सोमवार, 25 मई 2026

*१४. भयभीत भयानक का अंग ~२१/२४*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*१४. भयभीत भयानक का अंग ~२१/२४*
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*निडर निलज्ज निश्शंक ह्वै, पूरि करे अपराध ।*
*जन रज्जब जग सौं रचे, परिहर संगति साध ॥२१॥*
जो निडर, निलज्ज और निश्शंक होता है, वह पूर्ण रूप से पाप ही करता रहता है और संतों की संगति को छोड़ कर संसार के पापी प्राणियों से ही प्रेम करता है ।
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*भय भाग्यूं भूले भजन, सत संगति रुचि नाँहिं ।*
*जन रज्जब सेवा गई, संशय नाँहिं माँहिं ॥२२॥*
मृत्यु आदि का भय चले जाने से भगवद् भजन करना भी भूल जाता है सत्संग में भी रुचि नहीं रहती, आत्म विषयक संशय मन में नहीं होने से सद्गुरु तथा संतों की सेवा का भाव भी प्राणी के मन से चला जाता है ।
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*अदब२ अकलि१ में पाइये, शर्म साफ दिल माँहिं ।*
*बे अदबी बे शर्म में, रज्जब रजमा३ नाँहिं ॥२३॥*
ज्ञान१ युक्त में आदर२ का भाव रहता है, साफ हृदय में लज्जा रहती है, आदर भाव से रहित और निर्ज्जल में उन्नतिप्रद योग्यता३ नहीं रहती ।
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*जो तन निपजा तीन करि, न नीतिगि१ साज२ ।*
*जन रज्जब सुत पंच का, करे कौन की लाज ॥२४॥*
शुद्ध माता पिता से उत्पन्न होता है उसमें नीति, लज्जा, पाप कर्म से भय रहता है । जिसमें जार का बिन्दु भी पड़ा हो, वह तीन का पुत्र है उसमें नीतिज्ञ१ होने का साधन२ नहीं होता । जिसके चार जार हैं और एक पति उन पांच से उत्पन्न पुत्र किसकी लज्जा करेगा, अर्थात जो भय रहित व्यभिचारणी नारी का पुत्र हो, वह किस को पिता मान कर लज्जा करेगा ?
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इति श्री रज्जब गिरार्थ प्रकाशिका सहित “१४. भयभीत भयानक का अंग” समाप्त ॥
(क्रमशः) 

*२५. अवस्था कौ अंग ४५/४८*

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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*२५. अवस्था कौ अंग ४५/४८*
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मावस अति अज्ञान कै, निसा अंधेरी कीन । 
ससि आतमा दृसै नहीं, ज्ञान कला करि हीन ॥४५॥
६. अवस्था का अन्य भेद : ४५ से ५१ तक की साषियों द्वारा महात्मा श्रीसुन्दरदासजी ने एक अवस्थाभेद १५ तिथियों में चन्द्रमा के प्रकाश के अनुक्रम-व्यतिक्रम के उदाहरण से समझाया है । इसमें अमावस्या को सुषुप्ति अवस्था(अज्ञान) के समान, प्रतिपदा से दशमी तक अल्प प्रकाश को स्वप्न अवस्था के समान तथा एकादशी से पूर्णिमा तक वर्धमान प्रकाश को जाग्रत् अवस्था बताया गया है ॥४५॥
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है अज्ञान अनादि कौ, जीव पर्यौ भ्रम कूप । 
श्रवन मनन निदिध्यास तें, सुन्दर ह्वै चिद्रूप ॥४६॥
यह अज्ञान अनादि माना गया है । यह जीव भ्रमरूप गहरे गर्त में गिरा हुआ है । जब वह(गुरु उपदेश का) श्रवण मनन एवं निदिध्यासन करता है तभी वह स्वकीय चिद्रूप को समझ पाता है ॥४६॥
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श्रवण सु कहिये प्रतिपदा, ज्ञान कला दरसाइ । 
दुतिया तृतिया चतुर्थी, सुनि पंचमी दिखाइ ॥४७॥
श्रवण : इन तीनों में, प्रतिपदा तिथि को 'श्रवण' माना जा सकता है जिसमें ज्ञान की प्रथम कला उद्भूत होती है । द्वितीया, तृतीया एवं चतुर्थी तथा पञ्चमी तिथि में श्रवण द्वारा उसी ज्ञानकला में वृद्धि होती है ॥४७॥
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मनन किये षष्टी दृसै, अर्थ लेइ पहिचांनि । 
होइ सप्तमी अष्टमी, नवमी दशमी जांनि ॥४८॥
मनन : षष्ठी तिथि में 'मनन' को माना जा सकता है जब जिज्ञासु गुरुपदिष्ट के वाच्यार्थ की वास्तविकता पहचान लेता है । तब सप्तमी, अष्टमी, नवमी एवं दशमी तिथि को इसी मनन के द्वारा ज्ञानकला का विस्तार होता है ॥४८॥
(क्रमशः) 

दीन कौ दयाल दादू

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*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*दादू हमको सुख भया, साध शब्द गुरु ज्ञान ।*
*सुधि बुधि सोधी समझकर, पाया पद निर्वाण ॥*
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*गुरुमहिमा ॥*
दीन कौ दयाल दादू कब मिलै मोहि ।
जिसी घड़ी हूँ तुझै देखौं, मुझकौं सुख होहि ॥टेक॥
तरवर रूप फल अनूप, पंथी टालन घाम । 
सब काहू परि छाया करणा, पँखियाँ कौं विश्राम॥  
आंधा केरी आँखड़ी, पांगुलाँ का पाव ।
पैली पार उतारिणहारा, भौसागर की नाव ॥ 
जा सँगि बहै मुकति कौ मारग, निरभै को भै नांहि ।
जाकौ ग्यान नीसरणी, चढ़ि साधू जन जांहि ॥ 
पारस रूप तत्त अनूप, परस्याँ पलटै भाव ।
दरसन परि बषनौं बलिहारी, बंदि छुड़ावणहार ॥१३०॥
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बषनांजी कहते हैं, दीनों पर दया करने वाले दादूजी महाराज मुझे कब मिलेंगे । जिस क्षण मैं दादूजी महाराज को देखूँगा उसी समय मुझे सुख होगा । वे दादूजी महाराज वृक्ष रूप है जिसमें भक्ति-मुक्ति रूपी अनुपम फल लगते हैं । वह पंथी रूपी साधकों को ज्ञान, भक्ति और वैराग्य रूपी शीतल, मंद और सुगंधित छाया रूपी साधना की प्रक्रिया प्रदान करते हैं । 
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वे पात्रापात्र का बिना विचार किये सभी को भगवद्भक्ति रूपी छाया प्रदान करते हैं तथा परम भगवद्भक्त रूपी पक्षियों को अपने सान्निध्य में विश्राम = रहने का अवसर भी प्रदान करते हैं । वस्तुतः वे अंधों के लिये लकड़ी के समान हैं तथा पंगुओं के लिये पावों के समान हैं । भवसागर के दूसरे किनारे तक ले जाने के लिये वे नाव के समान हैं । 
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जिसका संग करने से संगकर्ता भयमुक्त = विघ्न बाधाओं से भरे मार्ग पर भी निर्भय हुआ चलकर मुक्ति के मार्ग पर निष्कंटक चलता है और जिसका ज्ञान नीसरणि = सीढ़ी रूपा है जिसपर चढ़कर साधु = साधक जन मुक्त हो जाते हैं । दादूजी महाराज अनूपम पारस तत्व रूप हैं जिनके संग से लोहा रूपी संसारी जीव पलटकर कंचन रूपी भक्त बन जाते हैं । मैं बषनां उन बंधनों को काटने वाले दादूजी महाराज के दर्शनों पर न्यौछावर होता हूँ ॥१३०॥

