गुरुवार, 28 मई 2026

*१५. विरक्त का अंग ~५/८*

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*🌷卐 सत्यराम सा 卐🌷*
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*१५. विरक्त का अंग ~५/८*
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*बपु१ वसुधा२ सौं वैर विधि, विरच्या३ लग बैकुण्ठ ।*
*रज्जब रूचे न विनशती४, यहु उर अंतर अण्ट५ ॥५॥*
विरक्त का मन शरीर१ तथा पृथ्वी२ के भोगों से और बैकुण्ठ तक से जैसे वैर के द्वारा वैरी से उपराम होता है, वैसे ही उपराम३ हो जाता है, उसे विनाशी४ माया रुचि कर नहीं लगती, विरक्त के हृदय में यह वैराग्य की गाँठ५ ही लग जाती है, अर्थात वह वैराग्य को नहीं छोड़ता ।
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*माया काया मन मतैं१, विरच्या प्राण प्रचण्ड२ ।*
*रज्जब न्यारा नाम बल, नजर नहीं नौ खंड ॥६॥*
तीव्र२ वैराग्य युक्त प्राणी माया, शरीर और सांसारिक मन के विचारों२ से उपराम हो जाता है, निरंजन राम के नाम चिन्तन के बल से सबसे ही अलग रहता है, इस नौ खंड वाली पृथ्वी के किसी भी पदार्थ पर उसकी रागयुक्त दृष्टि नहीं पड़ती ।
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*विरच्या बरते बरतणिहिं, तन मनत्रितिरस्कार ।*
*जन रज्जब रत नाम सौं, यहु विरक्त व्यवहार ॥७॥*
उपरामता से सब कार्य करता है, तीनों लोकों के भोगों का तन - मन से अनादर करता है और निरंतर निरंजन राम के नाम में अनुरक्त रहता है, वही विरक्त पुरुष का व्यवहार है ।
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*रज्जब रूठा ऋद्धि सौं, सिद्धि सुहावे नाँहिं ।*
*इन आगे इसका धणी, सो बैठा मन माँहिं ॥८॥*
विरक्त पुरुष ऐश्ववर्य से उपराम रहता है, सिद्धियाँ उसे प्रिय नहीं लगती, इन सिद्धि आदि से परे इनका स्वामी परमात्मा है, वही विरक्त के मन में निरंतर स्थिर रहता है ।
(क्रमशः)

२६. बिचार कौ अंग १/४

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२६. अथ बिचार कौ अंग १/४
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सुन्दर साधन सब थके, उपज्यौ हृदय बिचार । 
श्रवन मनन निदिध्यास पुनि, याही साधन सार ॥१॥
श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - जब हमारे द्वारा किये जा रहे भगवत्-साक्षात्कार साधना के सभी उपाय निष्फल हो गये, तब हमारे हृदय में यह विचार उद्भूत हुआ कि श्रवण, मनन एवं निदिध्यासन द्वारा निराकार निरञ्जन प्रभु का चिन्तन ही उस की प्राप्ति का एकमात्र उपाय है ॥१॥
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सुन्दर या साधन बिना, दूजौ नहीं उपाइ । 
निस दिन ब्रह्म बिचार तें, जीव ब्रह्म ह्वै जाइ ॥२॥
इस साधना के विना भगवत्प्राप्ति का अन्य कोई उपाय नहीं है । यदि इस उपाय से निरन्तर ब्रह्मचिन्तन किया जाय तो जीव-ब्रह्म की एकता सहजता से सुलभ हो सकती है ॥२॥
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सुन्दर एक बिचार है, सुरझावन कौं सूत । 
उरझि रह्यौ संसार मैं, नखशिख प्रानी भूत ॥३॥
यही एकमात्र उपाय ऐसा है जिससे जन्म-मरण परम्परा की यह उलझी हुई समस्या का सरलता से समाधान हो सकता है । नख से शिखा तक संसार के विषयभोगों में डूबा हुआ प्राणी इसी उपाय से मुक्त हो सकता है ॥३॥
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उपजै एक बिचार जब, तब यह पावै ठौर । 
भरमावन कौं जगत महिं, सुन्दर साधन और ॥४॥
जब किसी भाग्यवान् प्राणी को यह विचार(भगवच्चिन्तन) रूप उत्तम उपाय सूझता है तभी यह प्राणी उस निरञ्जन निराकार प्रभु तक पहुँच सकता है । अन्यथा इस जगत् में विभिन्न मतवादियों ने, उस प्राणी को बहकाने के लिये, अपना अपना मत प्रतिपादन करते हुए, नाना भ्रमजाल फैला रखे हैं ॥४॥
(क्रमशः) 

