रविवार, 12 अप्रैल 2026

आचार्यों की महानता

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*॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥*
*॥ दादूराम~सत्यराम ॥*
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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अध्याय १६, आचार्य पर्व -
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आचार्यों की महानता ~ नारायणा दादूधाम के जितने पीठाधीश आचार्य हुये हैं, वे सभी महानुभाव महान् महात्मा हुये हैं । यह उनके उक्त विवरण से ही ज्ञात होता है । वे सभी संत- साधना पद्धति से संपन्न, निज नाम का निरंतर चिन्तन, निगुर्ण भक्ति में निष्ठा, सहन- शक्ति, आसुर गुण विजय, दैवीगुण संपादन, अभेद निश्‍चय, सर्व हितैषिता, मिलनसारिता, संतोष, क्षमाशीलता, शीलव्रत संपन्नता, निष्पक्षता, उपदेशों द्वारा लोकहित के कार्यों में तत्परता, स्वार्थहीनता, परमार्थ में निपुणता दीनों पर दया, परोपकार, समय सद्उपयोगिता, इत्यादिक विशेषतायें नारायणा दादूधाम के पीठाचार्यों में विशेष रुप में ज्ञात होती है । ये सभी ही आचार्य पद पर रहते हुये निरंजनराम की भक्ति में ही तत्पर रहते थे ।
नारायणा दादूधाम के पीठाचार्यों में कई आचार्य तो ऐसे पहुँचे हुये महान् सिद्ध पुरुष हुये हैं जिनकी कितनी ही चमत्कार की कथायें आज भी प्रसिद्ध है । वे केवल बनावटी कथायें ही हों सो बात नहीं है । उनके प्रमाण भी मिलते रहे हैं और अब तक भी प्राप्य हैं । 
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उनके त्याग और तप तेज के कारण ही- जयपुर, जोधपुर, अलवर, कोटा, बूंदी, उदयपुर, सीकर, खेतडी, करोली, नाभा, पटियाला, जीन्द, फरीदकोट आदि राजाओं के वे पधारते थे तब उनको नगर में प्रवेश कराने आदि के नियम बने हुये थे । आचार्य अपने आने की सूचना देते थे तब उसी समय राजकीय सम्मान से उनको नगर में प्रवेश कराया जाता था । 
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अनेक राज्यों की ओर से गांव, जमीन, कुये आदि भी भेंट किये गये थे । राजा लोग स्वयं भी आचार्यों के पास आते जाते थे, उपदेश सुनते थे । स्वयं भारत का बादशाह जहांगीर भी आचार्य गरीबदासजी के पास आया था । उदयपुर महाराणा फतेसिंह जी को नारायणा दादूधाम में मैंने स्वयं आचार्य दयारामजी महाराज के समय अपनी आखों से देखा था । 
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अनेक राजाओं ने आचार्यों के श्रद्धा भक्ति पूर्वक चातुर्मास कराये हैं । राजाओं के समान प्रजागण भी नारायणा दादूधाम के पीठाचार्यों का अति सम्मान करते थे । इससे अपने आप ही सिद्ध होता है कि वे सब महान् हुये हैं ।
(क्रमशः) 

२३. स्वरूप विस्मरण को अंग १/४

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२३. अथ स्वरूप विस्मरण को अंग १/४
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सुन्दर भूलौ आपकौं, खोई अपनी ठौर । 
देह मांहिं मिलि देह सौ, भयौ और कौ और ॥१॥
श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - इस जीवात्मा ने स्व रूप को भूल कर अपनी वास्तविक स्थिति ही विलुप्त कर दी । उसने इस देह में मिथ्या अध्यास कर इसी में आसक्त होकर, अपनी वास्तविक स्थिति से परिवर्तित होकर, यह इस हीनतम स्थिति(दशा) में जा पहुँचा ॥१॥
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जा घट की उनहारि है, तैसौ दीसत आहि । 
सुन्दर भूलौ आपु ही, सो अब कहिये काहि ॥२॥
यह (जीवात्मा) अपने प्रारब्धवश जिस योनि(शरीर) में जाता है वहाँ वह अपनी क्रियाओं(चेष्टाओं) से उस शरीर के अनुरूप जैसा ही दीखने लगता है । तथा अपनी वास्तविक(तटस्थ रहना) स्थिति को भूल जाता है । अब यह इसका उपालम्भ किसको दें; क्योंकि यह उसका अपना ही किया हुआ प्रमाद(गलती) है ! ॥२॥
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हाथी मांहे देखिये, हाथी कौ अभिमांन । 
सुन्दर चींटी मांहिं रिस, चींटी कै अनुमांन ॥३॥
जब यह प्रारब्धवश हाथी की योनि(शरीर) में पहुँचता है तो यह हाथी के समान मदोन्मत्त रहकर वैसी ही सब क्रियाएँ(चेष्टाएँ) करने लगता है और यदि यह कभी चींटी का शरीर धारण करता है तो चींटी के समान ही चेष्टाएँ करता है ॥३॥
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सिंह मांहिं है सिंह सौ, स्याल मांहिं पुनि स्याल । 
जैसी घट उनहार है, सुन्दर तैसौ ख्याल ॥४॥
इस प्रकार, इस के सिंह की योनि में पहुँचने पर इस की सिंहसदृश चेष्टाएँ होने लगती हैं और श्रुगाल(गीदड़) की योनि में पहुँचने पर श्रुगाल जैसी । कहने का तात्पर्य यही है कि यह(जीवात्मा) प्रारब्धवश जिस शरीर में पहुँचता है उस शरीर के आकार के अनुरूप ही उस की शारीरिक चेष्टाएँ भी होने लगती हैं ॥४॥
(क्रमशः)

*साच, उपदेश ॥*

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*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*दादू संशय आरसी, देखत दूजा होइ ।*
*भ्रम गया दुविधा मिटी, तब दूसर नाहिं कोइ ॥*
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*साच, उपदेश ॥*
लोगौ घर का मारै रे, गाँठि कौ राम बिसारै रे ॥टेक॥
घर का मारै राम बिसारै, जुड़ै पराया बाह्या । 
म्हे तौ याँहनैं पूजाँ नाहीं, हरि कै सरणैं आया ॥
याँहनैं सुधी नहीं रे साधौ, है कोई समझावै ।
राम नाम बिहूणी म्हाँनैं, तिल तिल बाइड़ आवै ॥
पैंडै जाताँ ऊजड़ ताकै, समझत नहीं गँवारा ।
हिन्दु तुरक जिन दोउ उपाया, सो एकै सिरजनहारा ॥
राम कह्याँ तैं नामौं तिरियौ, धू प्रहिलाद कबीरा ।
मूरिख मनिख राम नहिं जाणैं, सोचै नहीं सरीरा ॥
उड़तौ हंस बिलम नहिं लागै, तब यौ राम क्यूँ कहसी । 
बषनौं कहैं राम किन सुमरौ, पछितावौ मनि रहसी ॥८९॥
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“श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात् । 
स्वधर्म निधनं श्रेयः परधर्मो भयावह ॥३/३५॥” 
गीता के उक्त श्लोक में जिस स्वधर्म एवं परधर्म की चर्चा है, उसकी उक्त पद में नहीं है । क्योंकि गीता में अर्जुन को क्षत्रियोचित गृहस्थधर्म को अंगीकार करके युद्धधर्म में प्रवृत्त होने को स्वधर्म तथा संन्यासी बनकर बन में रहते हुए भगवद्भजन करने चले जाने को परधर्म बताया है । 
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बषनांजी हिन्दूधर्म को स्वधर्म तथा मुस्लिमधर्म को परधर्म हिन्दुओं के लिये तथा मुस्लिमधर्म को स्वधर्म तथा हिन्दूधर्म को परधर्म मुस्लिमों के लिय बताते हैं । धर्म = उपासना पद्धति की भिन्नता के कारण एक दूसरा एक दूसरे को मारता है । वस्तुतः कोई भी दूसरे को नहीं मारकर अपनों को ही मारता है क्योंकि सभी एक ही परब्रह्म-परमात्मा के उपजाये हुए उसी के अंश हैं । बस, मन में भ्रम पाल लेते हैं कि हमने इतने दूसरे धर्म वालों को मार दिया । 
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श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं “मयैवैते निहताः पूर्वमेव निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन् ॥११/३३॥” सामने दिखने वाले समस्त शूरवीर पहले से ही मेरे द्वारा मारे हुए हैं । हे सव्यसाचिन् ! तू तो मात्र निमित्त बन जा । इसीप्रकार प्रत्येक शरीरधारी को एक न एक दिन मरना ही है । फिर क्यों ‘मैंने मार डाला’ कहकर मारने वाला बनकर हत्याजन्य पाप का भागी बना जाये । फिर निरपराध को मारना तो और भी बड़ा अपराध है । बषनांजी इसी बात को इस प्रकार कहते हैं ।
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लोग भ्रम के कारण अपनों को ही मार डालते हैं, परेशान करते हैं । मारने में इतने अधिक संलग्न हो जाते हैं कि गाँठि = निज-राम जो सभी में रम रहा है को ही विस्मरण कर बैठते हैं ? वस्तुतः कुछ स्वार्थी तत्वों के बहकावे में आकर अज्ञानी लोग उनसे जुड़कर उनके कहे अनुसार चलते हुए (बाह्या = बहाये हुए) अपनों को ही मारते रहते हैं । परिणामस्वरूप सभी में रमने वाले राम का भी विस्मरण कर बैठते हैं ? 
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बषनांजी कहते हैं, मैं तो इनके परामर्शों = उपदेशों को मानता नहीं हूँ क्योंकि मैंने तो परात्पर-परब्रहम-परमात्मा हरि की शरण का आश्रय ले लिया है । मेरे लिये तो सचराचर ही “सीयाराम मय सब जग जानीं । करहुँ प्रणाम जोर जुग पानी ।” एक परमात्मा का स्वरूप है । अतः मैं किससे विरोध करके किसको मारूँ तथा किससे प्रेम करके किसे न मारूँ । 
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हे सज्जन पुरुषों ! इन मूर्खों को इस वास्तविकता का बोध नहीं है । बताओ, ऐसा कोई है, जो इन्हें समझा सके । कदाचित् रामजी का नाम एक क्षण के लिये भी विस्मृत हो जाता है तो क्षण-क्षण, पल-पल मुझे उस परमात्मा के नाम-स्मरण की वायड़ = तलब आती है, नशा करने की सी हुड़क आती है । जबकि दूसरी ओर ये लोग है कि इन्हें एक दूसरे को मारने से ही फुर्सत नहीं है । 
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ये मूर्ख रास्ते पर चलते हुए भी रास्ते को छोड़कर ऊजड़ = टेढ़े-मेढ़े, अराजपथ पर चलने की सोचते हैं, चलते हैं । वास्तव में ये मूर्ख लोग राजपथ = निजधर्म तथा अराजपथ = परधर्म के यथार्थ मर्म को जानते-समझते ही नहीं है । हिन्दू और तुर्क दोनों को ही जिसने बनाया है, वह सृजनहार परमात्मा एक ही है । 
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यदि हम इतिहास को उठाकर देखें तो ज्ञात होता है, रामजी का राम नामक नाम का स्मरण करके हिन्दू नामदेव, ध्रुव और प्रहलाद मोक्षगामी हुए हैं तो मुस्लिम कबीर भी रामनाम स्मरण के बल पर ही मोक्षगामी हुए हैं । किन्तु मूर्ख मनुष्य रामजी के ऐसे अतुलनीय, अप्रमेय प्रभाव को नहीं जानते और इस बात का चिंतन नहीं करते कि सभी शरीरों में एक ही राम रम रहा है । 
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आत्मा शरीर में से किस समय निकलकर चली जायेगी, किसी को पता नहीं होता । अतः अंतसमय में रामजी के नाम का स्मरण किस प्रकार हो सकता है क्योंकि आत्मा को शरीर में से निकलने में जरा सी भी देर नहीं लगती । अतः “तस्मात् सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युष्य च ।” हर पल, हर क्षण परमात्मा का स्मरण करो जिससे कि अंत में भी उसकी स्मृति हो जाए । 
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बषनां कहता है, क्यों नहीं समय रहते ही रामजी के स्मरण करने का अभ्यास डाल लेते जिससे कि अन्तिम समय में पश्चाताप न रहे कि मैं भगवान् का भजन-ध्यान नहीं कर सका । 
“सो परत्र दुख पावही, सिर धुनि धुनि पछताहिं । 
कालहि कर्महि ईश्वरहिं, मिथ्या दोष लगाहिं ॥८९॥”

