बुधवार, 14 अक्टूबर 2026

*२९. साधु महिमा का अंग ~१/४*

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*🌷卐 सत्यराम सा 卐🌷*
साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*२९. साधु महिमा का अंग ~१/४*
इस अंग में साधु महिमा सम्बन्धी विचार करेंगे -
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*रज्जब साधु अगाध है, कहिये कौन समान ।*
*देखो शिव शक्ति सहित, सेवक ह्वैं तहँ आन ॥१॥*
संतों की महिमा अगाध है । कहिये, उनकी महिमा के समान किसकी महिमा है, देखो तो सही, संतों के स्थान में आकर माया के सहित ब्रह्म भी सेवक होकर रहते हैं ।
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*सकल धरे ऊपर धर्या, सांई अपना साध ।*
*रज्जब महिमा क्या कहै, अस्थल अगम अगाध ॥२॥*
परमात्मा ने अपने संतों को संपूर्ण मायिक प्रपंच के उपर रक्खा है, हम उनकी महिमा क्या कर सकते हैं ? उनकी महिमा रूप स्थान अति अगम और अगाध है ।
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*कीये में नाँहीं किया, साधु सम कोउ और ।*
*आप समाना इन्हौं में, इनको दी उर ठौर ॥३॥*
ईश्वर ने अपने बनाये हुये संसार में संत के समान अन्य कोई भी नहीं बनाया है, संतों के हृदय में स्वयं भगवान समाये रहते हैं और अपना हृदय रूप स्थान संतों को दिया है अर्थात संतों का विशेष ध्यान रखते हैं ।
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*साधु दिल सांई रहै, हरि हिरदै में साध ।*
*रज्जब महिमा क्या कहै, ठाहर उभय अगाध ॥४॥*
संतों के हृदय में परमात्मा रहते हैं और परमात्मा के हृदय में संत रहते हैं, संत और परमात्मा इन दोनों का ही महिमा रूप स्थान अगाध है, उसका कथन मैं पूर्ण रूप से कैसे कर सकता हूँ ?
(क्रमशः)

बखतावरसिंह खेतड़ी

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🌷*卐 श्री दादूदयालवे नम:  卐*🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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*दादू धरती ह्वै रहै, तज कूड़ कपट अहंकार ।*
*सांई कारण सिर सहै, ताको प्रत्यक्ष सिरजनहार ॥*
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यहां पर जिन संतों को दर्शन की अभिलाषा थी उनको दर्शन दिया और आसोज सुदि चौदस को वहां अन्तर्धान हुये थे । अतः आसोज सुदि १४ को उस स्थान में भारी मेला लगता है । हालू के वंशज निर्वाण क्षत्रिय ही उस मंदिर के पुजारी हैं । यह सुन्दरदासजी के मेले के नाम से खेतड़ी के आसपास प्रसिद्ध है । इस मेले में यात्री दूर दूर से आते हैं । जो उनकी कामनायें होती हैं वे पूर्ण होती हैं । मेला में बहुत चढ़ावा आता है । 
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एक समय बखतावरसिंह खेतड़ी ने पूजा का बटाने का प्रस्ताव रखा था । पूजा बांटने से और उसे अपने लेने से बहुत हानि हुई और शरीर में भी रोग हो गया । फिर वहां जाकर चरणों में पड़ा और भेंट का कूप चढ़ाया तब अच्छा हुआ । 
सोई कहा भी है—
बखतावर सिंह खेतड़ी, कहि पूजा बट चाय ।
बहु अफाज तन दुखित बहु, पद परि कूप चढ़ाय ॥ सुन्दरोदय
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उक्त घटना के बहुत पीछे की एक घटना पांचेटिया के दुरसा चारण के वंशज पहाड़दान की मुझे पांचेटिया की दरियाव बाई ने सुनाई थी सो इस प्रकार है— दुरसा चारण रज्जबजी के शिष्य थे । अतः उनके वंशज दादूजी को ही अपना इष्ट मानते आये हैं । उनमें एक पहाड़दानजी उत्तराखंड की यात्रा के लिये गये थे । एक दिन मार्ग भूल गये । इससे वे बहुत व्यथित हुये और उन्होंने व्यथित हृदय से दादूजी महाराज का स्मरण किया तब थोड़ी ही देर में उनको एक संत आते दिखाई दिये । 
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पहाड़दानजी ने संतजी के पास जाकर सत्यराम बोलते हुये प्रणाम किया । फिर कहा— भगवन् ! मैं मार्ग भूल जाने से अत्यन्त व्यथित था अब आपके दर्शन से मुझे शांति मिली है । अपने इष्टदेव दादूजी महाराज का स्मरण करते ही आपका दर्शन हुआ है । इससे मैं उनकी कृपा ही आपके दर्शन में कारण समझ रहा हूँ । अब आप मुझे मार्ग बताने की कृपा करें । संतजी ने उसे अच्छी प्रकार मार्ग बता दिया । फिर उसने पूछा- भगवन् ! आपके शरीर का नाम क्या है ? आप कौन हैं ? 
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संतजी ने कहा- जिनका तुमने स्मरण किया था, मैं उन दादूजी महाराज का शिष्य हूँ, मैंने अपनी योग शक्ति से तुम्हारी स्थिति जान ली थी अतः तुमको मार्ग बताने के लिये ही बहुत दूर से योग शक्ति द्वारा यहां तुम्हारे पास ही प्रकट हुआ हूँ । मेरे शरीर को बड़े सुन्दरदास के नाम से बोलते हैं । इतना कहकर संतजी वहां ही अन्तर्धान हो गये । पहाड़दान सुन्दरदासजी के दर्शन कर अपने को कृतार्थ मानने लगा और दादूजी महाराज  का स्मरण करते हुये मार्ग से पर्वत के नीचे उतर कर यात्रा करता हुआ अपने ग्राम पांचेटिया में आ गया । 
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इस घटना से भी सूचित होता है कि बड़े सुन्दरदासजी हिमालय में अब भी भजन कर रहे हैं । दादूजी महाराज ने उनको कहा था- गुप्त रह कर भजन करना और पुण्यवान को दर्शन देना । वैसे ही वे रहते हैं । बड़े सुन्दरदासजी का समाज में निर्वाण दिन नहीं माना जाता है । इससे भी सूचित होता है कि वे अब तक विद्यमान हैं । 
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बड़े सुन्दरदासजी की स्थिति भक्तमाल के कर्ता राघवदासजी के विचारानुसार बड़े सुन्दरदासजी की स्थिति देखिये- मू. इ.-
दादू दयाल की शाल¹ शिरोमणि, ऐसे घड़े घट उपमा लायक ।
नारद ज्यों निश्चय निर्भय किये, ज्ञान परापरि² बेहद वायक ॥
भीम ज्यूं भर्म उड़ायो आकाश को, ऐसो बली सिध साधु सहायक ।
राघो कहै पुनि वृद्धि पछोप³ की, एक से एक अनूप महायक⁴ ॥४८५॥
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दादू दयालजी की सत्संग रूप श्रेष्ठ टकशाल¹ में बड़े सुन्दरदासजी ऐसे उत्तम सन्त रूप घट बनाये गये हैं जो अति उत्तम उपमा देने योग्य हैं । दादूजी ने अपने सत्संग में अपने शिष्यों को नारदजी के समान भक्ति विषय में निश्चय वाले तथा निर्भय बना दिये थे । दादूजी के परात्पर² परब्रह्म ज्ञान के सम्बन्धी वचन असीम हैं अर्थात् ब्रह्मज्ञान और ब्रह्म को असीम बताने वाले हैं । जैसे भीम ने युद्ध के समय हाथियों को आकाश में उड़ा दिया था, वैसे ही दादूजी ने अपने सत्संग में आने वाले शिष्यों के हृदय से अज्ञान को उड़ा दिया था ।
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दादूजी ऐसे परमार्थ बल से युक्त बली और साधक सन्तों के सहायक सिद्ध सन्त थे । राघवदासजी कहते हैं कि फिर आपके पीछे³ भी आप की शिष्य परंपरा में ऐसे ही सन्तों की वृद्धि हुई जो एक से एक अधिक और अनुपम है । इन बड़े सुन्दरदासजी जैसे अनेक महान्⁴ महात्मा हुये हैं ।
(क्रमशः)

