मंगलवार, 21 जुलाई 2026

३०. ज्ञानी कौ अंग ३३/३६

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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३०. ज्ञानी कौ अंग ३३/३६
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अज्ञ क्रिया कछु करत है, अहं बुद्धि कौं आंनि ।
सुन्दर ज्ञानी करत है, अहंकार बिनु जांनि ॥३३॥
इसमें वास्तविक कारण यह है कि अज्ञानी पुरुष सभी सांसारिक कृत्यों को अहं बुद्धि से(मैं कर रहा ' - ऐसा मान कर) करता है; जब कि ज्ञानी अपने सभी सांसारिक कृत्यों में अहंबुद्धि त्याग कर उनको ईश्वरार्पण बुद्धि से पूर्ण करता है । अतः जब यह अपने को किसी कर्म का कर्ता ही नहीं मानता तो उसे उन से होने वाला दुःख क्या और क्यों सन्तप्त करेगा ! ॥३३॥
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अज्ञानी सुख दुखनि कौं, जानत अपने मांहिं ।
सुन्दर ज्ञानी आपु मैं, सुख दुख मानैं नांहिं ॥३४॥
यही कारण है कि अज्ञानी जहाँ स्वयं को उन कर्मों का कर्ता मान कर स्वयं को उन कर्मों के फल का भोक्ता मान लेता है, वहीं ज्ञानी स्वयं को उन सुख दुःखात्मक कर्मों का अकर्ता, अभोक्ता मान कर सुखी एवं सन्तुष्ट तथा सन्तृप्त रहता है ॥३४॥
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सुन्दर अज्ञ रु तज्ञ कै, अंतर है बहु भांति ।
वाकै दिवस अनूप है, वाहि अंधेरी राति ॥३५॥
महाराज श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - इसी प्रकार, ज्ञानी एवं अज्ञानी में अन्य भी अनेक भेद हैं । जैसे - जो साधनाकाल ज्ञानी के लिये अनुपम दिवस के रूप में माना जाता है वहीं अज्ञानी के लिये घोर अन्धकारमय रात्रि के रूप में प्रतीत होता है१ ॥३५॥
(१ तु० श्रीमद्भगवद्‌गीता : या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी ।
यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुनेः ॥ - अ० २, ६९)
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ज्ञानी शुभ कर्मनि करै, लोक आचरन हेत ।
बहुत भांति के शब्द कहि, सुन्दर शिक्षा देत ॥३६॥
दूसरा भेद यह है - जहाँ ज्ञानी अपने सभी आचरण लोकाचार निभाने के लिये करता है । वह अपने उपदेशों में भी, शिष्यों को समझाने के लिये, विविध लौकिक उदाहरण प्रस्तुत करता रहता है ॥३६॥
(क्रमशः)

सिद्धि रूप प्रपंच

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*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
*प्रेम पियाला राम रस, हमको भावै येहि ।*
*रिधि सिधि मांगैं मुक्ति फल, चाहैं तिनको देहि ॥*
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सिद्धि के कारण राजारामजी के पास जनता का आना जाना बहुत बढ़ गया था । उस आवागमन से तोलारामजी आदि संतों के भजन में विघ्न होने लगा था । इससे एक दिन तोलारामजी ने कहा~राजाराम ! तुम्हारे पास जनता का आना जाना अधिक रहता है । इससे हमारे साधन भजन में विघ्न होता है । अतः तुम स्थान बदल लो, अन्य स्थान पर रहा करो । फिर गुरूजी की आज्ञा से तोलारामजी के प्रथम स्थल से पश्चिम की ओर पास ही राजारामजी ने स्थान बनवा लिया । राजारामजी के स्थल के नाम से प्रसिद्ध हुआ । फिर उसी में रहकर भगवद् भजन करने लगे वह स्थान राजाराम जी के स्थल के नाम से अब भी प्रसिद्ध है ।
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तोलारामजी के अन्य शिष्य थे उन्होंने जोधपुर के खाँडा पलसा में स्थान बनवाया था जो अब घोसियों के मोहल्ले में है । दादूपंथियों के नोहरे के नाम से प्रसिद्ध है । राजारामजी को दादू वाणी के पाठ से सिद्धि प्राप्त हो गई थी । उनको भविष्य का ज्ञान भी पहले ही हो जाता था । एक दिन कुचामण ठाकुर साहब राजारामजी के दर्शन करने गये थे ।
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वे राजारामजी को प्रणाम करके घर को जाने लगे तब राजारामजी ने कहा~ घर से आधी फर्लांग दूर पर बग्गी से उतर जाना । ठाकुर साहब की राजारामजी पर श्रद्धा थी । उन्होंने कहा~ जो आज्ञा उतर जाऊंगा । फिर वे राजारामजी की आज्ञानुसार उतर गये । घर के पास आते ही बग्गी उलट गई । यह बात जब राजारामजी के गुरु तोलारामजी ने सुनी तब राजारामजी को कहा~ तूं इस सिद्धि रूप प्रपंच में क्यों पड़ा है ? यह तो भगवत् प्राप्ति में विघ्न और दुःखदाता है ।
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कहा भी है~
विघ्न मानते संत जन, सिद्धिन का संयोग ।
किस प्रपंच में पड़ गया, सिद्धि क्लेशप्रद रोग ॥१२१॥दृ. त. १३
उक्त प्रकार ही पोकरण आदि के कई ठाकुरों को उन्होंने चमत्कार दिखाये थे । महाराज तखतसिंहजी भी राजारामजी के पास आते थे । अधिक राजा व प्रजा व आने के राजारामजी के पास बहुत संपत्ति संग्रह हो गई थी । उनके पास आने वाले लोग संपत्ति संबधी बात उनसे करते थे तब वे यह उत्तर दिया करते थे-
'राजाराम माया जोडी, क्यों परमोधो लोको ।
या माया यूं जायसी, होको आरे फोको ॥'
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अर्थात् राजाराम ने माया जोड़ ली यह अच्छा नहीं किया । हे लोगों यह प्रबोध मुझे क्यों देते हो ? तुमको ज्ञान नहीं है ! यह किस के लिये जुड़ी है । किन्तु मुझे ज्ञात है इसीलिये मैं माया के विषय में मौन रहा हूं । यह माया तो ऐसे जायगी, जैसे वायु का झोंका आने पर आरे से काटने पर निकाला हुआ बुरादा, हल्का होने से उड़ जाता है वैसे ही यह शीघ्र ही यहां से चली जायगी । हुआ भी वैसा ही । राजारामजी के शिष्य अर्जुनदासजी ने उस माया का विनाश बहुत शीघ्र ही कर डाला । राजारामजी का शरीरान्त वि. स. १९४४ में हुआ था ।
(क्रमशः)

*२१. भजन भेद का अंग ~४१/४३*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*२१. भजन भेद का अंग ~४१/४३*
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*सब अक्षर सांई सुमिर, रे दिव्य दृष्टि दास ।*
*रज्जब रत रह राम में, त्यों ही प्राण पचास ॥४१॥*
हे दिव्य दृष्टि भक्त ! सभी अक्षरों के द्वारा प्रभु का स्मरण कर, जैसे 'राम' इन दो अक्षरो में भक्त प्राणी रत रहते हैं, वैसे ही अन्य पचास अक्षरों में रत रहना चाहिये अर्थात ईश्वर के विभिन्न नामों में सभी अक्षर आते हैं, उन नामों से स्मरण करना ही अन्य पचास अक्षरों से स्मरण करना है ५२ ही अक्षर हैं ।
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*बावन अक्षर करि भजे, वेत्ता बावन वीर ।*
*जन रज्जब सुध बुद्धि का, ररै ममै में सीर ॥४२॥*
बावन अक्षरों से बनने वाले विविध शब्दों को समझने में वीर ज्ञानी जन तो बावन अक्षरों के द्वारा प्रभु का भजन करते हैं, किन्तु जो सरल, शुद्ध बुद्धि के अधिकारी जन हैं उनका तो रकार मकार से बने राम नाम के स्मरण में ही साझा है अर्थात अधिकार है ।
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*रज्जब रहे न नाम बल, नेह बिना मन थीर ।*
*ज्यों चूने बिन पाथरहुं रोक्या रहै न नीर ॥४३॥*
जैसे चूना लगाये बिना केवल पत्थरों की दीवाल से पानी नहीं रुकता, निकलता रहता है, वैसे ही प्रभु में प्रेम किये बिना केवल नाम-स्मरण के बल से ही मन प्रभु में स्थिर नहीं रहता ।
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इति श्री रज्जब गिरार्थ प्रकाशिका सहित “२१. भजन भेद का अंग” समाप्त ॥
(क्रमशः)

