🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷*卐 श्री दादूदयालवे नम: 卐*🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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*निर्मल तत्त निर्मल तत्त निर्मल तत्त ऐसा ।*
*निर्गुण निज निधि निरंजन, जैसा है तैसा ॥टेक॥*
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हरजीरामजी जोधपुर राज्य के मकराणा के पास के चाडी गांव के मेड़तिया अखैसिंघघोट गोत के क्षत्रिय थे । एक दिन इन्होंने एक सेठ को मार्ग में लूटकर उस धन को अपनी माता के पास ले जाकर डाला । माता ने पूछा- ये धन कहां से लाये हो ? हरजीरामजी ने कहा~ लूटकर लाया हूं । यह सुनते ही माता परम दुःखी हो गई और बोली- “बेटा ! यह काम तुमने अच्छा नहीं किया । यदि कोई मुझे लूटे तो मुझे तथा तुझे कितना दुःख होगा । किसी को दुःखी करके सुख भोगना पाप है । यह धन जिसका है, उसे लौटा दो ।” कहा भी है~ अपने दुख सम सभी का, लखते भक्त सुजान । माता हरजीराम की, धन लख भाई मलान । दृ.त.६।
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माता की उक्त बात सुनकर हरजीरामजी को वैराग्य हो गया । उस धन को उन्होंने धन वाले सेठ को लौटा दिया । फिर नारायणा में जाकर नारायणदासजी के शिष्य हो गये । और भैराणा पर्वत पर जाकर निर्गुणराम की उपासना करने लगे । फिर जब माता ने सुना मेरा सुत साधु हो गया है और भैराणा पर्वत पर तपस्या कर रहा है । तब हरजीरामजी की माता भैराणा पर्वत पर आई और हरजीराम से कहा~ बेटा ! साधु बन गये हो यह तो बहुत अच्छा किया है किन्तु अब श्रेष्ठ संत बनना, केवल कहने मात्र का साधु बनकर मेरा दूध नहीं लजाना । माता का उक्त वचन सुनकर हरजीरामजी ने कहा~ आपके कथनानुसार ही बनूंगा ।
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फिर माता तो अपने पुत्र हरजीराम को उत्तम संत बनने का शुभाशीर्वाद देकर अपने ग्राम को चली गई । फिर हरजीरामजी प्रभु प्रेरणा से भैराणा से विचर गये और भ्रमण करते हुये गुड़ा पूंख के माल के पर्वत पर जहां मनसा देवी का मंदिर है उससे ऊपर जाकर विकट स्थान में तपस्या करने लगे । फिर एक दिन मनसा देवी ने आकर कहा-यहां तो कोई भी नहीं रह सकता है । तुम यहां से चले जाओ । मनसा देवी का उक्त वचन सुनकर हरजीरामजी ने कहा~हरजीराम रहेगा ।
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फिर वे वहां रहकर भजन करने लगे । वे दादू वाणी का पाठ करते थे तब एक प्रेत और सर्प वाणी का पाठ सुनते थे । एक दिन मनसा देवी ने कहा~ आप महातपस्वी हैं तो मेरे कुंड से पानी क्यों ले जाते हैं ? वहां निकाल लें हरजीरामजी ने कहा जैसी हरि इच्छा होगी वैसा ही हो जायगा । फिर एक दिन सर्प और प्रेत ने कहा~ आप रात को भी दादूवाणी का पाठ किया करो । हरजीरामजी ने कहा~ रात को प्रकाश बिना पाठ कैसे हो सकता है ? सर्प ने कहा~ प्रकाश तो मैं कर दिया करूंगा । प्रेत ने कहा~ और कोई आपको कष्ट हो तो कहिये ।
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हरजीरामजी ने कहा~ पानी का कष्ट है । प्रेत ने कहा~ पारस पीपल के नीचे वह पत्थर पड़ा है, उसको उखाड़ डालो, उसके नीचे बहुत अच्छा पानी निकलेगा । फिर हरजीरामजी ने उस पत्थर को उखाड़ डाला । उसके नीचे बहुत अच्छा पानी निकल आया था । वह पानी वि. सं. २०२९ तक तो था किन्तु अब वह पानी वहां नहीं है । फिर मनसा देवी के कुंड से पानी लाना बन्द कर दिया । सर्प अपनी मणि मुख से निकाल कर एक ऊंचे पत्थर पर रख देता था । उसके प्रकाश से हरजीरामजी से रात्रि को भी सर्प और प्रेत दादूवाणी सुनने लगे थे । कहा भी है~
“सर्पादिक भी संत की, सेव करै भलरीति ।
हरजीरामकी करी थी, सुन वाणी सहप्रीति ॥१॥"
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कुछ वर्षों तक हरजीरामजी ने माल के पर्वत में तपस्या की । मनसादेवी के मंदिर से कुछ ऊपर इनका तप स्थल हरजीरामजी की थूमड़ी(कुटिया) के नाम से प्रसिद्ध है । फिर वे वहां से गौड़जी के गुढ़े के पर्वत पर आकर तपस्या करने लगे । यहां पर आने के पश्चात इनकी अच्छी ख्याति हो गई । आप अधिक वस्त्र शरीर पर नहीं रखते थे । एक कौपीन और एक चौंकोंटा रुमाल सिर पर रखते थे । चोमू ठाकुर साहब ने हरजीरामजी की तपस्या तथा चमत्कारों से प्रभावित होकर प्रथम इनके लिये पर्वत पर स्थान बनवाया जिसमें गुफा भी बनवाई गई । उस गुफा में भजन करते थे । उसको अब वहां के लोग गढ़ी कहते हैं ।
(क्रमशः)