४९. भ्रम विधवंस कौ अंग ५/८

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*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
*श्रद्धेय श्री Tapasvi @Ram Gopal Das की प्रेरणा से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Meta AI*
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४९. भ्रम विधवंस कौ अंग ५/८
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कहि जगजीवन हरि भगति, हरि भजि करै बिचार ।
रांम नांम भजि रांम मिलि, सहजैं उतरै पार ॥५॥
भावार्थ - जगजीवन दास जी महाराज कहते हैं कि हरि की भक्ति ही सच्चा विचार है, हरि का भजन करो । राम नाम को भज कर, राम में मिल कर जीव सहज ही इस भवसागर से पार उतर जाता है ।
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सेवा पूजा सव करैं, घर घर पूजैं देव ।
जगजीवन निज वस्तु का, कोई बिरला जांनै भेव ॥६॥
सब लोग सेवा-पूजा करते हैं, घर-घर में देवताओं को पूजते हैं । संत जगजीवन दास जी कहते हैं कि अपनी निज वस्तु, अपने भीतर बैठे उस आत्म-राम का भेद कोई विरला ही जान पाता है ।
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गंडक१ रेती आंनि करि, पूजैं सालिगरांम ।
जगजीवन ते क्यौं तिरैं, तिनके रिदैं न नांम ॥७॥
(१. गंडक=नदी की)
गंडक नदी की रेत से निकले पत्थर को ला कर लोग सालिगराम के रूप में पूजते हैं । जगजीवन दास जी महाराज कहते हैं कि जिनके हृदय में राम का नाम ही नहीं है, वे ऐसे पत्थर पूज कर कैसे तरेंगे ।
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असम पूज२ यौं ही रह्या, तूटा३ तुलसी तोडि४ ।
कहि जगजीवन रांम भगति बिन, खोडि भरी इंहिं खोडि ॥८॥
(२. असम पूज=पाषाण पूजक)    (३. तूटा=टूट गया)    (४. तुलसी तोडि=तुलसी के पत्ते तोड़कर उन से पूजा करने वाला)
पत्थर की पूजा तो वैसी ही पड़ी रह गई, और तुलसी के पत्ते तोड़-तोड़ कर बेकार कर दिए । जगजीवन दास जी कहते हैं कि राम की भक्ति के बिना तो जैसे घाव में और घाव भर दिया, एक खोड में दूसरी खोड जोड़ ली ।
(क्रमशः) 

मंगलवार, 13 अक्टूबर 2026

*२८. साधु असाधु परीक्षा का अंग ~२८/३०*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*२८. साधु असाधु परीक्षा का अंग ~२८/३०*
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*अंगहु१ अंग मिले नहीं, गुण लक्षण गत२ गात३ ।*
*तो रज्जब क्यों होयगा, साधु सम कथ बात ॥२८॥*
संत के लक्षणों१ से असंत के लक्षण तो मिलते नहीं, अत:जिसके शरीर३ से शुभगुण और संत के लक्षण तो चले गये२ हैं, फिर वह संत के समान केवल बातें करके ही संत कैसे हो सकेगा ?
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*बादल वन्दे शीश पर, सूखे सजल अपार ।*
*रज्जब रत रीतों नहीं, धन्य जु वर्षनहार ॥२९॥*
शिर पर सूखे और जल-सहित बहुत बादल हैं किन्तु खाली बादलों से कौन प्रेम करता है ? वर्षने वालों को ही धन्यवाद दिया जाता है, वैसे ही शिर पर, अर्थात साधु भेष से युक्त बहुत साधु दिखाई देते हैं, किन्तु ध्यान ज्ञानादि साधनों से खाली पर कौन श्रद्धा करता है ? जो ज्ञानरूप वर्षा वर्षाते हैं, उन्हें ही धन्यवाद दिया जाता है ।
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*आँख उदर ठाहर उभय, एक समान सु नाँहिं ।*
*एकहु रज न समाव ही, उगल गले इक माँहिं ॥३०॥*
शरीर में नेत्र और पेट ये दो स्थान हैं, ये दोनों एक से नहीं हैं, नेत्र में तो किचिंत मात्र रज भी नहीं समाती और पेट खाकर भरता है और खाली भी होता है, वैसे ही विराट् शरीर के साधु और असाधु दोनों स्थानों में से साधु में तो कीचिंत मात्र भी दोष तथा पाप नहीं समाता और असाधु हिंसादि कर्म करके पाप हृदय में भरता है और उसका फल भोगकर उनको हृदय से निकालता भी है ।
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इति श्री रज्जब गिरार्थ प्रकाशिका सहित “२८. साधु असाधु परीक्षा का अंग” समाप्त ॥
(क्रमशः)

*२८. साधु असाधु परीक्षा का अंग ~२५/२७*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*२८. साधु असाधु परीक्षा का अंग ~२५/२७*
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*साधु हिरदा शून्य१ सम, मुक्ता२ मल न रहाय ।*
*और सकल उर धर४ मयी३, बहु विधि विघ्न उपाय ॥२५॥*
संत का हृदय आकाश१ के समान है, जैसे आकाश सभी मलों से मुक्त२ रहता है, उसमें मल नहीं रहता वैसे ही संत का हृदय सब पापादि दोषों से रहित है, उसमें कोई भी दोष नहीं रहता और संपूर्ण असंतों का हृदय पृथ्वी४ रूप३ है, जैसे पृथ्वी विविध प्रकार के उपायों से मैली होती रहती है, वैसे ही असंतों के हृदय बहुत प्रकार के दोष रूप विघ्नों से मलीन होते रहते हैं ।
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*संसारी१ राकेश२ उर, झाँई३ दर्शे माँहिं ।*
*साधु दिल सूरजमयी४, प्रतिविम्ब पड़े सुनाँहि ॥२६॥*
असंत१ का हृदय चन्द्रमा२ के समान है, जैसे चन्द्रमा में पृथ्वी की छाया३ पड़ती है, वैसे ही असाधु के हृदय में विषयों की छाया पड़ती है, अर्थात विषयाशा रहती है । संत का हृदय सूर्य-रूप४ है, जैसे सूर्य पृथ्वी का प्रति-बिम्ब नहीं पड़ता है वैसे ही संत के हृदय में विषयाशा नहीं रहती । यही संत -असंत की परीक्षा है ।
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*दर्पण में दीपक दर्शे, दीवे दर्पण नाँहिं ।*
*यूं संसारी१ अरु साधु के, व्यौरा२ उरहु सु माँहिं ॥२७॥*
दर्पण में दीपक का प्रतिबिम्ब दिखता है, किन्तु दीपक में दर्पण का प्रतिबिम्ब नहीं दिखता, वैसे ही असाधु१ के हृदय में तो विषयाशा भासती है किन्तु साधु के हृदय में नहीं भासती । यही उनके हृदय का समाचार२ है ।
(क्रमशः)

