शनिवार, 18 अप्रैल 2026

उपसंहार ~

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*॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥*
*॥ दादूराम~सत्यराम ॥*
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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अध्याय १६, आचार्य पर्व -
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उपसंहार ~  
दोहा- 
दादू पंथ आचार्यों के, लिख करके गुण ग्राम ।
‘आचार्यपर्व’ पूरण करत, ‘नारायण’ सुख धाम ॥१॥
प्राप्त हुये जो जो मुझे, उन्हें सहित अनुराग ।
अंकित इसमें कर दिये, पढें सुजन बडे भाग ॥२॥
ब्रह्म रुप आचार्यों की, गुण गाथा सु महान । 
संपूरण किमि लिख सके, ‘नारायण’ अनजान ॥३॥
अत: कृपा मुझ पर करें, ब्रह्म रुप आचार्य । 
आदर पावे पंथ में, मुझ बालक का कार्य ॥४॥
बाल विनय यह मानकर, करैं अनुग्रह आप ।
जिससे पढ कर पर्व यह, होंय मनुज निष्पाप ॥५॥
इति श्री १६ वाँ अध्याय समाप्त: १६ ।  
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महात्मय ~
चित्त लगाकर पढेगा, जो आचार्य पर्व । 
सुख रु शांति सो पायगा, क्षोभ हटा कर सर्व ॥१॥ 
दोष दृष्टि को त्याग कर, प्रीति सहित जो कोउ । 
आचार्य पर्व पढेगा, भक्ति पायगा सोउ ॥२॥
पढे पर्व आचार्य को, कोउ कामना लेय ।  
दीर्घ काल तक प्रति दिवस, ईश्‍वर उसको देय ॥३॥
जगदीश्‍वर अरु संत का, चरित समहिं फल देत ।  
अत: पढे इस पर्व को, ले मानव अभिप्रेत ॥४॥ 
आचार्य पर्व पढे से, सु कार्य होंगे पूर्ण ।  
अरु कु भावना हृदय से, निकल जायगी तूर्ण ॥५॥
आचार्य पर्व पढे से, ईश्‍वर में दॄढ प्रेम । 
होगा निश्‍चय अंत में, पावें पाठक क्षेम ॥६॥
परब्रह्म परात्परं, सो मम देव निरंजनम् । 
निराकार निर्मलं, तस्य दादू, वन्दनम् ॥
इति श्री दादूपंथ परिचय का आचार्य पर्व १ समाप्त: ।

२३. स्वरूप विस्मरण को अंग १७/२०

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२३. स्वरूप विस्मरण को अंग १७/२०
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जे गुन उपजै देह कौं, सुख दुख बहु संताप । 
सुन्दर ऐसौ भ्रम भयौ, ते सब मांनै आप ॥१७॥
सुख दुःख आदि सन्तापदायक कष्ट देह को होते हैं; यह जीवात्मा भ्रम में पड़ कर उन सब कष्टों को अपना मान बैठा है ॥१७॥
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शीत उष्ण क्षुधा तृषा, मोकौं लागी आइ । 
सुन्दर या भ्रम की नदी, ताही मैं बहि जाइ ॥१८॥
वह समझता है कि ये शीत उष्ण, क्षुधा तृषा(भूख प्यास) मुझ(आत्मा) को लग रहे हैं । यह तो भ्रम की नदी है, जिस में आज यह जीवात्मा बहा जा रहा है ॥१८॥
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अंध बधिर गूंगौ भयौ, मेरौ कौंन हवाल । 
सुन्दर ऐसौ मांनि करि, बहुत फिरै बेहाल ॥१९॥
वह इस भ्रमनदी में बहता हुआ यही सोच रहा है कि अब मेरी क्या गति होगी ! ऐसा सोचते हुए उस को न इस नदी के पार जाने का कोई उपाय सूझ(दीख) रहा है, न उसे दूसरों(गुरु आदि) का हितोपदेश ही सुनायी दे रहा है, और न वह अपनी व्यथा कथा ही किसी अन्य हितचिन्तक को कह पा रहा है । इस प्रकार वह अन्धा, बहरा एवं गूंगा होकर अपने लिये व्यथित हो रहा है ॥१९॥
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मिलि करि या जड देह सौं, रह्यौ तिसौ ही होइ । 
सुन्दर भूलौ आपु कौं, सुधि बुधि रही न कोइ ॥२०॥
यह जीवात्मा इस जडप्रकृतिक देह से सम्पृक्त होकर स्वयं भी जड होकर रह गया है । इस स्थिति में इसको स्वकीय वास्तविक रूप की कोई सुध बुध(होश = चेतना) नहीं रह गयी है ॥२०॥
(क्रमशः)

