*🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏*
*🌷卐 सत्यराम सा 卐🌷*
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*२१. भजन भेद का अंग ~१३/१६*
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*एक बंदगी विश्व में, एकै ब्रह्म सु होय ।*
*रज्जब श्रावण स्वाति की, वारि बूंद गुण दोय ॥१३॥*
श्रावण के जल की बिन्दु और स्वाति नक्षत्र के जल की बिन्दु एक जैसी होती है किन्तु गुण भिन्न है, स्वाति से मोती बनता है श्रावण की से नहीं, वैसे ही संसारिक प्रीति और ब्रह्म की भक्ति भी भिन्न गुण वाली है, संसारिक प्रीति से बन्धन और ब्रह्म भक्ति से मुक्ति प्राप्त होती है ।
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*तन सुमिरण ढिकू चड़स, रहट रूप उनहार ।*
*रज्जब सुमिरन शून्य मन, वर्षा विपुल अपार ॥१४॥*
हाथ में माला फेरना तथा शरीरधारी का स्मरण करना, ढिकली, चड़स और रहट माला के समान है, जैसे इनसे माप का जल आता है, वैसे ही उक्त भजन से सीमित फल ही मिलता है और मन के द्वारा सर्व विकार शून्य ब्रह्म स्मरण भारी वर्षा के समान है । भारी वर्षा के अपार जल मिलता है वैसे ही ब्रह्म भजन से आपार ब्रह्मानन्द तथा ब्रह्म पद प्राप्त होता है ।
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*अराध अराधहु अंतरा, भजन भजन बहु भेद ।*
*रज्जब पावे एक को, नर निज नाम न खेद ॥१५॥*
आराधना, आराधना में भी निष्कामता और सकामता रूप बहुत अंतर है तथा भजन, भजन में भी निर्गुण, सगुण, चित्त स्थैर्यता, चपलतादि रूप बहुत रहस्य है । कोई विरला नर ही जिसके चिन्तन में दु:ख नहीं है, ऐसे निज नाम का भजन कर पाता है ।
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*भगवंत भजन सब विधि भला, पाये मानुष जूनि१ ।*
*रज्जब सुमिरन सो सही, जापर स्रवे२सु शूनि३ ॥१६॥*
मनुष्य जन्म१ पाने पर वैसे तो भगवान का भजन सभी प्रकार का अच्छा ही है किन्तु सच्चा सुमिरण तो वही है, जिस पर विकार शून्य राम२ जी कृपामृत गिरावें ।
(क्रमशः)























