शनिवार, 14 मार्च 2026

दादू दयालु महासभा की बैठक

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*॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥*
*॥ दादूराम~सत्यराम ॥*
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
नवमी, दशमी व एकादशी ये उतरार्द्धा के दिन थे । नवमी को प्रात: दादू दयालु महासभा की बैठक हुई । मध्यो में महामान्य राजगुरु पंडित श्री माया प्रसादजी महाराज के सभापतित्व में इतिवृत संभाषा परिषद् हुई । वक्ताओं में से पंडित श्री झाबरमल्ल जी शर्मा भूतपूर्व सम्पादक कलकत्ता समाचार, हिन्दू संसार, अनेक ग्रंथों के लेखक रियासत खेतडी जसरापुर के निवासी व माननीय स्वामी दयानिधि जी आयुर्वेदाचार्य, आनरेरी मजिस्टे्रट, संचालक बाबा काली कमली वालों के आयुर्वेद विभाग ॠषीकेश थे । 
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वक्ताओं ने अपने अपने दृष्टिकोण से साधु समुदाय द्वारा भारतीय जन- समुदाय की अनेक धाराओं से की गई सहायताओं का बहुत ही उत्तम रुप से दिग्दर्शन कराया । अतीत के गौरव का संस्मरण, वर्तमान का पथ प्रदर्शक व भविष्य का निर्मायक  है । दादूजी महाराज से लेकर आजतक परवर्ति काल में इस समाज ने किस प्रकार अपनी साधुता का संरक्षण कर अपना तथा लोक का कल्याण किया, इस पर स्वामी दयानिधि जी का बहुत विस्तृत विवेचन था । उन्होंने अपने उस विवेचन में से थोडा सा भाग  श्रवण कराया था । 
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फिर सभापति जी का सारमय भाषण हुआ । आज व्यायाम प्रदर्शन भी था । दादूपंथी संप्रदाय का एक भाग जो ‘‘नागों की जमात’’ के नाम से प्रसिद्ध है, इस काम में बहुत ही नैपुण्य रखने वाला था । थोडे समय पूर्व तक प्रत्येक जमात में व्यायाम के कई अखाडे रहते थे । लाठी, पट्टा, तलवार, मुग्दर, बन्दूक, मल्ल खेल आदि के अनेक खेल नियम से लोगों को सीखने पडते थे । 
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प्रधानत: दो सौ खंडेतों का दल था, जो सब जमातों के योग से बना हुआ था । आधुनिक पद्धति ने इस क्रम का शैथिल्य कर दिया तो भी अभी इस प्रणाली का स्रोत जमातों में हैं ही । प्रदर्शन में जमातों के कई खंडेत, सीकर, नवलगढ की व्यायाम शालायें, दादू महाविद्यालय के छात्र व उनके प्रमुख शिक्षक स्वामी गोपालजी ने नाना प्रकार के व्यायामों का प्रदर्शन कराया । 
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स्वामी गोपालजी व्यायामाचार्य न केवल प्राचीन व्यायाम के जानकार है प्रत्युत उन्होंने आधुनिक व्यायाम प्रणाली का भी विस्तृत अभ्यास किया है । वे अनेक प्रकार के व्यायामों के शिक्षक हैं । उनके सिखाये हुये छात्रों के प्रदर्शन को सभी लोगों ने बहुत अधिक पसन्द किया । निवाई के खंडेत रामूजी का भी प्रदर्शन अच्छा रहा । व्यायामों के ये प्रदर्शन इसीलिये विशेष रुप से किये गये थे कि हिन्दू जाति के वयस्क  बच्चों में इसका अधिकाधिक  प्रचार हो सके । व्यायाम का यह प्रदर्शन अपने आप में पूरी तरह से सफल रहा । 
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आज रात्रि को पुन: सभा का कार्यारम्भ हुआ । इसमें स्वामी आत्माराम जी व्याकरणाचार्य, वेदान्तशास्त्री दादू महाविद्यालय ने अपना ‘‘दादूजी महाराज और भक्तियोग’’ नाम का निबन्ध सुनाया, जिसमें स्थान- स्थान पर दादूजी महाराज की साखियों का विभिन्न शास्त्रीय वाक्यों से समन्वय किया गया था । एक दो वक्ताओं के उपदेश व भजन के पश्‍चात् इस दिन का कार्य समाप्त हुआ । दशमी को सामयिक  संभाषा परिषद् थी । आज समापितत्व स्वामी रत्नदेव जी उदासीन ने ग्रहण किया था । 
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प्रमुख वक्ताओं  में आज जयपुर के ख्यातनामा, महाराजा संस्कृत कॉलेज के अध्यक्ष, सनातन धर्म के आधार स्तम्भ, प्रख्यात प्रवक्ता महामहोपाध्याय श्री गिरिधर जी शर्मा चतुर्वेदी थे । आपने महात्माओं के अवतरण की स्थिति  के साथ- साथ अवतारवाद का विशद विवेचन शास्त्रीय ढंग से किया । आपकी भाषण शैली के विषय में कुछ कहना अनुपदेश होगा । जनता तथा साधु वर्ग ने आप के प्रवचन का पूरा लाभ उठाया । रात्रि में भजन तथा उपदेश का यथावत् कार्यक्रम रहा । 
(क्रमशः)

२१. समर्थाई आश्चर्य को अंग ९/१२

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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२१. समर्थाई आश्चर्य को अंग ९/१२
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सुन्दर संमरथ राम कौं, कहत दूरि तैं दूरि । 
पलक मांहिं प्रगटै सही, हृदये मांहि हजूरि ॥९॥
श्रीसुन्दरदासजी कहते है - हमारे शास्त्र उन राम को हम से बहुत अधिक दूर(दूरि तैं दूरि) बता रहे हैं; परन्तु इसके विपरीत, हमारा अनुभव यह है कि वे तो हम सब के हृदयों में विराजमान हैं अतः वे हमारे समीप से समीपतम हैं । वे हमारे सङ्कट में घिरने पर क्षण भर में ही साक्षात् प्रकट होने की स्थिति में हैं ॥९॥
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सुन्दर संमरथ राम की, महिमा कही न जाइ । 
देखहु या आकाश कौं, क्यौं करि राख्यौ छाइ ॥१०॥
ऐसे सामर्थ्यशाली उन प्रभु राम की महिमा का वर्णन शब्दों में कौन कर सकता है । उनके असीम सामर्थ्य का यही उदाहरण है कि उन ने, बिना किसी स्तम्भ आदि आधार के, कितना विशाल(लम्बा चौड़ा) यह आकाश पृथ्वी पर आवृत कर दिया है ! ॥१०॥
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सुन्दर अगम अगाध गति, पल मैं बादल होइ । 
गरजै चमकै बिज्जली, बरखन लागै तोइ ॥११॥
उनकी एक अन्य सामर्थ्य का यह अगम्य एवं अबोध्य उदाहरण भी देखो कि वे स्वच्छ आकाश को कुछ ही क्षण में ऐसी घनघोर घटा से आच्छादित कर देते हैं कि वहाँ बिजली कड़कने लगती है और मूसलाधार वर्षा(तोइ = तोय = जल) होने लगती है ॥११॥
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पल मैं कछुव न देषिये, सुद्ध रहै आकाश । 
सुन्दर समरथ रामजी, उतपति करै रु नाश ॥१२॥
कैसे आश्चर्य की बात है कि अभी जहाँ कुछ देर पहले जहाँ स्वच्छ आकाश दिखायी दे वहाँ ये हमारे समर्थ प्रभु चाहें तो एक ही क्षण में साधारण वर्षा से खेतों में खेती लहलहा सकती है या वे ऐसी प्रलयङ्कर वर्षा कर सकते हैं कि उस से बाढ आने के कारण अनेक ग्राम एवं नगर डूब सकते हैं ॥१२॥
(क्रमशः) 