वा रस रीति न जाणैं कोई

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*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*फूटी काया जाजरी, नव ठाहर काणी ।*
*तामें दादू क्यों रहै, जीव सरीषा पाणी ॥*
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राग मारू ॥५॥ भ्रमविध्वंश ॥
वा रस रीति न जाणैं कोई, जिहि बिधि हरि की सेवा होई ॥टेक॥
षटक्रम ध्रम ब्रत पूजा पाणी । तामैं पिरथी सकल भुलाणी ॥
जल भरि कुंभ जहाँ थैं ल्याये । मच्छ कच्छ ता भीतरि ब्याये ॥
अंग पखाल्या सौंज षट्याई । मैल रह्या तहाँ खबरि न पाई ॥
चौका चौकि ढोलि जब दीया । जिव का घात घणाँ ही कीया ॥
तुलसी तोड़ी तब जिव मूवा । सुची करी फिरि सूतिग हूवा ॥
ब्रह्म बिचालै दुबिधा होई । पाक कियाँ जिनि भींटै कोई ॥
खाइ नहीं तिहि आगै मेल्है । आतमराम अपूठा ठेलै ॥
ब्रह्म बिरोध्या पाथर पूजै । च्यार् यूँ फूटी तौ क्या सूझै ॥
अपणैं अपणैं चौकै चाढ्या । घर का माणस बाहरि काढ्या ।
पीछैं पांडे कार बुझाणैं । चाड हुई तब घर मैं आणैं ॥
वा रस रीति कोइ यक जाणैं । जिहिं सेवा साहिब भल मानैं ॥
कनक कलस हरि जल भरि लीजै । तिरबैणी तहाँ मंजन कीजै ॥
बुझणि न जाइ घटै नहिं बाढै । निरमल तिलक तहाँ लै काढै ॥
चित चौका दे सेवा साजै । तिहि घर केवल राम बिराजै ॥
संख सबद भरि भरि हरि दाखै । इहिं बिधि चरणाँ अंम्रत चाखै ।
लोभ मोह मद मच्छर बाढै । पहली बार इन्हाँ बिचि काढै ॥
भाव भगति करि भोग लगावै । सो परसाद सही हरि पावै ।
बषनां बात जवै ह्वै लेखै । पूरणब्रह्म सकल मैं देखै ॥९३॥
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षटकर्म = हठयोगानुसारी छः क्रियाएँ नैति, धौती आदि अथवा ब्राह्मणों द्वारा पालनीय षटकर्म पढ़ना-पढ़ाना, दान देना, दान लेना आदि । ध्रम = दान-पुण्य । ब्रत = उपवास । पाणी = तीर्थस्थान । सौंज = सामगी । षट्याई = विन्यास = शरीर पर नाना तरह के कपड़े पहने तथा केशादि को सँवारा ।
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ढोलि = जब चौका लगाया, कच्चे घरों में गोबर-मिट्टी से, भोजन बनाने के पूर्व चौके को लीपा जाता था । पीली मिट्टी से चौका लगाते हुए मैंने बचपन में मेरी दादी माँ व माँ को पक्की रसोईघर में भी देखा है । बिचालै = बीच में ॥ भींटै = स्पर्श करे । अपूठा ठेलै = उल्टा ही भगा देते हैं । बिरोध्या = विरोध करने वाले । च्यार् यूँ = दो आँखें प्रत्यक्ष तथा दो अंतःकरण की विवेक एवं विचार ।
“हाकम नैं संग्राम कहै तू आंधौ मति होइ यार ।
दो दो नेतर सबनि कैं तेरै चहिये चार ॥
तेरैं चहिये चार दोइ देखण कूँ बारै ।
दोइ हिया कै मांहि जकाँ सूँ न्याव निहारै ॥
जस अपजस रहसि अठै समय बार दिन चार ।
हाकम नैं संग्राम कहै तू आंधौ मति होइ यार ॥”
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संग्रामदासजी के कुंडलिया; सम्पादक : ब्रजेन्द्रकुमार सिंहल । सूझै = दीखै । चाढ्या = भोजन बनाना प्रारम्भ किया । कार बुझाणैं = सीमा = प्रतिबन्ध हटाता है । चाड़ = बुलाने की आवाज । कनक कलस = हृदय । हरिजल = परमात्मा के प्रति अनन्य अनुराग । मंजन = स्नान । तिरवेणी = इड़ा, पिंगला और सुषुम्ना का संगम ।
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बुझणि न जाइ = अनन्य अनुराग समाप्त न हो । घटै नहिं = मंद भी न पड़े । बाढै = अहर्निश बढ़े । चित चौका = चित्त में से समस्त कलुषों को निकालना रूपी चौका लगावे । दाखै = बोलै = स्मरण करे । बाढै = काट दे, निकालकर बाहर कर दे । लेखै = उक्त बातें संपादित सससहों, आचरित हों ।
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जिस विधि से परात्पर-परब्रह्म-परमात्मा की सेवा होती है उस रस = प्रेममयी भक्ति की रीति को कोई नहीं जानता । पृथिवी की सारी ही जनता या तो नेति-धोती आदि षट्कर्मों को या पुण्य या व्रत-उपवासादि या मूर्ति-पूजा या तीर्थादि में स्नानादि के करने के ही भ्रमों में उलझी पड़ी है । जिन तीर्थों में से कुंभ में भरकर जल लाये हैं क्या वह पवित्र है ? अरे ! उसमें तो कछुवे और मगरमच्छ प्रजनन करते हैं, मल-मूत्र करते हैं और बच्चे पैदा करते हैं । उन्हीं तीर्थों में जाकर शरीर को नहलाते हैं, फिर उसका(शरीर का) तिलकादि लगाकर, केश विन्यास करके श्रृंगार करते हैं किन्तु जिस मन में मैल = पापादि रहते हैं उसके बारे में तनिक भी विचार नहीं करते हैं ।
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जब चौके को पवित्र करने केलिए गोबर-मिट्टी से लीपते-पोतते हिं तब बहुत से छोटे-छोटे जीवों को मारने की हत्या करते हैं । भोग लगाने के लिये जब तुलसी तोड़ते हैं तब भी जीव करते हैं । जब उस तुलसी को जल से धोकर पवित्र करते हैं, तब भी जीव मरते हैं । जब उस तुलसी को जल से धोकर पवित्र करते हैं, तब भी जीव हिंसा होती है(सूतिग = अस्पृश्यता = हिंसा) ब्रह्म = भगवान् और भक्त के बीच में दूरी(दुविधा) हो जाती है क्योंकि पुजारी कहता है, अब आप इसके हाथ तक मत लगाओ क्योंकि इसे पवित्र कर लिया गया है ।
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जो परमात्मा की मूर्ति भोजन खाती नहीं उसके आगे तो भोग धरते हैं जबकि जिस भिखारी के शरीर में आत्मा रूपी परमात्मा विराजमान है उसे बिना भोजन कराये ही उल्टा भेज देते । परात्पर-परब्रह्म-परमात्मा का विरोध करते हैं जबकि पत्थर को भगवान् मानकर पूजते हैं । क्योंकि इन मूर्खों की चारों ही आँखें फूट गई होती हैं । इन्हें सत्यानृत क भेद ही मालूम नहीं पड़ता ।
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अपने-अपने चौकों में जब भोजन बनाने की तैयारी की जाती है तब उस घर में से(रसोईघर में से) घर के अन्य सभी मनुष्यों को बाहर निकाल दिया जाता है । फिर पांडे(पंडित, आचारी व्यक्ति) भोजन तैयार हो जाने पर सबको आने के लिये आवाज लगाता है । अपनी कार को मिटाता है तब सब लोग घर में प्रविष्ट होते हैं ।
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वस्तुतः परमात्मा जिस सेवा विधि से प्रसन्न होता है उस अनुरागमयी रीति को कोई कोई ही जानता है ।
“मनुष्याणां सहस्त्रेषु कश्चिद्यतति सिद्धये ।
यततामपि सिद्धानां कश्चिन्मां वेत्ति तत्त्वतः ॥”
परमात्मा को प्रसन्न करने की वास्तविक सेवाविधि तो अग्रांकित प्रकार से है । हृदय रूपी कनक कलश में परमात्मनाम में अनन्य प्रीति रूपी जल भरे । फिर उस राम नाम का अखंड जप करे तथा त्रिवेणी घाट पर पहुँचकर उसमें स्नान करे = सरोवर हो जाये । ऐसा प्रयत्न करे कि यह रामनाम का स्मरण छूटे तो बिलकुल ही नहीं, कम भी न हो उल्टे दिनानुदिन बढ़ता ही जाये(प्रतिक्षणवर्धमानं, नारदभक्तिसूत्र) फिर स्नानोपरान्त वहाँ निर्मल तिलक लगावे ।
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चित्त में से सारे कलुषों को निकालने रूपी चौका लगावे और अहर्निश अनन्य अनुरागयुक्त राम-नाम का स्मरण करे । जो इस प्रकार से अपने घर रूपी घट को परमात्मा के लिये तैयार करता है उसमें निश्चय ही परमात्मा विराजमान होता है । शंख में हरि का नाम भरकर बजावे और उसी रामनाम के जप प्रभाव से स्त्रवित सुषुम्ना के अमृत जलरूपी चरणामृत का पान करे । लोभ, मोह, मद = अभिमान, मात्सर्य = चुगलखोरी को समाप्त करे ।
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सर्वप्रथम ही इन्हें अंतःकरण में न आने देने के लिये बाड़(कार = सीमा = बाड़) लगावे । भावभक्ति का भोग लगावे । इस भावभक्ति रूपी प्रसाद को ही परमात्मा ग्रहण करता है ।
“न देवो विद्यते काष्ठे न पाषाणे न मृण्मये ।
भावो हि विद्यते देवो तस्माद् भावो हि कारणं ॥”
बषनांजी कहते हैं, जब उक्त प्रकार से सारी सामग्री तैयार हो जाये = साधना हो जाये तब सचराचर में ही परमात्मा के दर्शन होना प्रारम्भ हो जाता है ॥९३॥

