बुधवार, 4 नवंबर 2026

*करड़ाला यात्रा*

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷*卐 श्री दादूदयालवे नम: 卐*🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
.
*स्वांगी साधु बहु अन्तरा, जेता धरणी आकाश ।*
*साधु राता राम सौं, स्वांगी जगत की आश ॥*
================
*करड़ाला यात्रा*
एक दिन सांभर में जग्गाजी ने दादूजी महाराज को प्रणाम करके प्रार्थना की — भगवन् ! मेरा मन करता है, आपकी तपो भूमि करड़ाला के तथा मोरड़ा वट वृक्ष के दर्शन कर आऊं । अतः आप मुझे जाने की आज्ञा दीजिये । दादूजी महाराज ने जग्गाजी की विशेष इच्छा देखकर आज्ञा दे दी । फिर जग्गाजी दादूजी महाराज को साष्टांग दंडवत सत्यराम करके करड़ाला के लिये प्रस्थान कर गये ।
.
वे भ्रमण करते हुये करड़ाला ग्राम में पहुँचे । वहां के चारण भक्तों ने जग्गाजी को पूछा — आप कौन हैं ? और कहां से आये हैं ? जग्गाजी ने कहा — मैं संत प्रवर दादूजी महाराज का शिष्य हूँ और सांभर से दादूजी की आज्ञा लेकर ही यहां की यात्रा करने आया हूँ । मुझे आप लोग दादूजी महाराज जहां विराज कर तपस्या करते थे उस स्थान का दर्शन कराओ । दादूजी महाराज का नाम सुनकर वे लोग आनन्द में मग्न होकर बोले — बहुत अच्छा, अभी पधारिये । दादूजी महाराज की तो इस ग्राम पर बड़ी कृपा रही है ।
.
फिर दो व्यक्ति जग्गाजी के साथ गये और पर्वत के मध्य भाग में एक ककेड़ा वृक्ष के पास पहुँच कर बोले — इस वृक्ष के नीचे ही दादूजी महाराज भजन करते थे । अब आस पास के ग्रामों के लोग इसको दादूजी का ककेड़ा ही बोलते हैं । फिर जग्गाजी ने दादूजी महाराज की यह साखी —
“प्रीतम के पग परसिये, मुख देखन का चाव ।
तहां ले शीश नमाइये, जहां धरे ते पाव ॥”
बोलते हुये उस स्थान को साष्टांग दंडवत किया । फिर वहां ककेड़े की छाया में कुछ देर बैठे ।
.
उस समय उन करड़ाले के निवासी दोनों व्यक्तियों ने दादूजी महाराज के वहां पर निवास की चर्चा चलाई । वे कहने लगे — दादूजी महाराज संतोष की तो साक्षात् मूर्ति ही हैं । उनके समान संयम नियमादि साधन साधारण व्यक्ति से तो होने कठिन ही हैं । यहां तो वे निरंतर ब्रह्म-भजन में ही रहते थे । इत्यादिक दादूजी महाराज के साधन सम्बन्धी बहुत सी बातें कह कर कहा — अब पधारिये दर्शन हो गये हैं । फिर जग्गाजी उनके साथ नीचे ग्राम में आ गये और भोजन करके रम गये ।
.
भ्रमण करते हुये सलेमाबाद के पास आ गये और किसी से पूछा — इस ग्राम का क्या नाम है ? उसने कहा — सलेमाबाद है किन्तु आजकल इसको परशुराम पुरी भी कहते हैं । यहां निम्बार्क संप्रदाय के आचार्य परशुरामजी महाराज विराजते हैं । तब जग्गाजी ने अपने मन में सोचा पास ही आ गया हूँ, अब तो परशुरामजी महाराज का दर्शन करके ही आगे चलूंगा ।
.
*परशुरामजी के दर्शन*
फिर वे परशुरामजी के स्थान पर गये किन्तु उनके द्वार पर स्थित लोगों ने उनको भीतर नहीं जाने दिया । जग्गाजी समझ गये कि इन्होंने मुझे कंगाल समझ कर रोक दिया है । फिर वे ग्राम में एक वैश्य की दुकान पर गये । वैश्य से वार्तालाप होने से इनको दादूजी का शिष्य जानकर उसने इनसे बहुत प्रेम किया और बोला — सेवा की आज्ञा दीजिये । जो भी आपकी आज्ञा होगी उसे पालन किया जायगा, लेश मात्र भी संकोच नहीं कीजिये । तब जग्गाजी ने कहा — कुछ समय के लिये आप अपने पहनने के वस्त्र मुझे दे दीजिये । मेरे वस्त्र यहां रखकर तथा आपके पहनकर मैं परशुरामजी के दर्शन करके आ जाऊंगा तब आपके वस्त्र आपको देकर मेरे वस्त्र पहन लूंगा ।
.
अधिक श्रद्धा के कारण उस वैश्य ने अन्य कुछ भी न पूछ कर तत्काल अपने वस्त्र जग्गाजी को दे दिये । फिर अपने वस्त्र उतार के सेठ का भेष बनाकर जग्गाजी चले । मार्ग में ऊंट के मेंगने पड़े थे, उनमें से लगभग पांच सेर मेंगने अपने कंधे पर रखे हुये वस्त्र में बांध कर उसको हाथ में लटका लिया । फिर परशुरामजी के द्वार पर आये तब उनके हाथ में मेंगनों की गठड़ी लटकती हुई देखकर द्वार पर स्थित लोगों ने सोचा कोई बड़ा सेठ है । हाथ में प्रसाद की गठड़ी भी है, हमें भी प्रसाद मिलेगा तथा महाराज को भी अच्छी भेंट चढ़ायेगा । ऐसा सोचकर तत्काल दो तीन व्यक्ति उठकर सामने आये और बोले — आइये सेठ साहब ! हम आपको महन्त महाराज के पास ले चलते हैं ।
.
फिर वे सेठ भेषधारी जग्गाजी को परशुरामजी महाराज के पास ले गये । परशुरामजी के पास जाकर जग्गाजी ने मेंगनों की गठड़ी एक ओर रखकर पहले मेंगनों की गठड़ी को साष्टांग दंडवत प्रणाम किया । फिर वह गठड़ी परशुरामजी के चरणों में रखकर परशुरामजी महाराज को दंडवत करके सामने बैठ गये । इनका यह विचित्र व्यवहार देखकर परशुरामजी महाराज ने सोचा — इसमें कोई रहस्य अवश्य है । परशुरामजी ने पूछा — आप कौन है ? कहां से आये हैं ? और इन मेंगनों की गठड़ी को प्रथम दंडवत करने का क्या रहस्य है ? मेरे पास आप किस लिये आये हैं ?
.
*परशुरामजी के प्रश्नों के उत्तर*
परशुरामजी महाराज के उक्त चार प्रश्न सुनकर परम सिद्ध जग्गाजी बोले — भगवन् ! मैं संत प्रवर दादूजी का शिष्य हूँ, जग्गाजी मेरे इस शरीर का नाम है । इस समय मैं दादूजी महाराज की तपोभूमि करड़ाला की यात्रा करके इधर आ रहा हूँ । आपके धाम के पास आकर मैंने पूछा — इस ग्राम का क्या नाम है ? तब उत्तर मिला यह परशुरामपुरी है । यह सुनकर मेरी प्रबल इच्छा हुई कि परशुरामजी महाराज का दर्शन करके ही आगे चलूंगा किन्तु आपके द्वार पर स्थित लोगों ने मुझे दरिद्री जानकर भीतर नहीं आने दिया ।
.
तब मैंने सोचा — परशुरामजी महाराज के दर्शन अवश्य करने हैं । अतः कोई उपाय करना ही होगा । फिर मैं एक वैश्य के पास से जो मैंने पहन रखे हैं, ये वस्त्र मांग लाया और मार्ग में पड़े हुये मेंगने द्वार पर स्थित लोगों को यह दिखाने के लिये कि — सेठजी प्रसाद लाये हैं हमें भी मिलेगा, बांध लाया । मेंगनों की गठड़ी को प्रथम दंडवत करने का रहस्य यही है कि — इनकी कृपा से ही आपके दर्शन हो सके हैं । अतः इनका उपकार मान कर प्रथम दंडवत इनको किया है । आपके पास आपके दर्शन करने ही आया हूँ । इतना कह कर जग्गाजी मौन हो गये ।
(क्रमशः)