*९. गुरु संयोग वियोग माहात्म्य का अंग ~ २९/३२*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*९. गुरु संयोग वियोग माहात्म्य का अंग ~ २९/३२*
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*केशर कनक कपूर मुक्त मन, यह पैदायश जोय ।*
*खेत नदी है केलि शुक्ति गुरु, ठाहर उतपति होय ॥२९॥*
केशर खेत में, स्वर्ण सुमेरू से आने वाली नदियों में, कपूर केले में, मोती सीप में उत्पन्न होता है, वैसे ही गुरु के संग से मन में ज्ञान उत्पन्न होता है ।

*पिंड प्राण बिन कुछ नहीं, सूखी काया काठ ।*
*त्यों अनुभव बिन अनुभवी, ज्यों पंडित बिन पाठ ॥३०॥*
प्राणधारी जीव के बिना यह शरीर शुष्क काष्ठ के समान कुछ भी सारयुक्त नहीं, पाठ स्मरण न हो तो पंडित कुछ नहीं, यथार्थ अनुभव न हो तो नाम मात्र का अनुभवी कुछ नहीं, वैसे ही गुरु संयोग बिना शिष्य कुछ नहीं ।

*रज्जब वपु वायक१ चले, परस्यो२ पूरा पीर३ ।*
*पर काया सु प्रवेश गुरु, मृतक शब्द शरीर ॥३१॥*
गुरु के शरीर से वचन१ चलते हैं, वे जिसके हृदय को स्पर्श२ करते हैं, वह पुरा सिद्ध३ हो जाता है । इस प्रकार गुरु मृतक शब्द रूप शरीर से अपने से भिन्न शिष्य के शरीर में प्रवेश करते हैं ।

*गुरु पंडित अक्षर शबद, आदम१ अपढ़ न लेश ।*
*रज्जब पैठे पीर२ संग, ठाहर सु प्रवेश ॥३२॥*
अक्षर ही गुरु है, शब्द ही पंडित है, अत: अक्षर और शब्दों को सभी जानते हैं, मानव१ किचिंत मात्र भी अपठित नहीं है फिर भी माया से परे ब्रह्म रूप स्थान में निर्विध्न प्रवेश करना होता है तब तो सिद्ध२ गुरु के संग से ही प्रवेश होता है अन्यथा नहीं ।
(क्रमशः)