अचला गिरि

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*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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*बिन गुण व्यापे सब किया, समर्थ आपै आप ।*
*निराकार न्यारा रहै, दादू पुन्य न पाप ॥*
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इसी समय दादूजी के शिष्य बड़े सुन्दरदासजी अपनी गुफा से किसी कार्यवश बाहर आये थे । कृष्णादासजी पयाहारी के उक्त विचारों को सुनकर वे बोले-
“दादू माला तिलक से कुछ नहीं, काहू सेती काम ।
अन्तर मेरे एक है, अह निशि उस का नाम ॥
स्वांग सगाई कुछ नहीं, राम सगाई सांच ।
दादू नाता नाम का, दूजै अंग न राच ॥”
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उक्त दादूजी की साखी सुनकर उस साधु को अति प्रसन्नता हुई । कारण, वह राजस्थानी था और दादूजी से तथा दादूपंथ से परिचित था । अतः उसने कहा- ये दादूजी महाराज की साखी यहां कौन बोल रहा है ? कृष्णादासजी पयाहारी ने कहा- ये दादूजी के शिष्य बड़े सुन्दरदासजी बोल रहे हैं । फिर वह साधु उठकर सुन्दरदासजी की गुफा के ऊपर गया । वहां अनेक संत साधना में संलग्न थे । सब के दर्शन किये । सुन्दरदास को सत्यराम बोलकर दंडवत करी । फिर कृष्णादासजी पयाहारी के पास आकर बैठ गया ।
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तब कृष्णादासजी पयाहारी ने कहा- अब तुम यहां से अपने देश को चले जाओ । साधु ने कहा- यहां आपकी चरण सेवा में ही रहने दीजिये । कृष्णादासजी ने कहा-यहां आप नहीं रह सकते । फिर उक्त योगी संत को कहा- तुम जहां से इनको लाये हो वहां छोड़कर शीघ्र आ जाओ । वह योगी संत उसको गुरुजी की आज्ञानुसार जहां से ले गये थे, वहां ही छोड़कर मार्ग भी बता गये कि इस मार्ग से चले जाओ आगे तुमको मानव मिलते रहेंगे । उनसे पूछ २ कर देश को चले जाना ।
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उक्त वैरागी साधु राजस्थान में पहुँचकर पहले नारायणा दादूधाम में गये । उस समय वहां के आचार्य चैनरामजी महाराज थे । उसने सुन्दरदासजी की सूचना चैनरामजी महाराज को दी । तब चैनरामजी महाराज ने कहा— तुम ठीक कह रहे हो, हम ध्यान के समय प्रतिदिन सुन्दरदासजी महाराज का दर्शन करते हैं । तुमको जो दर्शन प्राप्त हुआ है वह भी हमें ज्ञात हो गया है । उस वैरागी साधु के विश्वास के लिये फिर चैनरामजी महाराज ने पर्वत व सुन्दरदासजी तथा कृष्णादासजी की गुफा का संपूर्ण वर्णन सुनाया । चैनरामजी से सुनकर साधु को अति आश्चर्य हुआ ।
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साधु ने हाथ जोड़ कर कहा—महाराज ! आपको धन्य है । आपने वहां का विवरण जैसा बताया है, वह वैसा का वैसा ही है । ये सब मैं आंखों देखकर आया हूं । उस समय सुन्दरदासजी की गद्दी पर घाटड़ा में रामदासजी महन्त थे । सुन्दरदासजी महाराज के घाटड़ा से जाने के पश्चात् उनकी यह सूचना २२५ वर्ष बाद प्राप्त हुई । उस समय सभी स्थानों में उत्सव मनाया गया था । फिर दो संत नारायणा दादूधाम के आचार्य चैनरामजी महाराज से आज्ञा लेकर सुन्दरदासजी के दर्शन करने अचला गिरि को चले ।
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वे एक तो आचार्य चैनरामजी महाराज से आज्ञा लेकर चले थे दूसरे वे स्वयं भी समर्थ थे और सुन्दरदासजी में उनका सच्चा स्नेह भी था । अतः वे उक्त कारणों से तथा भगवत् कृपा से निर्विघ्न सुन्दरदासजी के पास पहुंच गये । सुन्दरदासजी के दर्शन करके दोनों संत बहुत प्रसन्न हुये । सुन्दरदासजी ने उन दोनों संतों को पूछा—आप लोग कौन हैं ? कहां से आये हैं ? और यहां कैसे पहुँच सके ? यह तो सर्व साधारण के आने योग्य स्थान नहीं है । संतों ने कहा— हम आप के ही हैं; राजस्थान से आये हैं और आपकी ही कृपा से यहां पहुंच सके हैं ।
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फिर उन दोनों संतों को समझा कर पीछे लौटा दिया । दोनों संत जब देश पहुँचे तो बहुत-संत उनसे परिचय प्राप्त करके सुन्दरदासजी के दर्शन करने के लिये अचलागिरी जाने को तैयार होने लगे । तब योगीराज सुन्दरदासजी ने उनके विचार को अपनी योग शक्ति से अचलागिरि पर रहते ही जानकर सोचा, उन साधुओं के यहां आने से अच्छा नहीं रहेगा किन्तु उन की दर्शन करने की अभिलाषा भी तीव्र है । अतः उनको दर्शन देने के लिये मुझे ही वहां चलना चाहिये ।
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यह विचार करके स्वयं सुन्दरदासजी ही बिबाई ग्राम के पास पिपराणा स्थान में प्रकट हुये । कहा भी है—“सुन्दर प्रकटे आय बिबाई के पिपराणो” जहां प्रकटे थे वहां हालू नामक निर्वाण गोत्र के क्षत्रिये मिले । महाराज का दर्शन कर के हालू अति प्रसन्न हुये और कहा—भगवन् मैं आपकी क्या सेवा करूं ? तब संत सुन्दरदासजी ने कहा—कोई खाने योग्य वस्तु लाओ भूख लगी है ।
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तब हालू ने बाजरा के शिरे से ककर स्वामी सुन्दरदासजी के समर्पण किये । स्वामी सुन्दरदासजी ने उन्हें परमात्मा के समर्पण करके भोजन किया । हालू ने कहा- मेरी गायें रोग आने से मर गई हैं । तब सुन्दरदासजी ने हालू के हाथ से वन में एक बाड़ा बनवाया और कहा इस बाड़े में रोग नहीं आयेगा । उक्त सुन्दरदासजी का वचन ही जंत्र बन गया और उस बाड़े में बैल गाय आदि की वृद्धि हुई—कहा भी है—
“बनवायो बाड़ो बड़ो, आरन हालू हाथ ।
सुन्दर वायक जंत्र बन बड़ै बैल गऊ आथ ।”
(क्रमशः)

४९. भ्रम विधवंस कौ अंग १/४

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*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
*श्रद्धेय श्री Tapasvi @Ram Gopal Das की प्रेरणा से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Meta AI*
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४९. भ्रम विधवंस कौ अंग १/४
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प्रतिमा* प्रीति हीनस्यं, प्रेम भगति न आश्रितं ।
कहि जगजीवन बिना रांमं, काष्ट धेनिजया घृतं* ॥१॥
(*-*. प्रेमभाव रहित काष्ट या पत्थर की प्रतिमा(मूर्ति) में प्रेमा भक्ति कर उस से परमार्थ(मोक्ष) प्राप्त करना तो ऐसी ही बात हुई कि जैसे कोई मूर्ख काष्ठ की बनी गौ को दुह कर उसके दूध से घृतप्राप्ति की आशा करता हो ॥१॥)
जिसका मूर्ति में प्रेम नहीं, जिसने सच्चे प्रेम और भक्ति का आश्रय नहीं लिया है । संत जगजीवनदास जी कहते हैं कि बिना राम के उसका सारा जप-तप ऐसे ही व्यर्थ है, जैसे कोई लकड़ी की गाय से घी निकालना चाहे । लकड़ी की गाय दिखती तो गाय जैसी है पर उससे घी नहीं निकलता, वैसे ही बिना राम-प्रेम के सारी साधना निष्फल है ।
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अस्म३ दार४ अवनी५ इष्ट, ए गुण ग्रहै अनेक ।
कहि जगजीवन रांम हरि. अलख लखै कोई एक ॥२॥
(३. अस्म=पत्थर) {४. दार=दादरु(काष्ठ)} (५. अवनि=पृथ्वी)
अस्म यानी पत्थर, दार यानी लकड़ी, और अवनी यानी मिट्टी - इनसे बनी मूर्तियों को ही लोग इष्ट मान बैठे हैं और अनेक गुणों को पकड़ कर बैठे हैं । संत जगजीवनदास जी कहते हैं कि असली इष्ट तो राम हरि हैं, जो अलख हैं - जो आँखों से दिखता नहीं । उस अलख को कोई विरला ही लख पाता है, देख पाता है ।
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असम६ खसम जिनकी रसम६, तिन थैं अगम अगाध ।
कहि जगजीवन दरदवंद७, उस घर खेलै साध ॥३॥
(६-६. पत्थर की मूर्ति को ही अपना इष्ट देव मानना जिन की पूजा पद्धति हो) (७. दरदबंद=कष्ट झेलने वाली)
जिसका कोई शारीरिक आकार(असम) नहीं, जिसका कोई मालिक खसम) नहीं, जिसकी रस्म-दुनिया की रीत से अलग है, वही अगम और अगाध है - जिसे पाया नहीं जा सकता । संत जगजीवनदास जी कहते हैं कि जो दरदवंद है - जिसके हृदय में उस परमात्मा से मिलने की सच्ची पीड़ा है, वही साधु उस अगम घर में प्रवेश करके खेलता है, आनंद लेता है ।
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अरम८ इष्ट ते अस्म नर, दार इष्ट ते दार ।
पंक इष्ट ते पंक अस्म८, रांम विमुख विभिचार ॥४॥
{८-८. पत्थर को पूजने वाले पत्थर ही हो जाते हैं । काष्ठ को पूजने वाले काष्ठतुल्य हो जाते हैं । पंक(गंगा की गीली रेती) से शिवलिंग बनाकर पूजने वाले कीचड़ के समान हो जाते हैं ।}
जो व्यक्ति पत्थर को इष्ट मानता है वह स्वयं पत्थर जैसा जड़ हो जाता है, जो लकड़ी को इष्ट मानता है वह लकड़ी जैसा हो जाता है, जो कीचड़(पंक) को इष्ट मानता है वह कीचड़ जैसा ही बन जाता है । अर्थात जैसा जिसका इष्ट वैसा ही उसका स्वरूप हो जाता है । संत जगजीवन दास जी कहते हैं कि राम से विमुख होकर की गई हर पूजा व्यभिचार के समान है - भटकाव है, क्योंकि असली पति तो एक राम ही है ।
(क्रमशः)

