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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२८. आत्म अनुभव कौ अंग ५/८
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सदा रहै आनंद मैं, सुन्दर ब्रह्म समाइ ।
गूंगा गुड कैसैं कहे, मनही मन मुसकाइ ॥५॥
श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - साधक भी इस आत्मानन्द में तन्मय(लीन) हो कर, दिव्य अनुभव वैसे ही करता रहता है जैसे गूंगा मनुष्य स्वयं गुड़ खा कर भी उस का माधुर्य दूसरों को नहीं बता पाता । वह केवल अपने मन में मुसकरा कर रह जाता है ॥५॥
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जाकौ निश्चै ऊपजै, अनुभव आतम ज्ञांन ।
सुन्दर सो बोलै नहीं, सहज भया गलतांन ॥६॥
जिस साधक के हृदय में प्रभु परमात्मा का यह साक्षात्कार(ज्ञान) उद्भूत हो जाता है वह निश्चित ही उसके विषय में कुछ कहने की स्थिति में न रह कर दिन रात उसी में लीन रहता है ॥६॥
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जाकौ अनुभव होत है, सोई जानै सार ।
सुन्दर कहैं बनैं नहीं, मुख तैं एक लगार ॥७॥
जिस साधक ज्ञानी को इस प्रभु परमात्मा के साक्षात्कार का अनुभव हो जाता है वह उस का परम तत्त्व(महत्त्व) समझता है । परन्तु वह इस(अनुभव) को दूसरों को बताने में स्वयं को असमर्थ ही पाता है । इस विषय में उस के मुख से एक भी शब्द बोलने की स्थिति नहीं रह जाती ॥७॥
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कामी जानै काम सुख, सोऊ कह्यौ न जाइ ।
आतम अनुभव परम सुख, सुन्दर बचन बिलाइ ॥८॥
लोक में भी हम देखते हैं कि कोई कामभोगी नाना प्रकार के कामभोगों का आनन्द लेता है, परन्तु वह भी उन स्वयं अनुभूत कामभोगों के सुख का अनुभव दूसरों के सम्मुख यथार्थ रूप से वर्णन नहीं कर पाता; क्योंकि यह अनुभवसुख है ही ऐसा कि जिस का वाणी के माध्यम से वर्णन कथमपि नहीं किया जा सकता । उसको आत्मानुभव के यथार्थ वर्णन हेतु कोई यथार्थ शब्द ही नहीं मिलते ॥८॥
(क्रमशः)

















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