🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷*卐 श्री दादूदयालवे नम: 卐*🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
.
*दादू तन मन लाइ कर, सेवा दृढ़ कर लेइ ।*
*ऐसा समर्थ राम है, जे मांगै सो देइ ॥*
================
*प्रहलाददासजी के संग से तरने वाले नर नारी*
रट रामट बस सदा, भक्त भगवत को राघो ।
सुनत नरायण गोविन्द, धर्म धार्यो जिन आघो¹ ॥
भीमराज निर्वाण, राम यश नीको गावे ।
नीको लक्ष्मीदास, हरियो हरि धर्म चलावे ॥
किशनाई पार्वती, बीना दुरगा गोरिजा ।
पारस रूपी परसि, गुरु मेट्यो दिल गोरिजा² ॥
राघव हरि यश रात दिन, सुन सुन परमारथ करें ।
ये परम पुरुष प्रहलाद की, संगति नर नारी तिरें ॥६५॥
.
भगवान् के भक्त राघवजी रामट ग्राम में सदा बसते हुये राम रटते थे । नारायण और गोविन्दजी भागवद्द धर्म को सुनते थे और उन्होंने आदर¹ पूर्वक धारण भी किया था । निर्वाण गोत्र के भीमराजजी क्षत्रिय रामजी का यश अच्छी प्रकार प्रीति से गाते थे । लक्ष्मीदासजी भी अच्छे भक्त थे । हरियाजी भी हरिभक्ति रूप धर्म अच्छी प्रकार चलाते थे । किशनाई, पार्वती, बीना, दुरगा(दुरशा भी पाठान्तर है) और गौरिजा, इन बाइयों ने भी पारसरूप प्रहलादजी को गुरु बनाया था । गुरुजी ने इनके हृदय का अज्ञान रूप दारिद्र² अपने ज्ञान धन को देकर मिटा दिया था । ये उक्त सब ही नर-नारी रातदिन हरियश सुन सुनकर परमार्थ करते थे । इस प्रकार परम पुरुष प्रहलादजी की संगति से ये उक्त नरनारी संसार-सागर से पार हो गये थे ।
.
*प्रहलादजी की वाणी की महिमा*
प्रहलाददासजी के शिष्य प्रशिष्य तथा सेवकों ने प्रहलादजी की वाणी की महिमा कही है । उसका निर्देश भी करना यहां उचित समझकर किया जाता है-
श्री गुरुदेव प्रहलाद की वाणी सवा हजार ।
सुने सुनावे पाठ उर, "श्याम" सहज भव पार ॥ श्यामदास कृत ।
श्रीवाणी प्रहलाद की, वाणी ब्रह्म गियान ।
हृदय हरि प्रकाश हो, हरिदास भ्रम भान ॥ हरिदास कृत ।
प्रेम प्रीति हरि हित बढ़े, होय ब्रह्म पद वास ।
वाणी पढ़ प्रहलाद की, केशव कर्म विनाश ॥ केशवदास कृत
उद्धव आदि रु अंत मधि, जो उर धारे संत ।
वाणी गुरु प्रहलाद की, तारण जीव अनन्त ॥ उद्धवदास कृत ।
वाणी गुरु प्रहलाद की, राघव ब्रह्म विलास ।
जिन हृदय धारण करी, ताके दोष विनास । राघवदास कृत ।
नव षट् ठारह चार ग्रन्थ, मथि अनुभव ले घीव ।
प्रहलाद कृत धर श्याम उर, प्राण पुष्ट पद पीव ॥ श्यामदास कृत ।
कह हरिराय सहाय जग, वाणी गुरु प्रहलाद ।
जिन पढ़ उर धारण करी, ताके मिटे विषाद ॥ हरिराय कृत ।
रतनाई रत राम से, आठों पहर अखंड ।
जप वाणी प्रहलाद को, छूटे जमको दंड ॥ रतनाई बाई कृत ।
वाणी गुरु प्रहलाद की, हृदय सु धारे कोय ।
केशी कर्म नवारि है, लीन अमर पद होय ॥ केशीबाई कृत ।
.
*प्रहलाददासजी की समाधि*
प्रहलाददासजी की समाधि घाटड़ा में ही बड़ा बाग के कूप के पास है । समाधि की अच्छी मानता है । चरण चिन्हों को धोकर आसपास के लोग ले जाते हैं और रोगी को देने से रोग में शांति आती है । पशु आदि को देने से पशु ठीक होते हैं नजर लगी पर देने से बच्चे ठीक होते हैं । कामना करके बोल्यारी बोलने वालों की कामनायें पूर्ण होती हैं । घाटड़ा में वर्षा नहीं हो तो प्रहलाददासजी की समाधि पर जाकर प्रार्थना करने पर हो जाती है । समाधि पर जात, जडूला, सवामणी आती हैं । प्रहलाददासजी की समाधि से पूर्व की ओर कुछ ही दूर पर प्रहलाद दह है उसमें १२ मास पानी रहता है । प्रहलाददासजी की समाधि के पास ही इनकी शिष्य परंपरा के महन्तों की समाधिया हैं ।
(क्रमशः)
.jpg)

.jpg)



.jpg)








