मंगलवार, 2 जून 2026

*१५. विरक्त् का अंग ~२५/२८*

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*🌷卐 सत्यराम सा 卐🌷*
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*१५. विरक्त् का अंग ~२५/२८*
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*विरक्तताप हुं पौणि१ की, सो सम कही न जाय ।*
*बीज२ बुहारी की पङिणीं३, नर देखो निरताय४ ॥२५॥*
हे नरो ! विचार४ करके देखो, घर में बिजली२ के पड़ने३ से और बुहारी के पड़ने से एक सा ही संताप होता है क्या ? अर्थात नहीं, वैसे ही भगवद् वियोग जन्य ताप विरक्त संत की और पशु१ समान अज्ञानी प्राणी की समान नहीं कही जाती ।
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*धौ गति टूटे एक को, सालर गति सब कोय ।*
*रज्जब टूटा सो भला, जो फिर हर्या१ न होय ॥२६॥*
सालर वृक्ष की डाली टूट कर पृथ्वी के संबंध से पुन: हरी हो जाती है, ऐसे ही विरक्त होकर पुन: विषयों में अनुरक्त होने वाले तो सभी हैं अर्थात दोष दृष्टि से सभी को वैराग्य होता रहता है किन्तु वे पुन: राग में फंस जाते हैं । धोकड़ा वृक्ष की डाली टूट जाने पर पुन: हरी नहीं होती, ऐसे ही जो विरक्त होकर पुन: विषयों में राग नहीं करता ऐसा कोई विरला ही होता है और जो विरक्त होकर पुन: अनुरक्त१ नहीं होता वही विरक्त श्रेष्ठ होता है ।
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*मिहरी मूंगोड़ी भई, साधू मन भया काग ।*
*जन रज्जब जो यूं तजे, ताके मोटे भाग ॥२७॥*
जैसे मूंगोड़ी को काक पक्षी नहीं खाना चाहता, वैसे ही संत का मन नारी संग नहीं चाहता । जैसे काक ने मूँगोड़ी तजी वैसे ही जो नारी को तज देता है उसका विशाल भाग्य है ।
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*मूंगोड़ी वायस तजी, त्यों वैरागी तज वाम१ ।*
*पंखी की पर२ लीजिये, रज्जब सरे सु काम ॥२८॥*
जैसे काक पक्षी ने मूंगोड़ी तजी है वैसे ही हे विरक्त तू नारी१ को त्याग दे । पक्षी की यह श्रेष्ठ२ शिक्षा धारण कर वा पक्षी जैसे अपने पंख२ को त्याग कर पुन: धारण नहीं करता, वैसे ही नारी को त्याग कर पुन: उसे धारण मत कर तभी तेरा मुक्ति रूप कार्य सम्यक सिद्ध होगा ।
(क्रमशः)

*१५. विरक्त् का अंग ~२१/२४*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*१५. विरक्त् का अंग ~२१/२४*
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*बादल वायु वारि नर मोती, सगुण निर्गुण राखे राग ।*
*केलि कपूर बहुरि नहिं आवे, यूं रज्जब बींधा वैराग ॥२१॥*
बादल, वायु, जल, नर मोती और सगुण हैं, किन्तु निर्गुण में प्रेम रखते हैं । बादल, आकाश में ही रहता है, वायु आकाश में ही चलता है, पृथ्वी पड़ा जल आकाश में ही चढ़ता है । आकाश में इन्हें धारण करने का कोई गुण भी नहीं है किन्तु फिर भी उक्त तीनों का प्रेम आकाश में है । नर गुणों से युक्त होने पर भी निर्गुण ब्रह्म से प्रेम करता है । मोती बहु गुण युक्त होने पर भी हीन गुण वाली सीप में ही प्रेम करता है, अन्य में नहीं बनता, किन्तु फिर भी ये कपूर और विरक्त के समान नहीं हो सकते । कपूर केले में बनता है फिर भी केले से उड़ जाने के पीछे पुन: केले में नहीं आता, वैसे ही विरक्त संसार में जन्मता है किन्तु वह वैराग से इतना विद्ध हो जाता है कि पुन: संसार में नहीं जन्मता । अत: विरक्त का ही निर्गुण प्रेम सफल है, बादल आदि का नहीं कारण वे पुन: पुन: सगुण संसार में आते रहते हैं ।
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*धन्य जु निकस्या धोम ज्यों, रह्या शून्य१ कर सीर२ ।*
*रज्जब तीर कमान ज्यों, निकसि फिरै बहु वीर ॥२२॥*
धनुष से बाण जाता है और पुन: वीर के द्वारा कमान पर चढाया जाता है ऐसे विरक्त तो संसार में बहुत हैं जो घरादि को त्याग देते हैं और पुन: भोग-वासना के द्वारा जन्मादि संसार में आते हैं, किन्तु जैसे रसोई से निकला हुआ धूआँ पुन: रसोई में नहीं आता है, आकाश१ में लीन२ हो जाता है, वैसे ही संसार भावना से निकल कर पुन: भोग-भावना से जन्मादि संसार में नहीं आता है, ब्रह्म१ में लीन हो जाता है वही विरक्त वीर धन्य है ।
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*प्राणी पारे परि१ रमहिं२, वामा३ वैद्य न दूर ।*
*उभय न पावे उभय कर, जो ह्वै गये कपूर ॥२३॥*
अग्नि संस्कार करते समय जब तक वैद्य पास रहता है तब तक पारा उड़ नहीं सकता, वैद्य के वश में पड़ने१ से अपने आधार पात्र में ही विचरता२ है । वैसे ही जब तक प्राणी नारी३ के वश में पड़ा रहता है तब तक तो घर में रहता है । वैद्य दूर चला जाय और पारा कपूर के समान उड़ जाय तो फिर वैद्य के हाथ नहीं आता । वैसे ही जो पुरुष नारी के दूर रहने पर सत्संग द्वारा परम विरक्त होकर घर से निकल जाय तो वह भी उड़े हुये कपूर के समान फिर नारी के हाथ नहीं आता ।
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*पारे प्राणि कपूर है, उभय उडै सम साथ ।*
*एक सु वामा वैद्य कर, एक सु नाम हिं हाथ ॥२४॥*
पारा और प्राणी कपूर के समान हैं, जैसे कपूर उड़ जाता है वैसे ही उक्त दोनों ही उड़ जाते हैं किन्तु जैसे काली मिरचों के साथ रहने पर कपूर नहीं उड़ पाता है वैसे ही वैद्य के अधीन पारा नहीं उड़ पाता है और नारी के अधीन प्राणी विरक्त नहीं हो पाता । पारा वैद्य के हाथ के हाथ में रहता है और पुरुष नारी के हाथ में रहता है, किन्तु जो पारा अपनी ख्याति के हाथ में आ जाता है अर्थात् पारा उड़ने वाला है, यह प्रसिद्ध है अत: जो उड़ जाता है वह वैद्य के अधीन नहीं रहता तथा जो पुरुष भगवान् नाम के हाथ आ जाता है अर्थात निरंतर नाम चिन्तन करता है वह विरक्त हो जाता है और जैसे कपूर उड़ कर आकाश में मिल जाता है वैसे ही भोग-वासना को त्याग कर ज्ञान ब्रह्म में मिल जाता है, वह नारी के अधीन नहीं रहता ।
(क्रमशः)

