सोमवार, 19 अक्टूबर 2026

*गुरुदेव का अंग~१, १/३*

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*श्री दादूवाणी भावार्थ = Meta AI*
*गुरुदेव का अंग~१, १/३* 
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*दादू नमो नमो निरंजनं, नमस्कार गुरुदेवत: ।* 
*वन्दनं सर्व साधवा, प्रणामं पारंगत: ॥१॥*                                
दादू जी महाराज सबसे पहले उस निरंजन - माया से परे, निर्मल परमात्मा को बार-बार नमस्कार करते हैं । फिर अपने गुरुदेव को नमस्कार करते हैं, जिन्होंने निरंजन का मार्ग दिखाया । फिर सब संत-साधुओं की वंदना करते हैं, और उन सिद्ध पारंगत जनों को प्रणाम करते हैं जो भवसागर से पार हो गए हैं । यह दादू पंथ की विनम्रता की परम्परा है - पहले प्रभु, फिर गुरु, फिर सब संत ।
*I bow, O bow to the Formless, Pure,*
*Salutations to Gurudev, divine and sure.*
*I venerate all saints so true,*
*Pranams to those who the Beyond broke through.(1)*
Dadu Ji first bows again and again to Niranjan - the pure Lord beyond Maya. Then he offers salutations to his Gurudev, who showed him the path to that Niranjan. Then he bows to all Sadhus and saints, and offers pranam to the Parangat - those enlightened souls who have crossed the ocean of existence. This shows the humility of Dadu Panth - first God, then Guru, then all saints.
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*परब्रह्म परापरं, सो मम देव निरंजनं ।*
*निराकारं निर्मलं, तस्य दादू वन्दनं ॥२॥*
वो परब्रह्म जो पर से भी परे है - परापर है, वही मेरा देव निरंजन है । वो आकार से रहित है - निराकार है, और माया-मल से रहित - निर्मल है । दादू जी कहते हैं, मैं उसी को वंदन करता हूँ । मेरा इष्ट कोई देवी-देवता नहीं, बल्कि वह निर्गुण, निराकार, निर्मल तत्व ही है ।
*Supreme Beyond, the Highest Light,* 
*He is my Lord, Stainless, Bright.* 
*Formless, Immaculate, ever free,* 
*To Him, Dadu bends in reverie.(2)* 
That Parabrahma who is beyond the beyond - Parapar, He alone is my God, Niranjan. He is without any form - Nirakar, and without any impurity - Nirmal. Dadu says, I bow only to Him. My beloved deity is not any limited form, but that formless, pure, supreme essence itself. 
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*दादू गैब मांहिं गुरुदेव मिल्या, पाया हम परसाद ।*
*मस्तक मेरे कर धर्या, देख्या अगम अगाध ॥३॥*
दादू जी कहते हैं - दादू जी महाराज अपने सद्गुरु की प्राप्ति और उनके फल का वर्णन कर रहे हैं - जब मैं अनजान अवस्था में था, तब अकस्मात् ही, गैब से - यानी अलौकिक रूप से गुरुदेव ने मुझे दर्शन दिये । उन्होंने बड़े प्रेम से मेरे मस्तक पर अपना वरद-हस्त रखा । उनकी इस कृपा से मुझे उनका दिव्य प्रसाद प्राप्त हुआ । उन्होंने मुझे उस अगम, अगाध स्वरूप का दर्शन कराया - जो मन और इन्द्रियों से परे है, जो निर्गुण और अपार है ।
*In the Unseen, my Gurudev came to me,* 
*And blessed me with His grace so free.* 
*He placed His hand upon my head,* 
*And showed me Depths where none have led -* 
*The Unreachable, the Fathomless spread.(3)* 
Dadu Ji Maharaj describes the attainment of his Sadguru and its divine fruit -When I was in an innocent state, suddenly, out of the Unseen - in a miraculous, divine way - Gurudev appeared before me. With great love, He placed His blessed hand upon my head. By His grace, I received His divine Prasad. He initiated me and showed me the vision of that Form - which is beyond mind and senses, attributeless(Nirguna), and infinite. 

*घाटड़ा की महन्त परंपरा*

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🌷*卐 श्री दादूदयालवे नम:  卐*🌷
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*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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*सगुणा गुण केते करै, निगुणा न मानै एक ।*
*दादू साधू सब कहैं, निगुणा नरक अनेक ॥*
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*घाटड़ा की महन्त परंपरा*
१- सुन्दरदासजी बड़े २-प्रहलाददासजी ३- केशवदासजी ४- गरीबदासजी
५- मानदासजी ६- हरिभक्तजी ७- जयरामदासजी ८- रामदासजी ९- रामगोपालजी १०- हरिचरणजी ११- लछीरामजी १२- आशारामजी वर्तमान में हैं । 
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*महन्त रामदासजी*
वैसे तो केशवदासजी आदि घाटड़ा के महन्त सभी उच्चकोटि के संत हुये हैं किन्तु रामदासजी विशेष रूप से सिद्ध पुरुष हुये हैं । रामदासजी ने ही रामपुरा में रामशाला बनवाई थी । कारण- जयपुर नरेश की दी हुई भूमि रामपुरा में ही थी । अतः वहां रामशाला बनवाने की आवश्यकता थी । रामपुरा में गुसांइयों का मठ था उसमें कुछ गुसांई रहते थे । वे गुसांई रामदासजी से कुछ छेड़छाड़ करते रहते थे । 
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रामदासजी उच्च कोटि के सन्त थे । अत पहले तो कुछ समय तक उनके आघातों को सहन करते रहे किन्तु उनकी सहन शक्ति को उन गुसांइयों ने उनकी कमजोरी मानकर के अधिक गड़बड़ की तब रामदासजी ने उनको गधा बनाकर मठ से बाहर निकाल दिया था । रामपुरा घाटड़ा आदि आम पहले जयपुर राज्य के ही थे । अलवर राज्य की स्थापना लगभग २२५ वर्ष पहले प्रतापसिंहजी ने की थी । अब प्रतापसिंहजी की सातवीं पीढ़ी है । प्रतापसिंहजी के वंशज अलवर नरेश दादूजी के विशेष रूप से भक्त रहे हैं । 
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*महन्त हरिचरणजी*
घाटड़ा के महन्तों में महन्त हरिचरणजी भी ख्याति प्राप्त महन्त हुए हैं । इन्होंने घाटड़ा की प्रहलादशाल तथा घाटड़ा की शाखा रूप अन्य ११ राम-शालाओं के कुंडे मंत्र दिये थे । उनको धोकर वह जल देने से मानवों तथा पशुओं के भी नजर आदि अनेक रोग दूर होते हैं । वे १२ यूँ हैं- १- घाटड़ा २- बलदेवगढ़ ३- गोलाकावास ४- बरकड़ी ५- रोडिरहडिया ६- तिलवाड़ा ७- खोह ८- द्वन्दपुरी ९- कोटड़ी रामपुरा १०- मलारणा ११- लोकली(सिकराय केपास) १२- कागोता ।
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प्रहलाददासजी के समय घाटड़ा में ३५० कोटड़ियां धीरावत ठाकुरों की थीं । वे सभी प्रहलाददासजी महाराज की कृपा से संतों की सेवा में लग गये थे, किन्तु भक्तों की सन्तानें ही आगे चलकर महन्त हरिचरणजी के समय तक भक्ति विहीन होकर संतों की विरोधी बन गई थीं । घाटड़े में बसन्त पंचमी पर मेला भरता था । 
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उस समय संत बहुत आते थे । अतः आश्रम की छत पर भी चढ़ते थे । इससे घाटड़े के जो अश्रद्धालु धीरावत ठाकुर थे एक मेले के समय महन्त हरिचरणजी से बोले-साधु छत पर नहीं चढ़ने चाहिये । साधु छत पर चढ़ते हैं तब हमारी ठकराणियां संकोचवश कोटड़ियों के चौक में नहीं निकल सकती हैं । तब महन्त हरिचरणजी ने कहा- प्रथम तो मातायें संतों से संकोच करती ही नहीं हैं । कारण- संत तो उनको माता के रूप में देखते हैं और मातायें भी संतों को पिता तुल्य देखती हैं । 
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ऐसी स्थिति में संकोच का काम ही क्या है? फिर भी संकोच करती हैं तो मेला तो चार दिन का है । मेले के चार दिनों में बाहर चौक में नहीं निकलें । मेले के दिनों में हम किस २ को कहें । अधिकतर अनजान ही आते हैं और हम यहां के निवासी सब आने वालों की भोजनादि सेवा में लगे रहते हैं । अतः इस बात का विशेष ध्यान हर समय कैसे रह सकेगा । महन्तजी ने उचित ही कहा था किन्तु उन प्रमादी ठाकुरों ने महन्तजी की बात पर कुछ भी ध्यान नहीं दिया और मदिरा पान करके मंदिर के द्वार पर आकर बोले-नहीं मानता है तो इस दूंदल्या महन्त की दूंद(मोटा पेट) फोड़ दो । 
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यह सुनकर महन्त हरिचरणजी ने कहा- अब या तो यहां पर आप लोग ही रहेंगे या संत ही रहेंगे । तुम्हारे पूर्वजों ने श्रद्धा पूर्वक लाकर घाटड़ा में संतों को बसाया था और तन मन धन से संतों की सेवा की थी किन्तु उन भक्तों की ही संतानें अब संतों से ईर्ष्या करने लगी हैं । तब ऐसी स्थिति में संत कैसे रहेंगे¹, किन्तु फिर भी मुझे विश्वास है कि संतों के सहायक भगवान् हैं । इससे संतों का आप कुछ भी नहीं बिगाड़ सकेंगे । 
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आप लोग ही यहां से चले जायेंगे और नहीं जायेंगे वे नष्ट हो जायेंगे । संत यहां ही रहेंगे और छत पर भी चढ़ेंगे । फिर महन्त हरिचरणजी की भविष्य वाणी सर्वथा सत्य ही हो गई । प्रहलाददासजी के समय धीरावतों की ३५० कोटड़ियां घाटड़े में थीं किन्तु अब एक भी नहीं है । विशेष तो वहां से उठकर चले गये और कोई रह गये तो उनका वंश नष्ट हो गया । अब वहां धीरावतों की स्मृति दिलाने वाला उनकी कोटड़ियों का मुख्य द्वार खड़ा है और कुछ भी नहीं है । संतों से ईर्ष्या का परिणाम ऐसा ही होता है ।
(क्रमशः)

