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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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३१. अन्योन्य भेद कौ अंग ९/१२
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तेरै अनुभव होइ है, तबहिं जानि हैं बीर ।
मुख तें कही न जात है, सुन्दर सुख की सीर ॥९॥
इस का उत्तर यही है, भाई ! कि जब तुम्हें ऐसे किसी अनुमान का अनुभव होगा तभी तुम समझ पाओगे कि अनुभव क्या और कैसे होते है; क्योंकि किसी प्राप्त सुख का आकार या रूप वाणी से नहीं कहा जा सकता ॥९॥
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कन्या पूछत और त्रिय, पुरुष मिलै कौ सुक्ख ।
सुंदर परसी पीव कौं, तब कछु कहै न मुक्ख ॥१०॥
इस बात को इस उदाहरण से समझ लो - किसी कन्या(नाबालिग लड़की) ने अनेक विवाहित युवतियों से पूछा - पति से संसर्गसुख का क्या और कैसा अनुभव होता है ? परन्तु कोई युवति उसको स्पष्ट उत्तर न दे पायी । कालान्तर में जब उस कन्या का भी विवाह हो गया तो उस से यही प्रश्न पूछा गया तो वह भी इसका स्पष्ट उत्तर न दे पायी ॥१०॥
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गूंगै खाई सरकरा, सुन्दर मन मुसक्याइ ।
सैंन बतावै हाथ सौं, मुख तैं कही न जाइ ॥११॥
वास्तविकता भी यही है, वाणी से कोई आनन्द का यथातथ वर्णन नहीं कर सकता । जैसे कोई गूंगा(मूक) पुरुष गुड खाकर भी उसके माधुर्य का वर्णन करने के लिये कहने पर या तो मुस्करा देता है या कुछ संकेतमात्र करके रह जाता है; वही बात आनन्दप्राप्ति के अनुभव-वर्णन पर भी चरितार्थ होती है । वह भी इधर उधर के संकेतों के अतिरिक्त मुख से इस का स्पष्ट वर्णन नहीं कर सकता ॥११॥
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जिन जिन कौ अनुभव भयौ, तिन तिन पकरी मौंन ।
सुन्दर अनुभव गोपि है, चिन्ह बतावै कौंन ॥१२॥
यही बात आत्मानुभव के विषय में भी समझें । आज तक जितने ज्ञानियों ने आत्मा का अनुभव(साक्षात्कार) किया वे सब भी वाणी से आत्मा का यथातथ वर्णन नहीं कर पाये । पूछने पर भी मौन ही रह गये । महाराज श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - सभी अनुभव यथातथ रूप से अवर्णनीय होते हैं । उनका यथातथ आकार या रूप बताने का किसी में साहस नहीं होता है ॥१२॥
(क्रमशः)


















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