मंगलवार, 29 सितंबर 2026

*बाईजी श्यामकुमारीजी की परम्परा*

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🌷*卐 श्री दादूदयालवे नम: 卐*🌷
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*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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*समता के घर सहज में, दादू दुविध्या नांहि ।*
*सांई समर्थ सब किया, समझि देख मन मांहि ॥*
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*अथ अध्याय ७*
*बाईजी श्यामकुमारीजी की परम्परा*
श्यामकुमारी(रूपकुमारी) जी का स्थान बाईजी की पालकां व पालिकां के ऊपर के दो मंजिल दो मकानात् भी हैं । आपके शिष्य बालवेणी जी थे-"श्री बाईजी रूपकुमारी के बालवेणि पिख" रा. भक्तमाल मू. ६५७ में लिखा है । आपकी परम्परा का मुख्य स्थान वर्तमान में चोकड़ी(शेखावाटी) में है और वर्तमान में अलखरामजी की इंगरी के नाम से प्रसिद्ध है ।
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वि. सं. १७७६ के लगभग नारायण दादूधाम बाईजी की पालकां के संत चेतनदासजी और उनके शिष्य क्षेमदासजी भ्रमण करते हुये चौकड़ी पधारे थे और चौकड़ी से दक्षिण तालाब पर हनुमानजी के स्थान पर विराजे थे । दोनों ही गुरु शिष्य भजनानन्दी विरक्त महात्मा थे । चौकड़ी ग्राम से एक समय मध्यदिन में भिक्षा ले आते थे और भोजन करके भजन करते रहते थे ।
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उक्त प्रकार भिक्षा से निर्वाह करते हुये ६ मास उस स्थान पर भजन करते रहे । गुरु चेतनदासजी तो वृद्ध थे, वे तो स्थान पर ही बैठकर भजन करते रहते थे । क्षेमदासजी ही भिक्षा लाते और कभी इधर उधर घन्टा दो घन्टा भ्रमण करने भी निकल जाते थे । एक दिन घूमते हुये एक छोटी सी पहाड़ी के पास जा पहुँचे । उसके सघन वृक्षों को देखकर प्रसन्न हुये और ऊपर चढ़े तो एक छोटा-सा हनुमानजी का मंदिर दीख पड़ा । हनुमानजी को प्रणाम करके क्षेमदासजी वहां ही हनुमानजी के पास ही बैठकर भजन करने लगे ।
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थोड़ी ही देर में उनको राम राम की ध्वनि सुनाई देने लगी किन्तु ध्वनि करने वाला कोई भी नहीं दीख पड़ा । तब क्षेमदासजी ने प्रार्थना की- भगवन् ! राम राम की ध्वनि करने वाले आप कौन महानुभाव हैं, कृपा करके दर्शन दीजिये । क्षेमदासजी की उक्त प्रार्थना पर वहां क्षेमदासजी के सामने ही एक संत प्रकट हो गये । उनके एक हाथ में एक रोटी थी और दूसरे हाथ में जल का कमंडलु था । उनका दर्शन होते ही क्षेमदासजी ने उनको सत्यराम बोल- कर प्रणाम किया।
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फिर उन संतजी ने कहा- क्षेमदास ! अब तुम यहां पर रह कर भजन करो । मैंने यहां साढे तीन सौ वर्ष रहकर भगवद् भजन किया है । अब मैं यहां से जाऊंगा । क्षेमदासजी उक्त सिद्ध संत का वचन सुनकर बोले- भगवन् ! मेरे गुरुदेव वृद्ध हैं और भ्रमण भी करते रहते है । अतः मैं उनकी सेवा को छोड कर यहां कैसे रह सकता हूँ । सिद्ध संतजी ने कहा- गुरुजी को भी यहां ही रख कर सेवा करो । अब तुमको यहां ही रहना होगा । सिद्ध संतजी का अति आग्रह देखकर क्षेमदासजी ने संतजी की बात मानली । तब सिद्ध संत ने अपने हाथ की रोटी क्षेमदासजी के हाथ में दे दी ।
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क्षेमदासजी ने इस रोटी का चौथा भाग तो वहां बैठी हुई चिड़िया आदि पक्षियों को दे दिया और शेष रोटी के दो भाग सिद्ध संतजी का प्रसाद मानकर स्वयं पा गये एक भाग रख लिया । तब सिद्ध संत ने कहा- जैसे तुमने रोटी चिड़िया आदि पक्षियों को दे कर खाई है, वैसे ही तुम्हारे शिष्य प्रशिष्य परोपकार भी करते रहेंगे । और तुमने दो भाग खाये वैसे ही तुम्हारे शिष्य प्रशिष्य खाते पीने रहेंगे और तुमने एक भाग बचा कर रख लिया है, वैसे ही तुम्हारे स्थान में कमी नहीं आयेगी किन्तु विशेष श्रीमान् भी नहीं होंगे ।
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इतना कहकर सिद्ध संत वहां ही अन्तर्धान हो गये । फिर क्षेमदासजी हनुमानजी को प्रणाम करके अपने विश्राम स्थान की ओर चल दिये और गुरुजी के पास जाकर उक्त सब घटना सुनादी । तब गुरुजी ने कहा- ठीक है सिद्ध संत ने आज्ञा दी है तो वहां अवश्य निवास करना ही चाहिये । फिर क्षेमदासजी ने अपने पास आने वालों को कहा कि हम उस हूं'गरी पर निवास करेंगे । अतः उस पर हनुमानजी के मंदिर के पास एक फूस की इनती बड़ी कुटिया बनवादी जाय जिसमें हम गुरुजी के साथ आराम से निवास कर सकें ।
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भक्तों ने उनकी इच्छानुसार कुटिया तैयार करवा दी फिर क्षेमदासजी अपने वृद्धगुरु चेतनदासजी को लेकर डूंगरी पर चले गये और वहां ही रहकर भजन करने लगे । यहां भी अपना निर्वाह भिक्षावृत्ति से ही करने लगे । उक्त प्रकार श्यामकुमारी बाईजी की परम्परा चौकड़ी की डूंगरी पर गई । श्यामकुमारीजी के खास शिष्य का नाम बालवेणि था । चेतनदासजी तो पौत्र शिष्य ही होंगे इसका पूर्ण निर्णय नहीं हो सका है । भक्तमाल में खास शिष्य का नाम बालवेणि ही दिया है ।
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उक्त प्रकार डूंगरी पर निवास करके भजन करते हये वि. सं. १७०८ में चेतनदासजी महाराज ब्रह्मलीन हो गये । कुछ दिन के पश्चात् क्षेमदासजी के एक शिष्य हुये, उनका नाम सुखरामजी रक्खा गया । वे भी अपने दादा गुरु चेतनदासजी तथा गुरु क्षेमदासजी के समान भजनानन्दी महात्मा हुये । उक्त तीनों संतों ने ही अपना मन ईश्वर भजन में लगाया था, अन्य कुछ भी नहीं किया था। कारण वे तीनों विरक्त थे ।
(क्रमशः)

*४७. अध्यातम कौ अंग ८१/८४*

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*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
*श्रद्धेय श्री Tapasvi @Ram Gopal Das की प्रेरणा से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Meta AI*
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*४७. अध्यातम कौ अंग ८१/८४*
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कहि जगजीवन पालती१०, खेती करै किसान ।
प्रेम नीर बीरज भगति, वपु महिं जांनै जांन ॥८१॥
(१०. पालती=खेत में काम करने वाला)
संत जगजीवन जी कहते हैं, जैसे खेत में पालती मजदूर काम करता है और किसान खेती करता है, वैसे ही यह शरीर एक खेत है । इसमें प्रेम रूपी जल से भक्ति रूपी बीज बोना चाहिए । जो ज्ञानी है, वह इस रहस्य को अपने शरीर के अंदर ही जानता है ।
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सात पांच नौ तीन लहै, दस दोइ रवि प्रकास ।
षट अरु षट रस रांम धरि, सुकहि जगजीवनदास ॥८२॥
सात धातु, पांच प्राण, नौ द्वार और तीन गुण - इन सब में वही बसा है । दसवां द्वार और दो आँखों में सूर्य का प्रकाश भी वही है । छह शास्त्र और छह रस सब में राम को ही धारण करो, यही वार्ता संत जगजीवन दास जी सुखद वाणी में कहते हैं ।
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श्रवण नेत्र मुख नासिका, जिभ्या इन्द्री बंधि ।
कहि जगजीवन रांम रटि, लहै नांऊँ सुर संधि ॥८३॥
कान, आँख, मुख, नाक, जीभ - इन पाँचों ज्ञान इन्द्रियों को वश में बाँध कर जो राम नाम रटता है, संत जगजीवनदास जी महाराज कहते हैं कि वह सुरों की संधि को - अर्थात सुरत को शब्द से जोड़ने वाली दिव्य धुन को पा लेता है ।  
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सुध सिधांत१ सुणन की, सिद्ध साधिक की बांणि२ ।
कहि जगजीवन रांम रटि, रांमहि लेइ पिछांणि ॥८४॥
(१. सुध सिधांत=शिव प्रोक्त योगशास्त्र के प्रसिद्ध सिद्धांत)  
{२. बांणि=प्रकृति(आदत=स्वभाव)}
शुद्ध सिद्धांत सुनने की आदत सिद्ध और साधकों का स्वभाव है । पर संत जगजीवन साहब कहते हैं, सब सुन-सुन कर अंत में राम नाम रट कर राम को ही पहचान लेना चाहिए ।
(क्रमशः)

