शुक्रवार, 3 अप्रैल 2026

*८.आज्ञाकारी का अंग ~ ३२/३४*

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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*८.आज्ञाकारी का अंग ~ ३२/३४*
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*गुरु आज्ञा दुनिया तजहु, आज्ञा दर्शन त्याग ।*
*रज्जब आज्ञा ऐन यहु, पाखंड प्रपंच से भाग ॥३२॥*
गुरु आज्ञानुसार सांसारिक राग को त्यागो, जोगी, जंगम, सेवडे, सन्यासी, बौद्ध और शेखों के भेष तथा मताग्रह को त्यागो । पाखंड प्रपंच से दूर भागो, यही गुरु की यथार्थ आज्ञा है ।
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*शिष्य सदा सत शब्द मधि१, गुरु थिर गोविंद माँहिं ।*
*उभय उमर ठाहर व्यतीत, तब सँचर२ कछु नाँहिं ॥३३॥*
३३ में गुरु-शिष्य की निर्दोषता दिखा रहे हैं - शिष्य सदा गुरु के यथार्थत शब्दों में१ मन लगाये रहता है और गुरु गोविन्द के चिन्तन में मन स्थिर रखता है । इस प्रकार दोनों की आयु उक्त “शब्द मनन” और “गोविन्द भजन” रूप दोनों स्थानों में ही व्यतीत होती है, तब उनमें कोई दोष२ नहीं रहता वे निर्दोष ही हैं ।
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*शिष सोई सत सीख में, गुरु सोई ज्ञान गरक्क१ ।*
*मन वच कर्म रज्जब कहै, युगल२ जु पावैं जक्क३ ॥३४॥*
३४ में योग्य गुरु-शिष्य का परिचय दे रहे हैं - जो यथार्थ शिक्षानुसार चलता है वही शिष्य है और जो ज्ञान में निमग्न१ रहता है वही गुरु है । हम मन, वचन और कर्म से यथार्थ ही कहते हैं, उक्त प्रकार के गुरु-शिष्य दोनों२ ही शांति३ को प्राप्त होते हैं ।
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इति श्री रज्जब गिरार्थ प्रकाशिका सहित “८. आज्ञाकारी का अंग” समाप्त ॥
(क्रमशः)

बुधवार, 1 अप्रैल 2026

रामबगस जी

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*॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥*
*॥ दादूराम~सत्यराम ॥*
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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अध्याय १६ -
आचार्य पर्व -
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६- आचार्य दिलेरामजी महाराज ने वि. सं. १८९४ में अपने ज्येष्ठ शिष्य भजनानन्दी, परमविरक्त, बाल ब्रह्मचारी जो नवलगढ अग्रवाल वैश्य भक्त परिवार में जन्में थे, उनका पिता दादूजी का परम भक्त था । उसने अपने पुत्र रामबगस को आचार्य दिलेरामजी के भेंट कर दिया था । रामबगस जी की भजन निष्ठा, विरक्ति, समता, मितभाषिता परम संतोष आदि विशेषताओं को देखकर आचार्य पद के योग्य रामबगस जी को निश्‍चय किया ।
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वि. सं. १८९४ में रामबगसजी को उनकी इच्छा नहीं होने पर भी आचार्य दिलेरामजी ने अपना उत्तराधिकारी नियत करके भेष में पूजा बांट दी । इससे आचार्य दिलेरामजी के ब्रह्मलीन होने पर आचार्य दिलेरामजी की आज्ञानुसार समाज ने रामबगस जी की इच्छा न होने  पर भी आचार्य पद पर अभिषिक्त कर दिया । 
किन्तु रामबगसजी को यह वैभव संपन्न पद रुचिकर नहीं हुआ । वे इसको त्यागकर भागने का ही विचार प्रतिपल करते रहते थे । उन को उनके आचार्य काल के १७ दिन १७ वर्ष से भी अति महान् निकले थे । १८ वें दिन की रात्रि को उन्होंने भागने का दॄढ निश्‍चय कर लिया था । 
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आज वे रात्रि को चैनरामजी महाराज की बारहदरी के पूर्वी चौबारे में थे । उसकी दक्षिण की खिडकी से रस्सा डालकर नीचे उतर गये और रात ही रात में बहुत दूर निकल गये तथा परिचित लोगों से बचते हुये दूर देश में चले गये और वर्षों तक तीर्थयात्रा में भ्रमण करते रहे । 
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इधर इनकी आशा छोडकर इनके छोटे गुरु भाई प्रेमदासजी को समाज ने आचार्य पद पर अभिषिक्त कर दिया । फिर रामबगसजी चिरकाल से विचरते हुये इधर आये और हरमाडा ग्राम में स्थायी रुप से रहने लगे । हरमाडे ग्राम के बीच में जो दादूद्वारा अस्थल है वह आपका ही है । आपने केवल १७ दिन ही आचार्य गद्दी पर अति कठिनता से निकाले थे । 
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अत: अल्पकाल रहने से इनको भी आचार्यों की गणना में नहीं गिना गया । यही आचार्य प्रणाली की कुछ घटनायें शेष रह गई थीं । जैसी ग्रंथों में देखी गयी थी तथा वृद्ध संतों से परंपरागत सुनी गई थी, सो यहाँ लिख दी गई हैं । जिससे नाना भ्रांतियों को अवकाश नहीं मिल सकेगा ।
(क्रमशः)

२२. आपने भाव को अंग २३/२५

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२२. आपने भाव को अंग २३/२५
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सुन्दर अपने भाव तें, रूप चतुर्भुज होइ । 
याकौं ऐसौई दृसै, वाकै रूप न कोइ ॥२३॥
श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - अर्जुन के अपने हृद्गत विचार(भाव) के कारण ही कृष्ण उसको सदा चतुर्भुज रूप में दिखायी देते थे । यद्यपि उन का रूप चतुर्भुज नहीं था । भगवान् तो नीरूप(रूप -रहित) होते हैं । भक्त अर्जुन के भक्तिपूर्ण आग्रह के कारण ही उनको उसके सामने सदा चतुर्भुज रूप में ही आना पड़ता था२ ॥२३॥ २ द्र० - श्रीमद्भगवद्‌गीता : तेनैव रूपेण चतुर्भुजेन, सहस्रबाहो भव विश्वमूर्ते ! ॥ (अ० ११, श्लोक ४६))
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काहू मान्यौ सींग सौ, हृदये उपज्यौ चाव । 
सुन्दर तैसौ ई भयौ, जाकै जैसौ भाव ॥२४॥
भक्त प्रह्लाद को भगवान् के सिंह रूप से भी प्रीति थी । उसने उसी रूप के माध्यम से उन प्रभु की भक्ति की थी । अतः वे उसी(नृसिंह) रूप में प्रकट हुए । क्योंकि भगवान् भक्त के भाव के अधीन हैं; अतः वह भक्त जैसा रूप चाहता है उसी रूप में वे उसके सम्मुख आते हैं३ ॥२४॥ (३ भक्त प्रह्लाद की कथा भागवत पुराण में प्रसिद्ध है ।)
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काहू सौं अति निकट है, काहू सौं अति दूरि । 
सुन्दर अपनौ भाव है, जहां तहां भरपूरि ॥२५॥
इति आपने भाव को अंग ॥२२॥
इसी भाव – भेद के कारण वे प्रभु व्यवहार में किसी भक्त के बहुत समीप दिखायी देते हैं, किसी से बहुत दूर । श्रसुन्दरदासजी कहते हैं - प्रत्येक भक्त के भाव की विचित्रता के कारण ही यह सब होता है; अन्यथा भगवान् तो सर्वव्यापक हैं, उन पर अतिसमीप या अतिदूर रहने का उपालम्भ नहीं लगाया जा सकता ॥२५॥
इति आपने भाव का अंग सम्पूर्ण ॥२२॥
(क्रमशः)