*१४. भयभीत भयानक का अंग ~१७/२०*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*१४. भयभीत भयानक का अंग ~१७/२०*
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*महर१ कहर२ सौं डरपिये, द्वै बिन दिल दिलगीर३ ।*
*त्रिविधि भांति त्रासे रहै, रज्जब पूरण पीर ॥१७॥*
दया१ और क्रोध२ दोनों से ही डरते रहना चाहिये, जो इन दोनों से रहित रहता है, वही मन उदासीन३ रहता है । जो मन वचन कर्म से डरता है, वही अन्त में पूर्ण ब्रह्म को प्राप्त करके सिद्ध अवस्था को प्राप्त होता है ।
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*भय के भाजन१ में रहे, सुकृत सरीखा धन्न ।*
*जन रज्जब निर्भय भये, दह दिशि निकसे मन्न ॥१८॥*
भय रूप पात्र१ में ही पुण्य के समान धन रहता है अर्थात डरते रहने से ही पाप कर्म नहीं होते और पुण्य की रक्षा होती है । निर्भय होने मन दश इन्द्रिय रूप दशों दिशां से निकलकर पाप कर्म करने से प्रवृत होता है ।
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*भाव भक्ति भय बिन नहीं, भय बिन भजे न राम ।*
*रज्जब भय बिन भ्रष्ट ह्वै, भय बिन सरे न काम ॥१९॥*
भय बिना श्रद्धा तथा भक्ति नहीं होती, भय बिना कोई भी अज्ञानी राम को नहीं भजता, भय बिना इच्छानुसार पाप कर्म करके प्राणी भ्रष्ट हो जाता है, मृत्यु आदि के भय बिना मुक्ति रूप कार्य भी नहीं सिद्ध होता है ।
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*रज्जब सब डर निडर को, निर्भय को भय पूर ।*
*निर्संशय संशय घणा, प्रत्यक्ष प्राण हजूर ॥२०॥*
जो पाप कर्म से नहीं डरता उसके पिछे सभी प्रकार के भय लगे रहते हैं । जो ईश्वर से नहीं डरता उसके लिये सब विश्व भय से पूर्ण है । जो अपने को निर्संशय मानता है, उसमें बहुत संशय रहते हैं । ईश्वर, संत, शास्त्र और पाप कर्म से नहीं डरता, इच्छानुसार करता है उस प्राणी का फल उसके सामने प्रत्यक्ष ही आ जाता है ।
(क्रमशः)

शनिवार, 23 मई 2026

*१४. भयभीत भयानक का अंग ~१३/१६*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*१४. भयभीत भयानक का अंग ~१३/१६*
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*भय मिल सब कारज सरैं, भय मिल निपजे साध ।*
*रज्जब अज्जब ठौर डर, डर घर अगम अगाध ॥१३॥*
विचार पूर्वक भय युक्त कार्य करने से भी सभी कार्य सिद्ध होते हैं, मृत्यु आदि के भय से युक्त रहने से ही मन में साधु-पना उत्पन्न होता है । भयरूप स्थान अदभुत है तथा भयरूप घर में निवास करने से प्राणी अगम अगाध ब्रह्म को प्राप्त होता है ।
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*भय मधि भूत भला रहे, डर सौं डिगे सु नाँहिं ।*
*संशय सोच सहाय को, मुनि सुमिरें मति माँहिं ॥१४॥*
वृत्ति में भय रहने से प्राणी अच्छा रहता है अर्थात पाप कर्मों में प्रवृत नहीं होता, भय के कारण ही अपने धर्म कार्यों से नहीं डिगता । संशय और शोक के सहायक भय मुनि भी अपनी मति में चिन्तन करते हैं अर्थात मुनि भी डरते हैं, तभी वे सदा स्वधर्म में स्थित रहते हैं ।
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*भाव भक्ति का मूल भय, भय कर भजिये राम ।*
*रज्जब भय मिल भृत्य१ ह्वै, भय में सीझे काम ॥१५॥*
भय-भाव तथा मुक्ति का कारण है, चन्मादि भय से डर के ही राम का भजन किया जाता है । जो जन्मादि भय से युक्त होता है, वही राम का भजन करके भक्त१ होता है । संसार-बन्धन से डरता है तभी मुक्ति का साधन करता है और साधन से ज्ञान द्वारा मुक्ति रूप कार्य सिद्ध होता है ।
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*महर कहर तैं डरपिये, करत हरत क्या वेर ।*
*ता थैं भय भागे नहीं, रज्जब समझ्या फेर ॥१६॥*
दया युक्त तथा क्रोध युक्त दोनों ही व्यक्तियों से डरते रहना चाहिये, कारण क्रोधी को क्रोध करते क्या देर लगती है और दयालु को दया त्यागते क्या देर लगती है । इसलिये हृदय से भय से भय नहीं भागना चाहिये । हमने इनके परिवर्तन को भली प्रकार समझ लिया है, अत: डरते रहते ही सब काम करना चाहिये ।
(क्रमशः)

*२५. अवस्था कौ अंग ४१/४४*

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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*२५. अवस्था कौ अंग ४१/४४*
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ऋषभदेव बोले नहीं, रहे ब्रह्ममय होइ । 
गरक भये निज ज्ञान मैं, द्वैत भाव नहिं कोइ ॥४१॥
तृतीय(वरिष्ठ) प्रकार के सिद्धों में ऋषभदेव जी की गणना हो सकती है, जो जीवनपर्यन्त ब्रह्ममय होकर ही रहे । वे उस ब्रह्ममय ज्ञान में ऐसे निमग्न हुए कि उनमें द्वैत भाव का कुछ भी अंश नहीं रह गया ॥४१॥
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जाग्रदवस्था जानिये, जबहिं होइ साक्षात । 
अष्टावक्र वसिष्ट मुनि, कही सबनि सौं बात ॥४२॥
ब्रह्मसाक्षात्कार होने पर योगी की वह जाग्रत् अवस्था कहलाती है; इस अवस्था में पहुँचने पर अष्टावक्र एवं वसिष्ठ मुनि ने उस ब्रह्मज्ञान का जनसामान्य को भी उपदेश किया ॥४२॥
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स्वप्न अवस्था मांहिं है, पूछै बोलै सैंन । 
दत्तात्रय सुकदेवजी, कहे कछूइक बैंन ॥४३॥
ऐसे योगी की स्वप्नावस्था वह कहलाती है, जब वह किसी जिज्ञासु के पूछने पर ब्रह्मज्ञानविषयक संक्षिप्त वचन बोलता है या वैसा संक्षिप्त संकेत करता है । श्रीदत्तात्रेय या श्रीशुकदेव इसके श्रेष्ठ उदाहरण हैं ॥४३॥
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सुषुपति मैं कछु सुधि नहीं, ऐसी परम समाधि । 
ऋषभदेव चुप करि रहे, छूटी सकल उपाधि ॥४४॥
सुषुप्ति अवस्था में पहुँचे हुए सिद्ध को लौकिक व्यवहार की कोई सुध बुध(ज्ञान) नहीं रहती । वह सदा उच्चतम समाधि में रत रह कर निरन्तर ब्रह्मज्ञान में निमग्न रहता है । ऋषभदेव इस अवस्था के ज्वलन्त उदाहरण हैं । ब्रह्मज्ञान की तीव्रता के कारण उन के सभी लौकिक विकार क्षीण हो चुके थे ॥४४॥ (५)
(क्रमशः) 

