रविवार, 9 अगस्त 2026

३१. अन्योन्य भेद कौ अंग ९/१२

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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३१. अन्योन्य भेद कौ अंग ९/१२
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तेरै अनुभव होइ है, तबहिं जानि हैं बीर । 
मुख तें कही न जात है, सुन्दर सुख की सीर ॥९॥
इस का उत्तर यही है, भाई ! कि जब तुम्हें ऐसे किसी अनुमान का अनुभव होगा तभी तुम समझ पाओगे कि अनुभव क्या और कैसे होते है; क्योंकि किसी प्राप्त सुख का आकार या रूप वाणी से नहीं कहा जा सकता ॥९॥
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कन्या पूछत और त्रिय, पुरुष मिलै कौ सुक्ख । 
सुंदर परसी पीव कौं, तब कछु कहै न मुक्ख ॥१०॥
इस बात को इस उदाहरण से समझ लो - किसी कन्या(नाबालिग लड़की) ने अनेक विवाहित युवतियों से पूछा - पति से संसर्गसुख का क्या और कैसा अनुभव होता है ? परन्तु कोई युवति उसको स्पष्ट उत्तर न दे पायी । कालान्तर में जब उस कन्या का भी विवाह हो गया तो उस से यही प्रश्न पूछा गया तो वह भी इसका स्पष्ट उत्तर न दे पायी ॥१०॥
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गूंगै खाई सरकरा, सुन्दर मन मुसक्याइ । 
सैंन बतावै हाथ सौं, मुख तैं कही न जाइ ॥११॥
वास्तविकता भी यही है, वाणी से कोई आनन्द का यथातथ वर्णन नहीं कर सकता । जैसे कोई गूंगा(मूक) पुरुष गुड खाकर भी उसके माधुर्य का वर्णन करने के लिये कहने पर या तो मुस्करा देता है या कुछ संकेतमात्र करके रह जाता है; वही बात आनन्दप्राप्ति के अनुभव-वर्णन पर भी चरितार्थ होती है । वह भी इधर उधर के संकेतों के अतिरिक्त मुख से इस का स्पष्ट वर्णन नहीं कर सकता ॥११॥
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जिन जिन कौ अनुभव भयौ, तिन तिन पकरी मौंन । 
सुन्दर अनुभव गोपि है, चिन्ह बतावै कौंन ॥१२॥
यही बात आत्मानुभव के विषय में भी समझें । आज तक जितने ज्ञानियों ने आत्मा का अनुभव(साक्षात्कार) किया वे सब भी वाणी से आत्मा का यथातथ वर्णन नहीं कर पाये । पूछने पर भी मौन ही रह गये । महाराज श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - सभी अनुभव यथातथ रूप से अवर्णनीय होते हैं । उनका यथातथ आकार या रूप बताने का किसी में साहस नहीं होता है ॥१२॥
(क्रमशः) 

