🌷🙏 🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
.
*कवल निरन्तर नरहरी, प्रकट भये भगवंत ।*
*जहँ विरहनी गुण वीनवे, खेले फाग बसन्त ॥*
*वर आयो विरहनी मिली, अरस परस सब अंग ।*
*दादू सुन्दरी सुख भया, जुगि जुगि यहु रस रंग ॥*
================
*विचार, ब्रह्मस्वरूप-निर्णय ॥*
आज सहेली म्हारै मंगलचार ।
अम्ह घरि आये राजा राम भरतार ॥टेक॥
जाकै सागर सप्त अष्टकुल पर्वत, छ्यानवे कोटि मेघमाला ।
अठारह भार बिरख बहू बिधि के, गुणचास कोटि धरचाला ॥
अरध उरध मधि जल थल महियल, चारि खानि चारि वाणी ।
धरती गगन पवन अरु पाणी, यहु आरँभ अहिनाणी ॥
अपरम्पार पार परमेसुर, परापरी परभेवा ।
ब्रह्मा बिष्न महेस्वर सुर नर, सकल साध सिध सेवा ॥
वो उपजै खपै मरै नहिं जामैं आवागवण न होई ।
अबिहड़ अमर अखै अबिनासी, जिनबर हेर्यौ सोई ॥
चंद सूर जाकै घरि दीपक, जोति करै परकासी ।
चारि पदारथ आग्याकारी, रिधि सिधि दोऊ दासी ॥
जुगि जुगि राज करै जुगि जीवै, परगट जोति न छानी ।
सोइ बर ल्याया म्हारा सतगुर, जिहिं की या रजधानी ॥
जिहिं कौ मारग निसदिन हेरौं, सो म्हारै घरि आयौ ।
अगर चँदणि म्हारै आँगणा लीप्यौ, मोतियाँ चौक पुरायौ ॥
बाजा बाजि निसाणाँ घाई, झालरि झालर लायौ ।
आज उछाह मांड है मंगल, तोरणि कलस बंदायौ ॥
पाँच सहेली मंगल गावैं, घरि घरि रली बधाई ।
आरति साजि आतमाँ आगैं, धूप दीप ले आई ॥
नैणा स्यूँ नैण बैण बैणा स्यूँ, निर्मल नूर निहारै ।
तन मन धन नौछावरि करि करि, ऊपर लूण उतारै ॥
निर्मल नाहा निर्मल साहा,निर्मल बेद उचेरा ।
चित चौंरी ऊपरि चढ़ि लीया, आतम सुंदरि फेरा ॥
प्रेम प्रीति की येकै दीनीं, दूजी दई न काई ।
सहज डोरड़ो कदे न छूटै, गुर त्यूँ गाँठि धुलाई ॥
अरस परसपर दूलह दुलहनि, खेल भलौ बणि आयौ ।
गुरि म्हारै हथलेवो जोड्यौ, जू वै राम रमायौ ॥
पंच अभूषण सजि पतिबरता, प्रेम प्रीति पट धारी ।
सील सँतोष सुहागणि भागणि, नख सख साजि सँवारी ॥
खिमा सहेली पाई हेली, दया सरीषी दाई ।
भाव सरीषा भाई मिलकरि, पिव के गौंणैं आई ॥
परणि पधार्याँ कारिज सार्या, हुई निसाणाँ घाई ।
वारि वारि परआतम ऊपरि, दीजे घणी बधाई ॥
जेता पाव धर्या धरणी परि, सो म्हारै सिरि धार्या ।
लगन महूरत आज भलौ दिन, भीतरि महलि पधार्या ॥
जिहाँ कोमल कवल पालिकौ निर्मल, हिरदा मांहि बिछायौ ।
सकल सिरोमणि सुख कौ सागर, सेज हमारी आयौ ॥
पाव पलौटूँ बिजणा ढोलौं, धाइ धाइ चरणा लागूँ ।
हूँ म्हारा साँई की सेजाँ, क्यौं सोऊँ क्यौं जागूँ ॥
वो जाणराइ हूँ बाली भोली, थोड़ी सी बतलावैं ।
सेज हसै घरि थंभा बोलै, दिवलै जोति न मावै ॥
चारि पहर बासौ बसि केसौ, सुंदरि नैं सुख दीजै ।
अरस परस ऐकै सेज्या परि, रोम रोम रस भीजैं ॥
असी रैंणि मोलि नहिं लाभै, मांग्याँ मिलै न साँई ।
घणाँ दिनाँ की हूँ तरसै थी, आज का दिन कै ताँई ॥
सषी सहेली बूझै हेली, तैं काँइ सुकृत कीन्हौं ।
हरि निर्मल तूँ मैल कुचीली, कहि बिधि आदर दीन्हौं ॥
हूँ गुरि म्हारै मोटै घरि दीन्हीं, भाव भलेरौ कीनौं ।
