शनिवार, 4 जुलाई 2026

भगवत्प्रदत्त विवेकका आदर

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* दादू सांई को संभालतां, कोटि विघ्न टल जांहि ।*
* राई मन बैसंदरा, केते काठ जलांहि ॥*
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*॥ श्रीहरि: ॥*
दिनांक 4.7.26.
वि. सं. 2083, 'रौद्र' नाम संवत्सर, आषाढ़ मास, कृष्ण पक्ष, चतुर्थी, शनिवार। (गीता दैनन्दिनी अनुसार)।
1- परम श्रद्धेय स्वामीजी श्री रामसुखदासजी महाराजका प्रवचन—
दिनांक— 10.8.95, प्रातः 5.18 बजे।
स्थान— जयपुर।
*विषय— भगवत्प्रदत्त विवेकका आदर करनेसे भगवत्प्राप्ति।*
2- गीता पाठ— गीता पाठ अध्याय 12 श्लोक संख्या 11 से 20 तक।
* जो मनुष्य अपने ज्ञानका, अपनी समझका, अपने अनुभवका आदर नहीं करता है, वह न शास्त्रोंका, न ईश्वरका, न गुरुजनोंका— किसीका भी आदर नहीं कर सकेगा। मनुष्योंको कम-से-कम अपनी समझ, अपनी जानकारीका आदर तो करना ही चाहिए। यह बात सब जानते हैं कि शरीर पैदा हुआ है और समय होने पर निश्चित ही मरेगा, फिर भी इस ज्ञानका आदर नहीं करते हैं। इस बातका अर्थ है कि यह मनुष्य शरीर भगवान् ने जिस विशेष उद्देश्यके लिए दिया है, मनुष्य शरीरमें भगवत्प्राप्तिका मौका दिया है, उसे शरीरके रहते प्राप्त कर लेना चाहिए। ऐसा नहीं करके मनुष्य शरीरमें नहीं करने योग्य कार्य करते हैं, यह अपने विवेककी हत्या है।*
* गांधीजीका एक पत्र अखबारमें छपा, जिसमें लिखा था— 'मैं एक सौ आठ वर्ष तक जीवित रहूँगा।' सेठजी श्री जयदयाल जी, जो गीता प्रेसके उत्पादक, संस्थापक, संरक्षक, संचालक— सब कुछ थे, इस बात पर बोले कि एक सौ आठ वर्ष तक न गांधीजी जीयेंगे, न इतने वर्षों तक मैं जीऊंगा, लिख लो। ऐसे अपने जीवित रहनेका भरोसा किसीको है? यदि नहीं, तो फिर मनुष्य शरीरमें करने लायक असली कामसे क्यों वंचित हो रहे हैं। 'मानहिं मातु पिता नहिं देवा। साधुन्ह सन करवावहिं सेवा॥ जिन्ह के यह आचरन भवानी। ते जानेहु निसिचर सब प्रानी॥'*
* जीनेका तो भरोसा नहीं है और मरनेकी तैयारी नहीं है, और तीसरा कोई मार्ग है नहीं। मनुष्य शरीरमें आकर जो काम करने लायक था, वह कर लिया, अब शरीर रहे या जावे, अपने इसकी गर्ज नहीं रही। 'रज्जब धोखा को नहीं फल दे सूखा खेत।' मनुष्य शरीरमें आकर जो काम करना चाहिए, वह कर लिया, अब मृत्युका भय नहीं है। मृत्युका भय तभी तक रहता है, जब तक मनुष्य शरीरमें जो काम करने आये हैं, वह नहीं किया हो। ऐसी निश्चिन्तता जिसके आ गई है, तो बढ़िया है और जिसके ऐसी निश्चिन्तता नहीं है, उसे तत्परता पूर्वक भगवान् में लग जाना चाहिए। 'नवग्रह चौंसठ जोगनी बावन वीर पर्जंत। काल भक्ष सबको करै, हरि शरणै डरपंत॥'*
* जड़ चीजोंकी जो चाहना है, वह कामना है और चिन्मय तत्त्वकी इच्छा आवश्यकता है। स्वयंकी जो मांग है, वह आवश्यकता है और शरीर, इन्द्रियाँ, मन-बुद्धिको लेकर जो मांग है, वह कामना है। कामनाकी तो निवृत्ति ही होती है और आवश्यकताकी पूर्ति ही होती है, आवश्यकता अधूरी रहती ही नहीं। मनुष्य मात्रको परमात्मप्राप्ति हो सकती है, यह बात मुझे सन्तोंसे मिली है, शास्त्रोंमें नहीं मिली है। 'जो जिव चाहे मुक्ति को तो सुमरीजे राम। हरिया गैले चालतां जैसे आवे गांव॥' सन्तोंने वाणीमें अपना अनुभव लिख दिया है, ऐसे मनुष्य शरीरको प्राप्त कर अपना उद्धार कर ही लेना चाहिए।*

२९. अद्वैत ज्ञान कौ अंग १३/१६

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२९. अद्वैत ज्ञान कौ अंग १३/१६
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सुन्दर घृतई बंधि गयौ, धर्यौ डरी सौ नाम । 
ऐसैं रामहि जगत है, जगत देखिये राम ॥१३॥
ब्रह्म एवं जगत् की एकता के प्रतिपादक कुछ दृष्टान्त : जैसे लोक में दही के बिलोने पर डली(ग्रन्थि) रूप में निकले घी को 'मक्खन' कहते हैं, उसी को तप्त होने पर पिघल जाने पर 'घृत' कहने लगते हैं; उसी प्रकार यह राम(ब्रह्म) ही जगत् है तथा जगत् ही राम है ॥१३॥ (प्र०- सवैया : ३२/१५ छ०)
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सुन्दर पांनी तैं कछू, पाला भिन्न न होइ । 
ऐसैं जगत सु ब्रह्म है, जगत ब्रह्म नहिं दोइ ॥१४॥
जैसे शीत के कारण जमा हुआ जल ही 'वर्फ'(हिम) कहलाता है; उसी प्रकार इस जगत् एवं ब्रह्म में कोई द्वैत नहीं है ॥१४॥ (द्र० - सवैया : ३२/१५ छ०)
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सुन्दर नीर समुद्र कौ, जमि करि हूवौ लौंन । 
तैसैं यह सब ब्रह्म है, दूजा कहिये कौंन ॥१५॥
जैसे समुद्र का जल वायु के कारण जमकर 'सैन्धव लवण'(सैन्धा नमक) बन जाता है; वैसे यह ब्रह्म ही जगत् के रूप में परिवर्तित हो जाता है ॥१५॥ (द्र० - सवैया : ३२/१६ छ०)
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सुन्दर जैसैं लोह के, किये बहुत हथियार । 
ऐसैं यहु सब ब्रह्म है, जौ दीसै बिस्तार ॥१६॥
जैसे एक लोह धातु के अनेक शस्त्र अस्त्र बना लिये जाते हैं, वैसे ही यह समस्त जगद्विस्तार भी एक ब्रह्म से ही हुआ है ॥१६॥
(क्रमशः) 