*४९. भ्रम विधवंस कौ अंग ८५/८७*

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
*श्रद्धेय श्री Tapasvi @Ram Gopal Das की प्रेरणा से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Meta AI*
.
*४९. भ्रम विधवंस कौ अंग ८५/८७*
.
*कहि जगजीवन निरजला, बरष दिवस मंहि एक ।*
*हरि के कारण हरि भगति, अैसी करैं अनेक ॥८५॥*
संत जगजीवन साहेब कहते हैं, सच्चा निर्जला तो वर्ष में एक दिन नहीं, प्रतिदिन है । हरि के कारण, हरि की भक्ति के लिए भक्त ऐसी अनेक साधनाएं करते हैं । अर्थात निर्जला केवल एकादशी का व्रत नहीं, हर दिन मन को विषय-जल से निर्जल रखना ही सच्ची हरि भक्ति है ।
.  
*कहि* जगजीवन दार कौ, ब्रिषभ न खैंचे भार* ।*
*रांम सुमीर जन ऊधरै, जगजीवन बिसतार ॥८६॥*
(*-*. काष्ठनिर्मित बैल गाड़ी को कभी नहीं खींच सकता)
आपने बहुत सुंदर टिप्पणी की है, काठ से बना बैल कभी गाड़ी का भार नहीं खींच सकता । वैसे ही केवल बाहरी जड़ साधनों से भवसागर पार नहीं होता । संत जगजीवन दास जी विस्तार से कहते हैं, राम को सुमिर कर ही जन का उद्धार होता है । सजीव राम नाम ही गाड़ी खींचेगा, निर्जीव साधन नहीं ।
.
*कहि* जगजीवन अस्म को, अस्व कोय घडि घात ।*
*अराभष बाजी अलाप धी, हरि बिन कटै न बाट* ॥८७॥*
{*-*. पत्थर के बने घोड़े से कोई मूर्ख(=अल्पधी) ही यात्रा करने की सोच सकता है}
जैसा आपने लिखा, पत्थर के बने घोड़े से कोई मूर्ख ही यात्रा करने की सोचेगा । वैसे ही हरि बिना यह जीवन की बाट, यह रास्ता कटने वाला नहीं है । संत जगजीवन साहेब कहते हैं, जो अल्प बुद्धि वाले हैं, वे नश्वर साधनों को, पत्थर के घोड़े को ही सच्चा मान बैठते हैं और हरि नाम रूपी सजीव घोड़े को भूल जाते हैं ।
॥ इति भ्रम विध्वंस कौ अंग संपूर्ण ॥
(क्रमशः)

मंगलवार, 3 नवंबर 2026

*३१. साधु संगति परम लाभ का अंग ~२९/३२*

*🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏*
*🌷卐 सत्यराम सा 卐🌷*
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
.
*३१. साधु संगति परम लाभ का अंग ~२९/३२*
.
*रज्जब अज्जब काम है, साधु जन संसार ।*
*जिन मिलते मोहन मिलैं, प्राणपुरुष ह्वै पार ॥२९॥*
संसार में संत जनों का कार्य अद्भुत देखा जाता है, जिसके संग से प्राणधारी पुरुष संसार-सागर से पार होकर विश्व-विमोहन ब्रह्म में ही मिल जाता है ।
.
*रज्जब अज्जब रूप, साधु जन संसार मधि१ ।*
*जेहिं मिल मिलहिं अनूप, सकल बोल कारज सिधि२ ॥३०॥*
संसार में१ संत जनों का स्वरूप अद्भुत है, उनके सभी वचन जीव के कार्य को सिद्ध२ करने वाले होते हैं और जिनके सङ्ग से उपमा रहित परमात्मा भी मिल जाते हैं ।
.
*असंख्य१ लोक आतम फिरे, तो भी साधु न होय ।*
*जन रज्जब सत्सङ्ग बिन, सीझया२ सुन्या न कोय ॥३१॥*
जीवात्मा अनन्त१ लोकों में फिर आवे, तो भी साधु नहीं हो सकता, संसार में सत्सङ्ग के बिना कोई भी ज्ञानी२ हुआ हो ऐसा नहीं सुनने में आता ।
.
*भाव भक्ति सत जत जुदे, अंग१ न आवहिं अंग२ ।*
*रज्जब रीती३ आतमा, एक बिना सत्संग ॥३२॥*
भाव, भक्ति, सत्य भाषण, ब्रह्मचर्य आदि भिन्न भिन्न साधन करने से प्रिय१तम ब्रह्म अभेद रूप से अपने शरीर२ में नहीं आता अर्थात आत्मा और ब्रह्म की एकता का ज्ञान नहीं होता । वह तो सत्सङ्ग से ही होता है । अत: सत्सङ्ग के बिना जीवात्मा आत्म-ज्ञान रहित होने से खाली३ ही माना जाता है ।
(क्रमशः)

*३१. साधु संगति परम लाभ का अंग ~२५/२८*

*🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏*
*🌷卐 सत्यराम सा 卐🌷*
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
.
*३१. साधु संगति परम लाभ का अंग ~२५/२८*
.
*परम पुरुष पारस परसि, साधु सोना होय ।*
*तो रज्जब सत्संग सौं, मिलत न वरजो कोय ॥२५॥*
पारस से स्पर्श पर लोहा सोना हो जाता है, वैसे ही सत्संग में जाने से ध्यानादि द्वारा परम पुरुष परमात्मा से मिलकर साधारण प्राणी भी संत हो जाता है, अत: सत्संग में जाकर संतों से मिलने वाले को कोई न रोके ।
.
*साधु वाणी छाँह हमाई१, भाग हुं पड़े शीश पर आई ।*
*देखत दोन्य पाँवहि राज, रज्जब होहिं सकल शिर ताज ॥२६॥*
संतों की वाणी कान में और हमा१ पक्षी की छाया शीश पर बने भाग्य से ही पड़ती है, जिसके शिर पर हमा पक्षी की छाया पड़ती है वह राजा हो जाता है और जिसके कानों में संतों की वाणी पड़ती है वह सकल शिरोमणी आत्म राज्य ब्रह्म पद को प्राप्त होता है । देखते देखते वर्तमान शरीर में ही दोनों महाराज पद को प्राप्त हो जाते हैं ।
.
*साधु संदल१ पारस पारा, भृंगी छाँह हमाय२ ।*
*रज्जब मन तन पलटणों, भागहुं मिलहि सु आय ॥२७॥*
साधु, चन्दन१, पारस, पारा भृंगी और हमा२ पक्षी की छाया, इनका संयोग मन और शरीर दोनों को बदलने वाला है तथा बड़े भाग्य की प्रेरणा से ही आकर ऐसा संयोग मिलता है । साधु संग से शरीर संयम और मन में ज्ञान रूप परिवर्तन होता है, चन्दन से पृक्ष का गंध और गुण और आकार बदलता है । पारस से लोह का मूल्य और रंग बदलता है । पारा से औषधि रसायन रूप में बदल जाती है । भृंगी से कीट का आकार और स्वभाव बदलता है । हमा पक्षी की छाया से भाग्य और भेष बदलता है ।
.
*हद१ बेहद२ के बीच में, साधु३ संत दलाल ।*
*सौदा४ आतम राम सौं, इन करि ह्वै दर५हाल६ ॥२८॥*
मायिक संसार१ और ब्रह्म२ के बीच में श्रेष्ठ३ संत ही दलाल है, इनके द्वारा ही आत्म का राम से मिलन रूप व्यापार४ वर्तमान६ में५ ही हो जाता है ।
(क्रमशः)

*३१. साधु संगति परम लाभ का अंग ~२१/२४*

*🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏*
*🌷卐 सत्यराम सा 卐🌷*
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
.
*३१. साधु संगति परम लाभ का अंग ~२१/२४*
.
*जो दत१ जीव हिं जीव दे, तिहिं पसाव२ प्रभु दूर ।*
*रज्जब साधु नाम देहिं, सु नरहरि३ करे हजूर ॥२१॥*
जीव को अन्य जीव जो सुवर्णादि दान देते हैं, उस दान१ से प्रभु की कृपा२ नहीं होती, साधु नाम रूप दान देते हैं, वह नाम सम्यक् रीति से प्रभु३ के पास उपस्थित कर देता है ।
.
*चिदानन्द का चिन्तवन, चौरासी में नाँहिं ।*
*जन रज्जब सो पाइये, साधु संगति माँहिं ॥२२॥*
चौरासी लक्ष योनियों में चेतन आनन्द स्वरूप ब्रह्म का चिन्तन भी नहीं हो पाता, वह ब्रह्म साधु संगति में आत्म रूप से प्रत्यक्ष प्राप्त होता है ।
.
*नाव नाव साधु कनें१, बूडत लेहि चढाय ।*
*महिमा उस उपकार की, रज्जब कही न जाय ॥२३॥*
साधु के पास१ राम-नाम रूप नौका है, वह संसार सागर में डूबते हुये प्राणी को उस पर चढा लेता है और प्रभु के पास पहुँचा देता है, साधु के उस उपकार की महिमा किसी भी प्रकार कही नहीं जा सकती ।
.
*शब्द संदेश ना लहत, साधुन कनें जो जीव ।*
*तो रज्जब रह१ चलती नहीं, प्राण न परसत पीव ॥२४॥*
जो जीव साधुओं के पास से शब्द रूप समाचार नहीं सुनता, तो उसकी वृत्ति परमार्थ मार्ग१ में नहीं चल सकती और वह प्राणी प्रभु से नहीं मिल पाता ।
(क्रमशः)