= १७८ =

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*सोई सुहागिनी साच श्रृंगार,*
*तन मन लाइ भजै भर्तार ॥*
*भाव भक्ति प्रेम ल्यौ लावै,*
*नारी सोई सार सुख पावै ॥*
*साभार ~ @Hariya K Video*
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यह पुरी है जहां कण-कण में भगवान जगन्नाथ बसते हैं। उनकी महिमा, उनके चमत्कार, उनकी लीलाएं कोई क्या जाने। लेकिन कभी-कभी उनकी सबसे अनोखी लीलाएं सबसे साधारण इंसानों के जीवन से बुनी जाती हैं। वह रात जब सब कुछ शुरू हुआ।
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कुटिया के भीतर प्रभुदास अपनी छोटी सी दुकान पर पान बना रहे हैं। उनके चेहरे पर संतोष है। पर आंखों में कुछ अधूरापन। आठ बार भोग लगता है। दिन में आठ बार छप्पन भोग क्या-क्या नहीं चढ़ता मेरे प्रभु को। मीठे पकवान, नमकीन पकवान, फल, दूध सब कुछ। मेरा मन हर बार एक ही सवाल पूछता है। इतना सब कुछ पर पान क्यों नहीं ? भोजन के बाद एक पान.. आ हा.. कितना संपूर्ण हो जाता मेरा प्रभु का भोग।
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यह कहानी सिर्फ एक पान वाले की नहीं है। यह उस रहस्य की है जिसमें स्वयं भगवान ने भाग लिया। उस रात जब पुरी सो रही थी, प्रभुदास की यह अनकही प्रार्थना भगवान तक पहुंच गई थी और भगवान की लीला तो अपरंपार है। वो ऐसे रास्ते ढूंढ लेते हैं जिनकी कोई कल्पना भी नहीं कर सकता। प्रभुदास अपनी कुटिया के किवाड़ बंद करके सोने की तैयारी करते हैं। तभी बाहर से हल्की खटखटाहट होती है। इतनी रात को कौन होगा ? वह दरवाजा खोलते हैं।
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सामने दो बेहद खूबसूरत नौजवान खड़े हैं। उनके घुंघराले बाल कंधों तक फैले हैं। कानों में चमकते कुंडल हैं और वस्त्र भी असाधारण रूप से सुंदर हैं। उनकी आंखों में एक दिव्य चमक है। नमस्ते प्रभुदास जी। क्या थोड़ा पान मिल सकता है ? बहुत देर से चल रहे हैं। थकान हो रही है। अरे अरे हां हां जरूर। आप दोनों इतनी रात को पहले कभी देखा नहीं ? जी हम बस ऐसे ही भटकते हुए यहां आ गए।
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प्रभुदास तुरंत उनके लिए दो पान बनाते हैं। उनकी सुंदरता और विनम्रता से वह इतने मोहित हो जाते हैं कि कुछ और पूछना भूल जाते हैं। लीजिए ताजाताजा पान। दोनों युवक पान लेते हैं। एक दूसरे को देखकर मुस्कुराते हैं और पान खाते हैं। आ लाजवाब। ऐसा पान तो हमने कभी नहीं खाया। हां, सच में मन तृप्त हो गया। बहुत-बहुत धन्यवाद प्रभुदास जी। पान का पैसा ? अरे मुझे तो याद ही नहीं रहा। कोई बात नहीं। कल आ जाएंगे तो ले लूंगा।
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और फिर ऐसा ही होने लगा। हर रात वही दो रहस्यमय नौजवान आते पान खाते और बिना कुछ कहे बिना कुछ दिए चले जाते प्रभुदास के लिए तो जैसे वे ईश्वर का ही कोई वरदान थे । बलरामदास के मन में सवाल उठते रहे। अरे यह कौन है यह दोनों बालक इतनी रात को प्रभुदास की कुटिया से निकल रहे हैं मैंने इन्हें कभी मंदिर में देखा नहीं युवक तेजी से गली में मुड़ उड़ जाते हैं और आंखों से ओझल हो जाते हैं। अजीब बात है। रोज रात को देखता हूं बस रात को ही। प्रभुदास की कुटिया से कुछ तो गड़बड़ है।
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अगले कुछ दिन बलराम दास उन पर नजर रखने लगा। बलरामदास के मन में सवाल उठते रहे। एक और रात बलरामदास एक खंभे के पीछे छिपे हैं। युवक प्रभुदास की कुटिया से निकलते हैं। आज तो जरूर पूछूंगा प्रभुदास से। कहीं कोई गलत काम तो नहीं हो रहा ? प्रभुदास जरा एक बात सुनिए। अरे बलराम दास जी आइए आइए बैठिए। सुबह-सुबह कैसे आना हुआ ? क्या पान बनाऊं ? नहीं पान नहीं। मैं कुछ पूछने आया हूं और आपसे सच-सच जानना चाहता हूं। पूछिए पूछिए। मैं भला आपसे क्या छुपाऊंगा ?
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प्रभुदास मैं कुछ दिनों से देख रहा हूं। हर रात दो नौजवान बालक आपकी कुटिया से निकलते हैं। इतनी रात को यह कौन बालक हैं ? और यहां क्या कर रहे थे ? मुझे नहीं पता बलराम दास जी कि वो कौन है। पर हां वे प्रतिदिन मेरे घर आते हैं और मुझसे पान लेकर जाते हैं। और बिना मूल्य दिए चले जाते हैं। है ना ? मैंने देखा है उन्हें निकलते हुए। जब भी मैं उन्हें देखता हूं ना तो उनसे इतना मोहित हो जाता हूं कि मैं पान की कीमत मांगना ही भूल जाता हूं। अब इसमें मेरा क्या दोष है ? बताइए। अगर ऐसा ही चलता रहा तो आपका घर कैसे चलेगा ? बताइए...
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जब भी वे दोनों बालक आपके पास आएंगे तो आप उनसे पान की कीमत मांगना और अगर वह आपको पान की कीमत ना दें तो उनसे कहना कि वे दोनों बंधक के रूप में अपनी-अपनी चादर आपके पास छोड़ जाए। प्रभुदास अपनी दुकान बंद करने वाले हैं। तभी दोनों युवक फिर से आते हैं। नमस्ते प्रभुदास जी। क्या आज भी आपका बेहतरीन पान मिल पाएगा ? प्रभुदास उन्हें देखकर फिर से मोहित हो जाते हैं।
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पर बलरामदास की बात याद आती है। वह थोड़ा संकोच करते हैं। पान देने के बाद आप दोनों इतने दिनों से पान खा रहे हैं। पर मैंने आपसे कभी दाम नहीं लिया। पर आज आपको पान के बदले में दाम देना होगा। अरे आप तो कभी हमसे दाम मांगते ही नहीं है। हमने तो सोचा इसलिए हम आज कोई धन लेकर नहीं आए। हमारे पास अभी देने को कुछ नहीं है। कल आएंगे तो दे देंगे। वादा रहा। नहीं नहीं बहाना बनाने से नहीं चलेगा। बलराम दास जी ने मुझे समझाया है। आज ही देना होगा। बिना दाम दिए मैं तुम दोनों को नहीं जाने दूंगा।
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लेकिन हमारा आज जाना अति आवश्यक है। प्रभुदास जी। हम पर विश्वास रखिए। कल हम बहुत सारा धन लाकर देंगे। तो ठीक है। बिना दाम दिए जा सकते हो। लेकिन अपनी यह चादर मेरे पास रखनी होगी। कल जब दाम लाओगे तो चादर वापस ले जाना या बंधक के तौर पर रहेगी। युवक विवश होकर अपनी-अपनी चादरें उतारते हैं। दोनों युवक बिना चादरों के ही तेजी से वहां से निकल जाते हैं। प्रभुदास ने अपनी नादानी में भगवान की लीला का एक और अध्याय लिख दिया था।
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उस रात पुरी में किसी को अंदाजा नहीं था कि मंदिर में एक अजीब सा तूफान आने वाला है। मुख्य पुजारी भगवान जगन्नाथ और बलभद्र के विग्रहों के पास पहुंचते हैं ताकि उन्हें सुबह की पूजा के लिए तैयार कर सकें। वह भगवान जगन्नाथ को ओढ़ाई गई श्वेत चादर को हटाते हैं। फिर बलभद्र जी की ओर बढ़ते हैं। पर अरे यह क्या ? बलभद्र जी की चादर कहां गई ? जगन्नाथ जी की भी नहीं है। रात को तो मैंने खुद अपने हाथों से उन्हें चादर ओढ़ाई थी। यह कैसे गायब हो गई ? अरे सुनिए। सब यहां आइए जल्दी।
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क्या हुआ महाराज ? दोनों विग्रहों पर से श्वेत चादरें नहीं है। किसने चुराई हैं ? चोरी ? पर यहां ? अगर कोई चोर आया होता तो प्रभु के कीमती आभूषण, रत्नजित मुकुट चुराता। श्वेत चादर कोई क्यों चुराएगा ? अपशगुन भगवान कहीं नाराज तो नहीं हैं ? शांत सब शांत हो जाओ। यह खबर फैलनी नहीं चाहिए। पहले ढूंढो मंदिर के हर कोने में देखो। लेकिन यह खबर आग की तरह फैल गई। पूरी पूरी में हाहाकार मच गया। लोगों के मन में डर था और यह बात राजा प्रताप रुद्रदेव तक भी पहुंची।
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यह क्या हो रहा है ? प्रभु जगन्नाथ की चादरें गायब हो गई हैं। क्या मेरे सेवक सो रहे थे ? महाराज पुजारियों का कहना है कि उन्होंने खुद रात में चादरें ओढ़ाई थी। कोई निशान नहीं है चोरी का। यह मेरे राज्य पर कलंक है। यह सब मेरे मंदिर के सेवकों की लापरवाही है। बुलाओ उन सबको। मैं उन्हें कड़ी से कड़ी सजा दूंगा। महाराज पर कोई परवर नहीं। जिसने भी लापरवाही की है, उसे दंड भुगतना पड़ेगा। राजा का क्रोध स्वाभाविक था। सब डर गए थे।
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पर जब भगवान स्वयं अपनी लीला कर रहे हो तो भला कोई भक्त दंड क्यों पाए ? भगवान अपने भक्तों को कैसे दंड मिलने दे सकते थे ? बलराम दास गहरी नींद में हैं। अचानक उनके स्वप्न में एक अद्भुत प्रकाश फैलता है। भगवान जगन्नाथ और बलभद्र उनके सामने प्रकट होते हैं। उनका दिव्य रूप बलराम दास को विस्मय में डाल देता है। प्रभु मेरे प्रभु जगन्नाथ बलभद्र जी आप आप यहां उठो बलराम दास डरो नहीं। मैं तुम्हें एक रहस्य बताने आया हूं। आज्ञा दीजिए प्रभु।
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जो चादरें मंदिर से गायब हुई है वे किसी ने चुराई नहीं है। क्या ? पर पर कैसे ? तुम्हें याद है वह भोला प्रभुदास पान वाला जिसने तुम्हें बताया था कि दो बालक उससे बिना मूल्य के पान लेते हैं। हां प्रभु याद है। मैंने ही उसे कहा था कि उन बालकों से दाम मांगे या बंधक के रूप में उनकी चादर रखवा ले। वही बालक मैं और बलभद्र थे। हम प्रभुदास की उस छोटी सी इच्छा को जानते थे कि हमें भोजन के बाद पान अर्पित किया जाए। हम खुद को रोक नहीं पाए। हम रोज रात उसके पास पान खाने जाते थे।
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प्रभु यह क्या लीला है आपकी ? मैं कितना मूर्ख था कि मैंने उन्हें चोर समझा। मैंने तो मैंने तो प्रभुदास को कहा कि वह आपसे चादरें रखवा ले। हां। और जब प्रभुदास ने हमसे दाम मांगे तो हम नहीं दे पाए। क्योंकि हम जानते थे कि उसके मन में क्या है और जब उसने चादरें मांगी तो हमने सहर्ष अपनी चादरें उसे दे दी क्योंकि वह उसकी भक्ति का प्रतिफल था। वह चादरें अब प्रभुदास के पास हैं। ये तो अद्भुत है प्रभु। सुबह होते ही राजा प्रताप रुद्रदेव के पास जाओ और उन्हें यह सब बताओ।
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उन्हें कहना कि वे प्रभुदास के पास जाए और उन्हें यह भी बताना कि आज से मेरे भोजन के बाद पान चढ़ाने की परंपरा शुरू की जाए। यह प्रभुदास की भक्ति का सम्मान होगा। स्वप्न टूट जाता है। बलरामदास हड़बड़ा कर उठ बैठते हैं। उनके माथे पर पसीना है और आंखें खुली की खुली हैं। वह चारों ओर देखते हैं। ये ये सपना था ? नहीं। यह तो सच था। मेरे प्रभु ने मुझे दर्शन दिए। मुझे राजा के पास जाना होगा।
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महाराज रुकिए दंड मत दीजिए। मुझे कुछ कहना है बहुत जरूरी। बलराम दास क्या है यह सब ? क्षमा करें महाराज। पर यह दंड रुकना चाहिए। चादरें किसी ने चुराई नहीं है। स्वयं भगवान जगन्नाथ ने मुझे स्वप्न में सब कुछ बताया है। स्वप्न तुम होश में तो हो ? मेरे प्रभु के वस्त्रों की चोरी हुई है। और तुम स्वप्न की बात कर रहे हो ? हां महाराज यह सत्य है। वो चादरें प्रभुदास के पास हैं। वो पान वाला वही दो बालक जो उससे रोज पान लेते थे। वह स्वयं प्रभु जगन्नाथ और बलभद्र थे।
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मैंने ही प्रभुदास को कहा था कि वह उनसे दाम मांगे या चादर बंधक रखवा ले। क्या कह रहे हो तुम ? प्रभु जगन्नाथ और बलभद्र स्वयं एक पान वाले से पान लेने आते थे। हां महाराज भगवान ने अपनी लीला मुझे बताई है। उन्होंने कहा है कि वे प्रभुदास की उस छोटी सी इच्छा को पूरा करना चाहते थे कि उन्हें भोजन के बाद पान अर्पित किया जाए। प्रभुदास की भक्ति इतनी पवित्र थी कि भगवान स्वयं उसके पास चले आए। राजा प्रताप रुद्रदेव अपनी कुर्सी से उठ खड़े होते हैं। उनके चेहरे पर पहले अविश्वास, फिर आश्चर्य और फिर गहरी श्रद्धा के भाव आते हैं।
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महाराज अगर यह सत्य है तो यह प्रभु की महान लीला है। तो फिर हमें तुरंत प्रभु दास के पास चलना चाहिए। यह देखना होगा। यह जानना होगा। यदि यह सत्य है तो प्रभु दास को मैं अपने सिर आंखों पर बैठाऊंगा। महाराजा प्रताप रुद्रदेव, बलराम दास और उनके साथ मंत्री, सेनापति तथा कुछ लोग प्रभुदास की छोटी सी कुटिया के पास पहुंचते हैं। महाराज आप आप यहां मुझसे क्या गलती हो गई ?
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शांत हो जाओ प्रभुदास। हम तुमसे कुछ पूछने आए हैं। क्या तुम्हारे पास कोई ऐसी श्वेत चादरें हैं जो तुम्हें दो नौजवान बालकों ने दी हो ? प्रभुदास पहले घबराते हैं। वो कांपते हाथों से अपनी दुकान के कोने में रखी उन दोनों श्वेत चादरों को निकालते हैं। जी महाराज यह रही वो चादरें। कल रात उन बालकों ने इन्हें बंधक के तौर पर मेरे पास रखा था। राजा प्रताप, रुद्रदेव और बलराम दास चादरों को देखते हैं। वे हूबहू वैसी ही हैं जैसी मंदिर में भगवान को ओढ़ाई जाती थी। यह वही चादरें हैं।
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प्रभुदास क्या तुम जानते हो यह किसकी चादरें अपने पास रखी हैं ? प्रभुदास वो दोनों बालक स्वयं भगवान जगन्नाथ और बलभद्र थे। तुमने स्वयं प्रभु को अपने हाथों से पान खिलाया है। जैसे ही प्रभुदास यह बात सुनते हैं, उनके चेहरे का रंग बदल जाता है। उनकी आंखों में आंसू भर आते हैं। वह अपनी ही नादानी पर अवाक रह जाते हैं। उन्होंने जिनसे दाम मांगे, जिनसे चादर रखवाई, वे स्वयं भगवान थे। प्रभु मेरे प्रभु मैंने आपको पहचाना नहीं। मैंने तो आपसे चादर रखवा ली। यह कैसा पाप किया मैंने ? नहीं प्रभुदास यह पाप नहीं है। यह तो प्रभु की लीला है और तुम्हारी महान भक्ति का प्रमाण। तुमने अपनी शुद्ध भक्ति से प्रभु को साक्षात अपने पास बुला लिया। धन्य हो तुम। धन्य है तुम्हारा जीवन। उस दिन प्रभुदास के जीवन का अर्थ बदल गया।
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एक छोटा सा पान वाला जिसे भगवान ने स्वयं अपने दर्शन दिए। उसकी भक्ति की कहानी सदियों के लिए अमर हो गई। प्रभुदास की अटूट भक्ति के कारण स्वयं भगवान ने इच्छा व्यक्त की है कि भोजन के बाद उन्हें पान अर्पित किया जाए। उस दिन से भगवान जगन्नाथ के मंदिर में भोजन के बाद पान खिलाने की परंपरा शुरू हो गई। प्रभुदास ने अपना सारा जीवन मंदिर की सेवा में लगा दिया। वह एक उदाहरण बन गए कि भक्ति प्रेम पूर्वक की जाए तो ईश्वर तक अवश्य पहुंचती है। प्रभु जगन्नाथ के चमत्कारों का जितना वर्णन करें उतना ही कम है।