*विनती ॥*

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🌷🙏 *卐सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*तुम बिन तारण को नहीं, दूभर यहु संसार ।*
*पैरत थाके केशवा, सूझै वार न पार ॥*
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*विनती ॥*
भौसागर मेरे राम नरेसा ।
तुम बिन कौंन काढै कर गहि केसा ॥टेक॥
थाघ नहीं भौसागर मांहीं । वारपार सूझै कछु नांहीं ॥
ऊची नीची आवै प्राण रहै न ऊभा । लहरि लहरि मैं, डाभक डूभा ॥
भगति परोहण ऊपरि, चाढीजै । बाँह दे बाँह डूबता काढीजै ॥
तू बोहिथ भौ तारणहारा । बषनां बोल्या यहु बिड़द तुम्हारा ॥६९॥
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हे मेरे प्रियतम राजाराम ! आपके अतिरिक्त मेरे केशों को पकड़कर कौन मुझे संसार रूपी सागर में डूबते हुए को बाहर निकाल सकता है । क्योंकि संसार रूपी सागर की थाघ = सीमा = गहराई की सीमा का तो पता है ही नहीं, इसके एक किनारे से दूसरे किनारे तक की लम्बाई चौड़ाई का भी कुछ पता नहीं चलता है । 
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इस संसार रूपी सागर में वर्तते समय कभी अच्छी स्थिति और कभी बुरी स्थिति मालूम पड़ती है जिसके कारण प्राण = जीव स्थिर नहीं रह पाता है । प्रत्येक क्षण-क्षण में कभी डूबने और कभी जल के ऊपर आने का अनुभव होता है । चित्त डाँवाडोल हो जाता है । डाँवाडोल चित्त से न लोक सुधरता है और न परलोक सुधरता है । संशय की स्थिति बनी रहती है और ‘संशयात्मा विनश्यति’ संशयात्मा का नाश हो जाता है । 
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अतः हे राजाराम ! मुझे आपकी अनन्यभक्ति रूपी नौका में चढ़ा दीजिये । अपना बाँह = आश्रय = सहारा प्रदान करके मुझ डूबते हुए को बाहर निकाल दीजिये । भाव सागर से पार होने के लिये आप जहाज रूप हैं । मैं बषनां इस बात को ठोक बजाकर कहता हूँ क्योंकि आपके बारे में पुराना इतिहास यही कहता आ रहा है, आपका सुयश उक्त प्रकार का ही है ॥६९॥

शुक्रवार, 13 मार्च 2026

*६. गुरु मुख कसौटी का अंग ~ ५/८*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*६. गुरु मुख कसौटी का अंग ~ ५/८*
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*कालबूत१ कसणी२ भई, सेवक साँठी३ जानि ।*
*रज्जब तावे४ तीरगर५, त्यों सद्गुरु की बानि६ ॥५॥*
जैसे तीर बनाने वाले५ साँचे१ से लोह शलाका२ वा लकडी३ को ठीक करके फिर उसे तपा तपा कर लक्ष्य वेधने योग्य बाण तैयार करता है वैसे ही सद्गुरु का स्वभाव६ है, वे साधन कष्ट से शिष्य को तपा४ तपा कर ब्रह्म प्राप्ति के योग्य बना देते हैं ।
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*प्राण पटहूँ उरतू१ करहि, झूठ सांच सा२ साद३ ।*
*दिवसा दे न दझाव हीं, धनि धनि गुरु उस्ताद ॥६॥*
वस्त्र पर उस्तरि१ करने वाला उस्तरि करता है तब वस्त्र साफ हो जाता है, वह२ सफाई ही उसको ठीक होने की निशानी३ है । उस्तरि करने वाला उस्ताद प्रतिदिन उस्तरि करता है किन्तु वस्त्र को जलाता नहीं, धन्य है उसे, वैसे ही गुरु ज्ञानाग्नि से युक्त सत्य उपदेश करते हैं और मिथ्या को भिन्न करके दिखा देते हैं, उपदेश का धारण करना है वही साधक के श्रेष्ठ बनाने का चिन्ह है गुरु प्रतिदिन उपदेश करते हैं किन्तु किसी के अन्तकरण को व्यथित नहीं करते, ऐसे गुरुदेव को बारम्बार धन्यवाद है ।
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*काया कद उरतू किया, गुरु उस्ताद हि ताय ।*
*शंकट में शोभा भई, नर देखहु निरताय ॥ ७॥*
उस्तरि करने वाला उस्ताद वस्त्र पर उस्तरि करता है तब देखो तपाने और दबाने रूप कष्ट से भी वस्त्र से शोभा बढ़ जाती है । वैसे ही गुरु प्रयत्न पूर्वक उपदेश द्वारा साधन कष्ट से साधक के शरीर को शुद्घ करते हैं । हे नरो ! विचार करके देखो, जिनकी भी शोभा हुई है, उनकी साघन कष्ट से ही हुई है ।
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*मन रुपा निर्मल भया, सद्गुरु सोनी हाट ।*
*रज्जब शीशे शब्द सौं, कटै कलंकी काट ॥८॥*
स्वर्णकार चाँदी के मैल को निकालने के लिये उसमें शीशा डालते हैं, शीशा चाँदी के कलंक रूप मैल को निकाल लाता है, इस प्रकार सोनी की हाट पर जाकर चाँदी निर्मल होती है । वैसे ही शिष्य का मन सद्गुरु के उपदेश से निर्मल होता है, सद्गुरु के शब्द मन के कलंक रूप मैल को निकाल देते हैं ।
(क्रमशः)

गुरुवार, 12 मार्च 2026

२१. समर्थाई आश्चर्य को अंग ५/८

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२१. समर्थाई आश्चर्य को अंग ५/८
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सुन्दर संमरथ राम की, मो पै कही न जाइ ।
पलही मैं जल थल भरै, पल मैं धूरि उडाइ ॥५॥
श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - ऐसे समर्थ प्रभु की स्तुति(प्रशंसा) के लिये मेरे पास वैसी शब्दावलि(सशक्त वाणी) ही नहीं है । उन में ऐसा अपूर्व सामर्थ्य है कि वह क्षण भर में घन घोर वर्षा कर स्थल(शुष्क भूमि) को जलमय कर सकते हैं तथा उसके दूसरे ही क्षण उस जलमय भूमि को ऐसी सूखी(जलविहीन) कर देते हैं कि वहाँ सब ओर धूल उडने लगती है ॥५॥
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सुन्दर संमरथ राम कौं, करत न लागै बार ।
पर्वत सौं राई करै, राई करैं पहार ॥६॥
हमारे सर्वप्रथम निरञ्जन निराकार प्रभु राई को पर्वत के रूप में परिवर्तित करने में कोई विलम्ब नहीं लगाते और न उन को किसी विशाल पर्वत को राई के समान सूक्ष्म बनाने में ही कोई विशेष समय लगता है ॥६॥
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सुन्दर सिरजनहार कौं, करतें कैसी शंक । 
रंकहि लै राजा करै, राजा कौं लै रंक ॥७॥
इसी प्रकार वे किसी राजा को रंक(दरिद्र) बनाने में या किसी अकिंचन दरिद्र को सर्वविध ऐश्वर्यसम्पन्न सम्राट् बनाने में कोई विलम्ब नहीं लगाते और न उन को ऐसा करने में कोई भय या शङ्का ही होती है ॥७॥
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सुन्दर सिरजनहार की,  सबही अद्भुत बात । 
गर्भ मांहिं पोखत रहै,  जहां गम्य नहिं मात ॥८॥
उन सिरजनहार के किन किन विशिष्ट कर्मों की प्रशंसा करें । उन के तो सभी कार्य निराले(विशिष्ट) ही हैं । अब देखिये ना ! वह गर्भावस्था में भी हमारी सर्वथा रक्षा करता रहता है, जब कि वहाँ माता तक का भी हाथ नहीं पहुँच पाता ! ॥८॥
(क्रमशः) 

