*🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏*
*🌷卐 सत्यराम सा 卐🌷*
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
.
*२१. भजन भेद का अंग ~२५/२७*
.
*जन रज्जब विछुड़त मरहिं, जिनके अमल अराध ।*
*मनसा वाचा कर्मना, साखी सद्गुरु साध ॥२५॥*
जिनके हृदय में स्वार्थ-मल रहित परमात्मा की भक्ति है, वे प्रभु के वियोग दु:ख से व्यथित होकर मर जाते हैं । यह बात हम मन, वचन, कर्म से सत्य ही कहते हैं, इसमें सद्गुरु और संतों की भी साक्षी है ।
.
*निति निवृत्ति प्रभुता प्रभु, चतुर स्थान कर गौन ।*
*रज्जब पावे प्राण पति, भृत्य भगवंत सु भौन ॥२६॥*
व्यवहारिक नीति, वैभव स्वामीपना और वैराग्य का अभिमान, इन चारों से दूर रहने वाला भक्त ही भगवान के भवन को जाकर प्राणपति परमेश्वर को प्राप्त करता है ।
.
*शरीअत सेव शरीर की, तरीकते दिल राह ।*
*माँहिं मारफत कीजिये, हकीकत मिल जाह ॥२७॥*
मुसल्मानी धर्म की चार अवस्थाओं द्वारा भजन-रहस्य बता रहे हैं - दोनों कानून रूप शरीअत में तो भजन द्वारा भी शरीर की ही सेवा में लगा रहता है । शुद्धाचरण रूप तरीकत में मन से प्रभु का मार्ग पकड़ता है । अध्यात्म विद्या रूप मारफत में ईश्वरीय ज्ञान का विचार करता है । मूल तत्त्व ब्रह्म में निष्ठा रूप हकीकत में पहुँचने पर ब्रह्म में ही मिल जाता है । इस प्रकार अवस्था भेद से भजन भेद भी होता है ।
.
*धर्म योग ब्रह्मांड मध्य, कर्म योग पिंड माँहिं ।*
*भक्ति योग सो प्राण घर, अगम योग ठहराँहि ॥२८॥*
धर्म योग सभी ब्रह्माण्ड में व्याप्त है वा धर्म योग का साधक ब्रह्मांड में ही रहता है । कर्म योग व्यक्ति की भावना से भिन्न-भिन्न होने से शरीर में ही है वा शरीर से होता है भक्ति योग प्राणी के हृदय रूप घर में होता है । उक्त तीनों योगों से प्राणी गतिशील रहता है किन्तु ब्रह्मचिन्तन द्वारा प्राप्ति रूप अगम योग से योगी ब्रह्म में स्थिर होकर ब्रह्म रूप ही हो जाता है । अत: ब्रह्म चिन्तन ही रहस्यमय भजन है ।
(क्रमशः)



बहुत श्रेष्ठ प्रवचन है।



















