बुधवार, 25 मार्च 2026

यथेष्ट आशीर्वाद

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*॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥*
*॥ दादूराम~सत्यराम ॥*
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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आचार्य प्रकाशदेव जी महाराज परम कृपालु थे । इस ग्रंथ के लेखक पर भी उसकी महान कृपा थी । नारायणा दादूधाम के वार्षिक मेले में मैं नारायणा जाता था तब उस  मेले के समय जबकि उनको हजारों महानुभावों के साथ बातों में लगे रहने का प्रसंग रहता था । किन्तु फिर भी मेरे को नहीं भूलते थे । 
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मुझे अपने निवास के महल की छत पर बनी हुई एकान्त की कुटिया में ठहराकर मेरी संपूर्ण व्यवस्था ऊपर ही करा देते थे । उस मेले के समय पर रात्रि की नियत समय पर मेरे लिये दूध भिजवा देते थे । इससे निश्‍चय होता है कि मेरे जैसे साधारण जन का इतना ध्यान रखते थे तो यह उनकी परम कृपालुता का द्योतक कार्य हैं । आचार्य प्रकाशदेव जी महाराज ने अपने मंडल के सहित निम्नलिखित चातुर्मास किये थे । 
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१. बाबाजी गंगादासजी महाराज के यहां प्याऊ पर वि. सं. २००३ में किया था । यह चातुर्मास बहुत ही अच्छा हुआ था । २. संत गोर्धनदासजी महावीर वालों के  ३. राममोला महन्त रामूदास जी के  ४. नारायणा खेजडाजी के बाबा चैनजी की प्रेरणा से । 
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५. संत मांगीदासजी निवाई जमात वालों के वि. सं. २००६ में किया था ६. संत पूर्णदासजी मऊ वालों के  ७. संत भोलारामजी बडू वालों के  ८. संत गोविन्ददास जी रामपुरा वालों के  ९. महन्त दयारामजी गूलर वालों के  १०. राजगढ में रामनाथदासजी नारायणा वालों की ओर से 
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११. मेडता श्री कृष्णदेवजी की छत्री में बाबा गंगादासजी प्याऊ वालों की ओर से १२. विद्याद बाबा गंगादासजी की शिष्या मोहन बाई जी के  १३. बोडावड बाबा गंगादास जी की शिष्या मनोहर बाईजी के  १४. ईन्दावड भंडारी मंगलदासजी के । 
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उक्त सभी चातुर्मास आचार्य प्रकाशदेव जी महाराज के चातुर्मास की संपूर्ण मर्यादाओं से युक्त हुये । सभी में सत्संग, भजन, नाम संकीर्तन आदि साधन अति सुन्दर रीति से होते रहे थे । सभी में मर्यादानुसार भेंट आदि की प्रथा पूर्ण रुप से संतोष जनक रही थी और चातुर्मास कराने वाले मकानभावों को आचार्य जी की ओर से यथेष्ट आशीर्वाद प्राप्त हुये थे ।  
(क्रमशः)

२१. समर्थाई आश्चर्य को अंग ५७/६१

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२१. समर्थाई आश्चर्य को अंग ५७/६१
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वचन तहां पहुंचै नहीं, तहां न ज्ञान न ध्यांन । 
कहत कहत यौं ही कह्यौ, सुन्दर है हैरांन ॥५७॥
आपके यथातथ वर्णन करने में न किसी की वाणी समर्थ है और न उसकी ज्ञानमय एवं ध्यानमय गम्भीर साधना ही । आपके विषय में शास्त्रों में भी जो कुछ कहा गया है वह भी पूर्ण नहीं है । आपका यह भक्त सुन्दरदास इसी से चकित(हैरान) है ! ॥५७॥
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नेति नेति कहि थकि रहे, सुन्दर चार्यौं बेद । 
अगह अकह अविशेष कौं, कोउ न पावै भेद ॥५८॥
बहुत साहस कर आपका वर्णन करना चाहने वाले समर्थ विद्वान् कुछ न्यूनाधिक कह कर अन्त में आप को 'नेति नेति'(अनिर्वचनीय = अवर्णनीय) कह कर मौन हो गये । वेद शास्त्र भी आप असाधारण को किसी भी प्रकार 'न जानने योग्य', 'न ग्रहण करने(समझने योग्य)’ कहकर चुप हैं । कहने का अभिप्राय यही है कि आप का वास्तविक भेद(ज्ञान) कोई भी नहीं जान पाया ॥५८॥
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किनहूं अंत न पाइयौ, अब पावै कहि कौंन । 
सुन्दर आगें होहिंगे, थाकि रहे करि गौंन ॥५९॥
इस प्रकार कोई भी शास्त्र या विद्वान् आज तक आप को 'इदमित्थम्'(आप यह हैं या ऐसे हैं) कर के नहीं पहचान सका । आगामी काल में भी आप को कोई यथातथ रूप से पहचान सकेगा - यह भी सम्भव नहीं दीखता । अतः हम भी थक कर इस विषय को यहाँ छोड़‌कर आगे बढ़ते हैं१ ॥५९॥ 
(१ तु० श्रीमद्भगवद्‌गीता : अच्छेद्योऽयमदाह्योऽयमक्लेद्योऽशोष्य एव च ॥
नित्यः सर्वगतः स्थाणुरचलोऽयं सनातनः ॥
अकोऽयमचिन्त्योऽयमविकार्योऽयमुच्यते। अ० २, श्लोक २४, २५.
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लौंन पूतरी उदधि मैं, थाह लेन कौं जाइ । 
सुन्दर थाह न पाइये, बिचि ही गई बिलाइ ॥६०॥
आप के विषय में पूर्ण ज्ञान करना तो ऐसा ही है जैसे कोई नमक की पुतली(मूर्ति) समुद्र की गहराई जानने के लिये उसमें फैंकी जाय । वह उसकी गहराई का पार तो क्या पायगी, अपितु वह स्वयं पिघल कर तद्रूप हो जायगी । यही स्थिति मेरे जैसे आपके सभी साधकों की हुई है ॥६०॥
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अनल पंखि आकाश मैं, उडै बहुत करि जोरि । 
सुन्दर वा आकास कौ, कहूं न पायौ छोर ॥६१॥
इति समर्थाई को अंग ॥२१॥
यहाँ श्रीसुन्दरदासजी एक अन्य उदाहरण भी देते हैं - जैसे कोई अनलपक्षी जीवनपर्यन्त अपनी पूर्ण शक्ति तथा वेग से आकाश में उड़ता रहता है तो भी वह उस आकाश का आदि(आरम्भ) या अन्त(समापन भाग) नहीं बता सकता; क्योंकि क्या कभी किसी ने उस आकाश के आदि या अन्त के किनारे का ज्ञान प्राप्त किया है ! ॥६१॥
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इति समर्थाई आश्चर्य का अंग सम्पन्न ॥२१॥
(क्रमशः) 