२६. बिचार कौ अंग २१/२४

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२६. बिचार कौ अंग २१/२४ 
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भोपा भोपी आइ कै, बहुत लगायौ दोष । 
सुन्दर या ऊपर कियौ, देवी देवन रोष ॥२१॥
अविवेकी ओझा(मन्त्रवैद्य) : तब किसी ओझा(भोपा) को या उसकी स्त्री को, वहाँ उस रोगी की चिकित्सा के लिये, बुलाया जाय । वह, आते ही, उस पर किसी देवी या देवता का कोप बताकर उस पर नाना प्रकार के दोष लगावे ॥२१॥
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अपनी अपनी सब कहै, अटकर परै न कोइ । 
सुन्दर बहुत मता सुने, कछू बिचार न होइ ॥२२॥
ये सभी तथाकथित(अविवेकी) ज्ञाता, अपनी अपनी बुद्धि के अनुसार, रोग निवृत्ति के अनेक उपाय बताते हैं; परन्तु उनकी कोई भी युक्ति(अटकल) या उपाय सफल नहीं होते । इस प्रकार, हमने अनेक विद्वानों के अभिमत सुने । किन्तु चिन्तन करने पर इनमें कोई भी मत विचारसरणि पर नहीं चढ सका ॥२२॥
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जे बिषई अत्यंत करि, रहै बिषै फल खाइ । 
सुन्दर मावस की निसा, अभ्र रहे अति छाइ ॥२३॥
भ्रान्ति का एक उदाहरण : कोई लौकिक विषयासक्त पुरुष मेघों से आवृत अमावस्या तिथि को उन विषयों से मुक्ति का उपाय जानने के लिये किसी योग्य गुरु के पास पहुँचा ॥२३॥
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कोऊ एक मुमुक्षु कौं, दीयौ गुरु उपदेश । 
सुन्दर वा सौं यौं कह्यौ, यह संसार कलेश ॥२४॥
गुरुदेव ने उस को विषयभोगों की हीनता बताते हुए इस नश्वर संसार को क्लेशमय(दुःखमय) बताया ॥२४॥
(क्रमशः)

*बाणी बरसै सबद सुहावै ॥*

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*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*वसुधा सब फूलै फलै, पृथ्वी अनंत अपार ।*
*गगन गर्ज जल थल भरै, दादू जै जै कार ॥*
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साधु महिमा ॥ साषी लापचारी की ॥१ 
(१. इन साषियों का अर्थ ‘गुरुदेव कौ अंग’ में देंखे ।)
बषनां बाणी बरसणी, बरसै गहर गँभीर ।
सूका नैं हरिया करै, गुर बाणी कौ नीर ॥
बषनां बाणी बरसणी, अंमृत बरसण लाग ।
बैणाँ पुणिगाँ वोसरी, भीगा ज्याँह सिरि भाग ॥
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पद ॥
*बाणी बरसै सबद सुहावै ॥*
कनरस भरि भरि हरिरस पीवै, हरि भगताँ नैं थावै ॥टेक॥
साध सीप संसार समंदा, तामैं लिपत न थावै । 
स्वाति बूंद सौं हरि रस बरसै, मन मोती होइ आवै ॥
रूँख बिरख बाबा की बाड़ी, केला भेला ठाँई । 
काया केलि मैं हरि रस बरसै, व्है कपूर ता मांहीं ॥ 
डूंगर हरिया सरवर भरिया, नीर निवाणाँ सरिया । 
फूली फली प्रत्थमी सगली, बाबै आनँद करिया 
दादुर मोर बबीहा बोलै, और जलचराँ जीवैं ।
बषनां बाणी हरि रस बरसै, साध सवाया पीवै ॥१३८॥
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परहित-निरत-संत-महात्मा सभी के लिये हितकारी अपरोक्षानुभूतियुक्त उपदेश देते हैं जो सभी सुनने वालों को प्रियकर लगता है । वे संत-महात्मा कानों को प्रिय लगने वाला हरि-गुण-रस स्वयं तो प्याले भर-भर कर पीते ही हैं हरिभक्तों को भी पिलाते हैं जो उन हरिभक्तों को भी प्रिय लगता है ।
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संसार रूपी समुद्र में साध-संत सीप के समान हैं जो संसार में रहते हुए भी संसार के भोगविलासों को ठीक वैसे ही नहीं भोगते हैं जैसे सीप समुद्र में रहकर भी समुद्र-जल का पान नहीं करके स्वाति नक्षत्र का जल ग्रहण करती है । जब हरिरस रूपी स्वाति नक्षत्र का जल बरसता है तब मन मोती हो जाता है । 
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बाबा = परमात्मा की संसार रूपी बाड़ी में केले के वृक्ष के साथ ही अनेकों प्रकार के पेड़ पौधे हैं । अर्थात् संसार में चौरासी लाख प्रकार की जीवा-जोनी साधु-संतों सहित रहती है । जब काया रूपी केले के वृक्ष में हरिरस रूपी वर्षा बरसती है तब वह कपूर में परिणित हो जाती है । 
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उस हरिरस रूपी वर्षा से डूंगर रूपी अहं का शुष्कत्व मिटकर शील, संतोष, क्षमा, दया आदि रूपी घास वृक्षादि से हरा भरा हो जाता है । हृदय रूपी सरोवर रामरस से लबालब भर जाता है । हरिरस रूपी जल, (निवाण = नीची जगह, तलहटी) सुरति रूपी निवाण में अथाह मात्रा में एकत्रित हो जाता है जो आवश्यकतानुसार हृदय रूपी सरोवर को जल से पूरित रखता है । 
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इस हरिरस रूपी वर्षा के जल से शरीर रूपी पूरी पृथिवी ही हरि भरी हो जाती है । वस्तुतः परमात्मा ने साधु-संतों के द्वारा हरिरस का वितरण कराकर आनंद करने का बंदोबस्त कर दिया है । उस हरिरस रूपी वर्षा के जल से कामी, क्रोधी, लोभी, दुराचारी रूपी दादुर, मोर, पपीहा और अनेक जलचर आनंदमग्न होकर हरि गुणों का गान करते हैं और आनंदपूर्वक जगत् में निवास करते हैं । 
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बषनां कहता है ब्रह्मनिष्ठ साधु-संतों की वाणी हरिरस रूपी जल की वर्षा करती है जिसको साधक साधु-संत पूरे उत्साह के साथ सवाया = अधिक से अधिक पीते हैं ॥१३८॥

सोमवार, 1 जून 2026

२६. बिचार कौ अंग १७/२०

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२६. बिचार कौ अंग १७/२० 
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इनि दुहुंवनि कै मध्य है, नव तत्वनि कौ लिंग । 
सुन्दर करै बिचार जब, उहै होत तब भंग ॥१७॥
लिङ्गशरीर : रूप और आत्मा के मध्य नौ तत्त्वों से निर्मित एक लिङ्गशरीर(कारण शरीर या सूक्ष्म शरीर) भी है । सुन्दरदासजी कहते हैं - जब विवेकपूर्वक चिन्तन किया जाय तो वह भी विनाशी ही ज्ञात होगा ॥१७॥
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पंच तत्व सौं मिलि रह्यौ, सूक्षम लिंग शरीर । 
सुन्दर एक बिचार बिन, चेतन मानत सीर ॥१८॥
यह सूक्ष्म शरीर भी पञ्च तत्त्व(पृथिवी, जल, अग्नि, वायु, आकाश) से मिला हुआ है । श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - (अज्ञानावृत)आत्मा, विवेक न होने के कारण, इसमें आसक्ति कर लेता है ॥१८॥
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ज्यौं काहू कै रोग ह्वै, नाडी देखै बैद । 
सुन्दर अपनी सी कहै, वायु कियौ तन कैद ॥१९॥
अविवेकी वैद्य : जैसे किसी रोगी पुरुष को कोई वैद्य आकर(उसकी नाडी) देखे । वह अपनी बुद्धि के अनुसार, रोगी के शरीर को वात(वायु) रोग से युक्त बता दे ॥१९॥
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बहुरि बुलायौ जोतिषी, उन यह कियौ बिचारि । 
सुन्दर ग्रह लागै सबै, कीये पुन्य उबार ॥२०॥
अविवेकी ज्यौतिषी : पुनः वहाँ किसी ज्यौतिषी को बुलाया जाय । वह उस रोगी को, अपने विचार के अनुसार, अनेक दुष्ट ग्रहों से युक्त बतावे और कुछ पुण्य करने से ही उस के स्वास्थ्य की उन्नति बतावे ॥२०॥
(क्रमशः)

