रविवार, 3 मई 2026

*१०. विरह का अंग~ ३३/३६*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*१०. विरह का अंग~ ३३/३६*
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*काया काष्ठ मनुवा धोम,*
*इश्क अग्नि मिल जाँहिं सु व्योम ।*
*आदि अंत मधि मुक्ति सुमाग,*
*रज्जब लहिये पूरण भाग ॥३३॥*
जैसे अग्नि के संयोग से काष्ठ की धुआँ आकाश में चली जाती है, वैसे ही विरह-युक्त प्रेम से मन शरीरासक्ति को छोड़ कर परब्रह्म के स्वरूप में लीन होता है । सृष्टि के आदि, मध्य और अन्त में भी यह विरह ही मुक्ति धाम का सुन्दर मार्ग माना जाता है । कोई भाग्यशाली ही इस पूर्णब्रह्म प्राप्ति के साधन मार्ग को ग्रहण करता है ।
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*नर नारी सब नाज, विरहा बारू भाड़ की ।*
*रज्ज्ब अज्जब साज, काचे पाके परसतैं ॥३४॥*
जैसे नाज के कच्चे दाने भाड़ की गरम बालू से मिलकर पक जाते हैं, उनकी उगने की शक्ति नष्ट हो जाती है, वैसे ही नर नारी भगवद् विरह के ताप से पक जाते हैं, उनकी जन्मादि क्लेशदायिनी शक्ति नष्ट हो जाती है । अत: सिद्धावस्था को प्राप्त करने को लिये भगवद्-विरह अद्भुत सामग्री है ।
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*दोस्त नाँहिं दर्द सम, जे दिल अंदर होय ।*
*जीव सीव१ एकै करे, जे ब२ सदा हु ते दोय ॥३५॥*
यदि मन में हो तो विरह-व्यथा के समान जीव का मित्र अन्य कोई भी नहीं है, कारण, जो अब२ अज्ञान दशा में सदा से ही दो भास रहे हैं उन जीव और ब्रह्म१ को एक करता है ।
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*विरह अग्नि व्है युक्ति सौं, आतम सार१ मझार ।*
*कपट कीट कुल काढि दे, तामें फेर न सार ॥३६॥*
लोह१ के युक्ति से अग्नि लगाया जाय तो, लोह का सब मैल निकाल देगा । वैसे ही जीवात्मा में युक्ति पूर्वक विरह प्रकट होगा, तो उसका सब कपट निकाल देगा । उक्त बात सर्वथा सत्य है ।
(क्रमशः)

शनिवार, 2 मई 2026

२४. सांख्य ज्ञान कौ अंग २१/२४

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२४. सांख्य ज्ञान कौ अंग २१/२४
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जे बिकार हैं देह कै, देहहि के सिर मारि । 
सुन्दर यातें भिन्न ह्वै, अपनौ रूप बिचारि ॥२१॥
अतः तुम्हारे लिये हितकर यही होगा कि जो देह के विकार(दोष) हैं, उन को उसी तक सीमित रहने दो; क्योंकि तुम उस से भिन्न हो । स्व रूप पर कुछ तो विचार कर के देखो ! ॥२१॥
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सुन्दर यह नहिं यह नहीं, यह तौ है भ्रम कूप । 
नाहिं नाहिं करते रहैं, सो है तेरौ रूप ॥२२॥
'तुम में देह का यह विकार नहीं है' या 'यह नहीं है' - ऐसा बताने में बहुत समय लगेगा और इससे नाना प्रकार के भ्रमजाल के उद्भव की सम्भावना है; अतः इसके स्थान पर 'नहीं है', 'नहीं है' कहने से भी कार्य सिद्ध हो जायगा । इसी वर्णन में तुम्हारा वास्तविक स्वरूप भी छिपा है ॥२२॥
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एक एक कै एक पर, तत्व गिनैं तै होइ । 
सुन्दर तूं सब कै परै, तौ ऊपरि नहिं कोइ ॥२३॥
पचीस तत्वों की गणना में दूसरा तत्त्व पहले से पर है । इस प्रकार की गणना में तूं इन सब से पर है । तुझ से ऊपर(उत्तम) कोई तत्त्व नहीं है ॥२३॥
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एक एक अनुलोम करि, दीसहिं तत्व स्थूल । 
एक एक प्रतिलोम तें, सुन्दर सूक्षम मूल ॥२४॥
इन तत्त्वों की अनुलोम गणना में भी पहला तत्त्व दूसरे तत्त्व से स्थूल है । इसी प्रकार प्रतिलोम गणना में दूसरा तत्त्व पहले तत्त्व से सूक्ष्म है ॥२४॥
(क्रमशः)

स्वारथ लागै घी गुड़ मीठौ

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*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*भरी अधौड़ी भावठी, बैठा पेट फुलाइ ।*
*दादू शूकर स्वान ज्यों, ज्यों आवै त्यों खाइ ॥*
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*स्वार्थ-परमार्थ ॥*
स्वारथ लागै घी गुड़ मीठौ । और जनम कहु कौंनैं दीठौ ॥टेक॥
स्वारथि कारणि अनरथ कीजै । दई दोस किसा कौ दीजै ॥
सदा रहै स्वारथ के पासै । परमारथ थैं अलगौ नासै ॥
पाप पुंनि की कौंण चलावै । जे खुरदा चहुँ की घर मैं आवै ॥  
मंछ गिलगिलिया जुग मांही । परमेसुर कौ को डर नांहीं ॥
बषनां स्वारथ मैं सह लोई । परमारथ मैं बिरला कोई ॥१०८॥
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चार्वाक मतानुयायियों की खरी आलोचना इस पद में की गई है । चार्वाकों का कथन है .....
“यावज्जीवेत्सुखंजीवेत् ऋणं कृत्वा घृतं पिवेत् । 
भस्मीभूतस्य देहस्य पुनरागमनं कुतः ॥” 
(सर्वदर्शन संग्रह श्लोकांक १८) 
जो देह भस्मीभूत हो जाती है उसका पुनरागमन फल भोगने के लिये क्यों कर हो सकता है । अतः इसी जन्म में जो भी खाना, पीना, मौज-मस्ती करनी हो वह कर लेनी चाहिये । यदि मौज-मस्ती के लिये हाथ में पैसा न भी हो तो कोई बात नहीं, ऋण लेकर ही घी, दूध खाना चाहिये क्योंकि मरने के बाद चुकाने की कोई आवश्यकता नहीं है । इन्हीं विचारों को प्रकारान्तर से बषनांजी कहते हैं ।
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स्वारथ = शरीर पोषणार्थ घी, गुड़ खाना रुचिकर लगता है । खाने वाले कहते हैं, अन्य जन्म किसने देखा है, जो खाना-पीना है, वह इसी जन्म में खा पी लो, मौज मस्ती कर लो । जिसको हमने देखा नहीं, उसके पीछे पड़कर क्यों हम हमारी मौज मस्ती को छोड़ें । इस प्रकार की सोच वालों के संबंध में बषनांजी कहते हैं, स्वार्थ के कारण तो अनर्थ करते हैं, दुराचरण, हिंसा, कपट, पाखंड करते हैं । 
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फिर बताइये ! ये लोग कैसे विधाता को दोष दे सकते हैं जैसा कि प्रायः लोगों को दोष देते हुए देखा गया है 
“सो परत्र दुख पावहीं, सर धुनि धुनि पछिताहिं । 
कालहि कर्महि ईश्वरहि, मिथ्या दोष लगाहिं ॥” 
वस्तुतः ये लोग सदा ही स्वार्थांध हुए रहते हैं । परमार्थ से सर्वथा अलग रहते हैं । समय पड़ने पर उसकी आलोचना भी कर डालते हैं ? इनके लिये पाप और पुण्य का कोई महत्त्व नहीं है । 
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राह, बेराह, उचित-अनुचित जिस भी रास्ते से धन मिलता है उसी को अंगीकृत करके घर में खुरदा = धन-सम्पत्ति कमा कर लाते हैं । फिर सभी घरवाले मिलकर उसका उपयोग करते हैं । जुग = पूरे जीवन भर मद्य, मांस, मछली जैसे निषिद्ध भोज्यों को खाते हैं । परमेश्वर का डर बिल्कुल ही मन में नहीं लाते हैं कि अंत में वह हमें हमारे दुष्कर्मों का दण्ड देगा । बषनां कहता है, सभी लोग स्वारथ के वशीभूत हुए हुए हैं । परमार्थ में किसी-किसी विरले की ही प्रवृत्ति है । 
“मनुष्याणां सहस्त्रेषु कश्चिद्यतति सिद्धये । 
यततामपि सिद्धानां कश्चिन्मां तत्त्वतः”॥१०८॥

