मंगलवार, 24 फ़रवरी 2026

बीकानेर का चातुर्मास ~

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*॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥*
*॥ दादूराम~सत्यराम ॥*
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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१६ आचार्य दयारामजी ~
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बीकानेर का चातुर्मास ~
वि. सं. १९७२ का चातुर्मास का निमंत्रण बीकानेर के हीरालालजी, लालदासजी, किशनदासजी का माना था । अत: समय पर आचार्य दयारामजी महाराज शिष्य संत मंडल के सहित बीकानेर पधारे । बीकानेर के संतों ने तथा भक्तों ने आचार्य दयारामजी की बडे ठाट बाट से अगवानी की और मर्यादापूर्वक स्थान पर लाये ।
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चातुर्मास आरंभ हो गया । चातुर्मास के सभी कार्य उत्तम रीति से होने लगे । नगर के सेठ साहूकारों ने आचार्यजी को अति सम्मान के साथ रसोइयां दीं । अति आनन्द से चातुर्मास सम्पन्न हुआ । समाप्ति पर हीरालालजी, लालदासजी, किशनगढजी ने आचार्यजी को मर्यादानुसार भेंट तथा शिष्य संत मंडल को यथायोग्य वस्त्रादि देकर सस्नेह विदा किया ।
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बीकानेर वाटी की रामत ~
बीकानेर से विदा होकर आचार्य दयारामजी महाराज ने अपने मंडल के सहित बीकानेर वाटी की रामत की । इस रामत में बीकानेर राज्य के साधुओं तथा सेवकों ने आचार्यजी का अति आदर सम्मान किया । दादूवाणी के प्रवचन सुने । संतों की सेवा भी अच्छी की । बीकानेर राज्य की रामत करते हुये सीकर की ओर बढे और सीकर के पास, सीकर नरेश को अपने आने की सूचना दी ।
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सीकर में स्वागत ~
पोष कृष्णा ९ मी को सीकर के राव राजा माधवसिंहजी स्वयं चांदी के हौदे का हाथी एवं राजकीय लवाजमा लेकर तथा बाजे गाजे से संकीर्तन करते हुये संत तथा भक्त मंडल के साथ आचार्य दयारामजी महाराज की अगवानी करने आये । फिर आवश्यक प्रश्‍नोत्तर हो जाने के पश्‍चात् आचार्य दयारामजी महाराज को हाथी पर बैठाकर नगर के मुख्य बाजार से भक्त जनता को आचार्यजी व संत मंडल का दर्शन कराते हुये नियत स्थान पर ले जाकर शोभा यात्रा समाप्त की ।
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प्रसाद लेकर भक्त लोग अपने अपने घर चले गये । सेवा का प्रबन्ध सुचारु रुप से कर दिया । आचार्य दयारामजी महाराज ने भक्त जनता की प्रार्थना पर कुछ समय सीकर में विराज कर भक्तों को सत्संग का लाभ दिया । भक्तों ने भी शिष्य संत मंडल सहित आचार्यजी की अच्छी सेवा की । फिर जब आचार्य दयारामजी महाराज सीकर से पधारने लगे तब राजा तथा प्रजा ने उदारता पूर्वक भेंटें दीं और सस्नेह विदा किया ।
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भूरारामजी के चातुर्मास ~
वि. सं. १९७३ में आचार्य दयारामजी महाराज का चातुर्मास भण्डारी भूरारामजी ने करवाया । भूरारामजी भण्डारी ने चातुर्मास पूर्ण मर्यादा के सहित कराया, कारण वे भण्डारी होने से संपूर्ण मर्यादाओं को जानते थे । अत: उन्होंने उन मर्यादाओं का पालन पूर्ण रुप से कर दिखाया ।
(क्रमशः)

२०. विपर्यय कौ अंग २१/२४

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२०. विपर्यय कौ अंग २१/२४
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भ्रमर सु तौ उज्जल भयौ, हंस भयौ फिरि स्यांम । 
को जानै केते भये, सुन्दर उलटे कांम ॥२१॥
मन रूप भ्रमर जो पहले विषयरूप पुष्पों पर बैठने से काला था वह अब भगवद्भक्ति से अपने मलविक्षेप प्रक्षालित कर उज्ज्वल हो गया । इसी प्रकार जीवात्मा रूप हंस सात्त्विकता के कारण उज्ज्वल था वह अब, श्यामसुन्दर भगवान के निरन्तर सम्पर्क(भगवद्भक्ति) के कारण श्यामवर्ण का हो गया । श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - इस अध्यात्मक्षेत्र में ऐसे आश्चर्यमय वैपरीत्य(उलट फेर) कितने ही होते रहते हैं ॥२१॥ (द्र० सवैया : २२/छ० सं० १३) ॥
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अग्नि मथन करि नीसरी, लकरी सहज सुभाइ । 
पानी मथि घृत काढियौ, सो घृत सुन्दर खाइ ॥२२॥
साधक ने अपनी विरह अग्नि को अतिशय प्रज्वलित कर, या श्रवण मनन आदि से ज्ञान प्रकट कर लकड़ी काढी(ब्रह्माकार वृत्ति उत्पन्न की ।) इस प्रकार सहज योग के अभ्यास से उसको आत्मसाक्षात्कार हुआ । 
इसी प्रकार, साधक ने पानी प्रेमा भक्ति को अथवा अन्तःकरण रूप तरल प्रवाहमय वृत्तियों में समुद्र को या संसार को मथकर विचार विवेकपूर्वक साधनचतुष्टय द्वारा ज्ञानरूप घृत(ब्रह्मानन्द) निकाला । वही घृत साधक को खाना चाहिये जिससे वह निरन्तर तदाकर वृत्ति का आनन्द ले सके ॥२२॥ (द्र० सवैया : २२/छ० सं० १४) ॥
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पात्र मांहिं झोली धरै, जोगी मांगै भीख । 
सोवै गोरख यौं कहे, सुन्दर गुरु की सीख ॥२३॥
लोक में हम देखते हैं कि भिक्षु लोग झोली में पात्र रखते हैं, परन्तु यहाँ विपरीत खेल हो रहा है । पात्र अर्थात् शुद्ध हृदय या मन में सांसारिक कर्मों के पाप-पुण्य भरे हुए हैं । उन कर्मों को सर्वथा त्याग दे । मन के शुद्ध होते ही शुभाशुभ कर्मों की ग्रन्थि स्वयं खुल जाती है । तब योगी(जिज्ञासु) ज्ञान की क्षुधा से पीडित होकर अपने गुरु तथा अनुभवी सन्तों से ज्ञान की भिक्षा मांगै(याचना करे) और उस समय "जागै जगत सोवै गोरख१"- इस वाक्य का बार बार मनन करे । श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - यहीं गुरुजनों की शिक्षा है ॥२३॥ (द्र० सवैया : २२/छ० सं० १५) ॥ (१ तु. – श्री भगवद्गीता - या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी । यस्यां जाग्रति भूतानि, सा निशा पश्यतो मुनेः ॥ अ० २, श्लो० ६९)
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पर धी लै करि घर धरै, पर धन हरि हरि खाइ । 
पर निंदा निस दिन करै, सुन्दर मुक्ति हो जाइ ॥२४॥
इस साषी का व्यावहारिक अर्थ तो किसी को भी चकित करने में समर्थ है; परन्तु इसका अध्यात्मिक अर्थ यह है –
परधन अर्थात् परमात्मसम्बन्धिनी बुद्धि को ले(ग्रहण) कर घर(स्वकीय अन्तःकरण या हृदय) में स्थिर रखना चाहिये ।
परधन(परमात्मज्ञान या पराभक्ति रूप धन या सन्तों से प्राप्त ज्ञानधन) का 'हरि हर' कहते हुए प्रसन्नतापूर्वक ग्रहण तथा उपभोग करना चाहिये ।
परनिन्दा - आत्मा से भिन्न अनात्म(मायामय) पदार्थों की निन्दा(ग्लानि तथा त्याग) निशदिन(निरन्तर) करे । महाराज सुन्दरदासजी कहते हैं - ये उपर्युक्त तीनों कार्य करने वाले साधक की एक न एक दिन मुक्ति(मोक्ष = निर्वाण) हो ही जायगी - यह निश्चित है ॥२४॥ (द्र० सवैया : २२/छ० २२/१८) ॥
(क्रमशः)

