शनिवार, 15 अगस्त 2026

३१. अन्योन्य भेद कौ अंग ३३/३६

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
.
३१. अन्योन्य भेद कौ अंग ३३/३६
.
कूप अग्नि दोऊ बचहिं, तामैं फेर न कोइ । 
सुन्दर ज्ञान क्रिया बिना, मुक्त कदे नहिं होइ ॥३३॥
ज्ञान एवं क्रिया से मिश्रित साधना करने वाले साधक(पूर्व वर्णित उदाहरणों के) न कूए में गिरेंगे और न अग्नि से जलेंगे । इस में कोई सन्देह नहीं है । अतः महाराज श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - क्रिया सहित ज्ञान की साधना के विना ज्ञानी को मुक्ति कभी नहीं प्राप्त हो सकती ॥३३॥ 
.
क्रिया भक्ति हरि भजन है, और क्रिया भ्रम जांन । 
ज्ञान ब्रह्म देखै सकल, सुन्दर पद निर्बान ॥३४॥ 
इस साधनाविधि का संक्षिप्त निरूपण : इस विशिष्ट साधनापद्धति में १. हरिभक्ति (निरञ्जन निराकार प्रभु का सतत स्मरण) ही 'क्रिया' कहलाती है । अन्य मिथ्यागुरुपदिष्ट क्रियाओं को भ्रमात्मक ही समझो । तथा २. 'उस प्रभु को सर्वव्यापक मान कर तदनुसार आचरण को ज्ञान समझना चाहिये । ऐसी साधना करने वाले साधक को ही निर्वाण (मोक्ष) पद प्राप्त हो सकता है ॥३४॥
.
कर्ता कर्म न भोगता, पुद्गल जीव न कोई । 
सुन्दर यह भ्रम स्वप्न मैं, जागें एक न दोइ ॥३५॥ 
६. ज्ञानी का अन्य भेद : कोई ज्ञानी कहता है कि यहाँ न कोई कर्ता है, न कोई कर्म, न ही उसका कोई फलभोक्ता ही है । न कोई पुद्‌गल(शरीर) है, न कोई जीव । अतः यह सब दृश्यमान संसार उसी प्रकार भ्रममात्र है, जैसे स्वप्न भ्रममात्र होता है । उस स्वप्न से जगने पर न वहाँ एक दिखायी देता है, न दूसरा ॥३५॥
.
भ्रम कर्त्ता भ्रम भोगता, भ्रम सु कर्म भ्रम काल । 
भ्रम पुद्गल भ्रम जीव है, सुन्दर सब भ्रम जाल ॥३६॥ 
वहाँ कर्ता, भोक्ता एवं कर्म - सब कुछ भ्रमात्मक प्रपञ्च है । इसी प्रकार पुद्‌गल(शरीर) एवं जीव भी भ्रममात्र है । अर्थात् सृष्टि में जो कुछ दिखायी दे रहा है वह सब भ्रम के अतिरिक्त कुछ नहीं है ॥३६॥
(क्रमशः)

कृष्णदेवजी की शिष्य परंपरा

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷*卐 श्री दादूदयालवे नम: 卐*🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
.
*दादू अंतरगति आपा नहीं, मुख सौं मैं तैं होइ ।*
*दादू दोष न दीजिये, यों मिल खेलैं दोइ ॥*
.
रामनारायणजी महान् वैद्य हुये, साखून के स्थान में दीक्षित थे । राजा रामसिंहजी के समय में जयपुर आ गये थे । जयपुर में इनको राजवैद्य की पदवी प्राप्त हुई थी तथा जयपुर राज्य के एक गुढा कुमावतन ग्राम भी इनको प्राप्त हुआ था । मोजीरामजी साखून में जाकर बसे और अच्छी ख्याति प्राप्त की । साखून में एक पीढी ही रहे । पश्चात् बुधरामजी के समय में जयपुर पुराणी बस्ती में आ गये । वहां स्थान अब भी है ।
.
रामनारायणजी ने महाराजा माधोसिंह का इलाज किया था । इसके फलस्वरूप में ही वि. सं. १९४७ में ग्राम गुढा कुमावतान तन कालख पट्टा जागीर माफी दिया था । आप राजकीय औषधखाना के मुखिया वैद्य थे । आप स्थान पर भी धमार्थ औषधालय चलाते थे, जो अब तक चल रहा है । अब भी रामनारायण औषधालय के नाम से १५००) रु. लगभग सरकारी सहायता मिलती है । आपको राज्य दरबार में ताजीमी कुर्सी मिलती थी ।
.
अपने स्थान से दरबार व राजकीय औषधखाना जाने आने के लिये राज्य से एक भैल(बैलगाड़ी) का प्रबन्ध था । आप पूर्वाश्रम में ब्राह्मण थे । और ईसरदा के थे । इसमें माधोसिंहजी के पूर्व परिचितों में से थे । आपने वि. सं. १९६० ज्येष्ठ कृष्णा ८ को देह छोड़ा था । आप के स्थान में अब वैद्य भजनदासजी आयुर्वेद, व्याकरण, वेदान्तचार्य दादू महाविद्यालय जयपुर के स्नातक हैं । आपका स्थान जाट के कुए का रास्ता पुराणी बस्ती, चांदपोल बाजार में रामनारायण धर्मार्थ औषधालय जयपुर है । २- नारायणा ३- गुढा कुमावतान ( कालख ) आपके कृषि भूमि है ।
.
६ कृष्णदेवजी की शिष्य परंपरा = गंगारामजी = १- क्षत्रियों के महन्त गंगारामजी~ आचार्य कृष्णदेवजी महाराज के ब्रह्मलीन होने पर मेड़ता में आचार्य गद्दी पर चैनरामजी महाराज को संपूर्ण भेष तथा मारवाड़ के राजाओं तथा प्रजा ने बैठाया था । किन्तु नारायणा में गंगारामजी के गुरु भाई कृपारामजी, नागेसंत तथा जयपुर नरेश ने गंगारामजी को गद्दी पर बैठाया था । फिर मतभेद समाप्त होने पर समाज ने आचार्य चैनरामजी से प्रार्थना की~आप अब नारायणा दादूधाम में पधारें ।
.
चैनरामजी ने कहा~वहां गंगारामजी को गद्दी पर बैठाया गया, वे गद्दी से कैसे हटेंगे । समाज के मुख्य २ व्यक्तियों ने कहा~उनको हम गद्दी छोड़ने के लिये प्रार्थना करेंगे और वे अवश्य समाज की प्रार्थना से गद्दी त्याग देंगे । तब चैनरामजी महाराज ने कहा उनकी कुछ मर्यादा व प्रतिष्ठा भी रहनी चाहिये । इसके लिये मैं समाज से निवेदन करूंगा कि हमें आचार्यों की स्मारक छत्रियां बनानी हैं । उनका उनको महन्त बनाकर उनकी प्रतिष्ठा रखी जाय । इस पर वे प्रसन्नता से गद्दी त्याग दें तो मैं नारायणा अवश्य चलूंगा ।
.
समाज के मुख्य २ महानुभाव नारायणा में आये और उनको चैनरामजी महाराज ने जैसा कहा था, वैसा ही उन्होंने गंगारामजी को कहा । गंगारामजी ने उक्त व्यवस्था होने की बात सुनकर सहर्ष गाद्दी त्याग दी । फिर महाराज चैनरामजी नारायणा पधारे और आचार्य जयतरामजी तथा अपने गुरुदेव कृष्णदेवजी की संयुक्त छत्री बनाई और उसकी प्रतिष्ठा करके गंगारामजी को छत्रियों के महन्त बना दिये । नारायणा में सर्वप्रथम उक्त छत्री ही बनी थी । इससे पूर्व के आचार्यों के चरणचिन्ह भैराणा में हैं, नारायणा में नहीं हैं ।
.
जयतरामजी महाराज तथा कृष्णदेवजी महाराज के संयुक्त चरणचिन्ह जिस छतरी में हैं, उसके ठीक पश्चिम में जो स्थान है वही छत्रियों के महन्तों का स्थान है । उसी में गद्दी लगा कर गंगारामजी विराजते थे । छड़ी चंवर आदि महन्तों के चिन्ह उनको दिये गए थे । आचार्यजी के पास छत्रियों के महन्त आते हैं तब आचार्यजी को दंडवत करते हैं और आचार्यजी खड़े होकर उनसे मिलते हैं ।
(क्रमशः)

*२५. नाम निरूप आदम अकलि का अंग ~९/१२*

*🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏*
*🌷卐 सत्यराम सा 卐🌷*
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
.
*२५. नाम निरूप आदम अकलि का अंग ~९/१२*
.
*सब ही नाम स्वभाव के, काढे अकलि विचार ।*
*जन रज्जब गुण गूंथ कर, जोड़े सहस हजार ॥९॥*
परमात्मा के सभी नाम स्वभाव, गुण तथा स्वरूपानुसार बुद्धि से विचार करके निकाले गये हैं और गुणों के द्वारा गूंथ करके तो बुद्धिमानों ने हजार हजार नाम जोड़कर सहस्त्र नाम स्तोत्रों की रचना की है ।
.
*जेती हिकमत हुक्म में, ये सब तिसके नांउ ।*
*सब साहिब जिस नाम में, ताकि मैं बलि जांउ ॥१०॥*
जितनी ही विद्यायें उस प्रभु की आज्ञा में हैं, वे सभी उसके नाम हैं अर्थात गुण, कर्म और स्वभाव से बनने वाले नाम सब विद्या द्वारा ही बनते हैं, किन्तु प्रभु के जिस स्वरूपभूत निज नाम में सब कुछ आ जाता है, मैं उसी नाम की बलिहारी जाता हूँ ।
.
*नाम निनामे१ के धरे, संतों शोध स्वभाय ।*
*रज्जब माने राम जी, सुमर्यां करी सहाय ॥११॥*
संतों ने परमात्मा के स्वभाव को विचार द्वारा खोजकर नाम-रहित१ के भी नाम रख दिये हैं रामजी ने भी उन्हें अपने नाम मानकर स्मरण करने वालों की सहायता की है ।
.
*निराकार का नाम तन, अलिफ१ अलह औजूद२ ।*
*जन रज्जब यहु गहन गति, मालिक है मौजूद३ ॥१२॥*
निराकार परमात्मा का शरीर नाम ही है, फारसी का आदि अक्षर१ ही अल्लाह का शरीर२ है । परमात्मा नाम रूप से सब जगह विद्यमान३ है, किन्तु उनके स्वरूप को जानकर उनमें प्रवेश करना बड़ा कठिन है ।
(क्रमशः)