हिरदै बडौ रे कठौर ।

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*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*प्रीति न उपजै विरह बिन, प्रेम भक्ति क्यों होइ ।*
*सब झूठै दादू भाव बिन, कोटि करे जे कोइ ॥*
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साषी लापचारी की ॥
पाणी मैं पाथर रह्या, ऊपरि बध्या सिवालि ।
बषनां टाँच्याँ नीकली, माहिं अग्नि की झालि ॥१
(१ इसका अर्थ ‘निगुणा कठोर कौ अंग’ की साषियों में देखें ।)  
गुरि मिलिया तब पाथर भीगा, चूना कीया गारी ।
पाणी माहिं पखाण भिजोया, बषनां गुरि की बलिहारी ॥२ 
(२ इसका अर्थ ‘सुमिरण कौ अंग’ की साषियों में देखें ।)  
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पद ॥
हिरदै बडौ रे कठौर ।
कोटि कियाँ भीजै नहीं, अैसौ पाहण नांहीं और ॥टेक॥ 
गंगा नैं गोदावरि न्हायौ, कासी पुहकर मांहि रे ।
करम कापड़ी मैंण कौ, ताथैं रोम भीगौ नाहिं रे ॥
बेद नैं भागौत सुणियाँ, कथा सुणी अनेक रे ।
कर्म पाखर सारिखा, ताथैं बाण न लागौ एक रे ॥
औंधा कलसा ऊपरैं, जल बूठौ अखंड धार ।
तत बेलाँ निहालियौ, तौ पाणी नहीं लगार ॥
ब्रह्म अग्नि पाषाण जाल्या, चूना कीया सलेस रे ।
बषनां भिजोया राम रस, म्हारा सतगुर नैं आदेस रे ॥८८॥  
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बषनांजी कहते हैं, सांसारिक विषय-भोगों को भोगने का आदी मन परमात्मा की ओर बिलकुल ही नहीं मुड़ना चाहता है । यह विषय-भोग, भोग-भोग कर अत्यन्त कठोर हो गया है, उन्हें छोड़ने का नाम ही नहीं लेता है । करोड़ों उपाय करने के उपरान्त भी यह पत्थर जैसा कठोर मन भीगता = नरम नहीं होता है । इस जैसा और कोई दूसरा अवयव कठोर नहीं है । 
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(पाठकों को यहाँ स्मरण करना चाहिये कि वास्तव में भाव क्या है और भाव तथा भक्ति का आपस में क्या सम्बन्ध है । यहाँ इस विषय में अधिक लिखने का अवकाश नहीं है किन्तु जिन्हें इस विषय में अधिक जानना हो, वे मधुसूदन स्वामी रचित ‘भक्तिरसायन’ ग्रंथ को अवश्य पढ़ें । भक्ति का उदय होता ही तब है, जब हृदय नवनीत के समान द्रवणशील = नरम होता है । भगवान् के नाम, गुणों को सुनते ही हृदय का द्रवित होकर तदाकार होना ही तो भक्ति है । यदि नाम-गुणों के सुनने के उपरांत भी मन में कोई परिवर्तन न हो तो वह मन भक्तिमार्ग के योग्य नहीं है । ऐसे साधकों को ज्ञानमार्ग का आश्रय लेना चाहिये । बषनांजी कठोर और नरम न होने की चर्चा करके इसी ओर संकेत कर रहे हैं ।) 
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इस मन को नरम करने के लिये, इसमें भक्ति जम सके, एतदर्थ मैंने इसे गंगा नैं = और गोदावरी में नहलाया । काशी की गंगा तथा पुष्कर के ब्रह्मसरोवर में भी इसको स्नान कराया किन्तु क्या करें ? यह वहाँ भी नहीं भीगा क्योंकि इसने सकामकर्म रूपी मोंमिया(मोम में सना हुआ) कपड़ा पहना हुआ है । 
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इसने वेद और भागवत महापुराण का श्रवण किया है । इसके अतिरिक्त अन्य अनेकों इतिहास, पुराण उपनिषदों की कथाएँ, तत्त्वमीमांसाएँ सुनी है किन्तु इसके सकामकर्म, कवच के समान प्रतिबंधक बन गये जिससे इस पर एक भी शब्द रूपी बाण लग नहीं सका । 
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इसकी स्थिति ठीक वैसी ही है जैसे उल्टे रखे हुए कलश पर अखंडित जल की धारा गिरने के उपरान्त भी जब ततबेलाँ = जल की आवश्यकता होने के समय उसमें नाममात्र का भी पानी नहीं मिलता । वस्तुतः पानी तो तब मिले, जब उसमें पानी रुका हो । ठीक इसी प्रकार मन भाव-भक्ति में सराबोर हुआ तो तब अनुभव हो जब उसने भाव-भक्ति का एकनिष्ठ होकर अनुष्ठान किया हो । 
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बषनांजी अपनी स्थिति बताते हुए कहते हैं, परब्रह्म-परमात्मा की भक्ति रूपी अग्नि से हृदय रूपी पत्थर को जला डाला जिससे बह मजबूती के गुणों से युक्त उत्तम किस्म का चूना बन गया । फिर उस चूने को राम-नाम रूपी जल में भिगो दिया जिससे मुक्ति रूपी महल बनने का उत्तम सरंजाम हो गया । मेरे हृदय को उक्त प्रकार नरम करने की युक्ति बताने वाले गुरु महाराज को मेरा आदेश = नमस्कार है ॥८८॥ 

*७.आज्ञाकारी का अंग ~ २५/२८*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*७.आज्ञाकारी का अंग ~ २५/२८*
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*गुरु सन्मुख शिष रह सदा, कदे करो मत और ।*
*ज्यों रज्जब वसुधा विरछ१, सुखी दुखी इक ठौर ॥२५॥*
२५-२६ में शिष्य को गुरु आज्ञा में रहने की प्रेरणा कर रहे हैं - वृक्ष१ वर्षा से सुखी और आतप से दुखी होने पर भी पृथ्वी में एक स्थान पर ही रहता है, उखडने से तो नष्ट ही होगा । वैसे ही शिष्य को सदा गुरु की आज्ञा में ही रहना चाहिये । गुरु आज्ञा से विमुख होने का उपदेश कभी भी कोई न करे, कारण-गुरु से विमुख होते ही परमार्थ से भ्रष्ट हो जाता है ।
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*ज्यों सद्गुरु के शब्द में, त्यों चल शिष्य सुजान ।*
*जन रज्जब रहु इस मतै१, छाडहु खैंचातान ॥२६॥*
हे बुद्धिमान शिष्य ! जैसे सद्गुरु के उपदेश रूप शब्दों में चलने का विधान है, वैसे ही चल, इस सद्गुरु आज्ञा रूप सिद्धान्त१ में ही स्थित रह, अन्य मत मतान्तरों की खैंचातान को छोड़ दे ।
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*हीरा हेम१ सोई खरे, जो लागे भाणे२ भित्त३ ।*
*रज्जब चहुँटे गुरु शब्द, सो चेला चोखे चित्त ॥२७॥*
२७ में सुमति शिष्य का परिचय दे रहे हैं - हीरा और स्वर्ण१ वही अच्छा माना जाता है जिसके पीठ३ पर तोड़ने के समान चोट२ लगे और वे परस्पर चिपकते जावें(स्वर्ण के भूषण में हीरा बैठाया जाता है, तब जिसमें बैठाया जाता है उस स्थान की दीवाल के और हीरा के थोडी थोडी चोट मारी जाती है, जिससे वह हीरा भूषण में दब कर स्थिर हो जाता है) वैसे ही जो साधन कष्ट देने पर भी गुरु के शब्दों के विचार में लगा रहे, वही शिष्य अच्छे हृदय का माना जाता है ।
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*गुरु आज्ञा इन्द्रिय दमन, आज्ञा परिहर काम ।*
*रज्जब आज्ञा आप१ हत, आज्ञा भजिये राम ॥२८॥*
२८-२९ में गुरु आज्ञा पालन की प्रेरणा कर रहे हैं - गुरु आज्ञानुसार साधन करके इन्द्रियों को जय करो, काम को त्यागो, अपने मिथ्या अहंकार१ को नष्ट करो और राम का भजन करो ।
(क्रमशः)  