*१०. विरह का अंग~ २९/३२*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*१०. विरह का अंग~ २९/३२*
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*दुख दिनकर की दृष्टि१ करि, नेह नीर नभ जाहिं ।*
*रज्जब रमिये शून्य२ में, यही युक्ति जग माँहिं ॥२९॥*
सूर्य की किरणों१ के द्वारा ही जल आकाश में जाता है, वैसे ही भगवद्-विरह-दु:ख से ही प्राणी का प्रेम विषयों से हट कर प्रभु में जाता है । विरह द्वारा प्रकट प्रेम से ही निर्विकार२ ब्रह्म में रमण करना चाहिये । ब्रह्म से मिल कर ब्रह्मानन्द प्राप्त करने की श्रेष्ठ युक्ति जगत् में यही है ।
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*रज्जब आज्ञा अग्नि मधि१, आतम अंभ२ निकास ।*
*उलट समावे शून्य में, पंथी पंथ सु तास ॥३०॥*
जैसे गरमी पड़ने से जल२ समुद्र के मध्य१ से निकल कर आकाश में चढ़ता है, वैसे ही गुरु-उपदेश रूप आज्ञा से आत्मा रूप पथिक संसार से निकल कर सांसारिक भावनों से विपरीत विरह रूप प्रभु प्राप्ति के मार्ग द्वारा निर्विकार ब्रह्म में समाता है ।
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*विरह सूर अति गति तपै, तन मन मांड१ मझार ।*
*रज्जब निकसे राम जल, विरहा के उपकार ॥३१॥*
ब्रह्मांड१ में सूर्य विशेष रूप से तपता है तब समुद्र से जल निकल कर बर्षता है, वैसे ही जब भक्त का तन मन विरह से अत्यन्त व्याकुल होता है तब राम का दर्शन होता है । अत: राम का दर्शन विरह के उपकार से ही होता है ।
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*तन मन ओले ज्यों गलहिं, विरह सूर की ताप ।*
*रज्जब निपजै देखतों, यूं आपा गलि आप ॥३२॥*
जैसे सूर्य के ताप से बर्फ के पत्थर गलकर देखते देखते ही जल रूप हो जाते हैं, वैसे ही विरह-जन्य दु:ख से तन मन के अहंकारादि विकार गल जाने से देखते देखते ही आत्मज्ञान उत्पन्न होकर साधक अपने शुद्ध स्वरूप ब्रह्म को प्राप्त हो जाते हैं ।
(क्रमशः)

शुक्रवार, 1 मई 2026

२४. सांख्य ज्ञान कौ अंग १७/२०

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२४. सांख्य ज्ञान कौ अंग १७/२०
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सुन्दर सिर को सीस है, प्राननि कौ है प्रांन । 
कहत जीव कौं जीव सब, शास्तर वेद पुरांन ॥१७॥
इसी प्रकार इस देह के शिर एवं प्राण का आधार भी तूं ही है । तेरे सहारे ये दोनों भी अपना अपना व्यापार कर पाते हैं । इसी लिये वेद, पुराण आदि सभी शास्त्र इस शरीर को, इस में तुम्हारी स्थिति तक ही 'जीवित' कहते हैं ॥१७॥
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सुन्दर तू चैतन्य घन, चिदानंद निज सार । 
देह मीन असुच्चि जड, बिनसत लगै न बार ॥१८॥
हे आत्मा ! तूं चेतनरूप है, सत् चित् आनन्दमय है, मूल तत्त्व है । इसके विपरीत यह शरीर तो विकारों से परिपूर्ण, अतएव अशुचि एवं जड है । इस को विनष्ट होने में कोई विलम्ब नहीं लगता ॥१८॥
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सुन्दर अविनाशी सदा, निराकार निहसंग । 
देह बिनश्वर देखिये, होइ पलक मैं भंग ॥१९॥
श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - हे आत्मा ! तुम तो नित्य, अविनाशी निराकार एवं सङ्गरहित हो; जब कि तुम्हारा यह शरीर क्षणमात्र में ही विनष्ट हो जाने वाला है अतएव विनाशी कहलाता है ॥१९॥
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सुन्दर तूं तौ एकरस, तोहि कहौं समुझाइ । 
घटै बढै आवै रहै, देह बिनसि करि जाइ ॥२०॥
अथ च, तुम तो सदा एकरस(एक भाव में) रहने वाले हो; जब कि यह शरीर कभी घटता है, कभी बढ़ता है, कभी आता है, कभी जाता है । इस प्रकार यह देह निरन्तर विनशनशील है ॥२०॥
(क्रमशः)

उपिलौ मारै न माँहिलौ तारै

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*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*कामधेनु कै पटंतरे, करै काठ की गाइ ।*
*दादू दूध दूझै नहीं, मूरख देइ बहाइ ॥*
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*भ्रमविध्वंश*
उपिलौ मारै न माँहिलौ तारै । 
पंडित होइ सु अरथ बिचारै ॥टेक॥  
स्यंघ कहैं पणि पोरिष नांहीं । 
बसै पँखेरुवा मुहड़ा मांहीं ॥
साध कहैं सो तौ यहु नांहीं । 
घड़िया बैठा घड़िया मांहीं ॥
अलख निरंजन की करि आस । 
बषनां याँह कौ किसौ बिसास ॥१०७॥ 
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इस पद में बषनांजी ने सगुणमार्गियों के उस कथन का खंडन किया है जिसमें कहा गया है..... 
“न देवोविद्यते काष्ठे न पाषाणे न मृण्मये । 
भावोहि विद्यते देवो तस्माद्भावोहि कारणं ॥” 
परमात्मा काष्ठमय, पाषाणमय अथवा मृण्मयमय नहीं है । साधक इनमें परमात्मा के होने की भावना करता है । इसीलिए इन्हें भगवद्विग्रह कहा जाता है और इसलिये भाव की प्रधानता है । बषनांजी कहते हैं, न ऊपरी शक्ति किसी को मार सकती है और न अंदरूनी शक्ति किसी को जिला सकती है । 
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एक निर्गुण-निराकार परमात्मा में ही जिलाने और मारने की शक्ति है । वही सबको पैदा करता है, सबका पालन-पोषण करता है तथा अंत में वही सबका संहार भी करता है । तदितर ऊपर-नीचे के देवी-देव, भूत-प्रेत, यंत्र-मंत्रों में यह शक्ति नहीं है । जो वास्तविक पंडित = बुद्धिमान होते हैं वे इसी प्रकार का विचार करते हैं । उदाहरणार्थ, कहने के लिये किसी को ‘सिंह’ कहते हैं किन्तु यदि उसमें पौरुषत्व = बल सिंह के समान नहीं है तो उसको सिंह कहना व्यर्थ है । 
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इसी प्रकार यदि पंखों वाले पक्षी पिंजरे में बसते हों तो उनकी पंखों का क्या लाभ । वे उड़ नही सकते । वस्तुतः साधु-संत जिस परमात्मा का कथन करते हैं वह परमात्मा स्वयं द्वारा रचित तथा भावित इन पत्थर खंड़ों में (घड़िया = बनाये हुआ में) नहीं है ।(पहला घड़िया शब्द निर्मित करने का अर्थ व्यंजित करता है जबकि दूसरा घड़िया = भावना से भावित, वेदमंत्रों के द्वारा प्राणप्रतिष्ठित अर्थ द्योतित करता है ।) 
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यदि कोई घर में लकड़ी की गाय बनाकर रख ले और उसमें भावना करे कि यह वास्तविकता में गाय है तो क्यों नहीं वह गाय दूध देती है और क्यों नहीं गाय की भावना करने वाला उक्त व्यक्ति उस दूध-दही से निकले घृत से चुपड़ी रोटी खाता है । क्यों लूखी रोटी खाता है । वास्तव में काष्ठ में दूध देने वाली गाय नहीं हो सकती है । अतः उसमें भावना करना व्यर्थ है । आशा तो मात्र एक निरंजन-निराकार-परमात्मा की करनी चाहिये । वही ‘कर्तुंअकर्तुंअन्यथाकर्तुंसमर्थ’ है । अन्यों में विश्वास करना व्यर्थ है ॥१०७॥ 