*२५. नाम निरूप आदम अकलि का अंग ~५/८*

*🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏*
*🌷卐 सत्यराम सा 卐🌷*
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
.
*२५. नाम निरूप आदम अकलि का अंग ~५/८*
.
*आदम ने अचरज किया, नाम सु दीपक राग ।*
*तिमिर हंत सो उर धरहु, रज्जब जागहिं भाग ॥५॥*
मानव ने जो परमात्मा के जो नाम रक्खे हैं, वे दीपक राग के समान है, दीपक राग गाने से जैसे दीपक जग कर अंधेरा दूर होता है, वैसे ही नाम-स्मरण से हृदय का अज्ञान रूप अँधेरा दूर होता है, अत: नाम को सदा हृदय में रक्खो, तुम्हारा भाग्योदय होगा ।
.
*सांकल आतम राम को, नाम रूप निज जान ।*
*देख अबन्धूं बन्धना, जन रज्जब हैरान ॥६॥*
आत्माराम को बाँधने के लिये एक मात्र निज नाम-स्मरण रूप जंजीर ही समर्थ है, नाम-स्मरण रूप जंजीर बन्धन रहित परमात्मा को भी बाँधने वाला है, यह देखकर हमें बड़ा आश्चर्य होता है ।
.
*मन उनमन१ मूसल उभय, हाथा जोड़ी नांउ ।*
*बंध अबन्धूं बंदगी, हिकमत२ पर वलि जांउ ॥७॥*
मूसल से धान कुटते समय दोनों हाथ अपने आप मिल जाते हैं, वैसे ही नाम-स्मरण के द्वारा मन समाधि१ अवस्था में जाता है तब जीव और ब्रह्म दोनों मिल जाते हैं । स्मरण रूप भक्ति तत्त्वज्ञान द्वारा बन्धनयुक्त जीव और बन्धन रहित ब्रह्म दोनों को एक कर देती है, ज्ञानी मानव के उस तत्त्व-ज्ञान२ की हम बलिहारी जाते हैं ।
.
*नाम सभी संतों धरे, गहि गहि गुण उनमान ।*
*यहु रज्जब इस ओर तें, सुमिरन का अस्थान ॥८॥*
परमात्मा के सभी नाम संतों के गुण, कर्म को ग्रहण करके तथा स्वरूप का अनुभान करके रक्खे हैं । इस साधक अवस्था की ओर से परब्रह्म के चिन्तन का मुख्य स्थान नाम ही है, अर्थात नाम का आश्रय लेकर के ही स्मरण किया जाता है ।
(क्रमशः)

*२५. नाम निरूप आदम अकलि का अंग ~१/४*

*🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏*
*🌷卐 सत्यराम सा 卐🌷*
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
.
*२५. नाम निरूप आदम अकलि का अंग ~१/४*
इस अंग में मानव ने अपनी बुद्धि से रूप रहित परमात्मा के जो नाम रखे हैं, उन नामों तथा मानव की बुद्धि विषयक विचार कर रहे हैं ।
.
*नाम नाव आदम१ गढी, भर्या सु आदम भार ।*
*आदम खेवहिं अकलि सौं, आदम उतरहिं पार ॥१॥*
ज्ञानी मनुष्यों१ ने ही नाम रूपी नौका बनाई है और साधक मनुष्य रूप बोझा भरा है, गुरु रूप मनुष्य ही बुद्धि द्वारा उसे चलाते हैं, इस प्रकार ही साधक संसार -सिन्धु के पार उतरते हैं ।
.
*धन्य धन्य आदम अकलि, अकल कल्या धर नांउ ।*
*रज्जब रीझ्या देखकर, बुद्धि बँधन बलि जांउ ॥२॥*
मनुष्य की बुद्धि को धन्य है जिसने कलारहित ब्रह्म का भी नाम रख करके उसे कलायुक्त-सा कर दिया है, बुद्धिमानों के इस कलायुक्त-सा कर दिया है, बुद्धिमानों के इस कला-बन्धन को देखकर मैं भी अति प्रसन्न हूँ और बलिहारी जाता हूँ ।
.
*नाम नेह नर के बँध्या, निराकार निर्बन्ध ।*
*रज्जब धन्य आदम अकलि, अकलहिं बाह्या फंद ॥३॥*
नाम-स्मरण के कारण ही बन्धनरहित निराकार परमात्मा नर के स्नेह में बँधा है, मनुष्य की बुद्धि को धन्य है, जिसने कलारहित परमात्मा को कला रूप फँदे में डाल दिया ।
.
*अकलि१ बड़ी दी आदम२ हिं, नाम निनाम३ हिं दीन्ह ।*
*अगह गह्या जिहिं बुद्धि सौं, अलग सलग४ कर लीन्ह ॥४॥*
सृष्टि कर्त्ता ने मनुष्य को विशाल बुद्धि दी है, जिसके बल से मानव ने नाम-रहित को भी नाम प्रदान किया है और मन इन्द्रियों के द्वारा जो नहीं ग्रहण किया जाता है, उस ब्रह्म को आत्म रूप से ग्रहण किया है, इस प्रकार जो जीव और ब्रह्म अलग भास रहे हैं, उन्हें एक कर लिया है ।
(क्रमशः)

शुक्रवार, 14 अगस्त 2026

३१. अन्योन्य भेद कौ अंग २९/३२

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
.
३१. अन्योन्य भेद कौ अंग २९/३२
.
सुन्दर या अनुक्रम बिना, ज्ञान प्रगट नहिं होइ । 
बात कहें का होत है, भ्रम मति भूलै कोइ ॥२९॥ 
ज्ञानप्राप्ति की इस विधि के बिना जिज्ञासु साधक को आत्मज्ञान नहीं प्राप्त हो सकता । वैसे, इस ज्ञानप्राप्ति के लिये नाना उपदेशक दूसरे प्रकार की अन्य विधियाँ(बातें) बताते हैं; परन्तु उनकी ये बातें(उपदेश) भ्रममात्र हैं । इनसे आत्मज्ञान कथमपि नहीं प्राप्त हो सकता । अतः कोई जिज्ञासु साधक ऐसे भ्रान्त उपदेशों के भ्रम में न पड़े ॥२९॥ 
.
क्रिया करत है बहुत विधि, ज्ञान दृष्टि जो नांहिं । 
अंध चल्यौ मग जात है, परै कूप के मांहिं ॥३०॥ 
ज्ञानविहीन साधक : अनेक भ्रान्त साधक मिथ्यागुरु के मिथ्या उपदेश के आश्रय से साधना(क्रिया) करने लगते हैं; परन्तु उन को बहुत श्रम करने पर भी ज्ञानदृष्टि उद्भुत नहीं हो पाती । ऐसे साधक की वही दशा होती है जैसे कोई अन्धा(नेत्रविहीन) पुरुष, मार्ग में चलते चलते, सामने आये कूप में जा गिरे ॥३०॥
.
ज्ञान दृष्टि करि निपुनि है, क्रिया नहीं पग दौर । 
अग्नि लगै जब सदन मैं, पंगु जरै वहि ठौर ॥३१॥ 
क्रियाविहीन साधक : तथा जिस मिथ्या साधक को साधना द्वारा ज्ञानदृष्टि तो उद्भूत हो गयी, परन्तु उसकी क्रियाएँ तदनुकूल नहीं हैं तो उसकी भी वही दशा होगी जैसे कोई पुरुष, घर में अग्नि लग जाने का ज्ञान होने पर भी उससे बाहर निकलने की कोई क्रिया(प्रयास) न करे । अन्त में, वह वहीं जल कर मर जाता है ॥३१॥ 
.
ज्ञान क्रिया दोऊ मिलहिं, तबही होइ उबार । 
यथा अंध के कंध पर, पंगु होइ असवार ॥३२॥ 
ज्ञान एवं क्रिया समन्वित साधना से ही मोक्षप्राप्ति : अतः आत्मज्ञान की साधना में वही साधक सफल माना जाता है, जिसकी साधना में ज्ञान एवं क्रिया दोनों सम्मिलित हों । जैसे कोई पंगु(क्रियाविहीन, परन्तु ज्ञानवान्) पुरुष अन्धे(ज्ञानरहित परन्तु क्रियावान्) पुरुष की पीठ पर चढ कर दुर्गम मार्ग पार कर लेता है । (क्रिया एवं ज्ञान का मिश्रण ही सफलता प्रदान करता है । ज्ञानं भारः क्रियां विना) ॥३२॥
(क्रमशः)

