मंगलवार, 3 फ़रवरी 2026

*१९. अथ साधु कौ अंग १/४*

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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*१९. अथ साधु कौ अंग १/४*
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संत समागम कीजिये, तजिये और उपाइ ।
सुन्दर बहुते उद्धरे, सत संगति मैं आइ ॥१॥
महाराज श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - साधक को सद्‌गुणों की प्राप्ति के लिये अन्य सभी उपायों का त्याग कर केवल सत्सङ्ग का आश्रय लेना चाहिये; क्योंकि इस अनुपम सत्सङ्गति साधन द्वारा ही अनेक साधक दुस्तर भवसागर को पार कर सके हैं ॥१॥
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सुन्दर या सतसंग मैं, भेदाभेद न कोइ ।
जोई बैठै नाव मैं, सो पारंगत होइ ॥२॥
इस सत्सङ्ग का आश्रय लेने पर कोई भेद या अभेद, जाति, वर्ण, कुल, आश्रम, आयु, धन आदि की हीनता या उत्तमता नहीं देखी जाती । जैसे नौका की यात्रा में उक्त हीनता या उत्तमता का कोई महत्त्व नहीं होता; क्योंकि उसमें जो भी बैठा वह दुर्गम नदी के पार हो गया; वैसे ही जिसने भी सत्सङ्ग किया वह एक न एक दिन भवसागर से पार हो ही गया ॥२॥
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सुन्दर जो सतसंग मैं, बैठै आइ बराक ।
सीतल और सुगंध ह्वै, चंदन की ढिग ढाक ॥३॥
श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - यदि कोई मूढ जन(बराक) भी सत्सङ्गति करने लगे तो उसकी मूढता उसी प्रकार भङ्ग हो जाती है, जैसे किसी चन्दन वृक्ष के पास उत्पन्न हुए ढाक के वृक्ष में भी शीतलता एवं सुगन्ध आ जाती है ॥३॥
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सुन्दर या सतसंग की, महिमा कहिये कौंन ।
लोहा पारस कौं छुवै, कनक होत है रौंन ॥४॥
इस सत्सङ्गति की यथातथ(वास्तविक) महिमा का व्याख्यान कौन कर सकता है । लोक में हम देखते हैं - पारस का स्पर्श होते ही लोह धातु सुन्दर सवर्ण के रूप में परिवर्तित हो जाती है - यह सत्सङ्ग का ही प्रताप है ! ॥४॥ 
(रौंन = रमणीय)
(क्रमशः)

रामगढ गमन ~

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*॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥*
*॥ दादूराम~सत्यराम ॥*
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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१४ आचार्य गुलाबदासजी
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रामगढ गमन ~ 
रामगढ(शेखावटी) के पास आये तब अपने आने की सूचना पोद्दार भक्तों को दी । सूचना मिलने पर पोद्दार एकत्र होकर बाजे गाजे से संकीर्तन करते हुये आचार्य गुलाबदासजी महाराज के पास अगवानी करने आये । भेंट चढाकर सत्यराम बोलते हुये सब ने दंडवत की । 
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आवश्यक  प्रश्‍नोत्तर होने के पश्‍चात् आचार्य को अति सत्कार पूर्वक सवारी पर बैठाकर संकीर्तन करते हुये नगर के मुख्य बाजार से ले जाकर नियत स्थान में ठहराया । सेवा का सुन्दर प्रबन्ध कर दिया । आचार्य गुलाबदासजी महाराज जब तक रामगढ में रहे तब तक पोद्दार भक्तों ने परिवार के सहित सत्संग किया और अच्छी सेवा की । 
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आचार्य गुलाबदासजी जब रामगढ से पधारने लगे तब पोद्दार भक्तों ने आचार्यजी को ढाई हजार रुपये भेंट किये तथा संतों को भी यथोचित वस्त्रादि दिये और अति सत्कार से सस्नेह विदा किया । रामगढ से विदा होकर आचार्य गुलाबदासजी महाराज शिष्य संत मंडल के सहित भ्रमण करते हुये तथा धार्मिक जनता को निर्गुण राम भक्ति का उपदेश करते हुये नारायणा दादूधाम में पधार गये ।
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सूरतरामजी को छडी ~ 
वि. सं. १९४४ में महन्त सूरतरामजी सिंगरावट को आचार्य गुलाबदासजी महाराज ने दस्तूर के साथ चान्दी की छडी बक्शी । महन्त सूरतरामजी ५२ थामों में चतुरदासजी सिंगरावट वालों की परंपरा के महन्त थे । तुलसीदासजी के चातुर्मास ~वि. सं. १९४४ में तुलसीदासजी भाभोलावका ने चातुर्मास का निमंत्रण आचार्य गुलाबदासजी महाराज को दिया । आचार्यजी ने स्वीकार कर लिया । 
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फिर चातुर्मास का समय समीप आने पर आचार्य गुलाबदासजी महाराज शिष्य संत मंडल के सहित तुलसीदासजी के पधारे । आचार्यजी की अगवानी के लिये तुलसीदासजी भक्त मंडल के सहित गये और मर्यादापूर्वक  प्रणामादि शिष्टाचार के पश्‍चात् अति आदर सत्कार से संकीर्तन करते हुये लाकर स्थान पर ठहराया । 
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चातुर्मास आरंभ हो गया । चातुर्मास के सभी कार्यक्रम सुचारु रुप से चलने लगे । शांति पूर्वक चातुर्मास समाप्त हुआ तब तुलसीदासजी ने मर्यादानुसार आचार्य गुलाबदासजी महाराज को भेंट और शिष्य संत मंडल को वस्त्र देकर सस्नेह विदा किया । विदा होकर भ्रमण करते हुये नारायणा दादूधाम में पधार गये ।  
(क्रमशः)  