संतोषदासजी

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🌷*卐 श्री दादूदयालवे नम: 卐*🌷
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*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
*परमारथ को सब किया, आप स्वार्थ नांहि ।*
*परमेश्‍वर परमार्थी, कै साधु कलि मांहि ॥*
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संतोषदासजी = हरिदासजी के दो शिष्य थे । एक संतोषदासजी और दूसरे किशनदासजी । किशनदासजी ने अपना साधन धाम कोटपूतली में बनाया । वे वहां रहकर भजन करने लगे । माँदी ग्राम की सीमा ग्वालियर राज्य से लगती थी । वहाँ बड़ा वन था तथा नदी भी बहती थी । उस निर्जन स्थान में संतोषदासजी ने कई वर्ष कठोर तपस्या की । उनको प्रेमदासजी महाराज के दर्शन हुये और सिद्धावस्था भी प्राप्त हुई ।
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इनके तपस्या करते समय ग्वालियर नरेश भी इनके दर्शन करने आये थे और दर्शन करके अति प्रसन्न हुये थे । आपका उपदेश श्रवण करके आपके योग क्षेम के लिये जागीर भी आपके समर्पण करना चाहते थे किन्तु संतोषदासजी ने स्वीकार नहीं किया । तब राजा महान् संतोषी संत संतोषदासजी को प्रणाम करके लौट गये । तत्कालीन जयपुर नरेश ने भी आपकी यश गाथा सुनी और दर्शनार्थ आये और दर्शन करके अति प्रसन्न हुये और अपनी मनोरथ पूर्ति के लिये कुछ प्रश्न किये ।
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तब संतोषदासजी ने कहा-‘सत्यराम’ ‘दादूराम’ करो । और प्रत्येक प्रश्न का उत्तर देनें के लिये उक्त दोनों मंत्र ही बोलते थे अन्य कुछ नहीं । तब राजा ने संतोषदासजी को दंभी मान लिया । फिर भी अनुनय विनय करके संतोषदासजी को जयपुर ले आया । जयपुर में भी राजा ने जो प्रश्न किये उनका उत्तर भी ‘सत्यराम’ ‘दादूराम’ करो, यही दिया और कहा इनका जप करो इनसे सब मनोरथ सिद्ध हो जायेंगे ।
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यह सुनकर राजा के ह्रदय को क्षोभ हुआ । इससे राजाने कर्मचारियों को आज्ञा दी कि इस साधु को कैद में डाल दो । कर्मचारियों ने वैसा ही किया, संतोषदासजी को कैद में डाल दिया । वे कैद की कोटड़ी में थे किन्तु राजा को हर जगह दीखने लगे । राजा जिधर देखे उधरही सामने संतोषदासजी दीखने लगे । यह देखकर राजा को अति भय हुआ ।फिर संतोषजदासजी को जेल में देखने गया तो जेल में भी विराज रहे हैं और ध्यानस्थ हैं । यह देखकर राजा को अति आश्चर्य हुआ ।
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वह तत्काल संतोषदासजी के चरणों में आ पड़ा और कैद में डालने के लिये किये अपराध के लिये क्षमा याचना की । संत तो क्षमाशील होते ही हैं, क्षमा कर दिया । फिर राजाने उनको अपने यहां ही चातुर्मास में रखकर उनका सत्संग किया । इससे राजा के सब संशय नष्ट हो गये और पूर्ण संतोष हो गया ।
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चातुर्मास समाप्ति पर राजा ने भेंट की किन्तु संतोषदास ने कहा~इस धन का हम क्या करेंगे ? यह तो तुम ही रक्खो । राजा ने कहा~ यह तो आपको समर्पण हो गया है अब मैं इसे नहीं रख सकता । संतोषदासजी ने कहा~ इसको आप अमानत रूप में रखें । हम इसको जहां लगाना उचित समझेंगे तब मंगवालेंगे और उस कार्य में यह धन राशि कम पड़े तो आप और अपने खजाने से भी लगा देना । राजा ने स्वीकार कर लिया ।
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संतोषदासजी मांदी पधार गये । फिर मांदी के पास ही जंगल में नदी के किनारे उस धनराशि को मंगवाकर एक कुआ, बावड़ी व स्थान बनवाया । संतोषदासजी की शिष्य परंपरा के संतों ने वि. सं,१९६२ में एक शिलालेख लगाया है । उसमें लिखा है कि~ अब से १५० वर्ष पूर्व में बावड़ी, कुआ व स्थान का निर्माण संतोषदासजी ने जयपुर नरेश द्वारा चातुर्मास कराकर समाप्ति पर भेंट की गई थी उसी धन राशि से कराया था । संतोषदासजी ख्याति प्राप्त सिद्ध संत थे । इनके ६० शिष्य हुये हैं ।
(क्रमशः)