*४९. भ्रम विधवंस कौ अंग २५/२८*

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*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
*श्रद्धेय श्री Tapasvi @Ram Gopal Das की प्रेरणा से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Meta AI*
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*४९. भ्रम विधवंस कौ अंग २५/२८*
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*कहि जगजीवन रांम बिन, बात न पूछै कोइ ।*
*ताथैं हरि भजि प्रीति सौं, सांई सनमुख होइ ॥२५॥*
जगजीवन साहेब कहते हैं कि राम नाम के बिना इस संसार में जीव की कोई बात नहीं पूछता, कोई कीमत नहीं है । जैसे बिना आत्मा के शरीर की कोई कीमत नहीं, वैसे ही राम नाम बिना सारे तीर्थ व्यर्थ हैं । इसलिए प्रीति और प्रेम से हरि को भजो, सच्चे प्रेम से भजन करने पर सांई यानी स्वामी खुद तुम्हारे सामने आ जाते हैं । भगवान को प्रेम प्यारा है, तीर्थ नहीं ॥२५॥
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*जगजीवन तीरथ सकल, रांम नांम मंहि जांण ।*
*पूरण२ ब्रह्म पिछांणिये, हरि भजि वो मति आंण२ ॥२६॥*
(२-२. पूरण ब्रह्म.....आंण...ब्रह्मसाक्षात्कार हो सके=ऐसे ज्ञान की प्राप्ति का प्रयास कर)
जगजीवन जी कहते हैं कि सारे तीर्थों को राम नाम में ही समाया हुआ जानो । जो फल अड़सठ तीर्थों में मिलता है, वह एक राम नाम में मिल जाता है । इसी राम नाम के भजन से पूरण ब्रह्म की पहचान होती है । इसलिए हे मन, ऐसी बुद्धि ला, ऐसी मति ला, कि तू सदा हरि को ही भजे, और किसी भ्रम में न पड़े ॥२६॥
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*नित प्रति घर घर निरजला३, प्रेम न पीवहि पूरि ।*
*जगजीवन सूकै सकल, वो जल इन थैं दूरि ॥२७॥*
(३. निरजला=निर्जला एकादशी व्रत)
लोग रोज घर-घर में निर्जला व्रत रखते हैं, पूरे दिन पानी भी नहीं पीते, शरीर को सुखाते हैं, पर प्रेम का पूरा जल नहीं पीते । जगजीवन जी कहते हैं कि प्रेम के बिना सब साधना सूखी है, जैसे बिना पानी के खेत सूख जाता है । वह असली प्रेम रूपी जल इन बाहरी सूखे व्रतों से बहुत दूर है । सच्चा व्रत तो प्रेम से भीगना है, देह को सुखाना नहीं ॥२७॥
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*जगत जला४ जन निरजला, व्रत सुमिरन वेसास ।*
*पारंगति परमारथी, सु कहि जगजीवनदास ॥२८॥*
(४. जला=नष्ट हुआ)
एक ओर सारा जगत विषय-वासना की आग में जला हुआ है, दूसरी ओर जन यानी साधक कहलाने वाले लोग निर्जला व्रत और केवल बाहरी सुमिरन के वेश पर विश्वास रखे बैठे हैं । जगजीवनदास जी कहते हैं कि सच्चा पारंगत और सच्चा परमार्थी वह है जो इन दोनों से पार चला जाए । जो न तो विषयों की आग में जले, न केवल बाहरी वेश में उलझा रहे, बल्कि भीतर के प्रेम तत्व को पहचान ले, वही पार होता है ।
(क्रमशः)

*२९. साधु महिमा का अंग ~१७/२०*

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*🌷卐 सत्यराम सा 卐🌷*
साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*२९. साधु महिमा का अंग ~१७/२०*
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*साधों के हित सृष्टि यहु, सिरजी सिरजनहार ।*
*यथा पिता पुत्रहु निमित्त, श्रम१ करहिं संसार ॥१७॥*
संसार में जैसे पिता पुत्र के लिये परिश्रम१ करता है, वैसे ही सृष्टिकर्त्ता ईश्वर ने यह सृष्टि संतों के लिये ही रची है, सृष्टि बिना संत सेवा कैसे होती ?
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*खलक१ मुलक२ खेती करी, खालिक३ खसम सु साथ ।*
*ता में कण जण नीपजे, हरि हाली के हाथ ॥१८॥*
संसार१ रूप देश२ अर्थात खेत में साधन रूप खेती करी है, संसार का कर्त्ता३ स्वामी ब्रह्म भी व्यापक होने से तथा प्रतिक्षण चिन्तन होने से साथी ही है, जैसे खेत में हाली के हाथ से अन्नकण उत्पन्न होकर प्राणियों के पोषक होते हैं, वैसे ही हरि के कृपा-रूप से संसार में संत उत्पन्न होकर संसार को सुखद होते हैं ।
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*भजन भूमि जन कन उदय, समा१ धणी२ के होय ।*
*यहु खेती सुखदाय की, बूझे विरला होय ॥१९॥*
भूमि में अन्न कण उत्पन्न होते है तब भूमि के स्वामी२ के लिये अच्छा समय१ होता है, वैसे ही भजन से संत उत्पन्न होते हैं तब वह समय प्रभु को प्रिय होता है, भजन - भूमी में उत्पन्न होने वाली संत-रूप खेती महान् सुखप्रद होती है, किन्तु उस सुख को कोई विरला ही समझ पाता है ।
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*भक्त भेंट भगवन्त है, जे कुछ हरि घर माँहिं ।*
*परि बन्दा१ पैठा बन्दगी, सु कछू कबूले२ नाँहिं ॥२०॥*
जो भी कुछ हरि के घर में है, वह सभी कुछ भगवान संत को भेंट रूप में देने को तैयार हैं, किन्तु संत१ तो भगवान की भक्ति में स्थित है अन्य कुछ स्वीकार२ नहीं करता ।
(क्रमशः)

*२९. साधु महिमा का अंग ~१३/१६*

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साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*२९. साधु महिमा का अंग ~१३/१६*
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*स्वामी कर१ सेवक बड़े, नाँहीं अचरज कोय ।*
*रज्जब तरु फल शिश पर, प्रत्यक्ष देखो जोय२ ॥१३॥*
स्वामी के द्वारा१ ही सेवक बड़ा बनता है, इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है, सेवक का जो२ बड़प्पन है वह प्रत्यक्ष है, देखो वृक्ष का फल वृक्ष के शिर पर ही रहता है ।
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*भगवन्त भूमि ऊपर दर्शै, वन्दे वृक्ष सु१ भाल२ ।*
*सो रज्जब परमारथी, सब प्राणिहुं प्रतिपाल ॥१४॥*
जैसे वृक्ष पृथ्वी से उत्पन्न होकर भी पृथ्वी के शिर२ पर दिखाई देते हैं, वैसे ही भगवान की भक्ति द्वारा संत बन कर भी श्रेष्ठ१ संत भगवान के शिर पर दिखाई देते हैं, इस बड़प्पन का कारण यह है कि - वे वृक्ष तथा संत दोनों ही सभी प्राणियों के प्रतिपालक और परमार्थी हैं ।
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*सांई शून्य समान है, वन्दे१ बादल जूंणि२ ।*
*तिन माँहीं ह्वै दे प्रभू, चौरासी की चूंणि३ ॥१५॥*
परमात्मा आकाश के समान हैं और संत१ बादल के समान हैं, जैसे आकाश बादलों द्वारा वर्षा करके चौरासी लक्ष योनियों२ को चून३(भोजन) देने में निमित होता है, वैसे ही प्रभु उन संतों द्वारा ही सबको सुख शांती देते हैं ।
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*आदम१ माँहीं ऊपजे, शब्द स२ विता३ सो शीश४ ।*
*रज्जब रीझ्या देखकर, त्योंही जन जगदीश ॥१६॥*
जैसे मनुष्य१ में विचार-धन३-सहित२ शब्द उत्पन्न होता है, वही शिरोमणि४ माना जाता है, उसी से मानव आनन्दित होता है, वैसे ही संसार में जो संत उत्पन्न होता है, उसे ही देखकर जगदीश्वर प्रसन्न होते हैं ।
(क्रमशः)

