गोखड़े पर बैठे हुये देवादासजी ‘‘देव तुम्हारा भेव न जाने’’ बोल रहे थे । राजा ने स्वयं ही उनसे पूछा - महन्तजी कहां हैं ? देवादासजी ने कहा - यहां ही हैं, भीतर ही नारड़े नाथ रहे हैं । फिर आगे जाकर राजा ने आसन पर विराजे हुये महन्तजी के दर्शन किये । प्रणाम करके सामने बैठ गये ।
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फिर बोले महाराज आप के द्वार के गोखड़े पर एक कौपीन मात्र लगाये हुये साधु बैठा था । उससे मैंने पूछा - महन्तजी कहां हैं ? तब उस साधु ने कहा - यहां ही हैं, भीतर ही नारड़े नाथ रहे हैं । किन्तु आप तो आसन पर विराज रहे हैं । साधु को अपने पूज्य महन्त की झूठी बुराई तो नहीं करनी चाहिये । राजा का उक्त वचन सुनकर महन्त लच्छीरामजी ने कुछ मौन के पश्चात् कहा -- वे उच्च कोटि के संत हैं, दूसरे के मन की बात जान जाते हैं । उन्होंने झूठी बुराई नहीं करी है, सत्य ही कहा है -- मेरे मन में अभी यही बात थी कि नारड़े बहुत उपद्रव करने लग गये हैं । अतः इनके नाथ डालनी ही पड़ेगी । उन्होंने मेरी मन की उक्त बात जानकर ही आप को कहा है । वह सत्य है मिथ्या नहीं है ।
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राजा यह सुनकर देवादासजी से अति प्रभावित हुआ । फिर महन्त जी ने राजा को उचित उपदेश दिया । राजा ने देखा संतों के गायें बहुत हैं, अतः इनके पास गोचर भूमि भी बहुत होनी ही चाहिये । फिर अलवर नरेश जयसिंहजी ने बहुत सी गोचर भूमि का पट्टा करके महन्तजी के पास भेज दिया । महन्त लच्छीरामजी घाटड़ा में ही ब्रह्मलीन हुये थे । उनकी चरण चौकी में वि . सं . १९९१ फागुण सुदि ८ मी अंकित है ।
(क्रमशः)

*४९. भ्रम विधवंस कौ अंग ३७/४०*

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*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
*श्रद्धेय श्री Tapasvi @Ram Gopal Das की प्रेरणा से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Meta AI*
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*४९. भ्रम विधवंस कौ अंग ३७/४०*
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*कहि जगजीवन गया२ की, संगति गया बिलाइ ।*
*पिंड भरण तीरथ गया, रह्या न हरि गुन गाइ ॥३६॥*
(२. गया की=गया तीर्थ जाने वाले की)
संत जगजीवनदास जी चेताते हैं - जो व्यक्ति गया तीर्थ जाकर पिंड भरने के चक्कर में पड़ गया, वो सत्संगति से गया-बिलाया, अर्थात सत्संग से चूक गया, खो गया । वो गया तो पिंड भरने तीर्थ को, पर हरि के गुण गाना ही छोड़ बैठा । तीर्थ से बड़ा तो हरि का गुणगान है ।
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*अंबु अनल उतपति इष्ट, हरि निज राखै मांहि ।*
*कहि जगजीवन रांम रस, ता थैं प्रापति नांहि ॥३७॥*
जो इष्टदेव जल और अग्नि से उत्पन्न हैं - यानी पत्थर की मूर्ति या तत्वों से बने हैं, उनको हरि ने अपने भीतर ही रखा हुआ है । संत जगजीवन जी कहते हैं - उन बाहरी इष्टों से राम-रस की प्राप्ति नहीं होती, राम-रस तो भीतर है ।
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*जीवन साध तजि, तीरथ गया अग्यांन ।* 
*तिन कै पाछै जे गया, तिन का कैसा ग्यांन ॥३८॥*
जिसने अपने जीवन की सच्ची साधना - हृदय में राम को भजना - छोड़ दिया और केवल तीर्थों में भटकने को ही धर्म मान लिया, वह अज्ञान है । संत जगजीवन जी कहते हैं - अज्ञानी के पीछे-पीछे चलते हैं, उनके ज्ञान का तो कहना ही क्या ।
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*संकर ल्यंग३ मूरति सुधर४, अलह अलख नहिं दोइ ।*
*कहि जगजीवन बंदगी, दिल अंदर करि जोइ ॥३९॥*
(३. संकर ल्यंग=शिवलिंग की मूर्ति)   (४. मूरति सुधर=कुशल कारीगर द्वारा भले प्रकार से बनायी गयी मूर्ति)
चाहे सुन्दर कारीगर से बनी हुई शंकर जी के लिंग की सुन्दर मूर्ति हो, और चाहे अलह-अलख कहा जाये - दोनों में कोई दोई नहीं है, दोनों एक ही साहिब के रूप हैं । संत जगजीवन जी कहते हैं - सच्ची बंदगी तो दिल के अंदर झाँक कर करने में है ।
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*सांचा साहिब एक है, ओ ही आप अलेख ।*
*कहि जगजीवन सेवि हरि, जा कै रूप न रेख ॥४०॥*
सच्चा साहिब तो एक ही है, वही स्वयं अलेख है - जो लिखा न जा सके । संत जगजीवन जी कहते हैं - उसी हरि की सेवा करो, जिसका कोई रूप-रेखा नहीं, जो निराकार है ।
(क्रमशः) 