*चांणक॥*

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*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*बातों सब कुछ कीजिये, अंत कछू नहिं देखै ।*
*मनसा वाचा कर्मना, तब लागै लेखै ॥*
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*चांणक॥*
सोचि कहौ रे सोचि कहौ । साच तजौ काँइ झूठ गहौ ॥टेक॥
औरै बच्छ गऊ तलि मेल्हा, कान्ह नहीं कोइ औरै खेल्या ।
बाल बह्मचारी गोप्याँ कहिया, जमुना पार तबै जाइ लहिया ॥
गौप्याँ के प्रीति ये काँइ बखाणौं, आप तिसा अगले कौं जाणैं ।
बषनां प्रीति लगाया लोड़ै, पद नहिं करै बिगोवा जोड़ै ॥५९॥
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भागवत आदि ग्रंथों का वास्तविक रहस्य न जानने वाले किन्तु उन्हीं का वाचन करके उदरपूर्ति करने वाले ब्राह्मणों को फटकारते हुए बषनांजी कहते हैं, हे ब्राह्मणों ! उन बातों को सोच-विचार करके कहो जिनको तुम प्रायः अपने श्रोताओं को व्यासगद्दियों पर बैठकर सुनाते हो । जिस बात को कहना हो, उसे सोच-विचार करके ही कहना चाहिये । क्यों व्यर्थ ही सत्य बात को त्यागकर झूठ का आश्रय ग्रहण करते हो ।
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उदाहरणार्थ तुम कहते हो, ‘ब्रह्मा ने गाय-बछड़ों को एक वर्ष तक ब्रज में से गायब करके पातालादि में छिपा दिया था क्योंकि उसे यह भ्रम हो गया था कि तत्समय ब्रजमण्डल में खेल्या = लीला कर रहा कान्हा स्वयं परात्पर-परब्रह्म न होकर कोई और सामान्य पुरुष है किन्तु श्रीकृष्ण तो परात्पर-परब्रहम परमात्मा थे ।
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उन्होंने ब्रह्मा के भ्रम को विदीर्ण करने के लिये तत्काल वैसे ही और उतने ही गाय-बछड़े बना दिये जितने ब्रह्मा ने चुराकर अपने पास छुपा करके रख लिये थे । एक बार गोपियाँ यमुना पार करते समय यमुना के अथाह जल में डूबने लगीं । तब उन्होंने यमुना से प्रार्थना की, हे यमुना मैय्या ! यदि श्रीकृष्ण बाल-ब्रह्मचारी है तो तू अपना अथाह रूप समेटकर हमें जाने का मार्ग दे दे । यमुना ने तत्काल गोपियों को मार्ग दे दिया ।
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इससे सिद्ध होता है कि श्रीकृष्ण बालब्रह्मचारी थे । उनकी रासलीला विशुद्ध(कामहीन) लीला मात्र थी । हे ब्राह्मणों, कथावाचकों, गोपियों के प्रति ये क्या क्या और किस-किस प्रकार के झूठे कथन तुम करते हो ? जरा सोच-विचार करके अपनी बातों को कहो ।
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वस्तुतः इसमें तुम्हारा नहीं तुम्हारी प्रकृति व वृत्ति का दोष है । जैसी तुम्हारी प्रकृति और वृत्ति है, तुम अगले को भी वैसा ही बढ़ा चढ़ाकर कहते हो । वह असल में जो और जैसा है, वैसा तुम उसको बताते नहीं हो । वस्तुतः तुम उस श्रीकृष्ण से प्रीति लगाये घूमते-फिरते हो जो जन्मता और मरता है जबकि परात्पर-परब्रह्म-परमात्मा न जन्मता और न मरता ही है । वह सदैव एकरस रहता है ।
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तुम उस परब्रह्म परमात्मा के तो पद नहीं बनाते हो जो निर्गुण-निराकार, एक, अकल, अविनाशी है उल्टे उसके गुनगान करते हो जो बिगोवा = नष्ट होता है, मृत्यु को प्राप्त होता है ॥५९॥ (चांणक और चेतावनी के अंगों में लगभग समान विषय ही होते हैं किन्तु कहने की शैली भिन्न होती है । उपदेश में बात सपाट शैली में, चेतावनी में सावधान करते हुए तथा चांणक में डाँटते-फटकारते हुए कही जाती है ।)
(क्रमशः)

सोमवार, 23 फ़रवरी 2026

*५. गुरु-शिष्य निदान निर्णय का अंग ~ ३३/३६*

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*🌷卐 सत्यराम सा 卐🌷*
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*५. गुरु-शिष्य निदान निर्णय का अंग ~ ३३/३६*
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सब हुन्नर संसार के, किन हुं किये करि याद ।
सो रज्जब किस काम का, अब दे सो उस्ताद ॥३३॥
३३-३५ में कहते हैं, ज्ञानोपदेश करे वही गुरु है - किसी ने संसार के सभी गुण-विद्यादि परिश्रम करके याद किये हों वे आज किस काम के हैं ? जो वर्तमान में अधिकारियों को देते हैं वे ही गुरु हैं ।
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*सब संतों के सत शबद, जिनमें अलख अभेव ।*
*अब समझावे जो जिसहिं, सो तिस का गुरु देव ॥३४॥*
सभी संतों के वे शब्द यथार्थ है, जिनमें मन इन्द्रियों का अविषय अद्वैत ब्रह्म अर्थ रूप से स्थित है किन्तु जिस को जो अब उन शब्दों को समझाता है वही गुरु है ।
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*तुपक१ पावक दारू गोली, कहीं कहीं सौं होय ।*
*पै रज्जब निर्दोष सब, मारे वैरी सोय ॥३५॥*
बंदूक१, अग्नि, बारूद, गोली कहाँ कहाँ से संग्रह होती है किन्तु उनके बनाने वाले सभी निर्दोष माने जाते हैं, जो बंदुक से गोली मारता है, वही शत्रु माना जाता है । वैसे ही गुरु, शब्द, युक्ति आदि कहाँ कहाँ से संग्रह करता है किन्तु उन शब्द और युक्ति के कारण पुरुष को गुरु न मानकर जो वर्तमान में उपदेश देता है उसे ही गुरु माना जाता है ।
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*षड् दर्शन के रँग रँगी, आतम जल ज्यों आय ।*
*रज्जब सद्गुरु सूर ज्यों, किरण कर्ष ले जाय ॥३६॥*
३६-३९ में सद्गुरु की विशेषता बता रहे हैं - जल किसी रंग में पड़कर रंगा जाता है तब सूर्य अपनी किरण से खेंच कर उसे रंग रहित कर देते हैं, वैसे ही जब जीवात्मा जोगी, जंगम, सेवड़े, बौद्ध, संन्यासी, शेख, इन ६ प्रकार के भेषधारियों के भेष मतादि आग्रह में फँस जाता है तब सद्गुरु ही उपदेश द्वारा उससे मुक्त करके ब्रह्म साक्षात्कार कराते हैं ।
(क्रमशः)

सूरत गमन ~

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*॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥*
*॥ दादूराम~सत्यराम ॥*
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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१६ आचार्य दयारामजी ~ 
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सूरत गमन ~
वि. सं. १९७० में आचार्य दयारामजी महाराज सूरतनगर में पधारे । वहाँ सेवकों और स्थान धारी संतों ने आचार्यजी की श्रद्धा पूर्वक की और सूरत में रहे तब तक भावपूर्वक दादूवाणी के प्रवचन सुनते रहे । दादूवाणी सूरतनगर के सत्संगियों को बहुत प्रिय लगती थी । सूरत के भक्तों की सत्संग की इच्छा पूर्ण करके आचार्यजी बम्बई नगरी को जाने लगे । तब सूरत नगर के संत तथा भक्तों ने आचार्यजी को मर्यादानुसार भेंट देकर सूरत से सस्नेह विदा किया ।
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बम्बई पधारना ~ 
सूरत नगर से विदा होकर आचार्य दयारामजी महाराज बम्बई नगरी को पधारे । बम्बई नगरी के सेवकों ने आपका अति सम्मान किया । अच्छे स्थान में ठहराकर सेवा का सुचारु रुप से प्रबन्ध कर दिया । दादूवाणी का प्रवचन होता था । सत्संगी सज्जन अति प्रेम से श्रवण करते थे । आप बम्बई में जितने दिन रहे उतने ही दिन वहां के सेवक आपके पास आकर सत्संग करते रहे और अपने को धन्य समझते रहे । फिर बम्बई से पधारने लगे तब वहां के सेवकों ने आपका अति सम्मान करते हुये श्रद्धा भक्ति से भेंटें देकर आपको विदा किया । बम्बई से विदा होकर आप नारायणा दादूधाम दादूद्वारे में पधार गये । 
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जयपुर नरेश का आगमन ~ वि. सं. १९७१ के भाद्रपद की शुक्ला १४ को जयपुर नरेश माधवसिंहजी दोनों लालजी, सेठ रामनाथजी अटल, नायब नथमल के साथ दादूद्वारे में पधारे । मंदिर में गद्दी पर विराजे हुये आचार्य दयारामजी महाराज को भेंट करके प्रणाम किया । फिर सामने बैठकर प्रसाद ग्रहण किया तथा वार्तालाप किया । 
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फिर स्टेशन पर डेरे में चले गये । शाम को स्टेशन पर डेरे में दादूद्वारे के भंडारियों को बुलाकर रसोई का निमंत्रण दिया । दूसरे दिन नाजिम निजामत के इन्तजाम में रसोई कराई । नाजिम आदि ने सस्नेह सब संतों के साथ आचार्यजी को जिमाया और मर्यादानुसार भेंट दी । महाराजा के लिये प्रसाद भेजा गया । महाराजा ने श्रद्धा पूर्वक  प्रसाद ग्रहण किया ।
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कलकत्ता पधारना ~ 
वि. सं. १९७२ के चैत्र मास में सेवकों के आग्रह से आचार्य दयारामजी महाराज शिष्य संत मंडल के सहित कलकत्ता के सेवकों ने आपको अच्छे स्थान में ठहरा कर सेवा का सब प्रकार का प्रबन्ध कर दिया । जहां ठहरे थे वहां ही दादूवाणी का प्रवचन होता था । सेवक लोग श्रवण करने आते थे । जिसको कोई शंका होती तो उसका भी समाधान आचार्यजी कर देते थे । सेवक लोग आचार्यजी के दर्शन से तथा दादूवाणी के प्रवचन के श्रवण से महान् सुख प्राप्त करते थे । 
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कोई कोई आचार्यजी को शिष्य मंडल सहित भोजन कराने मर्यादापूर्वक  घर ले जाता था और जिमाके भेंट देकर मर्यादापूर्वक ही स्थान पर पहुँचा देता था । इस प्रकार कलकत्ता महानगर में अपने चार मास से भी कुछ ऊपर ही निवास किया । फिर चातुर्मास का समय आने से चलने का विचार किया । सेवकों ने तो कहा चातुर्मास यहाँ ही कीजिये किन्तु पहले माना हुआ था अत: अधिक नहीं ठहर सके । कलकत्ता के सेठ साहूकारों ने आपको श्रद्धा पूर्वक भेंटें दीं और सस्नेह विदा किया । 
(क्रमशः)