*१०. विरह का अंग~ २५/२८*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*१०. विरह का अंग~ २५/२८*
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*रज्जब भय की भाकसी१, करणी२ कूंदै३ पाय ।*
*हाथ हरकड़ी हेत की, सरक्या रती न जाय ॥२५॥*
हमारा मन हरि-वियोग जन्य भय रूप कैद१ की कोठड़ी में बन्द है उसके कर्तव्य२ रूप कुंडा३ लगा है और उसके वृत्ति रूप हाथ में हरि-प्रेम रूप हथकड़ी पड़ी है, अत: विषयों की ओर उससे किंचित मात्र भी नहीं चला जाता ।
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*इन्द्री अनंग१ न ऊतरे, आँख्यूं आँसू जाँहिं ।*
*रज्जब मन मोरा भये, महापुरुष महि२ मांहि ॥२६॥*
पृथ्वी२ में हरि विरही रूप महापुरुषों के मन मयूर पक्षी के समान हो गये हैं, जैसे मोर पक्षी के सामने मोरनी आने पर मोर की आँखों से आँसू गिरते हैं तब मूत्र इन्द्रिय से बिन्दु१ नहीं गिरता, वैसे ही हरि-विरह भक्तों के आँखों से अश्रु गिरते रहते है अत: उन्हें काम नहीं सताता ।
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*इन्द्रिय आभै१ पंच मिल, घट२ सु घटा जुरी आय ।*
*रज्जब विषय न वर्ष ही, विरह वायु ले जाय ॥२७॥*
पंच ज्ञानेन्द्रियों का विषयाशा रूप बादल१ मिलकर अन्त:करण२ रूप आकाश में अच्छी घटा बन गई है, फिर भी उक्त घटा विषय-वारि नहीं वर्षा सकती, कारण, इसे विरह रूप वायु उड़ाकर ले जाता है, अर्थात हृदय में भगवद् विरह आने पर विषयाशा तथा विषयासक्ति नहीं रहती है ।
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*विरह सु वोहित१ बैठकर, तिरिये शुक्र२ समंद ।*
*इहिं ठाहर पौहण३ यही, पार पहुँचण बंद४ ॥२८॥*
विरह रूप जहाज१ पर बैठकर काम२-समुद्र को तैरना चाहिये । इस काम-समुद्र के पार जाने के लिये यह भगवद् विरह ही श्रेष्ठ वाहन३ है, इसी से काम-समुद्र के बाँध४ पर पहुँचा जाता है अर्थात काम को जीता जाता है ।
(क्रमशः)

गुरुवार, 30 अप्रैल 2026

२४. सांख्य ज्ञान कौ अंग १३/१६

 

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२४. सांख्य ज्ञान कौ अंग १३/१६
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सुन्दर तूं न्यारौ सदा, क्यौं इंद्रिनि संग जाइ । 
ये तो तेरी शक्ति करि, बरतैं नाना भाइ ॥१३॥
अरे भाई ! तूं तो इन सब(इन्द्रियों) से पृथक् है, फिर इन के साथ तूं क्यों भ्रान्त हो रहा है ! यह बात तेरी समझ में क्यों नहीं आती कि तूं इन का सञ्चालक है अतः ये सब तेरे अधीन हैं, तेरे ही आश्रय से ये अपना समस्त व्यापार कर पाती हैं ॥१३॥
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सुन्दर मन कौं मन कहै, बहुरि बुद्धि कौं बुद्धि । 
तोहि आपने रूप की, भूलि गई सब सुद्धि ॥१४॥
तूं इस देहस्थ मन को अपना मान रहा है, इस देह में स्थित बुद्धि को भी अपना मान रहा है । क्या तुझे स्व रूप की दशा(स्मृति) पूर्णतः विस्मृत हो चुकी है ॥१४॥ 
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कहै चित्त कौं चित्त पुनि, सुन्दर तोहि बखानि । 
अहंकार कौं है अहं, जानि सकै तो जानि ॥१५॥
तूं इस देहस्थ चित्त को भी अपना मान बैठा है और इसके अहङ्कार में अपना ममत्व कर रहा है । यह तेरा कितना विशाल प्रमाद है – इस बात को तूं अब भी जान सके तो जान ले ॥१५॥ 
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सुन्दर श्रवणनि कौ श्रवण, आहि नैंन कौं नैंन । 
नासा कौं नासा कहै, अरु बैननि कौ बैंन ॥१६॥
तूं इन स्वदेहस्थ श्रवण, नेत्र, नासिका एवं रसना - इन्द्रियों को अपना मान कर इन में स्वत्व कर बैठा है । परन्तु वस्तुतः तूं ही इनका वास्तविक श्रवण, नेत्र, नासिका एवं रसना है । तेरे सहारे से ही ये अपना व्यापार कर पाती हैं ॥१६॥
(क्रमशः)

एता ही मैं जाणीलै

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*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*दादू दह दिश दीपक तेज के, बिन बाती बिन तेल ।*
*चहुँ दिसि सूरज देखिये, दादू अद्भुत खेल ॥*
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*ब्रह्मविचार ॥*
एता ही मैं जाणीलै । पूरण ब्रहम बखाणीलै ॥टेक॥
अबिनासी दीपक बिन थालै । तेल जलै न बाती न्हालै ॥
अगनी होइ न मँदिर प्रजालै । सब सूझै तिहि कै उजियालै ॥
करमादिक दीपक जे कीजै । तेल जलै बाती पणि छीजै ॥
जीव दगध जे पड़ै पतंगा । आदि अंति दीपक कौ भंगा ॥
रे पारिख क्यूँह पारिख कीजै । खोटा रालि खरा नित लीजै ॥
रालि आरसी तवै दिखालौ । जैठै लागौ तंहिठै कालौ ॥
बुझिये दिवै न होइ उजियालौ । गलथनिया मैं दूध दिखालौ ॥
बषनौं कहै सुनौं रे लोई । परिख करैगा बिरला कोई ॥१०६॥
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आगे एक पंक्ति में जितना सा कहा जा रहा है; बस, उतने में ही पूर्णब्रह्म परमात्मा को जानले और उसका अहर्निश बखान = स्मरण कर ले । अविनाशी ब्रह्न रूपी दीपक थालै = किसी स्थान विशेष में जलकर वहीं प्रकाश नहीं करता । वह तो देश, काल और वस्तु के परिच्छेद से सर्वथा अन्वछिन्न है .....
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“दिक्कालाद्यन्वच्छिन्नानन्तचिन्मात्रमूर्तये ।
स्वानुभूत्येकमानाय नमः शांताय तेजसे ॥”
वह सर्वत्र प्रकाशित होता है । (अर्थात् परमात्मा ब्रह्माण्ड के जर्रे जर्रे में व्याप्त है) उस ब्रह्म रूपी दीपक में न तैल जलता है और बत्ती ही दिखाई देती है ।
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(माया विद्या और अविद्या के नाम से दो प्रकार की है । अथवा माया तथा अविद्या नाम से दो प्रकार की है । अथवा माया तथा अविद्या नाम से दो प्रकार की है । सत्वप्रधान माया तथा रज-तम प्रधान अविद्या होती है । माया ईश्वर की उपाधि है जबकि अविद्या जीव की उपाधि है । ब्रह्म इन दोनों से अतीत है । यही दीपक का बिना तैल तथा बाती के जलना है ।)
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उस दीपक के जलने से न अग्नि = ताप ही उत्पन्न होती है और न मंदिर ही उससे जलता है । फिर भी उसके प्रकाश से सब कुछ दिखाई देता है । (वह निर्गुण-निराकार-परमात्मा अकर्ता है फिर भी सारी सृष्टि का उत्पादन उसी से होता है क्योंकि वह जगत का अभिन्ननिमित्तोपादन कारण कहा जाता है । सारी सृष्टि का उत्पादन, संचालन, नियंत्रण करने के उपरांत भी वह उसमें लिपता नहीं है । यही दीपक के जलने पर भी न अग्नि का उत्पन्न होना तथा न मंदिर का जलना है ।) इसके विपरीत करमादिक = अवतार धारण करके कर्म करने वाले अवतारी भगवान का दीपक बनाते हो तो उस दीपक का तैल भी जलता है तथा बत्ती भी छीजती है ।
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(सगुण परमात्मा को भी कर्मों का बदला चुकाना पड़ता है । यथा बाली ने रामावतार का बदला कृष्णावतार में व्याध बनकर लिया तथा इनको अंत में शरीर त्यागकर अथवा शरीर सहित इस जगत् से जाना भी पड़ता है । यही सगुण परमात्मा रूपी दीपक की बत्ती का छीजना तथा तैल का जलना है) जो भी जीव रूपी पतंगे सगुण परमात्मा की साधना रूपी लौ पर आसक्त होकर गिरते हैं उनका नाश अवश्यम्भावी होता है ।
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(सगुणोपासक मोच्छ न लेही ॥ मोक्ष न मिलना ही नाश होना है ।) क्योंकि सगुण-परमात्मा रूपी दीपक का आदि होकर एक दिन अंत भी होता है । बषनांजी कहते हैं, अरे परीक्षक ! कुछ तो परीक्षा करके सत्य को जानने का प्रयत्न कर । खोटा रूपी सगुण-परमात्मा को रालि = त्यागकर खरा = निष्कलंक-निर्गुण-निराकार-परमात्मा को अंगीकार कर । यदि तू आरसी = दर्पण रूपी निर्गुण-निराकार-परमात्मा को त्याग कर काले तवे रूप सगुण परमात्मा को अंगीकृत करेगा तो जिस जगह उस तवे को लगायेगा, वहीं वह तुझे काला कर देगा ।
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बुझे हुए दीपक से उजाला नहीं होता । जो अवतारी परमात्मा यहाँ से चला गया उससे मुक्ति की आशा करना ठीक वैसे ही व्यर्थ है जैसे बकरी के गले के थनों से दूध प्राप्ति की आशा करना । जिस प्रकार गले के थनों में दूध दिखावटी होता है वैसे ही अवतार भगवान दिखावटी परमात्मा है; वास्तविक नहीं । हे लोगों ! सुनो; बषनां डंके की चोट से कहता है, नित्य-अनित्य, असली-नकली परमात्मा की परीक्षा विरला ही करता है । हरेक के वश की बात नहीं है ॥१०६॥