हथलेवा की लाज वही हरि, इहिं बिधि आदर दीनौं ॥
दादू कै परसादि दमोदर, दीन दया करि आयौ ।
बारबार बषनौं बलिहारी, घर बर रूड़ौ पायौ ॥९७॥
हे सखी ! आज मेरे घर पर मेरे प्रियतम राजा राम पधारे हैं । अतः मेरे यहाँ आज मंगलाचार है = आनंदोत्सव है । मेरे प्रियतम अवर्णनीय है तथापि तुझको उसकी कुछ विशेषताएँ बताती हूँ जिससे तू उसके ऐश्वर्यमय रूप की कुछ झलक शब्दों में जान सके । उसके अधीन सात असीम अथाह सागर हैं; अष्ट्कुली पर्वत हैं; छयानवे कोटि मेघमाला (मेघों का समूह) हैं, अठारह भार नाना प्रकार के वृक्ष-वनस्पति हैं; और गुनचास कोटि योजन व्यासात्मक पृथिवी तथा उसके ऊपर अनेकों विशाल पर्वत हैं; ऊपर, नीचे और मध्य में आकाश, जल तथा स्थल है ।
.
चार प्रकार की जीव जन्तुओं की कोटि हैं = उद्भिज, अण्डज, जरायुज, स्वेदज; चार प्रकार की वाणियाँ हैं परा, पश्यंति, मध्यमा, वैखरी । भूमि, आकाश, वायु और जल इन सभी के आरम्भ होने का स्त्रोत भी वही है । (वेदों में इनकी उत्पत्ति का क्रम नाना प्रकार से बताया गया है तथापि आचार्य शंकर ने ब्रह्मसूत्रकार के मंतव्यानुसार तैत्तरीयश्रुति के मत को मानकर इनका उत्पत्ति क्रम आकाश, पवन, अग्नि, जल व् भूमि बताया है । संतों ने भी इसी क्रम को मान्यता दी है ।
“परथम पवन पवन से आभा, आभा जल बरसाया है ।
गाजै-बीजै नभ नहिं भीजै, अैसी अद्भुत माया है ॥
भीगी भोमि भई हरियाली, जीवाँ गुजर चलाया है ।”
(स्वामी रामचरणजी की वाणी) वह प्रियतम स्वरूप परमेश्वर = सर्वप्रधान अपरम्पार है । उसका पार = रहस्य आज तक किसी ने नहीं जाना है । परापरी = परा-चेतन प्रकृति (जीव) तथा अपरा = जड़ प्रकृति = माया से परभेवा = पृथक है, वह परमेश्वर ।
“भूमिरापोनलो वायुः खं मनोबुद्धिरेव च ।
अहंकार इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा ॥४॥
अपरेयमितस्वन्यां प्रकृतिं विद्धि में पराम् ।
जीवभूतां महाबाहो ययेदं धार्यते जगत् ॥५॥”
.
ब्रह्मा, विष्णु, महेश, सुर, नर, साधु, सिद्ध सभी उसकी सेवा में संलग्न रहते हैं । वह न जन्मता है, न कम ज्यादा होता है, न मरता है और न अवतार ही लेता है । वस्तुतः उसका इस भूमि पर आना जाना होता ही नहीं है । वह अबिहड़ = अपरिवर्तनीय, अमर, अक्षय, अविनाशी है । मैंने उक्त लक्षणों वाले पति को ही ढूंढा है, पाया है । मेरे प्रियतम के घर में चंद्रमा और सूर्य दीपक बनकर प्रकाश का आलोक करते हैं ।
.
धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष रूपी चारों पुरुषार्थ उसकी आज्ञा में रहते हैं तथा रिद्धि और सिद्धि दोनों उसके यहाँ दासी का काम करती हैं । (परमात्मा को अकर्ता कहा गया है । फिर उसका पुरुषार्थों से क्या सम्बन्ध, सृष्टि का उत्पादन कैसे करता है । इन प्रश्नों का उत्तर गीता के इस श्लोक में खोजा जा सकता है
“न मे पार्थास्ति कर्तव्यं त्रिषु लोकेषु किंचन ।
नानावाप्तमवाप्तप्यं वर्त एवं च कर्मणि ॥३|२२॥”
.