लघु जैत की आज्ञा

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*॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥*
*॥ दादूराम~सत्यराम ॥*
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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अध्याय १६ -
आचार्य पर्व -
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नारायणा दादूधाम में पहुँच कर सब संतों से परामर्श किया । तब यह प्रश्‍न आया कि गद्दी पर किसको बैठाया जाय ? फिर समाज के माने हुये संतों को बुलाया । सबके आ जाने पर सबने निश्‍चय किया कि दादूजी महाराज ही उत्तराधिकारी का निर्णय देगें, उन्हीं से प्रार्थना की वह सब आचार्य जैतरामजी महाराज के गद्दी पर विराजने के प्रसंग अध्याय तीन में लिख दिया गया है । वहाँ देखें ।
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दादूजी महाराज ने लघु जैत की आज्ञा नभवाणी द्वारा दी । फिर उनको गद्दी पर बैठाना निश्‍चय हो गया । तब ध्यानीबाई सहमत हो गई । गद्दी पर बैठने वालों पर प्रतिबन्ध लगा रखा था उसको हटा दिया । इससे सूचित होता है कि सभाकुमारी जी ने तथा ध्यानी जी ने आचार्य गद्दी पर न बैठकर केवल समाज एक मत होकर एक व्यक्ति को न बैठाये तब तक प्रतिबन्ध लगाये रक्खा था ।
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वे आचार्य होने योग्य व्यक्ति की तथा संपूर्ण समाज की एकता की प्रतिक्षा करती रही थी । जयतरामजीने आचार्य हो गये और वि. सं. १७६० में ध्यानी बाई ब्रह्मलीन हो गई । ध्यानी बाई की गुरु सभाकुमारी वि. सं. १७२४ में ब्रह्मलीन हो गई थी । कहा भी है-
‘‘सत रासे चौबीसिये, चलिया सभाकुमारी ।
चेली सभाकुमारी की, ध्यानी बैठी पाट ।
सतरासे अरु साठ ही, कुमारि चल्या दे हाट ।’’
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दे हाट का तात्पर्य यही ज्ञात होता है कि योग्य आचार्य की व्यवस्था हो जाने पर ध्यानीबाई ने उपदेश के केन्द्र दादूजी की गद्दी पर प्रतिबन्ध लगा रक्खा था । वह गद्दी जैतरामजी को देकर बाईजी की पालका में चली गई और वि. सं. १७६० में ब्रह्मलीन हो गई ।
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५- वि. सं. १८१० में मेडते में आचार्य कृष्णदेव जी महाराज ब्रह्मलीन हुये तब मेडते में तो जोधपुर नरेश, नागौर नरेश आदि मारवाड के सरदारों, भक्तों व उतराधे संतों तथा अन्य थांमायती महन्तों ने मिलकर कृष्णदेव जी की आज्ञानुसार चैनराम जी महाराज को आचार्य पद पर अभिषिक्त किया । किन्तु नागे संत तथा जयपुर नरेश ने मिलकर नारायणा दादूधाम में आचार्य कृष्णदेव जी के दूसरे शिष्य गंगाराम जी को आचार्य गद्दी पर बैठा दिया ।
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किन्तु फिर वि. सं. १८१२ में समाज में एकता हो गई तब गंगाराम जी ने प्रसन्नता से गद्दी त्याग दी थी । वि. सं. १८१० से वि. सं. १८१२ तक गंगाराम जी नारायणा दादूधाम की गद्दी पर विराजे किन्तु संपूर्ण समाज की सम्मति से नहीं विराजने से वे आचार्यों की गणना में नहीं आये । उनके दूसरे गुरु भाई कृपाराम जी को सवाई जयसिंह द्वितीय जयपुर नरेश ने गृहस्थ बना दिया था । वे समाज के भेष भण्डारी बने रहे ।
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अब गंगाराम जी छत्रियों के महन्त जी की परंपरा पाखर ग्राम में है । उनकी परंपरा के संत नारायणा से पाखर चले गये । कृपाराम जी भेष भंडारी जी की परंपरा कैरया ग्राम में है । कैरया नारायणा के पास ही है ।
(क्रमशः)

मंगलवार, 31 मार्च 2026

२२. आपने भाव को अंग २०/२२

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२२. आपने भाव को अंग २०/२२ 
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याही देखत नूर कौं, याही देखत तेज । 
याही देखत जोति कौं, सुन्दर याकौ हेज ॥२०॥
तुम्हारा यह शुभ चिन्तन ही तुम को उस प्रभु के नूर(दिव्य ज्योति) तक पहुँचायगा, यही चिन्तन उसके तेज(दिव्य प्रताप) तक पहुँचायगा । यही तुम्हें उस की दिव्य प्रभा तक पहुँचायगा । अतः तुम उसी प्रभु की अनन्य प्रेमा भक्ति से उसकी आराधना(हेज) करो ॥२०॥
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सुन्दर अपने भाव तें, जन की करै सहाइ । 
बाहिर चढि कै बीठलौ, दुष्ट हि मारै आइ ॥२१॥
श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - वे निरञ्जन निराकार प्रभु भी उसी भक्त की सहायता करने के लिये आतुर होते हैं जो अपने हृदय से भगवान् से सहायता हेतु पुकार करता है । बीठल एवं नामदेव की हार्दिक पुकार सुनकर भगवान् उनकी सहायता के लिये दौड़े हुए आये थे - यह सभी जानते हैं ॥२१॥
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सुन्दर अपने भाव तें, मूरत पीयौ दुद्ध । 
ठाकुर जान्यौं सत्य करि, नांमां कौ उर सुद्ध ॥२२॥ 
भक्त(नामदेव) की हार्दिक प्रार्थना पर भगवान् ने उसका दिया हुआ दूध दीवाल से मुख निकाल कर पीया था; क्योंकि भगवान् ने भी जान लिया था कि मेरा भक्त नामदेव१ शुद्ध हृदय से पुकार रहा है ॥२३॥ {१ नामदेव द्वारा भगवान् को दूध पिलाने की कथा श्रीराघोदास की भक्तमाल (५० २८८) में देखें ।}
(क्रमशः)

*नाम-माहात्म्य ॥*

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*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*दादू जागहु लागहु राम सौं, छाड़हु विषय विकार ।*
*जीवहु पीवहु राम रस, आतम साधन सार ॥*
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*नाम-माहात्म्य ॥*
भाई रे, नाँव लियाँ निस्तारा । यों गुर कहैं हमारा ॥टेक॥
जोग जग्गि जप जेता । तप तीरथ ब्रत केता ॥
पढ्याँ गुण्याँ जे गाया । सब एक नाँव मैं आया ॥
सेवा संजम पूजा । देव दिहाड़ी दूजा ॥
धरम ध्यान बिस्तारा । सबै नाँव की लारा ॥
सो नाँव छाड़ि क्या कीजै । अैसि काहि बडाई दीजै ॥ 
और सकल ही फीका । हरि नाँव सकल मैं टीका ॥
सो मेरे नाँव अधारा । नाहिं और का सारा ॥
सो नाँव सहज घरि आणैं । रटि बषनां और न जाणैं ॥८७॥
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हे भाई ! भगवान् का नाम रटने से ही भला = कल्याण होता है, ऐसा मेरे गुरुमहाराज कहते हैं ।
“रामचरण हम कहते हैं, कह्या कबीरै राम ।
सकल सासतर सोधिया, कलजुग केवल नाम ॥”
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योगसाधना, यज्ञ करना, सकाम मंत्र जप करना, अग्नि आदि में तपकर तपस्या करना, तीर्थाटन करना, नाना व्रतोपवासादि करना, पढ़ना, चिंतन करना आदि जितने भी भगवत्प्राप्ति के उपाय नाना शास्त्रों में बताये गये हैं वे सभी एक भगवन्नाम जप करने मात्र से किये हुए हो जाते हैं, वे सभी भगवन्नाम में वैसे ही सम्मिलित हो जाते हैं जैसे हाथी के पैर में सभी का पैर समा जाता है ।
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“यज्ञानां जपयज्ञोऽस्मि” मूर्ति की सेवा-पूजा करना, नहाना-धोना आदि संयमों का साधना, देवताओं, शीतलादि देवियों व अन्य-भैरावादि का यजन-पूजन, धर्म-दानादि, ध्यान आदि सभी भगवन्नाम, के पीछे-पीछे चलने वाले हैं अथवा लारा = से हल्के स्तर के हैं ।
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अतः ऐसे नाम को छोड़कर क्यों अन्य मार्ग का अवलंबन किया जाये ? यदि मुझसे पूछा जाये (बषनांजी कहते हैं) तो मैं कहूंगा, नाम के अतिरिक्त और दूसरा कुछ है ही नहीं जिसको इतनी बडाई = महत्त्व दिया जाये । “राम न सकई नाम गुन गाई ॥”
“राम सकल नामन तैं अधिका ।
होहु नाथ अघ खग बधिका ॥”
“ब्रह्म राम तैं नामु बड़, बरदायक बर दानि ।
रामचरित सतकोटि मँह, लिय महेस जियँ जानि ॥”
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इस भगवन्नाम के सामने सभी अन्य साधन फीका = निस्तेज हैं । क्योंकि परात्पर-परब्रह्म-परमात्मा हरि का नाम ही सबका राजा है, सबका शिरोमणि = प्रधान है । अतः मेरा तो परमाश्रय परमात्मा का नाम ही है । मुझे और किसी के सहारे की आवश्यकता भी नहीं है । वह नाम सहज घर = मुक्ति का दाता है, स्वस्वरूप में अवस्थिति कराने वाला है । बषनां तो बस, इस नाम का ही रटन करता है । वह इसके अतिरिक्त किसी और को जानता ही नहीं ॥८७॥