*करि आरती आतमा ऊजली ।*

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*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*तन मन चन्दन प्रेम की माला,*
*अनहद घंटा दीन दयाला ।*
*ज्ञान का दीपक पवन की बाती,*
*देव निरंजन पाँचों पाती ।*
*आनन्द मंगल भाव की सेवा,*
*मनसा मन्दिर आतम देवा ।*
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आरती ॥
*करि आरती आतमा ऊजली ।*
रामजी पधार्यौ म्हारै पुरवन रली ॥टेक॥
तीस समाणा ऊपरि चाढ़ी । चवर ढुलावै इक पग ठाढी ॥
पंच सबद घंटा निरबाणी । झालरि बाजै राम नाम बाणी ।
पाँच तत्व कौ दीपक धार्यौ । जोति सरूपी ऊपर बार्यौ ॥
दसवें द्वारै देव मुरारी । सन्मुख सुंदरि पूजणहारी ॥
मन पंडौ तिहि सेवा मांहीं । बषनां बारै आवै नांहीं ॥
इति श्रीबषनांजी की बाणी संपूर्ण भवेत् ॥
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घट-घट में रमने वाला राम मेरी मनोऽभिलाषाओं की पूर्ति करने हेतु मेरे हृदय रूपी घर में आया है । अतः हे निष्कल्मष उज्जवल आत्मा ! उसकी प्रसन्न मन से आरती उतार । उज्जवल आत्मा तेतीस कोटि देवताओं का शमन करके सर्वोच्चसत्ता सच्चिदानंदस्वरूप राम के स्थान में पहुँची है जहाँ वह अकेली अपने एक आश्रय से ही खड़ी-खड़ी चँवर ढोल रही है ।
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पाँच ज्ञानेन्द्रियों का समवेत राम नाम उच्चारण करना ही वहाँ बाण = कल्मष रहित घंटा ध्वनि है और रामनाम की अखंडध्वनि ही झालरों का बजना है । जल-पृथिवी-वायु-अग्नि-आकाशात्मक पंचतत्वों का ही वहाँ दीपक है(शरीर ही दीपक है) जिसको ज्योतिस्वरूप परब्रह्म-परमात्मा पर न्यौछावर किया गया है ।
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दशमद्वार = ब्रह्मरंध्र में मुरारी रूप परात्पर-परब्रह्म-परमात्मा विराजमान है जिसके सन्मुख आत्मा रूपी सुन्दरी पूजा हेतु खड़ी है । निष्पाप मन रूपी पुजारी उसकी सेवा में हाजिर है । बषनां कहता है, मैं सच्चिदानंद हुआ अब उस सच्चिदानंद के यहाँ से वापिस नहीं आ सकता । वह और मैं अब दो नहीं एक हैं ॥१६८॥
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इति श्रीबषनांजी की बाणी जयपुर नगर वास्तव्य प्रकाश-ताराचंद-सुत ब्रजेन्द्रकुमार सिंहल कृत “बखनां-वचनामृत-वर्षणी” टीका सहित सम्पूर्ण ॥ दिनाङ्क १०.०१.२००५ ई. तदनुसार पौष कृष्णा ३०, वि. सं. २०६१ सोमवार, प्रातःकाल ११ बजे ॥
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बषनां बाणी होय सरल टीका कै सारै ।
यौं कर मन संकल्प पाठ सोधन चित धारै ॥
दो पुस्तक मंगवाय पाठ कौ सोधन कीनौं ।
फिर टीका कौ काम कर्यौ सबकौ मन भीनौं ॥
ब्रजेन्द्र सिंहल नाम मम राम नाम बिसवास ।
प्रकास ताराचंद सुत मानसरोवर बास ॥१॥
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टीका के सहारे बषनांजी की वाणी को समझना सरल हो जायेगा, ऐसा मन में संकल्प उठा । एतदर्थ सर्वप्रथम पाठ शोधन करने का विचार मन में आया । तदर्थ दादूराम नरायना से वि. सं. १७८० व १७८५ में लिखी दो पुस्तकें मंगवाकर पाठ का शोधन किया । ततपश्चात् सभी के मन को भाने वाली टीका लिखी । रामनाम-विश्वासी मुझ टीकाकार का नाम ब्रजेन्द्रकुमार सिंहल है । मेरी माता प्रकाशदेवी तथा पिता ताराचंद सिंहल है । मेरा निवास मानसरोवर, जयपुर में है ॥१॥

शुक्रवार, 3 जुलाई 2026

*२०. सुमिरण का अंग ~७३/७६*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*२०. सुमिरण का अंग ~७३/७६*
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सप्त धातु पलटे सुतन, परसे पारस नाँउ ।
रज्जब कटे कलंक कुल, प्रभु प्रभुता बलि जाँउ ॥७३॥
जाति पारस के स्पर्श से सातों ही धातु सब दोषों से रहित होकर बदल जाती है, वैसे ही परमात्मा के नाम-स्मरण से संपूर्ण दोष नष्ट होकर उभय शरीर में शुद्धता रूप परिवर्तन हो जाता है, अत: उस प्रभु की प्रभुता की बलिहारी जाता हूँ ।
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हरि सुमिरण संशय हरे, पाप जाप सौं जाँहिं ।
जन रज्जब जगदीश भज, नौ निधि है जा माँहिं ॥७४॥
हरि नाम जप से पाप नष्ट हो जाते हैं, हरि-स्मरण ज्ञान द्वारा संशय हर लेता है, जिसके भजन में नौ निधि भी स्थित है, उस जगदीश्वर का ही निरन्तर भजन कर ।
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कर्म हुँ कर्म सु नाम निज, जम का जम हरि जाप ।
रज्जब रटतों ना रहे, प्राणी पिंड के पाप ॥७५॥
राम नाम का स्मरण अपने श्रेष्ठ कर्मों से भी श्रेष्ठ कर्म है, यम का भी यम है, अर्थात यम को भी दंड देने वाला है । राम नाम - स्मरण करने से प्राणी के शरीर के पाप नष्ट हो जाते हैं ।
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रज्जब बीरज नाम निज, रिधि सिधि डाल बतीस ।
पहुप पत्र प्रभुता अनन्त, राम नाम फल शीस ॥७६॥
साधना वृक्ष का निज नाम बीज है, अठारह सिद्धियों और चौदह रत्न रूप ऋद्धि ये ३२ डाल हैं, और भी जो अनन्त प्रकार की प्रभुता हैं, वे ही पत्र पुष्प हैं, इसके शिर पर पुन: राम नाम रूप ही फल आता है, अर्थात साधन के आरम्भ में भी नाम और अंत में भी नाम स्मरण ही रहता है, यह नाम की महान् की विशेषता है ।
(क्रमशः)

२९. अद्वैत ज्ञान कौ अंग ९/१२

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२९. अद्वैत ज्ञान कौ अंग ९/१२
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दीप मसाल चिराक बहु, दौं लागी घर लाइ ।
सुन्दर पावक एक ही, ऐसैं ब्रह्म दिखाइ ॥९॥
जैसे दीपक, मशाल(लाठी पर तेल से भीगा कपड़ा लपेट कर जलाया जाने वाला प्रकाशस्तम्भ) एवं चिराग(लैम्प) की अग्नि तथा घ्घ्र को जलाने वाली सब एक ही हैं तो भी व्यवहार में वे भिन्न भिन्न कहलाती हैं; वैसे ही यह समस्त ब्रह्माण्ड में व्यापक ब्रह्म भी एक ही है ॥९॥ (द्र० - सवैया : ३२/४ छ०)
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सुन्दर यहु सब ब्रह्म है, नाम धर्यौ संसार ।
एक बीज तें पलटि कैं, हूवौ बृक्षाकार ॥१०॥
जैसे लोकव्यवहार में बीज के अंकुरित होते ही उस को वृक्ष कह दिया जाता है उसी प्रकार इस समस्त संसार की भी ब्रह्म से ही उत्पत्ति है । केवल व्यवहार में जनसाधारण इसे 'संसार' कहने लगता है ॥१०॥ (५० सवैया ३२/६ छ०)
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सुन्दर सबकी आदि है, सुन्दर सबका मूल ।
यथा बृक्ष मैं देखिये, डाल पांन फल फूल ॥११॥
महाराज श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - वह ब्रह्म ही इस समस्त संसार का आदि है, तथा इस का मूल(जड) भी यही है । जैसे बीज से ही वृक्ष के शाखा, पत्र, पुष्प एवं फल दिखायी देते हैं; वही स्थिति इस ब्रह्माण्ड के लिये ब्रह्म की भी समझनी चाहिये ॥११॥ (द्र० - सवैया : ३२/६ छ०)
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भयौ सरकरा ईक्षु रस, ब्यापि मिठाई मांहिं ।
सुन्दर ब्रह्म सु जगत है, जगत ब्रह्म द्वै नांहिं ॥१२॥
जैसे सभी मिठाइयों में ईख का मीठा रस(शक्कर) सर्वत्र व्याप्त रहता है, वैसे इस समस्त संसार में ब्रह्म व्याप्त है । अतः इस संसार एवं ब्रह्म में कोई द्वैत नहीं है । दोनों एक ही हैं ॥१२॥ (द्र० - सवैया : ३२/१५ छ०)
(क्रमशः)

