सोमवार, 27 अप्रैल 2026

२४. अथ सांख्य ज्ञान कौ अंग १/४

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२४. अथ सांख्य ज्ञान कौ अंग १/४
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सुन्दर सांख्य बिचार करि, संमुझै अपनौ रूप । 
नहिंतर जड के संग तें, बूडत है भव कूप ॥१॥
श्रीसुन्दरदासजी महाराज कहते हैं - साङ्ख्यशास्त्र के अनुसार चिन्तन मनन द्वारा भी आत्मस्वरूप पर विचार करना चाहिये । अन्यथा(नहिंतर) इस अल्पमति जिज्ञासु को, अन्य शास्त्रों के ज्ञाताओं की मूर्खतापूर्ण बातों के जञ्जाल में फँसने से, जन्म मरणपरम्परा से कथमपि मुक्ति नहीं मिलेगी ओर वह उसी में डूबता उतराता रह जायगा ॥१॥
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माया कै गुन जड सबै, आतम चेतनि जानि । 
सुन्दर सांख्य बिचार करि, भिन्न भिन्न पहिचानि ॥२॥
साङ्ख्यशाख के अनुसार, केवल आत्मा ही चेतन है । शेष सभी गुण, प्रकृति से उत्पन्न होने के कारण, जड(अचेतन) कहलाते हैं । साङ्ख्यशास्त्र का स्वाध्याय करते हुए इन सब को पृथक् पृथक् रूप से समझ(पहचान) लेना चाहिये ॥२॥
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पंच तत्व कौ देह जड, सब गुन मिलि चौबीस । 
सुन्दर चेतनि आतमा, ताहि मिलै पच्चीस ॥३॥
पाँच तत्त्वों से उत्पन्न यह शरीर अचेतन है । इसके उत्पादक गुण, सब मिल कर चौबीस(२४) होते हैं । यदि इन में चेतन आत्मा को भी मिला दिया जाय तो ये ही संख्या में पच्चीस(२५) हो जाते हैं ॥३॥
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छब्बीसवौं सु ब्रह्म है, सुन्दर साक्षी भूत ।
यौं परमातम आतमा, यथा बाप तें पूत ॥४॥
इस उपर्युक्त संख्या में यदि ब्रह्म को भी मिला दिया जाय तो ये सब, सङ्ख्या में, छब्बीस(२६) हो जाते हैं । श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - यह साक्षी एवं परमात्मा कहलाता है । इस का(हमारी) आत्मा के साथ वही सम्बन्ध है जो लोक में किसी पिता का अपने पुत्र के साथ होता है ॥४॥
(क्रमशः) 

वोलै ऊबरिबौ हरि थारै

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*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*कहि कहि केते थाके दादू, सुणि सुणि कहु क्या लेइ ।*
*लौंण मिलै गलि पाणियां, ता सम चित यों देइ ॥*
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*शरणागति ॥*
वोलै ऊबरिबौ हरि थारै, कलि की बालि झकोला मारै ॥टेक॥
जप तप करणी दाहै बाली, अलगाँ हीं थै दीसै काली ।
दूधाधारी पवन अहारी, हरि बिन हुई बिगूचनि भारी ॥
नगिन अंगीठी बारहमासा, मोंनी करै मित्र की आसा ।
बनखँडि जाइ गुफा मैं बासा, तीरथ बरत न पूजै आसा ॥
तुम तजि “औरहि वोलै” जांहीं, सो बालि अछूता मेल्ह्या नांहीं ।
जहाँ जाव तहाँ वोलौ नांहीं, झींणी बालि झकोलै मांहीं ॥
वोलै राखि अमर ले कीधा, साषि कहैं ते सरणैं लीधा ।
बषनैं बूझ्या त्याँह समझायौ, ताकि तुम्हारै ओलै आयौ ॥१०३॥
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स्वामी मंगलदासजी ने “औरहि वोलै” का “और हिवालै” पदच्छेद करके “हिवालै” को हिमालय का वाचक माना है किन्तु इसका सही पदच्छेद ऊपर दिया गया है जिससे ही अर्थ की पूर्वापरसंगति पूर्णरूप से बैठती है । “जो तुम को छोड़कर अन्य के आश्रय में जाता है उसको विषय-वासना ने आज तक अपने प्रभाव से अस्पर्श नहीं छोड़ा है ।” अस्तु ।
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कलिकाल में “तामस बहुत रजोगुण थोरा । कलि प्रभाव बिरोध चहुँ ओरा ।” चारों ओर तामसगुण का साम्राज्य है । फलस्वरूप चारों ओर लड़ाई-झगड़े, वैर-विरोध का प्रभाव है । वैर-विरोध द्वैत बुद्धि के कारण होता है । द्वैत बुद्धि अज्ञान के कारण होती है । अज्ञान = अविद्या = माया = भ्रम = तत् में अतत् का बोध ही विषय-वासना में प्रवृत्ति का कारण है ।
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“क्रोध कि द्वैत बुद्धि बिनु, द्वैत कि बिनु अज्ञान । मायाबस परिच्छिन्न जड़, जीव कि ईस समान ।” यहाँ इस अज्ञानजन्य विषय-वासना को ही हरि का आश्रय ग्रहण करने में सबसे बड़ी बाधा बताया गया है । बषनांजी कहते हैं, कलियुग में प्रभावशाली विषयवासना मन को चंचल करके मानव को नरकगामी बनाती है किन्तु हे हरि ! इसके दुष्चक्र से उबरने का साधन एकमात्र आपका अनन्य आश्रय ही है ।
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जप, तप, निष्कामकर्म आदि सभी को यह विषयवासना दग्ध कर देती है । यह प्रत्यक्षतः काली = दुर्गा जैसी भयानक है जो जप, तप पुण्यादि को तत्काल समाप्त कर देती है । जो दूध का आहार करते हैं, पवन का आहार करते हैं, उनकी भी बर्बादी बिना हरि का आश्रय लेने के कारण होती है क्योंकि उन पर यह अपना साम्राज्य स्थापित कर लेने में सफल हो जाती है ।
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जो बारहों मास नग्न रहकर तपस्या करते हैं उनके लिये अंगीठी ही विषय-वासना का रूप है । जो मौंन की साधना करते हैं उनके लिये मित्र की आवश्यकता ही विषय-वासना का रूप है । क्योंकि मौंनी को अपनी बात बताने के लिये किसी न किसी सहायक मित्र की आवश्यकता ही पड़ती ही है । जो जंगल में जाकर गुफा में निवास करके, तीर्थ, व्रत करके परमात्म-प्राप्ति की आशा करते हैं, उनकी वह आशा पूजै = पूर्ण = सफल नहीं होती है ।
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हे परमात्मन् ! जो आपका आश्रय छोड़कर अन्य का सहारा लेते हैं उन्हें यह विषयवासना अछूता छोड़ती नहीं है । अर्थात् उन्हें अपने प्रभाव में ले ही लेती है । जहाँ भी जाओ वहाँ पर ही आपके अतिरिक्त अन्य और कोई दूसरा आश्रय नहीं है क्योंकि सर्वत्र ही इस सूक्ष्म विषयवासना की गति होने से यह सभी स्थानों पर विचलन = मन में हलचल पैदा कर देती है ।
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वे लोग इस बात की साक्षी भरते हैं जिन्हें हे हरि आपने अपनी शरण में ले लिया; जिन्हें अपनी अभय बाँह प्रदान कर दी । क्योंकि उन्हें आपने अपनी शरणावलंबन प्रदान करके जन्म-मरण के चक्र से छुड़ाकर अमर कर दिया । मैं बषनां ने भी उनसे जाकर पूछा । उन्होंने मुझे आपकी शरणागतवत्सलता का रहस्य समझाया । ताकि = उस रहस्य को जानकर ही मैं आपके आश्रय में आया हूँ ॥१०३॥