मेरा परित्राण करो

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🌷 *#श्रीरामकृष्ण०वचनामृत* 🌷
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*जे नर कामिनी परहरैं, ते छूटैं गर्भवास ।*
*दादू ऊँधे मुख नहीं, रहैं निरंजन पास ॥*
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साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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नरेन्द्र - निर्लिप्त संसार कहिये या चाहे जो कहिये, काम-कांचन का त्याग बिना किये न होगा । स्त्री के साथ सहवास करते हुए घृणा नहीं होती ? जहाँ कृमि, कफ, मेध, दुर्गन्ध –
"अमेध्यपूर्णे कृमिजालसंकुले स्वभावदुर्गन्धिविनिन्दितान्तरे ।
कलेवरे मूत्रपूरीषभाविते रमन्ति मूढ़ा विरमन्ति पण्डिताः ॥
"वेदान्त-वाक्यों में जो रमण नहीं करता, हरिरस का जो पान नहीं करता, उसका जीवन ही वृथा है ।
"ओंकारमूलं परमं पदान्तरं गायत्रीसावित्रीसुभाषितान्तरम् ।
वेदान्तरं यः पुरुषो न सेवते वृथान्तरं तस्य नरस्य जीवनम् ॥
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"एक गाना सुनिये - (भावार्थ)
"मोह और कुमन्त्रणा को छोड़ो, उन्हें जानो, तब सम्पूर्ण कष्ट छूट जायेंगे । चार दिन के सुख के लिए अपने जीवन-सखा को भूल गये, यह कैसा ?
"कौपीन धारण बिना किये दूसरा उपाय नहीं - संसारत्याग !" - यह कहकर नरेन्द्र सस्वर गाने लगे –
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"वेदान्तवाक्येषु सदा रमन्तो भिक्षान्नमात्रेण च तुष्टिमन्तः ।
अशोकमन्तःकरणे चरन्तः कौपीनवन्तः खलु भाग्यवन्तः ॥"
नरेन्द्र फिर कह रहे हैं - "मनुष्य संसार में बँधा क्यों रहेगा ? क्यों वह माया में पड़े ? मनुष्य का स्वरूप क्या है ? 'चिदानन्दरूपः शिवोऽहं शिवोऽहं ।' मैं ही वह सच्चिदानन्द हूँ ।"
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फिर स्वरसहित नरेन्द्र शंकराचार्य-कृत स्तव पढ़ने लगे –
ॐ मनो बुद्धयहंकारचित्तानि नाहं, न च श्रोत्रजिह्वे न च घ्राणनेत्रे ।
न च व्योमभूमिर्न तेजो न वायुश्चिदानन्दरूपः शिवोऽहं शिवोऽहम् ॥
एक दूसरा स्तव वासुदेवाष्टक भी नरेन्द्र सस्वर पढ़ रहे हैं । "हे मधुसूदन ! मैं तुम्हारे शरणागत हूँ, मुझ पर कृपा करके काम, निद्रा, पाप, मोह, स्त्री-पुत्र का मोहजाल, विषय-तृष्णा, इन सब से मेरा परित्राण करो और अपने पाद-पद्मों में भक्ति दो ।"
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"ॐ इति ज्ञानरूपेण रागाजीर्णेन जीर्यतः।
कामनिद्रां प्रपन्नोऽस्मि त्राहि मां मधुसूदन ॥
न गतिर्विद्यते नाथ त्वमेकः शरणं प्रभो ।
पापपंके निमग्नोऽस्मि त्राहि मां मधुसूदन ॥
मोहितो मोहजालेन पुत्रदारगृहादिषु ।
तृष्णया पीड्यमानोऽहं त्राहि मां मधुसूदन ॥
भक्तिहीनं च दीनं च दुःखशोकातुरं प्रभो ।
अनाश्रयमनाथं च त्राहि मां मधुसूदन ॥
गतागतेन श्रान्तोऽहं दीर्घसंसारवर्त्मसु ।
येन भूयो न गच्छामि त्राहि मां मधुसूदन ॥
बहुधाऽपि मया दृष्टं योनिद्वारं पृथक् पृथक् ।
गर्भवासे महद्दुःखं त्राहि मां मधुसूदन ॥
तेन देव प्रपन्नोऽस्मि नारायणपरायणः ।
जगत्संसारमोक्षार्थ त्राहि मां मधुसूदन ॥
वाचयामि यथोत्पन्नं प्रणमामि तवाग्रतः ।
जरामरणभीतोऽस्मि त्राहि मां मधुसूदन ॥
सुकृतं न कृतं किंचित् दुष्कृतं च कृतं मया ।
संसारे पापपंकेऽस्मिन् त्राहि मां मधुसूदन ॥
देहान्तरसहस्राणामन्योन्यं च कृतं मया ।
कर्तृत्वं च मनुष्याणां त्राहि मां मधुसूदन ॥
वाक्येन यत्प्रतिज्ञातं कर्मणा नोपपादितम् ।
सोऽहं देव दुराचारस्त्राहि मां मधुसूदन ॥
यत्र यत्र हि जातोऽस्मि स्त्रीषु वा पुरुषेषु वा ।
तत्र तत्राचला भक्तिस्त्राहि मां मधुसूदन ॥"
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मास्टर - (स्वगत) - नरेन्द्र को तीव्र वैराग्य है । इसलिए मठ के अन्य भाइयों की भी यही अवस्था है । इन लोगों को देखते ही श्रीरामकृष्ण के उन भक्तों में, जो संसार में अब भी हैं कामिनीकांचन-त्याग की इच्छा प्रबल हो जाती है । अहा ! इनकी यह कैसी अवस्था है ! दूसरे कुछ भक्तों को उन्होंने (श्रीरामकृष्ण ने) अब भी संसार में क्यों रखा है ? क्या वे कोई उपाय करेंगे ? क्या वे तीव्र वैराग्य देंगे या संसार में ही भुलाकर रख छोड़ेंगे ?
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नरेन्द्र तथा और दो-एक अन्य भाई भोजन करके कलकत्ता गये । नरेन्द्र रात को फिर लौटेंगे । नरेन्द्र के घरसम्बन्धी मुकदमे का अब भी फैसला नहीं हुआ । मठ के भाइयों को नरेन्द्र की अनुपस्थिति सह्य नहीं होती । सब सोच रहे हैं कि नरेन्द्र कब लौटें ।
(क्रमशः)

*३. श्री गुरुदेव का अंग ~१३७/१४०*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी* टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*३. श्री गुरुदेव का अंग ~१३७/१४०*
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*सद्गुरु वर्षे मेघ ज्यों, रज्जब ॠतु शिर आय ।*
*शिष वसुधा व्है लेय जल, ऊगे अगम अघाय१ ॥१३७॥*
वर्षा ॠतु में बादल वर्षते हैं, उस जल को पृथ्वी लेती है तब उसमें अनन्त बीज उगते हैं और उनसे हरियाली होकर पृथ्वी की शोभा बढ़ती है । वैसे ही, सद्गुरु जिज्ञासा होने पर शिष्यों को ज्ञान प्रदान करते हैं, शिष्य उसे ग्रहण करते हैं तब तृप्त१ हो जाते हैं ।
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*रज्जब रवे सु सार के, चम्बुक लगे सु धाय ।*
*त्यों अंकूरी आतमा, सद्गुरु मिले सु आय ॥१३८॥*
जैसे चम्बुक को पृथ्वी की रेत में हिलाने से रेत में स्थित लोहे के दाने दौड़कर चम्बुक के आ लगते हैं । वैसे ही जिसमें परमार्थ का अँकुर है वह जीवात्मा सद्गुरु से आ मिलता है ।
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*चेला तब ही जानिये, चित्त रहै चितलाय ।* 
*रज्जब दूजा देखिये, जब लग आवे जाय ॥१३९॥* 
१३९-१४२ में शिष्य की पहचान बता रहे हैं - जब तक विषयों में चित का गमनागमन होता है तब तक शिष्य न कहला कर शिष्य से अन्य संसारी ही कहलायेगा । शिष्य तभी जानना चाहिये, जब वह अपने चित्त को चेतन में ही लगाये रहे ।
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*शिष्य सही सोई भया, रहै सीख में जोय ।* 
*रज्जब श्रद्धा सीख सौं, दूजा कदे न होय ॥१४०॥* 
सच्चा शिष्य वही कहलाता है, जो गुरु की शिक्षा में रहता है । श्रद्धा सहित गुरु की शिक्षा मानने वाले शिष्य में द्वैत भाव कभी भी उत्पन्न नहीं होता । 
(क्रमशः)

हुक्मदासजी के चातुर्मास ~

*#daduji*
*॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥*
*॥ दादूराम~सत्यराम ॥*
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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१४ आचार्य गुलाबदासजी
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हुक्मदासजी के चातुर्मास ~ 
वि. सं. १९३७ में ढीकोल्या के हुक्मदासजी ने आचार्य गुलाबदासजी महाराज को चातुर्मास का निमंत्रण दिया था । आचार्य जी स्वीकार किया था । चातुर्मास का समय आने पर आचार्य गुलाबदासजी महाराज अपने शिष्य संत मंडल के सहित हुक्मदासजी के पधारे । 
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हुक्मदासजी ने शिष्य संत मंडल के सहित आचार्य गुलाबदासजी महाराज का सामेला बडे ठाट बाट से करके अपने स्थान पर ले गये । चातुर्मास आरंभ हो गया । चातुर्मास के सभी कार्यक्रम सुचारु रुप से चलने लगे । सत्संग अच्छा होने लगा । समाप्ति पर हुक्मदासजी ने मर्यादानुार आचार्य जी को भेंट दी और संतों को वस्त्र देकर सस्नेह सबको विदा किया । 
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जीन्द के नरेश के चातुर्मास ~
वि. सं. १९३८ में जीन्द नरेश रघुनाथसिंहजी ने आचार्य गुलाबदासजी महाराज को चातुर्मास का निमंत्रण दिया । आचार्यजी ने स्वीकार कर लिया । चातुर्मास का समय समीप आने पर आचार्य गुलाबदासजी महाराज ने अपने शिष्य संत मंडल के साथ चातुर्मास के लिये नारायणा दादूधाम से प्रस्थान किया और जीन्द राज्य की राजधानी के पास पहुँचकर अपनी मर्यादा के अनुसार जीन्द नरेश को अपने आने की सूचना दी । 
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सूचना मिलने पर जीन्द नरेश को रघुनाथसिंह जी राजकीय लवाजमा तथा भक्त मंडल के सहित बाजे गाजे से संकीर्तन करते हुये आचार्य गुलाबदासजी महाराज की अगवानी करने आये । मर्यादा के अनुसार भेंट चढाकर प्रणाम किया । और आवश्यक प्रश्‍नोत्तर हो जाने के पश्‍चात् आचार्यजी को सवारी पर बैठाकर नगर के मुख्य बाजार से संकीर्तन करते हुये ले जाकर नियत स्थान पर ठहराया । सेवा का सब प्रबन्ध करा दिया । 
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चातुर्मास आरंभ हो गया । चातुर्मास के सभी कार्यक्रम सुचारु रुप से चलने लगे । दोनों समय सत्संग होने लगा । नगर के नर-नारी दर्शन करने तथा सत्संग करने आने लगे । राजा, राज परिवार, प्रजानन सत्संग में अति श्रद्धा भक्ति से आकर ज्ञान भक्ति रुप अमृत का पान करते थे । 
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आचार्य गुलाबदासजी महाराज का प्रवचन रुचि कर होने से जनता ठीक समय पर आ जाती थी । सत्संग की दृष्टि से यह चातुर्मास भी बहुत अच्छा हुआ । जीन्द राज्य के इस चातुर्मास में आचार्यजी गुलाबदासजी महाराज तथा सब सतों का ही अच्छा सत्कार हुआ चातुर्मास समाप्ति पर आचार्यजी को मर्यादानुसार भेंट तथा संतों को वस्त्रदि देकर सस्नेह सब को विदा किया ।
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उतराध की रामत ~ 
जीन्द राज्य से विदा होकर आचार्य गुलाबदासजी महाराज ने शिष्य संत मंडल के सहित उतराध की रामत की । उतराधे स्थानधारी साधुओं ने तथा सेवकों ने आचार्यजी का अच्छा स्वागत किया । आचार्यजी भी सबके हित का उपदेश देते हुये पोद्दार भक्तों के आग्रह से रामगढ शेखावटी की ओर आगे बढे ।
(क्रमशः) 