*९. गुरु संयोग वियोग माहात्म्य का अंग ~ २५/२८*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*९. गुरु संयोग वियोग माहात्म्य का अंग ~ २५/२८*
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*रज्जब पावे दूरसौं, शब्द वास नर नाग ।*
*पै गुरु चंदन पास गये, शीतल होय सुभाग१ ॥२५॥*
सर्प को चंदन की सुगंध तो दूर से मिल जाती है किन्तु उसके विष की गरमी मिटकर शीतलता तो तभी प्राप्त होती है, जब सर्प चंदन के पास जाकर उसके लिपटता है । वैसे ही गुरु का शब्द तो परम्परा से साधकों के द्वारा मिल जाता है, किन्तु परम शांति प्राप्त होने का सौभाग्य१ तो गुरु के पास जाने पर ही मिलता है ।
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*रज्जब केशर खेत गुरु, बीज वचन बिच जोर ।*
*आन१ अवनि२ उर विपुल३ अति, पै सो कण४ करहि न फोर५ ॥२६॥*
जिसमे केशर उत्पन्न होती है उसी खेत में केशर का बीज डालने से वह जोर करता है, दूसरे१ पृथ्वी२ के खेत अत्याधिक३ है किन्तु उनमें वह बीज४ अँकुरित५ नहीं होता । वैसे ही ज्ञान के वचन गुरु के हृदय में ही सबल रहते हैं, अन्य हृदय तो अत्यधिक है किन्तु उनमें वह अज्ञान नष्ट करने की योग्यता नहीं रखता ।
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*रज्जब सद्गुरु सीप सम, शिष ह्वै स्वाति सुनीर ।*
*मन मुक्ता मधि निपज ही, जुदे न निपजे वीर ॥२७॥*
गुरु रूप सीप में शिष्य रूप स्वाती बिन्दु पड़ता है अर्थात गुरु के उपदेश में शिष्य की चित्तवृत्ति लगती है, तब ज्ञान रूप मोती उत्पन्न होता है । हे भाई ! सीप से स्वाती बिन्दु दूर रहे और गुरु से शिष्य दूर रहे, तो दोनों में ही मोती और ज्ञान उत्पन्न नहीं होता ।
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*सद्गुरु सुन्दरी शुक्ति मधि, शिष सुत मुक्ता खेत ।*
*देखो निपजे ठौर नग, जन रज्जब कह देत ॥२८॥*
पुत्र उत्पन्न होने का गर्भाशय रूप खेत नारी में है, मोती के उत्पन्न होने का खेत सीप का मध्य भाग है और देखो, अन्य नग भी अपने उत्पन्न होने के स्थान में ही उत्पन्न होते हैं । वैसे ही शिष्य के उत्पन्न होने का ज्ञान रूप खेत सद्गुरु में है अर्थात गुरु ज्ञान से ही शिष्य को तत्त्व ज्ञान होता है । ये हमने यथार्थ ही कहा है ।
(क्रमशः)

*९. गुरु संयोग वियोग माहात्म्य का अंग ~ २१/२४*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*९. गुरु संयोग वियोग माहात्म्य का अंग ~ २१/२४*
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ओंकार आतम अवतार, ता सुत शब्द सदा प्रतिहार१ ।
इष्टों लग पोर्यों२ प्रवेश, आगे रज्जब दाता देश ॥२१॥
ओंकार आत्मा का ही अवतार है । शब्द, सृष्टि का आदि कारण ओंकार है, इसलिये उससे उत्पन्न, उसके पुत्र रूप शब्द ही संदेश-वाहक१ हैं, उन शब्दों में से जो इष्ट देव परब्रह्म की ओर लगते हैं अर्थात परब्रह्म का बोध कराते हैं, उन शब्दों द्वारा ही परब्रह्म के अन्तरंग साधन रूप द्वारों२ में प्रवेश किया जाता है, फिर आगे तो विश्व को आजीविका देने वाले परब्रह्म का निर्विकल्प समाधि रूप देश आ ही जाता है और इसमें ब्रह्म का साक्षात्कार भी हो जाता है ।
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विवेक जीव वस्ती जहाँ, ब्रह्म बासदे१ माँहिं ।
शब्द धूम व्योम२ हि गहै, चुणे चकोर सु नाँहिं ॥२२॥
जहाँ विवेकी जीवों की बस्ती है, वहाँ ब्रह्म रूप अग्नि१ है, उसकी ब्रह्मज्ञान युक्त शबद रूप धुआं को भी जिज्ञासु रूप आकाश२ ग्रहण करता है किन्तु इसे भेदवादी रूप चकोर खा नहीं सकता, कारण - जैसे बस्ती के चूल्हों में चकोर नहीं पहुँचता, वैसे ही विवेकियों के हृदय में भेद-वादियो की वृत्ति नहीं पहुँचती ।
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मति सु मुकर जड़ में दरसै, चेतन को मुख दोष ।
सोइ लाज आतम करे, रज्जब ह्वै संतोष ॥२३॥
जैसे जड़ दर्पण में चेतन मनुष्य को अपने मुख के दोष दीखते हैं तब वह लज्जित होकर उनको हटाता है और हट जाने पर उसे प्रसन्नता होती है । वैसे ही बुद्धि में मल, विक्षेप, आवरण दोष दिखाई देते हैं उनसे जो लज्जित होकर उन्हें हटाता है तब उसे ब्रह्म का साक्षात्कार होकर संतोष होता है ।
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गुरु चंदन शिष वनी विधि, पेखो पलटे पास ।
रज्जब दूर न मूर१ ह्वै, शब्द सकल भर वास ॥२४॥
देखो, चन्दन के पास वन होगा, उसके वृक्षों को तो चंदन अपनी सुगंध भर कर बदल देगा । पर दूर होने पर लेश१ मात्र भी परिवर्तन नहीं हो सकता । वैसे ही गुरु के पास रहने वाले शिष्यों को तो गुरु अपने शब्दों द्वारा उनमें ज्ञान भरकर असंत को संत रूप में बदल देगा, किन्तु दूर होगा उसे लेश मात्र भी नहीं बदलेगा ।
(क्रमशः)