परिचय आत्मसाक्षात्कार ॥

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*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*सांई दीया दत घणाँ, तिसका वार न पार ।*
*दादू पाया राम धन, भाव भक्ति दीदार ॥*
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परिचय आत्मसाक्षात्कार ॥
तहाँ मन भयौ रे अड़ोल ।
म्हारै मनि बसियौ रे, गुर म्हारा कौ बोल ॥टेक॥
थित्ति मांहि थित्ति पाई, अगम थी सो गुरि बताई ॥
तहाँ लागौ मंन लाई, तहाँ उपजै नहिं और काई ॥
चंचल था निहचल कीया, जाइ था सो फेरि लीया ।
अैसा गुरि उपदेस दीया, तिहिं आलंबनि लागि जीया ॥
सबद माँहैं संतोष पाया, मंन था सो तहाँ लाया ।
कह्या था सो हाथ आया, राम राम सहजि समाया ॥
जहाँ गुरि थापना थापी, जप करै जहाँ पंच जापी ।
प्रगट्यौ तहाँ आप आपी, निरखि बषनां सकल ब्यापी ॥१६७॥
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मेरे मन में मेरे गुरुमहाराज के उपदेश रूपी बोल बस गये हैं जिनको साधने से उस शब्दस्वरूपी परमात्मा में मेरा मन निश्चल हो गया है । निश्चय मन में थिति = निधिस्वरूप परमात्मा का बोध पाया । बोध पाना सर्वथा अगम्य था किन्तु गुरुमहाराज ने उसको प्राप्त करने की युक्ति बता दी जिससे मुझे बोध हो गया । अब मेरा मन उस अद्वितीय तत्व में लग गया है, जहाँ उसके अतिरिक्त अन्य कुछ सूझता ही नहीं है, उपजता ही नहीं है । 
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मन पहले अतीव चंचल था जिसको निश्चल कर लिया । वह विषयभोगों में दौड़ा करता सो उसे वहाँ से उल्टाकर स्वात्मतत्त्व-चिंतन में लगा लिया । गुरुमहाराज ने “निश्चल मन करके रामजी का स्मरण करना चाहिये” यह उपदेश दिया जिसका आश्रय लेकर ही मैंने स्वात्मतत्त्व का बोध प्राप्त कर जीवन प्राप्त किया है । 
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गुरुमहाराज के उपदेशों को सुनकर ही मैंने संतोषवृत्ति धारण की है और मन को संतोषवृत्ति से जोड़ दिया है । गुरुमहाराज ने जो कुछ कहा था वह मुझे प्राप्त हो गया । राम-नाम में रम कर, रामनाम से एकाकार होकर मैं सहजावस्था में समा गया । गुरुमहाराज ने जिस ब्राह्मीस्थिति की स्थापना की थी अब वहाँ जाप करने वाली पाँचों ज्ञानेन्द्रियाँ जाप करती हैं । उस स्थान में आत्मा ही परमात्मा के रूप में प्रकट हुआ है । बषनां उस सकलब्यापी को देखता है ॥१६७॥

गुरुवार, 2 जुलाई 2026

*२०. सुमिरण का अंग ~६९/७२*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*२०. सुमिरण का अंग ~६९/७२*
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अर्थ किया उस प्राणी ने, तन मन लाया ठौर ।
रज्जब रह गया राम में, भूल न भासे और ॥६९॥
जिस प्राणी ने अपने तन को परब्रह्म रूप संत सेवा और मन को ब्रह्म चिन्तन रूप स्थान में लगाया है, उसी ने वेदादि का यथार्थ अर्थ समझकर धारण किया है, उसका मन राम के वास्तव स्वरूप में ही स्थिर रहता है, उसे भूल से भी मायिक प्रपंच नहीं भासता है ।
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कौड़ी कौटि न चाहिये, कहतों केवल राम ।
रज्जब दम दम सुमरिये, नहिं दामों से काम ॥७०॥
माया रहित राम का स्मरण करने के लिये न कौटि रुपयों की आवश्यकता है, अत: प्रति स्वास स्मरण करना चाहिये । स्मरण करना रूप कार्य धन से सिद्ध नहीं होता ।
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दया रूप नर सु तरु मय, पै गुण स्वाद न जाँहिं ।
ब्रह्म अग्नि निज नाम बिन, रज्जब सुधि१ नहिं माँहिं ॥७१॥
दयालु नर श्रेष्ठ वृक्ष के समान उदार होता है किन्तु जैसे वृक्ष का कटु कषायादि स्वाद नष्ट नहीं होता, वैसे ही दयालु के भी अंत:करण के गुण दूर नहीं होते, वृक्ष-स्वाद अग्नि से जलने पर ही नष्ट होता है । वैसे ही निज नाम स्मरण द्वारा ब्रह्म ज्ञान रूप अग्नि उत्पन्न होता है । तभी दयालु के गुण नष्ट होते हैं, अन्यथा भीतर स्थिर निजात्मा का अनुभव१ नहीं होता ।
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सप्त धातु तन शुद्ध ह्वै, पड़ पावक प्रभु नाँउ१ ।
रज्जब रज मल ऊतरे, बासदेव२ बलि आँउ ॥७२॥
अग्नि में पड़ने से सात धातुओं का भीतरी मैल तथा बाहर की रज नष्ट होकर वे शुद्ध हो जाती हैं, वैसे ही राम नाम१ चिन्तन द्वारा ब्रह्मज्ञानाग्नि उत्पन्न होकर प्राणी के स्थूल शरीर की हिंसादि रूप रज और सूक्ष्म शरीर का कामादि रूप मैल नष्ट हो जाता है, अत: हम ज्ञानाग्नि२ की बलिहारी जाते हैं ।
(क्रमशः) 

२९. अद्वैत ज्ञान कौ अंग ५/८

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२९. अद्वैत ज्ञान कौ अंग ५/८
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घर कहिये सब भूमि पर, भूमि घरनि मैं होइ ।
सुन्दर एकै देखिये, कहन सुनन कौं दोइ ॥५॥
इसी प्रकार, कोई भी घर(भवन) भूमि पर ही स्थित होता है, जब कि सभी घरों में भूमि भी होती ही है; अतः 'भूमि' एवं 'घर' - दोनों एक ही वस्तु हैं, केवल लोकव्यवहार में सुगमता के लिये उन को पृथक् पृथक् कह दिया जाता है ॥५॥
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सुन्दर घर सब गांव मैं, गांव सकल घर मांहिं । 
घर अरु गांव बिचारिये, तौ कछु दूजा नांहिं ॥६॥
इसी प्रकार, सभी घर ग्राम में ही होते हैं, तथा वह ग्राम भी उन घरों से ही कहलाता है । यदि घर एवं ग्राम की यथार्थता पर विचार किया तो उन में कोई भेद(द्वैत) नहीं दिखायी देता ॥६॥ (द्र० - सवैया : ३२/६ छ०)
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वापी कूप तलाव मैं, सुन्दर जल नहिं और ।
एक अखंडित देखिये, व्यापक सबही ठौर ॥७॥
वापी(बाबडी = चौड़ा कूआ), साधारण कूआ, सरोवर(तालाब), इन सब में एक ही जल होता है, तो भी व्यवहारभेद से भिन्न भिन्न नामों से इन को जाना जाता है; इसी प्रकार समस्त ब्रह्माण्ड में एक अखण्ड एवं व्यापक ब्रह्म ही सर्वत्र ओतप्रोत है ॥७॥ (द्र० – सवैया : ३२/४ छ०) ।
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कोरि किये चित्राम बहु, एक शिला कै मांहिं । 
यौं सुन्दर सब ब्रह्ममय, ब्रह्म बिना कछु नांहिं ॥८॥
जैसे एक ही शिला पर विविध चित्र उकेर दिये जाते हैं; इसी प्रकार यह समस्त ब्रह्माण्ड एक ब्रह्म से ही ओतप्रोत है । यहाँ ब्रह्म के अतिरिक्त अन्य कुछ नहीं है ॥८॥ (द्र० - सवैया : ३२/५ छ०) 
(क्रमशः) 

