🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
* दादू सांई को संभालतां, कोटि विघ्न टल जांहि ।*
* राई मन बैसंदरा, केते काठ जलांहि ॥*
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*॥ श्रीहरि: ॥*
दिनांक 4.7.26.
वि. सं. 2083, 'रौद्र' नाम संवत्सर, आषाढ़ मास, कृष्ण पक्ष, चतुर्थी, शनिवार। (गीता दैनन्दिनी अनुसार)।
1- परम श्रद्धेय स्वामीजी श्री रामसुखदासजी महाराजका प्रवचन—
दिनांक— 10.8.95, प्रातः 5.18 बजे।
स्थान— जयपुर।
*विषय— भगवत्प्रदत्त विवेकका आदर करनेसे भगवत्प्राप्ति।*
2- गीता पाठ— गीता पाठ अध्याय 12 श्लोक संख्या 11 से 20 तक।
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जो मनुष्य अपने ज्ञानका, अपनी समझका, अपने अनुभवका आदर नहीं करता है, वह न शास्त्रोंका, न ईश्वरका, न गुरुजनोंका— किसीका भी आदर नहीं कर सकेगा। मनुष्योंको कम-से-कम अपनी समझ, अपनी जानकारीका आदर तो करना ही चाहिए। यह बात सब जानते हैं कि शरीर पैदा हुआ है और समय होने पर निश्चित ही मरेगा, फिर भी इस ज्ञानका आदर नहीं करते हैं। इस बातका अर्थ है कि यह मनुष्य शरीर भगवान् ने जिस विशेष उद्देश्यके लिए दिया है, मनुष्य शरीरमें भगवत्प्राप्तिका मौका दिया है, उसे शरीरके रहते प्राप्त कर लेना चाहिए। ऐसा नहीं करके मनुष्य शरीरमें नहीं करने योग्य कार्य करते हैं, यह अपने विवेककी हत्या है।*
जो मनुष्य अपने ज्ञानका, अपनी समझका, अपने अनुभवका आदर नहीं करता है, वह न शास्त्रोंका, न ईश्वरका, न गुरुजनोंका— किसीका भी आदर नहीं कर सकेगा। मनुष्योंको कम-से-कम अपनी समझ, अपनी जानकारीका आदर तो करना ही चाहिए। यह बात सब जानते हैं कि शरीर पैदा हुआ है और समय होने पर निश्चित ही मरेगा, फिर भी इस ज्ञानका आदर नहीं करते हैं। इस बातका अर्थ है कि यह मनुष्य शरीर भगवान् ने जिस विशेष उद्देश्यके लिए दिया है, मनुष्य शरीरमें भगवत्प्राप्तिका मौका दिया है, उसे शरीरके रहते प्राप्त कर लेना चाहिए। ऐसा नहीं करके मनुष्य शरीरमें नहीं करने योग्य कार्य करते हैं, यह अपने विवेककी हत्या है।**
गांधीजीका एक पत्र अखबारमें छपा, जिसमें लिखा था— 'मैं एक सौ आठ वर्ष तक जीवित रहूँगा।' सेठजी श्री जयदयाल जी, जो गीता प्रेसके उत्पादक, संस्थापक, संरक्षक, संचालक— सब कुछ थे, इस बात पर बोले कि एक सौ आठ वर्ष तक न गांधीजी जीयेंगे, न इतने वर्षों तक मैं जीऊंगा, लिख लो। ऐसे अपने जीवित रहनेका भरोसा किसीको है? यदि नहीं, तो फिर मनुष्य शरीरमें करने लायक असली कामसे क्यों वंचित हो रहे हैं। 'मानहिं मातु पिता नहिं देवा। साधुन्ह सन करवावहिं सेवा॥ जिन्ह के यह आचरन भवानी। ते जानेहु निसिचर सब प्रानी॥'*
गांधीजीका एक पत्र अखबारमें छपा, जिसमें लिखा था— 'मैं एक सौ आठ वर्ष तक जीवित रहूँगा।' सेठजी श्री जयदयाल जी, जो गीता प्रेसके उत्पादक, संस्थापक, संरक्षक, संचालक— सब कुछ थे, इस बात पर बोले कि एक सौ आठ वर्ष तक न गांधीजी जीयेंगे, न इतने वर्षों तक मैं जीऊंगा, लिख लो। ऐसे अपने जीवित रहनेका भरोसा किसीको है? यदि नहीं, तो फिर मनुष्य शरीरमें करने लायक असली कामसे क्यों वंचित हो रहे हैं। 'मानहिं मातु पिता नहिं देवा। साधुन्ह सन करवावहिं सेवा॥ जिन्ह के यह आचरन भवानी। ते जानेहु निसिचर सब प्रानी॥'**