१०. विरह का अंग~ २१/२४

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*१०. विरह का अंग~ २१/२४*
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*दृग१ द्रुम२ डारी ऐन३, चित चुल्है पावक जरै ।*
*परी अग्नि उत४ घैन५, तो रज्जब रस६ इत७ झरै ॥२१॥*
वृक्ष२ की गीली डाली चूल्हे में लगी हो और चूल्हे में अग्नि बहुत५ हो तो चुल्हे४ से बाहर जो लकड़ी का मुख७ है उससे पानी६ निकलता है, वैसे ही चित्त में सच्चा३ विरहाग्नि हो तो नेत्रों१ से अश्रु निकलते रहते हैं ।
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*रज्जब वह्नी१ विरह की, गुण गण अवटै३ वीर४ ।*
*काया काठ कसेरे२ जरहिं, सु नैनहुं निकसे नीर ॥२२॥*
चुल्हे पर चढे हुये बर्तन में दालादि के दाने अग्नि१ के द्वारा उबलते२ हैं, जब अग्नि ठीक नहीं जलता है तब लकङियों को चिमटा से छेड़ने३ से ठीक जलने लगता है और लकड़ी गीली होने से चूल्हे से बाहर वाले मुख में पानी निकलता है, वैसे ही हे भाई४ ! विरह रूप अग्नि कामादि गुणों के समूह को तपाकर शक्ति -हीन करता है । विरहीजनों की कथा सुनना वा भगवान् का स्मरण करना ही विरहाग्नि को छेड़ना है, उस से शरीर जलता है अर्थात क्षीण होता है और नेत्रों से अश्रु गिरते रहते हैं ।
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*रोज१ रेश्मी जेवङों२ हुं, तन मन बाँधे घोलि३ ।*
*जन रज्जब जो यूं जड़े, सु कहां जाहिं कहु खोलि ॥२३॥*
विरहीजनों के तन मन विरह-व्यथा के रुदन रूप रेशमी१ रस्सों२ से कसकर३ बांधे हुये हैं, कहिये फिर जो ऐसे अच्छी प्रकार जकड़े हुये हैं, वे भगवान् के बिना कहां जाकर अपने रुदन रूप बन्धन को खोल सकते हैं अर्थात भगवन् के दर्शन से ही उनका रोना बन्द होता है ।
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*रज्जब चाढे दुर्ग दुख, बाँधे सांकल शोच ।*
*हरियाली ताले जड़े, क्यों निकसे मन मोच ॥२४॥*
भगवद् विरहजनों को विरह ने दुख रूप किले में चढाकर शोक रूप जंजीर से बांध रक्खा है और हरि दर्शन का अभाव रूप ताला लगा रखा है, उक्त ताले को खोलने की ताली हरि के पास है, वे अपनी कृपा रूप ताली से खोल कर दर्शन न दे तब तक मन दुख-दुर्ग से निकलकर शोक-सांकल से कैसे मुक्त हो सकता है ?
(क्रमशः)

बुधवार, 29 अप्रैल 2026

२४. सांख्य ज्ञान कौ अंग ९/१२

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२४. सांख्य ज्ञान कौ अंग ९/१२
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जाकी सत्ता पाइ करि, सब गुन ह्वै चैतन्य । 
सुन्दर सोई आतमा, तुम जिनि जानहुं अन्य ॥९॥
जिस की सत्ता(सङ्ग) पा कर ये सब अचेतन गुण चैतन्य धारण कर लेते हैं, वह चेतन आत्मा ही है । तुम इसे कोई अन्य न समझो ॥९॥
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बुद्धि भ्रमै मन चित्त पुनि, अहंकार बहु भाइ । 
सुन्दर ये तौं तैं भ्रमै, तूं क्यौं इनि संग जाइ ॥१०॥
उन क्षुधा तृषा, शोक मोह से देहस्थित बुद्धि, मन चित्त एवं अहङ्कार ये तेरे द्वारा ही सञ्चालित होते हैं । श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - हे आत्मन् ! ये भ्रान्त होते हैं तो होते रहें; तूं भी इनके साथ लग कर भ्रान्ति में क्यों पड़ता है ! ॥१०॥
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श्रोत्र त्वचा दृग नासिका, रसना रस कौं लेत । 
सुन्दर ये तौं तैं भ्रमै, तूं क्यौं बांध्यौ हेत ॥११॥
श्रोत्र, त्वचा, नासिका, चक्षु एवं रसना - ये सभी ज्ञानेन्द्रियाँ तेरे ही सहारे से अपना अपना विषय ग्रहण करने में समर्थ हो पाती हैं; क्योंकि इन का सञ्चालक तूं है, अतः ये भ्रान्त होती हैं तो होती रहें । तूँ इनके साथ अपनी आसक्ति(= हेत) क्यों रख रहा है ? ॥११॥
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बाक्य पानि अरु पाद पुनि, गुदा उपस्थ हि जांनि । 
सुन्दर ये तो तैं भ्रमैं, तूं क्यौं लीने मांनि ॥१२॥
हे आत्मन् ! वाणी, हाथ, पैर, गुदा एवं मूत्रेन्द्रिय - ये कर्मेन्द्रियाँ भी तेरे ही आश्रयण से सञ्चालित होती हैं, अतः इन को तूं अपना सञ्चालक क्यों मान रहा है ॥१२॥
(क्रमशः) 