रविवार, 18 अक्टूबर 2026

*प्रहलादजी की वाणी की महिमा*

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*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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*दादू तन मन लाइ कर, सेवा दृढ़ कर लेइ ।*
*ऐसा समर्थ राम है, जे मांगै सो देइ ॥*
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*प्रहलाददासजी के संग से तरने वाले नर नारी*
रट रामट बस सदा, भक्त भगवत को राघो ।
सुनत नरायण गोविन्द, धर्म धार्यो जिन आघो¹ ॥
भीमराज निर्वाण, राम यश नीको गावे ।
नीको लक्ष्मीदास, हरियो हरि धर्म चलावे ॥
किशनाई पार्वती, बीना दुरगा गोरिजा ।
पारस रूपी परसि, गुरु मेट्यो दिल गोरिजा² ॥
राघव हरि यश रात दिन, सुन सुन परमारथ करें ।
ये परम पुरुष प्रहलाद की, संगति नर नारी तिरें ॥६५॥
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भगवान् के भक्त राघवजी रामट ग्राम में सदा बसते हुये राम रटते थे । नारायण और गोविन्दजी भागवद्द धर्म को सुनते थे और उन्होंने आदर¹ पूर्वक धारण भी किया था । निर्वाण गोत्र के भीमराजजी क्षत्रिय रामजी का यश अच्छी प्रकार प्रीति से गाते थे । लक्ष्मीदासजी भी अच्छे भक्त थे । हरियाजी भी हरिभक्ति रूप धर्म अच्छी प्रकार चलाते थे । किशनाई, पार्वती, बीना, दुरगा(दुरशा भी पाठान्तर है) और गौरिजा, इन बाइयों ने भी पारसरूप प्रहलादजी को गुरु बनाया था । गुरुजी ने इनके हृदय का अज्ञान रूप दारिद्र² अपने ज्ञान धन को देकर मिटा दिया था । ये उक्त सब ही नर-नारी रातदिन हरियश सुन सुनकर परमार्थ करते थे । इस प्रकार परम पुरुष प्रहलादजी की संगति से ये उक्त नरनारी संसार-सागर से पार हो गये थे । 
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*प्रहलादजी की वाणी की महिमा*
प्रहलाददासजी के शिष्य प्रशिष्य तथा सेवकों ने प्रहलादजी की वाणी की महिमा कही है । उसका निर्देश भी करना यहां उचित समझकर किया जाता है-
श्री गुरुदेव प्रहलाद की वाणी सवा हजार ।
सुने सुनावे पाठ उर, "श्याम" सहज भव पार ॥ श्यामदास कृत ।
श्रीवाणी प्रहलाद की, वाणी ब्रह्म गियान ।
हृदय हरि प्रकाश हो, हरिदास भ्रम भान ॥ हरिदास कृत ।
प्रेम प्रीति हरि हित बढ़े, होय ब्रह्म पद वास ।
वाणी पढ़ प्रहलाद की, केशव कर्म विनाश ॥ केशवदास कृत
उद्धव आदि रु अंत मधि, जो उर धारे संत ।
वाणी गुरु प्रहलाद की, तारण जीव अनन्त ॥ उद्धवदास कृत ।
वाणी गुरु प्रहलाद की, राघव ब्रह्म विलास ।
जिन हृदय धारण करी, ताके दोष विनास । राघवदास कृत ।
नव षट् ठारह चार ग्रन्थ, मथि अनुभव ले घीव ।
प्रहलाद कृत धर श्याम उर, प्राण पुष्ट पद पीव ॥ श्यामदास कृत ।
कह हरिराय सहाय जग, वाणी गुरु प्रहलाद ।
जिन पढ़ उर धारण करी, ताके मिटे विषाद ॥ हरिराय कृत ।
रतनाई रत राम से, आठों पहर अखंड ।
जप वाणी प्रहलाद को, छूटे जमको दंड ॥ रतनाई बाई कृत ।
वाणी गुरु प्रहलाद की, हृदय सु धारे कोय ।
केशी कर्म नवारि है, लीन अमर पद होय ॥ केशीबाई कृत ।
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*प्रहलाददासजी की समाधि*
प्रहलाददासजी की समाधि घाटड़ा में ही बड़ा बाग के कूप के पास है । समाधि की अच्छी मानता है । चरण चिन्हों को धोकर आसपास के लोग  ले जाते हैं और रोगी को देने से रोग में शांति आती है । पशु आदि को देने से पशु ठीक होते हैं नजर लगी पर देने से बच्चे ठीक होते हैं । कामना करके बोल्यारी बोलने वालों की कामनायें पूर्ण होती हैं । घाटड़ा में वर्षा नहीं हो तो प्रहलाददासजी की समाधि पर जाकर प्रार्थना करने पर हो जाती है । समाधि पर जात, जडूला, सवामणी आती हैं । प्रहलाददासजी की समाधि से पूर्व की ओर कुछ ही दूर पर प्रहलाद दह है उसमें १२ मास पानी रहता है । प्रहलाददासजी की समाधि के पास ही इनकी शिष्य परंपरा के महन्तों की समाधिया हैं । 
(क्रमशः)

४९. भ्रम विधवंस कौ अंग २१/२४

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*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
*श्रद्धेय श्री Tapasvi @Ram Gopal Das की प्रेरणा से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Meta AI*
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*४९. भ्रम विधवंस कौ अंग २१/२४*
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*कंचन की सरभरी८ तुलै, पुनि करै कुरु छेत्र ।*
*कहि जगजीवन भोग भ्रम, हरि मंहि खुलै न नेत्र ॥२१॥*
(८. कंचन की सरभरी=सोने के बराबर)
कोई व्यक्ति सोने की मेरु पर्वत जैसी बड़ी ढेरी को तराजू पर तोल कर दान कर दे, और उसके बाद कुरुक्षेत्र जैसे महातीर्थ में जाकर भी दान-पुण्य करे, तो भी उससे मुक्ति नहीं मिलती । जगजीवन साहेब कहते हैं कि यह सब केवल भोग की इच्छा और भ्रम ही है, इससे हरि में प्रेम के नेत्र नहीं खुलते । सच्चा लाभ तो तब है जब मन हरि में लगे, केवल सोना दान करने से भगवान नहीं मिलते ॥२१॥
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*गंग गया गोदावरी, कटै न तन का मैल ।*
*कहि जगजीवन जग धरम९, ज्यूं तेली का बैल ॥२२॥*
(९. जग धरम=जगत का दैनिक कर्म)
गंगा, गया, गोदावरी जैसे पवित्र तीर्थों में बार-बार नहाने से शरीर का मैल भी पूरी तरह नहीं कटता, तो मन का मैल कैसे कटेगा । जगजीवन जी कहते हैं कि बिना प्रेम के जो जगत का धर्म यानी केवल बाहरी तीर्थ-व्रत किया जाता है, वह तेली के बैल जैसा है । बैल आँख पर पट्टी बाँध कर दिन भर कोल्हू के चारों ओर घूमता है, पर वहीं का वहीं रहता है, आगे नहीं बढ़ता । वैसे ही जीव भी तीर्थों में घूमता रहता है पर माया से बाहर नहीं निकलता ॥२२॥
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*तीरथ व्रत करि करि मुए, सेवा पूजा पाक ।*
*जगजीवन जग का धरम, ज्यूं कुलाल का चाक ॥२३॥*
अनेक लोग तीर्थ, व्रत, सेवा, पूजा, पवित्र भोजन और नियम आदि करते-करते ही मर गए, पर भीतर की मुक्ति नहीं मिली । जगजीवन जी कहते हैं कि संसार का यह केवल बाहरी धर्म कुम्हार के चाक जैसा है । चाक लगातार घूमता ही रहता है, कभी स्थिर नहीं होता, और उसी पर बर्तन बनते-बिगड़ते रहते हैं । वैसे ही जीव भी इन बाहरी कर्मों के चक्कर में जन्म-मरण के चक्कर में ही घूमता रहता है ॥२३॥
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*बदरी फिरि केदार फिरि, जगन्नाथ फिरि जोइ ।*
*गंगा सागर द्वारिका, सब तीरथ गमि१ होइ ॥२४॥*
{१. गमि=गति(जाना)}
चाहे तुम बदरीनाथ फिर आओ, केदारनाथ फिर आओ, जगन्नाथ पुरी, गंगा सागर और द्वारिका, सारे तीर्थ घूम लो, तो भी मन को कहीं सच्चा ठिकाना नहीं मिलता । सब तीर्थ घूम लेने पर भी अगर भीतर हरि से प्रेम नहीं जगा, तो मन भटकता ही रहता है । बाहर की यात्रा से पैर थकते हैं, मन शांत नहीं होता, शांति तो भीतर के तीर्थ में मिलती है ॥२४॥
(क्रमशः)