*९. गुरु संयोग वियोग माहात्म्य का अंग~५३/५६*

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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*९. गुरु संयोग वियोग माहात्म्य का अंग~५३/५६*
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*रज्जब शब्द समुद्र मधि, मत१ मुक्ता निज ठौर ।*
*सो गुरु मरजीवे बिना, आनि२ न सकई और ॥५३॥*
समुद्र में मोती अपने स्थान पर है, उसे मरजीवा बिना अन्य कोई भी नहीं ला सकता । वैसे ही शब्दों में विचार हैं किन्तु उसे गुरु बिना अन्य कोई भी नहीं निकाल सकता, गुरु ही निकाल कर शिष्यों को प्रदान करते हैं ।
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*रज्जब शाल१ ताला जङ्या, अर्थ द्रव्य धर माँहिं ।*
*सु गुरु दृष्टि कूंची बिना, हस्त सु आवे नाँहिं ॥५४॥*
शब्द रूप घर१ में अर्थ रूप धन रखकर, अज्ञान रूप ताला लगा दिया है, यह सद्गुरु की युक्ति-युक्त ज्ञान-दृष्टि रूप ताली के बिना अन्त:करण रूप हाथ में नहीं आ सकता ।
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*वायक१ बादल अर्थ जल, गुरु आज्ञा सु निकास ।*
*बिना संयोग वर्षा बिना, चेले चकहु२ निरास ॥५५॥*
बदलों में जल है किन्तु वर्षा के योग बिना खेती२ को नहीं मिलता । वैसे ही शब्दों१ में ज्ञान रूप अर्थ है, किन्तु वह गुरु आज्ञा से ही निकलता है, बिना गुरु संयोग के शिष्य शब्दों से निराश हुये - से ही रहते हैं ।
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*महापुरुष पारस परसि, पलटहिं प्राण सु धात ।*
*मिलतौं मंगल मौन में, रज्जब तहाँ न बात ॥५६॥*
पारस से लोह धातु मिलती है तब तत्काल स्वर्ण रूप में बदल जाती है । वैसे ही महापुरुष से प्राणी मिलता है तब मौन में अखण्ड शांति रूप मंगल होता है, और वहाँ ब्रह्म भिन्न सांसारिक बात नहीं होती ।
(क्रमशः)

शुक्रवार, 17 अप्रैल 2026

आचार्यों की शिष्य परंपरा ~

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*॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥*
*॥ दादूराम~सत्यराम ॥*
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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अध्याय १६, आचार्य पर्व -
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आचार्यों की शिष्य परंपरा ~ 
गद्दी पर बैठने वाले आचार्यों के भी कई शिष्य होते थे । उनमें से एक तो गद्दी का अधिकारी होता था । किन्तु अन्य भी शिष्य होते थे और उनके शिष्यों के भी शिष्य हो जाते थे । वे सब अपने- अपने स्थान बनाकर स्वतंत्र रहते थे । गरीबदासजी महाराज ने जीवितावस्था में गद्दी त्याग दी थी । 
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इससे उनकी शिष्य परंपरा भी चल पडी थी । मसकीनदासजी की शिष्य परंपरा गद्दी पर चलती रही किन्तु आचार्यो के एक से भिन्न शिष्यों की परंपरा भिन्न चली । इस प्रकार आचार्य गद्दी पर बैठने वाले गरीबदासोत और मसकीनदासोत और बाई जी का थांभा ये तीन थांभे खास के होने से ‘खालसा’ कहलाने लगे । 
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इन तीनों के स्थान नारायणा में ही थे । वहाँ ही बढने लगे । जब इनकी संख्या अधिक बढने लगी तब आगे चलकर उक्त तीनों ही थांभों के संत नारायणा दादूधाम से बाहर जाकर अन्य ग्रामों में भी अपने साधन धाम बनाकर भजन करने लगे । तीनों ही थांभों के आदि महात्मा दादूजी महाराज के मानस पुत्र होने से खास थे अत: अन्य थांभों के साधु संत इन तीनों को खालसा कहकर अन्य सब से इन तीनों का अधिक सम्मान करते थे । 
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इन की वृद्धि होती गई त्यों ही इनके स्थान भी बढते गये । नारायणा में भी इनके अनेक स्थान बन गये । इन में अनेक विद्वान, भजनीक, तपस्वी, त्यागी, संगीतज्ञ कथा वाचक तथा परंपरा के जानकार विशेष रुप में हुये हैं । इनका भेष-भूषा पहले कान तक टोपा तथा कपाली टोपी, चौला, और कटि वस्त्र था । किन्तु अब वैसा नहीं रहा है । टोपी के स्थान पर साफा बाँधने लगे हैं । चौले के स्थान पर कोट, कमीज और कटिवस्त्र के स्थान पर धोती बाँधी जाती है । 
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वर्तमान में भी खालसा वर्ग के अनेक स्थान अच्छी स्थिति में हैं । पहले तो इस वर्ग के स्थानों तथा संतों की संख्या बहुत अच्छी थी । इनके स्थान जयपुर, जोधपुर, बीकानेर, अलवर आदि कई राज्यों में हैं । गरीबदासजी की परंपरा का थांभायती स्थान नारायणा दादूधाम में ही है । मसकीनदासजी की परंपरा आचार्य गद्दी पर चल ही रही है । 
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बाईजी के थांभे का मुख्य हरमाडा तथा चुरु में था किन्तु चुरु का स्थान आबाद नहीं है हरमाडे का स्थान है । उक्त तीनों ही थांभों में अच्छे-अच्छे महापुरुष हुये हैं । उनका यथा प्राप्त परिचय ‘खालसा’ पर्व २ में दिया जावेगा । इस आचार्य पर्व में आचार्यों का यथा प्राप्त प्रसंग दे दिया गया है । नारायणा दादूधाम के पीठाचार्यों की गुण गरिमा का परिचय देकर अब आचार्य पर्व १ का उपसंहार किया जा रहा है ।
(क्रमशः)

२३. स्वरूप विस्मरण को अंग १३/१६

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२३. स्वरूप विस्मरण को अंग १३/१६
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मरकट मूठ न छाडई, बंध्यौ स्वाद सौं जाइ । 
सुन्दर गर मैं जेवरी, घर घर नाच्यौ आइ ॥१३॥
या जैसे कोई मूर्ख वानर, चने के लोभ में, घड़े में फंसी हुई अपनी मुट्ठी नहीं खोलता और उसके परिणामस्वरूप बाजीगर द्वारा पकड़ लिया जाता है, और वह बाजीगर इस के गले में रस्सी बांध कर ग्रामों में घर घर ले जाकर नचाता रहता है ॥१३॥ (२)
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जैसैं मदिरा पान करि, होइ रह्या उन्मत्त । 
सुन्दर ऐसैं आपु कौं, भूल्यौ आतम तत्त ॥१४॥
या जैसे कोई मद्य(शराब) पीने वाला मद्यपान के कारण उन्मत्त होकर स्व रूप को भूल जाता है, वैसे ही यह जीवात्मा भी वासनाओं के मद में उन्मत्त होकर स्व रूप को भूल गया है ॥१४॥ (३)
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ज्यौं ठगमूरी खात ही, रहै कछू नहिं बुद्धि । 
यौं सुन्दर निज रूप की, भूलि गयौ सब सुद्धि ॥१५॥
जैसे कोई उन्मादकारी औषध खाते ही किसी की बुद्धि भ्रष्ट हो जाती है, वैसे ही यह जीवात्मा भी भवजाल में फंस कर अपनी स्मृति विलुप्त कर बैठा है ॥१५॥
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जैसैं बालक शंक करि, कंपि उठै भय मांनि । 
ऐसैं सुन्दर भ्रम भयौ, देह आपु कौ जांनि ॥१६॥
जैसे कोई बालबुद्धि(मुर्ख) पुरुष अन्धकार में स्थाणु को देखकर उस में भूत का भ्रम कर भय मान बैठता है; उसी प्रकार इस जीवात्मा ने भ्रम से देह को अपना मान कर उसी में अध्यास कर लिया है ॥१६॥
(क्रमशः)