श्रीदादूवाणी का जुलूस ~

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*॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥*
*॥ दादूराम~सत्यराम ॥*
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
श्रीदादूवाणी का जुलूस ~ 
अष्टमी शताब्दी का प्रमुख दिन था । वि. सं. १६०१ की फा. शु. ८ को ही श्रीदादूजी भारत भूमि पर पधारे थे । आज उन्हें ४०० वर्ष हो गये थे । उनका पुनीत उपदेश आज भी संसार के अनन्त क्लेशों से सन्तप्त प्राणियों को पूर्ण शांति प्राप्त कराने का साधन है । 
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आज का प्रमुख आयोजन ‘श्रीदादूजी महाराज की वाणी का जुलूस’ था । क्योंकि  दादूजी का यही सच्चा स्मारक आज तक  उसी रुप में प्रस्तुत है । मंदिर में सुबह ४०१ पाठों की समाप्ति आज ही हुई थी । वहीं से वाणीजी की उतार कर पुस्तक की सवारी आरंभ हुई । सभा मंडप तक सवारी महात्मा अपने शिर पर धारण करके लाये । मंदिर से सभा मंडप तक आचार्य रामलालजी महाराज व संपूर्ण महन्त संत पैदल पैदल वाणीजी की सवारी के साथ थे ।
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सभा मंडप से वाणीजी का आरोहण जमात उदयपुर के गजराज पर हुआ । आचार्य रामलालजी महाराज दूदू के हाथी पर विराजे । अन्य सब संत, महन्त, महात्मा व भक्तजन पैदल सवारी के साथ थे । सब के आगे नौबतें थीं उनके पीछे झण्डा, पश्‍चात् जबूरों की सवारियां थीं । उनके पीछे जमातों के कारखानों के बाजे थे । उनके पीछे साज सज्जा से सज्जित घोडे थे । उनके पीछे किशनगढ स्टेट का बैण्ड बाजा था । 
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फिर दादू पन्थियों की जमातों के शस्त्रवित् जिनको ‘‘खंडेत’’ संज्ञा से सम्बोधन करते हैं, वे अपने अस्त्र शस्त्रों से सुसज्जित अखाडों सहित थे । सीकर तथा नवलगढ से व्यायाम शालाओं के शिक्षक व शिक्षित व्यायाम प्रदर्शक मंडलिये थीं । स्वामी गोपालजी व्यायामाचार्य अपनी दादू महाविद्यालय के छात्रों की व्यायाम मंडली के साथ सम्मिलित थे । 
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उनके पीछे भजन मंडिलयें व दादूराम की ध्वनि करने वाली मंडिलयें थी । स्थान पर व्यायाम का प्रदर्शक बैंड की मधुर ध्वनि व जंबूरों के शब्दों का तुमुल घोष होता जा रहा था । साधु समुदाय व दर्शक सभी दादूजी की परम भक्ति में श्रद्धा से प्रेम विभोर हो रहे थे । इस प्रकार का शांतिप्रद जुलूस अब तक नारायणे में नहीं देखा गया था । यह बात वयोवृद्ध महात्मा व नागरिकों के मुख से मुख से निकल रही थी । 
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नौ बजे सुबह का आरंभ हुआ जुलूस १ बजे वापिस मंदिर में पहुँचा था । छतरियों पर कीर्तन व खेजडेजी के दर्शनों के महत्व का भी आज का ही प्रमुख दिन था । सब लोग निराहार थे । इसलिये आज के दिन अन्य कार्यक्रम स्थगित करना पडे । रात्रि को नाम कीर्तन व भजन जागरण का प्रोग्राम था । सभा मंडप में ही ८ बजे से प्रात: तक नाम कीर्तन व भजन का प्रवाह प्रवाहित रहा । इस प्रकार शताब्दी उत्सव के पूर्वार्द्ध की आज समाप्ति हो गई थी । 
(क्रमशः)

*भक्ति-महिमा ॥*

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*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*दादू पलक मांहि प्रकटै सही, जे जन करैं पुकार ।*
*दीन दुखी तब देखकर, अति आतुर तिहिं बार ॥*
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*भक्ति-महिमा ॥*

सरणैं आया ते काढि न दीया । भौ भान्यौं जन निरभै कीया ॥टेक॥
हा प्रभु हा प्रभु दीन ह्वै भाखी । ताकी लाज सभा मैं राखी ॥
जल थल गिर ज्वाला बहु जाली । प्रह्लाद की पैज पले त्यौं पाली ॥
निहचल राज साध कौं दीया । चलै नहीं धू निहचल कीया ॥
ग्राहि गह्यौ गज सकुंटि आयौ । म्हारौ म्हारौ करतौ धायौ ॥
अंतकालि राम नाम पुत्र हेति लीयौ । जम कौं टालि आपनौं पद दीयौ ॥
गउ जिलाइयौं तमकि बुलायौ । नामदेव की बाहर बीठल आयौ ॥
वै जालै वै गाडण लागा झगड़ौ मचायौ । 
अदग कबीरा राख्यौ देही दाग न लायौ ॥
बखनैं बिड़द तुम्हारौ गायौ । सबल देखि सरणाई आयौ ॥६८॥

भक्ति का शरणागति एक महत्त्वपूर्ण अंग है । आत्मनिवेदनात्मक नवम्भक्ति ही शरणागति है । बषनांजी परमशरण्य परब्रह्म-परमात्मा से स्वयं को अपनी शरण में पुराने इतिहास की स्मृति कराकर रखने का निवेदन करते हैं ।
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वे कहते हैं, हे परात्पर-परब्रहम-परमात्मा ! तेरी शरण में जो भी आये, उन्हें तूने अपनी शरण में रखा है, उन्हें अपनी अभय शरण से कभी भी निकाला नहीं है । उनका भौ = आवागमन का चक्र मिटाकर उन्हें सदा के लिये जन्म-मृत्यु रूप भय से विमुक्त किया है । (शरणागति का रहस्य जितना और जिसप्रकार विभीषण तथा राम के चरित्र से उत्तमरीत्या हृदयंगम होता है उतना अन्य किसी चरित्र से नहीं । शरणागत भक्तों में आदर्श विभीषण तथा शरण्यों में आदर्श श्रीराम का सर्वोच्च है । इस तत्त्व की मीमांसा वाल्मीकि रामायण पर भूषणराज की टीका में अत्युत्तम रीत्या की गई है ।)
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जिस पांचाली द्रोपती ने हा कृष्ण ! हा द्वारिकावासिन् वासुदेव ! पुकारकर तुझसे अपनी लज्जा बचाने की प्रार्थना की थी उसकी भरी सभा में साड़ी बढ़ाकर तूने लाज बचाई थी । प्रहलाद की पैज = प्रतिज्ञा = रामनाम-स्मरण-व्रत जिसप्रकार भी, जैसे भी सुरक्षित रह सकता था, वैसे ही तूने प्रयत्न किये और सुरक्षित रखा । उसे जल से बचाया, थल पर हाथी द्वारा रौंदे जाने पर बचाया, पर्वत से गिराने पर सुरक्षित रखा । और तो और भयंकर अग्नि में जलाने पर भी उसे जलने न दिया, सर्वथा सुरक्षित बचा लिया ।
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सज्जन बालक ध्रुव को निश्चल राज प्रदान किया । उसका राज अचल है । वह कभी भी नाश नहीं होता । अर्थात् ध्रुव को अचल राज ही प्रदान नहीं किया उस स्वयं को भी निश्चल कर दिया । गज को जल पीते समय ग्राह ने पकड़ लिया जिससे गज पर भयंकर संकट आ पड़ा । उसने आपको याद किया । तत्काल मेरा भक्त संकट में है, मुझे तत्काल पहुंचना है, कहते-कहते आप उसके पास पहुँच गये तथा उसकी ग्राह को मारकर रक्षा की ।
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अजामिल नामक पापी ब्राह्मण ने पुत्र के नाम के मिस से मरते समय आपका नाम पुकारा । आपने यमराज के दूतों को भगाकर उस अधमाधम ब्राह्मण अजामिल को अपने बैकुण्ठ लोक में अचल निवास प्रदान किया । जब झूठे आरोप में नामदेव को क्रोधित होकर मुस्लिम हाकिम ने बुलाया तब आपने कुटिया से बाहर निकलकर मृत गाय को जिला दी और नामदेव को कारागार के बंधन से मुक्त करा दिया ।
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हिन्दू कबीर को जलाने की जिद पर अड़ गये । मुस्लिम गाड़ने की जिद करने लगे । दोनों में झगड़ा होने लगा । आपने कबीर की देह के स्थान पर फूल उत्पन्न करके कबीर को अदाग ही कर दिया । उसके शरीर को दाग लगाने की आवश्यकता ही नहीं रहने दी । बषनां आपके सुयश का बखान करता है तथा आपको समर्थ शरण्य(शरणागतरक्षक) जाण कर आपकी शरण में आया है ॥६८॥
(क्रमशः)

