बुधवार, 18 मार्च 2026

सुन्दर जयन्ती ~

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*॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥*
*॥ दादूराम~सत्यराम ॥*
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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१८ आचार्य प्रकाशदेव जी ~
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आचार्य प्रकाशदेव जी महाराज का जीवन आचार्य पद से पूर्व भी भजन साधन में ही व्यतीत हुआ था । आप बाल ब्रह्मचारी थे । छोटी अवस्था में दीक्षित हो गये थे और दादू मंदिर के पुजारी थे । अत: इन का कार्य साधन रुप ही था । आचार्य पद पर विराजने पर आपके तप त्याग, साधुता आदि विशेषताओं का विशेष परिचय समय समय पर समाज को मिलने लगा । उस से समाज की आप पर अटूट श्रद्धा हो गई । समाज में सुख शांति का विस्तार हुआ ।
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आपकी कोमलता और सद्व्यवहार परम श्‍लाघनीय था । आपके पास महन्त, सन्त, सामान्य साधु नेता, राज्य के अधिकारी व सेवक जो भी आते थे आप उनका अधिकारानुसार समादर करते थे । एक बार जो आपके पास आ जाता था, उसकी इच्छा बारंबार आपके पा आने की होती थी । आप की साधुता सौम्यता में ऐसा विचित्र आकर्षण था कि आपके दर्शन सत्संग से सबको यही अनुभव होता था - कि ये तो मेरे परम हितेषी हैं । सभी आपके दर्शन तथा सत्संग से परम प्रसन्न होते थे और अपना परम सौभाग्य समझते थे ।
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सुन्दर जयन्ती ~
आपके आचार्य काल वि. सं. २००५ के कार्तिक शुक्ला ८ व ९ को नारायणा दादूधाम में दादूजी महाराज के सुयोग्य शिष्य राजस्थान के परम प्रधान संतकवि स्वामी सुन्दरदासजी का जयन्ती उत्सव भी दादू पंथी समाज ने मनाया था ।
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इस ‘सुन्दर जयन्ती’ उत्सव में अन्य समाजों के महानुभाव भी पधारे थे । उत्सव के प्रथम दिन कार्तिक शुक्ल ८ को महात्मा विनोबा भावे के सभापतित्व में महामंडलेश्‍वर असंगानन्दजी उदासीन आदि विद्वानों के भाषण महाकवि सुन्दरदासजी की विशेषताओं को लक्ष्य करके हुये थे ।
(क्रमशः)

२१. समर्थाई आश्चर्य को अंग २९/३२

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२१. समर्थाई आश्चर्य को अंग २९/३२
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आज्ञा मांहीं लच्छमी, ठाढी है कर जोरि । 
सुन्दर प्रभु सनमुख रहै, दृष्टि सकै नहिं चोरि ॥२९॥
धन की देवी लक्ष्मी भी उन प्रभु के सम्मुख आज्ञापालन - हेतु उन के सम्मुख हाथ जोड़कर खड़ी रहती है । वह इस अज्ञापालन में कभी आँख नहीं चुरातीं (आज्ञापालन से मुख नहीं मोड़तीं) ॥२९॥
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आज्ञा मांहैं तत्व सब, होइ देह कौ संग । 
सुन्दर बहुरि जुदे रहैं, आज्ञा करै न भंग ॥३०॥
'पञ्चतत्त्व' या 'पञ्च महाभूत' कहलाने वाले पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु एवं आकाश, उन महाप्रभु के आदेश से, प्राणियों के देह में सङ्घात रूप से एकत्र होते हैं । तथा उन का जब आदेश होता है तो वे उस देह को छोड़कर यथास्थान चले जाते हैं । वे उस महाप्रभु की आज्ञा कभी भङ्ग नहीं करते ॥३०॥
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आज्ञा मांहैं रहत हैं, सप्त दीप नौ खंड । 
सुन्दर प्रभु की त्रास तें, कंपै सब ब्रह्मंड ॥३१॥
सप्तद्वीप - जम्बुद्वीप, शाकद्वीप, सूक्ष्मद्वीप, क्रौञ्चद्वीप, गोमयद्वीप, श्वेतद्वीप एवं लक्षद्वीप एवं नव खण्ड(पृथ्वी के नौ भाग) - भारत, इलावृत्त, किम्पुरुष, भद्र, केतुमाल, हरि, हरिण्य, रम्य एवं कुश - ये सभी उस प्रभु की आज्ञा में रहते हैं । संक्षेप में यह कह सकते हैं कि यह समस्त संसार(ब्रह्माण्ड) उस प्रभु के भय से काँपता रहता है(कि वे रुष्ट न हो जायँ) ॥३१॥
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ऐसै प्रभु की त्रास तें, कंपै सब ही लोक । 
बार बार करि कहत हैं, सुन्दर तुम कौं धोक ॥३२॥
ऐसे आप सर्वशक्तिसम्पन्न उस निरञ्जन निराकार प्रभु के क्रोध से सभी संसारी जीव भय मानते हैं; अतः हे प्रभो ! आप का परम भक्त यह सुन्दरदास आप को बार बार प्रणाम(= धोक) करता है ॥३२॥
(क्रमशः) 

*विरह, आत्मसाक्षात्कार ॥*

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*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*अति आतुर ये खोजत डोलैं,*
*बान परी वियोगिनि बोलैं ॥*
*सब हम नारी दादू दीन,*
*दे सुहाग काहू संग लीन ॥*
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*विरह, आत्मसाक्षात्कार ॥* 
आपणा रमइया कारणि, जोगणि ह्वै हूँ रे ।
पहिरूँ रे भसमी मुद्राली, बनखँडि जैहूँ रे ॥टेक॥
बिरह बिभूति भई तनि मेरै, सींगी सुरति हमारै रे ।
बैरागनि ह्वै वनखँडि जैहूँ, दरसन काज तुम्हारै रे ॥
सोइ बैराग एकटक आगैं, पलभरि पलक न लागै रे ।
रावल कै कारणि रौलानी, चेतनि पहरै जागै रे ॥
ग्यानि गुफा मैं रहणि हमारी, उनमनि ताली लाऊँ रे ।
अनहद बाजे बाजैं रावल, कींगरड़ी झुणकाऊँ रे ॥
अणभै भिख्या घर अबिनासी, चल तहाँ करै प्रवेसा रे ।
बषनां दरसन देषि करीजै, वा आइस कौं आदेसा रे ॥
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अपनी भावना व्यक्त करते हुए बषनांजी कहते हैं । मैं अपने प्रियतम रमैयाराम को प्राप्त करने के लिये योगियों की भस्म, मुद्रा, सींगी, सेली आदि लगाकर व पहनकर योगिनी बनूंगी । मैं शरीर पर भस्म लगाऊंगी, कानों में मुद्रा पहनूंगी तथा प्रियतम को रिझाने के लिये एकान्त बनखंड में चली जाऊंगी । 
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परम प्रियतम के अमिलन से उत्पन्न चित्त में आकुलता-व्याकुलता रूपी विरह की भस्म ही मेरे शरीर पर रमी होगी । चित्त की वृत्ति = सुरति का प्रियतम से सदैव तादात्म्य ही गले में लटकने वाली सींगी होगी । प्रियतम का सदैव नाम श्रवण ही कानों मुद्रा होगी । संसार तथा संसार के समस्त पदार्थों, सुखों से तन और मन से अनासक्ति रूपी वनखंड में निवास करने को जाउंगी । 
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यह सब मैं इसलिये करूंगी कि हे प्रियतम ! आपके दर्शन हो जाएँ, आपसे मेरा चिरसंयोग हो जाये । इस एकान्तिकी, अनन्य वैराग्य के सामने एक पल के लिये भी मेरी आँखों की पलकें नीचे को नहीं गिरेंगी । क्योंकि आप रावल(योगियों का एक भेद) के कारण मैं रौलानी = जोगन पूर्ण सावधान होकर(चेतनि) आपके जाने के रास्ते में पहरा देती रहूंगी । अर्थात् मैं अपलक जागकर आपके आने की, दर्शन देने की प्रतिक्षा करूंगी । 
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इस समय मेरी रहनी = दिनचर्या = क्रियाकलाप ज्ञानमय होंगे । (आत्मा अपने आपको परमात्मा जानकर परमात्मा ही अनुभव करे, दोनों को एक अनुभव करे, यही ज्ञान है । गुफा = आवरण । यहाँ ‘ज्ञान के आश्रय में’ से तात्पर्य है । अर्थात् इस समय मेरे सारे क्रियाकलाप ज्ञानमय होंगे) तथा मैं उनमनि = सहजावस्था = निर्विकल्प समाधि अवस्था से ताली = सम्बन्ध स्थापित कर लूंगी अर्थात् समस्त द्वन्द्वों से अतीत होकर निर्विकल्प सहजावस्था में स्थिर हो जाऊंगी । 
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इस समय रावल = परमप्रियतम अनहदनाद रूपी बाजे के रूप में तथा मैं पायल की झुनकार के रूप में बजूंगी अर्थात् हम दोनों इस अवस्था में दो न रहकर एक नाद स्वरूप हो जायेंगे । पाठकों को ज्ञात हो, ब्रह्मरंध्र में जब शब्द-सुरति का एकाकार होता है तब वहाँ परमप्रकाश हो जाता है तथा अनहदनाद होता है । वहाँ मूर्ति, आकृति आदि कुछ नहीं होती । 
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सुषुम्ना से अमृत की धारा का प्रवाह भी यहाँ अनवरत चलता रहता है । “स्त्रवै सुषुम्ना नीर फुवारा । सुन्य सिखर का यह व्यवहारा ॥” बषनांजी अपने आपको संबोधित करते हुए कहते हैं, अब हमें चलकर अविनाशी परमात्मा के घर में प्रवेश करना चाहिये जहाँ उसकी अणभै = अपरोक्ष साक्षात्कार रूपी भिक्षा मिलती है । उस आइस = योगी = परमप्रियतम का दर्शन = अपरोक्ष साक्षात्कार प्राप्त करके उसका अभिवादन करूंगा ॥७४॥