*९. गुरु संयोग वियोग माहात्म्य का अंग ~ १७/२०*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*९. गुरु संयोग वियोग माहात्म्य का अंग ~ १७/२०*
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*हनुमंत हाँक हनुमंत मुख, तो व१ हीज अब होय ।*
*पै रज्जब ता शब्द का, वक्ता औरै कोय ॥१७॥*
हनुमान जी के मुख से हनुमान जी का हाँक सुनते ही पुरुष हिजड़े हो जाते थे किन्तु अब हनुमान जी के बिना ही अनेक मानव वही१ आवाज दें, कोई नहीं हिजड़ा होता । वैसे ही ब्रह्मवेता के मुख से महावाक्य रूप शब्द सुनने से ब्रह्मवेता हो जाते थे, अब उसी महावाक्य को अनेक परोक्ष ज्ञानी सुनाते हैं, परन्तु कोई भी ब्रह्मवेता नहीं होता, कारण - महावाक्य का यथार्थ वक्ता तो विद्या मात्र के विद्वानों से भिन्न ब्रह्मनिष्ठ ही होता है । सिंहल द्वीप में हनुमान जी किसी नियत समय पर हाँक मारते हैं उसे सुनने वाले पुरुष हिजड़े हो जाते हैं ।
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*चंबुक चर्चा गहि गुण गाढ़, सुरति सूई रज रिधि सौं काढ़ ।*
*पारस गुरु मिलतहि गति जोय, वहि सोना वहि साधू होय ॥१८॥*
जैसे चम्बुक सूई को रज से निकालकर पकड़ लेता है । वैसे ही ज्ञान चर्चा माया रूप ऋद्धि और मायिक गुणों से वृत्ति को निकालकर दृढ़ता से पकड़ लेती है, माया में नहीं जाने देती । लोहा पारस से मिलता है और शिष्य सद्गुरु से मिलता है तब देखो, मिलते ही उनकी क्या गति होती है । जो गलियो में पड़ा काट से गल गल रहा है वही लोहा सुवर्ण बन जाता है और जो संसार के विषयों में आसक्त था वही प्राणी निरासक्त संत बन जाता है । ये उक्त संयोग से ही बनते हैं ।
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*रज्जब सद्गुरु ज्योति जिव, शब्द सही सुप्रकास ।*
*शिष सोने कर्म काट१ का, कहिं मिल होय सु नास ॥१९॥*
सद्गुरु जीवों के लिये ज्योति के समान हैं, उनके यथार्थ शब्द ही सुन्दर प्रकाश है । लोहे के खंड पारस से कहीं भी मिले उनके मैल का नाश होकर वे सुवर्ण बन जाते हैं; वैसै ही शिष्य गुरु से कहीं भी मिलें, उनके कर्मों का नाश होकर वे ब्रह्मनिष्ठ हो जाते हैं ।
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*गुरु नराधिपति शिष उमराव१, वचन बीच प्रतिहार२ सुभाव ।*
*घट३ बध४ पटा करे नर नाथ, सो निधि५ नहीं शब्द के हाथ ॥२०॥*
गुरु राजा के समान हैं, शिष्य सरदारों१ के समान हैं, वचन समाचार देनेवाले२ के समान हैं, सरदारों के लिये पट्टा करते समय कमी३ वेशी४ करनी हो, तो राजा ही कर सकता है, यह राजा के हाथ का खजाना५ समाचार देने वाले के हाथ नहीं है, वैसे ही शिष्यों की योग्यता की कम वेशी गुरु के ही हाथ है अन्य के नहीं ।
(क्रमशः)

शनिवार, 11 अप्रैल 2026

*९. गुरु संयोग वियोग माहात्म्य का अंग ~ १३/१६*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*९. गुरु संयोग वियोग माहात्म्य का अंग ~ १३/१६*
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*भूत१ बात सुन भूत की, भूत होत क्या बेर ।*
*सोई बात बहु वदन सुन, सोन होत तो फेर ॥१३॥*
भूत बात को सुन कर प्राणी२ को भूत होते देर नहीं लगती, किन्तु वही बात फिर परम्परा से बहुत मनुष्यों के मुख से सुनने पर भी वह भूत होना रूप कार्य तो नहीं होता तब उस बात में परिवर्तन अवश्य माना जायेगा । वैसे ही ब्रह्मवेता के मुख से महावाक्य सुनने पर ब्रह्म प्राप्ति में कुछ भी देर नहीं लगती । वही महावाक्य ब्रह्मवेता से भिन्न अनेक परोक्ष ज्ञानी सुनाते हैं किन्तु उससे कोई भी द्वन्द्वों से मुक्त होकर ब्रह्मनिष्ठ नहीं होता ।

*रज्जब वपु वायक मिलत, फहम१ करहु बहु फेर ।*
*मनसा वाचा कर्मना, हाजिर हडका२ हेर२ ॥१४॥*
एक तो सद्गुरु सन्मुख स्थिर होकर उपदेश करें और एक उनका वचन परम्परा से सुनें । विचार१ करके देखो३, इन दोनों बातों में बहुत अन्तर है । वचन मात्र सुनने से मन वचन कर्म से उनके सम्मुख उपस्थित होने की अति उत्कंठा२ होती है ।

*साधु१ सिंह के शब्द सु शंकित२, दर्श दुखी परस३ नास ।*
*रज्जब कही विचार कर, त्रिविधि भांति की त्रास ॥१५॥*
जैसे सिंह के शब्द सुनने से व्यक्ति चिंतित२ होता है, सिंह को देखने से दुखी होता है और सिंह पकड़ले३ तो नाश ही हो जाता है । वैसे ही श्रेष्ठ१ गुरु शब्द से त्रिताप चिंतित होती है, दर्शन से व्यथित होती है और स्वरूप साक्षात्कार होने पर नष्ट हो जाती है, यह हमने विचार कर के ही कहा है ।

*गुरु अगनी सेवा त्रिविधि, देख ताप सत माँहिं ।*
*जन रज्जब मुर१ मामले२, एक बंदगी नाँहिं ॥१६॥*
अग्नि में काष्ठ डालना, वायु देना और जल से बचाना यही तीन प्रकार की अग्नि की सेवा है । वैसे ही गुरु में भी देखो, सत्य रूप ताप है, अत: उनको भी भोजन देना, उनके साधन में विध्न न होने देना, अनुकूल वातावरण से प्रसन्न रखना, यही तीन प्रकार की सेवा है, वा तन मन वचन से सेवा करना ही त्रिविधि सेवा है । इन तीन१ कामों२ के लिये एक प्रकार की सेवा नहीं होती, तीन प्रकार की ही होती है ओर गुरु संयोग से ही होती है, वियोग होने पर नहीं होती ।
(क्रमशः)

*९. गुरु संयोग वियोग माहात्म्य का अंग ~ ९/१२*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*९. गुरु संयोग वियोग माहात्म्य का अंग ~ ९/१२*
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*जन रज्जब गोदावरी, गोरख गिरा सु गाल ।*
*सूधे१ सिध ऊंधे२ शिला, देख हुये तत्काल ॥९॥*
देखो, गोदावरी कुंभ मेले में गोरक्षनाथ जी के मुख से निकली वाणी(खड़े सिद्ध, बैठे शिला) से तत्काल ही उनके अनुकूल१ तो सिद्ध हो गये और प्रतिकूल२ शिला हो गये । अब यह वाणी बोलने से कहाँ सिद्ध और शिला होते हैं ? अर्थात सिद्धों के मुख से ही ऐसा होता है । वैसे ही गुरु के मुख के शब्द से ही शिष्य मुक्त होते हैं ।
प्रसंग कथा - गोदावरी कुंभ मेले में नाथों की जमात के लिये आने वाली मतीरों की गाड़ी से गोरक्षनाथ ने मार्ग में एक मतीरा से आधा लेकर आधा गाड़ी में रख दिया था । नाथ समूह ने गाड़ी जूंठी करने का दोष लगाकर, मत्स्येन्द्रनाथ तथा गोरक्षनाथ के हाथ पीछे की ओर बाँधे, शिरों पर भारी पत्थर रक्खे और धूप में खड़े कर दिये । यह देख कर अच्छे अच्छे संत तो इस दण्ड को अनुचित बताकर सभा में खड़े हो गये अभिमानी बैठे बैठे हँस रहे थे । उसी समय गोरक्षनाथ ने "खड़े सिद्ध बैठे शिला" बाणी कही थी ।
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*उहै१ शब्द आनन२ अनन्त, कहैं सुनैं सब कोय ।*
*पै रज्जब उहिं३ शक्ति बिन, सिद्ध शिला नहिं होय ॥१०॥*
वही शब्द अब अनन्त मुखों से कहा सुना जाता है किन्तु उस गोरक्षनाथ की शक्ति बिना न कोई सिद्ध होता है और न कोई शिला होता है ।