*६. गुरु मुख कसौटी का अंग ~ १/४*

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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*६. गुरु मुख कसौटी का अंग ~ १/४*
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गुरु शिष्य निदान निर्णय अंग के अनन्तर गुरु मुख से उपदिष्ट साधन द्वारा होने वाले कष्ट और उससे शिष्य की होने वाली उन्नति तथा परीक्षा का परिचय देने के लिये गुरु मुख कसौटी का अंग कह रहे हैं ।
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*गुरु ज्ञाता परजापती१, सेवक माँटी रूप ।*
*रज्जब रज सौं फेरि कर, घडले कुंभ अनूप ॥१॥*
ज्ञानी गुरु कुंभकार१ के समान है ओर शिष्य मिट्टी के समान है । जेसे कुंभकार पृथ्वी की रज को कूटना आदि कष्ट देकर अनुपम कलश बना देता है, वैसे ही गुरु साधन कष्ट देकर साधारण प्राणी को भी अति श्रेष्ठ संत बना देते हैं ।
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*सेवक कुंभ कुंभार गुरु, घड़१ घड़ काढे खोट ।*
*रज्जब माँहिं सहाय कर, तब बाहर दे चोट ॥२॥*
शिष्य घट के समान है और गुरु कुंभार के समान हैं, जैसे कुंभार घड़े के चोट१ लगा लगा कर उसका दोष निकालता है किन्तु पहले भीतर कपड़ा - युक्त हाथ से सहायता करता है, तब बाहर से थप्पी की चोट लगाता है । वैसे ही गुरु भीतर से हित चाहते हुये ही शिष्यों को साधन का कष्ट देता है ।
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*क्रोध न करहिं कुलाल गुरु, दीसे बहु विधि मार ।*
*रज्जब निपजे पात्र क्यों, बिन कसणी व्यवहार ॥३॥*
कुंभार मिट्टी पर नाना प्रकार के आधात लगाता है किन्तु क्रोध नहीं करता कारण - कूटना, पीटना, तपाना आदि कष्टप्रद व्यवहार करे बिना तो पात्र बनता ही नहीं । वैसे ही गुरु क्रोध न करके ही शिष्य पर कठोर वचन और साधन कष्ट देना आदि व्यवहार करते देखे जाते हैं, कारण, बिना उक्त व्यवहार के शिष्य ब्रह्म साक्षात्कार करने योग्य होता ही नहीं ।
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*सद्गुरु शंका ना करै, जैसे लोह लुहार ।*
*रज्जब मारे महरकर, ताय१ करे तत२ सार३ ॥४॥*
जैसे लुहार लोह पर चोट मारते समय यह शंका नहीं करता कि यह नष्ट हो जायेगा, वह तो लोह को पहले से अच्छा बनाने की भावना से ही तपा१-तपा कर श्रेष्ठ३ बनाता है । वैसे ही गुरु शिष्य को साधन-कष्ट देते समय यह शंका नहीं करते कि - इसकी हानि होगी, वे तो दयापूर्वक वचन-बाण मारते हैं और ज्ञानाग्नि२ से तपा-तपा कर ब्रह्मनिष्ठ बना देते हैं ।
(क्रमशः)

उत्सव उद्घाटन ~

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*॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥*
*॥ दादूराम~सत्यराम ॥*
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
उत्सव उद्घाटन ~ 
मध्यान्ह में तीन बजे शताब्दी उत्सव का उद्घाटन काल था । उद्घाटन आचार्य रामलाल जी महाराज नारायणा दादूधाम द्वारा होना था । किन्तु महाराज सामेले से १ बजे स्थान पर आये थे । वे इस समय तक बिलकुल विश्राम नहीं कर सके थे । अत: उनके निर्देशानुसार मंगलाचरण स्तुति व गायन के पश्‍चात् उनके प्राक्कथन के साथ उत्सव का उद्घाटन समारोह संपन्न हुआ । स्वामी मंगलदासजी ने संक्षेप में आयोजन की आवश्यकता व उत्सव के साप्तहिक कार्यक्रम पर प्रकाश डाला । उद्घाटन समारोह के साथ आज का कार्य समाप्त हुआ । 
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फा. शु. ६ से ११ तक का कार्यक्रम ~ 
फा. शु. ६ से ११ तक प्रतिदिन क्रमानुसार परिषदों का आयोजन था । प्रतिदिन के एक -२ प्रमुख विद्वान सभापति थे । फा. शु. ६ को सन्त साहित्य परिषद् हुई । इसका सभापतित्व वेद दर्शनाचार्य पंडित प्रवर स्वामी गंगेश्‍वरानन्द जी महाराज उदासीन ने सुशोभित किया । इस दिन व्यायाम प्रदर्शन भी हुआ । जिसे देखकर सभी दर्शकों के मुख से धन्यवाद शब्द निकल रहा था । 
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द्वितीय दिन फा. शु. ७ को वाणी समीक्षा परिषद् हुई । इस दिन का सभापतित्व हिन्दी वाचनालय के संस्थापक संगरिया मंडी जाट स्कूल के प्रवर्द्धक एकान्त कर्मठ महात्मा स्वामी केशवानन्द जी ने सुशोभित किया । दोनों दिन व्याख्याताओं में स्वामी सर्वानन्द जी महाराज उदासीन व व्याकरण साहित्य वेदान्ताचार्य स्वामी सुरजनदासजी प्रधानाध्यापक  श्रीदादू महाविद्यालय जयपुर प्रमुख थे । 
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उभय महानुभावों ने क्रमश: सन्त साहित्य पर व वाणी समीक्षा का बहुत ही गवेषणा पूर्ण ढंग से विवेचन किया । संत साहित्य की धारा का वैशिष्ठ क्या है ? श्रीदादूजी महाराज की वाणी में प्रतिपादित विषयों का संकलन किस प्रकार किस रुप में हुआ है, इसका विशद वर्णन मननीय था । 
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उभय सभापतियों के भाषण तो उनके अनुरूप होने ही थे । सभा का आयोजन मध्यो काल में १ बजे से ४ बजे तक का था । श्रोताओं की उपस्थिति प्रतिदिन ४ हजार से ऊपर ही होती थी । षष्ठी की रात्रि को भजन उपदेश व निबन्ध प्रवचन हुआ । सप्तमी की रात्रि को नवयुवक  मंडल का अधिवेशन हुआ । 
(क्रमशः) 

२१. अथ समर्थाई आश्चर्य को अंग १/४

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२१. अथ समर्थाई आश्चर्य को अंग १/४
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सुन्दर समरथ राम है, जे कछु करै सु होइ । 
जो प्रभु कौं कछु कहत है, ता सम बुरा न कोइ ॥१॥
श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - हमारा इष्टदेव प्रभु निरञ्जन निराकार राम ऐसा समर्थ(शक्तिसम्पन्न) है कि वह जो कुछ करना चाहता है कर ही लेता है । ऐसे समर्थ प्रभु की जो मूर्ख निन्दा करता है,  उसके विषय में अपशब्द कहता है उससे बढ़कर अन्य कोई नीच(हीन विचार बाला) नहीं हैं ॥१४॥
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कर्त्तुमकर्त्ता अन्यथा,  सुन्दर सिरजनहार । 
पलक मांहि उतपति करै,  पलक मांहि संहार ॥२॥
उसके विषय में सभी शास्त्र एक स्वर से यही कहते हैं - "वह सृष्टिकर्ता(सिरजनहार) कुछ भी करने में, न करने में या विपरीत करने में सर्वथा समर्थ है१ ।" वह ऐसा शक्तिसम्पन्न है कि वह चाहे तो क्षणमात्र में नयी सृष्टि की रचना कर सकता है, पुरानी सृष्टि का नाश(संहार) कर सकता है ॥२॥ (१ कर्तुमकर्तुमन्यथा कर्तुं समर्थों भगवान् ईश्वर इति प्रोच्यते ।)
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ज्यौं हरि भावै त्यौं करै,  कौंन कहै यह नांहिं । 
अग्नि उपावै पलक मैं, सुन्दर पाला मांहिं ॥३॥
अतः प्रत्येक आस्तिक(भक्त) जन को वही कर्तव्य करना चाहिये जो उन प्रभु को अभीष्ट हो । उस की सत्ता का कौन निषेध करने का साहस कर सकता है । वह इतना सशक्त है कि वह चाहे तो क्षणमात्र में उष्ण(अग्निमय) पदार्थ को हिम(वर्फ) के समान सर्वथा शीतल(ठण्ढा) कर सकता है ॥ (क)
इस दोहा का यह भी अर्थ हो सकता है – 
हरि(भगवान्) जो चाहते हैं कर ही लेते हैं । उन की रचना में कोई यह नहीं कह सकता कि यह रचना यथार्थ नहीं है, या इसमें कोई न्यूनता है ! हरि में क्षणमात्र काल में उष्ण को शीत करने की क्षमता है ॥३॥ (ख)
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ज्यौं हरि भावै त्यौं करै, काले धौले रंग ।
धौले तें काले करै, सुन्दर आपु अभंग ॥४॥
उन को जो कार्य उचित लगता है उस को वे कर ही डालते हैं । वे अनुचित(काले) कर्म को उचित(धौला = धवल, श्वेत) करने की क्षमता(शक्ति) रखते हैं तथा उचित(श्वेत) कर्म को अनुचित(कृष्ण) कर्म में परिवर्तित करने की शक्ति रखते हैं । इतने पर भी उनमें यह विशेषता है कि वे सब करके भी सबसे तटस्थ(अभङ्ग = अस्पृष्ट) है ॥४॥
(क्रमशः) 