*३१. साधु संगति परम लाभ का अंग ~१७/२०*

*🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏*
*🌷卐 सत्यराम सा 卐🌷*
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
.
*३१. साधु संगति परम लाभ का अंग ~१७/२०*
.
*रज्जब साधु दरसतैं, साहिब आवे याद ।*
*आयु न पूजे१ उस पल२ हिं, देखर दीज्यो दाद३ ॥१७॥*
संन्तों के दर्शन मात्र से ही परमात्मा का स्मरण होने लगता है, फिर सत्सङ्ग के तो एक क्षण२ के बराबर१ भी संपूर्ण आयु नहीं हो सकती, अत: सत्सङ्ग का महात्म्य प्रत्यक्ष देखकर के अवश्य प्रशंसा३ करना चाहिये ।
.
*साधु दत्त१ की मिति२ नहीं, सांई आवे हाथि ।*
*रज्जब और न देखिये, देता ऐसी आथि३ ॥१८॥*
साधु के दान१ की सीमा२ नहीं है, उसके उपदेश से परमात्मा भी हाथ आ जाते हैं अर्थात मिल जाते हैं । देखिये और कोई भी ऐसी पूंजी३ नहीं देता, जिससे परमात्मा मिल सकें ।
.
*सदा अभूली भूलिये, भूल्या आवे याद ।*
*यहु रज्जब सत्संग फल, देखर दीज्यो दाद ॥१९॥*
जीव जिसे कभी भी नहीं भूलता उस माया को भी सत्संग से भूल जाता है और जिसे भूला रहता है वह परमात्मा स्मरण हो आता है । यही सत्संग का फल है यह प्रत्यक्ष देखकर सत्सङ्ग की प्रशंसा अवश्य करनी चाहिये ।
.
*रज्जब साधु दान सम, दिया किसी का नांहि ।*
*मनसा वाचा कर्मना, समझ देख मन माँहिं ॥२०॥*
साधु को दिये हुये दान के समान किसी का भी दान नहीं होता, हम तो मन, वचन, कर्म से यथार्थ ही कहते हैं, तुम भी मन में विचार कर देख लो ।
(क्रमशः)

*अध्याय ५~जग्गाजी*

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷*卐 श्री दादूदयालवे नम:  卐*🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
.
*दादू सब जग नीधना, धनवंता नहीं कोइ ।*
*सो धनवंता जाणिये, जाके राम पदार्थ होइ ॥*
================
*अध्याय ५~जग्गाजी*
एक दिन सांभर में एक गुजराती सज्जन आये । उनका नाम जगिया भाई था । वे अपनी पत्नी की प्रेरणा से धन प्राप्ति के लिये भ्रमण कर रहे थे । जब उनको कहीं भी विशेष रूप से धन नहीं मिला तब उन्होंने निश्चय किया—सांभर से लवण खरीद कर देश को ले चलें, इससे कुछ तो प्राप्त होगा ही । वे सांभर में आये तब उन्होंने सुना—यहां दादूजी नाम के एक गुजराती संत हैं । वे बड़े सिद्ध पुरुष हैं । जगियाभाई ने अपने मन में सोचा—यदि दादूजी सिद्ध पुरुष हैं, तब तो मुझे धन भी दे सकते हैं । मुझे उनके पास अवश्य चलना चाहिये । 
.
फिर वे दादूजी के आश्रम में गये । दादूजी का दर्शन करके नमो नारायण बोलते हुये दादूजी के चरणों में मस्तक रखकर प्रणाम किया फिर सामने बैठ गये और अपनी कथा सुनाकर बोले—स्वामिन् ! मुझे धन की अभिलाषा है । आप सिद्ध पुरुष हैं । अतः मेरी आशा पूर्ण कर दीजिये । यदि मैं बिना धन घर को जाऊंगा तो मेरी स्त्री क्रोधित होकर मुझे बहुत गालियां देगी । वह मुझे बहुत दुःख देती है । जगियाभाई की उक्त बातें सुनकर दादूजी बोले—
.
बार हि बार कहूँ रे गहिला, राम नाम कांई विसारच्यो रे ।
जन्म अमोलक पामियो¹ एव्हो² रतन कांई हारच्यो रे ॥टेक॥
विषया बाह्या³ नैं तहं धायो, कीधो⁴ नहिं म्हारो वारच्यो⁵ रे ।
माया धन जोई नैं भूल्यो, सर्वस येणे⁶ हारच्यो रे ॥१॥
गर्भवास देह दमतो' प्राणी, आश्रम तेह संभारच्यो रे ।
दादू रे जन राम भणीजे,नहिं तो यथा विधि हारच्यो रे ॥२॥
अर्थ—अरे अनसमझ ! मैं तुझे बारं बार कहता हूं, तू राम का नाम चिन्तन करना क्यों भूला है ? यह अमूल्य मानव जन्म तुझे प्राप्त¹ हुआ है, ऐसा² रत्न विषयों में क्यों खो रहा है ? विषयों से बहक³ कर के जहां विषय प्राप्त हों वहां ही दौड़ता है । मैंने जिनको त्यागने⁵ के लिये कहा वे कामादि तो नहीं त्यागे, मेरा कहना नहीं किया⁴ । मायिक कनकादि धनों को देखकर प्रभु को भूल रहा है । इस⁶ व्यवहार से तू अपना सर्वस्व खो रहा है । हे प्राणी ! गर्भवास में तेरा सूक्ष्म देह बारं बार अति कष्ट⁷ पाता रहा है । गर्भवास रूप आश्रम में तूने उस प्रभु को स्मरण किया था, अब फिर भूल गया है । अरे जन ! राम नाम चिन्तन तथा उच्चारण कर, नहीं करने से तो जैसी विधि से तू चल रहा है, ऐसे तो अपने जन्म को व्यर्थ ही खो रहा है । 
.
उक्त उपदेश सुनकर जगियाभाई बोला—
''राम नाम केम थाय गुसांई, राम नाम तणो स्थान कहांई ॥
किम हृद थाय राम तू नामू, केन्हीं संगति थी हूँ प्रामू ॥''
जगियाभाई के उक्त प्रश्नों को सुनकर संत प्रवर दादूजी महाराज बोले—
''वाहला म्हारा ! प्रेम भक्ति रस पीजिये,
रमिये रमता राम, म्हारा वाहला रे ।
हिरदा कमल में राखिये, उत्तम एहज ठाम, 
म्हारा वाहला रे ॥टेक॥
वाहला म्हारा ! सदगुरु शरणे अणासरे,
साधु समागम थाय, म्हारा वाहला रे ।
वाणी ब्रह्म बखाणिये आनन्द में दिन जाय, 
म्हारा वाहला रे ॥१॥
वाहला म्हारा ! आत्म अनुभव उपजे,
उपजे ब्रह्म गियान, म्हारा वाहला रे ।
सुख सागर में झूलिये, साँचो यह स्नान,
म्हारा वाहला रे ॥२॥  
वाहला म्हारा ! भव बंधन सब छूटिये,
कर्म न लागे कोय, म्हारा वाहला रे ।
जीवन मुक्ति फल पामिये¹ अमर अभय पद
होय, म्हारा वाहला रे ॥३॥
वाहला म्हारा ! अठ सिधि नव निधि आंगणे,
परम पदारथ चार म्हारा वाहला रे ।
दादू जन देखे नहीं, रातो सिरजन हार,
म्हारा वाहला रे ॥४॥
अर्थ — हे हमारे प्रिय आत्मा ! प्रेमाभक्ति रस का पान करो । हृदय कमल में सदा राम का ध्यान रखो । राम के ध्यान के लिये यही उत्तम स्थान है किन्तु सद् गुरु की शरण लिये बिना यह काम आगे नहीं चलता । संतों का समागम भी होना ही चाहिये । संत ब्रह्म सम्बन्धी वाणी कहते हैं, उनके संग से दिन आनन्द पूर्वक निकलते हैं । बुद्धि में आत्मानुभव उत्पन्न होकर ब्रह्म-ज्ञान प्रकट होता है, फिर तो साधक सुख-सागर में झूलता है । यही सच्चा स्नान है । इस स्नान से संपूर्ण बन्धन खुल जाते हैं । कर्तृत्व भाव न रहने से कोई भी कर्म का फल नहीं लगता । 
.
जीवनमुक्ति रूप फल प्राप्त करके अमर-अभय पद को प्राप्त¹ होता है । फिर उसके निवास स्थान के आंगन में अष्ट सिद्धि, नव निधि और अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष ये चारों पदार्थ आते हैं किन्तु वह भक्त उनकी ओर देखता भी नहीं, वह तो सृष्टिकर्ता प्रभु के स्वरूप में ही अनुरक्त रहता है । उक्त पद के रहस्यमय उपदेश को श्रवण करके जगिया भाई दादूजी के शिष्य बन गये और भगवद् भजन करके एक महा सिद्ध पुरुष हो गये, फिर ये जग्गाजी के नाम से प्रसिद्ध हुये ।
(क्रमशः)