जीनेका तो भरोसा नहीं है और मरनेकी तैयारी नहीं है, और तीसरा कोई मार्ग है नहीं। मनुष्य शरीरमें आकर जो काम करने लायक था, वह कर लिया, अब शरीर रहे या जावे, अपने इसकी गर्ज नहीं रही। 'रज्जब धोखा को नहीं फल दे सूखा खेत।' मनुष्य शरीरमें आकर जो काम करना चाहिए, वह कर लिया, अब मृत्युका भय नहीं है। मृत्युका भय तभी तक रहता है, जब तक मनुष्य शरीरमें जो काम करने आये हैं, वह नहीं किया हो। ऐसी निश्चिन्तता जिसके आ गई है, तो बढ़िया है और जिसके ऐसी निश्चिन्तता नहीं है, उसे तत्परता पूर्वक भगवान् में लग जाना चाहिए। 'नवग्रह चौंसठ जोगनी बावन वीर पर्जंत। काल भक्ष सबको करै, हरि शरणै डरपंत॥'*
जीनेका तो भरोसा नहीं है और मरनेकी तैयारी नहीं है, और तीसरा कोई मार्ग है नहीं। मनुष्य शरीरमें आकर जो काम करने लायक था, वह कर लिया, अब शरीर रहे या जावे, अपने इसकी गर्ज नहीं रही। 'रज्जब धोखा को नहीं फल दे सूखा खेत।' मनुष्य शरीरमें आकर जो काम करना चाहिए, वह कर लिया, अब मृत्युका भय नहीं है। मृत्युका भय तभी तक रहता है, जब तक मनुष्य शरीरमें जो काम करने आये हैं, वह नहीं किया हो। ऐसी निश्चिन्तता जिसके आ गई है, तो बढ़िया है और जिसके ऐसी निश्चिन्तता नहीं है, उसे तत्परता पूर्वक भगवान् में लग जाना चाहिए। 'नवग्रह चौंसठ जोगनी बावन वीर पर्जंत। काल भक्ष सबको करै, हरि शरणै डरपंत॥'**
जड़ चीजोंकी जो चाहना है, वह कामना है और चिन्मय तत्त्वकी इच्छा आवश्यकता है। स्वयंकी जो मांग है, वह आवश्यकता है और शरीर, इन्द्रियाँ, मन-बुद्धिको लेकर जो मांग है, वह कामना है। कामनाकी तो निवृत्ति ही होती है और आवश्यकताकी पूर्ति ही होती है, आवश्यकता अधूरी रहती ही नहीं। मनुष्य मात्रको परमात्मप्राप्ति हो सकती है, यह बात मुझे सन्तोंसे मिली है, शास्त्रोंमें नहीं मिली है। 'जो जिव चाहे मुक्ति को तो सुमरीजे राम। हरिया गैले चालतां जैसे आवे गांव॥' सन्तोंने वाणीमें अपना अनुभव लिख दिया है, ऐसे मनुष्य शरीरको प्राप्त कर अपना उद्धार कर ही लेना चाहिए।*
जड़ चीजोंकी जो चाहना है, वह कामना है और चिन्मय तत्त्वकी इच्छा आवश्यकता है। स्वयंकी जो मांग है, वह आवश्यकता है और शरीर, इन्द्रियाँ, मन-बुद्धिको लेकर जो मांग है, वह कामना है। कामनाकी तो निवृत्ति ही होती है और आवश्यकताकी पूर्ति ही होती है, आवश्यकता अधूरी रहती ही नहीं। मनुष्य मात्रको परमात्मप्राप्ति हो सकती है, यह बात मुझे सन्तोंसे मिली है, शास्त्रोंमें नहीं मिली है। 'जो जिव चाहे मुक्ति को तो सुमरीजे राम। हरिया गैले चालतां जैसे आवे गांव॥' सन्तोंने वाणीमें अपना अनुभव लिख दिया है, ऐसे मनुष्य शरीरको प्राप्त कर अपना उद्धार कर ही लेना चाहिए।*




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