बुधरामजी =

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷*卐 श्री दादूदयालवे नम: 卐*🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
.
*दादू सोई सेवक राम का, जिसे न दूजी चिंत ।*
*दूजा को भावै नहीं, एक पियारा मिंत ॥*
.
बुधरामजी = जयतरामजी महाराज की शिष्य परम्परा में भोजपुरा स्थान की परम्परा इस प्रकार है~ १- बुधरामजी, इनके शिष्य दयारामजी गुढा ग्राम में अपना साधन धाम बनाकर भजन करने लगे । दूसरे मयारामजी भोजपुरा में ही भजन करते रहे । उनके शिष्य १ - नानकरामजी उनके २ - महादेव देवदासजी उनके ३- रामधनदासजी ४- भोलारामजी ५- वक्षीरामजी ६- बालदासजी ७- हरिरामजी ८- शीतलदासजी वर्तमान हैं । यही भोजपुरा स्थान की परम्परा है ।
.
इस परम्परा के आदि संत बुधरामजी परमविरक्त परोपकारी संत थे । वे वर्तमान भोजपुरा ग्राम से लगभग १॥मील उत्तर में खीरवा ग्राम के जंगल में एक पर्णकुटी में रहते थे । तथा निरन्तर निर्गुणराम का चिन्तन करते हुये पशु पक्षियों तथा पथिकों को जल पिलाना रूप परोपकार करते रहते थे । आपकी इस परोपकार वृत्ति से प्रभावित होकर एक श्रद्धालु जवानीराम जाट भक्त ने अपने खेत में से २४ बीघा भूमि बुधरामजी के भेंट कर दी और उस भूमि में एक पक्का कुआ तथा एक खेल भी बनवादी ।
.
वहां रहकर बुधरामजी अपनी उक्त प्रकार की सेवा रूप परोपकार करने लगे । वह प्याऊ अब तक चलती आ रही है । बुधरामजी का अन्तिम समय निकट आने पर अपने सेवकों को आज्ञा दी कि मेरा शरीर जाने वाला है । प्राण पिण्ड का वियोग होने पर शव को घोड़े की पीठ पर बांध देना । वह घोड़ा जहाँ रुक जाय वहां ही संस्कार करके समाधि बना देना । सेवकों ने वैसा ही किया ।
.
वर्तमान भोजपुरा ग्राम के स्थान के सम्मुख गोशाला में बुधरामजी की समाधि विद्यमान है । सेवक लोग अब भी समाधि को पूजते हैं । समाधि बनने के पश्चात् समाधि के पास कच्चा स्थान रूप दादूद्वारा बना । बुधरामजी के सेवक ब्राह्मण और जाटों के सैकड़ों परिवार थे । बाद मैं इस स्थान के सेवक राजपूत भी बहुत बन गये । सेवक लोग बच्चों के जडूला आदि संस्कार बुधरामजी की समाधि पर आकर ही करते हैं ।
.
बुधरामजी के शिष्य मयारामजी भोजपुरा रहे और दूसरे शिष्य दयारामजी ग्राम में चले गये । उनकी परंपरा वहां चली । उनकी परंपरा में वर्तमान में भजनदासजी वैद्य पुराणी बस्ती जयपुर में हैं । मयारामजी की शिष्य परम्परा भोजपुरा में भोलारामजी संपत्तिशाली महापुरुष हुये । भोजपुरा में पक्का दादूद्वारा भोलारामजी ने ही बनाया था । भोलारामजी के समय वहां का आसपास का क्षेत्र खेती न होने के कारण अर्थ संकट में पड़ गया था, तब निकटस्थ जनता तथा जोबनेर, मंढ़ा, भैसलाना भादवा, रोझडी आदि के जागीरदार ठाकुरों कों भी भोलारामजी ने आर्थिक सहयोग दिया था । वे प्रारब्धी महापुरुष थे ।
.
इन परंपरा में हरिरामजी भी परोपकारी, समाज सेवक साधु थे । आप नारायणा दादूधाम दादूद्वारे के भंडारी भी रहे थे । आप समाज के सभी अच्छे कार्यौं में सहयोग देते थे । हरिरामजी के शिष्य वैद्य शीतलदासजी वर्तमान हैं । नारायणा से गोविन्ददासजी के शिष्य मौजीरामजी साखून गये । उनके शिष्य बुधरामजी के समय में जयपुर पुरानी बस्ती का स्थान बसाया गया । उसमें रामनारायणजी, वल्लभदासजी, हरिरामजी, भजनदासजी वर्तमान गाड़ी वालों का मौहल्ला जाट के कुए का रास्ता, जयपुर पुराणी बस्ती के स्थान में रामनारायणजी महान् वैद्य हुये ।
(क्रमशः)

गुरुवार, 13 अगस्त 2026

३१. अन्योन्य भेद कौ अंग २५/२८

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
.
३१. अन्योन्य भेद कौ अंग २५/२८
.
जीव भयौ अनुलोम तैं, ब्रह्म होइ प्रतिलोम ।
सुन्दर दारू जराइ कैं, अग्नि होइ निर्धोम ॥२५॥
रे जीवात्मा ! जैसे अग्नि काष्ठ को जला कर धूमरहित हो जाती है, वैसे ही जब तक तूं देह के संसर्ग में था, तब तक तूँ उसके अनुकूल(अनुलोम) था । अब तेरा देह से संसर्ग छूट जाने के कारण प्रतिकूल(प्रतिलोम) ब्रह्मरूप हो गया है । अब उस देह से तेरा कोई सम्बन्ध नहीं है, अतः तूं उसका ममत्व त्याग दे ॥२५॥
.
गऊ देह कै मद्धि है, पय अरु उत्तम ज्ञान ।
सुन्दर घृत ज्यौं आतमा, ब्यापक एक समान ॥२६॥
४. गो-दुग्ध की उपमा से ज्ञानी की प्रशंसा : जैसे गौ के दूध में घृत सर्वत्र व्याप्त रहता है, उसी प्रकार ज्ञानी की देह में श्रेष्ठ आत्मा तथा उस का ज्ञान सर्वत्र व्यात है ॥२६॥
.
चारि श्रवन जब नीरिये, बांट मनन अभ्यास ।
सुन्दर दुहिये धेनु कौं, सो कहिये निदिध्यास ॥२७॥
श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - जैसे किसी गौ को, अधिक दूध की प्राप्ति के लिये पहले उसको उत्तम चारा(हरा घास) तथा बीट(खली, बिनौला, दाना) आदि खिलाया जाता है तब उससे दूध निकाला जाता; उसी प्रकार जिज्ञासु साधक को भी पहले गुरुपदेशश्रवण रूप चारा, तथा बांट(खाली, बिनौला आदि) रूप निराई(मनन) करने के बाद ही दूध निकालना रूप निदिध्यासन करना चाहिये ॥२७॥
.
दुग्ध ज्ञान जब पाइये, जा मन निश्चै तात ।
सुन्दर दधि मथि अनुभवै, निकसै घृत साक्षात ॥२८॥
इस विधि से साधक को जब ज्ञानरूप दूध मिल जाता है, तब उसे 'जीव-ब्रह्म की एकता' का निश्चयात्मक ज्ञान हो पाता है । इस निश्चयात्मक ज्ञान के बाद जब वह साधक दूध रूप ज्ञान को दही के रूप में बार बार मथता है तब उसे घृतरूप ब्रह्म का साक्षात्कार होता है ॥२८॥
(क्रमशः)