*४९. भ्रम विधवंस कौ अंग ८१/८४*

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
*श्रद्धेय श्री Tapasvi @Ram Gopal Das की प्रेरणा से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Meta AI*
.
*४९. भ्रम विधवंस कौ अंग ८१/८४*
.
*आतम अस्थल रांमजी, डिगै न कबहूं मंड ।*
*कहि जगजीवन नांम भजि, निरखि नूर नौ खंड ॥८१॥*
आत्मा रूपी अस्थल में राम जी विराजते हैं, वह अस्थल कभी डगमगाता नहीं, कभी नष्ट नहीं होता । संत जगजीवन दास जी कहते हैं, तू नाम को भज, तो तुझे नौ खंडों में, सारे ब्रह्मांड में उसी नूर का दर्शन होगा । वह एक ही नूर सब जगह रमा है ।
.
*कहि जगजीवन सक्ति करि, अस्थल अडिग करंत ।*
*रांम बिमुख देही डिगी, अंबुज अंबु भरंत ॥८२॥*
संत जगजीवन साहेब कहते हैं, शक्ति के द्वारा इस अस्थल को अडिग किया जाता है, साधना की शक्ति से आत्मा स्थिर होती है । जो राम से विमुख है, उसकी देह डिग जाती है, नष्ट हो जाती है, जैसे कमल का पत्ता जल भरते ही डूब जाता है । अंबुज=कमल, अंबु=जल ।
.
*कहि जगजीवन निरजला, लोक करै यौं नांहि ।*
*हरि जन राखै ते सही, रांम भगति ब्रत मांहि ॥८३॥*
संत जगजीवन साहेब निर्जला व्रत के बारे में कहते हैं, लोक जिस प्रकार निर्जला करता है, केवल अन्न-जल त्याग कर, वह सच्चा निर्जला नहीं है । सच्चा निर्जला तो वह है जो हरि जन रखते हैं, अर्थात राम भक्ति के व्रत में स्थित रहना, विषयों से निर्जल रहना, वही सही निर्जला है ।
.
*कहि जगजीवन निरजला,अन्न उदिक की आड़ ।*
*हरि तजि चित भ्रम दूसरा, मनसा लाड़ै लाड़ ॥८४॥*
कई लोग निर्जला का बहाना बनाते हैं, अन्न-जल की आड़ लेते हैं, पर चित्त में हरि को छोड़ कर दूसरे भ्रम में लगे रहते हैं । मनसा लाड़ै लाड़ का अर्थ है मन में तरह-तरह के लाड़, लाड-प्यार, विषयों की चाह में लिप्त रहना । संत जगजीवन साहेब कहते हैं, बाहर से अन्न-जल त्यागा और भीतर मन विषयों में लिपटा रहा, तो वह निर्जला किस काम का ।
(क्रमशः)

सोमवार, 2 नवंबर 2026

*४ राजारामजी*

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷*卐 श्री दादूदयालवे नम:  卐*🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
.
*दादू प्रीतम के पग परसिये, मुझ देखण का चाव ।*
*तहाँ ले सीस नवाइये, जहाँ धरे थे पाँव ॥*
================
*४ राजारामजी*
४- चौथे राजारामजी भी अपने गुरुदेव कुंजदासजी के समान ही भजनानन्दी महात्मा थे । राजारामजी ने भी करोली से ७ मील गंगापुर रोड़ पर मांच ग्राम की सीमा में विद्यमान अस्थल नामक स्थान बनवाया था । कारण—एक तो यहां पर करोली नरेश की दी हुई भूमि थी उसकी व्यवस्था के लिये व्यवस्थापक के निवास के लिये और जो विरक्त संत शहर में नहीं रहना चाहें उनके एकान्त निवास के लिये, लाल पत्थर का अच्छा स्थान बनवाया था । अस्थल में दादू वाणी मंदिर भी है । 
.
वाणी मंदिर की पूजा व स्थान की व्यवस्था वर्तमान में रामचरणदासजी करते हैं । मेरे पूछने पर उन्होंने मुझे करोली की कुंजदासजी की कुंज के महन्त ज्ञानदासजी का शिष्य अपने को बताया था । उक्त कारणों से ही राजारामजी ने अस्थल नामक स्थान बनवाया था । अस्थल के पास कुछ बस्ती है, वह अस्थल नाम से ही बोली जाती है । कारण—अस्थल के बनने के पश्चात ही बसी है । 
.
राजारामजी की घटना भी सुनने में आती है कि—उनके समकालीन करोली नरेश ने आज्ञा निकाली थी कि—मेरे राज्य में रहने वालों को सबको कर देना होगा । उक्त आज्ञा साधुओं के स्थानों पर भी लागू हो गई । कुंज के महन्त राजारामजी को भी कर देने की सूचना मिली । राजारामजी ने कहा—करोली नरेश को आश्रम में बुलवाकर देंगे । राजा कुंज में आये तब कुंज में आने पर करोली नरेश का जो स्वागत होता था वैसा ही स्वागत किया गया । फिर कर की बात चली । तब राजारामजी ने कहा—ठीक है । 
.
फिर एक थाल सुन्दर कपड़े से ढककर राजा के पास रखा गया । राजा ने उसे उघाड़ कर देखा तो कपड़े के नीचे राजारामजी का ही शिर कटा हुआ दीख पड़ा । यह देख राजा डर गया । फिर राजा के आगे से थाल हटा दिया और राजा ने राजारामजी से पूछा—यह क्या लीला है ? राजारामजी ने कहा—हमने तो शिर तक भगवान् को दे दिया है । फिर आप हम से कर क्या लेंगे । हमारे पास तो अपना कहने योग्य अब कुछ भी नहीं है । 
.
फिर राजारामजी का कटा हुआ शिर देखकर तथा राजारामजी की निष्ठा देखकर करोली नरेश ने संतों से कर लेने की आज्ञा अपनी पीछे लौटा ली । इससे सूचित होता है कि राजारामजी भी अपने गुरु कुंजदासजी के समान महान् संत थे । राजारामजी भी करोली में ही वि. स. १८४१ श्रावण सुदि ९मी को ब्रह्मलीन हुये थे । चरण चौकी पर अंकित दोहा —
''श्रावण इकतालीस में, सुदि नवमी अनुराग ।
महन्त राजारामजी, कियो कलेवर त्याग ॥'' 
इनके चरण पधराने का समय वि.स. १८४५ वैशाख सुदि १० मी चरण चौकी पर अंकित है । किसी कारण से चरण पधराने में देर हो गई होगी । इनकी समाधि कुंजदासजी की समाधि के बराबर है । इनकी समाधि की भी छत्री बनी हुई है । 
.
५- नन्दरामजी, ६- हरिनारायणजी, ७- पुरुषोत्तमजी, ८- जयरामदासजी, इन चार के चरण स्थल के सामने कूप पर एक ही चौकी में हैं । माधोदासजी ने वि. स. १९१९ माह सुदि १२ को पधराये हैं । करौली का जो विवरण ज्ञात हुआ वह सब लिख दिया है । अन्य स्थान पर लिखित—करौली के कुंज की महन्त परंपरा इस प्रकार है । १- राघवदासजी, २- कुंजदासजी, ३- मुरलीदासजी, ४- राजारामजी । नं. २, ३, ४ के चरण चिन्ह करौली में हैं । ५- जयरामदासजी, ६- पुरुषोत्तमदासजी, ७- नन्दरामजी, ८- हरिनारायणजी, ९- माधवदासजी, इन पांच के चरण चिन्ह अस्थल के कूप के पास में हैं । १०- गोपालदासजी, ११- ज्ञानदासजी । इति श्री चतुर्थ अध्याय समाप्तः
(क्रमशः)

*४९. भ्रम विधवंस कौ अंग ७७/८०*

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
*श्रद्धेय श्री Tapasvi @Ram Gopal Das की प्रेरणा से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Meta AI*
.
*४९. भ्रम विधवंस कौ अंग ७७/८०*
.
*तेजपुंज की सुरति मैं, तेजपुंज प्रकास ।* 
*(तहां)तन मन बिलै समान सौ, सु कहि जगजीवनदास ॥७७॥*
जब साधक की सुरति, उसकी चेतना तेजपुंज परमात्मा में लग जाती है, तब वहाँ तेजपुंज का ही प्रकाश हो जाता है । संत जगजीवन दास जी कहते हैं, उस अवस्था में तन और मन दोनों उसी में विलीन हो जाते हैं, समा जाते हैं, जैसे नमक पानी में समा जाता है ।
.
कहि जगजीवन नांम मैं, सब काहू का सीर ।
जो है प्यासा सो पिवै. हरि जल अम्रित नीर ॥७८॥
संत जगजीवन साहेब कहते हैं, राम नाम में ही सब का सीर है, सब की शीतलता है, सबकी तृप्ति है । हरि नाम अमृत जल के समान है, जो प्यासा है, जिसे सच्ची प्यास लगी है, वह इसे पी लेता है और अमर हो जाता है ।
.
*पांचौं तत्त४ पवित्र करि, प्रेम भगति मन राषि ।* 
*कहि जगजीवन आतमां, सुणैं अगम की साषि ॥७९॥*
(४. पांचौं तत्त=पृथ्वी आदि पाँच महाभूत)
पाँचो तत्वों को पवित्र करके, मन में प्रेम-भक्ति को धारण करके रखो । संत जगजीवन दास जी कहते हैं, तब यह आत्मा अगम की साखी सुनने योग्य होती है, अर्थात उस परम अगम्य लोक की वाणी सुन पाती है । तन शुद्ध, मन में प्रेम, तभी अनहद नाद सुनाई देता है ।
.
*कहि जगजीवन रांमजी, रीता५ भरौ भंडार ।*
*प्रेम भगति दीदार हरि, सुमिरन बिरह बिचार ॥८०॥*
{५. रीता=रिक्त(खाली)}
संत जगजीवन साहेब कहते हैं, हे राम जी, मेरा भंडार खाली है, आप इसे भर दीजिए । वह भंडार किस चीज से भरेगा ? प्रेम-भक्ति से, हरि के दीदार से, सुमिरन से और बिरह के विचार से । यही सच्चा धन है जिससे जीव का भंडार भरता है ।
(क्रमशः) 