मन रे प्रीति कहैं सति सोई

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*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*दादू तो पीव पाइये, कर सांई की सेव ।*
*काया मांहि लखाइसी, घट ही भीतर देव ॥*
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*प्रेम-प्रीति ॥*
मन रे प्रीति कहैं सति सोई ।
जाकै जीवताँ सो मूवाँ पाछैं होई ॥टेक॥ 
ज्यूँ सूरै सूरातन कीयौ, तन मन त्याग्यौ लोई ।
पहली थी सो पाछै रही, मारो मार रणौही ॥
देही गइ पणि नेह न भूली, जाली बाली काटी ।
अनलहक अनलहक कहि बोली, मूवाँ पाछै माटी ॥
सरीर गयौ पणि सुरति न भूली, प्रीति सोहि सति जाणी ।
बषनां बिरहणि मरि करि पीयौ, बैरी के मुहि पाणी ॥९२॥
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इतिहास में दो ही व्यक्तियों के उदाहरण ऐसे मिलते हैं जिनके मरने के उपरान्त भी जिनके शरीर से ‘अनहलक-अनहलक’ तथा ‘राम-राम’ की ध्वनि आती रही । पहला उदाहरण मंसूर का है तथा दूसरा स्वामी रामचरण का है । 
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स्वामी रामचरण ने अपनी वाणी में कहा है “राम नाम सूँ प्रीति करि, तन मन सूँज समेत । प्राण गयाँ छूटै नहीं, ज्यूँ बेल बृक्ष कौ हेत ॥” जिस प्रकार सूख जाने पर भी बेल वृक्ष पर ही लिपटी रहती है, ऐसे ही साधक को भी रामनाम से प्रीति इस प्रकार की करनी चाहिये कि शरीर से प्राणों के निकल जाने पर भी निर्जीव शरीर भी उसी प्रकार प्रीति करता रहे जैसे जीवित अवस्था में करता था । 
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स्वामी रामचरण तथा मंसूर के सम्बन्ध में यह बात सर्वथा खरी उतरती है । बषनांजी ने उक्त पद में मंसूर का उदाहरण दिया है । आगे उन्हीं के शब्दों में पढ़िये । स्वामी रामचरणजी के बारे में विशेष जानने के लिये मेरे द्वारा लिखित ‘श्रीरामचरण-चरितामृत’ तथा सम्पादित ‘जगन्नाथ-ग्रन्थावली’ मंगाकर पढ़े । यहाँ मन = मनधारी जीव का वाचक है ।
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हे जीव ! सच्ची प्रीति उसको ही कहते हैं जो जैसी जीवित अवस्था में होती है । वैसी की वैसी ही देह में से प्राणों के निकल जाने के उपरान्त भी विद्यमान रहे । रणौही = रणारोही = युद्धरत शूरवीर जिसप्रकार अपने समस्त लोई = परिचित-अपरिचित लोगों के प्रति तन-मन से रागशून्य होकर रण में सूरातन = युद्ध करते हुए मर जाता है तब भी युद्ध करते समय उसके मुँह से जो शब्द ‘मारो-मारो’ ‘काटो-काटो’ निकलते थे । वे ही मरने के उपरान्त भी निकल रहे होते हैं । वास्तव में ऐसे लोग ही शूरवीर कहलाते हैं । 
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इसी प्रकार पार्थिव शरीर से प्राणों के निकल जाने पर भी माटी = मंसूर का मृतशरीर टुकड़े-टुकड़े करके काट देने व जला-बलाकर भस्म कर देने के उपरान्त भी पूर्व का प्रेम नहीं भूला और अनलहक-अनलहक का उच्चारण करता रहा । यद्यपि मंसूर का शरीर तो नष्ट हो गया किन्तु उसकी वृत्ति अनलहक-अनलहक का उच्चारण करती रही । वास्तव में सच्ची प्रीति करना इसी का नाम है । 
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बषनां कहता है, इतना ही नहीं जब मंसूर का शरीर की राख तक ने अनलहक की ध्वनि करना नहीं छोड़ा तब उसके बैरी बादशाह ने उस राख को नदी में प्रवाहित करा दिया और वह पानी पनिहारी के द्वारा बादशाह के घर में पहुँचकर बादशाह द्वारा पी लिया गया । बादशाह के पेट में भी मंसूर के शरीर की राख जो पानी के साथ प्रविष्ट हो गई थी अनलहक-अनलहक बोलने लगी । 
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तब बादशाह ने कहा, मेरे पेट में से कैसे अनलहक की ध्वनि आती है । तब बुद्धिमानों ने सारा रहस्य खोला जिससे बादशाह भी ‘अनलहक’ वह परमात्मा मैं ही हूँ कहने लग गया (देखें राघवदासजी का भक्तमाल) अंतिम पंक्ति का अर्थ मछली पर भी घटता है । मछली का शरीर चला जाता है किन्तु वह पानी को नहीं भूलती क्योंकि उसने ही सच्ची प्रीति के रहस्य को जाना है । 
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बषनां कहता है, पानी की विरहणी मछली ने मरकर, रंधकर तथा मारने वाले वैरी के द्वारा खा जाने के उपरान्त भी बैरी के मुख से पानी पीकर पानी के प्रति अपने अनन्य अनुराग को सिद्ध कर दिया । मछली रंधती भी पानी में ही है तथा खाने के बाद खाने वाला पीता भी पानी ही है । अतः मछली मरने पर भी पानी ही के सानिध्य में रहती है । 
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यही मछली का सच्चा प्रेम है । 
“मीन उरग दादुर कुरम इनकौ जल मैं बास । 
रामचरण पणि मीन कौ है सांचौ घर वास ॥ 
है साँचौ घर वास नीर बिछड़त तन छाड़ै । 
और गहै जल वौट कामना आनै हाँड़े । 
पतिबरता कै पीव पणि बिभचारिणी दूजी आस । 
मीन उरग दादुर कुरम इनकौ जल मैं बास ।” ॥९२॥

*९. गुरु संयोग वियोग माहात्म्य का अंग~४९/५२*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*९. गुरु संयोग वियोग माहात्म्य का अंग~४९/५२*
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*गुरु शिष नर नार्यों मिल्यूं, ब्रह्म बाल विधि होय ।*
*शब्द शुक्र१ सुरति२ सुन्दरि, फल पावे नहिं कोय ॥४९॥*
नर-नारी के मिलन विधि से ही बालक उत्पन्न होता है, विदेश से नारी के पास वीर्य१ भेज दिया जाय, तो बालक रूप फल नहीं मिलता है । वैसे ही गुरु शिष्य से मिलने पर ही ब्रह्म साक्षात्कार होता है, गुरु की पुस्तक पढ़ने से ही शिष्य की वृत्ति२ को अपरोक्ष ब्रह्म - ज्ञान रूप फल नहीं मिलता ।
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*त्रिविध भाँति तरणी१ तपे, तिमिर हंत सम भाय२ ।*
*सविता३ सद्गुरु आथवैं४, पाला५ अघ६ न गराय७ ॥५०॥*
ग्रीष्म, वर्षा और शीत काल इन तीनों समयों में सूर्य१ तीन प्रकार से तपते हैं तथा अंधकार को तीनों ही समय में सम भाव२ से नष्ट करते हैं, किन्तु सूर्य३ छिप४ जाने पर बर्फ५ तो नहीं गलता७ । वैसे ही सद्गुरु भक्ति, योग और ज्ञान के ग्रंथ लिखकर उपदेश तो सबको सम भाव से ही करते हैं, किन्तु साधक के सन्मुख न होने से उसके हृदय का संशय विपर्य्य रूप पाप६ नष्ट नहीं होता ।
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*रज्जब साधु शब्द सुरही१ सु पय२, कीये पलट अशुद्ध ।*
*अब अर्थ घृत काढे बिना, दीपक बले३ न दुद्ध ॥५१॥*
गो१ के दूध२ में जामन देकर उसे दही रूप में बदल दिया जाय तब न तो दूध रहता है और न घृत निकाले बिना उससे दीपक ही जलता३ है । वैसे ही लोक, गुरु-रूप संत के वचन बदल लेते हैं तब न तो वे शुद्ध रूप में रहते हैं और न उनसे यथार्थ अर्थ निकाले बिना ज्ञान-दीपक ही जलता है ।
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*काष्ट लोह पाषाण शब्द सत, अगनी अर्थ प्रकाश ।*
*कौन काम का सौं सरे, सुन हुँ विवेकी दास ॥५२॥*
काष्ट, लोहा, पत्थर इनमे अग्नि होता है और उसका प्रकाश भी होता है किन्तु किस के प्रकाश से कौन सा काम सिद्ध होता है ? अर्थात मनुष्य बिना कुछ भी नहीं होता । वैसे ही हे विवेकी दास सुन ! सत्य शब्दों में अर्थ हैं किन्तु सद्गुरु बिना किसके अर्थ से कौन सा काम होता है ? अर्थात गुरु मुख द्वारा सुने शब्दों से ही ज्ञान द्वारा ब्रह्म प्राप्ति रूप कार्य सिद्ध होता है ।
(क्रमशः) 