बुधवार, 21 अक्टूबर 2026

देवादासजी सिद्ध पुरुष

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*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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*अन्तर सोई नीका जाणै,*
*निमिष न बिसरै ब्रह्म बखाणै ॥*
*सोई सुजाण सुधा रस पीवै,*
*दादू देखि जुग जुग जीवै ॥*
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एक समय अर्थ की न्यूनता से देवादास जी के गुरु भाई महन्त लच्छीराम जी चिन्तित थे । उनके मन की स्थिति जानकर देवादासजी ने महन्त जी को कहा- महन्तजी चिन्ता क्यों करते हो आप जितना भी खरीद सको उतना ही जीरा खरीद लो, उससे आपकी सब चिन्ता मिट जायगी । महन्त लच्छीरामजी तो जानते ही थे कि देवादासजी सिद्ध पुरुष हैं । इनकी वाणी यथार्थ ही होती  है । अतः उन्होंने अपनी शक्ति भर जीरा खरीद लिया । फिर उस वर्ष जीरा बहुत महंगा हो गया था । इससे एक ही वर्ष में महन्त लच्छीरामजी की चिन्ता नष्ट हो गई थी । कहा भी है-
"जान लेते हैं भविष्य भी, योगीजन अन्यास ।
देवादास ने महन्त की, सहज मिटाई त्रास ॥ह.त. १०॥
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देवादासजी आगामी बात पहले ही जान जाते थे यह अति प्रसिद्ध है । जब कोई संतों की मंडली आने वाली होती थी तो देवादासजी को ज्ञात हो जाता था कि अमुक मंडलेश्वर की मंडली आ रही है । तब वे महन्त जी के पास जा कर कहते- महन्त जी गेहूं दे दो । गेहूं खाने वाले महात्माओं की मंडली आ रही है जिससे पहले ही पीस कर आटा तैयार कर दिया जाय । महन्तजी दे देते थे कारण वे जानते थे कि इनको पहले ही पता लग जाता है संतोंकी सेवा करने से ही देवादासजी की दिव्य दृष्टि हो गई थी । कहा भी है-
"साधु सेवसे होत है, दिव्य दृष्टि सत बात ।
नाभा देव दास अरु, सन्त भक्त की ख्यात ॥३३०॥ह.त. ७॥
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देवादासजी जब गेहूं व जौ पीसते थे तब जिस मकान में पीसते थे उसका किवाड़ बन्द कर लेते थे । एक दिन किवाड़ बन्द करना भूल गये । द्वार खुला होने से एक संत उनके पास चले गये तो उन्होंने देखा देवादासजी तो ध्यानस्थ हैं और चक्की अपने आप ही फिर रही है । यह आश्चर्य देखकर संत महन्त जी के पास गये और महन्तजी से बोले- महाराज ! देवादासजी की पीसने की कुटिया खुली देखकर मैं उसमें गया तो मैंने देखा- देवादासजी तो चक्की से दूर बैठे हुये ध्यान में निमग्न हैं और चक्की अपने आप ही फिर रही है । तथा अपने आप उसमें गेहूं पड़ रहे हैं ।
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तब महन्त लच्छीरामजी ने स्वयं ही जाकर देखा तो वास्तव में ही चक्की अपने आप घूम रही है और आवश्यकतानुसार गाला(अन्न के दाने) भी अपने आप ही चक्की में पड़ते जाते हैं तथा सिद्ध संत देवादासजी दूर बैठे ध्यान कर रहे हैं । फिर महन्तजी ने उनका पीसना छुड़ा दिया । देवादासजी भिक्षा लेने जाते थे । वे एक दिन अपने काकी के घर भिक्षा लेने गये थे । देवादासजी को आया हुआ देखकर काकी ने कहा - नाज तो थोड़ा हुआ है और बोहरा अधिक मांगता है । बोहरा जितना मांगता है, उतना बोहरा को तोल दें तो खाने के लिये भी नहीं बचेगा ।
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यह सुनकर देवादासजी ने कहा- तू बोहरा को पूरा तोल दे, तेरे खाने के लिये रह जायगा । फिर उसने बोहरा को बुलवाकर वह जितना मांगता था उतना सब तोल दिया और अपने घर के खाने के लिये जितना १२ मास में चाहिये था वह भी सब अपनी मिट्टी की कोठली आदि सब भर गये किन्तु फिर भी वह अन्न राशि कम नहीं हुई उतनी की उतनी ही रही । तब काकी दौड़कर प्रहलादशाल पर आकर देवादास जी को बोली- देवला ! मैंने बोहरे को भी चुका दिया और १२ महिने घर में खाने के लिये भी बहुत रख लिया है किन्तु तो भी नाज की राशि कम नहीं होती है ।
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काकी की उक्त बात सुनकर देवादासजी बोले- उस अन्न राशि पर ऊंधा टोकरा लगा दे । फिर उसने उस अन्न पर ऊंधा टोकरा रख दिया और कुछ देर के पश्चात् उठा कर देखा तो एक दाना भी नहीं मिला । इससे सूचित होता है कि देवादासजी की आज्ञा में ऋद्धि सिद्धि भी रहती थीं किन्तु देवादासजी अपने लिये उनका कुछ भी उपयोग नहीं करते थे । देवादासजी तमाखू का डांड अपनी डाह में रखा करते थे । इससे वे तमाखू का डांड मांगा करते थे । एक दिन अपने पूर्वाश्रम के घर की बाई से उन्होंने तमाखू का डांड मांगा । बाई ने तत्काल लाकर दे दिया ।
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उससे प्रसन्न होकर देवादासजी ने कहा - बाई तेरे नवें महीने बेटा होगा । यह सुनकर बाई घबराई और बोली - बाबाजी ! मैं तो विधवा हूँ, मेरे लिये तो यह महा दुःख की बात है । देवादासजी ने कहा - बाई ! अब तो मेरे मुख से निकल गया, बेटा तो होगा ही । जब उसके गर्भ चिन्ह प्रकट हुए तब जाति वालों ने पंचायत की और उससे पूछा । तब वह संकट में पड़ गई किसका नाम बतावे ।
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देवादासजी को ज्ञात हुआ तो वे पंचायत की सभा में जाकर बोले - इस बाई का कोई दोष नहीं, यह तो मेरे राम के मुख से तेरे बेटा होगा यह निकल गया था । अतः इसे आप लोग जाति बाहर मत करो । देवादासजी को सब जानते ही थे कि ये सिद्ध पुरुष हैं इनके मुख से निकलने पर तो बात सत्य ही होती है । अतः उस बाई को जाति बाहर नहीं निकाला । इससे सूचित होता है कि देवादासजी का प्रभाव जनता पर अत्यधिक था ।
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एक दिन देवादासजी महन्तजी की घोड़ी को वन में छोड़ने को गये थे । वे उसे छोड़कर आये ही थे कि थोड़ी देर में घोड़ी स्थान पर पीछे आ गई । तब महन्तजी ने कहा - देवादासजी ! घोड़ी तो पीछे आ गई । इसको आगे छोड़कर आओ जिससे पीछे नहीं आवे । देवादासजी बोले - पीछे नहीं आवे ऐसे छोड़ आऊं क्या ? महन्तजी ने कहा - हां, ऐसे ही छोड़ आओ । फिर देवादासजी घोड़ी को छोड़कर आ गये । उस दिन घोड़ी लौटकर नहीं आई । उसे सिंह खा गया ।
(क्रमशः)