*६. गुरु मुख कसौटी का अंग ~ २५/२९*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*६. गुरु मुख कसौटी का अंग ~ २५/२९*
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*ध्यान१ धनुष गहि सद्गुरु, मारैं वायक२ बाण ।*
*रज्जब सावज३ शर सहित, पड़े परस्पर आण ॥२५॥*
सद्गुरु हृदय-हाथ में विचार१-धनुष लेकर अर्थात अन्त:करण में साधकों के कल्याण को विचार करके साधक-शिकार२ के वचन३-बाण मारते हैं, तब अनेक शिष्य रूप शिकार परस्पर मिलकर वचन-बाण के सहित गुरु के चरणों में आ पड़ते हैं अर्थात वचनों को विचारते हुये गुरुदेव के पास आते हैं ।
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*रज्जब भलका१ भाव का, साँटी२ शब्द सु लाय ।*
*काबिज३ गुरु कमान५ गहि४, मार्या तीर चलाय ॥२६॥*
साधकों का कल्याण करने का विचार रूप धनुष४ ग्रहण३ करने वाले गुरु ने शब्द रूपी लचीली लकड़ी२ पर भाव रूप भल्ल१ लगाकर तैयार किये हुये बाण को उठाया५ और उक्त धनुष पर चढ़ाकर वह तीर साधक-हृदय के मोह-मृग पर मार दिया, मोह नष्ट होते ही साधक का कल्याण हो जाता है ।
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*सद्गुरु शब्द सु मार शर, जो फोड़े त्रयलोक ।*
*रज्जब छेदैं सकल गुण, अइया१ पैनी२ नोक३ ॥२७॥*
जो तीनों लोकों में स्थित साधकों के अज्ञान को तोड़ता है वा अज्ञान नाश द्वारा स्थूल, सूक्ष्म, कारण शरीर रूप तीनों लोकों का अभाव करता है, ऐसा सुन्दर-शब्द रूप बाण मारकर सद्गुरु, शिष्यों के सभी दोष रूप गुणों को नष्ट करके उनकी वृत्ति निर्गुण ब्रह्म में स्थित करते हैं । सद्गुरु के शब्द-बाण का अग्र३ भाग ऐसा१ ही तीखा२ है ।
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*रज्जब रूचे सु रोष रस, सद्गुरु पारस बैन ।*
*प्राणी पलटै लोह ज्यों, लागे कंचन ऐन ॥२८॥*
लोहा पारस की टक्कर लगते ही अपनी पूर्व स्थिति से बदल कर साक्षात् स्वर्ण ही हो जाता है, अत: पारस की टक्कर भी लोह के लिये सुन्दर सिद्ध होती है । वैसे ही सद्गुरु के रोष पूर्ण वचन भी रस-रूप ही भासते हैं, कारण-उनसे प्राणी का हृदय बदल कर ब्रह्म का साक्षात्कार हो जाता है, अत: वे रुचिकर ही सिद्ध होते हैं ।
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*शिष लोहा पारस गुरु, सज्यौं त्यों राम मिलाव ।*
*रज्जब भवै रोष रस, परसे कंचन भाव१ ॥२९॥*
जैसे पारस की टक्कर भी लोह को स्वर्ण की आकृति१ में बदल देती है । वैसे ही सद्गुरु के रोषपूर्ण वचन भी प्राणी को राम से मिलाकर पूर्वावस्था से बदल देते हैं, अत: रस रूप ही भासते हैं और सभी साधकों को प्रिय लगते हैं ।
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इति श्री रज्जब गिरार्थ प्रकाशिका सहित “६. गुरु मुख कसौटी का अंग” समाप्त ॥
‬‬‬‬‬‬‬‬‬‬‬‬‬‬‬‬‬‬‬‬‬‬‬‬‬‬‬‬‬‬‬‬‬‬‬‬‬‬‬‬‬‬‬‬‬‬‬‬‬‬‬‬‬‬‬‬‬‬‬‬‬‬‬‬‬‬‬‬‬‬‬‬‬‬‬‬‬‬‬‬‬‬‬‬‬‬‬‬‬‬‬(क्रमशः)

१८ आचार्य प्रकाशदेव जी ~

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*॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥*
*॥ दादूराम~सत्यराम ॥*
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
अथ अध्याय १५ ~ 
१८ आचार्य प्रकाशदेव जी ~ 
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प्रकाशदेवजी प्रथम पुजारी थे और आचार्यजी के प्रशिष्य थे । जब आचार्य रामलाल जी महाराज ब्रह्मलीन हो गये तब समाज ने प्रकाशदेव जी की गद्दी के योग्य अधिकारी समझ कर वि. सं. २००१ आश्‍विन कृष्ण ११ को आचार्य गद्दी पर विराज मान कर दिया । आचार्य प्रकाशदेव जी महाराज के गद्दी पर विराजने के पश्‍चात् मेरे मुख से भी यह मनहर छंद निकला था-
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पूषण प्रकाश सा प्रकाश राजे पाट पर,
यही वरदान दादूदेव हमें दीजिये ॥
पंथ पाथ - निधि संत पद्म फूलें पेखकर, 
 गुण गंध शत गुण फैले अस कीजिये ॥
 कुगुण कुमुद कुम्हलावें औ पलावे भेद, 
 भ्रमर विवेक थिरताई भल दीजिये ॥
 बावन ही घाट पर आतम विचार पाथ, 
 विश्‍व जीव पीय के अघावें कृपा कीजिये ॥१॥
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अर्थात्- हे दादूदेव दयालु जी ! हमें यही वरदान दें कि - आचार्य प्रकाशदेव जी महाराज आपकी गद्दी पर विराजकर पूषण(सूर्य) प्रकाश के समान ज्ञान प्रकाश प्रदान करें । जैसे सूर्यप्रकाश से सरोवर के कमल खिल जाते हैं, वैसे ही दादू पंथरुप सरोवर के संत रुप कमल आचार्य प्रकाशदेव जी के ज्ञान प्रकाश को देखकर खिल जायें अर्थात् पूर्ण संतत्व को प्राप्त हो जायें । 
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और जैसे कमलों के फूलने पर उनकी गंध फैल कर लोकों को सुख प्रदान करती है, वैसे ही संतों के विचारादि दैवी गुण अधिक लोक कल्याण में सहायक हों, ऐसी व्यवस्था कर दीजिये । और जैसे सूर्य के प्रकाश से चन्द्रमुखी कमल कुम्हला जाते हैं, वैसे ही आचार्य प्रकाशदेव जी के ज्ञान प्रकाश से संतों के हृदय के आसुर गुण कमजोर होकर नष्ट हो जायें और भेद - भ्रांति भाग जाय । 
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जैसे खिले हुये कमलों पर भ्रमर स्थिरता पूर्वक मडराते हैं, वैसे ही संतों के हृदय में विवेक आदि को भली भांति स्थिर कर दीजिये । जैसे सरोवर के जल का पान करके जगत के सभी प्राणी प्यास बुझा कर तृप्त होते हैं, वैसे ही दादू पंथ रुप सरोवर के ५२ थांभे रुप घाटों पर जगत के संपूर्ण मानव प्राणी आत्म विचार(ब्रह्मज्ञान) रुप सुधा पान करके तृप्त होते रहें, ऐसी कृपा अवश्य कीजिये । 
(क्रमशः)