*२१. भजन भेद का अंग ~३७/४०*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*२१. भजन भेद का अंग ~३७/४०*
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*रज्जब उर१ कर२ के भजन, कछु पाड़ा३ पड़ जाय ।*
*यथा रुपया ठौर बिन, गैरी४ नाम कहाय ॥३७॥*
जैसा रुपया जिस देश का होता है उससे भिन्न राज्य में अन्य४ देश का कहलाता है, वैसे ही हृदय१ के भजन और हाथ२ से माला फेरने के भजन में कुछ अन्तर३ पड़ ही जाता है, दोनों सम नहीं होते हृदय का भजन ही श्रेष्ठ कहलाता है ।
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*रज्जब उर१ कर२ के भजन, अंतर ह्वै द्वै हाथ ।*
*आतम अबला३ धाम में, वर४ बाहर निज नाथ ॥३८॥*
हृदय१ के भजन और हाथ२ से माला फेरने के दो हाथ जितना अंतर है अर्थात भेद रहता है । नारी३ तो घर में हो और उसका स्वामी४ बाहर हो तब नारी को स्वामी के पास रहने का सा सुख नहीं मिलता, वैसे ही जीवात्मा के हृदय में चिन्तन होने से जो आनन्द मिलता है, वैसा माला फेरने से नहीं मिलता, कारण माला फेरने से हृदय में प्रभु की अनुभूति नहीं होती ।
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*रंग महल रंकार मध्य, रहे जु आतम राम ।*
*सो सुख मुख नहिं कहि सकै, सुरति लहै विश्राम॥३९॥*
राम मंत्र के बीज "राँ" रूप रंग महल में आत्म स्वरूप राम रहते हैं अर्थात "राँ" का जप करने से राम का दर्शन होता है और दर्शन से होने वाला सुख मुख से नहीं कहा जाता, किन्तु मनोवृत्ति को पूर्ण शांती मिलती है ।
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*रज्जब सुमिरन सदन१ मध्य, धरे२ अधर३ के सु:ख ।*
*जे कोइ पैठे प्राणियाँ, कदे न पावे दु:ख ॥४०॥*
प्रभु-स्मरण रूप धाम१ मायिक२ सुख तथा ब्रह्म३ सुख दोनों ही है, जो कोई प्राणी उसमें प्राणी उसमें प्रवेश करता है, वह कभी भी दु:ख नहीं पाता अर्थात परमात्मा का स्मरण करने से दोनों प्रकार का ही सुख प्राप्त हो जाता है ।
(क्रमशः)

३०. ज्ञानी कौ अंग २९/३२

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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३०. ज्ञानी कौ अंग २९/३२
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भावै तनु काशी तजौ, भावै बागड मांहिं । 
सुन्दर जीवन मुक्त कै, संसय कोऊ नांहिं ॥२९॥
उस ज्ञानी का देहपात भले ही काशी जैसे पवित्र क्षेत्र में हो, या मरुभूमि(बागड देश) में हो - इस की चिन्ता ज्ञानी को नहीं होती; क्योंकि वह, ब्रह्मज्ञान के कारण, जीवन्मुक्त हो चुका है । जीवन्मुक्त को ऐसे हीन(निकृष्ट) शङ्का - सन्देह नहीं हुआ करते ॥२९॥ (तु० : कासी तजि मगहर गयौ, कबीर भरोसै रांम - श्रीदा०वा० १९/५३)
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जैसौ कासी क्षेत्र है, तैसौ बागड देस । 
सुन्दर जीवन मुक्त कै, संक नहीं लवलेस ॥३०॥
उस ज्ञानी के लिये काशी जैसा पवित्र देश एवं मरुभूमि जैसा हीनदेश - दोनों समान ही हैं । जीवन्मुक्तावस्था में ज्ञानी को ऐसी शङ्काएँ कभी नहीं उद्भूत होती ॥३०॥
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अज्ञानी कौ जगत सब, दीसै दुख संताप । 
सुन्दर ज्ञानी कै सकल, ब्रह्म बिराजै आप ॥३१॥
अज्ञानी एवं ज्ञानी में भेद - अज्ञानी को समस्त संसार दुःख, शोक एवं सन्ताप से परिपूर्ण एवं भयजनक लगता है, जब कि ज्ञानी के वे तथाकथित सांसारिक दुःख, शोक एवं सन्ताप भय आदि ब्रह्मज्ञान के नीचे दब जाते हैं ॥३१॥
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अज्ञानी कौ जगत यह, दुखदाइक भै त्रास । 
सुन्दर ज्ञानी कै जगत, है सब ब्रह्म बिलास ॥३२॥
यही कारण है कि अज्ञानी को वे सांसारिक शोक सन्ताप एवं भय जहाँ दुःखदायक हो जाते हैं; वहीं ज्ञानी इन शोक, सन्ताप आदि को ब्रह्मलीला मान कर मौन रहता है ॥३२॥
(क्रमशः) 

लालदासजी की शिष्य परंपरा

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*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
*दादू पूरणहारा पूरसी, जो चित रहसी ठाम ।*
*अन्तर तैं हरि उमग सी, सकल निरंतर राम ॥*
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लालदासजी की शिष्य परंपरा ~
१~लालदासजी, २~हेमदासजी, ३~तोलारामजी, ४~स्वरूपदासजी, ५~रामरतनजी, ६~समर्थरामजी ७~रामदयालजी, ८~परशरामजी, ९~रामनारायणजी वर्तमान हैं, यह जोधपुर अस्थल की परंपरा है ।
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२ हेमदासजी = भी अपने गुरु देव लालदासजी के समान भजनानन्दी महात्मा थे । स्थान इनने भी नहीं बनाया था । 
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(१६) ३ तोलारामजी = लालदासजी के पौत्र शिष्य तोलारामजी से उनके भक्तों ने प्रार्थना की कि- स्वामिन् ! सन्तों के भजन करने के लिये स्थान अवश्य ही बनना चाहिये । आप हम लोगों को स्थान बनाने की आज्ञा अवश्य दें । स्थान होने से हम लोग भी स्थान पर आकर संतों के दर्शन, सत्संग भजन, कीर्तन का लाभ लेते रहेंगे । अतः भक्तों के आग्रह से स्थान बनाने की स्वीकृति तोलारामजी ने दे दी और स्थान बन गया ।
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तोलारामजी के एक गुरु भाई ह्रदयरामजी भी अच्छे सन्त थे । हृदयरामजी अत्यन्त दयालु थे । वे पशु पक्षी को भी दुःखी देखते थे तो उसकी सेवा में तन, मन, धन से लग जाते थे और जब तक उसका दुःख न मिटे तब तक सेवा करते रहते थे । तोलारामजी के पास एक छोटी सी तुम्बी थी । वे उसे आवश्यकतानुसार रुपये आदि निकालते रहते थे । लगातार निकालने पर भी वह खाली कभी भी नहीं होती थी । तोलारामजी ने गरीबदासोत महन्तों के १८ चातुर्मास करवाये थे । उस तुम्बी से द्रव्य निकाल २ कर ।
कहा भी है~
"संत सम्पदा अल्प भी, होती परम अपार ।
तूम्बी तोलाराम की, देती थी इकतार ॥३५८॥ दृ. त. ११॥
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तोलारामजी के अस्थल में एक दिन रात्रि को एक चोर घुस गया और अन्न भंडार से अन्न की पोट बांध ली । लोभवश अधिक अनाज बांध लेने से वह पोट उससे उठती नहीं थी । तोलारामजी भजन कर रहे थे । उन्होंने उसे पोट बांधते देख लिया था किन्तु बोले नहीं थे । जब पोट नहीं उठी तब उसे दुःखी देखकर आये और बोले-"लो उठाओ मैं उठवाता हूँ ।"
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संत को पास आया देख कर चोर डरा किन्तु संतजी ने कहा~ डरो मत तुम्हारे यहां इसकी आवश्यकता है, और यहां कोई कमी नहीं है । तुम ले जाओ । अधिक बोलने से दूसरे लोग जग जायेंगे । उसे पोट उंचाकर झट भेज दिया । कहा भी है~
"श्रेष्ठ संत सब से रखें, सहानुभूति दे क्षेम ।
पोट ऊंचाई चोर को, तोलाराम सप्रेम ॥११७॥दृ. त. १३ ।१७
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राजारामजी = तोलारामजी के मुख्य शिष्य राजारामजी जाति से वैश्य थे और नेत्रहीन थे । इससे बचपन में ही इनको तोलारामजी का शिष्य होने का सौभाग्य मिल गया था । इनके माता पिता ने इनको महात्मा तोलारामजी की भेंट कर दिया था । तोलारामजी ने इनको संपूर्ण दादूवाणी कंठस्थ करवादी थी तथा नियम दिला दिया था कि~प्रति दिन संपूर्ण दादूवाणी का पाठ कर के ही भोजन करना । अतः ये गुरुजी की आज्ञानुसार संपूर्ण दादूवाणी का पाठ कर के ही भोजन करते थे ।
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राजारामजी प्रतिदिन रात के दो बजे उठ कर पाठ आरंभ करते थे और आठ बजे वाणी का पाठ पूरा कर देते थे । यह नियम इनका जीवन पर्यन्त सुचारू रूप से चलता रहा था । वाणी पाठ के प्रताप से इनको वचन सिद्धि प्राप्त हो गई थी अर्थात् इनका वचन सत्य ही होता था । कहा भी है~
संत गिरा के पाठ से सिद्धावस्था होय ।
बोले राजारामजी, मिथ्या होत न कोय ॥११६ दृ. त. १३
(क्रमशः)

