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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२९. अद्वैत ज्ञान कौ अंग ३३/३६
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सुन्दर ज्यौं आकाश मैं, अभ्र होइ मिटि जांहिं ।
त्यौं आतम तैं जगत है; ता ही मध्य समांहि ॥३३॥
श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - जैसे आकाश में बादल आते हैं और चले जाते हैं, वैसे ही यह संसार भी आत्मा में समा जाता है ॥३३॥
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जहं सुन्दर तहं जग नहीं, जग तहं सुन्दर नित्य ।
जहं पृथ्वी तहं घट नहीं, घट तहं पृथ्वी सत्य ॥३४॥
जहाँ संसार की सत्ता हो वहाँ ब्रह्म नित्यरूप से रहता है; परन्तु यह आवश्यक नहीं कि जहाँ ब्रह्म की सत्ता हो वहाँ संसार की सत्ता भी रहे ही ॥३४॥
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वोहं सोहं एक ही, तूं ही हूं ही एक ।
कहिबे ही कौ फेर है, सुन्दर संमुझि बिबेक ॥३५॥
वह(ब्रह्म) और मैं एक ही हैं । इसी प्रकार तूं(जिज्ञासु) और मैं(सद्गुरु) भी एक ही हैं । केवल कथनव्यवहार में भिन्नता दिखायी दे सकती है; परन्तु विवेकपूर्वक चिन्तन करने पर वे एक ही ज्ञात होंगे ॥३५॥
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ज्यौं माता हाऊ कहै, बालक मांनै त्रास ।
त्यौं सुन्दर संसार है, मिथ्या बचन बिलास ॥३६॥
जैसे कोई माता अपने शिशु को भय दिखाने के लिये उस के सामने 'हाउ' ऐसा भयदायक शब्द बोले तो उसे सुन कर वह बालक, भय के कारण काँपने लगता है; वैसे इस संसार का समस्त वाग्विलास(वाणीविस्तार) मिथ्या(भ्रमोत्पादक) ही समझना चाहिये ॥३६॥
(क्रमशः)















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जो मनुष्य अपने ज्ञानका, अपनी समझका, अपने अनुभवका आदर नहीं करता है, वह न शास्त्रोंका, न ईश्वरका, न गुरुजनोंका— किसीका भी आदर नहीं कर सकेगा। मनुष्योंको कम-से-कम अपनी समझ, अपनी जानकारीका आदर तो करना ही चाहिए। यह बात सब जानते हैं कि शरीर पैदा हुआ है और समय होने पर निश्चित ही मरेगा, फिर भी इस ज्ञानका आदर नहीं करते हैं। इस बातका अर्थ है कि यह मनुष्य शरीर भगवान् ने जिस विशेष उद्देश्यके लिए दिया है, मनुष्य शरीरमें भगवत्प्राप्तिका मौका दिया है, उसे शरीरके रहते प्राप्त कर लेना चाहिए। ऐसा नहीं करके मनुष्य शरीरमें नहीं करने योग्य कार्य करते हैं, यह अपने विवेककी हत्या है।*