जयतरामजी की शिष्य परम्परा

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷*卐 श्री दादूदयालवे नम: 卐*🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
.
*जे नांही सो ऊपजै, है सो उपजै नांहि ।*
*अलख आदि अनादि है, उपजै माया मांहि ॥*
.
जयतरामजी की शिष्य परम्परा =
५- जयतरामजी की शिष्य परम्परा~ १- रामचन्द्रदासजी, नारायणा मुख्य स्थान ।२ - रामदासजी, ३-गोविन्दरामजी । इनके एक शिष्य बुधरामजी-भोजपुरा में अपना साधन धाम बनाकर भजन करने लगे । दूसरे शिष्य मौजीरामजी के साखून, गुढ़ा, जयपुर स्थान बने । नारायणा में ४- भगवतदासजी ५-हरिनारायणदासजी ६- नन्दरामदासजी ७- बुधरामदासजी ८- खेमदासजी ९- गुमानदासजी १०- धनीरामजी वर्तमान में नारायणा दादूधाम में ही आपका स्थान अलग है ।
.
१- रामचन्द्रदासजी आचार्य जयतरामजी महाराज के प्रमुख शिष्य तथा कृपा पात्र थे । अपने गुरुदेव के समान ही आप भी सिद्ध तथा भजनानन्दी महान् संत थे । आप दादूवाणी के विचार में संलग्न रहते थे । दादूवाणी के उपदेशानुसार निर्गुणराम के चिन्तन में ही निरन्तर लगे रहते थे । आपकी वृत्ति प्रायः अन्तर्मुख रहती थी ।
.
३- गोविन्दरामजी~आप भजनानन्दी महात्मा थे । संत परम्परा के संरक्षक थे । आपके अनेक शिष्य थे किन्तु तीन मुख्य शिष्य थे १- भगवतदासजी, ये नारायणा में रहकर भजन करते थे । २- बुधरामजी, इन्होंने भोजपुरा में अपना साधन धाम बनाया था । ३- मौजीरामजी, इन्होंने प्रथम साखून में अपना साधन धाम बनाया और पश्चात जयपुर पुराणी बस्ती स्थान बनाया ।
.
मुख्य स्थान नारायणा के उत्तराधिकारी भगवतदासजी रहे । ये अच्छे विद्वान भजनानन्दी संत स्वभाव वाले महात्मा थे । भगवतदासजी के शिष्य हरिनारायणदासजी हुये । इन्होंने स्थान का संवर्धन किया-मकान भी बनाये, कृषि योग्य भूमि भी स्थान के नीचे लगाईं । संपत्ति भी संचय की । दादूद्वारे में दो बड़े मकान बनाये । इनका पुराणा स्थान श्री भंडार के घी के कोठार के ऊपर था । इनकी परम्परा के साधु मेलों में घी तोलकर वितरण करते थे । इससे इनकी संज्ञा घिया हो गई थी ।
.
हरिनारायणदासजी सिद्ध पुरुष थे । इनसे भूत प्रेतादि कांपते थे । इनकी समाधि वर्तमान धनीरामजी के आश्रम में है । पहले चबूतरा ही था किन्तु धनीरामजी ने उस पर अब छत्री बना दी है । इस परम्परा में ये प्रधान सिद्ध संत हुये हैं । इनकी समाधि भी चमत्कारी है । स्व. आचार्य प्रकाशदेवजी महाराज कहते थे कि मैं बचपन में जेब खर्च की कामना करके समाधि पर जाता था तब मुझे एक चांदी की चवन्नी मिलती थी । ऐसा अनेक बार हुआ था । इनकी परम्परा के अन्य संतों के चरण स्टेशन की ओर सांभर दूदू सड़क के पास है ।
.
९ गुमानदासजी, हरिनारायणजी से गुमानदासजी तक सभी संत भजनानन्दी व सुगुणों से संपन्न हुये । किन्तु गुमानदासजी पन्थ के छोटे बच्चों दादूवाणी पढ़ाते थे । पंथ परंपरा की शिक्षा देते थे । आचार्यों के साथ भ्रमण भी करते थे । रामत कोठीगढ़ा(वस्त्रादि वस्तुओं की बैलगाड़ी) के अधिकारी भंडारी कहलाते थे । प्राचीन साम्प्रदायिक परम्परा के ज्ञाता थे । धार्मिक उत्सवों में अच्छा सहयोग देते थे ।
.
१०~ धनीरामजी वर्तमान हैं । गुमानदासजी ने धनीरामजी को वि. स. १९७४ में अपना शिष्य बनाया था । उस समय धनीरामजी ५-६ वर्ष के थे । धनीरामजी ने प्रारंभिक शिक्षा के पश्चात् भ्रमण करते हुये अनेक स्थानों में अनेक संतों से आध्यात्मिक ग्रंथों का अध्ययन किया तथा चिरकाल तक वैराग्य पूर्वक भ्रमण करते रहे । अपने गुरु गुमानदासजी का देहान्त होने पर उनके उत्तराधिकारी बने फिर विशेषकर नारायणा में विराजने लगे । कलकत्ता के भक्त परिवार आदि आप पर अच्छी श्रद्धा रखते हैं । आपने नारायणा में अच्छा स्थान भी बनवा लिया है । आप आचार्य प्रकाशदेवजी महाराज के साथ रहकर कथा भी करते थे । उक्त परंपरा के मुख्य संत वर्तमान में धनीरामजी ही हैं ।
(क्रमशः)

*२४. नाम महिमा का अंग ~३३/३५*

*🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏*
*🌷卐 सत्यराम सा 卐🌷*
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
.
*२४. नाम महिमा का अंग ~३३/३५*
.
*काया काष्ठ में बंधी, देखो आज्ञा आगि१ ।*
*सो मुकती२ ह्वै रज्जबा, नाम अँगारे लागि ॥३३॥*
काष्ठ में अग्नि१ बँधा रहता है किन्तु अँगारा लगने पर काष्ठ जल कर वह अग्नि व्यापक अग्नि में लय हो जाता है, वैसे ही आत्मा को परमात्मा से मिलने की आज्ञा होने पर भी वह देहाध्यास के कारण शरीर में बद्ध है किन्तु निरंतर नाम-स्मरण होने से वह खुल२ जाती है, अर्थात नाम-स्मरण द्वारा ज्ञान होकर आत्मा परमात्मा में अभेद रूप से मिल जाता है ।
.
*कर्म काष्ठ कहु क्या करे, जब प्रकटे पावक नांउ ।*
*अठारह भार अघ दहम१ ह्वै, बासदेव२ बलि जांउ ॥३४॥*
जैसे अठारह भार वनस्पति रूप काष्ठ अग्नि के आगे क्या जोर कर सकता है, वह तो भस्म ही हो जाता है वैसे ही नाम-स्मरण द्वारा ज्ञानाग्नि प्रकट होने पर कर्म क्या कर सकते हैं ? वे तो भस्म१ ही हो जाते हैं उस ज्ञानाग्नि२ की हम बलिहारी जाते हैं ।
.
*प्रतिमा१ पूजा नाम धरि, नाम तिरे पाषान ।*
*सोई नाम नर उर बस्या, सीझे२ क्यों न सुजान ॥३५॥*
राम कृष्णादि नाम रखने पर ही मूर्ती१ की पूजा होती है, बिना नाम धरे तो कोई भी नहीं पूजता और नाम अंकित होने पर ही सेतु बाँधने के समय पत्थर जल पर तिरे थे । हे बुद्धिमान् ! राम-नाम मनुष्य के हृदय में निरंतर बसा रहे तो यह सिद्धावस्था२ मुक्ति को क्यों नहीं प्राप्त होगा ? अर्थात होगा ही ।
इति श्री रज्जब गिरार्थ प्रकाशिका सहित “२४. नाम महिमा का अंग” समाप्त ॥
(क्रमशः)

*२४. नाम महिमा का अंग ~२९/३२*

*🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏*
*🌷卐 सत्यराम सा 卐🌷*
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
.
*२४. नाम महिमा का अंग ~२९/३२*
.
*नाहर१ जरख सु मंत्र वश, अबला२ ह्वै असवार ।*
*तो नाम लेत नर नेह सौ, क्यों ना ह्वै करतार ॥२९॥*
बाध१ और जरख भी मंत्र के अधीन हो जाते हैं और उनपर डाकिनी नारी२ बैठकर घूमती है, तो फिर स्नेह पूर्वक ईश्वर का नाम जपने से ईश्वर क्यों न अनुकूल होंगे ?
.
*जन जगपति के मध्य मन, द्वै दिशि जीव इक नांउ ।*
*रज्जब राखे नाम मन, तिनकी मैं बलि जांउ ॥३०॥*
भक्त और भगवान् दोनों के मन में एक नामरूप जीव है, अर्थात भक्त भी नाम के आश्रय जीवित रहता है और भगवान के अस्तित्त्व का भी बोध नाम से ही होता है, ऐसे नाम में जो निरंतर अपना मन रखते हैं, मैं उनकी बलिहारी जाता हूँ ।
.
*नाम निरंजन जीव है, सो साधु मध्य श्वास ।*
*तो रज्जब हरि क्यों रहे, बिन आये उन पास ॥३१॥*
नाम ही निरंजन राम का जीव है और वह संत के प्रति श्वास के साथ रहता है, अर्थात निरंतर स्मरण रहता है, तो फिर उन संतों के पास आये बिना हरि कैसे रह सकते हैं ?
.
*नाम नाज जीवन सबहुं, आदम१ की औलाद२ ।*
*और हु और अहार है, देखर४ दीज्यो दाद३ ॥३२॥*
आदि मानव१ की संतान२ मनुष्य जाति का, भगवान नाम स्मरण रूप नाज ही जीवन है, अर्थात नाम-स्मरण बिना मानव में आत्म-बल की वृद्धि नहीं होती । अन्य पशु, जाति आदि का आहार अन्य वस्तुएँ है, अत: नाम का स्मरण करके नाम-स्मरण द्वारा प्राप्त आत्म-बल को प्रत्यक्ष देखकर४ के साधक को स्मरण की प्रशंसा३ अवश्य करनी चाहिये ।
(क्रमशः)

*२४. नाम महिमा का अंग ~२५/२८*

*🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏*
*🌷卐 सत्यराम सा 卐🌷*
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
.
*२४. नाम महिमा का अंग ~२५/२८*
.
*नमो नाम महिमा अंनत, बोध न वाणी माँहिं ।*
*रज्जब कहिये कौन विधि, अकल कह्या नहीं जाहि ॥२५॥*
नाम की महिमा अनन्त है, उसे कह सके ऐसा ज्ञान वाणी में तो है ही नहीं फिर किस प्रकार कही जा सकती है ? निज नाम कला विभाग से रहित है अत: उसका यश नहीं कहा जा सकता, हम तो नाम को नमस्कार ही करते हैं ।
.
*रज्जब रंचक भजन की, महिमा कही न जाय ।*
*अर्ध नाम पशु१ उद्धरे, नर देखो निरताय२ ॥२६॥*
किंचित मात्र भजन की भी महिमा नहीं कही जा सकती, हे नरो ! विचार करके देखो तो सही आधे नाम के उच्चारण से भी गजराज१ का उद्धार२ हो गया ।
.
*आदम१ ईदम२ औलिया३, गहिये अगह अलाह ।*
*सिफत४ नाम की क्या कहूँ, बन्ध अबन्धू बाह५ ॥२७॥*
नाम-समरण की महिमा४ मैं क्या कहूँ, नाम - स्मरण करके यह२ मनुष्य१ संत३ बन जाता है, न ग्रहण किया जाय उस ब्रह्म को आत्मा रूप से ग्रहण करता है, और संसार बन्धन में बँधे हुये प्राणियों को मुक्त कर के धन्य५वाद का पात्र होता है ।
.
*सारंग१ सर्प शिशु स्वर सुनत, मगन होत मुर२ मान ।*
*त्यों जगदीश्वर जाप वश, जन रज्जब जिव जान ॥२८॥*
मृग१, सर्प और बच्चा ये तीनों२ वीणा आदि बाजों के स्वर को सुन कर प्रसन्न होते हुये बजाने वाले के अधीन हो जाते हैं, वैसे ही ईश्वर जीव द्वारा किये गये नाम जाप को जानकर प्रसन्न होते हैं और उसके अधीन हो जाते हैं, अर्थात उसकी इच्छानुसार व्यवहार करते हैं, यह यथार्थ ही मानना चाहिये ।
(क्रमशः)

