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🌷*卐 श्री दादूदयालवे नम: 卐*🌷
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*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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*दुर्बल देही निर्मल वाणी, दादू पंथी ऐसा जाणी ।*
*काहू जीव विरोधे नांही, परमेश्वर देखे सब माँही ॥*
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एक समय दुष्काल के कारण ग्राम की जनता अन्न की कमी से ग्राम छोड़ कर जाने लगी थी । दयालु संत राघवदासजी ने जनता को कहा—जाओ मत सब लोग भंडार से अन्न ले आओ, बनाकर पावो, भगवान् का भजन करो, कहीं मत जावो । भगवान् ने राघवदासजी टेक की रखी । नया अन्न न आने तक उनका भंडार सब ग्राम को अन्न देता रहा था । कहा भी है—
जन सेवा में भक्त जन, करत नहीं संकोच ।
राघवदास ने ग्राम को, अन्न दिया तज सोच ॥२७१॥दृ.त.९
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एक समय राघवदासजी ने ब्रह्म भोजन दिया था । जीमने वालों की संख्या बढ़ जाने से घृत की कमी आ गई । मालपुओं की तई चल रही थी । पंक्तियां भी बैठी जीम रही थीं । घृत शीघ्र प्राप्त नहीं हो सका । अत: राघवदासजी स्नान के तालाब से जल के पीपे भर लाये और घृत के स्थान में तई में डाल दिये । वह जल घृत बन गया । फिर घृत आने पर जितने पीपे तालाब से लाकर तई में डाले थे तालाब में उतने ही पीपे घृत के डाल दिये । इससे सूचित होता है कि भक्तों के कार्य में जल भी घृत का काम कर देता है । कहा भी है-
भक्त जनों के कार्य में, जल भी दे घी काम ।
राघवदास के ताल जल, बना सु घृत अभिराम ॥३६४॥दृ.त.९
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राघवदासजी महाराज के तप तेज व परोपकारादि दिव्य गुणों से प्रभावित होकर तत्कालीन करौली नरेश उनको करौली ले गये थे तथा करौली में ही निवास स्थान बनवाकर उसमें विराजने की प्रार्थना की थी और निर्वाह के लिये भूमि भेंट की थी । कुछ समय आप विराजे भी थे । उदेई भी जाते थे और रहते भी थे । राघवदासजी ब्रह्मलीन उदेई ग्राम में ही हुये थे । उनकी समाधि उदेई में ही है । राघवदासजी की समाधि उदेई ग्राम में श्वेत चबूतरे के नाम से प्रसिद्ध है ।
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राघवदासजी अच्छे विद्वान और कवि थे । उनकी रचना से ही ज्ञात होता है कि वे कवि गुणों से विभूषित थे । उन्होंने अपने दादा गुरु प्रहलाददासजी की प्रेरणा से भक्तमाल की रचना की थी । प्रेरणा में कारण था - नाभाजी ने सगुण उपासक वैष्णवों की कथा ही भक्तमाल में दी थी । यह देखकर प्रहलाददासजी ने सोचा भक्त तो सगुण और निर्गुण दोनों प्रकार के ही होते हैं । अतः दोनों ही प्रकार के भक्तों की कथा भक्तमाल में होनी चाहिये ।
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ऐसा विचार करके अपने पौत्र शिष्य राघवदासजी को आज्ञा दी कि - तुम ऐसी भक्तमाल की रचना करो जिसमें निर्गुण ब्रह्म के भक्तों तथा सगुण ब्रह्म के भक्तों की कथायें हों । वे भक्त चाहे किसी भी संप्रदाय के हों व किसी भी जाति के हों, किसी भी देश के हों, किसी भी भेष के हों । सभी प्रकार के पक्ष का त्याग करके भक्तों की कथायें उसमें दो । राघवदासजी ने अपने दादा-गुरुजी की आज्ञा मानकर सभी की कथायें अपनी भक्तमाल में दी हैं । उनके समय तक जो भक्त हुये हैं और जिनको वे जान सके उनको अपनी भक्तमाल में स्थान दिया है ।