सोमवार, 28 सितंबर 2026

संत भक्तरामजी

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*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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*दादू सोई हमारा सांइयां, जे सबका पूरणहार ।*
*दादू जीवन मरण का, जाके हाथ विचार ॥*
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फिर संत भक्तरामजी कोलायत तीर्थ की ओर चले गये थे । वहां जागेरी तलाई से कुछ दूर एक गुफा में बहुत समय तक भजन किया था । भक्तरामजी बहुत उच्चकोटि के योगी महात्मा थे । बीकानेर नरेश को ज्ञात हुआ कि आजकल भक्तरामजी महाराज जागेरी तलाई के पास की गुफा में भजन करते हैं । तब राजा एक दिन उनके दर्शन करने वहां गये ।
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राजा को भक्तरामजी के दर्शन से महान् आनन्द प्राप्त हुआ । थोड़ी देर सत्संग चर्चा करने के पश्चात् राजा ने हाथ जोड़ कर प्रार्थना की- भगवन् ! सेवा की आज्ञा दीजिये । भक्तरामजी ने कहा- भगवत् कृपा से सब आनन्द है । फिर राजा ने आग्रह पूर्वक कहा- स्वामिन् ! सेवक को सेवा अवश्य बताइये । भक्तरामजी ने कहा- हम बतायेंगे वह सेवा आप करने में अच्छा नहीं मानेंगे ।
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राजा ने कहा- नहीं महाराज ! अयोग्य सेवा तो संत बताते ही नहीं हैं । योग्य सेवा मेरे करने योग्य होगी और जिसको मैं कर सकता हूं वह अवश्य करूंगा आप अवश्य आज्ञा दें । भक्तरामजी ने कहा- "अच्छा तो लो बता देता हूं । आज से पीछे फिर मेरे पास आप नहीं आना यही हमारी सबसे बड़ी सेवा है ।" राजा भक्तरामजी की बात सुनकर कुछ क्षण मौन रहा फिर हाथ जोड़ कर बोला- मैं तो आपकी आज्ञा अवश्य मानूंगा किन्तु इससे आपका क्या आशय है ? यह भी कृपा करके समझा दें जिससे मेरे हृदय की ग्लानि मिट जाय ।
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भक्तरामजी ने कहा- मेरा आशय है- आपके बारंबार आने से मेरे भजन में विघ्न होगा । देश का राजा जिस संत के पास श्रद्धा से बारंबार जाता है तब उसकी प्रजा भी बहुत आने लगती है और लोगों के बहुत आने जाने से भजन में पूर्ण विघ्न होता है । राजा भक्तरामजी की बात सुनकर समझ गया कि- ये विरक्त संत हैं । इनको लोगों का आना जाना अवश्य ही विघ्न रूप भासता है । अतः इनका कहना सर्वथा उचित ही है ।
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फिर राजा प्रणाम करके बोला- आपकी आज्ञानुसार ही करूंगा । इसमें कुछ भी प्रमाद नहीं करूंगा फिर प्रणाम करके राजा साथियों सहित चला गया ।
कहा भी है-
आश हीन वर भक्त को, जन सम्पर्क न भाय ।
भक्तराम ने भूप से, कहा फिर न इह आय ॥४६६॥ह.त. ९॥
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अंतिम दिनों में एक दिन भक्तरामजी जहां बैठे थे वहां से सहसा उठकर भी लगभग पचास भक्त थे वे भी चल दिये । कानासर के वन में एक टीले के उत्तर की ओर चल दिये । उस समय उनके साथ-विवेकनाथ, सम्पन्ननाथ और पास जाकर सब से बोले "अब हमारे शरीर के त्याग का समय आ गया है. तुम सब यहां ही रुक जाओ आगे मत आओ ।" उक्त वचन सुनकर सब रुक गये । संत भक्तरामजी टीले की उतराई में एक कैर के वृक्ष के पास गये ।
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थोड़ी ही देर में कैर के पास एक शब्द हुआ । तब दोनों नाय संत समझ गये कि कपाल(ब्रह्मरंध्र) भेदन का शब्द हुआ है, अब शरीर त्याग दिया है । फिर वे सब दौड़कर टीले पर चढ़ और शव को भी देख लिया किन्तु उन लोगों के शव के पास पहुँचने से पहले ही आकाश से एक विशाल पक्षी उतरा और शव को उठाकर आकाश में ही ऊंचा चढकर अदृश्य हो गया ।
कहा भी है-
"संत जनों का प्रयाण भी विचित्र ढंग से होय ।
भक्तराम तन तजत ही, पक्षि ले गया सोय ॥१८१८.त.१३॥
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समाधि बनाने के लिए भक्तरामजी निषेध कर गए थे । किन्तु फिर भी उनके भक्त लोग श्रद्धा पूर्वक उस स्थान पर जाते रहते हैं । बीकानेर में सदाणियों के मंदिर के पीछे एक ब्राह्मण के घर में उनकी तस्वीर स्मृति चिन्ह अभी तक है । भक्तरामजी का निर्वाण दिन वि. सं. १९२४ पोष पूर्णिमा है । बीकानेर के दादू पंथी लालदासजी ने भक्तरामजी के चरण अपने स्थान में वि. सं. १९७७ आषाढ़ पूणिमा को पधराये थे सो वहां छत्री में विद्यमान हैं ।
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*रामसुखदासजी*
रामसुखदासजी बाईजी के थांभे के थे । रामगढ़ शहर में दीक्षित हुये थे । आप अच्छे विद्वान संत थे । पंडित रामशरणजी महाराज के साथ आपका अनेक बार संस्कृत में शास्त्रार्थ चला करता था । आपका शरीर वि.सं.१९६० तक धरातल पर था । आप अच्छे विद्वान संत थे ।
(क्रमशः)

*४७. अध्यातम कौ अंग ७७/८०*

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*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
*श्रद्धेय श्री Tapasvi @Ram Gopal Das की प्रेरणा से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Meta AI*
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*४७. अध्यातम कौ अंग ७७/८०*
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नाम भगति निरगुण लहै, ज्ञान सकति गुन गाइ ।
कहि जगजीवन राम भगति जन, रामहि मांहि समाइ ॥७७॥
नाम की भक्ति से निर्गुण ब्रह्म की प्राप्ति होती है, और ज्ञान की शक्ति से सगुण का गुणगान होता है । पर संत जगजीवन दास जी कहते हैं कि राम का भक्तजन तो सीधा राम में ही समा जाता है ।
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सहस बरस साधै पवन८, सोधै सकल सरीर ।
कहि जगजीवन राम भगति बिन, पीवै न अम्रित नीर ॥७८॥
(८. पवन=प्राणायाम)
संत जगजीवनदास जी महाराज कहते हैं कि चाहे हजार वर्ष तक प्राणायाम साधे और सारे शरीर को शोध ले, पर राम की भक्ति के बिना वह अमृत रूपी जल को नहीं पी सकता ।
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कहि जगजीवन एक भजि, आरंभ९ तज्या अनेक ।
राम ह्रिदै रसना रटणि, तन मंहि येही टेक ॥७९॥
(९. आरंभ=लौकिक कर्म)
संत जगजीवनदास जी महाराज कहते हैं कि अनेक प्रकार के लौकिक कर्मों के आरंभ को छोड़ कर एक ही राम को भजना चाहिए । हृदय में राम का वास हो, जीभ पर राम का रटण हो, यही तन का सच्चा आधार है ।
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बिषियां बिहाइ कामनी, जोगी जोग समाधि ।
कहि जगजीवन एक रस, अकाल पुरिष आराधि ॥८०॥
विषयों और कामना को छोड़ दे, योगी जन योग समाधि में लगें, पर जगजीवन कहते हैं कि एक रस होकर केवल अकाल पुरुष की ही आराधना करनी चाहिए ।
(क्रमशः) 