*राम-नाम-विस्मरण-फल ॥*

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*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*कबहूँ पावक कबहूँ पाणी, धर अम्बर गुण बाइ ।*
*कबहूँ कुंजर कबहूँ कीड़ी, नर पशुवा ह्वै जाइ ॥*
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*राम-नाम-विस्मरण-फल ॥*
मैं मद भागी राम न ध्यायौ । 
जनमि जनमि ताथैं दुख पायौ ॥टेक॥
चिड़ी कमेड़ि की जोनी दीन्हौं । 
सूकर स्वान कागलौ कीन्हौं ॥
जीव जँत कीन्हौं केती बारी । 
कबहूँ पुरिष कबहुँ भयौ नारी ॥
बहुत बार कियौ ढांढौ ढोर । 
कबहुँ न साध सदा भयौ चोर ॥
बहुत जोनि फिर्यौ हा हा हूँतौ । 
बषनां राम बिसार बिगूतौ ॥६७॥ 
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बषनांजी अधिकांश संसारी जीवों की ओर से कहते हैं, मैं भाग्यहीन हूँ कि मैंने रामजी का भजन-ध्यान नहीं किया और इसीलिये बार-बार जन्मकर व मरकर अनेकों दुख भुगते हैं । बुरे कर्म करने व रामभजन न करने के कारण परमात्मा ने कभी चिड़िया, कभी कमेड़ी = फाखता नामक पक्षी को योनि प्रदान की । कभी शूकर, कभी कूकर तो कभी काक बनाया । 
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जीव-जन्तु = पशु-पक्षी कितनी ही बार बनाया । कभी पुरुष तो कभी नारी बनाया । अनेकों बार ढांढौ-ढोर = पशु बनाया किन्तु मैं सदैव चौर ही बना रहा । कभी भी मैं साधु नहीं बना । 
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(जिस कार्य के लिये व्यक्ति को नियत किया जाये और वह उस कार्य को न करे तो वह व्यक्ति चौर कहलाता है । भगवान ने भजन करने के लिये मनुष्य देह दी है । भगवद्भजन न करके विषयभोग करना चौरी है । भजन करना साधु-सज्जन होने का लक्षण है ।) मैं अनेकों योनियों में मैं हाय-हाय करता भ्रमा क्योंकि मैं बषनां ने रामजी का विस्मरण कर दिया जिसके कारण मैं बिगूतौ = बर्बाद हुआ ॥६७॥

बुधवार, 11 मार्च 2026

*५. गुरु-शिष्य निदान निर्णय का अंग ~ ६५/६७*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*५. गुरु-शिष्य निदान निर्णय का अंग ~ ६५/६७*
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*रोगी को भासे उभय, वैद्यहिं दीसे तीन ।*
*रज्जब ऐसे गुरु शिषहु, कहु सु क्या मिल कीन ॥६५॥*
रोगी को एक से दो दिखे और वैद्य को एक के तीन दिखे तब कहो ? ऐसे वैद्य से रोगी मिलकर अपना क्या भला कर लेगा ? वैसे ही शिष्य से अधिक अज्ञानी गुरु मिल जाये तो ऐसे गुरु शिष्य मिलकर कहो क्या कर लेंगे ? अर्थात दोनों संसार में ही रहेंगे परब्रह्म को प्राप्त नहीं कर सकते ।
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*वैद्य व्यथा बूझे नहीं, पीर न पावे पीर१ ।*
*रज्जब मिलै न नाम गुण, क्यों सु वंदिये वीर२ ॥६६॥*
६६-६७ में अयोग्य गुरु का परिचय दे रहे हैं - वैद्य रोग को न समझ सके और गुरु१ साधक की कठिनता रूप पीड़ा को न समझ सके तो उनमें नाम के अनुरूप गुण तो मिलते नहीं, फिर हे भाई२ ! उन्हें वैद्य ओर गुरु मान कर क्यों वन्दना की जाय ? अर्थात गुरु के लक्षणों बिना गुरु अयोग्य ही माना जाता है ।
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*आशंका अरु घाव, मन मरकट सु दिखाव ही ।*
*अगले मति बिन वानरे, रज्जब ठोर उठाव ही ॥६७॥*
कोई कारण से किसी वानर के घाव हो जाय तो वह दूसरे वानर को दिखाता है, तब देखने वाला वानर यह समझकर कि - यह कोई जन्तु इसके चिपक गया है, घाव को उखाड़ने की सी चेष्टा करता है । जिससे घाव अधिक बढ़ जाता है । वैसे ही शिष्य अपने मन की शंका गुरु को बताता है तो गुरु बुद्धि-हीन होने से उसे तो दूर नहीं कर सकता किन्तु उसके स्थान में और कई शंकाए खड़ी कर देता है । अत: ऐसा गुरु अयोग्य ही माना जाता है ।
इति श्री रज्जब गिरार्थ प्रकाशिका सहित “५. गुरु शिष्य निदान निर्णय का अंग” समाप्त ॥
(क्रमशः)

समितियां ~

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*॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥*
*॥ दादूराम~सत्यराम ॥*
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
समितियां ~
उत्सव की व्यवस्था के लिए सात समितियां बनाई गई थीं । १- स्वागत समिति । २- अतिथि भोजन व्यवस्था समिति । ३- बडे भंडार की व्यवस्था समिति । ४- सभा मंडप निर्माण स. । ५- परिषद् प्रबन्ध स. । ६- दादू वीर दल स. । ७- कार्यालय औषधालय स. । उक्त समितियों ने अपने- २ कार्य तत्परता से संभाल लिये थे । 
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उत्सव का आरंभ ~  
उत्सव का समय वि. सं. २००० फा. शु. ५ से फा. शु. ११ तक एक सप्ताह का निश्‍चित किया था । कार्य संभालने वाले महानुभाव फा. शु. २-३ को ही नारायणा दादूधाम में आ गये थे । खुश्की रास्ते से आने वाले महात्मा भी चतुर्थी के प्रात: मध्यो तक नारायणा दादूधाम में आ गये थे । भैराणा से आने वाले चतुर्थी की शाम तक नारायणा दादूधाम में पहुँच गये थे । 
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जमात उदयपुर अपने पूरे लवाजमे के साथ आई थी । उसका हाथी, निशाण, जंबूरे, नौबत व कारखाना सब उदयपुर से खुश्की रास्ते से आये थे । जमात चानसेन, मोरडा, जमात लालसोट भी अपने- २ पूरे लवाजमे व तम्बू डेरों के साथ आई थी । इन्होंने अपने- २ तम्बू डेरे सभा मंडप के दक्षिण पश्मिोत्तर में लगाये थे । फा. शु. ४ को शाम को नारायणे ग्राम में एक नया नारायणा और निर्मित हो गया था । आस पास के गावों के दर्शक पंचमी का सामेला देखने बहुत अधिक संख्यामें आये थे । पंचमी को प्रात: आचार्य रामलाल जी महाराज के सामेले का आयोजन था । 
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सामेला ~ 
संपूर्ण जमातें अपने- २ लवाजमे के साथ सामेले में सम्मिलित हुई थीं । स्वामी गोपालजी व्यायामाचार्य दादू महाविद्यालय के छात्र मंडल को व्यायाम सामग्री से सुसज्जित करके लाये थे । जमात उदयपुर के हाथी पर निशाण था । आचार्य रामलालजी महाराज दूदू ठाकुर साहब के हाथी ऊपर सिंहासन पर विराजमान थे । घोडे, ऊंट, रथ, बहल आदि सैंक़डों सवारियों की कतार लगी हुई थी । 
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लगभग चार हजार साधुओं का समुदाय व लगभग दश हजार दर्शकों का समूह, सामेले में सम्मिलित था । प्रात: नौ बजे रवाना होकर करीब १ बजे आचार्य रामलाल जी महाराज बारहदरी पधारे थे । आचार्य जी का सामेला वैसे तो प्रतिवर्ष ही मेले के समय नारायणा में होता है पर देखने वाले कहते थे कि यह सामेला अभूतपूर्व है । इस प्रकार शांत व जन समूह सहित सामेला पचासों वर्षों में देखने में नहीं आया था । 
(क्रमशः) 