रविवार, 1 नवंबर 2026

*४९. भ्रम विधवंस कौ अंग ७३/७६*

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
*श्रद्धेय श्री Tapasvi @Ram Gopal Das की प्रेरणा से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Meta AI*
.
*४९. भ्रम विधवंस कौ अंग ७३/७६*
.
*तेज पुंज निरबासनां८, नाद सक्ति गुन बास ।*
*जस भासै तस प्रकासै, सु कहि जगजीवनदास ॥७३॥*
{८.निरबासनां=निष्काम(कामनारहित)}
परमात्मा तेज का पुंज है और वह निष्काम है, उसमें कोई वासना नहीं । नाद उसकी शक्ति है और सब गुण उसी में वास करते हैं । संत जगजीवन दास जी कहते हैं, जैसा जिसके हृदय में भास होता है, भाव होता है, वैसा ही उसे वह प्रकाशित होता है । निर्मल हृदय को वह तेज पुंज रूप में दिखता है ।
.
*मन मारुत माथि रांम कहि, मारि मारि मर जांणि ।*
*कहि जगजीवन मिलि रहै, पूरण ब्रह्म पिछांणि ॥७४॥* 
मन पवन के समान चंचल है, उसे मथ कर, मार-मार कर मार डालो, अर्थात वश में कर लो, तब जाकर मरना सार्थक होगा । संत जगजीवन साहेब कहते हैं, इस प्रकार मन को मार कर जो पूर्ण ब्रह्म को पहचान लेता है, वह उसी में मिल कर रह जाता है, फिर उसका जन्म-मरण छूट जाता है ।
.
*अरथ१ निरंतर भगति हरि, अनरथ२ बिषै बिलास ।*
*जे जन भाव सुझाव सोइ, सु कहि जगजीवनदास ॥७५॥*
{१. अरथ=(हितकर)}  (२. अनरथ=अहितकर)
हितकर तो केवल एक ही है, निरंतर हरि की भक्ति, और अहितकर है विषयों में विलास करना । संत जगजीवन दास जी कहते हैं, जो जन इस भाव को समझ लेता है, सुझाव को हृदय में धर लेता है, वही सच्चा भक्त है ।
.
*आदि निरंजन अंत हरि, मद्धि रांम सब ठांम ।*
*कहि जगजीवन निरखि निज३, सहज सरै सब काम ॥७६॥*
(३. निरखि निज=स्व स्वरूप को पहचानने से)
आदि में वही निरंजन है, अंत में वही हरि है, और मध्य में भी सब ठौर वही राम ही रमा है । संत जगजीवन दास जी कहते हैं, अपने निज स्वरूप को निरख लेने से, पहचान लेने से, सहज ही सब काम संवर जाते हैं, सिद्ध हो जाते हैं । आत्मज्ञान से ही परमात्मज्ञान होता है ।
(क्रमशः) 

*राघवदासजी की शिष्य परम्परा*

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷*卐 श्री दादूदयालवे नम: 卐*🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
.
*सूखा सहजैं कीजिये, नीला भांजे नांहि ।*
*काहे को दुख दीजिये, साहिब है सब मांहि ॥*
================
*राघवदासजी की शिष्य परम्परा*
राघवदासजी की शिष्य परंपरा करौली में चली गई । राघवदासजी का स्थान उदेही से उठकर करौली चला गया । संभव है राघवदासजी के शिष्य सुखदेवदासजी ही करौली जा बसे होंगे । करौली के स्थान की स्थापना तो राघवदासजी के समय में हो गई थी किन्तु राघवदासजी उदेही भी आते थे और रहते थे । फिर भी उनकी परंपरा करोली की परंपरा ही मानी जाती है तो इस प्रकार है-१ राघवदासजी, २ सुखदेवदासजी, ३ कुंजदासजी, ४ राजारामजी, ५ नन्दरामजी, ६ हरिनारायणजी, ७ पुरुषोत्तमजी, ८ रामदासजी, ९ माधोदासजी, १० गोपालदासजी, ११ ज्ञानदासजी । २- सुखदेवदासजी भजनानन्दी महातमा थे तथा परम विरक्त थे ।
.
*कुंजदासजी*
३- कुंजदासजी दादूवाणी में कथित निर्गुण ब्रह्म की उपासना करके महान् सिद्ध संत हो गये थे । उनके तप तेज से प्रभावित होकर तत्कालीन करोली नरेश ने एक ग्राम भी उनकी भेंट किया था जो राजस्थान के एकीकरण होने से पहले तक ‘कुंज’ के महन्तजी के अधिकार में था । कुंजदासजी ने करोली में अच्छा स्थान बनवाया था जो कुंजदासजी की कुंज नाम से करोली में प्रसिद्ध है । कुंजदासजी महान् सिद्ध संत तथा अति दयालु थे ।
.
उनकी दया के विषय में एक जन श्रुति चलती है कि-एक दिन एक भक्त ने कुंजदासजी को एक इमली का हरा दांतुन लाकर दिया था । तब कुंजदासजी ने कहा- भाई ! हरा वृक्ष क्यों तोड़ लाये हो मेरा राम के दांत तो सूखी से ही साफ हो जाते हैं और हमारे परमाचार्य दादूजी महाराज ने सूखे दांतुन से दांत मुख साफ करने को कहा भी है—
‘सूखा सहजैं कीजिये, नीला भांजे नांहि ।
काहे को दुख दीजिये, साहिब है सब मांहि ॥’
.
फिर कुंजदासजी महाराज ने सोचा-भक्त तोड़ तो लाया है, अब इसको सफल भी बनाना ही चाहिये । अतः कुंजदासजी ने उस दांतुन से अपने दांत साफ किये । फिर उस दांतुन को चीर कर जीभ साफ की और उन चीरे हुये दोनों टुकड़ों को वहां ही अलग भूमि में रोप दिया और प्रति दिन उनको पानी पिलाते रहे । वे हरे होकर शनैः शनैः दो वृक्ष बन गये । उन वृक्षों में सब लोग एक प्रत्यक्ष चमत्कार देखते थे कि-उनके फलों में आधा आधा बीज आता था । यह देखकर सब अति आश्चर्य करते थे और कहते थे यह कुंजदासजी महाराज की करामात है । वे दोनों वृक्ष कुंजदासजी महाराज की स्मृति चिरकाल तक कराते रहे किन्तु कुछ वर्षों पहले कुंज के महन्त ने किराये के लोभ में पड़कर उन वृक्षों के स्थान में दुकानें बनवाने के लिये उनको कटवा दिया और दुकानें बनवा दीं ।
.
उक्त घटना से कुंजदासजी महाराज की योग शक्ति और दयालुता का परिचय मिलता है ।
भक्त जनों में दया की, अतिशयता दिखलाय ।
दांतुन करके फेरि भी दीन्हे वृक्ष लगाय ॥
कुंजदासजी महाराज के जीवन की विशेष घटनायें उनके स्थान में कोई जानकार व्यक्ति नहीं मिलने से नहीं मिल सकीं किन्तु यह तो प्रसिद्ध ही है कि वे महान् सिद्ध संत हुये हैं । तब ही उस देश के राजा तथा प्रजागण उनसे प्रभावित हुये थे । कुंजदासजी महाराज करोली में ही ब्रह्मलीन हुये हैं । उनकी समाधि कुंज में ही एक छत्री में है । समाधि की चरण चौकी में वि. सं. १७५२ अंकित है । पूजा प्रति-दिन होती है । कोई ब्राह्मण वेतन द्वारा करता है । कुंज की आय से वेतन मिलता है । पानी डालकर घिसने आदि से मास तिथि के अक्षर बिगड़ गये हैं । समाधि की छत्री लाल पत्थर की अच्छी बनी हुई है ।
(क्रमशः)

