*🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏*
*🌷卐 सत्यराम सा 卐🌷*
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*२८. साधु असाधु परीक्षा का अंग ~५/८*
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*आकार भार दौन्यों द्रसहिं, कंकर पुन: कपूर ।*
*उभय चढे आकाश दिशि, उभय मधि धूर ॥५॥*
ककंर तथा कपूर में आकार और भार दोनों ही दिखाई देते हैं किन्तु कपूर का तो आकार-भार आकाश में चढ़ता है और ककंर का पृथ्वी में मिल कर धूलि हो जाता है, वैसे ही साधु का आत्मा ब्रह्म में लय हो जाता है, असाधु का आकार-भार संसार में रहता है ।
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*आभे१ अवनि२ सु देखिये, त्यों साधु संसार ।*
*एक समाये शून्य में, एक रहै आकार ॥६॥*
जैसे बादल१ और पृथ्वी२ का आकार दिखाई देता है, वैसे ही साधु और सांसारिक असाधु प्राणी का आकार दिखाई देता है, किन्तु जैसे बादल का आकार आकाश में मिल जाता है, वैसे ही साधु ब्रह्म में मिल जाता है और जैसे आकार बना रहता है, वैसे ही असाधु का संसार बना रहता है ।
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*पाणी अरु पाषाण के, पर्वत पृथ्वी माँहिं ।*
*एक समाये सूर में, इक अवनि सु छाडे नाँहिं ॥७॥*
पृथ्वी में बर्फ और पत्थर दोनों ही प्रकार के पर्वत हैं किन्तु बर्फ के पर्वत तो सूर्य में समा जाते हैं, अर्थात गलकर किरणों द्वारा ऊँचे चढ़ जाते हैं, किन्तु पत्थर के पृथ्वी को नहीं छोड़ते, वैसे ही संत तो ब्रह्म में मिल जाते हैं किन्तु असंत संसार को नहीं छोड़ते ।
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*रज्जब पानी पृथ्वी पर पड़या, पृथ्वी पानी माँहिं ।*
*ज्यों सलिल समाना शून्य में, त्यों अवनि आकाश न जाँहिं ॥८॥*
जल पृथ्वी पर पड़ा है और पृथ्वी जल में है, किन्तु जैसे जल आकाश में चला जाता है, वैसे ही पृथ्वी आकाश में नहीं जाती, वैसे ही संत-असंतों के शरीर भी परस्पर मिले रहते हैं, किन्तु संत तो ब्रह्म में लय हो जाते हैं असंत नहीं होते ।
(क्रमशः)


