सोमवार, 20 जुलाई 2026

३०. ज्ञानी कौ अंग २५/२८

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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३०. ज्ञानी कौ अंग २५/२८
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भूत हु भब्य हु बर्त्तते, दूजा नांहीं आंन । 
सुन्दर ज्ञानी कै सदा, कहिये केवल ज्ञांन ॥२५॥
ज्ञान की दिक्कालाद्यनवच्छिन्नता : उस के लिये साधनावस्था के भूतकाल में ब्रह्म के अतिरिक्त अन्य कोई चिन्तनीय विषय था ही नहीं, न भविष्य में होगा; आज(वर्तमान में) भी उसके मन की वही स्थिति है । वह तो सदा(निरन्तर) ब्रह्मचिन्तन में ही सुख मानता है ॥२५॥
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अध ऊरध दश हूं दिशा, पूरन ब्रह्म समांन । 
सुन्दर ज्ञानी कै सदा, कहिये केवल ज्ञांन ॥२६॥
उस के लिये पूर्व पश्चिम, उत्तर, दक्षिण, ऊपर, नीचे आदि दशों दिशाओं में ब्रह्म समान रूप से व्याप्त(पूर्ण) है । अतः वह कहीं भी ब्रह्म के अतिरिक्त अन्य कुछ भी नहीं देख पाता ॥२६॥
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घटाकाश ज्यौं मिलि गयौ, महदाकाश निदांन । 
सुन्दर ज्ञानी कै सदा, कहिये केवल ज्ञांन ॥२७॥
शास्त्र में जैसे घटाकाश को महाकाश का ही अङ्ग माना जाता है; उसी प्रकार वह ज्ञानी संसार के सभी सुखों को ब्रह्मसुख का ही अङ्ग मानता है ॥२७॥
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मुक्ति शिला मूयें कहै, ते तौ अति अज्ञांन । 
सुन्दर ज्ञानी कै सदा, कहिये केवल ज्ञांन ॥२८॥
'मनुष्य का मोक्ष मुक्तिशिला पर ही होता है' - यह भ्रान्त लोगों(जैनों) का कथन है । ज्ञानी तो एकमात्र ब्रह्मज्ञान को ही मोक्ष का श्रेष्ठ उपाय मानता है ॥२८॥
(क्रमशः)  

लालदास जी मलाणा की वाणी

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*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
*दादू राम रसायन भर धर्‍या, साधुन शब्द मंझार ।*
*कोई पारखि पीवै प्रीति सौं, समझै शब्द विचार ॥*
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लालदासजी वि.सं. १८३० के लगभग जोधपुर में ही ब्रह्मलीन हुये थे । उनकी समाधि गवा की डूंगरी पर तेजानन्दजी की समाधि के पास ही है ।
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लालदास जी मलाणा की वाणी~
वि.सं. १६३९ की लिखी हुई लालदासजी के अस्थल जोधपुर नागौरी गेट के वर्तमान महन्त रामनारायणजी के पास बड़ी पुस्तक में निम्न वाणी देखने में आई, साखी ७६ । अरिल ३ । पद ७ देखने में आये ।
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इनके लघु ग्रंथ~
१~ ब्रह्म स्त्रोत युग्म, इसमें १८ पद्य हैं आदि में एक दोहा और अंत में एक छप्पय है । शेष सब मोतिदाम छंद है । उदाहरण~ मोतीराम-
पुरातन आदि अनंत अपार ।
अखंड अडंड अतीत अधार ॥
अछेद अभेद अलेख अन्नवे ।
नमो परब्रह्म निरंजन देव ॥१॥
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२~ "नाम माला" इनका यह प्रसिद्ध है । इसमें दादूजी के १५२ शिष्यों के नाम तथा मुख्य २ चरित्र दोहों में हैं । चरित्र किसी का एक किसी का दो और किसी का तीन दोहों में दिया है ।
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३~ एक "भयानक चितावनी" ग्रंथ भी लालदासजी का मिलता है और भी कोई रचना इनकी होनी चाहिये । कारण, इनकी रचना से ये अच्छे कवि ज्ञात होते हैं । अतः अन्य रचना भी होनी चाहिये । इनकी वाणी के उदाहरण भी देखिये~
साखी~
'तन त्यागी तरकां करे, मन माया के मांहिं ।
यह लोग दिखावा लालदास, सो साहिब माने नांहिं ॥१॥
अरिल~
"सूता सारी रात लगा नहिं पीव से,
संकट पड़सी सोच बनेगी जीव से ।
स्वाद बाद से श्वास गमाया बादरे,
परिहां लाल कहै समझाय सु अब तो जागरे ।
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पद~ 
राम भक्ति नहिं जानी प्राणी, सोवत रैनि विहाणी ॥टेक॥
जब लग सूता तब लग देखे, जागत किनहुन मानी ।
यह संसार इसो रे प्राणी, ज्यूं अंजली का पानी ॥१॥
यह संसार इसा रे प्राणी, ज्यूं तरवर की छाया ।
धन जीवन है धूम गृह ज्यों, ज्यों सपने की माया ॥२॥
हस्ती घोड़ा देश परगना, आणि मिले रजधानी ।
मेरी मेरी कर नर फूले, हो गई झूठ निधानी ॥३॥
झूठ सांच जिन कीन्ह निबेड़ा गुरु गम ज्ञान विचारी ।
लाल कहै जन कहि कहि हारे, ममता किनहु न मारी ॥४॥
(क्रमशः)

