🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
*श्रद्धेय श्री @महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी, @Rgopaldas Tapsvi, बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ @Premsakhi Goswami*
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*४६. परमारथ कौ अंग ५३/५६*
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मेघ मया करि बूढ़ा तूटा३, हरी दूब बन राइ ।
कहि जगजीवन जे जस मनसा४, तस फल५ भुगतै भाइ ॥५३॥
(३. बूढ़ा तूटा-झंझावत की वर्षा में पुराने वृक्ष टूट करगिर जाते हैं)
(४. जस मनसा-जैसा संकल्प होता है) {५. तस फल-वैसा ही उस का फल (परिणाम) होता है}
संत जगजीवन जी कहते हैं कि वर्षा व मेघ झंझावात में पुराने बूढे पेड़ भी टूट जाते हैं ये सब संसारिक क्रियाओं का प्रभाव है । जिनके प्रभास से बड़े बड़े दृढ जन भी लक्ष्य से हट जाते हैं । और सूक्ष्म होने से हरि दूब फलती है जो अहम् से रहित हो दीन हो रहता है प्रभु उनका पोषण करते हैं । जैसी जिसकी भावना होती है वैसा ही फल मिलता है ।
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कहि जगजीवन भजन कौं, उद्दिम कीजै मांहि६ ।
रांम भगति गुर बंदगी, कोइ दुख ब्यापै नांहि ॥५४॥
(६. मांहि-ह्रदय में)
संत जगजीवन जी कहते हैं कि भजन सप्रयास करना चाहिये प्रभु की भक्ति व सेवा से कोइ दुख नहीं होता है ।
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उद्दिम अध्यातम भजन, रांम भगति तत सार ।
कहि जगजीवन हरि परमारथ, सब जन पहुँचैं पार ॥५५॥
संत जगजीवन जी कहते हैं कि हमारा परिश्रम अध्यात्म व भजन हो यह ही तत्व राम भक्ति का सार है । परमार्थ परमात्मा को साध कर सभी जन भव पार हो जाते हैं ।
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परमारथ कै कारणैं, उद्दिम कीजै ऊठि१ ।
रांम ह्रिदै रसनां रटिन, साध न फेरै मूंठि२ ॥५६॥
(१. उद्दिम कीजै ऊठि-उत्साहपूर्वक उद्योग करना चाहिये)
(२. मूंठि-साधु के मंत्र तंत्र के चक्कर में नहीं पड़ना चाहिये)
संत जगजीवन जी कहते हैं कि परमार्थ के कारण सप्रयास उठ कर काम करना चाहिये । राम ह्रदय में हों ओर जिह्वा पर प्रभु का नाम हो । साधु जन को तंत्र मंत्र से परे होना चाहिये ।
(क्रमशः)

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