बुधवार, 21 अक्टूबर 2026

देवादासजी सिद्ध पुरुष

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*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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*अन्तर सोई नीका जाणै,*
*निमिष न बिसरै ब्रह्म बखाणै ॥*
*सोई सुजाण सुधा रस पीवै,*
*दादू देखि जुग जुग जीवै ॥*
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एक समय अर्थ की न्यूनता से देवादास जी के गुरु भाई महन्त लच्छीराम जी चिन्तित थे । उनके मन की स्थिति जानकर देवादासजी ने महन्त जी को कहा- महन्तजी चिन्ता क्यों करते हो आप जितना भी खरीद सको उतना ही जीरा खरीद लो, उससे आपकी सब चिन्ता मिट जायगी । महन्त लच्छीरामजी तो जानते ही थे कि देवादासजी सिद्ध पुरुष हैं । इनकी वाणी यथार्थ ही होती  है । अतः उन्होंने अपनी शक्ति भर जीरा खरीद लिया । फिर उस वर्ष जीरा बहुत महंगा हो गया था । इससे एक ही वर्ष में महन्त लच्छीरामजी की चिन्ता नष्ट हो गई थी । कहा भी है-
"जान लेते हैं भविष्य भी, योगीजन अन्यास ।
देवादास ने महन्त की, सहज मिटाई त्रास ॥ह.त. १०॥
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देवादासजी आगामी बात पहले ही जान जाते थे यह अति प्रसिद्ध है । जब कोई संतों की मंडली आने वाली होती थी तो देवादासजी को ज्ञात हो जाता था कि अमुक मंडलेश्वर की मंडली आ रही है । तब वे महन्त जी के पास जा कर कहते- महन्त जी गेहूं दे दो । गेहूं खाने वाले महात्माओं की मंडली आ रही है जिससे पहले ही पीस कर आटा तैयार कर दिया जाय । महन्तजी दे देते थे कारण वे जानते थे कि इनको पहले ही पता लग जाता है संतोंकी सेवा करने से ही देवादासजी की दिव्य दृष्टि हो गई थी । कहा भी है-
"साधु सेवसे होत है, दिव्य दृष्टि सत बात ।
नाभा देव दास अरु, सन्त भक्त की ख्यात ॥३३०॥ह.त. ७॥
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देवादासजी जब गेहूं व जौ पीसते थे तब जिस मकान में पीसते थे उसका किवाड़ बन्द कर लेते थे । एक दिन किवाड़ बन्द करना भूल गये । द्वार खुला होने से एक संत उनके पास चले गये तो उन्होंने देखा देवादासजी तो ध्यानस्थ हैं और चक्की अपने आप ही फिर रही है । यह आश्चर्य देखकर संत महन्त जी के पास गये और महन्तजी से बोले- महाराज ! देवादासजी की पीसने की कुटिया खुली देखकर मैं उसमें गया तो मैंने देखा- देवादासजी तो चक्की से दूर बैठे हुये ध्यान में निमग्न हैं और चक्की अपने आप ही फिर रही है । तथा अपने आप उसमें गेहूं पड़ रहे हैं ।
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तब महन्त लच्छीरामजी ने स्वयं ही जाकर देखा तो वास्तव में ही चक्की अपने आप घूम रही है और आवश्यकतानुसार गाला(अन्न के दाने) भी अपने आप ही चक्की में पड़ते जाते हैं तथा सिद्ध संत देवादासजी दूर बैठे ध्यान कर रहे हैं । फिर महन्तजी ने उनका पीसना छुड़ा दिया । देवादासजी भिक्षा लेने जाते थे । वे एक दिन अपने काकी के घर भिक्षा लेने गये थे । देवादासजी को आया हुआ देखकर काकी ने कहा - नाज तो थोड़ा हुआ है और बोहरा अधिक मांगता है । बोहरा जितना मांगता है, उतना बोहरा को तोल दें तो खाने के लिये भी नहीं बचेगा ।
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यह सुनकर देवादासजी ने कहा- तू बोहरा को पूरा तोल दे, तेरे खाने के लिये रह जायगा । फिर उसने बोहरा को बुलवाकर वह जितना मांगता था उतना सब तोल दिया और अपने घर के खाने के लिये जितना १२ मास में चाहिये था वह भी सब अपनी मिट्टी की कोठली आदि सब भर गये किन्तु फिर भी वह अन्न राशि कम नहीं हुई उतनी की उतनी ही रही । तब काकी दौड़कर प्रहलादशाल पर आकर देवादास जी को बोली- देवला ! मैंने बोहरे को भी चुका दिया और १२ महिने घर में खाने के लिये भी बहुत रख लिया है किन्तु तो भी नाज की राशि कम नहीं होती है ।
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काकी की उक्त बात सुनकर देवादासजी बोले- उस अन्न राशि पर ऊंधा टोकरा लगा दे । फिर उसने उस अन्न पर ऊंधा टोकरा रख दिया और कुछ देर के पश्चात् उठा कर देखा तो एक दाना भी नहीं मिला । इससे सूचित होता है कि देवादासजी की आज्ञा में ऋद्धि सिद्धि भी रहती थीं किन्तु देवादासजी अपने लिये उनका कुछ भी उपयोग नहीं करते थे । देवादासजी तमाखू का डांड अपनी डाह में रखा करते थे । इससे वे तमाखू का डांड मांगा करते थे । एक दिन अपने पूर्वाश्रम के घर की बाई से उन्होंने तमाखू का डांड मांगा । बाई ने तत्काल लाकर दे दिया ।
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उससे प्रसन्न होकर देवादासजी ने कहा - बाई तेरे नवें महीने बेटा होगा । यह सुनकर बाई घबराई और बोली - बाबाजी ! मैं तो विधवा हूँ, मेरे लिये तो यह महा दुःख की बात है । देवादासजी ने कहा - बाई ! अब तो मेरे मुख से निकल गया, बेटा तो होगा ही । जब उसके गर्भ चिन्ह प्रकट हुए तब जाति वालों ने पंचायत की और उससे पूछा । तब वह संकट में पड़ गई किसका नाम बतावे ।
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देवादासजी को ज्ञात हुआ तो वे पंचायत की सभा में जाकर बोले - इस बाई का कोई दोष नहीं, यह तो मेरे राम के मुख से तेरे बेटा होगा यह निकल गया था । अतः इसे आप लोग जाति बाहर मत करो । देवादासजी को सब जानते ही थे कि ये सिद्ध पुरुष हैं इनके मुख से निकलने पर तो बात सत्य ही होती है । अतः उस बाई को जाति बाहर नहीं निकाला । इससे सूचित होता है कि देवादासजी का प्रभाव जनता पर अत्यधिक था ।
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एक दिन देवादासजी महन्तजी की घोड़ी को वन में छोड़ने को गये थे । वे उसे छोड़कर आये ही थे कि थोड़ी देर में घोड़ी स्थान पर पीछे आ गई । तब महन्तजी ने कहा - देवादासजी ! घोड़ी तो पीछे आ गई । इसको आगे छोड़कर आओ जिससे पीछे नहीं आवे । देवादासजी बोले - पीछे नहीं आवे ऐसे छोड़ आऊं क्या ? महन्तजी ने कहा - हां, ऐसे ही छोड़ आओ । फिर देवादासजी घोड़ी को छोड़कर आ गये । उस दिन घोड़ी लौटकर नहीं आई । उसे सिंह खा गया ।
(क्रमशः)