गुरुवार, 16 अप्रैल 2026

हरि भजन और परोपकार

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*॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥*
*॥ दादूराम~सत्यराम ॥*
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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अध्याय १६, आचार्य पर्व -
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आचार्य कृष्णदेव जी महाराज मेडता में कुछ वर्ष रहे तो वहां भी सदाव्रत आदि का सम्यक् प्रबन्ध करा दिया गया था । उनके ब्रह्मलीन होने तक तथा आचार्य चैनराम जी जब तक वहाँ रहे तब तक वहाँ का सदाव्रत भी चलता रहा था । उक्त प्रकार सर्व साधारण मानवों के साथ-साथ देश के बडे छोटे राजा तथा रईसों को भी सत्य उपदेश कर निज धर्म में स्थित रहने की चितावनी देते रहते थे । 
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यही कारण था कि राजा महाराजाओं ने उनका भारी स्वागत सत्कार किया था । नारायणा दादूधाम के आचार्यों ने अपने समाज के लाखों साधु- संतों व सेवकों का सम्यक् संचालन किया था । साधु संतों को तथा सेवकों को भी उक्त ‘‘हरि भजन और परोपकार’’ का ही उपदेश निरंतर करते थे । उनके निष्पक्ष उपदेश से ही समाज की वृद्धि तथा समाज में शांति सुख की बाहुल्यता रहती थी । 
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यह तो प्रसिद्ध ही है कि प्राणी मात्र सुख तथा शांति ही चाहता है । किन्तु जो सुख शांति के साधन नहीं होते उनको ही भ्रांतिवश सुख शांति के साधन मानकर करता है और उनका फल सुख शांति के विपरीत दु:ख और अशांति ही प्राप्त करता है । ऐसी स्थिति में आचार्य ही वास्तव में सुख शांति का यथार्थ साधन-मार्ग बताकर उसके करने की प्रेरणा करते हैं । जिसको करके  मानव सदा के लिये आन्तरिक शांति तथा नित्य सुख का भागी होता है । 
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उक्त रीति से आचार्यों के अन्य सब कार्य भी लोक कल्याण की भावना को लेकर ही होते रहे हैं । ऐसा ही उन सर्व हितेषी आचार्यों के जीवन वृतान्त से ज्ञात होता है । कभी किसी आचार्य की किसी किख्यासे किसी प्राणी का अहित होता है, तो वह उसी के पाप से होता है । आचार्य तो केवल निमित्त मात्र ही होता है । क्योंकि आचार्यों के मन में तो कभी किसी प्राणी के अनहित की भावना उठती ही नहीं है और यदि उठती है तो-
‘‘शील नहीं सुमिरण नहीं, नहीं नाम का जाप । 
महन्ताई पाने पडी को पूर्वला पाप ॥’’
(दादू शिष्य जगन्नाथ जी आमेर) । 
वह आचार्य कहलाने योग्य नहीं है । 
‘‘शील बडे, सुमिरण बडे, दया बडे गुणवन्त ।
‘जगन्नाथ’ करणी बडी, ताका नाम महन्त ॥’’ 
उक्त विचारों से सिद्ध होता है कि आचार्यों के संपूर्ण कार्य लोक हित के लिये होते हैं ।
(क्रमशः)  

२३. स्वरूप विस्मरण को अंग ९/१२

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२३. स्वरूप विस्मरण को अंग ९/१२
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सुन्दर पावक दार कै, भीतरि रह्यौ समाइ । 
दीरघ मैं दीरघ लगै, चौरे मैं चौराइ ॥९॥
जैसे छोटे बड़े काष्ठ में अग्नि रहती है, उसी प्रकार यह आत्मा भी लम्बे शरीर में लम्बा आकार तथा तदनुरूप चेष्टाएँ करने लगता है; चौड़े शरीर में चौड़ा(विस्तृत) आकार धारण कर लेता है और लम्बे में लम्बा ॥९॥
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रंचक काढै मथन करि, बहुरि होइ बलवंत । 
सुन्दर सब ही काठ कौं, जारि करै भस्मंत ॥१०॥
यद्यपि काष्ठ के मन्थन से निकलने वाली अग्नि की चिनगारी बहुत छोटी(कम = रंचक) होती है, परन्तु वह इतनी सामर्थ्यशाली होती है कि अवसर मिलने पर बड़े से बड़े काष्ठसमूह(विशाल वन) को भी जला कर भस्म कर सकती है ॥१०॥
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सुन्दर जड कै संग तें, भूलि गयौ निज रूप । 
देखहु कैसौ भ्रम भयौ, बूडि रह्यौ भव कूप ॥११॥
जैसे कोई भला आदमी किसी मूर्ख(जड) का सङ्ग करता हुआ पाप कर्म में प्रवृत्त हो जाता है, उसी प्रकार यह जीवात्मा भी जड(अचेतन = प्रकृति) का सङ्ग कर अपना तटस्थ स्वरूप ही भूल गया ! इस प्रकार वह अविद्या के भ्रम में फंस कर इस विकराल भवकूप में जा डूबा ॥११॥
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सुन्दर इन्द्रिय स्वाद सौं, अति गति बांध्यौ मोह । 
मीन न जानै बावरौ, निगलि गयौ सठ लोह ॥१२॥
वहाँ यह विषय भोगों के स्वाद में मुग्ध होकर कुटुम्ब के प्रबल मोह में फँसता चला गया । और अज्ञानता के कारण यह मूर्ख उस अबोध मछली के समान मांस के लोभ में लोह-कण्टक ही निगल गया ॥१२॥ (१)
(क्रमशः)

राम राइ दरसनि कारनि तेरे

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*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*रोम-रोम रस प्यास है, दादू करहि पुकार ।*
*राम घटा दल उमंग कर, बरसहु सिरजनहार ॥*
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विरह ॥ साषी लापचारी की ॥१
(१ इन साषियों का अर्थ ‘विरह का अंग’ में देखें)
राम राइ दरसनि कारनि तेरे, झड़ लागे नैंणौं मेरे ॥टेक॥
जब मन मेर सिखर चढ़ि बोल्या, गुरि का सब्द सुर धरिया ।
बिरह महाघण ऊलटि आयौ, डर डाबर सब भरिया ॥
घट मैं घटा उलटि करि अैसी, इहिं बिधि बोल्हरि आयौ ।
बरसै बिसुर बिसुर निसबासुरि, भाव भादौं झड़ लायौ ॥
यहु गाजै पुरवाई बाजै, धरतीपति धड़हड़ियौ ।
माँझलि राति पपीहौ बोल्यौ, आछि बांधि वौरड़ियौ ॥
बीजल एक बिरह कै ताँई, धुर दिसि खिंवै सु ठाँई ।
बषनां तिहिं बरिखा मैं भीजै, राम मिलण कै ताँई ॥९१॥
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हे रामराय ! तेरे दर्शन पाने के लिये मेरे दोनों नेत्रों से अश्रुओं की धारा बहने लगी है । जब मेरे मन की वृत्ति गुरु द्वारा प्रदत्त राम-नाम के साथ चारों घाटियों को लांघकर ब्रह्मरंध्र में पहुँच गई तब सम्पूर्ण शरीर में राम-नाम-सुर धरिया = अनहदनाद के रूप में परिवर्तित होकर बोलने = निनादित होने लगा ।
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विरह रूपी महाधन – संवर्तक मेघ पूर्ण शक्ति के साथ उमड़-घुमड़ कर बरसने लगे जिससे शरीर के नाना अवयव मन, बुद्धि, प्राण, इन्द्रियाँदि रूपी डर-डाबर = गड्डे, तालाब विरह रूपी जल से लबालब भर गये ।
घट = शरीर में विरह की घटाएँ उलटि करि = इसरीति से छायीं तथा इस प्रकार से बरसने लगीं जैसे कि भाद्रपद मास की वर्षा की अखंड झड़ी लग जाती है ।
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भाव रूपी भाद्रपद मास निसवासरि = रात-दिन प्रियतम के अमिलन जन्य दुख में झड़ी लगाकर बरसने लगा, बिसूर-बिसूर = विह्वल होकर रोने लगा । विरह रूपी बादल भयंकर गर्जना रूपी रुदन करते हैं । पूर्व की ओर से आने वाली हवा रूपी संत-महात्माओं का सत्संग, ज्ञान उसे और बढ़ाता है । धरतीपति = पहाड़ रूपी धीरज धड़हड़ियौ = धराशाही हो गया, डगमगा गया ।
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आधी रात्रि में पपीहा ‘पीव’ ‘पीव’ की ध्वनि अपने मुख को ऊपर की ओर करके ऊँचे स्वर में बोरिहड़ियौ = बोलने लगा । इस विरह को बेग देने के लिये विवेकरूपी बिजली धुरदिसि = सामने की और चमकती है । बषनां रामजी से मिलने के लिये ही इस विरह रूपी वर्षा में भीगता = सराबोर होता है ॥९१॥