रविवार, 19 जुलाई 2026

*२१. भजन भेद का अंग ~३३/३६*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*२१. भजन भेद का अंग ~३३/३६*
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*माया घट मणियें सबै, सुमिरे साँई साध ।*
*रज्जब तुच्छ तसबीह रही, माला मिली अगाध ॥३३॥*
माया रचित सभी शरीर मणियें है जैसे मणिये पर नाम उच्चारण किया जाता है वैसे ही प्रत्येक शरीर को ब्रह्म रूप ही देखते हैं, संत लोग इसी प्रकार परब्रह्म का स्मरण करते हैं । जिन संतों को उक्त अगाध ब्रह्म का साक्षात्कार कराने वाली माला मिली है, उनके हाथ से काष्ठादि की माला दूर ही रही है ।
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*रज्जब माला माँहिंली, जा को सद्गुरु देय ।*
*सो सुन कांधे काठ का, कबहुँ भार न लेय ॥३४॥*
जिस को सद्गुरु कृपा करके मानस चिन्तन रूप भीतरी माला देते हैं अर्थात मानस चिन्तन की युक्ति बता देते हैं, हे साधको ! सुनो वह अपने कंधे पर काष्ठादि की मालाओं का भार भी नहीं धारण करता ।
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*रज्जब सुमिरन माहिला, माला रहित सु होय ।*
*पंच पचीसों त्रिगुण मन, विरला फेरे कोय ॥३५॥*
भीतर का स्मरण माला रहित ही होता है, पंच ज्ञानेन्द्रिय, पच्चीस प्राकृति, त्रिगुण इन सब को भगवत् परायण करना रूप माला कोई विरला संत ही फेरता है ।
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*विदा होय बाइक१ वदन२, छूटहि श्वास शरीर ।*
*तब काष्ठ कर कौन के, सुमिरन सुरति सधीर ॥३६॥*
जब मुख१ से वचन२ बंद हो जाता है और शरीर से श्वास निकलने वाले होते हैं तब काष्ठ की माला किसके हाथ में फिरती है, किन्तु वृत्ति से होने वाला स्मरण तो धीर पुरूषों का उस समय भी होता रहता है ।
(क्रमशः)

३०. ज्ञानी कौ अंग २१/२४

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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३०. ज्ञानी कौ अंग २१/२४
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जलचर थलचर ब्योमचर, जीवनि की गति तीन । 
ऐसैं सुन्दर ब्रह्मचर, जहां तहां लयलीन ॥२१॥
जैसे संसार में उत्पन्न प्राणियों की तीन ही चर्चा(गति) होती हैं । उन में १. कोई जलचर होता है, जो जल में ही रह कर सुख मानता है, २. कोई स्थलचर होता है जो स्थल(भूमि) पर रह कर ही सुख मानता है, ३. कोई नभचर होता है जो नभ(आकाश) में उडता हुआ ही सुख मानता है; उसी प्रकार ज्ञानी पुरुष ब्रह्मचर होता है जो ब्रह्मानन्द में एकान्ततः निमग्न रहता हुआ ही आत्यन्तिक सुख मानता है, अन्यत्र नहीं ॥२१॥
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अपनै मन आनंद है, तौ सगरै आनंद । 
सुन्दर मन शीतल भयौ, दह दिशि शीतल चन्द ॥२२॥
महाराज सुन्दरदासजी कहते हैं - हमारा मत यह है कि यदि किसी विवेकी पुरुष का अपना मन सुख से परिपूर्ण है तो उस को संसार में भी सर्वत्र सुख ही सुख अनुभूत होता है; क्योंकि उसका अपना मन शान्त होने पर उसे समस्त संसार में भी सर्वत्र चन्द्रमा के समान शीतलता(शान्ति = आनन्द) ही प्रतीत होगी ॥२२॥
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ऊठत बैठत फिरत हूं, खातहूं पीवत प्रांन । 
सुन्दर ज्ञानी कै सदा, कहिये केवल ज्ञांन ॥२३॥
साधना करते करते समय आने पर, उस ज्ञानी के मन की यह स्थिति हो जाती है कि उसे अपनी खाना, पीना, उठना बैठना आदि क्रियाएँ करते रहने पर भी सर्वत्र ब्रह्मानन्द रस की निरन्तर अनुभूति होती रहती है; अतः वह निरन्तर ब्रह्मचिन्तन में ही व्यस्त रहता है ॥२३॥
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जागत सोवत जोवते, सुख सौं करत बखांन । 
सुन्दर ज्ञानी कै सदा, कहिये केवल ज्ञांन ॥२४॥
वह सोते हुए, जागते हुए, किसी वस्तु को देखते हुए या किसी की प्रतीक्षा करते हुए भी ब्रह्मानन्द का ही चिन्तन, मनन या व्याख्यान करता रहता है; क्योंकि तब तक उस ज्ञानी का निरन्तर ब्रह्मानन्द में निमग्न रहना ही स्वभाव बन जाता है ॥२४॥
(क्रमशः) 

उच्चकोटि का भजनानन्दी संत

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*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
*दादू काम धणी के नाम सौं, लोगन सौं कुछ नांहि ।*
*लोगन सौं मन ऊपली, मन की मन ही मांहि ॥*
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फिर शनैः शनैः तत्कालीन जोधपुर नरेश विजयसिंहजी के पास भी आपकी यश गाथा पहुँच गई । तब विजयसिंहजी अपने भाई भीमसिंहजी के साथ एक दिन लालदासजी के दर्शन करने आये । वे आये तब भी लालदासजी कैर वृक्ष की छाया में बैठे हुये भजन कर रहे थे । लालदासजी के दर्शन कर के जोधपुर नरेश विजयसिंहजी तथा उनके भाई भीमसिंहजी दोनों ही अति प्रसन्न हुये ।
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फिर कुछ समय सरसंग कर के राजा ने प्रार्थना की~ भगवन् ! कोई सेवा की आज्ञा दें । लालदासजी ने कहा~भगवत् कृपा से सब आनन्द है । फिर भी राजा ने अति आग्रह पूर्वक कहा~ भगवन् कोई तो सेवा अवश्य बताइये । तब लालदासजी ने कहा~ सेवा बता तो दूंगा किन्तु आप लोग करोगे नहीं । राजा ने कहा~ अवश्य करूंगा आप निस्संकोच बताइये ।
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तब लालदासजी कहा~ हमारी सब से बड़ी सेवा यह है कि~ 'आप हमारे पास फिर कभी भी नहीं आना । लालदासजी का उक्त वचन सुनकर राजा कुछ देर मौन रहे । फिर बोले ठीक है, स्वामिन् ! मैं आप के पास फिर नहीं आऊंगा । किन्तु आपका इसमें क्या रहस्य है ? यह तो कृपा करके बताइये । तब लालदासजी ने कहा~ आपके बारंबार आने से आपकी प्रजा भी अति मात्रा में आने लगेगी । उस अधिक आवागमन से हमारे भजन ध्यान में विघ्न पड़ेगा । यही मेरा तात्पर्य है ।
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लालदासजी का उक्त वचन सुनकर जोधपुर नरेश विजयसिंहजी ने तथा उनके भाई भीमसिंहजी ने लालदासजी उच्चकोटि का भजनानन्दी संत समझ लिया तथा उनके विचारों से दोनों ही अति हर्षित हुये । और धन्यवाद देते हुये प्रणाम करके राजमहल को चले गये । कहा भी है~
साधक संतों को नहीं, जन समुदाय सुहाय ।
लालदास ने कह दिया, पीछे कभी न आय ॥११५। दृ.त.११॥
(क्रमशः)

शनिवार, 18 जुलाई 2026

*२१. भजन भेद का अंग ~२९/३२*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*२१. भजन भेद का अंग ~२९/३२*
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*मणियें मोहन नाम सब, सूत समीर१ न मेर२ ।*
*जन रज्जब हित हाथ ले, आठों पहर सु फेर ॥२९॥*
आन्तर माला बता रहे हैं - विश्वमोहन परमात्मा के सभी नाम मणियें हैं, प्राण१ वायु सूत है, इस आन्तर माला के सुमेरु२ नहीं होता अर्थात इसकी समाप्ति नहीं होती, निरन्तर फिरती ही रहती है । इसे हृदय से प्रेमरूप हाथ में लेकर अष्टपहर निरंतर ही फेरा कर ।
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*अकलि१ कष्ट२ सेती३ घङै, मणियें नाम अनन्त ।*
*रज्जब माला मोहनी, सुमिरै साधू संत ॥३०॥*
विचारशील व्यक्तियो ने बुद्धि१ के परिश्रम२ से३ भगवान के अनन्त नाम रूप मणियें बनायें हैं, उन नामों से बनी हुई मोहिनी माला द्वारा साधु-संत ही भगवान का स्मरण करते हैं ।
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*पंच पचीसों त्रिगुण मन, ये मणिये जिव फेरि ।*
*रज्जब माला माँहिली, जोगेश्वर जप हेर ॥३१॥*
पंच ज्ञानेन्द्रिय, पच्चीस प्रकृतियें, तीन गुण और मन ये ही माला के मणियें है । इनसे बनी हुई माला भीतरी माला कहलाती है । योगीश्वरों का जाप इसी माला द्वारा होता है अर्थात योगीश्वर उक्त सब को भगवत् परायण रखते हैं । हे जीव ! इस माला को विचार द्वारा खोजकर के निरंतर फेर ।
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*मारुत मोज सु माला मणियें, मन हुं उधारण मंत ।*
*रज्जब जूना जाप यह, जोगेश्वर सुमिरंत ॥३२॥*
सहज स्वभाव से चलने वाले श्वास ही माला के मणियें है और मन का विषयों से उद्धार करने के लिये संतों ने ऐसी ही माला फेरने की सलाह दी है पूर्व काल का यही जाप है । योगीश्वर लोग भी इसी तरह स्मरण करते थे ।
(क्रमशः)