मंगलवार, 17 मार्च 2026

२१. समर्थाई आश्चर्य को अंग २५/२८

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२१. समर्थाई आश्चर्य को अंग २५/२८
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जाकी आज्ञा मैं रहै, सुन्दर सप्त समुंद्र । 
सबही मांनहिं त्रास कौं, देवन सहित पुरंद्र ॥२१॥ 
अधिक क्या कहें, संसार के सातों समुद्र भी इन प्रभु के वशवर्ती(आज्ञाकारी) हैं । सभी देवता तथा उनके स्वामी इन्द्र भी उन प्रभु का भय एवं सङ्कोच मानते हैं ॥२१॥
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जाकी आज्ञा मैं रहै, ब्रह्मा विष्णु महेस । 
सुन्दर अवनि अनादि की, धारि रहे सिर सेस ॥२२॥
देवताओं में श्रेष्ठ तीनों देव - ब्रह्मा, विष्णु एवं शिव भी इन निरञ्जन निराकार प्रभु की आज्ञा के पालन में अपना गौरव समझते हैं । यदि पुराण शास्त्र की बात मानी जाय तो सहस्रमुख शेषनाग अनादि काल से प्रभु का आदेश मान कर इस समस्त पृथ्वी का भार अपने शिर पर ढो रहे हैं ॥२२॥

सुन्दर आज्ञा मैं रहै, काल कर्म जमदूत । 
गण गंधर्व निशाचरा, और जहां लगि भूत ॥२३॥
महाराज श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - जगत् के सञ्चालक काल एवं कर्म तथा यमराज(धर्मराज) देव, गन्धर्वगण, रात्रि में विचरण करने वाले राक्षस, भूत एवं प्रेत भी इनकी आज्ञा में रहना ही अपना प्रथम कर्तव्य समझते हैं ॥२३॥
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सिध साधिक जोगी जती, नाइ रहे मुनि सीस । 
सुन्दर सब ही कहत हैं, जै जै जै जगदीस ॥२४॥
तीनों लोकों में प्रसिद्ध सिद्ध(ज्ञानी), योगी, यति, ऋषि एवं मुनि भी इन प्रभु का जगदीश्वर के रूप में गौरव मानते हुए इनका सदा जय-जयकार ही करते रहते हैं ॥२४॥
(क्रमशः) 

अैसा रे कोई नगर बतावै

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*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*दादू अपणे अपणे घर गये, आपा अंग विचार ।*
*सहकामी माया मिले, निहकामी ब्रह्म संभार ॥*
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*निश्चय ॥*
अैसा रे कोई नगर बतावै । यहु संसार जहाँ थैं आवै ॥टेक॥
आवै अलेख लेखै चालै, बाट बहै दिन राती ।
जिहि नगरी जाइ बासा लीणाँ, सो नगरी लखीं न जाती ॥
खलक सवाई जाइ जाइ आई, तहाँ जाणौं भी कहिये ।
अजूँ नौंध नहीं नगरी का, देखि तमासै रहिये ॥
बूझत बूझत वै भीं बूझे, जे बेद कतेब बखाणैं ।
उन्हौं भी कह्या नहीं रे भाई, मैं जाण्याँ ए जाणैं ॥
अबही थैं ठाई करि राखौं, या मनि आई मेरै ।
बषनां बास बसन के ताँई, हरि नगरी कौन हेरै ॥७३॥
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बषनांजी उस नगर, स्थान, स्त्रोत की चर्चा इस पद में वे करते हैं जहाँ से इस संसार तथा संसार में निवास करने वाले जीवों का उद्गम होता है । वे सभी लोगों के अनभिज्ञ होने के कारण इस निर्णय पर पहुँचते है कि मुझे उस स्थान की पहचान शरीर छोड़ने के पूर्व ही कर लेनी चाहिये जिसस्थान में हरि = परात्पर-परब्रहम-परमात्मा निवास करता है । 
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वस्तुतः इसका तात्पर्य यह है कि परमात्मा किसी के स्थान पर न बसकर जर्रे जर्रे में बसता है । अतः बषनांजी उस रास्ते की खोज में है जिस पर चलकर वे ब्रह्म को जानकर ब्रह्म रूप हो सकें । यहां नगरी का तात्पर्य परब्रह्म-परमात्मा से है । वही जगत का अभिन्न निमित्तोपादन कारण है उसी से जगत की उत्पत्ति होती है ।
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कोई मुझे ऐसा नगर, स्थान, स्त्रोत बता दे जहाँ से इस संसार का(जड़तत्व) तथा संसार में रहने वाले जीवों का(चित तत्त्व) उद्गम होता है । अनेक(अलेख = अलेख्य) जीव इस संसार में जन्मते हैं । जन्मकर निवास करते हैं और अंत में लेखै = निश्चित क्रमानुसार, निश्चित अवधि पूरी करके इस संसार से चले जाते हैं । 
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आने-जाने का यह क्रम दिनरात, अनवरत चलता रहता है । मरने वाले जिस नगरी में जाकर विश्राम करते हैं वह नगरी देखने में नहीं आती क्योंकि वह भूमण्डल पर नहीं है । समस्त खलक = संसार के जीव उस नगरी में जाते हैं, अपने पाप-पुण्यों को भुगतते हैं और वहाँ से पुनः वापिस भी आते हैं । आने के उपरान्त वे यहाँ अचल रूप में नहीं रह पाते । अतः वे आकर पुनः जाने की बात भी कहते हैं । 
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दिन-प्रतिदिन न जाने उस नगरी से कितने जीव आते हैं और उसमें कितने ही जीव जाते हैं तब भी उस नगरी की असली जानकारी(नौंध) किसी को नहीं हुई है । इसकारण इस विषय में इन आने-जाने वाले लोगों के भोलेपन का तमाशा देख सुनकर चुप रह जाना पड़ता है । जब जिज्ञासावश उस नगरी(परब्रह्म-परमात्मा) के बारे में उनसे पूछा जाता है जो वेद तथा कुरान का पठन-पाठन, चिंतन-व्याख्यान करते हैं तो वे भी उसके बारे में बताने में असमर्थ तो रह ही जाते हैं उल्टे जिज्ञासु से ही पूछने लग जाते हैं । 
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वे कहते हैं, हे भाई ! हमने उस नगरी को अभी तक उतना ही नहीं जाना जितना दूसरे(आत्मजिज्ञासु) जानते हैं । इस विचित्र स्थिति को देख व जानकर मैं बषनां के मन में यह विचार आया कि मैं अबही से उस नगरी के बारे में सभी कुछ ज्ञातव्यों की जानकारी कर लूँ । अतः मैं बषनां अचल बास बसने के लिये उस नगरी = हरि की नगरी = परमात्मा को जानने का प्रयत्न कर रहा हूँ, परमात्मा को खोज रहा हूँ ॥७३॥