गुरमहिमा ॥

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*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*सो धी दाता पलक में, तिरे तिरावण जोग ।*
*दादू ऐसा परम गुरु, पाया किहीं संजोग ॥*
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*गुरमहिमा ॥*
मोहि मिलिया रामसनेही रे । मेरी जिव की जीवनि एही रे ॥टेक॥
पूरिबले पुनि पाया रे । सो भागि हमारे आया रे ॥ 
भगति मुकति का दाता रे । सो येक राम का राता रे ॥
उन साधन का सँग भावै रे । जन बषनौं मंगल गावै रे ॥१२९॥

“दुर्लभो मानुषो देहो क्षणभंगुरः । 
तत्रापि दुर्लभः मन्ये वैकुण्ठप्रिय दर्शनम् ॥” 
भागवत स्कंध ११ ॥ 
महात्माओं का दर्शन मात्र भी बड़े भाग्य से मिलता है । यदि उनका सान्निध्य मिल जाये, फिर उनका मार्गदर्शन भी मिल जाये तो कहना ही क्या है । 
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बषनांजी इसी भावना को व्यक्त करते हे कहते हैं – मुझे रामजी से सच्चा स्नेह करने वाले महाराज दादूजी मिल गये हैं जो मेरे जीवन के जिवनि = सर्वस्व हैं । मैंने उन्हें पूर्वजन्म में किये किन्हीं पुण्यों के उदय हो आने के कारण पाया है । वस्तुतः वे तो जीवन्मुक्त भगवत्स्वरूप थे किन्तु हमारे भाग्य = पुण्यकर्मों के उदय होने के कारण वे इस समय इस धराधाम पर पधारे । 
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वे भक्ति और मुक्ति दोनों ही के देने वाले हैं । वे एक निर्गुण-निराकार-परात्पर-परब्रह्म-राम में ही निमग्न रहने वाले हैं । बषनां कहता है, मुझे उक्त वर्णित लक्षणों वाले संतों का संग करना ही रुचिकर व प्रिय लगता है । अतः जन = भक्त बषनां ऐसे संतों के मिलन पर मंगल गान करता है ॥१२९॥

शुक्रवार, 22 मई 2026

*२५. अवस्था कौ अंग ३७/४०*

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
*२५. अवस्था कौ अंग ३७/४०*
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दूजौ रहै समुद्र मैं, सीस दिखावै आइ । 
पूछै बोलै बचन कौं, फेरि तहां छिपि जाइ ॥३७॥
दूसरा(वरीयान्) सिद्ध यद्यपि अधिक समय ब्रह्मामृत समुद्र में ही गोता लगाने में व्यतीत करता है; परन्तु कभी कभी उसमें से निकलकर किसी विशिष्ट जिज्ञासु की ब्रह्मविषयक जिज्ञासा भी शान्त करता है, तदनन्तर वह पुनः उसी ब्रह्मसमुद्र में गोता लगाने लगता है ॥३७॥ (२)
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ब्रह्मानंद समुद्र तैं, तीजौ निकसै नांहिं । 
गहरै पैठौ जाइ कै, मगन भयौ ता मांहिं ॥३८॥
तृतीय(वरिष्ठ) सिद्ध ब्रह्मानन्द समुद्र से बाहर कभी निकलता ही नहीं । वह तो निरन्तर(जीवनपर्यन्त) उसी ब्रह्मानन्द समुद्र में ही गोता लगाये रहता है और उसी में मग्न रहता है ॥३८॥ (३)
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अष्टावक्र वसिष्ट मुनि, प्रगट कियौ निज ज्ञांन । 
क्रम ही क्रम उपदेश करि, कीये ब्रह्म समांन ॥३९॥
उदाहरण : इन त्रिविध सिद्धों में प्रथम(वर) सिद्ध के लिये अष्टावक्र एवं वसिष्ठ ऋषि का उदाहरण दिया जा सकता है; जिन ने स्वरचित ग्रन्थों द्वारा जनसामान्य को ब्रह्मज्ञान का क्रमिक उपदेश कर उनमें से बहुतों को ब्रह्म कोटि में पहुँचा दिया ॥३९॥
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दत्तात्रय शुकदेवजी, बोले बचन रसाल । 
नृपति परीक्षत भूप जदु, मुक्त किये ततकाल ॥४०॥
द्वितीय(वरीयान्) प्रकार के सिद्धों में दत्तात्रेय एवं शुकदेव की गणना होती है । इनमें से शुकदेव ने राजा परीक्षित को, एवं दत्तात्रेय ने जदु को ब्रह्मज्ञान का ऐसा गम्भीर उपदेश किया कि वे तत्काल मुक्त हो गये ॥४०॥
(क्रमशः) 