काँयौं डर छै रे घर बार कौ

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*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*सब जग मांही एकला, देह निरंतर वास ।*
*दादू कारण राम के, घर वन मांहि उदास ॥*
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भेष ॥
*काँयौं डर छै रे घर बार कौ ।*
ज्याँह के हिरदै हरि कौ सुमिरण, ता डर नहीं लगार कौ ॥टेक॥
काँयौं घर काँयौं बन मांहीं, यहु छै काम बिचार कौ ।
बैराग लियाँ की कौंण बडाई, जे भार बहै संसार कौ ॥
तनि बैरागी मनि घरबारी, दीठौ ग्यान गवार कौ ।
थोड़ी छोडि घणेरी लागौ, पसारौ सैंवार कौ ॥
चरण चितारै हिरदै धारै, गुर गमि ग्यान अपार कौ ।
तिहि नैं करम न लागै कोई, वो साहिब का दरबारि कौ ॥
सुवा पढावत गनिका तारी, जिहि कै बणिज बिकार कौ ।
अजामेलि से अधम उधारे, जिनि नाम लियौ करतार कौ ॥
घर मैं होते नाम कबीरा, अरु रैदास चमार कौ ।
घर मांहै हरि का गुण गावै, बषनां सिरजनहार कौ ॥१३७॥
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कहते हैं, दादूजी के समतापूर्ण बर्ताव पर उनके शिष्यों में यह चर्चा चली कि बषनांजी गृहस्थ हैं जबकि हम विरक्त हैं ।  फिर भी दादूजी महाराज बषनांजी को भी उतना ही मान सम्मान देते हैं जितना हमको देते हैं । सिद्धांततः महत्व हमको ज्यादा मिलना चाहिये । 
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यद्यपि दादूजी अपने शिष्यों की इस चर्चा से प्रसन्न नहीं थे तथा वे स्वयं भी इसका उचित उत्तर दे सकते थे किन्तु उन्होंने इसका उत्तर बषनांजी से ही उक्त पद के माध्यम से दिलवाया है जिसका स्पष्ट संकेत है कि मात्र स्त्री का परित्याग करके साधु के से वस्त्र पहन लेने से कोई साधु नहीं हो जाता । साधु होने के लिये मन में से विषय-विकारों के प्रति विद्यमान सूक्ष्म से सूक्ष्म राग को भी निकाल देना होता है । 
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विरक्त वह नहीं है जो एक घर को छोड़कर अनेकों मठ मंदिर बनाता और संचालित करता फिरे । वस्तुतः विरक्त तो वह है जिसके मन में से संसार ही नहीं ब्रह्मा के लोक तक के समस्त सुखों के प्रति राग समाप्त हो जाता है । गीता में कहा गया है विषय स्थूल रूप से तो निवृत्त हो जाते हैं किन्तु सूक्ष्म रूप से उसमें राग विद्यमान रह जाता हा जो ही सबसे बड़ा घातक है । यही प्रवृत्ति और निवृत्ति मार्ग की भित्ति है । बषनांज ने इस प्रवृत्ति वाद तथा निवृत्तिवाद पर बहुत ही सुंदर विवेचन इस पद में किया है । 
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“विषया विनिवर्तंते निराहारस्य देहिनः । 
रसवर्जरसोप्यस्य परं दृष्ट्वा निवर्तते ।” 
२|५९ । गीता ॥ 
“कहणी का कहिये भगत, रहणी का संसार । 
रामचरण वै पावसी, जम दरघै बहुमार ॥” 
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घरबार का होना किसी डर का कारण नहीं है । अतः घरबार होने में किस बात का डर है । जिनके हृदय में अहर्निश राम-नाम का स्मरण चलता रहता है, उन्हें घरबार से तनिक भी डर नहीं है । उनके लिये क्या तो घर में रहना और क्या जंगल दोनों ही बंधनकारी भी हो सकते हैं तो अबंधनकारी भी हो सकते हैं । जब अनित्यता का विचार करके घर को छोड़ा जाता है तब तो वह अबंधनकारी होता है किन्तु जब वहीँ घर बिना विचार किये छोड़ा जाता है तब वह बंधनकारी हो जाता है क्योंकि जंगल में रहने पर भी घर गृहस्थ के प्रति राग निवृत्त नहीं होता है । 
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अतः यह विचार का विषय है । भौतिक रूप से त्यागने अथवा न त्यागने का नहीं है । उस वैराग्य धारण करने का क्या महत्व है जिसमें सांसारिक क्रियाकलापों से पीछा नहीं छूटता है । वैरागी संसारी की तरह रामभजन न करके मकान, खेती, धन, दौलत की व्यवस्था करता रहे । वह ज्ञान तो गँवार के ज्ञान के सदृश है जिसमें व्यक्ति शरीर से तो भेष पहनकर वैरागी बन जाता है किन्तु काम से घरबारी ही बना रहता हाउ, प्रवृत्तिमार्ग का अवलम्बन किये रहता है । 
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ऐसा वैरागी एक घर की थोड़ी बहुत सम्पत्ति, शिष्य-प्रशिष्यों का समुदाय एकत्रित कर लेता है । उसका विस्तार सौ गुणा कर लेता है । इसके विपरीत गुरुपदिष्ट ज्ञानानुसार अपार = निर्गुण-निराकार-परमात्मा का जो सदैव चिंतन करते हैं, उसका स्मरण सदैव हृदय से करते हैं, उनको किसी भी प्रकार के परमात्मा द्वारा नियत किये गये कर्मों के फलभोग बंधनकारी नहीं होते है । क्योंकि वे वर्तमान कर्मों को अकर्त्ताभाव से प्रारब्धों को प्रभुप्रसाद समझकर करते भोगते हैं । सचितों ओ समाप्त करने के लिये सदैव भगवद्भजन करते हैं ॥ 
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“क्रीयमाण करिये नहीं, प्रारब्ध कर्म ले भोग । 
संचित ऊपर भजन कर, यौं छूटै भवरोग ॥” 
(श्रीरामजन वीतराग वाणी) 
जिस स्त्री का, गणिका का विषयभोग का व्यापार था, वह भी शुक के साथ राम-नाम का स्मरण करने से मोक्ष पाने की अधिकारिणी हो गई । अजामिल जैसा वेश्यागामी पतितब्राह्माण भी उद्धार को प्राप्त हो गया जिसने परब्रह्म-परमात्मा का नाम स्मरण अपने पुत्र के नाम के बहाने किया । घरबारी ही नामदेव तथा कबीर थे तो घरबारी ही रैदास चमार भी थे । घर में ही बषनां हरि सृजनहार के गुणों का गान करता है ॥१३७॥ 