*६. गुरु मुख कसौटी का अंग ~ २१/२४*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*६. गुरु मुख कसौटी का अंग ~ २१/२४*
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*सतगुरु सीगणि१ हाथ ले, मारे मर्म२ विचार ।*
*जन रज्जब जाके बणैं, सो बैठे तन हार ॥२१॥*
सद्गुरु अपने अन्त:करण रूप हाथ में जीव के कल्याण की भावना रूप धनुष१ लेकर तथा शिष्य-हृदय के दोष-विनाशक-रहस्य२ का विचार करके अर्थात कौन दोष है और किस बाण से नष्ट होगा, ऐसा विचार करके वचन-बाण मारते हैं । बाणघात से जिन शिष्यों के कार्य ठीक बन जाते हैं, वे तो शरीराध्यास को खोकर स्व स्वरूप में स्थित हो जाते हैं ।
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*ज्ञान खङ्ग गुरु देव गहि, दे सेवक शिर आन ।*
*मारत ही मोहन मिले, जे ओडे१ जिव जान ॥२२॥*
गुरुदेव ज्ञान-रूप तलवार को शास्त्रागार से उठाकर लाते हैं और शिष्य के जीवत्व अभिमान रूप शिर पर मारते हैं । यदि शिष्य अपने हृदय में कल्याण-प्रद जानकर उसे झेल१ लेता है, तो मारते ही अर्थात अभिमान के नष्ट होते ही ब्रह्म का साक्षात्कार हो जाता है ।
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*सद्गुरु साँग१ सु शब्द की, रसन हाथ ले देय ।*
*जन रज्जब जगपति मिलै, जे उर श्रवण सु लेय ॥२३॥*
सद्गुरु, ज्ञान युक्त सुन्दर शब्द रूप भाला१ जिह्वा रूप हाथ में लेकर मारते हैं, यदि कोई भली प्रकार श्रवणों द्वारा उसे हृदय में धारण करता है, उसे परब्रह्म मिलते हैं ।
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*ज्ञान गुर्ज१ गुरुदेव गहि, गर्द२ किया रण माँहिं ।*
*जो रज्जब सन्मुख गया, सो फिर आवे नाँहिं ॥२४॥*
गुरुदेव ने ज्ञान रूप गदा१ हृदय-हाथ में ग्रहण करके योग-संग्राम में कामादि शत्रुओं को घूली२ में मिला दिया है अर्थात नष्ट कर दिया है । ऐसे गुरुदेव के सन्मुख जो भी गया है अर्थात उनका ज्ञान धरण किया है, वह फिर जन्मादि संसार में नहीं आता है ।
(क्रमशः)

सोमवार, 16 मार्च 2026

समारोह समाप्ति ~

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*॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥*
*॥ दादूराम~सत्यराम ॥*
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
समारोह समाप्ति ~ 
उत्सव के आयोजन का स्थूल उद्देश्य ‘‘दादूजी महाराज की स्मृति को जागृत करना था ।’’ उसकी अधिकांश रुप में पूर्ति हो गई । यह वैसे ‘‘उत्सव’’ मनाया गया था । ‘‘उत्सवों’’ में जैसा कि उसका स्थूल रुप होना चाहिये, वैसा स्थूल रुप इसका भी बहुत अच्छे रुप में सम्पन्न हो गया । कथा, कीर्तन, जुलूस, भाषण, उपदेश के आवश्यक उपांग होते हैं, वे सब इसमें भी अच्छी प्रकार हुये थे । 
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जनता का समूह बहुत ही पर्याप्त था । बाहरी दृश्य भी बहुत अच्छा था । उत्सव के इस नाते से, समारोह की इस भावना से, शताब्दी उत्सव पूर्णरुप से सफल संपन्न हुआ, इसमें कोई अतिशयोक्ति का भाव नहीं है । इस प्रकार दादू समाज की निर्धारित भावना, परमाचार्य श्रीदादू महाराज की अनुकम्पा से सम्यक् रुप में सफलता के साथ सम्पन्न हो गई । 
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उत्सव मानकर आने वाले व्यक्तियों को किसी प्रकार का असंतोष नहीं रहा था । उत्सव की समाप्ति आनन्द के साथ ही हुई थी ।  उक्त  महान् उत्सव आचार्य रामलालजी महाराज के समय में हुआ था । अत: उनके विवरण के साथ ही दिया गया है । उक्त प्रकार आचार्य रामलाल जी महाराज १२ वर्ष १० माह १३ दिन गद्दी पर विराज कर वि. सं. २००१ आश्‍विन कृष्णा ९ मी को ब्रह्मलीन हो गये ।  
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गुण गाथा ~ दोहा- 
रामलाल आचार्य जी, थे सब भांति प्रवीन ।  
संकट में भी उन्हों का, हुआ न चित्त मलीन ॥१॥
होते भी प्रति पक्ष के, तजा न निज कर्तव्य ।  
इसीलिये ही हो गये, वे सबके मन्तव्य ॥२॥ 
रामलालजी राम के, थे निश्‍चय ही लाल ।  
इसी लिये ही हो सके, सब के पूज्य विशाल ॥३॥
रामलाल आचार्य ने, भजा विश्‍व पति राम ।
इससे ही उनके हुये, सारे पुरण काम ॥४॥
रामलाल आचार्य में, गुण थे उनहि समान ।
सब तो कैसे कह सके, ‘नारायण’ अनजान ॥५॥ 
इति श्री चतुर्दश अध्याय समाप्त: १४ 
(क्रमशः)

२१. समर्थाई आश्चर्य को अंग २१/२४

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२१. समर्थाई आश्चर्य को अंग २१/२४
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जाकी आज्ञा मैं रहै, सुन्दर सप्त समुंद्र । 
सबही मांनहिं त्रास कौं, देवन सहित पुरंद्र ॥२१॥ 
अधिक क्या कहें, संसार के सातों समुद्र भी इन प्रभु के वशवर्ती(आज्ञाकारी) हैं । सभी देवता तथा उनके स्वामी इन्द्र भी उन प्रभु का भय एवं सङ्कोच मानते हैं ॥२१॥
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जाकी आज्ञा मैं रहै, ब्रह्मा विष्णु महेस । 
सुन्दर अवनि अनादि की, धारि रहे सिर सेस ॥२२॥
देवताओं में श्रेष्ठ तीनों देव - ब्रह्मा, विष्णु एवं शिव भी इन निरञ्जन निराकार प्रभु की आज्ञा के पालन में अपना गौरव समझते हैं । यदि पुराण शास्त्र की बात मानी जाय तो सहस्रमुख शेषनाग अनादि काल से प्रभु का आदेश मान कर इस समस्त पृथ्वी का भार अपने शिर पर ढो रहे हैं ॥२२॥

सुन्दर आज्ञा मैं रहै, काल कर्म जमदूत । 
गण गंधर्व निशाचरा, और जहां लगि भूत ॥२३॥
महाराज श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - जगत् के सञ्चालक काल एवं कर्म तथा यमराज(धर्मराज) देव, गन्धर्वगण, रात्रि में विचरण करने वाले राक्षस, भूत एवं प्रेत भी इनकी आज्ञा में रहना ही अपना प्रथम कर्तव्य समझते हैं ॥२३॥
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सिध साधिक जोगी जती, नाइ रहे मुनि सीस । 
सुन्दर सब ही कहत हैं, जै जै जै जगदीस ॥२४॥
तीनों लोकों में प्रसिद्ध सिद्ध(ज्ञानी), योगी, यति, ऋषि एवं मुनि भी इन प्रभु का जगदीश्वर के रूप में गौरव मानते हुए इनका सदा जय-जयकार ही करते रहते हैं ॥२४॥
(क्रमशः)