अब मैं राम पदारथ लाधौ

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*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*दादू निमिष न न्यारा कीजिये, अंतर थैं उर नाम ।*
*कोटि पतित पावन भये, केवल कहतां राम ॥*
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*परिचय, आत्म-साक्षात्कार ॥*
अब मैं राम पदारथ लाधौ ।
राम रतन धन लाधौ फड़कै बांधौ ॥टेक॥
गाँठी बांधौ देखौ खोई । जिव की जीवनि आनँद होई ॥
रतन लह्यौ पणि परिख न काई । तोल्यौ जोख्यौ मिण्यौं न जाई ॥
ज्यूँ किरपण धन धरै छिपाइ । दिन कौ तिहनैं देखण जाइ ॥
बषनौं कह मैं तौ क्यूँ पायौ । छिपै नहीं परगट ह्वै आयौ ॥१०५॥
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लाधौ = प्राप्त किया । राँकि = रंक । फड़कै = पल्ला । जिव की जिवनि = जीवन का सर्वस्व । तोल्यौ = तौला नहीं जा सकता । जोख्यौ = जोखना तौलने को ही कहा जाता है । मिण्यौं = मापा नहीं जा सकता ।
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बषनांजी स्वानुभव बताते हुए कहते हैं, अब मैंने रामजी रूपी पदारथ को प्राप्त कर लिया है । मैं रंक ने रामजी रूपी रत्न धन को प्राप्त करके अपने हृदय रूपी पल्ले में बांधकर सुरक्षित रख लिया है । मैंने उसे हृदय रूपी गाँठ में बांध लिया है और बारबार उसे देखता हूँ कि कहीं वह खो न जाये ।
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वह मेरे जीवन का सर्वस्व है । उसके होने से सदैव आनन्द ही आनन्द की प्राप्ति = अनुभूति होती है । मैंने रामजी रूपी रत्न प्राप्त कर लिया है किन्तु वह तत्त्व इतना अनूपम = अनोखा है कि वजन करने पर तौला नहीं जा सकता तथा लम्बाई-चौड़ाई नापने पर नापने में नहीं आता । तुल्यता करने पर अन्यों से इक्कीस ठहरता है अर्थात् अनूपम है ।
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जिस प्रकार कृपण धन को छिपाकर रखता है तथा प्रतिदिन उसे देखता है कि कहीं किसी ने उसे चुरा तो नहीं लिया है । अर्थात् उस कृपण की मनोवृत्ति सदैव उस धन में ही लगी रहती है । उसी प्रकार मेरी मनोवृत्ति सदैव उसी में लगी रहती है । किन्तु मुझ बषनां को जो कुछ भी रामजी रूपी पदारथ मिला है वह छिपाये छिपता नहीं है । वह तो सबके सामने प्रकट हो गया है । क्योंकि वह छिपने की वस्तु नहीं है ॥१०५॥

१०. विरह का अंग~ १७/२०*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*१०. विरह का अंग~ १७/२०*
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जैसे नारी नाह१ बिन, भूली सकल श्रृंगार ।
त्यों रज्जब भूला सकल, सुन सनेह दिलदार ॥१७॥
जैसे नारी अपने पति१ का वियोग होने पर विरह व्यथित रहती है और सौन्दर्य के साधन सभी श्रृंगारों को भी भूल जाती है । वैसे ही हम भी अपने प्यारे प्रभु के स्नेह की कथा सुनकर सब कुछ भूल गये हैं ।
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अरिल -
शक्ति१ सु:ख शशि सीर२ सुधा रस वर्ष हीं ।
पीवत प्राण पीयूष३ सब हि मन हर्ष हीं ॥
मो मन वाजि४ विशेष विरह बपु चाँदियाँ५ ।
परिहाँ रज्जब रस विष होय, उभय मुख बाँदियाँ ॥१८॥
मायिक१ सुखों का उपभोग करके तथा चन्द्रमा की शीतल२ किरणों से वर्षने वाले अमृत३ रस का पान करके सभी प्राणियों का मन हर्षित होता है किन्तु मेरा मन तो घोड़े४ के समान विशेष प्रकार का है और उस के विरह रूप घाव५ है । घोड़े के पीठ पर घाव हो और उस घाव में शरद् पूर्णिमा के चन्द्रमा की किरण द्वारा चन्द्रामृत पड़ जाता तो वह घोड़ा मर जाता है । वैसे ही मेरे मन में मायिक सुखों की अभिलाषा आ जाय तो मेरा मन भी परमार्थ दृष्टि से मर ही जायगा । देखो, चन्द्रमृत अन्य सबको तो हितकर रस रूप है किन्तु घोड़े को तो विष रूप होकर मार देता है, वैसे ही मायिक सुख अन्य सबके मन को तो हितकर है किन्तु मेरे मन को तो परमार्थ से गिरा देता है, परन्तु घोड़े के घाव पर पट्टी लगी हो तो घोड़ा नहीं मरता, वैसे ही मेरे मन में मायिक सुखों की अभिलाषा न आये और पूर्ण वैराग्य हो तो मेरा मन भी परमार्थ से न गिरेगा ।
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रज्जब रुचे न राम बिन, सकल भांति के सु:ख ।
भगवंत सहित भावहिं सबै, नाना विधि के दु:ख ॥१९॥
राम के दर्शन न होने से सभी प्रकार के सुख भी हमे रुचिकर नहीं हो रहे हैं और राम के साथ रहने पर तो सभी प्रकार के दु:ख भी प्रिय लगते हैं ।
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जन रज्जब जगदीश बिन, ऋतु भली कोइ नाँहिं ।
शीत उष्ण वर्षा बुरी, विरह व्यथा मन मांहिं ॥२०॥
जगदीश्वर के दर्शन बिन कोई भी ऋतु प्रिय नहीं लगती है । जब विरह का दु:ख मन में रहता है तब हेमन्त, ग्रीष्म और वर्षा तीनों ही ऋतु बुरी लगती है ।
(क्रमशः)

*१०.विरह का अंग~ १३/१६*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*१०.विरह का अंग~ १३/१६*
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*दशवें कुल का नाग है, दरद सु देहि माँहिं ।*
*जन रज्जब ताके डसे, मंत्र रु मूली नाँहिं ॥१३॥*
नागों के दशवे कुल का नाग जिसे डसता है, वह उसके विष से बच नहीं सकता, उसके विष को दूर करने वाला न तो कोई मंत्र है और न कोई बूंटी है । वैसे ही जिसके हृदय में विरह का दर्द है, उसको दूर करने का भी मंत्र तथा बूँटी नहीं है । उसकी व्यथा तो प्रियतम के मिलने से ही मिटती है ।
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*रज्जब विरह भुवंग१ परि, औषधि हरि दीदार ।*
*बिन देखे दीरघ दुखी, तन मन नहीं करार२ ॥१४॥*
विरह रूप सर्प१ के काटने पर, हरि-दर्शन रूप औषधि उसके विष को उतार सकती है । हरि-दर्शन बिना विरही भक्त महान दुखी रहता है, उसके तन और मन में उत्साह पूर्वक कार्य करने की शक्ति२ नहीं रहती ।
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*भलका१ लागा भाव का, सेवक हुआ सु मार ।*
*रज्जब तलफै तब लगे, मिले न मारन हार ॥१५॥*
जब से भगवद्-विरह भावना रूप भाला१ मन के लगा है, तब से ही मन भगवत् प्राप्ति में बाधक कामादि शत्रुओं को अच्छी प्रकार मारकर भगवान् का सु सेवक हो गया है । अब यह तब तक तड़फता रहेगा जब तक भाला मारने वाले भगवान् दर्शन न देंगे ।
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*ज्यों विरहनी वर बीछुटे, बिहर१ गई तहिं काल ।*
*त्यों रज्जब तुम कारने, विपति माँहिं बेहाल ॥१६॥*
जैसै अपने स्वामी के बिछुड़ने पर वियोगिनी का हृदय तत्काल विदीर्ण१ होने लगता है, वैसे ही हे प्रभो ! हम विरहजनों में विरह-विपत्ति आ पड़ी है, हम आपके दर्शनार्थ अति व्याकुल हैं ।
(क्रमशः)