*४९. भ्रम विधवंस कौ अंग ३३/३६*

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*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
*श्रद्धेय श्री Tapasvi @Ram Gopal Das की प्रेरणा से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Meta AI*
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*४९. भ्रम विधवंस कौ अंग ३३/३६*
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*ए व्रत संजम ए क्रिया, ए सुच्या९ ए ग्यांन ।*
*जगजीवन निज निरखिये, अंतर गति धरि ध्यांन ॥३३॥*
{९ सुच्या=शुचि(तन मन की शुद्धि)}
संत जगजीवनदास जी कहते हैं, ये बाहरी व्रत, संयम, तरह-तरह की क्रियाएँ, तन-मन की शुचि और किताबी ज्ञान ये सब तभी सार्थक हैं, जब अपने निज स्वरूप को भीतर देखो । अंतर की गति में ध्यान धर के अपने आप को निरखो । बाहर का सब दिखावा भीतर के दर्शन के बिना व्यर्थ है ।
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*एक दस एकादसी, ए व्रत उत्तम सार ।*
*जगजीवन दूजी करै, सोई मूढ़ गंवार ॥३४॥*
वो जो एक में परमात्मा में दशा लग जाने वाली एकादशी है, वही व्रतों में सबसे उत्तम और सार है । संत जगजीवनदास जी कहते हैं, जो इस एक अनन्य व्रत को छोड़ कर दूसरी-दूसरी एकादशी केवल भूखे रहने वाली करता फिरता है, वो मूढ़ और गँवार ही है ।
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*जगजीवन निज निरजला, भजतां निरमल नांम ।*
*साधन१ का सांचा वरत, दुनियां का बेकांम ॥३५॥*
{१. साधन का=साधु सन्तों का}
संत जगजीवनदास जी कहते हैं, हमारा अपना सच्चा निरजला व्रत यही है कि निरमल नाम राम नाम को भजते रहें । साधु-संतों का यही सच्चा व्रत है । दुनिया के कहने के लिए किया गया भूखा रहने वाला व्रत तो बेकाम-बेकार है ।
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*कहि जगजीवन गया२ की, संगति गया बिलाइ ।*
*पिंड भरण तीरथ गया, रह्या न हरि गुन गाइ ॥३६॥*
(२. गया की=गया तीर्थ जाने वाले की)
संत जगजीवनदास जी चेताते हैं - जो व्यक्ति गया तीर्थ जाकर पिंड भरने के चक्कर में पड़ गया, वो सत्संगति से गया-बिलाया, अर्थात सत्संग से चूक गया, खो गया । वो गया तो पिंड भरने तीर्थ को, पर हरि के गुण गाना ही छोड़ बैठा । तीर्थ से बड़ा तो हरि का गुणगान है ।
(क्रमशः) 

मंगलवार, 20 अक्टूबर 2026

*२९. साधु महिमा का अंग ~२५/२८*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*२९. साधु महिमा का अंग ~२५/२८*
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*अकलि१ अल्प उनमान२ तुच्छ, जो कुछ कहै बनाय ।*
*रज्जब सांई साधु की, महिमा कही न जाय ॥२५॥*
ईश्वर और संत की महिमा कहते समय जो कुछ भी बनाकर कहा जाय, उसमें कहने वाले की बुद्धि१ अल्प और अनुमान२ भी तुच्छ ही सिद्ध होते हैं, कारण, ईश्वर और संत की महिमापूर्ण रूप से कथन नहीं की जा सकती ।
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*रज्जब महिमा साधु की, मोपै कही न जाय ।*
*आदि अंत मधि मांड में, जो निबहै इक भाय१ ॥२६॥*
जो संत जीवन के आदि, मध्य, अंत तक इस ब्रह्मांड में संतपने के भाव१ का एक रस निर्वाह कर लेता है, उस संत की महिमा मेरे से पूर्ण रूप से नहीं कही जा सकती ।
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*एक रंग राता रहै, दूजे रंग रुचि नाँहिं ।*
*जन रज्जब ता संत सम, को कहिये कल माँहिं ॥२७॥*
जो एक अद्वैत ब्रह्म-रंग में अनुरक्त रहता है, द्वैत रूप विषय-रंग की प्रीति जिसमें नहीं होती, उस संत के समान इस कलयुग में किस को कहा जा सकता है ? अर्थात उसके समान कोई नहीं है ।
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*बन्दे एक खुदाय के, आदि अंत मधि अब्ब ।*
*जन रज्जब मस्तक धरै, मन वच कर्म सौं सब्ब ॥२८॥*
सृष्टि के आदि काल के, मध्यकाल के, अन्त के और अब वर्तमान काल के ईश्वर के प्यारे संत सभी एक से हैं, हम तो मन, वचन और कर्म से सभी को मस्तक पर धारण करते हैं अर्थात शिरोमणि समझते हैं ।
(क्रमशः) 