*९. गुरु संयोग वियोग माहात्म्य का अंग~४५/४८*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*९. गुरु संयोग वियोग माहात्म्य का अंग~४५/४८*
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*अरिल - सद्गुरु सूरज कांति, सूर सम है धणी१ ।*
*शब्द सलिल कफ२ कान, गुरु शिष अति बणी ॥*
*आदम३ अश्म४ असंख्य तहाँ नहिं यहु कला ।*
*परिहाँ रज्जब योग दुर्लभ भाग लहि ये भला ॥४५॥*
सूर्य किरण द्वारा बर्षा जल अँजली२ में प्राप्त हुआ हो और सूर्य प्रकाश भी हो, तब सूर्य का प्रतिबिम्ब अंजली के जल में भासता है, वैसे ही ब्रह्म-ज्ञान युक्त गुरु के शब्द कान द्वारा शिष्य के हृदय में जावें और ब्रह्म१ का ज्ञान रूप प्रकाश हो, तब ब्रह्म का साक्षात्कार होता है । इस प्रकार के गुरु - शिष्य हों, तब उनकी विशेष रूप से बनती है । अन्यथा पत्थर४ रूप मनुष्य३ असंख्य हैं, किन्तु उनमें यह ज्ञान कला प्रगट नहीं होती । यह जीव का मिलन रूप योग होना अति दुर्लभ है, कोई अच्छे भाग्य से ही मिलता है ।
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*चिदानन्द चन्द्र सु कला, चन्द्र मणी गुरु संत ।*
*उभय मिलत अमृत स्रवे, पीव हिं जीवन जंत ॥४६॥*
चन्द्र किरण चन्द्रमणी पर पड़ती है तब उससे अमृत टपकने लगता है, उसे पान कर प्राणी जीवित रहते हैं । वैसे ही चिदानन्द ब्रह्म का ज्ञान-प्रकाश गुरु रूप संत में आता है, जब गुरु से ज्ञानामृत टपकने लगता है, उसे जिज्ञासु जीव पान करके ब्रह्मरूप नित्य जीवन प्राप्त करते हैं ।
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*शब्द बीज करसा गुरु, चेला चकहुँ१ स्वरूप ।*
*नाम नाज यूं नीपजे, महर मेघ हरि भूप ॥४७॥*
राजा की कृपा से भूमि१ मिले, किसान उसमें बीज बोये फिर भली प्रकार मेघ बर्षा करे तब नाज उत्पन्न हो । वैसे ही गुरु अपने शब्दों से शिष्य को उपदेश करे और हरि कृपा हो तब निरंतर हरिनाम चिन्तन द्वारा ब्रह्म निष्ठा प्राप्त होती है ।
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*शब्द आरसी१ अर्थ सु आगी,
*सतगुरु सविता२ सन्मुख जागी ।*
*आरति४ बीच अहार३ अनूपा,*
*प्रीतम पावक प्रकटहि रूपा ॥४८॥*
आतशी शीशा१ में सूर्य२ कभी किरण पड़ती है तब उससे अग्नि निकलता है, उस शीशे के नीचे अग्नि के भोजन३ रूप कोमल तृण रूई आदि कुछ होता है तब वह अग्नि प्रकट रूप में आकर तृणादि को भस्म करता है । वैसे ही सद्गुरु के सन्मुख शब्द आते है तब उनसे अर्थ निकलता है और हरि वियोग दुख४ से युक्त साधक के हृदय में अनुपम प्रियतम का स्वरूप प्रकट होता है, वह वियोग व्यथा को नष्ट कर डालता है ।
(क्रमशः)

*९. गुरु संयोग वियोग माहात्म्य का अंग~४१/४४*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*९. गुरु संयोग वियोग माहात्म्य का अंग~४१/४४*
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*बैन बाजि निज नाम को, कहत सुनत जग माँहिं ।*
*पै रज्जब गुरु असवार बिन, कारज आवहिं नाँहिं ॥४१॥*
अश्व का नाम कहने-सुनने से ही कोई कार्य नहीं होता, सवार द्वारा ही अश्व से कार्य होता है । वैसे ही जगत में अपने २ इष्ट का नाम सभी कहते सुनते हैं किन्तु भगवान नहीं मिलते । गुरु द्वारा उसकी साधना पद्धति जानकर आन्तर साधना करने से ही वह भगवत् प्राप्ति रूप कार्य सिद्ध करने में समर्थ होता है ।

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*चाबुक अंकुश शब्द सत, हय गय मन पर धार ।*
*रज्जब गुरु असवार बिन, को काढै पशु मार ॥४२॥*
चाबुक अश्व पर, अंकुश हाथी पर रख दिया जाय तो क्या वे जिस स्थान में हैं, वहाँ से रखने वाले के इच्छित स्थान पर जा सकते हैं ? नहीं । किन्तु उन पशुओं पर सवार बैठकर चाबुक, अंकुश मारते हुये चलावेगा तभी अभीष्ट स्थान पर जाँयेगे । वैसे ही मन ने सत्य शब्द रट लिये तो क्या है ? कुछ नहीं । गुरु उनका अर्थ समझाना रूप चोट मार कर मन को विषयासक्ति से निकाल के ज्ञान-मार्ग द्वारा परब्रह्म रूप स्थान में जाकर लय करता है तभी प्राणी मुक्त होता है ।
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*शब्द पुराणी१ क्या करे, जे गुरु खाडती२ नाँहिं ।*
*रज्जब चले न बैल रथ, समझ देख मन माँहिं ॥४३॥*
बैलों को चलाने की लकड़ी१ रथ पर रख दी जाये, तो रथ के बैल चलते हैं क्या ? हाली२ उस लकड़ी की चोट मार कर चलाता है । तभी बैल चलते हैं । वैसे ही मन में विचार कर देखो, गुरु के बिना केवल शब्द से शिष्य का मन साधना-मार्ग में नहीं चल सकता । गुरु जब साधना-पद्धति बतायेंगे तभी साधन-मार्ग से प्रभु को प्राप्त होगा ।