भौं मैं भजियौ राम

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*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*एकै अक्षर पीव का, सोई सत्य करि जाण ।*
*राम नाम सतगुरु कह्या, दादू सो परवाण ॥*
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*सुमिरण ॥*
भौं मैं भजियौ राम, यौं भौ भागौ रे । 
निसदिन हरि की नाँइ, सुमिरण लागौ रे ॥टेक॥
दोवड़ तेवड़ मैं करी रे, हरि सुमिरण की बाड़ि ।
ज्याँह कै पहरै को नहीं, ते नर मुसिया झाड़ि ॥
म्हारा घर कै आंगणैं रे, चेतन पहरा देइ ।
निधड़क सोवै कुम्हारड़ी रे, चोर न मटिया लेइ ॥
ज्याँह चोराँ चोरी करी रे, पर घर किया प्रवेस ।
सो चोर भया फिरि पाहरू, म्हारै गुर दीन्हौं उपदेस ॥ 
सूता था सुणि जागिया रे, सुण्याँ सहर मैं सोर ।
कहि बषनां बाथाँ पड़ी, म्हारी बहुटल मार्यौ चोर ॥१३३॥ 
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भू = संसार । भौ = भय, जनम-मरण का भय । दोवड़-तेवड़ = दोहरी (द्वंद्व = राग-द्वेष, सुख-दुःख आदि), तिहरी (सत, रज, तम गुण) । बाड़ि = पुराने समय में घर के चारों ओर काँटों से अहाता बनाया जाता था जिसे बाड़ लगाना कहा जाता था । मुसिया = लूट लिये गये । झाड़ि = झाड़-पौंछकर सब कुछ ले लेना, सर्वस्व को छीन लेना । आगणैं = चारों ओर । चेतन = सावधान मन, ज्ञान, विवेक । कुम्हारड़ी = कुम्हार की पत्नी, आत्मा । मटिया = मिटटी = मन । चौराँ = इंद्रियाँ । सहर = शरीर । बाथाँ = युद्ध । बहुटल = बुद्धि ।
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योगशास्त्र में पाँच क्लेशों का उल्लेख है । उनमें से पाँचवा क्लेश अभिनिवेश नाम्ना है जिसका तात्पर्य है, मृत्यु का भय कि कहीं मुझे मृत्यु आकर दबोच न ले । जिस व्यक्ति के मन में मृत्यु का भय समा जाता है, वह इससे अभय होने का प्रयत्न भी करता है । 
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यहाँ बषनांजी यही कह रहे हैं । मृत्यु के भय से भयभीत होकर मृत्यु से छुड़ा देने वाले रामजी को मैंने भजा । परिणामस्वरूप मेरा भय भाग गया । मैं निशिदिन आठों पहर हरि के नाम के स्मरण में लग गया हूँ । मैंने समस्त द्वंद्वों तथा तीनों गुणों को वशीभूत करके राम-नाम-स्मरण-का-अहाता = कवच मेरे शरीर रूपी घर के चारों ओर लगा लिया है । 
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जिन मनुष्यों ने राम – नाम की बाड़ नहीं लगाई है वे पूर्ण रूप से काल द्वारा लूट लिये गये हैं । वे पुनरपि जननं पुनरपि मरणं के चक्र में ही गोता खाते रहेंगे । मेरे घर रूपी शरीर के घट रूपी आंगन में चेतन रूपी ज्ञान पहरा देता है । हृदय में ज्ञान विराजता है जिससे आत्मा रूपी कुम्हारी अभय होकर सोती है, परमात्मा में एकरस स्थित रहती है क्योंकि इंद्रिय रूपी चौर मन रूपी मिटटी को अब चोर सकने में = संसाराभिमुख करने में समर्थ नहीं है । 
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जिन इंद्रियों रूपी चौरों ने ही विषयभोग रूपी चोरी करी थी तथा जिस मन में परमात्मा का निवास होना था उसमें प्रवेश करके उसको बिगाड़ा था, अब वे ही इंद्रियाँ पहरेदार बन गई हैं, मन को विषयों में जाने नहीं देती हैं । जो श्रवणेन्द्रिय पहले दुनियावी बाते सुनती थीं वे अब भगवद्गुण सुनने लगी हैं । जो आंखें परस्त्री, परधन की ओर देखा करती थीं वे अब संत-भगवंत दर्शन करने लगी हैं । जो त्वचा पहले कामोपभोग करने में आनंदानुभव करती थी अब वह संत-चरण स्पर्श में आनंद का अनुभव करती है । आदि आदि । 
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यह सब गुरु महाराज के उपदेश के कारण ही संभव हो पाया है । मेरी आत्मा, मन पहले अज्ञाननिद्रा में सोया पड़ा था किन्तु गुरु महाराज के उपदेश रूपी शोर को सारी सहर = शरीरस्थ सभी इंद्रियों ने सुना जिससे वे जागिया = विवेकवान हो गई । सत्यासत्य, नित्यानित्य विवेक सम्पन्न हो गई । 
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बषनां कहता है, मेरी बुद्धि रूपी बहुटल = बहु इन समस्त चौरों से = मनोविकारों से बाथाँ = गुत्थमगुत्था हो गई, युद्धरत हो गई । परिणामस्वरूप सारे दुर्गुण, दुराचार, मनोविकार शरीर में से निकाल कर भाग गये । मैं परमात्मा से एकाकार हो गया ॥१३३॥

बुधवार, 27 मई 2026

*२५. अवस्था कौ अंग ५२*

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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*२५. अवस्था कौ अंग ५२*
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छप्पय छंद
प्रथम भूमिका श्रवन चित्त एकाग्रहि धारै । 
दुतिय भूमिका मनन श्रवन करि अर्थ बिचारै । 
तृतिय भूमिका निदिध्यास नीकी बिधि करई । 
चतुर्भूमि साक्षातकार संशय सब हरई ॥ 
अब तासौं कहिये ब्रह्मबिदु बर बरयान बरिष्ट है । 
यह पंच षष्ट अरु सप्तमी भूमि भेद सुन्दर कहै ॥५२॥
इति अवस्था कौ अंग ॥२५॥
७. प्रसङ्गवश ज्ञान की चार भूमिकाओं का वर्णन : 
श्रवण ज्ञान की प्रथम भूमिका है, जिस के माध्यम से जिज्ञासु का चित्त एकाग्र होता है । 
ज्ञान की द्वितीय भूमिका मनन से गुरुपदिष्ट शब्द के अर्थ पर विचार होता है । 
ज्ञान की तृतीय भूमिका निदिध्यासन से उस शब्द एवं अर्थ का सामञ्जस्य बैठाया जाता है(नीकी विधि करई) । 
ज्ञान की चतुर्थ भूमिका है - साक्षात्कार, जिस समस्त द्वैत भ्रम एवं संशय विनष्ट हो जाते हैं । 
और ज्ञान की पञ्चम भूमिका है - ब्रह्मवित्(वर) होना । 
षष्ठ भूमिका है - वरीयान् होना । 
तथा सप्तम भूमिका है - वरिष्ठ होना । 
श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - इस प्रकार शास्त्र में ज्ञान की सात भूमिकाएँ बतायी गयी हैं ॥५२॥
इति अवस्था का अंग सम्पन्न ॥२५॥
(क्रमशः) 