सोमवार, 12 अक्टूबर 2026

*अचला गिरी पर पधारना*

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🌷*卐 श्री दादूदयालवे नम:  卐*🌷
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*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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*धनि धनि साहिब तू बड़ा, कौन अनुपम रीत ।*
*सकल लोक सिर सांइयां, ह्वै कर रह्या अतीत ॥*
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*अचला गिरी पर पधारना*
द्वन्द्वपुरि से चलकर सुन्दरदासजी महाराज ने द्वन्द्वपुरी से दो मिल दूर तिलवाड़ा के पास पर्वत की चट्टान पर गुफा में कुछ समय ब्रह्म भजन किया था । इस गुफा के पास अब भी धूप की सुगंध आती रहती है । उक्त गुफा से विचरकर तिलवाड़ा से लगभग चार मील रामकुंड स्थान है । वहाँ जल का कुंड भरा रहता है और इस रामकुंड से जल का भरगा भी चलता रहता है । वहां गुफा भी है । उस गुफा में भी सुन्दरदासजी ने ब्रह्म भजन किया था । 
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इस गुफा में आगे एक खो आता है, वहां भी पानी वहता है । आज से लगभग ६० वर्ष पहले मांगू नामक एक गूजर एक संत के साथ आगे चला गया था । इससे उसने खो और पानी का नाला प्रत्यक्ष देखा था और उसी ने सवको सुनाया था । वहां के लोगों की धारणा है कि इस गुफा में जो दर्शन के योग्य होता है उसे सुन्दरदासजी का दर्शन होता है और कई भक्त सज्जनों को हुआ है । ऐसा वहां के निवासी वृद्ध लोग कहते हैं । इस स्थान से योगेश्वर संत सुन्दरदासजी हिमालय के अचला गिरी को पधार गये । कहा भी है-
“अचलागिरि वासो कियो, जपैं निरंजन जाप ।
अव भाषों जिन सुधि दिई, पद परसे रु मिलाप ॥२५॥ त.८ सुन्दरोदय
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अचला गिरि पर निवास की सूचना जिसने दी उसका परिचय दे रहे हैं- एक रामानन्दी वैष्णव साधु रसायन प्राप्ति की इच्छा लेकर १२ वर्ष से घूम रहा था । वह पर्वतों को खोजता हुआ उत्तर दिशा के पर्वतों में चला गया । वहां चारों ओर पर्वत ही पर्वत दृष्टि आ रहे थे । मनुष्य तो वहां दृष्टि में आता ही नहीं था । किन्तु एक दिन उन साधुजी ने अकस्मात एक योगी संत को देखा । तब उन्हें प्रसन्नता हुई । फिर वे योगी संतजी के पास गये और जय सीताराम बोलकर उनके चरणों में प्रणाम किया । 
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तब योगी संतजी ने इनसे पूछा— यहां कैसे आये हो ? साधुजी ने कहा— भगवन् ! मैं रसायन प्राप्ति की आशा से घूमता हुआ यहां आ गया हूँ । यह सुनकर योगी संत को उन साधुजी पर दया आ गई । इससे पास खड़ी हुई सिद्ध रसायन बूटी उनको बताई और साधु के शरीर पर उस बूंटी का रस मसला । उससे साधु का शरीर युवक के समान दिव्य हो गया । वृद्धावस्था चली गई । फिर योगी संत ने साधु को एक भस्म देते हुये कहा- इसको सदा पास में रखना, यह रसायन है । इससे ताम्र स्वर्ण हो जाता है । स्वर्ण बनाकर सद् उपयोग करना ।
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फिर उस योगी संत से उस साधु ने पूछा- भगवन् ! आप कौन हैं ? कहां रहते हैं ? आप कोई देवता हैं क्या ? मैं आपके चरणों में प्रणाम करके पूछता हूँ । आप सत्य-सत्य बताने की कृपा अवश्य करें । योगी संत ने कहा- मैं रामानन्दजी के पौत्र शिष्य और अनन्तानन्दजी के शिष्य कृष्णदासजी पयाहारी का शिष्य हूँ और उनके पास ही उनकी सेवा में रहता हूँ । योगी संत के उक्त वचन सुनकर साधु अति प्रसन्न होकर बोला- भगवन् ! मैं कृष्णदासजी पयाहारी की संप्रदाय का साधु हूँ । आप कृपा करके मुझे भी पयाहारीजी का दर्शन अवश्य करायें । 
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योगी संत ने कहा- तुम वहां चल नहीं सकते । साधु ने फिर बहुत दीनता पूर्वक प्रार्थना की तव योगी संत ने उसे अपने कंध पर बैठाकर आकाश मार्ग से थोड़ी ही देर में कृष्णादासजी पयाहारी की गुफा पर ले जाकर उतार दिया और कहा कि जो सामने शिला पर विराजे हुये हैं वे ही कृष्णादासजी पयाहारी हैं । साधु ने सप्रेम कृष्णादासजी पयाहारी को दंडवत किया और उनके चरणों की रज को अपने मस्तक पर धरा और अपने को कृतार्थ मानने लगा । 
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किन्तु कृष्णादासजी पयाहारी के माला तिलकादि न देखकर बोला— भगवन् ! आपके दिये हुये माला तिलकादिक हम धारण करते हैं किन्तु आपके तो वे नहीं दिखाई दे रहे हैं और न यहां ठाकुरजी की मूर्ति ही है, यह क्या बात है ? आपके ये सब होने ही चाहिये । साधु का उक्त वचन सुनकर कृष्णादासजी पयाहारी ने कहा- अब हम आन्तर साधना करते हैं । उक्त चिन्हों की आवश्यकता नहीं रही । 
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हमारे परम गुरुदेव रामानन्दजी महाराज ने भी मानस पूजा का उपदेश दिया है । माला जप की संख्या करने के लिये रक्खी जाती है । अब हम जप संख्या नहीं करते निरंतर ही जप करते हैं । तिलक संप्रदाय का चिन्ह है किन्तु अब हम संप्रदायवाद से ऊपर उठ गये हैं । अतः गुरु उपदेश ही शिर पर धारण करते हैं, वही हमारा तिलक है, शरीर ही मंदिर है इसमें आत्म-स्वरूप ठाकुरजी विद्यमान हैं उनकी पूजा निरंतर करते हैं । इससे बाह्य मूर्ति-पूजा की आवश्यकता अब हमारे को नहीं रही है । उच्चकोटि के संतों को उक्त चिन्हों की आवश्यकता नहीं रहती है । 
(क्रमशः)

*४८. सतगुरु कौ अंग १०/१३*

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*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
*श्रद्धेय श्री Tapasvi @Ram Gopal Das की प्रेरणा से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Meta AI*
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*४८. सतगुरु कौ अंग १०/१३*
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सतगुरु साषी सौ कही, सकल ग्रंथ जा मांहि ।
कहि जगजीवन रांमजी, दूजा भावै४ नांहि ॥१०॥
(४. भावै=रुचिकर)
सतगुरु ने साखी के द्वारा जो कहा, वह सब ग्रंथों में है । संत जगजीवनजी कहते हैं, हे रामजी, मुझे और दूसरा कुछ भी अच्छा नहीं लगता ।
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सतगुर साखी सौ कही, रही सकल घट छाइ ।
कहि जगजीवन सुनत हरि, मिटि गइ चित की चाहि ॥११॥
सतगुरु ने जो साखी कही, वह हम सब जीवों में छाई हुई है । संत जगजीवनदासजी कहते हैं, हरि को सुनते ही चित्त की सारी चाह मिट गई ।
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सतगुर साषी सौ कही, भाखी दास कबीर ।
कहि जगजीवन करि रहे, गुरु दादू तहं सीर१ ॥१२॥
(१. सीर=मेल)
सतगुरु की साखी कबीर दास ने भी कही, और उसी में गुरु दादू ने मेल मिलाया । एवं वे उसी में लीन होकर रह रहे हैं यह बात जगजीवनदास जी महाराज कहते हैं ।
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सतगुर साखी सौ कही, जे भाई सब साध ।
कहि जगजीवन बिचारै, बांणी अगम अगाध ॥१३॥
सतगुरु की साखी जो कही, वह सब साधुओं को अच्छी लगी । संत जगजीवन कहते हैं, वे इस अगम और अगाध वाणी का विचार करते हैं ।
(२. भाई=अच्छी लगी ।)
 इति सतगुरु कौ अंग संपूर्ण ॥४८॥
(क्रमशः)