*१०. विरह का अंग~ ९/१२*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*१०. विरह का अंग~ ९/१२*
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*विरही बालक गूंग पशु, काहि कहै दुख सुक्ख ।*
*रज्जब मन की मन रही, लहै न मारग मुक्ख ॥९॥*
विरही, नवजात बालक, गूंगा और पशु अपना दुख: सुख किसको कहते हैं ? इनके मन की व्यथा मन में ही रहती है जब तक ब्रह्म-ज्ञान रूप मुख्य मार्ग नहीं प्राप्त होता तब तक विरह का दुख: समाप्त नहीं होता ।
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*अंतर ही अंतर घणा, बिच ही बीच अपार ।*
*माँहीं माँहिं न मिल सकूं, दीरघ दुख करतार ॥१०॥*
मेरे अन्त:करण के मध्य ही साक्षी रूप से मेरे प्रियतम रहते हैं किन्तु फिर भी उनमें और मेरे में बहुत भेद है वे विश्वकर्त्ता व्यापक हैं, अत: मैं उनके बीच में ही व्यापक रूप से रहता हूँ किन्तु फिर भी उनके और मेरे मिलन में अज्ञान रूप अपार व्यवधान पड़ रहा है । वे मेरे में हैं, मैं उनमें हूँ, इस प्रकार ओत-प्रोत होने पर भी उनका साक्षात्कार नहीं होता इसी से महान दुख: हो रहा है ।
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*रज्जब चखि१ चुख२ चिहुर३ की, नैनहुँ काढे नीर ।*
*सांई सुरति सुमेरु सम, सु नैनहुँ अटके वीर४ ॥११॥*
नेत्र१ की पलक के भीतर के छोटे छोटे परबालों३ की चुभन२ नेत्रों से जल निकालती है किन्तु हे भाई४ ! प्रियतम प्रभु की वियोगाकार वृत्ति तो सुमेरू के समान विशाल होने पर भी वह जल नेत्रों में ही अटक जाता है अर्थात प्रभु वियोग का दु:ख तो बहुत होता है किन्तु नेत्रों अश्रु नहीं गिरते, कारण- विरहाग्नि से भीतर ही जल जाते हैं ।
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*रज्जब बारह बाहिरा१, विरह तेरहाँ मेघ ।*
*वहिं२ सौ तिन३ कन४ जन५ सुवहिं६, करै कौन कहु सेघ७ ॥१२॥*
बाहिर१ के बारह मास के बारह सूर्य और तेरहवाँ बादल इन२ से ही घासादि तृण३ और अन्न४ उत्पन्न होते हैं, वैसे ही विरह द्वारा श्रेष्ठ भक्त होते हैं । विरह६ उत्पन्न होने पर भक्त५, भगवद् से भिन्न किस से संबन्ध७ करता है ? जिसका संबन्ध परब्रह्म को छोड़ अन्य से नहीं होता वही श्रेष्ठ भक्त कहलाता है और ऐसा भक्त विरह उत्पन्न होने से ही होता है ।
(क्रमशः)

नाममाहात्म्य

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*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*राम भजन का सोच क्या, करता होइ सो होइ ।*
*दादू राम संभालिये, फिर बुझिये न कोइ ॥*
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*राग टोड़ी ॥७॥ नाममाहात्म्य ॥*
जोषीला सब जोईला, कोइ नाँव समानि न होईला ॥टेक॥
अठसठि तीरथ बेद पुराणा, तुलै नहीं कोइ नाँउ समाना ।
नेम धरम सब जप तप भैला । नाँव समानि कोइ हुवा न व्हैला ॥
दान पुंनि करि तुला बईठा, नाँव समानि कोइ तुलत न दीठा ॥
नीखँड पिरथी जोषी जोई, बषनां नहीं बराबरि होई ॥१०२॥
जोषीला = हे साधकों ! (जोषीला ‘जोशी’= ब्राह्मण का वाचक भी अर्थ किया जा सकता है । वस्तुतः यहाँ “जोषीला” शब्द ‘जोशी’ के लिये अश्रद्धास्पद भाव से आया है । जैसे ‘जोगी’ को ‘जोगीड़ा’ कहने में अश्रद्धा का भाव दर्शित हुआ करता है ।) हमने सब को तौल लिया है, देख डाला है, पढ़ डाला है, सुन लिया है; भगवन्नाम के बराबर अन्य दूसरा कोई भी भगवत्प्राप्ति का सरल, सुगम, निरापद व बिना लागत ही सध जाने वाला साधन नहीं हो सकता है ।
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अड़सठ तीर्थों में जाकर स्नान करने से अर्जित पुण्य, वेद-पुराणादि का स्वाध्याय, श्रवण; कोई भी भगवन्नाम के बराबर तौलने पर तुल नहीं पाते हैं । नियम, धर्म = पुण्य, सकाम-जप, तप सभी भेला = मिलकर आज तक न तो भगवन्नाम के बराबर हुए हैं और न भविष्य में होंगे ही । पण्ढरपुर में एक दानवीर श्रेष्ठिवर्य अपरिमित दान पुण्य करके तुला के एक पलड़े में यह कहकर बैठा कि यदि मैंने अपरिमित मात्रा में दान पुण्य किया है तो मेरा पलड़ा तुलसी पर लिखे राम-नाम युक्त एक पत्ते से भारी हो जाए किन्तु उस एक पत्ते पर लिखे राम-नाम के बराबर उस दान-पुण्य को तुलते हुए नहीं देखा गया । अर्थात् नाम का पलड़ा ही भारी रहा ।
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कार्तिकेयस्वामी नौखंड पृथिवी नाप कर = घूमकर आये जबकि गणेश कहीं पर भी न जाकर माता-पिता के समक्ष राम शब्द पृथिवी पर लिखकर उसी की परिक्रमा करके आ गये जिससे गणेश को ही जीता हुआ मान लिया गया । क्योंकि नवखंडात्मक पूरी पृथिवी राम-नाम में समाहित है और गणेशजी ने रामनाम की परिक्रमा करके नवखंडात्मक पृथिवी की परिक्रमा एक क्षण मात्र में कर ली । अथवा बषनां कहता है, जोषी, जोई = पूरी नवखंडात्मक पृथिवी को तौल व देख डाल किन्तु नाम के बराबर वह भी नहीं हो सकेगी । राम नाम इससे भी बड़ा महान्, प्रभावशाली है ॥१०२॥

२३. स्वरूप विस्मरण को अंग ४८/५०

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२३. स्वरूप विस्मरण को अंग ४८/५०
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बुद्धि हीन अति बावरौ, देह रूप ह्वै जाइ । 
सुन्दर चेतनता गई, जडता रही समाइ ॥४८॥
देहाभिमानी आत्मा का देह यदि मूर्ख है या पागल है तो वह आत्मा स्वयं को भी मूर्ख एवं पागल मानने लगता है । ऐसी स्थिति में यही समझना चाहिये कि उस आत्मा का स्वरूप(चेतनता) नष्ट हो गया है तथा देह की जडता उस को आवृत कर चुकी है ॥४८॥
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स्याणौ घर मांहे कहै, हूं अपने घर जांउं । 
सुन्दर भ्रम ऐसौ भयौ, भूलौ अपनौ ठांउं ॥४९॥
यदि कोई उन्मत्त पुरुष, घर में बैठा हुआ भी कहे कि मैं घर जाना चाहता हूँ, यह बात तो समझ में आने योग्य है; परन्तु आश्चर्य तब होता है जब कोई सयाना(सावधान) पुरुष भी यही कहे । आज भ्रमात्मक स्थिति के कारण आत्मा की यही दशा हो गयी है कि वह स्वस्थिति को ही भूल गया है ! ॥४९॥
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रवि रवि कौं ढूंढत फिरै, चंद हि ढूंढै चंद । 
सुन्दर हूवो जीव सौं, आप इहै गोबिंद ॥५०॥
इति स्वरूप विस्मरण कौ अंग ॥२३॥
लोक में यहीं देखा जाता है कि प्रत्येक प्राणी अपने समानस्थितिक(समानधर्मा) को ही खोजता है । सूर्य सूर्य जैसे तेजस्वी को ही खोजता है तो चन्द्रमा अपने जैसे शीतल को ही खोजता है । इसी प्रकार आत्मा को अपने समानधर्मा ब्रह्म की ही खोज करनी चाहिये, तब वह गोविन्दस्वरूप(ईश्वर = ब्रह्म) हो पायगा ॥५०॥
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इति स्वरूपविस्मरण का अंग सम्पन्न ॥२३॥
(क्रमशः) 

