🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷*卐 श्री दादूदयालवे नम: 卐*🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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*रहै नियारा सब करै, काहू लिप्त न होइ ।*
*आदि अंत भानै घड़ै, ऐसा समर्थ सोइ ॥*
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उक्त प्रकार देवादासजी की अनेक घटनायें घाटड़ा में प्रसिद्ध हैं । वि. सं. १९६९ आसोज वदि १० को संत देवादासजी घाटड़ा में ही ब्रह्मलीन हुए थे । देवादासजी के स्मारक चरण चिन्ह समाधि के तिवारे की एक ताक में हैं । उक्त सं. चरणों पर अंकित है । अभी भी उनके ऊपर जनता श्रद्धा रखती है । दो नागे साधु अलवर राज्य की पर्वतमाला से घाटड़ा जा रहे थे । एक दिन पहाड़ी के मार्ग में उनके सामने सिंह आ गया और मार्ग रोककर खड़ा हो गया ।
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साधुओं ने भयभीत होकर देवादासजी महाराज का स्मरण करके प्रार्थना की कि -- हे देवादासजी महाराज ! इस सिंह से बचाइये । प्रार्थना करते ही तत्काल वह सिंह जैसे कान पकड़ कर हटाया गया हो वैसे हट गया । मार्ग छोड़कर पर्वत पर चढ़ गया । कहा भी है -
‘‘दूर देश से भी भले, रक्षा भक्त करन्त ।
देवादास के नाम से, हटा सु सिंह तुरन्त ॥३६१॥ ह. त.६’’
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*महन्त लच्छीरामजी*
घाटड़ा के महन्त लच्छीरामजी अच्छे विद्वान् संत थे । शांत स्वभाव के थे । मेरा राम भी एक समय ग्रीष्म ऋतु में महन्त लच्छीरामजी के पास घाटड़ा में रहा था । वे अच्छे महन्त थे । एक दिन अलवर नरेश जयसिंह जी प्रहलादशाल व महन्तजी के दर्शन करने बिना सूचना दिये ही अकस्मात आ गये थे । उस समय द्वार के गोखड़े पर बैठे हुये देवादासजी ‘‘देव तुम्हारा भेव न जाने’’ बोल रहे थे । राजा ने स्वयं ही उनसे पूछा - महन्तजी कहां हैं ? देवादासजी ने कहा - यहां ही हैं, भीतर ही नारड़े नाथ रहे हैं । फिर आगे जाकर राजा ने आसन पर विराजे हुये महन्तजी के दर्शन किये । प्रणाम करके सामने बैठ गये ।
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फिर बोले महाराज आप के द्वार के गोखड़े पर एक कौपीन मात्र लगाये हुये साधु बैठा था । उससे मैंने पूछा - महन्तजी कहां हैं ? तब उस साधु ने कहा - यहां ही हैं, भीतर ही नारड़े नाथ रहे हैं । किन्तु आप तो आसन पर विराज रहे हैं । साधु को अपने पूज्य महन्त की झूठी बुराई तो नहीं करनी चाहिये । राजा का उक्त वचन सुनकर महन्त लच्छीरामजी ने कुछ मौन के पश्चात् कहा -- वे उच्च कोटि के संत हैं, दूसरे के मन की बात जान जाते हैं । उन्होंने झूठी बुराई नहीं करी है, सत्य ही कहा है -- मेरे मन में अभी यही बात थी कि नारड़े बहुत उपद्रव करने लग गये हैं । अतः इनके नाथ डालनी ही पड़ेगी । उन्होंने मेरी मन की उक्त बात जानकर ही आप को कहा है । वह सत्य है मिथ्या नहीं है ।
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राजा यह सुनकर देवादासजी से अति प्रभावित हुआ । फिर महन्त जी ने राजा को उचित उपदेश दिया । राजा ने देखा संतों के गायें बहुत हैं, अतः इनके पास गोचर भूमि भी बहुत होनी ही चाहिये । फिर अलवर नरेश जयसिंहजी ने बहुत सी गोचर भूमि का पट्टा करके महन्तजी के पास भेज दिया । महन्त लच्छीरामजी घाटड़ा में ही ब्रह्मलीन हुये थे । उनकी चरण चौकी में वि . सं . १९९१ फागुण सुदि ८ मी अंकित है ।
(क्रमशः)














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