*रज्जब मुये जिलावता, मंत्र धन्वन्तरि वैद१ ।*
*वह विद्या वादी२ अजहुँ, परि वह नुकता३ नहिं कैद४ ॥११॥*
पूर्व काल में मंत्र और धन्वन्तरि वैद्य१ मुर्दों को जीवित कर देते थे, वही मंत्रविद्या और उनके कथन२ करने वाले अब भी हैं किन्तु वह मुर्दों को जीवित करने वाली सूक्ष्म बात३ रूप शक्ति उनके अधीन४ अब कहाँ है ? वह तो उन्हीं के साथ थी वैसे ही ज्ञान की बातें करने वाले तो बहुत हैं किन्तु शिष्यों को जीवन्मुक्त बनाने वाले कहाँ हैं ? वे तो सद्गुरु ही होते हैं ।
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*रसन रसातल पर पड़ी, ज्ञान गजा१ सु अपार ।*
*रज्जब जड़ गढ़३ भानते२, गये उठावनहार ॥१२॥*
पृथ्वी पर अपार भारी शिलायें व गदायें१ पड़ी हैं किन्तु उनको उठा कर जो किलों को तोड़ते२ थे, वे चलै गये, तब किले कैसे टूटें । वैसे ही जिह्वा से ज्ञान की बातें तो बहुत कही जाती हैं किंतु उन्हें धारण करके जड़ता३ अर्थात अज्ञान को नष्ट करते थे वे साधक नहीं रहे । भाव यह है - योग्य गुरु शिष्यों का संयोग ही मुक्ति का हेतु है, वियोग नहीं है ।
(क्रमशः)

*९. गुरु संयोग वियोग माहात्म्य का अंग ~ ५/८*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*९. गुरु संयोग वियोग माहात्म्य का अंग ~ ५/८*
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*सद्गुरु सिंह समान है, शब्द डंक नख ठौर ।*
*जीवित जाय गह जोर वर, उतरे बल कुछ और ॥५॥*
सद्गुरु सिंह के समान हैं, जैसे सिंह के नख जीवित अर्थात पंजे के लगे हैं तब तो उनमें श्रेष्ठ बल होता है और पंजे से उतरने के पीछे उनका बल अन्यावस्था को प्राप्त होता है अर्थात फिर उनसे कोई भी नहीं डरता, प्रत्युत डरपोक बालक के गले में बाँधे जाते हैं । वैसे ही सद्गुरु शब्द गुरु मुख द्वारा तो महान् कार्य करता है और गुरु मुख से हट जाने पर उसमें पूर्ववत् शक्ति नहीं रहती ।
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*वाराह१ वारण२ वक्त्र३ बल, देखहु दुहुं के दंत ।*
*तैसे गुरु मुख शब्द सयाणा४, मनहु मनावै मंत५ ॥६॥*
देखो, शूकर१ और हाथी२ इन दोनों के मुख३ में दाँतो का ही बल है । हे सुजान४ वैसे ही गुरु के मुख में शब्द का बल है, वे शब्द-बल से ही साधकों के मनको अपना सिद्धान्त मनवाते५ हैं ।
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*रज्जब जहिं पारे पैदा हुये, पारवती मधि पूत ।*
*सो पारा अजहूं घणा, पै१ पी न होत सुत सूत२ ॥७॥*
जिस पारे से पार्वती में पुत्र उत्पन्न हुये थे, वही पारा अब भी बहुत है किंतु१ इस पारे२ के पीने पर पुत्र नहीं होता । पारा शंकर जी का वीर्य माना जाता है, वह वीर्य रूप से शंकरजी में था तभी पुत्र हुये थे । वैसे ही सद्गुरु के जीवन काल में उनके मुख से शब्द सुनने से बहुत से शिष्यों का उद्धार होता है, पीछे वे ही शब्द ग्रंथाकार में रहते हैं किन्तु गुरु मुख बिना मुक्त नहीं करते, उन्हें कोई सद्गुरु सुनाता है तभी साधकों को यथार्थ बोध होता है ।
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*निनाणवें कोटि१ नराधिपति२, निपजे४ गोरख ज्ञान ।*
*अब रज्जब एकहुँ नहीं, शब्द सत्ता घट मान ॥८॥*
योगिराज गोरक्षनाथ जी के मुख से सुने शब्दों के ज्ञान द्वारा ९९ प्रकार१ के राजा२ साधक होकर४ मुक्त हुये थे । उन्हीं शब्दों का पाठ अब भी किया जाता है किंतु पढ़ने वालों में एक भी मुक्त नहीं होता, तब निश्चयपूर्वक मानना होगा कि शब्द की शक्ति रूप सत्ता कम हो गई ।
(क्रमशः)

*९. गुरु संयोग वियोग माहात्म्य का अंग ~ १/४*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*९. गुरु संयोग वियोग माहात्म्य का अंग ~ १/४*
आज्ञाकारी अंग के अनन्तर गुरु के संयोग और वियोग से होने वाले फलाफल का परिचय देने के लये गुरु संयोग वियोग महात्म्य का अंग कह रहे हैं -
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*सद्गुरु प्रत्यक्ष परसतैं, शिष की शंका जाँहिं ।*
*ज्यों दिनकर१ सौं दिन दरसे, त्यों निशि सूझे नाँहिं ॥१॥*
सद्गुरु के मिलने पर शिष्य की शंका नष्ट हो जाती है, यह प्रत्यक्ष ही है । जैसा सूर्य१ के प्रकाश दिन में दिखता है, वैसा रात्रि में नहीं दिखता । वैसे ही गुरु के संग से ज्ञान होता है, वैसा ज्ञान गुरु के अभाव में नहीं होता ।
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*गुरु चन्दन जीवित मुवौं, वचन वास बिच होय ।*
*नर तरु निपजे परसपर, त्यों पीछे नहिं कोय ॥२॥*
चन्दन मृतकवत सूखे काष्ठों को भी अपनी सुगन्ध द्वारा उन्हें सुगन्धित करना रूप जीवन देता है । वैसे ही गुरु ज्ञानहीन नरों को भी अपने वचनों द्वारा ज्ञानयुक्त करता है । सुगन्ध द्वारा चन्दन और काष्ठ परस्पर मिलते हैं तब चन्दन बनते हैं । गुरु वचनों द्वारा गुरु और नर परस्पर मिलते हैं तब नर ज्ञानी बनते हैं । चन्दन और गुरु के अभाव में उक्त कार्य सिद्ध नहीं हो सकता ।
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*शब्द डंक गुरु भृंग पर, मारत तन में जंत१ ।*
*उभय उतर्यों उभय अंग, सु कला न कंटक२ मंत३ ॥३॥*
शब्द गुरु के पास हो और डंक भृंग के पास हो तब ही गुरु शिष्य के शब्द मारता है और भृंग कीट१ के डंक मारता है । शब्द गुरु से हट जाय तथा डंक भृंग से हट जाय, तो इन दोनों के हट जाने से शिष्य और कीट में परिवर्तन रूप सुन्दर कला प्रकट नहीं होगी । उस उद्योग में विध्न२ ही समझो३ ।
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*गुरु हमाइ१ संयोग शब्द पर, परस्यूं पलटे प्राण ।*
*रज्जब बिछड्यूं बल घटे, समझै संत सुजाण ॥४॥*
हुमा१ पक्षी की छाया के संयोग से प्राणी दरिद्री से बदलकर राजा हो जाता है और गुरु के शब्द संयोग से साधारण मानव से बदलकर संत हो जाता है । हुमा और गुरु के संयोग बिना उनका वर्तमान बल भी घटता जाता है किन्तु इस रहस्य को कोई विरले बुद्धिमान संत ही समझ पाते हैं ।
(क्रमशः)

शुक्रवार, 3 अप्रैल 2026

*८.आज्ञाकारी का अंग ~ ३२/३४*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*८.आज्ञाकारी का अंग ~ ३२/३४*
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*गुरु आज्ञा दुनिया तजहु, आज्ञा दर्शन त्याग ।*
*रज्जब आज्ञा ऐन यहु, पाखंड प्रपंच से भाग ॥३२॥*
गुरु आज्ञानुसार सांसारिक राग को त्यागो, जोगी, जंगम, सेवडे, सन्यासी, बौद्ध और शेखों के भेष तथा मताग्रह को त्यागो । पाखंड प्रपंच से दूर भागो, यही गुरु की यथार्थ आज्ञा है ।
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*शिष्य सदा सत शब्द मधि१, गुरु थिर गोविंद माँहिं ।*
*उभय उमर ठाहर व्यतीत, तब सँचर२ कछु नाँहिं ॥३३॥*
३३ में गुरु-शिष्य की निर्दोषता दिखा रहे हैं - शिष्य सदा गुरु के यथार्थत शब्दों में१ मन लगाये रहता है और गुरु गोविन्द के चिन्तन में मन स्थिर रखता है । इस प्रकार दोनों की आयु उक्त “शब्द मनन” और “गोविन्द भजन” रूप दोनों स्थानों में ही व्यतीत होती है, तब उनमें कोई दोष२ नहीं रहता वे निर्दोष ही हैं ।
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*शिष सोई सत सीख में, गुरु सोई ज्ञान गरक्क१ ।*
*मन वच कर्म रज्जब कहै, युगल२ जु पावैं जक्क३ ॥३४॥*
३४ में योग्य गुरु-शिष्य का परिचय दे रहे हैं - जो यथार्थ शिक्षानुसार चलता है वही शिष्य है और जो ज्ञान में निमग्न१ रहता है वही गुरु है । हम मन, वचन और कर्म से यथार्थ ही कहते हैं, उक्त प्रकार के गुरु-शिष्य दोनों२ ही शांति३ को प्राप्त होते हैं ।
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इति श्री रज्जब गिरार्थ प्रकाशिका सहित “८. आज्ञाकारी का अंग” समाप्त ॥
(क्रमशः)