शनिवार, 26 सितंबर 2026

*संत गोपालदासजी*

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*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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*करामात कलंक है, जाकै हिरदै एक ।*
*अति आनन्द व्यभिचारिणी, जाके खसम अनेक ॥*
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*संत गोपालदासजी*
गोपालदासजी बाईजी के थांभे के संत थे । आप सकराय के पास सिकंदरे में बाईजी के थांभे का स्थान था वहां ही दीक्षित हुये थे । एक मत से ये जयपुर में ही दीक्षित हुये थे । आप उच्चकोटि के भजनानन्दी महात्मा थे ! सुना जाता है कि-आपका सम्मान तत्कालीन राजा भी करते थे । आपका देहान्त वि. सं. १८०० में जयपुर में हुआ था ।
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आपके शरीर का जुलूस जयपुर के सांगानेर दरवाजे से निकाला गया । उस समय सांगानेर दरवाजे से किसी का भी शव नहीं निकाला दिया जाता था । यह आपके शव को ही सौभाग्य प्राप्त हुआ था । इससे सूचित होता है कि उस समय जयपुर में आपकी अति प्रतिष्ठा थी । आप महान् भजनानन्दी परम विरक्त संत थे । आपने अपने दर्शन और सत्संग से अनेकों का कल्याण किया था । आपका समय भजन विचार और सत्संग में ही व्यतीत होता था ।
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*महान् योगी संत भक्तरामजी*
भक्तरामजी महाराज बाईजी के थांभे के चूरू के स्थान में दीक्षित हुये थे । प्रारंभ में आप विद्याध्ययन के लिये रामगढ़ गये थे । एक दिन किसी साधारण कारण से ही कुपित होकर पंडित ने इनको कहा- तुम्हारे गुरु ने तो यह उपदेश दिया है- दादू धरती होय रहु । फिर तुम क्यों व्यर्थ इन पानों में माथा मारते हो ? इस वचन से भक्तरामजी को अत्यधिक विचार हुआ । फिर आप उसी समय अध्ययन त्याग कर वहां से विचर गये और विचरते विचरते बीकानेर में आ गये ।
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बीकानेर में नृसिंह सागर के मार्ग पर आपकी गुफा थी वहां ही भजन करते रहे । आप बीकानेर में डागों की पंचायती बगीची में भी रहे थे । एक दिन बगीचे के कमरे के कपाट बन्द होने पर भी आप बाहर आ गये थे और भीतर चले गये थे । इनकी यह सिद्धि देखकर एक कथावाचक पंडित ने कहा-"इन सिद्धियों में क्या रखा है ? महाराज !" पंडित के उक्त वचन से उन्होंने अपना अपमान नहीं माना और बोले-पंडितजी ! आप सत्य ही कहते हैं, ये सिद्धियां अवश्य ही भगवत् मार्ग में बटमार का काम करती हैं ।
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इससे सूचित होता है कि- संत सत्य बात को सत्य ही मानते हैं । अपनी कही हुई बात के लिये हठ नहीं करते और लज्जित भी नहीं होते । कहा भी है-
"संत सत्य को सत्य ही, मानें करें न लाज ।
पंडित वचन से नहिं हुये, भक्तराम नाराज ॥१७२॥ह.त.१३॥
एक समय बीकानेर नगर में भक्तरामजी दादूवाणी की कथा कर रहे थे और नीचे लिखी साखी की व्याख्या कर रहे थे-
"नैनों भर नहिं देखिये, यह सब माया रूप ।
तहं ले नैना राखिये, जहां है तत्व अनूप ॥"
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उस समय एक पंडित ने तर्क की-"दादूजी तो संसार को माया का रूप बताकर देखने का निषेध कर रहे हैं और आप देख रहे हैं यह क्या ? वक्ता को तो कहने के समान ही करना चाहिये ।" भक्तरामजी ने तर्क का उत्तर तर्क से नहीं दिया प्रत्युत उसको उपदेश मानकर बोले-"अब नहीं देखूंगा ।" उस दिन से कथा करना छोड़ दिया । वन में रहकर भजन ही करने लगे । उस दिन के बाद दृष्टि भर किसी को भी नहीं देखते थे । कहा भी है-
संत कुतर्कों से नहीं, क्षुभित होत हैं लेश ।
भक्तराम ने विप्र का, मान लिया उपदेश ॥४२७॥ह.त.११॥
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एक दिन तत्कालीन बीकानेर नरेश संत भक्तरामजी के दर्शन करने वन में उनका पता लगाकर गये थे । वे राजा को वन में एक वृक्ष के नीचे बैठे भजन करते हुये मिले । शीतकाल का समय था । राजा भक्तरामजी के लिये एक बहुमूल्य दुशाला ले गया था । भक्तरामजी को प्रणाम करके उक्त दुशाला उनको ओढ़ा दिया और हाथ जोड़कर सामने बैठ गया । कुछ देर के पश्चात् भक्तरामजी उठे तब वह दुशाला उनके शरीर से नीचे गिर पड़ा और वे चल दिये । राजा आदि की हिम्मत उन्हें रोकने की नहीं हुई । कहा भी है-
"विरत संत श्रीमान अरु, श्री में करें न राग ।
भक्तराम उठ चल दिये, नृप रु दुशाला त्याग ॥१५०॥ह.तं.१३।
(क्रमशः)

*४७. अध्यातम कौ अंग ७३/७६*

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*४७. अध्यातम कौ अंग ७३/७६*
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जल बिछुटी१ जल करि भखी, वो जीव इसमैं सीर२ ।
कहि जगजीवन प्रीति हरि, सो फिर मांग्या नीर ॥७३॥
(१. जल बिछुटी=जल से वियुक्त)    (२. सीर=आकर मिले)
जैसे मछली जल से बिछुड़ जाती है, तो भी वह जल को ही याद करती है और उसी में जीती है, और अंत में फिर उसी जल में आकर मिल जाती है । वैसे ही हरि से बिछुड़ा हुआ जीव अंत में फिर हरि के प्रेम रूपी जल को ही माँगता है ।
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कहि जगजीवन मही३ मथि, राम नाम घ्रित खाइ ।
प्राण पुष्टि पावै तहां, चित मंहि हरि रस भाइ४ ॥७४॥
(३. मही=छाछ)   (४. भाइ=रुचिकर लगे)
जैसे छाछ को मथ कर घी निकाला और खाया जाता है, वैसे ही इस संसार को मथ कर राम नाम रूपी घी को खाना चाहिए । इससे प्राणों को पुष्टि मिलती है और चित्त में हरि का रस रुचिकर लगने लगता है ।
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कहि जगजीवन ध्यान धरि, सिध साधक मुनि जान ।
जैसी व्यापत५ सरीर मंहि, तैसा करै बखान६ ॥७५॥
(५. व्यापत=वासना)   (६. बखान=बोलना)
सिद्ध, साधक और मुनि जन ध्यान करके जानते हैं कि जिसके शरीर में जैसी वासना व्याप्त है, वह वैसी ही वाणी बोलता है ।
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पवन सकति प्रिथवी भजै, सबद सकति सब कोइ ।
कहि जगजीवन हरि सकति, हरि मंहि बासा७ होइ ॥७६॥
(७. बासा=निवास)
पवन की शक्ति पृथ्वी का आश्रय लेती है, और शब्द की शक्ति सब में बसती है । पर जो हरि की शक्ति है, उसका निवास केवल हरि में ही होता है ।
(क्रमशः)