*४९. भ्रम विधवंस कौ अंग ३३/३६*

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*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
*श्रद्धेय श्री Tapasvi @Ram Gopal Das की प्रेरणा से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Meta AI*
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*४९. भ्रम विधवंस कौ अंग ३३/३६*
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*ए व्रत संजम ए क्रिया, ए सुच्या९ ए ग्यांन ।*
*जगजीवन निज निरखिये, अंतर गति धरि ध्यांन ॥३३॥*
{९ सुच्या=शुचि(तन मन की शुद्धि)}
संत जगजीवनदास जी कहते हैं, ये बाहरी व्रत, संयम, तरह-तरह की क्रियाएँ, तन-मन की शुचि और किताबी ज्ञान ये सब तभी सार्थक हैं, जब अपने निज स्वरूप को भीतर देखो । अंतर की गति में ध्यान धर के अपने आप को निरखो । बाहर का सब दिखावा भीतर के दर्शन के बिना व्यर्थ है ।
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*एक दस एकादसी, ए व्रत उत्तम सार ।*
*जगजीवन दूजी करै, सोई मूढ़ गंवार ॥३४॥*
वो जो एक में परमात्मा में दशा लग जाने वाली एकादशी है, वही व्रतों में सबसे उत्तम और सार है । संत जगजीवनदास जी कहते हैं, जो इस एक अनन्य व्रत को छोड़ कर दूसरी-दूसरी एकादशी केवल भूखे रहने वाली करता फिरता है, वो मूढ़ और गँवार ही है ।
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*जगजीवन निज निरजला, भजतां निरमल नांम ।*
*साधन१ का सांचा वरत, दुनियां का बेकांम ॥३५॥*
{१. साधन का=साधु सन्तों का}
संत जगजीवनदास जी कहते हैं, हमारा अपना सच्चा निरजला व्रत यही है कि निरमल नाम राम नाम को भजते रहें । साधु-संतों का यही सच्चा व्रत है । दुनिया के कहने के लिए किया गया भूखा रहने वाला व्रत तो बेकाम-बेकार है ।
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*कहि जगजीवन गया२ की, संगति गया बिलाइ ।*
*पिंड भरण तीरथ गया, रह्या न हरि गुन गाइ ॥३६॥*
(२. गया की=गया तीर्थ जाने वाले की)
संत जगजीवनदास जी चेताते हैं - जो व्यक्ति गया तीर्थ जाकर पिंड भरने के चक्कर में पड़ गया, वो सत्संगति से गया-बिलाया, अर्थात सत्संग से चूक गया, खो गया । वो गया तो पिंड भरने तीर्थ को, पर हरि के गुण गाना ही छोड़ बैठा । तीर्थ से बड़ा तो हरि का गुणगान है ।
(क्रमशः) 

मंगलवार, 20 अक्टूबर 2026

*२९. साधु महिमा का अंग ~२५/२८*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*२९. साधु महिमा का अंग ~२५/२८*
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*अकलि१ अल्प उनमान२ तुच्छ, जो कुछ कहै बनाय ।*
*रज्जब सांई साधु की, महिमा कही न जाय ॥२५॥*
ईश्वर और संत की महिमा कहते समय जो कुछ भी बनाकर कहा जाय, उसमें कहने वाले की बुद्धि१ अल्प और अनुमान२ भी तुच्छ ही सिद्ध होते हैं, कारण, ईश्वर और संत की महिमापूर्ण रूप से कथन नहीं की जा सकती ।
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*रज्जब महिमा साधु की, मोपै कही न जाय ।*
*आदि अंत मधि मांड में, जो निबहै इक भाय१ ॥२६॥*
जो संत जीवन के आदि, मध्य, अंत तक इस ब्रह्मांड में संतपने के भाव१ का एक रस निर्वाह कर लेता है, उस संत की महिमा मेरे से पूर्ण रूप से नहीं कही जा सकती ।
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*एक रंग राता रहै, दूजे रंग रुचि नाँहिं ।*
*जन रज्जब ता संत सम, को कहिये कल माँहिं ॥२७॥*
जो एक अद्वैत ब्रह्म-रंग में अनुरक्त रहता है, द्वैत रूप विषय-रंग की प्रीति जिसमें नहीं होती, उस संत के समान इस कलयुग में किस को कहा जा सकता है ? अर्थात उसके समान कोई नहीं है ।
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*बन्दे एक खुदाय के, आदि अंत मधि अब्ब ।*
*जन रज्जब मस्तक धरै, मन वच कर्म सौं सब्ब ॥२८॥*
सृष्टि के आदि काल के, मध्यकाल के, अन्त के और अब वर्तमान काल के ईश्वर के प्यारे संत सभी एक से हैं, हम तो मन, वचन और कर्म से सभी को मस्तक पर धारण करते हैं अर्थात शिरोमणि समझते हैं ।
(क्रमशः) 

*२९. साधु महिमा का अंग ~२१/२४*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*२९. साधु महिमा का अंग ~२१/२४*
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*नाम निनिमे१ के धरे, करी सु सेवा ठौर ।*
*ताथे रज्जब राम के, साधु सवा२ न और ॥२१॥*
नाम रहित१ निरंजन राम के नाम धरे है और निष्काम अवस्था रूप स्थान में स्थित रहकर भक्ति की है, इसलिये राम के प्रिय संत के चतुर्थाश२ के समान भी अन्य नहीं हो सकते हैं ।
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*रज्जब भक्त भण्डार में, राख्या नाँणा नाम ।*
*तो देखो भगवन्त घर, साधु शिरोमणि ठाम ॥२२॥*
संत ने अपने अन्त:करण रूप भण्डार में नाम रूप धन रक्खा है तब ही तो देखो, भगवान ने अपने संसार रूप घर में संत को सर्वशिरोमणी स्थान प्रदान किया है, अर्थात संत को अपना स्वरूप ही बताया है ।
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*व्योम विराजे धू धरे१, पाताल पन्नगपति२ संत ।*
*रज्जब मंडन३ मांड के, मन वच कर्म महंत४ ॥२३॥*
संत ध्रुव आकाश में विराजते हैं और संत शेषजी२ पाताल में रक्खे१ गये है, फिर भी हम मन, वचन कर्म से कहते हैं कि महान्४ संत सभी ब्रहमाण्ड के भूषण३ हैं, चाहे वे कहीं भी विराजें ।
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*मात मही मधि पैठि१ कर, सुमिरे शुकदेव शेष ।*
*रज्जब छिप्यों न वित२ छिपे, प्रकट भये सब देस ॥२४॥*
शुकदेव के माता के उदर में प्रवेश करके और शेषजी ने पृथ्वी में प्रवेश१ करके स्मरण किया, इस प्रकार छिपने पर भी उनका भजन-रूप धन२ नहीं छिप सका, वे दोनों विश्व में सभी देशों में प्रकट हो गये हैं ।
(क्रमशः)

*गुरुदेव का अंग~१, ४/६*

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*श्री दादूवाणी भावार्थ = Meta AI*
*गुरुदेव का अंग~१, ४/६*
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*दादू सतगुरु सहज में, किया बहु उपकार ।*
*निर्धन धनवंत करि लिया, गुरु मिलिया दातार ॥४॥*
सतगुरु का उपकार बिना किसी कठिन साधना के सहज में ही मिल गया । दादू जी कहते हैं, मैं ज्ञान और राम-नाम के धन से निर्धन था, सतगुरु ने कृपा करके मुझे उसी अविनाशी धन से धनवंत बना दिया । मुझे कोई साधारण गुरु नहीं, बल्कि सब कुछ लुटा देने वाले दातार मिल गये ।
*In effortless Sahaj, my Satguru blessed me so,*
*This pauper poor He made me rich with wealth that ever glows.*
In His natural grace, Satguru showered boundless grace. I was poor in spiritual wealth, He made me rich with Ram-Naam. I found the true Giver.(4)
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*दादू सतगुरु सूं सहजैं मिल्या, लिया कंठ लगाइ ।*
*दया भई दयाल की, तब दीपक दिया जगाइ ॥५॥*
सतगुरु सहज में ही मिल गये, कहीं खोजने नहीं जाना पड़ा । मिलते ही उन्होंने बड़े प्रेम से कंठ से लगा कर अपना बना लिया । जब उस दयालु की दया बरसी, तब मेरे भीतर का बुझा हुआ ज्ञान-दीपक फिर से जल उठा ।
*In Sahaj my Satguru met me, held me to His heart,*
*With Daya of the Dayal, He lit my darkened lamp.*
Satguru met me effortlessly and embraced me with love. When the Merciful One's grace descended, He lit the unlit lamp of knowledge within me.(5)
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*दादू देखु दयाल की, गुरु दिखाई बाट ।*
*ताला कूंची लाइ कर, खोले सबै कपाट ॥६॥*
दादू जी कहते हैं, जरा उस दयाल की दया तो देखो । दुनिया भटकाती है, पर गुरु ने मुझे परमात्मा तक जाने की सच्ची बाट दिखा दी । मेरे हृदय पर अहंकार और अज्ञान का ताला लगा था, गुरु नाम की कुंजी ले कर आये और सारे कपाट खोल दिये ।
*Behold the Dayal's grace, my Guru showed the Way,*
*He brought the Key and opened wide each bolted door and gate.*
Behold the grace of the Merciful! Guru alone showed the true inner Path. He brought the Key of Naam and opened all locked doors of my heart.(6)
(क्रमशः) 