रविवार, 31 मई 2026

*१५. विरक्त् का अंग ~१७/२०*

*🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏*
*🌷卐 सत्यराम सा 卐🌷*
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*१५. विरक्त् का अंग ~१७/२०*
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*मनसा वाचा कर्मना, गहै न त्यागन हार ।*
*रज्जब रुचे न ऊगले, उर अबला रु आहार ॥१७॥*
जो मन, वचन, कर्म से त्याग देता है, वह पुन: ग्रहण नहीं करता, जैसे वमन करे हुये आहार को ग्रहण करने की इच्छा नहीं होती, वैसे ही त्यागी हुई नारी की इच्छा नहीं होती ।
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*रज्जब रवि को दरशते, अरुचि छींक चखि नीर ।*
*शक्ति सुन्दरी सन्मुखै, सो गति साधू वीर१ ॥१८॥*
सूर्य के समाने देखने से देखने की रूचि नहीं होती, छींकै आने लगती है और नेत्रों में पानी आने लगता है, देखने वाले की स्थिति बिगड़ जाती है, वैसे ही हे भाई१ स्वर्णादि माया और नारी के सामने देखने से विरक्त की स्थिति भी बिगड़ जाती है ।
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*कायर कोट२ हुं सौ गिर हिं, कंध न लेहि करवाल१ ।*
*त्यों अधपति३ अबल४ हुं सु डरि, गहै गरीबी हाल ॥१९॥*
कायर कंधे पर तलवार१ रखकर युद्ध में नहीं जाते तो भी किले२ पर से युद्ध करने वाले वीरों की तलवारों की चमक देख के भय से चक्कर खाकर नीचे गिर जाते हैं, वैसे ही राजा३ लोग विरक्तों के समान काम से युद्ध तो कहां सकते हैं, केवल काम के शस्त्र नारी४ से ही डरकर गरीबी दशा में आ जाते हैं, अर्थात दीन गरीब प्राणी के समान नारी के आगे उसकी गुलामी करते हैं ।
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*साधु सुत के जावणै२, हरि सिद्धि नहिं हेत ।*
*पूत नीपजे मात मरि, खोटा३ खच्चर बेत१ ॥२०॥*
खच्चरी के पेट रूप स्थान१ से जब खच्चर जन्मता है तब पेट को फाड़कर माता के मरने पर ही जन्मता है, अत: माता की दृष्टि से बुरा३ है । वैसे ही परमात्मा के विरक्त संतरूप पुत्र जन्मता२ है तब उसका हरि सिद्धि(माया) से प्रेम नहीं होता है, वह माया को नष्ट करके अर्थात मिथ्या समझ कर के ही होता है ।
(क्रमशः)

शनिवार, 30 मई 2026

२६. बिचार कौ अंग १३/१६

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२६. बिचार कौ अंग १३/१६ 
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सुन्दर ब्रह्म बिचारि है, सब साधन कौ मूल । 
याही मैं आये सकल, डाल पान फल फूल१ ॥१३॥ 
(१ तु० श्रीदादूवाणी : ८/७४
सब आया उस एक में, डाल पांन फल फूल । 
दादू पीछे क्या रह्या, जब निज पकड्या मूल ॥ 
(निज-ब्रह्मविचार))
सूक्ष्म विचार करते करते हम को यही समझ में आया कि ब्रह्मचिन्तन ही भगवत्साक्षात्कार का एकमात्र उपाय है । अन्य छोटे बड़े उपाय तो इसी में डाल, पान, फल फूल के समान सम्पृक्त हो जायँगें ॥१३॥
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कीयौ ब्रह्म बिचार जिनि, तिनि सब साधन कीन । 
सुन्दर राजा कै रहै, प्रजा सकल आधीन ॥१४॥
बात को सरलता से ऐसे समझिये - जिस जिज्ञासु ने भगवत्साक्षात्कार हेतु ब्रह्मचिन्तन उपाय का उपयोग कर लिया, समझ लो कि उसने सभी उपायों(साधनों) का प्रयोग कर लिया; क्योंकि लोक में हम देखते हैं कि समस्त प्रजा एक राजा के ही अधीन होती है । यह ब्रह्मचिन्तन उपाय भी भगवत्प्राप्ति के सब उपायों का राजा ही है ॥१४॥
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परा पश्यंति मध्यमा, हृदये होइ बिचार । 
सुन्दर मुख तैं बैखरी, बांणी कौ बिस्तार ॥१५॥
चतुर्विध वाणी में से परा, पश्यन्ती एवं मध्यमा - इन तीन वाणियों से हृदय में ब्रह्म का चिन्तन होता है और चतुर्थ वैखरी वाणी से उस ब्रह्म का विस्तार(व्याख्यान) होता है ॥१५॥ (तु०- सवैया : २६/८)
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सुन्दर रूप रहै नहीं, रूप रूप मिलि जाइ । 
एक अखंडित आतमा, सब मैं रह्यौ समाइ ॥१६॥
लौकिक रूप, विनाशी होने के कारण, स्थायी नहीं है; वह एक न एक दिन विश्वरूप में मिल ही जायगा । तब शेष में अखण्ड आत्मा रहेगा जो सर्वत्र व्यापक(समाया हुआ) है ॥१६॥
(क्रमशः)

अैसौ गरीब निवाज रमइयौ गाइये

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*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*साहिब जी के नांव में, मति बुधि ज्ञान विचार ।*
*प्रेम प्रीति स्नेह सुख, दादू ज्योति अपार ॥*
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सुमिरण ॥
*अैसौ गरीब निवाज रमइयौ गाइये ।* 
अखै अभै दान ता घरि पाइये ॥टेक॥
ऊपरि वासै तागू तागू, नीचै रइयौ न्हाइ ।
चरणाँ थैं गंगा फिरी, जल विप्राँ मैं जाइ ॥
उत्तिम बाह्मण बाणिया, उत्तिम हरि कौ थान ।
तामैं मद्धिम नामदेव, जिनि मल्यौ विप्राँ कौ मान ॥
अष्टादस व्याकरण बषाणैं, अैसे जीमणहार ।
संख पंचाइण बाजियौ, बालमीक की बार ॥
वै जालै वै गाडण लागे, दुह मैं झगड़ौ येह ।
अदग कबीरा राखियौ, ताकी दगी न देह ॥ 
ज्याँह हरि ध्यायौ त्याँह हरि पायौ, निरफल रह्यौ न कोइ ।
बषनां रमइयौ गाइये, गायाँ या गति होइ ॥१३६॥
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गरीबों पर, दीनों पर दया करने वाले ऐसे रमैयाराम का स्मरण करिये जिसके घर पर कभी भी वापिस न लिये जाने वाला अक्षय, अभय दान मिलता है, अभय शरण मिलती है । 
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गंगा के उपरी भाग में तागू-तागू = यज्ञोपवीतधारी ही यज्ञोपवीतधारी ब्राह्मण स्नान कर रहे थे जबकि एक ओर गहरे जल में भक्तप्रवर रैदास स्नान कर रहे थे । जैसे ही ब्राह्मणों को ज्ञात हुआ कि गहरे जल में रैदास चमार स्नान कर रहा है, उन्होंने रैदास को एक ओर चले जाने को कहा । जैसे ही रैदास ने और दूर जाने का प्रयास किया, गंगा का जल रैदास के चरणों का स्पर्श करके ब्राह्मणों के नहाने के जल की ओर जाने लगा । 
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पंढरपुर में नामदेव पंढरीनाथ के दर्शनार्थ गये । ब्राह्मणों ने अछूत समझकर नामदेव से कहा, भगवान का मंदिर उत्तम है पुजारी व दर्शनार्थी भी ब्राह्मण-बनिये हैं । तुम अधर्मवर्ण वाले कैसे मंदिर में  भगवद्दर्शन करने आ गये । तुम एक ओर चले जाओ । नामदेव मंदिर के पार्श्वभाग में चले गये । तत्काल पंढरीनाथ का मुख मंदिर के पिछवाड़े की ओर हो गया । नामदेव ने समस्त ब्राह्मणों के ब्राह्मणत्व के मान का मर्दन कर दिया ।  
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अठारह व्याकरणों को पढ़ने वाले, शास्त्रों के ज्ञाता ब्राह्मण युधिष्ठिर के यज्ञ में जींमे किन्तु उनके भोजन करने से पंचायण शंख नहीं बजा । पंचायण शंख तो वाल्मीकि सरगरा के भोजन करने पर ही बजा ।  हिन्दू कबीर की देह को जलाने के लिये जिद्द करने लगे जबकि मुसलमान गाड़ने की जिद करने लगे । दोनों के अपने-अपने आग्रहों पर दृढ़ रहने के कारण झगडा होने लगा । 
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परमात्मा ने कबीर की देह को बिना दाग किये ही अपने यहाँ बुला लिया । उसकी देह का दाग ही नहीं हुआ । जिन्होंने भी परात्पर-परब्रह्म-परमात्मा का स्मरण किया है, उन्होंने ही उस परमात्मा को पाया है । कोई की भी भक्ति निष्फल नहीं हुई है । बिना साक्षात्कार के कोई भी रहा नहीं है । बषनां कहता है रमैयाराम का अहर्निश स्मरण करो । स्मरण करने से ऊपर वर्णित भक्तों जैसी गति होती है ॥१३६॥