मिसर येक रूड़ी कथा कही

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*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*शब्द दूध घृत राम रस, मथि करि काढ़ै कोइ ।*
*दादू गुरु गोविन्द बिन, घट घट समझि न होइ ॥*
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राग सारंग ॥११॥भ्रमविध्वंश ॥
*मिसर येक रूड़ी कथा कही ।*
ऊंघै थी र बिछायौ लाधौ ता परि सोइ रही ॥टेक॥
मुख की पीक नैंन दिखलावै, अधरनि काजरि कारौ । 
तैं ज कही सो मेरै होती, तिहि मन खुसी हमारौ ॥
कंकन पूठि करन की चूरी, हार बन्यौ बिन तागै । 
जोर सुणैं ताकै यहु उपजै, ध्यान तहीं ठै लागै ॥
मानि मनावौ राधा प्यारी, एतौ हठ क्यूँ कीजै । 
तूँ ब्रिषभान बड़े की बेटी, तेरे ज्यायें जीजै ॥
मन हठ छाड़ि हसौ चित सनमुख, दोउँ घाँ अमृत पीजै ।  
जदपी बैर होइ हिरदा मैं, तौ बैरि कुँ पीठि न दीजै ॥ 
कहै सहेली अहो जसोधा, बात सुणी कै नांहीं । 
बंसी बट की छाँही, गही हठि मेरी बाँहीं ॥
हौं सकुचनि बोली नांहीं, बहु सखियन की भीर । 
गहि अचला मोहि ले चल्यौ, मान सरोवर तीर ॥
तेरै संग की ग्वालनी, मेरे संग के ग्वाल । 
एक एक कौं घेरिहैं, तब व्है है कौंन हवाल ॥
जहाँ जहाँ पग तूँ धरै, तहाँ तहाँ मन साथ । 
आप रहै आधीन व्है, चित बित तेरैं हाथ ॥
हठि बीरी मेरे मुखि दई, ग्रीबाँ मेल्ही बाँह । 
मिसही मिस मोहि ले चल्यौ, गहि अंधियारा माँह ॥
याही ग्यान ध्यान भी याही, नर नारी कौं भावै ।  
बषनां देखि ब्यास की कथणी, साच न हिरदै आवै ॥१३२॥
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कथावाचक मिश्र ने एक सुंदर कथा कही । राधा बैठी-बैठी ऊंघ रही थी कि उसको किसी के द्वारा बिछाया हुआ बिछौना मिल गया जिसपर वह आराम से सो गई । पान खाने से उत्पन्न पीक = लाली उसके होठों पर न दीखकर नयनों में दीख रही थी । इसी प्रकार नेत्रों में लगी काजल नेत्रों में न दीखकर होठों पर दीख रही थी । 
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वस्तुतः ऊंघती हुई राधा संसार और भगवान दोनों के मार्गों पर चलती हुई चित्तवृत्ति है जो न पूर्णतः संसार में ही लगी हुई है और न पूर्णरूपेण परमात्मा में ही अनुरक्त हुई है । गुरु के द्वारा उपदेश ही किसी के द्वारा बिछाया हुआ बिछौना है । परमात्मा में चित्तवृत्ति का पूर्णरूपेण लग जाना ही सुखपूर्वक सोना है । परमात्मा के विरह में आंखों का रो रोकर लाल हो जाना ही मुँह की लाली आँखों में होना है । रोने से आंखों का काजल बहकर अधरों तक आता है यही ‘अधरनि काजरि कारौ’ है । 
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बषनांजी कहते हैं पंडित द्वारा कही गई बात भ्रम है (प्रथम अर्थ) किन्तु हमारे द्वारा अध्यात्मपरक लगाया गया अर्थ ही पंडित को अभिप्रेत है तो हे पंडित ! जो बात तूने कही है, यदि उसी के अनुसार मेरी स्थिति हो जाये तो मेरा मन परमानंद में सरावोर हो जाये । परमात्मा की भक्ति में चित्तवृत्ति के लग जाने से हाथ में पहने जाने वाली चूड़ियाँ और कंगन जो बंधन के प्रतीक है पीछे हो गये, अबंधनकारी हो गये । गले को बांधने वाला हार बिना धागे की लै बन गयी । 
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अर्थात् चित्तवृत्ति का परमात्म-नाम से बिना किसी व्यवधान के तादात्म्य हो गया । जो भी इस रूपक को सुनता है, उसके मन में भी ऐसा ही करने की इच्छा जागृत हो जाती है और उसकी भी चित्तवृत्ति भगवन्मय हो जाती हैं । (तहाँ ठै = उसी स्थान में = परमात्मा में) आगे राधा कृष्ण की लीला का वर्णन है ।  जिसे भी आध्यात्मिक अर्थ में घटाया जा सकता है ।  
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कृष्ण राधा से कहते हैं, हे प्यारी राधा ! अब आप अपने मन को ठंडा करो । इतना अधिक हठ क्यों कर रही हो । अरे ! तुम तो वृषभानु जैसे बड़े गोप की बेटी हो । उनका प्रभाव बहुत भारी है । वे चाहें जिसको जीवनदान दे दें तथा वे चाहें जिसको मरवा देवें । तू है तो उन्हीं की लाड़ली । तेरे पास भी उनके बराबर ही शक्ति है । अतः मैं तो तेरे जिलाने से ही, तेरे द्वारा दिये हुए जीवनदान से ही जीता हूँ ।  मन में से हठ को निकाल दे ।  
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सामने देखते हुए हँस जिससे कि हम दोनों दोनों ओर से = एक दूसरा एक दूसरे के दर्शन लाभ रूपी अमृत का पान कर सकें । हे राधा ! नीति कहती है, हृदय में बैरभाव होने के उपरान्त भी बैरी के सन्मुख हो जाने पर = बैरी के विनीत हो जाने पर उसे पीठ नहीं दी जाती = त्यागा नहीं जाता । प्रत्युत उसको अपना लिया जाता है । अब कृष्ण की लीलाओं के बारे में एक सखी यशोदा से जाकर कहती है । 
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अहो यशोदा ! तूने तेरे पुत्र की अचरजभरी बात सुनी अथवा नहीं । वह वंशीवट की छाया में वह छुपकर खड़ा हुआ था । मैं जैसे ही उधर से गुजरने लगी, कृष्ण ने जबरदस्ती मेरी बाँह पकड़ ली । मेरे साथ में बहुत सी सखियाँ और थीं । इसकारण संकोचवश मैं उससे कुछ भी नहीं कह सकी । श्रीकृष्ण मेरी फरिया का पल्ला पकड़कर मुझे मानसरोवर की तीर पर ले गया । वहाँ वह मेरे से कहने लगा~ 
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तेरे साथ की सारी ग्वालिनों को मेरे साथ के एक-एक ग्वालबाल, एक-एक को पकड़ लेवें तो बता तुम सबका फिर क्या हाल होगा । जहाँ-जहाँ तू जाती है, वहाँ-वहां तेरे साथ ही मेरा मन भी जाता है । यह मेरा मन तेरे अधीन होकर रहेगा और चित्त = वृत्ति तथा धन-माल-खजाना सब तेरे हाथों में रहेगा । अर्थात् जहाँ जहाँ तू रहेगी वहाँ वहाँ ही मेरा मन रहेगा । मेरा मन तेरे अधीन रहेगा । तू स्वामिनी होगी । मन, धन-सम्पत्ति सब तेरी आज्ञा के अनुसार चलने वाले होंगे । इस प्रकार श्रीकृष्ण ने कहते-कहते जबरदस्ती करते हुए पान का बीड़ा मेरे मुख में दे दिया । 
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मेरी गर्दन पर अपनी बाँह रख दी और बातें करता हुआ मिस ही मिस = भुलावे में डाले हुए पकड़कर मुझे गहन अंधकार की ओर लेकर चला गया । नर-नारियों को वस्तुतः इस प्रकार का ही ज्ञान, ध्यान रुचिकर लगता है क्योंकि मिश्र के दृष्टिकोण से भी यही ज्ञान, ध्यान है तथा मिश्र की कथा सुनने वाले श्रोताओं के अनुसार भी यही ज्ञान-ध्यान है । बषनां कहता है व्यास की उक्त कथा को सुनकर कभी भी हृदय में सत्य स्थापित नहीं हो सकता ॥१३२॥ 