*हरिचरणजी का सम्मान*

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*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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*कोई नहिं करतार बिन, प्राण उधारणहार ।*
*जियरा दुखिया राम बिन, दादू इहि संसार ॥*
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*हरिचरणजी का सम्मान*
घाटड़ा के महन्त हरिचरणजी को वि. सं. १९०९ के दादूद्वारा नारायणा के मेले में आचार्य नारायणदासजी महाराज ने जमात के पंचों के आग्रह से भेंट लेकर छड़ी रखने का अधिकार दिया था तथा जमातों के ११ अखाड़ों के महन्तों के समान ही घाटड़ा के महन्तों का सम्मान करना नियत किया था ।
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*हरिचरणजी के शिष्य*
महन्त हरिचरणदासजी घाटड़ा वालों के १९ शिष्य थे- देवादासजी, दोलजी, लच्छीरामजी आदि । दोलजी विरक्त हो गये थे । गिरधारीदासजी दूबल धनियां की मंडली में रहते थे । मंडलेश्वर जुगतरामजी के संरक्षक दोलजी ही थे । लच्छीरामजी हरिचरणजी की गद्दी पर विराजकर घाटड़ा के महन्त बने थे ।
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*सिद्ध संत देवादासजी*
महन्त हरिचरणदासजी घाटड़ा वालों के शिष्यों में देवादासजी महान् सिद्ध पुरुष हुये हैं । देवादासजी का जन्म घाटड़ा के ही कुंभावत कुल में हुआ था । जब वे बोलने लगे तब "अब बाबा के पग जाबा" यही सब दिन भर बोलते रहते थे । तब उनके घरवालों ने सोचा कि- यह बालक हर समय "अब बाबा के पग जाबा" ही बोलता रहता है, और इसकी चेष्टा भी अन्य बालकों से निराली ही है और महात्माओं की सी चेष्टा करता है । अतः हो सकता है, प्रारब्धवश किसी महात्मा ने ही हमारे कुल में जन्म लिया हो । इसलिये इसे महात्मा के ही भेंट कर देना चाहिये ।
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फिर घरवालों ने अपने देवला नामक उस बालक को घाटड़ा के महन्त हरिचरणजी को भेंट कर दिया । महन्त हरिचरणजी ने देवला को अपना शिष्य बना कर नाम देवादास रख दिया । देवादास अपने गुरुदेव हरिचरणजी से दादूवाणी में कथित निर्गुणराम की निर्गुण भक्ति की पद्धति जान कर निरन्तर निगुणाराम का भजन करने लगे । अब उन्होंने 'अब बाबा के पग जाबा'' बोलना तो छोड़ दिया था और उसके स्थान में ''देव तुम्हारा भेव न जाने'' यह दिन भर बोलते रहते थे । और भजन करते थे ।
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जब कुछ बड़े हो गये तब हाथ में टोकरी लेकर 'देव तुम्हारा भेव न जाने'' बोलते हुये कंड़े चुनने जंगल में चले जाते थे । कंडे चुनते जाते थे और ''देव तुम्हारा भेव न जाने'' बोलते जाते थे । टोकरी कंडों की भर जाती थी तब ''देव तुम्हारा भेव न जाने'' बोलते हुये कंडों की टोकरी सिर पर धर कर स्थान में लाकर डाल देते थे । कभी-कभी कंडों की टोकरी भर जाती और उनको आगे जाने की इच्छा होती तो टोकरी के कंडे पृथ्वी पर डाल कर टोकरी खाली कर लेते और वहाँ से आगे चलने लगते तब बोलते- इन कंडों को कोई भी उठायेगा तो उसको बिच्छू काट खायेगा । उनके कंडे कोई भी नहीं उठाता था । वे ''देव तुम्हारा भेव न जाने'' बोलते हुये जहां तक उनकी इच्छा होती वहाँ तक जाकर लौट आते और कंडे सब लाकर स्थान में डाल देते । गाय भैंसों का गोबर भी आप ही थापते थे ।
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और कुछ बड़े हो गये तब आटा पीसने की सेवा भी करने लगे थे । आप शरीर पर कौपीन मात्र ही वस्त्र रखते थे । आगामी घटनाओं को भी पहले ही जान जाते थे । वि. सं. १९१९ में महन्त हरिचरणजी का चातुर्मास उदयपुर जमात में था । देवादास जी भी साथ ही थे । एक दिन देवादासजी ने महन्त जी से कहा आज अपनी घाटड़ा की प्रहलाद शाल के पीछे से दीवार तोड़कर चोर घुस गये हैं । तब महन्तजी कुछ चिन्ता करने लगे तो देवादास जी ने कहा- चिन्ता की कोई बात नहीं है, चोर अन्धे हो गये हैं, उनको निकलने का मार्ग नहीं मिल रहा है । प्रातः काल स्थान के संरक्षक उनको पकड़ कर अपना सब माल उनसे ले लेंगे । अपना कुछ भी नहीं जायगा ।
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दीवार तोड़ी है उसको भी वे ही बना देंगे और भविष्य में स्थान में चोरी नहीं करने की शपथ भी ले लेंगे । वे जाति के मीणे थे । भविष्य में मीणा जाति का कोई मनुष्य इस स्थान में चोरी नहीं करेगा । यह प्रतिज्ञा जब करी तब उनको पूर्ववत दीखने लगा था । फिर वे मंदिर में प्रणाम करके अपने घरों को लौट सके थे । फिर हरिचरणजी ने एक साधु को भेज कर समाचार मंगवाये तो देवादासजी की सब बात सत्य निकली थी ।
(क्रमशः)

*४९. भ्रम विधवंस कौ अंग २९/३२*

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*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
*श्रद्धेय श्री Tapasvi @Ram Gopal Das की प्रेरणा से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Meta AI*
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*४९. भ्रम विधवंस कौ अंग २९/३२*
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*जलमइ५ सकल सरीर ये, जल ही मांही बास ।*
*कहि क्यों रहिये निरजला, सु कहि जगजीवनदास ॥२९॥*
{५. जलमइ=जलमय(जलयुक्त)} 
संत कहते हैं कि यह हमारा सारा शरीर ही जल से बना है । खून, पसीना, रस सब जल ही है । और हमारा वास भी जल में ही है - माता के गर्भ में हम जल में ही रहे । फिर हे साधक ! तू बाहर से पानी न पीने का दिखावा करके कैसे निरजला रह लेगा ? शरीर का धर्म तो जल से ही है । असली निरजला तो मन का होना चाहिए ।
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*एक जला इक निरजला, सरवर६ मद्धि निवास ।*
*क्यूं व्रत निबहै क्यों रहै, सु कहि जगजीवनदास ॥३०॥*
{६. सरवर=सरोवर(तालाब)}
जैसे एक ही तालाब में दो पक्षी रहते हैं - एक जल में डुबकी लगाता है(जला) और एक किनारे बैठा पानी से दूर रहता है(निरजला) । वैसे ही इस संसार रूपी सरोवर में दो तरह के साधक हैं । एक तो संसार के भोग रूपी जल को पीता है, दूसरा कहता है मैं निरजला व्रत हूँ । पर दोनों रहते तो इसी सरोवर में ही हैं । जगजीवनदास जी पूछते हैं - जब रहना यहीं है तो तेरा ये बाहरी व्रत कैसे निभेगा ? मन तो अभी यहीं अटका है ।
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*हरिजल पीवत निरजला, जे व्रत धारै कोइ ।*
*कहि जगजीवन तहँ, पलटि देवगति होइ ॥३१॥*
सच्चा निरजला व्रत वो है । जो व्यक्ति हरि नाम रूपी जल को पीता है, हरि के प्रेम रस को पीता है, और संसार के जल से - काम, क्रोध, लोभ से - निरजला रहता है । जो ऐसा व्रत धारण करता है, जगजीवनदास जी कहते हैं, उसकी पलट कर देवगति हो जाती है, अर्थात वो मनुष्य से देवता के समान पवित्र हो जाता है ।
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*एक दसा७ एकादसी८, के करि जांणैं कोइ ।*
*जगजीवन सौ पलटि करि, जीव ब्रह्म तहां होइ ॥३२॥*
{७. एक दसा=एक अनन्या(प्रेमा) भक्ति की अवस्था में}
(८. एकादसी=निर्जला एकादशी व्रत)
एकदशा माने एक अवस्था - जब मन एक ही परमात्मा में टिक जाए, अनन्य प्रेम की दशा बन जाए । यही सच्ची एकादशी है । इस भेद को कोई बिरला ही जानता है । जगजीवनदास जी कहते हैं, जो इस एकदशा में पलट कर - अर्थात संसार से उलट कर भीतर मुड़ जाता है, वहीं जीव ही ब्रह्म हो जाता है ।
(क्रमशः)