 

*१५. विरक्त् का अंग ~ १३/१६*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*१५. विरक्त् का अंग ~ १३/१६*
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*रज्जब तूटी त्रिभुवन, करतों त्रिय तिरस्कार ।*
*सो योगी यशवंत जग, जग में जै जै कार ॥१३॥*
नारी का त्याग करते ही तीनों भुवनों के विषय सुखों से वृत्ति हट जाती है, जो तन मन से नारी का त्याग कर देता है, वह योगी जगत् में यश का भागी होता है और उसकी जगत् में जय ध्वनी होती है ।
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*रज्जब आये रहत१ में, उर अबला अनमेल ।*
*तन से तिय तिरस्कार कर, खेल चले यह खेल ॥१४॥*
जो शरीर से नारी का त्याग करके मन से भी नारी से नहीं मिले वे ही यह वैराग्य का खेल खेलकर तथा संसार से चलकर ब्रह्म स्वरूप में आये हैं, अर्थात ब्रह्म१ रूप हुये हैं ।
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*नर नारी न्यारा भया, निकस गया नौ खंड ।*
*रज्जब रखता राम सौं, रही सु माया मंड१ ॥१५॥*
विरक्त नर तन मन से नारी से अलग हो जाता है, उसी समय नौ खंड के विषय सुखों से निकल जाता है और राम में अनुरक्त होकर ब्रह्म रूप हो जाता है, फिर माया उसका क्या कर सकती है ? वह तो ब्रह्मांड१ में ही रह जाती है । ब्रह्म में माया का अभाव है ।
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*रज्जब त्यागी घर घरनि, पर नारी न सुहाय ।*
*अहि अपनी तज काँचुली, का की पहरे जाय ॥१६॥*
जो विरक्त निज नारी का त्याग देता है, उसे पर नारी अच्छी नहीं लगती, सर्प काँचुली त्यागकर किसी अन्य सर्प की पहनने कब जाता है ?
(क्रमशः)

२६. बिचार कौ अंग ९/१२

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२६. बिचार कौ अंग ९/१२
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जैसैं जल महिं कंवल है, जल तैं न्यारौ सोइ । 
सुन्दर ब्रह्म बिचार करि, सब तैं न्यारौ होइ ॥९॥ 
या इस रूप से सोचिये कि जैसे कमल जल में रहता हुआ भी व्यवहार में उससे पृथक् ही रहता है; ऐसे ही उत्तम जिज्ञासु प्राणी, ब्रह्मचिन्तन करता हुआ, संसार से अपना पृथग्भाव बनाये रख सकता है ॥९॥
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मनि अहि कै मुख मैं सदा, बिष नहिं लागै ताहि । 
सुन्दर ब्रह्म बिचारि तैं, सब सौं न्यारौ आहि ॥१०॥
लोक में हम देखते हैं कि विषधर सर्प के मुख में मणि रहने के कारण, उस सर्प पर अपने विष का कोई प्रभाव नहीं होता; इसी प्रकार, उत्तम जिज्ञासु, निरन्तर ब्रह्मचिन्तन करता हुआ, अपने को लोकासक्ति से बचाये रखे ॥१०॥
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सुन्दर एक बिचार तैं, सुख दुख होइ समांन । 
राग दोष उपजै नहीं, तजै मान अपमांन ॥११॥
यदि हम एकमात्र ब्रह्मचिन्तन करते रहें तो हमारे लिये सुख-दुःख को सहन करना एक साधारण बात हो जायगी, राग द्वेष से भी हम दूर हो जायेंगें, तथा लौकिक मान अपमान का भी हम पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा ॥११॥
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सुन्दर एक बिचार सौं, बुद्धि तजै नानत्व । 
जानै एकै आतमा, उपजै भाव समत्व ॥१२॥
जो जिज्ञासुभक्त निरन्तर ब्रह्मचिन्तन करने लगेगा, तो शनैः शनैः उसकी बुद्धि का जगद्विषयक नानात्व भ्रम स्वतः मिट जायगा । साथ ही वह सभी प्राणियों में एक ही आत्मा समझता हुआ सर्वत्र समबुद्धि भी हो जायगा ॥१२॥
(क्रमशः)