*संत दूलजी*

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*सूधा मारग साच का, साचा होइ सो जाइ ।*
*झूठा कोइ न चलै, दादू दिया दिखाइ ॥*
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*संत दूलजी*
संत दूलजी का समय लगभग वि . सं . १८८५ से १९७४ तक है । आप बाईजी रामकुमारीजी की परम्परा में महलकां महन्तों के अतीत(छुट भाइयों में) में थे । शरीर से हृष्ट पुष्ट तेजस्वी संत थे । नारायणा दादूधाम में खेजड़ाजी के स्थान पर प्रह्लादजी की शाल के बाहर बालकों को निःशुल्क पढ़ाया करते थे ।
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उस समय काष्ठ के पाटों पर मुरड़(श्वेत) मिट्टी पोत कर उसके सूख जाने पर खोर(लाल ईंट की मिट्टी) बिछाकर पराश वृक्ष की टहनियों को पैंसिल नुमा बनाकर उक्त पाटे पर अक्षर लिखाये जाते थे । पढ़ाते समय पास में एक लम्बा वांस रखते थे । उस वांस से आप बैठे ही जिस बच्चे का प्रमाद देखते उसे सचेत करते थे । अक्षर ज्ञान प्राप्त हो जाने पर दादूपंथी संतों के शिष्यों को दादूवाणी, सुन्दरविलासादि ग्रंथ भी पढ़ाया करते थे ।
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प्रति दिन खेजड़ा के आस पास की भूमि पर बुहारी निकालकर साफ रखते थे । आपके अंतिम दिनों की एक घटना भी विचित्र है, वह देखिये । यह आचार्य दयारामजी महाराज के समय की है । उन दिनों में दूलजी तालाव की पाल वाले महलकां वाल महन्तों के मकान के नीचे शाल में निवास करते थे । आप इससे पूर्व हर व्यक्ति को सीधी खाने या बिना परिश्रम मिलने वाली बात के प्रसंग में कहते थे—
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"भाया सीधी सनेती पर सोवाला हो" । तब सुनने वाले लोक कहते थे कि— "बाबाजी हम क्या सभी और आप भी सीधी सनेती पर सोवेंगे" तब संत दूलजी कहते थे- "नहीं भाया मैं तो म्हारी सनेती बांधकर उस पर सोकर ही मरूंला । जैसा वे कहते थे वैसा ही उन्होंने किया भी था । आपने अपनी मृत्यु के समय के दिन से पहले ही सब सामग्री तैयार करली थी । संस्कार के योग्य छोटी मोटी सभी वस्तुयें लाकर शाल में रख दी थी ।
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सनेती बांध कर खड़ी कर दी थी । कफन भी उस पर रख दिया था । लकड़ियां अपने कंधे पर लेजा लेजाकर श्मशान में डाल आये थे । स्नान के लिये जल का घड़ा भरकर रख दिया था । एक थैली में टक्के पैसे भी रख दिये थे, मृत्यु के कुछ समय पूर्व ही दादूमंदिर में जाकर दंडवत की फिर आचार्य दयारामजी महाराज के पास बारहदरी में गये । उनको दंडवत सत्यराम करके तथा हाथ जोड़कर प्रार्थना की कि महाराज, मेरा राम का शरीर अब थोड़ी ही देर में छूटने वाला है ।
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अन्तिम संस्कार के लिये मैंने सब तैयारी कर दी है, अब जाकर स्नान करके शरीर को छोड़ दूंगा । अतः आप चार साधुओं को भेजदें । वे श्मशान में पहुँचाकर देह को जला आयेंगे । आचार्य दयारामजी ने कहा— अभी तो आप का शरीर ठीक है, ऐसा क्यों कह रहे हैं ? संत दूलजी ने कहा— महाराज ! मैं सत्य ही कह रहा हूँ । ऐसा कहकर दूलजी अपने निवास स्थान पर आये और स्नान करके कफन की चादर ओढ़ अविचल मंत्र का जप करते हुये सनेती पर सो गये और उसी क्षण ब्रह्मलीन हो गये ।
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आपके जीवन में यह भी एक नियम रहा था कि किसी व्यक्ति के मरने की खबर सुनते तो उसके दाह संस्कार में अवश्य जाते थे और चिता आदि की सब विधि स्वयं करते थे । थोड़ी देर के पश्चात् आचार्य दयारामजी महाराज ने एक साधु को कहा- दूलजी के पास जाओ और देखकर आओ कि वे क्या कर रहे हैं? साधु ने जाकर देखा तो ज्ञात हुआ वे तो सनेती पर सोये हुये हैं और शरीर को छोड़ चुके हैं ।
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फिर सब संतों ने तथा भक्तों ने उनका देह शमशान में ले जाकर दाह संस्कार किया । उनके देहान्त के दिन मैं भी नारायणा दादूधाम में ही था ।
कहा भी है-
"संत न पर दुःख सह सके, आप करैं निज काम ।
दूलदास काष्ठादि भी, धरे दाग के धाम ॥१६१॥ह.त.१२॥
(क्रमशः)

*४७. अध्यातम कौ अंग ६९/७२*

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*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
*श्रद्धेय श्री Tapasvi @Ram Gopal Das की प्रेरणा से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Meta AI*
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*४७. अध्यातम कौ अंग ६९/७२*
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नित अध्यातम नाम रत, काम क्रोध तजि एह ।
कहि जगजीवन हरि भगत, हरि मंहि राखै देह ॥६९॥
जो नित्य अध्यात्म और नाम में रत रहता है और काम-क्रोध को छोड़ देता है, वही हरि-भक्त अपनी देह को हरि में रखता है ।
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नौ खिड़की११ ताला जड़ै, दसमी पोलि निकास१२ ।
हरि मारग लहै राम घर, सु कहि जगजीवनदास ॥७०॥
(११. नौ खिड़की=नव द्वार बंद कर)    (१२. दसमी पोलि निकास=दशम द्वार खोलना)
शरीर की नौ खिड़कियों, नौ द्वारों पर ताला लगा दो और दसवें द्वार को खोलो । जो सातों को दृढ़ता से बंद करके दसवें में प्रवेश कर निकल जाता है, उसने राम का नाम रट कर अपना किला सजा लिया ।
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सात उभै गाढ़ा जड़ै, दसमैं पैठि निकास ।
तिहिं गढ़ सज्यौ राम रटि, सु कहि जगजीवनदास ॥७१॥
शरीर में नौ खिड़कियाँ हैं - दो आँख, दो कान, दो नाक, मुख, गुदा और इंद्रिय - इन नौ द्वारों पर ताला जड़ दो, यानी इनको बाहर की ओर जाना बंद कर दो । और दसवीं जो पोल है - दसवाँ द्वार, जो सिर के भीतर गगन-मंडल में है - उससे निकल जाओ । वही हरि का मार्ग है, वही राम का घर है, ऐसा जगजीवन दास कहते हैं ।
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दुनियां मांही दुइ सरग१३, देव असुर बिसतार ।
कहि जगजीवन हरि भजि सुलझै उलझै मैंमत१४ मार ॥७२॥
(१३. सरग=सृष्टि)   (१४. मैंमत=अभिमान)
जगजीवन जी कहते हैं, दुनिया में दो ही सृष्टि हैं - देव और असुर का विस्तार। हरि को भजने से ये उलझन सुलझ जाती है और अहंकार में उलझने से जीव मारा जाता है ।
(क्रमशः)  