सोमवार, 19 अक्टूबर 2026

*गुरुदेव का अंग~१, १/३*

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*श्री दादूवाणी भावार्थ = Meta AI*
*गुरुदेव का अंग~१, १/३* 
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*दादू नमो नमो निरंजनं, नमस्कार गुरुदेवत: ।* 
*वन्दनं सर्व साधवा, प्रणामं पारंगत: ॥१॥*                                
दादू जी महाराज सबसे पहले उस निरंजन - माया से परे, निर्मल परमात्मा को बार-बार नमस्कार करते हैं । फिर अपने गुरुदेव को नमस्कार करते हैं, जिन्होंने निरंजन का मार्ग दिखाया । फिर सब संत-साधुओं की वंदना करते हैं, और उन सिद्ध पारंगत जनों को प्रणाम करते हैं जो भवसागर से पार हो गए हैं । यह दादू पंथ की विनम्रता की परम्परा है - पहले प्रभु, फिर गुरु, फिर सब संत ।
*I bow, O bow to the Formless, Pure,*
*Salutations to Gurudev, divine and sure.*
*I venerate all saints so true,*
*Pranams to those who the Beyond broke through.(1)*
Dadu Ji first bows again and again to Niranjan - the pure Lord beyond Maya. Then he offers salutations to his Gurudev, who showed him the path to that Niranjan. Then he bows to all Sadhus and saints, and offers pranam to the Parangat - those enlightened souls who have crossed the ocean of existence. This shows the humility of Dadu Panth - first God, then Guru, then all saints.
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*परब्रह्म परापरं, सो मम देव निरंजनं ।*
*निराकारं निर्मलं, तस्य दादू वन्दनं ॥२॥*
वो परब्रह्म जो पर से भी परे है - परापर है, वही मेरा देव निरंजन है । वो आकार से रहित है - निराकार है, और माया-मल से रहित - निर्मल है । दादू जी कहते हैं, मैं उसी को वंदन करता हूँ । मेरा इष्ट कोई देवी-देवता नहीं, बल्कि वह निर्गुण, निराकार, निर्मल तत्व ही है ।
*Supreme Beyond, the Highest Light,* 
*He is my Lord, Stainless, Bright.* 
*Formless, Immaculate, ever free,* 
*To Him, Dadu bends in reverie.(2)* 
That Parabrahma who is beyond the beyond - Parapar, He alone is my God, Niranjan. He is without any form - Nirakar, and without any impurity - Nirmal. Dadu says, I bow only to Him. My beloved deity is not any limited form, but that formless, pure, supreme essence itself. 
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*दादू गैब मांहिं गुरुदेव मिल्या, पाया हम परसाद ।*
*मस्तक मेरे कर धर्या, देख्या अगम अगाध ॥३॥*
दादू जी कहते हैं - दादू जी महाराज अपने सद्गुरु की प्राप्ति और उनके फल का वर्णन कर रहे हैं - जब मैं अनजान अवस्था में था, तब अकस्मात् ही, गैब से - यानी अलौकिक रूप से गुरुदेव ने मुझे दर्शन दिये । उन्होंने बड़े प्रेम से मेरे मस्तक पर अपना वरद-हस्त रखा । उनकी इस कृपा से मुझे उनका दिव्य प्रसाद प्राप्त हुआ । उन्होंने मुझे उस अगम, अगाध स्वरूप का दर्शन कराया - जो मन और इन्द्रियों से परे है, जो निर्गुण और अपार है ।
*In the Unseen, my Gurudev came to me,* 
*And blessed me with His grace so free.* 
*He placed His hand upon my head,* 
*And showed me Depths where none have led -* 
*The Unreachable, the Fathomless spread.(3)* 
Dadu Ji Maharaj describes the attainment of his Sadguru and its divine fruit -When I was in an innocent state, suddenly, out of the Unseen - in a miraculous, divine way - Gurudev appeared before me. With great love, He placed His blessed hand upon my head. By His grace, I received His divine Prasad. He initiated me and showed me the vision of that Form - which is beyond mind and senses, attributeless(Nirguna), and infinite. 

*घाटड़ा की महन्त परंपरा*

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🌷*卐 श्री दादूदयालवे नम:  卐*🌷
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*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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*सगुणा गुण केते करै, निगुणा न मानै एक ।*
*दादू साधू सब कहैं, निगुणा नरक अनेक ॥*
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*घाटड़ा की महन्त परंपरा*
१- सुन्दरदासजी बड़े २-प्रहलाददासजी ३- केशवदासजी ४- गरीबदासजी
५- मानदासजी ६- हरिभक्तजी ७- जयरामदासजी ८- रामदासजी ९- रामगोपालजी १०- हरिचरणजी ११- लछीरामजी १२- आशारामजी वर्तमान में हैं । 
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*महन्त रामदासजी*
वैसे तो केशवदासजी आदि घाटड़ा के महन्त सभी उच्चकोटि के संत हुये हैं किन्तु रामदासजी विशेष रूप से सिद्ध पुरुष हुये हैं । रामदासजी ने ही रामपुरा में रामशाला बनवाई थी । कारण- जयपुर नरेश की दी हुई भूमि रामपुरा में ही थी । अतः वहां रामशाला बनवाने की आवश्यकता थी । रामपुरा में गुसांइयों का मठ था उसमें कुछ गुसांई रहते थे । वे गुसांई रामदासजी से कुछ छेड़छाड़ करते रहते थे । 
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रामदासजी उच्च कोटि के सन्त थे । अत पहले तो कुछ समय तक उनके आघातों को सहन करते रहे किन्तु उनकी सहन शक्ति को उन गुसांइयों ने उनकी कमजोरी मानकर के अधिक गड़बड़ की तब रामदासजी ने उनको गधा बनाकर मठ से बाहर निकाल दिया था । रामपुरा घाटड़ा आदि आम पहले जयपुर राज्य के ही थे । अलवर राज्य की स्थापना लगभग २२५ वर्ष पहले प्रतापसिंहजी ने की थी । अब प्रतापसिंहजी की सातवीं पीढ़ी है । प्रतापसिंहजी के वंशज अलवर नरेश दादूजी के विशेष रूप से भक्त रहे हैं । 
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*महन्त हरिचरणजी*
घाटड़ा के महन्तों में महन्त हरिचरणजी भी ख्याति प्राप्त महन्त हुए हैं । इन्होंने घाटड़ा की प्रहलादशाल तथा घाटड़ा की शाखा रूप अन्य ११ राम-शालाओं के कुंडे मंत्र दिये थे । उनको धोकर वह जल देने से मानवों तथा पशुओं के भी नजर आदि अनेक रोग दूर होते हैं । वे १२ यूँ हैं- १- घाटड़ा २- बलदेवगढ़ ३- गोलाकावास ४- बरकड़ी ५- रोडिरहडिया ६- तिलवाड़ा ७- खोह ८- द्वन्दपुरी ९- कोटड़ी रामपुरा १०- मलारणा ११- लोकली(सिकराय केपास) १२- कागोता ।
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प्रहलाददासजी के समय घाटड़ा में ३५० कोटड़ियां धीरावत ठाकुरों की थीं । वे सभी प्रहलाददासजी महाराज की कृपा से संतों की सेवा में लग गये थे, किन्तु भक्तों की सन्तानें ही आगे चलकर महन्त हरिचरणजी के समय तक भक्ति विहीन होकर संतों की विरोधी बन गई थीं । घाटड़े में बसन्त पंचमी पर मेला भरता था । 
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उस समय संत बहुत आते थे । अतः आश्रम की छत पर भी चढ़ते थे । इससे घाटड़े के जो अश्रद्धालु धीरावत ठाकुर थे एक मेले के समय महन्त हरिचरणजी से बोले-साधु छत पर नहीं चढ़ने चाहिये । साधु छत पर चढ़ते हैं तब हमारी ठकराणियां संकोचवश कोटड़ियों के चौक में नहीं निकल सकती हैं । तब महन्त हरिचरणजी ने कहा- प्रथम तो मातायें संतों से संकोच करती ही नहीं हैं । कारण- संत तो उनको माता के रूप में देखते हैं और मातायें भी संतों को पिता तुल्य देखती हैं । 
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ऐसी स्थिति में संकोच का काम ही क्या है? फिर भी संकोच करती हैं तो मेला तो चार दिन का है । मेले के चार दिनों में बाहर चौक में नहीं निकलें । मेले के दिनों में हम किस २ को कहें । अधिकतर अनजान ही आते हैं और हम यहां के निवासी सब आने वालों की भोजनादि सेवा में लगे रहते हैं । अतः इस बात का विशेष ध्यान हर समय कैसे रह सकेगा । महन्तजी ने उचित ही कहा था किन्तु उन प्रमादी ठाकुरों ने महन्तजी की बात पर कुछ भी ध्यान नहीं दिया और मदिरा पान करके मंदिर के द्वार पर आकर बोले-नहीं मानता है तो इस दूंदल्या महन्त की दूंद(मोटा पेट) फोड़ दो । 
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यह सुनकर महन्त हरिचरणजी ने कहा- अब या तो यहां पर आप लोग ही रहेंगे या संत ही रहेंगे । तुम्हारे पूर्वजों ने श्रद्धा पूर्वक लाकर घाटड़ा में संतों को बसाया था और तन मन धन से संतों की सेवा की थी किन्तु उन भक्तों की ही संतानें अब संतों से ईर्ष्या करने लगी हैं । तब ऐसी स्थिति में संत कैसे रहेंगे¹, किन्तु फिर भी मुझे विश्वास है कि संतों के सहायक भगवान् हैं । इससे संतों का आप कुछ भी नहीं बिगाड़ सकेंगे । 
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आप लोग ही यहां से चले जायेंगे और नहीं जायेंगे वे नष्ट हो जायेंगे । संत यहां ही रहेंगे और छत पर भी चढ़ेंगे । फिर महन्त हरिचरणजी की भविष्य वाणी सर्वथा सत्य ही हो गई । प्रहलाददासजी के समय धीरावतों की ३५० कोटड़ियां घाटड़े में थीं किन्तु अब एक भी नहीं है । विशेष तो वहां से उठकर चले गये और कोई रह गये तो उनका वंश नष्ट हो गया । अब वहां धीरावतों की स्मृति दिलाने वाला उनकी कोटड़ियों का मुख्य द्वार खड़ा है और कुछ भी नहीं है । संतों से ईर्ष्या का परिणाम ऐसा ही होता है ।
(क्रमशः)