बिछड़्या रामसनेही रे

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*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*ना वह मिलै, न हम सुखी, कहो क्यों जीवन होइ ।*
*जिन मुझको घायल किया, मेरी दारु सोइ ॥*
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राग मल्हार ॥१०॥ गुरु वियोग जन्य विरह ॥ 
बिछड़्या रामसनेही रे । म्हारै मन पछतावो एही रे ॥टेक॥ 
बीछुड़ियाँ बन दहिया रे । म्हारै हियड़ै करबत बहिया रे ॥
बिलखी सखी सहेली रे । ज्यूँ जल बिन नागर बेली रे ।
व मुलकनि की छबि छाँही रे । म्हारै रहि गई हिरदै माँही रे ॥
कोइ उहि उणिहारै नांही रे । हौं ढूंढि रही जग मांही रे ॥
अब फीकौ म्हारै भाँई रे । मँडली कौ मंडण नाँही रे । 
कौंण सभा मैं सोहै रे । जाकी निर्मल बाणी मोहै रे ॥
भरि भरि प्रेम पिलावै रे । कोइ दादू आणि मिलावै रे । 
बषनां बहुत बिसूरै रे । दरसणि कै कारणि झूरै रे ॥१२८॥
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यह पद बषनांजी ने दादूजी महाराज के परलोकगमन के उपरान्त वियोग जन्य विरह के अत्यधिक उत्पन्न होने पर बनाकर गाया था । इस पद में व्यक्त भावनाओं से लगता है बषनांजी का दादूजी के प्रति मानसिक लगाव तो था ही शारीरिक लगाव भी कम नहीं था । उनके तन-मन और वचन तीनों में ही दादूजी समाये हुए थे । 
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वे कहते हैं, राम से स्नेह करने वाले दादूजी महाराज आज मुझसे शरीररूपेण बिछुड़ गये हैं । मेरे मन में इसका गहरा पश्चाताप = दुःख है । उनके बिछुड़ जाने से मेरा मन रूपी वन धधक रहा है । ह्रदय पर करवत = आरा फिर रहा है । हम सभी शिष्य-प्रशिष्य रूपी सखी-सहेलियाँ वियोग के कारण उसी प्रकार बिलख-बिलख कर कुम्हला रही हैं जैसे बिना जल की नागरवेल कुम्हला जाती है । 
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दादूजी महाराज की मुस्कराती हुई उस आकृति की मेरे हृदय में अब प्रतिकृति(छाँही) मात्र ही रह गई है ।  उनकी जैसी आकृति अब संसार में और कोई रही नहीं है । मैं विरहणी उसको पूरे संसार में ढूंढ रही हूँ । मेरे लिये(म्हारै भाँई) सारा संसार ही सारहीन हो गया है क्योंकि मेरी मंडली को शोभा देने वाला प्रधान अब इस दुनिया में नहीं रहा है । 
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अब ऐसा कौन है जो रामसभा में शोभायमान होगा = विराजेगा जिसके निर्मल उपदेशों से संसार-सागर में डूब रहे अज्ञानी लोग प्रभावित होकर राम-रस-रसिक बनेंगे । वे राम-रस में छके राम प्रेम का रस सभी को प्याला भरकर पिलाते थे । ऐसे दादूजी को कोई पुनः लाकर मुझसे मिलादे, बस यही हृदयेच्छा है । बषनां उनको पल-पल, क्षण-क्षण बिसूरता है = याद करता है । उनके दर्शन नहीं हो रहे हैं, इस कारण सदैव झूरै = रोता रहता है ॥१२८॥ 

*१४. भयभीत भयानक का अंग ~९/१२*

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*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*१४. भयभीत भयानक का अंग ~९/१२*
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*जे सांई का सोच ह्वै, तो मन फूले नाँहिं ।*
*जन रज्जब सिमट्या रहै, ज्यों अजा उभयसिंह माँहिं ॥९॥*
दो सिंहो के पींजरो के बीच में बाँधकर रक्खी गई बकरी को कितना ही खिलाओ वह मोटी नहीं होती, वैसे ही यदि ईश्वर का भय हो तो मन सांसारिक विषयों से नहीं फूलता, संकुचित ही रहता है ।
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*रज्जब राम न भूलिये, जे मीच रहै मन माँहिं ।*
*याद करन को आदमी, या सम ओर सु नाँहिं ॥१०॥*
यदि मृत्यु का भय मन में रहे तो प्राणी राम को नहीं भूल सकता । हे मानव ! भगवान् को याद कराने का साधन इस मृत्यु भय के समान अन्य कोई भी नहीं है ।
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*रज्जब डर घर साधु का, महा पुरुष रहै माँहिं ।*
*तिन के सब काज सरे, जु बाहर निकसे नाँहिं ॥११॥*
संतों का स्थान भय ही है, महापुरुष भय में ही निवास करते हैं अर्थात मृत्यु, बुराई, आसुर गुणादि से सदा ही डरते रहते हैं, जो मृत्यु आदि के भय से मन को बाहर नहीं जाने देते उनके सभी कार्य सिद्ध हो जाते हैं ।
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*रज्जब डर डेरा बडा, बडे रहैं बिच आय ।*
*भय को भय लागे नहीं, नर देखो निरताय ॥१२॥*
भय रूप स्थान महान् है, बड़े पुरुष भी निर्भयता से बुरे कर्म करने की स्थिति से आकर भय में ही रहते हैं अर्थात बुराइयों से डरते रहते हैं । हे नरों ! जो स्वयं भय में स्थित है उसको भय नहीं लग सकता ।
(क्रमशः)

*२५. अवस्था कौ अंग ३३/३६*

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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*२५. अवस्था कौ अंग ३३/३६*
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बर सौ जीवनमुक्त है, तुरिया साक्षीभूत । 
लिपै छिपै नहिं सब करै, अनकरता अवधूत ॥३३॥
वर(उच्च) उस ज्ञानी पुरुष को कहते हैं जो जीवन्मुक्त१ हो चुका है । तथा जो तुर्यावस्था को अतिक्रान्त कर साक्षीभूत अवस्था में पहुँच चुका हो । जो सब कुछ करता हुआ भी लोक व्यवहार में कहीं आसक्त या लिप्त नहीं होता । तथा उस का समस्त व्यवहार अवधूत के समान होता है ॥३३॥ 
(१ जीवन्मुक्त अवधूत के लक्षण :
क्लेश-पाश-तरङ्गाणां कृन्तनेन विमुण्डनम् ।
सर्वावस्थाविनिर्मुक्तः सोऽवधूतोऽभिधीयते ॥ 
सि० सि० प०, पृ० ८३
गते न शोकं विभवे न वाञ्छां, प्राप्ते न हर्षं न करोति योगी ।
आनन्दपूर्णो निजबोधलीनो न बाध्यते कालपथेन नित्यम् ॥ 
सि० सि० प०, पृ० ९७)
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महा मुक्त अक्रिय सदा, सो कहिये बरियान । 
तुरिया तुरियातीत कै, मध्य कहैं सज्ञान ॥३४॥
वरीयान्(उच्चतर) सिद्ध उसे कहते हैं जो लौकिक व्यवहारों से सर्वथा मुक्त हो, तथा लौकिक वैदिक कर्मों का भी सर्वथा त्याग कर चुका हो । इसकी स्थिति ज्ञानियों ने तुर्य एवं तुर्यातीत के मध्य बतायी है ॥३४॥
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जाकी गति न लखि परै, सो कहिये जु बरिष्ट ।
तुरीयातीत परातपर, बचन परै उतकृष्ट ॥३५॥
तथा वरिष्ठ(उच्चतम) सिद्ध उसे कहते हैं जिस की क्रियाओं को पहचाना या समझा न जा सके । वह तुर्यातीत, परात् पर(ब्रह्म) के विषय में उत्कृष्ट वचन बोलता है ॥३५॥
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ब्रह्म समुद्र जहां तहां, ता महिं तीनौं लीन । 
एक किनारे आइ करि, सब कौं सिक्षा दीन ॥३६॥
यद्यपि ये तीनों ही प्रकार के सिद्ध निरन्तर ब्रह्मामृत समुद्र में गोता(डुबकी) लगाये रहते हैं; परन्तु उनमें से एक(वरसिद्ध) प्रायः किनारे(लोक में) आकर सामान्य जन को ब्रह्म की शिक्षा(ब्रह्मविषयक ज्ञान) भी देता रहता है ॥३६॥ (१)
(क्रमशः)