*२३. ध्यान का अंग ~९/१३*

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*🌷卐 सत्यराम सा 卐🌷*
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*२३. ध्यान का अंग ~९/१३*
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*ज्यों विषयी पर नारि सौं, अति गति माडे ध्यान ।*
*जन रज्जब जगपति मिले, यूं हरि सौं चित सान ॥९॥*
जैसे कामी नर विशेष कर के पर नारी का ध्यान करता है, वैसे ही यदि हरि के ध्यान में मन लगाया जाय तो जगतपति परमात्मा मिल जाते हैं ।
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*ज्यों भृंगी का ध्यान धर, कीट भृंग ह्वै जाय ।*
*त्यों रज्जब जिव ध्यान धर, जगपति माँहिं समाय ॥१०॥*
जैसे कीट भृंग का ध्यान करके भृंग बन जाता है, वैसे ही जीव ब्रह्म का ध्यान करके ब्रह्म बन जाता है ।
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*पंच तत्त्व घर पंच रस, प्राण तत्त्व घर ध्यान ॥*
*रज्जब रचे बखानियहिं, जो जिहिं ठाहर ठान ॥११॥*
आकाशादि पंच तत्त्वों से रचित पंच ज्ञानेन्द्रियों के घर पंच विषय रूप रस हैं वे विषयों में स्थिर रहती हैं । मन रूप तत्त्व का घर ध्यान है, मन ध्यान में ही स्थिर रहता है । जो जिस स्थान को अपना बनाकर उसमें रत रहता है, उसी का कथन करता है । ईश्वर ध्यान में रत ईश्वर का और मायिक ध्यान में रत माया का कथन करता है ।
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*ध्यान याद सुरति निरति सँभाल, सप्त अष्ट पोषंति१ पाल२ ।*
*धरे३ अधर४ बिच ध्यान जुहोइ, नि५ ध्यान निकट पावे नहीं कोई ॥१२॥*
ध्यान, याद, सुरति, निरति(विचार) सँभालना, इनसे ही सप्त धातु मय स्थूल शरीर का पोषण१ होता है और १.ज्ञानेन्द्रियें पंचक, २.कर्मेन्द्रिय पंचक ३.अन्त:करण चतुष्टय, ४.प्राणदि पंचक, ५.भूत पंचक, ६.काम, ७.त्रिविधकर्म, ८.वासना, इन पुरी अष्ट का भी पालन२ होता है । माया३ तथा ब्रह्म४ के बीच सम्बन्ध करने का कारण ध्यान ही सिद्ध होता है, बिना५ ध्यान निकट रहने पर भी प्रभु नहीं मिलते ।
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*ध्यान म्यान माँहिं रहे, राम काम तरवारि ।*
*रज्जब रुचि के हाथ में, जो जाने सो धारि ॥१३॥*
जैसे म्यान में तलवार रक्खी जाती है, वैसे ही ध्यान में राम तथा काम दोनों ही रक्खे जाते हैं किन्तु विचार द्वारा जिसको अपने कल्याण का कारण समझे उसे ही प्रेम रूप हाथ से ध्यान में रखना चाहिये । कल्याण का साधन राम का ध्यान ही है, अत: राम का ध्यान करना चाहिये, काम का नहीं ।
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इति श्री रज्जब गिरार्थ प्रकाशिका सहित “२३. ध्यान का अंग” समाप्त ॥
(क्रमशः)

*२३. ध्यान का अंग ~५/८*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*२३. ध्यान का अंग ~५/८*
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*कच्छपी दृष्टि सु ध्यान धर, अकल पुरुष की ठौर ।*
*तो रज्जब सहजै मिले, परम पुरुष श्री मौर ॥५॥*
जैसे कछवों का ध्यान अपने अण्डों के स्थान पर ही रहता है, वैसे ही कलारहित परम पुरुष परमात्मा के साक्षात्कार होने के स्थान अष्टदल कमल पर साधक का ध्यान रहे, तो मायापति परमात्मा अनायास मिल जाते हैं ।
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*गऊ जाय वन खण्ड में, धरे वत्स पर ध्यान ।*
*यू रज्जब ह्वै राम सौं, तो पहुंचे हरि थान ॥६॥*
गो वन में चली जाती है किन्तु उसका ध्यान घर में स्थित बच्छे पर रहता है, वैसे ही जीव का ध्यान राम के स्वरूप में रहे तो जीव भी हरि के स्थान को पहुँच जाता है ।
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*जैसे नटनी बरत१ चढ़, धरै कौन विधि ध्यान ।*
*त्यों रज्जब रम राम मधि, मिले प्राण पति प्रान ॥७॥*
जैसे नटनी रस्से१ पर चढ़कर जिस प्रकार रस्से का ध्यान करती है वैसे ही ध्यान द्वारा राम में रमना चाहिये, तब ही प्राणी को प्राणपति परमेश्वर मिलते हैं ।
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*ज्यों कामिनि शिर कुंभ धरि, मन राखे ता माँहिं ।*
*त्यों रज्जब कर राम सौं, कारज विनशे नाँहिं ॥८॥*
जैसे नारी जल से भरा घड़ा शिर पर रहने पर भी सहेली से हँस हँस कर बातें करती है, किन्तु मन घड़े में ही रखती है, इससे घड़ा नहीं पड़ता, वैसे ही सब काम करते हुये मन राम में रखने पर भी कोई कार्य नष्ट नहीं होता ।
(क्रमशः)