तहाँ भरै माली एक पाली

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*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*बहुगुणवंती बेली है, मीठी धरती बाहि ।*
*मीठा पानी सींचिये, दादू अमर फल खाहि ॥*
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*परिचय ॥*
तहाँ भरै माली एक पाली, सहज सींचै बेलि रे ।
बांध्यौ चड़स आवै, त्रिबेणी चढ़ि झेलि रे ॥टेक॥
नीर निरमल सिर सीतल, सहज कील्यौ सांधि रे ।
गगनि कूवा धरणिबाड़ी, ध्यान धोरा बांधि रे ॥
भोमि भीनीं बाह दीनीं, कमाई करि खाँति रे ।
पंच संगी सहजि लागे, नीपनी बहु भाँति रे ॥
गुरि बीज बाह्यौ ऊगि आयौ, बिरख बधतौ जाइ रे ।
तिहि बिरखि फल अमर लागौ, सो फल सूवौ खाइ रे ॥ 
रंगि रातौ रहै मातौ, भँवर बाड़ी मैं रमैं ।
फूल नाहीं बास आवै, मंन मधुकर जहाँ रमैं ॥ 
अमर फलियाँ हुई रलियाँ, पूगी मनह जगीस रे ।
रमैं बषनौं राम सेती, तहाँ बिसवावीस रे ॥८१॥
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माली = गुरु । पाली = क्यारी = चित्तवृति, हृदय । सीचैं बेलि = गुरूपदेशानुसार साधना करे । चित्त बांध्यौ = चित्त रूपी चड़स को लय रूपी रस्सी से बांधकर साधना रूपी कूवे में डुबोकर पुनः राम-नाम रूपी जल के साथ बाहर निकाले । सीर = स्त्रोत । कील्यौ = कीली, चड़स के पास चड़स को खींचने वाली रस्सी में लगी रहती है और जो चड़स को रोकने का काम करती है । 
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कूवा = सुषुम्ना का जल ऊपर से नीचे की ओर आता है । “स्त्रवै सुषुम्ना नीर फवारा । सून्य सिषर का यह व्यवहारा ॥” (श्रीरामचरणजी की वाणी) धरणि = हृदय, योग ग्रंथों के अनुसार मूलाधारचक्र जहाँ कुंडलिनी रहती है । धोरा = जिसमें होकर जल प्रवाहित होता है, नाली । भीनीं = भीग गई । बाह = बीज बो दिया । 
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खाँति = प्रेम के साथ, उत्साह-उमंग के साथ । पंचसंगी = पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ । नीपनी = खेती अच्छी उपजी, साधना निर्विघ्न पूर्ण हो गई । जगीस = जिजिविषा = मुमुक्षु ।  जहाँ माली रूपी सद्गुरु आत्मजिज्ञासु के पाली = क्यारी रूपी हृदय को जल रूपी उपदेश से भर देता है और आत्मजिज्ञासु सहजभाव से बेलि = वृक्ष रूपी साधना को सहज रूप में = जिस विधि से गुरु ने साधना करनी बताई है, उसी विधि से सींचै = करता है । 
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चित्त रूपी चड़स(कूवे में से पानी निकालने का पात्र जो चमड़े का बना होता है) को लै रूपी रस्सी से बांधकर निकालता है तथा त्रिवेणी(इड़ा-पिंगला तथा सुषुम्ना का मिलन स्थल, भ्रूमध्यस्थ) रूपी ढाणें = (कूवे का ऊपरी भाग जहाँ खड़े होकर चड़स को कूवे में उतारा व निकाला जाकर पानी में डाला जाता है । फिर वहीँ से पानी धोरों में होकर क्यारियों में जाता है) पर खड़े होकर लय = वृत्ति को झेलता = पकड़ता है । 
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वहाँ रामजी की प्रेममयी भक्ति रूपी शीतल = अजस्त्रस्त्रोत युक्त निर्मल नीर प्राप्त होता है । उसे सहज रूपी कील से रोक लेना चाहिये । कूप में बापिस नहीं जाने देना चाहिये । ब्रह्मरंध्र रूपी कूप, हृदय रूपी बाड़ी तथा ध्यान रूपी धोरे को भली प्रकार बना लेना चाहिये जिससे हृदय रूपी भूमि सिंचित हो जायेगी । फिर उसमें भक्ति रूपी बीज बो देना चाहिये और उस भक्ति को उत्साह के साथ प्रेमपूर्वक करनी चाहिये । 
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साधना में पांचों ज्ञानेन्द्रियाँ सहज ही सहयोग करने लगेंगी जिससे साधना रूपी खेती अच्छी मात्रा में उत्पन्न होगी । साधना अच्छी तरह परिपक्व होगी । गुरुमहाराज का उपदेश रूपी बीज = राम नाम जो उन्होंने प्रदान किया था को बो देने पर वह उग आया और साधना रूपी वृक्ष दिनानुदिन बढ़ता ही जाता है । 
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उस साधना रूपी वृक्ष के अमर = स्वात्मानंद रूपी फल लगता है जिसे जीव रूपी तोता खाता = भोगता है । वह जीव रूपी तोता स्वात्मानंद रूपी फल में ही रत है, उसी में मस्त रहता है । उस बाड़ी रूपी परमानंद = आत्मानंद रूपी बाड़ी में जीव रूपी भँवरा रसास्वादन करता हुआ रमता है । उस बाड़ी में न फूल रूपी विषयसुख है और न उनकी चाहना रूपी गंध है । 
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वहाँ आत्मानंद रूपी फल ही फल है जहाँ मन रूपी भँवरा सदैव मंडराता रहता है । अमर फल रूपी आत्मानंद के प्राप्त होते ही रलियाँ = आनंद ही आनंद रूपी सम्मिलन होता है । वस्तुतः अनेकों जन्मों की परमानंद को प्राप्त करने की जगीस = इच्छा पूर्ण हो गई । बषनां बिसवाबीस = पूर्णरूप से ऐसे अखंडानंद स्वरूप राम में रमण करता है ॥८१॥

*७.आज्ञाकारी का अंग ~ ५/८*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*

*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*७.आज्ञाकारी का अंग ~ ५/८*
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*हरि आज्ञा में अणसरे१, गुरु दिनकर२ इकतार३ ।*
*रज्जब शिष सो किरण सम, सदा सु तिनकी लार ॥५॥*
ईश्वर आज्ञा अनुसार१ सूर्य२ निरन्तर३ चलते हैं, सूर्य की किरण भी सूर्य के साथ ही चलती हैं । वैसे ही ईश्वर आज्ञानुसार गुरु चलते हैं, गुरु आज्ञानुसार शिष्य सदा गुरु के साथ रहता है ।
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*चंद सूर पाणी पवन, धरती अरु आकाश ।*
*ये सांई के कहे में, त्यों रज्जब गुरु दास ॥६॥*
चन्द्रमा, सूर्य, जल, पृथ्वी और आकाश ये सभी परमात्मा की आज्ञा में चलते हैं । वैसे ही शिष्य गुरुदेव की आज्ञा में चलते हैं ।
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*पाणी पवन सूर्य शशि सोधे१, धन्य धणी४ जिन ये परमोधे ।*
*चूक२ हि चक३ हि न सीख मँझारी, जन रज्जब ता पर बलिहारी ॥७॥*
जल, वायु, सूर्य, चन्द्रमा, इन सबके व्यवहार हमने अन्वेषण१ करके देखे हैं, ये सब भूल२ कर भी भ्रम३ में नहीं पड़ते, निरंतर ईश्वर की शिक्षा रूप आज्ञा में ही चलते हैं । जिनने इनको उपदेश दिया है, वे स्वामी धन्य४ हैं मैं उनकी बलिहारी जाता हूँ ।
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*ज्यों हलवाई की हाट तज, माँखी कहीं न जाय ।*
*त्यों रज्जब गुरु शिष बँधे, उडहि न रहे उडाय ॥८॥*
जैसे हलवाई की हाट की मक्खयों को उडा उडा कर थक जाते हैं किन्तु हाट को छोड कर कहीं भी नहीं जातीं । वैसे ही शिष्य गुरु की आज्ञा में बँधे रहते हैं, हटाने पर भी नहीं हटते ।
(क्रमशः)

मंगलवार, 24 मार्च 2026

*रामरस ॥*

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*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*यहु रस मीठा जिन पिया, सो रस ही मांहि समाइ ।*
*मीठे मीठा मिल रह्या, दादू अनत न जाइ ॥*
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*रामरस ॥*
मेरा मन अमली राम रस भावै ।
पीवै नहिं तौ बाइड़ि आवै ॥टेक॥
अमल पियाँ मेरी आत्मा सुहेली ।
बिण पीयाँ तन तालाबेली ॥
राम रसाइण भरि भरि पीवै ।
राम रसाइण चाख्याँ जीवै ॥
साध सँगति अमल्याँ की टोली ।
सुरति सदाहीं हरि रस दोली ॥
बहुगुण घूंघणी ठूंगै ठांगै ।
अमल चढै तो निकुल न मांगै ॥
बषनां अमली जुग जुग जीवै ।
ग्यान नातणैं छाणैं पीवै ॥८०॥
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अमली = नशा करने का आदी । बाइड़ि = तलब, नशा करने की बार-बार इच्छा होना । सुहेली = सुखी । तालाबेली = व्याकुलता । अमल्याँ = नशा करने वाले । टोली = समूह । दोली = निमग्न, सरोबार । घूंघणी = मलशुई में घुटकर निश्चित परिमाण में बनी हुई शुद्ध अफीम । ठूंगै ठांगै = अफीम आदि नशे के पदार्थों (शराब आदि) को पीते समय खाये जाने वाले चर्बण, पदार्थ । निकुल = बिल्कुल । नातणैं = अंगोछा, कपड़े का टुकड़ा जिसमें अफीम आदि को छाना जाता है ।
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मेरा मन रामनाम-स्मरण रूपी रस का नशा करने का आदी है क्योंकि उसे उसमें आनंद मिलता है । कदाचित् किसी कारण से उसे उक्त रामरस पीने को नहीं मिलता है तो उसे उसकी बायड़(तलब) आती रहती है । उसके बिना पिये पूरा शरीर बेचैन रहता है ।
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मेरा मन रामरस को भर-भर कर पीता है – हमेशा राम-नाम का स्मरण ही करता रहता है । वह जीवित ही इस रामरस को पीकर रहता है । मेरे संगी साथी जो मेरे जैसा अमल पीते हैं वह साधु-संतों का समूह है । मेरी सुरति = चित्तवृत्ति सदैव ही हरिरस में निमग्न रहती है ।
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वस्तुतः इस रामरस रूपी अफीम तथा इसके साथ सत्संगति रूपी खाये जाने वाली अन्य वस्तुएँ बहुत ही गुणकारी = लाभकारी हैं । इस अमल के चढ़ जाने पर = एक बार इसका नशा पूर्णरूपेण हो जाने पर फिर नशा करने वाला और दूसरी कुछ चीज नहीं मांगता, चाहता ।
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बषनांजी कहते हैं, अमली युग-युगान्तरों तक जीता है = अमर हो जाता है । क्योंकि वह इस अमल को ज्ञान रूपी नातणें से छानकर पीता है । वेदों में कहा गया है “ऋतेज्ञानान्नमुक्ति” बिना ज्ञान के मुक्ति नहीं होती । बषनांजी ने अंत में ज्ञान रूपी नातणें का उल्लेख करके इसी तथ्य की ओर संकेत किया है ॥८०॥

