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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२७. अक्षर बिचार कौ अंग १/४
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ऐंन१ नहीं अरु ऐंन है, गैंन२ नहीं अरु गैंन ।
सुन्दर नुकता३ आर सी, दूरि किये तें ऐंन ॥१॥
[श्रीसुन्दरदासजी महाराज इस अङ्ग में उर्दू(अरबी,
फारसी) लिपि एवं देवनागरी लिपि के अक्षरों के
माध्यम से आत्मतत्त्व एवं ब्रह्मतत्त्व पर विचार कर रहे हैं । अतः पाठक को,
इस अङ्ग का स्वाध्याय प्रारम्भ करने से पूर्व,
इन लिपियों से सम्बद्ध व्याकरण शास्त्र का
ज्ञान होना भी अत्यावश्यक है । अतः पाठक उधर भी ध्यान दें ।]
(१ ऐंन = प्रत्यक्ष ।
२ गैंन = अप्रत्यक्ष । ३ नुकता = बिन्दु । फारसी के ऐन अ) अक्षर पर बिन्दु लगाने
से गैन अक्षर(ग) बन जाता है ।) उर्दू लिपि के अक्षरों के माध्यम से आत्मतत्त्व पर विचार :
यह आत्मा अज्ञानावरण के कारण हम को अभी प्रत्यक्ष नहीं दिखायी देता है;
परन्तु वह गुरुपदेश से प्राप्त आध्यात्मिक
साधनों द्वारा प्रत्यक्ष(अैंन) किया जा सकता है । इसी प्रकार वह आत्मा वस्तुतः
मलविक्षेपरहित एवं निर्विकार है, परन्तु वही माया के विकारों से संश्लिष्ट होकर विकारमय(गैंन
= परोक्ष) प्रतीत होता है ।
महाराज श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - यदि उसमें से नुकता
(विकार या बिन्दु को पृथक् कर दिया जाय वह पुनः अैंन(निर्विकार एवं निष्कलङ्क) ही
हो जायगा ॥१॥
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सुन्दर नुकता भिन्न है, मिल्यौ ऐंन सौं नांहिं ।
मिलि करि दोऊ बांचिये, मिले अमिल यौं मांहिं ॥२॥
यद्यपि इस अैंन में यह नुकता(मायाविकार) आत्मा से सर्वथा
भिन्न है; क्योंकि यह इस अैंन(आत्मा) से किसी भी तरह
मेल नहीं खाता । इन को मिला कर पढनेधना करने) पर स्पष्ट समझ में आ जाता है कि यहाँ
दो अनमेल चीजें मिली हुई प्रतीत हो रही हैं ॥२॥
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ऐंन आतमा जानिये, नुकता भयौ शरीर ।
सुन्दर दोऊ भिन्न हैं, मिले देखियें बीर ॥३॥
हे भाई ! यहाँ अैंन अक्षर से आत्मा का बोध होता है और इसमें
लगे हुए नुकते को मायाकृत शरीर समझिये । ये दोनों(आत्मा एवं शरीर) स्वभावतः भिन्न
हैं । इन को मिला कर पढ़ने से यही ज्ञात होता है ॥३॥
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ऐंन सु दीरघ देखिये, नुकता तनक दिखाइ ।
सुंदर नुकता तनक तैं, ऐंन गैंन ह्वै जाइ ॥४॥
इस ऐंन अक्षर में, छोटा सा नुकता लगा देने से, इस का आकार दीर्घ(लम्बा) प्रतीत होता है । छोटे से नुकता(अविद्यामय
आवरण) के लग जाने पर यह अैंन(शुद्ध आत्मा) ही गैंन(जन्ममरण की दीर्घपरम्परा) बन
जाता है ॥४॥
(क्रमशः)




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