*४९. भ्रम विधवंस कौ अंग २५/२८*

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*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
*श्रद्धेय श्री Tapasvi @Ram Gopal Das की प्रेरणा से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Meta AI*
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*४९. भ्रम विधवंस कौ अंग २५/२८*
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*कहि जगजीवन रांम बिन, बात न पूछै कोइ ।*
*ताथैं हरि भजि प्रीति सौं, सांई सनमुख होइ ॥२५॥*
जगजीवन साहेब कहते हैं कि राम नाम के बिना इस संसार में जीव की कोई बात नहीं पूछता, कोई कीमत नहीं है । जैसे बिना आत्मा के शरीर की कोई कीमत नहीं, वैसे ही राम नाम बिना सारे तीर्थ व्यर्थ हैं । इसलिए प्रीति और प्रेम से हरि को भजो, सच्चे प्रेम से भजन करने पर सांई यानी स्वामी खुद तुम्हारे सामने आ जाते हैं । भगवान को प्रेम प्यारा है, तीर्थ नहीं ॥२५॥
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*जगजीवन तीरथ सकल, रांम नांम मंहि जांण ।*
*पूरण२ ब्रह्म पिछांणिये, हरि भजि वो मति आंण२ ॥२६॥*
(२-२. पूरण ब्रह्म.....आंण...ब्रह्मसाक्षात्कार हो सके=ऐसे ज्ञान की प्राप्ति का प्रयास कर)
जगजीवन जी कहते हैं कि सारे तीर्थों को राम नाम में ही समाया हुआ जानो । जो फल अड़सठ तीर्थों में मिलता है, वह एक राम नाम में मिल जाता है । इसी राम नाम के भजन से पूरण ब्रह्म की पहचान होती है । इसलिए हे मन, ऐसी बुद्धि ला, ऐसी मति ला, कि तू सदा हरि को ही भजे, और किसी भ्रम में न पड़े ॥२६॥
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*नित प्रति घर घर निरजला३, प्रेम न पीवहि पूरि ।*
*जगजीवन सूकै सकल, वो जल इन थैं दूरि ॥२७॥*
(३. निरजला=निर्जला एकादशी व्रत)
लोग रोज घर-घर में निर्जला व्रत रखते हैं, पूरे दिन पानी भी नहीं पीते, शरीर को सुखाते हैं, पर प्रेम का पूरा जल नहीं पीते । जगजीवन जी कहते हैं कि प्रेम के बिना सब साधना सूखी है, जैसे बिना पानी के खेत सूख जाता है । वह असली प्रेम रूपी जल इन बाहरी सूखे व्रतों से बहुत दूर है । सच्चा व्रत तो प्रेम से भीगना है, देह को सुखाना नहीं ॥२७॥
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*जगत जला४ जन निरजला, व्रत सुमिरन वेसास ।*
*पारंगति परमारथी, सु कहि जगजीवनदास ॥२८॥*
(४. जला=नष्ट हुआ)
एक ओर सारा जगत विषय-वासना की आग में जला हुआ है, दूसरी ओर जन यानी साधक कहलाने वाले लोग निर्जला व्रत और केवल बाहरी सुमिरन के वेश पर विश्वास रखे बैठे हैं । जगजीवनदास जी कहते हैं कि सच्चा पारंगत और सच्चा परमार्थी वह है जो इन दोनों से पार चला जाए । जो न तो विषयों की आग में जले, न केवल बाहरी वेश में उलझा रहे, बल्कि भीतर के प्रेम तत्व को पहचान ले, वही पार होता है ।
(क्रमशः)

*२९. साधु महिमा का अंग ~१७/२०*

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साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*२९. साधु महिमा का अंग ~१७/२०*
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*साधों के हित सृष्टि यहु, सिरजी सिरजनहार ।*
*यथा पिता पुत्रहु निमित्त, श्रम१ करहिं संसार ॥१७॥*
संसार में जैसे पिता पुत्र के लिये परिश्रम१ करता है, वैसे ही सृष्टिकर्त्ता ईश्वर ने यह सृष्टि संतों के लिये ही रची है, सृष्टि बिना संत सेवा कैसे होती ?
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*खलक१ मुलक२ खेती करी, खालिक३ खसम सु साथ ।*
*ता में कण जण नीपजे, हरि हाली के हाथ ॥१८॥*
संसार१ रूप देश२ अर्थात खेत में साधन रूप खेती करी है, संसार का कर्त्ता३ स्वामी ब्रह्म भी व्यापक होने से तथा प्रतिक्षण चिन्तन होने से साथी ही है, जैसे खेत में हाली के हाथ से अन्नकण उत्पन्न होकर प्राणियों के पोषक होते हैं, वैसे ही हरि के कृपा-रूप से संसार में संत उत्पन्न होकर संसार को सुखद होते हैं ।
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*भजन भूमि जन कन उदय, समा१ धणी२ के होय ।*
*यहु खेती सुखदाय की, बूझे विरला होय ॥१९॥*
भूमि में अन्न कण उत्पन्न होते है तब भूमि के स्वामी२ के लिये अच्छा समय१ होता है, वैसे ही भजन से संत उत्पन्न होते हैं तब वह समय प्रभु को प्रिय होता है, भजन - भूमी में उत्पन्न होने वाली संत-रूप खेती महान् सुखप्रद होती है, किन्तु उस सुख को कोई विरला ही समझ पाता है ।
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*भक्त भेंट भगवन्त है, जे कुछ हरि घर माँहिं ।*
*परि बन्दा१ पैठा बन्दगी, सु कछू कबूले२ नाँहिं ॥२०॥*
जो भी कुछ हरि के घर में है, वह सभी कुछ भगवान संत को भेंट रूप में देने को तैयार हैं, किन्तु संत१ तो भगवान की भक्ति में स्थित है अन्य कुछ स्वीकार२ नहीं करता ।
(क्रमशः)