२१. समर्थाई आश्चर्य को अंग ४३/५६

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२१. समर्थाई आश्चर्य को अंग ४३/५६
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अंजन कीया नैंन मैं, सबही राखै मोहि । 
सुन्दर हुन्नर बहुत हैं, कोइ न जांनै तोहि ॥५३॥ 
जैसे यह बाजीगर किसी दर्शक की आँखों में अभिमन्त्रित काजल लगा कर उसको विविध दृश्य दिखा देता है; उसी प्रकार आप प्रभु के पास भी ऐसे अनेक हुनर(कला) हैं कि उनका उपयोग करते हुए आप संसार को मुग्ध (अपनी ओर आकृष्ट) किये रहते हैं । आप की इस कला को कोई नहीं जान पाया ॥५३॥
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ब्रह्मादिक शिव मुनि जनां, थाके सब ही संत । 
सुन्दर कोउ न कहि सकै, जाकौ आदि न अंत ॥५४॥
साधारण मनुष्य की तो बात क्या कहें ! ब्रह्मा, विष्णु, शिव एवं बड़े बड़े प्रसिद्ध ऋषि मुनि भी, जो निरन्तर आप की ही साधना में लगे रहते हैं, वे भी आज तक आप के आदि या अन्त का पार नहीं पा सके ॥५४॥
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सुन्दर सब चक्रित भये, वचन कह्या नहिं जाइ । 
टग टग रहे सु देखते, ठगमूरी सी खाइ ॥५५॥ 
वे सभी आपका यह अनुपम लोकोत्तर क्रियाकलाप देख कर चकित हैं । इसके वर्णन के लिये उनके मुख से एक भी वचन निकलना सम्भव नहीं हो पा रहा है । वे भौंचक(किङ्कर्तव्य विमूढ) हो कर एक दृष्टि से आपको निरन्तर देख रहे हैं ॥५५॥
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बातैं कोउ न कहि सकै, थकित भये सिध साध । 
सुन्दर हू चुप करि रहे, वह तौ अगम अगाध ॥५६॥
जब वे समर्थ सिद्ध साधक ही आपका यथातथ वर्णन करने में असमर्थ पा कर, थके हुए से, मौन ग्रहण कर बैठे हैं तब मुझ गरीब सुन्दरदास की क्या सामर्थ्य है कि आप जैसे अगम्य एवं गम्भीर शक्तिशाली की प्रशंसा में कुछ कहने का अपने में सामर्थ्य जुटा पाऊँ ! ॥५६॥
(क्रमशः) 

‘‘दादूपंथी दासानुदास’’

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*॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥*
*॥ दादूराम~सत्यराम ॥*
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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आचार्य प्रकाशदेवजी महाराज ने समाज की समस्त मर्यादाओं का तथा रीति नीतियों का निर्वाह भली भांति किया था । आप इष्ट में पूर्ण श्रद्धा के तो प्रतीक ही थे । पाठ, पूजा, ध्यान, धारणा, दैनिक कथा, प्रवचन, आरती, मंदिर का भोग, भजनशाल तथा समाधियों पर धूप दीप, पंक्ति में आकर संतों के साथ दोनों समय भोजन करना इत्यादि कार्यों का पूर्ण रुप से ध्यान रखते थे ।
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आप रामत में समुचित लवाजमे के सहित योग्य संतों के साथ भ्रमण करते थे । श्री भंडार व सदाव्रत आदि के सम्यक् संचालन में अच्छी रुचि रखते थे । पशुओं को घास दांणा बांटा आदि देने की बात सेवकों को स्मरण कराते रहते थे । पक्षियों के चुगा पानी की समुचित व्यवस्था रखाते थे ।
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अभ्यागतों के भोजन वस्त्र का पूरा -२ ध्यान रखते थे । स्थानीय सभी कार्य निपुणता, तत्परता और योग्यता से यथा रीति नीति से करवाते थे । उक्त कार्यों के कारण ही समाज की आप पर दॄढ श्रद्धा थी । आचार्य प्रकाशदेव जी महाराज इष्टदेव तथा समाज के सच्चे दास थे ।
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दादू सम्प्रदायाचायों के पीठ दादू द्वारा नारायणा दादूधाम की परंपरा की जो मुहर होती है उसमें भी यही अंकित रहता है - ‘‘श्रीरामजी दादू पंथी दासानुदास महन्त ------संवत ------’’ यह मुहर पंथाचार्यों के पीठ की गद्दी की मुहर से युक्त होते हैं । इस मुहर के नीचे आचार्य जी के हस्ताक्षर होते थे ।
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आचार्य प्रकाशदेव जी महाराज उक्त मुहर के समान ही अपने को इष्टदेव व समाज का दास ही समझते थे । आचार्य प्रकाशदेव जी को मेलों में, उत्सवों में, बृहद् संत- सम्मेलनों में पंथ स्वरुप परमेश्‍वर को कई बार दंडवत करते हुये मैं(कनिरामजी) ने देखे थे । मेरे पूछने पर कि आप दंडवत किस को कर रहे थे । सामने वाणी जी भी नहीं थी ।
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तब वे कहते थे भेष भगवान् जो एकत्र हो रहा है उसे ही मैं दंडवत कर रहा था । उक्त मुहर में अंकित ‘‘दादूपंथी दासानुदास’’ भावना प्रकाशदेव जी महाराज में दॄढ थी । उक्त भावना से सूचित होता है कि उनकी नम्रता कितनी विशाल थी । उन में अभिमान का तो लेश भी नहीं ज्ञात होता था ।
(क्रमशः)

*७.आज्ञाकारी का अंग ~ १/४*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*७.आज्ञाकारी का अंग ~ १/४*
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आज्ञाकारी, आज्ञा भंगी-अंग के अनन्तर आज्ञा पालक, आज्ञा पालन आदि का विचार करने को आज्ञाकारी का अंग कर रहे हैं -
गुरु आज्ञा में शिष्य यूं, ज्यों अदभू१ इक पाय ।
रज्जब सेवक सो सही, सर्वस्व सेवा भाय ॥१॥
१-१५ में आज्ञाकारी के परिचय पूर्वक आज्ञा पालन का बता रहे हैं - जैसे वृक्ष१ निरन्तर पृथ्वी में खड़ा रहता है, वैसे ही शिष्य निरन्तर गुरु सेवा में स्थित रहता है, वही सच्चा सेवक है, जिसका सर्वस्व भावपूर्वक सेवा में आ जाता है ।
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गुरु आज्ञा अँगूरी बँधे, चेले चक्री होय ।
आवे जाय रजा में रज्जब, दूजा नाँहीं कोय ॥२॥
जैसे अँगुली के बँधी हुई चक्री, चक्री वाले के इच्छा से ही आती-जाती है, चक्रीधर की इच्छा के बिना गमनागमन का दूसरा हेतु कोई भी नहीं है । वैसे ही सु शिष्य गुरु आज्ञा में बँधे हुये रह कर ही सब व्यवहार करते हैं, कोई अन्य हेतु लेकर नहीं करते ।
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सद्गुरु सूरज शिष सलिल, आज्ञा आवे जाँहिं ।
रज्जब रहतौ इहिं जुगति, सेवक स्वामी माँहिं ॥३॥
जैसे सूर्य की किरण से जल पृथ्वी पर आता है और आकाश को जाता है । वैसे ही जो शिष्य सद्गुरु की आज्ञा पालन रूप युक्ति से रहता है अर्थात आज्ञानुसार ही सब व्यवहार करता है वह सेवक स्वामी में ही मिल जाता है ।
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धोम वास बल वायु के, संग समीर सु जाँहिं ।
तैसे रज्जब गुरु शिषों, सदा सु आज्ञा माँहिं ॥४॥
जैसे धूआँ और गंध वायु के बल से वायु के साथ जाती हैं । वैसे ही शिष्यगण भी सम्यक् प्रकार सदा गुरु की आज्ञा में रहने के बल से गुरु के साथ ही परब्रह्म में मिल जाते हैं ।
(क्रमशः)

