🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏
🌷*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*६. गुरु मुख कसौटी का अंग ~ १३/१६*
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*शिष शंकट मैं नीपजे, गुरुहुं सु बंधे गंठ ।*
*मन मणि गण छेदे बिना, रज्जब बँधे न कंठ ॥१३॥*
मणि समूह छेद करे बिना कंठ में नहीं बाँधा जाता, वैसे ही साधन संकट सहन करे बिना गुरुओं की ज्ञान-गांठ में मन भली प्रकार में नहीं बंधता । अत: शिष्य साधन-संकट में ही श्रेष्ठ बनता है ।
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*कठिन कसौटी१ नीपज्या, तिसहिं कसौटी नाँहिं ।*
*वासण२ डरे न बासदे३, पाका पावक माँहिं ॥१४॥*
जो साधन-संकट१ से श्रेष्ठ बना है, उसे यम-यातनादि का कष्ट नहीं होता । जो बर्तन२ अग्नि में पका है वह अग्नि३ से नहीं डरता है ।
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*मन हस्ती मैमंत१ शिर, गुरु महावत होय ।*
*रज्जब रज डारे नहीं, करै अनीति न कोय ॥१५॥*
मदमत्त१ हाथी के शिर पर महावत होता है तब वह अपने ऊपर रेत नहीं डालता, वैसे ही शिष्य-मन के वृत्ति-शिर पर गुरु ज्ञान होता है तब मन अनीति नहीं करता ।
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*मन मारूतभख१ सूधा किया, सोधी३ दोनों जाड़२ ।*
*काम क्रोध अरु लोभ मोह की, च्यारों डाढ़ उपाड़ ॥१६॥*
सर्प१ की ऊपर नीचे की दोनों दाढों३ को शुद्ध२ करदी अर्थात विष निकाल दिया तो मानो सर्प को सीधा कर दिया, अर्थात फिर उससे कोई हानि नहीं होती, वैसे ही मनकी काम, क्रोध, लोभ और मोह रूप चारों दाढें उपाड़ दी तो मानों मन को सीधा कर दिया । अब उससे भी कोई हानि नहीं हो सकेगी ।
(क्रमशः)



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