२०. विपर्यय कौ अंग ४८/५०

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२०. विपर्यय कौ अंग ४८/५०
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ऊजर मैं बस्ती भई, बस्ती भई उजारि । 
सुन्दर उलटे पेच कौं, पंडित देखि बिचारि ॥४८॥
अब हमें निर्जन एकान्त स्थान ही साधना के अनुकूल लगने लगा, तथा सांसारिक लोगों की भीड़ से अरति(ग्लानि) होने लगी१ । हमारी चर्चा में इस विपरीतता का यथार्थ कोई ज्ञानी जन(विवेकी) ही समझ सकता है; साधारण (सांसारिक) जन के लिये इस का समझना बहुत टेढी खीर है ॥४८॥ 
(१ तु० – श्रीमद्भगवद्गीता : विविक्तदेशसेवित्वम् अरतिर्जनसंसदि । - भ० गी० १३/१० 
अथवा –
विविक्तदेशसेवी लध्वाशी यतवाक्कायमानसः ॥
ध्यानयोगपरो नित्यं वैराग्यं समुपाश्रितः ॥ - भ० गी० १८/५२.)
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नीच सु तौ ऊंचौ भयौ, ऊंचौ हूवौ नीच ।
सुन्दर उलटौ ज्ञान है, इनि साखिन कै बीच ॥४९॥
गुरुपदेश के प्रभाव से साधक की चर्चा में वैपरीत्य आ ही जाता है । साधना से पूर्व कुसङ्ग के कारण जो हीनचरित्र दिखायी देता था वही अब सत्सङ्ग करने से उत्तम चरित्र लगता है । परन्तु साधनाभ्यास से पूर्व जो कुसङ्ग उस की दृष्टि में उच्च था उसे ही अब वह फूटी आँखों से भी नहीं देखना चाहता । यह सब गुरु के उपदेश का ही माहात्म्य है ।
ऊपर की सभी साषियों से महात्मा ने अपना यही भाव प्रकट किया है ॥४९॥
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सुन्दर सब उलटी कही, संमुझै संत सुजांन । 
और न जांनै बापुरे, भरे बहुत अज्ञांन ॥५०॥
इति बिपर्ज्जय को अंग ॥२०॥
इन उपर्युक्त सभी ४९ साथियों से सन्तों की जिस चर्चा का बोध कराया है, महात्मा सुन्दरदाससी कहते हैं - इसका महत्त्व कोई ज्ञानी सन्त ही समझ सकता है । अन्य किसी साधारण पुरुष का यह सामर्थ्य नहीं है कि वह इसका यथार्थ मर्म समझ सकें; क्योंकि उसकी बुद्धि पूर्णतः अविद्या(अज्ञान) से आवृत है ॥५०॥
इति विपर्यय को अंग सम्पन्न ॥२०॥
(क्रमशः) 

*साँच ॥*

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*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*आयु घटै घट छीजै काया, यहु तन भया पुराना ।*
*पाँचों थाके कह्या न मानैं, ताका मर्म न जाना ॥३॥*
*हंस बटाऊ प्राण पयाना, समझि देख मन मांहीं ।*
*दिन दिन काल ग्रासै जियरा, दादू चेतै नाँहीं ॥४॥*
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*साँच ॥*
त्राहि त्रिष्ना तऊ न भागी, बूढा हुवा घणेरी लागी ॥टेक॥
नैंन नीर श्रवणाँ नहिं सुणिये, देही काँपै आव घटी ।
नाड़ी डग डग डोलण लागी, मन की कामना तउ न मिटी ॥
असी बरस कौ औषदि मांगै, बैद मिलै कोइ आणौं रे ।
खाट पड्यौ ही खुरदा बरजै, जे खरच्या तौ थे जाणौं रे ॥
साधू संगति कदे न बैठा, स्वारथ लागै कर्म किया ।
राम नाम कौ मरम न जाण्यौं, किहीं पुरातनि पाप लिया ॥
तरणापै तरणी बुधि आई, बालपणैं बुधि बाली ।
बूढा हुवा बुढावलि लागी, सक्यौ न राम सँभाली ॥
हावड़ि धावड़ि कदे न चूकी, जदि कौ कलि में जनम लियौ ।
बषनां हरि कौ नाँव न जान्यौं, जातौ सगली मेल्हि गयौ ॥६६॥
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त्राहि = हाय ! इतना सब कुछ प्राप्त कर लेने के उपरान्त भी तृष्णा निश्शेष नहीं हुई, उल्टे वृद्धावस्था आने पर और अधिक बढ़ गई है । आंखों में जल आने लगा है, कानों से सुना नहीं जाता है, देह अत्यन्त कृश हो जाने से काँपने लगी है तथा आयु क्षीण हो गई है । नाड़ = गर्दन हिलने लगी है । फिर भी मन की कामना मिटी नहीं है । शरीर सर्वथा जर्जरीभूत हो गया है किन्तु मन अब भी युवा है तथा नाना कामनाओं को पूरा करना चाहता है ।
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अस्सी वर्ष का बुढ्ढा अस्वस्थ होने पर स्वस्थ होने के लिये औषधि मांगता है और कहता है कि कोई अच्छा सा वैद्य मिलता हो तो उसे बुला लाओ ताकि वह सही निदान करके उपयुक्त औषधि देकर मुझे पूर्णरूप से स्वस्थ कर दे । मरणासन्न अस्सी वर्ष के वृद्ध की धन में अब भी इतनी ममता है कि वह चारपाई पर पड़ा-पडा भी छोटे से छोटे खर्चे को करने से भी रोकता है तथा कठोरतापूर्वक परिवारजनों से कहता है कि यदि तुमने जरा भी धन व्यय किया तो फिर जानते ही हो, मेरे से बुरा और कोई नहीं होगा ।
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धन का लालची साधुओं की संगति में सत्संग सुनने को कभी भी नहीं बैठा । बस स्वयं की उदरपूर्ति हेतु ही नाना कर्मों को करने में लगा रहा । सत्संग में बैठकर राम नाम जप के मर्म = महत्त्व तथा उसकी साधना की विधि को किन्हीं पुराने पापों के कारण जाना ही नहीं ।
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तरुणावस्था में तरुणी को भोगने की बुद्धि, बालकपन में बाली = कच्ची = खेलने-कूदने की बुद्धि तथा बृद्धावस्था में बुढावलि = बकवाद =अनावश्यक बोलने की बुद्धि बनी रहने से कभी भी रामजी का स्मरण नहीं कर सका । हावड़ि = धावड़ि = हाय-हाय तबही से चूकी = समाप्त नहीं हुई जब से इस कलिकाल में जन्म लिया है ।
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बषनांजी कहते हैं, मूर्ख संसारी मनुष्य ने घर-धन्धे में उलझकर रामजी के नाम का स्मरण कभी भी नहीं किया और जिस धन-दौलत, मान-प्रतिष्ठा, घर-परिवार के लिये सारी उम्र प्रयत्न करता रहा उसे मरते समय यहीं संसार में ही छोड़ गया, साथ में एक तिनका भी लेकर नहीं गया ॥६६॥

*५. गुरु-शिष्य निदान निर्णय का अंग ~ ६१/६४*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*५. गुरु-शिष्य निदान निर्णय का अंग ~ ६१/६४*
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*रज्जब बिक्त१ रूप गुरु बहु मिलै, शिष चखि२ वोत३ न कोय ।*
*एकै सद्गुरु सूर सम, तिमिर हरै त्रयलोय ॥६१॥*
रात्रि में जुगनू१ बहुत दिखाई देते हैं किन्तु उनसे अंधकार नाश होकर नेत्रों२ को स्पष्ट वस्तु दर्शन का आनन्द३ नहीं मिलता, एक सूर्य के उदय होने से ही त्रिलोक का अंधकार नष्ट होकर स्पष्ट भासने का आनन्द प्राप्त होता है । वैसे ही गुरु तो बहुत मिलते हैं, किन्तु उनसे शिष्यों का अज्ञान नाश द्वारा आनन्द नहीं मिलता । वह तो सद्गुरु प्राप्त होने पर ही मिलता है ।
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*गुरु अनन्त शिष हूँ घणे, पै सद्गुरु भेटैं भाग ।*
*रज्जब रागी बहु मिलैं, पै विरलहु दीपक जाग ॥६२॥*
६२ में सद्गुरु भाग्य से ही मिलते हैं, यह कहते हैं - गायक तो बहुत ही मिलते हैं किन्तु दीपक राग गान से दीपक किसी विरले से ही जगता है वैसे ही गुरु भी बहुत मिलते हैं, शिष्य भी बहुत है किन्तु शिष्य के हृदय में ज्ञान दीपक जगाने वाला कोई विरला ही सद्गुरु होता है और वह किसी भाग्यशाली शिष्य को ही भाग्यवश मिलता है ।
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*बहुते स्वामी शैल१ सुत२, के३ पारस गुरु जान ।*
*रज्जब पलटे लोह शिष, तिनका होय बखान ॥६३॥*
६३ में अयोग्य और योग्य गुरु का परिचय दे रहे हैं - बहुत से गुरु रूप स्वामी तो पर्वत के पत्थर के समान हैं, जैसे पर्वत१ के पत्थर२ लोह नहीं बदलता, वैसे ही उनसे शिष्य नहीं बदलता, किन्तु कोई३ विरला ही सद्गुरु पारस के समान होता है, पारस से लोह सुवर्ण हो जाता है, वैसे ही सद्गुरु से ज्ञान द्वारा शिष्य का हृदय बदल जाता है, भेद से अभेद में आजाता है । जो उक्त रीति से शिष्य को बदल देते हैं, उन्हीं का यश-गान किया जाता है ।
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*वैद्य व्यथा में आप ही, रोगी चीन्हैं नाँहिं ।*
*रज्जब दोन्यों दृष्टि बिन, पचन भये गल१ माँहिं ॥६४॥*
६४-६५ में अयोग्य गुरु शिष्य का परिचय दे रहे हैं - वैद्य स्वयं भी रोगी हो और रोगी भी यह नहीं जान सके कि वैद्य भी रोगी है, तब दोनों ही रोगाग्नि से संतप्त होकर नष्ट होते हैं । वैसे ही गुरु भी अज्ञानी हो और शिष्य भी न जान सके कि गुरु भी अज्ञानी है तब दोनों ही ज्ञान दृष्टि बिना भावग्नि से पक कर संसार दशा में ही नष्ट१ होते हैं ।
(क्रमशः)

