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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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३०. ज्ञानी कौ अंग ३३/३६
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अज्ञ क्रिया कछु करत है, अहं बुद्धि कौं आंनि ।
सुन्दर ज्ञानी करत है, अहंकार बिनु जांनि ॥३३॥
इसमें वास्तविक कारण यह है कि अज्ञानी पुरुष सभी सांसारिक कृत्यों को अहं बुद्धि से(मैं कर रहा ' - ऐसा मान कर) करता है; जब कि ज्ञानी अपने सभी सांसारिक कृत्यों में अहंबुद्धि त्याग कर उनको ईश्वरार्पण बुद्धि से पूर्ण करता है । अतः जब यह अपने को किसी कर्म का कर्ता ही नहीं मानता तो उसे उन से होने वाला दुःख क्या और क्यों सन्तप्त करेगा ! ॥३३॥
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अज्ञानी सुख दुखनि कौं, जानत अपने मांहिं ।
सुन्दर ज्ञानी आपु मैं, सुख दुख मानैं नांहिं ॥३४॥
यही कारण है कि अज्ञानी जहाँ स्वयं को उन कर्मों का कर्ता मान कर स्वयं को उन कर्मों के फल का भोक्ता मान लेता है, वहीं ज्ञानी स्वयं को उन सुख दुःखात्मक कर्मों का अकर्ता, अभोक्ता मान कर सुखी एवं सन्तुष्ट तथा सन्तृप्त रहता है ॥३४॥
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सुन्दर अज्ञ रु तज्ञ कै, अंतर है बहु भांति ।
वाकै दिवस अनूप है, वाहि अंधेरी राति ॥३५॥
महाराज श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - इसी प्रकार, ज्ञानी एवं अज्ञानी में अन्य भी अनेक भेद हैं । जैसे - जो साधनाकाल ज्ञानी के लिये अनुपम दिवस के रूप में माना जाता है वहीं अज्ञानी के लिये घोर अन्धकारमय रात्रि के रूप में प्रतीत होता है१ ॥३५॥
(१ तु० श्रीमद्भगवद्गीता : या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी ।
यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुनेः ॥ - अ० २, ६९)
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ज्ञानी शुभ कर्मनि करै, लोक आचरन हेत ।
बहुत भांति के शब्द कहि, सुन्दर शिक्षा देत ॥३६॥
दूसरा भेद यह है - जहाँ ज्ञानी अपने सभी आचरण लोकाचार निभाने के लिये करता है । वह अपने उपदेशों में भी, शिष्यों को समझाने के लिये, विविध लौकिक उदाहरण प्रस्तुत करता रहता है ॥३६॥
(क्रमशः)

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बहुत श्रेष्ठ प्रवचन है।





