🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷*卐 श्री दादूदयालवे नम: 卐*🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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*श्रम न आवै जीव को, अनकिया सब होइ ।*
*दादू मारग महर का, बिरला बूझै कोइ ॥*
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*अथ अध्याय ६*
*= युगलबाईजी थांभा =*
खालसे में तीसरा और चौथा थांबा युगलबाईजी का है । ईश्वर की प्रेरणा से दादूजी द्वारा दिए गये लवंग एवं काली मिर्च प्रसाद से वि. सं. १६३६ श्रावण शुक्ला द्वितीया को युगल{एक साथ दो} बाइयों का जन्म दामोदर व्यास की पत्नि उमा के गर्भ से हुआ था, इससे उनकी संज्ञा युगल बाई प्रसिद्ध थी । वैसे उनके नाम सभाकुमारी और रूप- कुमारी थे । आगे चल कर उनको संतगण रामकुमारी, श्यामकुमारी नामों से बोलते थे ।
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लवंग फल स्वरूप में द्विज नारी ने प्राप्त कर गर्भ धारण किया और समय पाकर क्रमशः गरीब व मसकीन नामक बालकों को जन्म दिया, फिर एक-दो वर्ष के अन्तराल के बाद काली मिर्च प्रसाद- प्रभाव से नौवें मांस युगल कन्याऔं को जन्म दिया । गुरुदेव की कृपा से द्विज दामोदर के घर सुन्दर चार सन्ताने खेलने लगी । संत-प्रसाद पाकर उसके आनन्द का वारपार नहीं था ।
अविगत अगोचर परमेश्वर की लीला कौन जान सकता है? उसके गुणों का व्याख्यान कौन कर सकता है? जब साधारण बाजीगर की लीला कोई नहीं समझ सकता, तो फिर श्री हरि जैसे जगत् को नचाने वाले महान् बाजीगर की माया साधारण जन भला कैसे जान सकता है । जैसे ब्रह्मा की मानसिक संकल्प शक्ति से सनकादिक उत्पन्न हु ए। वैसे ही दादूजी महाराज के (वरदान) प्रसाद से विप्र कन्या उमा ने चार सन्ताने गरीबदास, मस्कीन दास, रामा और श्यामा बाईयां वरदान स्वरूप प्रगट हुए। विक्रम समवत् १६३२ में गरीब दास और १६३४ में मस्कीन दास, १६३६ में दोनों युगल कन्यायें(रामाकुमारी व श्यामा कुमारी) ने जन्म लिया ।
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भगवत स्वरूप दादू जी महाराज द्वारा देव कुसुम (लवंग) प्रसाद व वरदान पाकर द्विज सेवक दामोदर एवं उमा अत्यन्न हर्षित रहने लगे । उक्त चारों सन्तान हरि आज्ञा से दादू जी के वर देने पर महा योगेश्वर दादू जी की इच्छा मात्र से हुई थी । कैसे? जैसे ब्रह्मा ने सनकादि आदि की सृष्टि मन की इच्छा मात्र से ही मानस सृष्टि की थी और विश्वामित्र ने अपनी इच्छा से तपो बल द्वारा सृष्टि रची थी ।
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एक हजार कन्याओं के सहित अद्भूत विमान को कर्दम ने मानसी सृष्टि तपोबल से ही की थी । वसिष्ठ ने नभ में मानसी सृष्टि रूप कुटिया तपो बल से ही रचि थी । मत्सेन्द्रनाथ जी ने गोरक्षनाथ की उत्पत्ति तपो बल से मनके द्वारा ही की थी । युवनाश्व के पेट से मानधाता का जन्म इतिहास में अति प्रसिद्ध है । महाभारत वनप. १२६, २७, २८ । वैसे ही दादू जी ने भी भगवत् आज्ञा से उक्त चार व्यक्ति योग रूप तपोबल से ही उत्पन्न किये थे ।
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योगियों में यह सामर्थ्य हो इसमें तो कहना ही क्या है ? राक्षस भी अपनी मायिक सृष्टि रच देतें हैं । द्रोपदी और धृष्टद्युम्न भी बिना बिन्दु के ही उत्पन्न हुये थे । वे मायिक भी नहीं थे । मत्सेन्द्रनाथ भी योग बल से मत्स्य से मानव बने थे । यह इतिहास पुराणादि में प्रसिद्ध है । ईश्वर की तथा ब्रह्मरूप संतों की शक्ति विचित्र होती है । उनके लिए ऐसी बात असम्भव नहीं है ।
(क्रमशः)


