 

सोमवार, 9 मार्च 2026

वाणीपाठ ~

*#daduji*
*॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥*
*॥ दादूराम~सत्यराम ॥*
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
वाणीपाठ ~  
शताब्दी उत्सव के कार्यक्रम में एक अंग ‘श्रीदादूवाणी’ के  ४०१ पाठ भी थे । पाठों का आरंभ माघ शुक्ला ५ को नारायणा दादूधाम में किया गया । इसके लिये १५ संत नियुक्त किये गये । एक पाठ अखण्ड दिन रात चलता था । शेष खुले होते थे । संत लोग उत्साह पूर्वक पाठ करने लगे ।  
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सभा मण्डप ~ 
शताब्दी उत्सव समिति ने सभा मण्डप योजना स्वीकृत की थी । तद्नुसार- तपस्वी चौक, विरक्तों की बारहदरी, छतरियें, बागर तथा तालाब के बीच का मैदान सभा के लिये चुना गया । तालाब से पश्‍चिम की ओर थोडी जगह छोडकर १५० फुट चौ़डाई व तीन सौ फुट लम्बाई का चौक उपयोग में लाया गया । 
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पंडाल के लिए राव राजा जी सीकर, डिग्गी ठाकुर साहब, दूदू ठाकुर साहब, चौमू साहब, बडे गाँव ठाकुर साहब व नारायणा दादूधाम के तम्बू डेरे, छोलदारी कनातों का सामान प्राप्त हुआ था । इसी सामग्री से उत्तम व सुन्दर सभा मंडप की रचना हो गई थी । सभा मंडप का पूरा स्थान इतना था कि उसमें करीब सात आठ हजार व्यक्ति बैठ सकते थे । 
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मंडप में एक मुख्य द्वार पश्‍चिमाभिमुख तथा दो लघु द्वार उत्तर दक्षिण थे । मंडप में बल्ली, बांस, रस्सी, सफाई व मजदूरी का ही व्यय हुआ था । वस्त्र संबन्धी व्यय बिल्कुल नहीं हुआ था । बल्लियों में भी सौ बल्ली माधवलालजी फुलेरे वालों ने उपयोग में लाने के लिए ऐसे ही दी थी । 
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मंडप के दो भाग थे । प्रमुख(मंच) भाग, साधारण भाग । प्रमुख भाग के लिए एक चबूतरा दो फुट ऊंचा, १५० फुट लम्बा ५० फुट चौडा बनाया गया था । शेष भाग भूमि के धरातल का था । मंडप के मध्य में माननीय सन्त श्री किशनदासजी बीकानेर निवासी के सुयोग्य शिष्य स्वामी नारायणदासजी आयुर्वेदाचार्य संचालक दादूदयाल फार्मेसी बीकानेर द्वारा इस आयोजन के लिए बनवाया हुआ श्री दादूजी महाराज का छ: फुट तीन फुट का सुन्दर चित्र शोभायमान था । चित्र दादूजी महाराज का वृद्ध भगवान से उपदेश ग्रहण करते समय का था ।
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दादू वाणी की महत्व पूर्ण साखियों के बोर्ड स्थान- २ पर लगे हुये थे । बावन थामों की नामावली व सिद्ध महात्मा योगी, तपस्वी, शूरवीर, विद्वान, भजनीक, मंडलेश्‍वर, कला- विदों की सूचियें सम्प्रदाय के महान् अतीत की स्मृति को जाग्रत कर रही थी । मंडप की चार दिवारी कनातों की थी । इसकी सब कनातें दूदू ठाकुर साहब से प्राप्त हुई थीं । 
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सभा मंडप के निर्माण में सबसे अधिक सहायता दूदू ठाकुर साहब से प्राप्त हुई थीं । मंडप के आगे, पश्‍चिम में, दक्षिण में व उत्तर में तम्बू डेरे थे व छोल दारियों की पंक्तियें लगाई गई थीं । विशेष अतिथियों के लिये कानडदासजी के चौभीते में डेरे, छोलदारियों का प्रबन्ध किया था । 
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गृहस्थ अतिथियों के लिए व गणमान्य अतिथियों के लिए अन्य कई स्थानों की व्यवस्था की गई थी । कानडदासजी का चौभीता, महात्मा हरजीरामजी का महल, तपस्वी चौक से स्वामी रतिरामजी की हवेली तक के सम्पूर्ण स्थानों तक शताब्दी उत्सव व्याप्त था । सभा मंडप से राम चौक तक ध्वजा पताकायें लहरा रही थीं । माघ शु. १३ से फा. शु. ३ तक  सभा मंडप बन गया था । 
(क्रमशः)

२०. विपर्यय कौ अंग ४५/४७

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२०. विपर्यय कौ अंग ४५/४७
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सुन्दर बरिखा अति भई, सूकि गई सब साख । 
नींव फल्यौ बहु भांति करि, लागे दाड्यौं दाख ॥४५॥
अमृतमय गुरुज्ञानापेदश की अतिशय वृष्टि के प्रभाव से, साधक द्वारा साधनचतुष्टय करने से, उस के विषयभोगादिक की खेती सूख गयी । परन्तु वहाँ भी यह अतिशय आश्चर्यमय घटना हुई कि जहाँ कटु रस से परिपूर्ण नीम का वृक्ष फला फूला(हरा भरा) ही खड़ा रह गया तथा अब उस में अनार, अमरूद, अंगूर(दाख) आदि(अमानित्व, अदम्भित्व, अहिंसा, क्षान्ति) फल दिखायी देने लगे ॥४५॥ (इस साषी का सवैया में व्याख्यान नहीं हुआ ।) ॥
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मिष्ट सु तौ करवौ लग्यौ, करवो लाग्यौ मीठ । 
सुन्दर उलटी बात यह, अपनै नैंनहि दीठ ॥४६॥
अब महात्मा श्रीसुन्दरदासजी अधोलिखित तीन साषियों से इस 'विपर्यय' पर अपना अनुभव सुनाते हैं -उस गुरुज्ञानोपदेश का हम पर भी यह प्रभाव हुआ कि पहले(गुरुपदेश सुनने से पूर्व) हमें जो सांसारिक भोग मधुर(अनुकूल) प्रतीत होते थे, वे ही अब(गुरु से ज्ञानोपदेश प्राप्ति के बाद) वे ही कटु(त्याज्य) लगने लगे, जिन त्याग, वैराग्य आदि से उपेक्षा या घृणा(कटुता) थी वे ही गुण अब मधुर(ग्राह्य) लगने लगे । हमारे जीवन में भी, उस ज्ञानोपदेश के प्रभाव के कारण, यह विपरीत घटना हुई । इतना ही नहीं; हमने स्वयं यह वैपरीत्य अपने गुरुजनों की पवित्र चर्चा में भी अपनी आंखों देखा है ॥४६॥
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मित्र सु तौ बैरी भये, बैरी हूये मिंत । 
सुन्दर उलटी बात सौं, भागी सबही चिंत ॥४७॥
इस ज्ञानोपदेश के हमारी बदली हुई जीवनचर्या के कारण पहले जो मोह, ममता, मित्र कलत्र आदि हमारे अनुकूल(प्रिय) थे वे आज हमारे बैरी(विरोधी) बन गये; तथा उस समय जो(साधु, सन्त, सच्छास्त्र आदि) वैरी प्रतीत होते थे वे ही अब हमारे मित्र(सुहृत्) बन गये । तथा सबसे बड़ी बात यह हुई कि उस गुरुपदेश के प्रभाव से हमारी सर्वविध सांसारिक चिन्ताएँ(वासना) पूर्णतः निवृत्त हो गयीं ॥४७॥
(क्रमशः)