*२९. साधु महिमा का अंग ~२१/२४*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*२९. साधु महिमा का अंग ~२१/२४*
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*नाम निनिमे१ के धरे, करी सु सेवा ठौर ।*
*ताथे रज्जब राम के, साधु सवा२ न और ॥२१॥*
नाम रहित१ निरंजन राम के नाम धरे है और निष्काम अवस्था रूप स्थान में स्थित रहकर भक्ति की है, इसलिये राम के प्रिय संत के चतुर्थाश२ के समान भी अन्य नहीं हो सकते हैं ।
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*रज्जब भक्त भण्डार में, राख्या नाँणा नाम ।*
*तो देखो भगवन्त घर, साधु शिरोमणि ठाम ॥२२॥*
संत ने अपने अन्त:करण रूप भण्डार में नाम रूप धन रक्खा है तब ही तो देखो, भगवान ने अपने संसार रूप घर में संत को सर्वशिरोमणी स्थान प्रदान किया है, अर्थात संत को अपना स्वरूप ही बताया है ।
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*व्योम विराजे धू धरे१, पाताल पन्नगपति२ संत ।*
*रज्जब मंडन३ मांड के, मन वच कर्म महंत४ ॥२३॥*
संत ध्रुव आकाश में विराजते हैं और संत शेषजी२ पाताल में रक्खे१ गये है, फिर भी हम मन, वचन कर्म से कहते हैं कि महान्४ संत सभी ब्रहमाण्ड के भूषण३ हैं, चाहे वे कहीं भी विराजें ।
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*मात मही मधि पैठि१ कर, सुमिरे शुकदेव शेष ।*
*रज्जब छिप्यों न वित२ छिपे, प्रकट भये सब देस ॥२४॥*
शुकदेव के माता के उदर में प्रवेश करके और शेषजी ने पृथ्वी में प्रवेश१ करके स्मरण किया, इस प्रकार छिपने पर भी उनका भजन-रूप धन२ नहीं छिप सका, वे दोनों विश्व में सभी देशों में प्रकट हो गये हैं ।
(क्रमशः)

*गुरुदेव का अंग~१, ४/६*

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*श्री दादूवाणी भावार्थ = Meta AI*
*गुरुदेव का अंग~१, ४/६*
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*दादू सतगुरु सहज में, किया बहु उपकार ।*
*निर्धन धनवंत करि लिया, गुरु मिलिया दातार ॥४॥*
सतगुरु का उपकार बिना किसी कठिन साधना के सहज में ही मिल गया । दादू जी कहते हैं, मैं ज्ञान और राम-नाम के धन से निर्धन था, सतगुरु ने कृपा करके मुझे उसी अविनाशी धन से धनवंत बना दिया । मुझे कोई साधारण गुरु नहीं, बल्कि सब कुछ लुटा देने वाले दातार मिल गये ।
*In effortless Sahaj, my Satguru blessed me so,*
*This pauper poor He made me rich with wealth that ever glows.*
In His natural grace, Satguru showered boundless grace. I was poor in spiritual wealth, He made me rich with Ram-Naam. I found the true Giver.(4)
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*दादू सतगुरु सूं सहजैं मिल्या, लिया कंठ लगाइ ।*
*दया भई दयाल की, तब दीपक दिया जगाइ ॥५॥*
सतगुरु सहज में ही मिल गये, कहीं खोजने नहीं जाना पड़ा । मिलते ही उन्होंने बड़े प्रेम से कंठ से लगा कर अपना बना लिया । जब उस दयालु की दया बरसी, तब मेरे भीतर का बुझा हुआ ज्ञान-दीपक फिर से जल उठा ।
*In Sahaj my Satguru met me, held me to His heart,*
*With Daya of the Dayal, He lit my darkened lamp.*
Satguru met me effortlessly and embraced me with love. When the Merciful One's grace descended, He lit the unlit lamp of knowledge within me.(5)
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*दादू देखु दयाल की, गुरु दिखाई बाट ।*
*ताला कूंची लाइ कर, खोले सबै कपाट ॥६॥*
दादू जी कहते हैं, जरा उस दयाल की दया तो देखो । दुनिया भटकाती है, पर गुरु ने मुझे परमात्मा तक जाने की सच्ची बाट दिखा दी । मेरे हृदय पर अहंकार और अज्ञान का ताला लगा था, गुरु नाम की कुंजी ले कर आये और सारे कपाट खोल दिये ।
*Behold the Dayal's grace, my Guru showed the Way,*
*He brought the Key and opened wide each bolted door and gate.*
Behold the grace of the Merciful! Guru alone showed the true inner Path. He brought the Key of Naam and opened all locked doors of my heart.(6)
(क्रमशः) 