२०. विपर्यय कौ अंग १७/२०

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२०. विपर्यय कौ अंग १७/२०
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रजनी मैं दीसै दिवस, दिन मैं दीसै राति । 
सुन्दर दीपक जल गयौ, रही बिचारी बाति ॥१७॥
साधना के प्रसङ्ग में, कुछ समय बाद, साधक के साथ ऐसा घटित हुआ कि उसे रात्रि(सांसारिक निवृत्ति) में दिन(ज्ञान का प्रकाश) दिखायी देने लगा । मोह ममता रूप तैल से पूर्ण(दीपक) बुझ गया, उस समय केवल बाती(ब्रह्मानन्दरूप वृत्ति) ही अवशिष्ट रह गयी ॥१७॥ (द्र० सवैया : २२/छ० सं० ११ पूर्वार्ध) ॥
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सुन्दर बरिखा अति भई, सूकि गये नदि नार । 
मेर बूडि जल मैं रह्यौ, झर लाग्यौ इकसार ॥१८॥
श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - साधक द्वारा अभ्यास करते करते साधना(वर्षा) से निरन्तर भजन एवं अनाहत नादध्वनि बढ़ने लगी और अहङ्कार रूप सुमेरु पर्वत डूब गया; परन्तु लौकिक नदी नाले(इन्द्रियों द्वारा प्रवाहित होने वाले विषय-भोग) सूख गये(नष्ट हो गये) । यद्यपि यह आनन्दवर्षा निरन्तर हो रही थी ॥१८॥ (द्र० सवैया : २२/छ० सं० १२ पूर्वार्थ) ॥
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कांसा पर्यौ पराकिदे, बिजली ऊपर आइ । 
घर की सब टाबर मुवौ, सुन्दर कही न जाइ ॥१९॥
लोक में हम देखते हैं कि आकाश से बिजली किसी कांस्य पात्र पर गिरती है; परन्तु यहाँ उलटा हुआ कि कांस्य पात्र(काया, शरीर = लौकिक विषयभोगों का पात्र) ही गुरुजान रूप बिजली पर 'फडाक्' शब्द करता हुआ तत्काल जा गिरा । उस का परिणाम यह हुआ कि साधक की समस्त शुभाशुभ संस्कार रूप(बाल बच्चे = टाबर) मलिन अन्तःकरण की वृत्तियाँ निरुद्ध हो गयीं । इस का स्पष्ट वर्णन सब के लिये सम्भव नहीं है - ऐसा श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं ॥१९॥ ॥१३॥ (द्र० सवैया : २२/छ० सं० १२) ॥
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सुन्दर माली नीपज्यौ, फल अरु फूल समेत । 
हाली के कोठा भरे, सूके बाडी खेत ॥२०॥
कुछ अन्य आश्चर्यमय घटनाएँ सुनिये - इस बाड़ी(खेत) रूप कर्मक्षेत्र में क्षेत्रज्ञ जीवरूप माली फल फूल(नाना विषय भोगों) सहित उत्पन्न हुआ । इस कृषिरूप क्षेत्र(देह) में हाली(हलधर = किसान) के अन्तःकरण या मन के कोठे(अन्तरङ्ग वृत्तियों के स्थान) ब्रह्मानन्द से परिपूर्ण हो गये । परिणामस्वरूप, काया रूप खेत सूख गये । अर्थात् अन्तःकरण की वृत्तियाँ अन्तर्मुख होने से साधक का मन ब्रह्मानन्दरूप सच्चे फल-फूलों से परिपूर्ण हो गया । और बहिमुर्खता से हट कर निरञ्जन निराकार के ध्यान में सतत मग्न हो गया ॥२०॥ (द्र० सवैया : २२/छ० सं० १३) ॥
(क्रमशः) 

भ्रमविध्वंश ॥

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*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*जे कुछ भावै राम को, सो तत कह समझाइ ।*
*दादू मन का भावता, सबको कहि बनाइ ॥*
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भ्रमविध्वंश ॥साषी॥१ (१ लौकिक माया कौ अंग” में साषी क्रमांक ३ में इसका अर्थ देखें ।)
बेद बिड़ौ बषनां हम जाण्या, रस सिंगार दह डार्या ।
थोह कै दूध माछला माता, ज्याँह पिया तैं मार्या ॥
पद ॥
अैसा बैद बेद कलि मांहीं । ताथैं रोगी जीवै नांहीं ॥टेक॥
हरि गोपी काँधै करि लीन्हीं, अैसा ग्यान दिढ़ावै ।
जैसी सुणैं ऊपजै तैसी, लहरि बिषै की आवै ॥
काम कलपना बिषै बुराई, यहु बेदन घट मांहीं ।
बैद मिल्या परि पीड़ न भागी, ठौर नाटिका नांहीं ॥
करम बिथा काटण कै कारणि, सुनते थे सब लोई ।
औषद और पीड़ कछु औरे, ताथैं कुपछि पड्या सब कोई ॥
बीस बरस का पुरिष सुणैं था, सोलह ब्रस की नारि ।
बषनौं कहै भली समझाई, भूलै चोटि कटारी ॥५८॥
हरि = निर्गुण-निराकार परमात्मा, सगुण-साकार-भगवान् बनकर गोपियों के कंधों पर हाथ रखकर रास रचाया करता था, इस प्रकार का ज्ञानोपदेश कलियुग के वैद्य रूपी उपदेशक, गुरु श्रोताओं को यह कहकर करते हैं कि वेदों में, पुराणों में ऐसा ही लिखा है ।
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इस मिथ्या अथवा विषय-वासना-जागृत करने वाली ज्ञान रूपी औषधि से रोगी रूपी श्रोता कभी भी जीवै = जीवन्मुक्त नहीं होता उल्टे बार-बार जन्मता और मरता रहता है । क्योंकि व्यक्ति जैसे विचार सुनता है, वैसे ही संस्कार उसके चित्त में निर्मित होते हैं और जैसे संस्कार निर्मित होते हैं, व्यक्ति वैसा ही करता है । विषयों की बातें सुनने से विषयों को भोगने की लहरि = इच्छा जागृत होती है । काम की कल्पना = चिंतन और विषयों का भोग ही शरीर में बेदन = व्याधि = बीमारी हैं ।
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इन बीमारियों को दूर करने वाले गुरुओं की प्राप्ति तो हो जाती है किन्तु पीड़ा = बीमारियों का अंत नहीं होता क्योंकि इन गुरुओं का न तो बीमारी समाप्त करने का दृष्टिकोण ही होता है और न इनमें इनको समाप्त करने की सामर्थ्य ही होती है । कर्मों रूपी व्यथा = बीमारियों को समाप्त करने के लिये ही श्रोता रूपी बीमार इन गुरुओं के उपदेश सुनते हैं किन्तु इनकी बीमारी तो कुछ अलग प्रकार की है जबकि इन गुरुओं के उपदेश अलग प्रकार के हैं ।
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श्रोताओं की बिमारी विषयभोगों में आसक्ति है । वे इससे छुटकारा पाना चाहते हैं जबकि गुरु उपदेशक उपदेश ही इसप्रकार का करते हैं जिससे विषयभोगों में आसक्ति घटने के बजाय उल्टे बढ़ती ही है । फलस्वरूप सभी लोग कुपछि = कुपथ्य = कुमार्ग पर ही आरुढ़ हो गये हैं । कोई भी निर्गुण-निराकार की भक्ति = नामस्मरण की ओर उन्मुख नहीं हो पाते हैं ?
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वस्तुतः उपदेश सुनने वाले पुरुष बीस वर्ष और स्त्री सोलह वर्ष की उम्र वाले होते हैं अर्थात् दोनों ही नवयुवक होते हैं जिनमें स्वाभाविक रूप से ही काम का वेग अत्यन्त प्रबल होता है । फिर इनको श्रृंगारिक बातें उक्त गुरुओं, उपदेशकों से सुनने को मिल जाती हैं जिससे इनमें काम वासना और अधिक वेग से उद्दीप्त हो जाती है ।
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बषनांजी कटाक्ष करते हुए कहते हैं, इन गुरुओं ने क्या ही भली बात इनको समझाई है कि ये इन विषय भोगों में इस प्रकार आकंठ डूब जाते हैं कि ये यमराज की कटारी = मुदगर की कठोर मार को भी भूल जाते हैं ॥५८॥
(क्रमशः)