*विचार नाथ वायक दिया, लिया सु चेतन नाथ ।*
*रज्जब निजे देखतौं, चेला हाथों हाथ ॥४४॥*
विचारशील गुरु रूप विचारनाथ ने उपदेश रूप शब्द प्रदान किया है और साधन में सावधान शिष्य रूप चेतननाथ ने ग्रहण किया, ऐसे शिष्य के हृदय में वर्तमान शरीर में देखते देखते ही हाथों हाथ ब्रह्म ज्ञान उत्पन्न हो जाता है ।
(क्रमशः) 

बुधवार, 15 अप्रैल 2026

*९. गुरु संयोग वियोग माहात्म्य का अंग~३७/४०*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*९. गुरु संयोग वियोग माहात्म्य का अंग~३७/४०*
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*वचन बाट बहुतै१ चली, जीव खड़ा तहँ आय ।*
*रज्जब गुरु भेदी२ बिना, प्राण३ पंथ किहिं जाय ॥३७॥*
जिनने शास्त्र वचन रूप मार्ग में बहुत ही१ गमन किया है, अर्थात पढ़ गये है, वेद दर्शनाचार्य हो गये हैं । ऐसे विद्वानों के पास आकर जीव कल्याणार्थ स्थित होते हैं किन्तु शास्त्र में अनेक मार्ग बताये हैं । जब तक किसी भी एक साधन को सांगोपाँग करके ब्रह्म प्राप्त न कर सके, तब तक साधना मार्ग का पूरा रहस्यवेता२ नहीं हो सकता । अत: साधन-मार्ग के रहस्यवेता सद्गुरु के बताये बिना साधक३ किस साधन-मार्ग ब्रह्मप्राप्ति के लिये आगे बढे ? विद्वान तो पठित वचन सुना देता है । साधन-मार्ग में उसकी गति नहीं होती जो ठीक साधन बता सकते ।
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*रज्जब राजा बिन कटक, बनजारों बिन बैल ।*
*त्यों सद्गुरु बिन शब्द दल, ह्वै न काज१ की सैल२ ॥३८॥*
राजा बिना सेना का और बनजारों बिना बैलों का गमन ठीक नहीं होता, वैसे ही सद्गुरु बिना शब्द - सैन्य का भी अज्ञान नाश रूप कार्य१ सिद्ध हो सके ऐसा गमन२ नहीं हो सकता अर्थात सद्गुरु बिना केवल शब्दों से ब्रह्म प्राप्ति होना संभव नहीं है ।
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*रज्जब आतिशबाज१ बिन, गोला नालि२ न काज ।*
*ऐसी विधि गुरु बिन गिरा, ज्यो नर बिन गज बाज३ ॥३९॥*
बारूद बनाने वाले१ के बिना गोला, गोली, तोप२, बन्दुक३ किस काम की हैं ? ये सब बारूद होने पर ही काम देती हैं तथा मनुष्य बिना हाथी और अश्व भी किस काम के हैं अर्थात ये मनुष्य के द्वारा ही काम करते हैं । वैसे ही सद्गुरु बिना वाणी ब्रह्म प्राप्ति कराने में सफल नहीं हो सकती ।
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*पुस्तक पैगह१ वचन सु बाज२, अर्थ असवार गुरु गति राज ।*
*चढे चढाये नहिं तहँ नाहिं, रज्जब रचना यह दल३ माँहीं ॥४०॥*
पैदल१ सेना, अश्व२ और सवार की गति राजा के अधीन है, राजा आज्ञा देता है, उसी प्रकार सेना३ में चढाई करना रूप रचनात्मक कार्य की व्यवस्था होती है, नहीं आज्ञा दे तो नहीं होती । वैसे ही पुस्तक, वचन और अर्थ ये गुरु के द्वारा ही कार्य करने में समर्थ होते हैं । गुरु इनका अज्ञान नाशार्थ प्रयोग करे, तो अज्ञान को नष्ट करते हैं, नहीं तो नहीं कर पाते ।
(क्रमशः)

सोमवार, 13 अप्रैल 2026

आचार्यों के कार्य

*#daduji*
*॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥*
*॥ दादूराम~सत्यराम ॥*
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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अध्याय १६, आचार्य पर्व -
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आचार्यों के कार्य ~ नारायणा दादूधाम के पीठाचार्यों के कार्यों में सर्व प्रथम कार्य था दादूजी महाराज की वाणी के अनुसार निगुर्णराम का निरंतर चिन्तन करना, सो उसका सभी आचार्यों ने निर्वाह किया था । दूसरा था स्थान पर आये हुये भूखे प्यासों को अन्न जल देना । इसका प्रबन्ध सभी आचार्यों ने सुचारु रुप से रक्खा था । मानवों को ही नहीं पशु पक्षियों को भी स्थान पर भूखा प्यासा नहीं रहने देते थे । गुरु गोविन्दसिंह जी के मांसाहारी बाज को भी आचार्य जैतरामजी महाराज ने ज्वार चुगाकर तृप्त किया था । यह सिक्खों के इतिहास सूरज प्रकाश में भी अंकित है । तथा दादूपंथ में भी प्रसिद्ध है । 
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दादूजी महाराज के निम्न लिखित उपदेश का सभी आचार्यों ने निर्वाह बडी तत्परता के साथ किया था- ‘हरिका भजन’ और ‘परोपकार’ में किसी भी आचार्य ने शिथिलता नहीं आने दी थी । तथा उपदेश रुप परोपकार भी निरंतर करते रहते थे । नारायणा दादूधाम से देश में भ्रमण करने जाते थे, उसका उद्देश्य भी उपदेश रुप परोपकार था । देश के विभिन्न भागों में अपने शिष्य मंडल के साथ जा जाकर स्थान पर मानवों के उपकार के लिये निष्पक्ष उपदेश करते थे और हजारों का काया पलट कर देते थे । 
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हजारों मानव दुर्जनता का त्याग करके  सज्जन बन जाते थे तथा लोक कल्याण करने में संलग्न हो जाते थे । यह उन आचार्यों का साधारण परोपकार नहीं था, असाधारण परोपकार था । ऐसा परोपकार श्रीमान् तथा महाराजा भी करने में समर्थ नहीं हो सकते । उक्त साधन से नारायणा दादूधाम के पीठाचार्यों ने लाखों का उद्धार किया था । अनन्तों के हिंसा आदि पाप कर्म, मदिरा पानादि दुर्व्यसन छु़डाये थे । 
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दादूजी महाराज के इस कथन के अनुसार-
‘‘सद् गुरु पशु मानुष करे, मानुष से सिध सोय ।
दादू सिध तैं देवता, देव निरंजन होय ॥’’
अनन्तों पशु तुल्य मानवों को मनुष्य बनाने का कार्य किया था । मानवों को साधन पद्धति समझा करके साधन द्वारा सिद्धावस्था तक पहुँचाया था । जो संतों से भिन्न अन्य किसी से भी नहीं हो सकता उस उपदेश रुप कार्य से सिद्ध से देवतुल्य बनाकर निरंजन परमात्मा के स्वरुप को प्राप्त कराने का महान् कार्य किया था । यह उन आचार्यों की महान् विशेषता थी ।
(क्रमशः) 

