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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*पास पीव, परदेश है रे, जब लग प्रकटै नांहि ।*
*बिन देखे दुख पाइये, यहु सालै मन मांहि ॥*
*कहा करूँ कैसे मिले रे, तलफै मेरा जीव ।*
*दादू आतुर विरहनी, कारण अपने पीव ॥*
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विरह ॥
बिचालै अंतरौ रे, हरि हम भागौ नाहिं ।
को जाणैं कदि भाजिसी, म्हारौ पछितावो मन माहिं ॥टेक॥
आडा डूंगर बन घणाँ, नदियाँ बहै अनंत ।
सो पंखड़ियाँ पंजर नहीं, हौं मिलि मिलि आऊँ नित्त ॥
चरणाँ पाखैं चालिबौ रे, धरती पाखैं बाट ।
परबत पाखैं लंघणाँ, बिषमी औघट घाट ॥
जाताँ जाताँ ध्यौंहड़ा, म्हारै मनि पछितावौ होइ ।
जीवत मेलो हे सषी, मुवाँ न मिलसी कोइ ॥
हरि का दर्सन कारिण हे सषी, म्हारा नैंन रह्या जल पूरि ।
सो साजन अलगा हुवा, भ्वैं भारी घर दूरि ॥
पाती प्यारा पिव की, हुँ क्युँ बाँचूँ कर लेइ ।
बिरह महाघण ऊमट्यौ, म्हारा नैंण न बाँचण देइ ॥
बटाऊ उहिं बाट का, म्हारौ संदेसौ तिहि हाथि ।
आऊँली नांहीं रहूँ, काहु साधु जन के साथि ॥
ज्युँ बन कै कारणि हस्ती झूरै, चकवी पैली पार ।
यौं बषनां झूरै नाम कौं, ज्युं उलिगाणा की नारि ॥९५॥
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हरि और मेरे बीच में विद्यमान अन्तर(दूरी) अभी तक समाप्त नहीं हुआ है कौन जाने, यह अंतर = दूरी कब भागेगी । मेरे मन में तो बस इसी बात को लेकर नाना प्रकार की ऊहापोह होती रहती है । (पछितावौ = पश्चाताप का वाचक न होकर असमंजस = ऊहापोह की स्थिति का वाचक है ।) मेरे और परमात्मा के बीच दूरी होने के कारण = प्रतिबंधक अग्रांकित रूप से हैं ।
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सबसे बड़ा प्रतिबंधक अहंकार रूपी पर्वत है तथा मन की नाना वृत्तियों रूपी बीहड़ जंगल है और पाँच कर्मेन्द्रिय, पाँच ज्ञानेन्द्रिय तथा एक उभयात्मक मन रूपी इंद्रियों की नाना भोगों में आसक्ति ही नाना नदियों का बहना है । इन दुर्लघ्यों को लांघना शक्य नहीं जानकर मैंने सोचा कि मैं विवेक-विराग रूपी पंख लगाकर उड़कर प्रियतम से मिल लूँ किन्तु मेरे पंजर = शरीर में वैराग्य और विवेक रूपी पंख भी नहीं हैं कि मैं उड़कर प्रतिदिन प्रियतम से मिल कर आ जाऊँ ।
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धरती पर बिना राजमार्ग, पगडंडी के चलना, उस पर भी बिना पैरों के चलना, फिर दुर्गम पहाड़ों को बिना रास्ते व बिना पैरों के लांघना अत्यन्त ही ऊबड़ खाबड़ = बेतरतीब तथा विषमी =कष्टदायक है । दिन पर दिन जाते जा रहे हैं जिसके कारण मेरे मन में भारी असमंजस पड़ गया है कि जीते जी मेरा प्रियतम से मेल होगा अथवा नहीं । क्योंकि मरने के पश्चात् तो उससे मिलना संभव नहीं है, वह मिलेगा ही नहीं ।
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(यहाँ जीवन्मुक्ति की बात कही गई है) हे सखी ! प्रियतम हरि के दर्शन नहीं मिलने के कारण मेरे दोनों नेत्र रो-रो कर जल से भर गये हैं और मेरा वह प्रियतम मेरे से दूर परदेश में है । यदि तुम कहो कि मैं ही उसके घर चली जाऊँ तो हे सषी ! इसमें भी मेरी मजबूरी है क्योंकि भ्वैं-भूमि बहुत लम्बी-चौड़ी है जिसमें उसका घर बहुत दूरी पर बना हुआ है । मेरे हृदय में विरह रूपी महाघन अनवरत उमड़ता रहता है, बरसता रहता है जिससे मेरे नेत्रों से अजस्त्र अश्रुधारा गिरती रहती है जो प्रियतम की पत्रिका को बाँचने ही नहीं देती है ...
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(नेत्रों में तो विरह का जल भरा रहता है, फिर अक्षरों को कौन पढ़े । अथवा यदि बलपूर्वक अश्रुयुक्त आंखों से प्रियतम के पत्र को पढ़ने का प्रयत्न भी करूँ तो अश्रु पत्र पर गिरकर अक्षरों को मिटा देते हैं जो मुझे सह्य नहीं है क्योंकि प्रियतम का पत्र भी प्रियतम के समान ही है जिसे मिटाना मुझे अभीष्ट नहीं हैं । अतः प्यारे प्रियतम की चिट्ठी हाथ में लेकर कैसे बाँच सकती हूँ । )
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जिस स्थान पर मेरा प्यारा प्रियतम रहता है, उसी स्थान को जाने वाले राहगीर(गुरुमहाराज, साधु संत) के हाथों मैंने मेरा संदेशा प्रियतम को भेज दिया है कि हे प्रियतम ! तू कहीं भी किसी भी रूप में छिपकर मुझसे दूर हो जा किन्तु मैं किसी साधु = सज्जन पुरुष के साथ तेरे पास अवश्य आऊंगी (पहले के जमाने में औरतें अकेली यात्राएँ नहीं करती थीं । अत आपातकाल में वे ऐसे सज्जन पुरुषों के साथ यात्राएँ करती थीं जिनके साथ उनके शील भंग होने की संभावना बिलकुल नहीं रहती थी । यहाँ पर साधु महात्मा ही सज्जन पुरुष हैं ।)
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बषनांजी कहते हैं मैं रामजी को प्राप्त करने के लिये ठीक उसी प्रकार विरह निमग्न हूँ जिस प्रकार परदेशी(उलिगाणा) की पत्नी पति के लिये, जंगल से हटा राजप्रसादों की कैद में बंद हाथी बन के लिये तथा चकवी-चकवे के लिये रात भर दूसरी पार = तीर पर बैठी-बैठी मिलने की राह देखती है ॥९५॥