रविवार, 22 फ़रवरी 2026

*५. गुरु-शिष्य निदान निर्णय का अंग ~ २९/३२*

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*🌷卐 सत्यराम सा 卐🌷*
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*५. गुरु-शिष्य निदान निर्णय का अंग ~ २९/३२*
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*तन मन शिष रोगी भये, वैद्य मिले गुरु आय ।*
*जन रज्जब सु हाकीम हद, जासौं व्यथा विलाय ॥२९॥*
शरीर रोगी होने पर अनेक वैद्य मिलते हैं किन्तु सबसे अच्छा चिकित्सक वही माना जाता है, जिससे रोग दूर हो जाय । वैसे ही शिष्य का मन भव रोग से व्यथित है, उसे भी अनेक गुरु मिलते हैं, किन्तु जो जन्मादि दु:ख को दूर करे वही सबसे अच्छा गुरु माना जाता है ।
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*रोगी वैद्य पिछान ले, बूंटी सत्य सुजान ।*
*व्यथा विलय ह्वै परसतै, रज्जब सो सु प्रमान१ ॥३०॥*
जो रोगी के रोग कौ और उसकी औषधि को यथार्थ रूप से पहचान लेता है, वही बुद्धिमान सच्चा वैद्य है, उसकी चिकित्सा से रोग दूर हो जाता है, वैसे ही जो साधक के विकारों को और उनके दूर करने के साधनों को पहचान लेता है, वही माननीय१ गुरु है उस श्रेष्ठ गुरु के उपदेश से भव रोग नष्ट हो जाता है ।
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*तृण१ तोयं२ रस तन हुँ मिल, तनै३ तनइया४ होत ।*
*रज्जब जंगम५ जगमगे, स्थावर६ गल गये गोत ॥३१॥*
३१-३२ में गुरु की विशेषता बता रहे हैं - घास१ और जल२ शरीर में जाकर मिलते हैं तब जठराग्नि से पच कर रस बनता है, रस से रज - वीर्य बनकर शरीर३ से पुत्र४ होता है । देखो, अचल६ घास और जल, चल५ शरीर के संग से पुत्र रूप से शोभित होता है और स्थावर गोत्र नष्ट हो जाता है, वैसे ही मूर्ख प्राणी गुरु के संग से ज्ञानी रूप से शोभित होता है और मूर्खपना नष्ट हो जाता है ।
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*विविध भाँति बूटी वन हुँ, वेत्ता१ ल्याव हिं जौय२ ।*
*रज्जब रोग तिन हुं हटे, पै वैद्य वन्दना होय ॥३२॥*
वन में नाना प्रकार की औषधियां होती है, उनको जानने वाले१ देख२ कर लाते हैं । रोग उन औषधियों से ही हटते हैं, परन्तु रोग निवृत्ति पर पूजा चिकित्सा करने वाले वैद्य की ही होती है, वैसे ही वेदादि ग्रंथों में नाना प्रकार के विचार हैं, उनको समझने वाले विद्वान उन्हें संग्रह करते हैं, अज्ञान भी उन विचारों से ही नष्ट होता है, परन्तु अज्ञान नष्ट होने पर पूजा उपदेशक गुरु की ही होती है ।
(क्रमशः)

शनिवार, 21 फ़रवरी 2026

महावीर में चातुर्मास ~

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*॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥*
*॥ दादूराम~सत्यराम ॥*
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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१६ आचार्य दयारामजी ~ 
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महावीर में चातुर्मास ~ 
वि. सं. १९६८ में आचार्य दयारामजी महाराज को चातुर्मास का निमंत्रण बजरंगदासजी महावीर वालों ने दिया । आचार्यजी शिष्य संत मंडल सहित महावीर पधारे । महावीर जमात ने आपका अच्छा सामेला किया । जमात में ले जाकर शोभा यात्रा समाप्त की । चातुर्मास के कार्यक्रम आरंभ हो गये और सब नियम पूर्वक अंत तक चलते रहे । अंत में बजरंगदासजी ने आचार्यजी को मर्यादा के अनुसार भेंट और शिष्य संत मंडल को यथा योग्य वस्त्रादि देकर सस्नेह विदा किया ।  
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महाराणा का आना ~ 
वि. सं. १९६८ मार्गशीर्ष शुक्ला ३ को उदयपुर के महाराणा फतहसिंहजी नारायणा दादूधाम में पधारे । विरक्तों के चौभीता के पास डेरा डलवाकर दर्शन करने मंदिर में गये । मंदिर में चढावा चढा के प्रसाद लेकर बारहदरी गये । आचार्य दयारामजी के भेंट चढाकर सामने गलीचे पर बैठ के सत्संग चर्चा की । अपनी शंका का समाधान होने से अति प्रसन्न हुये और प्रसाद लेकर डेरे पर पधार गये ।
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सीकर नरेश का आना ~ 
पौष शुक्ला ९ मी को सीकर के राव राजा माधवसिंहजी नारायणा दादूधाम में दादूद्वारे के दर्शन करने आये । मंदिर, खेजडाजी, छत्रियां, गरीब गुहा आदि का दर्शन करके बारहदरी में जाकर आचार्यजी के दर्शन किये । भेंट देकर प्रणाम की, फिर सत्संग किया और अन्य मुख्य-२ संतों के दर्शन करके  चले गये ।
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उदयपुर राणा के चातुर्मास ~
वि. सं. १९६९ में चातुर्मास का निमंत्रण उदयपुर महाराणा का आया था । अत: उदयपुर चातुर्मास करने के लिए आचार्य दयारामजी महाराज अपने शिष्य संत मंडल के सहित पधारे । अपने आने की सूचना महाराणा को दी । तब उदयपुर राज्य से आचार्यजी के स्वागतार्थ पोशाक सहित हाथी, पलटन, बाजा आदि लेकर राज्य के विशेष पुरुष आये । 
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मर्यादापूर्वक  प्रणामादि करके सूरज पोल दरवाजा से आचार्य जी को हाथी पर विराजमान करा कर बडे ठाट बाट से ले गये और नई सराय में डेरा कराया तथा सेवा का सब प्रबन्ध अच्छी प्रकार कर दिया गया । महाराणा आचार्यजी के पास दो बार नई सराय में आये । दोनों ही समय शिष्टाचार के साथ आचार्यजी के भेंट चढाकर तथा सामने बैठ कर वार्तालाप किया । नई सराय चातुर्मास सत्संग चलता रहा । धार्मिक  जनता श्रवण करती रही । 
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आश्‍विन शुक्ला ८ मी को बाडी महल में रसोई कराई । उस दिन पांच सरदार आकर आचार्यजी को हाथी पर बैठा के बाजे गाजे के साथ लेकर चले । आचार्यजी का शिष्य संत मंडल साथ में संकीर्तन करता चल रहा था । गणेश ड्यौढी तक ले गये । वहाँ महाराणा सामने आकर आचार्यजी से मिले और आचार्यजी का हाथ थाम कर महल में ले गये और गद्दी पर बैठाकर सामने बैठे तथा एक सहस्त्र रुपये आचार्यजी को भेंट देकर महाराणा ने आचार्यजी द्वारा प्रसाद रुप में दिया गया दुशाला सप्रेम ओढा । 
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महाराणाजी, राज दादीजी, राज माताजी, कंवराणीजी आदि ने भी स्वर्ण मुद्रायें भेंट कीं । फिर भोजन कराकर सम्मान पूर्व नई सराय में पहुँचा दिये गये । उक्त प्रकार महाराणा उदयपुर के चातुर्मास में उदयपुर की जनता ने सत्संग का अच्छा लाभ उठाया । आचार्यजी उदयपुर से विदा होकर भ्रमण करते हुये नारायणा दादूधाम दादूद्वारे में पधार गये । 
(क्रमशः)

२०. विपर्यय कौ अंग १३/१६

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२०. विपर्यय कौ अंग १३/१६
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सुन्दर पर्बत उडि गये, रुई रही थिर होइ ।
बाव बह्यौ इंहिं भांति कौ, क्यौं करि मांनै कोइ ॥१३॥
ज्ञान की पवन का ऐसा झोंका आया कि साधक के पर्वत के समान अहंकार आदि उड़ गये; परन्तु निर्मल, स्वच्छ एवं गुरुतारहित सात्त्विक वृत्ति उसके अन्तःकरण में दृढता से जम कर बैठ गयी । इस बात का यथार्थ कोई विचारवान् पुरुष ही जान सकता है, कोई अज्ञ इसे क्या समझेगा ॥१३॥ (द्र० सवैया : २२/छ० सं० १० उत्तरार्ध) ॥
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ल्याळी खायौ गाडरै, सुसले खायौ स्वांन ।
सुन्दर यह कैसी भई, बधक हि लागौ बांन ॥१४॥
भेड़ (साधक की सात्त्विकी वृत्ति के अभ्यास ने भेडिया(ल्याळी) रूप मनोविकारों को खा डाला । तथा इस प्रकार शील-संतोष रूप खरगोश(सुसलै) ने क्रोध, क्रूरता एवं संतों को देख कर भोंकना आदि कुत्ते की चेष्टा रूप दुष्ट वृत्तियों का पूर्णतः निवारण कर दिया । श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - यहाँ यह कैसी विपरीत बात हुई की वाण मारनेवाला ही अपने वाण से मारा गया ! ॥१४॥ (सवैया ग्रन्थ में इस साषी का व्याख्यान नहीं है)॥
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ब्रह्मा ऊपर हंस चढि, कियौ गगन दिशि गौन ।
गरुड चढ्यौ हरि पीठि पर, सुन्दर मांनै कौंन ॥१५॥
हंस(जीव) ब्रह्मा(रजोगुण) से सम्पृक्त रहता है तो संसार में जन्ममरण परम्परा से आता जाता रहता है; परन्तु वह जीव जब गरुड(ज्ञान) पर आरूढ हो जाता है तो उसका सत्त्वगुणमय ईश्वर से मेल हो जाता है ॥१५॥ (द्र० - सवैया : २२/छ० ८) ॥
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वृषभ भयौ असवार पुनि, सुन्दर शिव पर आइ ।
डाइन ऊपर जरख चढि, भली दई दौराइ ॥१६॥ 
जब हमारा वृषभ(बैल रूप शरीर) शिव(तमोगुण) पर आरूढ हो जाता है, या लौकिक पदार्थों की अतिशय वासना रूप डायन जरख(भेड़िया=संकल्प विकल्पात्मक मन) पर चढ जाती है तो उसे संसार में इधर उधर दौड़ाती रहती है ॥१६॥ (द्र० - सवैया : २२/छ० सं० ८) ॥
(क्रमशः)

