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🌷*卐 श्री दादूदयालवे नम: 卐*🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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*दादू धरती ह्वै रहै, तज कूड़ कपट अहंकार ।*
*सांई कारण सिर सहै, ताको प्रत्यक्ष सिरजनहार ॥*
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अब परिचितों को भी पढ़िये—दादूपंथियों की छावनी में जागरण था । वह मेला शीतकाल में था । विदुरजी संतों के भजन सुनना चाहते थे, इससे वे दादूवाणी मंदिर में बैठे थे जो विशाल छप्पर के रूप में था । उनको वहां नंगे बैठे देखकर भूरादास कलानोरिया कुपित होकर बोला- यहां क्यों आकर बैठा है ? यहां मातायें बैठी हैं, दीखता नहीं तेरे को यह नंगे बैठने का स्थान है क्या ?
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भूरादास के उक्त वचन सुनकर विदुरजी तो क्या बोलते अन्य किसी साधु ने भी कुछ नहीं कहा- किन्तु मातृमंडल से आवाज आई । महाराज को बैठे रहने दो । ये तो संत हैं इनमें भेद दृष्टि ही ही कहां है और हम तो दूषित भाव रहित अपने बच्चों को रात दिन नंगा देखती हैं । यही बालवृत्ति इन संतजी की है । फिर भूरादास को कहा-तुम्हारा भाव अवश्य दूषित है तुम यहां बैठने के अधिकारी अवश्य नहीं हो । फिर भूरादास भी चुप हो गया । अन्य सन्तों व गृहस्थों ने किसी ने भी कुछ नहीं कहा ।
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बेरीवाले घनश्यामदासजी के शिष्य नन्दकिशोरजी मेरे से स्नेह रखते थे साथ ही आते जाते खाते पीते बैठते प्रायः साथ रहते थे । जागरण में भी हम दोनों साथ ही बैठे थे । शीत बहुत पड़ रहा था । मैंने नन्दकिशोरजी को कहा-अपन दोनों एक कम्बल में काम चला लेंगे । एक कम्बल विदुरजी को ओढ़ा आओ । मैंने मेरा कम्बल उतार कर नन्दकिशोरजी को दिया ।
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वे उठै और विदुरजी के शरीर को अच्छी प्रकार ढकर आ गये । विदुरजीने कुछ भी नहीं कहा । वे चित्रलिखित मूर्ती के समान ही विराजे रहे । हम दोनों एक कम्बल ओढ़े रहे वहां गायक संत उच्च कोटि के संतों के भजन गा रहे थे । महान् आनन्द की वर्षा हो रही थी । विदुरजी का शरीर किसी कारण हिल गया तो कम्बल उनके शरीर से नीचे गिर गया ।
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किन्तु उन परम तितिक्षु संत विदुरजी ने उस कम्बल को अपने हाथों उठाकर पुनः नहीं ओढ़ा । उक्त प्रकार की उनकी सहनशक्ति और तितिक्षा तो मैंने मेरे नेत्रों से देखी थी । इससे सूचित होता है, वे महान् तितिक्षु क्षमाशील, भजनानन्दी संत थे । उनके जीवन में ऐसी अनेक घटना घटी होगी, मैंने तो उक्त घटनायें आखों देखी लिखी हैं । उनके दर्शन फिर नारायणा दादूधाम के मेले में होते रहते थे । उनके किसी प्रकार का आग्रह नहीं था, वे गद्दे पर भी बैठ जाते थे और रेते में वैसे ही प्रसन्नता से बैठते थे ।
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स्नान के समय तो कुछ देर लगती ही नहीं थी । कारण कुछ धोना निचोना तो पड़ता ही नहीं था । वे अन्त तक दिगम्बर ही रहे थे । वे सदा अपना जीवन परम संतोष से ही व्यतीत करते रहे थे । सुनते हैं कि वि. सं. १९८९ में गोदावरी के कुंभ मेले में जाते समय बनास नदी से निकल रहे थे चातुर्मास का समय था वर्षा वर्षती ही रहती थी । पीछे से जोर से बाढ़ आ गई । इससे उनका शरीर बनास में ही बह गया । भगवान् की ऐसी ही इच्छा होगी । इस प्रकार संत विदुरजी की जीवन यात्रा समाप्त हुई ।
(क्रमशः)













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