मंगलवार, 26 मई 2026

*१५. विरक्त् का अंग ~१/४*

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*🌷卐 सत्यराम सा 卐🌷*
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*१५. विरक्त् का अंग ~१/४*
इस अंग में विरक्त विषयक विचार दिखा रहे हैं ~
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*त्यागी ताखे१ की दशा, तहां न माया घास ।*
*जन रज्जब तब जानिये, ब्रह्म अग्नि परकाश ॥१॥*
विरक्त्त पुरुष तक्षक१ जाति के सर्प के समान होता है । तक्षक जाति के सर्प की बाँबी के पास लगभग एक बीधा भूमि में घास नहीं होता, वैसे ही विरक्त के पास माया नहीं रहती । ऐसा विरक्त्त हो तभी समझना चाहिये कि इसमें ब्रह्म ज्ञानाग्नि का प्रकाश हुआ है ।
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*गृह दारा सुत वित्त सों, यहु मन भया उदास ।*
*जन रज्जब राम हिं रच्या, छूटया जगत निवास ॥२॥*
विरक्त्त का यह चंचल मन भी घर, नारी, पुत्र, धनादि से उदास हो जाता है, उसका सांसारिक विषयों में रहना छूट जाता है और वह राम में ही अनुरक्त्त रहता है ।
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*त्याग तेग सौं मारिये, रज्जब लंगर१ लोभ ।*
*मनसा वाचा कर्मना, तो तिहुं लोक में शोभ ॥३॥*
ढीठ१ लोभ को वैराग्य रूप तलवार से मारना चाहिये, हम मन, वचन, कर्म से कहते हैं, लोभ को नष्ट करने से ही तीनों लोकों में शोभा होती है ।
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*रज्जब रह गया राम में, तज रामति का द्वन्द्व ।*
*नभ नीर परसे नहीं, भया सीप का बूंद ॥४॥*
स्वाति जल का बिन्दु सीप में जाकर मोती बन जाता है तब अन्य जल के समान न तो आकाश में जाता और न जल से मिलता, वैसे ही संसार में भ्रमण के हेतु काम, क्रोधादि द्वन्द्वों का त्याग से विरक्त्त का मन राम में ही स्थिर रह जाता है, पुन: सांसारिक विषयों में अनुरक्त्त नहीं होता ।
(क्रमशः)

*२५. अवस्था कौ अंग ४९/५१*

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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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*२५. अवस्था कौ अंग ४९/५१*
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निदिध्यास एकादशी, पुनि द्वादशी बदंति । 
आगै होइ त्रयोदशी, चतुर्दशी पर्यंति ॥४९॥
निदिध्यासन : तब एकादशी, द्वादशी, त्रयोदशी एवं चतुर्दशी तिथि में 'निदिध्यासन' द्वारा ज्ञान कला का विस्तार आगे से आगे बढता जाता है ॥४९॥
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तदाकार पूरन कला, पूरनमासी होइ । 
पूरन ज्ञान प्रकाश शशि, भ्रम संदेह न कोइ ॥५०॥
पूर्णिमा तिथि में उस चन्द्रमा के आकार(मण्डल) को पूर्ण करने वाली कला उद्भूत होती है, तब उस आत्मा रूप चन्द्रमा में ज्ञान का प्रकाश भी पूर्णतः उद्भूत होता है । और उस में किसी प्रकार का द्वैत भ्रम या कोई सन्देह नहीं रह जाता ॥५०॥
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ताहि कहत हैं ब्रह्मबिदु, शास्त्र बेद पुरांन । 
सुन्दर या अनुक्रम बिना, और सकल अज्ञांन ॥५१॥ 
ब्रह्मवित् : ऐसे ही आत्मज्ञानी को विविध शास्त्रों, वेदों एवं पुराणों में ब्रह्म का ज्ञाता(ब्रह्मवित्) कहा गया है । शेष संसार तो अज्ञान का भण्डार है ॥५१॥
(क्रमशः) 

ध्रिगि जीवन मेरे मन

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*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*दादू निमिष न न्यारा कीजिये, अंतर थैं उर नाम ।*
*कोटि पतित पावन भये, केवल कहतां राम ॥*
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*उपदेश ॥*
*ध्रिगि जीवन मेरे मन राम बिना* । राम बिना यौं गए दिना ॥टेक॥
रैंणि गई त्यूँ दिन भी जाइ । हरि हिरदै कबहूँ नहिं आइ ॥
हार्यौ जनम राम बिण सोये । जे दिन राम भगति बिन खोये ॥
कलि मैं आइ कर्म ये कीया । कहा भयौ जे बहु दिन जीया ॥ 
ध्रिग ते नर ध्रिगि ध्रिगि ते नारी । बषनां हरि की भगति बिसारी ॥१३१॥

हे मेरे मन ! राम-नाम-स्मरण के बिना जीवन को धिक्कार है । राम-नाम-स्मरण के बिना गया हुआ समय यौं =यौंही = व्यर्थ है । जैसे सोने में रात्री व्यतीत हो जाती है वैसे ही काम-धंधे में दिन व्यतीत हो जाता है किन्तु हरि = परात्पर-परब्रह्म-परमात्मा का चिंतन-स्मरण मन में कभी भी करता नहीं है । 
राम-नाम-स्मरण के बिना सोने में ही सारा जीवन व्यतीत कर दिया है । वे दिन व्यर्थ ही गये के समान हैं जिनमें रामजी की भक्ति का संपादन नहीं किया । कलिकाल में भगवन्नामजाप करने मात्र से ही मुक्ति मिल जाती है । कलिकाल में भगवन्नाम करने मात्र से ही मुक्ति मिल जाती है ~
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“कलिजुग केवल नाम अधारा । सुमिर सुमिर नर उतरहिं पारा ॥” 
कलिजुग केवल हरि गुण गाहा । गावत नर पावहीं भव थाहा ॥” 
“कलौ केशव कीर्तनात् ॥” 
“हरेर्नामैव हरेर्नामैव हरेर्नामैवे केवलं ।” 
“कलौ नास्त्यैव नास्त्यैव नास्त्यैव गतिरन्यथा ॥” 
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किन्तु इस सुगम, सरल और निरापद मार्ग का परित्याग करके संसार में आकर नाना बंधनकारी कर्म किये जिनसे मुक्ति का मारग प्रशस्त हो गया । यदि बंधनकारक कर्मों को करते हुए बहुत दिनों तक जिये भी तो उस जीने से क्या लाभ ? उससे तो उल्टे हानि ही होती है । उन पुरुषों व स्त्रियों को भी धिक्कार है जिन्होंने हरि की भक्ति का विस्मरण किया है ॥१३१॥