मोहि सबल भरोसा राम का

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*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*श्रम नहीं सब कुछ करै, यों कल धरी बनाइ ।*
*कौतिकहारा ह्वै रह्या, सब कुछ होता जाइ ॥*
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भक्तमहिमा ॥
मोहि सबल भरोसा राम का ।
परचा सूँ सेवियै परमेसुर, आन धरम किस काम का ॥टेक॥
नामाँ परि सुलतानी कोपे, ले गये मांडौ मीर का ।
मूई गाइ जिवाई कैसौ, बडा मता बै बीर का ॥
कासी मांहि सिकन्दर तमक्यौ, गल मैं डालि जंजीर का ।
जिनिकौं आइ मिले परमेसुर, बंधन काटि कबीर का ॥
पंडित कोपि सबै खड़ि आये, ठाकुर लिया रैदास का ।
ऊपरि करिकैं गोद पधारे, पंडित गये निरासका ॥
जब न्रिप खिजे ढील क्यूँ लाई, पठ्यौ दूत कहि बैंन का ।
जन कै बदलै तेल लगायौ, कारिज सार्यौ सैंन का ॥
भवन भगत परि घाट घड़ी मिलि, काठ पलटि भयौ सार का ।
पीपा नैं दोइ देही दीनी, इक टोडै इक द्वारका ॥
धनाँ भगत कौ खेत निपायौ, खाटू हस्त झुकाइका ।
रह्यौ ठग्यौ सौ निकसे स्वामी, दादूजी गछ नाइका ॥
साट महोछा श्रीसांभरि मैं, द्वारै द्वारै ब्यौति का ।
जन अपना कौ बिड़द बुलायौ, सबकै जीमें न्यौंति का ॥
तुलसी बाह्मणि चुगली कीन्हीं, दादू है आंबेरि का ।
अकबर कहै बेगि ले आवौ, दरस करौं तीन केरि का ॥
जोर करै ताही कौं मारै, ठाकुर है लघु लीन का ।
बषनां कहै सूनौं भाइ संतौं, यहु मारग है दीन का ॥१३५॥
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बषनांजी कहते हैं, मुझे सबल = सर्वसमर्थ ‘कर्तुंअकर्तुंअन्यथाकर्तुम्’ समर्थ परात्पर-परब्रह्म-परमात्मा की भक्तवत्सलता पर पूर्ण विश्वास है । अतः उस परमेश्वर को ही पूर्णनिष्ठा, श्रद्धा-विश्वास के साथ भजिये । उसके भजन स्मरण के अतिरिक्त अन्य धर्मों का अनुष्ठान किस काम का है ? अर्थात् अन्यों से प्रयोजन रखना व्यर्थ है ।
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स्वयं मुसलमानों ने गाय मारकर नामदेव पर इल्जाम लगा दिया कि नामदेव ने गाय मार दी । मांडूगढ़ का मीर शिकायत मिलने पर नामदेव पर क्रोधित हुआ । सेवकों द्वारा नामदेव को पकड़कर अपने दरबार में बुलाया । नामदेव से कहा, यदि तुमने गाय नहीं मारी है तो इसे जीवित कर दो अन्यथा तुम्हें गाय मारने का दंड भुगतना पड़ेगा । तत्काल केशव ने मृत गाय को जिला दी । उस नामदेव नामक भक्त का मता = विश्वास, सिद्धान्त अटल था जिसके वशीभूत होकर भगवान् ने उसकी लाज मांडूमीर के दरबार में रखी ।
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काशी में सिकन्दर कबीर के ऊपर क्रोधित हुआ । उसने कबीर के गले में वजनी जंजीर डाल कर गंगा में डुबो दिया किन्तु तत्काल परमात्मा कबीर से आकर मिले और उन्होंने जंजीर के बंधनों को काटकर कबीर को गंगा के बाहर सुरक्षित पहुँचा दिया ।
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काशी के समस्त पंडित क्रोधित होकर अपने अपने स्थानों से निकलकर रैदास के घर पहुँच गये और उन्होंने रैदास द्वारा पूजित विग्रह को छीन लिया । राजा की सभा में से वह देवविग्रह बीच में से उठकर आकाश मारग में होकर तत्काल रैदास की गोदी में आकर बिराज गये । इससे सारे पंडित लज्जित होकर अपने अपने घरों को निराश ही लौट गये ।
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सेन नाई द्वारा तैल मदनार्थ समय पर न पहुँचने पर जब बांधवगढ़ का राजा सेन पर क्रोधित हुआ तथा लाने को दूत भेजे गये तब भक्त सेन के बदले में भगवान् स्वयं ने तैलमर्दन करके भक्तप्रवर सेन नाई को राजा का कोपभाजन बनने से बचा लिया ।
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भक्त भुवन चौहान पर जब चितौड़ दरबार में अन्य दरबारियों ने षंड्यंत्र रचकर आरोप लगाया कि वह लोहे की तलवार न रखकर काठ की तलवार रखता है । राजर्षि पीपा को भगवान ने एक द्वारिका में चंदोवे में लगी आग को बुझाने को तथा दूसरी टोड़ा के जागीरदार की सभा में उपस्थित रहने के लिये दो शरीर प्रदान किये थे । भगवान् ने ही धनाँ भक्त का खेत बिना बीज बोये ही निपजाया था ।
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खाटू में दादूजी महाराज पर दुष्टों ने मदमस्त हाथी को झुकाया = मारने के छोड़ा किन्तु वह मदमस्त हाथी ठग्यौ सो = हतप्रभ हुआ खड़ा ही रहा । उसने दादूजी पर कोई प्रहार नहीं किया । वे स्वामी दादूजी आराम से उसके सामने से निकल गये । सांभर में सात व्यक्तियों ने अपने अपने घरों पर महोत्सव किये और दादूजी महाराज को सभी ने अपने यहाँ पधारने का निमंत्रण दिया । परमात्मा ने अपने भक्त की महिमा सातों स्थानों पर एक साथ पधार व जींमकर बढ़ाई, प्रकट की ।
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तुलसी नामक ब्राह्मण ने अकबर से चुगली खाई कि निर्गुण-निराकार-परमात्मा का प्रचार-प्रसार करने वाला दादू आंबेर में रहता है । तब अकबर ने कहा उसे तत्काल बुलावो । मैं उसका दर्शन करना चाहता हूँ, वार्तालाप करना चाहता हूँ ।
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दादूजी व अकबर ४० दिन तक सत्संग हुआ और वह परम संतुष्ट हुआ । जो भी भक्तों पर जोर जुल्म करता है उन्हीं को परमात्मा दंडित करता है क्योंकि वह लघु लीन = निर्बल भक्तों का रक्षक है । बषनां सभी संतों से कहता है, हे भाइयों ! परमात्मा की भक्ति करना, उसकी शरण का आश्रय ग्रहण करना तथा उसके शरणागतवत्सलत्व पर पूर्ण विश्वास करना ही सच्चा धर्म है । इसके अतिरिक्त सारे धर्म व्यर्थ हैं ॥१३५॥

शुक्रवार, 29 मई 2026

*१५. विरक्त् का अंग ~९/१२*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*१५. विरक्त् का अंग ~९/१२*
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*पाइ परी पाई नहीं, ऋद्धि सिद्धि निधि ऐन१ ।*
*रज्जब त्यागी ते पुरुष, संतति शक्ति न सैन ॥९॥*
जो नाना प्रकार के ऐश्वर्य, अष्टसिद्धि, नौ निधि साक्षात्१ पैरों में पड़ने पर भी उनको नहीं प्राप्त के समान ही समझते हैं अर्थात उससे उपराम ही रहते हैं । संतान तथा मायिक सुख प्राप्ति के लिये संकेत मात्र ही नहीं करते, उद्योग तो कैसा, वे ही त्यागी पुरुष हैं ।
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*मुख की सिलक गूदा की ढीमा,*
*त्यागत सोच नहीं कुछ जीमा ।*
*त्यों विभूति बरतणि ले डारी,*
*यूं माया मुनिवर सौ न्यारी ॥१०॥*
मुख की लार पंक्ति वा वमन और गुदा का मल इनको त्यागने से मन में कुछ भी चिन्ता नहीं होती, वैसे ही विरक्त पुरुष माया को कार्य में लेकर पटक देते हैं, उसमें राग नहीं करते, इसी से माया मुनिवरों से अलग ही रही है ।
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*सोने मुख पीला किया, रूपे किया सुश्वेत ।*
*जन रज्जब सु वियोग ही, साधु किया नहीं हेत ॥११॥*
संतों ने प्रेम नहीं किया, संतों के वियोग दु:ख के कारण ही सोना पीला पड़ गया और चाँदी श्वेत हो गई ।
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*जोड़े के सुख से रह्या, जड़ काटी जग माँही ।*
*रे रज्जब संसार में, सो फिर आवे नाँहिं ॥१२॥*
जो नारी पुरुष के जोड़े से होने वाले सुख से अलग रहा है और जगत के धनादि में जो अपनी आसक्ति रूप जड़ जमी थी उसे वैराग्य से काट दी है, वह पुन: संसार में नहीं आता ब्रह्म में लीन हो जाता है ।
(क्रमशः)

२६. बिचार कौ अंग ५/८

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२६. बिचार कौ अंग ५/८
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सुन्दर एक बिचार तें, हिरदौ निर्मल होइ ।
फिरत रहै जौ मसक लौं, काटन लागै कोइ ॥५॥
श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - इसी एकमात्र विचाररूप साधना से ही जिज्ञासु प्राणी का हृदय निर्मल(विकार रहित) हो सकता है । अन्यथा वह जगत् में मच्छर के समान घूमता रहेगा और मत मतान्तर के प्रतिपादन द्वारा वाद विवाद करता हुआ साधु सन्तों को डंक ही मारता रहेगा(कष्ट ही देता रहेगा) ॥५॥

सुन्दर साधन सब किया, बरकति दीसै नांहिं । 
आयौ हृदय बिचार जब, तब संमुझै हरि मांहिं ॥६॥
हमने भगवत्प्राप्ति के लिये अन्य सभी उपाय कर के देख लिये, हमें किसी भी उपाय से सफलता या लाभ(बरकत) नहीं मिला । जब हम को यह भगवच्चिन्तन रूप विचार सूझा तो हम को यह आश्वासन मिला कि हम एक न एक दिन उस प्रभु का साक्षात्कार कर ही लेंगे ॥६॥
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करत देह के कृत्य सब, जौ उर होइ बिचार । 
सुन्दर न्यारौ ई रहै, लिपै न एक लगार ॥७॥
इस उपाय के माध्यम से हम को समझ में आया कि भले ही हम व्यावहारिक दृष्टि से सभी लौकिक कर्म करते रहें; परन्तु वहाँ हम इतना ही करें कि उन से लिप्त न हों, उन में आसक्त न हों ॥७॥
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दधि मथि घृत कौं काढि करि, देत तक्र मंहिं डार । 
सुन्दर बहुरि मिलै नहीं, ऐसैं लेहु बिचार ॥८॥ 
लोक में हम देखते हैं कि दही को मथ कर उसमें से घृत(मक्खन) निकालने के बाद, शेष बचे तक्र में वह घृत पुनः मिलाना चाहें तो नहीं मिलता; इसी प्रकार चिन्तन द्वारा एक बार लौकिक सम्पर्कों से पृथक् होने के बाद पुनः उन में लिप्त होना या आसक्त होना उत्तम साधक के लिये असम्भव हो जाता है ॥८॥
(क्रमशः) 