भक्त के उत्तराधिकारी

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*॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥*
*॥ दादूराम~सत्यराम ॥*
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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५- श्रीदादू जी महाराज के परम भक्त नवलगढ(शेखावटी राजस्थान) निवासी, वर्तमान में कलकत्ता के महान् उद्योगपति सेठ स्व. बंशीधर घनश्याम दास भक्त के उत्तराधिकारी दादू कालीचरण जुगल किशोर भक्त हैं । इस परिवार में वैभव होने पर भी दो- तीन पीढ़ियों से कोई पुत्र नहीं होने से परिवार में सूनापन सा था । 
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स्व. घनश्यामदासजी भक्त के समय से ही इनके यहाँ नारायणा दादूधाम के खालसा के संत धनीराम जी तथा ऊमरा वाले भगवानदास जी का प्राय: आना जाना था तथा सत्संग से भी परिवार लाभ उठाता था । धनीराम जी परिवार की अन्तर्व्यथा को जान गये थे और मिटाना भी चाहते थे ।
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अत: धनीरामजी ने प्रेरणा की कि - आचार्य प्रकाशदेवजी को यहाँ बुलाओ, मेरा विश्‍वास है कि उनके पधारने से आपकी इच्छा पूर्ण हो जायगी । तब उक्त परिवार ने आचार्य प्रकाशदेवजी महाराज को मर्यादापूर्वक  सादर कलकत्ते ले जाकर आचार्य जी के पावन चरणोदक  से अपने भवन को पवित्र किया और संतों सहित आचार्य जी की पूर्ण श्रद्धा भाव से सेवा की । 
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आचार्य प्रकाशदेव जी महाराज ने चि. जुगलकिशोर के शुभ विवाह के समय भक्त दम्पती को प्रसाद व दुपट्टा प्रदान करते हुये उनके मनोरथ पूर्ति का शुभाशीर्वाद दिया ।  फिर परम दयालु दादूजी महाराज की कृपा से आचार्य प्रकाशदेव जी के आशीर्वाद से उक्त भक्त दम्पती को अनेक पुत्र रत्नों की प्राप्ति हुई । 
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परिवार की इच्छा पूर्ण हो गई वह कृतकृत्य हो गया । फलत: उक्त भक्त परिवार ने पूर्ण श्रद्धा भक्ति से नारायणा दादूधाम की अच्छी सेवा की । दादूद्वारे में बिजली आदि की सेवा उन्होंने ही की है । समय- समय पर आप भेष, भंडार व स्थान की सेवा करते ही रहते हैं ।  
(क्रमशः)

२१. समर्थाई आश्चर्य को अंग ४९/५२

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२१. समर्थाई आश्चर्य को अंग ४९/५२
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करै करावै रामजी, सुन्दर सब घट मांहिं । 
ज्यौं दर्पन प्रतिबिंब है, लिपै छिपै कछु नाहिं ॥४९॥
निर्लेपता का उदाहरण : वह सभी शरीरों में रहता हुआ प्रभु निरञ्जन निराकार राम ही सभी प्राणियों की क्रियाओं का सञ्चालक होता है३ । इतने पर भी, इसकी स्थिति वही होती है; जैसे दर्पण में प्रतिबिम्ब की । अर्थात् जैसे दर्पण में पड़े हुए प्रतिबिम्ब का कीचड़(कर्दम) आदि दर्पण में लिप्त नहीं होता, उसी प्रकार प्राणी के शुभाशुभ कर्मों से वह निरञ्जन निराकार भी लिप्त नहीं होता ॥४९॥ (३ तु० - श्रीमद्भगवद्‌गीता : भ्रामयन् सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया ॥ अ० १८, श्लो० ६१.)
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बाजीगर बाजी रची, ताकौ आदि न अंत । 
भिन्न भिन्न सब देखिये, सुन्दर रूप अनंत ॥५०॥
दूसरा उदाहरण : जैसे किसी बाजीगर द्वारा दिखायी जा रही कला(बाजीगरी) का कोई आदि या अन्त नहीं होता; उसी प्रकार, इस प्रभु की रची हुई सृष्टि के अनेक रूपों को देखते रहिये, इन का आदि या अन्त खोजने का प्रयास न कीजिये ॥५०॥
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काढि काढि बाहिर करै, राते पीरे रंग । 
सुन्दर चांवर धूरि के, पंख परेवा संग ॥५१॥
वह बाजीगर अपने झोले में से निकालकर लाल या पीले आदि रंग की अनेक वस्तु दिखाता है । वह धूलि के कणों(चांवलों) से पंख वाले कबूतर उड़ा सकता है ॥५१॥
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कबहुँ मिलावै गोटिका, कबहूं बीछुरि जांहिं । 
सुन्दर नाचै जगत सब, ऐसी कल तुझ मांहिं ॥५२॥ 
कभी वह दो पुतलियों को मिला देता है, कभी पृथक करता हुआ उनको नचाता है; इसी प्रकार आप प्रभु भी इस समस्त जगत् को नचाते रहते हैं । ऐसी अलौकिक कला(बाजीगरी) आप के पास है ॥५२॥
(क्रमशः) 

