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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२०. विपर्यय कौ अंग ३७/४०
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पानी फिरै पुकारतौ, उपजी जरनि अपार ।
पावक आयौ पूछनै, सुन्दर वाकी सार ॥३७॥
जब कोई जिज्ञासु अपनी प्रेमा भक्ति से उत्पन्न विरह की अग्नि ज्वाला से सन्तप्त होकर, उस ताप को मिटाने के लिये ज्ञानी जनों को खोजता है तो वे ज्ञानी जन ही उस पर दया कर उसके पास अपनी ज्ञानाग्नि भेजते हैं । उस अवसर पर वह ज्ञानाग्नि ही उस जिज्ञासु की विरहताप से रक्षा(=सार) करती है तो उस का त्रिविध ताप निवृत्त होता है और उसे भगवत्साक्षात्कार हो पाता है ॥३७॥ (द्र० – सवैया : छ० २२/२६)।
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जौ तूं मेरी सीख ले, तौ तूं सीतल होइ ।
फिरि मोही सौं मिलि रहै, सुन्दर दुःख न कोइ ॥३८॥
इस साषी के माध्यम से ज्ञान प्रेम से कहता है - यदि स्वभाव से शीतल तूं मेरी सीख(उपदेश) मान ले तो तूं सदा शीतल रह सकता है । तब हम दोनों एक दूसरे से सम्प्रुक्त हो सकते हैं । (कहने का तात्पर्य यह है - भक्ति की प्रथम अवस्था में जिज्ञासु को अवश्य द्वैतभाव रहता है, जिसके कारण उस को अपने उपास्य के प्रति विह्वलता होती है; परन्तु वह साधना करते करते जब पराभक्ति की साधना की पराकाष्ठा पर पहुँच जाता है, तब वह उसकी ज्ञान दशा होती है । वहाँ पहुंचने पर उसे निरञ्जन निराकार प्रभु का साक्षात्कार हो जाता है । उस समय उसकी उस जलन का कोई ठौर ठिकाना भी नहीं मिलता और वह निरन्तर ब्रह्मानन्द में निमग्न लगता है ।) ॥३८॥ (द्र० – सवैया : २२/छ० २६ उ०) ॥
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पंथी मांहे पंथ चलि, आयौ आकसमात ।
सुन्दर वाही पंथ गहि, उठि चाल्यौ परभात ॥३९॥
पन्थी मुमुक्षु सन्त साधक के पास पन्थ(ज्ञान) स्वयं अकस्मात् पहुँच गया । उस पन्थ के पन्थी में प्रविष्ट होते ही ब्रह्मप्राप्ति का वह विशेष अवसर = प्रातः काल, ब्राह्ममुहूर्त आते ही वह पन्थी उस पन्थ(ज्ञान) पर आरुढ होकर प्रभुसाक्षात्कार हेतु चल दिया(साधना आरम्भ कर दी) ॥३९॥ (द्र० - सवैया २२/छ० २८) ॥
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चलत चलत पहुंच्यौ तहां, जहां आपनौ भौंन ।
सुन्दर निश्चल ह्वै रह्यौ, फिरि आवै कहि कौंन ॥४०॥
चलते चलते(साधना करते करते) वह साधक(पन्थी) प्रभु के उस अविनाशी स्थान पर पहुँच गया जो उसका अपना निजी भवन कहलाता है । जहाँ साधक एक बार पहुँच जाने पर वहाँ से पुनः लौटने की इच्छा ही नहीं करता । (तु०- गीता : "यद् गत्वा न निवर्तन्ते तद् धाम परम सम" - १५/६)। वहाँ निश्चल बैठ कर भगवद्ध्यान में मग्न हो गया ॥४०॥ (द्र० - सवैया २२/छ० २८) ॥
(क्रमशः)


