शनिवार, 17 अक्टूबर 2026

प्रहलादजी ब्रह्म स्वरूप में

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🌷*卐 श्री दादूदयालवे नम:  卐*🌷
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*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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*सब चतुराई देखिये, जे कुछ कीजे आन ।*
*मन गह राखै एक सौं, दादू साधु सुजान ॥*
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निरंतर निदिध्यासन रूप रटन करके प्रहलादजी ब्रह्म स्वरूप में ही प्रवेश कर गये थे ।
परम पुरुष प्रहलाद के, इतने शिष्य सब धर्म धुर¹ ॥
तिन मधि बड़ बानैत हेत² हापोजी होई ।
धीरध और अनन्त, बुरो जनि मानो कोई ॥
चरणदास भजनीक, तिलकधारी है केशो ।
हरीदास पुनि पाट, कियो हरि घर सु प्रवेशो ॥
कान्हड़दास कल्यारा, पुन. परमानन्द धमंडी ।
रामदास हरदास, भक्त भगवद्द की मंडी³ ।
राघव को रुचि रात दिन, भर्यौ भक्त भगवंत गुरु ॥
परम पुरुष प्रहलाद के, इतने शिष्य सब धर्म धुर ॥६६२॥
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परम पुरुष प्रहलादजी के, इतने शिष्य भागवद्द धर्म रूप रथ की धुरी¹ को धारण करने वाले थे । उनमें प्रेमाभक्ति² रूप बाण चलाने वाले बानैत और महान १- हापाजी ही थे । इस बात से कोई बुरा न मानें और भी अनन्त बड़े थे । २- भजनीक चरणदासजी और ३- तिलकधारी केशवजी । गद्दी पर हरिदासजी ही बिराजे थे और उन्होंने हरिधाम(स्वरूप) में ही प्रवेश किया था ।
(उक्त छंद के "तिन मधि से प्रवेशो" तक के चार पादों ने समाज में विवाद खड़ा कर रखा है । इनमें यह कह कर कि- सबसे बड़े हापाजी थे, फिर कहते हैं कि कोई मेरी इस बात पर बुरा नहीं मानें, और भी अनन्त बड़े थे अर्थात् हरिदासजी से बहुत बड़े थे । चरणदासजी भजन करने में बहुत बड़े थे । और केशवदासजी तिलक गुरु गादीधारी होने से बहुत बड़े थे । फिर भी हरिदासजी पाट अर्थात् गद्दी धारण करते थे अर्थात् उनकी स्वयं की गद्दी हिन्डौन में लगती थी और उन्होंने हरिस्वरूप में प्रवेश किया था इससे बड़े थे । राघवदासजी हरिदासजी के शिष्य थे अतः अपने गुरुदेव की महिमा करना भी उनका कर्तव्य था ही । किन्तु उनका तात्पर्य पाटड़ा गद्दी पर वे बिराजे थे ऐसा मानले तो पाटड़ा की गद्दी के महन्तों में हरिदासजी का नाम आना चाहिये सो तो आता नहीं, केशवदासजी का ही आता है । "हरिदास पुनि पाट" यह राघवदास जी का पाद भी यही ध्वनि करता है कि- प्रहलाददासजी की गद्दी पर तो केशवदास ही बैठे थे फिर भी हरिदासजी गद्दी पर ही बिराजते थे । ऐसा मान लेने पर संगति बैठ जाती है । कारण वे हिन्डौन में गद्दी पर ही विराजते थे । हिन्डौन उनकी स्वयं की गादी थी ही । उक्त पदों के प्रयोग से मुझे तो ऐसा ही ज्ञात हो रहा है । वास्तविकता क्या है, यह तो भगवान् ही जाने)
४- कान्हड़दासजी ५- कल्यारादासजी ६- परमानन्दजी ७- धमंडीजी ८- रामदासजी कहीं कहीं "धमंडी रामू" भी पाठ मिलता है । अतः धमंडी रामदास का विशेषण भी हो सकता है । ९- हरदासजी । इन सब ने ही भगवान् की भक्ति की³ थी । राघवदासजी कहते हैं- मेरे हृदय में रात दिन यही रुचि रहती है कि भक्त, भगवान् और गुरु का यश कहता ही रहूँ ।
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दो माधव दो सूर, दो नारायण नापो ।
चतुरदास दो सन्त, नहीं जिनके अंग आपो ॥
श्यामदास चरणदास, मतो नरहरि को न्यारो ।
किशनो मोहन मान, रामजी सबको प्यारो ॥
भाषा में भौरे नहीं, राघव ज्यों की त्यों कही ।
परम पुरुष प्रहलाद की, पैज प्रकट पंथ सु रहो ॥६६३॥
उक्त सभी प्रहलादजी के शिष्यों में देहाभिमान नहीं रहा था और सबको ही रामजी प्रिय लगते थे । राघवदासजी कहते हैं- यह मैंने भूल में नहीं कहा है, जैसा था वैसा ही कहा है । दादू पंथ में प्रहलादजी की श्रेष्ठता की टेक अच्छी प्रकार रही थी अर्थात् दादूपंथ में वे महान् माने जाते हैं ।
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*प्रहलादजी के सेवक शिष्य*
ये स्वामी प्रहलाद के, राघव सेवक शिष्य बरणि ॥
सेवक बडव कुरेत, प्रथम धीरावत सारे ।
खान पान से रहित, नाम तिनके निरवारे¹ ॥
भरतोजी बड़ भक्त, छओं दर्शन में जारां ।
वेणीदास बखान, भावे आदर अन्त पारगौ² ॥
रामसाहि धन धर्म, धुर³ गुरु आज्ञा अंत बणी ।
भई भक्ति गोविन्ददास, कुल दीपक कीरति घणि ॥
भांझू भक्ति जुंभारखां, देवकरण हरि की शरणि ।
ये स्वामी प्रहलाद के, राघव सेवक शिष बरणि ॥६६४॥
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प्रथम बड़े कुरेत(कुरीति वाले) थे । वे सब घाटड़ा के धीरावत आपके सेवक बन गये थे । मांस मदिरा का खान पान छोड़ दिया था । फिर तो वे मांसादि के नाम उच्चारण करने से भी छूट गये¹ थे । घाटड़ा के धीरावतों में भरतजी बड़े भक्त थे । उनको छःओं दर्शन- (योगी, जंगम, सेवड़े, बौद्ध, सन्यासी, शेष) ये छः प्रकार के भेषधारी सब जानते थे । वेणीदासजी भी कथन करने योग्य हो गये हैं । वे आये अतिथियों का अति आदर करते थे और प्रेम से अन्न जल² देते थे ।
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रामसाहजी ने तो अपना धन धर्म में ही लगाया था और अंत³ तक गुरु आज्ञा का पालन किया था । उनकी अन्त में अच्छी स्थिति बन गई थी । गोविन्ददासजी भी भक्ति की अच्छी अवस्था को प्राप्त हो गये थे । ये भी कुल दीपक माने जाते थे । इनकी कीर्ति भी बहुत फैल गई थी । झांझूजी जुंझारखांजी और देवकरणजी ये सब भक्ति करके हरि की शरण में आ गये थे । उक्त प्रकार प्रहलाददासजी के सेवक शिष्य भी अच्छे भक्त हुए हैं । यह भक्तमालकार ने आंखों देखी ही बातें लिखी हैं ।
(क्रमशः) 