*७.आज्ञाकारी का अंग ~ २१/२४*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*७.आज्ञाकारी का अंग ~ २१/२४*
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अमलबेत सूई मिल एकै, त्यों शिष सद्गुरु संग ।
रज्जब द्वितीय भाव न दर्शे, अंग१ समाये अंग२ ॥२१॥
अमलवेत वृक्ष का फल बहुत खट्टा होता है । उसमें सूई रख देने से सूई गल कर उसी में मिल जाती है, वैसे ही शिष्य को सद्गुरु का संग मिल जाने पर शिष्य के हृदय में द्वैत भाव नहीं दिखाई देता, उसकाआत्मा सद्गुरु आत्मा१ के लक्ष्य स्वरूप ब्रह्म२ में समा जाता है ।
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आदि तिणैं१ रस नीपजी, अंत तिणा२ दिल माँही ।
रज्जब शिष सितिया३ मतै, गुरु गुण लोपे नाँहिं ॥२२॥
मिश्री३ प्रथम ईख१ के रस से उत्पन्न हुई और अन्त में भी बाँस की सीक२ को अपने बीच में रक्खा अर्थात मिश्री तैयार होने पर भी उसके बीच में बाँस की सींक रही (जैसे आजकल धागा बीच में रखकर मिश्री बनाते हैं, वैसे ही पूर्व काल में बाँस की सींकों पर बनाई जाती थी) इतनी श्रेष्ठ बनकर भी मिश्री ने तृण का उपकार नहीं भूला, वैसे ही सुमति शिष्य कितना ही श्रेष्ठ हो जाने पर गुरु के उपकार रूप गुणों को मन से नहीं भूलता ।
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मिश्री मन विसरु नहीं, आदू जो उपकार ।
मीठों सौं मीठी भई, तेउ१ तिण उरधार ॥२३॥
मिश्री ने अपने ऊपर किया हुआ ईख रूप तृण का उपकार नहीं भूला, वह उन मधुर गन्नों से भी अधिक मधुर हो गई किन्तु तो भी१ बाँस की सींक रूप तृण को अपने बीच में ही रक्खा । वैसे ही सुमति शिष्य गुरु से योग्यता में अत्याधिक बढ़ जाये तो भी गुरु का उपकार नहीं भूलता ।
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गुरु बूंद शिष समुद्र का, मिलत महातम जोय ।
परफुल्लित सायर१ सुगुण, उठत बुदबुदे होय ॥२४॥
२४ में गुरु शिष्य मिलन-माहात्म्य बता रहे हैं - जब बिन्दु समुद्र से मिलती है तब समुद्र प्रसन्न होता है, इसी से समुद्र१ में बुदबुदे उठते हैं । वैसे ही जब शिष्य को गुरु मिलते हैं, तब शिष्य में सुन्दर गुण उत्पन्न होते हैं । यही गुरु और शिष्य के मिलन का माहात्म्य है ।
(क्रमशः)

सोमवार, 30 मार्च 2026

ध्यानीबाई

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*॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥*
*॥ दादूराम~सत्यराम ॥*
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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अध्याय १६ -
आचार्य पर्व -
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४- वि. सं. १७५० में आचार्य फकीरदासजी महाराज के ब्रह्मलीन होने पर आचार्य गद्दी पर बैठने का फिर विवाद चल पडा । कई व्यक्ति गद्दी पर बैठने के लिए तैयार हो रहे थे । सभाकुमारी जी की शिष्या और फकीरदासजी की सहोदरा बहिन ध्यानीबाई जी बहुत उज्चकोटि की संत थी । उसने विवाह नहीं किया था । आजन्म ब्रह्मचारिणी रही थी । 
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सभाकुमारी से उसने दादूजी महाराज की साधन पद्धति जान कर साधन किया था । इससे वह महान् संत बन गई थी । ज्ञान, भक्ति, योग आदि परमार्थिक  साधना में वह संतों से भी आगे बढी हुई थी । उस समय नारायणा दादूधाम के सभी संत ध्यानीबाई की परमार्थिक  योग्यता से अति प्रभावित थे । गद्दी पर बैठने के विवाद की बात ध्यानीबाई को जब ज्ञात हुई तो साधु समुदाय में उसने कहा- ‘संतों कुछ सोच विचारकर बात करो, गादी पर बैठने के लिये ऐसे आतुर हो रहे हो जैसे लोग बताशा प्रसाद लेने को तैयार होकर आगे बढते हैं किन्तु गादी प्रसाद तो नहीं है । मेरे गुरु सभाकुमारी जी ने जैसा किया था इस समय मुझे उनका अनुकरण करना पडेगा । गादी आप महानुभावों में से किसी को भी नहीं मिलेगी । 
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जो गादी के योग्य होगा उसी को गादी पर समाज बैठायेगा । मैं बैठूं , मैं बैठूं करने वालों को बैठना चाहता ही उचित नहीं है । जो बिना अधिकार गादी पर बैठना चाहता हो तो वह समाज को निराशा का उपदेश भी कैसे कर सकता है । कारण- वह तो स्वयं गद्दी की आशा से बन्धा हुआ है । अत: जब तक समाज एक मत होकर योग्य आचार्य को नहीं बैठायेगा तब तक आचार्य का कार्यभार मैं संभाला करुंगी ।
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सभाकुमारी की शिष्या ध्यानीबाई का उक्त भाषण सुनकर सब मौन रहे । गद्दी पर बैठने के लिये किसी भी व्यक्ति ने कुछ भी तो नहीं कहा । कारण- ध्यानीबाई की शक्ति को सब जानते थे और उनसे सब डरते थे । फिर गद्दी का कार्यभार ध्यानीबाई ने संभाल लिया । ध्यानीबाई के समय में एक चारण नारायणा दादूधाम में आया और ध्यानीजी से उसने कुछ मांग की । 
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ध्यानीजी ने उस की मांग पूरी नहीं की, इससे उसने देश भर में यह बात फैलाई कि - ‘‘दादू के सब ही मरे, ध्यानी बैठी पाट ।’’ 
यह उक्ति दूर दूर तक जा पहुँची । पंजाब प्रान्त में दौसा के महन्त सुखरामजी उस समय तीन सौ महात्माओं के साथ भ्रमण करते हुये दादूवाणी के उपदेशों द्वारा जनता को भगवान् के सम्मुख कर रहे थे । उनके पास भी उक्त उक्ति जा पहुँची । उन्होंने जब सुना कि - ‘‘दादू के सब ही मरे, ध्यानी बैठी पाट’’ तब उसी समय पंजाब से नारायणा दादूधाम के लिये प्रस्थान कर दिया । 
(क्रमशः)  