३०. ज्ञानी कौ अंग १७/२०

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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३०. ज्ञानी कौ अंग १७/२०
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शब्द सुनै सो ब्रह्ममय, कहै ब्रह्ममय बैंन । 
सुन्दर ज्ञानी ब्रह्ममय, ब्रह्महि देखै नैंन ॥१७॥
वह ज्ञानी प्रत्येक शब्द या वचन को या नेत्रों से द्रष्टव्य रूप को ब्रह्मयुक्त ही मानता हुआ स्वयं को निरन्तर ब्रह्मचिन्तन में लगाये रखता है ॥१७॥
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पंच तत्व पुनि ब्रह्ममय, ब्रह्मा कीट पर्यंत । 
ज्ञानी देखै ब्रह्ममय, सुन्दर संत असंत ॥१८॥
पाँच तत्त्वों से रचित ब्रह्मा से कीट तक इस समस्त सृष्टि को भी पूर्णतः ब्रह्ममय मानता हुआ तथा सभी साधु स्वभाव या दुष्ट स्वभाव वाले प्राणियों को भी वैसा ही मानता हुआ वह सदैव ब्रह्मचिन्तन में लीन रहता है ॥१८॥
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सुंदर बिचरत ब्रह्ममय, ब्रह्म रह्या भरपूर । 
जैसैं मच्छ समुद्र मैं, कहां जाइ कहुं दूर ॥१९॥
जैसे समुद्र में तैरती हुई मछली को, कितना ही दूर जाने पर भी, सर्वत्र जल ही जल मिलता है; वैसे ही ब्रह्मानन्द में मग्न ज्ञानी को संसार में सर्वत्र ब्रह्म ही दिखायी देता है, अन्य कुछ नहीं ॥१९॥
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जौ पग पहरी पानही, कांटा चुभै न कोइ । 
सुंदर ज्ञानी सुखमई, जहां तहां सुख होइ१ ॥२०॥ 
(१ उपानद्‌गूढपादस्य ननु चर्मावृतैव भूः । - सूक्ति)
जैसे पैरों में जूता पहने हुए मनुष्य को, कण्टकाकीर्ण स्थल में जाने पर भी, कहीं कांटा नहीं चुभता; उसी प्रकार समग्र संसार को ब्रह्ममय देखने वाले ज्ञानी को कहीं भी किसी प्रकार के दुःख की प्रतीति नहीं होती ॥२०॥ 
(क्रमशः)

रातड़िया ग्राम में

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*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
*छाजन भोजन परमार्थी, आतम देव आधार ।*
*साधु सेवक राम के, दादू पर उपकार ॥*
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वर्तमान में दामोदरदासजी व उनके शिष्य दीपारामजी है । अतः मलाणा के स्थान में आज तक दो की संख्या से अधिक साधु नहीं हो सके हैं । मलाणा लालदासजी की तपोभूमी है । आगे लालदासजी मलाणा से विचरकर कुछ समय देवातड़े विराजे ।
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वहां से चामूचैराई(पोकरण फलोदी) तहसील ओसियां में पधारे फिर थली के महालाणी प्रदेश के रातड़िया ग्राम में पधारे । वहां के भक्त लालदासजी पर अब तक भी पूर्ण श्रद्धा रखते हैं । लालदासजी को परमेश्वर रूप ही मानते हैं । जोधपुर नागौरी दरवाजा के लालदासजी के स्थल में माघी पूर्णिमा को आकर बच्चों के जडूले उतारते हैं । जात देते हैं । इच्छा पूर्ति के लिये बोली हुई बोल्यारी की भेंट इच्छा पूर्ण होने पर चढ़ाते है ।
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एक समय लालदासजी भ्रमण में थे और एक स्थान पर बैठे हुये भगवद् भजन कर रहे थे । एक जाट ने उन्हें देख कर सोचा संत भूखे होंगे । वह अपने लिये चार रोटियां लाया था, उनमें से उसने एक रोटी लालदासजी को दे दी । फिर सोचने लगा । आज मेरे भोजन में एक रोटी कम रहने से भूख शीघ्र ही लगेगी और भूख लगने से काम नहीं हो सकेगा ।
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किन्तु जब वह मध्याह्र में रोटी खाने लगा तो उसे पूरी चार रोटियां मिलीं उसने संतजी को जो रोटी दी थी वह कम नहीं हुई । तब दूसरे दिन उसने लालदासजी को दो रोटी दी, तो भी भोजन के समय चार ही मिली । तीसरे दिन तीन दी तो भी भोजन के समय चार मिली । तब उसे निश्चय हो गया कि संतों की सेवा करने से वस्तुयें कम नहीं होती हैं~ कहा भी है~
"संतों की सेवा करे, वस्तु घटत है नांहिं ।
दिये जाट को रोटियां, घटी न वर्तन मांहिं ॥११३ ॥दृ. त. १३॥
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लालदासजी भ्रमण करते हुये वि.सं. १८२५ के लगभग जोधपुर में पधारे थे और नागौरी गेट के भीतर अधर शिला पहाड़ी की नीचाई में एक कैर वृक्ष की छाया में विराजे थे और वहां रह कर भजन करने लगे थे । सर्व प्रथम यहां पर कागा तीर्थ में स्नानार्थ जाने आने वाले सज्जनों ने लालदासजी को कैर वृक्ष की छाया में भजन करते हुये देखा था । फिर वे लोग स्नान करके आते थे तब आप के दर्शनार्थ व सत्संग के लिये आप के पास जाने लगे थे ।
(क्रमशः)

शुक्रवार, 17 जुलाई 2026

*२१. भजन भेद का अंग ~२५/२७*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*२१. भजन भेद का अंग ~२५/२७*
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*जन रज्जब विछुड़त मरहिं, जिनके अमल अराध ।*
*मनसा वाचा कर्मना, साखी सद्गुरु साध ॥२५॥*
जिनके हृदय में स्वार्थ-मल रहित परमात्मा की भक्ति है, वे प्रभु के वियोग दु:ख से व्यथित होकर मर जाते हैं । यह बात हम मन, वचन, कर्म से सत्य ही कहते हैं, इसमें सद्गुरु और संतों की भी साक्षी है ।
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*निति निवृत्ति प्रभुता प्रभु, चतुर स्थान कर गौन ।*
*रज्जब पावे प्राण पति, भृत्य भगवंत सु भौन ॥२६॥*
व्यवहारिक नीति, वैभव स्वामीपना और वैराग्य का अभिमान, इन चारों से दूर रहने वाला भक्त ही भगवान के भवन को जाकर प्राणपति परमेश्वर को प्राप्त करता है ।
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*शरीअत सेव शरीर की, तरीकते दिल राह ।*
*माँहिं मारफत कीजिये, हकीकत मिल जाह ॥२७॥*
मुसल्मानी धर्म की चार अवस्थाओं द्वारा भजन-रहस्य बता रहे हैं - दोनों कानून रूप शरीअत में तो भजन द्वारा भी शरीर की ही सेवा में लगा रहता है । शुद्धाचरण रूप तरीकत में मन से प्रभु का मार्ग पकड़ता है । अध्यात्म विद्या रूप मारफत में ईश्वरीय ज्ञान का विचार करता है । मूल तत्त्व ब्रह्म में निष्ठा रूप हकीकत में पहुँचने पर ब्रह्म में ही मिल जाता है । इस प्रकार अवस्था भेद से भजन भेद भी होता है ।
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*धर्म योग ब्रह्मांड मध्य, कर्म योग पिंड माँहिं ।*
*भक्ति योग सो प्राण घर, अगम योग ठहराँहि ॥२८॥*
धर्म योग सभी ब्रह्माण्ड में व्याप्त है वा धर्म योग का साधक ब्रह्मांड में ही रहता है । कर्म योग व्यक्ति की भावना से भिन्न-भिन्न होने से शरीर में ही है वा शरीर से होता है भक्ति योग प्राणी के हृदय रूप घर में होता है । उक्त तीनों योगों से प्राणी गतिशील रहता है किन्तु ब्रह्मचिन्तन द्वारा प्राप्ति रूप अगम योग से योगी ब्रह्म में स्थिर होकर ब्रह्म रूप ही हो जाता है । अत: ब्रह्म चिन्तन ही रहस्यमय भजन है ।
(क्रमशः)