काल ॥ साषी लापचारी की ॥

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*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*गर्वै भाव न ऊपजै, गर्वै भक्ति न होइ ।*
*गर्वै पिव क्यों पाइये, गर्वै करै जनि कोइ ॥*
*गर्वै बहुत विनाश है, गर्वै बहुत विकार ।*
*दादू गर्व न कीजिये, सन्मुख सिरजनहार ॥*
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काल ॥ साषी लापचारी की ॥१ (१ इनका अर्थ “काल कौ अंग” की साषियों में देखें)
जाकै सूरिज तपै रसोई, पवन अँगना जु बुहारै । 
नौ ग्रह बंध्या पाइ, मींच कूँ कुवै उसारै ॥
बिह जाकै दाँणौं दलै, बंदि बांध्या तेतीस ।
बषनां वै भी काल गिरासिया, जाकै दस माथा भुज बीस ॥
जाकै जल था जंघ सवाँणाँ । सागर मथिया करि मेर मथाणाँ ॥
हाथाँ धरि धरि पर्वत ल्याये । बषनां काल उसे नर खाये ॥ 
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पद ॥
मनिखा मान न कीजै, गहिला गर्ब न कीजै ।
पल पल जाइ अवधि दिन आवै, आव घटै दिन छीजै ॥टेक॥
एकै घूँट समँद जिनि सोख्या, हाथौं परबत ल्याये ।
लंका छोडि प्रलंका पहुँचे, ते भी कालहि खाये ॥
धरि चाँपी धरि गई पयालाँ, एक दाढ परि ल्याये ।
जाकी मापी भई एक डग, ते भी अंति बिलाये ॥
लंका सा कोट समद सी खाई, मंदोदरि सी राणी ।
दस मस्तक बीस भुज जाकै, सो मारि किया धुल धाणी ॥
दाणौं देखि दलै बिह बैठी, रावण तणाँ घराँ ।
वाकै माथैं कौणैं लिखिया, वा लिखती औराँ ॥
चंद कलंक समद पणि खारौ, सीता राम बिजोगा ।
ग्रब काहू कौ रहण न पावै, गरव करौ जिनि लोगा ॥
बडाँ बड़ी कौ डोरू बाजै, बेद पुराणाँ साषी ।
क्रिष्नदेव की गोपी लूटी, अरजन सक्यौ न राखी ॥
कैरौं कहाँ कहाँ पँच पांडौं, भारत भिड़ते भाई ।
दिन दोइ चारि आपणी नौबति, केते गये बजाई ॥
सुर नर मुनिजन पीर पैकंबर, चंद सूर पणि गहिये ।
बषनौं कह हरि गर्ब प्रहारी, जाथैं डरता रहिये ॥७९॥
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मानव ! अभिमान मत कर, हे मूर्ख ! गर्व मत कर । तेरे जीवन की निश्चित आयु की अवधि पल-पल क्षीण हो रही है तथा मृत्यु का समय नजदीक आता जा रहा है । आयु दिनों-दिन घट रही है । दिनों पर दिन व्यतीत हो रहे हैं । जिन अगस्त्य ऋषि ने संपूर्ण सागर के जल को एक घूँट के समान पी लिया; जो पवनपुत्र हनुमान लंका को छोड़कर लंका के बाहर से द्रोणगिरि पर्वत को उखाड़कर हाथ में उठा लाये वे भी काल के ग्रास बन गये । 
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जिस हिरण्याक्ष राक्षस के द्वारा पृथिवी को दबाने पर पृथिवी पाताल में चली गई, उसे शूकर शरीरधारी भगवान् एक दाढ पर रखकर ले आये और उसी पृथिवी को जिन वामनावतार भगवान् ने एक ही ढग में माप डाली वे भी अंत में मर गये, अमर नहीं रह सके । जिस रावण के पास लंका सा किला, उस किले की सुरक्षा के लिये समुद्र सी खाई, मंदोदरी जैसी पतिव्रता पत्नी, दस मस्तक और बीस भुजाएँ थीं उसे भी रामजी ने मारकर नेस्तनाबूद कर दिया ।
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जिस रावण के घर में अनाज के एक-एक दाने को देखकर बिधना बैठी-बैठी पीसा करती थी, बताइये उस बिधना के ललाट पर किसने दाना पीसना लिखा था जबकि वह स्वयं ही सबके ललाटों पर जन्म के छटे दिन भाग्य लिखती है ? चंद्रमा के परस्त्रीगमन का कलंक लगा जो आज भी प्रत्यक्ष दीखता है, जल की निधि समद्र का जल खारा हो गया, सीता और राम का वियोग हुआ । 
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अतः हे मनुष्यों ! अपने धन, जन, बल का गर्व मत करो । गर्व किसी का भी रहता नहीं है क्योंकि परमात्मा गर्वप्रहारी है । वह गर्व करने वालों के गर्व को स्थिर नहीं रहने देता है । अनेकों बड़े-बड़े = महान् स्त्री-पुरुषों के गौरव-गान के ढोल बजते रहे हैं जिनकी साक्षी वेद-पुराणादि में सुरक्षित हैं । उनमें कृष्ण और अर्जुन का नाम अन्यतम है । फिर भी उन्हीं कृष्ण की गोपियों को भीलों द्वारा लूट लिया गया और उनकी रक्षा में चल रहा उनके साथ अर्जुन उनकी तनिक सी भी रक्षा नहीं कर सका । 
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आज वे बलशाली कौरव और पांडव कहाँ हैं जिन्होंने महाभारत जैसा युद्ध लड़ा था । अर्थात् वे सभी दो चार दिन अपनी-अपनी नोबत बजाकर = अपना-अपना कार्य करके मर गये । उनमें से कोई भी शेष नहीं बचा । चाहे देवता, मनुष्य, मुनिजन, पीर, पैगंबर, चंद्रमा और सूर्य हों चाहें और कोई हों, किसी के भी गर्व को भगवान् रहने नहीं देता । वह गर्वप्रहारी, गर्वगंजन है । अतः गर्व कभी मत करिये । गर्व करने से बचते रहिये ॥७९॥ 

सोमवार, 23 मार्च 2026

*७.आज्ञाकारी आज्ञा भंगी का अंग ~ १७/१९*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*७.आज्ञाकारी आज्ञा भंगी का अंग ~ १७/१९*
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सीता सुरति उलंधिया, राम लीक गुरु बैन ।
रज्जब रावण काल कर, चढ़या न पावे चैन ॥१७॥
१७-१८ में आज्ञा भंगियों के उदाहरण कह रहे हैं - सीता ने राम के भाई लक्ष्मण की लीक का उलंधन किया तब रावण के हाथ में आकर कष्ट उठाया । वैसे ही शिष्य की वृत्ति गुरु के वचनों को उलंधन करती है तब शिष्य काल के हाथ में आकर व्यथित होता है ।
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रज्जब रजा१ रजानिकर२, आजाजील शैतान ।
हुआ फजीहत फरिश्ता३, मेट अलह फरमान ॥१८॥
ईश्वर ने आदि मानव आदम को रचकर अप्सराओं तथा फरिश्ताओं को कहा, इसे प्रणाम करो, अन्य सबने तो आदम को प्रणाम किया किन्तु शैतान अजालील ने ईश्वर की यह आज्ञा१ नहीं मानी । इस ईश्वर के हुक्म को न मानने२ से ही उस ईश्वर दूत३ को बेइज्जत पूर्वक फरिश्ताओं से निकाल दिया गया । बड़ों की आज्ञा न मानने से ऐसा ही होता है । अत: गुरुजनों की आज्ञा अवश्य माननी चाहिये । यह कथा छप्पय ग्रंथ के आज्ञा भंग अंग १५ छप्पय एक की टीका में विश्तार से है ।
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रज्जब गुरु गोविन्द की, मया१ मेघ प्रतिपाल ।
इन बिरच्यूं२ राचे३ विघन, केवल आतम काल ॥१९॥
१९ में आज्ञा मानने, न मानने का लाभालाभ दिखा रहे हैं - और गोविन्द की कृपा१ रूप मेध से पालन होता है । इन दोनों में उपराम२ होने से केवल विध्न ही होते३ हैं और जीवात्मा को यम-यातना भोगनी पड़ती है । अत: सदा गुरु और गोविन्द की आज्ञा में ही रहना चाहिये ।
इति श्री रज्जब गिरार्थ प्रकाशिका सहित “७. आज्ञाकारी आज्ञा भंगी का अंग” समाप्त ॥
(क्रमशः)

*७.आज्ञाकारी आज्ञा भंगी का अंग ~ १३/१६*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*७.आज्ञाकारी आज्ञा भंगी का अंग ~ १३/१६*
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*गुरु धरती गोविन्द जल, शिष तरुवर मधि पोष *
*रज्जब सरके ठौरतैं, देखि दुहुं दिशि दोष ॥१३॥*
१३-१५ में आज्ञाकारी और आज्ञा भंगी की होने वाली उन्नति तथा हानि दिखा रहे हैं - गुरु पृथ्वी के समान हैं और गोविन्द जल के समान हैं । वृक्ष पृथ्वी में लगा रहता है तब तो जल से उसका पोषण होता है और पृथ्वी से उखड जाने पर जल से गल जाता है । वैसे ही शिष्य गुरु की आज्ञा में रहता है तब तो निष्काम गोविन्द भजनादि से परमार्थ की आज्ञा में रहता है तब तो निष्काम गोविन्द भजनादि से परमार्थ उसका पोषण होता रहता है और गुरु आज्ञा में नहीं रहता तब सकाम साधना द्वारा संसार में ही पड़ता है ।
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*शिष्य गुडी१ सुरति डोरी में, गुरु खिलार हित हाथ ।*
*तंतू टूटे तैं गई, साबित२ सांई साथ ॥१४॥*
पतंग१ डोरी में बँधकर उड़ाने वाले खिलारी के हाथ में है तब तक तो उसके साथ है और डोरी टूट जाय तो उसके हाथ से चला जाता है । वैसे ही शिष्य आज्ञा मानना रूप वृत्ति-डोरी में बँधकर गुरु के स्नेह-हाथ में है तब तक तो ठीक२ रूप से परमात्मा के साथ है और आज्ञा मानना रूप वृत्ति टूट जाय तो वह भी प्रभु से दूर हो जाता है ।
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*ज्यों धोडा असवार वश, चलै पराये भाय१ ।*
*रज्जब अड़२ अपनी गहै, तभी मार बहु खाय ॥१५॥*
अश्व अश्वारोही के वश में है तथा अपने से भिन्न अश्वारोही के भावानुसार१ चलता है तब तक तो ठीक है और जब वह अपनी टेक२ पकडता है तब खूब मार खाता है । वैसे ही शिष्य गुरु आज्ञा में चलता है तब तक तो ठीक है और अपने हट से यमन की इच्छानुसार चलता है तब भारी यम यातना भोगता है ।
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*अणी१ अग्नि अहि सौं असह२, गुरु आज्ञा में गौन ।*
*जन रज्जब तन त्रास तुच्छ, मन हिं मरावे कौन ॥१६॥*
१६ में कहते हैं - गुरु आज्ञा पालन कठिन होने पर भी, उसका फल देखते हुये कष्ट अति कम है - भाला आदि का अग्र२ भाग चुभन से, अग्नि के ताप से और सर्प से होने वाले दु:ख से भी गुरु आज्ञा पालन करने का दु:ख असह्य२ है तो भी इसका जो मन को जीतना रूप महाफल है, उसके आगे इससे होने वाला शारीरिक कष्ट अति तुच्छ है । कारण - गुरु को छोडकर और कौन मन को मारने में सहायता करता है ?
(क्रमशः)