*२३. ध्यान का अंग ~१/४*

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*🌷卐 सत्यराम सा 卐🌷*
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*२३. ध्यान का अंग ~१/४*
इस अंग में ध्यान सम्बन्धी विचार कर रहे हैं -
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*विभूति१ भूत२ भगवंत लग, होहं३ सोहं४ ध्यान ।*
*यथा धूम पावक सहित, रज्जब शून्य समान ॥१॥*
माया१ प्राणी२ और भगवान यह भेद भासता है जब तक ही मैं है३, वह मैं हूँ४ ऐसा ध्यान रहता है, फिर साधन की परिपाकावस्था ज्ञान में तो जैसे काष्ठ को जला कर धूआँ और अग्नि दोनों ही लय हो जाते हैं, वैसे ही ध्यान, ध्याता, ध्येय रूप त्रिपुटी ब्रह्म में लय हो जाती है, उस स्थिति में अद्वैत ही भासता है ।
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*ध्यान रूधिर खीरो भयो, ध्यान सु लोही काम ।*
*तैसे रज्जब ध्यान में, प्राणि पलट ह्वै राम ॥२॥*
जैसे रक्त से दूध और लोही से वीर्य बनता है, वैसे ही ध्यान में स्थित होने से प्राणी बदल कर राम स्वरूप ही हो जाता है ।
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*रज्जब एक हि ध्यान में, नर नारायण होय ।*
*मनसा वाचा कर्मना, कीट भृंग ले जोय ॥३॥*
हम मन वचन कर्म से कहते हैं कि - एक मात्र नारायण के ध्यान में वृत्ति स्थित रहने से नर नारायण बन जाता है, इसका उदाहरण लोक में भी प्रत्यक्ष है देख लो, कीट भृंग का ध्यान करता है तब भृंग ही बन जाता है ।
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*परम पुरुष का ध्यान धर, जैसे चन्द्र चकोर ।*
*जन रज्जब चारों पहर, मेली पलक न कोर ॥४॥*
जैसे चकोर पक्षी रात्रि में चारों पहरों में अपने नेत्रों की पलक के किनारे न मिलाकर चन्द्रमा का ध्यान करता है, वैसे ही परम पुरुष परमात्मा का ध्यान करना चाहिये ।
(क्रमशः)