बुधवार, 1 अप्रैल 2026

रामबगस जी

*#daduji*
*॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥*
*॥ दादूराम~सत्यराम ॥*
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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अध्याय १६ -
आचार्य पर्व -
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६- आचार्य दिलेरामजी महाराज ने वि. सं. १८९४ में अपने ज्येष्ठ शिष्य भजनानन्दी, परमविरक्त, बाल ब्रह्मचारी जो नवलगढ अग्रवाल वैश्य भक्त परिवार में जन्में थे, उनका पिता दादूजी का परम भक्त था । उसने अपने पुत्र रामबगस को आचार्य दिलेरामजी के भेंट कर दिया था । रामबगस जी की भजन निष्ठा, विरक्ति, समता, मितभाषिता परम संतोष आदि विशेषताओं को देखकर आचार्य पद के योग्य रामबगस जी को निश्‍चय किया ।
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वि. सं. १८९४ में रामबगसजी को उनकी इच्छा नहीं होने पर भी आचार्य दिलेरामजी ने अपना उत्तराधिकारी नियत करके भेष में पूजा बांट दी । इससे आचार्य दिलेरामजी के ब्रह्मलीन होने पर आचार्य दिलेरामजी की आज्ञानुसार समाज ने रामबगस जी की इच्छा न होने  पर भी आचार्य पद पर अभिषिक्त कर दिया । 
किन्तु रामबगसजी को यह वैभव संपन्न पद रुचिकर नहीं हुआ । वे इसको त्यागकर भागने का ही विचार प्रतिपल करते रहते थे । उन को उनके आचार्य काल के १७ दिन १७ वर्ष से भी अति महान् निकले थे । १८ वें दिन की रात्रि को उन्होंने भागने का दॄढ निश्‍चय कर लिया था । 
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आज वे रात्रि को चैनरामजी महाराज की बारहदरी के पूर्वी चौबारे में थे । उसकी दक्षिण की खिडकी से रस्सा डालकर नीचे उतर गये और रात ही रात में बहुत दूर निकल गये तथा परिचित लोगों से बचते हुये दूर देश में चले गये और वर्षों तक तीर्थयात्रा में भ्रमण करते रहे । 
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इधर इनकी आशा छोडकर इनके छोटे गुरु भाई प्रेमदासजी को समाज ने आचार्य पद पर अभिषिक्त कर दिया । फिर रामबगसजी चिरकाल से विचरते हुये इधर आये और हरमाडा ग्राम में स्थायी रुप से रहने लगे । हरमाडे ग्राम के बीच में जो दादूद्वारा अस्थल है वह आपका ही है । आपने केवल १७ दिन ही आचार्य गद्दी पर अति कठिनता से निकाले थे । 
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अत: अल्पकाल रहने से इनको भी आचार्यों की गणना में नहीं गिना गया । यही आचार्य प्रणाली की कुछ घटनायें शेष रह गई थीं । जैसी ग्रंथों में देखी गयी थी तथा वृद्ध संतों से परंपरागत सुनी गई थी, सो यहाँ लिख दी गई हैं । जिससे नाना भ्रांतियों को अवकाश नहीं मिल सकेगा ।
(क्रमशः)

२२. आपने भाव को अंग २३/२५

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२२. आपने भाव को अंग २३/२५
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सुन्दर अपने भाव तें, रूप चतुर्भुज होइ । 
याकौं ऐसौई दृसै, वाकै रूप न कोइ ॥२३॥
श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - अर्जुन के अपने हृद्गत विचार(भाव) के कारण ही कृष्ण उसको सदा चतुर्भुज रूप में दिखायी देते थे । यद्यपि उन का रूप चतुर्भुज नहीं था । भगवान् तो नीरूप(रूप -रहित) होते हैं । भक्त अर्जुन के भक्तिपूर्ण आग्रह के कारण ही उनको उसके सामने सदा चतुर्भुज रूप में ही आना पड़ता था२ ॥२३॥ २ द्र० - श्रीमद्भगवद्‌गीता : तेनैव रूपेण चतुर्भुजेन, सहस्रबाहो भव विश्वमूर्ते ! ॥ (अ० ११, श्लोक ४६))
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काहू मान्यौ सींग सौ, हृदये उपज्यौ चाव । 
सुन्दर तैसौ ई भयौ, जाकै जैसौ भाव ॥२४॥
भक्त प्रह्लाद को भगवान् के सिंह रूप से भी प्रीति थी । उसने उसी रूप के माध्यम से उन प्रभु की भक्ति की थी । अतः वे उसी(नृसिंह) रूप में प्रकट हुए । क्योंकि भगवान् भक्त के भाव के अधीन हैं; अतः वह भक्त जैसा रूप चाहता है उसी रूप में वे उसके सम्मुख आते हैं३ ॥२४॥ (३ भक्त प्रह्लाद की कथा भागवत पुराण में प्रसिद्ध है ।)
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काहू सौं अति निकट है, काहू सौं अति दूरि । 
सुन्दर अपनौ भाव है, जहां तहां भरपूरि ॥२५॥
इति आपने भाव को अंग ॥२२॥
इसी भाव – भेद के कारण वे प्रभु व्यवहार में किसी भक्त के बहुत समीप दिखायी देते हैं, किसी से बहुत दूर । श्रसुन्दरदासजी कहते हैं - प्रत्येक भक्त के भाव की विचित्रता के कारण ही यह सब होता है; अन्यथा भगवान् तो सर्वव्यापक हैं, उन पर अतिसमीप या अतिदूर रहने का उपालम्भ नहीं लगाया जा सकता ॥२५॥
इति आपने भाव का अंग सम्पूर्ण ॥२२॥
(क्रमशः)

हिरदै बडौ रे कठौर ।

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*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*प्रीति न उपजै विरह बिन, प्रेम भक्ति क्यों होइ ।*
*सब झूठै दादू भाव बिन, कोटि करे जे कोइ ॥*
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साषी लापचारी की ॥
पाणी मैं पाथर रह्या, ऊपरि बध्या सिवालि ।
बषनां टाँच्याँ नीकली, माहिं अग्नि की झालि ॥१
(१ इसका अर्थ ‘निगुणा कठोर कौ अंग’ की साषियों में देखें ।)  
गुरि मिलिया तब पाथर भीगा, चूना कीया गारी ।
पाणी माहिं पखाण भिजोया, बषनां गुरि की बलिहारी ॥२ 
(२ इसका अर्थ ‘सुमिरण कौ अंग’ की साषियों में देखें ।)  
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पद ॥
हिरदै बडौ रे कठौर ।
कोटि कियाँ भीजै नहीं, अैसौ पाहण नांहीं और ॥टेक॥ 
गंगा नैं गोदावरि न्हायौ, कासी पुहकर मांहि रे ।
करम कापड़ी मैंण कौ, ताथैं रोम भीगौ नाहिं रे ॥
बेद नैं भागौत सुणियाँ, कथा सुणी अनेक रे ।
कर्म पाखर सारिखा, ताथैं बाण न लागौ एक रे ॥
औंधा कलसा ऊपरैं, जल बूठौ अखंड धार ।
तत बेलाँ निहालियौ, तौ पाणी नहीं लगार ॥
ब्रह्म अग्नि पाषाण जाल्या, चूना कीया सलेस रे ।
बषनां भिजोया राम रस, म्हारा सतगुर नैं आदेस रे ॥८८॥  
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बषनांजी कहते हैं, सांसारिक विषय-भोगों को भोगने का आदी मन परमात्मा की ओर बिलकुल ही नहीं मुड़ना चाहता है । यह विषय-भोग, भोग-भोग कर अत्यन्त कठोर हो गया है, उन्हें छोड़ने का नाम ही नहीं लेता है । करोड़ों उपाय करने के उपरान्त भी यह पत्थर जैसा कठोर मन भीगता = नरम नहीं होता है । इस जैसा और कोई दूसरा अवयव कठोर नहीं है । 
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(पाठकों को यहाँ स्मरण करना चाहिये कि वास्तव में भाव क्या है और भाव तथा भक्ति का आपस में क्या सम्बन्ध है । यहाँ इस विषय में अधिक लिखने का अवकाश नहीं है किन्तु जिन्हें इस विषय में अधिक जानना हो, वे मधुसूदन स्वामी रचित ‘भक्तिरसायन’ ग्रंथ को अवश्य पढ़ें । भक्ति का उदय होता ही तब है, जब हृदय नवनीत के समान द्रवणशील = नरम होता है । भगवान् के नाम, गुणों को सुनते ही हृदय का द्रवित होकर तदाकार होना ही तो भक्ति है । यदि नाम-गुणों के सुनने के उपरांत भी मन में कोई परिवर्तन न हो तो वह मन भक्तिमार्ग के योग्य नहीं है । ऐसे साधकों को ज्ञानमार्ग का आश्रय लेना चाहिये । बषनांजी कठोर और नरम न होने की चर्चा करके इसी ओर संकेत कर रहे हैं ।) 
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इस मन को नरम करने के लिये, इसमें भक्ति जम सके, एतदर्थ मैंने इसे गंगा नैं = और गोदावरी में नहलाया । काशी की गंगा तथा पुष्कर के ब्रह्मसरोवर में भी इसको स्नान कराया किन्तु क्या करें ? यह वहाँ भी नहीं भीगा क्योंकि इसने सकामकर्म रूपी मोंमिया(मोम में सना हुआ) कपड़ा पहना हुआ है । 
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इसने वेद और भागवत महापुराण का श्रवण किया है । इसके अतिरिक्त अन्य अनेकों इतिहास, पुराण उपनिषदों की कथाएँ, तत्त्वमीमांसाएँ सुनी है किन्तु इसके सकामकर्म, कवच के समान प्रतिबंधक बन गये जिससे इस पर एक भी शब्द रूपी बाण लग नहीं सका । 
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इसकी स्थिति ठीक वैसी ही है जैसे उल्टे रखे हुए कलश पर अखंडित जल की धारा गिरने के उपरान्त भी जब ततबेलाँ = जल की आवश्यकता होने के समय उसमें नाममात्र का भी पानी नहीं मिलता । वस्तुतः पानी तो तब मिले, जब उसमें पानी रुका हो । ठीक इसी प्रकार मन भाव-भक्ति में सराबोर हुआ तो तब अनुभव हो जब उसने भाव-भक्ति का एकनिष्ठ होकर अनुष्ठान किया हो । 
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बषनांजी अपनी स्थिति बताते हुए कहते हैं, परब्रह्म-परमात्मा की भक्ति रूपी अग्नि से हृदय रूपी पत्थर को जला डाला जिससे बह मजबूती के गुणों से युक्त उत्तम किस्म का चूना बन गया । फिर उस चूने को राम-नाम रूपी जल में भिगो दिया जिससे मुक्ति रूपी महल बनने का उत्तम सरंजाम हो गया । मेरे हृदय को उक्त प्रकार नरम करने की युक्ति बताने वाले गुरु महाराज को मेरा आदेश = नमस्कार है ॥८८॥ 