*१८. सूरातन कौ अंग २३/२५*

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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*१८. सूरातन कौ अंग २३/२५*
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सुन्दर निस दिन साधु कै, मन मारन की मूठि । 
मनकै आगै भागि करि, कबहुं न फेरै पूठि ॥२३॥
इस प्रकार, साधक को अपने मन पर निग्रह करने हेतु, गुरूपदिष्ट ज्ञान रूप खड्‌ग हाथ में ले कर, सर्वदा सन्नद्ध रहना चाहिये । ऐसा न हो कि वह साधक इस युद्ध में हताश होकर मन को पीठ दिखाता हुआ पीछे हट जाय; क्योंकि पीछे हट कर भागना तो उस की कायरता ही कहलायगी ॥२३॥
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मारै सब संग्राम करि, पिसुनहु ते घट मांहिं । 
सुन्दर कोऊ सूरमा, साधु बराबरि नांहिं ॥२४॥
साधक को अपने अन्य काम क्रोध, राग द्वेष, लोभ मोह आदि आन्तरिक शत्रुओं को भी इसी(उपर्युक्त) पद्धति से युद्ध करते हुए नष्ट कर देना चाहिये; क्योंकि साधु से बढकर अन्य कोई वीर इस संसार में श्रीसुन्दरदासजी को नहीं दिखायी देता ॥२४॥
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साधु सुभट अरु सूरमा, सुन्दर कहै बखांनि । 
कहन सुनन कौं और सब, यह निश्चय करि जांनि ॥२५॥
इति सूरातन कौ अङ्ग ॥१८॥
श्रीसुन्दरदासजी महाराज कहते हैं - इस प्रकार उपर्युक्त २४ दोहा छन्दों के माध्यम से साधु, योद्धा(सैनिक) एवं वीर के लक्षण बता दिये । इन लक्षणों से विहीन कोई पुरुष यदि स्वयं को 'वीर' कहता है तो यह उस का कथनमात्र ही है; इसमें वास्तविकता नहीं है ॥२५॥
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इति सूरातन कौ अङ्ग सम्पन्न ॥१८॥
(क्रमशः)

*वासना के रहते ईश्वर में अविश्वास होता है*

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🌷 *#श्रीरामकृष्ण०वचनामृत* 🌷
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*दादू प्यासा प्रेम का, साहिब राम पिलाइ ।*
*प्रकट प्याला देहु भर, मृतक लेहु जिलाइ ॥*
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साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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*वासना के रहते ईश्वर में अविश्वास होता है*
प्रसन्न - कभी तो तुम कहते हो, भगवान हैं ही नहीं और अब ये सब बातें सुना रहे हो । तुम्हारी बातों का कुछ ठीक ही नहीं । तुम प्रायः मत बदलते रहते हो । (सब हँसते हैं)
नरेन्द्र - यह बात अब कभी न बदलूँगा - जब तक वासनाएँ रहती हैं तब तक ईश्वर पर अविश्वास रहता है । कोई न कोई कामना रहती ही है । कुछ नहीं तो भीतर ही भीतर पढ़ने की इच्छा रह गयी । पास करूँगा, पण्डित होऊँगा, इस तरह की वासना ।
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नरेन्द्र भक्ति से गद्गद होकर गाने लगे ।
'वे शरणागतवत्सल हैं, पिता और माता हैं । ...'
'जय देव, जय देव, जय मंगलदाता, जय जय मंगलदाता ।
संकटभयदुःखत्राता, विश्वभुवनपाता , जय देव, जय देव ॥
नरेन्द्र फिर गा रहे हैं । भाइयों से हरिरस का प्याला पीने के लिए कह रहे हैं । कहते हैं, ईश्वर पास ही हैं, जैसे मृग के पास कस्तूरी ।
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"पीले अवधूत, हो मतवाला, प्याला प्रेम हरिरस का रे ।
बाल अवस्था खेलि गँवायो, तरुण भयो नारीबस का रे ।
वृद्ध भयो कफ वायु ने घेरा, खाट पड़ो रह्यो शाम-सकारे ।
नाभि-कमल में है कस्तूरी, कैसे भरम मिटै पशु का रे ।
बिन सद्गुरु नर ऐसहि ढूँढ़ै, जैसे मिरिग फिरै वन का रे ॥"
मास्टर बरामदे से ये सब बातें और संगीत सुन रहे हैं ।
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नरेन्द्र उठे । कमरे में आते समय कह रहे हैं - 'इन युवकों से बातचीत करते करते मेरा सिर गरम हो गया ।' बरामदे में मास्टर को देखकर उन्होंने कहा, 'मास्टर महाशय, आइये पानी पियें ।'
मठ के एक भाई नरेन्द्र से कह रहे हैं, 'इतने पर भी तुम क्यों कहते हो कि ईश्वर नहीं है ?' नरेन्द्र हँसने लगे ।
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*नरेन्द्र का तीव्र वैराग्य । गृहस्थाश्रम*
दूसरे दिन सोमवार है । ९ मई १८८७ । सबेरे मास्टर मठ के बगीचे में एक पेड़ के नीचे बैठे हुए हैं । मास्टर सोच रहे हैं - "श्रीरामकृष्ण ने मठ के भाइयों का काम-कांचन छुड़ा दिया । अहा ! ईश्वर के लिए ये लोग व्याकुल हो रहें हैं ! यह स्थान मानो साक्षात् वैकुण्ठ है ! मठ के भाई मानो साक्षात् नारायण हैं ! श्रीरामकृष्ण को गये अभी अधिक दिन नहीं हुए । इसलिए वे सब भाव अब भी ज्यों के त्यों बने हैं ।
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"अयोध्या तो वही है, परन्तु राम नहीं है ।'
"इनसे तो उन्होंने(श्रीरामकृष्ण ने) गृहत्याग करा लिया, फिर कुछ और जो हैं, उन्हें ही क्यों घर में रखा है, उनके लिए क्या कोई उपाय नहीं है ?"
नरेन्द्र ऊपर के कमरे से देख रहे हैं । मास्टर अकेले पेड़ के नीचे बैठे हैं । उतरकर हँसते हुए वे कह रहे हैं - 'क्यों मास्टर महाशय, क्या हो रहा है ?'
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कुछ बाते हो जाने पर मास्टर ने कहा - 'अहा ! तुम्हारा स्वर बड़ा मधुर है ! कोई श्लोक कहो ।'
नरेन्द्र स्वर से अपराध-भंजन स्तव कहने लगे । गृहस्थगण ईश्वर को भूले हुए हैं, - बाल्य, प्रौढ़ और वार्धक्य तक वे न जाने कितने अपराध करते हैं ! क्यों वे मनसा, वाचा और कर्मणा ईश्वर की सेवा नहीं करते ? –
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"बाल्ये दुःखातिरेको मललुलितवपुः स्तन्यपाने पिपासा,
नो शक्तश्चेन्द्रियेभ्यो भवगुणजनिताः जन्तवो मां तुदन्ति ।
नानारोगादिदुःखाद्रुदनपरवशः शंकरं न स्मरामि,
क्षन्तव्यो मेऽपराधः शिव शिव शिव भो श्रीमहादेव शम्भो ॥
प्रौढोऽहं यौवनस्थो विषयविषधरैर्पचभिर्मर्मसन्धौ,
दष्टो नष्टो विवेकः सुतधनयुवतिस्वादुसौख्ये निषण्णः ।
शैवीचिन्ताविहीनं मम हृदयमहो मानगर्वाधिरूढम्,
क्षन्तव्यो मेऽपराधः शिव शिव शिव भो श्रीमहादेव शम्भो ॥
वार्धक्ये चेन्द्रियाणां विगतगतिमतिश्चाधिदैवादितापैः,
पापैः रोगैर्वियोर्गस्त्वनवसितवपुः प्रौढिहीनं च दीनम् ।
मिथ्यामोहाभिलाषैर्भमति मम मनो धूर्जटेर्ध्यनिशून्यम्,
क्षन्तव्यो मेऽपराधः शिव शिव शिव भो श्रीमहादेव शम्भो ॥
स्नात्वा प्रत्यूषकाले स्नपनविधिविधौ नाह्यतं गांगतोयं,
पूजार्थं वा कदाचित् बहुतरगहनात् खण्डबिल्वीदलानि ।
नानीता पद्ममाला सरसि विकसिता गन्धधूपौ त्वदर्थ,
क्षन्तव्यो मेऽपराधः शिव शिव शिव भो श्रीमहादेव शम्भो ॥
गात्रं भस्मसितं सितं च हसितं हस्ते कपालं सितं,
खट्वांगं च सितं सितश्च वृषभः कर्णे् सिते कुण्डले ।
गंगाफेनसिता जटा पशुपतेश्चन्द्रः सितो मूर्धनि,
सोऽयं सर्वसितो ददातु विभवं पापक्षयं सर्वदा ॥..."
स्तवपाठ हो गया । फिर बातचीत होने लगी ।
(क्रमशः)

