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🌷*卐 श्री दादूदयालवे नम: 卐*🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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*दादू प्रीतम के पग परसिये, मुझ देखण का चाव ।*
*तहाँ ले सीस नवाइये, जहाँ धरे थे पाँव ॥*
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*४ राजारामजी*
४- चौथे राजारामजी भी अपने गुरुदेव कुंजदासजी के समान ही भजनानन्दी महात्मा थे । राजारामजी ने भी करोली से ७ मील गंगापुर रोड़ पर मांच ग्राम की सीमा में विद्यमान अस्थल नामक स्थान बनवाया था । कारण—एक तो यहां पर करोली नरेश की दी हुई भूमि थी उसकी व्यवस्था के लिये व्यवस्थापक के निवास के लिये और जो विरक्त संत शहर में नहीं रहना चाहें उनके एकान्त निवास के लिये, लाल पत्थर का अच्छा स्थान बनवाया था । अस्थल में दादू वाणी मंदिर भी है ।
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वाणी मंदिर की पूजा व स्थान की व्यवस्था वर्तमान में रामचरणदासजी करते हैं । मेरे पूछने पर उन्होंने मुझे करोली की कुंजदासजी की कुंज के महन्त ज्ञानदासजी का शिष्य अपने को बताया था । उक्त कारणों से ही राजारामजी ने अस्थल नामक स्थान बनवाया था । अस्थल के पास कुछ बस्ती है, वह अस्थल नाम से ही बोली जाती है । कारण—अस्थल के बनने के पश्चात ही बसी है ।
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राजारामजी की घटना भी सुनने में आती है कि—उनके समकालीन करोली नरेश ने आज्ञा निकाली थी कि—मेरे राज्य में रहने वालों को सबको कर देना होगा । उक्त आज्ञा साधुओं के स्थानों पर भी लागू हो गई । कुंज के महन्त राजारामजी को भी कर देने की सूचना मिली । राजारामजी ने कहा—करोली नरेश को आश्रम में बुलवाकर देंगे । राजा कुंज में आये तब कुंज में आने पर करोली नरेश का जो स्वागत होता था वैसा ही स्वागत किया गया । फिर कर की बात चली । तब राजारामजी ने कहा—ठीक है ।
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फिर एक थाल सुन्दर कपड़े से ढककर राजा के पास रखा गया । राजा ने उसे उघाड़ कर देखा तो कपड़े के नीचे राजारामजी का ही शिर कटा हुआ दीख पड़ा । यह देख राजा डर गया । फिर राजा के आगे से थाल हटा दिया और राजा ने राजारामजी से पूछा—यह क्या लीला है ? राजारामजी ने कहा—हमने तो शिर तक भगवान् को दे दिया है । फिर आप हम से कर क्या लेंगे । हमारे पास तो अपना कहने योग्य अब कुछ भी नहीं है ।
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फिर राजारामजी का कटा हुआ शिर देखकर तथा राजारामजी की निष्ठा देखकर करोली नरेश ने संतों से कर लेने की आज्ञा अपनी पीछे लौटा ली । इससे सूचित होता है कि राजारामजी भी अपने गुरु कुंजदासजी के समान महान् संत थे । राजारामजी भी करोली में ही वि. स. १८४१ श्रावण सुदि ९मी को ब्रह्मलीन हुये थे । चरण चौकी पर अंकित दोहा —
''श्रावण इकतालीस में, सुदि नवमी अनुराग ।
महन्त राजारामजी, कियो कलेवर त्याग ॥''
इनके चरण पधराने का समय वि.स. १८४५ वैशाख सुदि १० मी चरण चौकी पर अंकित है । किसी कारण से चरण पधराने में देर हो गई होगी । इनकी समाधि कुंजदासजी की समाधि के बराबर है । इनकी समाधि की भी छत्री बनी हुई है ।
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५- नन्दरामजी, ६- हरिनारायणजी, ७- पुरुषोत्तमजी, ८- जयरामदासजी, इन चार के चरण स्थल के सामने कूप पर एक ही चौकी में हैं । माधोदासजी ने वि. स. १९१९ माह सुदि १२ को पधराये हैं । करौली का जो विवरण ज्ञात हुआ वह सब लिख दिया है । अन्य स्थान पर लिखित—करौली के कुंज की महन्त परंपरा इस प्रकार है । १- राघवदासजी, २- कुंजदासजी, ३- मुरलीदासजी, ४- राजारामजी । नं. २, ३, ४ के चरण चिन्ह करौली में हैं । ५- जयरामदासजी, ६- पुरुषोत्तमदासजी, ७- नन्दरामजी, ८- हरिनारायणजी, ९- माधवदासजी, इन पांच के चरण चिन्ह अस्थल के कूप के पास में हैं । १०- गोपालदासजी, ११- ज्ञानदासजी । इति श्री चतुर्थ अध्याय समाप्तः
(क्रमशः)
