शनिवार, 8 अगस्त 2026

लययोग की साधना

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🌷*श्री दादूदयालवे नम:  卐*🌷
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*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
*श्रम न आवै जीव को, अनकिया सब होइ ।*
*दादू मारग महर का, बिरला बूझै कोइ ॥*
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फिर तो संपूर्ण ग्राम के नरनारी हरिदासजी की ही पूजा करने लगे और हरिदासजी के उपदेश के अनुसार हरि कीर्तन दादू वाणी का पाठ सत्संग आदि करने लगे । हरिदासजी ने मांदी ग्राम के निवासियों को उपदेश दिया कि~आप लोग सदा दादूवाणी पढ़ोगे तथा उसकी पूजा करोगे, दादूराम, सत्यराम का जप करते रहोगे । मांस नहीं खाओगे, शराब नहीं पान करोगे, तो प्रभु की कृपा से ग्राम पर कोई भी प्रकार का संकट नहीं आयेगा ।
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उक्त वचन हरिदासजी का सत्य ही हुआ । जब तक उक्त नियम ग्रामवासियों ने पालन किये तब तक ग्राम में परम शांति ही रही । तब से ही मांदी ग्राम दादूपंथी संतो का निवास स्थान बन गया था । अब भी हरिदासजी की शिष्य परंपरा के संत वहां निवास करते हैं । एक समय तालाब खोदते समय हनुमानजी की एक मूर्ति मिली तब से संतों ने हनुमानजी की पूजा करने की आज्ञा दे दी थी । अतः हनुमानजी की भी पूजा स्थान में होती है और दादू वाणी मंदिर तथा दादूजी की पूजा तो वहां मुख्यरूप से होती ही है ।
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हरिदासजी मांदी में ही ब्रह्मलीन हुये थे । उनकी समाधि मांदी में ही है । मांदी में अब भी हरिदासजी की प्रतिष्ठा बहुत है । उधर प्रेमदासजी महाराज एक समय खोरबसईसे अन्यत्र पधारने लगे तब मार्ग में एक श्रीमान् सेठ की पुत्री जिसमें बड़ को छोड़कर आया था वह जिन्द आता था । वह जिन्द आता था । वह प्रेतावस्था में नग्न खड़ी थी और पिता आदि की बात नहीं सुन रही थी तथा उनके कहने पर भी वस्त्र नहीं पहन रही थी ।
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जब प्रेमदासजी उस मार्ग से निकले और उन्होंने ज्यों ही ‘सत्यराम’ ‘दादूराम’ का उच्चारण किया त्यों ही वह जिन्द लड़की के शरीर से बाहर चला गया । जिन्द के के निकलते ही लड़की को होश आया । वह शीघ्रता से दौड़ी और अपने वस्त्र उठाकर पहनने लगी । वस्त्र पहनकर प्रेमदासजी को प्रणाम करने लगी । सेठ समझ गया कि महाराज के आने से ‘सत्यराम’ ‘दादूराम’सुनने से लड़की के शरीर से जिन्द निकला है । अतः सेठ ने प्रेमदासजी से प्रार्थना की कि महाराज ! जिन्द लड़की को बहुत तंग करता है । इस मेरी पुत्री पर कृपा करके इसे इस दुःख से बचाओ ।
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फिर प्रेमदासजी ने जिन्द से कहा~इस लड़की के देह में पुनः नहीं आना । जिन्द ने स्वीकार कर लिया कि नहीं आऊंगा । फिर वह उस प्रदेश से अन्यत्र ही चला गया । पुनः उस लड़की के शरीर में नहीं आया । प्रेमदासजी दादूवाणी में कथित लययोग की साधना करके सिद्धावस्था को प्राप्त हुये थे । वे सदा अपनी मनोवृत्ति को ब्रह्म स्वरूप में ही लीन रखते थे । वे दादूवाणी का ही विचार करते थे । अधिकारियों को उपदेश भी देते थे । आपकी समाधि मिलकपुर में है । अब भी आपकी समाधि बहुत पुजती है । मिलकपुर खोरबसई से लगभग चार मील दूर ही है ।
(क्रमशः)