सोमवार, 2 फ़रवरी 2026

*३. श्री गुरुदेव का अंग ~१३३/१३६*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी* टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*३. श्री गुरुदेव का अंग ~१३३/१३६*
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*शब्द सुरति परसे नहिं, तब लग बाँझी जोय१ ।*
*रज्जब परसी जानिये, जब बालक विरहा होय ॥१३३॥*
१३३ - १३८ में शब्द और सुरति के मिलन की पहचान बता रहे हैं - जैसे नारी१ पुरुष से नहीं मिलती तब तक बंध्या ही है और जब उसके बालक हो जाय तब जानो कि - वह पुरुष से मिली है । वैसे ही जब तक वृत्ति सद्गुरु से नहीं मिलती तब तक बंध्या ही है । जब वृत्ति भगवद् विरह उत्पन्न होता है तब ही निश्चय होता है कि - यह सद्गुरु शब्द से मिली है ।
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*घन बादल वर्षा भई, सींप हिं श्रध्दा नाँहिं ।*
*रज्जब उपज्यों ऊपजे, स्वाति बूंद पड़ माँहिं ॥१३४॥*
बादलों के समूह से स्वाति नक्षत्र में वर्षा हुई किन्तु शुक्ति में उसे लेने की इच्छा नहीं हुई तो मोती कैसे होगा ? वह तो सींप में स्वाति बिन्दु लेने की श्रध्दा होने पर ही स्वाति बिन्दु उसमें पड़कर उत्पन्न होगा । वैसे ही वृत्ति में सद्गुरु-शब्द ग्रहण की श्रध्दा न होगी तो ज्ञान उत्पन्न न होगा । श्रध्दा होने पर ही वृत्ति में शब्द स्थिर होकर ज्ञान होगा ।
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*घटा सुगुरु आशोज की, स्वाति बूंद सत बैन ।*
*सीप सुरति श्रध्दा सहित, तहँ मुक्ता मन ऐन१ ॥१३५॥*
आश्विन मास घन-घटा से वर्षने वाली स्वाति बिन्दु को शुक्ति ठीक१ ढंग से लेती है, तब ही उसमें मोती बनता है । वैसे श्रेष्ठ गुरु के सत्य वचन शिष्य की वृत्ति श्रध्दा सहित ग्रहण करती है तब मन साँसारिक भावनाओं से भली प्रकार मुक्त हो जाता है ।
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*आतम आरतिवंत है, सद्गुरु शब्द समाय ।*
*रज्जब रुचि के राचणे, फल मांही रह जाय ॥१३६॥*
जीवात्मा विरह दु:ख से युक्त होता है, तब उसकी वृत्ति सद्गुरु-शब्दों में ही लीन होती है, फिर अपनी रुचि के अनुसार प्रभु-प्रेम में निमग्न होती है उक्त साधना का फल यही होता है कि वृत्ति संसार में जाने से रुक कर प्रभु में स्थिर हो जाती है ।
(क्रमशः)

कल्याणदासजी के चातुर्मास ~

*#daduji*
*॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥*
*॥ दादूराम~सत्यराम ॥*
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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१४ आचार्य गुलाबदासजी
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कल्याणदासजी के चातुर्मास ~  
वि. सं. १९३४ के चातुर्मास का निमंत्रण आचार्य गुलाबदासजी महाराज को कल्याणदासजी ने दिया । आचार्य जी ने स्वीकार किया । चातुर्मास का समय आने पर अपने शिष्य संत मंडल के सहित आचार्य गुलाबदासजी महाराज कल्याणदासजी के चातुर्मास में विराजे । 
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चातुर्मास के कार्यक्रम कल्याणदासजी ने अच्छी प्रकार चलाये । आचार्यजी तथा संतों की अच्छी सेवा की । चातुर्मास समाप्ति पर मर्यादा के अनुसार आचार्यजी को भेंट तथा सब संतों को वस्त्रादि देकर सस्नेह विदा किया ।  
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तुकोराव होल्कर का आगमन ~
वि. सं. १९३९ में इन्दौर के महाराजा तुकोरावजी होल्कर नारायणा दादूधाम के कर्मचारियों द्वारा उनका स्वागत कराया । कर्मचारी उनको मर्यादा के अनुसार मंदिर में ले गये । मंदिर में दर्शन करके तुकोरावजी ने चढावा किया । पुजारी ने प्रसाद दिया । मंदिर से भंडारी आदि उनको बारहदरी में आचार्य गुलाबदासजी महाराज के पास ले गये । 
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आचार्य गुलाबदासजी महाराज का दर्शन करके तुकोरावजी ने भेंट चढाकर प्रणाम किया और नम्रता पूर्वक हाथ जोडकर सामने बैठ गये । और सत्संग करते रहे । इधर तुकोरावजी के सहित उनके साथ के सज्जनों के ठहरने आदि का प्रबन्ध कर्मचारियों ने कर दिया । भोजन की व्यवस्था हो गई । तुकोरावजी ने इच्छानुसार आचार्य गुलाबदासजी महाराज से सत्संग किया और भोजन आदि से निवृत होकर उनकी इच्छानुसार ठहरे । पश्‍चात् आचार्यजी को प्रणाम करके तथा मंदिर में दर्शन करके चले गये ।  
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जमातों की रामत ~ 
वि. सं. १९३६ में निवाई तथा लालसोट जमातों की रामत की । रामत में बहुत आनन्द रहा । जमातों के साधुओं ने बहुत अच्छा - सामेला किया । बाजे गाजे से संकीर्तन करते हुये जमातों में ले गये । बहुत अच्छी रसोइयाँ दीं । मर्यादा के अनुसार भेंट दी और पधारने लगे तब अति श्रद्धा भाव से विदा किया ।  
(क्रमशः) 