शुक्रवार, 25 सितंबर 2026

संत ध्यानीबाईजी

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🌷*卐 श्री दादूदयालवे नम:  卐*🌷
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*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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*दादू लीला राजा राम की, खेलैं सब ही संत ।*
*आपा पर एकै भया, छूटी सबै भरंत ॥*
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महल के ज्ञात महन्तों की परंपरा इस प्रकार है~ १-लालदासजी २-सीतारामजी ३-आकारदासजी ४-कनिरामजी ५- श्योरामजी ६-तोलारामजी ७-कानदासजी वर्तमान । स्थान व जीविका—१- मकान नारायणा के तालाब की पाल पर रामकुई के पास पश्चिम में सड़क पर पश्चिम देखता है, दूसरा उक्त मकान के सम्मुख सड़क पर पूर्व देखता है । ये दो निवास स्थान हैं । 
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कुवा(कृषि योग्य भूमि व कोठी) महलकां वाली नाम से बोली जाती है । यह विरक्तों के चौभीता के पास सांभर रोड पर बड़ के व समाधि के तिवारे के पास है । एक कुवा नीमड़ी वाला रामोला के पास है । एक कोस्या कैर वाला कुवा दूदू सड़क के पास है । बाईजी रामकुमारीजी परंपरा जो कुछ ज्ञात हो सकी सो लिख दी गई है । इन रामकुमारी की परम्परा में भी अच्छे २ भजनानन्दी संत हुये हैं । सो भी ज्ञात हुये जो दिये जाते हैं देखिये....   
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संत ध्यानीबाईजी ध्यानीबाईजी का समय वि. सं. १७५० लगभग है । यह आचार्य फ़कीरदासजी की सहोदरा बहिन थीं और सभाकुमारी(रामकुमारी) जी की शिष्या थीं । इनका साधन स्थान बाईजी की पालकां थी और निवास स्थान बाईजी की पालकां के ऊपर साइड में ड्योढी ऊपर वाला चौबारा व झरोखा था । 
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फ़कीरदासजी के ब्रह्मलीन होने पर जब कई साधु आचार्य बनने की इच्छा करने लगे तब ध्यानीबाईजी ने किसी को भी नहीं बैठने दिया और कहा~ “गादी म्हारा वीर की तामें म्हारो वीर” फिर जब तक अन्य आचार्य का एक मत से निर्णय नहीं हुआ तब तक आचार्य का कार्य ध्यानीबाईजी करती रही थीं । ध्यानीबाईजी महान् योगिनी बाल ब्रह्मचारिणी थीं । रामकुमारीजी से सब साधन पद्धति का पूर्ण ज्ञान ध्यानीबाईजी को प्राप्त हुआ था । 
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पंजाब से तीन सौ संतों की अपनी मंडली घुमाते हुये दौसा के मंडलेश्वर व महन्त सुखरामजी ने सुना तब नारायणा दादू धाम में आये और सब संतों से परामर्श करके निर्णय किया कि मंदिर में प्रार्थना करने से जिसका नाम सुनाई दे उसको आचार्य बनाया जाय । फिर मंदिर में लघुजैतरामजी की आज्ञा हुई तब ध्यानीबाईजी ने सर्व समाज की सम्मति व दादूजी महाराज की आज्ञा से जैतरामजी को गादी पर बैठने दिया था । 
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इससे ध्यानीबाईजी की शक्ति का अनुमान हो जाता है । ध्यानीबाईजी नारायणा में ब्रह्मलीन हुई हैं । उनका समाधि रूप एक जीर्ण तिबारा दादूद्वारे से पश्चिम है जहां शमशान है । बाईजी रामकुमारीजी की शिष्य परम्परा में ध्यानीबाईजी महान सिद्ध हुई हैं । 
(क्रमशः)

*४७. अध्यातम कौ अंग ६६/६८*

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*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
*श्रद्धेय श्री Tapasvi @Ram Gopal Das की प्रेरणा से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Meta AI*
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*४७. अध्यातम कौ अंग ६६/६८*
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कहि जगजीवन अग्यारस३, बारस४ मांही भेद ।
तेरस५ तिस घर समावै, चौदस६ चार्यूं वेद ॥६५॥
(३. अग्यारस=एकादशी)   (४. बारस=द्वादशी)   (५. तेरस=त्रयोदशी)   (६.चौदस=चतुर्दशी)
जगजीवनदास जी महाराज चेतना की सीढ़ियाँ बता रहे हैं । 
*अग्यारस(एकादशी)* - हमारे शरीर में १० इंद्रियाँ + १ मन = ११ हुए । जब तक मन और इंद्रियाँ अपनी-अपनी ओर भाग रही हैं, तब तक जीव ग्यारह में ही अटका है ।
*बारस(द्वादशी)* - जब इन ग्यारह से आगे १२ वाँ - बुद्धि या विवेक जागता है, तब भेद दिखने लगता है - क्या अपना है, क्या पराया, क्या जड़ क्या चेतन । यहीं से साधक में भेद-बुद्धि आती है । 
*तेरस(त्रयोदशी)* - तेरस पर वह भेद मिट जाता है । साधक "तिस घर" - उस अपने निज घर में, उस दसवें द्वार वाले घर में समा जाता है । जैसे आपने पहले कहा था - मछली पानी में ही समा जाए ।
*चौदस(चतुर्दशी)* - जब वह अपने घर में समा गया, तब चारों वेद - यानी सारा ज्ञान, सारे शास्त्र, सारा पढ़ा-सुना - उसी में समा जाता है । अब बाहर के वेद पढ़ने की जरूरत नहीं, भीतर ही सब प्रकट हो जाता है । ग्यारह में जीव, बारह में भेद, तेरह में निज घर, चौदह में सब वेद उसी में लय ।
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पून्यूं७ पुण्य पवित्र तन, राम नाम रस लीन ।
कहि जगजीवन मिलि रहै, ज्यूं जल मांहै मीन८ ॥६६॥
(७. पून्यूं=पूर्णिमा)   (८. मीन=मछली)
जगजीवन जी महाराज के इस दोहे में दो बहुत मीठी बातें हैं -
*१. पून्यूं पुण्य* - चौदस तक ज्ञान हुआ, पर पूनम पर पूर्णता होती है । जब बहुत जन्मों के पुण्य इकट्ठे होते हैं, तब यह तन पवित्र होता है । और पवित्र तन की पहचान क्या ? वह राम नाम के रस में लीन हो जाता है । जैसे मिश्री पानी में घुल जाती है, वैसे तन नाम में घुल जाता है ।
*२. ज्यूं जल मांहै मीन* - आपने पहले भी मछली का उदाहरण दिया था । यह बाबा जी का सबसे प्रिय उदाहरण है । मछली जल से अलग होकर जी नहीं सकती, और जल में रहकर भी वह जल से अलग नहीं दिखती । वैसे ही जब तन राम-नाम-रस में पवित्र हो जाता है, तो वह हरि में ही मिला रहता है । उसे अलग करना पड़े ही नहीं, वह मिला ही हुआ है । जैसे मछली और पानी ।
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कहि जगजीवन राम रस, रसना हरि रस राचि ।
निरबाणी निर्मोह रहै, बिषै बच९ हरि रचि ॥६७॥
(९. बिषै बच=विषय भोगों से बचता हुआ)
जीभ को राम-रस में, हरि-रस में रंग लो । वाणी से परे होकर, मोह रहित होकर, विषयों से बचते हुए हरि में ही रच जाओ ।
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दीरघ बुधि१० दीरघ भजन, दीरघ भगति प्रकास ।
ते मन ते तन ते सबद, सु कहि जगजीवनदास ॥६८॥
(१०. दीरघ बुधि=विशाल बुद्धि)
जिसकी बुद्धि विशाल है, उसका भजन भी बड़ा है और उसकी भक्ति का प्रकाश भी दीर्घ है । वह मन से, तन से और शब्द से एक ही हो जाता है ।
(क्रमशः)  