*२९. साधु महिमा का अंग ~१३/१६*

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साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*२९. साधु महिमा का अंग ~१३/१६*
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*स्वामी कर१ सेवक बड़े, नाँहीं अचरज कोय ।*
*रज्जब तरु फल शिश पर, प्रत्यक्ष देखो जोय२ ॥१३॥*
स्वामी के द्वारा१ ही सेवक बड़ा बनता है, इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है, सेवक का जो२ बड़प्पन है वह प्रत्यक्ष है, देखो वृक्ष का फल वृक्ष के शिर पर ही रहता है ।
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*भगवन्त भूमि ऊपर दर्शै, वन्दे वृक्ष सु१ भाल२ ।*
*सो रज्जब परमारथी, सब प्राणिहुं प्रतिपाल ॥१४॥*
जैसे वृक्ष पृथ्वी से उत्पन्न होकर भी पृथ्वी के शिर२ पर दिखाई देते हैं, वैसे ही भगवान की भक्ति द्वारा संत बन कर भी श्रेष्ठ१ संत भगवान के शिर पर दिखाई देते हैं, इस बड़प्पन का कारण यह है कि - वे वृक्ष तथा संत दोनों ही सभी प्राणियों के प्रतिपालक और परमार्थी हैं ।
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*सांई शून्य समान है, वन्दे१ बादल जूंणि२ ।*
*तिन माँहीं ह्वै दे प्रभू, चौरासी की चूंणि३ ॥१५॥*
परमात्मा आकाश के समान हैं और संत१ बादल के समान हैं, जैसे आकाश बादलों द्वारा वर्षा करके चौरासी लक्ष योनियों२ को चून३(भोजन) देने में निमित होता है, वैसे ही प्रभु उन संतों द्वारा ही सबको सुख शांती देते हैं ।
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*आदम१ माँहीं ऊपजे, शब्द स२ विता३ सो शीश४ ।*
*रज्जब रीझ्या देखकर, त्योंही जन जगदीश ॥१६॥*
जैसे मनुष्य१ में विचार-धन३-सहित२ शब्द उत्पन्न होता है, वही शिरोमणि४ माना जाता है, उसी से मानव आनन्दित होता है, वैसे ही संसार में जो संत उत्पन्न होता है, उसे ही देखकर जगदीश्वर प्रसन्न होते हैं ।
(क्रमशः)

रविवार, 18 अक्टूबर 2026

*प्रहलादजी की वाणी की महिमा*

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*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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*दादू तन मन लाइ कर, सेवा दृढ़ कर लेइ ।*
*ऐसा समर्थ राम है, जे मांगै सो देइ ॥*
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*प्रहलाददासजी के संग से तरने वाले नर नारी*
रट रामट बस सदा, भक्त भगवत को राघो ।
सुनत नरायण गोविन्द, धर्म धार्यो जिन आघो¹ ॥
भीमराज निर्वाण, राम यश नीको गावे ।
नीको लक्ष्मीदास, हरियो हरि धर्म चलावे ॥
किशनाई पार्वती, बीना दुरगा गोरिजा ।
पारस रूपी परसि, गुरु मेट्यो दिल गोरिजा² ॥
राघव हरि यश रात दिन, सुन सुन परमारथ करें ।
ये परम पुरुष प्रहलाद की, संगति नर नारी तिरें ॥६५॥
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भगवान् के भक्त राघवजी रामट ग्राम में सदा बसते हुये राम रटते थे । नारायण और गोविन्दजी भागवद्द धर्म को सुनते थे और उन्होंने आदर¹ पूर्वक धारण भी किया था । निर्वाण गोत्र के भीमराजजी क्षत्रिय रामजी का यश अच्छी प्रकार प्रीति से गाते थे । लक्ष्मीदासजी भी अच्छे भक्त थे । हरियाजी भी हरिभक्ति रूप धर्म अच्छी प्रकार चलाते थे । किशनाई, पार्वती, बीना, दुरगा(दुरशा भी पाठान्तर है) और गौरिजा, इन बाइयों ने भी पारसरूप प्रहलादजी को गुरु बनाया था । गुरुजी ने इनके हृदय का अज्ञान रूप दारिद्र² अपने ज्ञान धन को देकर मिटा दिया था । ये उक्त सब ही नर-नारी रातदिन हरियश सुन सुनकर परमार्थ करते थे । इस प्रकार परम पुरुष प्रहलादजी की संगति से ये उक्त नरनारी संसार-सागर से पार हो गये थे । 
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*प्रहलादजी की वाणी की महिमा*
प्रहलाददासजी के शिष्य प्रशिष्य तथा सेवकों ने प्रहलादजी की वाणी की महिमा कही है । उसका निर्देश भी करना यहां उचित समझकर किया जाता है-
श्री गुरुदेव प्रहलाद की वाणी सवा हजार ।
सुने सुनावे पाठ उर, "श्याम" सहज भव पार ॥ श्यामदास कृत ।
श्रीवाणी प्रहलाद की, वाणी ब्रह्म गियान ।
हृदय हरि प्रकाश हो, हरिदास भ्रम भान ॥ हरिदास कृत ।
प्रेम प्रीति हरि हित बढ़े, होय ब्रह्म पद वास ।
वाणी पढ़ प्रहलाद की, केशव कर्म विनाश ॥ केशवदास कृत
उद्धव आदि रु अंत मधि, जो उर धारे संत ।
वाणी गुरु प्रहलाद की, तारण जीव अनन्त ॥ उद्धवदास कृत ।
वाणी गुरु प्रहलाद की, राघव ब्रह्म विलास ।
जिन हृदय धारण करी, ताके दोष विनास । राघवदास कृत ।
नव षट् ठारह चार ग्रन्थ, मथि अनुभव ले घीव ।
प्रहलाद कृत धर श्याम उर, प्राण पुष्ट पद पीव ॥ श्यामदास कृत ।
कह हरिराय सहाय जग, वाणी गुरु प्रहलाद ।
जिन पढ़ उर धारण करी, ताके मिटे विषाद ॥ हरिराय कृत ।
रतनाई रत राम से, आठों पहर अखंड ।
जप वाणी प्रहलाद को, छूटे जमको दंड ॥ रतनाई बाई कृत ।
वाणी गुरु प्रहलाद की, हृदय सु धारे कोय ।
केशी कर्म नवारि है, लीन अमर पद होय ॥ केशीबाई कृत ।
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*प्रहलाददासजी की समाधि*
प्रहलाददासजी की समाधि घाटड़ा में ही बड़ा बाग के कूप के पास है । समाधि की अच्छी मानता है । चरण चिन्हों को धोकर आसपास के लोग  ले जाते हैं और रोगी को देने से रोग में शांति आती है । पशु आदि को देने से पशु ठीक होते हैं नजर लगी पर देने से बच्चे ठीक होते हैं । कामना करके बोल्यारी बोलने वालों की कामनायें पूर्ण होती हैं । घाटड़ा में वर्षा नहीं हो तो प्रहलाददासजी की समाधि पर जाकर प्रार्थना करने पर हो जाती है । समाधि पर जात, जडूला, सवामणी आती हैं । प्रहलाददासजी की समाधि से पूर्व की ओर कुछ ही दूर पर प्रहलाद दह है उसमें १२ मास पानी रहता है । प्रहलाददासजी की समाधि के पास ही इनकी शिष्य परंपरा के महन्तों की समाधिया हैं । 
(क्रमशः)