*२४. नाम महिमा का अंग ~२१/२४*

*🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏*
*🌷卐 सत्यराम सा 卐🌷*
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
.
*२४. नाम महिमा का अंग ~२१/२४*
.
*शशि सांई तारे सुजन, ध्रुव रूपी निज नाँउ ।*
*प्रदक्षिण देही शाम सौं, जन रज्जब वलि जाँउ ॥२१॥*
चन्द्रमा और तारे सांयकाल से ही ध्रुव के परिक्रमा देते हैं, वैसे ही परमात्मा और श्रेष्ठ भक्त निज नाम के प्रदक्षिणा देते हैं, अर्थात नाम के पास ही रहते हैं, ऐसे नाम की मैं दास बलिहारी जाता हूँ ।
.
*साधू सांई शीश पर, नाम सदा शिर मौर ।*
*रज्जब रीझ्या देखकर, अकल१ कले२ जहिं ठौर ॥२२॥*
संत तथा परमात्मा के शिर पर नाम सदा मुकट के समान रहता है, अर्थात दोनों ही श्रेष्ठ है, जिस नाम चिन्तन के द्वारा कला-रहित१ परमात्मा भी कला२ धारण करते हैं, उस नाम रूप स्थान को देखकर मैं अति प्रसन्न हूँ ।
.
*रज्जब सुमिरन की सिफत१, मो पै कही न जाय ।*
*जा के वश दोनों भये, कुदरत२ सहित खुदाय ॥२३॥*
जिसके वश में माया२ और माया का स्वामी ईश्वर दोनों है, उस नाम सुमिरण की महिमा१ मेरे से कैसे कही जा सकती है ?
.
*नमो नाम सम कुछ नहीं, धरे१ अधर२ बिच और ।*
*जन रज्जब ता सौं बँधे, शिवरू शक्ति इक ठौर ॥२४॥*
मायिक१ संसार और परमात्मा२ के मध्य नाम के समान अन्य कुछ भी नहीं है, उस नाम के प्रताप से ब्रह्म और माया दोनों एक भक्तरूप स्थान से बँधे हैं, अर्थात दोनों ही नाम-स्मरण से अधीन हो जाते हैं, उस नाम को नमस्कार है ।
(क्रमशः)

*२४. नाम महिमा का अंग ~१७/२०*

*🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏*
*🌷卐 सत्यराम सा 卐🌷*
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
.
*२४. नाम महिमा का अंग ~१७/२०*
.
*नख शिख सूरत१ शुक्ल२ मध्य, मनसा वाचा मान ।*
*तैसे रज्जब नाम में, नाम धणी३ परवान४ ॥१७॥*
जैसे नख से शिखा पर्यन्त रूप१ को देखकर मन बलात काम२ में जाता है, वैसे ही मन वचन से नाम को ही यथार्थ३ रूप से नामी४ मानकर नाम में ही मन लगाना चाहिये ।
.
*मूल डाल तरु बीज मधि, त्यों जन जगपति नाम ।*
*रज्जब रीझ्या देख कर, बडहु बडी निज ठाम ॥१८॥*
जैसे बीज में मूल, डाल आदि सभी वृक्ष रहता है, वैसे ही नाम में भक्त और भगवान दोनों ही रहते हैं, अर्थात नाम में भगवान् अर्थ रूप से व्यापक रूप से रहते हैं और भक्त का मन नाम में रहता है । इस नाम रूप स्थान को देखकर हम अति प्रसन्न हैं, हमारी नाम रूप जगह बड़े स्थानों से भी बड़ी है ।
.
*रज्जब एकहि नाम मध्य, देखी दीरघ ठौर ।*
*संत अनन्त समाव हिं, अस्थल इसा न और ॥१९॥*
एक नाम ही अति विशाल जगह देखी है, जिसमे ज्ञानी योगी, भक्त, कर्मकाण्डी आदि अनन्त संत समाते हैं, अर्थात सभी नाम का चिन्तन करते हैं । नाम साधना के समान साधन रूप स्थान अन्य नहीं है ।
.
*बडहुं बडा सांई सही, ताहि बडे सत साध ।*
*दोनों आये नाम में, रज्जब नाम अगाध ॥२०॥*
बड़े जो ब्रह्मादि है उनसे भी बड़ा परमात्मा है, परमात्मा से भी बड़े परमात्मा के प्यारे सच्चे संत हैं और परमात्मा की महिमा नाम में स्थित है, तभी तो नाम चिन्तन से प्रगट होती है, नाम की महिमा अगाध है ।
(क्रमशः)

बुधवार, 12 अगस्त 2026

३१. अन्योन्य भेद कौ अंग २१/२४

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
.
३१. अन्योन्य भेद कौ अंग २१/२४
.
ताही तैं यह जीव है, अहं ममत जब होइ । 
भूलि गयौ निज रूप कौं, सुधि बुधि अपनी खोइ ॥२१॥
जब जीव की इस देह में 'मैं' या 'मेरा' यह ममता हो जाती है, तब यह जीव अपना वास्तविक शुद्ध बुद्ध रूप भूल कर सांसारिक प्रपञ्चों में फंस जाता है ॥२१॥ 
.
जो कोई जिज्ञास ह्वै, सद्‌गुरु सरणै जाइ । 
सुन्दर ताहि कृपा करै, ज्ञान कहै समुझाइ ॥२२॥ 
ऐसी स्थिति आने पर यदि कोई जिज्ञासु साधक किसी सद्‌गुरु की शरण में पहुँचता है, तब वे सद्‌गुरु उस पर कृपा कर उस को ज्ञान (यथार्थता) का उपदेश करते हैं । उस को उस की वास्तविक स्थिति भली भाँति समझाते हैं ॥२२॥ 
.
वा सौं सद्‌गुरु यौं कहै, समझि आपनौ रूप । 
सकल भेद भ्रम दूरि करि, तूं है तत्व अनूप ॥२३॥ 
वे सद्‌गुरु उस समय उसको यही उपदेश करते हैं - अरे भले आदमी ! तू अपना वास्तविक रूप समझ ! अपने सभी अज्ञानजन्य भ्रम दूर कर ले ! अरे ! तूँ तो शुद्ध बुद्ध निरञ्जन निराकार रूप अनुपम तत्त्व है, तेरा इस अज्ञान से क्या सम्बन्ध ! ॥२३॥ 
.
अस्ति होइ सत रूप तब, भाति होइ चैतन्य । 
प्रिय पुनि ह्वै आनन्दमय, आतम ब्रह्म न अन्य ॥२४॥ 
तूँ 'सत्' होने के कारण सदा 'अस्ति'(अविनाशी) है । 'चित्' होने के कारण 'भाति'(सुन्दर तथा चेतन) है तथा ‘आनन्दमय’ होने के कारण सदा 'शिव'(प्रिय = मङ्गलमय) है । अतः हे आत्मा ! तूं ब्रह्मरूप है, अन्य नहीं ॥२४॥ 
(क्रमशः)

= मसकीनदासोत =

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷*卐 श्री दादूदयालवे नम: 卐*🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
.
*प्रेम भक्ति दिन दिन बधै, सोई ज्ञान विचार ।*
*दादू आतम शोध कर, मथ कर काढ़या सार ॥*
.
अथ अध्याय ३ = मसकीनदासोत = आचार्य गरीबदासजी के पश्चात् मसकीनदासजी गद्दी पर विराजे और उनकी शिष्य परम्परा के ही संत अब तक गद्दी पर बैठते आ रहे हैं । जो गद्दी पर बैठे उनका विवरण आचार्य पर्व में आ गया है किन्तु मसकीनदासजी से लेकर आज तक के आचार्यों के अन्य भी शिष्य होते थे । उनकी शिष्य परम्परा के संत ही मसकीनदासोत कहलाते हैं ।
.
३ मसकीनदासजी की शिष्य परम्परा = अब उनका ही यथा प्राप्त परिचय इस प्रसंग में दिया जायगा । भक्तमालकार राघवदासजी ने आचार्य मसकीनदासजी के चार शिष्य बताये हैं~ १-फकीरदासजी २ - चेतनदासजी ३- अतीतदासजी ४- ध्यानीबाई । अन्य भी हो सकते हैं किंतु उनका उल्लेख नहीं मिल रहा है । उक्त चारों भी मसकीनदासजी के पुत्र ही थे और शिष्य भी थे इनका ऐसा ही परिचय मिला है ।
.
ध्यानी बाई ने साधन शिक्षा, सभा कुमारीजी से ली थी । अतः उनको सभा कुमारीजी की शिष्या भी अन्य ग्रन्थकारों ने लिखा है । मसकीनदासजी के समान ही उक्त तीन शिष्य भी परमविरक्त थे । अतः इन्होंने शिष्य नहीं किया तो कोई बड़ी बात नहीं है । उक्त तीनों खेजड़ाजी, भजनशाल और गरीब-गुहा पर बैठकर भजन ही करते थे । इनको अन्य प्रपंच रुचिकर नहीं था । इन्होंने कोई शिष्य किये भी हों तो उनका स्पष्ट उल्लेख नहीं मिलता है ।
.
४ फ़कीरदासजी की शिष्य परम्परा = २- फ़कीरदासजी महाराज के कई शिष्य थे १- क्षेमदासजी २- गोविन्ददासजी ३- गंगारामजी ४- बड़े जैतजी ५- लघुजैतरामजी आदि । किन्तु उनकी शिष्य परम्परा का पता नहीं लगता है फिर कुछ समय पूर्व श्यामदासजी और उनके शिष्य रामनारायणजी बाट बदल फ़कीरदासजी की शिष्य परम्परा में कहे जाते थे । वर्तमान में रामनारायणजी के शिष्य प्रहलाददासजी बाट बदल हैं । इनका एक स्थान सिरोही(शेखावटी) में है । एक स्थान नारायणा में कैरिया वालों की गली में भी है । इस स्थान का एक कूप और भूमि थी ।
.
नारायणा के मेलों में कच्चा सामान तोलने के समय इनकी परम्परा के साधु ताखड़ी के बाट बदला करते थे । इससे इनकी बाट बदल संज्ञा हो गई थी । सिरोही के स्थान की परम्परा १- गंगारामजी २- प्रेमदासजी ३- साहिबरामजी ४- क्षेमदासजी ५- भगवानदासजी, आगे तीन पीड़ी का नाम ज्ञात नहीं है । ९- लालदासजी १०- रामधनजी । नारायणा स्थान की परम्परा वि. सं. १८५२ में कुंजदासजी सं. १०४३ में रामदयालजी । सं. १९४४ में सूरतदासजी । सं. १९५२ मनसारामजी, शालगरामजी । सं. २००५ में श्योरामजी, रामनारायणजी, प्रहलाददासजी । उक्त सभी दादूवाणी का विचार करके उसके अनुसार निर्गुण भक्ति करने वाले थे ।
(क्रमशः)