*विनती ॥ साषी लापचारी की ॥१*

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*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*दादू हौं बलिहारी सुरति की, सबकी करै सँभाल ।*
*कीड़ी कुंजर पलक में, करता है प्रतिपाल ॥२५॥*
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*विनती ॥ साषी लापचारी की ॥१* 
(१ इस साषी का अर्थ ‘बेसास कौ अंग’ में देखें ।) 
मात पिता का गमि नहीं, तहाँ पिवाया खीर ।
सो गुण थारा रामजी, बषनैं लिख्या सरीर ॥
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पद ॥
हूँ क्यूँ बीसरौं रे, तो गुण दीनदयाल ।   
तूँ म्हारौ औगुण छाँवणौं करणा मैं किरपाल ॥टेक॥
जिहिं उदर माँहिं अधार दियौ, नीर खीर सँजोइ ।
सो थारा किया रामजी, म्हारै कहैं न होइ ॥
जिहिं सिरज्या जल बूंद थैं, बांध्या इस्या बँधाण ।
सोह मनैं क्यूँ बीसरै, जिहिं का ये सहिनाण ॥   
जिहिं सागै ए सहि सगा, मात पिता परिवार ।
जिहिं तूटाँ सहि तूटिसें, कोइ राखै नँहीं लगार ॥
और सबै बीसारस्यौं, कहुँ नहिं म्हारै भाइ ।
जिहिं बिना म्हारै ना सरै, सो क्यूँ बीसार्यौ जाइ ॥
ए गुण थारा रामजी, ए दूजा का नाहिं ।
सो बषनौं क्यूँ बीसरै, म्हारै लिख्या जु हिरदै माहिं ॥७२॥
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हे दीनों पर दया करने वाले दीनदयालु परमात्मन् ! मैं आपके अनंतानंत गुण = उपकारों को क्योंकर विस्मृत करूं क्योंकि आप अकारण ही कृपा करने वाले करुणामय तथा मेरे अवगुणों को छावणौं आच्छादित = ढँकने = विस्मृत कर देने वाले हैं । 
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पदकार परमात्मा के अमित उपकारों में से कुछ का दिग्दर्शन कराते हुए कहते हैं, आपने माता के उदर में जल और खीर = दूध = भोजन की व्यवस्था करके मुझे अधार = जगत् में आने के लिये सुदृढ़ आधार रूपी शरीर प्रदान किया । यह सब आपका ही कृत्य है, कोई भी इसे अपना कृत्य नहीं बता सकता । आपने मेरे शरीर का सृजन जल = वीर्य की एक बूंद मात्र से किया और माता के उदर में खाने-पीने का पूरा प्रबन्ध करके इसप्रकार की व्यवस्था की कि मुझे संसार में आने में किसी भी प्रकार की कोई भी बाधा का सामना नहीं करना पड़ा । 
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जिस परमात्मा के = आपके उक्त प्रकार के सहिनाण = उपकारों के नमूने हैं, वह परमात्मा मुझे क्योंकर भूल सकता है । अर्थात् आपका स्वभाव तो अकारण ही दया-कृपा करना है । अतः मैं चाहे आपको याद करूँ अथवा नहीं करूँ आपतो मुझ पर कृपा करेंगे ही । अतः आपके द्वारा मुझे भूला जाना कैसे भी संभव नहीं है । हे परमात्मन् ! आपका प्रभाव भी अमित है । 
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आपसे सम्बन्ध रहने पर माता, पिता परिवार वाले सभी परिजन भी मधुर सम्बन्ध बनाकर रखते हैं । इसके विपरीत आपसे सम्बन्ध टूटते ही ये सभी सम्बन्ध विच्छेद कर लेते हैं । इनमें से कोई भी लगार = तनिक सा भी प्रेम-सम्बन्ध नहीं रखते हैं । 
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(वेदान्त की दृष्टि से देखें तो ज्ञात होता है, जब तक शरीर का सम्बन्ध चैतन्य से रहता है, तबतक ही सगे सम्बन्ध उससे सम्बन्ध रखते हैं । जैसे ही शरीर से चैतन्य निष्क्रमण करता है वैसे ही सभी परिवारजन मरा-मरा कहकर जलाने को शमशान में ले जाते हैं । अतः पदकार का कहना सर्वथा व्यावहारिक तथ्याधारित है कि असली प्रेम चैतन्य को लेकर ही होता है । फिर क्यों नहीं उसी से एकान्तिकी प्रेम किया जाय । वस्तुतः समष्टिचैतन्य ही ब्रह्म तथा व्यष्टिचैतन्य ही जीव है ।) 
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हे परमात्मन् ! अब मेरा और कहीं भी किसी से भाव = लगाव = राग नहीं रह गया है । फिर भी यदि कहीं किसी से प्रकट, गुप्त रूप में कोई राग-सम्बन्ध है तो उसे भी मैं सर्वथा विस्मृत कर दूंगा । किन्तु जिस परमात्मा के बिना मेरा काम बिलकुल नहीं चल सकता, उस परमात्मा = आपको मैं कैसे विस्मृत कर सकता हूँ । 
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हे रामजी ! उक्त प्रकार के अनिर्वचनीय उपकार आपही कर सकते हैं; दूसरों के द्वारा इस प्रकार के उपकार करना संभव नहीं है । ऐसे उपकारों को मैं बषनां कैसे विस्मृत कर सकता हूँ क्योंकि ये सभी उपकार मेरे हृदय-पटल पर अमिट रूप में अंकित हो चुके हैं ॥७२॥ 

*६. गुरु मुख कसौटी का अंग ~ १७/२०*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*

*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*६. गुरु मुख कसौटी का अंग ~ १७/२०*
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*मन भुजंग१ गुरु गारड़ी२, राखे कील करंड३ ।*
*जन रज्जब निर्विष करै, दुष्ट दशन कर खंड ॥१७॥*
सर्प१ को सर्प विष नाशक मंत्र जानने वाला२ कीलन मंत्र से कीलकर पिटारे३ रखता है और उसके विष से दूषित दाँत तोड़कर उसे निर्विष बना देता है । वैसे ही सद्गुरु उपदेश द्वारा मन की दूषित वृत्तियों को नष्ट करके मन को निर्विषय बना देते हैं ।
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*मन भवंग१ गुरु गरुड कहि, किया गगन को गौन ।*
*जन रज्जब जिवकी पड़ी, मूसे गटके कौन ॥१८॥*
सर्प१ को पकड़ कर गरुड़ आकाश को उड़ता है तब सर्प के हृदय से अपनी रक्षा की उपाय गिर पड़ती है, अर्थात वह अपने प्राणों की रक्षा भी नहीं कर सकता तब चूहे कैसे खायगा ? वैसे ही गुरु साधन द्वारा पकड़ कर साधक के मन को ब्रह्म में ले जाते हैं तब मन अपनी रक्षा भी नहीं कर सकता, अर्थात उसका मन पना भी वहाँ नहीं रहता तब विषयों का उपभोग कैसे कर सकता है ?
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*अनल पक्षि गुरु ने लिये, पंच तत्त्व अरु प्रान१ ।*
*ज्यों गगना२ गय३ ले उड़े, छूटा क्षिति४ अस्थान५ ॥१९॥*
जैसे अनल पक्षी हाथियों३ को लेकर आकाश२ मार्ग से उड़ता है तब हाथियों का पृथ्वी४ रूप स्थान५ छूट जाता है । वैसे ही पंच तत्त्व रूप पंच ज्ञानेन्द्रियां और मन१ को सद्गुरु उपदेश द्वारा उठाकर ब्रह्म में ले जाते हैं तब उनका मायारूप स्थान छूट जाता है । अनल पक्षी का परिचय- अनल पक्षी आकाश में रहता है । अंडा देता है तब अंडा पृथ्वी पर आता है । उस अंडे से जन्मा हुआ बच्चा खाने के लिये कुछ हाथियों को अपने पंजों में पकड़ कर पुन आकाश को चला जाता है ।
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*मन मैमंतों१ ले गये, सुगुरु अनल आकाश ।*
*सो न छुडाये छूट हीं, नख शिख किये गराश ॥२०॥*
अनल पक्षी हाथी१ को आकाश में ले जाता है तब वह छुड़ाने से नहीं छूटता, उसे तो नख से शिखा तक अनल पक्षी खा जाता है । वैसे ही श्रेष्ठ गुरु साधक के मन को साधन द्वारा ब्रह्म में ले जाते हैं तब उसका भी अभाव हो जाता है ।
(क्रमशः)