वह युग-युगान्तरों तक इस ब्रह्मांड पर शासन करता है तथा युग-युगान्तरों तक तक जीता है । उसकी ज्योति = जीवन सदैव विद्यमान रहने से सदैव प्रकट ही रहती है, कभी भी अदृश्य नहीं होती तथा छिपी भी हुई नहीं रहती । जब भी भक्त उसको याद करते हैं, वह तत्काल प्रकट हो जाता है । जिस परमात्मा की उक्त प्रकार की राजधानी है, सद्गुरु महाराज ने मेरे लिये ऐसे ही पति को खोजकर उससे मेरा सम्बन्ध जोड़ा है । जिसके आने के रास्ते को मैं प्रतिदिन ढूंढा करती थी कि वह किस मार्ग से आयेगा, वह आज स्वयं ही मेरे घर आ गया है ।
.
उसके स्वागतार्थ मैंने मेरे आंगन को अगर और चंदन से लीपा है । मोतियों से चौक को पूरा है = शुभ संकेत युक्त मांडने मांडे हैं । द्वार पर बाजे बज रहे हैं, निसाण = नगारे पर डंकों की मिलवाँ चोटें पड़कर मधुर ध्वनि हो रही है । आज विवाह होगा, इसका बड़ा भरी उछाह = उत्साह है । इसीलिए द्वार पर तोरण बांदा गया है । पाँचों ज्ञानेन्द्रियों रूपी सखियाँ मंगल गीत गा रही हैं । घर-घर में = इंद्री-इन्द्री में बधाई = आनंद का रली = संचार हो गया है ।
.
आत्मा रूपी दुल्हन आरती करने के लिये वर की दीप, धूप, थाली में रखकर तैयार हो गई है । वह नयनों से नयनों को निहारती है, वचनों से वचनों के द्वारा वार्तालाप करती है तथा उस परमात्मा के अमंद निर्मल नूर को निहारती है । दुल्हन तन, मन, धन, सर्वस्व समर्पण करते हुए दूल्हे के ऊपर नमक राई उतारती है कि कहीं किसी की नजर उसे न लग जाये । दूल्हा भी निर्मल है । साहा = विवाह का मुहूर्त भी निर्मल = निर्दोष है । ब्राह्मण वेद मंत्रों का उच्चारण कर रहे हैं ।
.
आत्मा रूपी सुंदरी ने चित्त रूपी चौंरी(विवाह मंडप) में परमात्मा रूपी वर के साथ फेरे ले लिये । दूल्हे-दुल्हन ने प्रेम-प्रीति रूपी एक ही फेरा खाया । दूसरा फेरा खाने की उन्हें आवश्यकता ही अनुभूत नहीं हुई । गुरुमहाराज रूपी सवासनी ने सहज रूपी डोरे से दोनों का गठबंधन ऐसी गाँठ लगाकर किया है कि वह खुलने का नाम ही नहीं ले सकती । एक दूसरे का एक दूसरे से परस = मिलने का = दूल्हे आर दुल्हन का बढ़िया खेल बन गया ।(अरस = मिलना; परस = स्पर्श, छूना ।)
.
गुरु महाराज स्वयं जिस प्रकार सभी में रमने वाले राम में रमण करते हैं, वैसे ही मैं रम सकूँ, एतदर्थ उन्होंने मेरा हाथ प्रियतम के हाथों में दे दिया । दोनों को एक कर दिया । पतिव्रता पत्नी पाँच आभूषणों को प्रेम-प्रीति की साड़ी के सहित धारण करके सुसज्जित हो गई है । उस भाग्यशाली सौभाग्यवती ने शील संतोष आदि सद्गुणों से अपने आपको नख से शिख तक सजाकर सँवारा है । उसने क्षमा रूपी सहेली को मित्र के रूप में प्राप्त किया है तो दया जैसी दाई प्राप्त की है । भाव = श्रद्धा विश्वास रूपी भाई के साथ प्रियतम के यहाँ मुकलावा होकर आई है ।
.