रविवार, 26 अप्रैल 2026

रामजी आगे दोइ करि जोड़ि

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*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*दादू निमिष न न्यारा कीजिये, अंतर थैं उर नाम ।*
*कोटि पतित पावन भये, केवल कहतां राम ॥*
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*उपदेश ॥*
*रामजी आगे दोइ करि जोड़ि ।*
और आगै जोड़ैगा तौ याही मोटी खोड़ि ॥टेक॥
रामजी रामजी रसना भाखि । राम रजा सिर ऊपर राखि ॥
आन कौं सीस नवावैगा । तौ पति कौ ब्रत लजावैगा ॥
भूखाँ धायाँ करि इकतार । मति छोड़ै मोटै दरबार ॥
सेवा सेव्यां भला जु व्हैलौ । कबइक साम्हाँ जोवैलौ ।
सेवा छाड़ि न भाजैलौ । तो बषनां राम निवाजैलौ ॥१०१॥
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हे आत्मकल्याणार्थी ! मात्र परात्पर-परब्रह्म-परमात्मा रूप रामजी के आगे ही हाथ जोड़ना = दीन बनकर करुण प्रार्थना करना । यदि तू रामजी के अतिरिक्त अन्य देवी-देव, राजा-प्रजा आदि के समक्ष दीनता प्रदर्शित करेगा तो यही तेरे जीवन की सबसे बड़ी गलती होगी । तेरे द्वारा होने वाली सबसे बड़ी कृतघ्नता होगी, परब्रह्म-परमात्मा के प्रति ।
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अतः रामजी की रजा = राजी = आज्ञा को सर्वोपरि मानकर सदैव रसना से राम नाम का उच्चारण कर ।
“सततं कीर्तयन्तो माम् ये जना पर्युपासते ।
तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम् ॥”
रामजी को छोड़कर यदि अन्य की शरण का आश्रय लेगा तो तेरा पातिव्रतधर्म लज्जित हो जायेगा । तू व्यभिचारी कहलाने लगेगा । चाहे जैसी भी परिस्थितियाँ प्राप्त हों, चाहे सुख की स्थिति हो चाहे दुःख की स्थिति हो; सभी में समभाव रखकर परमात्मा राम में पूर्ण विश्वास रख ।
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उस परात्पर-परब्रह्म की शरण का आश्रय कथमपि मत छोड़ । परात्पर-परमात्मा की सेवा करने से हमेशा कल्याण ही होगा । क्योंकि परमात्मा की भक्ति का कभी भी नाश नहीं होता ।
“नेहाभिक्रमानाशोऽस्ति प्रत्यवायो न विद्यते ।
स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात् ॥”
कभी न कभी तो उसको तू प्रत्यक्ष देखेगा ही । तुझे इस जन्म में नहीं तो अगले जन्म में तो अवश्य ही साक्षात्कार हो जायेगा ॥१०१॥ 

२३. स्वरूप विस्मरण को अंग ४५/४७

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२३. स्वरूप विस्मरण को अंग ४५/४७
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देह आपकौ जानि करि, ब्राह्मन क्षत्रिय होइ । 
वैश्य सूद्र सुन्दर भयौ, अपनी सुधि बुधि खोइ ॥४५॥ 
वह आत्मा देहाभिमान करता हुआ, अपनी सुध बुध खो कर, कभी अपने को ब्राह्मण कहता है और कभी क्षत्रिय । वही कभी अपने आप को वैश्य तो कभी शूद्र मानने लगता है ॥४५॥
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देह पुष्ट ह्वै दूबरी, लगै देह कौं घाव । 
चेतनि मांनै आपु कौं, सुन्दर कौंन सुभाव ॥४६॥
देहाभिमानी उस आत्मा की देह कभी किसी कारण से पुष्ट हो जाती है, या कभी दुर्बल । कभी उस देह को किसी कारण से कोई आघात लग जाता है । वह चेतन आत्मा, देहाभिमान के कारण, देह के इस उतार चढाव(हानि या वृद्धि) को अपना मान बैठता है ॥४६॥
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देह बाल अरु बृद्ध ह्वै, जोबनि ह्वै पुनि देह । 
सुन्दर मानैं आपु कौं, देखहु अचिरज येह ॥४७॥
बाल्यावस्था, वृद्धावस्था या युवावस्था स्वभावतः देह में आती रहती है । वह देहाभिमानी आत्मा इन अवस्थाओं को अपने में मानने लगता है । यही आश्चर्य की बात है ! ॥४७॥
(क्रमशः)

खालिक यूँ न खुसी होइ ।

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*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*आये एकंकार सब, साँई दिये पठाइ ।*
*आदि अंत सब एक है, दादू सहज समाइ ॥*
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*उपदेश ॥*
खालिक यूँ न खुसी होइ ।
इन पंचौं को फैलाइ देकरि, इहि नींदड़ी न सोइ ॥टेक॥
मांहैं मुहकम मीयां मिसमिला, औरैं करद न लाइ ।
हसेब हासिल कवल करदाँ, ज्वाब देणाँ जाइ ॥
बोलते का बरण कैसा, चालि तूँ चलि जाइ ।
सब जोति उसकी जुल्म न कीजै, साहिब सही रिसाइ ॥
दूइ दरोगाँ गुसा हरामा, दूरि करि यहु ज्ञाना ।
अजाब अंति बिसियार व्हैगा, मानि मूसलमाना ॥
तरस तोबा कौफ करणाँ, हरदम नाँव् हजूरि ।
 
खालिक = परमात्मा । खलक = जगत् । पंचौं = शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध । मुहकम = शत्रु, काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मात्सर्यादि । मींया = मन । मिसमिला = बिस्मिल्लाह = शुरुआत । करद = छुरी । हसेब = हिसाब । कवल = कौल = करार = प्रतिज्ञा “गरभ कौल काठा किया, जीव दान दे मुज्झ । आठ पहर चौसठ घड़ी, साँई सुमरूँ तुज्झ ॥“ हासिल = बसूल करेगा; करेगा । दुइ = द्वैत । गुसा = क्रोध । हरामा = हराम हैं, नहीं करना चाहिये क्योंकि करना बुरा है । दरोगाँ = असत्य, झूठ । तरस = दया । तोबा = पश्चाताप । कौफ = डर । हजूरि = उपस्थित, संलग्न । बिसियार = प्रचुर मात्रा में । अजाब = शोक, दुःख (?)। 
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बषनांजी मुसलमानों के मिस समस्त उन मनुष्यों को समझाते हैं जो दुराचरण, दुर्गुणों के शिकंजों में फँसे हुए हैं । वे कहते हैं, हे मनुष्य ! परमात्मा उस आचरण से प्रसन्न नहीं होता, जैसा तू कर रहा है । अतः पंच विषयों में अपने आपको, फैलाई देकरि = आकंठ डुबोकर अज्ञान रूपी निद्रा में निश्चिंत होकर मत सो । तू  भीतरी मुहकम = रूप, रस, गंध, स्पर्श और शब्दात्मक पंचविषयों को प्राप्त करने के लिये औरौं की गर्दन पर छुरी मत चला, औरौं का अहित मत कर । 
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मैं कहता हूँ कि तू अन्यों को मत मार अपितु स्वयं के भीतर ही विद्यमान काम, क्रोधादि अनेक शत्रुओं को मार । तूने जन्म लेने के पूर्व माता के गर्भ में परमपिता परमेश्वर से उसका भजन करने की प्रतिज्ञा की थी किन्तु संसार में आकर तू उस प्रतिज्ञा को भूल गया तथा करदाँ = छुरी से जीवों का कत्ल करने लग गया । परमात्मा इन सभी का हिसाब लेगा । अथवा मरने वाला जीव अगले जन्म में मारक बनकर तुझको मारकर हिसाब चुकता करेगा । धर्मराज के यहाँ प्रत्येक कृत्य का हिसाब देना पड़ता है ।
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शरीर में जो बोलने, चलने वाली आत्मा है उसका वर्ण कौनसा है ?” 
“रूप बरण कैसौ तड़का कौ । असौ कहा बखाणौं जाकौ ॥” (एक हाथ से दूसरे हाथ पर चोट करने को तड़का मारना कहा जाता है । स्वामी रामचरण कहते हैं, तड़के का न रूप है और न वर्ण है । उस जैसा और है भी क्या कि जिसकी उपमा दी जाये । वस्तुतः आत्मा, ब्रह्म रूप, वर्ण, लिंग, वचन सभी से अतीत है । उसे इदमित्थं कह पाना असंभव है । 
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“राम अतर्क्य बुद्धि मन बानी ॥ 
मत हमार अस सुनहूँ सयानी । 
धर्मराज के यहाँ प्रत्येक कृत्य का हिसाब देना पड़ता है ।”  
“राम अगोचर बुद्धि मन, अविगत अकथ अपार । 
नेति नेति नित निगम कह ॥”  
“इदमित्थं कहि जाइ न सोई ॥”  मानस ॥) 
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अर्थात् उसका कोई भी वर्ण = जाति नहीं है । वह तो लिंग व वर्ण से अतीत है । फिर क्यों ऊपरी शरीर के कारण भेद मानकर अन्यों को मारता है । अरे ! एक दिन तुझे भी तो चले जाना है । जितने भी जीव संसार में हैं, वे सभी उसी एक परमात्मा की ज्योति हैं । अतः उन पर जुल्म मत कर ।  उन्हें सता भी मत तो मार भी मत । यदि तू मारेगा तो निश्चय ही परमात्मा तेरे ऊपर नाराज होगा । द्वैत भ्रम है(दुइ दरोगाँ) “द्वितीयाद्वै भयं भवति ।” गुस्सा करना हराम है । इनको दूर करना ही ज्ञान है । 
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अतः इन्हें तत्काल दूर कर दे । हे मुसलमान ! हे मोमिन ! हे पवित्रात्मा ! यदि तू उक्त बातों को नहीं मानेगा तो अंत में तुझे बेजा अजार = दुःख उठाने पड़ेंगे । तरस = दया, तौबा = पश्चाताप (गलती होने पर गल्ती का अहसास करके भविष्य में पुनः न करने का दृढ संकल्प), कौफ = डर (परमात्मा से सदा डर कर रहना कि वह अनंत आंखों वाला है । 
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मैं जो जैसा भी जहाँ-कहाँ करता हूँ, उन सभी को वह देखता है तथा अंत में उन सभी का मुझे वह फल देगा । “दो बातन कौं भूल मति, जो चाहै कल्याण । ‘नारायन’ इक मौत कौ दूजै श्री भगवान ॥” इनको करना चाहिये । साथ ही हरदम भगवन्नाम जप में संलग्न रहना चाहिये । जो मेरे द्वारा बताये गये उक्त विचारों के अनुसार आचरण करते हैं उनसे बषनां कहता है कि उनसे परमात्मा बिल्कुल भी दूर नहीं है । अर्थात् परमात्मा उनमें ही निवास करता है  ॥१००॥ 