गुरुवार, 24 सितंबर 2026

ब्रह्मानन्द को देने वाली

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*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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*सदा लीन आनन्द में, सहज रूप सब ठौर ।*
*दादू देखै एक को, दूजा नाहीं और ॥*
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दादूजी की शिष्या दोउ सकल शिर वन्दनी सु, 
आनन्द की कंदनी सबन मति भाई है । 
रहैं गलतान दोउ भला बुरा कहै कोउ, 
सूक्षम सुरति जाय शून्य में समाई है ॥
राजा मानसिंह कह्यो कन्या तुम व्याह करो, 
वरचो वर सोई हरि सृष्टि जो उपाई है । 
कियो जिन त्याग प्रभु दियो दरशन भाग, 
ब्रह्म रस पाग लिव लागी उभै बाई है ॥४८३॥
दादूजी की शिष्या रामा और श्यामाबाई दोनों ही सबके मस्तकों द्वारा वन्दनीय और श्रेष्ठ थीं अर्थात् उनको सब नमस्कार करते थे । ब्रह्मानन्द की तो वे जड़ ही थीं अर्थात् ब्रह्मानन्द को देने वाली थीं । सर्व की बुद्धि को प्रिय लगती थीं । चाहे उन्हें कोई भला कहो या बुरा उस पर उनका ध्यान जाता ही नहीं था । वे तो दोनों निजानन्द में निमग्न रहती थीं । उनकी मनोवृत्ति तो सूक्ष्म होकर तथा संसार दशा से ऊंची जाकर ब्रह्म में ही समाई रहती थी ।
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कुछ लोगों के कहने से आमेर में आमेर के राजा मानसिंह ने दादूजी से कहा- “इन बाइयों का विवाह कर दो ।” तब दादूजी ने कहा- “उनको पूछो यदि वे करना चाहती हैं तो कर दिया जाय ।” पूछा गया तब दोनों बाइयों ने कहा- जिस हरि ने यह सृष्टि उत्पन्न की है, उसी हरि रूप वर को हमने वर लिया है, अर्थात् वह परमेश्वर ही हमारा स्वामी है । अन्य वर हम नहीं करेंगी । जिसने सांसारिक विषयों का त्याग किया है, उन प्रभु ने दौड़ाकर दर्शन दिया अतः दोनों बाइयों ने सब कुछ त्यागकर  ब्रह्म भक्ति अपनाई थी । 
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दोनों बाइयों की वृत्ति ब्रह्म में ही लगी रहने से वे दोनों ब्रह्मरस(भक्ति) में ही अनुरक्त रहती थीं । अन्य में उनकी वृत्ति जाती ही नहीं थी । दोनों बाइयों का साधन धाम नारायणा में बाईजी की पालका ही था । दोनों बाईजी उक्त स्थान पर ही दादूवाणी मन्दिर में भजन पूजन सत्संग व विश्राम करती थीं । सभाबाईजी के पाट पर कल्याणजी विराजे थे । इनके दो शिष्य थे । 
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यह भक्तमाल के मू. छ. ६५७ में लिखा है “श्री बाईजी सभा, पाट कल्याण दोय शिष” बाईजी रामकुमारीजी के उत्तराधिकारी महन्तों की परंपरा वर्तमान महन्त वृजमोहनदासजी ने हरभाड़े के स्थान की चरण चौकियों के आधार पर भेजी है । कारण- रामकुमारीजी बाईजी के थांभे का मुख्य स्थान हरमाड़ा ही रहा है । नारायण से हरमाड़ा चले गये थे । हरमाड़ा में तालाब के किनारे बगीची है, हनुमानजी का मन्दिर है । 
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एक स्थान इनका चूरू में भी था, बिड़ला घंटाघर से गोशाला जाने वाली सड़क पर था किन्तु अब वह समाप्त हो गया है । हरमाड़े के स्थान की परंपरा अब तक चल रही है । महन्त परंपरा इस प्रकार है-१ राम- कुमारीजी वि. सं. १६५९ से नारायणा में विराजे थे । २-महन्त चेतनदासजी हुये । ये महान् सिद्ध संत थे । इन से हनुमानजी साक्षात् बातें करते थे । इन की अपने समय में महान् प्रतिष्ठा थी । ये भूत भविष्य के ज्ञाता योगीराज थे । इनकी समाधि हरमाड़े में अब भी पूजी जाती है । 
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भक्तों की मनो- कामनायें भावना के अनुसार अब भी मानने वाकों की पूर्ण होती हैं । ये महान् संत हुये हैं । इनकी चरण चौकी में वि. सं. १७०८ अंकित है । ३-महन्त सीताबाईजी । ४ महन्त रामसुखदासजी । ५-महन्त सीतारामजी । ६-महन्त दुईदासजी । ७- महन्त रामदासजी । ८-महन्त लालदासजी । ९- महन्त ब्रिज-मोहनजी वर्तमान हैं । 
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बाईजी के थांभे के महन्त प्रथम चेतनदासजी ने एक महल बनवाया था । वह महल बहुत सुन्दर था और सर्व महलों से प्रथम था । वह वर्तमान भंडार(टीन) के उत्तर में गरीब-दासोतों की पिछली सीढ़ियों के दक्षिण में स्थित भू भाग पर अवस्थित था किन्तु अब नष्ट हो चुका है । अब केवल एक चौक के रूप में है । इसी महल के कारण इस रामकुमारीजी की परंपरा के संतों की संज्ञा महलका हो गई थी । इस महल की ज्ञात संत परम्परा में महल के महन्त कनिरामजी थे । ये दादूद्वारे के भण्डारी होने से भंडारी कनिरामजी कहलाते थे । उनके उत्तराधिकारी महन्त श्योरामजी महलका(गरीबनिवाज) थे । उनके उत्तराधिकारी तोलारामजी हुये जो आचार्य प्रकाशदेवजी के ख़ास बड़े भ्राता थे । वर्तमान में कानदासजी हैं । 
(क्रमशः)

*४७. अध्यातम कौ अंग ६१/६४*

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*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
*श्रद्धेय श्री Tapasvi @Ram Gopal Das की प्रेरणा से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Meta AI*
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*४७. अध्यातम कौ अंग ६१/६४*
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त्रिकुटी५ आगै भीजिये, सो हूनर हरि नाउं ।
कहि जगजीवन नीपजै, नूर पिवै निज ठाउं ॥६१॥
(५. त्रिकुटी=भौंहों के मध्य कुछ ऊपर का स्थान)
त्रिकुटी से आगे भीगना, डूबना ही हरि नाम का सच्चा हुनर है । हे नर ! सच्चा मनुष्य वही है जो इस हुनर को करे, वही प्रधान कर्ता है । जो कर्ता होते हुए भी अकर्ता रहे, देह में रहते हुए भी विदेह रहे ।
जगजीवन जी महाराज कहते हैं - तर्क-वितर्क, चतुराई हुनर नहीं है । सच्चा हुनर, सच्ची कला तो यही है कि तुम उस नाम में भीग जाओ, डूब जाओ । फिर तुम नहीं रहते, बस हरि ही रह जाता है ।
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हूनर तू नर नांव नर, करतब करता६ एह ।
कहि जगजीवन करै अकरता, देही मांहि बिदेह ॥६२॥
(६. करतब करता=प्रधान कर्ता)
संत जगजीवन जी कहते हैं, नर कहलाने लायक नर तो वही है जिसमें यह हुनर है । और यह हुनर क्या है ? यही कि वह कर्ता होते हुए भी अकर्ता हो जाए । हम सब कर्ता हैं - मैं कर रही हूँ, मैंने किया । इसी 'मैं' से सारा बंधन बनता है । सच्चा नर वह है जो संसार के सारे काम करे - सेवा भी करे, व्यवहार भी निभाए, पर भीतर से जाने कि करने वाला मैं नहीं, कराने वाले दादूजी है । हाथ उसके, सत्ता हरि की । जैसे एक अच्छी नौकरानी घर का सारा काम करती है पर जानती है घर मेरा नहीं है । और जब कोई कर्ता होते हुए भी अकर्ता हो गया, तो वह देह में रहते हुए भी विदेह हो गया । शरीर में है, पर शरीर का नहीं है । कमल के पत्ते पर पानी की तरह ।
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षिर मंहि अक्षर खोज हरि, तो खिरै न कबहूं खोड़ि७ ।
कहि जगजीवन नांव भजि, वपु मंहि बावन जोड़ि८ ॥६३॥
(७. खोड़ि=गड्ढा, खोखला । ८. बावन जोड़ि=शरीर ५२ बंधनों से बंधा)
सिर के अंदर ही हरि रूपी अक्षर को खोज लो तो शरीर कभी खोखला नहीं होगा । जगजीवन जी महाराज कहते हैं नाम को भजो, ये शरीर ५२ बंधनों से बंधा है ।
("वपु मंहि बावन जोड़ि" - इसके दो बहुत ही सुंदर अर्थ हैं, 
१. पहला अर्थ - ५२ अक्षरों का जाल : हमारी हिंदी वर्णमाला में मूल ५२ अक्षर माने गए हैं( स्वर-व्यंजन मिलाकर)। संत कहते हैं कि यह सारा संसार इन ५२ अक्षरों के जाल से ही बना है । शास्त्र, वेद, पुराण, झगड़ा, तर्क-वितर्क, मान-बड़ाई सब इसी बावन अक्षर में उलझा है । यह पढ़ा-लिखा ज्ञान है, पर यह मुक्त नहीं करता । और हरि रूपी एक अक्षर - जो अ + क्षर = जिसका नाश न हो, वह अविनाशी नाम है । वह आँखों से पढ़ा नहीं जाता, वह तो सुरति से खोजा जाता है । तो जगजीवन जी महाराज कहते हैं - बाहर के बावन में मत उलझो, अंदर के एक अक्षर(नाम) को खोज लो ।
२. दूसरा अर्थ - शरीर के ५२ बंधन : संत-वाणी में शरीर को बंधनों का घर कहा है । मोटे तौर पर गिनें तो - 
५ ज्ञान इंद्रिय + ५ कर्म इंद्रिय + ५ तत्व + ५ तन्मात्रा + मन + बुद्धि + चित्त + अहंकार = २४
५ मुख्य प्राण (प्राण, अपान, समान, उदान, व्यान) + ५ उप-प्राण (नाग, कूर्म, कृकल, देवदत्त, धनंजय) = १०
३ शरीर के बंधन - स्थूल, सूक्ष्म, कारण + ३ गुण - सत, रज, तम = ६
६ विकार - काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर + ६ अवस्थाएं - भूख, प्यास, शोक, मोह, जन्म, मृत्यु = १२
इसीलिए कहते हैं - "कहि जगजीवन नांव भजि" - इन बंधनों को काटने का एक ही उपाय है, नाम भजन । जैसे ही नाम की धारा अंदर जागती है, ये सारे बंधन ढीले पड़ जाते हैं ।)
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पवन पिंगला१ रवि तपै, चन्द्र पंगुला२ मन ।
कहि जगजीवन मद्धि घर, राम रटै निज जन ॥६४॥
(१. पिंगला=दक्षिण भाग की नाड़ी । २. पंगुला=इड़ा नाड़ी)
पिंगला नाड़ी में सूर्य जैसा पवन तपता है और इड़ा नाड़ी चंद्रमा जैसी शीतल है, जगजीवन जी महाराज कहते हैं ज्ञानी जन इनके मध्य घर में राम को रटता है ।
(क्रमशः) 