४९. भ्रम विधवंस कौ अंग १७/२०

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*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
*श्रद्धेय श्री Tapasvi @Ram Gopal Das की प्रेरणा से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Meta AI*
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४९. भ्रम विधवंस कौ अंग १७/२०
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गया प्रयाग बनारसी, इहाँ ही जगन्नाथ३ ।
जगजीवन इस जीव का, जे हरि पकड़ै हाथ ॥१७॥
(३. जगन्नाथ=जगन्नाथपुरी का मन्दिर)
गया, प्रयाग, बनारस और जगन्नाथ धाम सब यहीं इसी घट में मिल जाते हैं, अगर हरि कृपा करके इस जीव का हाथ पकड़ ले । संत जगजीवन जी कहते हैं कि भगवान के मिलते ही सारी तीर्थ यात्रा पूरी हो जाती है, फिर कहीं बाहर जाने की आवश्यकता नहीं रहती ।
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जगजीवन पटु४ कर ह्रिदै, सब तीरथ का राइ ।
सकल साध पावन भए, जीवन जांनै ताहि ॥१८॥
(४. पटु=सत्कर्म में कुशल, स्वच्छ, निर्दोष)
संत जगजीवन जी कहते हैं कि अपने हृदय को ही पवित्र कर लो, वही सब तीर्थों का राजा है । जो इस हृदय रूपी तीर्थराज को पहचान लेता है, उसका जीवन पावन हो जाता है, और सभी साधु संत भी उसे पवित्र मानते हैं, सबसे बड़ा तीर्थ अपना शुद्ध हृदय ही है ।
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अड़सठ तीरथ सब करै, फिर फिर बार हजार ।
जगजीवन हरि भगति बिन, अंट पड़ै मुझ छार५ ॥१९॥
(५. छार=धूल) 
कोई व्यक्ति अड़सठ तीर्थों की यात्रा हजार-हजार बार भी कर ले, फिर भी क्या होगा । सांय जगजीवन जी कहते हैं कि हरि भक्ति के बिना वह सब राख में मिल जाता है, व्यर्थ चला जाता है । भाव ये है कि गिनती से मुक्ति नहीं मिलती, एक बूंद सच्ची भक्ति हजार तीर्थों से भारी होती है ।
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बासी६ बस्या बनारसी, मांहि विषै की प्यास ।
(तौ) मगहर मरण गति सोभई७, सुकहि जगजीवनदास ॥२०॥
{६. बासी=पुराने समय से(चिर काल से)}   (७. सोभई=शोभा देना)
कोई व्यक्ति बनारस जैसे पवित्र धाम में बरसों से बसा हुआ है, पर भीतर अभी भी विषयों की प्यास लगी है, तो उसका बनारस में रहना व्यर्थ है । संत जगजीवनदास जी कहते हैं कि उससे तो मगहर में वैराग्य और हरि नाम के साथ मरना भी ज्यादा शोभा देता है, क्योंकि स्थान बड़ा नहीं होता, मन की पवित्रता ही बड़ी होती है ।
(क्रमशः) 

शुक्रवार, 16 अक्टूबर 2026

*२९. साधु महिमा का अंग ~९/१२*

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साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*२९. साधु महिमा का अंग ~९/१२*
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*आकार भार छाया अरु वास, जन कपूर के चार्यों नास ।*
*अंजन१ पलट निरंजन होई, यह गति बूझे विरला कोई ॥९॥*
जैसे कपूर का आकार, भार, छाया और गंध चारों ही वायु के संग से चले जाते हैं, वैसे ही संत के भी चारों परमार्थ विचार द्वारा चले जाते हैं, वह मायिक१, आकार से बदलकर निरंजन ब्रह्म को प्राप्त होता है, इस निरंजन ब्रह्म की प्राप्ति रूप गति को कोई विरला ज्ञानी ही समझता है ।
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*साहिब सौं साधु बड़े, साधु बड़ा न कोय ।*
*रज्जब देख्या गुरु दृष्टि, सब नीके कर जोय१ ॥१०॥*
परमात्मा से संत बड़े हैं, संतों से बड़ा कोई नहीं है, यह हमने गुरदेव की ज्ञान-दृष्टि द्वारा देखा है, हे साधक ! तू भी सबको अच्छी प्रकार विचार करके देख१ ।
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*सेवक स्वामी एक ह्वै, ता ऊपरि अधिकार ।*
*यथा बुदबुदा वारि शिर, देखे सब संसार ॥११॥*
सेवक स्वामी के साथ एक हो जाता है, उस एकता पर भी जैसे जल का बुदबुदा जल रूप होने पर भी जल के ऊपर रहता है, इसको सब संसार देखता है वैसे ही सेवक का अधिकार स्वामी के ऊपर रहने का होता है ।
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*स्वामी सेवक शिर धर्या, आदू अदभुत बंध ।*
*रज्जब पेख्या पुहमि पर, पुत्र पिता के कंध ॥१२॥*
स्वामी ने सेवक को शिर पर ही धारण किया है, यह अदभुत संबन्ध आदि काल का ही है, हमने वर्तमान में भी पृथ्वी में पुत्र को पिता के कंधे पर देखा है । अत: संत हरि से अधिक है ।
(क्रमशः)

*२९. साधु महिमा का अंग ~५/८*

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साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*२९. साधु महिमा का अंग ~५/८*
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*साधु अगाध अगस्त्य है, सांई सुधा समुंद ।*
*उभय समाने उभय उर, रज्जब रही न बुंद ॥५॥*
संत तो अपार महिमा वाले अगस्त्य ऋषि के समान हैं और परमात्मा अमृतमय समुद्र के समान हैं । जैसे समुद्र पान के समय समुद्र अगस्त्य में समा गया था, एक बिन्दु भी शेष न रही थी और समुद्र के अभिमानी देवता के हृदय में अगस्त्य का आकार बस रहा था, वैसे ही संत के हृदय में हरि और हरि के हृदय में संत रहते हैं ।
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*वृक्ष बीज मीश्रित सदा, सेवक स्वामी तेम१ ।*
*पाला पानी होत हैं, पुनि पानी तैं हेम२ ॥६॥*
जैसे बीज में वृक्ष है और वृक्ष में बीज, वैसे ही१ सेवक में स्वामी है और स्वामी में सेवक है । जैसे बर्फ२ जल बन जाता है और जल ही पुन: बर्फ बन जाता है वैसे ही परमात्मा संत बन जाते हैं और संत परमात्मा बन जाते हैं ।
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*माया ब्रह्म ने जो किया, सो उन बाहर नाँहिं ।*
*रज्जब साधु अगाध दिल, उभय समाने माँहिं ॥७॥*
माया और ब्रह्म ने जो संसार रचा है, वह उनके बाहर नहीं है, किन्तु संत का हृदय तो महान् अगाध है कारण, माया और ब्रह्म दोनों उसमें समाये हुये हैं, यद्यपि संत माया का चिन्तन नहीं करते किन्तु माया ब्रह्म से अलग नहीं रह सकती । अत: वह संत के हृदय में है किन्तु संत को मोहित नहीं कर सकती, संत उसे मिथ्या समझते हैं ।
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*साधु शक्ति१ कपूर गति, अकल कला इहि भौन२ ।*
*सह गुण निर्गुण होत है, मिल परमारथ पौन३ ॥८॥*
साधु की माया१ की गति कपूर के आकार की गति के समान होती है, जैसे कपूर में भार और गंध रूप कला दिखाई देती है, किन्तु वायु३ मिलने पर वह अकल हो जाती है, अर्थात भार और गंध दोनों ही कपूर के स्थान में नहीं रहते, वैसे ही संसार-भवन२ में संत की सगुणता रूप शरीरादि माया परमार्थ विचार होने पर नहीं रहती, वे निर्गुण ब्रह्म-रूप ही हो जाते हैं ।
(क्रमशः)

