*🌷卐 सत्यराम सा 卐🌷*
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*१५. विरक्त् का अंग ~१७/२०*
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*मनसा वाचा कर्मना, गहै न त्यागन हार ।*
*रज्जब रुचे न ऊगले, उर अबला रु आहार ॥१७॥*
जो मन, वचन, कर्म से त्याग देता है, वह पुन: ग्रहण नहीं करता, जैसे वमन करे हुये आहार को ग्रहण करने की इच्छा नहीं होती, वैसे ही त्यागी हुई नारी की इच्छा नहीं होती ।
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*रज्जब रवि को दरशते, अरुचि छींक चखि नीर ।*
*शक्ति सुन्दरी सन्मुखै, सो गति साधू वीर१ ॥१८॥*
सूर्य के समाने देखने से देखने की रूचि नहीं होती, छींकै आने लगती है और नेत्रों में पानी आने लगता है, देखने वाले की स्थिति बिगड़ जाती है, वैसे ही हे भाई१ स्वर्णादि माया और नारी के सामने देखने से विरक्त की स्थिति भी बिगड़ जाती है ।
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*कायर कोट२ हुं सौ गिर हिं, कंध न लेहि करवाल१ ।*
*त्यों अधपति३ अबल४ हुं सु डरि, गहै गरीबी हाल ॥१९॥*
कायर कंधे पर तलवार१ रखकर युद्ध में नहीं जाते तो भी किले२ पर से युद्ध करने वाले वीरों की तलवारों की चमक देख के भय से चक्कर खाकर नीचे गिर जाते हैं, वैसे ही राजा३ लोग विरक्तों के समान काम से युद्ध तो कहां सकते हैं, केवल काम के शस्त्र नारी४ से ही डरकर गरीबी दशा में आ जाते हैं, अर्थात दीन गरीब प्राणी के समान नारी के आगे उसकी गुलामी करते हैं ।
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*साधु सुत के जावणै२, हरि सिद्धि नहिं हेत ।*
*पूत नीपजे मात मरि, खोटा३ खच्चर बेत१ ॥२०॥*
खच्चरी के पेट रूप स्थान१ से जब खच्चर जन्मता है तब पेट को फाड़कर माता के मरने पर ही जन्मता है, अत: माता की दृष्टि से बुरा३ है । वैसे ही परमात्मा के विरक्त संतरूप पुत्र जन्मता२ है तब उसका हरि सिद्धि(माया) से प्रेम नहीं होता है, वह माया को नष्ट करके अर्थात मिथ्या समझ कर के ही होता है ।
(क्रमशः)


