बुधवार, 23 सितंबर 2026

बाइयों का समाज में समादर

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*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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*मना ! जप राम नाम लीजे,*
*साधु संगति सुमिर सुमिर, रसना रस पीजै ॥*
================
दादूजी के दरबार रहिये जनम भरि,
तोहू काहू बात की कमी न दीखे काई जी ।
तुमको संतोष वे को विधना संवारी आप,
छाजन भोजन करि सर्व सुखदाईजी ॥
हमतो दर्श देखि अति ही निहाल भये,
और अब कहा कहैं मुख से बनाई जी ।
बार बार कर जोरि बीनती करत राजि,
सुन्दर को हंसिकर सीख दीजे बाईजी ॥४॥
उक्त मनहर में बाईजी के समय में नारायणा दादूधाम में संतों को जो अनुकूलतायें थीं, उनका प्रदर्शन करते हुए, बाईजी के कार्य और विचारों से प्रसन्न होकर सुन्दरदासजी नारायणा दादूधाम से विचरने के लिए बाईजी से आज्ञा मांग रहे हैं ॥
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इन्दव –
पीछे तुम्हार हि आय मिलै सब छाजन भोजन जे कछु कीजे ।
आदर मान सबै विधि पाइये नाम तुम्हारो जहां तहां लीजे ॥
बार हि बार कहा तुमसे कहैं सुन्दर की अरदास सुनीजे ।
चित्त हमारो भयो रमि वे करि बाईजी वेगि रजा मोहि दीजे ॥५॥
उक्त इन्दव में बाईजी का प्रभाव बताते हुए जाने की आज्ञा मांग रहे हैं ।
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जे तक द्यौस रहे दरबार में जानत हैं बड़ भाग हमारो ।
जैसी तुम्हारी कृपा हम ऊपर तैसी सदाहि रहो इक सारो ।
मारग चालत होत परिश्रम आबत जात अत्यन्त उन्हारो ।
सुन्दरदास कहै कर जोर जु, बाईजी आयुस पाऊं तुम्हारो ॥६॥
उक्त इन्दव में बाईजी का अपने प्रति स्नेह प्रदर्शित करते हुये तथा अधिक उष्णकाल आ रहा है मार्ग चलने में अति परिश्रम होगा । यह कह कर जाने की आज्ञा शीघ्र मांग रहे हैं ।
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उक्त सवैया सप्तक से सभाकुमारी बाईजी का महत्व प्रकट होता है । सुन्दरदासजी जैसे महान् संतों के ह्रदय में भी सभाकुमारी(रामकुमारी) जी के प्रति कितना आदर है, यह उक्त सप्तक से सूचित हो जाता है । रूपकुमारीजी(श्याम कुमारी) जी बहुत कम बोलती थीं । वह ब्रह्म भजन में लीन रहती थीं । दोनों साथ रहने से जब भी बोलने का प्रसंग आता था तब सभाकुमारीजी बोला करती थीं ।
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राघवदासजी ने भी अपनी भक्तमाल में युगल बाइयों के विषय में दो मनहर दिए हैं, वे भी यहां दिए जाते हैं । उनसे भी ज्ञात होगा कि बाइयों का समाज में कैसा समादर था~
दादूजी के पाट को प्रताप देख्यो दशों दिशि,
रामा श्यामा बाई राजे दोउ ओर चढती ।
दर्शन को आवें संत महन्त प्रवीन१ दीन,
आतमा अनन्त दीसे जै जै कार पढ़ती ।
निरंजन निराकार अलख अपरंपार,
ऐसे रहे रात दिन राम राम रटती ।
राघो कहै ऋद्धि सिद्धि छाजन२ भोजन यश,
जानराय कीन्ही जान सर्व बात बढ़ती ॥४८२॥
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दादूजी की गद्दी का प्रताप उस समय दशों दिशाओं में फैला हुआ देखा जाता था । दादूजी की गद्दी के दोनों ओर रामा(रामकुमारी) और श्यामा(श्याम कुमारी) दोनों बाई बैठी हुई दिखाई देती थीं । एक और रामकुमारीजी और दूसरी ओर श्यामकुमारीजी का दर्शन होता था । (ये उस बीच के समय में ही बैठती थीं जब केवलदासजी ने गद्दी छोड़ी और मसकीनदासजी नहीं बैठे थे) । दोनों बाईजी ध्यान तथा ज्ञान दोनों ही दिशाओं में बढ़ती हुई संतों को ज्ञात होती थीं ।
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दोनों बाईजी के दर्शन करने-सन्त,महन्त, विद्वान१ तथा दीन गरीब सभी आते थे । उनके पास जय ध्वनि करती हुई अनेक आत्मायें देखि जाती थीं । दोनों बाईजी निरंजन, निराकार, अलख और अपरंपार ब्रह्म का नाम रात दिन रटते हुये प्रभु-प्रेम में ऐसे निमग्न रहती थीं, जैसे जल में मछली । राघवदासजी कहते हैं- दोनों बाईयों के पास ऋद्धि, सिद्धि, वस्त्र२, भजन आदि की कुछ भी कमी नहीं रहती थी । जानराय भगवान् ने उनकी अवस्था जानकर उनकी सर्व बातों में वृद्धि कर दी थी और उनका सुन्दर यश भी बढ़ा दिया था ।
(क्रमशः)