३१. अन्योन्य भेद कौ अंग ५/८

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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३१. अन्योन्य भेद कौ अंग ५/८
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देह तमूरा ठाट जड, जीभ तार तिहिं लाग । 
सुन्दर चेतन चतुर बिन, कौंन बजावै राग ॥५॥
२ . वीणा(या तमूरा) की तुलना द्वारा ज्ञानी की प्रशंसा : यहाँ यह वीणा या तानपूरा, इस के ये साज(ठाट), इस के ये तार, और मनुष्य की जिह्वा - सभी कुछ तो अचेतन(जड) है । अतः कुशल चेतन(आत्मा) के विना कौन इस देह रूप तन्त्री से अनुपम राग निकाल(बजा) सकता है ! ॥५॥
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जीभ तार दोऊ बजहिं, सुन्दर देखहु आइ । 
एक बजावत देखिये, एक न देख्या जाइ ॥६॥
श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - आप ध्यानपूर्वक देखिये - यहाँ जिह्वा एवं तार दोनों बज रहे हैं । ये दोनों बजते हुए दीख रहे हैं; परन्तु इन को बजाने वाला नहीं दिखायी दे रहा ! ॥६॥
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एक कह्या अनुमानि करि, एक देखिये अक्ष । 
सुन्दर अनुभव होइ जब, तब देखिय प्रत्यक्ष ॥७॥
यद्यपि हम यहाँ एक(बजने वाले) को तो प्रत्यक्ष देख रहे हैं; परन्तु दूसरे(बजाने वाले) को अनुमान से ही जान पा रहे हैं कि दूसरा भी कोई है । यह अनुमान से जाना जा रहा भी अनुभव से ही प्रत्यक्षतः जाना जा सकता है ॥७॥
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किनहूं पूछ्यौ फेरि कैं, अनुभव कैसी होइ । 
सुन्दर तुम अनुभव कही, चिन्ह बतावौ कोइ ॥८॥
तब कोई यह प्रश्न करे कि इस अनुमान से ज्ञेय का यह प्रत्यक्ष अनुभव कैसे होता है ? तुमने उस का जिस प्रकार से अनुभव किया, इस की विधि हमें भी बताओ ? ॥८॥
(क्रमशः) 

*२२. अजपा जाप का अंग ~२१/२५*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*२२. अजपा जाप का अंग ~२१/२५*
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*सुरता सुई समान है, रज्जब वैद्य विवेक ।*
*अम्बलबेत आराध में, उभय वस्तु ह्वै एक ॥२१॥*
जैसे वैद्य सुई को अम्बलबेत नींबू में रख देता है तब वह गल कर अम्बलबेत रूप ही हो जाती है, वैसे ही विवेक युक्त साधक वृत्ति को अजपा जाप रूप उपासना में रखता है तब वही भी ब्रह्म रूप ही हो जाता है इस प्रकार नींबू और सुई तथा जीव और ब्रह्म दोनों वस्तु एक हो जाती हैं ।
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*सुमिरण शून्य समान है, आतम अभ्र अनेक ।*
*रज्जब वायु विचार मिल, बाट बटाऊ एक ॥२२॥*
जैसे आकाश में अनेक बादल दिखाई देते हैं, वे सभी वायु द्वारा एक मार्ग से चलकर आकाश में ही लय हो जाते हैं, वैसे ही स्मरण में संलग्न अनेक साधक आत्माएँ पथिक भी विचार द्वारा एक अजपा जाप मार्ग से ब्रह्म में ही लय होते हैं ।
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*नाम लिहारी१ नापिगा२, नदी नाथ३ निज नांउ ।*
*पंथ पथिक मिल एक ह्वै, यहु अजपा बलि जांउ ॥२३॥*
जैसे सभी नदियां२ विभिन्न मार्गों से चलकर समुद्र३ में जाते ही, वे मार्ग और जल सभी समुद्र में मिलकर एक हो जाते हैं, वैसे ही निज नाम का स्मरण करने वाले१ सभी साधक और साधन अजपा जाप की परिपाकावस्था में जाते ही सब ब्रह्म में मिलकर अद्वैत ब्रह्म रूप ही हो जाते हैं, यह एक हो जाना ही अजपा जाप है, हम इस अवस्था की बलिहारी जाते हैं ।
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*जिस नुकते१ साहिब स्रव२हिं, सही३ सु अजपा जाप ।*
*रज्जब पावे प्राण सो, जा जीवहिं दे आप ॥२४॥*
जिस सूक्ष्म साधन१ से भगवान दया२ करते हैं, वही सच्चा३ अजपा जाप है । यह अजपा जाप साधन, जिस जीव को स्वयं भगवान देते हैं, उसी प्राणी को प्राप्त होता है ।
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*प्रेम प्रीति हित नेह सु यारी, राम मुहब्बत सुरति सँभारी ।*
*रज्जब रत रुचि धुन सु आगे, द्वादश कला लगन को लागे ॥२५॥*
१.प्रेम, २.प्रीति, ३.हित, ४.स्नेह, ५.यारी, ६.राग, ७.मुहब्बत, ८.सुरति, ९.सँभारना, १०.रत होना, ११.रुचि, १२.धुन, ये जो प्रेम की द्वादश कला है, इन से आगे अजपा जाप में कोई विरले साधक की ही लगन लगती है अर्थात अद्वैत् स्थिति को विरला ही प्राप्त होता है ।
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इति श्री रज्जब गिरार्थ प्रकाशिका सहित “२२. अजपा जाप का अंग” समाप्त ॥
(क्रमशः)