रविवार, 11 अक्टूबर 2026

*घाटड़े पधारना*

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*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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*दादू गोविन्द के गुण बहुत हैं, कोई न जाणै जीव ।*
*अपणी बूझै आप गति, जे कुछ किया पीव ॥*
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*घाटड़े पधारना*
फिर एक दिन धीरावत ठाकुरों के अति आग्रह से सुन्दरदासजी और प्रहलाददासजी ने ठाकुरों के साथ घाटड़ा के लिये प्रस्थान किया और ब्रह्मभजन करते हुये दोनों महात्मा घाटड़े पहुँचकर जिसको अब बड़ाबाग बोलते हैं, उसके कूप के पास जो जालका वृक्ष है और अब भी अच्छी स्थिति में विद्यमान है, उसकी छाया में जाकर विराजे और ठाकुरों को कहा—हम यहां ही रहेंगे बस्ती में नहीं चलेंगे । ठाकुरों ने कहा—बहुत अच्छा ।
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फिर ठाकुरों ने वहां ही सब प्रकार की सेवा का प्रबन्ध कर दिया और स्वयं सेवा में रहने लगे । फिर एक दिन ठाकुरों ने प्रार्थना की कि—कृपया अब आज्ञा करें, आपके लिये कुटिया किस स्थान पर बनवाई जाय । तब सुन्दरदासजी महाराज ने जिस पर्वत के नीचे घाटड़ा बसता है, तथा वर्तमान प्रहलादशाल के पश्चिम और दक्षिण में दो पर्वत शिखर पास ही पड़ते हैं. उनमें से पश्चिम के शिखर पर कुटिया बनाने की आज्ञा दी ।
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ठाकुरों ने कहा—बहुत अच्छा, अब वहां ही आपकी इच्छानुसार शीघ्र ही कुटिया बनवा दी जायगी । जब तक कुटिया तैयार नहीं हो तब तक आपकी रुचि हो तो यहां वा जहां आप कहें वहीं ही सेवा का सब प्रबन्ध हो जायगा । सुन्दरदासजी महाराज ने कहा— कुटिया तैयार होगी तब तक हम यहां ही ब्रह्म भजन करेंगे ।फिर धीरावत ठाकुरों ने उक्त पर्वत शिखर पर रहने योग्य अच्छी कुटिया बनवाने की योजना शीघ्रातिशीघ्र बनाकर कार्य आरंभ कर दिया ।
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प्रथम उस शिखर पर १२ फुट ऊंचा २५ फुट लम्बा और २० फुट चौड़ा पक्का चबूतरा बनवाया और उस चबूतरे पर दो कुटिया बनवाई, एक सुन्दरदासजी के लिये और दूसरी प्रहलाददासजी के लिये । कुटिया से लगभग २० गज दूर पर एक जलाशय = छोटी तलई बनवा दी गई जिस से पानी वहां मिलता रहे । जब आश्रम तैयार होकर सूख गया तब ठाकुरों ने प्रार्थना की महाराज ! आश्रम तैयार हो गया है । अब आपकी इच्छा हो तब ही पधार सकते हैं । वहां विराजेंगे तब भी सब प्रकार की सेवा जैसे यहां होती रही है वैसे ही वहां भी होती रहेगी । आपके ब्रह्म भजन में किसी भी प्रकार का विघ्न नहीं होने दिया जायगा ।
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सुन्दरदासजी महाराज की जिस दिन उक्त आश्रम में पधारने की आज्ञा हुई उस दिन वहां उत्सव मनाने की योजना बनाई गई और आसपास के भक्त लोग भी महाराज के आश्रम प्रवेश के महोत्सव में सत्संग के लिये आये । फिर उक्त शिखर के आश्रम में पधार कर दोनों संत निर्विघ्न ब्रह्म भजन करने लगे । घाटड़ा के धीरावत ठाकुर लोग सेवा का पूरा-पूरा ध्यान रखते थे । दोनों ही संत परम विरक्त थे । अतः एकान्त स्थान में निरंतर ब्रह्म भजन ही करते रहते थे । आसपास के प्रदेश के लोग उक्त आश्रम को सुन्दरदासजी प्रहलाददासजी की मैड़ी बोलते हैं ।
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चिरकाल तक उक्त आश्रम में दोनों संतों ने ब्रह्म भजन किया । (खादू में रायसिंह ने दादूजी पर हाथी छोड़ा था तव सुन्दरदासजी ने वहां प्रकट होकर रायसिंह को समझाया था ।) फिर वहां से सुन्दरदासजी महाराज विचरने लगे तव प्रहलाददासजी भी अपने गुरुदेव के साथ ही उस आश्रम से नीचे उतर आये । प्रहलाददासजी को सुन्दरदासजी द्वन्द्वपुरी में बैठा कर अचलागिरी जाने के लिये आगे चल दिये फिर धीरावत प्रहलादजी को घाटड़ा में ले आये । घाटड़ा ग्राम के धीरावतों की कोटड़ियों के पास ठहरकर वे भजन करने लगे । सुन्दरदासजी अन्यत्र पधार गये और प्रहलादजी को घाटड़ा में रहकर भजन करने की आज्ञा दे गये थे, अतः प्रहलाददासजी वहां ही रहे ।
(क्रमशः)

*४८. सतगुरु कौ अंग ७/९*

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*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
*श्रद्धेय श्री Tapasvi @Ram Gopal Das की प्रेरणा से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Meta AI*
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*४८. सतगुरु कौ अंग ७/९*
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जै जै जै जै जयं जय, जै जै जै जगदीस ।
कहि जगजीवन जज तज जन, सतगुरु सौंपित सीस ॥७॥
जय जय जय जय, जय हो, हे जगदीश तुम्हारी जय हो । संत जगजीवन जी कहते हैं, भक्त अपना यज्ञ, अहंकार त्याग कर, अपना शीश सतगुरु को सौंप देता है ।
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सतगुरु पहरि३ सरीर हरि, तेज पुंज करि राखि ।
कहि जगजीवन रांमजी, तो एह साँची साखि ॥८॥
{३. पहरि-प्रहरी(संरक्षक)}
सतगुरु शरीर में पहरेदार बनकर हरि की ज्योति की रक्षा करते हैं, और उसे तेज पुंज बनाकर रखते हैं । जगजीवन जी महाराज कहते हैं, हे रामजी, यही सच्ची साक्षी है ।
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कहि जगजीवन रांमजी, तेज पुंज तन होइ ।
तुम सरणागति आतमा, तुम हरि राखौ मोहि ॥९॥
जगजीवन जी महाराज कहते हैं, हे रामजी, मेरा तन आपका तेज पुंज बन जाये । मेरी आत्मा आपकी शरण में है, हे हरि, आप ही मेरी रक्षा करो ।
(क्रमशः)