*प्रहलाददासजी का परिचय*

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*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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*दादू मम सिर मोटे भाग, साधों का दर्शन किया ।*
*कहा करै जम काल, राम रसायन भर पिया ॥*
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भक्तमाल में राघवदासजी ने *प्रहलाददासजी का परिचय* इस प्रकार दिया है—
मू. छ.—परम पुरुष प्रहलाद धनि, देव¹ ज्योति द्विजकुल भयो ॥
दिपत देह देदिप्य, दुती² सनकादिक ओपे³ ।
हढ़ दिग्पाल महन्त, परम गुरु थप्यो पछोपे⁴ ॥
दादू दादा गुरु लगे, सर्वज्ञ सुन्दरदास गुरु ।
निराकार को नियमव्रत, पहुँचायो परलोक धुर⁵ ।
राघव राम प्रताप तैं, प्राण मुक्ति पर पद लियो ।
परम पुरुष प्रहलाद धनि, देवज्योति द्विजकुल भयो ॥५६६॥
परमात्मा¹ शोभा² उपमा³ पीछे⁴ ब्रह्म⁵ प्राप्ति तक ।
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मू. म.— दादूजी के पंथ में दरद वंद¹ देव² ज्योति,
प्रणऊ³ प्रहलादजी प्रहलाद के पठंतरे ।
वह प्रेम वह नेम वह प्राण प्रीति रीति,
वह मन मायाजित मगन महन्तरे ॥
बह जत वह सत वह रंग रामरत,
निर्मल निर्दोष सुखदाई महासंतरे ।
राघो कहै मन वच कर्म धर्म धारणा से,
जीवत मुक्त भये उपमा अनन्तरे ॥५६७॥
युक्त¹ ईश्वर² प्रणाम³ करता हूँ ।
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मीठे मुख वचन रु कंचन ज्यों कान्ति वन्त,
दिपत ललाट पाट स्वामी प्रहलाद को ।
हाथ को उदार हरि हेत होते राखे नाहीं,
शुद्ध बुद्ध महा-संत जैसे सनकादि को ॥
भगति को पुंज भगवन्त जु रिझायो जिन,
भूत भविष्य वर्तमान आज्ञाकारी आदि को ।
लोपी नाहीं राम रेख प्रीति सेती पूज्यो भेख,
राघो कहै रामजी निवाह्यो व्रत साधको ॥५६८॥
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मू. इ.- कलि काल में आय निहाल भये, प्रहलाद मिले प्रहलाद कि नांई ।
उदार अपार दया सनमान, इसी विधि से रिझिये जिन सांई ॥
शील संतोष निर्दोष रु निर्मल, सन्तत से न दिई कहूं बांई ।
राघो कहै गुरु के गुरु से मिलियो मुजरो¹ कियो राम के तांई ॥५६६॥
चौथे पाद का अर्थ—अपने गुरु बड़े सुन्दरदासजी के गुरु दादूजी से मिलकर अर्थात् उनके उपदेशों के अनुसार साधन करके रामजी से मिलकर उनको प्रणाम¹ किया अर्थात् अपने को रामजी के समर्पण करके रामजी में ही मिल गये ।
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*प्रहलाददासजी की निष्पक्षता*
प्रहलाददासजी महाराज समता प्राप्त निष्पक्ष संत थे । सभी संत व भक्तों में उन की समान दृष्टि थी । जब प्रहलाददासजी ने सुना कि अग्रदासजी के शिष्य नारायणदास (नाभा) जी ने भक्तमाल की रचना की है, तब वे बहुत प्रसन्न हुये थे । फिर उन्होंने उसे आदि से अंत तक पढ़ा तब उसमें उनको एक महान् कमी का अनुभव हुथा . वह था निर्गुण भक्तों की कथायें उसमें नहीं देना । नाभाजी ने वि. सं. १६७० के आसपास भक्तमाल लिखी थी । उस समय तक अनेक निर्गुण ब्रह्म के भक्त हो गये थे किन्तु उनको नाभाजी ने अपनी भक्तमाल में स्थान नहीं दिया और उन निर्गुण भक्तों के समकालीन होने वाले सगुण भक्तों की उसमें कथायें दी हैं ।
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यह पक्षपात प्रहलाददासजी को अच्छा नहीं लगा । इससे एक दिन अपना सत्संग समाप्त होने पर संत सभा में, सामने बैठे हुये अपने पौत्र शिष्य राघवदासजी को प्रहलाददासजी ने कहा— राघवदासजी आप एक ऐसी भक्तमाल लिखो जिसमें किसी भी प्रकार का पक्ष नहीं हो । अपने परम गुरुजी की आज्ञा को संत सभा में स्वीकार करते हुये राघवदासजी ने कहा— आपकी आज्ञा का पालन अवश्य किया जायगा । फिर राघवदासजी ने भक्तमाल लिखी सो प्रसिद्ध है । नाभाजी की भक्तमाल में लगभग चार सौ भक्तों का उल्लेख हुथा है और राघवदासजी रचित भक्तमाल में १२ सौ भक्तों का उल्लेख है । उक्त कथानक से भी ज्ञात होता है कि प्रहलाददासजी निष्पक्ष संत थे तब ही पौत्र शिष्य को ऐसी आज्ञा दी थी ।
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*प्रहलाददासजी की वाणी*
प्रहलाददासजी की वाणी—साखी भाग में अंग ६९ हैं । साखी ३६७ हैं । अरिल १०९ हैं । चौपाई २७ हैं । सोरठा ६ हैं । निसानी ६ । सवैछंद ४८४ हैं । रागों में पद ९५ । राग ३३ हैं । बत्तीस अक्षर प्रमाण से ग्रंथ संख्या १२५० है ।
उदाहरण परिचय अंग से—
उर प्रहलाद प्रकाशिया, पारब्रह्म का तेज ।
सूरज सेन न संभवे, पीव पियारी सेज ॥१॥
गुरु अंग से—
दादू दादा गुरु दिपै, सद्गुरु सुन्दरदास ।
अंग वाकि इक ज्योति हरि, जन प्रहलाद प्रकाश ॥३॥
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*प्रहलाददासजी के शिष्य*
मू. छ.— परम पुरुष प्रहलाद के, शिष्य हरिदास शिरोमणि भयो ॥
कछवाहा कुल आदि, नाम पहले हो हापो ।
पुन परसि प्रहलाद, तज्यो कुल बल क्रम¹ आपो² ॥
कोमल कछवकुमार, नहीं चंचलता हांसी ।
शम दम सुमिरन करे, मोक्ष पद जुगति उपासी ॥
हदफ³ मार हरि को मिल्यो, जन राघव रट अनहद गयो ।
परम पुरुष प्रहलाद के, शिष्य हरिदास शिरोमणि भयो ॥६६१॥
परमपुरुष प्रहलादजी के शिष्यों में हरिदासजी शिरोमणि हुये हैं । इनका आदि कुल कछवाहा(कूर्म) था । ये आमेर नरेश मानसिंह के भाई थे । इनका नाम पूर्वाश्रम में हापाजी था । फिर ये गुरु प्रहलादजी से मिले तब इनने अपना कुल, कर्म¹ संपत्ति, बल आदि छोड़ दिये थे । कुल बलादि के अभिमान से रहित होकर ही अपना व्यवहार चलाया था । और भी सभी प्रकार का अभिमान² छोड़ दिया था । ये कूर्म कुल के हापाजी जब कुमार थे तब भी इनका व्यवहार वृद्धों का सा था । इनमें हंसी आदि चंचलता की बातें तो लेशमात्र भी नहीं थीं । ये मन और इन्द्रियों को रोककर हरि स्मरण ही करते थे । योग युक्ति पूर्वक मोक्षपद की उपासना करनेवाले उपासक थे । अज्ञान के ज्ञान की चोट³ मारकर अर्थात् अज्ञान को गुरु ज्ञान द्वारा नष्ट करके हरि को प्राप्त हुये थे ।
(क्रमशः)

४९. भ्रम विधवंस कौ अंग १३/१६

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*श्रद्धेय श्री Tapasvi @Ram Gopal Das की प्रेरणा से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Meta AI*
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४९. भ्रम विधवंस कौ अंग १३/१६
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तीरथाटन१० फल भोगं, सह्कामं सर्वदा दुखं ।
कहि जगजीवन रांम नांमं, निष्कामं त्रिवृति सुखं ॥१३॥
(१०. तीरथाटन=तीर्थयात्रा) 
तीर्थों में घूमने-फिरने का फल सिर्फ भोग मिलना है, और कामना रखकर किया गया कोई भी काम सदा दुख ही देता है । संत जगजीवन जी कहते हैं कि इसलिए राम नाम को बिना किसी कामना के जपना चाहिए, क्योंकि निष्काम राम नाम जपने से तीनों प्रकार के ताप मिट जाते हैं और सच्चा सुख मिल जाता है ।
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मथुरा गंगा गोमती, कहा पखालै१ अंग ।
जगजीवन हरि नांम का, जो नहिं लाया रंग ॥१४॥ 
(१. पखालै=धोवे, स्वच्छ करे)
मथुरा, गंगा, गोमती में जाकर शरीर को धोने से क्या होगा, अगर मन पर हरि नाम का रंग ही नहीं चढ़ा । संत जगजीवन जी कहते हैं कि जैसे कपड़ा केवल पानी में डुबोने से नहीं रंगता, उसे रंग में डुबोना पड़ता है, वैसे ही बाहर के पानी से मन का मैल नहीं धुलता, मन तो हरि नाम के प्रेम के रंग से ही पवित्र होता है ।
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मांही मथुरा परसिये, मांही केसौ राइ ।
बाहर टापा२ दीन कूं, जगजीवन जिन जाइ ॥१५॥
(२. टापा दीन कूं=उछल कूद करने के लिये)
असली मथुरा अपने भीतर ही है, उसी को परस करो जी, और केशव राय यानी कृष्ण भी अपने भीतर ही बैठे हैं । बाहर दौड़-भाग करना तो केवल दीनता और भटकाव है, संत जगजीवन जी ज्ञानी जन इसलिए बाहर नहीं जाता, वह भीतर ही सब तीर्थों को पा लेता है ।
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घट मंहि मथुरा परसिये, घट मंहि गंगतरंग । 
जगजीवन घट खोजतां, नख सिख लागै रंग ॥१६॥
घट के भीतर ही मथुरा का दर्शन होता है, और घट के भीतर ही गंगा की तरंगें बह रही हैं । संत जगजीवन जी कहते हैं कि जब साधक बाहर नहीं, अपने ही घट को खोजता है, अंतर्मुख होता है, तब उसका नख से शिख तक पूरा शरीर हरि के प्रेम के रंग में रंग जाता है ।
(क्रमशः)