शुक्रवार, 24 अप्रैल 2026

२३. स्वरूप विस्मरण को अंग ४१/४४

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२३. स्वरूप विस्मरण को अंग ४१/४४
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सुन्दर वाकी सुधि गई, जाकैं लागी बाइ । 
कहै और की और ई, जो भावै सो खाइ ॥४१॥
ज्वर रोग की वाताधिक सन्निपात अवस्था में रोगी अपनी शुद्ध स्मृति खो बैठता है । उस अवस्था में वह प्रलापयुक्त मिथ्या बातें बोलने लगता है । तथा सर्वाहारी(निषिद्ध भोजन खाने वाला) भी बन जाता है ॥४१॥
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काहू सौं बांभन कहै, काहू सौं चंडाल । 
सुन्दर ऐसौ भ्रम भयौ, यौं ही मारै गाल ॥४२॥
इस सन्निपात अवस्था में वह किसी को अपनी ब्राह्मण जाति बताता है तो किसी को चाण्डाल(अस्पृश्य शूद्र) । कहने का तात्पर्य यह है कि वह अपनी इस भ्रमात्मक दशा में अनर्गल प्रलाप करने लगता है ॥४२॥
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ज्यौं अमली की ऊंघतें, परी भूमि पर पाग । 
वह जानै यह और की, सुन्दर यौं भ्रम लाग ॥४३॥
किसी अमली(अफीमची) की, अफीम खाने के बाद, उस के शिर की पगड़ी भूमि पर गिर गयी तो उसने, नशे के अतिशय प्रभाव के कारण, उस पगड़ी को दूसरे के शिर से गिरी हुई पगड़ी समझ लिया। मस्तिष्क के भ्रान्त हो जाने पर, सब की यही स्थिति हो जाती है॥ ४३ ॥

जैसैं चिल्लीसेख हू, कियौ मनोरथ और । 
सुन्दर भूलौ आपु कौ, यौं हूवौ घर चौर ॥४४॥
जैसे कोई शेख चिल्ली(कल्पित मूर्ख) कुछ अन्य बात सोचता हुआ किसी अन्य के घर को अपना समझ कर, उसमें प्रविष्ट हो जाय तथा वहाँ चौर समझा जा कर पकड़ा जाय ! तो स्वस्थिति भूल जाने वाले को ऐसे ही परिणाम भोगने पड़ते हैं ॥४४॥
(क्रमशः)  

*१०. विरह का अंग~ ५/८*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*१०. विरह का अंग~ ५/८*
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*विरहनि बिहरे१ रैन दिन, बिन देखे दीदार ।*
*जन रज्जब जलती रहै, जाग्या विरह अपार ॥५॥*
विरहनी प्रियतम के दर्शन बिना चैन न पड़ने से रात-दिन इधर-उधर विचरती१ है । अपार विरह उत्पन्न हो जाने से विरह-व्यथा से जलती रहती है ।
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*रज्जब कहिये कौन सौं, इस विरहा की बात ।*
*मानहुँ रावण की चिता, अह निशि नहीं बुझात ॥६॥*
इस विरहाग्नि की बात किससे कहें, यह तो मानो रावण की चिता ही बन गई है, दिन-रात बुझती ही नहीं ।
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*विरहा पावक उर वसे, नख शिख जारे देह ।*
*रज्जब ऊपर रहम१ कर, वर्षहु मोहन मेह२ ॥७॥*
यह विरह रूप अग्नि हृदय में बसता है और नख से शिखा तक शरीर को जला रहा है । हे विरह-विमोहन परमात्मा रूप बादल२ मुझ पर अनुग्रह१ करके दर्शन रूप वर्षा कर इसे बुझाइये ।
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*विरहनी वसुधा की अगनि, ब्रह्म व्योम क्यों जाहि ।*
*रज्जब वर वर्षा बिना, उर धर क्यों सु सिराहि ॥८॥*
जैसे पृथ्वी के वन का अग्नि आकाश में जाकर जल से नहीं बुझता और न वर्षा बिना बुझता है । वैसे ही विरहनि के हृदय का अग्नि ब्रह्म के पास नहीं जा सकता और न किसी अन्य से बुझता है, वह ब्रह्मरूप स्वरूप का हृदय में दर्शन होने से ही बुझता है ।
(क्रमशः)

थारौ रे गुण गोबिंदा

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*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*दादू कहै- गरक रसातल जात है,*
*तुम बिन सब संसार ।*
*कर गहि कर्त्ता काढि ले, दे अवलम्बन आधार ॥*
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*विनती ॥*
थारौ रे गुण गोबिंदा, म्हारौ औगुणियौं कानि न कीजै ।
हौं तौ थाहरौ थाइ रह्यौ रे, मोनैं राम भगति दिढ़ दीजै रे ॥टेक॥
तुम्ह बिना डहकायौ थौ रे, थारै संगि न जागी रे ।
आगै ही चौरासी भरम्यौं, लखी न लागी रे ॥
भूलौ रे मैं भेद न जाण्यौं, ताहरी भगति न साधी रे ।
तूँ मिलिबा नैं रूड़ौ थौ, म्हारौ मन न मिल्यौ अपराधी रे ॥
तूँ समरथ मैं सरणैं आयौ, तूँ म्हारी पति राखी रे ।
बषनां सौं नींकै निरबहिये, मैं तुझ ऊपरि नाखी रे ॥९९॥