२२. आपने भाव को अंग १७/१९

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२२. आपने भाव को अंग १७/१९ 
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नीचै तैं नीचै सही, ऊंचै ऊपरि ऊंच । 
सुन्दर पीछै तैं पछै, आगै कौं न पहूंच ॥१७॥
श्रीसुन्दरदासजी महाराज जिज्ञासु को उपदेश देते हैं - हे जिज्ञासु ! इतना सब कहने के बाद तुम समझ गये होगे कि तुम्हारा भला बुरा जीवन तुम्हारे ही चिन्तन पर आधृत है । यदि तुम हीन चिन्तन करोगे तो तुम्हारा जीवन भी हीन होता चला जायगा । यदि तुम उत्तम चिन्तन करोगे तो तुम्हारा जीवन भी उत्कृष्टता की ओर बढ़ेगा । यदि तुम प्रतिकूल चिन्तन करोगे तो तुम पिछडते ही जाओगे, जीवन में आगे नहीं बढ़ सकते । तुम्हारी आध्यात्मिक उन्नति कभी नहीं हो सकती ॥१७॥
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बाहिर भीतरि सारिखौ, ब्यापक ब्रह्म अखंड । 
सुन्दर अपने भाव तें, पूरि रह्यौ ब्रह्मंड ॥१८॥
यदि तुम आध्यात्मिक चिन्तन करोगे तो तुम्हें शीघ्र ही ज्ञात हो जायगा कि यह समस्त जगत्(ब्रह्माण्ड) बाहर भीतर एक सा है, क्योंकि इसमें सर्वत्र निरञ्जन निराकार प्रभु व्याप्त हैं ॥१८॥
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याही देखत सूर सौ, याही देखत चंद । 
सुन्दर जैसी भाव है, तैसौ ई गोबिंद ॥१९॥
जो व्यक्ति सूर्य को सूर्य भाव से देखता है उसको वह सूर्य ही दिखायी देता है, जो चन्द्रमा को चन्द्रमा के भाव से देखता है तो उसे वह चन्द्रमा ही दिखायी देता है; इसी प्रकार जो भक्त निरञ्जन निराकार राम को उस भाव से देखता है उसके सम्मुख वे वे प्रभु उसी रूप में प्रकट होते हैं ॥१९॥
(क्रमशः)

बषनां मैल बिचारि करि

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*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*शरीर सरोवर राम जल, माहीं संजम सार ।*
*दादू सहजैं सब गए, मन के मैल विकार ॥*
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*मन ॥ साषी लापचारी की ॥१* (१ इसका अर्थ “मन कौ अंग” की साषियों में देखो)
बषनां मैल बिचारि करि, धोयौ नहीं गवारि ।                                         
पाणी पाप न ऊतरे, भावै सौ सौ डूंभी मारि ॥
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पद ॥
भाई रे सो संजम क्या कीजै । जिनि मांहिला मैल न भीजै ॥टेक॥
जे मन का मैल न धोवै । तौ कपट कियाँ क्या होवै ॥
मन का मैल गमावै । तौ निर्मल ह्वै आवै ॥
जे काया मांहि न खोलै । तौ क्या बाहरि जलि ढोलै ॥
मैल रह्या जिहिं ठाँई । तहाँ पाणी पहुँचै नाहीं ॥
जौ लग भरम न छूटै । तौ लग काट न खूटै ॥
भरम छाड़ि जब दीजै । तौ दीवै दीवा कीजै ॥
बाहरि मैल न होई । जाणैं तहाँ सब कोई ॥
जाणि बूझि ही कीजै । तौ बषनां हरि क्यूँ धीजै ॥८६॥
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संजम = पातंजलयोगसूत्र में धारणा, ध्यान तथा समाधि का समेकित नाम संयम बताया गया है । व्यवहार में तन का संजम तथा मन का संजम दो शब्दावली प्रचलित हैं । यहाँ तन-संजम को हेय = अनुपादेय बताकर मन के संजम को साधनामार्ग में अपरिहार्य बताया गया है । तुलसीदासजी ने ‘संजम यह न विषय की आसा’ कहकर मन के संयम को ही संयम माना है । खोलै = धोवै । जौ, तौ = जब तक, तब तक (ठेठ ब्रज भाषा के शब्दों का प्रयोग) कपट = पाखंड = वाह्याचार । 
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काट = कल्मष, मैल, विकार । खूटै = समाप्त हो । दीवै दीव = अभी तक जिस दिव्य आत्मा को कर्त्ता भोक्ता मानता है, वह दिव्यात्मा अपने निजी दिव्य रूप में ही बोध होने लगेगी । आत्मा न कभी कर्त्ता भोक्ता थी न है और न होगी । जीव अज्ञान से आत्मा को कर्त्ता भोक्ता मान लेता है । धीजै = विश्वास ।
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हे भाई ! ऐसा क्या संयम करते हो जिसके करने से अन्तःकरण के मैल = पापों का अंत ही नहीं होता है, अंतःकरण धुलकर निर्मल नहीं होता है । ऐसे पाखंड = आचारों को करने से क्या होने वाला है जिनके करने से मन के मैल ही न घुलते हों अथवा जो मन के मैलों को धो सकने में समर्थ ही नहीं हैं । 
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वस्तुतः यदि वे मन के मैलों को मिटा दें तो मन निर्मल हो जाता है और निर्मल-मन-जन ही परमात्मा को प्रियकर होते हैं “निर्मल मन जन सो मोहि पावा । मोहि कपट छल छिद्र न भावा ॥” (मानस, श्रीरामवाक्य) यदि तुम शरीर के अंदरूनी भाग को नहीं धोते हो तो उसे बाहर मात्र से धोने से, उसके ऊपर जल ढोलने से तात्पर्य ? 
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जिस जगह मैल रहते हैं, वस्तुतः वहाँ जल पहुँचता ही नहीं है ? जब तक भ्रम = (आत्मा में अनात्मा तथा अनात्मा में आत्मा तत्त्व की प्रतीति और कथन ही भ्रम है, सीधे शब्दों में विपरीत प्रतीति को ही भ्रम कहते हैं) समाप्त नहीं होता तब तक अंतःकरण में विद्यमान अनात्मतत्वों के प्रति आसक्ति, विकार व पाप समाप्त नहीं हो सकते । 
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जिस समय भ्रम को छोड़ दोगे; बस, उसी समय तुम अपने असली रूप को पहचानकर परमात्मस्वरूप हो जाओगे । इस बात को सभी लोग जानते हैं कि शरीर के बाह्य भाग में मैल = पाप, विकार नहीं होते । इसके उपरान्त भी जानते समझते हुए भी यदि तुम आचार विचार ही करते हो तो फिर तुम पर परमात्मा किसी भी प्रकार विश्वास नहीं कर सकता, कभी भी तुम्हें अपना नहीं सकता ॥८६॥ 