२३. स्वरूप विस्मरण को अंग ५/८

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२३. स्वरूप विस्मरण को अंग ५/८
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हंस मांहिं है हंस सौ, मोर मांहि है मोर । 
सुन्दर जैसौ घट भयौ, तैसो ई तिहिं वोर ॥५॥
जीवात्मा द्वारा कृत देहाध्यास का यह परिणाम होता है कि यह जब हंस शरीर में जाता है तो हंस के समान तथा मयूर के शरीर में मयूर के समान इस की सभी चेष्टाएँ हो जाती हैं । अर्थात् जैसा शरीर होता है उसी ओर इसकी चेष्टाएँ घूम जाती हैं(तत्सदृश हो जाती हैं) ॥५॥
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बीछू मैं बीछू भयौ, सर्प मांहि है सांप । 
सुन्दर जैसौ घट भयौ, तैसौ हूवौ आप ॥६॥
यदि विच्छू की योनि में गया तो विच्छू जैसी, या सर्प की योनि में गया तो सर्प जैसी ही इसकी क्रियाएँ हो जाती हैं । अर्थात् योनि के अनुसार ही इसकी क्रियाओं में तद्‌नुरूप परिवर्तन होता रहता है ॥६॥
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बांदर मैं बांदर भयौ, मच्छ मांहि पुनि मच्छ । 
सुन्दर गाइनि मैं गऊ, बच्छनि मांहे बच्छ ॥७॥
यदि वह वानरयोनि में गया तो वानर जैसा क्रियावान् और मत्स्ययोनि में गया तो मत्स्य जैसा ही क्रियावान् हो जाता है । गौ की योनि में जाय तो गौ जैसा व्यवहार करने लगता है और बैल हुआ तो बैल जैसा व्यवहार करने लगता है ॥७॥
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जलचर थलचर ब्योमचर, गनै कहां लौ कोइ । 
सुन्दर जैसौ घट जहां, रह्यौ तिसौ ही होइ ॥८॥
श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - हम कहाँ तक पृथक् पृथक् गणना कर बतावें; यह जलचरों(जल में रहने वालों) की या स्थलचरों(भूमि पर रहने वालों) की या आकाशचरों(प्रायः आकाश में ही रहने वाले) की जिस किसी भी योनि में जाय तब उसी योनि(शरीर) के अनुरूप इसकी समस्त शारीरिक चेष्टाएँ हो जाती है ॥८॥
(क्रमशः)

रामराइ मैं तरकसबंध तेरा

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*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*सिद्धि न माँगूं, रिद्धि न माँगूं,*
*तुम्ह ही माँगूं, गोविन्दा ॥*
*दादू तुम बिन और न माँगूं,*
*दर्शन माँगूं देहुजी ॥*
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*विनती ॥*
रामराइ मैं तरकसबंध तेरा ।
अबकी बार मया करि लीजै, मियाँ महोला मेरा ॥टेक॥
हुँ आदि कदीम तुम्हारा चाकर, तैं राख्या तहाँ रहिया ।
गिरता पड़ता साथि तुम्हारा, जहाँ तहाँ निरबहिया ॥
पाँच हाजारि को सात हजारी, हुकम तुम्हारे मांहीं ।
आसामी एक हमारी होती, सो कागलि चढ़ी क नांहीं ॥
साढ़ी तीनि कोड़ि की कहिये, अैसी सो आसामी ।
मुह आगैं मुजरा कै कारणि, ऊभी अंतरजामी ॥
रिधी न मांगूँ सिधी न मांगूँ, मुकति न मांगन आऊँ ।
एकैभाव भगति कै ताँई, तूँ कह तहाँ दगाऊँ ॥
सील सनाह षिमाँ करि खेड़ी, सुमिरण सेल सयाण ।
बषनां एक तुम्हारै आगैं, इहि विधि सौं उलिगाणा ॥९०॥
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तरकसबंध = राजा की सेना का योद्धा,सिपाही । मया = मेहरवानी, दया । प्रायः दया तथा कृपा एक ही अर्थ में प्रयुक्त होते हैं किन्तु दोनों में सूक्ष्म अंतर है । कृपा परिचित पर की जाती है । जिस पर कृपा की जाती है उसकी पात्रता का विचार किया जाता है । इसके विपरीत दया जान-अनजान सभी पर की जाने वाली भावना का नाम है । अतः इसमें पात्रापात्र, हेतु-अहेतु का प्रश्न नहीं उठता । इसीलिये परमात्मा अहैतुक दयालु कहा गया है । जिस प्रकार माँ बच्चे के गुणावगुणों पर बिना विचार किये उसका लालन-पालन करती है, वैसे ही परमात्मा जीव को मनुष्य शरीर देकर अहैतुकी कृपा करता है ।
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इसीलिये संतों ने दया को मया = माँ जैसी दया बना दिया । मियाँ महोला = एकमात्र स्वामी । कमीद = परम्परा । गिरता-पड़ता = दुःख सुख में, हमेशा । आसामी = राजा के अधीन रहने वाला जागीरदार । कागलि = कागज = बहियों में = लेखों में । साढे तीनि कोडि = साढ़े तीन कौड़ियों के बराबर का मन्सवदार, अत्यन्त तुच्छ, निम्न स्तर का आसामी । आसामी = जागीरदार = भक्त । मुजरा = नमस्कार । मुकति न = भक्तिमार्ग में “मुक्ति निरादर भगति लुभाने” मुक्ति का निरादर करके भक्ति मात्र की आकांक्षा करते हैं । दगाऊँ = चला जाऊँ । सनाह = कवच । खेड़ी = फौलाद, पक्का लोहा । सेल = भाला । चढ़ी क नांहीं = लिखी गई अथवा नहीं । उलिगाणा = निवेदन, प्रार्थना, विनती ।
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हे रामजी रूपी राजा ! मैं आपका एक छोटा सा महत्त्वहीन सिपाही हूँ । हे मेरे एकमात्र स्वामी ! अबकी मेरे ऊपर दया करके मुझे अपना लीजिये । मैं आपका प्रारम्भ का ही परम्परागत सेवक हूँ । नया-नया नहीं हूँ । परम्परागत होने से विश्वास करने लायक हूँ । आप मुझे अपनी सेना में बेहिचक भर्ती कर सकते हैं । मैं आपकी आज्ञाओं का पालनहार भी रहा हूँ । 
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आपने मुझे जहाँ रखा है, मैं वही और वैसे ही रहा हूँ । हानि-लाभ, जय-पराजय, खुशी-गम जैसी भी परिस्थितियाँ रही हैं, मैं हमेशा आपकी ही सेवा में रहा हूँ । मैं कभी भी अवसरवादी नहीं रहा । हर परिस्थिति में मैंने आपके साथ ही अपना निर्वाह कीया है । आपके हुकम = शासन में, राजत्व में कोई जागीरदार पाँच हजार तथा कोई सात हजार का मन्सवदार है । 
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मैं भी जागीरदारी के मन्सव का हकदार हूँ किन्तु आपने उस दावे को स्वीकार करके मुझे मन्सवदारी इनायत की है अथवा नहीं की है, मुझे पता नहीं है । अर्थात् मैं तो अपने आपको आपका भक्त मानता हूँ किन्तु आपने मुझे अपने भक्तों की सूची में सम्मिलित किया है अथवा नहीं किया है मुझे पता नहीं है । अन्यों की आसामीयत पाँच अथवा सात हजार की है किन्तु मेरी आसामीयत तो मात्र साढ़े तीन कौडी की है । 
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अर्थात् आपके अन्य भक्त तो बहुत ऊँचे दर्जे के हैं किन्तु उनकी तुलना में मैं बहुत ही निम्नकोटि का भक्त हूँ । हे अन्तर्यामिन् ! साढ़े तीन कौडी का आसामी मैं आपके समक्ष मुजरा = अभिवादन करने के लिये हाजिर हूँ । मैं आपसे न रिद्धि मांगता हूँ और न सिद्धि ही मांगता हूँ । और तो और मैं मुक्ति की याचना भी नहीं कर रहा हूँ । 
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मात्र एकान्तिकी = अनन्यभावयुक्त-भक्ति के लिये ही मैं आपके समक्ष उपस्थित हुआ हूँ तथा मैं वही करने तथा वहीँ जाने को तैयार हूँ जिसकी आप आज्ञा करे । मैंने अपने आपको शील का कवच पहनाकर, क्षमा रूपी फौलादी लोहे से निर्मित सुमिरण रूपी भाले को हाथ में लेकर सुसज्जित कर रखा है । हे परमात्मन ! मैं बषनां आपके आगे उक्त प्रकार विनती करता हूँ, निवेदन करता हूँ ॥९०॥