हरि भजि लाहौ लीज्यौ रे

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*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*आपा पर सब दूर कर, राम नाम रस लाग ।*
*दादू अवसर जात है, जाग सकै तो जाग ॥*
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सुमिरण ॥
हरि भजि लाहौ लीज्यौ रे ।
थारौ जनम सुफल सौ होइ रे । तूँ अहलौ यौंही न खोइ रे ॥टेक॥
लाहौ साधाँ  सेवियाँ  रे, लाहौ भगति कियाँ  ।
जीवनि मुकति फल प्रामियें, हरिजी को नाँव लियाँ ॥
साधाँ सेती गोठडी रे, कोटि कटै अपराध ।
धनि र दिहाड़ौ आज कौ, म्हारै द्वारै आया साध रे ॥
धन जोबन सब पाहूणौं रे, आइ मिल्या दिन दोइ ।
घिरती फिरती छाँहड़ी, जाताँ बार न होइ ॥ 
नैणाँ बैणाँ सरवणाँ रे, रसना रामइयौ गाइ ।
जनम सुफल करि आपणैं, बषनां बिलँब ल लाइ ॥१६६॥
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परात्पर-परब्रह्म-परमात्मा का अहर्निश भजन करके मनुष्य जन्म मिलने का लाभ लीजिये रामभजन करने से हे मनुष्य ! तेरा जन्म सफल हो जायेगा । तू इसे यों ही व्यर्थ मत गँवा । साधुओं का सत्संग करने में लाभ है । रामजी की भक्ति करने में लाभ ही लाभ है । हरिजी का नाम-स्मरण करने से जीते जी ही मुक्ति = जीवन्मुक्ति की प्राप्ति हो जाती है । साधु-संतों से गोष्टि करने पर करोड़ों अपराध कट जाते हैं । 
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बषनां जी कहते हैं, आज का दिन धन्य है कि मेरे द्वार पर साधु-संतों का आगमन हुआ है । धन, यौवन आदि सभी अतिथि तुल्य हैं जो जीव को कुछ समय के लिये मिले हैं । ये ठीक उसीप्रकार अस्थाई संगी-साथी हैं जैसे छाया घिरती फिरती =आती-जाती है, इन्हें नष्ट होते समय नहीं लगता । नैनों से संतों के दर्शन करके, श्रवणों से रामजी का नाम सुनकर तथा रसना से रमतीराम का गायन करके हे मनुष्य ! अपना मनुष्य जन्म सफल कर । बषनां कहता है, इस काम को करने में तनिक सी भी देरी मत कर ॥१६६॥

बुधवार, 1 जुलाई 2026

*२०. सुमिरण का अंग ~६५/६८*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*२०. सुमिरण का अंग ~६५/६८*
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रज्जब नाम नराधिपति, सकल अंग उमराव ।
मिलेहि कारज सिद्ध ह्वै, अमिल मडै१ नहिं पाव ॥६५॥
ईश्वर नाम राजा के समान है, अन्य साधन सरदारों के समान है राजा और सरदार मिलकर कार्य करे तो सुगमता से सिद्ध होता है, नहीं मिलने से सरदारों के पैर कार्य सिद्धि तक नहीं टिक१ सकते, वैसे ही नाम और अन्य साधन मिलकर तो मुक्ति रूप कार्य कर लेते हैं, नाम बिना अन्य साधन मुक्ति रूप कार्य सिद्ध करने में समर्थ नहीं होते ।
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अज्ञान कष्ट अठसठ सहित, सब व्रत रोजे कीन ।
जन रज्जब हरि नाम में, मन वच कर्म जो लीन ॥६६॥
अज्ञानावस्था में अड़सठ तीर्थों के स्नान, सब प्रकार के व्रत, रोजे करे जाते हैं, उन सब का फल उसे प्राप्त हो जाता है, जो मन, वचन और कर्मों से हरि-नाम-सुमिरण में लगा रहता है ।
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सुमिरण करे सु शास्त्र है, बुधि उपजे सो वेद ।
विषया तजे सु व्याकरण, रज्जब पाया भेद ॥६७॥
हरि-नाम-सुमिरण करना ही श्रेष्ठ शास्त्रों का अभ्यास करना है, बुद्धि ब्रह्म ज्ञान उत्पन्न होना ही वेदाध्यायन है, विषयों का त्याग करना ही व्याकरण पढ़ना है । इस प्रकार गुरु कृपा से हमने वेदादी का यथार्थ रहस्य प्राप्त किया है ।
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अस्थूल सु अक्षर अर्थ हरि, काढे पंडित प्राण ।
रज्जब ज्ञाता गुणी सो, समझ्या सोइ सुजाण ॥६८॥
मंत्र के अक्षर तो स्थूल है, उनमें जो अर्थ है, वही हरि है, जो प्राणी पंडित होता है, वही शब्दार्थ रूप हरि को निकाल कर हृदय में धारण करता है, तब वही ज्ञानी, गुणी, समझदार और सुजान कहलाता है ।
(क्रमशः)

२९. अद्वैत ज्ञान कौ अंग १/४

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२९. अद्वैत ज्ञान कौ अंग १/४
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सुन्दर हौं नहिं और कछु, तूं कछु और न होइ ।
जगत कहा कछु और है, एक अखंडित सोइ ॥१॥
श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - हे जिज्ञासु ! मैं कोई दूसरा नहीं हूँ, न तूं ही कोई दूसरा है, न यह संसार ही कोई दूसरा हैं; क्योंकि मुझ में, तुझ में और इस समस्त संसार में एक अखण्ड, सर्वव्यापक वह परमात्मा ही एकान्ततः विद्यमान है ॥१॥
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सुन्दर हौं नहिं तूं नहीं, जगत नहीं ब्रह्मंड ।
हौं पुनि तूं पुनि जगत पुनि, ब्यापक ब्रह्म अखंड ॥२॥
वस्तुतः मैं, तूं या यह समस्त ब्रह्माण्डमय संसार - इनमें कोई भी दूसरा नहीं है; क्योंकि हम सब में एकमात्र वह सर्वव्यापक ब्रह्म ही सर्वत्र व्याप्त है ॥२॥ (द्र० - सवैया : ३२/२ छ०).
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सुन्दर पहली ब्रह्म था, अबहूं ब्रह्म अखंड ।
आगै हूं यह ब्रह्म है, मृषा पिण्ड ब्रह्मंड ॥३॥
भूतकाल में भी हम सब में वह अखण्ड और व्यापक ब्रह्म ही वर्तमान था, और आज भी वही वर्तमान है तथा भविष्य में भी हम सब में उसी की सत्ता रहेगी । इस समस्त ब्रह्माण्ड एवं तेरे और मेरे शरीर में भासने वाला द्वैत ज्ञान तो सर्वथा मिथ्या(भ्रम) ही है ॥३॥
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बृक्षन कौं बन कहत हैं, बन मैं बृक्ष अनेक ।
सुन्दर द्वैत कछू नहीं, बृक्ष रु बन तौ एक ॥४॥
उदाहरणों द्वारा अद्वैत सिद्धि : यद्यपि लोकव्यवहार में हम वृक्षों(के समूह) को 'वन' कहते हैं; परन्तु वहाँ अनेक वृक्ष दिखायी देते हैं; तथापि वहाँ भी वस्तुतः कोई द्वैत नहीं है; 'वृक्ष' और 'वन' तो एक ही वस्तु की दो संज्ञा(नाम) हैं ॥४॥ (द्र० सवैया : ३२/४ छ०)
(क्रमशः)

सुसंगति-कुसंगति

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*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*दादू जिसका दर्पण ऊजला, सो दर्शन देखै मांहि ।*
*जिस की मैली आरसी, सो मुख देखै नांहि ॥*
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सुसंगति-कुसंगति ॥ साषी लापचारी ॥
मनसा डाकणि मन जरख, दौड़ावै दिन राति ।
बषनां कदे न ऊतरै, साँझ जिसी परभाति ॥१
(१ इसका अर्थ ‘मन कौ अंग’ की साषियों में देखे ।)
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पद ॥
आसरड़ी ऊजली रे, तामैं मुखड़ौ दीठौ जाइ ।
जिहि की मैंली आरसी, काट रह्यौ तिहि छाइ ॥टेक॥
काम क्रोध का मोरचा, भरम करम कौ काट ।
आसरड़ी दीठौ नहीं, कबहुँ सिकलीगर कौ हाट ॥
कारीगर सतगुर मिलै, सबद मसकला लाइ ।
आतम कीन्हों ऊजली, तामैं निर्मल दरसन थाइ ॥
एक तवा एक आरसी, ऊह बहन उह बीर ।
उह कुसंगति थैं काली हुवौ, उह कौ निर्मल देखि सरीर ।
एकहि आरणि नीपना, एकहि घड़्या लुहारि ।
दून्यूँ एकै लोह का, बषनां देखि बिचारि ॥१६५॥
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जो आसरड़ी = मन रूपी दर्पण उज्जवल होता है उसमें आत्मा रूपी मुख स्पष्ट रूप से दीखता है । इसके विपरीत जिसका मन पाप रूपी मैल से मलिन है, उसको आत्मदर्शन में काट = जंक रूपी प्रतिबंधक बाधा पहुँचाता है । मन रूपी दर्पण पर काम क्रोधादि का जंक(मोरचा) है । भ्रम और कर्मादि का काट है ।
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क्योंकि ऐसे मन वाले साधकों ने कभी भी गुरु रूपी सिकलीगर की हाट को जाकर देखा तक नहीं है कि जिससे उनके मनों में विद्यमान काम क्रोध, भ्रम, कर्म रूपी जंक हट जाता है । सर्वप्रथम जीव को गुरु रूपी कारीगर = सिकलीगर मिले । वह राम-नाम रटने का उपदेश देवे । जीव राम-राम रटन रूपी रगड़(मसकला) मन रूपी दर्पण पर लगावे । तब कहीं जाकर आत्मा उज्जवल = निर्मल होती है ।
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जो साधक उक्त प्रकार से मन को निर्मल करते हैं, उनको उस निर्मल मन में आत्मस्वरूप परमात्मा का निर्द्वंद्व दर्शन होता है । एक तवा होता है । एक दर्पण होता है । तवा भाई है । दर्पण बहिन है । तवा कुसंगति से काला हो जाता है जबकी सुसंगति से दर्पण निर्मल का निर्मल ही रहता है । दोनों एक ही ऐरण पर तैयार होते हैं । उन दोनों को एक लुहार बनाता है । दोनों में लगी हुई धातु लोहा भी एक ही होता है । फिर भी सुसंगति तथा कुसंगति के कारण दोनों में जमीन आसमान का अंतर पड़ जाता है । बषनां कहता है, जीव को विचार करना चाहिये कि क्या विधेय है तथा क्या निषिद्ध है ॥१६५॥