विवाहित होकर प्रियतम के घर आने पर सारे मनोरथ पूर्ण हो गये । द्वार पर रखे नगारों पर मिलवाँ चोट लगाकर समस्त नगरवासियों को आगमन की सूचना दी गई । प्रियतमा प्रियतम पर बार-बार न्यौछावर होती है और प्रभूत मात्रा में बधाई = धन्यवाद देती है कि परमात्मा की असीम अनुकंपा से हमारा एकाकार हो गया । प्रियतमा प्रियतम से कहती है, हे प्रियतम ! मेरे यहाँ पधारते समय जितने पैर भी आपने पृथिवी पर रखे(जितने भी डग भरे) वे समझिये मेरे शिर पर ही रखे हैं अर्थात् मैं उतनी ही बार आपके उपकारों के नीचे दब गई हूँ ।
.
आज की लग्न, मुहूर्त, दिन अतीव ही उत्तम हैं कि आप मेरे महल में पधार आये हैं । इस घर में(शरीर में) कोमल कमलों से निर्मित निर्मल = अत्यन्त स्वच्छ बिछौना सहित ह्रदय रूपी पलँग बिछाया है । क्योंकि हमारी सेज = शय्या = पर्यक पर सर्वशिरोमणि समस्त सुखों को देने वाला परम प्रियतम जो आया है । मैं प्रियतम के पाँवों को दबाती हूँ = पगचंपी करती हूँ । गर्मी लगने पर पंखा झलती हूँ । दौड़-दौड़ कर पाँवों पर पड़ती हूँ = अनुनय विनय करते हुए शरणागत होती हूँ ।
.
मेरे साँई की शय्या पर मैं कभी तो सोती हूँ और कभी उसकी सुख-सुविधाओं को जुटाने में लग जाने से जागती हूँ । वह पूर्ण यौवन युक्त सब कुछ जानने-समझने वाला है जबकि मैं अभी भोली भाली यौवन की संधि पर अग्रसर हुई बाला मात्र हूँ । इस कारण मैं उससे अधिक बातें न करके कुछ ही बातें करती हूँ । मेरी और प्रियतम की अनुपम जोड़ी को देखकर शय्या हँसती है, प्रफुल्लित होती है, घर और उसमें लगे स्तंभ बोलते हैं और कहते हैं कि हम आज धन्य हो गये हैं, जो हमें ऐसे आदर्श मालिक-मालकिनी मिले हैं ।
.
दीपक रात्री भर ज्योंति = प्रकाश करते-करते खुशी के मारे फूला नहीं समाता है । केशव रूपी पति ने चार प्रहरात्मक पूरी रात्री भर सेज पर सोकर व घर में रहकर आत्मा रूपी सुन्दरी को पूर्ण सुख प्रदान किया । दोनों अरस-परस एक शय्यापर हुए और दोनों की रोम-रोम रस = आनंद में भीनें = निमग्न हो गई । उक्त वर्णित जैसी रात्री किसी को मूल्य देकर नहीं मिल सकती । इतना ही नहीं यह मांगने से भी नहीं मिलती है । मैं स्वयं ही बहुत दिनों से आज की रात्री के आनंद को प्राप्त करने के लिये तरस रही थी ।
.
मुझे रात्री भर प्रियतम के सान्निध्य का लाभ मिला जानकर मेरी समस्त सखियाँ मुझसे पूछती हैं कि हे सषी ! तूने ऐसा कौनसा पुण्य किया है कि निर्मल हरि ने तुझ जैसी मैली-कुचीली = पापिष्ट व् दुराचारणी को अपने सान्निध्य का गौरव प्रदान किया । प्रिया सषियों की बातें सुनकर उत्तर देते हुए कहती है, मुझे मेरे गुरुमहाराज ने राम-नाम-स्मरण रूपी उत्तम घर में = उत्तम साधना में विवाहित की = संलग्न की ।
.
मैंने उत्तम भावभक्ति का संपादन किया । परिणामस्वरूप परमप्रभु-परमात्मा ने मेरी उक्त साधना रूपी शादी की लाज रखी और मुझे सान्निध्य रूपी साक्षात् दर्शन देने का आदर-सत्कार दिया । बषनांजी कहते हैं दादूजी महाराज की कृपा से मुझ बषनां के हृदय रूपी घर में दामोदर जो अकारण दयालु-कृपालु है दया करके आया है । मैं उस पर बार-बार न्यौछावर होता हूँ = समर्पित होता हूँ क्योंकि मैंने घर = शरीर(मनुष्य शरीर = “दुर्लभो मानुषो देहो देहिनां क्षणभंगुर ॥” भागवत्) और वर = पति = परमात्मा दोनों ही रूडौ = उत्तम प्राप्त किये हैं ॥९७॥