४९. भ्रम विधवंस कौ अंग २१/२४

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*श्रद्धेय श्री Tapasvi @Ram Gopal Das की प्रेरणा से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Meta AI*
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*४९. भ्रम विधवंस कौ अंग २१/२४*
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*कंचन की सरभरी८ तुलै, पुनि करै कुरु छेत्र ।*
*कहि जगजीवन भोग भ्रम, हरि मंहि खुलै न नेत्र ॥२१॥*
(८. कंचन की सरभरी=सोने के बराबर)
कोई व्यक्ति सोने की मेरु पर्वत जैसी बड़ी ढेरी को तराजू पर तोल कर दान कर दे, और उसके बाद कुरुक्षेत्र जैसे महातीर्थ में जाकर भी दान-पुण्य करे, तो भी उससे मुक्ति नहीं मिलती । जगजीवन साहेब कहते हैं कि यह सब केवल भोग की इच्छा और भ्रम ही है, इससे हरि में प्रेम के नेत्र नहीं खुलते । सच्चा लाभ तो तब है जब मन हरि में लगे, केवल सोना दान करने से भगवान नहीं मिलते ॥२१॥
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*गंग गया गोदावरी, कटै न तन का मैल ।*
*कहि जगजीवन जग धरम९, ज्यूं तेली का बैल ॥२२॥*
(९. जग धरम=जगत का दैनिक कर्म)
गंगा, गया, गोदावरी जैसे पवित्र तीर्थों में बार-बार नहाने से शरीर का मैल भी पूरी तरह नहीं कटता, तो मन का मैल कैसे कटेगा । जगजीवन जी कहते हैं कि बिना प्रेम के जो जगत का धर्म यानी केवल बाहरी तीर्थ-व्रत किया जाता है, वह तेली के बैल जैसा है । बैल आँख पर पट्टी बाँध कर दिन भर कोल्हू के चारों ओर घूमता है, पर वहीं का वहीं रहता है, आगे नहीं बढ़ता । वैसे ही जीव भी तीर्थों में घूमता रहता है पर माया से बाहर नहीं निकलता ॥२२॥
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*तीरथ व्रत करि करि मुए, सेवा पूजा पाक ।*
*जगजीवन जग का धरम, ज्यूं कुलाल का चाक ॥२३॥*
अनेक लोग तीर्थ, व्रत, सेवा, पूजा, पवित्र भोजन और नियम आदि करते-करते ही मर गए, पर भीतर की मुक्ति नहीं मिली । जगजीवन जी कहते हैं कि संसार का यह केवल बाहरी धर्म कुम्हार के चाक जैसा है । चाक लगातार घूमता ही रहता है, कभी स्थिर नहीं होता, और उसी पर बर्तन बनते-बिगड़ते रहते हैं । वैसे ही जीव भी इन बाहरी कर्मों के चक्कर में जन्म-मरण के चक्कर में ही घूमता रहता है ॥२३॥
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*बदरी फिरि केदार फिरि, जगन्नाथ फिरि जोइ ।*
*गंगा सागर द्वारिका, सब तीरथ गमि१ होइ ॥२४॥*
{१. गमि=गति(जाना)}
चाहे तुम बदरीनाथ फिर आओ, केदारनाथ फिर आओ, जगन्नाथ पुरी, गंगा सागर और द्वारिका, सारे तीर्थ घूम लो, तो भी मन को कहीं सच्चा ठिकाना नहीं मिलता । सब तीर्थ घूम लेने पर भी अगर भीतर हरि से प्रेम नहीं जगा, तो मन भटकता ही रहता है । बाहर की यात्रा से पैर थकते हैं, मन शांत नहीं होता, शांति तो भीतर के तीर्थ में मिलती है ॥२४॥
(क्रमशः)

शनिवार, 17 अक्टूबर 2026

प्रहलादजी ब्रह्म स्वरूप में

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🌷*卐 श्री दादूदयालवे नम:  卐*🌷
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*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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*सब चतुराई देखिये, जे कुछ कीजे आन ।*
*मन गह राखै एक सौं, दादू साधु सुजान ॥*
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निरंतर निदिध्यासन रूप रटन करके प्रहलादजी ब्रह्म स्वरूप में ही प्रवेश कर गये थे ।
परम पुरुष प्रहलाद के, इतने शिष्य सब धर्म धुर¹ ॥
तिन मधि बड़ बानैत हेत² हापोजी होई ।
धीरध और अनन्त, बुरो जनि मानो कोई ॥
चरणदास भजनीक, तिलकधारी है केशो ।
हरीदास पुनि पाट, कियो हरि घर सु प्रवेशो ॥
कान्हड़दास कल्यारा, पुन. परमानन्द धमंडी ।
रामदास हरदास, भक्त भगवद्द की मंडी³ ।
राघव को रुचि रात दिन, भर्यौ भक्त भगवंत गुरु ॥
परम पुरुष प्रहलाद के, इतने शिष्य सब धर्म धुर ॥६६२॥
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परम पुरुष प्रहलादजी के, इतने शिष्य भागवद्द धर्म रूप रथ की धुरी¹ को धारण करने वाले थे । उनमें प्रेमाभक्ति² रूप बाण चलाने वाले बानैत और महान १- हापाजी ही थे । इस बात से कोई बुरा न मानें और भी अनन्त बड़े थे । २- भजनीक चरणदासजी और ३- तिलकधारी केशवजी । गद्दी पर हरिदासजी ही बिराजे थे और उन्होंने हरिधाम(स्वरूप) में ही प्रवेश किया था ।
(उक्त छंद के "तिन मधि से प्रवेशो" तक के चार पादों ने समाज में विवाद खड़ा कर रखा है । इनमें यह कह कर कि- सबसे बड़े हापाजी थे, फिर कहते हैं कि कोई मेरी इस बात पर बुरा नहीं मानें, और भी अनन्त बड़े थे अर्थात् हरिदासजी से बहुत बड़े थे । चरणदासजी भजन करने में बहुत बड़े थे । और केशवदासजी तिलक गुरु गादीधारी होने से बहुत बड़े थे । फिर भी हरिदासजी पाट अर्थात् गद्दी धारण करते थे अर्थात् उनकी स्वयं की गद्दी हिन्डौन में लगती थी और उन्होंने हरिस्वरूप में प्रवेश किया था इससे बड़े थे । राघवदासजी हरिदासजी के शिष्य थे अतः अपने गुरुदेव की महिमा करना भी उनका कर्तव्य था ही । किन्तु उनका तात्पर्य पाटड़ा गद्दी पर वे बिराजे थे ऐसा मानले तो पाटड़ा की गद्दी के महन्तों में हरिदासजी का नाम आना चाहिये सो तो आता नहीं, केशवदासजी का ही आता है । "हरिदास पुनि पाट" यह राघवदास जी का पाद भी यही ध्वनि करता है कि- प्रहलाददासजी की गद्दी पर तो केशवदास ही बैठे थे फिर भी हरिदासजी गद्दी पर ही बिराजते थे । ऐसा मान लेने पर संगति बैठ जाती है । कारण वे हिन्डौन में गद्दी पर ही विराजते थे । हिन्डौन उनकी स्वयं की गादी थी ही । उक्त पदों के प्रयोग से मुझे तो ऐसा ही ज्ञात हो रहा है । वास्तविकता क्या है, यह तो भगवान् ही जाने)
४- कान्हड़दासजी ५- कल्यारादासजी ६- परमानन्दजी ७- धमंडीजी ८- रामदासजी कहीं कहीं "धमंडी रामू" भी पाठ मिलता है । अतः धमंडी रामदास का विशेषण भी हो सकता है । ९- हरदासजी । इन सब ने ही भगवान् की भक्ति की³ थी । राघवदासजी कहते हैं- मेरे हृदय में रात दिन यही रुचि रहती है कि भक्त, भगवान् और गुरु का यश कहता ही रहूँ ।
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दो माधव दो सूर, दो नारायण नापो ।
चतुरदास दो सन्त, नहीं जिनके अंग आपो ॥
श्यामदास चरणदास, मतो नरहरि को न्यारो ।
किशनो मोहन मान, रामजी सबको प्यारो ॥
भाषा में भौरे नहीं, राघव ज्यों की त्यों कही ।
परम पुरुष प्रहलाद की, पैज प्रकट पंथ सु रहो ॥६६३॥
उक्त सभी प्रहलादजी के शिष्यों में देहाभिमान नहीं रहा था और सबको ही रामजी प्रिय लगते थे । राघवदासजी कहते हैं- यह मैंने भूल में नहीं कहा है, जैसा था वैसा ही कहा है । दादू पंथ में प्रहलादजी की श्रेष्ठता की टेक अच्छी प्रकार रही थी अर्थात् दादूपंथ में वे महान् माने जाते हैं ।
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*प्रहलादजी के सेवक शिष्य*
ये स्वामी प्रहलाद के, राघव सेवक शिष्य बरणि ॥
सेवक बडव कुरेत, प्रथम धीरावत सारे ।
खान पान से रहित, नाम तिनके निरवारे¹ ॥
भरतोजी बड़ भक्त, छओं दर्शन में जारां ।
वेणीदास बखान, भावे आदर अन्त पारगौ² ॥
रामसाहि धन धर्म, धुर³ गुरु आज्ञा अंत बणी ।
भई भक्ति गोविन्ददास, कुल दीपक कीरति घणि ॥
भांझू भक्ति जुंभारखां, देवकरण हरि की शरणि ।
ये स्वामी प्रहलाद के, राघव सेवक शिष बरणि ॥६६४॥
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प्रथम बड़े कुरेत(कुरीति वाले) थे । वे सब घाटड़ा के धीरावत आपके सेवक बन गये थे । मांस मदिरा का खान पान छोड़ दिया था । फिर तो वे मांसादि के नाम उच्चारण करने से भी छूट गये¹ थे । घाटड़ा के धीरावतों में भरतजी बड़े भक्त थे । उनको छःओं दर्शन- (योगी, जंगम, सेवड़े, बौद्ध, सन्यासी, शेष) ये छः प्रकार के भेषधारी सब जानते थे । वेणीदासजी भी कथन करने योग्य हो गये हैं । वे आये अतिथियों का अति आदर करते थे और प्रेम से अन्न जल² देते थे ।
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रामसाहजी ने तो अपना धन धर्म में ही लगाया था और अंत³ तक गुरु आज्ञा का पालन किया था । उनकी अन्त में अच्छी स्थिति बन गई थी । गोविन्ददासजी भी भक्ति की अच्छी अवस्था को प्राप्त हो गये थे । ये भी कुल दीपक माने जाते थे । इनकी कीर्ति भी बहुत फैल गई थी । झांझूजी जुंझारखांजी और देवकरणजी ये सब भक्ति करके हरि की शरण में आ गये थे । उक्त प्रकार प्रहलाददासजी के सेवक शिष्य भी अच्छे भक्त हुए हैं । यह भक्तमालकार ने आंखों देखी ही बातें लिखी हैं ।
(क्रमशः) 