*२०. सुमिरण का अंग ~६१/६४*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*२०. सुमिरण का अंग ~६१/६४*
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*निर्भय प्राणी नाम में, सौ भूले भय पूरि ।*
*ज्यों रज्जब सुख मीन जल, दुख दीरघ जब दूरि ॥६१॥*
जैसे मछली जल में सुखी रहती है और जल दूर होते ही महान् दुख में पड़ जाती है, वैसे ही हरि-नाम-स्मरण रूप साधन में स्थित रहने से प्राणी निर्भय रहता है और नाम भूलने से अत्याधिक भय प्राप्त होता है ।
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*रज्जब नाम निरंजन नीर है, महा मुनी मन मीन ।*
*सुख सागर माँही सुखी, दुख दीरघ जब भीन१ ॥६२॥*
निरंजन ब्रह्म का नाम रूप जल है, और महा मुनीश्वरो के मन मच्छियाँ है । जैसे मच्छियाँ सागर में सुखी रहती है, वैसे ही मुनियों के मन ब्रह्मानन्द में सुखी रहते हैं मच्छी जल से और मुनि-मन निरंजन के नाम से अलग१ होते ही महान् दुख में पड़ जाते हैं ।
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*नाम नेह सेती भजे, तो कोइ गुण व्यापे नाँहिं ।*
*पै हरि सुमिरण हेत बिन, तो द्वन्द्व हि दग्धे माँहिं ॥६३॥*
यदि प्रेम से हरि नाम का स्मरण किया जाय तो हृदय में कामादि में से कोई भी गुण व्याप्त होकर व्यथित नहीं करता और यदि हरि-स्मरण बिना प्रेम किया जायगा, तो अवश्य हृदय को काम क्रोधादि द्वन्द्व जलायेगा ।
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*नाज नाम की एक गति, पानी प्रेम सु पोष ।*
*इन दोनों के दोय बिन, रज्जब रवि गुण दोष ॥६४॥*
नाज और नाम की एक-सी ही रीति है, नाज का पोषण पानी से और नाम का प्रेम से होता है । नाज और नाम इन दोनों के जल और प्रेम के बिना सूर्य और गुण दोष रूप हो जाते हैं । बिना पानी नाज सूर्य की ताप से जल जाता है और बिना प्रेम नाम का शास्त्र कथित फल नहीं होता ।
(क्रमशः)

मंगलवार, 30 जून 2026

देखी मैं डाकणि जरख चढ़ी

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*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*दादू माया फोड़े नैन दोइ, राम न सूझै काल ।*
*साधु पुकारैं मेरू चढ़, देखि अग्नि की झाल ॥*
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माया ॥
देखी मैं डाकणि जरख चढ़ी ॥
लेबे का छोडण का नांहीं, कोई अैसौ मंत्र पढ़ी ॥टेक॥
पाँच बीर जाकै सँगि डोलै, सब जोगणि मनि भावै ।
नगिन भई चढिबा कै कारणि, बन में जरख बुलावै ॥
लापसड़ी का लौंदा करि करि, आपण खाइ खुलावै ।
जब यहु लोग सहर कौ सोवै, तबै सिराड़ा ध्यावै ॥
पाड़ोसणि पणि हाँतैं आई, संगि मिली गटकावै ।
भूखी व्है तबहीं भख मांगै, मुवा मसाण जगावै ॥
बहुत सयाणें पचि पचि हारे, कोई मंत्र न लागै ।
जाली जलै न जल मैं बूडै, नीसरि नीसरि भागै ॥
टूनर मंत्र सोकोत्री का सब, हरि कै भजनि उडावै ।
बषनां अैसा गुरु हमारा, डाकणि लियाँ छुडावै ॥१६४॥
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स्वामी श्रीरामचरण ने कहा है,
‘मलिन मंत्र कौ पाठ पढि, जरख बुलावै बाम ।
रामचरण साचै सबद, क्यूँ नहिं आवै राम ॥’
इसीप्रकार के विचार बषनांजी डाकण के रूपक से प्रकट करते हुए कहते हैं । मैंने वासना रूपी जरख पर माया रूपी डाकण को चढे हुए देखा है । यह लेने ही लेने का काम करती है, देने का काम ही नहीं करती है । इसने कोई इसीतरह की शिक्षा अपने गुरु से सीखी है ।
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शब्द, स्पर्श, रूप, रस व गंध रूपी पाँच वीर इसके साथ सदैव घूमते रहते हैं जो सभी इन्द्रियों रूपी योगिनियों को रुचिकर लगते हैं । यह सत्यासत्य विचार रूपी कपड़ों को उतार कर जरख पर चढ़ने कर लिये नग्न हो जाती है और एकांत वन में जाकर वासना रूपी जरख को बुलाती है । विषयभोग रूपी लापसी के बड़े-बड़े ग्रास बनाकर यह स्वयं भी खाती है तथा अपने सहयोगी जरख तथा योगिनियों को भी खिलाती है ।
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जब शहर की जनता अज्ञान रूपी निद्रा में सोयी पड़ी रहती है तब यह अपना प्रभाव सिराड़ा = शीघ्रगति से प्रकट करती है । मनसा रूपी पड़ोसन के जब हाँतैं = कहीं से भोजन आती है तब उसके साथ बैठकर प्रसन्नता पूर्वक उस विषयभोग रूपी भोजन खाती है । जब यह भूखी होती है तब ही वलि मांगती है और शमशान में जाकर मृत बच्चों को जीवित करके खाती है ।
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बहुत से सयाने भोपे रूपी ज्ञानी-ध्यानी इससे बच निकलने के लिये प्रयत्न कर-करके हार गये किन्तु उनका कोई भी मंत्र = उपाय इसको वश में नहीं कर सका । यह जलाने पर जलती नहीं तथा जल में डुबाने से डूबती भी नहीं है । दोनों में से ही निकल-निकल कर बाहर आ जाती है । इस सोकोत्री = शोक देने वाली माया रूपी डाकण के समस्त जादू टोने और मंत्र परात्पर-परब्रह्म-परमात्मा हरि के भजन से प्रभावहीन हो जाते हैं । बषनां कहता है, मेरा गुरु ऐसा है, जो डाकण द्वारा वशीकृत मनुष्य को डाकण के चंगुल से छुड़ा देता है ॥१६४॥

सोमवार, 29 जून 2026

*२०. सुमिरण का अंग ~५७/६०*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*२०. सुमिरण का अंग ~५७/६०*
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*सुमिरन में सुकृत सबै, जे मन वच कर्म होय ।*
*जन रज्जब जगपति मिले, भेद न भासे कोय ॥५७॥*
यदि मन, वचन, कर्म से हो तो, हरि-स्मरण में सभी सुकर्मों का फल स्थित है, स्वयं जगदीश्वर का साक्षात्कार भी होता है और कोई प्रकार का भेद-भाव भी नहीं दिखता ।
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*सब सुकृत सेवक किये, जब जीव जगपति लीन ।*
*रज्जब राम विसार तों, विविध बुराई कीन ॥५८॥*
जब मन जगदीश्वर के स्मरण में लीन हो जाता है, तब समझना चाहिये कि - इस भक्त ने सभी सुकृत कर लिये और राम को भूलता है तो समझो उसने नाना प्रकार की बुराइयाँ कर डाली ।
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*नाम लेत नेकी उदय, बदी विसारत होय ।*
*जन रज्जब जानी जुगति, प्रत्यक्ष दीसे दोय ॥५९॥*
हरि-स्मरण करने से भलाई का जन्म होता है और नाम को भूलने से बुराई का जन्म होता है । भलाई, बुराई के उदय की उक्त युक्ति हमने जान ली है, इससे दोनों प्रत्यक्ष दिखती है ।
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*रज्जब तिरिये राम भज, बूडे राम विसार ।*
*जगपति जाण्यों जीत है, हृदय नहीं तो हार ॥६०॥*
राम के भजन से प्राणी संसार से पार होता है और राम को भूलने से संसार में डूबता है । जगदीश्वर का स्वरूप जानने से तो संसार में प्राणी की जीत होती है और हृदय में राम का चिन्तन नहीं हो तो हार होती है ।
(क्रमशः)