‘मैं अवगुण का पूतला, तुम गुणवन्ताँ राम । 
औगुण दिसी निहारियौ, तौ तीन लोक नहिं ठाम ॥” 
बषनांजी प्रथम पंक्ति में इस साषी में व्यक्त विचारों के सदृश ही विचार व्यक्त करते हुए कहते हैं, हे गोविन्द ! आपका गुण = स्वभाव है कि एक बार जिस भी जीव को अपना लेते हो, उसके द्वारा असंख्य अपराध करते रहने पर भी आप उसे त्यागते नहीं है । 
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जैसे रावण ने परस्त्री का हरण करके अशोक वाटिका में रखा वैसा ही कृत्य विभीषण ने अपनी भाभी मंदोदरी को अपनी पटरानी बनाकर किया किन्तु श्रीराम ने ऋषि-मुनियों द्वारा शिकायत करने के उपरान्त भी विभीषण को दंडित नहीं किया 
“सोइ करतूति विभीषण केरी । 
सपनेहु सो न राम हिय हेरी ॥” 
उल्टे उसके अपराध को अपने शिर पर ले लिया । 
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अतः मैं आपसे निवेदन करता हूँ कि मैं सर्वतोभावेन आपकी शरण का आश्रय ग्रहण करके आपका हो गया हूँ । मेरे अवगुणों को ध्यान में मत लाइये । मैं तो सर्वविध तेरा और मात्र तेरा ही हो गया हूँ । अतः मुझे अपनी दृढ़भक्ति = अनन्य भक्ति प्रदान कर जिससे कि मेरी चित्तवृत्ति सदैव तेरे में ही अनुरक्त हुई रहे । 
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हे प्रभो ! तेरी शरण का आश्रय न लेने के कारण मैं माया-मोह में डहकायौ = भ्रमित हो गया था । तेरा आश्रय न लेने से मैं जाग नही सका था । 
“मोह निसा सब सोवनिहार । 
देखिय सपन अनेक प्रकारा ॥” 
“या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी । 
यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशाः पश्यतो मुनेः ॥” 
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इस जन्म से पूर्व मैं चौरासी लाख योनियों में जन्म लेकर मरता रहा हूँ । उनमें से एक जन्म भी लेखे नहीं लगा = सफल नहीं हुआ । मैं तुझे सर्वथा भूल गया । सत्यानृत, नित्यानित्य तत्त्व का भेद मैं जान ही नहीं सका और तेरी भक्ति की साधना भी नहीं कर सका । वस्तुतः तू तो दर्शन देने के लिये, मुझसे मिलने के लिये आकुल-व्याकुल था किन्तु मेरा अपराधी मन तेरी ओर उन्मुख नहीं हुआ क्योंकि वह तो विषयभोगों ही को भोगने में निमग्न था । 
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“ये यथा मां प्रपध्यंते तांस्तथैव भजाम्यहं ।” 
हे परमात्मन् ! तू सर्व समर्थ है । अतः मैं तेरी शरण में आया हूँ । तू मेरी पत = लाज रख, मुझे शरण में रख ले । इसलिए मुझ बषनां का निर्वाह भली प्रकार कर क्योंकि मैंने मेरी सारी जिम्मेदारी तेरे ऊपर डाल दी है । जैसे बिल्ली का बच्चा बिल्ली पर पूर्ण भरोसा करके निश्चिंत रहता है वैसे ही मैं भी अब अपनी सारी जिम्मेदारी तुझे सौंप कर निश्चिंत हो गया हूँ ॥९९॥ 

गुरुवार, 23 अप्रैल 2026

२३. स्वरूप विस्मरण को अंग ३७/४०

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२३. स्वरूप विस्मरण को अंग ३७/४०
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कतहू भूलौ मौंनि धरि, कतहू करि बकवाद । 
सुन्दर या अभिमान तें, उपज्यौ बहुत बिषाद ॥३७॥
इस अभिमान के कारण ही कहीं वह मौन धारण कर लेता है, कहीं व्यर्थ प्रलाप(वितण्डावाद) करने लगता है । इस द्विविधामय स्थिति के कारण ही वह सङ्कटग्रस्त हो जाता है ॥३७॥
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सुन्दर यौं अभिमान करि, भूलि गयौ निज रूप । 
कबहूं बैठै छांहड़ी, कबहूं बैठै धूप ॥३८॥
इस प्रकार, यह आत्मा देहाभिमान के कारण स्वकीय रूप ही भूल गया है । तब यह कभी विषयभोगों की शीतल छाया में सुख मानता है तो कभी वह कठोर साधना धूप में बैठ कर ही सुख मानता है ॥३८॥
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सुन्दर ऐसौ भ्रम भयौ, छूटौ अपनौ भौंन । 
दिशा भूल जानै नहीं, पूरब पच्छिम कौंन ॥३९॥
उक्त देहाभिमान के कारण वह भ्रम के ऐसे प्रबल झंझावात(आंधी) में फंस गया कि वह अपना वास्तविक स्थान(भवन) ही भूल बैठा । इतना ही नहीं, वह उधर जाने की मार्गबोधक दिशाओं को भी भूल गया कि किधर पूर्व दिशा है ? या किधर पश्चिम दिशा ? ॥३९॥
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सुन्दर वाकी सुधि गई, जाकौं लाग्यौ भूत । 
काहू सौं बनिया कहै, काहू सौं रजपूत ॥४०॥
लोक में भी हम देखते हैं कि भूत प्रेत से आविष्ट पुरुष की संज्ञा(होश = ज्ञान) नष्ट हो जाया करती है । इसी कारण वह किसी के पूछने पर कभी स्वयं को बनिया(वैश्य) बताने लगता है तो किसी को राजपूत(क्षत्रिय) ॥४०॥
(क्रमशः) 

हरि आवै हो कब देखौं

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*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*दादू तो पीव पाइये, भावै प्रीति लगाइ ।*
*हेजैं हरि बुलाइये, मोहन मंदिर आइ ॥*
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*राग केदारौ ॥६॥ विरह ॥*
हरि आवै हो कब देखौं आंगण म्हारै ।
कोई सो दिन होइ रे जा दिन चरण धारै ॥टेक॥
सुंदर रूप तुम्हारौ देखौं नैनौं भरे ।
तन मन ऊपर वारौं नौछावरि करे ॥
तारा गिणताँ मोहि बिहावै रैंणि निरासी ।
बिहरणी बिलाप करै हरि दरसन की प्यासी ॥
बिण देखें तन तालाबेली कामणी करै ।
मेरौ मन मोहन बिन धीर न धरै ॥
बषनां बारम्बार हरि कौ मारग देखै । 
दीनदयाल दया करि आवो सोई दिन लेखै ॥९८॥
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मेरे आंगन रूपी हृदय में प्रियतम रूपी परात्पर-परब्रह्म-परमात्मा का कब तो प्राकट्य होगा और कब मैं उसे नैनों भर कर देखूंगी । ऐसा कौनसा दिन होगा जिस दिन मेरे आंगन में प्रियतम के चरण पड़ेंगे । वह दिन कौनसा होगा जिस दिन नयन भरकर मैं तुम्हारे अप्रतिम सुन्दर रूप को देख सकूंगी । वह दिन कौनसा होगा जिस दिन मैं पूर्ण समर्पण के साथ तन और मन तुम पर वार दूंगी, न्यौछावर कर दूंगी । 
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हे प्रियतम ! निराशा से पूर्ण तारों को गिनते-गिनते (समय-देखते-देखते कि अब प्रातःकाल हो और अब प्रियतम की स्मृति काम-काज में लग जाने से कम हो) ही पूरी रात्री व्यतीत हो जाती है । प्रियतम के दर्शनों की भूखी विरहनी विलाप करती है कि हे प्रियतम जल्दी मेरे घर में पधारो । कामिनी = प्रियतमा का बिना प्रियतम को देखे सारा ही शरीर व्याकुल है । हे मोहन प्रियतम ! मेरा मन बिना मोहन = तुम्हारे अब धीरज खोता जा रहा है, अधीर हुआ जा रहा है । 
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मैं बषनां विरही बारबार परात्पर-परब्रहम रूप प्रियतम के पधारने के मार्ग को देखता हूँ कि वह किस रास्ते से कब आ रहा है । अतः हे दीनों पर दया करने वाले दीनदयाल प्रियतम ! दया करके आप जिस दिन मेरे घर में पधार जाओगे, बस मेरा वही दिन लिखने योग्य होगा = गिनने से आयेगा, तदतिरिक्त सभी दिन व्यर्थ गये मानूंगा ॥९८॥ 

