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🌷*卐 श्री दादूदयालवे नम: 卐*🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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*दादू दत्त दरबार का, को साधु बांटै आइ ।*
*तहाँ राम रस पाइये, जहँ साधु तहँ जाइ ॥*
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मू.इ.—राम रजा¹ रजवंशि² बड़ो सत, सुन्दरदासजि पंथ में पूरो ।
गोप्य रह्यो पसरचो न पसारे में, न्यारे³ में ऊपज्या ज्ञान अंकूरो ॥
निज बोध निरोध कियो निश्चै, उतग्यो घट में पट हो गयो दूरो ।
राघो कहै गुरु दादू की दौलत, मोक्ष भयो कर मंगल तूरो⁴ ॥४८६॥
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रामजी की इच्छा¹ से राजवंश² में उत्पन्न बड़े सुन्दरदासजी दादूपंथ में पूरे सन्त हुये हैं यह सत्य है । आप प्रायः गुप्त रूप से ही रहे हैं । बाह्य सांसारिक पसारे में अपने मत को आपने नहीं फैलने दिया था । एकान्त³ रहने से ही आपके हृदय में अनुभव ज्ञानरूप अंकुर उत्पन्न हुआ था । आपने अपने ज्ञान का निरोध किया था अर्थात् विशेष रूप से उपदेश नहीं करते थे । आपका मन निश्चय पूर्वक शरीर के भीतर ही परमात्मा के स्वरूप की गहराई में उतर गया था । इससे आप के अन्तः करण का अज्ञान रूप पट सर्वथा दूर हो गया था ।
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राघवदासजी कहते हैं- गुरु दादूजी की ज्ञान रूप सम्पत्ति से आप परमार्थ रूप मांगलिक नगारा⁴ बजाकर जीवन्मुक्ति को प्राप्त हो गये थे । आपके शिष्य एक प्रहलाददासजी ही थे ! अन्य कोई शिष्य आपने नहीं किया था । प्रहलाददासजी को भी दादूजी महाराज की प्रेरणा से ही किया था वैसे तो ये परम विरक्त थे । इनकी वाणी भी नहीं है । ये प्रायः अन्तर्मुख वृत्ति रखते हुये ब्रह्म भजन में लीन रहते थे । इति श्री प्रथम अध्याय समाप्तः १
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अथ अध्याय २
प्रहलाददासजी
प्रहलाददासजी पूर्व आश्रम में बीकानेर नरेश के पुरोहित थे किन्तु बीकानेर नरेश जैतसिंहजी के पुत्र भीमराजजी जब दादूजी के शिष्य होकर बड़े सुन्दरदास बन गये तब दादूजी की आज्ञा से प्रहलादजी भी बड़े सुन्दरदासजी के शिष्य होकर प्रहलाददास बन गये । फिर गुरुजी के साथ ही रहने लगे । घाटड़े के पर्वत शिख पर सुन्दरदासजी प्रहलाददासजी की मैंड़ी नामक आश्रम में जब तक सुन्दरदासजी ब्रह्म भजन करते रहे तब तक प्रहलाददासजी भी उनके पास ही रहकर भजन करते रहे ।
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फिर जब सुन्दरदासजी वहां से विचर गये तब प्रहलाददासजी भी पर्वत से नीचे उतर ग्राम में धीरावत ठाकुरों की कोटडियों से कुछ दूर पर आकर विराजे और वहां ही भजन करने लगे । फिर वहां ही भक्तों ने प्रहलादशाल नामक आश्रम बनवा दिया । उसी में रहकर प्रहलाददासजी भजन करने लगे । प्रहलादशाल की चौखट के ऊपर के भाग में प्रहलाददासजी महाराज की मूर्ति भी खुदी हुई है ।
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स्थान का परिचय राघवदासजी ने भी भक्तमाल में दिया है, वह भी यहां देते हैं देखिये-
मू. छ. - वहर¹ वहत्तर देश, छीड़ ताहू में छोटी ।
धन्य स्वामि प्रहलाद, भक्ति तहं थापी मोटी ॥
द्वन्द्वपुरी ग्रति दिपै, तहां स्वामी की शाला ।
संग रह सन्त ग्रनन्त, करें हरिजी प्रतिपाला ॥
शुक्ल² धर्म को धार, मिल्यो धीरावत भरथो ।
सत-संगति से नेह, रचे पद साखी ग्ररथो ॥
दिन प्रति द्वादश कोटड़ी, न्यौतैं दल मंगल करें ।
रंग लागो राघो कहै, गुरु द्वारे सर्वस धरें ॥६६६॥
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वाहर¹ के ७२ देश हैं, उनमें सबसे छोटा छीड़ देश है । उस छीड़ में महान् भगवद् भक्ति की स्थापना की, उन स्वामी प्रहलादजी को धन्य है । उस देश में द्वन्द्वपुरी में स्वामी प्रहलाददासजी की भजन शाला है । इससे वह ग्राम ग्रति प्रकाशित हुथा है . द्वन्द्वपुरी में ही पहले रहे थे । पीछे घाटड़ा गये थे । द्वन्द्वपुरी घाटड़ा के ग्रास-पास ही है । वहां भी प्रहलादजी की शाला है । आपके संग ग्रनन्त संत रहते थे, उन सब का योग-क्षेम रूप पालन भगवान् ही करते थे ।
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आपके संग से शुद्ध² भागवत धर्म को धारण करके धीरावत भरतजी आपके साथ ही मिल गये थे ग्रर्थात् आपके समान ही भजन करने लग गये थे । भरतजी का सत्संग से अति स्नेह था । साखी औरर पदों का ग्रर्थ भरतजी को बहुत रुचिकर होता था । ये भरतजी आदि धीरावत ही द्वन्द्वपुरी से सुन्दरदासजी ग्रौर प्रहलाददासजी को घाटड़े ले गये थे । वैसे तो घाटड़े में धीरावतों के उस समय तीन सौ पचास के लगभग घर थे किन्तु १२ कोटड़ियां मुख्य थीं । प्रतिदिन ही घाटड़े की प्रहलादशाल पर उन १२ कोटड़ियों में से किसी एक का निमंत्रण आता था ।
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इस प्रकार १२ मास ही प्रहलादजी को सब संतों के साथ भोजन करा कर अपने घरों में मंगलाचार करते थे तथा सब ही लोग मांगलिक काम करते थे । गुरुवर स्वामी प्रहलादजी की कृपा से धीरावतों के रामजी का प्रेमरूप रंग लग गया था । अतः वे लोग सन्त सेवा संबंधी सब ही वस्तुयें ले जाकर अपने गुरु प्रहलादजी के द्वार पर भेंट करते थे ।
(क्रमशः)


