*२८. साधु असाधु परीक्षा का अंग ~२१/२४*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*२८. साधु असाधु परीक्षा का अंग ~२१/२४*
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*निर्मोल नगन में ताग ज्यों, ईख चढे विष वेल ।*
*रज्जब अहि चन्दन मिले, गुण गति१ औरै खेल ॥२१॥*
जैसे बहुमूल्य नगों में धागा, ईख-वृक्ष पर विष-वेलि और चन्दन पर सर्प लिपटने पर भी उनके गुणों के स्वरूप१ रूप खेल भिन्न भिन्न ही रहते हैं, अर्थात धागा नग के गुण नहीं लेता, विष वेली ईख के गुण नहीं लेती सर्प चन्दन के गुण नहीं लेता, वैसे ही असाधु साधुओं में रहने पर भी उनके गुण ग्रहण नहीं करता ।
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*उलटा चले सु औलिया१, सूधी गति संसार ।*
*जन रज्जब यूं जान ले, इनका यही विचार ॥२२॥*
संसार में विपरीत परमात्मा की ओर ध्यानादि द्वारा गमन करते हैं, वे ही संत१ हैं और संसार प्रवाह के साथ सीधे चलते हैं अर्थात विषयों के लिये ही प्रयत्नशील हैं, इनके पहचानने का यही उपाय है कि उक्त कही हुई गतियों को विचार द्वारा देखकर इन्हें जाने ।
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*विषय वायु वश ह्वै बहैं, वपु बादल वित१ नाश ।*
*जन रज्जब उलटे बहैं, तिनकी उर धर आश ॥२३॥*
जो बादल वायु के वश होकर चलते हैं, तो समझो उनका जल रूप धन१ नष्ट हो गया है और जो बादल वायु के उलटे, अर्थात सामने चलते हैं, उनके वर्षने की आशा हृदय में रक्खो, उनमें जल है, वैसे ही जो विषयों में आसक्त हैं उनके शरीर में ज्ञान-धन नहीं है, वे असाधु हैं और जो विषयों को त्याग कर उलटे अर्थात ध्यानादि द्वारा परमात्मा की और चलते हैं, उनमें ज्ञान धन है वे ही संत हैं, उनकी ऐसी आशा हृदय में रक्खो कि ये उपदेश द्वारा हमारा उद्धार कर सकेंगे ।
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*संसारी१ अरु साधु का, पाया भेद विनान२ ।*
*रज्जब पारस जल तिरे, बूडे सोइ पषान ॥२४॥*
असाधु१ और साधु के भेद का विज्ञान२ हमने जान लिया है कि उनमें क्या भेद है, जैसे जल पर तिरने वाला पत्थर तो पारस होता है और डूबने वाला पत्थर । वैसे ही संसार से ऊपर परमात्मा के स्वरूप में जिसकी वृत्ति रहती है वही संत है और जिसकी वृत्ति संसार के विषयों में रहती है, वह असंत है ।
(क्रमशः)

शुक्रवार, 9 अक्टूबर 2026

*सुन्दरदासजी का भविष्य बताना*

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*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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*नाद विन्दु से घट भरे सो जोगी जीवे ।*
*दादू काहे को मरे, रामरस पीवे ।*
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*सुन्दरदासजी का भविष्य बताना*
फिर दादूजी महाराज ने सुन्दरदासजी को कहा- सुन्दरदासजी ! तुम तो गोपीचन्द, भरतरी, गोरक्षनाथ आदि के समान चिरंजीवी होगे । अतः सदा निर्गुण भक्ति करते हुये प्रायः गुप्त ही रहना । जो पुण्यवान और दर्शन के अधिकारी हों, उन्हें दर्शन देकर कृतार्थ करते रहना- ‘पुण्यवान को दर्शन दीज्यो, नहिं तो गुप्त जगत में रहिज्यो ।” सुन्दरदासजी ने पूछा- भगवन् ! चिरंजीवी होने का साधन क्या है ? दादूजी ने कहा-“नाद विन्दु से घट भरे सो जोगी जीवे । दादू काहे को मरे, रामरस पीवे ।” 
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सुन्दरदासजी ने उक्त साखी में कथित साधना प्रारंभ करदी । सांभर में लगभग एक वर्ष रहे तव भी सुन्दरदासजी सत्संग और भोजन करके भैराणा की गुफा में भजन करते थे । प्रतिदिन सत्संग के समय प्रातःकाल आ जाते थे और भोजन करके चले जाते थे । फिर प्रहलादजी भी सुन्दरदासजी के शिष्य बनकर प्रहलाददासजी कहलाने लग गये । दोनों ही इच्छानुसार सांभर में सत्संग करके फिर दादूजी महाराज की आज्ञा लेकर घाटड़ा की ओर चले गये । 
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*द्वन्द्वपुरी निवास*
घाटड़ा से कुछ दूर द्वन्द्वपुरी में पहुंचकर वहां भजन करने लगे । द्वन्द्वपुरी से पराशर आश्रम तीन मील है । वहां पराशर गुहा है, पानी का नाला चलता है । आसपास के लोग इस आश्रम को तीर्थ मानते हैं । घाटड़ा से पराशर आश्रम पांच मील है । खोह से एक मील है और दरीबा से लगभग तीन मील है । सुन्दरदासजी व प्रहलाददासजी जब द्वन्द्वपुरी में भजन कर रहे थे तव घाटड़ा के धीरावत ठाकुरों को ज्ञात हुआ कि बीकानेर नरेश जैतसिंहजी के पुत्र भीमराजजी और उनके पुरोहित प्रहलादजी संत होकर सुन्दरदासजी तथा प्रहलाददासजी नाम से बोले जाते हैं और आजकल द्वन्द्वपुरी में भजन कर रहे हैं । 
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उस समय घाटड़ा में ३५० कोटड़ियां धीरावत ठाकुरों की थीं । सभी सरदारों ने मिलकर एक दिन अपनी सभा की और उसमें यह प्रस्ताव रखा कि-“सुन्दरदासजी और प्रहलाददासजी को अपने यहां घाटड़ा में लाकर दोनों महात्माओं की सेवा का लाभ उठावें ।” सभा के सभी सरदारों ने उक्त प्रस्ताव का समर्थन करते हुये मान लिया । 
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फिर मुख्य २ सरदार सुन्दरदासजी के पास द्वन्द्वपुरी में गये और सुन्दरदासजी को अति नम्रता से कहा- भगवन् ! हमारी प्रार्थना है कि आप घाटड़े में पधार कर दर्शन तथा उपदेशों से हम लोगों को कृतार्थ करें । महाराज सुन्दरदासजी ने उनकी प्रार्थना सुनी और कहा- हमें एकान्त स्थान चाहिये । सरदारों ने कहा— जहां आप आज्ञा देंगे, वहां आपकी इच्छानुसार कुटीर बना दी जायगी । धीरावत ठाकुरों के श्रद्धा-भाव को देखकर सुन्दरदासजी महाराज ने कहा-अच्छी बात है ।
(क्रमशः)

*४८. सतगुरु कौ अंग ४/६*

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*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
*श्रद्धेय श्री Tapasvi @Ram Gopal Das की प्रेरणा से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Meta AI*
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*४८. सतगुरु कौ अंग ४/६*
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रांम नांम गुरु बचनं, स्नानं देह पवित्र कृतं ।
हरि रस अम्रित नीरं, जगजीवन समुद्र घृतं ॥४॥
राम नाम ही गुरु का वचन है, उसके स्मरण रूपी स्नान से देह पवित्र हो जाती है । हरि रस ही अमृत जल है, संत जगजीवनदास जी कहते हैं, वही समुद्र की तरह सब जगह भरा है ।
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रांम नांम सुरति मुरत्यं, सु सबद उच्रितं तनं ।
कहि जगजीवन तस्य वचनं, सतगुरु रीझै तज्जनं ॥५॥
राम नाम में ही सुरति और मूर्ति दोनों हैं, और वही सुंदर शब्द तन में गूंजता है । संत जगजीवनदास जी महाराज कहते हैं, ऐसे वचन सुनकर सतगुरु अपने जन पर रीझ जाते हैं ।
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रांम नांम प्रसाद सौं, त्रिपति१ पंच भू एह ।
कहि जगजीवन प्रेम रस, सतगुरु पोषी२ देह ॥६॥
{१. त्रिपति-तृप्ति(सन्तोष)}   (२. पोषी-पाली गयी)
राम नाम के प्रसाद से ही पाँच तत्वों से बनी यह देह तृप्त होती है । जगजीवनदास जी महाराज कहते हैं, सतगुरु ने प्रेम रस से इस देह का पोषण किया है ।
(क्रमशः)