*१८. सूरातन कौ अंग २०/२२*

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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*१८. सूरातन कौ अंग २०/२२*
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सुन्दर सोभै सूरिवाँ, मुख परि बरिखै नूर । 
फौज फटावै पलक मैं, मार करै चकचूर ॥२०॥
श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - ऐसे शूर वीर ही युद्धभूमि में शोभा प्राप्त करते हैं । उनके मुख पर उस समय एक विशेष(दर्शनीय) आभा(कान्ति) झलकने लगती है और क्षणमात्र में ही विशाल सेना को भी नष्ट करने का साहस अपने में ले आते हैं ॥२०॥
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सुन्दर खैंचि कमान कौं, भरि करि मारै बांन ।
जाकै लागै ठौर जिहिं, लेकरि निकसै प्रांन ॥२१॥
उस समय वह अपने धनुष की डोर(प्रत्यञ्चा) को तीव्रता से खींच कर किसी को बाण मारता है तब वह विरोधी उस बाण के लगते ही प्राण त्याग कर यमलोक पहुँच जाता है ॥२१॥
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सुन्दर सील सनाह करि, तोष दियौ सिर टोप । 
ज्ञान षडग पुनि हाथ लै, कीयौ मन परि कोप ॥२२॥
भक्तियोग में शूरता : अब महाराज सुन्दरदासजी इस भक्तियोग के साधक को युद्ध की विधि का उपदेश कर रहे हैं - भक्तियोग का साधक भी अपने शीलव्रत(सदाचार) को कवच(सन्नाह) के रूप में धारण करे, सन्तोष को अपने शिर पर टोप(शिरस्त्राण) के रूप में रखे, तब वह साधक गुरु के ज्ञानोपदेश रूप खड्ग(तलवार) से अपने शत्रु मन पर, उस को एकाग्र करने के लिये, आक्रमण करे ॥२२॥
(क्रमशः)

*गुरुभाइयों के साथ नरेन्द्र*

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🌷 *#श्रीरामकृष्ण०वचनामृत* 🌷
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*दादू ऐसा बड़ा अगाध है, सूक्षम जैसा अंग ।*
*पुहुप वास तैं पतला, सो सदा हमारे संग ॥*
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साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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*गुरुभाइयों के साथ नरेन्द्र*
ध्यानवाले कमरे में अर्थात् काली तपस्वीवाले कमरे में नरेन्द्र और प्रसन्न आपस में बातचीत कर रहे हैं । कमरे में एक दूसरी तरफ राखाल, हरीश और छोटे गोपाल हैं । बाद में बूढ़े गोपाल भी आ गये ।
नरेंद्र गीतापाठ करके प्रसन्न को सुना रहे हैं -
“ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति ।
भ्राम्यन् सर्वभूतानि यन्त्रारूढ़ानि मायया ॥
तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत ।
तत् प्रसादात् परां शान्तिं स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम् ॥
सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज ।
अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः ॥
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नरेन्द्र - देखा ? - 'यन्त्रारूढ़' ! 'भ्रामयन् सर्वभूतानि यन्त्रारूढ़ानि मायया ।' इस पर भी ईश्वर को जानने की चेष्टा ! तू कीट से भी गया-बीता है, तू उन्हें जान सकता है ? जरा सोच तो सही आदमी क्या है । ये जो अगणित नक्षत्र देख रहा है, इनके सम्बन्ध में सुना है, ये एक एक Solar system(सौरजगत्) हैं । हम लोगों के लिए जो यह एक ही Solar system है, इसी में आफत है । जिस पृथ्वी की सूर्य के साथ तुलना करने पर वह एक भटे की तरह जान पड़ती है, उस उतनी ही पृथ्वी में मनुष्य चल-फिर रहा है ।
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नरेन्द्र गा रहे हैं । गाने का भाव -
"तुम पिता हो, हम तुम्हारे नन्हे-से बच्चे हैं । पृथ्वी की धूलि से हमारा जन्म हुआ है और पृथ्वी की धूलि से हमारी आँखे भी ढँकी हुई हैं । हम शिशु होकर पैदा हुए हैं और धूलि में ही हमारी क्रीड़ाएँ हो रही हैं, दुर्बलों को अपनी शरण में ग्रहण करनेवाले, हमें अभय प्रदान करो ।
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एक बार हमें भ्रम हो गया है, क्या इसीलिए तुम हमें गोद में न लोगे ? - क्या इसीलिए एकाएक तुम हमसे दूर चले जाओगे ? अगर ऐसा करोगे तो, हे प्रभु हम फिर कभी उठ न सकेंगे, चिरकाल तक भूमि में ही अचेत होकर पड़े रहेंगे । हम बिलकुल शिशु हैं, हमारा मन बहुत ही क्षुद्र है । हे पिता, पग-पग पर हमारे पैर फिसल जाते हैं ।
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इसलिए तुम हमें अपना रुद्रमुख क्यों दिखलाते हो ? - क्यों हम कभी कभी तुम्हारी भौंहों को कुटिल देखते हैं ? हम क्षुद्र जीवों पर क्रोध न करो । हे पिता, स्नेह-शब्दों में हमे समझाओं - हमसे कौनसा दोष हो गया है ? यदि हमसे सैकड़ों बार भी भूल हो जाय, तो सैकड़ों ही बार हमें गोद में उठा लो । जो दुर्बल हैं, वे भला कर क्या सकते हैं ?" "तू पड़ा रह । उनकी शरण में पड़ा रह ।"
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नरेन्द्र भावावेश में आये हुए-से फिर गा रहे हैं - (भावार्थ) –
"हे प्रभु, मैं तुम्हारा गुलाम हूँ । मेरे स्वामी तुम्हीं हो । तुम्हीं से मुझे दो रोटियाँ और एक लंगोटी मिल रही हैं ।"
"उनकी (श्रीरामकृष्णदेव की) बात क्या याद नहीं है ? ईश्वर शक्कर के पहाड़ हैं, और तू चींटी, बस एक ही दाने से तो तेरा पेट भरता है, और तू सोच रहा है कि मैं यह पहाड़ का पहाड़ उठा ले जाऊँगा । उन्होंने कहा है, याद नहीं ? -
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'शुक-देव अधिक से अधिक एक बड़ी चींटी समझे जा सकते हैं ।' इसीलिए तो मैं काली से कहा करता था, 'क्यों रे, तू गज और फीता लेकर ईश्वर को नापना चाहता है ?"
"ईश्वर दया के सागर हैं । उनकी शरण में तू पड़ा रह । वे कृपा अवश्य करेंगे । उनसे प्रार्थना कर -
'यत्ते दक्षिणं मुखं तेन मां पाहि नित्यम् ।‘ –
"असतो मा सद् गमय ।
तमसो मा ज्योतिर्गमय ॥
मृत्योर्माऽमृतं गमय ।
आविराविर्म एधि ॥
रूद्र यत्ते दक्षिणं मुखम् ।
तेन मां पाहि नित्यम् ॥"
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प्रसन्न - कौनसी साधना की जाय ?
नरेन्द्र - सिर्फ उनका नाम लो । श्रीरामकृष्ण का गाना याद है या नहीं ?
नरेन्द्र श्रीरामकृष्णदेव का वह गाना गा रहे हैं, जिसका भाव है –
"ऐ श्यामा, मुझे तुम्हारे नाम का ही भरोसा है । पूजनसामग्री, लोकाचार और दाँत निकालकर हँसने से मुझे क्या काम ?
तुम्हारे नाम के प्रताप से काल के कुल पाश छिन्न-भिन्न हो जाते हैं, शिव ने इसका प्रचार भी खूब कर दिया है, मैंने तो अब इसे ही अपना आधार समझ लिया है । नाम लेता जा रहा हूँ; जो कुछ होने का है, होता रहेगा । क्यों मैं अकारण सोचकर जीवन नष्ट करूँ ? ऐ शिवे, मैंने शिव के वाक्य को सर्वसार समझ लिया है ।"
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प्रसन्न - तुम अभी तो कह रहे हो, ईश्वर है । फिर तुम्हीं बदलकर कहते हो, 'चार्वाक और अन्य दूसरे दर्शनाचार्य कह गये हैं, यह संसार आप ही आप हुआ है ।'
नरेन्द्र - तूने Chemistry (रसायन शासत्र) नहीं पढ़ा ? अरे यह तो बता, Combination (समवाय - संयोग) कौन करता है ? पानी तैयार करने के लिए आक्सीजन, हाइड्रोजन और इलेक्ट्रिसिटी, इन सब चीजों को मनुष्य का हाथ इकट्ठा करता है ।
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"Intelligent Force (ज्ञानपूर्वक शक्तिचालना) तो सब लोग मानते हैं । ज्ञानस्वरूप एक ही है, जो इन सब पदार्थों को चला रहा है ।"
प्रसन्न - दया उनमें है, यह हम कैसे जानें ?
नरेन्द्र - 'यत्ते दक्षिणं मुखं' वेदों में कहा है ।
"जॉन स्टुअर्ट मिल भी यही कहते हैं । जिन्होंने मनुष्य के भीतर दया दी, उनमें न जाने कितनी दया है ! वे (श्रीरामकृष्ण) भी तो कहते थे - 'विश्वास ही सार है ।' वे तो पास ही हैं । विश्वास करने से ही सिद्धि होती हैं ।"
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यह कहकर नरेन्द्र मधुर स्वर में गाने लगे –
"मोको कहाँ ढूँढ़ो बन्दे मैं तो तेरे पास में ।
ना रहता मैं झगड़ि बिगड़ि में, ना छुरी गढ़ास में ।
ना रहता में खाल रोम में, ना हड्डी ना माँस में ॥
ना देवल में ना मसजिद में, ना काशी-कैलास में ।
ना रहता मैं अवध-द्वारका, मेरी भेंट विश्वास में ॥
ना रहता मैं क्रिया करम में, ना योग संन्यास में ।
खोजोगे तो आन मिलूँगा, पल भर की तलाश में ॥
शहर से बाहर डेरा मेरा, कुटिया मेरी मवास में ।
कहत कबीर सुनो भई साधो, सब सन्तन के साथ में ॥"
(क्रमशः)