गुरुवार, 15 अक्टूबर 2026

प्रहलाददासजी

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*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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*दादू दत्त दरबार का, को साधु बांटै आइ ।*
*तहाँ राम रस पाइये, जहँ साधु तहँ जाइ ॥*
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मू.इ.—राम रजा¹ रजवंशि² बड़ो सत, सुन्दरदासजि पंथ में पूरो ।
गोप्य रह्यो पसरचो न पसारे में, न्यारे³ में ऊपज्या ज्ञान अंकूरो ॥
निज बोध निरोध कियो निश्चै, उतग्यो घट में पट हो गयो दूरो ।
राघो कहै गुरु दादू की दौलत, मोक्ष भयो कर मंगल तूरो⁴ ॥४८६॥ 
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रामजी की इच्छा¹ से राजवंश² में उत्पन्न बड़े सुन्दरदासजी दादूपंथ में पूरे सन्त हुये हैं यह सत्य है । आप प्रायः गुप्त रूप से ही रहे हैं । बाह्य सांसारिक पसारे में अपने मत को आपने नहीं फैलने दिया था । एकान्त³ रहने से ही आपके हृदय में अनुभव ज्ञानरूप अंकुर उत्पन्न हुआ था । आपने अपने ज्ञान का निरोध किया था अर्थात् विशेष रूप से उपदेश नहीं करते थे । आपका मन निश्चय पूर्वक शरीर के भीतर ही परमात्मा के स्वरूप की गहराई में उतर गया था । इससे आप के अन्तः करण का अज्ञान रूप पट सर्वथा दूर हो गया था । 
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राघवदासजी कहते हैं- गुरु दादूजी की ज्ञान रूप सम्पत्ति से आप परमार्थ रूप मांगलिक नगारा⁴ बजाकर जीवन्‍मुक्ति को प्राप्त हो गये थे । आपके शिष्य एक प्रहलाददासजी ही थे ! अन्य कोई शिष्य आपने नहीं किया था । प्रहलाददासजी को भी दादूजी महाराज की प्रेरणा से ही किया था वैसे तो ये परम विरक्त थे । इनकी वाणी भी नहीं है । ये प्रायः अन्तर्मुख वृत्ति रखते हुये ब्रह्म भजन में लीन रहते थे । इति श्री प्रथम अध्याय समाप्तः १
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अथ अध्याय २
प्रहलाददासजी
प्रहलाददासजी पूर्व आश्रम में बीकानेर नरेश के पुरोहित थे किन्तु बीकानेर नरेश जैतसिंहजी के पुत्र भीमराजजी जब दादूजी के शिष्य होकर बड़े सुन्दरदास बन गये तब दादूजी की आज्ञा से प्रहलादजी भी बड़े सुन्दरदासजी के शिष्य होकर प्रहलाददास बन गये । फिर गुरुजी के साथ ही रहने लगे । घाटड़े के पर्वत शिख पर सुन्दरदासजी प्रहलाददासजी की मैंड़ी नामक आश्रम में जब तक सुन्दरदासजी ब्रह्म भजन करते रहे तब तक प्रहलाददासजी भी उनके पास ही रहकर भजन करते रहे । 
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फिर जब सुन्दरदासजी वहां से विचर गये तब प्रहलाददासजी भी पर्वत से नीचे उतर ग्राम में धीरावत ठाकुरों की कोटडियों से कुछ दूर पर आकर विराजे और वहां ही भजन करने लगे । फिर वहां ही भक्तों ने प्रहलादशाल नामक आश्रम बनवा दिया । उसी में रहकर प्रहलाददासजी भजन करने लगे । प्रहलादशाल की चौखट के ऊपर के भाग में प्रहलाददासजी महाराज की मूर्ति भी खुदी हुई है ।
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स्थान का परिचय राघवदासजी ने भी भक्तमाल में दिया है, वह भी यहां देते हैं देखिये-
मू. छ. - वहर¹ वहत्तर देश, छीड़ ताहू में छोटी ।
धन्य स्वामि प्रहलाद, भक्ति तहं थापी मोटी ॥
द्वन्द्वपुरी ग्रति दिपै, तहां स्वामी की शाला ।
संग रह सन्त ग्रनन्त, करें हरिजी प्रतिपाला ॥
शुक्ल² धर्म को धार, मिल्यो धीरावत भरथो ।
सत-संगति से नेह, रचे पद साखी ग्ररथो ॥
दिन प्रति द्वादश कोटड़ी, न्यौतैं दल मंगल करें ।
रंग लागो राघो कहै, गुरु द्वारे सर्वस धरें ॥६६६॥
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वाहर¹ के ७२ देश हैं, उनमें सबसे छोटा छीड़ देश है । उस छीड़ में महान् भगवद् भक्ति की स्थापना की, उन स्वामी प्रहलादजी को धन्य है । उस देश में द्वन्द्वपुरी में स्वामी प्रहलाददासजी की भजन शाला है । इससे वह ग्राम ग्रति प्रकाशित हुथा है . द्वन्द्वपुरी में ही पहले रहे थे । पीछे घाटड़ा गये थे । द्वन्द्वपुरी घाटड़ा के ग्रास-पास ही है । वहां भी प्रहलादजी की शाला है । आपके संग ग्रनन्त संत रहते थे, उन सब का योग-क्षेम रूप पालन भगवान् ही करते थे । 
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आपके संग से शुद्ध² भागवत धर्म को धारण करके धीरावत भरतजी आपके साथ ही मिल गये थे ग्रर्थात् आपके समान ही भजन करने लग गये थे । भरतजी का सत्संग से अति स्नेह था । साखी औरर पदों का ग्रर्थ भरतजी को बहुत रुचिकर होता था । ये भरतजी आदि धीरावत ही द्वन्द्वपुरी से सुन्दरदासजी ग्रौर प्रहलाददासजी को घाटड़े ले गये थे । वैसे तो घाटड़े में धीरावतों के उस समय तीन सौ पचास के लगभग घर थे किन्तु १२ कोटड़ियां मुख्य थीं । प्रतिदिन ही घाटड़े की प्रहलादशाल पर उन १२ कोटड़ियों में से किसी एक का निमंत्रण आता था । 
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इस प्रकार १२ मास ही प्रहलादजी को सब संतों के साथ भोजन करा कर अपने घरों में मंगलाचार करते थे तथा सब ही लोग मांगलिक काम करते थे । गुरुवर स्वामी प्रहलादजी की कृपा से धीरावतों के रामजी का प्रेमरूप रंग लग  गया था । अतः वे लोग सन्त सेवा संबंधी सब ही वस्तुयें ले जाकर अपने गुरु प्रहलादजी के द्वार पर भेंट करते थे ।
(क्रमशः)

४९. भ्रम विधवंस कौ अंग ९/१२

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*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
*श्रद्धेय श्री Tapasvi @Ram Gopal Das की प्रेरणा से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Meta AI*
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४९. भ्रम विधवंस कौ अंग ९/१२
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असम५ अंस उतपति अनल, सुलभा६ निरखि समाइ ।
कहि जगजीवन ऊबरै, रांम रिदै ल्यौ लाइ ॥९॥
{५. असम=अश्म(पत्थर) के अन्दर से अग्नि(अनल) उत्पन्न होती है}   (६. सुलभा=आसानी से मिल जाती है) 
पत्थर से भी अंश निकलता है, अग्नि उत्पन्न होती है, जो सुलभ हो कर उसी में समा जाती है । संत जगजीवनदास जी कहते हैं कि वैसे ही यदि राम को हृदय में लौ लगा कर रखो तो जीव मुक्त हो जाता है, उबर जाता है ।
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कोई बंदै७ चंद्रमा, कोई बंदै सूर ।
हरिजन बंदै एक हरि, जगजीवन निज नूर ॥१०॥
(७. बंदै=प्रणाम करना)
कोई चंद्रमा को पूजता है, कोई सूरज को पूजता है । पर सच्चा हरिजन तो एक हरि को ही भजता है । संत जगजीवनदास जी कहते हैं कि वही हरि ही अपना निज नूर है, अपना प्रकाश है ।
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जिन जिन का जे इष्ट है, तिन कौं तिन की मांन८ ।
कह जगजीवन रांम उपासक, दूजी करै न कांन९ ॥११॥
(८. मांन=मर्यादा)    (९. कांन=संकोच)
जिसका जो इष्ट है, उसे वही मान्य है । संत जगजीवनदास जी कहते हैं कि जो राम का उपासक है, वह दूसरी किसी बात पर कान नहीं देता, वह एकनिष्ठ रहता है ।
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मुख* ना मांथौ सबद कै, गूंगी बांणी ग्यांन ।
कहि जगजीवन रांम तजि, इष्ट कथैं जे आंन* ॥१२॥
(*-*. जो उपदेशक राम के अतिरिक्त अन्य देवता की उपासना का उपदेश करते हैं उन की बातों में न शिर है न पैर और न उनकी वाणी में सार है ॥१२॥)
जो राम को छोड़ कर दूसरे को इष्ट बताते हैं, उनके शब्द का कोई मुख नहीं, कोई सिर नहीं है, वह गूंगी वाणी जैसा अज्ञान है । संत जगजीवनदास जी कहते हैं कि राम को छोड़ कर आन इष्ट की बात करना व्यर्थ है ।
(क्रमशः)