*२४. नाम महिमा का अंग ~१३/१६*

*🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏*
*🌷卐 सत्यराम सा 卐🌷*
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
.
*२४. नाम महिमा का अंग ~१३/१६*
.
*नर नारायण सौं बड़ा, प्रकट नाम परकास ।*
*दोन्यों आगे नाम के, सेवक स्वामी दास ॥१३॥*
नाम चिन्तन द्वारा ब्रह्मज्ञान रूप प्रकाश प्रकट होकर नर नारायण(विष्णु) से भी बड़ा हो जाता है, अर्थात ब्रह्मरूप हो जाता है । नाम स्मरण के बल से ही सेवक नारायण रूप स्वामी के पास जाता है और नारायण रूप स्वामी सेवक के पास आता है ।
.
*रज्जब नाम नराधिपति, अंग१ अनन्त उमराव२ ।*
*दल बल महिमा क्या कहूँ, देख्या विपुल३ बणाव४ ॥१४॥*
नाम तो राजा के समान है और अनन्त साधन१ है वे सरदारों२ के समान हैं । इनके समूह और बल की महिमा में क्या कह सकता३ हूँ ? किन्तु मैनें देखा है, मोह दल को जीतने के लिये, इनकी सजावट महान्४ है ।
.
*युग युग राखी नाम की, संकट करी सँभाल ।*
*रज्जब महिमा क्या कहैं, वेद न जाने व्याल१ ॥१५॥*
परमात्मा ने नाम की महिमा प्रति युग में अखंड रक्खी है, नाम चिन्तन करने वालों की दु:ख के समय सहायता की है नाम की महिमा हम तो क्या कह सकते हैं, वेद तथा शेष१ जी भी पूर्ण रूप से नहीं जानते ।
.
*रज्जब महिमा नाम की, नर पै कही न जाय ।*
*जाके वश दोउ देखिये, कुदरत सहिय खुदाय ॥१६॥*
जिस नाम के वश में माया और माया के स्वामी ईश्वर दोनों हैं, उस नाम की महिमा मनुष्य से कैसे कही जा सकती है ।
(क्रमशः)

*२४. नाम महिमा का अंग ~९/१२*

*🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏*
*🌷卐 सत्यराम सा 卐🌷*
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
.
*२४. नाम महिमा का अंग ~९/१२*
.
*रज्जब नाम धणी१ सौं नाम का, दीसे तेज अन्नत ।*
*लीनौ२ घर लौंड़ा३ भया, साखी साधू संत ॥९॥*
राम नाम के नामी१ राम से नाम का प्रताप अत्याधिक दिखाई देता है, देखो, जिन भक्तों ने सविधि नाम लिया२ अर्थात चिन्तन किया उन दशरथादि के धर नामी राम पुत्र३ भी हो गये है, इस की साक्षी श्रेष्ठ संत भी देते हैं ।
.
*नाम धणी सौं नाम की, महिमा अधिक बखान ।*
*निज वपु घर तौं बूड गये, नाम तिरे पाषान ॥१०॥*
राम ने अपने शरीर के हाथ से जल पर पत्थर धरे वे तो डूब गये और नल-नील ने राम नाम लिख कर जल पर पत्थर धरे वे तिर गये । अत: नामी से नाम की महिमा अधिक कही जाती है ।
.
*फाटै थंभ रू मूरति पिवे, मंदिर मुख दिशि आन ।*
*रज्जब धनि धनि नाम बल, पानि तिरे पाषान ॥११॥*
नाम-स्मरण के बल से प्रह्लाद के लिये स्थम्भ फटा, नामदेव के हाथ से मूर्ति ने दूध पान किया, तथा मंदिर का मुख दूसरी दिशा में हो गया(ये कथाएँ भक्त मालों में प्रसिद्ध हैं) सेतु बाँधते समय जल पर पत्थर तिरे, अत: नाम-स्मरण जन्य शक्ति धन्य है, धन्य है ।
.
*नाम हिं राखे प्राण पति, अपनी ठौर१ उठाय ।*
*तो रज्जब ता नाम की, महिमा कही न जाय ॥१२॥*
प्राणपति परमेश्वर भी अपने आकार१ को हटाकर उसके स्थान में अपने नाम को ही रखते हैं, तो फिर उस नाम की महिमा कैसे कही जा सकती है ?
(क्रमशः)

*२४. नाम महिमा का अंग ~५/८*

*🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏*
*🌷卐 सत्यराम सा 卐🌷*
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
.
*२४. नाम महिमा का अंग ~५/८*
.
*निश्चल ह्वै नाम हिं भजे, एक मुहूरत मन्न ।*
*ता शम कृत मन सब कहैं, वेद रु वेत्ता जन्न ॥५॥*
एक घंटा वा एक क्षण भी जिसका मन निश्चल होकर राम का भजन करता है, तो उसने अपने मन को जीता है, ऐसा वेद तथा सभी विद्धान कहते हैं ।
.
*महन्त मुखों सेती१ सुन्या, रज्जब भजन प्रताप ।*
*ज्यो माया२ सौ माया उदय, त्यों नाम निरंजन आप३ ॥६॥*
जैसे पैसे२ से पैसा बढ़ता है, वैसे ही निरंजन ब्रह्म के नाम-चिन्तन से ब्रह्म३ प्राप्त होता है, ऐसा ही भजन का प्रताप महान् संतों के मुख से१ सुना है ।
.
*बहु विद्या हूनर१ बहुत, सुमिरण सम नहिं कोय ।*
*रज्जब गुण२ गुण सौं मिले, नाम सु नरहरि३ होय ॥७॥*
विद्या और गुण१ तो बहुत है किन्तु हरि-नाम-स्मरण के समान कोई नहीं है, कारण विद्या और गुणों से तो सांसारिक विषय२ ही प्राप्त होते हैं और नाम-स्मरण से ब्रह्म को प्राप्त होकर ब्रह्म३ ही हो जाता है ।
.
*अज्ञान कष्ट सब शक्ति१ में, शिव२ सेवा हरि नाम ।*
*ज्यो भृत३ भामिनि राज घर, सुत संपद् द्वै ठाम ॥८॥*
जैसे दास३ की नारी दासी राजा के घर में रहती है किन्तु उसका पुत्र और भूषणादि धन तथा राज-महल दोनों स्थानों में रहता है, वैसे ही जीवात्मा शरीर में रहता है किन्तु उसका मन और प्रेम माया१ में तथा हरि नाम दोनों में रहता है, माया में रहता है तब तो अज्ञान जन्य कष्ट मिलता है और हरि नाम में रहता है तब ब्रह्म की भक्ति द्वारा ब्रह्म२ को प्राप्त होता है ।
(क्रमशः)

*२४. नाम महिमा का अंग ~१/४*

*🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏*
*🌷卐 सत्यराम सा 卐🌷*
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
.
*२४. नाम महिमा का अंग ~१/४*
इस अंग में नाम महिमा सम्बन्धी विचार करेंगे -
.
*नमो नाम सम कुछ नहीं, साधु वेद मत माँहिं ।*
*तीरथ व्रत न योग यज्ञ, पटतर कहे न जाँहिं ॥१॥*
संतों तथा वेद मत का विचार करने पर ज्ञात होता है कि - ईश्वर नाम स्मरण के समान कोई भी साधन नहीं है, फिर तीर्थ, व्रत, योग और यज्ञ तो उसके समान कैसे कहे जा सकते हैं, उस नाम को हम नमस्कार करते हैं ।
.
*अर्ध नाम सम कुछ नहीं, जप तप तीरथ दान ।*
*षट् कर्म कष्ट रु साधना, समसरि१ नाम न जान ॥२॥*
परमात्मा के आधे नाम के समान भी कुछ नहीं है । जप, तप, तीर्थ, दान तथा ब्राह्मणों के षटकर्म-यजन, याजन, अध्यन, अध्यापन, दान देना और नाना साधन रूप कष्ट नाम-स्मरण के समान१ नहीं जानना चाहिये ।
.
*नाम ठाम रोके न कोई, जप तप तीरथ दान ।*
*रज्जब साधन कष्ट सब, सुमिरण सम न बखान ॥३॥*
नाम के स्थान को कोई भी नहीं रोक सकता अर्थात नाम की समता कोई भी नहीं कर सकता, जप, तप, तीर्थ स्नान, दान और भी नाना साधन रूप कष्ट ये सब नाम-स्मरण के समान नहीं कहे जाते ।
.
*सकल धर्म हरि नाम मधि, जप तप तीरथ दान ।*
*ज्यों रज्जब वृक्ष बीज में, बाहर द्रसे१ न पान ॥४॥*
जैसे सारा वृक्ष बीज में होता है, बाहर एक पत्ता ही नहीं दिखता१ वैसे ही संपूर्ण धर्म तथा जप, तप, तीर्थ, हरि नाम-स्मरण में आ जाता है, बाहर नहीं रहते अर्थात सबका फल नाम-स्मरण से प्राप्त हो जाता है ।
(क्रमशः)