*नाम-महिमा ॥*

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*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*दादू कहै, सो गुरु किस काम का,*
*गहि भ्रमावै आन ।*
*तत्त बतावै निर्मला, सो गुरु साध सुजान ॥*
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*नाम-महिमा ॥*
बैद बुराई कीन्हीं रे, औषद या जिनि दीन्हीं रे ॥टेक॥
करम कटै सो औषद नांहीं, औषद बिषै बिकारा ।
अजाण बैद जोराँ तुलि कहिये, तिहिं मार्यौ संसारा ॥
निर्गुण नींब पिलायौ नांहीं, सरगुण हिरदै धार्यौ ।
इहिं ओसै संसार सवायौ, बैद निपूतै मार्यौ ॥
निर्गुण नाउँ नींब सौ खारौ, या औषद थीबाइ ।
बषनौं कहै बिचारी नांहीं, घी समि सहत खुवाइ ॥५७॥
विषय-विकार, कर्मबंधन रूपी बीमारी को समाप्त करने के लिये वैद्य(गुरु-उपदेशक) ने सही औषधि उपदेश) नहीं दी । वैद्य ने यही सबसे बुरा कार्य किया । जिस औषधि से कर्म कटते हैं, वैद्य ने वह औषधि नहीं दी । उल्टे उसने तो वे औषधियाँ दीं जिनसे विषय-विकारों की ओर अधिक आकर्षण बढ़ता है । आकर्षण राग उत्पन्न करता है तथा राग प्रयत्न करने को प्रेरित करता है ।
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प्रयत्न ही कर्म हैं जो बंधन के हेतु हैं । (यहाँ आत्मसाक्षात्कार से रहित तथा वेदविहित तत्त्वज्ञान के परिपक्व विवेक से हीन गुरु, उपदेशक को ही वैद्य कहा गया है) वस्तुतः ऐसे अज्ञानी वैद्य रूपी गुरु-उपदेशक जोराँ = यम के दूतों के समान हैं जो समस्त संसार के प्राणियों को मार-मार कर यमराज के यहाँ भेजते हैं, यमराज के यहाँ जाने का मार्ग प्रशस्त कर देते हैं ।
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ये उपदेशक निर्गुण-निराकार-परमात्मा की भक्ति रूपी कडुवे नीम को तो खिलाते-पिलाते नहीं हैं उल्टे जिस सगुण-साकार-परमात्मा की भक्ति करने से विषयभोगों में आसक्ति होती है, उस सगुणभक्ति को हृदय में धारण करवाते हैं । सारा संसार ही इसी औषधि = सगुण साकार की भक्ति में सवायौ = पूर्णरूपेण लगा हुआ है जिसके कारण सारा संसार ही अपुत्र की भाँति मरता है । (जिस प्रकार पिता के अपुत्र मरने से गति नहीं होती ऐसे ही सगुण की भक्ति करने से मुक्ति नहीं होती । “सगुणोपासक मोछ न लेही” । यहाँ अज्ञानी वैद्य के उपदेश से अपुत्र मरने का तात्पर्य यही है)
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निर्गुण-निराकार परमात्मा का नाम स्मरण रूपी भक्ति कडुवे नीम के समान है जिसके सेवन से किसी भी प्रकार की कोई भी बिमारी नहीं होती उल्टे व्यक्ति स्वस्थ रहता है । ऐसे ही निर्गुण-निराकार की भक्ति से कर्मों का बंधन कट जाता है तथा मुमुक्षु थीवाइ = मुक्त हो जाता है । वस्तुतः संसारी उपदेशक सम्यक् विचार नहीं करते । वे भक्ति के नाम पर विषयभोगों में वैसे ही आसक्ति उत्पन्न करा देता हैं जैसे कोई वैद्य अज्ञानवश घी में शहद मिलाकर रोगी को खिला देता है और(समान मात्रा में घी-शहद का योग विष बन जाता है । यहाँ नरकगामी होना ही विष बन जाना है ।) जिससे रोगी की मृत्यु हो जाती है ॥५७॥
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“निरगुण सरगुण भगति उभै मधि अंतर जाणूँ ।
सरगुण रूप बिणास अकल निरगुण नित माणूँ ।
सरगुण गाय सिंगार धार बिषिया मन झूलै ।
निरगुण नाँइ अधार भोग राजस गुण भूलै ।
सरगुण सोभा जगत मैं उरै रहै उरझाइ ।
रामचरण महिमा सहित निरगुण निज धर जाइ ॥२॥
ब्रिंदावन मैं बास दास केसौ ज बिचारी ।
अपणुँ सुत परमोधि ग्यान कौ करि अधिकारी ।
ग्रिह कौ धरम निहारि बहुरि पीछै पिछतायौ ।
विषै कै काजि किसन कूँ कामी गायौ ।
बिप्र भयौ सो भूत लाभ सरगुण कौ देखौ ।
निरगुण गाइ कबीर मुकति गयौ जवन बिसेषौ ।
नहीं भेद भगवान कै यौं मुकरि मधि उणिहार । 
ज्यौं देषै ज्यूँ दरसि हैं टेढौ सुध सिणगार ॥३॥
(क्रमशः)

*५. गुरु-शिष्य निदान निर्णय का अंग ~ २५/२८*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*५. गुरु-शिष्य निदान निर्णय का अंग ~ २५/२८*
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*निवाण१ नैण२ मटुकी मुकुर, सजल सूर प्रतिबिम्ब ।*
*रज्जब कफ३ करुणा४ किये, जागे तहाँ विलम्ब ॥२५॥*
जलाशय१ तथा मटकी में पानी, और शीशा में शुद्ध चमक हो तो ही सूर्य का प्रतिबिम्ब पड़ता है किन्तु जहाँ नेत्रों के आडा हाथ३ लगादे वहाँ प्रतिबिम्ब उठने में देर लगती है, वैसे ही गुरु के द्वारा अन्त करण२ में श्रद्धा हो तो ज्ञान जगता है किन्तु जहाँ गुरु उपदेश धारण करने में दुख४ माने वहाँ ज्ञान जगने में देरी होती है ।
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*अनिल१ आगि आनन२ अनंत, पै गर३ हि न कंचन कान ।*
*रज्जब सोनी सद्गुरु, वज्र वारि विधि बान ॥२६॥*
वायु१ अग्नि और मुख२ अनंत हैं किन्तु स्वर्णकार के मुख की वायु और अग्नि से ही सुवर्ण गलता है अन्य किसी से नहीं गलता३, सोनी वज्र के समान कठोर सोना को जल के समान बना देता है, वैसे ही गुरु के मुख की वायु द्वारा बने शब्दों का ज्ञानाग्नि कान के द्वारा प्राणी के अन्त:करण में जाता है तब अज्ञान नष्ट होकर अन्त:करण जल के समान सबके लिये सम हो जाता है ।
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*सब गुरु तीरंदाज है, सेवक मन नीशाण ।*
*रज्जब गुरु कमनैत सो, जा का बैठा बाण ॥२७॥*
२७-३० में कहते हैं, जो शिष्य का उद्धार कर दे वही गुरु है - सभी गुरु बाण चलाने वालों के समान हैं और सेवकों का मन लक्ष्य है, किन्तु जिसका बाण लक्ष्य को ठीक बेधता है, वही अच्छा कमान चलाने वाला होता है । वैसे ही जिसका ज्ञान अज्ञान को नष्ट करदे वही गुरु श्रेष्ठ माना जाता है ।
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*सेवक मन मिहरी१ भया, मर्द मिले गुरु आय ।*
*रज्जब साबित३ सो सही२, जा सौं फल रह जाय ॥२८॥*
सेवक का मन नारी१ के समान है, गुरु मर्द के समान है, जिस मर्द से नारी में गर्भ रूप फल रह जाता है, वही मर्द ठीक२ माना जाता है । वैसे ही जिस गुरु से ज्ञान हो जाता है, वही पूरा३ गुरु माना जाता है ।
(क्रमशः)