समारोह के कार्यकर्ता ~

*#daduji*
*॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥*
*॥ दादूराम~सत्यराम ॥*
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
समारोह के कार्यकर्ता ~ 
वैसे इस समारोह को संपन्न करने में सम्पूर्ण दादूपंथी महात्माओं ने तन मन धन से भाग लिया था । गृहस्थ साधु भी बहुत बडी संख्यामें सकुटुम्ब आये थे । फिर भी समारोह का विशेष भार जिन पर था, उनका श्रम और प्रयास अधिक ही था । समारोह की निर्विध्न पूर्ति का विशेष श्रेय पूज्य अनन्त श्री आचार्य रामलाल जी महाराज को है । 
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उन्होंने आरंभ से अन्त तक इस कार्य में सर्वदा उचित सहयोग प्रदान किया । दूसरे स्वामी मंगलदासजी महाराज श्री दादू महाविद्यालय जयपुर तो चंदा से लेकर आदि सभी कार्यों में परिश्रम करते रहे थे । उनका परिश्रम सबसे अधिक था । वैद्य जयरामदास जी भिषगाचार्य जयपुर समारोह के मंत्री थे । उनपर तो इस कार्य का प्रधान भार था ही । 
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भंडारी हरिराम जी दादूद्वारा नारायणा । महन्त रामूदासजी रामोला । नारायणा की स्थानीय व्यवस्थाओं की पूर्ति अधिकांशत: आप ही से संपन्न हुई थी । भोजन की व्यवस्था का भार वहन महन्त चैन सुखजी डीडवाणा, सुखरामदास जी जमात निवाई ‘चांवडया’ आदि महानुभावों ने किया । 
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सभाओं के आयोजनादि तथा विचार संबन्धी कामों की पूर्ति में महन्त मनीराम जी कलानोर, स्वामी दयानिधि जी ॠषिकेश, स्वामी कृपारामजी भिवानी, स्वामी गिरधरानन्दजी दादरी प्रमुख थे । अतिथियों के आने, जाने ठहराने आदि की व्यवस्था की पूर्ति वैद्य रामदेवजी सेलू, वैद्य हरिश्‍चन्द्र जी किशनगढ, वैद्य कानदासजी चुरु ने की ।
‘‘दादू वीरदल’’ के संपूर्ण सदस्य व उनके प्रमुख स्वामी गिरधरानन्दजी का शारीरिक श्रम सम्बन्धी सहयोग सभी कामों को मिलता था । आयोजन के श्रम संबन्धी संपूर्ण कामों की पूर्ति इसी विभाग द्वारा संपन्न हुई थी । भोजन कराने की पूर्ति का श्रेय भी ‘दादू वीरदल’ के वीरों को ही है । पंडाल निर्माण, पंडाल समाप्ति, अतिथियों की परिचर्या, जुलूस की व्यवस्था, सभा आदि के समय बैठाने की व्यवस्था ये सब इसी विभाग द्वारा पूरे हुये थे ।  
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वैद्य गुलाबदासजी, स्वामी सुरजनदासजी, स्वामी केशवदासजी, स्वामी कानदासजी, भजनदासजी, महन्त मनसारारामजी बुरहानपुर, वैद्य श्रवणदासजी, लाघुरामजी जमात उदयपुर, जोधारामजी, तपस्वी मानदासजी, केशरदासजी जमात उदयपुर, भूरारामजी देवास, स्वामी चेतनानन्दजी रत्नगढ, मुखरामजी स्वामी की ढाणी, ये सब सहायक कार्य कर्ता थे । इनमें से बहुतों को तो कभी कभी दिन रात कार्य में लगना पडता था । 
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और भी अनेक महानुभावों ने इस कार्य में अत्यन्त भाग लिया था । उनके श्रम और सहयोग से ही इसकी यथावत पूर्ति हुई थी । स्वामी गिरधरानन्दजी ने ‘दादू वीरदल’ के सफल संचालन के साथ साथ सफाई के लिये भारी प्रयास किया था । उनके अथक श्रम से ही इतने समुदाय के एकत्रित होते हुये भी स्वच्छता का सम्यक् संरक्षण हो सका । यदि वे इतनी सतर्कता से इस ओर ध्यान न देते तो स्वच्छता का संरक्षण कठिन था, जिसकी सर्वतोपरि आवश्यकता थी ।
(क्रमशः)

२१. समर्थाई आश्चर्य को अंग १७/२०

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२१. समर्थाई आश्चर्य को अंग १७/२०
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उपजै बिनसै जगत सब, सुख दुख बहु संताप । 
सुन्दर करि न्यारा रहै, ऐसा समरथ आप ॥१७॥
यह संसार उत्पन्न एवं विनष्ट होता हुआ सुख दुःख आदि नानाविध वेदनाओं का अनुभव करता रहता है; परन्तु वह समर्थ प्रभु स्वयं इस अनुभव से पृथक् ही रहता है ॥१७॥
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सुन्दर करता राम है, भरता और न कोइ । 
हरता वह ई जानिये, ऐसा संमरथ सोइ ॥१८॥
महाराज श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - जब इस संसार का कर्ता(रचयिता) वह स्वयं निरञ्जन निराकार प्रभु है तो इसका भर्ता(रक्षक) उसके अतिरिक्त कौन होगा ! इतने विशाल संसार के पालन पोषण की सामर्थ्य अन्य किस में हो सकती है ! अतः उस सर्वशक्तिसम्पन्न को ही इसका रक्षक, भक्षक एवं पोषक मानना चाहिये ॥१८॥
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जाकी आज्ञा मैं सदा, धरती अरु आकास । 
ज्यौं राखै त्यौं ही रहै, सुन्दर मानहिं त्रास ॥१९॥
वे हमारे प्रभु इतने बलवान् एवं सामर्थ्यशाली है कि ये दोनों विशाल पृथ्वी एवं आकाश तत्त्व उनकी आज्ञा के पालन में सदा तत्पर रहते हैं । वे प्रभु उन को जैसी आज्ञा देते हैं, ये दोनों इन से भय एवं लज्जा मानते हुए एतदनुसार आचरण करते हैं ॥१९॥
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पावक पानी पवन पुनि, सुन्दर आज्ञा मांहिं । 
चन्द सूर फिरते रहैं, निश दिन आवै जांहिं ॥२०॥
इन पृथ्वी एवं आकाश के समान ही अग्नि, जल तथा वायु तत्त्व भी इन महाप्रभु के आज्ञाकारी ही रहते हैं । इसी प्रकार, चन्द्रमा और सूर्य भी, इनकी आज्ञा मान कर क्रमशः रात्रि एवं दिन में समस्त संसार को क्रमशः आलोकित करते रहते हैं ॥२०॥
(क्रमशः)

बिनती एक सुणौं हो स्वामी

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*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*दादू प्राणी बँध्या पंच सौं, क्योंही छूटै नांहि ।*
*निधणी आया मारिये, यहु जीव काया मांहि ॥*
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विनती ॥
बिनती एक सुणौं हो स्वामी ।
हिरदै रहिजै अंतरजामी ॥टेक॥
प्राण पखेरू करै पयाणौं ।
ता दिन मोहि अपणौं करि जाणौं ॥
सास बास छाडै काया गढ छीजै ।
तिहि दिन अपणा कौ ऊपर कीजै ॥
बषनां की बेनती या चिति कीजै ।
लेखौ मांगै तो लेण न दीजै ॥७१॥
हे स्वामी ! मेरे हृदय में सदैव-सदैव विराजमान रहिये, मेरी इस एक विनती को सुन लीजिये, मान लीजिये । जिस समय मेरे प्राण रूपी पक्षी शरीर रूपी वृक्ष से प्रयाण करें, उसी दिन, उसीसमय आप मुझे सर्वांश में अपना लेना, अपना बना लेना ।
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जिस दिन = समय शरीर रूपी किला क्षीण हो, उसमें से आत्मा रूपी निवासी निवास करना छोड़े, सास = प्राण रूपी सहायक निष्क्रमण करे; उसी दिन = समय मुझ अपने को नरकगामी = निम्नगामी न होने देकर उर्ध्वगामी = अपने स्वरूप में ही विलिन कर लेना ।
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हे स्वामी ! मुझ बषनां की इस विनती को ध्यान में लाइये, स्वीकार करिये । यदि यमराज आदि मेरे किये पापों का हिसाब मांगे तो भी मांगने मत देना । आप उन्हें निश्शेष कर देना । निश्शेष हुस पापों का हिसाब फिर धर्मराज कैसे मांग सकेगा ॥७१॥