रविवार, 22 मार्च 2026

मारवाड की रामत

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*॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥*
*॥ दादूराम~सत्यराम ॥*
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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३- एक दिन प्रात: पं. धनीराम जी परमहंस और कनिराम जी स्वामी को आचार्य प्रकाशदेव जी ने कहा - आज तो कलकत्ते के भगतबाबू कालीचरण आने चाहिये । वे गुरु द्वारे के दर्शनार्थ मार्ग में आ रहे हैं । कुछ समय के बाद ही कलकत्ते के भगत विश्‍वभंर दयाल शांति भवन वाले आ गये । वे मंदिर में दर्शन करके आचार्य प्रकाशदेव जी महाराज के पास बारहदरी में आये । 
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भेंट करके प्रसाद ग्रहण किया फिर सब संतों को प्रसाद करा कर वे तो लौट गये । फिर धनीरामजी तथा कनीराम जी ने आचार्य को कहा - महाराज आपने आज प्रात: कहा कि - कलकत्ते के भगत कालीचरण आज आने चाहिये । सो भगत तो अवश्य आ गया किन्तु कालीचरण तो नहीं आये । तब आचार्य प्रकाशदेवजी महाराज ने कहा - मार्ग में चल रहे हैं, आने वाले ही हैं । 
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इसके कुछ ही पश्‍चात् भगत कालीचरण नाथद्वारा कांकरोली की यात्रा करके मांजी आदि के साथ मोटर से दादू द्वारे में आ पहुँचे । इसके साक्षी धनीरामजी तथा कनिरामजी हैं । बाबू कालीचरण दादूधाम नारायणा की यात्रा करके  कुंभ मेले में गये । उनके साथ ही धनीरामजी तथा पुजारी बसन्तीराम जी भी कुंभ मेले में गये थे ।
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४- आचार्य प्रकाशदेव जी महाराज का वि. सं. २००३ का चातुर्मास स्वनाम धन्य बाबा गंगारामजी प्याऊ(मारवाड) वालों ने अपने यहाँ करवाया था । उस चातुर्मास में मारवाड की भक्त जनता का आना जाना बहुत रहा था । इससे महाराज प्रकाशदेव जी की साधुता, सिद्धि, व्यवहारिकता तथा प्रेम की छाप मारवाड की धरा के भक्तों पर बहुत अच्छी लगी थी । वे आचार्य प्रकाशदेव जी महाराज के व्यक्तित्व से बहुत प्रभावित हुये थे । 
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गंगादासजी महाराज की श्रद्धा तो आचार्य प्रकाशदेव जी पर इतनी थी कि वे तो आचार्य जी को दादू जी महाराज का स्वरुप ही मानते थे । चातुर्मास के पश्‍चात् गंगाराम जी महाराज ने आचार्य जी को साथ लेकर मारवाड की रामत करवाई थी । जोधपुर नरेश के राजगृह तक आपको ले गये थे तथा जितने भी अपने मुख्य - २ भक्त थे उनके घर आचार्य प्रकाशदेव जी के चरणों से पवित्र करवाये थे । गंगारामजी महाराज जैसे उच्चकोटि के संतों की इतनी श्रद्धा भी आचार्य प्रकाशदेवजी की महानता की द्योतक है ।
(क्रमशः)

२१. समर्थाई आश्चर्य को अंग ४५/४८

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२१. समर्थाई आश्चर्य को अंग ४५/४८
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उतपति सांई तैं किया, प्रथम हि वो ऊंकार । 
तिसतें तीनौं गुन भये, सुन्दर सब बिस्तार ॥४५॥ 
सृष्टिरचना : हे स्वामिन ! आप ने सर्वप्रथम ॐ का उच्चारण किया । उस से तीन गुण(सत्त्व, रज, तम) उत्पन्न हुए । उन ही से इस महत् तत्त्व आदि समस्त सृष्टि का विस्तार हुआ है१ ॥४५॥ 
(१ तु० - श्रीमद्भगवद्‌गीता : ॐ तत् सदिति निर्देशो ब्रह्मणस्त्रिविधः स्मृतः । - अ० ५, श्लो० २३.)
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तिनका रच्या सरीर यह, महल अनूपम एक । 
चौरासी लख जूनु ये, सुन्दर और अनेक ॥४६॥
आपने उन सब के सङ्घात(समन्वय) से अनुपम एवं दर्शनीय प्रासाद(महल) के सदृश इस शरीर की रचना की । इस में चौरासी लाख योनियों के छोटे बड़े अनेक प्रकार के शरीरधारी जीव दिखायी देते हैं ॥४६॥
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आपन बैठा गोपि ह्वै, सुन्दर सब घट मांहि । 
करता हरता भोगता, लिपै छिपै कछु नांहिं ॥४७॥ 
इतनी विशाल रचना के बाद आप स्वयं प्रत्येक प्राणी के हृदय में विराजमान हुए१ । इस प्रकार आप उस प्राणी के रचयिता, पालयिता एवं कर्मफलभोक्ता भी हुए । अतः उस प्राणी का कोई भी कर्म आप से गुप्त(छिपा हुआ) नहीं रह सकता ॥४७॥ 
(१ तु० - श्रीमद्भगवद्‌गीता : ईश्वरः सर्वभूतानां हद्देशेऽर्जुन तिष्ठति । - अ० १८, श्लो० ६१.)
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ऐसी तेरी साहिबी, जांनि न सक्कै कोइ । 
सुन्दर सब देखै सुनै, काहू लिप्त न होइ ॥४८॥
इस समस्त पृथ्वी के प्राणियों पर आप का ऐसा कठोर अनुशासन(स्वामित्व = साहिबी) है कि उसे कोई साधारणतः समझ नहीं पाता । यह आप के विषय में कैसी आश्चर्यमयी बात है कि आप इस सृष्टि के सब कुछ(कर्ता धर्ता) होकर उसके किसी भी कर्म में लिप्त नहीं होते२ ॥४८॥ 
(२ तु० - श्रीमद्भगवद्‌गीता : नादते कस्यचित्पापं न चैव सुकृतं विभुः । - अ०५, श्लो० १५.)
(क्रमशः) 