रविवार, 29 मार्च 2026

सूनी गादी देखकर

*#daduji*
*॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥*
*॥ दादूराम~सत्यराम ॥*
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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अध्याय १६ -
आचार्य पर्व -
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२- उनके जाने पर केवलरामजी ने अपनी बुद्धि में विचार किया कि राजा का कथन तो सर्वथा सत्य ही है, मुझे गद्दी तो छोड ही देनी चाहिये । फिर वे गद्दी छोड कर बादशाह जहांगीर ने गरीबदासजी के निवास के लिये जो महल बनाया था उसमें आकर रहने लगे । गद्दी पर बैठता छोड दिया । तब सूनी गद्दी देखकर बीसों साधु गद्दी पर बैठने को तैयार हो गये और वे परस्पर कहने लगे मेरा अधिकार है मैं बैठूंगा, मैं बैठूंगा, मैं बैठूंगा । यह होने लगा । 
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केवलराम जी चार वर्ष तक गद्दी पर विराजे थे । कहा भी है-
‘गरीबदास गरीब के शिष्य सु केवलदास । 
 चार वर्ष गादी तपे, पूरण प्रेम प्रकाश ॥’ (वासुदेव )
उक्त गादी पर बैठने की गडबड की बात किसी ने सभाकुमारी जी को सुनाई तब सभाकुमारी ने आकर कहा- 
‘‘सूनी गादी देखकर सभाकुमारी आय ।  
सभाकुमारी बोलिया, सुनियो संत सधीर । 
गादी म्हारा बीर की, तामें म्हारो सीर ॥’’ (दौलतराम) 
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सभाकुमारी जी ने कहा- ‘‘धैर्यमान् संतों- मेरी बात सुनो- गद्दी पर तो बैठ सकता है, जिसका अधिकार हो और समाज जिनको बैठाये । अत: किसी का भी गद्दी पर बैठने का अधिकार नहीं है किन्तु मेरे बडे भ्राता गरीबदासजी की गद्दी है । केवलरामजी  का अधिकार भी था किन्तु समाज उन्हें नहीं चाहता था । अत: उन्होंने गद्दी त्याग दी ।उनके लिये यह श्‍लाघनीय बात है किन्तु अब तो जिसको अधिकार होगा और जिसको समाज एकमत होकर बैठायेगा वही बैठेगा । तब तक गादी का संरक्षण मैं स्वयं करुंगी ।’’ 
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३- सभाकुमारी महान् तपस्विनी गार्गी के  समान तत्वनिष्ठ बाल ब्रह्मचारिणी और दादूजी महाराज की शिष्या, गरीबदासजी की सहोदरा बहिन थी । उनका प्रभाव समाज पर अच्छा था । अत: जब तक समाज में एकता नहीं आई तब तक आचार्य का कार्य सभाकुमारी जी ने किया । 
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तीन वर्ष में सब एकमत हो गये और निश्‍चय किया कि - परम विरक्त दादूजी महाराज के शिष्य और गरीबदासजी के भाई तथा छोटे गुरु भाई मसकीन दासजी ही वास्तव में गद्दी के अधिकारी हैं । उन्हें ही गद्दी पर बैठाना योग्य है । सभाकुमारी जी ने भी यह बात मान ली । 
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कहा भी है- ‘सभाबाई तीन वर्ष’(गुरु पद्धति) । चौथे वर्ष सब समाज ने परम विरक्त भजनानन्दी महान् महात्मा मसकीन जी को आचार्य गद्दी पर विराजमान किया और आनन्द के साथ मसकीनदासजी महाराज समाज का संचालन करने लगे । समाज में भी मत- भेदों के मिट जाने पर परमानन्द की लहर चल पडी । सब ओर अपने भजनानन्दी आचार्य का अनुकरण करके अपना समय भजन ध्यान में ही व्यतीत करने लगे । निष्पक्ष दादूवाणी के प्रवचनों का आनन्द लेने लगे ।
(क्रमशः) 

२२. आपने भाव को अंग १३/१६

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२२. आपने भाव को अंग १३/१६ 
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सुन्दर अपने भाव करि, पूजै देवी देव । 
यह मैं पायौ पुत्र धन, बहुत करी तीं सेव ॥१३॥
पुरुष अपने मन के भावों के कारण ही किसी देवी-देवता की पूजा-आराधना में लगता है तथा अकस्मात् उस का फल(पुत्रोत्पत्ति आदि) मिल जाने पर वह सोचने लगता है कि उस देवी-देवता की अतिशय आराधना के कारण ही मेरे यहाँ यह पुत्र उत्पन्न हुआ है ॥१३॥
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सुन्दर सूकै हाड कौं, स्वान चचोरै आइ । 
अपनौई मुख फोरि कै, लोही चाटै खाइ ॥१४॥ 
जैसे कोई मूर्ख कुत्ता सूखी हड्डी चबाने के कारण उसकी रगड़ से उसके मसूड़ों से निकले हुए रक्त को चूस चूस कर वह समझने लगता है कि यह मधुर स्वाद उस सूखी हड्डी से ही निकल रहा है ॥१४॥
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सुन्दर अपने भाव करि, आप कियौ आरोप । 
काहू सौं सन्तुष्ट ह्वै, काहू ऊपर कोप ॥१५॥
यह मनुष्य अपने मन में उद्भूत विचारों के कारण कभी स्वयं को ही उपालम्भ(आरोप) देने लगता है और कभी किसी से प्रसन्न होता है और कभी दूसरों पर क्रोध करने लगता है ॥१५॥
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अपनौ ई सब भाव है, जो कछु दीसै और । 
सुन्दर समुझै आतमा, तब याही सब ठौर ॥१६॥
यहाँ वस्तुतथ्य(सचाई) यह है कि मनुष्य के ये अपने ही मानसिक विचार हैं जिस से वह अन्यथा(विपरीत) सोचने लगता है । यदि वह यह सब कुछ छोड़कर केवल अध्यात्मचिन्तन करने लगे तो उसकी ये सब भ्रान्तियाँ स्वतः ही मिट जायँ ॥१६॥
(क्रमशः)

मन मूरिखा रे

 
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*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*दादू जग दिखलावै बावरी, षोडश करै श्रृंगार ।*
*तहँ न सँवारे आपको, जहँ भीतर भरतार ॥*
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*सच ॥*
मन मूरिखा रे, कहीं अनत न बहिये ।
मनसा ठौर राखि, केवल राम नाम कहिये ॥टेक॥
ऊपराँ पाणी पखालै, मांहिला मैल न जांहिला ।
न्हायाँ धोयाँ जे तिरै, तौ मींडक पाणी मांहिला ॥
बादि ही मूरिख मूँड मुँडायौ, मन मांहै काती बुरी ।
मूँड मुँडायाँ जे भौ तिरै, तौ भेड़ जाइ सरगापुरी ॥
बहुत दिन लग दूध पीयौ, देही राखी आछियाँ ।
दूधाधारी जे तिरै, तौ पहिली तिरसें बाछियाँ ॥
राम नाम न लियौ काथ पीयौ, अरु अंग न वौढ्यौ कापड़ा ।
इहिं करणीं बैंकुठि जासी, तोही ज म्रिधा बापड़ा ॥
राम नाम तारै राम नाम तिरै, आन मारग मति गहै ।
बषनां कोई बुरौ मानैं, तौ बूझौ जाइ गीता कहै ॥८५॥
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हे मूर्ख मन ! अपनी वृत्ति को केवल राम-राम-स्मरण रूपी सुस्थान, शुभकार्य में लगा कर रख । इसे राम-नाम-स्मरण के अतिरिक्त अन्य किसी भी विषय की ओर मत जाने दे । याद रख, शरीर को ऊपर से पानी से धोने से कुछ भी होने वाला नहीं है क्योंकि अंदर रहने वाले मन के मैल तो पानी से धुलते नहीं हैं ।
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यदि नहाने-धोने से ही मुक्ति मिलती हो तो मैंड़क तो सदैव पानी में ही रहता है । उसकी मुक्ति तो हो ही जानी चाहिये किन्तु होती नहीं है । अतः नहाना-धोना भ्रम है । मूर्ख व्यर्थ ही शिर को मुंडवाता है जबकि मन में बुरा चिंतन करता है । यदि मूंड मुंडाने से ही भवसागर से पार जाना संभव है तो भेड़ सर्वप्रथम मोक्ष को प्राप्त होगी क्योंकि उसके शरीर से तो वर्ष में कई बार बाल काटे जाते हैं ।
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बहुत दिनों तक अन्न का त्याग करके मात्र दूध का आहार किया और शरीर को निरोग रखा । यदि दूधाहारियों की मुक्ति होती है सर्वप्रथम उस बछिया की मुक्ति होगी जो गाय के स्तनों से सीधे ही दूध पीती है । राम-नाम का स्मरण न करके क्वाथ = काढा पिया और अंग पर कपड़े नहीं पहने (क्वाथ का अर्थ शीघ्र दौड़ना भी है । हिरण शीघ्र दौड़ता है तथा वस्त्र नहीं पहनता है । उल्टे उसी की खाल को संत महात्मा कमर में कटिवस्त्र के रूप में पहनते हैं) ।
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यदि शीघ्र दौड़ने = तीर्थ यात्रा करने से तथा वस्त्र न पहनने से ही बैकुंठ की प्राप्ति होती हो तो मृग बेचारा मृग हुआ क्यों दौड़ता फिरता है । क्यों नहीं उसकी मुक्ति हो जाती । हे मन ! हे जीव ! ! रामनाम ही तारता है । रामनाम के स्मरण करने से ही जीव तिरता है । अतः राम-नाम-स्मरण के अतिरिक्त अन्य किसी और साधन का आश्रय मत ले ।
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बषनांजी कहते हैं कि मेरी बातों का कोई बुरा मन मानों । यदि किसी को मेरी बातें कड़वी लगें तो उसे चाहिये कि वह गीता को पढ़े । अर्थात् मैंने जो बातें ऊपर कहीं हैं वे मनगढंत नहीं है । उनका समर्थन गीता करती है ॥८५॥
“अशास्त्रविहितं घोरं तप्यंते ये तपो जनाः ।
दम्भाहंकारसंयुक्ता कामरागबलान्विताः ॥
कर्शयन्तः शरीरस्थं भूतग्रामचेतसः ।
मां चैवान्तः शरीरस्थं तान्विद्धयासुरनिश्चयान् ॥” गीता १७/५-६॥