राम रसि रातौ मनाँ

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*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*दादू क्या बल कहा पतंग का, जलत न लागै बार ।*
*बल तो हरि बलवंत का, जीवै जिहिं आधार ॥*
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*शूरातण ॥*
राम रसि रातौ मनाँ खेत बुहारै रे ।
अरिदल परदल पांचौं पारै, सहजि सुरति सौं मारै रे ॥टेक॥
सील सनाह खिमां करि खेड़ी, सत हथियार सँवाहै रे ।
कपट किवाड़ कनारै कीया, बिसर्यौ पांचौं बाहै रे ॥
लागै लड़ै पड़ै फिरि ऊठै, अंतरि इसी उभारै ।
बिकराल भुवाल अखाड़ै ऊतरि, हरि हरि कहै न हारै ॥
साच सोर तिहि ठौर सुरति दे, ब्रह्म अग्नि सौं लाया ।
काम किरोध पलीतै पहलै, गुर कै ग्यानि गुड़ाया ॥
हूई हबसधबस धरणी मैं, नादैं गगनैं गाज्या ।
जीती राड़ि तहाँ मन हार्यौ, अनहद बाजा बाज्या ॥
गंग जमुन बिचि अंतरि बेध्या करणाँ था सो करिया ।
बषनां बिड़द दियौ हरि त्याँहनैं, झूझ्या ते ऊबरिया ॥१२७॥
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साधक रूपी शूरवीर राम-नाम के रस में निमग्न होकर मन रूपी खेत में से नाना वासनाओं रूपी झाड़-झंखाड़ों को उखाड़-उखाड़ कर बाहर करता है । पाँच = शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध रूपी शत्रुसमूह के सैनिकों को सहज = वशीकृत मनोवृत्ति से मारता है । साधक रूपी शूरवीर शील रूपी कवच पहनता है ।
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क्षमा की खेड़ी को सत रूपी हथियारों में लगाकर उन्हें हाथों में धारण करता है । (खेड़ी शुद्ध लोहे को कहा जाता था जो धारदार हथियारों को बनाने में काम आता था क्योंकि इस लोहे में लोच अधिक होने से धार अच्छी बैठती थी ।) कपट रूपी किंवाड़ों को हटाकर एक ओर करता है । बिसर्यौ = युद्ध में रत हुआ शूरवीर पाँचों अरिदल के उक्त योद्धाओं को बाहै = भगाता है । वे पुनः आकर लागै = अपना प्रभाव दिखाने का प्रयत्न करते हैं । यह शूरवीर उनसे लड़ता है, हारकर गिरता है किन्तु हार मानकर पड़ा नहीं रहकर उठता है और युद्ध करता है ।
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इस प्रकार से साधक रूपी शूरवीर अंतरि = अंदर ही अंदर शत्रुओं से लड़ता रहता है । लड़ाई का सिलसिला जारी रखता है । भयंकर युद्धस्थल में एकबार युद्धार्थ संनद्ध हो जाने पर ‘हर हर महादेव’ की ध्वनि रूपी राम-नाम स्मरण निरंतर करता हुआ शत्रुओं से हारता नहीं है । साच रूपी बारूद को सुरति रूपी युद्धस्थल में रखकर ब्रह्म रूपी अग्नि को जलाता है और काम, क्रोध आदि को गुरुज्ञान के पलीते से सर्वप्रथम गुड़ाया = भस्म करता है ।
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“काम एष क्रोध एष रजोगुणसमुद्भवं ।
महाशनो महापाप्मा विध्देनमिहवैरिणम्॥”
शरीर रूपी धरती पर भयंकर हबस-धबस = मारकाट होती है जिससे गगन में नाद गूंजता है । शरीर में रामनाम की साधना तीव्रता पूर्वक होती है जिससे समस्त दुर्गुण दुराचार समाप्त हो जाते हैं । उनकी चीख चिल्लाहट होती है किन्तु रामनाम सहस्त्रार में पहुँचकर अनहद नाद सुनने लगता है । सहस्त्रार में अनहद नाद परिव्याप्त हो जाता है ।
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शूरवीर रूपी साधक मन रूपी शत्रु को हराकर जीत जाता है = परमात्मा को पा लेता है । खुशी का बाजा रूपी अनहद नाद बजता है । इड़ा-पिंगला के मध्य रहने वाली सुषुम्ना को बेधते हुए सुरति और शब्द सहस्त्रार में पहुँच गये । शूरवीर रूपी साधक को जो करना था सो कर लिया । अर्थात् शत्रुओं को मारकर अपरोक्षानुभूति करनी थी जो कर ली । बषनां कहता है जिन्होंने शत्रुओं से युद्ध किया है वे ही जीते हैं और हरि रूपी राजा ने इन्हीं सैनिकों को = साधकों का यशभाजन बनाया है = दर्शन दिया है ॥१२७॥

गुरुवार, 21 मई 2026

*१४. भयभीत भयानक का अंग ~५/८*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*१४. भयभीत भयानक का अंग ~५/८*
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*चंदन संगति चंदनी, पारस कचंन होय ।*
*कीट भृंग भय मिल भये, तो डर सम और न कोय ॥५॥*
चंदन का संग होने से वनी चन्दन के भय से चन्दनी(चंदन की गंध से युक्त) हो जाती है । पारस के भय से लोहा स्वर्ण बन जाता है । भृंग के भय से कीट भृंग हो जाता है । अत: पूर्व स्थिति बदलने में निपुण भय के समान अन्य कोई भी नहीं है ।
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*जन रज्जब सात्त्विक१ लिये, गरीबी गरकाब२ ।*
*तो प्राणी पानी जमे, मारग ह्वै सिर आब३ ॥६॥*
पानी शीत के भय से जमता है तब उसकी चमक१ बढ़ जाती है, वैसे ही ईश्वर भय से प्राणी में सात्त्विकता२ आती है तब उसका अभिमान नष्ट हो जाता है और वह गरीबी में निमग्न रहता है, इस भय के मार्ग से प्राणी के शिर की शोभा३ बढ़ जाती है ।
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*निर्भय नटनी पुहमि१ पर, बरत२ चढे भय भीत ।*
*त्यों रज्जब चढ़ सुरति पर, भय मिल होय अतीत३ ॥७॥*
पृथ्वी१ पर नटनी निर्भय रहती है तब तो उसे धन्यवाद नहीं मिलता, रस्से२ पर चढ़कर गिरने के भय से भीत होती है तब ही दर्शक उसे धन्यवाद देते हैं । वैसे ही जो साधक ब्रह्माकार - वृत्ति पर आरूढ़ होकर ब्रह्म भिन्न वृत्ति न हो जाय इस भय से युक्त रहता है, वह सर्व प्रपंच से अलग३ होकर ब्रह्मरूप हो जाता है तब ही उसे धन्यवाद मिलता है ।
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*ज्यों जहाज के थंभ शिर, रह्या काक तज तेज ।*
*त्यों रज्जब भय भीत ह्वै, करहु नाम सौं हेज१ ॥८॥*
काक पक्षी अपने देश की ओर मुख कर बैठता है, अत: दिशाज्ञान के लिये जहाज में काक पक्षी रखते थे और समुद्र में दूर जाने पर छोड़ देते थे समुद्र में अन्य स्थान बैठने को मिलता न था तब वह अपने तेज-बल का त्याग करके भयभीत हुआ जहाज के स्तंभ पर ही बैठ जाता था । वैसे ही मृत्यु आदि के भय से डरकर ईश्वर नाम-चिन्तन में ही प्रेम१ करो ।
(क्रमशः)