बुधवार, 14 अक्टूबर 2026

*२९. साधु महिमा का अंग ~१/४*

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साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*२९. साधु महिमा का अंग ~१/४*
इस अंग में साधु महिमा सम्बन्धी विचार करेंगे -
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*रज्जब साधु अगाध है, कहिये कौन समान ।*
*देखो शिव शक्ति सहित, सेवक ह्वैं तहँ आन ॥१॥*
संतों की महिमा अगाध है । कहिये, उनकी महिमा के समान किसकी महिमा है, देखो तो सही, संतों के स्थान में आकर माया के सहित ब्रह्म भी सेवक होकर रहते हैं ।
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*सकल धरे ऊपर धर्या, सांई अपना साध ।*
*रज्जब महिमा क्या कहै, अस्थल अगम अगाध ॥२॥*
परमात्मा ने अपने संतों को संपूर्ण मायिक प्रपंच के उपर रक्खा है, हम उनकी महिमा क्या कर सकते हैं ? उनकी महिमा रूप स्थान अति अगम और अगाध है ।
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*कीये में नाँहीं किया, साधु सम कोउ और ।*
*आप समाना इन्हौं में, इनको दी उर ठौर ॥३॥*
ईश्वर ने अपने बनाये हुये संसार में संत के समान अन्य कोई भी नहीं बनाया है, संतों के हृदय में स्वयं भगवान समाये रहते हैं और अपना हृदय रूप स्थान संतों को दिया है अर्थात संतों का विशेष ध्यान रखते हैं ।
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*साधु दिल सांई रहै, हरि हिरदै में साध ।*
*रज्जब महिमा क्या कहै, ठाहर उभय अगाध ॥४॥*
संतों के हृदय में परमात्मा रहते हैं और परमात्मा के हृदय में संत रहते हैं, संत और परमात्मा इन दोनों का ही महिमा रूप स्थान अगाध है, उसका कथन मैं पूर्ण रूप से कैसे कर सकता हूँ ?
(क्रमशः)

बखतावरसिंह खेतड़ी

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🌷*卐 श्री दादूदयालवे नम:  卐*🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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*दादू धरती ह्वै रहै, तज कूड़ कपट अहंकार ।*
*सांई कारण सिर सहै, ताको प्रत्यक्ष सिरजनहार ॥*
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यहां पर जिन संतों को दर्शन की अभिलाषा थी उनको दर्शन दिया और आसोज सुदि चौदस को वहां अन्तर्धान हुये थे । अतः आसोज सुदि १४ को उस स्थान में भारी मेला लगता है । हालू के वंशज निर्वाण क्षत्रिय ही उस मंदिर के पुजारी हैं । यह सुन्दरदासजी के मेले के नाम से खेतड़ी के आसपास प्रसिद्ध है । इस मेले में यात्री दूर दूर से आते हैं । जो उनकी कामनायें होती हैं वे पूर्ण होती हैं । मेला में बहुत चढ़ावा आता है । 
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एक समय बखतावरसिंह खेतड़ी ने पूजा का बटाने का प्रस्ताव रखा था । पूजा बांटने से और उसे अपने लेने से बहुत हानि हुई और शरीर में भी रोग हो गया । फिर वहां जाकर चरणों में पड़ा और भेंट का कूप चढ़ाया तब अच्छा हुआ । 
सोई कहा भी है—
बखतावर सिंह खेतड़ी, कहि पूजा बट चाय ।
बहु अफाज तन दुखित बहु, पद परि कूप चढ़ाय ॥ सुन्दरोदय
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उक्त घटना के बहुत पीछे की एक घटना पांचेटिया के दुरसा चारण के वंशज पहाड़दान की मुझे पांचेटिया की दरियाव बाई ने सुनाई थी सो इस प्रकार है— दुरसा चारण रज्जबजी के शिष्य थे । अतः उनके वंशज दादूजी को ही अपना इष्ट मानते आये हैं । उनमें एक पहाड़दानजी उत्तराखंड की यात्रा के लिये गये थे । एक दिन मार्ग भूल गये । इससे वे बहुत व्यथित हुये और उन्होंने व्यथित हृदय से दादूजी महाराज का स्मरण किया तब थोड़ी ही देर में उनको एक संत आते दिखाई दिये । 
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पहाड़दानजी ने संतजी के पास जाकर सत्यराम बोलते हुये प्रणाम किया । फिर कहा— भगवन् ! मैं मार्ग भूल जाने से अत्यन्त व्यथित था अब आपके दर्शन से मुझे शांति मिली है । अपने इष्टदेव दादूजी महाराज का स्मरण करते ही आपका दर्शन हुआ है । इससे मैं उनकी कृपा ही आपके दर्शन में कारण समझ रहा हूँ । अब आप मुझे मार्ग बताने की कृपा करें । संतजी ने उसे अच्छी प्रकार मार्ग बता दिया । फिर उसने पूछा- भगवन् ! आपके शरीर का नाम क्या है ? आप कौन हैं ? 
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संतजी ने कहा- जिनका तुमने स्मरण किया था, मैं उन दादूजी महाराज का शिष्य हूँ, मैंने अपनी योग शक्ति से तुम्हारी स्थिति जान ली थी अतः तुमको मार्ग बताने के लिये ही बहुत दूर से योग शक्ति द्वारा यहां तुम्हारे पास ही प्रकट हुआ हूँ । मेरे शरीर को बड़े सुन्दरदास के नाम से बोलते हैं । इतना कहकर संतजी वहां ही अन्तर्धान हो गये । पहाड़दान सुन्दरदासजी के दर्शन कर अपने को कृतार्थ मानने लगा और दादूजी महाराज  का स्मरण करते हुये मार्ग से पर्वत के नीचे उतर कर यात्रा करता हुआ अपने ग्राम पांचेटिया में आ गया । 
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इस घटना से भी सूचित होता है कि बड़े सुन्दरदासजी हिमालय में अब भी भजन कर रहे हैं । दादूजी महाराज ने उनको कहा था- गुप्त रह कर भजन करना और पुण्यवान को दर्शन देना । वैसे ही वे रहते हैं । बड़े सुन्दरदासजी का समाज में निर्वाण दिन नहीं माना जाता है । इससे भी सूचित होता है कि वे अब तक विद्यमान हैं । 
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बड़े सुन्दरदासजी की स्थिति भक्तमाल के कर्ता राघवदासजी के विचारानुसार बड़े सुन्दरदासजी की स्थिति देखिये- मू. इ.-
दादू दयाल की शाल¹ शिरोमणि, ऐसे घड़े घट उपमा लायक ।
नारद ज्यों निश्चय निर्भय किये, ज्ञान परापरि² बेहद वायक ॥
भीम ज्यूं भर्म उड़ायो आकाश को, ऐसो बली सिध साधु सहायक ।
राघो कहै पुनि वृद्धि पछोप³ की, एक से एक अनूप महायक⁴ ॥४८५॥
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दादू दयालजी की सत्संग रूप श्रेष्ठ टकशाल¹ में बड़े सुन्दरदासजी ऐसे उत्तम सन्त रूप घट बनाये गये हैं जो अति उत्तम उपमा देने योग्य हैं । दादूजी ने अपने सत्संग में अपने शिष्यों को नारदजी के समान भक्ति विषय में निश्चय वाले तथा निर्भय बना दिये थे । दादूजी के परात्पर² परब्रह्म ज्ञान के सम्बन्धी वचन असीम हैं अर्थात् ब्रह्मज्ञान और ब्रह्म को असीम बताने वाले हैं । जैसे भीम ने युद्ध के समय हाथियों को आकाश में उड़ा दिया था, वैसे ही दादूजी ने अपने सत्संग में आने वाले शिष्यों के हृदय से अज्ञान को उड़ा दिया था ।
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दादूजी ऐसे परमार्थ बल से युक्त बली और साधक सन्तों के सहायक सिद्ध सन्त थे । राघवदासजी कहते हैं कि फिर आपके पीछे³ भी आप की शिष्य परंपरा में ऐसे ही सन्तों की वृद्धि हुई जो एक से एक अधिक और अनुपम है । इन बड़े सुन्दरदासजी जैसे अनेक महान्⁴ महात्मा हुये हैं ।
(क्रमशः)