*७.आज्ञाकारी का अंग ~ १७/२०*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*७.आज्ञाकारी का अंग ~ १७/२०*
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चेला चेतन चाहिये, ज्यों अक्षर१ शब्द हि लेय ।
रज्जब शिष श्रद्धा यही, गुरु मत जान न देय ॥१७॥
शिष्य को गुरु-वचन ग्रहण करने में इस प्रकार सावधान रहना चाहिये, जिस प्रकार अक्षरों को ग्रहण करने में शब्द रहता है । शब्द में एक मात्रा की कमी हो तो भी अखरती है । वैसे ही शिष्य को भी अपनी कमी अखरना चाहिये वा जैसे भी शब्दों द्वारा अविनाशी१ ब्रह्म का स्वरूप समझ सके वैसे ही शिष्य को सावधान रहना चाहिये । शिष्य की उत्तम श्रद्धा की यही पहचान है कि वह गुरु के सिद्धांत को अपने हृदय से नहीं जाने दे ।
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बावन अक्षर सेवका, सद्गुरु शब्द समान ।
रज्जब दुहुँ सों एक व्है, सो गुरु शिष्य प्रमान ॥१८॥
१८ में गुरु-शिष्य की प्रमाणिकता बता रहे हैं - जैसे वर्णमाला के बावन अक्षर और शब्द मिलाकर एक हो जाते हैं । वैसे ही गुरु और शिष्य दोनों मिलने पर ब्रह्म रूप में एक हो जावें वे ही गुरु-शिष्य प्रामाणिक हैं ।
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शिष श्रद्धा जंतर घटी, सद्गुरु जंत्रक जान ।
रज्जब रहिये कंध चढ़, सकल कला उर ठान ॥१९॥
शिष्य की श्रद्धा सितार घटिका के समान है और गुरु सितार बजाने वाले के समान हैं । सितार आदि वाद्यों की तुम्बी जो उनके ऊपर होती है, वह जब बजाने वाले के कंधे पर जाकर वहां ठहरती है तब गायन सम्बन्धि सभी कलायें उससे निकलती हैं । वैसे ही शिष्य की श्रद्धा जब गुरु में होती है, तब उसके हृदय में सभी अध्यात्म विषय अवगत हो जाते हैं ।
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तेल लौण आफु१ रु गुड़, पय२ पाणी सौं मेल ।
त्यों रज्जब गुरु ज्ञान में, शिष्य सुमति का खेल ॥२०॥
२०-२३ में सुमति शिष्य का परिचय दे रहे हैं - जैसे एक ही जल के मेल से तिल में तेल, भूमि में लवण, अफीम१ के डोडे में अफीम, ईख में गुड़ और दूध वाले वृक्षों में दूध२ होता है । वैसे ही एक गुरु के उपदेश से अनेक प्रकार के शिष्य तैयार होते हैं किन्तु ब्रह्म-प्राप्ति रूप खेल का आनन्द किसी सुमति शिष्य को ही प्राप्त होता है, सब को नहीं ।
(क्रमशः)

शनिवार, 28 मार्च 2026

‘‘करामात कलंक है’’

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*॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥*
*॥ दादूराम~सत्यराम ॥*
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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अध्याय १६ -
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आचार्य प्रणाली की कुछ घटनायें  जिन २ आचार्यों का जो२ वृत्तान्त मुझे प्राप्त हो सका है, वह मैंने इस आचार्य पर्व में अंकित कर दिया है । किन्तु कुछ आचार्य प्रणाली में न आने वालों के नाम भी कुछ ग्रंथों में आचार्य गद्दी पर समाज की इच्छा के बिना भी कुछ कुछ ने अपना अधिकार रक्खा है । अत: उनका परिचय देना भी उचित समझकर अब उनका परिचय दिया जाता है-  
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१- गरीबदासजी महाराज ने रज्जबजी द्वारा कहे हुये अपने भेंट के सवैया ‘दादू के पाट दिपे दिन दिन ही’ में मारक गणों का प्रयोग देखकर समझ लिया कि मेरा शरीर अब अधिक दिन नहीं रहेगा । अत: मुझे अब शीघ्र ही गद्दी छोड देनी चाहिये । फिर उन्होंने अपने निश्‍चय के अनुसार वि. सं. १६९२ मार्गशीर्ष शुक्ला १३ को गद्दी छोड दी और भैराणे जाकर भजन करने लगे । 
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कुछ जन श्रुति ऐसी भी सुनने में आई है कि वे नारायणा दादूधाम से दक्षिण की और मालपुर, जूनिया, होडोलाई की ओर पधार गये थे । किन्तु दौलतराम जी ने महन्त लीला प्रकरण में भैराणे जाकर भजन करने का उल्लेख किया है । हो सकता है भैराणे से उक्त ग्रामों के भक्त उनको ले गये हों । गद्दी छोडने के समय गरीबदासजी के मुख्य शिष्य केवलरामजी नारायणा दादूधाम में नहीं थे । बीजराणा के सेवकों के साथ गये हुये थे । 
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आगे जब उन्हें ज्ञात हुआ कि महाराज यहाँ नहीं हैं, सदा के लिए गद्दी का त्याग करके पधार गये । तब केवलराम जी उक्त ग्रामों की ओर जाकर गुरुदेव जी की सेवा में उपस्थित हुये । उधर कुछ बणजारे भक्तों को गरीबदासजी का सत्संग प्राप्त होने से वे गरीबदासजी के भक्त बन गये और सेवा करने लगे । और उधर ही आप वि. सं. १६९३ पौष कृष्णा १३ बृहस्पतिवार को ब्रह्मलीन हुये । 
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फिर केवलरामजी उनके शरीर को लेकर भैराणे आये । ऐसी जन श्रुति कनिरामजी स्वामी नारायणा ने सुनाई है किन्तु किसी भी ग्रंथ में यह विवरण मुझे नहीं मिला है । भैराणे जाकर भजन करने का उल्लेख मिला है । फिर केवलराम जी भैराणे से नारायणा दादूधाम में आये । गद्दी पर तो कोई था ही नहीं अत: अपने आप ही केवलराम जी गद्दी पर बैठ गये । 
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इस समय सभाकुमारी जी ने भी इनको गद्दी पर बैठने से नहीं रोका । कारण- ये गरीबदासजी के मुख्य शिष्य थे ही । फिर जब अजमेर के एक कायस्थ सज्जन सूबा अजमेर के भय से भाग कर केवलराम जी की शरण आये और उनको पकडने कुछ सैनिक आये । उनसे उक्त कायस्थ सज्जन की रक्षा के समय आपके विलक्षण चमत्कार से कई सैनिकों के प्राण गये । 
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उस घटना को सुनकर तत्कालीन किशनगढ नरेश केवलरामजी महाराज के दर्शन करने आये और अजमेर के कायस्थ सज्जन जो अब केवलरामजी के शिष्य होकर ‘रामदास’ बन गये थे, उनका प्रसंग चलने पर किशनगढ नरेश ने हाथ जोडकर केवलरामजी को कहा- स्वामिन् ! दादूजी महाराज ने कहा है- ‘‘करामात कलंक है’’ किन्तु आपने दादूजी के कथन को न मानकर अपनी करामात से कई मानवों के प्राणान्त करवा ही दिये । 
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दूसरे आप समाज की इच्छा न होने पर भी गद्दी पर अपनी शक्ति के बल पर ही तो विराजे हुये है । आप जैसे समर्थ संतों को यह व्यवहार शोभा नहीं देता है । आपका विरोध भी कौन कर सकता है । आपको ही सोचना चाहिये । जिससे समाज में एकता बनी रहे ऐसा ही व्यवहार आपको करना चाहिये । किशनगढ नरेश उक्त प्रार्थना करके चले गये ।  
(क्रमशः)