मंगलवार, 11 अगस्त 2026

३१. अन्योन्य भेद कौ अंग १७/२०

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
.
३१. अन्योन्य भेद कौ अंग १७/२०
.
ब्रह्म देह कै मध्य है, अंतहकरण उपाधि । 
तत् संबंधी आतमा, ताहि लगी यह ब्याधि ॥१७॥ 
अन्तःकरण : सांख्यशास्त्रोक्त सृष्टिप्रक्रिया के पच्चीस तत्त्वों में एक अन्तःकरण भी वर्णित है, जो ब्रह्म और देह के बीच सेतु(पुल) का कार्य करता है । इसी अन्तःकरण उपाधि से जब आत्मा का सम्बन्ध हो जाता है तभी इस आत्मा को यह अविद्या रोग लग जाता है ॥१७॥ 
.
याही सुद्ध असुद्ध है, याकै ज्ञांन अज्ञांन । 
जड सौं मिलि जडवत भयौ, जीवातम सो जांन ॥१८॥ 
यह जीवात्मा ही अन्तःकरण उपाधि से अविद्याग्रस्त होकर स्वयं को कभी अशुद्ध या कभी शुद्ध या कभी अज्ञानी या ज्ञानी मानता रहता है । यह जड प्रकृति से मिल कर जड के समान व्यवहार करने लगता है । वस्तुतः यह जीवात्मा ज्ञानवान् है ॥१८॥ 
.
अस्ति असत सौ जानिये, भाति भयौ जड रूप । 
प्रिय पुनि हूवौ दुःखमय, भूलि पर्यौ भ्रम कूप ॥१९॥ 
यह अविनाशी होता हुआ भी जड(प्रकृति) से सम्बन्ध बनाकर स्वयं को विनाशी(अनित्य) समझने लगता है । स्वयं चेतन होता हुआ भी स्वयं को जड(अनात्म) मानने लगता है । सदा आनन्दमय होता हुआ भी प्रकृति-संयोग के कारण भ्रान्त होता हुआ स्वयं को दुःखमय मानने लगता है । इस प्रकार यह भ्रम(अज्ञान) कूप में जा गिरता है ॥१९॥
.
यह लक्षण अज्ञान कौ, देह सु मान्यौ आप । 
सुन्दर या अभिमान तैं, व्यापैं तीनौं ताप ॥२०॥ 
वस्तुतः यह भ्रम अज्ञान का चिह्न है । इसको देह के संसर्ग से जीव ने स्वीकार कर लिया है । श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - 'यह देह मेरा है' - इस देहाभिमान के कारण इस शुद्ध जीवात्मा को त्रिविध लौकिक सन्ताप दुःखी करने लगते हैं ॥२०॥
(क्रमशः)

मांदी स्थान के शाखा रूप स्थान

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷*卐 श्री दादूदयालवे नम: 卐*🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
*दादू सब जग दीसै एकला, सेवक स्वामी दोइ ।*
*जगत दुहागी राम बिन, साधु सुहागी सोइ ॥*
.
मांदी स्थान के शाखा रूप स्थान- १ मिलकपुर २ बागटा की ढांणी ३ कोटपुतली ४ बहरोड़ ५ विजोरास ६ पावटा ७ बसई ८ पाटन । यह मांदी ग्राम का इतिहास कनिकरामजी स्वामी नारायणा दादूद्वारे वालों ने आत्मरामजी मांदी वालों से प्राप्त करके भेजा था ।
.
लालदासजी =गरीबदासजी की परंपरा के स्थान कालख से लालदासजी बीलू के तत्कालीन ठाकुर की प्रार्थना पर १७९० के लगभग आये थे । बीलू का स्थान लालदासजी का ही साधन धाम है । लालदासजी ने बीलू में स्थान बनवाया था । ये अच्छे संत थे ।
.
३५ किशनदासजी = मांदी स्थान की शाखा कोटपूतली में प्रथम किशनदासजी सिद्ध पुरुष हुये हैं । उनके भक्त कोटपूतली के वैश्यों ने उनकी प्रशंसा नारनौल के नवाब के आगे की थी । उससे वह नवाब किशनदासजी के दर्शन करने कोट- पूतली आया और किशनदासजी के दर्शन तथा सत्संग से प्रभावित होकर स्थान की सेवा के लिये नवाब ने ४० बीघा भूमि किशनदासजी के भेंट की । कोटपूतली के माली सज्जन के पुत्र नहीं होता था । वह वृद्ध भी हो गया था । किन्तु उसके मन में पुत्र प्राप्ति की अति उत्कट अभिलाषा थी ।
.
वह किशनदासजी की शरण में आया और पुत्र प्राप्ति के लिये किशनदासजी से प्रार्थना की । तब किशनदासजी ने कहा~ तेरे पुत्र हो जायगा किन्तु दूसरा पुत्र हो वह हमारे चढ़ाना होगा । उसने मान लिया । फिर उसके दो पुत्र हुये । दूसरा पुत्र किशनदासजी को भेंट कर दिया । वही किशनदासजी का उत्तराधिकारी बना । उनका नाम रामबगसदासजी था ।
.
इस प्रकार १- किशनदासजी २- रामबगसदासजी ३- गंगादासजी ४- मोहनदासजी ५- अमरदासजी वर्तमान हैं । इनमें मोहनदासजी अच्छे वैद्य हुये हैं । इन्होंने गोपालदासजी बुवाणी वालों से भी आयुर्वेद संबन्धी अभ्यास किया था तथा कलकत्ता में औषधालय भी खोला था । ये दादूबाग कनखल में आते जाते थे । मैंने इनके दर्शन किये हैं ।
.
गरीबदासोतों के स्थान = सामान्य रूप से गरीबदासोत कहते हैं ~हमारे मुख्य स्थान ३६ हैं । १२=मारवाड़ में, १२- शेखावटी में और १२ काठेड़ा में हैं । मुझे जो ज्ञात हुये उनके नाम मैं नीचे दे रहा हूं । देखिये- १-नारायणा दादूधाम, २- गिधाणी, ३- पिलास, ४- छापरी, ५- बिलू(कालख से आये), ६- नलू, ७- चूरू, ८- मलाणा, ९- देवतड़ा, १०- चामू, ११-चैराई(पोकरण फलोदी)महालाणी प्रदेश, १२- रातड़िया, १३- जोधपुर नागौरीगेट तोलारामजी का अस्थल, १४- राजारामजी का स्थल, १५- खांड़ा पलसा घोसियों के मोहल्ले में जो दादू पंथियों के नोहरे के नाम से प्रसिद्ध है, १६- खाचरियावास, १७-भूरडों का वास, १८- वेन्या का वास, १९- रामगढ़(दांता), २०-चंदेरया का वास, २१- मोटलास, २२- वाय, २३- पचार, २४- रेणवाल, २५- रुलाणा, २६- तिकूटया(रामगढ़), २७- कालख, २८- कोटपूतली, २९- बहरोड़, ३०- मांदी, ३१- मलिकपुरा, ३२- बाठाटाकी ढांणी, ३३- विजोरास, ३४- पावटा, ३५- वसई, ३६- पाटन, ३७- मारोठ, ३८-ओसियां, ३९- कासली, ४०- सीतापुरा, ४१- जोबनेर, ४२- मांलामें, ४३- उणियारा में, ४४- नयाग्राम में, इत्यादिक स्थान गरीबदासोतों के हैं ।
.
उक्त सभी स्थानों में अच्छे २ संत महात्मा भजनानन्दी, योगी, परोपकारी, दयालु, विरक्त, विद्वान् , ब्रह्मज्ञानी, भगवद् विरही, प्रतिष्ठित, दीनवत्सल, निरभिमानी परमनम्र, क्षमाशील, परम विवेकी इत्यादिक विशेषताओं वाले अनेक संत हुये हैं किन्तु भूत काल के सब महान् संतों के संपूर्ण चरित्र मिलना इस समय सुगम नहीं है । जिन जिन के मुझे मिल सके उन २ के मैंने संक्षिप्त रूप से दे दिये हैं । इति श्री द्वितीय अध्याय समाप्तः