*७.आज्ञाकारी का अंग ~ २५/२८*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*७.आज्ञाकारी का अंग ~ २५/२८*
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*गुरु सन्मुख शिष रह सदा, कदे करो मत और ।*
*ज्यों रज्जब वसुधा विरछ१, सुखी दुखी इक ठौर ॥२५॥*
२५-२६ में शिष्य को गुरु आज्ञा में रहने की प्रेरणा कर रहे हैं - वृक्ष१ वर्षा से सुखी और आतप से दुखी होने पर भी पृथ्वी में एक स्थान पर ही रहता है, उखडने से तो नष्ट ही होगा । वैसे ही शिष्य को सदा गुरु की आज्ञा में ही रहना चाहिये । गुरु आज्ञा से विमुख होने का उपदेश कभी भी कोई न करे, कारण-गुरु से विमुख होते ही परमार्थ से भ्रष्ट हो जाता है ।
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*ज्यों सद्गुरु के शब्द में, त्यों चल शिष्य सुजान ।*
*जन रज्जब रहु इस मतै१, छाडहु खैंचातान ॥२६॥*
हे बुद्धिमान शिष्य ! जैसे सद्गुरु के उपदेश रूप शब्दों में चलने का विधान है, वैसे ही चल, इस सद्गुरु आज्ञा रूप सिद्धान्त१ में ही स्थित रह, अन्य मत मतान्तरों की खैंचातान को छोड़ दे ।
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*हीरा हेम१ सोई खरे, जो लागे भाणे२ भित्त३ ।*
*रज्जब चहुँटे गुरु शब्द, सो चेला चोखे चित्त ॥२७॥*
२७ में सुमति शिष्य का परिचय दे रहे हैं - हीरा और स्वर्ण१ वही अच्छा माना जाता है जिसके पीठ३ पर तोड़ने के समान चोट२ लगे और वे परस्पर चिपकते जावें(स्वर्ण के भूषण में हीरा बैठाया जाता है, तब जिसमें बैठाया जाता है उस स्थान की दीवाल के और हीरा के थोडी थोडी चोट मारी जाती है, जिससे वह हीरा भूषण में दब कर स्थिर हो जाता है) वैसे ही जो साधन कष्ट देने पर भी गुरु के शब्दों के विचार में लगा रहे, वही शिष्य अच्छे हृदय का माना जाता है ।
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*गुरु आज्ञा इन्द्रिय दमन, आज्ञा परिहर काम ।*
*रज्जब आज्ञा आप१ हत, आज्ञा भजिये राम ॥२८॥*
२८-२९ में गुरु आज्ञा पालन की प्रेरणा कर रहे हैं - गुरु आज्ञानुसार साधन करके इन्द्रियों को जय करो, काम को त्यागो, अपने मिथ्या अहंकार१ को नष्ट करो और राम का भजन करो ।
(क्रमशः)  

लघु जैत की आज्ञा

*#daduji*
*॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥*
*॥ दादूराम~सत्यराम ॥*
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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अध्याय १६ -
आचार्य पर्व -
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नारायणा दादूधाम में पहुँच कर सब संतों से परामर्श किया । तब यह प्रश्‍न आया कि गद्दी पर किसको बैठाया जाय ? फिर समाज के माने हुये संतों को बुलाया । सबके आ जाने पर सबने निश्‍चय किया कि दादूजी महाराज ही उत्तराधिकारी का निर्णय देगें, उन्हीं से प्रार्थना की वह सब आचार्य जैतरामजी महाराज के गद्दी पर विराजने के प्रसंग अध्याय तीन में लिख दिया गया है । वहाँ देखें ।
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दादूजी महाराज ने लघु जैत की आज्ञा नभवाणी द्वारा दी । फिर उनको गद्दी पर बैठाना निश्‍चय हो गया । तब ध्यानीबाई सहमत हो गई । गद्दी पर बैठने वालों पर प्रतिबन्ध लगा रखा था उसको हटा दिया । इससे सूचित होता है कि सभाकुमारी जी ने तथा ध्यानी जी ने आचार्य गद्दी पर न बैठकर केवल समाज एक मत होकर एक व्यक्ति को न बैठाये तब तक प्रतिबन्ध लगाये रक्खा था ।
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वे आचार्य होने योग्य व्यक्ति की तथा संपूर्ण समाज की एकता की प्रतिक्षा करती रही थी । जयतरामजीने आचार्य हो गये और वि. सं. १७६० में ध्यानी बाई ब्रह्मलीन हो गई । ध्यानी बाई की गुरु सभाकुमारी वि. सं. १७२४ में ब्रह्मलीन हो गई थी । कहा भी है-
‘‘सत रासे चौबीसिये, चलिया सभाकुमारी ।
चेली सभाकुमारी की, ध्यानी बैठी पाट ।
सतरासे अरु साठ ही, कुमारि चल्या दे हाट ।’’
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दे हाट का तात्पर्य यही ज्ञात होता है कि योग्य आचार्य की व्यवस्था हो जाने पर ध्यानीबाई ने उपदेश के केन्द्र दादूजी की गद्दी पर प्रतिबन्ध लगा रक्खा था । वह गद्दी जैतरामजी को देकर बाईजी की पालका में चली गई और वि. सं. १७६० में ब्रह्मलीन हो गई ।
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५- वि. सं. १८१० में मेडते में आचार्य कृष्णदेव जी महाराज ब्रह्मलीन हुये तब मेडते में तो जोधपुर नरेश, नागौर नरेश आदि मारवाड के सरदारों, भक्तों व उतराधे संतों तथा अन्य थांमायती महन्तों ने मिलकर कृष्णदेव जी की आज्ञानुसार चैनराम जी महाराज को आचार्य पद पर अभिषिक्त किया । किन्तु नागे संत तथा जयपुर नरेश ने मिलकर नारायणा दादूधाम में आचार्य कृष्णदेव जी के दूसरे शिष्य गंगाराम जी को आचार्य गद्दी पर बैठा दिया ।
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किन्तु फिर वि. सं. १८१२ में समाज में एकता हो गई तब गंगाराम जी ने प्रसन्नता से गद्दी त्याग दी थी । वि. सं. १८१० से वि. सं. १८१२ तक गंगाराम जी नारायणा दादूधाम की गद्दी पर विराजे किन्तु संपूर्ण समाज की सम्मति से नहीं विराजने से वे आचार्यों की गणना में नहीं आये । उनके दूसरे गुरु भाई कृपाराम जी को सवाई जयसिंह द्वितीय जयपुर नरेश ने गृहस्थ बना दिया था । वे समाज के भेष भण्डारी बने रहे ।
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अब गंगाराम जी छत्रियों के महन्त जी की परंपरा पाखर ग्राम में है । उनकी परंपरा के संत नारायणा से पाखर चले गये । कृपाराम जी भेष भंडारी जी की परंपरा कैरया ग्राम में है । कैरया नारायणा के पास ही है ।
(क्रमशः)

मंगलवार, 31 मार्च 2026

२२. आपने भाव को अंग २०/२२

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२२. आपने भाव को अंग २०/२२ 
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याही देखत नूर कौं, याही देखत तेज । 
याही देखत जोति कौं, सुन्दर याकौ हेज ॥२०॥
तुम्हारा यह शुभ चिन्तन ही तुम को उस प्रभु के नूर(दिव्य ज्योति) तक पहुँचायगा, यही चिन्तन उसके तेज(दिव्य प्रताप) तक पहुँचायगा । यही तुम्हें उस की दिव्य प्रभा तक पहुँचायगा । अतः तुम उसी प्रभु की अनन्य प्रेमा भक्ति से उसकी आराधना(हेज) करो ॥२०॥
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सुन्दर अपने भाव तें, जन की करै सहाइ । 
बाहिर चढि कै बीठलौ, दुष्ट हि मारै आइ ॥२१॥
श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - वे निरञ्जन निराकार प्रभु भी उसी भक्त की सहायता करने के लिये आतुर होते हैं जो अपने हृदय से भगवान् से सहायता हेतु पुकार करता है । बीठल एवं नामदेव की हार्दिक पुकार सुनकर भगवान् उनकी सहायता के लिये दौड़े हुए आये थे - यह सभी जानते हैं ॥२१॥
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सुन्दर अपने भाव तें, मूरत पीयौ दुद्ध । 
ठाकुर जान्यौं सत्य करि, नांमां कौ उर सुद्ध ॥२२॥ 
भक्त(नामदेव) की हार्दिक प्रार्थना पर भगवान् ने उसका दिया हुआ दूध दीवाल से मुख निकाल कर पीया था; क्योंकि भगवान् ने भी जान लिया था कि मेरा भक्त नामदेव१ शुद्ध हृदय से पुकार रहा है ॥२३॥ {१ नामदेव द्वारा भगवान् को दूध पिलाने की कथा श्रीराघोदास की भक्तमाल (५० २८८) में देखें ।}
(क्रमशः)