रविवार, 15 मार्च 2026

*६. गुरु मुख कसौटी का अंग ~ १३/१६*

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🌷*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*६. गुरु मुख कसौटी का अंग ~ १३/१६*
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*शिष शंकट मैं नीपजे, गुरुहुं सु बंधे गंठ ।*
*मन मणि गण छेदे बिना, रज्जब बँधे न कंठ ॥१३॥*
मणि समूह छेद करे बिना कंठ में नहीं बाँधा जाता, वैसे ही साधन संकट सहन करे बिना गुरुओं की ज्ञान-गांठ में मन भली प्रकार में नहीं बंधता । अत: शिष्य साधन-संकट में ही श्रेष्ठ बनता है ।
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*कठिन कसौटी१ नीपज्या, तिसहिं कसौटी नाँहिं ।*
*वासण२ डरे न बासदे३, पाका पावक माँहिं ॥१४॥*
जो साधन-संकट१ से श्रेष्ठ बना है, उसे यम-यातनादि का कष्ट नहीं होता । जो बर्तन२ अग्नि में पका है वह अग्नि३ से नहीं डरता है ।
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*मन हस्ती मैमंत१ शिर, गुरु महावत होय ।*
*रज्जब रज डारे नहीं, करै अनीति न कोय ॥१५॥*
मदमत्त१ हाथी के शिर पर महावत होता है तब वह अपने ऊपर रेत नहीं डालता, वैसे ही शिष्य-मन के वृत्ति-शिर पर गुरु ज्ञान होता है तब मन अनीति नहीं करता ।
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*मन मारूतभख१ सूधा किया, सोधी३ दोनों जाड़२ ।*
*काम क्रोध अरु लोभ मोह की, च्यारों डाढ़ उपाड़ ॥१६॥*
सर्प१ की ऊपर नीचे की दोनों दाढों३ को शुद्ध२ करदी अर्थात विष निकाल दिया तो मानो सर्प को सीधा कर दिया, अर्थात फिर उससे कोई हानि नहीं होती, वैसे ही मनकी काम, क्रोध, लोभ और मोह रूप चारों दाढें उपाड़ दी तो मानों मन को सीधा कर दिया । अब उससे भी कोई हानि नहीं हो सकेगी ।
(क्रमशः)

शनिवार, 14 मार्च 2026

समारोह में सम्मिलित समुदाय ~

*#daduji*
*॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥*
*॥ दादूराम~सत्यराम ॥*
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
एकादशी शताब्दी समारोह की अन्तिम तिथि थी । इस दिन के कार्यक्रम में जयपुर के प्राइममिनिस्टर माननीय सर मिर्जा इस्माइल का प्रमुख स्थान था । अधिवेशन १ बजे से पंडित प्रवर स्वामी रत्नदेव जी के सभापतित्व में प्रारंभ हुआ । आज व्यायाम प्रदर्शन भी बहुत अच्छा हुआ । दर्शकों के हृदय देख देख कर प्रफुल्लित होते थे । सभापति रत्नदेव जी का धर्मोपदेश विषय में भाषण हुआ । 
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रेल्वे टाइम ४ बजे प्राइममिनिस्टर महोदय जयपुर से आये । उनके आने पर मंगलाचरण कर अभिनन्दन समर्पण किया गया । अभिनन्दन दादू सम्प्रदाय की ओर से दिया गया था । अभिनन्दन समर्पित करने का कार्य माननीय स्वामी श्री दयानिधिजी आयुर्वेदाचार्य ॠषिकेश ने सम्पन्न किया । 
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अभिनन्दन के प्रत्युत्तर में माननीय सर प्राइममिनिस्टर महोदय ने अपना सारगर्भित भाषण दिया, जिसमें साधुओं का ध्यान सामयिक  स्थितियों की ओर विशेष रुप से आकर्षित किया गया । धन्यवाद के पश्‍चात् शताब्दी समारोह की समाप्ति की गई । इस प्रकार इस महान् पर्व की पंचमी से एकादशी तक निर्विध्न समाप्ति हुई ।  
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समारोह में सम्मिलित समुदाय ~ 
शताब्दी समारोह में दादू संप्रदायानुयायी महन्त, सन्त, महात्मा तो प्राय: आये ही थे । वैसे ‘‘दादूजी’’ स्वयं किसी वर्ग विशेष के बन्धन में बँधे हुये नहीं थे । अत: उनमें श्रद्धा रखने वाले सभी व्यक्तियों को तथा जन साधारण को इस उत्सव में आमंत्रित किया गया था । 
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‘दादूजी’ अन्तर्राष्ट्रीय महापुरुष थे । उन्होंने अपने आदर्श तथा उपदेश से मानव समाज को विशेष प्रकार की देन प्रदान की थी । उनके उस उपकार की कृतज्ञाता में सभी को भागीदार होने का हक था । अत: इस समारोह में दादू पंथी साधु समुदाय के अतिरिक्त अन्य सम्प्रदायों के महात्मा तथा सद्गृहस्थ सभी ने प्रेम पूर्वक भाग लिया था । 
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युद्ध के कारण यात्रा करना इस समय अत्यन्त कष्ट प्रद था । फिर भी दूर- दूर से अनेक गणमान्य सज्जनों ने पधार कर अपनी श्रद्धा को मूर्त रुप में प्रकट किया था । साधुओं में दादूपंथी, निरंजनी, रामस्नेही, कबीर पंथी, उदासीन, संन्यासी आदि सभी महात्मा पधारे थे । गृहस्थों में चतुर्वर्ण के व्यक्ति आये थे । समारोह में दैनिक उपस्थिति का अनुमान पांच हजार प्रति दिन के हिसाब से था । 
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पंचमी, अष्टमी और एकादशी को यह संख्यादश हजार से अधिक हो गई थी । ऐसा समारोह सैक़डों वर्षों में भी नारायणा दादूधाम में नहीं हुआ था । युद्ध जनित भयंकर बाधाओं के होते हुये भी छोटे से नारायणे ग्राम में इतने समुदाय की भोजनादि की व्यवस्था समुचित होना इस समारोह की विशेषता थी । 
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पधारने वाले महानुभावों में कुछ विशेष गणनीय हैं, जैसे पंडित प्रवर गंगेश्‍वरानन्द जी महाराज व सर्वानन्दजी उदासीन । जामनगर के राज्य गुरु पं. माया प्रसाद जी जामनगर । पं. रतनदेवजी उदासीन गुजरां वाला । स्वामी केशवानन्दजी संगरिया मंडी । पंडित प्रवर महामहोपाध्याय गिरिधरजी शर्मा चतुर्वेदी । 
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पंडित सूर्य नारायणजी व्याकरणाचार्य । पं. मथुरानाथजी भट्ट साहित्याचार्य । राज्यगुरु श्री चन्द्रदत्त जी ओझा व्याकारणाचार्य । तथा जयपुर संस्कृत कालेज के कई विद्वान । पं. झावरमल जी शर्मा जसरापुर(खेतडी) । राज्य वैद्य नन्द किशोरजी भिषमाचार्य । धन्वन्तरि आरोग्य शाला के प्रधान वैद्य मुकुन्ददेवजी शर्मा । वैद्यवर स्वामी केवलराम जी बीकानेर । 
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वैद्यवर श्री नारायण जी शर्मा । वैद्य लक्षराम जी बीकानेर । महन्त तुलसीराम जी लीजा माजी का मंदिर जोधपुर । वैद्य गणेशदासजी विरक्त सुजानगढ इत्यादि । जयपुर राज्य के प्राइममिनिस्टर महोदय का आगमन विशेष था ही, साथ ही और भी कोई मिनिस्टर व राज्यधिकारियों ने आने का कष्ट उठाया था । इस प्रकार सभी श्रेणियों के सज्जनों का समारोह में सहयोग प्राप्त हुआ था ।  
(क्रमशः)