२८. आत्म अनुभव कौ अंग ४९/५१

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
.२८. आत्म अनुभव कौ अंग ४९/५१
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सुन्दर तत्व जुदे जुदे, राख्या नाम शरीर । 
ज्यौं कदली के खम्भ मैं, कौंन बस्तु कहि बीर ॥४९॥
महाराज श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - पृथक् पृथक् अनेक तत्त्वों से बने इस सङ्घात का नाम 'शरीर' उसी प्रकार घोषित कर दिया गया है, जैसे कि अनेक परतों से बने होने पर भी कदली स्तम्भ को, कोई सार वस्तु न होने पर भी, सङ्घात रूप में 'केले का वृक्ष' कह दिया जाता है ॥४९॥
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है सौ सुन्दर है सदा, नहीं सु सुन्दर नांहिं । 
नहीं सु परगट देखिये, है सौ लहिये मांहिं ॥५०॥
आत्मा सदा नित्य, शुद्ध, चेतन एवं निरन्तर एकरस है वह विकाररहित(अविनाशी) है । जो तत्त्व ऐसा नहीं है वह अभावरूप है । उस का कभी भाव(सत्ता) नहीं होता । अर्थात् माया मिथ्या होते हुए त्रिकालाबाधित सत्य नहीं हो सकती; क्योंकि यह माया क्षर एवं नाशवान् होने के कारण व्यवहार में भासमान तो अवश्य होती है, परन्तु वह वस्तुतः है नहीं ॥५०॥
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बिरवा बुद्धि गुलाब है, शब्द सु फूल प्रकास । 
सुन्दर आतम ज्ञान कौं, अनुभौ मध्य सुबास ॥५१॥ 
इति आतम अनुभव कौ अंग ॥२८॥
ज्ञान की तीन अवस्थाएँ : आत्मा का साक्षात्कार पुष्प की सुगन्ध के ज्ञान के सदृश है । यहाँ वृक्ष का ज्ञान साधारण ज्ञान कहलाता है । उस वृक्ष में लगे पुष्प से उस का विशेष ज्ञान कहलाता है । पुष्प की सुगन्ध से उस का पूर्ण ज्ञान हुआ । जैसे वृक्ष या पुष्प के दर्शनमात्र से गन्ध का ज्ञान नहीं हो पाता; इसी प्रकार आत्मा के ज्ञान के विषय में भी समझना चाहिये ॥५१॥
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इति आत्मानुभव का अंग सम्पन्न ॥२८॥
(क्रमशः)

भ्रमतौ भ्रमतौ तुम्हारै सरणैं आयौ

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*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*दादू जब लग जीविये, सुमिरण संगति साध ।*
*दादू साधू राम बिन, दूजा सब अपराध ॥*
================
विनती ॥
भ्रमतौ भ्रमतौ तुम्हारै सरणैं आयौ ।
दीनदयाल पतितपावन, एक तूँ ही ज बतायौ ॥टेक॥
चौरासी लख भ्रमतौ आयौ, तुम्हारौ घर नीठि पायौ ।
अनाथ कौ नाथ एक, तू ही ज बतायौ ॥
और जे को बांधै धाइ, दाम दे लीजै छुडाइ ।
करम कौ बांध्यौ तुम्ह पैं, छूटै रामइया राम ॥
सारौं ही साधौं बताइ, उबरन की ठौर याइ ।
बूझि बषनौं सरणि आयौ, राखि ले राम राइ ॥१६३॥
.
हे परमात्मन् ! मुझे बताया गया है कि सम्पूर्ण ब्रह्मांड में दीनों पर अकारण दया करने वाला और पतितों को पावन करने वाला मात्र एक तू ही है । इसीकारण अन्यों की शरण में रहते-रहते दुखी होकर भ्रमता हुआ अब तेरी शरण में आया हूँ ।
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चौरासी लाख जीवा-जोनियों में भ्रमते-भ्रमते मुश्किल से इसबार मनुष्य जन्म मिला है और सौभाग्य से तेरी भक्ति करने रूप तेरा घर = आश्रय भी पाया है । हे परमात्मन् ! अनाथों का नाथ एक तुझे ही बताया है । मैं अनाथ हूँ । मुझे आश्रय दे । यदि अन्य और कोई(पाप कर्मों के अतिरिक्त) बंधन में बांध लेता है तो उसको दाम देकर संतुष्ट करके उससे छूटा जा सकता है किन्तु पापकर्मों के बंधनों में बंधा हुआ जीव एकमात्र तेरे द्वारा छुड़ाने से ही छूट पाता है ।
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समस्त संतों ने मुझे बताया है कि पापकर्मों से छूटकर उद्धार पाने की मात्र एक ही जगह है और वह तेरी अभयशरण है जिसके सम्बन्ध में सभी संत महात्माओं से मैं पूछ आया हूँ । अतः हे रामराय ! मुझे अपनी अभय, अक्षय शरण में आश्रय प्रदान करके रख ले ॥१६३॥

रविवार, 28 जून 2026

*२०. सुमिरण का अंग ~५३/५६*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*२०. सुमिरण का अंग ~५३/५६*
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रज्जब अज्जब यह मता, निशि दिन नाम न भूल ।
मनसा वाचा कर्मना, सुमिरण सब सुख मूल ॥५३॥
यह स्मरण करने का सिद्धान्त अदभुत है, नाम रात्रि-दिन में कभी भी न भूलना चाहिये । हम मन, वचन, कर्म से कहते हैं कि - हरि स्मरण संपूर्ण सुखों का मूल हेतु है ।
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सुमिरण सम संपद् नहीं, धन नहिं ध्यान समान ।
वित यह बारंबार ले, रज्जब रिधि रट जान ॥५४॥
हरि-स्मरण के समान कोई भी संपत्ति नहीं है, ध्यान के समान कोई धन नहीं है, हरि-नाम रटने का ही ऋद्धि जानो और यह स्मरण-धन बारंबार प्राप्त करना चाहिये, अर्थात निरंतर स्मरण करते रहना चाहिये ।
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निमिष मुहूरत नाम ले, तिल१ पल सुमिरन होय ।
जन रज्जब या२ उमर३ में, साफिल बरियाँ४ सोय ॥५५॥
जिस मुहूर्त्त(दो घड़ी) निमेष, पल और और पल के अल्प१ भाग में हरि-स्मरण होता है, इस२ मानव तन की आयु३ में वही सफल४ है ।
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सोई बेला१ सो घड़ी, सो क्षण मात्र सु२ सत्य ।
रज्जब रहिये राम में, और अकारथ३ जत्य४ ॥५६॥
जिस में वृत्ति राम में रहती है, वह घड़ी१, वह क्षण मात्र भी सुन्दर२ सत्य है अन्य सब यत्न४ तो व्यर्थ३ है ।
(क्रमशः)