शनिवार, 31 अक्टूबर 2026

हरिश्चन्द्र सत

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷*卐 श्री दादूदयालवे नम:  卐*🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
.
*दादू शब्द बाण गुरु साध के, दूर दिसन्तरि जाइ ।*
*जिहि लागे सो ऊबरे, सूते लिये जगाइ ॥*
================
*हरिश्चन्द्र सत से मनहर-*
तक्षक भये हैं ततकाल विश्वामित्र मुनि,
राघो चढ़ि रूख रोहितास वन डस्यो है ।
जाके जी में कसर कटाक्ष नाहीं कामना की,
का जाने कर्तार गति काहे को धौं कस्यो है ।
बालक विलाप करें तोवा त्रयलोक नाथ,
धर्म की जहाज बूड़ी ऐसो ज्ञानी ग्रस्यो है ।
बोल्यो रोहितास जनि रोवो पुनि मेरी सोंह,
पाहुणे से देख पेख का को घर वस्यो है ॥४३॥
हरिश्चन्द्र सत में कवित्तों की संख्या ७० के लगभग होनी चाहिये ।
.
*ध्रुव चरित्र से इन्दव-*
ध्रुव की जननी ध्रुव को समभावत, रोवै कहा रट राम धणी को ।
केतेक राज कहां नृप आसन, का पर तूं कर मेल वनी को ॥
यह साल मिटै ततकाल करो तप, मृत्तक हो सुत धाम धनी को
राघो कहै कुल की ममता तज, ज्ञान के खड्ग से मार मनी को ॥६॥ 
.
*ग्रन्थ करुणा विनती से*
हा ! हा ! धनी दुःख देत गनी, तुम ही तुम एक अधार हो मेरे ।
जानत हो परवेदन की, परमेश्वर जा प्रभु न्याय है तेरे ॥
जोर करे तिन को समभावहु, साहब जी चढ़ सांक के केरे ।
राघो अनाथ अतीत की हे हरि, भीर परे भगवन्त निवेरे ॥४॥
.
*ग्रन्थ चेतावनी से*
समये सुमरचो नहिं राम धणी, सु धणी जम की तन त्रास सहैगो ।
आठ रु बीस में शीश ज्यूं सूम को, दे दशहुं दिशि आग दहैगो ॥
योजन द्वादश घाट घरे को, सो ता मधि मूरख भूरि मरैगो ।
राघो कहै निगुरे निगुसांई को, आवत ही जम कंठ गहैगो ॥१॥
.
*कवित्त ग्रंथ, संगति अंग से मनहर-*
दास की पूरण आश संगति करै निवास,
पाप ताप होत नाश गहै गुण सार जी ।
पाय है परम सुख राम नाम जाके मुख,
बिसरै न एक चुख प्राण आधार जी ॥
सोई जन जाके तन नाम से रहै लगन,
घर वन राखै मन सोई स्वामी कार जी ।
राघो गुरु-मंत्र प्रति राखै रैन दिन रति,
सुमिर सुमिर सिद्ध साध भये पार जी ॥३॥
.
गुरु शिष्य सम्बाद ग्रंथ, से गुरु वचन चौपाई -
अब कुछ बात कहूं मैं नीकी, सो तूं सुन शिष जीवन जी को ।
नाम लेत नरक नहीं जाई, और युगन से यह अधिकाई ॥२७॥
.
*उत्पत्ति स्थिति चिंतामणि ग्रंथ से दोहा-*
श्री हरि श्री गुरु से कही, सो श्री गुरु कहि मुभ ।
रघवा रंचक गम भई, श्री गुरु पै पायो गुभ ॥२६४॥
भक्तमाल के उदाहरण इस ग्रंथ में पहले भी आये हैं और आगे भी आते ही रहेंगे । उक्त उदाहरणों से ज्ञात होता है कि राघवदासजी महाराज अच्छे संत कवि थे । अब इनकी शिष्य परंपरा का परिचय दिया जाता है ।
(क्रमशः)

*४९. भ्रम विधवंस कौ अंग ६९/७२*

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
*श्रद्धेय श्री Tapasvi @Ram Gopal Das की प्रेरणा से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Meta AI*
.
*४९. भ्रम विधवंस कौ अंग ६९/७२*
.
*वेद बचन प्रतिपाल करि, अक्षर अक्षर गमि ग्यांन ।*
*कहि जगजीवन निर अक्षर हरि, तिस घर धर्या न ध्यांन ॥६९॥*
संत जगजीवनदास जी कहते हैं, वेद के एक-एक वचन का पालन करके, एक-एक अक्षर से ज्ञान की गति को समझ कर भी, अगर जीव ने निर-अक्षर(अविनाशी) हरि में ध्यान नहीं लगाया, तो सब व्यर्थ है । निर-अक्षर का अर्थ है जो अक्षरों से परे है, अविनाशी है । अक्षर ज्ञान तो साधन है, साध्य तो निर-अक्षर राम है ।
.
*सब क्रित करै सरीर का, हरि क्रित करै न कोइ ।*
*कहि जगजीवन रांम क्रित, रांम क्रिपा लहै४ सोइ ॥७०॥*
(४. रामक्रिपाल=जा पै क्रिपा राम की होई)
सब लोग शरीर की कृति करते हैं, शरीर के सुख-साधन जुटाते हैं, पर हरि की कृति, हरि का भजन कोई नहीं करता । संत जगजीवन साहेब कहते हैं, राम की कृति वही कर पाता है, जिस पर राम की कृपा होती है । बिना कृपा के हरि-भजन में मन नहीं लगता ।
.
*खरी कसौटी५ कीजिये, भुवन मंझि६ निज सांइ ।*
*कहि जगजीवन चित्र सब, निरखै प्रतिबिंब मांहि ॥७१॥*
(५. कसौटी=परख)   (६. मंझि=मध्य)
इस भुवन के मध्य में अपने साईं की खरी कसौटी करो, सच्ची परख करो । संत जगजीवन दास जी कहते हैं, जैसे चित्र में सब कुछ दिखता है पर वह केवल प्रतिबिंब है, वैसे ही यह सारा संसार उसी परमात्मा का प्रतिबिंब है । चित्र को देखकर चित्रकार को पहचानो, प्रतिबिंब को देखकर बिंब को पहचानो ।
.
*जगजीवन साधै पवन, सोधै सबद सरीर ।*
*रांम भगति ले बाहिरा७, सतगुरु करै न सीर ॥७२॥*
{७. बाहिरा=बाह्य(सांसारिक) भोगों से}
कोई पवन को साधता है, प्राणायाम करता है, कोई शब्द से शरीर को शोधता है, परन्तु राम भक्ति के बिना वह बाहरी ही रह जाता है, भीतर प्रवेश नहीं कर पाता । संत जगजीवन साहेब कहते हैं, जब तक सतगुरु स्वयं उसे शीतल नहीं करता, सीर नहीं करता, तब तक वह बाहरी साधनों में ही भटकता रहता है ।
(क्रमशः)

शुक्रवार, 30 अक्टूबर 2026

*३१. साधु संगति परम लाभ का अंग ~१३/१६*

*🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏*
*🌷卐 सत्यराम सा 卐🌷*
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
.
*३१. साधु संगति परम लाभ का अंग ~१३/१६*
.
*तन मन सिमटे सहज ही, जो सत्संगति होय ।*
*जन रज्जब दृष्टांत को, बेली लजालू जोय ॥१३॥*
देखो ! दृष्टान्त के लिये लाजवन्ती की बेलि, जैसे लाजवन्ती मनुष्य के हाथ पड़ने से संकुचित हो जाती है, वैसे ही सत्संग से प्राणी के तन तथा मन विषय-विस्तार को त्याग कर प्रभु में स्थिर हो जाते हैं, तन ब्रह्म स्वरूप सन्तों की सेवा में और मन निरंतर ब्रह्म चिन्तन में ही स्थिर रहता है ।
.
*साधु चन्दन बैन वास तैं, कुल काष्ट गये रोग ।*
*रज्जब देखहु देखते, भये देव गति जोग ॥१४॥*
देखो ! चन्दन की सुगन्ध से काष्ट का कुल परम्परागत दुर्गंध रूप से नष्ट होकर वह देखते देखते ही देवताओं के पास जाकर उनकी पूजा के योग्य हो जाता है, वैसे ही सन्तों के वचनों की श्रवण करने से प्राणी का कुल परम्परागत हीन जाति रूप रोग देखते देखते ही नष्ट होकर वह ब्रह्म प्राप्ति के योग्य हो जाता है ।
.
*रज्जब पलटे जीव सुध१, साधु संगति आय ।*
*पारस लोहा पहुप२ तिल, स्त्रक३ चन्दन वन राय४ ॥१५॥*
जैसे पारस से लोहा सुवर्ण रूप में, पुष्पों२ से तिल तैल सुगन्ध रूप में, निर्गंध पुष्प - माला३ चन्दन से इत्र सुगन्ध रूप में और चन्दन वृक्ष से वन पंक्ति४ के वृक्ष चन्दन रूप में बदल जाते हैं, वैसे ही सरल१ स्वभाव वाले साधारण जीव भी साधु संगति में आकर संत रूप में बदल जाते हैं ।
.
*स्वर्ग नसीनी१ जगत जहाज, दीर्ध दुर्भिक्ष२ में ज्यों नाज ।*
*दुख की दारू३ जीवन जड़ी४, रज्जब साधु समागम घड़ी ॥१६॥*
संतों के समागम की घड़ी, स्वर्ग में चढ़ने के लिये सीढी१, संसार सागर से तिरने के लिये जहाज, महान दुष्काल२ के कष्ट से बचने के लिये अन्न, रोग से बचने के लिये औषधि३, जीवन को सुरक्षित रखने के लिये रसायन बूंटी४ रूप है ।
(क्रमशः)