सोमवार, 25 मई 2026

*१४. भयभीत भयानक का अंग ~२१/२४*

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*🌷卐 सत्यराम सा 卐🌷*
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*१४. भयभीत भयानक का अंग ~२१/२४*
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*निडर निलज्ज निश्शंक ह्वै, पूरि करे अपराध ।*
*जन रज्जब जग सौं रचे, परिहर संगति साध ॥२१॥*
जो निडर, निलज्ज और निश्शंक होता है, वह पूर्ण रूप से पाप ही करता रहता है और संतों की संगति को छोड़ कर संसार के पापी प्राणियों से ही प्रेम करता है ।
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*भय भाग्यूं भूले भजन, सत संगति रुचि नाँहिं ।*
*जन रज्जब सेवा गई, संशय नाँहिं माँहिं ॥२२॥*
मृत्यु आदि का भय चले जाने से भगवद् भजन करना भी भूल जाता है सत्संग में भी रुचि नहीं रहती, आत्म विषयक संशय मन में नहीं होने से सद्गुरु तथा संतों की सेवा का भाव भी प्राणी के मन से चला जाता है ।
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*अदब२ अकलि१ में पाइये, शर्म साफ दिल माँहिं ।*
*बे अदबी बे शर्म में, रज्जब रजमा३ नाँहिं ॥२३॥*
ज्ञान१ युक्त में आदर२ का भाव रहता है, साफ हृदय में लज्जा रहती है, आदर भाव से रहित और निर्ज्जल में उन्नतिप्रद योग्यता३ नहीं रहती ।
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*जो तन निपजा तीन करि, न नीतिगि१ साज२ ।*
*जन रज्जब सुत पंच का, करे कौन की लाज ॥२४॥*
शुद्ध माता पिता से उत्पन्न होता है उसमें नीति, लज्जा, पाप कर्म से भय रहता है । जिसमें जार का बिन्दु भी पड़ा हो, वह तीन का पुत्र है उसमें नीतिज्ञ१ होने का साधन२ नहीं होता । जिसके चार जार हैं और एक पति उन पांच से उत्पन्न पुत्र किसकी लज्जा करेगा, अर्थात जो भय रहित व्यभिचारणी नारी का पुत्र हो, वह किस को पिता मान कर लज्जा करेगा ?
.
इति श्री रज्जब गिरार्थ प्रकाशिका सहित “१४. भयभीत भयानक का अंग” समाप्त ॥
(क्रमशः) 

*२५. अवस्था कौ अंग ४५/४८*

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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*२५. अवस्था कौ अंग ४५/४८*
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मावस अति अज्ञान कै, निसा अंधेरी कीन । 
ससि आतमा दृसै नहीं, ज्ञान कला करि हीन ॥४५॥
६. अवस्था का अन्य भेद : ४५ से ५१ तक की साषियों द्वारा महात्मा श्रीसुन्दरदासजी ने एक अवस्थाभेद १५ तिथियों में चन्द्रमा के प्रकाश के अनुक्रम-व्यतिक्रम के उदाहरण से समझाया है । इसमें अमावस्या को सुषुप्ति अवस्था(अज्ञान) के समान, प्रतिपदा से दशमी तक अल्प प्रकाश को स्वप्न अवस्था के समान तथा एकादशी से पूर्णिमा तक वर्धमान प्रकाश को जाग्रत् अवस्था बताया गया है ॥४५॥
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है अज्ञान अनादि कौ, जीव पर्यौ भ्रम कूप । 
श्रवन मनन निदिध्यास तें, सुन्दर ह्वै चिद्रूप ॥४६॥
यह अज्ञान अनादि माना गया है । यह जीव भ्रमरूप गहरे गर्त में गिरा हुआ है । जब वह(गुरु उपदेश का) श्रवण मनन एवं निदिध्यासन करता है तभी वह स्वकीय चिद्रूप को समझ पाता है ॥४६॥
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श्रवण सु कहिये प्रतिपदा, ज्ञान कला दरसाइ । 
दुतिया तृतिया चतुर्थी, सुनि पंचमी दिखाइ ॥४७॥
श्रवण : इन तीनों में, प्रतिपदा तिथि को 'श्रवण' माना जा सकता है जिसमें ज्ञान की प्रथम कला उद्भूत होती है । द्वितीया, तृतीया एवं चतुर्थी तथा पञ्चमी तिथि में श्रवण द्वारा उसी ज्ञानकला में वृद्धि होती है ॥४७॥
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मनन किये षष्टी दृसै, अर्थ लेइ पहिचांनि । 
होइ सप्तमी अष्टमी, नवमी दशमी जांनि ॥४८॥
मनन : षष्ठी तिथि में 'मनन' को माना जा सकता है जब जिज्ञासु गुरुपदिष्ट के वाच्यार्थ की वास्तविकता पहचान लेता है । तब सप्तमी, अष्टमी, नवमी एवं दशमी तिथि को इसी मनन के द्वारा ज्ञानकला का विस्तार होता है ॥४८॥
(क्रमशः) 

दीन कौ दयाल दादू

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*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*दादू हमको सुख भया, साध शब्द गुरु ज्ञान ।*
*सुधि बुधि सोधी समझकर, पाया पद निर्वाण ॥*
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*गुरुमहिमा ॥*
दीन कौ दयाल दादू कब मिलै मोहि ।
जिसी घड़ी हूँ तुझै देखौं, मुझकौं सुख होहि ॥टेक॥
तरवर रूप फल अनूप, पंथी टालन घाम । 
सब काहू परि छाया करणा, पँखियाँ कौं विश्राम॥  
आंधा केरी आँखड़ी, पांगुलाँ का पाव ।
पैली पार उतारिणहारा, भौसागर की नाव ॥ 
जा सँगि बहै मुकति कौ मारग, निरभै को भै नांहि ।
जाकौ ग्यान नीसरणी, चढ़ि साधू जन जांहि ॥ 
पारस रूप तत्त अनूप, परस्याँ पलटै भाव ।
दरसन परि बषनौं बलिहारी, बंदि छुड़ावणहार ॥१३०॥
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बषनांजी कहते हैं, दीनों पर दया करने वाले दादूजी महाराज मुझे कब मिलेंगे । जिस क्षण मैं दादूजी महाराज को देखूँगा उसी समय मुझे सुख होगा । वे दादूजी महाराज वृक्ष रूप है जिसमें भक्ति-मुक्ति रूपी अनुपम फल लगते हैं । वह पंथी रूपी साधकों को ज्ञान, भक्ति और वैराग्य रूपी शीतल, मंद और सुगंधित छाया रूपी साधना की प्रक्रिया प्रदान करते हैं । 
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वे पात्रापात्र का बिना विचार किये सभी को भगवद्भक्ति रूपी छाया प्रदान करते हैं तथा परम भगवद्भक्त रूपी पक्षियों को अपने सान्निध्य में विश्राम = रहने का अवसर भी प्रदान करते हैं । वस्तुतः वे अंधों के लिये लकड़ी के समान हैं तथा पंगुओं के लिये पावों के समान हैं । भवसागर के दूसरे किनारे तक ले जाने के लिये वे नाव के समान हैं । 
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जिसका संग करने से संगकर्ता भयमुक्त = विघ्न बाधाओं से भरे मार्ग पर भी निर्भय हुआ चलकर मुक्ति के मार्ग पर निष्कंटक चलता है और जिसका ज्ञान नीसरणि = सीढ़ी रूपा है जिसपर चढ़कर साधु = साधक जन मुक्त हो जाते हैं । दादूजी महाराज अनूपम पारस तत्व रूप हैं जिनके संग से लोहा रूपी संसारी जीव पलटकर कंचन रूपी भक्त बन जाते हैं । मैं बषनां उन बंधनों को काटने वाले दादूजी महाराज के दर्शनों पर न्यौछावर होता हूँ ॥१३०॥