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यही बात निम्न कवित्त में है-
"अग्र गुरु नाभाजी को आज्ञा दीन्ही कृपा कर,
प्रथम ही साखी छप्पै कीन्ही भक्तमाल है ।
तैसे प्रहलादजी विचार कहा राघोजी से,
करो संत-श्रावली सु बात ये रसाल है ॥
लिई मान करी जान धरे ध्यान भक्त सब,
निर्गुण सगुण षट् दरशन विशाल है ।
साखी छप्पै मनहर इन्दव अरिल्ल चौपै,
निसानी सवैया छंद जानयौ हंसाल है ॥"
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उक्त कवित्त इन राघवदासजी की भक्तमाल के पद्य टीकाकार चतुरदासजी की रचना का ६३१ वां मनहर कवित्त है । उक्त विवरण के अनुसार राघवदासजी ने ऐसी ही भक्तमाल रची । नाभाजी की भक्तमाल में समास व्यास से लगभग चार सौ भक्तों की कथायें हैं किन्तु राघवदासजी की भक्तमाल में समास व्यास से लगभग १२ सौ भक्तों की कथायें हैं । अतः राघवदासजी की भक्तमाल नाभाजी की भक्तमाल से तिगुनी बड़ी है । यह समास से मंगलदासजी जाखल की ढांणी वालों ने सुन्दरोदय के छप्पै में "जनयश" से सूचित किया है । छप्पै का अगला पद 'बारसी सहस रवि" से सूचित किया है कि - इन राघवदासजी की वाणी १२ हजार है । इसलिये अब उनकी रचना का परिचय भी यहां दिया जाता है ।
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*राघवदासजी की वाणी*
राघवदासजी की वाणी के *साखी भाग* में अंग ५८ हैं और साखी तथा अन्य चौपाई आदि *छोटे पद्य* १७२३ हैं । *अरिल्ल ग्रंथ* में १७ अंग हैं और ३७० अरिल्ल हैं, अरिल्ल ग्रंथ में ३६ चौपाई भी हैं । *पद भाग* की ३० रागों में १७९ गेय पद हैं । उत्पत्ति स्थिति चितावनी ग्रंथ में चार सौ के लगभग पद्य हैं । *लघु ग्रंथ* १- सवैया ग्रंथ- इसमें ६ अंगों में ७१ सवैयै हैं । *कवित्त ग्रंथ*- इसमें १३ अंगों में १२५ के लगभग कवित्त हैं । ३- गुरु शिष्य संवाद ग्रंथ, इसमें ९१ चौपाई आदि पद्य हैं । ४- गुरुदत्त रामरज ग्रंथ, इसमें ४३ दोहा चौपाई और कवित्त हैं । ५- हरिश्चन्द्रसत ६- ध्रुव चरित्र । ७- कहरा विनती ग्रंथ, ८- चितावणी ग्रंथ । ९- वाणी । १०- अरिल्ल ग्रंथ । ११- उत्पत्ति स्थिति चितावनी । १२- सत्तवार, इसमें २६ पद हैं । १३- पन्द्रह तिथि, इसमें ६९ पद्य हैं । १४- भक्तियोग इसमें ६१ पद्य हैं ।
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१४ ग्रंथ इनके प्राप्त होते हैं और एक भक्तमाल । और भी कोई हो तो ज्ञात नहीं है । किन्तु १५ ग्रंथ तो इनके देखने में आते हैं । इन सबकी पद्य संख्या ग्रंथ संख्या पद्धति से अर्थात ३२ अक्षर का पद्य मानकर संख्या करने से १२ हजार होती है । अतः मंगलदासजी जाखल की ढांणी वालों ने यही संख्या अपने 'सुन्दरोदय के छप्पै में दी है । वह छप्पैया राघवदासजी के विवरण के आरंभ में पहले दिया जा चुका है । उसका अंश यहां भी पाठकों की सुविधा के लिये दिया जाता है - "जन यश वाणी सहस रवि" इसका अर्थ होता है - जन यश भक्तों का यश भक्तमाल को मिलाकर राघवदासजी की वाणी १२ हजार है ।
(क्रमशः)






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