२४. सांख्य ज्ञान कौ अंग ५/८

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२४. सांख्य ज्ञान कौ अंग ५/८
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देह रूप ई ह्वै रह्यौ, देह आपकौं मानिं । 
ताही तें यह जीव है, सुन्दर कहत बखांनि ॥५॥
यह(आत्मा) जब देह को अपना मान कर उसमें अध्यास कर लेता है तो यह भी देहरूप हो जाता है । तब यही लोकव्यवहार में ‘जीव’ कहलाता है ॥५॥ 
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देह भिन्न हौं भिन्न हौं, जब यह करै बिबेक । 
सुन्दर जीव न पाइये, होइ एक कौ एक ॥६॥
जब यह आत्मा विवेकपूर्वक शास्त्रानुकूल चिन्तन मनन करता है तब इस को ज्ञान(समझ) होता है -'मुझ से देह भिन्न है तथा देह से भिन्न हूँ ।' इस ज्ञान के होने पर, जीव एवं ब्रह्म की एकता हो जाती है । अर्थात जीव की कोई पृथक् स्थिति नहीं रह जाती ॥६॥
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क्षीण रु पुष्ट शरीर है, शीत उष्ण तिहिं लार । 
सुन्दर जन्म जरा लगै, यह षट देह विकार ॥७॥
इस शरीर की भिन्न स्थिति है । यह कभी क्षीण होता है तो कभी पुष्ट हो जाता है; क्यौंकि सर्दी गर्मी, जन्म मरण, एवं छह भाव विकार१(देहविकार) इस के साथ लगे रहते हैं ॥७॥ (१ छह भावविकार – १.उत्पत्ति(जायते), २.सत्ता(अस्ति), ३.विपरिणमन = परिवर्तन(विपरिणमते), ४.वृद्धि(वर्धते), ५.क्षय(क्षीयते), एवं ६,नाश(नश्यति) ।) 
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क्षुधा तृषा गुन प्रांन कौं, शोक मोह मन होइ । 
सुन्दर साक्षी आतमा, जानै बिरला कोइ ॥८॥
वस्तुतः भूख प्यास लगना प्राण का धर्म है, शोक एवं मोह आदि मन के धर्म हैं, आत्मा तो इन सब का साक्षिमात्र है - इस बात को कोई ज्ञानी ही समझ पाता है ॥८॥
(क्रमशः)  

मंगलवार, 28 अप्रैल 2026

नाँव हरी का प्यारा रे ।

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*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*दुख दरिया संसार है, सुख का सागर राम ।*
*सुख सागर चलि जाइए, दादू तज बेकाम ॥*
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*नाममाहात्म्य ॥*
नाँव हरी का प्यारा रे । जासौं लागा हेत हमारा रे ॥टेक॥
जैसे माँखी कौं गुड़ मीठा । जिसा पतंगै दीपक दीठा ॥
जैस चंद कमोदनि प्यारा । तैसा हरि सौं हेत हमारा ॥
ज्यूँ कीड़ी कण सांच्या भावै । सीप स्वाति जल ऊपरि आवै ॥
चंदनि चील न होई न्यारा । यौं बषनां कै राम पियारा ॥१०४॥
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परात्पर-परब्रह्म-परमात्मा का नाम प्यारा = अखंडानंद स्वरूप है (रामजी और रामजी का नाम दो नहीं, एक ही तत्त्व है । रामजी अखंडानंद स्वरूप होने से उसका नाम भी अखंडानंद स्वरूप है और इसलिये वह भक्तों को प्यारा, रुचिकर है ।) जिससे हमें प्रेम हो गया है, जिससे हमारा अनन्य-अनुराग हो गया है ।
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हमारा परमात्म-नाम के प्रति अनुराग ठिक वैसा ही एकान्तिकी है जैसा मक्खी का मीठे गुड़ से, पतंगे का दीपक की लौ से, कुमुदनी का चंद्रमा की किरणों से होता है । बषनां को राम-नाम ठीक वैसे ही प्रिय है जैसे चींटी कण = अन्न, मिष्ठान को संचय करने के लिये सदैव प्रयत्नशील रहती है, स्वाति नक्षत्र के जल को ग्रहण करने के लिये सीपी समुद्र के नीचे से ऊपर आती है और चील = सर्प चंदन के वृक्ष से अलग नहीं होता है ॥१०४॥

सोमवार, 27 अप्रैल 2026

२४. अथ सांख्य ज्ञान कौ अंग १/४

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२४. अथ सांख्य ज्ञान कौ अंग १/४
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सुन्दर सांख्य बिचार करि, संमुझै अपनौ रूप । 
नहिंतर जड के संग तें, बूडत है भव कूप ॥१॥
श्रीसुन्दरदासजी महाराज कहते हैं - साङ्ख्यशास्त्र के अनुसार चिन्तन मनन द्वारा भी आत्मस्वरूप पर विचार करना चाहिये । अन्यथा(नहिंतर) इस अल्पमति जिज्ञासु को, अन्य शास्त्रों के ज्ञाताओं की मूर्खतापूर्ण बातों के जञ्जाल में फँसने से, जन्म मरणपरम्परा से कथमपि मुक्ति नहीं मिलेगी ओर वह उसी में डूबता उतराता रह जायगा ॥१॥
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माया कै गुन जड सबै, आतम चेतनि जानि । 
सुन्दर सांख्य बिचार करि, भिन्न भिन्न पहिचानि ॥२॥
साङ्ख्यशाख के अनुसार, केवल आत्मा ही चेतन है । शेष सभी गुण, प्रकृति से उत्पन्न होने के कारण, जड(अचेतन) कहलाते हैं । साङ्ख्यशास्त्र का स्वाध्याय करते हुए इन सब को पृथक् पृथक् रूप से समझ(पहचान) लेना चाहिये ॥२॥
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पंच तत्व कौ देह जड, सब गुन मिलि चौबीस । 
सुन्दर चेतनि आतमा, ताहि मिलै पच्चीस ॥३॥
पाँच तत्त्वों से उत्पन्न यह शरीर अचेतन है । इसके उत्पादक गुण, सब मिल कर चौबीस(२४) होते हैं । यदि इन में चेतन आत्मा को भी मिला दिया जाय तो ये ही संख्या में पच्चीस(२५) हो जाते हैं ॥३॥
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छब्बीसवौं सु ब्रह्म है, सुन्दर साक्षी भूत ।
यौं परमातम आतमा, यथा बाप तें पूत ॥४॥
इस उपर्युक्त संख्या में यदि ब्रह्म को भी मिला दिया जाय तो ये सब, सङ्ख्या में, छब्बीस(२६) हो जाते हैं । श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - यह साक्षी एवं परमात्मा कहलाता है । इस का(हमारी) आत्मा के साथ वही सम्बन्ध है जो लोक में किसी पिता का अपने पुत्र के साथ होता है ॥४॥
(क्रमशः) 