*अपना ब्रिद की लाज वही ।*

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*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*दादू जिन को सांई पाधरा, तिन बंका नांही कोइ ।*
*सब जग रूठा क्या करै, राखणहारा सोइ ॥*
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विनती ॥
*अपना ब्रिद की लाज वही ।* 
अनाथनाथ दीनबंधू, या तेरी निबही ॥टेक॥
हाथि कै हाथि कहा जप माला, का गनिका ब्रत धार्यौ ।
पुत्र हेत हरि नाम लियौ दिज, जम कौ डंड निवार्यौ ॥
हिरदै लिख्यौ लिख्यौ पाटी मैं, राम राम ब्रत धार्यौ ।
गिर तैं गेरि अग्नि मैं डार्यौ, जन प्रहलाद उबार्यौ ॥ 
कस्यौ कबीर कसौटी दीन्हीं, हाथी आगे नाख्यौ ।
जहाँ तहाँ भीड़ पड़ी भगतनि कौं, तहाँ तहाँ पन राख्यौ ॥ 
पतित उधारन बिरद तुम्हारौ, परतंग्या निबही ।
सबल जानि सरनाई आयौ, बषनैं बोट गही ॥१३४॥
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हे परमात्मा ! कहा जाता है, तू अनाथों का नाथ तथा दीनों का बन्धु है । तेरे इस बिड़द की मर्यादा का निर्वाह करने पर ही तेरी प्रतिज्ञा, वचन का निर्वाह होगा । अतः अपने विरुद की मर्यादा का निर्वहन कर । 
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हाथी के हाथ में तेरा नामस्मरण करने के लिये कौनसी माला थी । गणिका ने कौनसा पातिव्रतधर्म धारण किया था । फिर भी तूने उनका उद्धार किया । अजामिल नामक पतित ब्राह्मण ने तेरा नामस्मरण पुत्र के नाम के बहाने से किया था फिर भी तूने उसे यमदंड से बचाकर अपने लोक में बुला लिया था । 
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भक्तप्रवर प्रहलाद ने “राम-राम” अपने हृदय में लिखा था, गुरुमहाराज के यहाँ पढ़ते समय पाटी में भी लिखा था और आजीवन राम-राम रटने का व्रत भी धारण किया था । इससे क्रुद्ध होकर हिरण्यकश्यपु द्वारा उसे पर्वत से गिराया गया, अग्नि में जलाया गया, किन्तु आपने उसका बाल भी बाँका न होने दिया । उसका उद्धार कर दिया ? 
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संतसम्राट कबीर को जंजीरों से बांधकर गंगा में बहाया गया । कुचल डालने के लिए हाथी के आगे डाला गया किन्तु सिंकदरशाह उसका कुछ भी बिगाड़ न सका । 
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हे परमात्मन् ! जब-जब, जहाँ-तहाँ जिस-जिस रूप में भी भक्तों पर संकट आये वहाँ-वहाँ तूने उनके प्रणों का निर्वाह करवाया । “तू पतितों का उद्धार करने वाला है” इस विरुद की महिमा तूने अपनी प्रतिज्ञा का निर्वाह करके सदैव सुरक्षित रखी है । मैं बषनां ने तुझे सबल शरणागतवत्सल जानकर ही तेरी शरण का आश्रय लिया है ॥१३४॥

गुरुवार, 28 मई 2026

*१५. विरक्त का अंग ~५/८*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*१५. विरक्त का अंग ~५/८*
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*बपु१ वसुधा२ सौं वैर विधि, विरच्या३ लग बैकुण्ठ ।*
*रज्जब रूचे न विनशती४, यहु उर अंतर अण्ट५ ॥५॥*
विरक्त का मन शरीर१ तथा पृथ्वी२ के भोगों से और बैकुण्ठ तक से जैसे वैर के द्वारा वैरी से उपराम होता है, वैसे ही उपराम३ हो जाता है, उसे विनाशी४ माया रुचि कर नहीं लगती, विरक्त के हृदय में यह वैराग्य की गाँठ५ ही लग जाती है, अर्थात वह वैराग्य को नहीं छोड़ता ।
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*माया काया मन मतैं१, विरच्या प्राण प्रचण्ड२ ।*
*रज्जब न्यारा नाम बल, नजर नहीं नौ खंड ॥६॥*
तीव्र२ वैराग्य युक्त प्राणी माया, शरीर और सांसारिक मन के विचारों२ से उपराम हो जाता है, निरंजन राम के नाम चिन्तन के बल से सबसे ही अलग रहता है, इस नौ खंड वाली पृथ्वी के किसी भी पदार्थ पर उसकी रागयुक्त दृष्टि नहीं पड़ती ।
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*विरच्या बरते बरतणिहिं, तन मनत्रितिरस्कार ।*
*जन रज्जब रत नाम सौं, यहु विरक्त व्यवहार ॥७॥*
उपरामता से सब कार्य करता है, तीनों लोकों के भोगों का तन - मन से अनादर करता है और निरंतर निरंजन राम के नाम में अनुरक्त रहता है, वही विरक्त पुरुष का व्यवहार है ।
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*रज्जब रूठा ऋद्धि सौं, सिद्धि सुहावे नाँहिं ।*
*इन आगे इसका धणी, सो बैठा मन माँहिं ॥८॥*
विरक्त पुरुष ऐश्ववर्य से उपराम रहता है, सिद्धियाँ उसे प्रिय नहीं लगती, इन सिद्धि आदि से परे इनका स्वामी परमात्मा है, वही विरक्त के मन में निरंतर स्थिर रहता है ।
(क्रमशः)

२६. बिचार कौ अंग १/४

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२६. अथ बिचार कौ अंग १/४
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सुन्दर साधन सब थके, उपज्यौ हृदय बिचार । 
श्रवन मनन निदिध्यास पुनि, याही साधन सार ॥१॥
श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - जब हमारे द्वारा किये जा रहे भगवत्-साक्षात्कार साधना के सभी उपाय निष्फल हो गये, तब हमारे हृदय में यह विचार उद्भूत हुआ कि श्रवण, मनन एवं निदिध्यासन द्वारा निराकार निरञ्जन प्रभु का चिन्तन ही उस की प्राप्ति का एकमात्र उपाय है ॥१॥
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सुन्दर या साधन बिना, दूजौ नहीं उपाइ । 
निस दिन ब्रह्म बिचार तें, जीव ब्रह्म ह्वै जाइ ॥२॥
इस साधना के विना भगवत्प्राप्ति का अन्य कोई उपाय नहीं है । यदि इस उपाय से निरन्तर ब्रह्मचिन्तन किया जाय तो जीव-ब्रह्म की एकता सहजता से सुलभ हो सकती है ॥२॥
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सुन्दर एक बिचार है, सुरझावन कौं सूत । 
उरझि रह्यौ संसार मैं, नखशिख प्रानी भूत ॥३॥
यही एकमात्र उपाय ऐसा है जिससे जन्म-मरण परम्परा की यह उलझी हुई समस्या का सरलता से समाधान हो सकता है । नख से शिखा तक संसार के विषयभोगों में डूबा हुआ प्राणी इसी उपाय से मुक्त हो सकता है ॥३॥
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उपजै एक बिचार जब, तब यह पावै ठौर । 
भरमावन कौं जगत महिं, सुन्दर साधन और ॥४॥
जब किसी भाग्यवान् प्राणी को यह विचार(भगवच्चिन्तन) रूप उत्तम उपाय सूझता है तभी यह प्राणी उस निरञ्जन निराकार प्रभु तक पहुँच सकता है । अन्यथा इस जगत् में विभिन्न मतवादियों ने, उस प्राणी को बहकाने के लिये, अपना अपना मत प्रतिपादन करते हुए, नाना भ्रमजाल फैला रखे हैं ॥४॥
(क्रमशः) 