सुखासक्ति का त्याग

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*सुख मांहि दुख बहुत हैं, दुख मांही सुख होइ ।*
*दादू देख विचार कर, आदि अंत फल दोइ ॥*
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*॥ श्रीहरि: ॥*
दिनांक 17.7.26.
वि. सं. 2083, 'रौद्र' नाम संवत्सर, आषाढ़ मास, शुक्ल पक्ष, तृतीया, शुक्रवार। (गीता दैनन्दिनी अनुसार)।
1- परम श्रद्धेय स्वामीजी श्री रामसुखदासजी महाराजका प्रवचन—
दिनांक— 13.9.95, सांय 5.0 बजे।
स्थान— गांधी मैदान, जोधपुर।
*विषय— सुखासक्ति का त्याग।*
2- गीता पाठ— गीता पाठ अध्याय 17 श्लोक संख्या 21 से 28 तक।
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*🕉️ संसारमें जो सुख सामग्री दिख रही है, यह सब धोखा है और परमात्मा सबको आनन्द देने वाले हैं। धोखे वाली चीज आपका निरन्तर त्याग कर रही है और परमात्माका और आपका संबंध नित्य-निरन्तर है, परमात्मा कभी किसीका साथ छोड़ते ही नहीं। जो आपसे नित्य निरन्तर अलग हो रहा है, उस शरीर-संसारसे अलग होना है और जो परमात्मा नित्य निरन्तर आपके साथ रह रहे हैं, उन्हीं परमात्माको प्राप्त करना है। यह सत्संगकी खास बात है।*
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*🕉️ रुपये आ जाय, अनुकूल पदार्थ मिल जाय, मैं सुख पूर्वक जीता रहूँ— ये खास मोह है, आदर, मान, सत्कार अच्छा लगता है, ऐसी रूचि पतन करने वाली है। संसारको, नाशवान् वस्तुओंको सत्ता-महत्ता दे दी है, यह बाधा है। ये सब वस्तुएँ तो रहेगी नहीं और इनकी आशा, विश्वास, भरोसा रखा तो दुःख पाना पड़ेगा, रोना पड़ेगा। मनुष्य मरनेसे डरते हैं, वह मृत्यु प्रतिक्षण नजदीक आ रही है। आप यदि अपना कल्याण चाहते हैं, तो भोगोंका और अनुकूलताकी इच्छाका विषके समान त्याग कर देना चाहिए। भोग पदार्थ, आराम, मान-बड़ाई अच्छे लगते हैं, यह खास खतरा है।*
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*🕉️अनुकूलता जितना बांधती है, प्रतिकूलता उतना नहीं बांधती। अनुकूलताका सुख बेहोश कर देने वाला है, लेकिन प्रतिकूलता होशमें लाने वाली है। सावधान रहने वाला अनुकूलता-प्रतिकूलता, दोनोंमें नहीं फँसता है। भोग पदार्थ, मान-बढ़ाई, आदर-सत्कार, आराम— ये बांधने वाले हैं; अपमान, निन्दा, तिरस्कार, पैसोंका घाटा आदि बुरे लगते हैं, लेकिन ये दुखदाई परिस्थितियाँ आपको कल्याणकी तरफ अग्रसर कराने वाली हैं। खेड़ापाके श्रीरामदास जी महाराजको जोधपुरके राजाने देश-निकाला दे दिया, हुक्म मिला जब वे मकानके बाहर दातुन कर रहे थे, उसी समय वहाँसे चल दिए, गुरु महाराजका दिया हुआ गुटका और छड़ी साथमें ली, उसीमें आनन्द मान लिया, मकान, रुपये-पैसों आदिकी तरफ देखा ही नहीं।*
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*🕉️श्रीमद्भागवतमें भगवान् कहते हैं— 'जिस पर मैं कृपा करता हूँ, उसका धन हर लेता हूँ, भाई-बंधुओंसे संबंध विच्छेद करा देता हूँ, सब तरफसे उसके ऊपर दुःख आ जाते हैं— फिर भी वह मेरा भजन नहीं छोड़ता है, तो मैं उस भक्तका दास हो जाता हूँ।' जैसे वैद्य कड़वी दवाई रोगीका रोग दूर करनेके लिए देता है, ऐसे ही भगवान् प्रतिकूलता हमें जन्म-मरणसे रहित करनेके लिए, अपना प्रेम प्रदान करनेके लिए देते हैं, इसलिए प्रतिकूलतामें दु:खी नहीं होकर परम आनन्द मनाना चाहिए।*
बहुत श्रेष्ठ प्रवचन है।

३०. ज्ञानी कौ अंग १३/१६

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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३०. ज्ञानी कौ अंग १३/१६
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बंध मोक्ष जाकै नहीं, स्वर्ग नरक नहिं दोइ । 
सुन्दर ज्ञानी ज्ञानमय, संशय रह्यौ न कोइ ॥१३॥
महाराज श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - ऐसी उच्चतम अवस्था वाले ज्ञानी के लिये संसार में न कहीं कोई बन्धन है, न मोक्ष । न कोई स्वर्ग तक पहुँचाने वाला पुण्य कर्म रह जाता है और न कोई नरक में गिराने वाला पापकर्म । वह(ज्ञानी) उस स्थिति में पहुँच कर निरन्तर ज्ञानमय अवस्था में ही लीन रहता है ॥१३॥
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घर बन दोऊ सारिखे, नां कछु ग्रहण न त्याग । 
सुन्दर ज्ञानी ज्ञानमय, नां कहुं राग बिराग ॥१४॥
इस स्थिति में पहुँच कर उस ज्ञानी का न घर(गृहस्थ धर्म) के प्रति राग(आसक्ति) रह जाता है, न वन(संन्यास) के प्रति मोह । वह इन दोनों(घर एवं वन) को न ग्रहण(स्वीकार) करता है न छोड़ता है; क्योंकि उसकी दृष्टि में न कहीं राग का महत्त्व रह गया है न वैराग्य का । अतः वह अब निरन्तर ज्ञानमय स्थिति में ही स्थित रहता है१ ॥१४॥ 
(१ तु० श्रीदादूवाणी : 
दादू जिन प्रांणी करि जाणियां, घर बन एक समान । 
घर मांहै बन ज्यौं रहै, सोई साध सुजान ॥१६/२९)
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निंदा स्तुती देह की, कर्म शुभाशुभ देह । 
सुन्दर ज्ञानी ज्ञानमय, कछू न जानै येह ॥१५॥
उस की दृष्टि में सांसारिक निन्दा एवं स्तुति तथा ये लौकिक शुभ या अशुभ कर्म देह से होते हैं, अतः वही इन के प्रति उत्तरदायी है । अतः, ज्ञानी इन सब की उपेक्षा करता हुआ निरन्तर ब्राह्मी स्थिति में ही स्थित रहता है ॥१५॥
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काहू सौं घटि बढि नहीं, काहू निकट न दूरि । 
सुन्दर ज्ञानी ज्ञानमय, ब्रह्म रह्या भरपूरि ॥१६॥
वह ज्ञानी न वह किसी से अल्प प्रेम ही करता है और न अधिक द्वेष ही(घटि बढि) । न वह किसी से घनिष्ठ सम्बन्ध बनाता है और न बहुत दूर तक किसी से द्वेष ही रखता है । वह तो एकमात्र निरञ्जन निराकार प्रभु को सर्वव्यापक मानता हुआ सर्वदा उसी में लीन रहता है ॥१६॥
(क्रमशः) 