शुक्रवार, 20 फ़रवरी 2026

भिवानी चातुर्मास ~

*#daduji*
*॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥*
*॥ दादूराम~सत्यराम ॥*
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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१६ आचार्य दयारामजी ~ 
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भिवानी चातुर्मास ~ 
वि. सं. १९६३ में आचार्य दयारामजी महाराज को चातुर्मास का निमंत्रण भिवानी के मुखरामजी ने दिया । आचार्य दयारामजी महाराज शिष्य संत मंडल के सहित पधारे । भिवानी का चातुर्मास शहर के अनुरुप ही बहुत अच्छा हुआ । भिवानी के चातुर्मास से उठकर आचार्य दयारामजी महाराज ने उतराध मंडल की रामत की । रामत में उतराध मंडल के स्थानधारी साधुओं ने तथा सेवकों ने आचार्यजी का अच्छा सम्मान किया । उतराध की रामत करके  शनै: शनै: भ्रमण करते हुये नारायणा दादूधाम में पधार गये । 
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उदयपुर जमात में चातुर्मास ~ 
वि. सं. १९६४ में आचार्य दयारामजी महाराज का चातुर्मास उदयपुर जमात हुआ । चातुर्मास के सभी कार्यक्रम अच्छी प्रकार चलते रहे । संतों का समागम अच्छा रहा । इस चातुर्मास में चातुर्मास की मर्यादाओं का पूर्णत: निर्वाह होता रहा । समाप्ति पर आचार्यजी को उनकी मर्यादा के अनुसार भेंट तथा शिष्य संत मंडल को यथा योग्य वस्त्रादि देकर सस्नेह विदा किया गया ।  
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लालसोट जमात में चातुर्मास ~ 
वि. सं. १९६५ में आचार्य दयारामजी महाराज का चातुर्मास जमात लालसोट में मोहनदासजी के यहाँ नियत हुआ । चातुर्मास के समय आचार्यजी शिष्य संत मंडल के सहित पधारे तब जमात ने आचार्यजी का सामेला बडे ठाट बाट से किया । चातुर्मास भी बहुत अच्छा हुआ । मोहनदासजी ने संतों की सेवा अच्छी की । समाप्ति पर भी आचार्यजी को भेंट मर्यादानुसार देकर तथा शिष्य संत मंडल को वस्त्रादि देकर सबका अच्छा सम्मान किया और सस्नेह विदा किया । 
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गूलर में चातुर्मास ~ 
वि. सं. १९६६ में आचार्य दयारामजी महाराज को चातुर्मास का निमंत्रण रामरतनजी गूलर वालों ने दिया । आचार्य दयारामजी महाराज शिष्य संत मंडल के सहित गूलर पधारे । गूलर के ठाकुर साहब, रामरतनजी और वहाँ की जनता ने मिलकर आचार्यजी की अगवानी बाजे गाजे से कीर्तन करते हुये की । ग्राम में लाकर ठहराया । रामरतनजी अच्छे महात्मा थे । उनका प्रभाव उस प्रदेश पर अच्छा था । अत: यह चातुर्मास भी अच्छा हुआ । सभी कार्यक्रम मर्यादापूर्वक  हुये थे । अंत में आचार्यजी को मर्यादानुसार भेंट तथा शिष्य संत मंडल को यथा योग्य वस्त्रादि देकर सस्नेह विदा किया । 
(क्रमशः)

२०. विपर्यय कौ अंग ९/१२

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२०. विपर्यय कौ अंग ९/१२
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कमल मांहिं पांणी भयौ, पाणी मांहे भांन ।
भांन मांहि ससि मिलि गयौ, सुंदर उलटौ ज्ञांन ॥९॥
मन या हृदय रूप कमल से भगवद्भक्ति रूप जल प्रकट हुआ । उस प्रेमा भक्ति रूप जल से ब्रह्मज्ञान रूप सूर्य प्रकट हुआ । उस सूर्य से त्रिविध ताप का नाश होकर स्थायी शान्तिरूप शीतल चन्द्र उत्पन्न हुआ । उस शीतल शान्ति से साधक को पूर्ण ब्रह्मानन्द का अनुभव हुआ । अर्थात् मन के शुद्ध होने से उत्पन्न प्रेमाभक्ति द्वारा ज्ञान के प्रकट होने पर सांसारिक त्रिविध ताप निवृत्त हो गया । उसके फलस्वरूप साधक को ब्रह्मसाक्षात्कार का अक्षय सुख अनुभूत होने लगा ॥९॥ (द्र० सवैया : २२/छ० सं० ७) ॥
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धोबी कौं उज्जल कियौ, कपरै बपुरौ धोइ ।
दरजी कौं सीयौ सुई, सुन्दर अचिरज होइ ॥१०॥
साधक का मन रूप धोबी जब निर्मल (निर्विकार) हुआ तो उस निर्मल मन ने साधक की काया को भी निर्विकार कर दिया१ । अर्थात् ज्ञानप्राप्ति से साधक की मननशक्ति बढी तो इस मननशक्ति ने मन को निर्मल कर दिया ।
(१ तु.- श्रीदादूवाणी - मन निर्मल तन निर्मल भाई, आन उपाइ विकार न जाई । (२८वाँ शब्द)
इसी प्रकार, सुरति रूप सूक्ष्म स्थान में भी प्रवेश करने वाली सूई ने जीव रूपी दर्जी को (ब्रह्म के साथ) सी दिया । (उस के साथ ब्रह्म की एकता कर दी ।) इस छोटी सी सूई ने इतना बड़ा काम किया ! ॥१०॥ (द्र० सवैया : २२/छ० सं० ९) ।
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सोनै पकरि सुनार कौं, काढ्यौ ताइ कलङ्क ।
लकरी छील्यौ बाढई, सुन्दर निकसी बंक ॥११॥
यह कैसा आश्चर्य हुआ कि उलटे स्मरण रूप सुवर्ण ने ही मन रूपी सुनार को तपश्चर्या आदि साधनों से तपा कर निष्कलङ्क कर दिया ।
इसी प्रकार, लय समाधि रूप लकड़ी ने बढई (खाती) को छील कर (निर्विकार = निर्दोष) उस का बांका टेढ़ापन (मद) निकाल दिया । अर्थात् प्रभुस्मरण में मग्न कर साधक का कर्मों से संसर्ग मिटा दिया । (ज्ञान द्वारा कर्मों की निवृत्ति से उस की जन्ममरण की परम्परा समाप्त हो गयी ॥११॥) (द्र० सवैया : २२/छ० सं० ९) ॥
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जा घर मैं बहु सुख किये, ता घर लागी आगि ।
सुन्दर मीठौ ना रुचै, लौंन लियौ सब त्यागि ॥१२॥
साधक ने, अज्ञानावस्था में जिस घर (काया) में विविध सुखों का भोग किया था, वही घर अब ज्ञानाग्नि से दग्ध हो (जल) गया । अर्थात् अब देहाभिमान तथा वासनाओं की निवृत्ति हो गयी । अब साधक को मीठा या नमकीन (विषयभोग) रुचिकर नहीं लगते; अतः उन सब का सर्वथा त्याग कर उसने स्वयं को भगवद्भजन में ही एकान्ततः लगा लिया है ॥१२॥ (द्र० सवैया : २२/छ० सं० १०) ॥
(क्रमशः)

*साषी लापचारी की ॥ पतिव्रता-व्यभिचारणी ॥*

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*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*दादू तज भरतार को, पर पुरुषा रत होइ ।*
*ऐसी सेवा सब करैं, राम न जाने सोइ ॥*
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*साषी लापचारी की ॥ पतिव्रता-व्यभिचारणी ॥*
जल पोसौं का आभरण, पहरि किया टुक कोड ।
बषनां बांदी क्यूँ करै, पतिबरता की होड ॥
रांडाँ मिलि मंगल कियौ, मुणिस नहीं घर माँहिं ।
करि सिंगार हसती फिरै, रूली बिगूचै काँहिं ॥१
(१.इनका अर्थ ‘भेष को अंग’ की साषी १ व ३ में देखें ।)
..
आसरड़ी मुख देखि, भेष बणायौ रे ।
कामणि कियौ सिंगार, पीव नहिं भायौ रे ॥टेक॥
पति को बरत निवाहि, निकटि बिराजै रे ।
दुराचारणि थैं दूरि, अलगौ भाजै रे ॥
पतिबरता कै देखि, बदनि उजालौ रे ।
दुराचारणी देखि, मुहड़ौ कालौ रे ॥
लोगाँ माँहिं सुहागणि, कहती डोलै रे ।
कंत न बूझै बात, फीकी बोलै रे ॥
सखियाँ माँहिं सुहाग, महल मैं हूँथी रे ।
मेल्ही माथै मारि, आँजी गूँथी रे ॥
तीरथ बरत अनेक, त्याँह सँगि रलसी रे ।
सत मुणसी ले काठ, कौंण सँगि बलसी रे ॥
पतिबरता कौ बरत, जिहि धन धार्यौ रे ।
बषनां त्याँह की सेज, राम पधार्यौ रे ॥५६॥
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“एकइ धर्म एक व्रत नेमा । कायँ बचन मन पति पद प्रेमा ॥
उत्तम के अस बस मन माहीं । सपनेहुँ आन पुरुष जग नाहीं ॥
मध्यम परपति देखइ कैसे । भ्राता पिता पुत्र निज जैसे ।
धर्म बिचारि समुझि कुल रहई । सो निकृष्ट त्रिय श्रुति अस कहई ॥
बिनु अवसर भय तें रह जोई । जानेहु अधम नारि जग सोई ।
पति बंचक परपति रति करई । रौरव नरक कलप सत परई ॥
छन सुख लागि जनम सत कोटी । दुख न समुझ तेहि सम मो खोटी ॥” 
मानस ३/५/५-९ ॥
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बषनांजी ने जिन विचारों को इस पद में व्यक्त किया है, उनका समर्थन मानस की उक्त पंक्तियाँ बहुत ही उत्तम रीति से करती हैं । वस्तुतः पतिव्रता वह है जो निज इष्ट को ही अपना सर्वस्व समझकर उसी की मन, वचन एव कर्म से भक्ति करता है । इसके विपरीत जो जग दिखावे के लिये नाना वेश बनाकर अनेक देवी-देवों की उपासना करता है, वह व्यभिचारी है ।
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दर्पण में मुख निहार कर व्यभिचारणी कामिनी भेष = अलंकृत कपड़े पहनती तथा अन्यान्य श्रृंगार करती है किन्तु मन में पति के प्रति अनन्य अनुराग नहीं रखती है । पति अपने कर्तव्य का निर्वाह करते हुए रहता तो व्यभिचारणी के साथ घर में ही है (परमात्मा रूपी पति संसारियों के मायासक्त हो जाने पर भी संसारियों पर अकारण दया-कृपा करते हुए उनकी सार-संभार करता है) किन्तु पति, ऐसी व्यभिचारणी पत्नी से अलग रहता हुआ दूर-दूर ही भागता है अर्थात् ऐसी पत्नी से न स्नेह करता है और न संसर्ग ही करता है “ये यथा मां प्रपद्यंते तांस्तथैव भजाम्यहं ।”
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इसके विपरीत जो पतिव्रता पत्नी होती है उसका मुख पातिव्रतधर्म के तेज से आलोकित रहता है जबकि व्यभिचारणी का मुख काला = तेजहीन रहता है । (तेज युक्त = समाज में आदर, श्रद्धा, सम्मान का प्रतीक जबकि तेजहीन = तिरस्कार, अश्रद्धा का प्रतीक) व्यभिचारणी स्त्री अपने आपको समाज में सौभाग्यवती स्त्री के नाम से प्रचारित करती है (सौभाग्यवती = सपतिका, पति-प्रिया) किन्तु पति उससे संसर्ग तो क्या बात तक नहीं करता है जिसके कारण ऐसी व्यभिचारणी पति से फीकी = उल्टी-सुल्टी बोलती है, लड़ाई-झगड़ा करती है ।
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व्यभिचारणी स्त्री अपनी सखियों में सौभाग्यवती स्त्री के रूप में जानी जाती है क्योंकि वह पति के ही महल = मकान में निवास करती है, हूँथी = सोती है । वह सौभाग्यवती स्त्रियों की भाँति आँजी = चोटी गूँथती है तथा माथे में मांग भरती है । (सिंदूर लगाती है) तीर्थ-व्रत रूपी अनेक पुरुषों के संग रलसी-रति प्रसंग करती है ।
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ऐसी सतमुणसी = सौ पुरुषों की स्त्री अनेक पुरुषों से प्रसंग करने वाली व्यभिचारणी स्त्री, बताइये कितने पुरुषों के साथ अथवा किस पुरुष के साथ जल कर अपने सतीत्व को सिद्ध कर सकती है ! जिन स्त्रियों ने पातिव्रत धर्म रूपी धन को अपने जीवन में धारण किया है उन्हीं की सेज रूपी हृदय में परमात्मा का निवास होता है, परमात्मा का प्राकट्य होता है ॥५६॥
(क्रमशः)