सोमवार, 10 अगस्त 2026

३१. अन्योन्य भेद कौ अंग १३/१६

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
.
३१. अन्योन्य भेद कौ अंग १३/१६
.
सुन्दर जैसैं पुरुष तैं, अंगुरी ह्वै चेतन्य । 
अंगुरी जंत्र बजावई, राग अन्य ही अन्य ॥१३॥ 
जैसे देह में पुरुष चेतन है, उस चेतन पुरुष के संसर्ग से देह की अंगुलि भी चेतन है । उस चेतन अंगुलि के माध्यम से उस जड़ वीणा के तारों से नानाविध राग निकलते हैं ॥१३॥
.
पुरुष सु तौ चेतन्य है, अंगुरी अंतहकर्ण । 
सुंदर बाजै जंत्र तनु, शब्द कहै बहु बर्ण ॥१४॥ 
इसका अधिक विस्तार यह समझें - इस जड देह में पुरुष चेतन रूप से अधिष्ठित है । उसी के सम्पर्क से अन्तःकरण से अंगुलिपर्यन्त देह के सभी सूक्ष्म या स्थूल अवयव चेतनता धारण किये देह रूप वादय यन्त्र से समस्त(नानाविध) राग(कृत्य) उत्पन्न होते रहते हैं ॥१४॥ 
.
सत अरु चित आनंदमय, ब्रह्म बिशेषण तीन । 
अस्ति भाति प्रिय आतमा, वहै बिशेषण कीन ॥१५॥ 
३. आत्मा के लक्षण : वेदान्तशास्त्र में ब्रह्म का परिचय तीन शब्दों से दिया है - १. सत्, २. चित् एवं ३. आनन्दमय । यहाँ सत् का अर्थ है - अस्ति(सदा वर्तमान = अविनाशी) । २. चित् का अर्थ है – भाति(अर्थात् शोभामय = सुन्दर) । एवं ३. आनन्दमय का अर्थ है – प्रिय('सत्यं शिवं सुन्दरम्' इस शब्दसमूह से भी इसी ब्रह्म का निरूपण है) ॥१५॥
.
असत जानि जड दुःखमय, तीन बिशेषण देह । 
उपजै बर्तैं लीन ह्वै, सब बिकार कौ गेह ॥१६॥ 
देह का लक्षण : उसी शास्त्र में देह का परिचय इन तीन शब्दों से दिया है - १. असत्, २. जड, ३. दुःखमय । यहाँ असत् का अर्थ है - विनाशी(अस्थायी) । जड का अर्थ है - अचेतन(चेतनाविहीन) । एवं दुःखमय का अर्थ है - विविध विकारों वाला । इसी से यह १. उत्पत्ति, २. स्थिति एवं ३. विनाश - इन तीन स्थितियों में बदलता रहता है । यह देह सांसारिक सृष्टि का आश्रयस्थल कहलाता है ॥१६॥
(क्रमशः) 

मोतीरामजी

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷*卐 श्री दादूदयालवे नम: 卐*🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
*अपने सांई कारणै, क्या क्या नहिं कीजे ?*
*दादू सब आरम्भ तज, अपणा शिर दीजे ॥*
.
मोतीरामजी = संतोषदासजी के पश्चात मोतीरामजी भी मांदी में प्रसिद्ध संत हुये हैं । वे नीमकाथाना के पास डाबला के क्षत्रिय सुने जाते हैं । ऐसा भी मांदी ग्राम के वृद्धों से मैंने स्वयं सुना है कि- मोतीरामजी पाटन नरेश के भाई बन्धुओं में थे । वे बाल ब्रह्मचारी, बलवान और भजनानन्दी संत थे ।
.
आपने उदयपुर जमात में रहकर डांड पट्टे तथा पहलवानी सीखी थी । आपको लकड़ी चलाने का अच्छा अभ्यास था । पट्टे बाजी में आप माने हुये खिलाड़ी थे । आपका शरीर बहुत फुर्तीला था । सैकड़ों आदमियों को चीरकर बाहर निकल जाते थे । आप माँदी स्थान में रहते थे । आस-पास के ग्रामों के लोगों को मल्ल विद्या की शिक्षा भी देते थे तथा भजन भी करते थे ।
.
एक समय मांदी ग्राम की खड़ी फसल को बनजारे चराने लगे । ग्राम के लोगों ने उनको रोका किन्तु वे नहीं रुके । उनके यूथ में भी बलवान् बंजारे थे ।ग्रामवाले मोतीरामजी के पास आये और कहा बनजारों से बहुत अनुनय विनय की किन्तु फिर भी वे नहीं, मानकर खड़ी फसल को नष्ट करा रहे हैं, कुछ लोग उनको रोकने गये थे उनको बनजारों ने पीटा भी है । अब हमारी बारह मास की रोजी केवल आपकी कृपा से बच सकती है ।
.
मोतीरामजी को ग्राम-वासियों पर दया आ गई । वे बोले चिन्ता मत करो । भगवान् आपकी फसल की रक्षा करेंगे । फिर मोतीरामजी दादूजी तथा हनुमानजी को प्रणाम करके एक ढाल और दो लकडियाँ लेकर घोड़ी पर चढ़ खेतों में पहुंच गये । घोड़ी को खेजड़ी वृक्ष के बाँधकर, बनजारों को कहा~ तुमको दया नहीं आती, गरीब किसानों की खड़ी फसल नष्ट क्यों कर रहे हो ? अब यदि अपना भला चाहते हो तो शीघ्र बैलों की बालद को खेतों से निकाल कर चले जाओ ।
.
मोतीरामजी के उक्त वचन सुनकर बनजारों ने उनका मजाक उड़ाया और कहा~ गांववालों की सहायता करने आया है, कहीं अपनी जान खो देगा । किन्तु मोतीरामजी डरनेवाले नहीं थे । उनका साहस देखकर बनजारों ने दो तीन युवकों को कहा- मोडे की अच्छी प्रकार खबर लो । यह सुनकर मोतीरामजी ने कहा, इनको क्या कहते हो तुम सब ही एक साथ आजाओ, इनको क्यों मरवाना चाहते हो ।
.
फिर तो सब बनजारे मोतीरामजी पर टूट पड़े किन्तु मोतीरामजी बाल ब्रह्मचारी, लकड़ी की शिक्षा में निपुण पहलवान, तपस्वी और परोपकारार्थ आये थे । उनके साथी भगवान्, हनुमानजी व दादूजी थे । मोतीरामजी ने अनेक बनजारों को धराशायी कर दिया, शेष प्राण लेकर भाग छूटे । फिर कुछ बूढ़े बनजारे अपनी पगड़ी उतार कर दूर से रक्षा करो रक्षा करो पुकारते हुये आये और मोतीरामजी के चरणों में पगड़ियां रख कर क्षमा मांगने लगे ।
.
तब मोतीराम जी ने कहा- बालद को खेतों से निकालो और आगे इस प्रकार किसी ग्राम में न करने की प्रतिज्ञा करो । बनजारों ने वैसा ही किया । उक्त प्रकार मोतीरामजी ने ग्राम की फसल की रक्षा की । यद्यपि वे भजनानन्दी संत थे तो भी आताताइयों को दंड देना उचित ही जान पडा तब ही उन्होंने ऐसा किया था । मोतीरामजी को मांदी ग्राम की जनता अब तक भी धन्यवाद देती है ।
.
मोतीरामजी के भक्तरामजी हुये थे । वे भी दयालु संत थे । भूखों को अन्न देते थे, वस्त्रहीनों को वस्त्र देते थे । ये परोपकारी भजनानन्दी थे । इनके क्षमारामजी हुए । ये भी अपनी परंपरा की रक्षा करने वाले अच्छे संत हुये हैं । वर्तमान में आत्मारामजी हैं । उक्त प्रकार गरीबदासोतों के मांदी के थांमे में अच्छे अच्छे संत हुये हैं । वहां की जनता इस संत परंपरा पर पूर्ण श्रद्धा रखती है । इस परंपरा के संत भी सदा जनता के हित में ही रहते हैं ।
(क्रमशः)

रविवार, 9 अगस्त 2026

३१. अन्योन्य भेद कौ अंग ९/१२

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
.
३१. अन्योन्य भेद कौ अंग ९/१२
.
तेरै अनुभव होइ है, तबहिं जानि हैं बीर । 
मुख तें कही न जात है, सुन्दर सुख की सीर ॥९॥
इस का उत्तर यही है, भाई ! कि जब तुम्हें ऐसे किसी अनुमान का अनुभव होगा तभी तुम समझ पाओगे कि अनुभव क्या और कैसे होते है; क्योंकि किसी प्राप्त सुख का आकार या रूप वाणी से नहीं कहा जा सकता ॥९॥
.
कन्या पूछत और त्रिय, पुरुष मिलै कौ सुक्ख । 
सुंदर परसी पीव कौं, तब कछु कहै न मुक्ख ॥१०॥
इस बात को इस उदाहरण से समझ लो - किसी कन्या(नाबालिग लड़की) ने अनेक विवाहित युवतियों से पूछा - पति से संसर्गसुख का क्या और कैसा अनुभव होता है ? परन्तु कोई युवति उसको स्पष्ट उत्तर न दे पायी । कालान्तर में जब उस कन्या का भी विवाह हो गया तो उस से यही प्रश्न पूछा गया तो वह भी इसका स्पष्ट उत्तर न दे पायी ॥१०॥
.
गूंगै खाई सरकरा, सुन्दर मन मुसक्याइ । 
सैंन बतावै हाथ सौं, मुख तैं कही न जाइ ॥११॥
वास्तविकता भी यही है, वाणी से कोई आनन्द का यथातथ वर्णन नहीं कर सकता । जैसे कोई गूंगा(मूक) पुरुष गुड खाकर भी उसके माधुर्य का वर्णन करने के लिये कहने पर या तो मुस्करा देता है या कुछ संकेतमात्र करके रह जाता है; वही बात आनन्दप्राप्ति के अनुभव-वर्णन पर भी चरितार्थ होती है । वह भी इधर उधर के संकेतों के अतिरिक्त मुख से इस का स्पष्ट वर्णन नहीं कर सकता ॥११॥
.
जिन जिन कौ अनुभव भयौ, तिन तिन पकरी मौंन । 
सुन्दर अनुभव गोपि है, चिन्ह बतावै कौंन ॥१२॥
यही बात आत्मानुभव के विषय में भी समझें । आज तक जितने ज्ञानियों ने आत्मा का अनुभव(साक्षात्कार) किया वे सब भी वाणी से आत्मा का यथातथ वर्णन नहीं कर पाये । पूछने पर भी मौन ही रह गये । महाराज श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - सभी अनुभव यथातथ रूप से अवर्णनीय होते हैं । उनका यथातथ आकार या रूप बताने का किसी में साहस नहीं होता है ॥१२॥
(क्रमशः)