*१०. विरह का अंग~१/४*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*१०. विरह का अंग~१/४*
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गुरु संयोग वियोग अंग के अनन्तर वियोग और वियोगियों का परिचय देने के लिये विरह का अंग कह रहे हैं -
*कबहुँ सो दिन होयगा, पीव मिलेगा आय ।*
*रज्जब आनंद आतमा, त्रिविधि ताप तन जाय ॥१॥*
वह दिन कब उदय होगा ? जिस दिन परब्रह्मका साक्षात्कार होने से शरीर के त्रय ताप दूर होकर जीवात्मा को ब्रह्मानन्द प्राप्त होगा ।
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*प्राण पिंड रग रोम सब, हरि दिशि रहे निहारि ।*
*ज्यों वसुधा१ वनराय२ सौं, विरही चाहै वारि३ ॥२॥*
जैसे पृथ्वी१ वन पंक्तियों२ से अलग होने लगती है अर्थात वनस्पतियाँ सूखने लगती हैं तब जल३ वृष्टि चाहती है । वैसे ही विरही के प्राण, शरीर, रग, रोम आदि सभी अंग उपांग हरि दर्शनार्थ हरि की ओर ही देखते रहते हैं ।
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*साधु शब्द श्रवणों सुने, विरह वियोगी बैन ।*
*तब तैं वेधी आतमा, रज्जब परे न चैन ॥३॥*
विरही ने जबसे विरह सम्बधी संतों के शब्द सुने हैं, तब से ही जीवात्मा उनके शब्द-बाण से विद्ध हो गया है, लव मात्र भी शान्ति नहीं मिल रही है ।
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*बादल विरह वियोग के, दर्द दामिनी१ माँहिं ।*
*रज्जब घट२ ऐसी घटा, भैझड़३ भागे नाँहिं ॥४॥*
वियोगी के अन्त:करण२ में निम्नलिखित प्रकार घटा चढ़ रही है - वियोग के अनुभव द्वारा विरह रूप बादल चढ़ रहे हैं, व्यथा रूप बिजली१ चमक रही है, और भयंकर झड़३ लग रहा है, बन्द नहीं होता ।
(क्रमशः)

बुधवार, 22 अप्रैल 2026

२३. स्वरूप विस्मरण को अंग ३३/३६

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२३. स्वरूप विस्मरण को अंग ३३/३६ 
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यौं भ्रम तें बहु दिन भए, बीति गयौ चिरकाल । 
सुन्दर लह्यौ न आपुकौं, भूलि पर्यौ भ्रमजाल ॥३३॥
आत्मा को इस भ्रमात्मक स्थिति में रहते हुए बहुत दिन बीत गये । अधिक काल होने के बाद भी यह आत्मा स्वरूप ज्ञान की स्थिति में न आ सका और इस भ्रमजाल में अधिक गहरा फैलता ही चला गया ॥३३॥
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देह मांहिं ह्वै देह सौ, कियौ देह अभिमांन । 
सुन्दर भूलौ आपु कौं, बहुत भयौ अज्ञांन ॥३४॥
देह का अध्यास रखने पर देहाभिमान होना अनिवार्य हो जाता है । अतः यह आत्मा देहाभिमानी होकर, अज्ञान से आवृत होने से स्वरूप को भूल जाता है ॥३४॥
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कामी हूवौ काम रत, जती हुवौ जत साधि । 
सुन्दर या अभिमान तें, दोऊ लागी ब्याधि ॥३५॥
उस देहाभिमान के कारण, कभी यह आत्मा कामभोगों में रत रहकर कामी हो जाता है; कभी उस कामवासना को त्याग कर इन्द्रियसंयमी होकर साधना करने लगता है । इस देहाभिमान के कारण, इस के ये दोनों उपर्युक्त कर्म(भोग एवं त्याग) इस(आत्मा) के गले पड़ जाते हैं ॥३५॥
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कतहू भूलौ नीच ह्वै, कतहू ऊंची जाति । 
सुन्दर या अभिमांन करि, दोनौं ही कै राति ॥३६॥
देहभिमान से स्मृतिभ्रंश होने के कारण, कभी वह प्रमादवश स्वयं को नीच जाति का मान बैठता है; कभी उच्च जाति का; इस उभय प्रमाद का कारण एकमात्र देहाभिमान ही है जिससे उत्पन्न अज्ञान उस की स्मृति को आवृत कर बैठा है । (राति = अज्ञानन्धकार) ॥३६॥
(क्रमशः)

*विचार, ब्रह्मस्वरूप-निर्णय ॥*

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*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*कवल निरन्तर नरहरी, प्रकट भये भगवंत ।*
*जहँ विरहनी गुण वीनवे, खेले फाग बसन्त ॥*
*वर आयो विरहनी मिली, अरस परस सब अंग ।*
*दादू सुन्दरी सुख भया, जुगि जुगि यहु रस रंग ॥*
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*विचार, ब्रह्मस्वरूप-निर्णय ॥*
आज सहेली म्हारै मंगलचार । 
अम्ह घरि आये राजा राम भरतार ॥टेक॥
जाकै सागर सप्त अष्टकुल पर्वत, छ्यानवे कोटि मेघमाला ।
अठारह भार बिरख बहू बिधि के, गुणचास कोटि धरचाला ॥
अरध उरध मधि जल थल महियल, चारि खानि चारि वाणी ।
धरती गगन पवन अरु पाणी, यहु आरँभ अहिनाणी ॥
अपरम्पार पार परमेसुर, परापरी परभेवा ।
ब्रह्मा बिष्न महेस्वर सुर नर, सकल साध सिध सेवा ॥
वो उपजै खपै मरै नहिं जामैं आवागवण न होई । 
अबिहड़ अमर अखै अबिनासी, जिनबर हेर्यौ सोई ॥  
चंद सूर जाकै घरि दीपक, जोति करै परकासी ।
चारि पदारथ आग्याकारी, रिधि सिधि दोऊ दासी ॥
जुगि जुगि राज करै जुगि जीवै, परगट जोति न छानी ।
सोइ बर ल्याया म्हारा सतगुर, जिहिं की या रजधानी ॥
जिहिं कौ मारग निसदिन हेरौं, सो म्हारै घरि आयौ ।
अगर चँदणि म्हारै आँगणा लीप्यौ, मोतियाँ चौक पुरायौ ॥
बाजा बाजि निसाणाँ घाई, झालरि झालर लायौ ।
आज उछाह मांड है मंगल, तोरणि कलस बंदायौ ॥
पाँच सहेली मंगल गावैं, घरि घरि रली बधाई ।
आरति साजि आतमाँ आगैं, धूप दीप ले आई ॥
नैणा स्यूँ नैण बैण बैणा स्यूँ, निर्मल नूर निहारै ।
तन मन धन नौछावरि करि करि, ऊपर लूण उतारै ॥
निर्मल नाहा निर्मल साहा,निर्मल बेद उचेरा ।
चित चौंरी ऊपरि चढ़ि लीया, आतम सुंदरि फेरा ॥
प्रेम प्रीति की येकै दीनीं, दूजी दई न काई ।
सहज डोरड़ो कदे न छूटै, गुर त्यूँ गाँठि धुलाई ॥
अरस परसपर दूलह दुलहनि, खेल भलौ बणि आयौ ।    
गुरि म्हारै हथलेवो जोड्यौ, जू वै राम रमायौ ॥ 
पंच अभूषण सजि पतिबरता, प्रेम प्रीति पट धारी । 
सील सँतोष सुहागणि भागणि, नख सख साजि सँवारी ॥  
खिमा सहेली पाई हेली, दया सरीषी दाई । 
भाव सरीषा भाई मिलकरि, पिव के गौंणैं आई ॥
परणि पधार्याँ कारिज सार्या, हुई निसाणाँ घाई ।
वारि वारि परआतम ऊपरि, दीजे घणी बधाई ॥
जेता पाव धर्या धरणी परि, सो म्हारै सिरि धार्या ।
लगन महूरत आज भलौ दिन, भीतरि महलि पधार्या ॥
जिहाँ कोमल कवल पालिकौ निर्मल, हिरदा मांहि बिछायौ ।
सकल सिरोमणि सुख कौ सागर, सेज हमारी आयौ ॥
पाव पलौटूँ बिजणा ढोलौं, धाइ धाइ चरणा लागूँ । 
हूँ म्हारा साँई की सेजाँ, क्यौं सोऊँ क्यौं जागूँ ॥
वो जाणराइ हूँ बाली भोली, थोड़ी सी बतलावैं ।
सेज हसै घरि थंभा बोलै, दिवलै जोति न मावै ॥
चारि पहर बासौ बसि केसौ, सुंदरि नैं सुख दीजै । 
अरस परस ऐकै सेज्या परि, रोम रोम रस भीजैं ॥
असी रैंणि मोलि नहिं लाभै, मांग्याँ मिलै न साँई ।
घणाँ दिनाँ की हूँ तरसै थी, आज का दिन कै ताँई ॥
सषी सहेली बूझै हेली, तैं काँइ सुकृत कीन्हौं ।
हरि निर्मल तूँ मैल कुचीली, कहि बिधि आदर दीन्हौं ॥
हूँ गुरि म्हारै मोटै घरि दीन्हीं, भाव भलेरौ कीनौं ।
हथलेवा की लाज वही हरि, इहिं बिधि आदर दीनौं ॥
दादू कै परसादि दमोदर, दीन दया करि आयौ ।
बारबार बषनौं बलिहारी, घर बर रूड़ौ पायौ ॥९७॥