साथनि सहेलड़ी हे

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*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*सहज सहेलड़ी हे, तूँ निर्मल नैन निहारि ।*
*रूप अरूप निर्गुण आगुण में,*
*त्रिभुवन देव मुरारि ॥*
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*विरह ॥*
साथनि सहेलड़ी हे, हेली म्हारौ रँग भरि राम रमाइ ।
मुख माँहैं दस आंगुला, हूँ इहिं बिधि लागौ पाइ ॥टेक॥
येकैं घर मांहै रहै, बासौ येकैं ठाँइ ।
हूँ तौ इहि दुख दूबली, यौ बोलै नहीं सु काँइ ॥
काया बन मैं हूँ गई, जदि कौ रह्यौ रिसाइ ।
मरिये हे नणद अबोलणैं, हूँ रही मनाइ मनाइ ॥
पाड़ौसणि म्हारी बुरी, जिहि की घाली राँति ।
साँई म्हारौ भरिषवौं, पणि मन मैं पड़ी भिराँति ॥
नीड़ौ ही अलगौ जिसौ, जे आवै नाहीं भाइ ।
हरि बिन दूभर क्यूँ भरौं, मोनैं रैंणि छमासी जाइ ॥
कामण मोहण बहु किया, मैं कीया बहुत उपाय ।
यहु क्याँही कै बसि नहीं, क्यूँ ही लीयौ न जाइ ॥
घणाँ दिनाँ कौ रुसणौं, जे अबकै भागौ नाहिं ।
कूवा केरी छाँह ज्यूँ, म्हारा मुवा मनोरथ माहिं ॥
कबहुँक हित चित चूनड़ी, कबहुँक परहरि जात ।
कहि बषनां काँयौं कहूँ, म्हारा ये ठाकुर की बात ॥७८॥  
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साथनि-सहेलड़ी = सदैव साथ में रहने वाली सहेली, मित्र = मनसा = वृत्ति । रंगभरि = प्रियतम के अनन्य प्रेम में सराबोर । राम रमाय = राम का साक्षात्कार । दस आंगुला = दसों इन्द्रियाँ । मुख माँहै = बहिर्मुख । लागौं पाइ = अन्तर्मुखी । एकैं घर = शरीर में ही आत्मा-परमात्मा दोनों का निवास है । काया बन = विषयों में अनुरक्ति । अबोलणैं = आपस में वार्तालाप न होना, परमात्मा शरीर ही में है फिर भी उसका साक्षात्कार नहीं होता । नणद = मनसा, वृत्ति । पाड़ौसणि = इंद्रियाँ । राँति = अंतर । भरिषवौं = सहनशील । पणि = किन्तु । भिराँति = भ्रांति, भ्रम, सत्य कुछ हो किन्तु सत्य समझ कुछ और लिया जाये । भाइ = भावपूर्वक, उत्साह-उमंग के साथ । दूभर = असह्य अमिलन, दुख । भरौं = सहन करूँ । मोनैं = मुझे (हाड़ौती क्षेत्र की बोली में मूँने, मोनैं मुझे के अर्थ में बोला जाता है) कामण-मोहण = वशीकरण आदि तांत्रिक क्रियाएं ।  
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हे सहेली रूपी मनसा मेरे प्रियतम रमैयाराम से अनन्य अनुराग करना प्रारम्भ कर दे ताकि मुझे उसका साक्षात्कार हो जाये, मैं उससे जी भरकर रम सकूँ । इस समय दसों इंद्रियाँ बहिर्मुख हैं । नाना विषयों का रसास्वादन करती हैं । जब तक ये अन्तर्मुख न होंगी, तब तक प्रियतम से मिलना कठिन है । अतः मैं इन्हें अंतर्मुख करके प्रियतम से मिलूँगी । 
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मैं और प्रियतम एक ही काया रूपी घर में रहते हैं । हमारा रात्रि निवास भी एक ही पर्यंक पर है । किन्तु वह न तो मुझ से कुछ भी बोलता है और न रमण ही करता है । बस, मैं इस अबोलणैं = वार्तालापहीनता के दुःख से दुखित हूँ, पतली हुई जाती हूँ । वस्तुतः जब से मैंने अपने आपको आत्मा न मानते हुए शरीर मानकर विषय भोगों से सम्पृक्त कर लिया है, तबही से वह परमात्मा मुझसे रूठ गया है । 
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हे वृत्ति ! उसके द्वारा मेरे से न बोलने के कारण मेरा मरना हो रहा है, मरती तो नहीं हूँ किन्तु जीवित भी नहीं हूँ । इसीलिये मैं बार-बार उसको बोलने = दर्शन देने के लिये मना रही हूँ = उसकी भावभक्ति से साधना कर रही हूँ । मेरे और उस प्रियतम के मध्य अंतर डालने वाली मेरी पड़ोसन रूपी इन्द्रियाँ ही हैं जिन्होंने बहिर्मुखता रूपी भ्रांति के कारण हमारे मध्य पड़दा डाल रखा है । 
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वैसे प्रियतम परम सहिष्णु = दयालु-कृपालु हैं किन्तु हमारे बीच में भ्रांति जो पड़ गई है । मनों में एक दूसरे के प्रति एक दूसरे का अविश्वास जो जम गया है । (विषयों की ओर आकर्षण ही भ्रांति है । जैसे ही बहिर्मुखता मिटकर अन्तर्मुखता होती हैं, वैसे ही परमात्मा का संस्पर्श होना प्रारम्भ हो जाता है) वास्तव में प्रियतम घर में भाव के साथ न आवे तो उसका घर में रहना, दूर रहने के समान ही है । 
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बिना परमात्म-दर्शन-लाभ के मेरी एक-एक रात्रि छः-छः महिने की रात्रि के समान व्यतीत हो रही है और मैं इस सह्य दुख से दुखती हूँ । मेरे से कैसे भी इस दुःख के कारण जीवित रहना संभव नहीं हो पा रहा है । मैंने प्रियतम को अपने वश में करने के लिये वशीकरणादि अनेक तांत्रिक क्रियाएँ की । 
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इनके अलावा श्रुंगारादि भी अनेक प्रकार की क्रियाएँ करके उसको रिझाने का प्रयत्न किया (अनन्य-अनुरागमयी राम-नाम-स्मरण रूपी भक्ति के अतिरिक्त अन्य सभी साधनाएँ, अन्य उपाय हैं जो परमात्मा को रिझाने में नाकाफी हैं ।) किन्तु वह प्रियतम किसी भी उपाय से वशीभूत नहीं हुआ, कैसे भी प्राप्त नहीं किया जा सका । 
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यदि अनंत जन्मों का परमात्मा से अलगाव इस जन्म में समाप्त नहीं हुआ तो मेरी मनोकामना ठीक वैसे ही मेरे मन में रह जायेगी जैसे कुवे की छाया कुवे में ही समाप्त हो जाती है । वह बाहर आकर किसी का उपकार नहीं कर पाती । बषनांजी कहते हैं, मैं मेरे ठाकुर की विचित्र बातें किससे कहूँ, किसप्रकार कहूँ क्योंकि वह कभी तो प्रेम-प्यार करता हुआ चूंदड़ी ओढ़ाता है और कभी छोड़कर दूर चला जाता है ॥७८॥ 

. जीवन की घटनायें

*#daduji*
*॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥*
*॥ दादूराम~सत्यराम ॥*
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
.
जीवन की घटनायें ~
.
१- वि. सं. २०१४ की घटना है - कथा वाचक  धनीरामजी स्वामी ने सुनाई कि - एक दिन कथा के पश्‍चात् परंपरा के अनुसार मंदिर से आचार्य प्रकाशदेवजी महाराज के साथ साथ हम लोग खेजडाजी का दर्शन व प्रणाम कर छत्रियों के दर्शन करने गये । छत्रियों के दर्शन व प्रणाम करके बारहदरी पधार गये । 
.
आचार्य प्रकाशदेवजी महाराज गद्दी पर विराज गये और मैं शीघ्रता से मंदिर के नीचे की ड्यौढी होकर इधर उधर घूमा और स्थानीय ब्राह्मण पंडित दादूराम से कुछ बातें करी फिर लगभग २० मिनट में मैं बारहदरी पहुँच गया । आचार्य प्रकाशदेव जी महाराज के पास बैठा तो महाराज ने मेरी २० मिनट की संपूर्ण चर्या जहाँ गया वह तथा नानूराम पंडित से बात करी वह सब अक्षरश: मुझे सब सुना दी । 
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उनको सुनकर मेरे को अति आश्‍चर्य हुआ कि यह तो मानों मेरे साथ- २ सुन रहे हों वैसे की सब सुना दी हैं । यह क्या बात है ? अंत में मैंने सोचा ये महान् संत हैं इनके लिये यह कोई आश्‍चर्य की बात नहीं है । तब से महाराज पर मेरी अनन्य श्रद्धा हो गई थी । इस घटना से भी सूचित होता है कि - आचार्य प्रकाशदेव जी महान् संत थे । यह सब भजन का ही प्रताप था । 
२- परमहंस धनीरामजी प्राय: आचार्य प्रकाशदेवजी के साथ ही रहते थे । वि. सं. २०१४ की ही घटना है कि - एक दिन आचार्य जी ने जो बारहदरी में कपडे से ढका हुआ आचार्य जी के बैठने का मुड्डा पडा रहता है उसकी ओर हाथ करके विनोद में ही धनीराम जी को कहा- आप इस पर सो सकते हैं ? धनीराम जी ने कहा - महाराज यह बैठने ही योग्य है, सोने योग्य है ही नहीं । फिर सोना कैसे बन सकता है ? 
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तब आचार्य प्रकाशदेव जी ने कहा- मैं सो सकता हूँ देखो- फिर आचार्य प्रकाशदेवजी उस मु़ढे पर विराजकर बच्चे के समान छोटा शरीर बनाकर सो गये । धनीरामजी को यह देखकर अति आश्चर्य हुआ । उन्होंने उसी समय साष्टांग दंडवत करके प्रार्थना की- महाराज ! आपतो अपने रुप में आ जाओ, इस माया को शीघ्र समेट लो । फिर आचार्य जी अपने रुप में आ गये । उक्त घटना से ज्ञात होता है कि  आश्‍चर्य प्रकाशदेव जी को शरीर छोटा व बडा बनाने की शक्ति भी प्राप्त थी । यह धनीराम जी ने प्रत्यक्ष देखा था ।
(क्रमशः)  