४९. भ्रम विधवंस कौ अंग १७/२०

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*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
*श्रद्धेय श्री Tapasvi @Ram Gopal Das की प्रेरणा से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Meta AI*
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४९. भ्रम विधवंस कौ अंग १७/२०
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गया प्रयाग बनारसी, इहाँ ही जगन्नाथ३ ।
जगजीवन इस जीव का, जे हरि पकड़ै हाथ ॥१७॥
(३. जगन्नाथ=जगन्नाथपुरी का मन्दिर)
गया, प्रयाग, बनारस और जगन्नाथ धाम सब यहीं इसी घट में मिल जाते हैं, अगर हरि कृपा करके इस जीव का हाथ पकड़ ले । संत जगजीवन जी कहते हैं कि भगवान के मिलते ही सारी तीर्थ यात्रा पूरी हो जाती है, फिर कहीं बाहर जाने की आवश्यकता नहीं रहती ।
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जगजीवन पटु४ कर ह्रिदै, सब तीरथ का राइ ।
सकल साध पावन भए, जीवन जांनै ताहि ॥१८॥
(४. पटु=सत्कर्म में कुशल, स्वच्छ, निर्दोष)
संत जगजीवन जी कहते हैं कि अपने हृदय को ही पवित्र कर लो, वही सब तीर्थों का राजा है । जो इस हृदय रूपी तीर्थराज को पहचान लेता है, उसका जीवन पावन हो जाता है, और सभी साधु संत भी उसे पवित्र मानते हैं, सबसे बड़ा तीर्थ अपना शुद्ध हृदय ही है ।
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अड़सठ तीरथ सब करै, फिर फिर बार हजार ।
जगजीवन हरि भगति बिन, अंट पड़ै मुझ छार५ ॥१९॥
(५. छार=धूल) 
कोई व्यक्ति अड़सठ तीर्थों की यात्रा हजार-हजार बार भी कर ले, फिर भी क्या होगा । सांय जगजीवन जी कहते हैं कि हरि भक्ति के बिना वह सब राख में मिल जाता है, व्यर्थ चला जाता है । भाव ये है कि गिनती से मुक्ति नहीं मिलती, एक बूंद सच्ची भक्ति हजार तीर्थों से भारी होती है ।
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बासी६ बस्या बनारसी, मांहि विषै की प्यास ।
(तौ) मगहर मरण गति सोभई७, सुकहि जगजीवनदास ॥२०॥
{६. बासी=पुराने समय से(चिर काल से)}   (७. सोभई=शोभा देना)
कोई व्यक्ति बनारस जैसे पवित्र धाम में बरसों से बसा हुआ है, पर भीतर अभी भी विषयों की प्यास लगी है, तो उसका बनारस में रहना व्यर्थ है । संत जगजीवनदास जी कहते हैं कि उससे तो मगहर में वैराग्य और हरि नाम के साथ मरना भी ज्यादा शोभा देता है, क्योंकि स्थान बड़ा नहीं होता, मन की पवित्रता ही बड़ी होती है ।
(क्रमशः) 

शुक्रवार, 16 अक्टूबर 2026

*२९. साधु महिमा का अंग ~९/१२*

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*🌷卐 सत्यराम सा 卐🌷*
साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*२९. साधु महिमा का अंग ~९/१२*
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*आकार भार छाया अरु वास, जन कपूर के चार्यों नास ।*
*अंजन१ पलट निरंजन होई, यह गति बूझे विरला कोई ॥९॥*
जैसे कपूर का आकार, भार, छाया और गंध चारों ही वायु के संग से चले जाते हैं, वैसे ही संत के भी चारों परमार्थ विचार द्वारा चले जाते हैं, वह मायिक१, आकार से बदलकर निरंजन ब्रह्म को प्राप्त होता है, इस निरंजन ब्रह्म की प्राप्ति रूप गति को कोई विरला ज्ञानी ही समझता है ।
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*साहिब सौं साधु बड़े, साधु बड़ा न कोय ।*
*रज्जब देख्या गुरु दृष्टि, सब नीके कर जोय१ ॥१०॥*
परमात्मा से संत बड़े हैं, संतों से बड़ा कोई नहीं है, यह हमने गुरदेव की ज्ञान-दृष्टि द्वारा देखा है, हे साधक ! तू भी सबको अच्छी प्रकार विचार करके देख१ ।
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*सेवक स्वामी एक ह्वै, ता ऊपरि अधिकार ।*
*यथा बुदबुदा वारि शिर, देखे सब संसार ॥११॥*
सेवक स्वामी के साथ एक हो जाता है, उस एकता पर भी जैसे जल का बुदबुदा जल रूप होने पर भी जल के ऊपर रहता है, इसको सब संसार देखता है वैसे ही सेवक का अधिकार स्वामी के ऊपर रहने का होता है ।
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*स्वामी सेवक शिर धर्या, आदू अदभुत बंध ।*
*रज्जब पेख्या पुहमि पर, पुत्र पिता के कंध ॥१२॥*
स्वामी ने सेवक को शिर पर ही धारण किया है, यह अदभुत संबन्ध आदि काल का ही है, हमने वर्तमान में भी पृथ्वी में पुत्र को पिता के कंधे पर देखा है । अत: संत हरि से अधिक है ।
(क्रमशः)

*२९. साधु महिमा का अंग ~५/८*

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साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*२९. साधु महिमा का अंग ~५/८*
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*साधु अगाध अगस्त्य है, सांई सुधा समुंद ।*
*उभय समाने उभय उर, रज्जब रही न बुंद ॥५॥*
संत तो अपार महिमा वाले अगस्त्य ऋषि के समान हैं और परमात्मा अमृतमय समुद्र के समान हैं । जैसे समुद्र पान के समय समुद्र अगस्त्य में समा गया था, एक बिन्दु भी शेष न रही थी और समुद्र के अभिमानी देवता के हृदय में अगस्त्य का आकार बस रहा था, वैसे ही संत के हृदय में हरि और हरि के हृदय में संत रहते हैं ।
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*वृक्ष बीज मीश्रित सदा, सेवक स्वामी तेम१ ।*
*पाला पानी होत हैं, पुनि पानी तैं हेम२ ॥६॥*
जैसे बीज में वृक्ष है और वृक्ष में बीज, वैसे ही१ सेवक में स्वामी है और स्वामी में सेवक है । जैसे बर्फ२ जल बन जाता है और जल ही पुन: बर्फ बन जाता है वैसे ही परमात्मा संत बन जाते हैं और संत परमात्मा बन जाते हैं ।
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*माया ब्रह्म ने जो किया, सो उन बाहर नाँहिं ।*
*रज्जब साधु अगाध दिल, उभय समाने माँहिं ॥७॥*
माया और ब्रह्म ने जो संसार रचा है, वह उनके बाहर नहीं है, किन्तु संत का हृदय तो महान् अगाध है कारण, माया और ब्रह्म दोनों उसमें समाये हुये हैं, यद्यपि संत माया का चिन्तन नहीं करते किन्तु माया ब्रह्म से अलग नहीं रह सकती । अत: वह संत के हृदय में है किन्तु संत को मोहित नहीं कर सकती, संत उसे मिथ्या समझते हैं ।
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*साधु शक्ति१ कपूर गति, अकल कला इहि भौन२ ।*
*सह गुण निर्गुण होत है, मिल परमारथ पौन३ ॥८॥*
साधु की माया१ की गति कपूर के आकार की गति के समान होती है, जैसे कपूर में भार और गंध रूप कला दिखाई देती है, किन्तु वायु३ मिलने पर वह अकल हो जाती है, अर्थात भार और गंध दोनों ही कपूर के स्थान में नहीं रहते, वैसे ही संसार-भवन२ में संत की सगुणता रूप शरीरादि माया परमार्थ विचार होने पर नहीं रहती, वे निर्गुण ब्रह्म-रूप ही हो जाते हैं ।
(क्रमशः)