*२८. साधु असाधु परीक्षा का अंग ~१७/२०*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*२८. साधु असाधु परीक्षा का अंग ~१७/२०*
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*ऊपर संत असंत सम, अंतरि अंतर होय ।*
*रज्जब पाणी ईख का, रूप एक रस दोय ॥१७॥*
जैसे जल और ईख के रस का रूप समान सा दिखाई देते हैं, किन्तु पान करने पर दोनों के रस ज्ञात होंगे, वैसे ही ऊपर के भेषादि से तो संत और असंत समान दिखाई देते हैं, किन्तु भीतर अन्तकरण के भावों को देखने पर बहुत भेद ज्ञात होता है ।
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*साधु मिश्री मधुर मत, फोकट१ फटक२ पषान ।*
*जन रज्जब रंग एक से, चाख्यों भिन्न विनान३ ॥१८॥*
मिश्री और स्फटिक२ पत्थर का रंग एक सा दिखाई देता है, किन्तु चखने से उनके भिन्नत्व का ज्ञान३ होगा, अर्थात मिश्री मधुर और स्फटिक निरस१ ज्ञात होगा, वैसे ही साधु और असाधु भेषादि से एक से दिखाई देते हैं, किन्तु प्रसंग पड़ने पर उनके भिन्न मत दिखाई देंगे, उनमें साधु का सर्वप्रिय और असाधु का विक्षेप-प्रद सिद्ध होगा ।
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*साधु पारस परम निधि, और शिला संसार१ ।*
*जन रज्जब वपु एक से, गुण गति२ भिन्न विचार ॥१९॥*
साधु तो परम धन पारस के समान है और असाधु१ साधारण शिला के समान हैं, पारस और शिला दोनों पत्थर होने से आकार में सामान हैं, वैसे ही साधु और असाधु के शरीर समान हैं, किन्तु उनके गुणों का स्वरूप२ विचारा जाय, तो पारस-शिला और साधु-असाधु भिन्न भिन्न ही सिद्ध होते हैं ।
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*साधु कोयल काग जग, दर्श एक उनमान ।*
*जन रज्जब बोले विगति१, अरु खान पान पहचान ॥२०॥*
कोयल और काक दोनों के रंग देखने से तो अनुमान होता है कि दोनों ही एक जाति के पक्षी होंगे, किन्तु उनकी आवाज, विशेष प्रकार की गति१, खान पानादि से ही उनकी पहचान होती है, वैसे ही संत असंत भी समान ही दिखते हैं, किन्तु उनके वचन, विशेष भाव१ विचार और खान पानादि व्यवहार से ही उनकी पहचान होती है ।
(क्रमशः)

*२८. साधु असाधु परीक्षा का अंग ~१३/१६*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*२८. साधु असाधु परीक्षा का अंग ~१३/१६*
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*साधु सोने में जड्या, खोटा पीतल प्राण ।*
*जनरज्जब भोले१ बिके, परख्यू भिन्न विनाण२ ॥१३॥*
सोने में पीतल मिल जाता है तब भूल१ से तो वह सोने के भाव बिक सकता है, किन्तु परीक्षा करने पर वह भूल रूप अज्ञान२ मिटते ही पीतल सोने के भाव नहीं बिक सकता भिन्न भाव से बिकेगा, वैसे ही असाधु साधु का भेष बनाकर साधुओं में मिल जाता है और जब तक परीक्षक न मिले तब तक साधु ही माना जाता है परीक्षा होने पर नहीं ।
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*रज्जब रत्नों में फटक१, रूप रंग मिल जाय ।*
*आगे आध२ न एक ह्वै, बिके न सो सम भाय३ ॥१४॥*
स्फटिक१(काँच जैसा पत्थर) रूप -रंग से रत्नों में मिल जाता है, किन्तु आगे जौहरी के पास उसका आदर२ रत्नों के समान नहीं होता और न रत्नों के भाव३ सम बिकता, वैसे ही असंत भेषादि द्वारा संतों मिल जाता है किन्तु परीक्षा होने पर वह संत के समान नहीं सिद्ध होता ।
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*खेचर पैठे बंस ह्वै, साधु मिश्री माँहिं ।*
*जन रज्जब जल मिल जुदे, भिन्न भिन्न ह्वै जाँहिं ॥१५॥*
मिश्री में बाँस की सींक मिली रहती है, किन्तु जल में मिलने पर दोनों अलग अलग होते हैं, वैसे ही असाधु साधुओं में मिल जाता है किन्तु परीक्षा करने पर वह साधु सिद्ध नहीं होता । जैसे मिश्री अब धागों पर जमाते हैं, वैसे ही रज्जबजी के समय में मिश्री बाँस की सींको पर जमाई जाती थी ।
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अरिल -
*संतों माँहिं असंत न भूल समाव ही ।*
*कपटी दीजे काढि कपट नहिं भाव ही ॥*
*ज्यों पानों में पान चुनौती१ आँनरे ।*
*परि हां रज्जब दीजे डार लगे जब खान रे ॥१६॥*
जैसे पानों में लगी हुई सींक१ को पान खाते समय निकाल कर पृथ्वी पर डाल देते हैं, वैसे ही संतों में असंत भूल से भी नहीं समाता, सच्चे सत्संगियों को कपट अच्छा नहीं लगता, वे कपटी असंत का संतपना अपने हृदय से निकाल देते हैं, अर्थात उसे संत नहीं मानते ।
(क्रमशः)

*२८. साधु असाधु परीक्षा का अंग ~९/१२*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*२८. साधु असाधु परीक्षा का अंग ~९/१२*
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*रज्जब सोना शैल१ सुत, तुले बराबर तोल ।*
*तो कुछ आघन एक ह्वै, लहै न समसरि मोल ॥९॥*
सोना और पर्वत१ का पुत्र पत्थर तुला में तोल में बराबर तुलने पर भी पत्थर का आदर सोने के समान नहीं होता और न सोने के समान पत्थर का मूल्य मिलता, वैसे ही साधु-असाधु के शरीर भेष के द्वारा समान दीखने पर भी असाधु साधु के समान नहीं हो सकता ।
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*दोय भाव के दो पले, तुला हाथ हरि माँहिं ।*
*जड़ चेतन सुत तहँ चढे, मोल एक सो नाँहिं ॥१०॥*
दो प्रकार की भावना वाले दो पलङों वाला तुला हरि के हाथ में है, असाधु भावना वाले पलड़े पर जड़ बाट के समान असाधु पुत्र चढ़ता है और साधु भावना वाले पलड़े पर चेतन पदार्थ अर्थात ज्ञानी साधु पुत्र चढ़ता है उन दोनों का मूल्य एक नहीं हो सकता, अर्थात हरि के पास साधु की समता असाधु नहीं कर सकता ।
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*वस्तु बाट दोऊ तुलहिं, लिपैं छिपैं सो नाँहिं ।*
*रज्जब कही विचार कर, ताको१ तुला सु माँहिं ॥११॥*
तुला में देखो१, वस्तु और बाट दोनों तुल रहे हैं, वे किसी प्रकार छिपते नहीं, कारण वस्तु युक्त है और बाट गुण हीन है, वैसे ही हमने भी विचार करके ही कहा कि साधु दैवी गुण युक्त है, असाधु शुभ गुण हीन है, अत: साधु अपने गुण के कारण न तो किसी में लिपायमान होता और न असाधुओं से छिपता है ।
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*प्राण पले१ है प्राण-पति, पिंड पले सु पषान२ ।*
*भाव भार भेला३ तुला, विगता४ वस्तु बखान५ ॥१२॥*
विवेक रूप तुला का एक पलड़ा तो प्राणी रूप है और दूसरा शरीर रूप है, प्राणी रूप पलड़े१ प्राणपति-परमात्मा रूप वस्तु है और शरीर रूप पलड़े में बाट का पत्थर२ है, प्राणी का परमात्मा में जो भाव बाट का भार साथ३ तुल रहे हैं, अर्थात दोनों पलड़े बराबर हैं, किन्तु जिस मनुष्य को परमात्मा-रूप वस्तु का यथार्थ ज्ञान हो गया है वह परमात्मरूप वस्तु को बाट से अधिक समझता है और ज्ञानी४ संत कहा५ जाता है, बराबर समझता है वही अज्ञानी और असंत कहा जाता है ।
(क्रमशः)