*२५. अवस्था कौ अंग २९/३२*

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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*२५. अवस्था कौ अंग २९/३२*
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सुषुपति ही मैं स्वप्न है, जागै बक्रित चित्त । 
कछूक बार लखै नहीं, सुन्दर चित्त अबित्त ॥२९॥
सुषुप्ति अवस्था में स्वप्न अवस्था आने पर उस मनुष्य का चित्त कुछ भ्रान्त रहता है; अतः कभी उसे, चित्त के व्यवस्थित रहने पर, वे घटनाएँ स्मरण रहती हैं, परन्तु कभी कभी चित्त के भ्रान्त होने पर, उसी को वे घटनाएँ स्मरण नहीं भी रहतीं ॥२९॥
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सुषुपति मैं सुषुपति उहे, सुख अनुभवै प्रभाति । 
सुन्दर जागैं कहत है, सुख सौं सूते राति ॥३०॥
जब सुषुप्ति अवस्था सुषुप्ति अवस्था में ही पहुँच जाती है तो जाग्रदवस्था में आने पर वह मनुष्य दूसरों को इस प्रकार सुनाता है कि "मैं रात्रि में बहुत सुखपूर्वक सोया"(सुखमहमस्वाप्सम्) ॥३०॥
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तीन अवस्था भेद है, तीनौं ही भ्रमकूप ।
चौथी तुरिया ज्ञानमय, सुन्दर ब्रह्म स्वरूप ॥३१॥
श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - ये तीन अवस्था - भेद बता दिये गये । ये तीनों ही भ्रम के गहरे गर्त(कूप) के समान हैं । इनके बाद चतुर्थ अवस्था तुर्य अवस्था कहलाती हैं । यह पूर्ण ज्ञानमय एवं ब्रह्म का साक्षात्कार कराने वाली है ॥३१॥
[महात्मा, सिद्ध एवं गुरु की तीन श्रेणियाँ होती हैं - वर, वरीयान् एवं वरिष्ठ । श्रीसुन्दरदासजी के अनुसार, वर के उदाहरण हैं - अष्टावक्र एवं वशिष्ठ मुनि । वरीयान् अवस्था के उदाहरण माने जा सकते हैं - दत्तात्रेय एवं शुकदेव मुनि । तथा ऋषभ देव वरिष्ठ श्रेणि में आते हैं । महात्मा श्रीसुन्दरदासजी अब इन तीनों श्रेणियों का विस्तृत व्याख्यान कर रहे हैं - ]
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बर बरियान बरिष्ट पुनि, तीनहुं कौ मत एक । 
भिन्न भिन्न ब्यौहार है, सुन्दर समुझे बिबेक ॥३२॥
५. अवस्थाओं का अन्य भेद : अवस्थाओं का एक भेद १. वर, २. वरीयान् एवं ३. वरिष्ठ भेद से भी है । यद्यपि इन तीनों के मत(सिद्धान्त) समान ही हैं । हाँ, तीनों के व्यवहार में अवश्य अन्तर है । उस अन्तर को ही विवेकपूर्वक समझ लेना चाहिये ॥३२॥
(क्रमशः)

घणनामी तणैं मारगि माल्हताँ

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*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*दुहुँ बिच राम अकेला आपै, आवण जाण न देहि ।*
*जहँ के तहँ सब राखै दादू, पार पहुँचे तेहि ॥*
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राग सिंधूड़ौ ॥९॥भेष॥
घणनामी तणैं मारगि माल्हताँ, बिरलौ कोइ एक पार गहै । 
सूरा जाँहिं काँदरै काइर, पखाँ दहूँ बिचि बाट बहै ॥टेक॥
हिन्दू तुरक दोउ दल झूँब्या, बाणी बचन न बीसरियौ । 
लड़तौ जुड़तौ सूरापण करतौ, नामौं एणैं मारगि नीसरियौ 
बेद कुराणाँ मुसलमाना, इनमैं अचिरज येह भयौ । 
दहूँ दलाँ नैं लोह लगायौ, येणैं पंथ कबीर गयौ ॥
सोझौ सेन पीपौ पाखरियौ, जन रैदास नीषेड़ि खिड़ी । 
वै अविनासी नगरि पहूँता, बीजी परजा भूलि पड़ी ॥
गोरख हणूँ भरथरी सुखदेव, करता आया तिमैं कियौ । 
बषनां दोस किसौ दादू नैं, पंथ पुरातम सोधि लियौ ॥१२६॥
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“मनुष्याणां सहस्त्रेषु कश्चिद्यतति सिद्धये । 
यततामपि सिद्धानां कश्चिन्माम् वेत्ति तत्त्वतः ॥ गीता ॥७|३॥” 
गीता के इस श्लोक में व्यक्त भावना ही उक्त पद का मुख्य स्वर है । बषनांजी कहते हैं, परमात्मा की प्राप्ति के मार्ग पर चलने वालों में से कोई एक विरला ही पूरे मार्ग को पार करके परमात्मा को प्राप्त कर पाता है । जो शूरवीर होते हैं वे तो साधना रूपी मार्ग पर हर परिस्थिति में अग्रसर होते रहते हैं किन्तु जो कायर होते हैं वे काँदरै = भयभीत होकर दोनों ही मार्गों के बीच के रास्ते पर चलते हैं । 
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(जो संसार के विषयभोग, काम-क्रोध, लोभ-मोह, मद-मात्सर्यादि समस्त दुर्गुण दुराचारों का दमन करता हुआ परमात्मा का अहर्निश भजन-ध्यान करता है वह शूरवीर है । इसके विपरीत जो परमात्मा की भक्ति करके मुक्ति को चाहता है किन्तु संसार तथा संसार के आकर्षण सुख-सुविधाएँ नहीं छोड़कर परमात्मा की भक्ति भी करता है तथा संसार में भी रागसहित वर्तता है, वह कायर है । सुख-सुविधाओं को छोड़ते हुए भय खाता है तथा यमराज के दुखों को सुनकर भी भय खाता है । अतः दोनों ही मार्गों का अवलम्बन करता है । परिणामस्वरूप न राम मिलता है और न आराम ही मिलता है ।) 
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अपने-अपने ग्रंथों में लिखे वचनों को विस्मृत नहीं करके उल्टे स्मरण कर-करके हिन्दू तथा मुसलमान दोनों ही पक्षों के लोग आपस में झूब्या = खूब लड़े । इन लड़ते हुओं तथा जुड़ते हुओं के मध्य ही में से आन्तरिक शत्रुओं का संहार करता हुआ शूरवीर नामदेव इसीमार्ग से गमन करके परमात्मा को प्राप्त हो गया । वेदों ने अनुयायी हिन्दुओं तथा कुरान को मानने वाले मुसलमानों के मध्य में एक अद्भुत आश्चर्य हुआ । 
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इन दोनों ही सिद्धान्तों की खरी आलोचना करके, उनकी गलतियाँ बताकर कबीर ने एक तीसरा ही निराला पंथ प्रकट कर दिया और उस पर चलकर वह परमात्मा को पा गया । सोझा, सेन नाई, राजा पीपा खींची, और रैदास चमार ने राम-नाम रूपी पाखरियौ = कवच पहनकर भक्ति रूपी निसेनी (निश्रेणी = सीढ़ी) तैयार की जिसपर चढ़कर वे अविनाशी परमात्मा रूपी नगर में सहजरूप में ही पहुँच गये । जिन दुनियावी लोगों ने उनका अनुगमन नहीं किया, वे भ्रम-भूल में पड़े रह गये । 
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जिस रास्ते का आश्रय लेकर योगीराज गोरक्षनाथ, भक्तप्रवर ज्ञानी नाम अग्रगण्य हनुमान, भर्तृहरि, शुकदेव मुनि आदि साधना के क्षेत्र में आगे अग्रसर हुए उसी रास्ते = सिद्धान्त का अवलम्बन लेकर दादूजी ने सत्य-सनातन-पुराण-पुरुषोत्तम – परमात्मा का रास्ता शोधकर जनता के सामने प्रस्तुत किया है, तो बताइये, इसमें दादूजी का क्या दोष है । दादूजी ने  क्या नया कर दिया । क्या भ्रष्ट कर दिया जनता को ॥१२६॥ 