वोलै ऊबरिबौ हरि थारै

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*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*कहि कहि केते थाके दादू, सुणि सुणि कहु क्या लेइ ।*
*लौंण मिलै गलि पाणियां, ता सम चित यों देइ ॥*
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*शरणागति ॥*
वोलै ऊबरिबौ हरि थारै, कलि की बालि झकोला मारै ॥टेक॥
जप तप करणी दाहै बाली, अलगाँ हीं थै दीसै काली ।
दूधाधारी पवन अहारी, हरि बिन हुई बिगूचनि भारी ॥
नगिन अंगीठी बारहमासा, मोंनी करै मित्र की आसा ।
बनखँडि जाइ गुफा मैं बासा, तीरथ बरत न पूजै आसा ॥
तुम तजि “औरहि वोलै” जांहीं, सो बालि अछूता मेल्ह्या नांहीं ।
जहाँ जाव तहाँ वोलौ नांहीं, झींणी बालि झकोलै मांहीं ॥
वोलै राखि अमर ले कीधा, साषि कहैं ते सरणैं लीधा ।
बषनैं बूझ्या त्याँह समझायौ, ताकि तुम्हारै ओलै आयौ ॥१०३॥
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स्वामी मंगलदासजी ने “औरहि वोलै” का “और हिवालै” पदच्छेद करके “हिवालै” को हिमालय का वाचक माना है किन्तु इसका सही पदच्छेद ऊपर दिया गया है जिससे ही अर्थ की पूर्वापरसंगति पूर्णरूप से बैठती है । “जो तुम को छोड़कर अन्य के आश्रय में जाता है उसको विषय-वासना ने आज तक अपने प्रभाव से अस्पर्श नहीं छोड़ा है ।” अस्तु ।
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कलिकाल में “तामस बहुत रजोगुण थोरा । कलि प्रभाव बिरोध चहुँ ओरा ।” चारों ओर तामसगुण का साम्राज्य है । फलस्वरूप चारों ओर लड़ाई-झगड़े, वैर-विरोध का प्रभाव है । वैर-विरोध द्वैत बुद्धि के कारण होता है । द्वैत बुद्धि अज्ञान के कारण होती है । अज्ञान = अविद्या = माया = भ्रम = तत् में अतत् का बोध ही विषय-वासना में प्रवृत्ति का कारण है ।
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“क्रोध कि द्वैत बुद्धि बिनु, द्वैत कि बिनु अज्ञान । मायाबस परिच्छिन्न जड़, जीव कि ईस समान ।” यहाँ इस अज्ञानजन्य विषय-वासना को ही हरि का आश्रय ग्रहण करने में सबसे बड़ी बाधा बताया गया है । बषनांजी कहते हैं, कलियुग में प्रभावशाली विषयवासना मन को चंचल करके मानव को नरकगामी बनाती है किन्तु हे हरि ! इसके दुष्चक्र से उबरने का साधन एकमात्र आपका अनन्य आश्रय ही है ।
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जप, तप, निष्कामकर्म आदि सभी को यह विषयवासना दग्ध कर देती है । यह प्रत्यक्षतः काली = दुर्गा जैसी भयानक है जो जप, तप पुण्यादि को तत्काल समाप्त कर देती है । जो दूध का आहार करते हैं, पवन का आहार करते हैं, उनकी भी बर्बादी बिना हरि का आश्रय लेने के कारण होती है क्योंकि उन पर यह अपना साम्राज्य स्थापित कर लेने में सफल हो जाती है ।
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जो बारहों मास नग्न रहकर तपस्या करते हैं उनके लिये अंगीठी ही विषय-वासना का रूप है । जो मौंन की साधना करते हैं उनके लिये मित्र की आवश्यकता ही विषय-वासना का रूप है । क्योंकि मौंनी को अपनी बात बताने के लिये किसी न किसी सहायक मित्र की आवश्यकता ही पड़ती ही है । जो जंगल में जाकर गुफा में निवास करके, तीर्थ, व्रत करके परमात्म-प्राप्ति की आशा करते हैं, उनकी वह आशा पूजै = पूर्ण = सफल नहीं होती है ।
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हे परमात्मन् ! जो आपका आश्रय छोड़कर अन्य का सहारा लेते हैं उन्हें यह विषयवासना अछूता छोड़ती नहीं है । अर्थात् उन्हें अपने प्रभाव में ले ही लेती है । जहाँ भी जाओ वहाँ पर ही आपके अतिरिक्त अन्य और कोई दूसरा आश्रय नहीं है क्योंकि सर्वत्र ही इस सूक्ष्म विषयवासना की गति होने से यह सभी स्थानों पर विचलन = मन में हलचल पैदा कर देती है ।
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वे लोग इस बात की साक्षी भरते हैं जिन्हें हे हरि आपने अपनी शरण में ले लिया; जिन्हें अपनी अभय बाँह प्रदान कर दी । क्योंकि उन्हें आपने अपनी शरणावलंबन प्रदान करके जन्म-मरण के चक्र से छुड़ाकर अमर कर दिया । मैं बषनां ने भी उनसे जाकर पूछा । उन्होंने मुझे आपकी शरणागतवत्सलता का रहस्य समझाया । ताकि = उस रहस्य को जानकर ही मैं आपके आश्रय में आया हूँ ॥१०३॥

*१०. विरह का अंग~ ९/१२*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*१०. विरह का अंग~ ९/१२*
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*विरही बालक गूंग पशु, काहि कहै दुख सुक्ख ।*
*रज्जब मन की मन रही, लहै न मारग मुक्ख ॥९॥*
विरही, नवजात बालक, गूंगा और पशु अपना दुख: सुख किसको कहते हैं ? इनके मन की व्यथा मन में ही रहती है जब तक ब्रह्म-ज्ञान रूप मुख्य मार्ग नहीं प्राप्त होता तब तक विरह का दुख: समाप्त नहीं होता ।
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*अंतर ही अंतर घणा, बिच ही बीच अपार ।*
*माँहीं माँहिं न मिल सकूं, दीरघ दुख करतार ॥१०॥*
मेरे अन्त:करण के मध्य ही साक्षी रूप से मेरे प्रियतम रहते हैं किन्तु फिर भी उनमें और मेरे में बहुत भेद है वे विश्वकर्त्ता व्यापक हैं, अत: मैं उनके बीच में ही व्यापक रूप से रहता हूँ किन्तु फिर भी उनके और मेरे मिलन में अज्ञान रूप अपार व्यवधान पड़ रहा है । वे मेरे में हैं, मैं उनमें हूँ, इस प्रकार ओत-प्रोत होने पर भी उनका साक्षात्कार नहीं होता इसी से महान दुख: हो रहा है ।
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*रज्जब चखि१ चुख२ चिहुर३ की, नैनहुँ काढे नीर ।*
*सांई सुरति सुमेरु सम, सु नैनहुँ अटके वीर४ ॥११॥*
नेत्र१ की पलक के भीतर के छोटे छोटे परबालों३ की चुभन२ नेत्रों से जल निकालती है किन्तु हे भाई४ ! प्रियतम प्रभु की वियोगाकार वृत्ति तो सुमेरू के समान विशाल होने पर भी वह जल नेत्रों में ही अटक जाता है अर्थात प्रभु वियोग का दु:ख तो बहुत होता है किन्तु नेत्रों अश्रु नहीं गिरते, कारण- विरहाग्नि से भीतर ही जल जाते हैं ।
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*रज्जब बारह बाहिरा१, विरह तेरहाँ मेघ ।*
*वहिं२ सौ तिन३ कन४ जन५ सुवहिं६, करै कौन कहु सेघ७ ॥१२॥*
बाहिर१ के बारह मास के बारह सूर्य और तेरहवाँ बादल इन२ से ही घासादि तृण३ और अन्न४ उत्पन्न होते हैं, वैसे ही विरह द्वारा श्रेष्ठ भक्त होते हैं । विरह६ उत्पन्न होने पर भक्त५, भगवद् से भिन्न किस से संबन्ध७ करता है ? जिसका संबन्ध परब्रह्म को छोड़ अन्य से नहीं होता वही श्रेष्ठ भक्त कहलाता है और ऐसा भक्त विरह उत्पन्न होने से ही होता है ।
(क्रमशः)

नाममाहात्म्य

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*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*राम भजन का सोच क्या, करता होइ सो होइ ।*
*दादू राम संभालिये, फिर बुझिये न कोइ ॥*
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*राग टोड़ी ॥७॥ नाममाहात्म्य ॥*
जोषीला सब जोईला, कोइ नाँव समानि न होईला ॥टेक॥
अठसठि तीरथ बेद पुराणा, तुलै नहीं कोइ नाँउ समाना ।
नेम धरम सब जप तप भैला । नाँव समानि कोइ हुवा न व्हैला ॥
दान पुंनि करि तुला बईठा, नाँव समानि कोइ तुलत न दीठा ॥
नीखँड पिरथी जोषी जोई, बषनां नहीं बराबरि होई ॥१०२॥
जोषीला = हे साधकों ! (जोषीला ‘जोशी’= ब्राह्मण का वाचक भी अर्थ किया जा सकता है । वस्तुतः यहाँ “जोषीला” शब्द ‘जोशी’ के लिये अश्रद्धास्पद भाव से आया है । जैसे ‘जोगी’ को ‘जोगीड़ा’ कहने में अश्रद्धा का भाव दर्शित हुआ करता है ।) हमने सब को तौल लिया है, देख डाला है, पढ़ डाला है, सुन लिया है; भगवन्नाम के बराबर अन्य दूसरा कोई भी भगवत्प्राप्ति का सरल, सुगम, निरापद व बिना लागत ही सध जाने वाला साधन नहीं हो सकता है ।
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अड़सठ तीर्थों में जाकर स्नान करने से अर्जित पुण्य, वेद-पुराणादि का स्वाध्याय, श्रवण; कोई भी भगवन्नाम के बराबर तौलने पर तुल नहीं पाते हैं । नियम, धर्म = पुण्य, सकाम-जप, तप सभी भेला = मिलकर आज तक न तो भगवन्नाम के बराबर हुए हैं और न भविष्य में होंगे ही । पण्ढरपुर में एक दानवीर श्रेष्ठिवर्य अपरिमित दान पुण्य करके तुला के एक पलड़े में यह कहकर बैठा कि यदि मैंने अपरिमित मात्रा में दान पुण्य किया है तो मेरा पलड़ा तुलसी पर लिखे राम-नाम युक्त एक पत्ते से भारी हो जाए किन्तु उस एक पत्ते पर लिखे राम-नाम के बराबर उस दान-पुण्य को तुलते हुए नहीं देखा गया । अर्थात् नाम का पलड़ा ही भारी रहा ।
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कार्तिकेयस्वामी नौखंड पृथिवी नाप कर = घूमकर आये जबकि गणेश कहीं पर भी न जाकर माता-पिता के समक्ष राम शब्द पृथिवी पर लिखकर उसी की परिक्रमा करके आ गये जिससे गणेश को ही जीता हुआ मान लिया गया । क्योंकि नवखंडात्मक पूरी पृथिवी राम-नाम में समाहित है और गणेशजी ने रामनाम की परिक्रमा करके नवखंडात्मक पृथिवी की परिक्रमा एक क्षण मात्र में कर ली । अथवा बषनां कहता है, जोषी, जोई = पूरी नवखंडात्मक पृथिवी को तौल व देख डाल किन्तु नाम के बराबर वह भी नहीं हो सकेगी । राम नाम इससे भी बड़ा महान्, प्रभावशाली है ॥१०२॥