भीमराज को शिष्य करना

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🌷*卐 श्री दादूदयालवे नम: 卐*🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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*कछू न कीजे कामना, सहगुण निर्गुण होय ।*
*पलट जीव तैं ब्रह्मगति, सब मिल मानें मोय ॥*
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तब वे दोनों साधक विराट के पर्वत से चलकर सांभर आये । सांभर में दादूजी का दर्शन करके दोनों अति प्रसन्न हुये । दोनों ने पास जाकर साष्टांग दंडवत प्रणाम किया और हाथ जोड़कर दोनों सामने बैठ गये । दादूजी ने पूछा— आप लोग कहां से आये हैं ? तब भीमराजजी ने अपनी कथा सुनाकर कहा— ये मेरे पुरोहित हैं । मैं वृन्दावन में चतुरा- नागाजी का शिष्य होने गया था । उन्होंने मुझे शिष्य न बनाकर आप का शिष्य होने की आज्ञा दी और कहा— वे सांभर में आने वाले हैं, तुमको उनका दर्शन सांभर में होगा ।
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फिर हम दोनों वृन्दावन से आकर विराट नगर के पर्वत की गुफा में एक वर्ष रहे । वहां आपके पद भी एक सज्जन ने सुनाये और आपका पता भी दिया कि वे सांभर में पधार गये हैं । तब हम दोनों ही आपकी शरण आये हैं । अब आप हम लोगों पर कृपा करें । दादूजी ने कहा— क्या कृपा चाहते हैं ? भीमराज हाथ जोड़ कर बोले— मुझे अपना शिष्य बनाकर कृतार्थ कीजिये । दादूजी ने कहा— आप तो राज- परिवार में पले हुये हैं, साधु धर्मका निर्वाह आपसे कैसे हो सकेगा ?
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“दादू मारग साधु का, खरा दूहेला जान ।
जीवत- मूतक हो चले, राम नाम नीशान ॥
दादू मारग कठिन है, जीवत चले न कोय ।
सोई चल है बापरा, जीवत मृतक होय ॥
कायर काम न आव हीं, यह शूरे का खेत ।
तन मन सौंपे रामको, दादू शीश सहेत ॥
मन ताजी चेतन चढ़े, त्यौ की करे लगाम ।
शब्द गुरु का ताजणा, कोइ पहुँचे साधु सुजान ॥”
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ये शब्द सुनकर भी भीमराजजी ने कहा— यह सब तो आप की कृपा से हो जायगा, आपतो मुझे शिष्य रूप से अपनाइये । मैं आपका ही शिष्य हूँगा, अन्य का कदापि नहीं हूँगा । 
*भीमराज को शिष्य करना, सुन्दरदास नाम देना* 
फिर परमेश्वर ने दादूजी को प्रेरणा दी— तुम इनको शिष्य बनालो । ये उच्चकोटि के संत हो जायेंगे । अन्य को भी जिसको शिष्य करोगे, वह अच्छा ही संत बनेगा । शिष्य बनने वालों को ना नहीं करना चाहिये । शिष्यों द्वारा ही निर्गुण भक्ति का प्रचार होगा ।
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उक्त ईश्वर की आज्ञा सुनकर दादूजी ने भीमराज को वि. सं. १६२६ फाल्गुण शुक्ला अष्टमी गुरुवार को गुरुमंत्र देकर शिष्य बनाया और सुन्दरदास नाम प्रदान किया । कहा भी है—
“फागुन सुदि गुरु अष्टमी, सौलह सौ छः बीस ।
दादू शिष्य सुन्दर भये, भेष वाक्य जगदीश ।५। तरंग८ सुन्दरोदय
श्री दादू चरितामृत में सुन्दरदासजी का शिष्य होना वि. सं. १६२६ दिया है । किन्तु केदार देश की परची के सम्पादक नारायण स्वामी मास्टर ने मतभेद खड़ा करने लिये उक्त दोहे के “छः बीस” को पच्चीस बनाया है । और सुन्दरोदय में भी लिखा बताया है किन्तु यह सुन्दरोदय तरंग ८ का पंचम दोहा है कोई भी देख ले ।
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फिर गुरुदेव दादूजी ने शिष्य सुन्दरदासजी को अपनी निर्गुण भक्ति की पद्धति बताई और निष्काम भाव से भजन करने का आदेश दिया । फिर सुन्दरदासजी गुरु प्रदत्त साधना में संलग्न हो गये और आगे चलकर बड़े सुन्दरदासजी के नाम से दादू पंथ में प्रसिद्ध हुये ।
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*प्रहलादजी को उपदेश*
फिर एक दिन प्रहलादजी ने हाथ जोड़कर दादूजी महाराज से पूछा— मुझे भी आज्ञा दीजिये, मेरा क्या कर्तव्य है ? मैं इन सुन्दरदासजी के साथ रहूँ या अलग रहूँ तथा किस मत को धारण करूँ ? दादूजी ने कहा— तुम्हारा कर्तव्य है, इनके साथ रहकर इनकी सेवा करो । पूर्वाश्रम में भी ये आपको धनादि की सहायता करते थे और अब भी इनके द्वारा ही आपको वैराग्य हुआ है । यहां भी इनके साथ ही आये हो । अतः आप इनको ही अपना गुरु मानकर निष्काम भाव से भजन करो ।
फिर कहा—
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“कछू न कीजे कामना, सहगुण निर्गुण होय ।
पलट जीव तैं ब्रह्मगति, सब मिल मानें मोय ॥
तन मन ले लागा रहे, राता सिरजन हार ।
दादू कछू मांगे नहीं, ते विरले संसार ॥”
रही मत की बात सो मानने योग्य मत यह है इसी को मानना चाहिये-
“आपा मेटो हरि भजो, तन मन तजो विकार ।
निरवैरी सब जीव से, दादू यह मत सार ॥”
जब तक किसी भी प्रकार का आपा(अहंकार) होता है तव तक भगवान् उस अहंकारी की भक्ति को यथार्थ रूप से नहीं मानते हैं-
“सेवा सुकृत सब गया, मैं मेरा मन मांहि ।
दादू आपा जब लगें, साहिब पानें नांहि ॥”
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परमात्मा तथा गुरुजनों का उपकार मानते रहोगे तो तुम्हारा साधन रूप धन बढ़ता ही रहेगा-
“किया कृतं मेटे नहीं, गुण ही मांहि समाय ।
दादू बधै अनन्त धन, कव हूँ खूट न जाय ॥”
जब तक तुम्हारी इच्छा हो यहां रहकर सत्संग करो फिर मथुरा से आते समय जहां तुम्हारा संकल्प हुआ था कि यह बैठकर भजन करने का स्थान है, वहां ही जाकर भजन करना । वह स्थान(घाटड़ा के पास का प्रदेश) पराशर के तप करने से पवित्र हो गया है-
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“चलि जाइयो उहिं ठौड़ सभागी, जो आतां आछी तुम लागी ।
नदी बहै जहां परम पुनीता, जहां पराशर आसण जीता ॥”
(महन्त चेतनजी कृत दादूजीवन चरित्र पंचम विश्राम) मथुरा से आते समय इन्होंने घाटड़ा के पास जो संकल्प किया था, उसको दादूजी महाराज ने अपनी योग शक्ति से जानकर बता दिया और कहा- वहां भजनशाल बनाकर निरंतर भजन करना ।
(क्रमशः)

*४८. सतगुरु कौ अंग १/३*

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*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
*श्रद्धेय श्री Tapasvi @Ram Gopal Das की प्रेरणा से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Meta AI*
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*४८. सतगुरु कौ अंग १/३*
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ॐ नमो* परम पुरिष परमात्मानं, गुरु गम्य सतगुरु लयं ।
जगजीवन जन तस्य शिष्यं, दण्डवत जय जय जयं* ॥१॥
*-*. संस्कृत भाषा में-
परम पुरुष परमात्मा को नमस्कार है, जो गुरु की कृपा से ही प्राप्त होते हैं और सतगुरु में ही लीन हैं । मैं उनका शिष्य जगजीवन, उन्हें बार-बार दण्डवत प्रणाम करता हूँ ।
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पुरुषं परमात्मानं, गुरुगम्य गुरोर्लयम् ।
जगजीवननामाहं, शिष्यःसन् प्रणमामि तम् ॥१॥
परम पुरुष परमात्मा को नमस्कार है, जो केवल गुरु की कृपा से ही प्राप्त होते हैं और जो सतगुरु में ही लीन हैं । मैं जगजीवन, उनका शिष्य होकर, उन्हें प्रणाम करता हूँ ।
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नमो रांमं नमो नांमं, नमो सतगुरु बन्दनम् ।
जगजीवन नमो गुरु दादू, कोटि कर्म निकन्दनम् ॥२॥
संत जगजीवनजी महाराज कहते हैं, राम को नमस्कार, राम नाम को नमस्कार, सतगुरु की वंदना को नमस्कार । गुरु दादू को नमस्कार, जो करोड़ों कर्मों का नाश करने वाले हैं ।
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रांम नांम अक्षर उभयं, गुरु शिष्य उपदेशितं ।
जगजीवन सतगुरु साधनं, प्रणामं पारं गतं ॥३॥
राम नाम के दो अक्षर ही गुरु ने शिष्य को उपदेश रूप में दिए हैं । संत जगजीवनजी कहते हैं, सतगुरु की साधना ही प्रणाम है और यही भव से पार ले जाने वाली है ।
(क्रमशः)