२१. समर्थाई आश्चर्य को अंग ४१/४४

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२१. समर्थाई आश्चर्य को अंग ४१/४४
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सांई तेरी अगम गति, हिकमति की कुरबांन । 
सब सिरजै न्यारा रहै, सुन्दर यह हैरान ॥४१॥
श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - हे स्वामिन् ! आप के बुद्धिमत्ता(हिकमत) एवं चतुरता युक्त कर्म किसी के लिये भी समझ से बाहर हैं, अतः मैं आप की बलिहारी जाता हूँ कि आप इतनी विशाल सृष्टि की रचना कर के भी इस से पृथक् ही हैं । यह देखकर मैं आश्चर्यचकित(हैरान) हूँ ॥४१॥ 
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शेख मसाइक औलिया, सिध साधिक मुख मौंन ।
वै भी बैठे थाकि करि, सुन्दर बपुरा कौंन ॥४२॥ 
वास्तविकता यह है कि शेख, मसाइक, औलिया आदि मुस्लिम साधक सन्त एवं सिद्ध साधक आदि आर्यमतानुयायी सन्त ही जब आप के यथार्थ वर्णन में थक कर मौन रहते आ रहे हैं तो मुझ अकिञ्चन सुन्दरदास की कौन गणना है ! ॥४२॥
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प्रीतम मेरा एक तूं, सुन्दर और न कोइ । 
गुप्त भया किस कारनै, काहि न परगट होइ ॥४३॥
इन ही सब कारणों से अब मैं केवल आपको अपना प्रियतम(इष्टदेव) मानता हूँ, अन्य किसी(देवता) को नहीं । इतना होने पर भी आप मुझ से क्यों छिपे बैठे हैं, मेरे सम्मुख आप प्रकट क्यों नहीं होते ! (मुझको दर्शन क्यों नहीं देते!) ॥४३॥
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धन्य धन्य मोटा धनी, रच्या सकल ब्रह्मंड । 
सुन्दर अद्भुत देषिये, सप्त दीप नौ खंड ॥४४॥ 
श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - हे मेरे सर्वशक्तिमान् स्वामी ! आपने यह बहुत ही आश्चर्यमय सकल ब्रह्माण्ड बनाया है कि जिसमें अद्भुत सात द्वीप एवं नौ खण्ड पृथक् पृथक दिखायी दे रहे हैं ॥४४॥
(क्रमशः) 

*आत्मसाक्षात्कार ॥*

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*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*प्राण कवल मुख राम कहि, मन पवना मुख राम ।*
*दादू सुरति मुख राम कहि, ब्रह्म शून्य निज ठाम ॥*
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*आत्मसाक्षात्कार ॥*
सुरति बँधी मेरी सुरति बंधी । बहुत ठौर तैं तूटी संधी ॥टेक॥
तीनि टूक ले चौथैं सांधी । ऊँची अलग अलगाले बांधी ॥
बाव बिकार न झोला काई । निहचल रहै गुरू की लाई ॥
खूँटी एक गगन धरणि दूजा जाण्याँ । दुहुँ खूँटा बिचि ताणाँ ताण्याँ ॥  
गुर तैं गुढी अलूझणि भागी । बषनां सुरति ब्रह्म स्यौं लागी ॥७७॥
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संसार के अनेकों विषयों में मेरी चित्तवृत्ति अटकी पड़ी थी । अब सद्गुरु महाराज की क्रिया से उन समस्त विषयों से वृत्ति की आसक्ति मिट गई है और उसका नित्य सम्बन्ध एक परात्पर-परब्रहम-परमात्मा से हो गया है । यह परमात्मा में पूर्णरूप से अटक गई है । 
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इस वृत्ति को राम-नाम से संयुक्त करके जिव्हा, हृदय तथा नाभि नामक तीनों स्थानों से निकालकर चौथे स्थान पर स्थापित कर दी है । वह चौथा स्थान ब्रह्मरंध्र सर्वोच्च तथा सबसे अलग एक ओर है । “चौकी भजन प्रताप की, संत कह गये च्यारि । रामचरण या सत्ति है, दूजा भरम असार ॥१॥ रसन कंठ रस पीय कैं, हिरदै सुक्ख बिलास । नाभ कँवल सूँ उलटि कै, सुरति गई आकास ॥२॥” 
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वहाँ विषयों में आसक्ति रूपी हवा के झौंके (विषयों को पुनः पुनः भोगने की इच्छा) नहीं आते । वहाँ तो सुरति गुरुमहाराज के उपदेश से शब्दमयी हो जाने के कारण निश्चल रहती है । सुरति का निवास, अंत में शब्द के साथ आकाश = ब्रह्मरंध्र में तथा प्रारम्भिक अवस्था में मूलाधार चक्र में होता है । इसी के बीच इसका संचरण होता है । 
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बषनांजी इस बात को कहते हैं, सुरति ने मूलाधार चक्र जहाँ कुण्डलिनी सुषुप्तावस्था में सर्प की भाँति कुंडली मारकर पड़ी रहती है तथा ब्रह्मरंध्र दोनों बिन्दुओं के मध्य अपना निवास बना रखा है । उसने मूलाधार से लेकर ब्रह्मरंध्र तक अपना साम्राज्य जमा रखा है । गुरुमहाराज की कृपा से कुंडलिनी की गुढी = घुंडी = कुंडली मिट गई और वह सीधी होकर शब्द के साथ ब्रह्मरंध्र में पहुँच गई । उसका सीधा सम्बन्ध ब्रह्म से हो गया ।
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सुरति रूपी जीव और शब्द सरूपी ब्रह्म का एकाकार हो गया । वस्तुतः कुंडलिनी वृत्ति ही है । उसका साढे तीन वलयों में कुंडली मारकर सोना तीनों गुणों में आसक्त होना ही है । जब सुरति गुणों को त्यागकर ब्रह्म को अंगीकार कर लेती है तब उसको जागृत हुआ कहते हैं । जागृत होने पर कुण्डलिनी का एक छोर मूलाधार में तथा दूसरा ब्रह्मरंध्र में पहुँचता है यही सुरति का शब्द से इस शरीर के रहते एकाकार होना है ॥७७॥ 

शनिवार, 21 मार्च 2026

*७.आज्ञाकारी आज्ञा भंगी का अंग ~ ९/१२*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*७.आज्ञाकारी आज्ञा भंगी का अंग ~ ९/१२*
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*आज्ञा में अनमोल१ है, अन आज्ञा अढ़२ आघ३ ।*
*रज्जब रंग५ सु रजा४ में, विरच्यों६ बाल्हे७ बाघ८ ॥९॥*
गुरुजनों की आज्ञा में रहने से व्यक्ति अति उत्तम१ माना जाता है । आज्ञा४ में न रहने से उसकी उत्तमता३ में कमी२ आ जाती है । सम्यक आज्ञा में रहने से ही आनन्द५ मिलता है । गुरुओं की आज्ञा मानने से विरक्त६ होने पर तो बहिमुर्ख७ होकर सिंह८ के समान भय-प्रद होता है ।
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*गुरु की आज्ञा में रहै, सो शिष्य कोई एक ।*
*रज्जब रहे वन रोझ मन, आज्ञा भंग अनेक ॥१०॥*
गुरु की आज्ञा में रहने वाला शिष्य तो कोई विरला ही होता है । वन में रहने वाले रोझों के समान बहिमुर्ख मन आज्ञा भंग करने वाले, अनन्त मिलते हैं ।
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*असली आज्ञा में चलैं, बाहर धरैं न पाँव ।*
*रज्जब कपटी कम असल, खेलैं अपना दाँव ॥११॥*
सच्चे शिष्य आज्ञा में ही चलते हैं, आज्ञा के बाहर एक पैर भी चलते अर्थात कुछ भी नहीं करते । जो कपट से सच्चे बने हुये और वास्तव में झूठे, वे तो अपने स्वार्थ का दाँव खेलते हैं अर्थात स्वार्थ सिद्धि के लिए ही सब कुछ करते हैं, कल्याण के लिये कुछ नहीं ।
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*रज्जब रहिये रजा में, गुरु गोविन्द हजूर ।*
*इनकी आज्ञा मेट तैं, देखत पड़िये दूर ॥१२॥*
गुरु और गोविन्द की आज्ञा में रहोगे तभी गुरु और गोविन्द समीप रह सकोगे, इनकी आज्ञा से बाहर जाने से तो देखते ही इनसे दूर पड़ जाओगे ।
(क्रमशः)