रविवार, 1 फ़रवरी 2026

*३. श्री गुरुदेव का अंग ~१२९/१३२*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी* टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*३. श्री गुरुदेव का अंग ~१२९/१३२*
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*सद्गुरु साधु जहाज तज, विरचे मूरख दास ।*
*जन रज्जब हैरान है, कहाँ करेगा बास ॥१२९॥*
जेसे जहाज से विरक्त होकर जहाज को छोड़ दे तो किस पर बैठ कर समुद्र पार करेगा ? वैसे ही यदि श्रेष्ठ सद्गुरु से भी विरक्त होकर उनको त्याग दे तो बड़ा आश्चर्य है, वह प्रभु प्राप्ति रूप अखंड शांति के लिए कहाँ निवास करेगा ।
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*जन रज्जब गुरु साण पर, भूंठी मन तलवार ।*
*तो तीखी कत कीजिये, रे जीव सोच विचार ॥१३०॥*
यदि साण पर चढाने पर भी तलवार तीखी नहीं होती तो कहाँ होगी ? वैसे ही गुरु के उपदेश से भी मन सूक्ष्म नहीं हो सका तो, हे जीव ! सोच विचार कर कह फिर कहाँ सूक्ष्म होगा ?
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*जे पंच रात अंतर पड्या, शिष तरुवर गुरु मेह ।*
*जन रज्जब जोख्यूं१ नहीं, तऊ हरे उस नेह ॥१३१॥*
१३१ में कहते हैं, गुरु का किंचित् वियोग हानिकर नहीं - जैसे पाँच दिन वर्षा न हो तो वृक्ष की हानि१ नहीं होती, वह पूर्व में बर्षे हुये से ही हरा रहता है । वैसे ही यदि कुछ दिन गुरु का वियोग हो भी जाय तो भी शिष्य की हानि नहीं होती वह प्रथम सुने हुये गुरु के उपदेश में स्नेह रखने से ही निर्दोष रहता है ।
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*रज्जब सींचे सद्गुरु, हरि लग हरे सु प्राण ।*
*सदा सुखी सुमिरण करैं, सूखैं नहीं सुजाण ॥१३२॥*
१३२ में गुरु की दया का फल बता रहे हैं - यदि सद्गुरु दया पूर्वक उपदेश - जल से सींचते रहें तो हरि के चिन्तन में लगकर साधक प्राणी प्रसन्नता रूप हरियाली से युक्त ही रहेंगे, हे सुजान ! दु:ख रूप शुष्कता उनमें नहीं आयेगी, कारण - जो हरि स्मरण करते हैं, वे तो सदा ही सुखी रहते हैं ।
(क्रमशः)

३. श्री गुरुदेव का अंग ~१२५/१२८*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी* टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*३. श्री गुरुदेव का अंग ~१२५/१२८*
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*माता पिता असंख्य ह्वैं, चौरासी के माँहिं ।* 
*रज्जब यह सौदा घणा, पर सद्गुरु मेला नाँहिं ॥१२५॥* 
चौरासी लक्ष योनियों में माता-पिता तो असंख्य मिल जाते हैं । अत: स्वजन मिलन रूप व्यापार तो संसार में बहुत अधिक है किन्तु सद्गुरु मिलन दुर्लभ है । 
*युवती जातक योनि बहु, चौरासी के बास ।* 
*जन रज्जब जिव को नहीं, सद्गुरु चरण निवास ॥१२६॥* 
चौरासी लक्ष योनियों में निवास के समय नारी, पुत्रादि तो बहुत प्राप्त होते हैं, किन्तु वहाँ पर प्राणी को सद्गुरु चरणों में निवास प्राप्त नहीं होता ।
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*मात पिता सुत नारि सौं, विष फल आवे हाथ ।*
*जन रज्जब गुरु की दया, सदा सु सांई साथ ॥१२७॥*
१२७ में माता पिता से गुरु की अधिकता बता रहे हैं - माता, पिता, पुत्र, नारी आदि स्वजनों से विषय रूप विष फल ही मिलता है किन्तु गुरुदेव की दया से सदा के लिये परब्रह्म का साथ मिलता है अर्थात प्राणी परब्रह्म रूप ही हो जाता है । 
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*सद्गुरु साधु न छोडिये, जे तू स्याणा दास ।* 
*रज्जब रहँट कहाँ रहे, जब ना वध ह्वै नास ॥१२८॥* 
१२८-१३० में गुरु-त्याग से हानि होती है यह कह रहे हैं - यदि तू चतुर सेवक है तो श्रेष्ठ सद्गुरु का त्याग कभी न करना । कारण - जैसे बैलों के नासिका में बँधी हुई रस्सी अरहट की हाल की खूंटी के न बंधी हो तो बैल अरहट के पास कहाँ रहेंगे ? मार्ग छोड़ देंगे । वैसे ही श्रेष्ठ सद्गुरु के चरणों में न रहेगा तो, भगवान के पास कहाँ रह सकेगा, वह परमार्थ पथ को छोड़कर संसार में ही जायेगा । 
(क्रमशः)

निवाई में चातुर्मास ~

*#daduji*
*॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥*
*॥ दादूराम~सत्यराम ॥*
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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१४ आचार्य गुलाबदासजी
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निवाई में चातुर्मास ~ 
वि. सं. १९३२ के चातुर्मास का निमंत्रण आचार्य गुलाबदासजी महाराज को निवाई जमात के पंचों ने दिया । आचार्य जी ने स्वीकार कर लिया । फिर चातुर्मास का समय समीप आने पर आचार्य गुलाबदासजी महाराज अपने शिष्य संतों के सहित निवाई पधारे । 
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निवाई जमात के पंचों के सहित अब जमात- नौबत, निशान, जंबूरे, बाजा, सजे हुये खंडेत आदि के सहित संकीर्तन करते हुये आचार्य गुलाबदासजी महाराज का सामेला करने गये । साष्टांग दंडवत सत्यराम करके बडे ठाट बाट से बाजे गाजे व संकीर्तन करते हुये निवाई के मुख्य बाजार से चले । खंडेत अपनी शस्त्र कला का प्रदर्शन करते जा रहे थे । नगर के नर नारियों की दोनों ओर दर्शनों के लिये भीड लगी थी ।
उक्त प्रकार नगर के नर नारियों को आचार्य जी के तथा संत मंडल के दर्शन कराते हुये शोभा यात्रा शनै: शनै: आगे बढ रही थी । नगर से निकल कर जमात में आये और नियत स्थान पर आचार्य जी को ठहराया । सेवा के लिये सेवक रख दिये गये । चातुर्मास का सत्संग आरंभ हो गया । 
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सत्संग के कार्यक्रम दोनों समय कथा, पद गायन, नाम संकीर्तन, आरती, ‘दादूराम’ मंत्र की ध्वनि आदि सब समय पर होने लगे । चातुर्मास अच्छा हुआ । समाप्ति पर आचार्य जी को मर्यादानुसार भेंट और सब को यथा- योग्य दस्तूर व संतों को वस्त्र देकर सस्नेह विदा किया ।
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मारवाड की रामत ~ 
निवाई का चातुर्मास करके आचार्य गुलाबदासजी महाराज नारायणा दादूधाम में पधार गये । फिर यहाँ से मारवाड की रामत के लिये प्रस्थान किया । मारवाड के निज समाज के साधुओं के स्थानों में तथा सेवकों में भ्रमण करते हुये उन्होंने दादूजी महाराज के रहस्यमय सिद्धांत एवं साधन समझाने का प्रयत्न किया तथा धार्मिक जनता को सत्संग द्वारा ईश्‍वर भक्ति में लगाने का कार्य करते रहे । बडे ग्रामों में अधिक ठहरते थे । व छोटे ग्रामों में कम ठहरते थे । उक्त प्रकार निर्गुण राम की भक्ति के संस्कार जमाने के लिये भ्रमण करते हुये पुन: नारायणा दादूधाम में पधार गये । 
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निर्माण कार्य ~ 
वि. सं. १९३१ में आचार्य गुलाबदासजी महाराज ने जयपुर में स्थान बनवाया था । वि. सं. १९३१ में ही नारायणा दादूधाम में श्री चैनरामजी महाराज की बारहदरी के आगे आचार्य गुलाबदासजी महाराज ने साईवान लगाया था जो अब तक विद्यमान है । 
(क्रमशः)  