*१४. भयभीत भयानक का अंग ~१७/२०*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*१४. भयभीत भयानक का अंग ~१७/२०*
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*महर१ कहर२ सौं डरपिये, द्वै बिन दिल दिलगीर३ ।*
*त्रिविधि भांति त्रासे रहै, रज्जब पूरण पीर ॥१७॥*
दया१ और क्रोध२ दोनों से ही डरते रहना चाहिये, जो इन दोनों से रहित रहता है, वही मन उदासीन३ रहता है । जो मन वचन कर्म से डरता है, वही अन्त में पूर्ण ब्रह्म को प्राप्त करके सिद्ध अवस्था को प्राप्त होता है ।
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*भय के भाजन१ में रहे, सुकृत सरीखा धन्न ।*
*जन रज्जब निर्भय भये, दह दिशि निकसे मन्न ॥१८॥*
भय रूप पात्र१ में ही पुण्य के समान धन रहता है अर्थात डरते रहने से ही पाप कर्म नहीं होते और पुण्य की रक्षा होती है । निर्भय होने मन दश इन्द्रिय रूप दशों दिशां से निकलकर पाप कर्म करने से प्रवृत होता है ।
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*भाव भक्ति भय बिन नहीं, भय बिन भजे न राम ।*
*रज्जब भय बिन भ्रष्ट ह्वै, भय बिन सरे न काम ॥१९॥*
भय बिना श्रद्धा तथा भक्ति नहीं होती, भय बिना कोई भी अज्ञानी राम को नहीं भजता, भय बिना इच्छानुसार पाप कर्म करके प्राणी भ्रष्ट हो जाता है, मृत्यु आदि के भय बिना मुक्ति रूप कार्य भी नहीं सिद्ध होता है ।
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*रज्जब सब डर निडर को, निर्भय को भय पूर ।*
*निर्संशय संशय घणा, प्रत्यक्ष प्राण हजूर ॥२०॥*
जो पाप कर्म से नहीं डरता उसके पिछे सभी प्रकार के भय लगे रहते हैं । जो ईश्वर से नहीं डरता उसके लिये सब विश्व भय से पूर्ण है । जो अपने को निर्संशय मानता है, उसमें बहुत संशय रहते हैं । ईश्वर, संत, शास्त्र और पाप कर्म से नहीं डरता, इच्छानुसार करता है उस प्राणी का फल उसके सामने प्रत्यक्ष ही आ जाता है ।
(क्रमशः)

शनिवार, 23 मई 2026

*१४. भयभीत भयानक का अंग ~१३/१६*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*१४. भयभीत भयानक का अंग ~१३/१६*
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*भय मिल सब कारज सरैं, भय मिल निपजे साध ।*
*रज्जब अज्जब ठौर डर, डर घर अगम अगाध ॥१३॥*
विचार पूर्वक भय युक्त कार्य करने से भी सभी कार्य सिद्ध होते हैं, मृत्यु आदि के भय से युक्त रहने से ही मन में साधु-पना उत्पन्न होता है । भयरूप स्थान अदभुत है तथा भयरूप घर में निवास करने से प्राणी अगम अगाध ब्रह्म को प्राप्त होता है ।
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*भय मधि भूत भला रहे, डर सौं डिगे सु नाँहिं ।*
*संशय सोच सहाय को, मुनि सुमिरें मति माँहिं ॥१४॥*
वृत्ति में भय रहने से प्राणी अच्छा रहता है अर्थात पाप कर्मों में प्रवृत नहीं होता, भय के कारण ही अपने धर्म कार्यों से नहीं डिगता । संशय और शोक के सहायक भय मुनि भी अपनी मति में चिन्तन करते हैं अर्थात मुनि भी डरते हैं, तभी वे सदा स्वधर्म में स्थित रहते हैं ।
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*भाव भक्ति का मूल भय, भय कर भजिये राम ।*
*रज्जब भय मिल भृत्य१ ह्वै, भय में सीझे काम ॥१५॥*
भय-भाव तथा मुक्ति का कारण है, चन्मादि भय से डर के ही राम का भजन किया जाता है । जो जन्मादि भय से युक्त होता है, वही राम का भजन करके भक्त१ होता है । संसार-बन्धन से डरता है तभी मुक्ति का साधन करता है और साधन से ज्ञान द्वारा मुक्ति रूप कार्य सिद्ध होता है ।
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*महर कहर तैं डरपिये, करत हरत क्या वेर ।*
*ता थैं भय भागे नहीं, रज्जब समझ्या फेर ॥१६॥*
दया युक्त तथा क्रोध युक्त दोनों ही व्यक्तियों से डरते रहना चाहिये, कारण क्रोधी को क्रोध करते क्या देर लगती है और दयालु को दया त्यागते क्या देर लगती है । इसलिये हृदय से भय से भय नहीं भागना चाहिये । हमने इनके परिवर्तन को भली प्रकार समझ लिया है, अत: डरते रहते ही सब काम करना चाहिये ।
(क्रमशः)

*२५. अवस्था कौ अंग ४१/४४*

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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*२५. अवस्था कौ अंग ४१/४४*
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ऋषभदेव बोले नहीं, रहे ब्रह्ममय होइ । 
गरक भये निज ज्ञान मैं, द्वैत भाव नहिं कोइ ॥४१॥
तृतीय(वरिष्ठ) प्रकार के सिद्धों में ऋषभदेव जी की गणना हो सकती है, जो जीवनपर्यन्त ब्रह्ममय होकर ही रहे । वे उस ब्रह्ममय ज्ञान में ऐसे निमग्न हुए कि उनमें द्वैत भाव का कुछ भी अंश नहीं रह गया ॥४१॥
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जाग्रदवस्था जानिये, जबहिं होइ साक्षात । 
अष्टावक्र वसिष्ट मुनि, कही सबनि सौं बात ॥४२॥
ब्रह्मसाक्षात्कार होने पर योगी की वह जाग्रत् अवस्था कहलाती है; इस अवस्था में पहुँचने पर अष्टावक्र एवं वसिष्ठ मुनि ने उस ब्रह्मज्ञान का जनसामान्य को भी उपदेश किया ॥४२॥
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स्वप्न अवस्था मांहिं है, पूछै बोलै सैंन । 
दत्तात्रय सुकदेवजी, कहे कछूइक बैंन ॥४३॥
ऐसे योगी की स्वप्नावस्था वह कहलाती है, जब वह किसी जिज्ञासु के पूछने पर ब्रह्मज्ञानविषयक संक्षिप्त वचन बोलता है या वैसा संक्षिप्त संकेत करता है । श्रीदत्तात्रेय या श्रीशुकदेव इसके श्रेष्ठ उदाहरण हैं ॥४३॥
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सुषुपति मैं कछु सुधि नहीं, ऐसी परम समाधि । 
ऋषभदेव चुप करि रहे, छूटी सकल उपाधि ॥४४॥
सुषुप्ति अवस्था में पहुँचे हुए सिद्ध को लौकिक व्यवहार की कोई सुध बुध(ज्ञान) नहीं रहती । वह सदा उच्चतम समाधि में रत रह कर निरन्तर ब्रह्मज्ञान में निमग्न रहता है । ऋषभदेव इस अवस्था के ज्वलन्त उदाहरण हैं । ब्रह्मज्ञान की तीव्रता के कारण उन के सभी लौकिक विकार क्षीण हो चुके थे ॥४४॥ (५)
(क्रमशः) 