२१. समर्थाई आश्चर्य को अंग १३/१६

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२१. समर्थाई आश्चर्य को अंग १३/१६
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एक बूंद तें चित्र यह, कैसौ कियौ बनाइ । 
सुन्दर सिरजनहार की, रचना कही न जाइ ॥१३॥
उन की रचना का एक आश्चर्यमय उदाहरण यह है कि वे एक विन्दु(शुक्रविन्दु) से इतनी विशाल एवं विचित्र सृष्टि कर देते हैं, उन की इस रचना का यथातथ वर्णन करने में किसी की सामर्थ्य नहीं है ॥१३॥
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जड़ चेतनि संयोग करि, अद्भुत कीयौ ठाट । 
सुन्दर समरथ रामजी, भिन्न भिन्न करि घाट ॥१४॥
उन ने इस सृष्टि में जड एवं चेतन को संयुक्त कर भिन्न भिन्न रचनाओं में आश्चर्यमय ऐसे आकार(ढाँचा = ठाट) बना दिये कि हम लोग देखते ही रह जाते हैं ॥१४॥
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करै हरै पालै सदा, सुन्दर संमरथ राम । 
सबही तैं न्यारौ रहै, बस मैं जिन कौ धांम ॥१५॥
उन समर्थ प्रभु के इस सृष्टिरचना में तीन अद्भुत कार्य हैं - १. वे इस सृष्टि की रचना भी करते हैं और २. इस सृष्टि का पालन भी करते हैं, तथा ३. वे इस सृष्टि का संहार भी करते हैं । इतना सब करने पर भी, वे सब से पृथक्(तटस्थ) भी रहते हैं । तथा सब के हृदय में भी वे विराजमान हैं ॥१५॥

अंजन यह माया करी, आपु निरंजन राइ । 
सुन्दर उपजत देखिये, बहुर्यौं जाइ बिलाइ ॥१६॥
उन समर्थ प्रभु ने स्वयं निरञ्जन(मायारहित) रहते हुए अपनी इस सृष्टि को मायिक एवं अविद्यायुक्त बना दिया । इस अविदया के कारण ही यह सृष्टि उत्पन्न एवं विनष्ट होती रहती है ॥१६॥
(क्रमशः)

*विनती ॥*

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*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*तुम को भावै और कुछ, हम कुछ किया और ।*
*मिहर करो तो छूटिये, नहीं तो नांहीं ठौर ॥*
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*विनती ॥*
तूँ जिनि छाडै बिड़द तुम्हारौ ।
धीग धौल धुर खैंचण हारौ ॥टेक॥
निबल परोहण भार सब लीया ।
भवसागर मैं गाडा गलिया ॥
तूँ घणाँ भार कौ जूपणहारौ ।
ज्यूँ जाणौं त्यूँ पार उतारौ ॥
तैं गलिया काढ्या देव मुरारी ।
पड़ि मति रहौ हमारी बारी ॥
बषनां कह हरि जूड़ी साहौ ।
पाण करौ पूरौ निरवाहौ ॥७०॥
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जिनि = मत । बिड़द = सुयश, प्रण, प्रतिज्ञा, व्रत, स्वभाव । धीग = गहरा, यहाँ समुद्र से तात्पर्य है । धौल = मस्तक । धुर = प्रथम, सबसे पहला हिस्सा, यहाँ केशों से तात्पर्य है । निबल = कमजोर । परोहण = नौका, यहाँ निर्बल भक्ति से तात्पर्य है । भार = पाप, कुकर्म ।
गाड़ा गलिया = आकंठ फँस गया हूँ । जूपणहारौ = जुवे में जुतकर गाड़ी को खींचकर ले जाने में समर्थ । पड़ि मति = आलस्य मत करो, सोवो मत । जूड़ी = गाड़ी का जुवा जिसमें बैल जुतकर गाड़ी को खींचते हैं । साहो = संभाल लो । पाण करौ = कृपा करो । पूरौ निरवाहौ = पूर्ण रूप से निर्वाह करो, संसार सागर से पर करो ।
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परमात्मा का नियम है “सन्मुख होहिं जीव मोहिं जबही । जन्म कोटि अघ नासहिं तबही ॥ जिस समय जीव परमात्मा की शरण का अवलम्बन ग्रहण करता है उसीसमय वह उसके अनंतों जन्मों के समग्र पापों का समूल नाश कर देता है ।
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इस पद में बषनांजी परात्पर-परमात्मा को उसके इसी व्रत का स्मरण कराते हैं । हे परमात्मा ! आप अपना व्रत मत छोड़िये । मैं गहरे संसार सागर में डूबा जा रहा हूँ । मेरे केशों को पकड़कर मुझे बाहर निकालने वाले मात्र आप हैं, आपकी अहैतुकी कृपा है । मेरे द्वारा की जा रही आपकी भक्ति अत्यन्त हल्के स्तर की है ।
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अतः मैं मेरे द्वारा किये गये अनंतों-अनंतों पापों के भार को उस निर्बल भक्ति रूपी नौका में रखकर पार होने में समर्थ नहीं हूँ । मैं भवसागर ने बुरी तरह फँस गया हूँ जबकि आप भारी से भारी भार रूपी पापों को भी ढोने में समर्थ हो । अतः आपको जैसे उचित लगे, वैसे ही मुझ डूबते हुए को इस संसार से पार करो ।
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हे मुरारी देव ! आपने पूर्व में अनेकों फँसे हुए, उलझे हुए जीवों को निकाला है । अतः अब मुझे पार करने के अवसर पर सोते मत पड़े रहो, निःचेष्ट मत रहो । हे प्रभो ! सावधान होवो तथा मेरे जीवन रूपी गाड़ी के जुवे में बैल बनकर तत्काल जुत जाओ और मुझे अपनी अहैतुकी कृपा करके जन्ममरण के चक्र से पूर्ण रूप से विमुक्त कर दो ॥७०॥

*६. गुरु मुख कसौटी का अंग ~ ९/१२*

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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*सोने सेती बैर क्या, मारे घण के घाइ ।*
*दादू काटि कलंक सब, राखै कंठ लगाइ ॥*
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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*६. गुरु मुख कसौटी का अंग ~ ९/१२*
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*ज्यों घोबी की धमस सहि, उज्वल होय सु चीर ।*
*त्यों शिष तालिब निर्मले, मार सहें गुरु पीर ॥९॥*
धोबी की चोटें सहन करता है तब वस्त्र उज्जवल होता है, वैसे ही योग के साधक शिष्य योगी गुरु की और जिज्ञासु ज्ञानियों की परीक्षा रूप मार सहन करते हैं, तब ही वे निर्मल होकर सिद्धावस्था को प्राप्त होते हैं ।
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*जन रज्जब गुरु गुर्ज१ सहि, करहु न सोच विचार ।*
*काया पलटे कीट क्यों, बिन भृंगी की मार ॥१०॥*
किसी भी प्रकार का सोच-विचार न करके गुरु की कठिन शिक्षा रूप गदा१ को सहो अर्थात धारण करो । भृंगी के डंक की तथा ध्वनी की मार सहे बिना कीट का शरीर बदलकर भृंग कैसे हो सकता है ? वैसे ही गुरु की कठिन शिक्षा धारण करे बिना अन्त:करण कैसे बदल सकता है ।
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*अर्क१ इन्दु२ ज्यों सद्गुरु, गुण द्वय अजब अनूप ।*
*रज्जब तपते वर्ष हीं, शीतल सुधा स्वरूप ॥११॥*
सद्गुरु सूर्य१ और चन्द्रमा२ के समान हैं । उनमें तप्त गुण सूर्य का और शीतल सुधा रूप चन्द्रमा का गुण विद्यमान है । जैसे सूर्य अधिक तपता है तब वर्षा करता है । वैसे ही सद्गुरु से अधिक प्रश्न करने पर वे विचित्र उपदेश रूप वर्षा करते हैं । चन्द्रमा जैसे शीतल सुधा वर्षा कर सबको तृप्त करता है । वैसे ही सद्गुरु अपने शान्तिपूर्ण वचन-सुधा से सबको तृप्त करते हैं ।
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*सद्गुरु सतयुग की अगनि, ताव तेज अधिकार ।*
*शिष सोना ह्वै सोलहा, रज्जब कसनी सार ॥१२॥*
सत्ययुग की अग्नि में अधिक ताप होने से सोना श्रेष्ठ होता है । वेसे ही सद्गुरु में ज्ञान-तेज अधिक होने से शिष्य श्रेष्ठ बनता है । सोना के श्रेष्ठ बनने में ताप और शिष्य के श्रेष्ठ बनने में साधन कष्ट ही सार हेतु है ।
(क्रमशः)