२३. स्वरूप विस्मरण को अंग ४८/५०

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२३. स्वरूप विस्मरण को अंग ४८/५०
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बुद्धि हीन अति बावरौ, देह रूप ह्वै जाइ । 
सुन्दर चेतनता गई, जडता रही समाइ ॥४८॥
देहाभिमानी आत्मा का देह यदि मूर्ख है या पागल है तो वह आत्मा स्वयं को भी मूर्ख एवं पागल मानने लगता है । ऐसी स्थिति में यही समझना चाहिये कि उस आत्मा का स्वरूप(चेतनता) नष्ट हो गया है तथा देह की जडता उस को आवृत कर चुकी है ॥४८॥
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स्याणौ घर मांहे कहै, हूं अपने घर जांउं । 
सुन्दर भ्रम ऐसौ भयौ, भूलौ अपनौ ठांउं ॥४९॥
यदि कोई उन्मत्त पुरुष, घर में बैठा हुआ भी कहे कि मैं घर जाना चाहता हूँ, यह बात तो समझ में आने योग्य है; परन्तु आश्चर्य तब होता है जब कोई सयाना(सावधान) पुरुष भी यही कहे । आज भ्रमात्मक स्थिति के कारण आत्मा की यही दशा हो गयी है कि वह स्वस्थिति को ही भूल गया है ! ॥४९॥
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रवि रवि कौं ढूंढत फिरै, चंद हि ढूंढै चंद । 
सुन्दर हूवो जीव सौं, आप इहै गोबिंद ॥५०॥
इति स्वरूप विस्मरण कौ अंग ॥२३॥
लोक में यहीं देखा जाता है कि प्रत्येक प्राणी अपने समानस्थितिक(समानधर्मा) को ही खोजता है । सूर्य सूर्य जैसे तेजस्वी को ही खोजता है तो चन्द्रमा अपने जैसे शीतल को ही खोजता है । इसी प्रकार आत्मा को अपने समानधर्मा ब्रह्म की ही खोज करनी चाहिये, तब वह गोविन्दस्वरूप(ईश्वर = ब्रह्म) हो पायगा ॥५०॥
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इति स्वरूपविस्मरण का अंग सम्पन्न ॥२३॥
(क्रमशः) 

रविवार, 26 अप्रैल 2026

रामजी आगे दोइ करि जोड़ि

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*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*दादू निमिष न न्यारा कीजिये, अंतर थैं उर नाम ।*
*कोटि पतित पावन भये, केवल कहतां राम ॥*
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*उपदेश ॥*
*रामजी आगे दोइ करि जोड़ि ।*
और आगै जोड़ैगा तौ याही मोटी खोड़ि ॥टेक॥
रामजी रामजी रसना भाखि । राम रजा सिर ऊपर राखि ॥
आन कौं सीस नवावैगा । तौ पति कौ ब्रत लजावैगा ॥
भूखाँ धायाँ करि इकतार । मति छोड़ै मोटै दरबार ॥
सेवा सेव्यां भला जु व्हैलौ । कबइक साम्हाँ जोवैलौ ।
सेवा छाड़ि न भाजैलौ । तो बषनां राम निवाजैलौ ॥१०१॥
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हे आत्मकल्याणार्थी ! मात्र परात्पर-परब्रह्म-परमात्मा रूप रामजी के आगे ही हाथ जोड़ना = दीन बनकर करुण प्रार्थना करना । यदि तू रामजी के अतिरिक्त अन्य देवी-देव, राजा-प्रजा आदि के समक्ष दीनता प्रदर्शित करेगा तो यही तेरे जीवन की सबसे बड़ी गलती होगी । तेरे द्वारा होने वाली सबसे बड़ी कृतघ्नता होगी, परब्रह्म-परमात्मा के प्रति ।
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अतः रामजी की रजा = राजी = आज्ञा को सर्वोपरि मानकर सदैव रसना से राम नाम का उच्चारण कर ।
“सततं कीर्तयन्तो माम् ये जना पर्युपासते ।
तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम् ॥”
रामजी को छोड़कर यदि अन्य की शरण का आश्रय लेगा तो तेरा पातिव्रतधर्म लज्जित हो जायेगा । तू व्यभिचारी कहलाने लगेगा । चाहे जैसी भी परिस्थितियाँ प्राप्त हों, चाहे सुख की स्थिति हो चाहे दुःख की स्थिति हो; सभी में समभाव रखकर परमात्मा राम में पूर्ण विश्वास रख ।
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उस परात्पर-परब्रह्म की शरण का आश्रय कथमपि मत छोड़ । परात्पर-परमात्मा की सेवा करने से हमेशा कल्याण ही होगा । क्योंकि परमात्मा की भक्ति का कभी भी नाश नहीं होता ।
“नेहाभिक्रमानाशोऽस्ति प्रत्यवायो न विद्यते ।
स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात् ॥”
कभी न कभी तो उसको तू प्रत्यक्ष देखेगा ही । तुझे इस जन्म में नहीं तो अगले जन्म में तो अवश्य ही साक्षात्कार हो जायेगा ॥१०१॥ 

२३. स्वरूप विस्मरण को अंग ४५/४७

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२३. स्वरूप विस्मरण को अंग ४५/४७
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देह आपकौ जानि करि, ब्राह्मन क्षत्रिय होइ । 
वैश्य सूद्र सुन्दर भयौ, अपनी सुधि बुधि खोइ ॥४५॥ 
वह आत्मा देहाभिमान करता हुआ, अपनी सुध बुध खो कर, कभी अपने को ब्राह्मण कहता है और कभी क्षत्रिय । वही कभी अपने आप को वैश्य तो कभी शूद्र मानने लगता है ॥४५॥
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देह पुष्ट ह्वै दूबरी, लगै देह कौं घाव । 
चेतनि मांनै आपु कौं, सुन्दर कौंन सुभाव ॥४६॥
देहाभिमानी उस आत्मा की देह कभी किसी कारण से पुष्ट हो जाती है, या कभी दुर्बल । कभी उस देह को किसी कारण से कोई आघात लग जाता है । वह चेतन आत्मा, देहाभिमान के कारण, देह के इस उतार चढाव(हानि या वृद्धि) को अपना मान बैठता है ॥४६॥
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देह बाल अरु बृद्ध ह्वै, जोबनि ह्वै पुनि देह । 
सुन्दर मानैं आपु कौं, देखहु अचिरज येह ॥४७॥
बाल्यावस्था, वृद्धावस्था या युवावस्था स्वभावतः देह में आती रहती है । वह देहाभिमानी आत्मा इन अवस्थाओं को अपने में मानने लगता है । यही आश्चर्य की बात है ! ॥४७॥
(क्रमशः)