गुरमहिमा ॥

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*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*सो धी दाता पलक में, तिरे तिरावण जोग ।*
*दादू ऐसा परम गुरु, पाया किहीं संजोग ॥*
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*गुरमहिमा ॥*
मोहि मिलिया रामसनेही रे । मेरी जिव की जीवनि एही रे ॥टेक॥
पूरिबले पुनि पाया रे । सो भागि हमारे आया रे ॥ 
भगति मुकति का दाता रे । सो येक राम का राता रे ॥
उन साधन का सँग भावै रे । जन बषनौं मंगल गावै रे ॥१२९॥

“दुर्लभो मानुषो देहो क्षणभंगुरः । 
तत्रापि दुर्लभः मन्ये वैकुण्ठप्रिय दर्शनम् ॥” 
भागवत स्कंध ११ ॥ 
महात्माओं का दर्शन मात्र भी बड़े भाग्य से मिलता है । यदि उनका सान्निध्य मिल जाये, फिर उनका मार्गदर्शन भी मिल जाये तो कहना ही क्या है । 
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बषनांजी इसी भावना को व्यक्त करते हे कहते हैं – मुझे रामजी से सच्चा स्नेह करने वाले महाराज दादूजी मिल गये हैं जो मेरे जीवन के जिवनि = सर्वस्व हैं । मैंने उन्हें पूर्वजन्म में किये किन्हीं पुण्यों के उदय हो आने के कारण पाया है । वस्तुतः वे तो जीवन्मुक्त भगवत्स्वरूप थे किन्तु हमारे भाग्य = पुण्यकर्मों के उदय होने के कारण वे इस समय इस धराधाम पर पधारे । 
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वे भक्ति और मुक्ति दोनों ही के देने वाले हैं । वे एक निर्गुण-निराकार-परात्पर-परब्रह्म-राम में ही निमग्न रहने वाले हैं । बषनां कहता है, मुझे उक्त वर्णित लक्षणों वाले संतों का संग करना ही रुचिकर व प्रिय लगता है । अतः जन = भक्त बषनां ऐसे संतों के मिलन पर मंगल गान करता है ॥१२९॥

शुक्रवार, 22 मई 2026

*२५. अवस्था कौ अंग ३७/४०*

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
*२५. अवस्था कौ अंग ३७/४०*
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दूजौ रहै समुद्र मैं, सीस दिखावै आइ । 
पूछै बोलै बचन कौं, फेरि तहां छिपि जाइ ॥३७॥
दूसरा(वरीयान्) सिद्ध यद्यपि अधिक समय ब्रह्मामृत समुद्र में ही गोता लगाने में व्यतीत करता है; परन्तु कभी कभी उसमें से निकलकर किसी विशिष्ट जिज्ञासु की ब्रह्मविषयक जिज्ञासा भी शान्त करता है, तदनन्तर वह पुनः उसी ब्रह्मसमुद्र में गोता लगाने लगता है ॥३७॥ (२)
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ब्रह्मानंद समुद्र तैं, तीजौ निकसै नांहिं । 
गहरै पैठौ जाइ कै, मगन भयौ ता मांहिं ॥३८॥
तृतीय(वरिष्ठ) सिद्ध ब्रह्मानन्द समुद्र से बाहर कभी निकलता ही नहीं । वह तो निरन्तर(जीवनपर्यन्त) उसी ब्रह्मानन्द समुद्र में ही गोता लगाये रहता है और उसी में मग्न रहता है ॥३८॥ (३)
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अष्टावक्र वसिष्ट मुनि, प्रगट कियौ निज ज्ञांन । 
क्रम ही क्रम उपदेश करि, कीये ब्रह्म समांन ॥३९॥
उदाहरण : इन त्रिविध सिद्धों में प्रथम(वर) सिद्ध के लिये अष्टावक्र एवं वसिष्ठ ऋषि का उदाहरण दिया जा सकता है; जिन ने स्वरचित ग्रन्थों द्वारा जनसामान्य को ब्रह्मज्ञान का क्रमिक उपदेश कर उनमें से बहुतों को ब्रह्म कोटि में पहुँचा दिया ॥३९॥
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दत्तात्रय शुकदेवजी, बोले बचन रसाल । 
नृपति परीक्षत भूप जदु, मुक्त किये ततकाल ॥४०॥
द्वितीय(वरीयान्) प्रकार के सिद्धों में दत्तात्रेय एवं शुकदेव की गणना होती है । इनमें से शुकदेव ने राजा परीक्षित को, एवं दत्तात्रेय ने जदु को ब्रह्मज्ञान का ऐसा गम्भीर उपदेश किया कि वे तत्काल मुक्त हो गये ॥४०॥
(क्रमशः) 