*हरिचरणजी का सम्मान*

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*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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*कोई नहिं करतार बिन, प्राण उधारणहार ।*
*जियरा दुखिया राम बिन, दादू इहि संसार ॥*
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*हरिचरणजी का सम्मान*
घाटड़ा के महन्त हरिचरणजी को वि. सं. १९०९ के दादूद्वारा नारायणा के मेले में आचार्य नारायणदासजी महाराज ने जमात के पंचों के आग्रह से भेंट लेकर छड़ी रखने का अधिकार दिया था तथा जमातों के ११ अखाड़ों के महन्तों के समान ही घाटड़ा के महन्तों का सम्मान करना नियत किया था ।
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*हरिचरणजी के शिष्य*
महन्त हरिचरणदासजी घाटड़ा वालों के १९ शिष्य थे- देवादासजी, दोलजी, लच्छीरामजी आदि । दोलजी विरक्त हो गये थे । गिरधारीदासजी दूबल धनियां की मंडली में रहते थे । मंडलेश्वर जुगतरामजी के संरक्षक दोलजी ही थे । लच्छीरामजी हरिचरणजी की गद्दी पर विराजकर घाटड़ा के महन्त बने थे ।
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*सिद्ध संत देवादासजी*
महन्त हरिचरणदासजी घाटड़ा वालों के शिष्यों में देवादासजी महान् सिद्ध पुरुष हुये हैं । देवादासजी का जन्म घाटड़ा के ही कुंभावत कुल में हुआ था । जब वे बोलने लगे तब "अब बाबा के पग जाबा" यही सब दिन भर बोलते रहते थे । तब उनके घरवालों ने सोचा कि- यह बालक हर समय "अब बाबा के पग जाबा" ही बोलता रहता है, और इसकी चेष्टा भी अन्य बालकों से निराली ही है और महात्माओं की सी चेष्टा करता है । अतः हो सकता है, प्रारब्धवश किसी महात्मा ने ही हमारे कुल में जन्म लिया हो । इसलिये इसे महात्मा के ही भेंट कर देना चाहिये ।
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फिर घरवालों ने अपने देवला नामक उस बालक को घाटड़ा के महन्त हरिचरणजी को भेंट कर दिया । महन्त हरिचरणजी ने देवला को अपना शिष्य बना कर नाम देवादास रख दिया । देवादास अपने गुरुदेव हरिचरणजी से दादूवाणी में कथित निर्गुणराम की निर्गुण भक्ति की पद्धति जान कर निरन्तर निगुणाराम का भजन करने लगे । अब उन्होंने 'अब बाबा के पग जाबा'' बोलना तो छोड़ दिया था और उसके स्थान में ''देव तुम्हारा भेव न जाने'' यह दिन भर बोलते रहते थे । और भजन करते थे ।
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जब कुछ बड़े हो गये तब हाथ में टोकरी लेकर 'देव तुम्हारा भेव न जाने'' बोलते हुये कंड़े चुनने जंगल में चले जाते थे । कंडे चुनते जाते थे और ''देव तुम्हारा भेव न जाने'' बोलते जाते थे । टोकरी कंडों की भर जाती थी तब ''देव तुम्हारा भेव न जाने'' बोलते हुये कंडों की टोकरी सिर पर धर कर स्थान में लाकर डाल देते थे । कभी-कभी कंडों की टोकरी भर जाती और उनको आगे जाने की इच्छा होती तो टोकरी के कंडे पृथ्वी पर डाल कर टोकरी खाली कर लेते और वहाँ से आगे चलने लगते तब बोलते- इन कंडों को कोई भी उठायेगा तो उसको बिच्छू काट खायेगा । उनके कंडे कोई भी नहीं उठाता था । वे ''देव तुम्हारा भेव न जाने'' बोलते हुये जहां तक उनकी इच्छा होती वहाँ तक जाकर लौट आते और कंडे सब लाकर स्थान में डाल देते । गाय भैंसों का गोबर भी आप ही थापते थे ।
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और कुछ बड़े हो गये तब आटा पीसने की सेवा भी करने लगे थे । आप शरीर पर कौपीन मात्र ही वस्त्र रखते थे । आगामी घटनाओं को भी पहले ही जान जाते थे । वि. सं. १९१९ में महन्त हरिचरणजी का चातुर्मास उदयपुर जमात में था । देवादास जी भी साथ ही थे । एक दिन देवादासजी ने महन्त जी से कहा आज अपनी घाटड़ा की प्रहलाद शाल के पीछे से दीवार तोड़कर चोर घुस गये हैं । तब महन्तजी कुछ चिन्ता करने लगे तो देवादास जी ने कहा- चिन्ता की कोई बात नहीं है, चोर अन्धे हो गये हैं, उनको निकलने का मार्ग नहीं मिल रहा है । प्रातः काल स्थान के संरक्षक उनको पकड़ कर अपना सब माल उनसे ले लेंगे । अपना कुछ भी नहीं जायगा ।
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दीवार तोड़ी है उसको भी वे ही बना देंगे और भविष्य में स्थान में चोरी नहीं करने की शपथ भी ले लेंगे । वे जाति के मीणे थे । भविष्य में मीणा जाति का कोई मनुष्य इस स्थान में चोरी नहीं करेगा । यह प्रतिज्ञा जब करी तब उनको पूर्ववत दीखने लगा था । फिर वे मंदिर में प्रणाम करके अपने घरों को लौट सके थे । फिर हरिचरणजी ने एक साधु को भेज कर समाचार मंगवाये तो देवादासजी की सब बात सत्य निकली थी ।
(क्रमशः)

*४९. भ्रम विधवंस कौ अंग २९/३२*

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*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
*श्रद्धेय श्री Tapasvi @Ram Gopal Das की प्रेरणा से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Meta AI*
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*४९. भ्रम विधवंस कौ अंग २९/३२*
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*जलमइ५ सकल सरीर ये, जल ही मांही बास ।*
*कहि क्यों रहिये निरजला, सु कहि जगजीवनदास ॥२९॥*
{५. जलमइ=जलमय(जलयुक्त)} 
संत कहते हैं कि यह हमारा सारा शरीर ही जल से बना है । खून, पसीना, रस सब जल ही है । और हमारा वास भी जल में ही है - माता के गर्भ में हम जल में ही रहे । फिर हे साधक ! तू बाहर से पानी न पीने का दिखावा करके कैसे निरजला रह लेगा ? शरीर का धर्म तो जल से ही है । असली निरजला तो मन का होना चाहिए ।
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*एक जला इक निरजला, सरवर६ मद्धि निवास ।*
*क्यूं व्रत निबहै क्यों रहै, सु कहि जगजीवनदास ॥३०॥*
{६. सरवर=सरोवर(तालाब)}
जैसे एक ही तालाब में दो पक्षी रहते हैं - एक जल में डुबकी लगाता है(जला) और एक किनारे बैठा पानी से दूर रहता है(निरजला) । वैसे ही इस संसार रूपी सरोवर में दो तरह के साधक हैं । एक तो संसार के भोग रूपी जल को पीता है, दूसरा कहता है मैं निरजला व्रत हूँ । पर दोनों रहते तो इसी सरोवर में ही हैं । जगजीवनदास जी पूछते हैं - जब रहना यहीं है तो तेरा ये बाहरी व्रत कैसे निभेगा ? मन तो अभी यहीं अटका है ।
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*हरिजल पीवत निरजला, जे व्रत धारै कोइ ।*
*कहि जगजीवन तहँ, पलटि देवगति होइ ॥३१॥*
सच्चा निरजला व्रत वो है । जो व्यक्ति हरि नाम रूपी जल को पीता है, हरि के प्रेम रस को पीता है, और संसार के जल से - काम, क्रोध, लोभ से - निरजला रहता है । जो ऐसा व्रत धारण करता है, जगजीवनदास जी कहते हैं, उसकी पलट कर देवगति हो जाती है, अर्थात वो मनुष्य से देवता के समान पवित्र हो जाता है ।
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*एक दसा७ एकादसी८, के करि जांणैं कोइ ।*
*जगजीवन सौ पलटि करि, जीव ब्रह्म तहां होइ ॥३२॥*
{७. एक दसा=एक अनन्या(प्रेमा) भक्ति की अवस्था में}
(८. एकादसी=निर्जला एकादशी व्रत)
एकदशा माने एक अवस्था - जब मन एक ही परमात्मा में टिक जाए, अनन्य प्रेम की दशा बन जाए । यही सच्ची एकादशी है । इस भेद को कोई बिरला ही जानता है । जगजीवनदास जी कहते हैं, जो इस एकदशा में पलट कर - अर्थात संसार से उलट कर भीतर मुड़ जाता है, वहीं जीव ही ब्रह्म हो जाता है ।
(क्रमशः)