*५. गुरु-शिष्य निदान निर्णय का अंग ~ २१/२४*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*५. गुरु-शिष्य निदान निर्णय का अंग ~ २१/२४*
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*काँसी कणजा१ काच लग, बधैं तताई२ माहिं ।*
*जन रज्जब शीतल समय, अस्थल छोड़ै नाँहिं ॥२१॥*
काँसी लाख१ काच यह गर्म२ ही बढ़ते हैं, शीतल होने पर नहीं बढ़ते टूट जाते हैं । वैसे ही शिष्य भी साधन में लग कर साधन संताप से ही ब्रह्म की ओर बढ़ते हैं, साधन न करने से देहाध्यासादिरूप स्थान को नहीं त्यागते, मर ही जाते हैं ।
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*जीव जल हिमगिरि होत है, शक्ति शीत के संग ।*
*सो पाषाण पानी भया, गुरु ग्रीष्म के अंग ॥२२॥*
जैसे शीत से जल हिमालय पर हिम बन जाता है और ग्रीष्म ऋतु में पुन: जल हो जाता है, वैसे ही माया के सम्पर्क से जीव संसारी बन जाता है और गुरु के संग से पुन: ज्ञानी होकर परब्रह्म को प्राप्त हो जाता है ।
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*ज्यों श्रावण सीगणि१ फिर हि, त्यों शठ सुरति संसार ।*
*रज्जब सूधी होय सो, कमणीगर गुरु द्वार ॥२३॥*
श्रावण में वर्षा की आर्द्रता से धनुष१ का काष्ठ कुछ टेढा होता है, फिर आश्विन मास में कमान बनाने वाला कमणीगर उसे सीधा कर देता है, वैसे ही मूर्ख प्राणी की वृत्ति संसार में काम क्रोधाधि विकार रूप वक्रता को प्राप्त होती है, तब गुरु द्वारा ही सीधी की जाती है ।
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*हाथा जोडी गुरु हुं सूं, मूसल मन सु मिलाँहि ।*
*ये इकठे ये ही कर हिं, और हुँ किये न जाँहिं ॥२४॥*
धान कूटते समय मूसल दोनों हाथों को मिला देता है, वैसे ही गुरु भिन्न विचारधारा के दो व्यक्तियों के मन विचार साम्यता द्वारा मिला देते हैं वा मन को ईश्वर में जोड देते हैं, दोनों हाथों को मन ईश्वर को जैसे मूसल और गुरु मिलाते हैं वैसे अन्य कोई भी नहीं मिला सकता ।
(क्रमशः)

गुरुवार, 19 फ़रवरी 2026

किशनगढ पधारना ~

*#daduji*
*॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥*
*॥ दादूराम~सत्यराम ॥*
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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१६ आचार्य दयारामजी ~ 
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किशनगढ पधारना ~  
वि. सं. १९६० में आचार्य दयारामजी महाराज किशनगढ पधारे और अपनी मर्यादा के अनुसार अपने आने की सूचना किशनगढ नरेश को दी । तब किशनगढ नरेश ने अपनी कुल परंपरा के अनुसार आचार्यजी की अगवानी का प्रबन्ध कर दिया । 
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राजाज्ञा से बाबू श्यामसुन्दरलालजी आदि मुसाहिब राजकीय पूरे लवाजमे के साथ आचार्य दयारामजी की अगवानी करने आये और मर्यादापूर्वक  बडे ठाट बाट से ले जाकर घेवर बाग में ठहराया । फिर एक दिन आचार्य दयारामजी महाराज को किशनगढ नरेश ने राज महलों में पधारने का निमंत्रण दिया ।
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आचार्यजी ने स्वीकार कर लिया, तब राजा ने अपने मंत्री को कहा- आचार्य दयारामजी महाराज को राजकीय पूरा लवाजमा और सवारी ले जाकर राजमहल में लाओ । मंत्री ने वैसा ही किया । फिर आचार्यजी को सवारी पर विराजमान कराके किशनगढ नरेश में पहुँचा दिया । दिवान खाने में चौके पर विराजमान करके किशनगढ नरेश ने आचार्यजी के भेंट चढाकर प्रणाम की और अति श्रद्धा भक्ति से हाथ जोडकर आचार्यजी के सामने बैठ गये । 
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नम्र भाव से उपदेश श्रवण किया और शिष्य संत मंडल के सहित आचार्यजी को भोजन कराकर मर्यादापूर्वक घेवर बाग पहुँचा दिया । आचार्यजी कुछ दिन किशनगढ की धार्मिक जनता को उपदेश करते रहे । जनता ने भी आचार्यजी की श्रद्धा भक्ति से सेवा की । फिर किशनगढ से विदा होकर भ्रमण करते हुये नारायणा दादूधाम में पधार गये ।  
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दहलोद चातुर्मास ~ 
वि. सं. १९६१ में आचार्य दयारामजी महाराज को चातुर्मास का निमंत्रण भगवानदासजी दहलोद वालों ने दिया । आचार्यजी ने स्वीकार कर लिया । चातुर्मास का समय समीप आने पर अपने शिष्य संत मंडल के साथ आचार्य दयारामजी महाराज दहलोद पधारे । भगवान्दासजी मर्यादा पूर्वक आचार्यजी की अगवानी करके आचार्यजी को स्थान पर लाये । चातुर्मास मर्यादापूर्वक  आनन्द के साथ समाप्त हो जाने पर आचार्यजी को मर्यादानुसार भेंट तथा संतों को वस्त्र देकर सस्नेह विदा किया  ।
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बीकानेर का चातुर्मास ~ 
वि. सं. १९६२ में महन्त सूरतरामजी बीकानेर वालों ने आचार्य दयारामजी महाराज को चातुर्मास का निमंत्रण दिया । आचार्यजी ने स्वीकार किया और समय पर अपने शिष्य संत मंडल के सहित भ्रमण करते हुये बीकानेर पहुँचे । महन्त सूरतरामजी ने बडे ठाट बाट से आचार्यजी की अगवानी की और स्थान पर ले गये । चातुर्मास आरंभ हो गया । 
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चातुर्मास के कार्यक्रम ठीक समय पर होने लगे । बीकानेर की श्रद्धालु भक्त जनता सत्संग में आकर अति प्रेम से दादूवाणी का प्रवचन सुनती थी । नगर के सेठ रसोइंया देते थे । शिष्य संत मंडल के सहित आचार्यजी को अपने घरों पर मर्यादापूर्वक पूर्ण सम्मान से ले जाकर भोेजन कराते थे । भेंट देते थे और सम्मान से आसन पर पहुँचा देते थे । चातुर्मास समाप्ति पर महन्त सूरतरामजी ने आचार्यजी को उनकी मर्यादानुसार भेंट तथा शिष्य संत मंडल को यथायोग्य वस्त्रादि देकर सस्नेह विदा किया था ।
(क्रमशः)