*उपदेश ॥*

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*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल**साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*मेरी मेरी करत जग खीना, देखत ही चल जावै ।*
*काम क्रोध तृष्णा तन जालै, तातैं पार न पावै ॥टेक॥*
*मूरख ममता जन्म गमावै, भूल रहे इहिं बाजी ।*
*बाजीगर को जानत नांही, जन्म गंवावै वादी ॥*
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*उपदेश ॥*
देखि जनम ज्यूँ हार्यौ रे ।
मेरी मेरी करि करि बौरे, राम बिसार्यौ रे ॥टेक॥
राचि माचि रह्यौ मैं बड मैं बड, कारिज न सार्यौ रे ।
पूत कलित धन जोबन माया मैं, गरबि गलार्यौ रे ॥
इंद्र्याँ कौं स्वारथ बहु कीनौं, पेट पसार्यौ रे ।
परधन परदारा परपँच तैं, मन नहिं मार्यौ रे ॥
गरब सरब सुख संपति माँहीं, हरि न निहार्यौ रे ।
मरती बार बिसूरण लागौ, धरणि उतार्यौ रे ॥
बालापणि तरणापैं बुढपणि, हरि न संभार्यौ रे ।
बषनां पहली बात बिगाड़ी, पछै पुकार्यौ रे ॥६५॥
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संसारासक्त जीव को उपदेश देते हुए कहते हैं, हे मूर्ख जीव ! उन बातों पर गंभीरतापूर्वक विचार कर जिनके कारण तूने देवदुर्लभ मनुष्य जन्म व्यर्थ ही बर्बाद कर दिया है । वस्तुतः हे बौरे = बावरे = मूर्ख मनुष्य ! तूने इस नश्वर संसार को जो न हमारा था, न है और न आगे होगा को अपना कह-कहकर, मान-मानकर उस परमात्मा को बिसार दिया है जो हमारा था, है और सदैव रहेगा ।
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मैं पैसेवाला हूँ, मैं धनवान हूँ, मैं जनवान हूँ, मैं समाज में प्रतिष्ठित व्यक्ति हूँ, मैं बुद्धिमान हूँ आदि नाना प्रकार के बडप्पन जन्य अहंकारों में राचि-माचि = आकंठ = पूर्णरूपेण डूबा हुआ है जिसके कारण उस कार्य को संपादित नहीं कर पाया जिसके लिये परमातमा ने अहैतुकी कृपा करके मनुष्य जन्म दिया है ।
“कबहुँक करि करुणा नर देही ।
देत ईस बिनु हेतु सनेही ॥”
“एहि तन करि फल विषय न भाई ।
स्वर्गउं स्वल्प अंत दुखदाई ॥”
असौ मया हतः शत्रुर्हनिष्ये चापरानपि ।
ईश्वरोऽहमहं भोगी सिद्धोऽहं बलवान्सुखी ॥
आढ्योऽभिजनवानस्मि कोऽन्योऽस्ति सदृशो मया ।
यक्ष्ये दास्यामि मोदिस्य इत्यज्ञानविमोहिताः ॥ गीता १६/१४-१५॥
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वस्तुतः हे मूर्ख मनुष्य ! तू तो पुत्र, पत्नी, धन, यौवन, माया = ऐश्वर्यादि के मद में मस्त होकर गर्जता फिर रहा है । इन्द्रियों को तृप्त करने के लिये ही तूने नाना विस्तारवाले अनेक व्यापार = धन्धे, कार्य-व्यवहार कर रखे हैं । दूसरों के धन व स्त्रियों को हड़पने के लिये प्रपंच-पाखंड से तूने मन को विरत कभी किया ही नहीं है ।
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सर्वरूपेण सुख संपति के गर्व में ही गरक हुआ पड़ा है । हरि = परात्पर-परब्रह्म को जानना तो दूर जानने का प्रयत्न तक तूने नहीं किया है । जब मरने लगता है और घरवालों द्वारा चारपाई पर से धरती पर उतार लिया जाता है तब अपने पूर्वकृत कर्मों को स्मरण कर-करके दहाड़ दे-देकर रोने लगता है कि हाय ! जिनको मैं अपना मानता था, जिनको प्राप्त करने में मैंने इतना भारी परिश्रम किया है, वे सभी मेरे से छूट रहे हैं । हाय मैं क्या करूँ ? जिस शरीर को मैं अपना समझता था, वह भी मेरे साथ नहीं जाकर यहीं छूटे जा रहा है । हाय ! हाय !! मेरे प्रयत्न व्यर्थ हुए जा रहे हैं ।
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कितना मूर्ख रह गया मैं कि मैंने न बालकपन में, न युवावस्था में, न जवानी में और न ही वृद्धावस्था में परमात्मा का भजन-स्मरण किया है । बषनांजी कहते हैं अवसर रहते भजन-स्मरण न करके पहले ही मूर्ख मनुष्य ने अपनी बात को बिगाड़ ली जिसके कारण अंत समय में उसे पुकारना पड़ रहा है, पश्चाताप करना पड़ रहा है । “समय चुके पुनि का पछिताने ॥” ६५॥

*५. गुरु-शिष्य निदान निर्णय का अंग ~ ५७/६०*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*५. गुरु-शिष्य निदान निर्णय का अंग ~ ५७/६०*
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*पान फूल फल तरु लगै, त्यों त्रिविधि भांति गुरु शिख्य१ ।*
*फूल वास तरु गुरु लिये, रज्जब सब विधि पिख्य२ ॥५७॥*
५७-५९ में गुरु तथा शिष्य निर्णय का विचार कर रहे हैं - जैसे वृक्ष के पत्ते, फूल और फल लगते हैं, वैसे ही तीन प्रकार के शिष्य१ गुरु के होते हैं, उनकी भिन्न पद्धति अब सब देखें२ । फूल वृक्ष से सुगन्ध लेता है फूल के समान शिष्य गुरु से ज्ञान लेता है ।
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*बात१ पात छाया लिये, ज्ञान सु गुल२ सम वास ।*
*करणी३ फल गुरु तरु गहैं, त्रिविधि भांति परकास४ ॥५८॥*
जैसे पत्ता वृक्ष से छाया देने की योग्यता प्राप्त करता है, वैसे ही एक प्रकार का शिष्य गुरु से कथा१ करने की योग्यता प्राप्त करता है । जैसे पुष्प२ वृक्ष से सुगन्ध लेता है, वैसे ही दूसरे प्रकार का शिष्य गुरु से आत्म ज्ञान लेता है । जैसे फल वृक्ष से तृप्ति प्रदान करने की शक्ति लेता है, वैसे ही तीसरे प्रकार का शिष्य ज्ञान के अनुसार निष्ठा रूप कर्त्तव्य३ प्राप्त कर के अन्यों को भी तृप्ति प्रदान करता है । उक्त रीति से गुरु से शिष्य तीन प्रकार का ज्ञान४ प्राप्त करते हैं ।
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*गुरु तरु शिष लागे सु यूं, ज्यों डाल पान फल फूल ।*
*बात घात इक झड पडै, एक न छाडैं मूल ॥५९॥*
जैसे वृक्ष के डाल, पत्ते, फूल, फल लगते हैं, वैसे ही गुरु के साथ शिष्य लगते हैं । जैसे पत्ते, फूल और फल तो वृक्ष को किंचित वायु के वेग से छोड देते हैं किन्तु डाल वृक्ष के मूल को किंचित वायु के आधात से नहीं छोडती । वैसे ही कुछ शिष्य तो गुरु के कठोर शब्दों को श्रवण कर के गुरु का संग छोड देते हैं और कुछ गुरु के उपकार की महानता को देखते हुये कटु उपदेश से चलायमान नहीं होते और आजीवन गुरु का संग तथा सेवा को नहीं छोडते ।
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*रज्जब गृह गृह गुरु दीपक दशा, तिनहुँ न पूरे आश ।*
*गुण तारे भ्रम शीत का, सद्गुरु सूरज नाश ॥६०॥*
६०-६१ में सद्गुरु की विशेषता बता रहे हैं - घर घर में दीपक जलते हैं किंतु उनसें तारों के अदर्शन और ठंडी के अभाव की आशा पूर्ण नहीं होती । सूर्य उदय होता है तभी तारों का अदर्शन और ठंडी का अभाव होता है वैसे ही गुरुओं की दशा है, गुरु घर - घर में घूमते हैं किन्तु उनसे काम-क्रोधादि गुण और अज्ञान नाश नहीं होता । गुण और अज्ञान का नाश रूप कार्य तो सद्गुरु से ही होता है ।
(क्रमशः)