सोमवार, 19 अक्टूबर 2026

*गुरुदेव का अंग~१, १/३*

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*श्री दादूवाणी भावार्थ = Meta AI*
*गुरुदेव का अंग~१, १/३* 
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*दादू नमो नमो निरंजनं, नमस्कार गुरुदेवत: ।* 
*वन्दनं सर्व साधवा, प्रणामं पारंगत: ॥१॥*                                
दादू जी महाराज सबसे पहले उस निरंजन - माया से परे, निर्मल परमात्मा को बार-बार नमस्कार करते हैं । फिर अपने गुरुदेव को नमस्कार करते हैं, जिन्होंने निरंजन का मार्ग दिखाया । फिर सब संत-साधुओं की वंदना करते हैं, और उन सिद्ध पारंगत जनों को प्रणाम करते हैं जो भवसागर से पार हो गए हैं । यह दादू पंथ की विनम्रता की परम्परा है - पहले प्रभु, फिर गुरु, फिर सब संत ।
*I bow, O bow to the Formless, Pure,*
*Salutations to Gurudev, divine and sure.*
*I venerate all saints so true,*
*Pranams to those who the Beyond broke through.(1)*
Dadu Ji first bows again and again to Niranjan - the pure Lord beyond Maya. Then he offers salutations to his Gurudev, who showed him the path to that Niranjan. Then he bows to all Sadhus and saints, and offers pranam to the Parangat - those enlightened souls who have crossed the ocean of existence. This shows the humility of Dadu Panth - first God, then Guru, then all saints.
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*परब्रह्म परापरं, सो मम देव निरंजनं ।*
*निराकारं निर्मलं, तस्य दादू वन्दनं ॥२॥*
वो परब्रह्म जो पर से भी परे है - परापर है, वही मेरा देव निरंजन है । वो आकार से रहित है - निराकार है, और माया-मल से रहित - निर्मल है । दादू जी कहते हैं, मैं उसी को वंदन करता हूँ । मेरा इष्ट कोई देवी-देवता नहीं, बल्कि वह निर्गुण, निराकार, निर्मल तत्व ही है ।
*Supreme Beyond, the Highest Light,* 
*He is my Lord, Stainless, Bright.* 
*Formless, Immaculate, ever free,* 
*To Him, Dadu bends in reverie.(2)* 
That Parabrahma who is beyond the beyond - Parapar, He alone is my God, Niranjan. He is without any form - Nirakar, and without any impurity - Nirmal. Dadu says, I bow only to Him. My beloved deity is not any limited form, but that formless, pure, supreme essence itself. 
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*दादू गैब मांहिं गुरुदेव मिल्या, पाया हम परसाद ।*
*मस्तक मेरे कर धर्या, देख्या अगम अगाध ॥३॥*
दादू जी कहते हैं - दादू जी महाराज अपने सद्गुरु की प्राप्ति और उनके फल का वर्णन कर रहे हैं - जब मैं अनजान अवस्था में था, तब अकस्मात् ही, गैब से - यानी अलौकिक रूप से गुरुदेव ने मुझे दर्शन दिये । उन्होंने बड़े प्रेम से मेरे मस्तक पर अपना वरद-हस्त रखा । उनकी इस कृपा से मुझे उनका दिव्य प्रसाद प्राप्त हुआ । उन्होंने मुझे उस अगम, अगाध स्वरूप का दर्शन कराया - जो मन और इन्द्रियों से परे है, जो निर्गुण और अपार है ।
*In the Unseen, my Gurudev came to me,* 
*And blessed me with His grace so free.* 
*He placed His hand upon my head,* 
*And showed me Depths where none have led -* 
*The Unreachable, the Fathomless spread.(3)* 
Dadu Ji Maharaj describes the attainment of his Sadguru and its divine fruit -When I was in an innocent state, suddenly, out of the Unseen - in a miraculous, divine way - Gurudev appeared before me. With great love, He placed His blessed hand upon my head. By His grace, I received His divine Prasad. He initiated me and showed me the vision of that Form - which is beyond mind and senses, attributeless(Nirguna), and infinite. 