*३१. साधु संगति परम लाभ का अंग ~९/१२*

*🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏*
*🌷卐 सत्यराम सा 卐🌷*
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
.
*३१. साधु संगति परम लाभ का अंग ~९/१२*
.
*रज्जब निमधे१ राम जी, साधु जन सु जहाज ।*
*काढ़हिं शक्ति२ समुद्र से, प्रभु प्रकटे पर काज ॥९॥*
राम जी संसार-समुद्र के मध्यनहीं१ मिलते, अर्थात संसार-भावना से पार होने पर ही राम का साक्षात्कार होता है और उससे पार करने के लिये श्रेष्ठ संत जन ही जहाज हैं, जैसे जहाज समुद्र से निकलता है, वैसे ही संत माया२ से निकालते हैं, प्रभु ने संत परोपकारार्थ ही प्रकट किये हैं ।
.
*ज्यों नाले मिल नापिगा१, सिन्धु समाप्त सु नीर ।*
*त्यों रज्जब रामहिं मिलै, सत संगति बहु वीर२ ॥१०॥*
जैसे नालों का जल नदियों१ में मिलकर समुद्र में जा मिलता है फिर नदी नालों का नाम समाप्त हो जाता है, वह समुद्र जल कहलाता है वैसे ही हे भाई२ ! संसारी प्राणी साधु संगति के द्वारा बहुत से राम के वास्तव स्वरूप को प्राप्त होते हैं, फिर वे संसारी नहीं कहलाते, ब्रह्म रूप ही कहे जाते हैं ।
.
*पारस चुंबक लोह मिल, पुनि चन्दन वन राय१ ।*
*जड़ पलटे मृतक चलहिं, त्यों सत्संगति आय ॥११॥*
पारस के सङ्ग से जड़ लोहा सुवर्ण रूप में बदलता है, चन्दन के सङ्ग से जड़ वन पंक्ति१ के वृक्ष चन्दन रूप में बदलते हैं और मृतकवत लोहा चुंबक के सङ्ग से चलने लगता है, वैसे ही सत्सङ्गति में आने से जड़ अज्ञानी प्राणी ज्ञानी रूप में बदलता है तथा परमार्थ में न चलने वाला मृतकवत प्राणी साधन द्वारा परमार्थ में चलने लगता है ।
.
*ज्यों शिल१ सूखी नदी में, जड़ी तुम्बिका बेल ।*
*सो रज्जब सहजैं तिरे, त्यों सत्संगति मेल ॥१२॥*
जैसे निरस सूखी शिला१ तुम्बिकाओं की बेलि में जड़ी हो, अर्थात उसके बहुत से तुम्बड़े बाँध दिये जाय तो वह अनायस तिर जाती है, वैसे ही मूर्ख प्राणी भी प्रतिदिन सत्संग करने लग जाय तो वह भी सहज ही संसार-सागर का तैर कर पार हो जायगा ।
(क्रमशः)

*रचना के उदाहरण*

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷*卐 श्री दादूदयालवे नम: 卐*🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
.
*दादू शब्द विचार करि, लागि रहे मन लाइ ।*
*ज्ञान गहै गुरुदेव का, दादू सहज समाइ ॥*
================
*रचना के उदाहरण*
*साखी-*
गगन गिरासी विमल चित, अजर जरावराहार ।
जन राघो वे संत जन, छन्द मुक्ति संसार ॥४॥*साधु महिमा*
जे जन आशा जित भये, ता जन को जग दास ।
राघो जे आशा सु रत्त, ते करें जगत की आस ॥६॥*विरक्तता*
राघो बोलत परखिये, बोल मनुष को मोल ।
इक मुखतें मोती झड़ै, इकमुख सेती टोल ॥१७॥*शब्द अंग*
सत सुकृत दोऊ बड़े, सत से बड़ो न कोय ।
राघो सत तपरूप है, सत से सब कुछ होय ॥१८॥*उपदेश अंग*
.
*अरिल्ल-*
कलियुग कठिन कठोर न कसके पाप से ।
सुत शैतान्यां करें अवश्य मां बाप से ॥
चेला गुरु से गुप्त दुरावै दाम रे ।
परि हां ! राघो छाड़ी रीति मिले क्यों रामरे ॥१॥*कलयुगी अंग*
कोटी ध्वज बाजार बैठते बांणिये ।
दुनियांदार सराफ जगत में जांणिये ॥
हीरा मोती लाल मुहर थैलो भरी ।
परि हां ! राघो ना वें काम काल वरियां तुरी ॥३॥*चितावनी अंग*
हिन्दू के हद वेद रहै मर्याद में ।
खंडै न खोटो खाय वस्तु नहिं वाद में,
तज असार गहि सार राम रस पीजिये ।
परि हां ! राघो युक्ति विचार योग यग कीजिये ॥४॥*न्याय मार्गी अंग*
ज्ञानी गुण की राशि निर्गुण से हो रहे ।
गहै शील संतोष काम क्रोध हि दहै ॥
खिझै न रीझै चाह चित्त को पेखणों ।
परि हां ! राघो हर्ष न शोक तमासौ देखणों ॥११॥*ज्ञानोपदेश अंग*
विमुख जाय जनि देहु अतिथि गृह द्वार से ।
टूक ग्रास घटि खाउ स्वकीय अहार से ॥
सत में से सत बांटि सत्य हरि राखि है ।
परि हां ! जन राघो धर्मराय धर्म की साखि है ॥१२॥*धर्म कसौटी अंग*
.
*पद- सारंग राग-*
ऐसो राम गरीब निवाज है,
भक्त वत्सल शरणाई समरथ, सारगा जनके काज है ॥टेक॥
आदि अन्त मध्य अखंड अहो निशि, अनन्त लोक जाको राज है ।
सुर नर असुर नाग पशु पक्षी, देत सबन जल नाज है ॥१॥
रिधि सिधि भक्ति मुक्ति को दाता, पूरा ब्रह्म जहाज है ।
निर्बल को बल निर्धन को धन, बहुत विरुद की लाज है ॥२॥
कर्ता पुरुष अनातम आतम, सन्तन मध्य समाज है ।
राघो तन मन करि नौछावर, मिलन माहात्म्य आज है ॥३॥
(क्रमशः)

*४९. भ्रम विधवंस कौ अंग ६५/६८*

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
*श्रद्धेय श्री Tapasvi @Ram Gopal Das की प्रेरणा से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Meta AI*
.
*४९. भ्रम विधवंस कौ अंग ६५/६८*
.
*नांम सुमिरि रांमहि मिलै, बिरह अगनि तन दाग१ ।*
*कहि जगजीवन सहज घरि, रहै रांम सूं लाग ॥६५॥*
{१. दाग=जला कर(निवीर्य कर)}
संत जगजीवन साहेब कहते हैं, राम नाम को सुमिरने से ही राम मिलते हैं, पर सुमिरन ऐसा हो कि बिरह की अग्नि में यह शरीर दग्ध हो जाए, अर्थात विषय-वासनाएं जल जाएं । जब तन की वासना जल जाती है, तब जीव सहज घर में, अपने आत्म-स्वरूप में स्थिर होकर राम में लगा रहता है ।
.
*बेद२ बचन प्रतिपाल करि, रांम बिसरि बिष खाइ२ ।*
*कहि जगजीवन जगतगुर, ते क्यौं परसैं आइ ॥६६॥*
(२=२. वेदों के कथनानुसार चलना तो, रांम भजन को त्याग कर विष खा कर श्री को नष्ट करने के समान है)
आपने स्वयं इसका सुंदर अर्थ लिखा है, कि केवल वेद के वचनों का पालन करते रहना और राम भजन को छोड़ देना, यह विष खाकर अपनी आत्मा को नष्ट करने के समान है । संत जगजीवन दास जी कहते हैं, ऐसे लोग जो राम को भूल कर केवल कर्मकांड में लगे हैं, वे जगतगुरु परमात्मा को कैसे छू पाएंगे, अर्थात कैसे प्राप्त कर पाएंगे ।
.
*बेद बचन प्रतिपाल करि, प्रीतिरत मगन सरीर ।* 
*कहि जगजीवन उभै मधि, हरि भजि किया न सीर ॥६७॥*  
कोई वेद के वचनों का पालन करने में लगा है, तो कोई प्रीति में रत होकर शरीर के सुख में मगन है । संत जगजीवन साहेब कहते हैं, दोनों के बीच में ही जीव उलझा रह गया, उसने हरि को भज कर अपने जीवन को शीतल, तृप्त और सार्थक नहीं किया । सीर का अर्थ है शीतलता या सार ।
.
*बेद बचन प्रतिपाल करि, अगम ठौर गम३ नांहि ।* 
*कहि जगजीवन रांम तजि, भूलि रहै भ्रम मांहि ॥६८॥* 
(३. गम=गति)
केवल वेद-वचनों का पालन करने से उस अगम ठौर तक गति नहीं होती, वहाँ पहुँच नहीं होती । जगजीवन दास जी कहते हैं, राम को छोड़ कर जीव भ्रम में ही भूला भटका रहता है । वेद राह बताते हैं, पर मंजिल तो राम भजन से ही मिलती है ।
(क्रमशः)