खेड़ापा रामस्नेही संप्रदाय

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*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
*जे जन बेधे प्रीति सौं, सो जन सदा सजीव ।*
*उलट समाने आप में, अन्तर नांही पीव ॥*
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लालदास जी के विषय में वहां यह भी प्रसिद्ध है कि खेड़ापा के रामस्नेही संप्रदाय के प्रवर्तक रामदासजी ने खेड़ापा से आकर मलाणा में एक दिन जागरण किया था । वे रात्री भर उच्च स्वर से गाते रहे थे । इससे भजनानन्दी लालदासजी के भजन में उस रात को विघ्न ही रहा ।
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प्रातःकाल लालदासजी ने भावूदास ब्राह्मण से पूछा~ आज रात्रि भर ऊंचे स्वर से कौन गाता रहा था । भावूदास ने कहा~ खेड़ापा के रामदासजी तीन दिन से यहां आये हुये हैं । आज रात्रि को वामियों के वास में उन्होंने जागरण किया था, अतः वे ही गाते थे । लालदासजी ने भावूदास को कहा~ तुम रामदासजी को मेरे पास बुला लाओ । भावूदास ने जाकर रामदासजी को कहा~ आपको लालदासजी महाराज बुला रहे हैं ।
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रामदासजी भावूदास के साथ लालदासजी के पास आये । तब लालदासजी ने उनको कहा~ रामदास ! जितनी लगन से तुम रात्रि भर ऊंचे स्वर से गाते रहे उतनी लगन से रामजी का भजन करते तो तुम्हारा कल्याण हो जाता और तुम्हारे संग से अन्यों का भी कल्याण होता । लालदासजी का उक्त वचन सुनकर रामदास जी बोले~ फिर आप ही मुझे शिष्य बनाकर रामजी के भजन की मुक्ति बताइये । तब लालदासजी ने कहा~ तुम सिंहस्थल में जाकर हरिरामदासजी के शिष्य हो जाओ ।
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लालदासजी की आज्ञा मानकर रामदास सिंहस्थल में हरिरामदासजी के पास गये । हरिरामदासजी ने उनको शिष्य बनाकर राम भजन में लगा दिया । फिर वे भजन करके उच्चकोटि के संत हो गये थे । उन्हीं से खेड़ापा रामस्नेही संप्रदाय चला है । रामदासजी ने लालदासजी के विषय में कहा भी है~
"लालदास लागा गुरु घाटी, कीन्ही दूर भरम की टाटी ।"
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विराही के संत सुखरामजी भी पहले लालदासजी के सत्संग में जाते थे और उनसे साधन संबन्धी परामर्श भी करते थे । यह विराही की परंपरा के संत भी सुनाते हैं । मलाणा के स्थान में दो संतों से अधिक संख्या नहीं होती है । लालदासजी ने ही ऐसी मर्यादा इसलिये बाँध दी थी कि अधिक होने से भजन में विघ्न पड़ेगा ।
(क्रमशः)

गुरुवार, 16 जुलाई 2026

३०. ज्ञानी कौ अंग ९/१२

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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३०. ज्ञानी कौ अंग ९/१२
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काइक बाइक मानसी, कर्म न लागै ताहि । 
सुन्दर ज्ञानी ज्ञानमय, देह-क्रिया सब आहि ॥९॥
ज्ञानी की सभी क्रियाएँ ज्ञानमय : महाराज श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - ऐसे साधक को, अतिशय ज्ञानवान् होने के कारण, उस के शरीर वाणी एवं मन से होने वाली क्रियाओं(कर्मों) का कोई शुभ या अशुभ फल स्वीकार नहीं होता; क्यों कि उस के मत में ये तीनों ही प्रकार के कर्म उसके देह से होते हैं; अतः जीवात्मा से इन का सम्बन्ध कैसे हो सकता है ! ॥९॥
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पहलैं कियौ न अब करौं, आगै की नहिं आस । 
सुन्दर ज्ञानी ज्ञान करि, काटे बंधन पास ॥१०॥
उस ज्ञानी साधक के मत में - जीवात्मा ने न पहले(भूतकाल में) कोई कर्म किया था, न वर्तमान में कोई कर्म कर रहा है, और न वह भविष्य में ही कोई कर्म करेगा । ज्ञान के आश्रय से यह उत्तम साधक अपने सभी भवबन्धन उच्छिन्न कर चुका है ॥१०॥
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बिधि निषेद जाकै नहीं, नां कछु पाप न पुंन्य । 
सुन्दर ज्ञानी ज्ञानमै, सब करि जानै शुंन्य ॥११॥
ऐसे उत्तम साधक के लिये, ज्ञान की इस उच्च भूमि में पहुँचने पर, न कोई शास्त्रोक्त विहित कर्म करणीय रह जाते हैं, और न कोई निषेधात्मक(अविहित) कर्म त्याज्य रह जाते हैं । न उस के लिये पुण्यकर्म या पापमय कर्म ही ग्राह्य या त्याज्य रह जाता है । ऐसा ज्ञानी समस्त संसार को निराकार निरञ्जन प्रभु से ही व्याप्त मानता है ॥११॥
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हर्ष शोक उपजै नहीं, राग द्वेष पुनि नांहिं । 
सुन्दर ज्ञानी देखिये, गरक ज्ञान के मांहिं ॥१२॥
ऐसी स्थिति में पहुँचने पर, उस ज्ञानी के लिये इस संसार में न कोई हर्षोत्पादक घटना रह जाती है, न कोई शोकमय समाचार । न कहीं उस का राग(प्रेम) रह जाता है, न द्वेष । वह तो इन सब(हर्ष शोक, राग द्वेष आदि) से ऊपर उठकर निरन्तर ज्ञानमय अवस्था(ब्राह्मी स्थिति) में ही स्थित रहता है ॥१२॥
(क्रमशः) 

१५ लालदासजी

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*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
*समर्थ सो सेरी समझाइनैं, कर अणकर्ता होइ ।*
*घट घट व्यापक पूर सब, रहै निरंतर सोइ ॥*
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१२ वें चेतनदेवजी अच्छे विद्वान् और विरक्त थे । इन्होंने दादूजी का जीवन चरित्र भी लिखा है । उसमें ५२ विश्राम हैं । इन्होंने जीवितावस्था में ही गद्दी त्याग दी थी । ये एकान्त में रहकर भगवद् भजन ही करते थे । शांत स्वभाव के अच्छे संत थे । १४ वें भजनदासजी भी अच्छे विद्ववान्, वैद्य व संगीतज्ञ थे । इनके पश्चात् कोई महन्त नहीं है ।
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१५ लालदासजी - केवलरामजी के पाटवी शिष्य रामदासजी, उनके शिष्य हरिभक्तजी उनके हरिदासजी, उनके लालदासजी हुये हैं । इस प्रकार दादूजी से ७ वें लालदासजी हैं । लालदासजी महान् संत हुये हैं । ये लालदासजी मलाणा वालों के नाम से जोधपुर के आस पास प्रसिद्ध हैं । इनका स्थान मलाणा धाम नाम से पुकारा जाता है ।
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आपके स्थान में एक लाल पत्थर की सवामण की विशाल कुंडी है । लालदासजी के नाम का एक नारेल चढ़ाकर वहां के विशाल जल के कुंड में कुंडी को छोड़ देते हैं । वह जल पर तैरती रहती है । तैरते समय दो इंच पानी के बाहर रहती है, शेष पानी में डूबी रहती है । कुंडी में पानी नहीं भरता है । कहा भी है~
भक्त नाम से पाठ पर, पत्थर भी तिर जाय ।
महलाणे कुंडी तिरे, बहुते लोग सुनाय ॥दृ. त. ६॥
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स्थान में लालदासजी की खड़ाऊ हैं, उनको धोकर पिलाने से हिड़के(पागल) कुत्ते का विष उतरता है । इसके लिये आस पास के लोग वहां ही जाते हैं । अन्य इलाज नहीं कराते हैं । कहा भी है~
संतन के तन संग से जड़ में भी बल आत ।
लालदास की पादुका, अब भी रोग गमात ॥१९३॥दृ. त. ११॥
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लालदासजी को जोधपुर नरेश विजयसिंहजी ने कहा~ कूंडी तैरती है, तब तो शिला भी तैरनी चाहिये । तब लालदासजी जोधपुर के गुलाब-सागर में सागर के पास पड़ा एक पत्थर का स्तंभ तिरा दिया था । लालदास जी के स्थान मलाणा में अब भी प्रति मास की पूर्णिमा को जागरण सत्संग होता है ।
(क्रमशः)