*१४. भयभीत भयानक का अंग ~१/४*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*१४. भयभीत भयानक का अंग ~१/४*
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*भै मिल आतम यूं बँधे, ज्यों जल शीत हि लाग ।*
*रज्जब अचरज देखिया, कुंभ काया दे त्याग ॥१॥*
जैसे शीत लगने से जल का पिंडा बँध जाता है और ऐसा आश्चर्य देखा जाता है कि - घड़े का त्याग करके भी फैलता नहीं, वैसे ही भय से प्राणी बंध जाता है और शरीर का त्याग करने पर भी जिसका भय है उसको त्यागता नहीं, अर्थात जिससे डरता है उसीके आकार वृत्ति रहती है ।
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*समझ शीत लागे जमहि, प्राणी पाणी दोय ।*
*फूटे में सारे रहैं, रज्जब देखा जोय ॥२॥*
शीत लगने से जल जम जाता है और बर्तन फूटने पर भी बर्फ साबित रहता है, वेसे ही विचार पूर्वक भय से प्राणी एक स्थिति में स्थिर रहता है और किसी अंग विशेष के टूटने पर भी डिगता नहीं, यह हमने देखा है और हे साधक ! तू भी इस स्थिति में आकर देख ।
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*जमै जीव जल ठाहरे, रायल१ काया कुंभ ।*
*रज्जब पिधले बह चले, देखो आतम अंभ२ ॥३॥*
जल२ शीत से जम जाने से तो दरार१ वाले घड़े में ही ठहर सकता है और ताप के द्वारा पिधलते ही बह चलता है, वैसे ही जीव जन्मादि दु:ख के भय से उपासना करके ब्रह्म में स्थिर होने से तो नाना छिद्रों वाला शरीर में भी स्थिर रहता है और विषयाशा ताप से तपने से पिघलकर अर्थात चंचल होकर विषयों की ओर बह चलता है ।
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*भयभीत बिना भूले नहीं, देह विदेह न होय ।*
*जन रज्जब दृष्टांत कूं, कीट भृंग ले जोय ॥४॥*
जन्मादिक भय से डरे बिना ब्रह्म चिन्तन द्वारा देहाध्यान त्याग कर विदेह नहीं हो सकता, इसमें कीट-भृंग का दृष्टांत प्रसिद्ध है । देख लो भृंग के भय से कीट शरीर धारण करता है, वैसे ही जीव ब्रह्म बन जाता है ।
(क्रमशः) 
 

मंगलवार, 19 मई 2026

*२५. अवस्था कौ अंग २५/२८*

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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*२५. अवस्था कौ अंग २५/२८*
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सुपिनै मैं जाग्रत बहै, बचन कहै मुख द्वार । 
ज्वाब देत हैं और कौं, सुन्दर शुद्धि न सार ॥२५॥
तथा कभी कभी मनुष्य स्वप्नावस्था में भी जाग्रदवस्था के समान बोलने(प्रलाप करने) लगता है । वह किसी अन्य को ऐसा उत्तर देने लगता है जिसमें न कोई सचाई होती है, न कोई सार(तत्त्व) ॥२५॥

स्वप्नै माहैं स्वप्न है, देखै नाना रूप । 
जागैं तैं सब कहत है, सुन्दर छाया धूप ॥२६॥
कभी कभी मनुष्य पर स्वप्नावस्था में ही स्वप्नावस्था आरूढ हो जाती है, उस अवस्था में वह ऐसे ऐसे रूप देखता है कि जागने पर उन्हें धूप एवं छाया का खेल बताता है ॥२६॥
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सुन्दर ऐसैं जानियें, सुषुपति स्वप्ना मांहिं । 
स्वप्नै ही मैं अनुभवै, जागै जानैं नांहिं ॥२७॥
परन्तु जब स्वप्नावस्था में सुषुप्ति अवस्था पहुँच जाती है तो वह पुरुष स्वप्न में अनुभूत किसी भी घटना को स्मरण नहीं कर पाता ॥२७॥
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सुषुपति मैं जाग्रत उहै, जानी करि अनुमांन । 
जागें ते ततपर भयौ, सब इन्द्रिनि कौ ज्ञांन ॥२८॥
सुषुप्ति अवस्था में जब जाग्रत् अवस्था पहुँच जाती है तो वह पुरुष, अनुमान का सहारा लेकर, उन सब घटनाओं का स्मरण कर लेता है; क्योंकि जाग्रदवस्था में सभी इन्द्रियों का ज्ञान यथाभूत(तत्पर) रहता है ॥२८॥
(क्रमशः)

*राग गुंड ॥८॥ साधुमहिमा ॥*

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*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*दादू निरंतर पीव पाइया, जहँ आनन्द बारह मास ।*
*हंस सौं परम हंस खेलै, तहँ सेवक स्वामी पास ॥*
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*राग गुंड ॥८॥ साधुमहिमा ॥*

धनि रे दिहाड़ौ आजि कौ रे लोइ ।
हरिजन आया म्हारै हरि जस होइ ॥टेक॥ 
ज्याँह कौ मारग हेरता हरि । सो जन आया म्हारै कृपा करी ॥ 
भाव भगति रुचि उपजी घणी । हिरदै आया म्हारै त्रिभुवन धणी ॥  
परफूलित अति कवल बिगास । मन का मनोरथ पुरवी आस ॥
बषनां महिमा बरणी न जाइ । राम सहित जन मिलिया आइ ॥१२५॥  
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हे लोगों ! आज का दिन धन्य है । मेरे घर पर हरि के जन = भक्त पधारे हैं और उनके पधारने से आज मेरे घर में हरि के गुणों का गान हो रहा है । जिन संतो-भक्तों के आने के रास्ते को स्वयं हरि देखा करते थे, वे ही ब्रह्मनिष्ठ साधु संत कृपा करके मेरे घर पधारे हैं । 
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“अनुब्रजाम्यहं येषां पूयायेंत्घ्रिरेणुभिः” उनके आने से मेरे मन में भाव = श्रद्धा तथा भक्ति परमात्मा के प्रति अत्यधिक मात्रा में उत्पन्न हो गई है । परिणामस्वरूप मेरे हृदय में त्रिभुवन का स्वामी विराजमान हो गया है । 
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मेरा हृदय-कमल आनंद में निमग्न हुआ विकसित हो गया है = खिल गया । मेरे मन की समस्त कामनाएँ, मनोरथ पूर्ण हो गये हैं । बषनां कहता है, रामजी के भक्तों के सहित रामजी स्वयं आकर मेरे से मिले हैं । इस सुखद व आनंददायक अवसर की महिमा का वर्णन करना संभव नहीं है ॥१२५॥ 