गुरुवार, 29 अक्टूबर 2026

*राघवदासजी की वाणी*

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷*卐 श्री दादूदयालवे नम:  卐*🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
.
*दुर्बल देही निर्मल वाणी, दादू पंथी ऐसा जाणी ।*
*काहू जीव विरोधे नांही, परमेश्‍वर देखे सब माँही ॥*
================
एक समय दुष्काल के कारण ग्राम की जनता अन्न की कमी से ग्राम छोड़ कर जाने लगी थी । दयालु संत राघवदासजी ने जनता को कहा—जाओ मत सब लोग भंडार से अन्न ले आओ, बनाकर पावो, भगवान् का भजन करो, कहीं मत जावो । भगवान् ने राघवदासजी टेक की रखी । नया अन्न न आने तक उनका भंडार सब ग्राम को अन्न देता रहा था । कहा भी है—
जन सेवा में भक्त जन, करत नहीं संकोच ।
राघवदास ने ग्राम को, अन्न दिया तज सोच ॥२७१॥दृ.त.९
.
एक समय राघवदासजी ने ब्रह्म भोजन दिया था । जीमने वालों की संख्या बढ़ जाने से घृत की कमी आ गई । मालपुओं की तई चल रही थी । पंक्तियां भी बैठी जीम रही थीं । घृत शीघ्र प्राप्त नहीं हो सका । अत: राघवदासजी स्नान के तालाब से जल के पीपे भर लाये और घृत के स्थान में तई में डाल दिये । वह जल घृत बन गया । फिर घृत आने पर जितने पीपे तालाब से लाकर तई में डाले थे तालाब में उतने ही पीपे घृत के डाल दिये । इससे सूचित होता है कि भक्तों के कार्य में जल भी घृत का काम कर देता है । कहा भी है- 
भक्त जनों के कार्य में, जल भी दे घी काम ।
राघवदास के ताल जल, बना सु घृत अभिराम ॥३६४॥दृ.त.९
.
राघवदासजी महाराज के तप तेज व परोपकारादि दिव्य गुणों से प्रभावित होकर तत्कालीन करौली नरेश उनको करौली ले गये थे तथा करौली में ही निवास स्थान बनवाकर उसमें विराजने की प्रार्थना की थी और निर्वाह के लिये भूमि भेंट की थी । कुछ समय आप विराजे भी थे । उदेई भी जाते थे और रहते भी थे । राघवदासजी ब्रह्मलीन उदेई ग्राम में ही हुये थे । उनकी समाधि उदेई में ही है । राघवदासजी की समाधि उदेई ग्राम में श्वेत चबूतरे के नाम से प्रसिद्ध है ।  
.
राघवदासजी अच्छे विद्वान और कवि थे । उनकी रचना से ही ज्ञात होता है कि वे कवि गुणों से विभूषित थे । उन्होंने अपने दादा गुरु प्रहलाददासजी की प्रेरणा से भक्तमाल की रचना की थी । प्रेरणा में कारण था - नाभाजी ने सगुण उपासक वैष्णवों की कथा ही भक्तमाल में दी थी । यह देखकर प्रहलाददासजी ने सोचा भक्त तो सगुण और निर्गुण दोनों प्रकार के ही होते हैं । अतः दोनों ही प्रकार के भक्तों की कथा भक्तमाल में होनी चाहिये । 
.
ऐसा विचार करके अपने पौत्र शिष्य राघवदासजी को आज्ञा दी कि - तुम ऐसी भक्तमाल की रचना करो जिसमें निर्गुण ब्रह्म के भक्तों तथा सगुण ब्रह्म के भक्तों की कथायें हों । वे भक्त चाहे किसी भी संप्रदाय के हों व किसी भी जाति के हों, किसी भी देश के हों, किसी भी भेष के हों । सभी प्रकार के पक्ष का त्याग करके भक्तों की कथायें उसमें दो । राघवदासजी ने अपने दादा-गुरुजी की आज्ञा मानकर सभी की कथायें अपनी भक्तमाल में दी हैं । उनके समय तक जो भक्त हुये हैं और जिनको वे जान सके उनको अपनी भक्तमाल में स्थान दिया है । 
.
यही बात निम्न कवित्त में है-
"अग्र गुरु नाभाजी को आज्ञा दीन्ही कृपा कर,
प्रथम ही साखी छप्पै कीन्ही भक्तमाल है ।
तैसे प्रहलादजी विचार कहा राघोजी से,
करो संत-श्रावली सु बात ये रसाल है ॥
लिई मान करी जान धरे ध्यान भक्त सब,
निर्गुण सगुण षट् दरशन विशाल है ।
साखी छप्पै मनहर इन्दव अरिल्ल चौपै,
निसानी सवैया छंद जानयौ हंसाल है ॥"
.
उक्त कवित्त इन राघवदासजी की भक्तमाल के पद्य टीकाकार चतुरदासजी की रचना का ६३१ वां मनहर कवित्त है । उक्त विवरण के अनुसार राघवदासजी ने ऐसी ही भक्तमाल रची । नाभाजी की भक्तमाल में समास व्यास से लगभग चार सौ भक्तों की कथायें हैं किन्तु राघवदासजी की भक्तमाल में समास व्यास से लगभग १२ सौ भक्तों की कथायें हैं । अतः राघवदासजी की भक्तमाल नाभाजी की भक्तमाल से तिगुनी बड़ी है । यह समास से मंगलदासजी जाखल की ढांणी वालों ने सुन्दरोदय के छप्पै में "जनयश" से सूचित किया है । छप्पै का अगला पद 'बारसी सहस रवि" से सूचित किया है कि - इन राघवदासजी की वाणी १२ हजार है । इसलिये अब उनकी रचना का परिचय भी यहां दिया जाता है । 
.
*राघवदासजी की वाणी*
राघवदासजी की वाणी के *साखी भाग* में अंग ५८ हैं और साखी तथा अन्य चौपाई आदि *छोटे पद्य* १७२३ हैं । *अरिल्ल ग्रंथ* में १७ अंग हैं और ३७० अरिल्ल हैं, अरिल्ल ग्रंथ में ३६ चौपाई भी हैं । *पद भाग* की ३० रागों में १७९ गेय पद हैं । उत्पत्ति स्थिति चितावनी ग्रंथ में चार सौ के लगभग पद्य हैं । *लघु ग्रंथ* १- सवैया ग्रंथ- इसमें ६ अंगों में ७१ सवैयै हैं । *कवित्त ग्रंथ*- इसमें १३ अंगों में १२५ के लगभग कवित्त हैं । ३- गुरु शिष्य संवाद ग्रंथ, इसमें ९१ चौपाई आदि पद्य हैं । ४- गुरुदत्त रामरज ग्रंथ, इसमें ४३ दोहा चौपाई और कवित्त हैं । ५- हरिश्चन्द्रसत ६- ध्रुव चरित्र । ७- कहरा विनती ग्रंथ, ८- चितावणी ग्रंथ । ९- वाणी । १०- अरिल्ल ग्रंथ । ११- उत्पत्ति स्थिति चितावनी । १२- सत्तवार, इसमें २६ पद हैं । १३- पन्द्रह तिथि, इसमें ६९ पद्य हैं । १४- भक्तियोग इसमें ६१ पद्य हैं । 
.
१४ ग्रंथ इनके प्राप्त होते हैं और एक भक्तमाल । और भी कोई हो तो ज्ञात नहीं है । किन्तु १५ ग्रंथ तो इनके देखने में आते हैं । इन सबकी पद्य संख्या ग्रंथ संख्या पद्धति से अर्थात ३२ अक्षर का पद्य मानकर संख्या करने से १२ हजार होती है । अतः मंगलदासजी जाखल की ढांणी वालों ने यही संख्या अपने 'सुन्दरोदय के छप्पै में दी है । वह छप्पैया राघवदासजी के विवरण के आरंभ में पहले दिया जा चुका है । उसका अंश यहां भी पाठकों की सुविधा के लिये दिया जाता है - "जन यश वाणी सहस रवि" इसका अर्थ होता है - जन यश भक्तों का यश भक्तमाल को मिलाकर राघवदासजी की वाणी १२ हजार है ।
(क्रमशः)