हे सखी ! आज मेरे घर पर मेरे प्रियतम राजा राम पधारे हैं  । अतः मेरे यहाँ आज मंगलाचार है = आनंदोत्सव है । मेरे प्रियतम अवर्णनीय है तथापि तुझको उसकी कुछ विशेषताएँ बताती हूँ जिससे तू उसके ऐश्वर्यमय रूप की कुछ झलक शब्दों में जान सके । उसके अधीन सात असीम अथाह सागर हैं; अष्ट्कुली पर्वत हैं; छयानवे कोटि मेघमाला (मेघों का समूह) हैं, अठारह भार नाना प्रकार के वृक्ष-वनस्पति हैं; और गुनचास कोटि योजन व्यासात्मक पृथिवी तथा उसके ऊपर अनेकों विशाल पर्वत हैं; ऊपर, नीचे और मध्य में आकाश, जल तथा स्थल है । 
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चार प्रकार की जीव जन्तुओं की कोटि हैं = उद्भिज, अण्डज, जरायुज, स्वेदज; चार प्रकार की वाणियाँ हैं परा, पश्यंति, मध्यमा, वैखरी । भूमि, आकाश, वायु और जल इन सभी के आरम्भ होने का स्त्रोत भी वही है । (वेदों में इनकी उत्पत्ति का क्रम नाना प्रकार से बताया गया है तथापि आचार्य शंकर ने ब्रह्मसूत्रकार के मंतव्यानुसार तैत्तरीयश्रुति के मत को मानकर इनका उत्पत्ति क्रम आकाश, पवन, अग्नि, जल व् भूमि बताया है । संतों ने भी इसी क्रम को मान्यता दी है । 