२०. विपर्यय कौ अंग ५/८

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२०. विपर्यय कौ अंग ५/८ 
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समद समानौं बून्द मैं, राइ मांहे मेर । 
सुन्दर यह उलटी भई, सूरज कियौ अन्धेर ॥५॥
नाम-साधना द्वारा साधक का अतिसुक्ष्म जीवात्मा (बूंद) महान् अप्रमेय ब्रह्म (समुद्र) में समा गया । अर्थात् एवं ब्रह्म की एकता हो गयी । इसी प्रकार, अतिसूक्ष्म ब्रह्माकार वृत्ति रूप राई में अतिशय विशाल मिथ्या जगद्रूप सुमेरु पर्वत समा गया । अर्थात् ब्रह्माकार वृत्ति होते ही जगत् का लय हो गया ।
इसी प्रकार, साधक के हृदय में ब्रह्मज्ञान रूप प्रकाशमय सूर्य के उदित होते ही अज्ञानरूप जगत् के अभाव का अन्धकार छा गया । अर्थात् इस ज्ञानसूर्य ने उथल पुथल किया कि उसके उदय के साथ ही अब तक भासमान संसार का नाश (निवृत्ति) हो गया । (द्र० सवैया : २२/छ० सं० ४) ॥५॥
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मछली बुगला कौं ग्रस्यौ, देखहु याके भाग ।
सुन्दर यह उलटी भई, मूसै खायौ काग ॥६॥
विवेक बुद्धि रूप मछली ने दम्भ (वृथाभिमान) रूप बगुला को अपना भक्ष्य बना लिया । अर्थात् शुद्ध मन हो जाने से, जिज्ञासु की जगद्‌भ्रान्ति मिट गयी । यह उसका सौभाग्य ही है ।
साथ ही, यह भी उलटी रीति हो गयी कि सदा चंचल चपल मन रूप मूषक (चूहा) ने अपनी सब दुर्वासना रूप काक (कौआ) का भक्षण कर लिया । अर्थात् मन की सर्वविध चंचलता मिट जाने से जिज्ञासु की सभी दुर्वासनाएँ निवृत्त हो गयीं ॥६॥ ((द्र० सवैया : २२/छ० सं० ५ पूर्वार्ध) ।
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सुन्दर उलटी बात है, समुझै चतुर सुजांन । 
सूवै काढे पकरि कै, या मिनिकी के प्रांन ॥७॥
साधक की साधना से यह भी लोकव्यवहार के विपरीत ही घटना हो गयी कि उसके सुवासनायुक्त चित्त रूप तोते ने दुर्वासना (तृष्णा) रूप बिल्ली को मार दिया । अर्थात् अन्तःकरण शुद्ध होने से उस साधक की सभी तृष्णाएँ (लौकिक कामनाएँ) विनष्ट हो गयीं तथा उसको ब्रह्मानन्द का सहज अनुभव होने लगा । इस बात को कोई चतुर (साधनाकुशल) ज्ञानी ही समझ सकता है ॥७॥ ((द्र० सवैया : २२/छ० सं० ५)
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गुरु शिष के पायनि पर्यौ, राजा हूवौ रंक । 
पुत्र बांझ के पंगुला, सुंदर मारी लङ्क ॥८॥
वहाँ हुई एक अन्य घटना का श्रीसुन्दरदासजी सङ्केत कर रहे हैं - अब तक अज्ञानावस्था में निमग्न उस साधक का चित्त गुरुपदेश से प्राप्त ज्ञान बल के प्रभाव से उस को सत् शिक्षा देने लगा । अर्थात् सन्मार्ग की ओर प्रवृत्त करने लगा । इसका परिणाम यह हुआ कि राजा प्रजा (रंक) के रूप में परिणत हो गया । अर्थात् ज्ञान प्राप्त होने से जीवात्मा (रंक) पुनः मन (राजा) पर शासन करने लगा ।
साथ ही, एक बात यह भी हुई कि सात्विक बुद्धि रूप बांझ (बन्ध्या) नारी से उत्पन्न ज्ञान रूप पंगुल (लंगड़ा) पुत्र उत्पन्न हुआ, उसने ऊंचे प्राकार (परकोटे) से सुरक्षित लङ्का रूप इस माया मोह से सुरक्षित संसार को जीत लिया । अर्थात् निर्मल बुद्धि के कारण उत्पन्न हुए ज्ञान से साधक का समस्त भ्रमात्मक जगत् नष्ट हो गया ॥८॥ (द्र० सवैया : २२/छ० सं० ६) ॥
(क्रमशः)

*साँच ॥*

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*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*सूरज कोटि प्रकास है,*
*रोम रोम की लार ।*
*दादू ज्योति जगदीश की,*
*अंत न आवै पार ॥*
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*साँच ॥*
धीरौ रे धीरौ मन, अहींठै सै जोइलौ ।
काया माँहैं गुर बतायौ, तिहीं ठाहर होइलौ ॥टेक॥
ग्यान के उजालै देखि, दीपक बालि के ।
बाहिरै क्याँहनैं ढूंढै, घर ही मैं न्हालि रे ॥
जहाँ आसण तहाँ बासण, रह्यौ भरपूरि रे ।
गुर गम बाहिरौ, नेड़ा ही तैं दूरि रे ॥
अहूँ कै पैलै कानैं, धरती कै छेव रे ।
वैलै कानैं गुण गली, पैलै कानैं देव रे ॥
जहाँ जीव तहाँ सीव, ऐकणि बासि रे ।
ब्रह्म बतायौ गुरि, सास कै पासि रे ॥
पाणी पाखै कवल फूल्यौ, चाँद कै परगासि रे ।
दसवैं दवारि देखी, हरि की रहासि रे ॥
लिपै नाहीं छिपै नांहीं, सब थैं न्यारौ रे ।
घटि घटि रमि रह्यौ, सो राम हमारौ रे ॥
जे बाहरि सोइ भीतरि, निहचै करि जाणि रे ।
बषनां बिनाणी बाबौ, लै नैं पिछाणि रे ॥५५॥
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“बधुरात्मात्मनस्तस्य येनात्मैवात्मना जितः ।
अनात्मनस्तु शत्रुत्वे वर्तेतात्मैव शत्रुवत् ॥१६/६ गीता॥
मन को धीरौ = स्थिर कर; मन को निश्चल कर । निश्चल मन में ही परमात्मा को देखा जा सकता है । (हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति) परमात्मा इस शरीर में ही निवास करता है, तीर्थ, मन्दिरादि में नहीं और गुरुमहाराज ने भी काया में ही परमात्मा का निवास बताया है ।
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विवेक रूपी दीपक को जला = जागृत करके = ज्ञान = ब्रह्मात्म्यैक्यात्मक ज्ञान के प्रकाश में उस परमात्मा को देख = जान । उस परमात्मा को बाहर क्यों ढूंढ़ता है, उसे तो घर में ही = घट में ही देख । परमात्मा देश अथवा काल अथवा परिस्थिति के परिच्छेदों से हीन है । अतः उसे ढूंढ़ने इधर-उधर न जाना चाहिये ।
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जहाँ हमारा निवास है, परमात्मा वहीँ वास करता है क्योंकि वह जर्रे-जर्रे में परिव्याप्त है “हरि व्यापक सर्वत्र समाना । प्रेम तैं प्रगट होइ मैं जाना ॥” हाँ, जो लोग गुरु के ज्ञान को ग्रहण नहीं करते उनके लिये परमात्मा अत्यन्त निकट होते हुए भी दूर से दूर है । जिनमें अहंकार की मात्रा अत्यधिक है (एक किनारे से दूसरे किनारे तक अर्थात् प्रारम्भिक बिन्दु से अन्तिम बिन्दु तक) उनके लिये परमात्मा उतनी ही दूर है जितना पृथिवी का दूसरा छोर (पृथिवी गोल है, अतः उसका दूसरा छोर ही नहीं । इसी प्रकार जिनमें अहंकार का प्राबल्य है उनके लिये परमात्मा की प्राप्ति असंभव है । “क्लेशोऽधिकतरस्तेषामव्यक्तासक्त चेतसाम् । 
अव्यक्ता हि गतिर्दुःखं देहवद्भिरवाप्यते ॥ गीता १२/५)
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संसार का पहला कौना त्रिगुणों की सँकरी गली है जिसमें चलने पर जीव उसी में फँस मरता है जबकि दूसरा किनारा राजमार्ग है जिसपर चलने पर देव = परमात्मा की प्राप्ति होती है । जहाँ पर जीव है, वही पर सीव = ब्रह्म है । दोनों एक हैं और एक होने से ब्रह्म ही शरीर में निवास करता है । (जीव और ब्रह्म की एकता चैतन्य के आधार पर है, शरीर के आधार पर नहीं)
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गुरुमहाराज ने ब्रह्म का स्थान श्वास के पास बताया है । (यहाँ श्वास के पास ही में ब्रह्म है, से हठयोग विवक्षित प्राणादि शोधन न होकर श्वास-प्रतिश्वास रामनाम स्मरण है) रामनाम साधना से बिना पानी के ही चंद्रमा के प्रकाश से कमल खिल उठता है । (व्यवहार में सूर्य के प्रकाश में ही जल में कमल खिलता है) हरि का निवासस्थान दसवें द्वारि = ब्रह्मरंध्र में है । वहीं उस हरि को निवास करते हुए दसवें द्वार = ब्रह्मरंध्र में देखा ।
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वह किसी से छिपता नहीं है अर्थात् स्वयं प्रकाशवान है । संसार के जर्रे जरे में परिव्याप्त होते हुए भी निष्काम होने से अलिप्त है “मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्त मूर्तीना । मत्स्थानि सर्वभूतानि न चाहं तेष्ववस्थितः । गीता ९॥४॥ वह परमात्मा सब में होते हुए भी सब से पृथक है । वह राम घट-घट = शरीर-शरीर में व्याप्त है ।
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ऐसा राम ही मेरा इष्ट राम हैं । जो बाहर है, वही भीतर है इसे निश्चित रूप से जान ले । बषनां कहता है अलख, अगोचर परमात्मा को जान ले, प्राप्त कर ले । “सीय राम मय सब जग जानी” मानस ॥५५॥
(क्रमशः)