बुधवार, 15 जुलाई 2026

*२१. भजन भेद का अंग ~२१/२४*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*२१. भजन भेद का अंग ~२१/२४*
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*रज्जब भय भगवन्त के, रोम कहें उठ राम ।*
*अऊंट१ कोङि रट एक फल, एक हिये कहि राम ॥२१॥*
ह्रदय में एक राम का चिन्तन करने से राम का वियोग अनुभव होकर राम वियोग भय के द्वारा रोम खङे होकर राम-राम करने लगते हैं, इस प्रकार साढे तीन१ कोटि राम-नाम का जाप एक साथ होता रहता है, उसका एक अद्वैत ब्रह्म की प्राप्ति ही फल होता है ।
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*ऊँचा नीचा होय जग, कर डंडौत निमाज ।*
*रोम रोम रज्जब भया, गुरु गोविन्द के काज ॥२२॥*
जगत् के मनुष्य ऊँचे तथा नीचे होकर दंडवत और नमाज द्वारा उपासना करते हैं किन्तु हमारे तो गोविन्द और गुरु की कृपा रूप कार्य से रोम रोम से ही उपासना हो रही है ।
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*अठारहभार ऊभी भई, आये अविगत१ नांउ२ ।*
*रज्जब जीये रोम रस, सो बेला३ बलि जांउ॥२३॥*
मन इन्द्रियों के विषय परमात्मा१ का नाम२ हृदय में आने से रोमावलि खड़ी हो गई और जिस समय में रोम रोम से चिन्तन द्वारा रसपान करते हुये जीवित रहे, संतों के उस समय३ की मैं बलिहारी जाता हूँ ।
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*रज्जब माया ब्रह्म का, रोम रोम रस पीन ।*
*सो विहड़े१ तिन विछुड़तै, जैसे जल बिन मीन ॥२४॥*
जो माया का चिन्तन रूप रस रोम रोम से पान करता है, वह माया से बिछुड़ने से और जो ब्रह्म का चिन्तन रूप रस-रोम रोम से पान करता है, वह ब्रह्म के वियोग१ से जैसे जल बिन मच्छी मर जाती है, वैसे ही वह भी शरीर का त्याग देता है ।
(क्रमशः)

मंगलवार, 14 जुलाई 2026

३०. ज्ञानी कौ अंग ५/८

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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३०. ज्ञानी कौ अंग ५/८
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बोलत ही अनबोलता, मिलता ही अनमेल । 
सोवत ही अनसोवता, सुन्दर ऐसा खेल ॥५॥
ज्ञान के इस अलौकिक प्रभाव से उस ज्ञानी की ऐसी उच्च स्थिति हो जाती है कि उस की भाषण, मिलन, शयन आदि सभी क्रियाएँ लोक के प्रति उपेक्षा ही प्रकट करती रहती हैं ॥५॥
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बैठैं तैं बैठा नहीं, ऊठत उठ्या न मांनि । 
चलतैं सो चालै नहीं, सुन्दर ज्ञानी जांनि ॥६॥
इसी कारण, सांसारिक जन भी उस ज्ञानी के बैठने को साधारण 'बैठना' नहीं मानते । नहीं उसके खड़े होने को सामान्य 'खड़ा होना' मानने को तय्यार होते हैं । और न उस की चलनक्रिया को ही लौकिक 'चलन क्रिया' मानने की भूल करते हैं ॥६॥
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देत कछू नहिं देत है, लेत कछू नहीं लेइ । 
यह सब जानै स्वप्न करि, सुन्दर ज्ञानी सेइ ॥७॥
उस ज्ञानी के दान में कोई मोह नहीं होता, न ग्रहण(लेना) में कोई लोभ ही होता है । वह तो इन ‘दान’ एवं ‘ग्रहण’ – दोनों ही क्रियाओं को स्वप्न के समान(मिथ्या) ही समझता है । इसी लिये(यथार्थज्ञ होने के कारण ही) ऐसे साधक को ‘ज्ञानी’ मानना चाहिये ॥७॥
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काज अकाज भलौ बुरौ, भेदाभेद न कोइ । 
सुन्दर ज्ञानी ज्ञानमय, देह-क्रिया सब होइ ॥८॥ 
ऐसे ज्ञानवान् साधक की दृष्टि में सभी लौकिक कर्तव्य या अकर्तव्य, शुभ या अशुभ क्रियाओं में कोई भेद या अभेद नहीं होता; क्योंकि वह इन सब को मिथ्या ही मानता है । उस के मत में ये सब क्रियाएँ देह से होती हैं अतः इन का जीवात्मा से क्या सम्बन्ध माना जा सकता है ! ॥८॥
(क्रमशः) 

केवलरामजी के शिष्य

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🌷*卐 श्री दादूदयालवे नम: 卐*🌷
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*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
*सत गुरु किया फेरि कर, मन का औरै रूप ।*
*दादू पंचों पलटि कर, कैसे भये अनूप ॥*
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२- रामदासजी रामदासजी अजमेर से जो केवलरामजी की शरण कायस्थ सज्जन आये थे वे ही केवलरामजी के शिष्य हो गये थे । तब उनका ही नाम रामदासजी रखा था और वे ही केवलरामजी की गद्दी पर विराजे थे ।
७ वें महन्त भगवान् दास जी जोधपुर के अस्थल से आकर गादी पर विराजे थे । ये बड़े प्रारब्धी संत थे ।
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८ वें सूरतरामजी विद्वान् और कवि हुये हैं ।
९वें रामनारायणजी १४ विद्याओं के ज्ञाता थे । उस समय उनके समान कोई अन्य विद्वान् ज्ञात नहीं होता था । कहा भी है~
"पंडित चबदा विद्या निधाना, रामनारायण सदृश न आना ।" आप अच्छे संगीतज्ञ थे । आपका पत्र व्यवहार पंडित निश्चलदासजी महाराज से भी होता रहता था ।
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१० गोविन्ददासजी अच्छे श्रीमान् हुये हैं ।
११ वें बोलतारामजी ख्याती प्राप्त हुये हैं । ये महाराज ध्यानदासजी के शिष्य थे । जाति के क्षत्रिय थे । शिकार करते समय एक बार एक गर्भवती हिरणी के इन्होंने गोली मारी थी । उससे गर्भ का बच्चा और हिरणी दोनों मर गये थे । उससे इनको अति ग्लानि हो गई फिर ये साधु हो गये ।
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वि सं. १९२५ में २५ वर्ष की आयु में साधु हुये थे । परबतसर के पास श्यामपुरा ग्राम के थे । साधु भेष लेने के पश्चात् १५ वर्ष तक तपस्वी रहे । साधु होने के पश्चात् किसी साधु के कुछ कहने पर आपने अपनी मूत्रेन्द्रिय काट दी थी । आपने प्रति दिन सवा लाख जप बहुत समय तक किया था । सुनते हैं आपने चार निस्संतान व्यक्तियों को संतानें दी थीं ।
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महन्त जुगलदासजी के प्राण कई दिन से नहीं निकल रहे थे, वे बहुत कष्ट पा रहे थे । आपने दादूवाणी के अचले का एक कौणा पानी में धोकर उनको पिलाया फिर उनका अनायास देहान्त हो गया था । आपकी कोटा, संगरूर, जयपुर आदि राजघरानों में अति प्रतिष्ठा थी । आप समाधि सिद्ध योगी थे ।
कहा भी है~
"पाछे भये बोलता रामा, ताका प्रसिद्ध जग में नामा ।
योगी भये समाधि लगाई, ताकी कीर्ती जग में छाई ॥"
इनकी गादी पर बैठने वाले महन्त चेतनजी ने उक्त पद्य अपने रचित दादू चरित्र के अन्त में लिखा है । वि.सं. १९७३ में मगसिर सुदि १३ को ब्रह्मलीन हुये । आपकी समाधि बीलू ग्राम में है ।
(क्रमशः)