“परथम पवन पवन से आभा, आभा जल बरसाया है । 
गाजै-बीजै नभ नहिं भीजै, अैसी अद्भुत माया है ॥ 
भीगी भोमि भई हरियाली, जीवाँ गुजर चलाया है ।”
(स्वामी रामचरणजी की वाणी) वह प्रियतम स्वरूप परमेश्वर = सर्वप्रधान अपरम्पार है । उसका पार = रहस्य आज तक किसी ने नहीं जाना है । परापरी = परा-चेतन प्रकृति (जीव) तथा अपरा = जड़ प्रकृति = माया से परभेवा = पृथक है, वह परमेश्वर । 
“भूमिरापोनलो वायुः खं मनोबुद्धिरेव च । 
अहंकार इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा ॥४॥ 
अपरेयमितस्वन्यां प्रकृतिं विद्धि में पराम् । 
जीवभूतां महाबाहो ययेदं धार्यते जगत् ॥५॥” 
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ब्रह्मा, विष्णु, महेश, सुर, नर, साधु, सिद्ध सभी उसकी सेवा में संलग्न रहते हैं । वह न जन्मता है, न कम ज्यादा होता है, न मरता है और न अवतार ही लेता है । वस्तुतः उसका इस भूमि पर आना जाना होता ही नहीं है । वह अबिहड़ = अपरिवर्तनीय, अमर, अक्षय, अविनाशी है । मैंने उक्त लक्षणों वाले पति को ही ढूंढा है, पाया है । मेरे प्रियतम के घर में चंद्रमा और सूर्य दीपक बनकर प्रकाश का आलोक करते हैं । 
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धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष रूपी चारों पुरुषार्थ उसकी आज्ञा में रहते हैं तथा रिद्धि और सिद्धि दोनों उसके यहाँ दासी का काम करती हैं । (परमात्मा को अकर्ता कहा गया है । फिर उसका पुरुषार्थों से क्या सम्बन्ध, सृष्टि का उत्पादन कैसे करता है । इन प्रश्नों का उत्तर गीता के इस श्लोक में खोजा जा सकता है 
“न मे पार्थास्ति कर्तव्यं त्रिषु लोकेषु किंचन । 
नानावाप्तमवाप्तप्यं वर्त एवं च कर्मणि ॥३|२२॥” 
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वह युग-युगान्तरों तक इस ब्रह्मांड पर शासन करता है तथा युग-युगान्तरों तक तक जीता है । उसकी ज्योति = जीवन सदैव विद्यमान रहने से सदैव प्रकट ही रहती है, कभी भी अदृश्य नहीं होती तथा छिपी भी हुई नहीं रहती । जब भी भक्त उसको याद करते हैं, वह तत्काल प्रकट हो जाता है ।  जिस परमात्मा की उक्त प्रकार की राजधानी है, सद्गुरु महाराज ने मेरे लिये ऐसे ही पति को खोजकर उससे मेरा सम्बन्ध जोड़ा है । जिसके आने के रास्ते को मैं प्रतिदिन ढूंढा करती थी कि वह किस मार्ग से आयेगा, वह आज स्वयं ही मेरे घर आ गया है । 
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उसके स्वागतार्थ मैंने मेरे आंगन को अगर और चंदन से लीपा है । मोतियों से चौक को पूरा है = शुभ संकेत युक्त मांडने मांडे हैं । द्वार पर बाजे बज रहे हैं, निसाण = नगारे पर डंकों की मिलवाँ चोटें पड़कर मधुर ध्वनि हो रही है । आज विवाह होगा, इसका बड़ा भरी उछाह = उत्साह है । इसीलिए द्वार पर तोरण बांदा गया है । पाँचों ज्ञानेन्द्रियों रूपी सखियाँ मंगल गीत गा रही हैं । घर-घर में = इंद्री-इन्द्री में बधाई = आनंद का रली = संचार हो गया है । 
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आत्मा रूपी दुल्हन आरती करने के लिये वर की दीप, धूप, थाली में रखकर तैयार हो गई है । वह नयनों से नयनों को निहारती है, वचनों से वचनों के द्वारा वार्तालाप करती है तथा उस परमात्मा के अमंद निर्मल नूर को निहारती है । दुल्हन तन, मन, धन, सर्वस्व समर्पण करते हुए दूल्हे के ऊपर नमक राई उतारती है कि कहीं किसी की नजर उसे न लग जाये । दूल्हा भी निर्मल है । साहा = विवाह का मुहूर्त भी निर्मल = निर्दोष है । ब्राह्मण वेद मंत्रों का उच्चारण कर रहे हैं । 
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आत्मा रूपी सुंदरी ने चित्त रूपी चौंरी(विवाह मंडप) में परमात्मा रूपी वर के साथ फेरे ले लिये । दूल्हे-दुल्हन ने प्रेम-प्रीति रूपी एक ही फेरा खाया । दूसरा फेरा खाने की उन्हें आवश्यकता ही अनुभूत नहीं हुई । गुरुमहाराज रूपी सवासनी ने सहज रूपी डोरे से दोनों का गठबंधन ऐसी गाँठ लगाकर किया है कि वह खुलने का नाम ही नहीं ले सकती । एक दूसरे का एक दूसरे से परस = मिलने का = दूल्हे आर दुल्हन का बढ़िया खेल बन गया ।(अरस  = मिलना; परस = स्पर्श, छूना ।) 
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गुरु महाराज स्वयं जिस प्रकार सभी में रमने वाले राम में रमण करते हैं, वैसे ही मैं रम सकूँ, एतदर्थ उन्होंने मेरा हाथ प्रियतम के हाथों में दे दिया । दोनों को एक कर दिया । पतिव्रता पत्नी पाँच आभूषणों को प्रेम-प्रीति की साड़ी के सहित धारण करके सुसज्जित हो गई है । उस भाग्यशाली सौभाग्यवती ने शील संतोष आदि सद्गुणों से अपने आपको नख से शिख तक सजाकर सँवारा है । उसने क्षमा रूपी सहेली को मित्र के रूप में प्राप्त किया है तो दया जैसी दाई प्राप्त की है । भाव = श्रद्धा विश्वास रूपी भाई के साथ प्रियतम के यहाँ मुकलावा होकर आई है । 
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विवाहित होकर प्रियतम के घर आने पर सारे मनोरथ पूर्ण हो गये । द्वार पर रखे नगारों पर मिलवाँ चोट लगाकर समस्त नगरवासियों को आगमन की सूचना दी गई । प्रियतमा प्रियतम पर बार-बार न्यौछावर होती है और प्रभूत मात्रा में बधाई = धन्यवाद देती है कि परमात्मा की असीम अनुकंपा से हमारा एकाकार हो गया ।  प्रियतमा प्रियतम से कहती है, हे प्रियतम ! मेरे यहाँ पधारते समय जितने पैर भी आपने पृथिवी पर रखे(जितने भी डग भरे) वे समझिये मेरे शिर पर ही रखे हैं अर्थात् मैं उतनी ही बार आपके उपकारों के नीचे दब गई हूँ । 
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आज की लग्न, मुहूर्त, दिन अतीव ही उत्तम हैं कि आप मेरे महल में पधार आये हैं । इस घर में(शरीर में) कोमल कमलों से निर्मित निर्मल = अत्यन्त स्वच्छ बिछौना सहित ह्रदय रूपी पलँग बिछाया है । क्योंकि हमारी सेज = शय्या = पर्यक पर सर्वशिरोमणि समस्त सुखों को देने वाला परम प्रियतम जो आया है । मैं प्रियतम के पाँवों को दबाती हूँ = पगचंपी करती हूँ । गर्मी लगने पर पंखा झलती हूँ । दौड़-दौड़ कर पाँवों पर पड़ती हूँ = अनुनय विनय करते हुए शरणागत होती हूँ । 
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मेरे साँई की शय्या पर मैं कभी तो सोती हूँ और कभी उसकी सुख-सुविधाओं को जुटाने में लग जाने से जागती हूँ । वह पूर्ण यौवन युक्त सब कुछ जानने-समझने वाला है जबकि मैं अभी भोली भाली यौवन की संधि पर अग्रसर हुई बाला मात्र हूँ । इस कारण मैं उससे अधिक बातें न करके कुछ ही बातें करती हूँ । मेरी और प्रियतम की अनुपम जोड़ी को देखकर शय्या हँसती है, प्रफुल्लित होती है, घर और उसमें लगे स्तंभ बोलते हैं और कहते हैं कि हम आज धन्य हो गये हैं, जो हमें ऐसे आदर्श मालिक-मालकिनी मिले हैं । 
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दीपक रात्री भर ज्योंति = प्रकाश करते-करते खुशी के मारे फूला नहीं समाता है । केशव रूपी पति ने चार प्रहरात्मक पूरी रात्री भर सेज पर सोकर व घर में रहकर आत्मा रूपी सुन्दरी को पूर्ण सुख प्रदान किया । दोनों अरस-परस एक शय्यापर हुए और दोनों की रोम-रोम रस = आनंद में भीनें = निमग्न हो गई । उक्त वर्णित जैसी रात्री किसी को मूल्य देकर नहीं मिल सकती । इतना ही नहीं यह मांगने से भी नहीं मिलती है । मैं स्वयं ही बहुत दिनों से आज की रात्री के आनंद को प्राप्त करने के लिये तरस रही थी । 
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मुझे रात्री भर प्रियतम के सान्निध्य का लाभ मिला जानकर मेरी समस्त सखियाँ मुझसे पूछती हैं कि हे सषी ! तूने ऐसा कौनसा पुण्य किया है कि निर्मल हरि ने तुझ जैसी मैली-कुचीली = पापिष्ट व् दुराचारणी को अपने सान्निध्य का गौरव प्रदान किया । प्रिया सषियों की बातें सुनकर उत्तर देते हुए कहती है, मुझे मेरे गुरुमहाराज ने राम-नाम-स्मरण रूपी उत्तम घर में = उत्तम साधना में विवाहित की = संलग्न की । 
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मैंने उत्तम भावभक्ति का संपादन किया । परिणामस्वरूप परमप्रभु-परमात्मा ने मेरी उक्त साधना रूपी शादी की लाज रखी और मुझे सान्निध्य रूपी साक्षात् दर्शन देने का आदर-सत्कार दिया । बषनांजी कहते हैं दादूजी महाराज की कृपा से मुझ बषनां के हृदय रूपी घर में दामोदर जो अकारण दयालु-कृपालु है दया करके आया है । मैं उस पर बार-बार न्यौछावर होता हूँ = समर्पित होता हूँ क्योंकि मैंने घर = शरीर(मनुष्य शरीर = “दुर्लभो मानुषो देहो देहिनां क्षणभंगुर ॥” भागवत्) और वर = पति = परमात्मा दोनों ही रूडौ = उत्तम प्राप्त किये हैं ॥९७॥ 

मंगलवार, 21 अप्रैल 2026

२३. स्वरूप विस्मरण को अंग २९/३२

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२३. स्वरूप विस्मरण को अंग २९/३२
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ज्यौं मनि कोऊ कंठ की, भ्रम तैं पावै नांहिं । 
पूछत डोलै और कौं, सुन्दर आपुहि मांहिं ॥२९॥
जैसे किसी जडमति(अज्ञ) को अपने कण्ठ में पहनी हुई माला के विषय में भ्रम हो जाय कि उसके गले में माला नहीं है और वह दूसरों से उस माला के विषय में पूछने लगे । वही स्थिति देहाध्यास के कारण इस आत्मा की भी हो गयी है ॥२९॥
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सुन्दर चेतनि आपु यह, चालत जड की चाल । 
ज्यौं लकरी के अश्व चढि, कूदत डोलै बाल ॥३०॥
महाराज श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं कि देहाध्यास के कारण यह आत्मा ऐसी चेष्टाएँ कर रहा है मानो कोई बालक काठ के घोड़े पर चढकर उछल कूद मचा रहा हो ! ॥३०॥
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भूतनि मांहें मिल रह्यौ, तातें हूवौ भूत । 
सुन्दर भूलौ आपु कौ, उरझ्यौ नौ मण सूत ॥३१॥
यह पाँच महाभूतों(से सम्पृक्त देह) में मिल गया(अध्यास कर लिया) है अतः यह भी भूत बन गया है । इसलिये इस के सम्मुख भी नौ मन सूत के सुलझाने जैसी कठिन समस्या खड़ी हो गयी; क्यों कि नौ मन सूत को कोई सावधान चित्त वाला, धैर्यवान् एवं विवेकी पुरुष ही सुलझा सकता है१ ॥३१॥ 
{१ तु० - श्रीदादूवाणी : जीव जंजालौं पड़ि गया, उलझ्या नौ मण सूत ।
कौ इक सुलझै सावधान, गुरु बाइक औधूत ॥ (१/८३)}
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आपुहि इंद्री प्रेरि कै, आपुहि मांनै सुक्ख । 
सुन्दर जब संकट परै, आपु हि पावै दुक्ख ॥३२॥ 
उस देहाध्यास का दुःखद परिणाम यह होता है आत्मा स्वयं को इन्द्रियों का प्रेरक मानकर उन के विषय-सम्पर्क से होने वाले सुख को अपना सुख मानने लगता है; परन्तु जब कभी विषम स्थिति आने पर उन से उद्भूत दुःख से इस का सामना होता है तो यह स्वयं को दुःखी मानने लगता है ॥३२॥
(क्रमशः)