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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*प्रीति न उपजै विरह बिन, प्रेम भक्ति क्यों होइ ।*
*सब झूठै दादू भाव बिन, कोटि करे जे कोइ ॥*
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साषी लापचारी की ॥
पाणी मैं पाथर रह्या, ऊपरि बध्या सिवालि ।
बषनां टाँच्याँ नीकली, माहिं अग्नि की झालि ॥१
(१ इसका अर्थ ‘निगुणा कठोर कौ अंग’ की साषियों में देखें ।)
गुरि मिलिया तब पाथर भीगा, चूना कीया गारी ।
पाणी माहिं पखाण भिजोया, बषनां गुरि की बलिहारी ॥२
(२ इसका अर्थ ‘सुमिरण कौ अंग’ की साषियों में देखें ।)
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पद ॥
हिरदै बडौ रे कठौर ।
कोटि कियाँ भीजै नहीं, अैसौ पाहण नांहीं और ॥टेक॥
गंगा नैं गोदावरि न्हायौ, कासी पुहकर मांहि रे ।
करम कापड़ी मैंण कौ, ताथैं रोम भीगौ नाहिं रे ॥
बेद नैं भागौत सुणियाँ, कथा सुणी अनेक रे ।
कर्म पाखर सारिखा, ताथैं बाण न लागौ एक रे ॥
औंधा कलसा ऊपरैं, जल बूठौ अखंड धार ।
तत बेलाँ निहालियौ, तौ पाणी नहीं लगार ॥
ब्रह्म अग्नि पाषाण जाल्या, चूना कीया सलेस रे ।
बषनां भिजोया राम रस, म्हारा सतगुर नैं आदेस रे ॥८८॥
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बषनांजी कहते हैं, सांसारिक विषय-भोगों को भोगने का आदी मन परमात्मा की ओर बिलकुल ही नहीं मुड़ना चाहता है । यह विषय-भोग, भोग-भोग कर अत्यन्त कठोर हो गया है, उन्हें छोड़ने का नाम ही नहीं लेता है । करोड़ों उपाय करने के उपरान्त भी यह पत्थर जैसा कठोर मन भीगता = नरम नहीं होता है । इस जैसा और कोई दूसरा अवयव कठोर नहीं है ।
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(पाठकों को यहाँ स्मरण करना चाहिये कि वास्तव में भाव क्या है और भाव तथा भक्ति का आपस में क्या सम्बन्ध है । यहाँ इस विषय में अधिक लिखने का अवकाश नहीं है किन्तु जिन्हें इस विषय में अधिक जानना हो, वे मधुसूदन स्वामी रचित ‘भक्तिरसायन’ ग्रंथ को अवश्य पढ़ें । भक्ति का उदय होता ही तब है, जब हृदय नवनीत के समान द्रवणशील = नरम होता है । भगवान् के नाम, गुणों को सुनते ही हृदय का द्रवित होकर तदाकार होना ही तो भक्ति है । यदि नाम-गुणों के सुनने के उपरांत भी मन में कोई परिवर्तन न हो तो वह मन भक्तिमार्ग के योग्य नहीं है । ऐसे साधकों को ज्ञानमार्ग का आश्रय लेना चाहिये । बषनांजी कठोर और नरम न होने की चर्चा करके इसी ओर संकेत कर रहे हैं ।)
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इस मन को नरम करने के लिये, इसमें भक्ति जम सके, एतदर्थ मैंने इसे गंगा नैं = और गोदावरी में नहलाया । काशी की गंगा तथा पुष्कर के ब्रह्मसरोवर में भी इसको स्नान कराया किन्तु क्या करें ? यह वहाँ भी नहीं भीगा क्योंकि इसने सकामकर्म रूपी मोंमिया(मोम में सना हुआ) कपड़ा पहना हुआ है ।
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इसने वेद और भागवत महापुराण का श्रवण किया है । इसके अतिरिक्त अन्य अनेकों इतिहास, पुराण उपनिषदों की कथाएँ, तत्त्वमीमांसाएँ सुनी है किन्तु इसके सकामकर्म, कवच के समान प्रतिबंधक बन गये जिससे इस पर एक भी शब्द रूपी बाण लग नहीं सका ।
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इसकी स्थिति ठीक वैसी ही है जैसे उल्टे रखे हुए कलश पर अखंडित जल की धारा गिरने के उपरान्त भी जब ततबेलाँ = जल की आवश्यकता होने के समय उसमें नाममात्र का भी पानी नहीं मिलता । वस्तुतः पानी तो तब मिले, जब उसमें पानी रुका हो । ठीक इसी प्रकार मन भाव-भक्ति में सराबोर हुआ तो तब अनुभव हो जब उसने भाव-भक्ति का एकनिष्ठ होकर अनुष्ठान किया हो ।
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बषनांजी अपनी स्थिति बताते हुए कहते हैं, परब्रह्म-परमात्मा की भक्ति रूपी अग्नि से हृदय रूपी पत्थर को जला डाला जिससे बह मजबूती के गुणों से युक्त उत्तम किस्म का चूना बन गया । फिर उस चूने को राम-नाम रूपी जल में भिगो दिया जिससे मुक्ति रूपी महल बनने का उत्तम सरंजाम हो गया । मेरे हृदय को उक्त प्रकार नरम करने की युक्ति बताने वाले गुरु महाराज को मेरा आदेश = नमस्कार है ॥८८॥