*१८. सूरातन कौ अंग १७/१९*

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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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*१८. सूरातन कौ अंग १७/१९*
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सुन्दर सोई सूरमा, लोट पोट ह्वै जाइ । 
बोट कछू राखै नहीं, चोट मुहें मुंह खाइ ॥१७॥
श्रीसुन्दरदासजी उसी पुरुष को सच्चा शूर वीर मानते हैं जो युद्ध करते हुए युद्ध - भूमि में ही गिर कर भी, बिना किसी आवरण के शत्रु पर आक्रमण करता रहे या अपने शरीर पर शत्रु का आक्रमण सहता रहे ॥१७॥
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सुन्दर सूरातन करै, छाडै तन को मोह । 
हबकि थबकि पेलै पिसण, जाइ चखाँवै लोह ॥१८॥
श्रीसुन्दरदासजी की दृष्टि में वही सच्चा वीर है जो अपने शरीर का मोह छोड़ कर आगे बढ़ बढ़ कर तीव्रता के साथ, वीरता का प्रदर्शन कर, शत्रुओं को शस्त्रों से मारता काटता रहे ॥१८॥
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सुन्दर फेरै सांगि जब, होइ जाइ बिकराल । 
सनमुख बांहै ताकि करि, मारै मीर मुछाल ॥१९॥ 
ऐसा वीर युद्ध में जब अपने वास्तविक रूप में आता है तो वह देखने में भयानक लगने लगता है । उस समय वह अपने सामने किसी भी मूंछों वाले (बलवान्) योद्धा को भी नगण्य समझता हुआ मार ही डालता है ॥१९॥
(क्रमशः)  

*श्रीरामकृष्ण का प्रेम तथा राखाल*

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🌷 *#श्रीरामकृष्ण०वचनामृत* 🌷
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*शब्दों मांहिं राम-रस, साधों भर दीया ।*
*आदि अंत सब संत मिलि, यों दादू पीया ॥*
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साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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*श्रीरामकृष्ण का प्रेम तथा राखाल*
राखाल काली तपस्वी के कमरे में बैठे हुए हैं । पास ही प्रसन्न है । उसी कमरे में मास्टर भी हैं ।
राखाल अपनी स्त्री और लड़के को छोड़कर आये हैं । उनके हृदय में वैराग्य की गति तीव्र हो रही है । उन्हें एक यही इच्छा है कि अकेले नर्मदा के तट पर या कहीं अन्यत्र चले जायें । फिर भी वे प्रसन्न को बाहर भागने से समझा रहे हैं ।
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राखाल - (प्रसन्न से) - कहाँ तू बाहर भागता फिरता है ? यहाँ साधुओं का संग –
क्या इसे छोड़कर कहीं जाना होता है ? - तिसपर नरेन्द्र जैसे व्यक्ति का साथ छोड़कर ? यह सब छोड़कर तू कहाँ जायगा !
प्रसन्न - कलकत्ते में माँ-बाप हैं । मुझे भय होता है कि कहीं उनका स्नेह मुझे खींच न ले । इसीलिए कहीं दूर भाग जाना चाहता हूँ ।
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राखाल - श्रीगुरु महाराज जितना प्यार करते थे, क्या माँ-बाप उतना प्यार कर सकते हैं ? हम लोगों ने उनके लिए क्या किया है, जो वे हमें उतना चाहते थे ? क्यों वे हमारे शरीर, मन और आत्मा के कल्याण के लिए इतने तत्पर रहा करते थे ? हम लोगों ने उनके लिए क्या किया है ?
मास्टर - (स्वगत) अहा ! राखाल ठीक ही तो कह रहे हैं, इसीलिए उन्हें (श्रीरामकृष्ण को) अहेतुक कृपासिन्धु कहते हैं ।
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प्रसन्न - क्या बाहर चले जाने के लिए तुम्हारी इच्छा नहीं होती ?
राखाल - जी तो चाहता है कि नर्मदा के तट पर जाकर रहूँ । कभी कभी सोचता हूँ कि वहीं किसी बगीचे में जाकर रहूँ और कुछ साधना करूँ । कभी यह तरंग उठती है कि तीन दिन के लिए पंचतप करूँ; परन्तु संसारी मनुष्यों के बगीचे में जाने से हृदय इनकार भी करता है ।
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क्या ईश्वर हैं ?
'दानवों के कमरे' में तारक और प्रसन्न दोनों वार्तालाप कर रहे हैं । तारक की माँ नहीं है । उनके पिता ने राखाल के पिता की तरह दूसरा विवाह कर लिया है । तारक ने भी विवाह किया था, परन्तु पत्नी-वियोग हो गया है । मठ ही तारक का घर हो रहा है । प्रसन्न को वे भी समझा रहे हैं ।
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प्रसन्न - न तो ज्ञान ही हुआ और न प्रेम ही, बताओ क्या लेकर रहा जाय ?
तारक - ज्ञान होना अवश्य कठिन है परन्तु यह कैसे कहते हो कि प्रेम नहीं हुआ ?
प्रसन्न - रोना तो आया ही नहीं, फिर कैसे कहूँ कि प्रेम हुआ ? और इतने दिनों में हुआ भी क्या ?
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तारक - क्यों ? तुमने श्रीरामकृष्णदेव को देखा है या नहीं ? फिर यह क्यों कहें कि तुम्हें ज्ञान नहीं हुआ ?
प्रसन्न - क्या खाक होगा ज्ञान ? ज्ञान का अर्थ है जानना । क्या जाना ? ईश्वर है या नहीं इसी का पता नहीं चलता –
तारक - हाँ, ठीक है, ज्ञानियों के मत से ईश्वर है ही नहीं ।
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मास्टर - (स्वगत) – अहा ! प्रसन्न की कैसी अवस्था है ! श्रीरामकृष्ण कहते थे, "जो लोग ईश्वर को चाहते हैं, उनकी ऐसी अवस्था हुआ करती है । कभी कभी ईश्वर के अस्तित्व में सन्देह होता है ।' जान पड़ता है, तारक इस समय बौद्ध मत का विवेचन कर रहे हैं, इसीलिए शायद उन्होंने कहा - 'ज्ञानियों के मत से ईश्वर है ही नहीं ।' परन्तु श्रीरामकृष्ण कहते थे - 'ज्ञानी और भक्त, दोनों एक ही जगह पहुँचेंगे ।'
(क्रमशः)