परमात्म-तत्त्व


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*शब्द सरोवर सुभर भर्‍या, हरि जल निर्मल नीर ।*
*दादू पीवै प्रीति सौं, तिन के अखिल शरीर ॥*
===================
*॥ श्रीहरि: ॥*
दिनांक 28.6.26.
वि. सं. 2083, 'रौद्र' नाम संवत्सर, शुद्ध ज्येष्ठ मास, शुक्ल पक्ष, चतुर्दशी, रविवार। (गीता दैनन्दिनी अनुसार)।
1- परम श्रद्धेय स्वामीजी श्री रामसुखदासजी महाराजका प्रवचन—
दिनांक— 19.11.90, प्रातः 5.18 बजे। स्थान— श्री मुरली मनोहर धोरा, भीनासर।
2- गीता पाठ— गीता पाठ अध्याय 11 श्लोक संख्या 1 से 11 तक।
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*⚜️ परमात्म-तत्त्वकी प्राप्ति सुगम है, क्योंकि परमात्म-प्राप्तिके लिए ही मानव शरीर मिला है। जिसके लिए मनुष्य शरीर मिला है, उसीकी प्राप्ति कठिन होगी, तो फिर सुगम क्या होगा? मनुष्य शरीरका प्रयोजन तत्त्वकी प्राप्ति, मुक्ति, कल्याण, परम-लाभकी प्राप्ति, भगवान् में प्रियता, सर्वोपरि स्थितिकी प्राप्ति ही है। संसार नाशवान् है, परिवर्तनशील है— यह जानते हुए भी इसको सत् मानते हैं, यह बड़ी गलती है; यह अपने ही ज्ञानका अनादर है; अपनी जानकारीके निरादरका ही बन्धन है।*
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*⚜️ कौन नहीं जानता कि शरीर और शरीरसे संबंधित प्राणी-पदार्थ नाशवान् हैं, एक दिन अवश्य बिछुड़ेंगे; फिर भी हम इन्हें स्थाई रखना चाहते हैं, इनसे सुख लेते हैं, इनका आश्रय लेते हैं; फिर चाहते हैं कि हमारी पारमार्थिक उन्नति हो— ऐसी आशा रखना कहाँ तक ठीक है? नाशवान् में जो सत्य बुद्धि है, इसको दूर करनेकी सामर्थ्य मनुष्य मात्रमें है, इसमें कोई भी अयोग्य नहीं है, फिर भी इसे दूर नहीं करते— यह दूसरी गलती है। संसारके दूसरे काम होंगे या नहीं होंगे, उनमें तो सन्देह है, लेकिन मरेंगे या नहीं मरेंगे, इसमें सन्देह नहीं है। जिनमें सन्देह है, उनमें तो रात-दिन लगे हुए हैं और जो मौत निश्चित आनी है, उसकी तरफ ध्यान ही नहीं देते हैं।*
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*⚜️ सत्संगसे स्वभाव बदलता ही है। यदि ऐसा नहीं होता तो सत्संग करना, सद्विचार करना, अपनी उन्नतिके लिए विचार करना— सब निरर्थक हो जायेगा। सत्संग करने वालोंमें औरोंकी अपेक्षा विलक्षणता आती ही है, फिर भी हम अपना पूरा सुधार नहीं करते और थोड़ेमें सन्तोष कर लेते हैं— यह बड़ी बाधा है। मुक्त होने पर स्वभावमें ही फर्क पड़ता है; न तो जड़ शरीरमें फर्क पड़ता है, न चेतन आत्मामें ही फर्क पड़ता है, केवल मनुष्यका स्वभाव बदलता है।*
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*⚜️ गीताजीमें कामनाका त्याग और भगवान् को याद रखना— इन दो बातों पर बहुत जोर दिया गया है। नाम-जपकी महिमा सब मानते हैं, नाम-जपसे लाभ होता ही है। किसीके नाम-जप करनेकी जँच जाय, तो इसमें रत्तीभर भी पराधीनता नहीं है। मनमें कामना रहने पर ही वस्तुओंके नहीं मिलनेका दुःख होता है और कामनाका त्याग कर दें, तो वस्तु मिले, चाहे न मिले, दुःख होता ही नहीं। सेठजीने निष्कामता पर बड़ा जोर दिया है, सेठजीकी वाणीमें आता है कि— 'मुझे गीताजीसे और नाम जपसे जितना लाभ हुआ है, उतना लाभ किसी अन्य साधनसे नहीं हुआ है।'*
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*⚜️ वस्तुओंका मिलना या नहीं मिलना कामना करनेके अधीन नहीं है, अपितु एक अलग विधानके अन्तर्गत है, तो फिर कामना रखनेसे क्या लाभ? 'चाह गई चिन्ता मिटी, मनवा बेपरवाह। जिसके कछु नहिं चाहिए, सो शाहनपति शाह॥' परमात्म-तत्त्वके प्राप्तिकी इच्छा कामना नहीं है, यह जिज्ञासा, मुमुक्षा है, जो पूरी होती ही है।*

२८. आत्म अनुभव कौ अंग ४४/४८

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२८. आत्म अनुभव कौ अंग ४४/४८
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निदिध्यास है ज्ञान पुनि, बडवा अनल समांन । 
माया जल भक्षन करै, सुन्दर यह हैरांन ॥४५॥
साधक के निदिध्यासन ज्ञान को समुद्र की वडवाग्नि के समान समझना चाहिये । जैसे बडवाग्नि समुद्र के जल का भक्षण करती रहती है; उसी प्रकार यह निदिध्यासन मायावरण को नष्ट करता रहता है । श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं- साधारण जन के लिये यही हैरानी की बात है ॥४५॥
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आतम अनुभव ज्ञान है, प्रलय अग्नि की अंच । 
भस्म करै सब जारि कैं, सुन्दर द्वैत प्रपंच ॥४६॥
साधक का आत्मानुभवज्ञान प्रलयाग्नि के समान है । इस प्रलयाग्निरूप ज्ञान से साधक का समस्त आध्यात्मिक द्वैतप्रपञ्च विनष्ट होता रहता है ॥४६॥ (४३ से ४६ साषी तक द्र० - सवैया : २८/२९) ।
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नित्य कहत गुरु आतमा, सो है शब्द प्रमांन । 
जैसैं ब्यापक ब्यौम पुनि, सुन्दर यह उपमांन ॥४७॥
प्रत्यक्ष आदि चार प्रमाणों से आत्मा में नित्यत्वसिद्धि : हमारे गुरुदेव शब्द(श्रुति) प्रमाण से आत्मा को शुद्ध, बन्धरहित, नित्य एवं त्रिकालाबाधित सत्य बताते हैं । तथा आकाश की व्यापकता, अखण्डता एवं परिपूर्णता के उपमान(सादृश्य) के सहारे से आत्मा को भी ऐसा ही मानते हैं ॥४७॥
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जाकी सत्ता इन्द्रियनि, यह कहिये अनुमांन ।
सुन्दर अनुभव आतमा, यह प्रत्यक्ष प्रमांनं ॥४८॥
"यह चेतन है, क्योंकि सभी इन्द्रियाँ उसी से चैतन्य प्राप्त कर स्वस्व व्यापार करती है"- यह अनुमान प्रमाण भी आत्मा की नित्यता ही सिद्ध करता है । तथा अनुभवज्ञान से आत्मा का साक्षात्कार कर लिये जाने पर उस का प्रत्यक्ष ज्ञान भी आत्मा की नित्यता में प्रबल प्रमाण है ॥४८॥ (द्र० - सवैया छः २८/२७) ॥
(क्रमशः)

भजन-उपदेश ॥

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*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*दादू बहुरूपी मन जब लगै, तब लग माया रंग ।*
*जब मन लागा राम सौं, तब दादू एकै अंग ॥*
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भजन-उपदेश ॥
भजि रे मन हरिचरण ।
स्वामि असरण सरण, पतित पावन जाकौ बिड़द छाजे ।
करम कानैं करण, दुख दालिद्र हरण, बिना गोबिन्द क्यूँ भीड़ भाजै ॥टेक॥
जेथि जीव ऊबरै, काज कोई सरै, सो नहीं कोइ आपणौं लोक माँही ।
जीव कौ सगौ संसार मैं सोधियौ, बिना गोविन्द कोइ और नांहीं ॥
तैं करम जेता किया, नहीं छूटै हिया, जीव जो लै पड्यौ असति भाखै ।
तीनि लोक मैं कहूँ ठाहर नहीं, राम बिना दूसरी कौंण राखै ॥
जो विरद मोटौ बहै, पार को न लहै, तास की साषि सुणि साध भणैं ।
बात बषनां बणैं समझि घरि आपणैं, चालि मनवालि मन तास सरणैं ॥१६२॥
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हे मन ! परात्पर-परब्रह्म-परमात्मा के चरणों का भजन-स्मरण कर । उस हरि, का अशरणों को शरण देने वाला और पतितों को पावन करने वाला बिड़द है । वह कर्मों के बंधनों को काटने वाला तथा दारिद्य का हरण करने वाला भी कहा जाता है ।
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ऐसे गोविन्द के भजन-स्मरण किये बिना कष्ट कैसे समाप्त हो सकते हैं ! जिसकी रंचमात्र कृपा से जीवों का उद्धार हो जाता है, असंभव से असंभव कार्य भी पूरा हो जाता है, ऐसे के अतिरिक्त संसार में अपना और कोई नहीं है । संसार में जीव का हितैषी खूब ढूंढा किन्तु गोविन्द के अलावा अकारणहितैषी और कोई नहीं है ।
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हे मन ! तूने जितने भी कर्म किये हैं वे यों ही कटने वाले नहीं है क्योंकि जीव उन कर्मों के फेर में पड़कर सदैव असत्य भाषण करता रहता है । उन कर्मों के इतने भयंकर परिणाम हैं कि तीनों लोकों में कहीं भी जीव को रुकने = ठहरने के लिये स्थान नहीं है ।
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अतः ऐसी स्थिति में रामजी के बिना और ऐसा दूसरा कौन है जो घोर पापी जीव को अपने यहाँ रहने को स्थान देवे । वस्तुतः रामजी मोटौ = महान प्रण का निर्वाह करता है । उसके प्रण की कोई थाह नहीं पा सकता है । उसके द्वारा पूर्वकाल में किये गये भक्तों के प्रति अप्रतिम उपकारों की साक्षियाँ उसके भक्त-संत-महात्मा कहते हैं ।
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अतः बषनां समझता है, कहता है, अपने घर में ही = समय रहते ही सारी बातें समझ ले । पराये घर में = यमराज के यहाँ समझने से कुछ लाभ नहीं होगा क्योंकि तब तक बहुत देर हो चुकी होगी । अतः हे मनवालि = संसारासक्त मन ! उस परब्रह्म-परमात्मा की शरण में चल जिसका ऊपर वर्णन किया गया है ॥१६२॥