*४७. अध्यातम कौ अंग ५७/६०*

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*श्रद्धेय श्री Tapasvi @Ram Gopal Das की प्रेरणा से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Meta AI*
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*४७. अध्यातम कौ अंग ५७/६०*
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झिलमिल जोति पिछांणिये, तेजहि झमकै तार ।
कहि जगजीवन तहां हरि, अम्रित झरै रस सार ॥५७॥
जहाँ झिलमिल करती ज्योति है, जहाँ तेज के तारे झमकते हैं, संत जगजीवन जी कहते हैं वहीं हरि हैं और वहीं से सार रूपी अमृत रस झरता है ।
(जब साधक दसवें द्वार पर सुरति टिकाता है, तो पहले अंधेरा नहीं, एक झिलमिलाती हुई ज्योति दिखती है । जैसे बरसात में बादलों के बीच बिजली झिलमिलाए । यही आत्मा की पहली झलक है । उस झिलमिल ज्योति में आगे चलकर स्थिर तारे जैसा तेज प्रकट होता है । संतों ने उसे ही गुरु का तारा, या सुरति का तारा कहा है । वह टिमटिमाता नहीं, एकटक चमकता है । वही हरि का द्वार है। हरि कोई मूर्ति नहीं, वही प्रकाश-पुंज है, जब सुरति उस तारे में लय हो जाती है, तब वहाँ से अमृत की बूँदें टपकती हैं । योगियों ने इसे सहस्त्रार से झरता अमृत कहा है । उस एक बूँद से मन का सारा खारापन, सारा विषय-विकार मिट जाता है । फिर बाहर का कोई रस अच्छा नहीं लगता)
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नाम निरंजन निरामै२, नाराइण निज रूप ।
कहि जगजीवन निरंतर, निरगुण निरखि अनूप ॥५८॥
(२. निरामै=रोग रहित)
जगजीवन जी महाराज कहते हैं निरंजन का नाम ही रोग-रहित करने वाला है, वही नारायण का अपना रूप है । उस अनुपम निरगुण को निरंतर देखो ।
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हरि हूनर३ नर नीपजै, उपजै भगति अगाध ।
कहि जगजीवन समझि लै, सकल सिखावैं साध ॥५९॥
(३. हूनर=हुनर, कला)
सच्चा हुनर वही है जो मनुष्य में हरि को प्रकट कर दे और अगाध भक्ति उपजा दे । संत जगजीवन जी कहते हैं, जिस हुनर से हरि मिले, वही सबसे श्रेष्ठ है, सभी संतों का यही मत है ।
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जिस हूनर हरि मंहि रहै, सोइ सिरै करि जानि ।
कहि जगजीवन दूसरा, हूनर नहीं है हानि४ ॥६०॥
(४. हानि=अनर्थ, नुकसान)
जगजीवन जी महाराज कहते हैं जिस हुनर से हरि में स्थिर रह सकें उसे ही श्रेष्ठ समझा जाय, इनसे अलग जो हुनर दिखे वह हुनर नहीं हानि ही है ।
(क्रमशः)  

मंगलवार, 22 सितंबर 2026

युगलबाईजी की भेंट के सवैये

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🌷*卐 श्री दादूदयालवे नम:  卐*🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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*आत्म बोधी अनुभवी, साधु निर्पख होइ ।*
*दादू राता राम सौं, रस पीवेगा सोइ ॥*
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*युगलबाईजी की भेंट के सवैये =* 
अब युगलबाईजी पर छोटे सुन्दरदासजी की श्रद्धा का परिचय देते हैं, देखिये~ मनहर~
दादूजी के पीछे तो चलाई है गरीबदास, 
ताके पीछे बाईजी चलावत है चौगनी । 
जोई आवे भेट भाव कोउ लेहु कोई खाय, 
राखिये को नाहीं चाव देने ही की सुनी ॥ 
अति ही गंभीर धीर शीतल ज्यों गंगनीर, 
पायो है जु पुरो पीर परम महामुनी । 
सुन्दर विराजै जोर दरबार दोउ ओर, 
संत बैठे-ठौर ठौर दर्शन करे दुनी ॥१॥ 
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उक्त मनहर से ध्वनित होता है कि गरीबदासजी के शिष्य केवलरामजी ने जब गद्दी त्याग दी थी तब बाईजी ने गरीबदासजी से भी चौगनी आचार्य की रीति नीति का निर्वाह किया था । आप गद्दी के बराबर बैठ कर आचार्य का सब कार्य करती रहीं थीं । जब संतों का दरबार लगता था तब गद्दी के दोनों ओर बाइयां बैठकर समाज सम्बन्धी सब विचार किया करती थीं और सबको आचार्य के समान ही आज्ञा देकर समाज को स्थिर रखा था । 
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भगति मुकती भरपूर है भंडार मांहीं, 
रिद्धि और सिद्धि कोउ चाहै सो तहां लहै । 
गुण तो समूह संग ठौर-ठौर राग रंग, 
प्रेम मांहिं भीजे अंग गंग सो गिरा बहै ॥ 
संतन को व्यूह सब आगे बैठो देखियत, 
सभाजी विराजमान सुन्दर कहा कहै । 
वरष वरष प्रति होय जात जै जै कार, 
दादूजी के दरबार दौलत सदा रहै ॥२॥ 
उक्त मनहर में सभाबाईजी के संचालन समय की दादूद्वारे की स्थिति का परिचय दिया है ।
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देश देश ही तैं दौरे आवत सेवक जन, 
दादूजी के दरबार देखन मिलाप जूं । 
जैसे काशी कुरुक्षेत्र मथुरा प्रयाग हेत, 
जात है जगत सब काटन का पाप जू ॥ 
परम पुनीत ठौर ऐसो न तीरथ और, 
जहां के आये से जांहिं संताप जू । 
सुन्दर शोभा अनन्त निशि दिन गावें संत, 
बाईजी विराजें गुरु गादी आपै आप जू ॥३॥ 
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उक्त मनहर में नारायणा दादूधाम को परम पुनीत तीर्थ बताते हुए कहा है कि-बाईजी को आचार्य के अभाव में गादी का संरक्षण करने के लिये समाज ने गादी के पास नहीं बैठाया था किन्तु बाईजी स्वयं ही अपने तप तेज से तब तक गादी का संरक्षण करती थीं, जब तक समाज आचार्य बैठाने पर एक मत नहीं हुआ था । यही अर्थ उक्त मनहर के “बाईजी विराजै गुरुगादी आपै आपजू” से ध्वनित होता है । 
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जब समाज मसकीनदासजी को आचार्य पद पर बैठाने में एक मत हो गया तब बाईजी सभाकुमारीजी अपने साधन धाम बाईजी की पालकां में बैठ कर निर्गुण ब्रह्म की भक्ति करने लग गई थीं । रूपकुमारीजी तो सभाकुमारीजी की अनुगामिनी ही थीं, वह भी उनके साथ ही रहती थीं । दोनों बाईजी की पालकां में ही भजन करती थीं । 
(क्रमशः)

*४७. अध्यातम कौ अंग ५३/५६*

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*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
*श्रद्धेय श्री Tapasvi @Ram Gopal Das की प्रेरणा से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Meta AI*
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*४७. अध्यातम कौ अंग ५३/५६*
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कहि जगजीवन कंवल मंहि, करम रहित करतार ।
उलटि सुरति१ तहां राखिये, निरखि निरंजन सार ॥५३॥
१. सुरति=स्मृति ।
जगजीवन जी कहते हैं, हृदय-कमल में वह करतार बैठा है जो कर्मों से परे है । अपनी सुरति को संसार से उलट कर वहाँ लगाओ और उस सार रूपी निरंजन को देखो ।
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कहि जगजीवन च्यारि जुग, हरि चरचा चित्त राखि ।
हरि चिंतामणि चरचिये, प्रेम सुधारस चाखि ॥५४॥
चारों युगों में बस हरि की चर्चा को ही चित्त में रखो । उस चिंतामणि रूपी हरि का स्मरण प्रेम के अमृत रस को चखते हुए करो ।
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छप्पन भोग लगाइ तहां, जहां निरंजन देव ।
कहि जगजीवन आतमा, परमातम की सेव ॥५५॥
छप्पन भोग वहीं लगते हैं जहाँ निरंजन देव है । आत्मा से परमात्मा की सेवा ही सच्चा भोग है ।
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एहि जुगति अरपै भगति, एहि भाव एहि भेद ।
कहि जगजीवन जागि जन, बिन स्वासा पढ़ि बेद ॥५६॥
इसी युक्ति से, इसी भाव और भेद से भक्ति अर्पण करो । हे जन जागो और बिना श्वास के ही वेद को पढ़ो, अर्थात अजपा जाप करो ।
("बिन स्वासा पढ़ि बेद" का अर्थ, किताब वाला वेद पढ़ना नहीं है । इसका अर्थ है अजपा जाप । 
१. हम लोग माला से या मुँह से जो जाप करते हैं, उसमें श्वास खर्च होती है । 
२. जब सुरति भीतर गगन मंडल में टिक जाती है, तब जाप अपने आप चलने लगता है - बिना जपे । 
३. वहाँ श्वास की डोरी टूट जाती है, प्राण स्थिर हो जाते हैं । 
उसी स्थिरता में वेद का असली भेद समझ में आता है । वही चारों वेदों का सार है - सोऽहम्, तत्त्वमसि । जगजीवन जी महाराज कहना चाहते हैं कि - बाहर के श्वास को रोक कर नहीं, बल्कि भीतर की सुरति को स्थिर करके उस धुन को सुनो जो बिना बजाए बज रही है । वही बिना श्वास का वेद-पाठ है । जैसे मछली पानी में रहते हुए पानी को नहीं जपती, बस उसी में रहती है - वैसे ही जीव राम में रह जाता है)
(क्रमशः)