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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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३०. ज्ञानी कौ अंग ३७/४०
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जानत है सब स्वप्न करि, इन्द्रिनि कौ ब्यवहार ।
सुन्दर ज्ञानी ज्ञान तैं, भिन्न न होइ लगार ॥३७॥
यद्यपि वह ज्ञानी यथार्थतः जानता रहता है कि उस की इन्द्रियों द्वारा कृत ये सभी कर्म स्वप्न के सदृश अयथार्थ(मिथ्या) हैं; क्योंकि ज्ञानी का यह ज्ञानक्रम एक क्षण भी उस से पृथक् नहीं होता ॥३७॥
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सुन्दर ज्ञानी ज्ञान मैं, गरक भयौ निज ठौर ।
दंत दिखावै और गज, दसन खान कै और ॥३८॥
ज्ञानी जिस ब्रह्मज्ञान में सतत निमग्न रहता है वह ब्राह्मी स्थिति कहलाता है२ । उस का लोकाचार का ज्ञान इस से दूसरा है; जैसे कि हाथी के दाँत दिखाने के लिये दूसरे और खाने के लिये दूसरे होते हैं ॥३८॥ (२ ब्राह्मी स्थिति के विस्तृत ज्ञान हेतु द्र० - भ० गी०, अ० २, श्लोक ७१, ७२)
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तम रज गुण करि जगत है, भक्त सतोगुण रुद्ध ।
सुन्दर तीनौं गुन परै, ज्ञानी सात्विक सुद्ध ॥३९॥
एक अन्य भेद यह भी है - जगत् अपना समस्त लोकव्यवहार रज तम में मिश्रित ज्ञान से सम्पन्न करता है; जब कि ज्ञानी का ज्ञान एकमात्र शुद्ध सत्त्वगुण से ही युक्त होता है ॥३९॥
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तवा अधोमुख आरसी, दर्पण सूधै होइ ।
ऐसै तम रज सत्व गुण, सुन्दर देखहु जोइ ॥४०॥
जैसे मुखदर्शन के तीन साधनों में से तवा अधोमुख होकर, तथा आरसी तथा दर्पण ऊर्ध्वमुख होकर ही मुखदर्शन के निमित्त बन पाते हैं, वैसे ही लौकिक ज्ञान रज एवं तमोगुण मिश्रित होकर तथा ज्ञानी का ज्ञान सत्त्वगुणमिश्रित होकर ही ज्ञान कराने में समर्थ हो सकते हैं ॥४०॥
(क्रमशः)



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बहुत श्रेष्ठ प्रवचन है।