भौं मैं भजियौ राम

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*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*एकै अक्षर पीव का, सोई सत्य करि जाण ।*
*राम नाम सतगुरु कह्या, दादू सो परवाण ॥*
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*सुमिरण ॥*
भौं मैं भजियौ राम, यौं भौ भागौ रे । 
निसदिन हरि की नाँइ, सुमिरण लागौ रे ॥टेक॥
दोवड़ तेवड़ मैं करी रे, हरि सुमिरण की बाड़ि ।
ज्याँह कै पहरै को नहीं, ते नर मुसिया झाड़ि ॥
म्हारा घर कै आंगणैं रे, चेतन पहरा देइ ।
निधड़क सोवै कुम्हारड़ी रे, चोर न मटिया लेइ ॥
ज्याँह चोराँ चोरी करी रे, पर घर किया प्रवेस ।
सो चोर भया फिरि पाहरू, म्हारै गुर दीन्हौं उपदेस ॥ 
सूता था सुणि जागिया रे, सुण्याँ सहर मैं सोर ।
कहि बषनां बाथाँ पड़ी, म्हारी बहुटल मार्यौ चोर ॥१३३॥ 
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भू = संसार । भौ = भय, जनम-मरण का भय । दोवड़-तेवड़ = दोहरी (द्वंद्व = राग-द्वेष, सुख-दुःख आदि), तिहरी (सत, रज, तम गुण) । बाड़ि = पुराने समय में घर के चारों ओर काँटों से अहाता बनाया जाता था जिसे बाड़ लगाना कहा जाता था । मुसिया = लूट लिये गये । झाड़ि = झाड़-पौंछकर सब कुछ ले लेना, सर्वस्व को छीन लेना । आगणैं = चारों ओर । चेतन = सावधान मन, ज्ञान, विवेक । कुम्हारड़ी = कुम्हार की पत्नी, आत्मा । मटिया = मिटटी = मन । चौराँ = इंद्रियाँ । सहर = शरीर । बाथाँ = युद्ध । बहुटल = बुद्धि ।
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योगशास्त्र में पाँच क्लेशों का उल्लेख है । उनमें से पाँचवा क्लेश अभिनिवेश नाम्ना है जिसका तात्पर्य है, मृत्यु का भय कि कहीं मुझे मृत्यु आकर दबोच न ले । जिस व्यक्ति के मन में मृत्यु का भय समा जाता है, वह इससे अभय होने का प्रयत्न भी करता है । 
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यहाँ बषनांजी यही कह रहे हैं । मृत्यु के भय से भयभीत होकर मृत्यु से छुड़ा देने वाले रामजी को मैंने भजा । परिणामस्वरूप मेरा भय भाग गया । मैं निशिदिन आठों पहर हरि के नाम के स्मरण में लग गया हूँ । मैंने समस्त द्वंद्वों तथा तीनों गुणों को वशीभूत करके राम-नाम-स्मरण-का-अहाता = कवच मेरे शरीर रूपी घर के चारों ओर लगा लिया है । 
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जिन मनुष्यों ने राम – नाम की बाड़ नहीं लगाई है वे पूर्ण रूप से काल द्वारा लूट लिये गये हैं । वे पुनरपि जननं पुनरपि मरणं के चक्र में ही गोता खाते रहेंगे । मेरे घर रूपी शरीर के घट रूपी आंगन में चेतन रूपी ज्ञान पहरा देता है । हृदय में ज्ञान विराजता है जिससे आत्मा रूपी कुम्हारी अभय होकर सोती है, परमात्मा में एकरस स्थित रहती है क्योंकि इंद्रिय रूपी चौर मन रूपी मिटटी को अब चोर सकने में = संसाराभिमुख करने में समर्थ नहीं है । 
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जिन इंद्रियों रूपी चौरों ने ही विषयभोग रूपी चोरी करी थी तथा जिस मन में परमात्मा का निवास होना था उसमें प्रवेश करके उसको बिगाड़ा था, अब वे ही इंद्रियाँ पहरेदार बन गई हैं, मन को विषयों में जाने नहीं देती हैं । जो श्रवणेन्द्रिय पहले दुनियावी बाते सुनती थीं वे अब भगवद्गुण सुनने लगी हैं । जो आंखें परस्त्री, परधन की ओर देखा करती थीं वे अब संत-भगवंत दर्शन करने लगी हैं । जो त्वचा पहले कामोपभोग करने में आनंदानुभव करती थी अब वह संत-चरण स्पर्श में आनंद का अनुभव करती है । आदि आदि । 
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यह सब गुरु महाराज के उपदेश के कारण ही संभव हो पाया है । मेरी आत्मा, मन पहले अज्ञाननिद्रा में सोया पड़ा था किन्तु गुरु महाराज के उपदेश रूपी शोर को सारी सहर = शरीरस्थ सभी इंद्रियों ने सुना जिससे वे जागिया = विवेकवान हो गई । सत्यासत्य, नित्यानित्य विवेक सम्पन्न हो गई । 
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बषनां कहता है, मेरी बुद्धि रूपी बहुटल = बहु इन समस्त चौरों से = मनोविकारों से बाथाँ = गुत्थमगुत्था हो गई, युद्धरत हो गई । परिणामस्वरूप सारे दुर्गुण, दुराचार, मनोविकार शरीर में से निकाल कर भाग गये । मैं परमात्मा से एकाकार हो गया ॥१३३॥

बुधवार, 27 मई 2026

*२५. अवस्था कौ अंग ५२*

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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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*२५. अवस्था कौ अंग ५२*
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छप्पय छंद
प्रथम भूमिका श्रवन चित्त एकाग्रहि धारै । 
दुतिय भूमिका मनन श्रवन करि अर्थ बिचारै । 
तृतिय भूमिका निदिध्यास नीकी बिधि करई । 
चतुर्भूमि साक्षातकार संशय सब हरई ॥ 
अब तासौं कहिये ब्रह्मबिदु बर बरयान बरिष्ट है । 
यह पंच षष्ट अरु सप्तमी भूमि भेद सुन्दर कहै ॥५२॥
इति अवस्था कौ अंग ॥२५॥
७. प्रसङ्गवश ज्ञान की चार भूमिकाओं का वर्णन : 
श्रवण ज्ञान की प्रथम भूमिका है, जिस के माध्यम से जिज्ञासु का चित्त एकाग्र होता है । 
ज्ञान की द्वितीय भूमिका मनन से गुरुपदिष्ट शब्द के अर्थ पर विचार होता है । 
ज्ञान की तृतीय भूमिका निदिध्यासन से उस शब्द एवं अर्थ का सामञ्जस्य बैठाया जाता है(नीकी विधि करई) । 
ज्ञान की चतुर्थ भूमिका है - साक्षात्कार, जिस समस्त द्वैत भ्रम एवं संशय विनष्ट हो जाते हैं । 
और ज्ञान की पञ्चम भूमिका है - ब्रह्मवित्(वर) होना । 
षष्ठ भूमिका है - वरीयान् होना । 
तथा सप्तम भूमिका है - वरिष्ठ होना । 
श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - इस प्रकार शास्त्र में ज्ञान की सात भूमिकाएँ बतायी गयी हैं ॥५२॥
इति अवस्था का अंग सम्पन्न ॥२५॥
(क्रमशः)