*घाटड़ा की महन्त परंपरा*

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🌷*卐 श्री दादूदयालवे नम:  卐*🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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*सगुणा गुण केते करै, निगुणा न मानै एक ।*
*दादू साधू सब कहैं, निगुणा नरक अनेक ॥*
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*घाटड़ा की महन्त परंपरा*
१- सुन्दरदासजी बड़े २-प्रहलाददासजी ३- केशवदासजी ४- गरीबदासजी
५- मानदासजी ६- हरिभक्तजी ७- जयरामदासजी ८- रामदासजी ९- रामगोपालजी १०- हरिचरणजी ११- लछीरामजी १२- आशारामजी वर्तमान में हैं । 
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*महन्त रामदासजी*
वैसे तो केशवदासजी आदि घाटड़ा के महन्त सभी उच्चकोटि के संत हुये हैं किन्तु रामदासजी विशेष रूप से सिद्ध पुरुष हुये हैं । रामदासजी ने ही रामपुरा में रामशाला बनवाई थी । कारण- जयपुर नरेश की दी हुई भूमि रामपुरा में ही थी । अतः वहां रामशाला बनवाने की आवश्यकता थी । रामपुरा में गुसांइयों का मठ था उसमें कुछ गुसांई रहते थे । वे गुसांई रामदासजी से कुछ छेड़छाड़ करते रहते थे । 
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रामदासजी उच्च कोटि के सन्त थे । अत पहले तो कुछ समय तक उनके आघातों को सहन करते रहे किन्तु उनकी सहन शक्ति को उन गुसांइयों ने उनकी कमजोरी मानकर के अधिक गड़बड़ की तब रामदासजी ने उनको गधा बनाकर मठ से बाहर निकाल दिया था । रामपुरा घाटड़ा आदि आम पहले जयपुर राज्य के ही थे । अलवर राज्य की स्थापना लगभग २२५ वर्ष पहले प्रतापसिंहजी ने की थी । अब प्रतापसिंहजी की सातवीं पीढ़ी है । प्रतापसिंहजी के वंशज अलवर नरेश दादूजी के विशेष रूप से भक्त रहे हैं । 
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*महन्त हरिचरणजी*
घाटड़ा के महन्तों में महन्त हरिचरणजी भी ख्याति प्राप्त महन्त हुए हैं । इन्होंने घाटड़ा की प्रहलादशाल तथा घाटड़ा की शाखा रूप अन्य ११ राम-शालाओं के कुंडे मंत्र दिये थे । उनको धोकर वह जल देने से मानवों तथा पशुओं के भी नजर आदि अनेक रोग दूर होते हैं । वे १२ यूँ हैं- १- घाटड़ा २- बलदेवगढ़ ३- गोलाकावास ४- बरकड़ी ५- रोडिरहडिया ६- तिलवाड़ा ७- खोह ८- द्वन्दपुरी ९- कोटड़ी रामपुरा १०- मलारणा ११- लोकली(सिकराय केपास) १२- कागोता ।
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प्रहलाददासजी के समय घाटड़ा में ३५० कोटड़ियां धीरावत ठाकुरों की थीं । वे सभी प्रहलाददासजी महाराज की कृपा से संतों की सेवा में लग गये थे, किन्तु भक्तों की सन्तानें ही आगे चलकर महन्त हरिचरणजी के समय तक भक्ति विहीन होकर संतों की विरोधी बन गई थीं । घाटड़े में बसन्त पंचमी पर मेला भरता था । 
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उस समय संत बहुत आते थे । अतः आश्रम की छत पर भी चढ़ते थे । इससे घाटड़े के जो अश्रद्धालु धीरावत ठाकुर थे एक मेले के समय महन्त हरिचरणजी से बोले-साधु छत पर नहीं चढ़ने चाहिये । साधु छत पर चढ़ते हैं तब हमारी ठकराणियां संकोचवश कोटड़ियों के चौक में नहीं निकल सकती हैं । तब महन्त हरिचरणजी ने कहा- प्रथम तो मातायें संतों से संकोच करती ही नहीं हैं । कारण- संत तो उनको माता के रूप में देखते हैं और मातायें भी संतों को पिता तुल्य देखती हैं । 
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ऐसी स्थिति में संकोच का काम ही क्या है? फिर भी संकोच करती हैं तो मेला तो चार दिन का है । मेले के चार दिनों में बाहर चौक में नहीं निकलें । मेले के दिनों में हम किस २ को कहें । अधिकतर अनजान ही आते हैं और हम यहां के निवासी सब आने वालों की भोजनादि सेवा में लगे रहते हैं । अतः इस बात का विशेष ध्यान हर समय कैसे रह सकेगा । महन्तजी ने उचित ही कहा था किन्तु उन प्रमादी ठाकुरों ने महन्तजी की बात पर कुछ भी ध्यान नहीं दिया और मदिरा पान करके मंदिर के द्वार पर आकर बोले-नहीं मानता है तो इस दूंदल्या महन्त की दूंद(मोटा पेट) फोड़ दो । 
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यह सुनकर महन्त हरिचरणजी ने कहा- अब या तो यहां पर आप लोग ही रहेंगे या संत ही रहेंगे । तुम्हारे पूर्वजों ने श्रद्धा पूर्वक लाकर घाटड़ा में संतों को बसाया था और तन मन धन से संतों की सेवा की थी किन्तु उन भक्तों की ही संतानें अब संतों से ईर्ष्या करने लगी हैं । तब ऐसी स्थिति में संत कैसे रहेंगे¹, किन्तु फिर भी मुझे विश्वास है कि संतों के सहायक भगवान् हैं । इससे संतों का आप कुछ भी नहीं बिगाड़ सकेंगे । 
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आप लोग ही यहां से चले जायेंगे और नहीं जायेंगे वे नष्ट हो जायेंगे । संत यहां ही रहेंगे और छत पर भी चढ़ेंगे । फिर महन्त हरिचरणजी की भविष्य वाणी सर्वथा सत्य ही हो गई । प्रहलाददासजी के समय धीरावतों की ३५० कोटड़ियां घाटड़े में थीं किन्तु अब एक भी नहीं है । विशेष तो वहां से उठकर चले गये और कोई रह गये तो उनका वंश नष्ट हो गया । अब वहां धीरावतों की स्मृति दिलाने वाला उनकी कोटड़ियों का मुख्य द्वार खड़ा है और कुछ भी नहीं है । संतों से ईर्ष्या का परिणाम ऐसा ही होता है ।
(क्रमशः)