२२. आपने भाव को अंग ९/१२

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२२. आपने भाव को अंग ९/१२ 
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सुन्दर याकै ऊपजै, काम क्रोध अरु मोह । 
याही कै ह्वै मित्रता, याही कै ह्वै द्रोह ॥९॥
अतः श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - इन उपर्युक्त तीन उदाहरणों से स्पष्ट हो जाता है कि काम, क्रोध, और मोह, मित्रता एवं वैर(द्रोह) पुरुष अपने मन में ही उत्पन्न होते हैं, अन्य किसी से इसका कोई लेना - देना नहीं है । विद्वानों का भी कहना है - मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः ॥९॥
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आपु हि फेरी लेत है, फिरते दीसै आंन । 
सुन्दर ऐसै जानि तूं, तेरौ ही अज्ञांन ॥१०॥
जैसे भ्रमिचक्र(हिंडोला) में बैठा हुआ पुरुष स्वयं घूमता है; परन्तु उस को दूसरे लोग घूमते हुए प्रतीत होते हैं; ऐसे ही जिज्ञासु को जानना चाहिये कि उस को दूसरे में दिखायी देने वाले राग द्वेष आदि के भाव उस के अपने हृदय के अज्ञान की ही उपज हैं ॥१०॥
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सुन्दर याकै संक ह्वै, याही ह्वै निहसंक । 
याही सुधौ ह्वै चलै, याही पकरै बंक ॥११॥
पुरुष को अपने ही मन में विविध शङ्काएँ उद्भूत होती हैं तथा उन के उत्तर भी उसी मन से मिलते हैं । उसका अपना मन कभी सीधा(सात्त्विक भाव से) चलता है या कभी वही मन बांकापन(द्वेष भाव) ग्रहण कर लेता है ॥११॥
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सुन्दर याकै अज्ञता, याही करै बिचार । 
याही बूडै धार मैं, याही उतरै पार ॥१२॥
श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - पुरुष के ही मन में अज्ञता(अज्ञान या मूर्खता) उद्भूत होती है तो कभी यही मन विचार(विवेक) पूर्वक ज्ञान का व्यवहार करने लगता है । यही कभी अपने विचारों से प्रबल जलधारा(गम्भीर सङ्कट) में डूबने लगता है तो कभी यही स्वयं अपने विचारों से उसके पार पहुँच जाता है ॥१२॥
(क्रमशः)

*चांणक उपदेश ॥*

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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*दादू माया मगन जु हो रहे, हमसे जीव अपार ।*
*माया माहीं ले रही, डूबे काली धार ॥*
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*चांणक उपदेश ॥*
मन रे हरत परत दुवै हार्या ।
रामचरण जौ तैं हिरद्यौं बिसार्या ॥टेक॥
माया मोह्यौ रे क्यूँ चीति न आयौ । 
मनिख जमारौ तैं अहलौ गमायौ ॥
कण छाड्यौ निकणैं चित लायौ । 
थोथिरौ पिछौड़्यौ क्यूँ हाथि न आयौ ॥
साच तज्यौ झूठै मन मान्यूँ । 
बषनां भूलौ रे तैं भेद न जान्यूँ ॥८४॥
हरत-परत = गिरते-पड़ते, दुनियावी कामों को करते करते “गृह कारिज नाना जंजाला । ते अति दुर्गम सैल बिसाला ॥” दुवै = दोनों-लोक तथा परलोक । अहलौ = व्यर्थ ही । निकणैं = अतत्व । थोथिरौ = पोला, खाकला । पिछौड्यौ = गाहा, कूटा, दाँय की ।
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हे मन ! तूने रामजी के चरण-कमलों को हृदय में से विस्मृत कर देने व सांसारिक काम-काजों को करते रहने के कारण, विषयों को भोगते रहने के कारण दुवै = लोक और परलोक दोनों को ही हार दिया है । तू माया में ही मोहित हुआ रहा । उसके अतिरिक्त कुछ और भी है, इसका तूने जरा भी चिंतन नहीं किया । 
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देवों को भी दुर्लभ मनुष्य शरीर तूने यौंही = व्यर्थ ही बर्बाद कर दिया । तूने कण रूपी परमात्मा को छोड़कर निकण = खाकले रूपी माया में अपना मन लगाये रखा । वस्तुतः तू जीवन भी खाकले को ही कूटता रहा जिससे तेरे हाथ कण का लेश भी नहीं आया । तूने त्रिकालावाधित सतस्वरूप परमात्मतत्व को छोड़ दिया और झूठै = केवल मध्य में ही दीखने वाली माया को अंगीकृत कर लिया । 
“अव्यक्तादीनि भूतानि व्यक्तमध्यानि भारत । 
अव्यक्त निधनान्येव तत्र का परिदेवना ॥गीता २/२८॥” 
बषनां कहता है, हे मनुष्य तू भ्रम में पड़ गया । तूने सच-झूठ का, नित्य-अनित्य का, अपने-पराये का रहस्य नहीं जाना ॥८४॥

*७.आज्ञाकारी का अंग ~ १३/१६*

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*🌷卐 सत्यराम सा 卐🌷*
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*७.आज्ञाकारी का अंग ~ १३/१६*
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*आज्ञा में ऊभा रहै, एक मना इकतार ।*
*रज्जब उज्वल अनन्य ह्वै, वह उतरेगा पार ॥१३॥*
जिसका हृदय उज्वल है और जो एक मन से सदा गुरु-गोविन्द की आज्ञा में ही खड़ा रहता है, वह अनन्य दशा को प्राप्त होकर संसार-सागर से अवश्य पार हो जायगा ।
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*आज्ञा में अघ ऊतरैं, आज्ञा पावन प्राण ।*
*सो आज्ञा आठों पहर, जन रज्जब उर आन ॥१४॥*
गुरु-गोविन्द की आज्ञा में चलने से पाप नष्ट हो जाते हैं, प्राणी पवित्र हो जाता है, उस गुरु-गोविन्द की आज्ञा को अष्ट पहर हृदय में रखना चाहिये ।
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*आज्ञा में ऊंची दशा, आज्ञा उत्तम ठौर ।*
*उभय एक आज्ञा चल्यों, सो आज्ञा शिर मौर ॥१५॥*
गुरु-गोविन्द की आज्ञा में चलने में उच्च अवस्था और उत्तम स्थान प्राप्त होता है, जीव-ब्रह्म दोनों एक हो जाते हैं । यह आज्ञा पालन रूप साधन सभी साधनों में शिरोमुकुट के समान है ।
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*शिष श्रद्धा यों चाहिये, ज्यों वसुधा रतिवन्त ।*
*रज्जब वर्षा गुरु वयन, लिया दशों दिश कन्त ॥१६॥*
१६-१७ में शिष्य को प्रेरणा कर रहै हैं - जैसे पृथ्वी की श्रद्धा इन्द्र में होती है तब वर्षा रूप से पृथ्वी अपने स्वामी इन्द्र को प्राप्त करती है । वैसे ही शिष्य की श्रद्धा गुरु वचनों में होनी चाहिये तभी दशों दिशा में परमात्मा का साक्षात्कार होता है ।
(क्रमशः)