बिछड़्या रामसनेही रे

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*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*ना वह मिलै, न हम सुखी, कहो क्यों जीवन होइ ।*
*जिन मुझको घायल किया, मेरी दारु सोइ ॥*
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राग मल्हार ॥१०॥ गुरु वियोग जन्य विरह ॥ 
बिछड़्या रामसनेही रे । म्हारै मन पछतावो एही रे ॥टेक॥ 
बीछुड़ियाँ बन दहिया रे । म्हारै हियड़ै करबत बहिया रे ॥
बिलखी सखी सहेली रे । ज्यूँ जल बिन नागर बेली रे ।
व मुलकनि की छबि छाँही रे । म्हारै रहि गई हिरदै माँही रे ॥
कोइ उहि उणिहारै नांही रे । हौं ढूंढि रही जग मांही रे ॥
अब फीकौ म्हारै भाँई रे । मँडली कौ मंडण नाँही रे । 
कौंण सभा मैं सोहै रे । जाकी निर्मल बाणी मोहै रे ॥
भरि भरि प्रेम पिलावै रे । कोइ दादू आणि मिलावै रे । 
बषनां बहुत बिसूरै रे । दरसणि कै कारणि झूरै रे ॥१२८॥
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यह पद बषनांजी ने दादूजी महाराज के परलोकगमन के उपरान्त वियोग जन्य विरह के अत्यधिक उत्पन्न होने पर बनाकर गाया था । इस पद में व्यक्त भावनाओं से लगता है बषनांजी का दादूजी के प्रति मानसिक लगाव तो था ही शारीरिक लगाव भी कम नहीं था । उनके तन-मन और वचन तीनों में ही दादूजी समाये हुए थे । 
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वे कहते हैं, राम से स्नेह करने वाले दादूजी महाराज आज मुझसे शरीररूपेण बिछुड़ गये हैं । मेरे मन में इसका गहरा पश्चाताप = दुःख है । उनके बिछुड़ जाने से मेरा मन रूपी वन धधक रहा है । ह्रदय पर करवत = आरा फिर रहा है । हम सभी शिष्य-प्रशिष्य रूपी सखी-सहेलियाँ वियोग के कारण उसी प्रकार बिलख-बिलख कर कुम्हला रही हैं जैसे बिना जल की नागरवेल कुम्हला जाती है । 
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दादूजी महाराज की मुस्कराती हुई उस आकृति की मेरे हृदय में अब प्रतिकृति(छाँही) मात्र ही रह गई है ।  उनकी जैसी आकृति अब संसार में और कोई रही नहीं है । मैं विरहणी उसको पूरे संसार में ढूंढ रही हूँ । मेरे लिये(म्हारै भाँई) सारा संसार ही सारहीन हो गया है क्योंकि मेरी मंडली को शोभा देने वाला प्रधान अब इस दुनिया में नहीं रहा है । 
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अब ऐसा कौन है जो रामसभा में शोभायमान होगा = विराजेगा जिसके निर्मल उपदेशों से संसार-सागर में डूब रहे अज्ञानी लोग प्रभावित होकर राम-रस-रसिक बनेंगे । वे राम-रस में छके राम प्रेम का रस सभी को प्याला भरकर पिलाते थे । ऐसे दादूजी को कोई पुनः लाकर मुझसे मिलादे, बस यही हृदयेच्छा है । बषनां उनको पल-पल, क्षण-क्षण बिसूरता है = याद करता है । उनके दर्शन नहीं हो रहे हैं, इस कारण सदैव झूरै = रोता रहता है ॥१२८॥ 

*१४. भयभीत भयानक का अंग ~९/१२*

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*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*१४. भयभीत भयानक का अंग ~९/१२*
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*जे सांई का सोच ह्वै, तो मन फूले नाँहिं ।*
*जन रज्जब सिमट्या रहै, ज्यों अजा उभयसिंह माँहिं ॥९॥*
दो सिंहो के पींजरो के बीच में बाँधकर रक्खी गई बकरी को कितना ही खिलाओ वह मोटी नहीं होती, वैसे ही यदि ईश्वर का भय हो तो मन सांसारिक विषयों से नहीं फूलता, संकुचित ही रहता है ।
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*रज्जब राम न भूलिये, जे मीच रहै मन माँहिं ।*
*याद करन को आदमी, या सम ओर सु नाँहिं ॥१०॥*
यदि मृत्यु का भय मन में रहे तो प्राणी राम को नहीं भूल सकता । हे मानव ! भगवान् को याद कराने का साधन इस मृत्यु भय के समान अन्य कोई भी नहीं है ।
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*रज्जब डर घर साधु का, महा पुरुष रहै माँहिं ।*
*तिन के सब काज सरे, जु बाहर निकसे नाँहिं ॥११॥*
संतों का स्थान भय ही है, महापुरुष भय में ही निवास करते हैं अर्थात मृत्यु, बुराई, आसुर गुणादि से सदा ही डरते रहते हैं, जो मृत्यु आदि के भय से मन को बाहर नहीं जाने देते उनके सभी कार्य सिद्ध हो जाते हैं ।
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*रज्जब डर डेरा बडा, बडे रहैं बिच आय ।*
*भय को भय लागे नहीं, नर देखो निरताय ॥१२॥*
भय रूप स्थान महान् है, बड़े पुरुष भी निर्भयता से बुरे कर्म करने की स्थिति से आकर भय में ही रहते हैं अर्थात बुराइयों से डरते रहते हैं । हे नरों ! जो स्वयं भय में स्थित है उसको भय नहीं लग सकता ।
(क्रमशः)

*२५. अवस्था कौ अंग ३३/३६*

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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*२५. अवस्था कौ अंग ३३/३६*
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बर सौ जीवनमुक्त है, तुरिया साक्षीभूत । 
लिपै छिपै नहिं सब करै, अनकरता अवधूत ॥३३॥
वर(उच्च) उस ज्ञानी पुरुष को कहते हैं जो जीवन्मुक्त१ हो चुका है । तथा जो तुर्यावस्था को अतिक्रान्त कर साक्षीभूत अवस्था में पहुँच चुका हो । जो सब कुछ करता हुआ भी लोक व्यवहार में कहीं आसक्त या लिप्त नहीं होता । तथा उस का समस्त व्यवहार अवधूत के समान होता है ॥३३॥ 
(१ जीवन्मुक्त अवधूत के लक्षण :
क्लेश-पाश-तरङ्गाणां कृन्तनेन विमुण्डनम् ।
सर्वावस्थाविनिर्मुक्तः सोऽवधूतोऽभिधीयते ॥ 
सि० सि० प०, पृ० ८३
गते न शोकं विभवे न वाञ्छां, प्राप्ते न हर्षं न करोति योगी ।
आनन्दपूर्णो निजबोधलीनो न बाध्यते कालपथेन नित्यम् ॥ 
सि० सि० प०, पृ० ९७)
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महा मुक्त अक्रिय सदा, सो कहिये बरियान । 
तुरिया तुरियातीत कै, मध्य कहैं सज्ञान ॥३४॥
वरीयान्(उच्चतर) सिद्ध उसे कहते हैं जो लौकिक व्यवहारों से सर्वथा मुक्त हो, तथा लौकिक वैदिक कर्मों का भी सर्वथा त्याग कर चुका हो । इसकी स्थिति ज्ञानियों ने तुर्य एवं तुर्यातीत के मध्य बतायी है ॥३४॥
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जाकी गति न लखि परै, सो कहिये जु बरिष्ट ।
तुरीयातीत परातपर, बचन परै उतकृष्ट ॥३५॥
तथा वरिष्ठ(उच्चतम) सिद्ध उसे कहते हैं जिस की क्रियाओं को पहचाना या समझा न जा सके । वह तुर्यातीत, परात् पर(ब्रह्म) के विषय में उत्कृष्ट वचन बोलता है ॥३५॥
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ब्रह्म समुद्र जहां तहां, ता महिं तीनौं लीन । 
एक किनारे आइ करि, सब कौं सिक्षा दीन ॥३६॥
यद्यपि ये तीनों ही प्रकार के सिद्ध निरन्तर ब्रह्मामृत समुद्र में गोता(डुबकी) लगाये रहते हैं; परन्तु उनमें से एक(वरसिद्ध) प्रायः किनारे(लोक में) आकर सामान्य जन को ब्रह्म की शिक्षा(ब्रह्मविषयक ज्ञान) भी देता रहता है ॥३६॥ (१)
(क्रमशः)