*🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏*
*🌷卐 सत्यराम सा 卐🌷*
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*१७. मोह मरदन निर्मोही का अंग ~१/५*
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*ज्यों सलित१ हु समदी२ मिलहिं, त्यों पंच तत्त्व परिवार ।*
*सो संतति कुछ है नहीं, रज्जब समझ विचार ॥१॥*
१-४ में मोह को नष्ट करके निर्मोही हुये ज्ञानी का परिचय दे रहे हैं - जैसे नदियाँ१ समुद्र२ में मिलती हैं वैसे ही पंच तत्त्व जन्म शरीरादि परिवार आत्मा से मिलता है । नदियों के आने से समुद्र की वृद्धि नहीं होती और जल उड़कर आकाश में जाने से ह्रास नहीं होता, वैसै ही पंच तत्त्व जन्म शरीरादि से आत्मा की वृद्धि तथा ह्रास नहीं होता । उक्त प्रकार से जो आत्मा को जान लेता है वह मोह को नाश करके निर्मोही हो जाता है, उसकी जो संतान आदि परिवार है वह आत्मा से भिन्न कुछ नहीं, कारण आत्मा का विवर्त्त है । विवर्त्त अधिष्ठान से भिन्न कुछ नहीं होता, जैसा रज्जु का सर्प रज्जु से भिन्न कुछ नहीं होता है ऐसा ही विचार के द्वारा अपने आत्मा को समझ कर साधकों को मोह नहीं करके निर्मोही होना चाहिये ।
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*ज्यो रज्जब नर नाव में, दह दिशि बैठैं आय ।*
*पार गये पंथो पड़ें, मोह न बाँध्या जाय ॥२॥*
जैसे पथिक नदी तट पर सभी दिशाओं से आकर नौका में बैठते हैं और नदी पार जाने पर अपने अपने मार्ग में चल पड़ते हैं, कौन किस के मोह में बँधता है, वैसे ही घर पर परिवार का संयोग वियोग है । मोह नष्ट करके निर्मोही हुआ ज्ञानी परिवार के मोह में नहीं बँधता ।
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*बहु विहंग बैठैं विरख, पंथी बसैं सराय ।*
*रज्जब मोह न बँध हिं, नर देखो निरताय ॥३॥*
रात्रि में वृक्ष पर बहुत से पक्षी आकर बैठते हैं और प्रात: सब उड़ जाते हैं, सराय में यात्री ठहरते हैं और चले जाते हैं, वृक्ष पक्षियों के और सराय यात्रियों के आने-जाने के हर्ष-शोक से नहीं बँधते, वैसे ही हे नरों ! विचार करके देखो, मोह को नष्ट करके निर्मोही बना ज्ञानी परिवार के मोह में नहीं बँधता ।
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*वैरी मिलहिं सु वैर विधि, ऋणी मिले ऋण भाय ।*
*रज्जब चूकै, वैण ऋण, पीछे रह्या न जाय ॥४॥*
परिवार में कुछ तो पूर्व जन्मों के वैरी आकर मिलते हैं और वैरी के समान दु:ख ही देते हैं । कुछ पूर्व जन्मों का ऋण देने तथा लेने आते हैं । वे सभी वैर तथा ऋण देने तथा लेने आते हैं । वे सभी वैर तथा ऋण चुक जाने पर मर करके चले जाते हैं फिर नहीं रहते, अत: ऐसे परिवार के मोह में मोह नष्ट करके निर्मोही हुआ ज्ञानी नहीं बँधता । अज्ञानी ही बँध कर क्लेश उठाते हैं ।
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*शीत कोट स्वपने की संपद्, माया मोह न बंध ।*
*रज्जब रार्यूं देख तों, कहा होय जाचंध१ ॥५॥*
निर्मोही बनने की प्रेरणा कर रहे हैं - बर्फ से बना हुआ किला वा गन्धर्व नगर और स्वप्न का धन जैसे मिथ्या है, वैसे ही यह व्यवहारिक मायिक मोह का बंधन भी प्रतीति मात्र ही है, वास्तव में नहीं है । बर्फ का किला और गन्धर्व नगर सूर्य की ताप बढ़ने पर और स्वप्न का धन जगने पर कुछ भी नहीं रहता । वैसे ही ब्रह्म-ज्ञान होने पर मायिक-मोह बँधन भी कुछ नहीं रहता । सब कुछ नाश होने वाले हैं, नष्ट होते देख भी रहे हैं किन्तु फिर भी प्राणी न जाने क्यों जन्माँध१ के समान हो रहा हैं, मोह को त्याग कर सुखी नहीं होता ।
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इति श्री रज्जब गिरार्थ प्रकाशिका सहित “१७. मोह मरदन निर्मोही का अंग” समाप्त ॥
(क्रमशः)



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