*१३. विरह विभग्ङका अंग ~५/७*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*१३. विरह विभग्ङका अंग ~५/७*
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*रसना रस हि न लाइये, हिरदै नाँहीं हेत ।*
*रज्जब राम हिं क्या कहैं, हम ही भये अचेत ॥५॥*
न तो रसना इन्द्रिय को उसके चिन्तन रस में लगाते, न हृदय में प्रेम ही करते, अत: हम ही असावधान हो रहे हैं, राम को कहैं भी क्या ?
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*पिंड प्राणि रोगी नहीं, औषधि नाम न लेहि ।*
*तो वैद्य विधाता क्या करै, दारू दर्शन देहि ॥६॥*
प्राणी का शरीर रोगी न हो तो वह औषधि का नाम भी नहीं लेता, फिर उसे वैद्य औषधि देकर क्या करेगा ? वैसे ही प्राणी में विरह-व्यथा है ही नहीं और वह प्रभु दर्शन का नाम भी नहीं लेता, फिर उसे प्रभु दर्शन देकर क्या करेंगे ? अर्थात जो जिस का पात्र होता है उसकी प्राप्ति से उसे लाभ होता है अन्य को नहीं होता ।
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*दारू चाहे दर्द वंद, निरोग सु नहिं लेय ।*
*औषधि अरथी आतमा, जो माँगे सो देय ॥७॥*
जिसके रोगजन्य दर्द होता है, वही औषधि चाहता है । जो भली प्रकार निरोगी है वह तो औषधि वह तो औषधि मिलने पर नहीं खाता, जो औषधि का इच्छुक प्राणी है वह तो औषधि का जो मूल्य माँगे वही देकर लेता है, वैसे ही जिसके वियोगजन्य व्यथा है, वही हरि-दर्शन चाहता है और सर्वस्व देकर भी लेने को तैयार रहता है ।
‪‎.
इति श्री रज्जब गिरार्थ प्रकाशिका सहित “१३. विरह विभंग का अंग” समाप्त ॥
(क्रमशः)‬

*१३. विरह विभग्ङका अंग ~१/४*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*१३. विरह विभग्ङका अंग ~१/४*
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*दर्द नहीं दीदार का, तालिब१ नाँहीं जीव ।*
*रज्जब विरह वियोग बिन, कहाँ मिले सो पीव ॥१॥*
न तो जीव जिज्ञासु१ है और न हरि-दर्शनार्थ उसके हृदय में पीड़ा ही है, फिर विरह वियोग व्यथा बिना वे प्रियतम प्रभु कहां मिलते हैं ? अर्थात नहीं मिलते ।
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*दर्द बिना क्यों देखिये, दर्शन दीन दयाल ।*
*रज्जब विरह वियोग बिन, कहां मिले सो लाल ॥२॥*
दीनदयालु परमात्मा का साक्षात्कार बिना साधन कष्ट उठाये कैसे किया जा सकता है । विरहजन्य वियोग व्यथा के बिना वे प्रियतम कहां मिलते हैं ? अर्थात नहीं मिलते ।
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*श्रवणों सुरति न पीव की, प्रेम न लेहि समाय ।*
*रज्जब रुचि माँही नहीं, कहां मिले सो आय ॥३॥*
न तो कान से भगवद् यश सुनने की वृत्ति ही बनती है, न प्रभु -प्रेम को अपनाकर हृदय में धारण करता है, जब हृदय में प्रभु से मिलने की रुचि ही नहीं तब वे कहां आकर मिलेंगे ? अर्थात वे हृदय में ही प्रकट होकर मिला करते हैं, तो हृदय उनके प्रकट होने योग्य है नहीं ।
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*नयनों नेह न नाह१ का, वहिं दिशि दृष्टि न जाँहिं ।*
*रज्जब राम हि क्यों मिले, तालिब२ नाँहीं माँहिं ॥४॥*
न तो नेत्रों में ही प्रभु१ का स्नेह है, न उन प्रभु की और विचार दृष्टि ही जाती है, अर्थात प्रभु मिलन सम्बन्धी विचार ही नहीं होता । जब जिज्ञासु२ जैसी भावना ही मन में नहीं है, तो फिर राम कैसे मिलेंगे ।
(क्रमशः)

*२५. अवस्था कौ अंग २१/२४*

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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*२५. अवस्था कौ अंग २१/२४*
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एक अवस्था कै विषै, तीनहुं बर्तैं आई । 
जाग्रत स्वप्न सुषोपती, सुन्दर कहत सुनाइ ॥२१॥
४. अवस्था का अन्य भेद : कभी कभी ऐसा भी होता है कि जाग्रत्, स्वप्न एवं सुषुप्ति - इन तीनों अवस्थाओं के व्यापार का एक ही अवस्था में समन्वय हो जाता है । श्रीसुन्दरदासजी महाराज अब यही भेद बता रहे हैं ॥२१॥ 
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जाग्रदवस्था जानिये, सब इन्द्रिय ब्यापार । 
अपने अपने अर्थ कौं, सुन्दर करै विहार ॥२२॥
सामान्यतः सभी इन्द्रियाँ अपने अपने विषयों की खोज में ही अपनी चेष्टाएँ सीमित रखती हुईं स्व स्व व्यापार में लीन रहती है ॥२२॥
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जाग्रत मैं स्वप्ना बहै, करै मनोरथ आंन । 
नैंन न देखै रूप कौं, शब्द सुनै नहिं कांन ॥२३॥
कभी कभी जाग्रदवस्था में ही स्वप्नावस्था प्रवेश कर जाती है तो मनुष्य अन्य(चक्षु की) क्रिया करता हुआ शब्दक्रिया का चिन्तन करने लगता है । अर्थात् उस समय न उस के नेत्र अपना कर्म करते हुए किसी रूप को देख पाते हैं और न श्रोत्रेन्द्रिय ही अपना कर्म करती हुई भी कोई शब्द सुन पाती है ॥२३॥
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जाग्रत मैं सुषुपति भई, जबहिं तंवारौ होइ । 
सुन्दर भूले देह कौं, सुधि बुधि रहै न कोइ ॥२४॥
तथा कभी कभी विश्रान्त अवस्था में ऐसा भी होता है कि मनुष्य को जाग्रदवस्था में ही सुषुप्ति अवस्था आवृत कर(घेर) लेती है तब वह उसी समय निःसंज्ञ(बेहोश = तंवारौं) होकर अपने शरीर का भी विस्मरण कर बैठता है(और वह तत्काल गाढ निद्रा में पहुँच जाता है) ॥२४॥
(क्रमशः)