शुक्रवार, 30 जनवरी 2026

नाभा गमन ~

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*॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥*
*॥ दादूराम~सत्यराम ॥*
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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१४ आचार्य गुलाबदासजी
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नाभा गमन ~ 
आचार्य गुलाबदासजी पटियाला से विदा होकर शिष्य संत मंडल के सहित विरचते हुये नाभा के पास पधारे तब आचार्य गुलाबदासजी महाराज ने अपने आने की सूचना नाभा नरेश हीरासिंहजी को दी । सूचना मिलने पर अपनी कुल परंपरा के अनुसार राजा हीरासिंहजी राजकीय लवाजमा तथा भक्त मंडल के सहित बाजे गाजे से संकीर्तन करते हुये आचार्य गुलाबदासजी की अगवानी करने आये । 
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मर्यादानुसार भेंट चढा, प्रणामकर के आवश्यक  प्रश्‍नोत्तर शिष्टाचार के पश्‍चात् आचार्य गुलाबदासजी महाराज को अति सत्कार से संकीर्तन करते हुये नगर में ले गये और नगर के मुख्य बाजार से ले जाकर नियत स्थान पर ठहराया । राजा हीरासिंहजी ने संत सेवा का अच्छा प्रबन्ध कर दिया । यहां भी कुछ दिन अच्छा सत्संग रहा और आचार्य गुलाबदासजी महाराज पधारने लगे तब राजा प्रजा ने सस्नेह भेंट देकर विदा किया ।  
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जीन्द राजा द्वारा सम्मान ~ 
नाभा से विदा होकर आचार्य गुलाबदासजी महाराज अपने शिष्य संत मंडल के सहित विचरते हुये जीन्द राज्य की राजधानी के पास आये तब अपनी मर्यादानुसार जीन्द नरेश रघुवीरसिंहजी को अपने आने की सूचना दी । 
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तब राजा रघुवीरसिंहजी अपनी को कुल मर्यादा के अनुसार राजकीय लवाजमा तथा भक्त मंडल के सहित बाजे गाजे के साथ संकीर्तन करते हुये आचार्य गुलाबदासजी महाराज की अगवानी करने गये । मर्यादापूर्वक भेंट चढा, प्रणामादि शिष्टाचार के पश्‍चात् अति सत्कार से संकीर्तन करते हुये नगर के मुख्य बाजार से ले जाकर नियत स्थान पर ठहराया । 
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सेवा का प्रबन्ध कर दिया गया । आचार्य गुलाबदासजी महाराज वहां ठहरे तब तक राजा, राजपरिवार तथा जनता ने सत्संग का आनन्द प्राप्त किया । वहां से पधारने लगे तब राजा प्रजा ने सप्रेम भेंट देकर विदा किया । फिर आप भ्रमण करते हुये तथा धार्मिक  जनता को निर्गुण ब्रह्म की भक्ति का उपदेश करते हुये नारायणा दादूधाम में पधार गये । 
(क्रमशः) 

*१८. सूरातन कौ अंग १३/१६*

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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*१८. सूरातन कौ अंग १३/१६*
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सुन्दर धरती धडहडै, गगन लगै उडि धूरि । 
सूर बीज धीरज धरै, भागि जाइ भकभूरि ॥१३॥
भले ही युद्धभूमि में किसी समय ऐसी स्थिति आ जाय कि भय के कारण भागते हुए हाथियों के पैरों की धमक से पृथ्वी थर्रा उठे, या घोडों की टाप से उड़ी धुल से आकाश मटमैला हो जाय; वैसी स्थिति में भी शूर वीर पुरुष उस युद्धभूमि में धैर्य के साथ डटा रहता है, परन्तु कायर(डरपोक) आदमी भाग जाता है ॥१३॥
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सुन्दर बरछी झलहलैं, छूटै बहु दिसि बांण । 
सूरा पडै पतंग ज्यौं, जहां होइ घंमसांण ॥९४॥
किसी घनघोर युद्ध में चारों ओर भाले चमक रहे हों, या बाणों की बौछार हो रही हो, ऐसी भयङ्कर स्थिति में भी वीर पुरुष अपने शत्रुओं पर, दीपक पर पतङ्ग के समान टूट पड़ता है ॥१४॥
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सुन्दर बाढाली बहैं, होई कडाकडि मार । 
सूर बीर सनमुख रहैं, जहाँ षलक्ंकै सार ॥१५॥
भले ही किसी भयानक युद्ध में तीक्ष्ण धार वाली तलवारों(बाढाली) या अन्य शस्त्रों से सब ओर योद्धा मारे जा रहे हों, ऐसे समय में भी वह वीर वहाँ छाती तान कर शत्रु का दृढता से विरोध करता ही रहता है ॥१५॥
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सुन्दर देखि न थरहरै, हहरि न भागै बीर । 
गहर बड़े घंमसांण मैं, कहर धरै को धीर ॥१६॥
सच्चा वीर किसी युद्ध की भयानकता देख कर भी न काँपता है, न डरता या भागता है; अपितु वह उस युद्ध में आगे से आगे बढ़ता ही जाता है, घबराता नहीं है ॥१६॥
(क्रमशः) 

*नरेन्द्र तथा शरणागति*

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🌷 *#श्रीरामकृष्ण०वचनामृत* 🌷
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*दादू राम हृदय रस भेलि कर,*
*को साधु शब्द सुनाइ ।*
*जानो कर दीपक दिया,*
*भ्रम तिमिर सब जाइ ॥*
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साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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*नरेन्द्र तथा शरणागति*
नरेन्द्र वार्तालाप कर रहे हैं । मास्टर भीतर नहीं गये । बड़े घर के पूर्व ओरवाले दालान में टहलते रहे, कुछ अंश सुनायी पड़ रहा था ।
नरेन्द्र कह रहे हैं, 'सन्ध्यादि कर्मों के लिए न तो अब स्थान ही है, न समय ही ।'
एक सज्जन - क्यों महाशय, साधना करने से क्या वे मिलेंगे ।
नरेन्द्र - उनकी कृपा ।
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गीता में कहा है –
"ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेर्जुन तिष्ठति ।
भ्रामयन् सर्वभूतानि यन्त्रारूढ़ानि मायया ॥
तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत ।
तत्प्रसादात् परां शान्तिं स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम् ॥"
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“उनकी कृपा के बिना हुए साधन-भजन कहीं कुछ नहीं होता । इसलिए उनकी शरण में जाना चाहिए ।"
सज्जन - हम लोग यदा-कदा यहाँ आकर आपको कष्ट देंगे ।
नरेन्द्र - जरूर, जब जी चाहे, आया कीजिये ।
"आप लोगों के वहाँ, गंगा-घाट में हम लोग नहाने के लिए जाया करते हैं ।"
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सज्जन - इसके लिए हमारी ओर से कोई रोक-टोक नहीं । हाँ, कोई और न जाया करे ।
नरेन्द्र - नहीं, अगर आप कहें तो हम भी न जाया करें ।
सज्जन - नहीं, नहीं, ऐसी बात नहीं; परन्तु हाँ, अगर आप देखें कि कुछ और लोग भी जा रहे हैं तो आप न जाइयेगा ।
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सन्ध्या के बाद फिर आरती हुई । भक्तगण फिर हाथ जोड़कर एकस्वर से 'जय शिव ओंकार' गाते हुए श्रीरामकृष्ण की स्तुति करने लगे । आरती हो जाने पर भक्तगण दानवों के कमरे में जाकर बैठे । मास्टर बैठे हुए हैं । प्रसन्न गुरुगीता का पाठ करके सुनाने लगे । नरेन्द्र स्वयं आकर सस्वर पाठ करने लगे । नरेन्द्र गा रहे हैं –
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"ब्रह्मानन्दं परमसुखदं केवलं ज्ञानमूर्तिम्
द्वन्द्वातीतं गगनसदृशं तत्त्वमस्यादिलक्ष्यम् ।
एकं नित्यं विमलमचलं सर्वदा साक्षिभूतम्
भावातीतं त्रिगुणरहितं सद्वरुं तं नमामि ।"
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फिर गाते हैं –
"न गुरोरधिकं न गुरोरधिकम् । 
शिवशासनतः शिवशासनतः ॥
श्रीमत् परं ब्रह्म गुरुं वदामि । 
श्रीमत् परं ब्रह्म गुरुं भजामि ॥
श्रीमत् परं ब्रह्म गुरुं स्मरामि । 
श्रीमत् परं ब्रह्म गुरुं नमामि ॥"
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नरेन्द्र सस्वर गीता का पाठ कर रहे हैं और भक्तों का मन उसे सुनते हुए निर्वात निष्कम्प दीप-शीखा की भाँति स्थिर हो गया । श्रीरामकृष्ण सत्य कहते थे कि 'बंसी की मधुर ध्वनि सुनकर सर्प जिस तरह फन खोलकर स्थिर भाव से खड़ा रहता है, उसी प्रकार नरेन्द्र का गाना सुनकर हृदय के भीतर जो हैं, वे भी चुपचाप सुनते रहते हैं ।' अहा ! मठ के भाइयों की गुरु के प्रति कैसी तीव्र भक्ति है !
(क्रमशः)