शनिवार, 27 जून 2026

*२०. सुमिरण का अंग ~४९/५२*

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*🌷卐 सत्यराम सा 卐🌷*
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*२०. सुमिरण का अंग ~४९/५२*
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*सकल सुखी हरि सुमिरतों, मनसा वाचा मान ।*
*जन रज्जब रुचि सौं रटी, यह जीव जीवन जान ॥४९॥*
हम मन वचन से यह कहते हैं, तु सत्य मानों, हरि-स्मरण करने से सभी सुखी होते हैं । रे जीव ! हरि-स्मरण को अपना जीवन रूप जानकर प्रेमपूर्वक हरि का नाम रटा कर ।
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*रज्जब अज्जब काम है, राम नाम रुचि सेव ।*
*आठौं पहर अखंड रट, मानुष से व्है देव ॥५०॥*
प्रेमपूर्वक राम नाम रटते हुये भक्ति करना अद्भुत कार्य है, अत: राम नाम को अखंड अष्ट पहर रटना चाहिये । ऐसा करने से प्राणी मनुष्य से देव अर्थात ब्रह्म बन जाता है ।
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*सांई सुमिरन सत्य है, सदगति सुमिरन हार ।*
*जन रज्जब युग युग सुखी, वक्ता श्रोता पार ॥५१॥*
ईश्वर-स्मरण मुक्ति का सच्चा साधन है, जो स्मरण करता है, वह मुक्ति को प्राप्त होता है और ब्रह्म रूप होकर प्रति युग में सुखी रहता है, नाम के वक्ता और श्रोता भी संसार से पार हो जाते हैं ।
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*सुरति१ माँहिं सांई सुमिरि, नाम निरति२ मधि राखि ।*
*जन रज्जब जग उद्धरै, सद्गुरु साधू साखि३ ॥५२॥*
मनोवृत्ति१ में निरंतर ईश्वर का स्मरण रख और विचारों२ में भी नाम को मुख्यता से रख, ऐसा करने से प्राणी संसार से पार हो जाता है, इसमें सद्गुरु और संतों की साक्षी३ है ।
(क्रमशः)

२८. आत्म अनुभव कौ अंग ४१/४४

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२८. आत्म अनुभव कौ अंग ४१/४४
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अनुभव बिन जानै नहीं, सुन्दर ब्यापक रूप । 
बाहिर भीतर एकरस, ऐसा तत्व अनूप ॥४१॥
श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - उस ईश्वर का वास्तविक रूप एवं वास अनुभवज्ञान के विना नहीं जाना जा सकता । वह तो बाह्य एवं आभ्यन्तर दशा में समान तथा अनुपम रूप वाला है ॥४१॥
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पंच कोस तें भिन्न है, सुन्दर तुरिय स्थांन । 
तुरियातीत हि अनुभवै, तहां न ज्ञान अज्ञांन ॥४२॥
शरीरस्थ १. अन्नमय कोष, २. प्राणमय कोष, ३. मनोमय कोष, ४. विज्ञानमय कोष एवं ५. आनन्दमय कोष - इन पाँच कोषों के त्यागने पर ही षष्ठ तुर्य(जीव) स्थान प्राप्त किया जा सकता है । इस अनुभवज्ञान की अवस्था तुर्यातीत कहलाती है । वह अवस्था ज्ञान एवं अज्ञान - दोनों को अतिक्रान्त कर चुकी होती है ॥४२॥ (द्र० - सवैया : २८/२८) ।
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श्रवन ज्ञान है तब लगै, शब्द सुनै चित लाइ । 
सुंदर माया जल परै, पावक ज्यौं बुझि जाइ ॥४३॥
ज्ञानचतुष्टय की अग्निचतुष्टय से तुलना : अब श्रीसुन्दरदासजी चतुर्विध ज्ञान की वास्तविकता बताते हुए कहते हैं - श्रवणज्ञान को उस अग्नि के समान समझना चाहिये जो जल डालते ही बुझ जाती है; क्योंकि साधक के चित्त पर माया का आवरण होते ही उस का श्रवणज्ञान भी तत्काल विलुप्त हो जाता है ॥४३॥
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मनन ज्ञान नहिं जात है, ज्यौं बिजुरी उद्दोत । 
माया जल बरखत रहै, सुन्दर चमका होत ॥४४॥
साधक का मननज्ञान मेघों में चमकने वाली उस बिजली के समान है जो जलमय मेघों का सम्पर्क होने पर भी बुझती नहीं है । इसी प्रकार यह मनन ज्ञान, चित्त के मायावृत्त होने पर भी, लुप्त नहीं होता ॥४४॥
(क्रमशः)

राखि ले हो राम देवा

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*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*कहो, क्यों जन जीवै सांइयां ?*
*दे चरण-कँवल आधार हो ।*
*डूबत है भव-सागरा,*
*कारी करो करतार हो ॥*
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विनती ॥
राखि ले हो राम देवा ।
हूँ बहतौ साद करौं हो, देवा इहिं भौजल मांहि डरौं हो ॥टेक॥
भौ जल भरिया सागरा, मोहि झकोला देइ ।
तुम्ह बिहूणाँ रामजी, मुनैं कोई काढि न लेइ हो ॥
भौ सागर मैं डूबताँ रे, कासौं करौं पुकार ।
सो मूनैं सूझै नहीं, कोइ तुम बिण थांभणहार हो ॥
काल नदी का घाट मैं, केता डूबा आइ ।
जे तूँ काढै केसवा, तो पारि परोहन जाइ हो ॥
तेरी भगति परोहण भौजला, मोहि चढ़ाइ किन लेइ ।
बषनौं डूबै देखताँ, तूँ डूबण मति देइ हो ॥१६१॥
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हे रामजी ! मुझे रख ले ! मैं इस संसारसागर में बहता हुआ अत्यधिक डर रहा हूँ कि पता नहीं मैं इसी में डूब मारुंगा अथवा इसको पार कर लूंगा । अतः समय रहते ही मैं दीनतापूर्वक करुणप्रार्थना करता हूँ कि हे रामजी ! तू मुझ डूबते हुए को डूबने से बचा ले ।
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यह संसार रूपी सागर विषयभोग रूपी जल से पूर्णतः भरा हुआ है और मुझे बार-बार धक्का देकर = ललचाकर डूबाने का प्रयतन करता है । हे रामजी ! तुम्हारे अतिरिक्त मुझे और कोई संसार-सागर से निकालेगा नहीं, निकाल सकता नहीं । भवसागर में डूबता हुआ मैं किससे पार करने के लिये प्रार्थना करूँ । मुझे यह समझ में नहीं आ रहा है क्योंकि आपके बिना भवजल में डूबते हुए को पकड़कर बाहर निकालने वाला और और नहीं है ।
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इस काल रूपी नदी के घाट पर कितने ही डूब चुके हैं । अतः हे केशव ! तू यदि मेरी धँसी हुई नैया को संसार सागर में से निकाल देगा तो वह निश्चय ही पार हो जायेगी । हे केशव ! मुझ भवसागर में बहते हुए को अपनी भक्ति रूपी नाव पर क्यों नहीं चढ़ा लेता है । बषनां को अपने सामने ही डूबता देखकर डूबने मत देना ॥१६१॥