*४९. भ्रम विधवंस कौ अंग २५/२८*

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*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
*श्रद्धेय श्री Tapasvi @Ram Gopal Das की प्रेरणा से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Meta AI*
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*४९. भ्रम विधवंस कौ अंग २५/२८*
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*कहि जगजीवन रांम बिन, बात न पूछै कोइ ।*
*ताथैं हरि भजि प्रीति सौं, सांई सनमुख होइ ॥२५॥*
जगजीवन साहेब कहते हैं कि राम नाम के बिना इस संसार में जीव की कोई बात नहीं पूछता, कोई कीमत नहीं है । जैसे बिना आत्मा के शरीर की कोई कीमत नहीं, वैसे ही राम नाम बिना सारे तीर्थ व्यर्थ हैं । इसलिए प्रीति और प्रेम से हरि को भजो, सच्चे प्रेम से भजन करने पर सांई यानी स्वामी खुद तुम्हारे सामने आ जाते हैं । भगवान को प्रेम प्यारा है, तीर्थ नहीं ॥२५॥
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*जगजीवन तीरथ सकल, रांम नांम मंहि जांण ।*
*पूरण२ ब्रह्म पिछांणिये, हरि भजि वो मति आंण२ ॥२६॥*
(२-२. पूरण ब्रह्म.....आंण...ब्रह्मसाक्षात्कार हो सके=ऐसे ज्ञान की प्राप्ति का प्रयास कर)
जगजीवन जी कहते हैं कि सारे तीर्थों को राम नाम में ही समाया हुआ जानो । जो फल अड़सठ तीर्थों में मिलता है, वह एक राम नाम में मिल जाता है । इसी राम नाम के भजन से पूरण ब्रह्म की पहचान होती है । इसलिए हे मन, ऐसी बुद्धि ला, ऐसी मति ला, कि तू सदा हरि को ही भजे, और किसी भ्रम में न पड़े ॥२६॥
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*नित प्रति घर घर निरजला३, प्रेम न पीवहि पूरि ।*
*जगजीवन सूकै सकल, वो जल इन थैं दूरि ॥२७॥*
(३. निरजला=निर्जला एकादशी व्रत)
लोग रोज घर-घर में निर्जला व्रत रखते हैं, पूरे दिन पानी भी नहीं पीते, शरीर को सुखाते हैं, पर प्रेम का पूरा जल नहीं पीते । जगजीवन जी कहते हैं कि प्रेम के बिना सब साधना सूखी है, जैसे बिना पानी के खेत सूख जाता है । वह असली प्रेम रूपी जल इन बाहरी सूखे व्रतों से बहुत दूर है । सच्चा व्रत तो प्रेम से भीगना है, देह को सुखाना नहीं ॥२७॥
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*जगत जला४ जन निरजला, व्रत सुमिरन वेसास ।*
*पारंगति परमारथी, सु कहि जगजीवनदास ॥२८॥*
(४. जला=नष्ट हुआ)
एक ओर सारा जगत विषय-वासना की आग में जला हुआ है, दूसरी ओर जन यानी साधक कहलाने वाले लोग निर्जला व्रत और केवल बाहरी सुमिरन के वेश पर विश्वास रखे बैठे हैं । जगजीवनदास जी कहते हैं कि सच्चा पारंगत और सच्चा परमार्थी वह है जो इन दोनों से पार चला जाए । जो न तो विषयों की आग में जले, न केवल बाहरी वेश में उलझा रहे, बल्कि भीतर के प्रेम तत्व को पहचान ले, वही पार होता है ।
(क्रमशः)

*२९. साधु महिमा का अंग ~१७/२०*

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*🌷卐 सत्यराम सा 卐🌷*
साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*२९. साधु महिमा का अंग ~१७/२०*
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*साधों के हित सृष्टि यहु, सिरजी सिरजनहार ।*
*यथा पिता पुत्रहु निमित्त, श्रम१ करहिं संसार ॥१७॥*
संसार में जैसे पिता पुत्र के लिये परिश्रम१ करता है, वैसे ही सृष्टिकर्त्ता ईश्वर ने यह सृष्टि संतों के लिये ही रची है, सृष्टि बिना संत सेवा कैसे होती ?
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*खलक१ मुलक२ खेती करी, खालिक३ खसम सु साथ ।*
*ता में कण जण नीपजे, हरि हाली के हाथ ॥१८॥*
संसार१ रूप देश२ अर्थात खेत में साधन रूप खेती करी है, संसार का कर्त्ता३ स्वामी ब्रह्म भी व्यापक होने से तथा प्रतिक्षण चिन्तन होने से साथी ही है, जैसे खेत में हाली के हाथ से अन्नकण उत्पन्न होकर प्राणियों के पोषक होते हैं, वैसे ही हरि के कृपा-रूप से संसार में संत उत्पन्न होकर संसार को सुखद होते हैं ।
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*भजन भूमि जन कन उदय, समा१ धणी२ के होय ।*
*यहु खेती सुखदाय की, बूझे विरला होय ॥१९॥*
भूमि में अन्न कण उत्पन्न होते है तब भूमि के स्वामी२ के लिये अच्छा समय१ होता है, वैसे ही भजन से संत उत्पन्न होते हैं तब वह समय प्रभु को प्रिय होता है, भजन - भूमी में उत्पन्न होने वाली संत-रूप खेती महान् सुखप्रद होती है, किन्तु उस सुख को कोई विरला ही समझ पाता है ।
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*भक्त भेंट भगवन्त है, जे कुछ हरि घर माँहिं ।*
*परि बन्दा१ पैठा बन्दगी, सु कछू कबूले२ नाँहिं ॥२०॥*
जो भी कुछ हरि के घर में है, वह सभी कुछ भगवान संत को भेंट रूप में देने को तैयार हैं, किन्तु संत१ तो भगवान की भक्ति में स्थित है अन्य कुछ स्वीकार२ नहीं करता ।
(क्रमशः)