शुक्रवार, 7 अगस्त 2026

मांदी ग्राम में

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🌷*卐 श्री दादूदयालवे नम: 卐*🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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*दादू निर्गुणं नामं मई, हृदय भाव प्रवर्त्तितम् ।*
*भ्रमं कर्मं किल्विषं, माया मोहं कंपितम् ॥*
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मांदी ग्राम में उस समय अनेक उपद्रव हो रहे थे । भैरू की उपासना का अधिक प्रचार था, पशुबलि, मदिरापान मांस भक्षण आदि की भरमार थी । भयंकर रोगों का भी आक्रमण हो रहा था । सेवड़े लोग तंत्र मंत्रों के बहाने से जनता को लूट रहे थे । ग्राम के सज्जन लोग उक्त व्यवहार से व्यथित थे । वे चाहते थे कि कोई समर्थ संत यहां पधारें तब ही उक्त उपद्रव रुक सकते हैं । अतः प्रेमदासजी की महिमा सुनकर मांदी ग्राम के सज्जन उनके पास गये और उनका दर्शन करके अति हर्षित हुये । प्रणामादि करके पास बैठ गये । फिर अपने ग्राम की उक्त स्थिति सुना कर प्रार्थना की~ आप हमारे ग्राम मांदी में पधार करके ग्राम का उद्धार करें ।
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हरिदासजी = प्रेमदासजी महाराज तो सिद्धि पुरुष थे, मांदी ग्राम के भक्तों की प्रार्थना सुनकर मांदी ग्राम की संपूर्ण स्थिति को जान गये । फिर अपने शिष्य हरिदासजी को आज्ञा दी~ तुम इन भक्तों के साथ मांदी ग्राम में जाकर पाखंडियो से ग्राम की जनता को बचाओ और हरि भक्ति का प्रचार करके ग्राम का उद्धार करो । अपने गुरुदेव प्रेमदासजी की आज्ञा पाकर हरिदासजी गुरुजी को प्रणाम करके मांदी ग्राम के भक्तों के साथ मांदी ग्राम को पधारे । फिर प्रेमदासजी उस स्थान से अन्यत्र चले गये ।
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हरिदासजी ने मांदी ग्राम में आकर देखा तो घर घर में सेवडों द्वारा टामन टूमन, जंत्र मंत्र, डोरे लगाये हुये हैं और ग्राम की भोली जनता सेवडों द्वारा दुःख में पड़ी हुई है और कई भयंकर रोग भी ग्राम में फैले हुये हैं । उनको निमित्त बनाकर दंभी लोग जंत्र मंत्रादि के बहाने बना कर भोली जनता को जाल में फंसा रखा है । फिर हरिदासजी ने अपना कर्तव्य निश्चय करके ग्राम में प्रचार आरंभ किया कि-देखो सज्जनों ये जंत्र मंत्रादि करने पर भी आप लोग दुःखों से मुक्त नहीं हुये हैं । अतः मैं आप लोगों को उपाय बताता हूँ वह करो तो अवश्य वर्तमान में जो आप को दुःख सता रहे हैं, वे सब मिट जायेंगे ।
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जनता दुःख से छूटना तो चाहती ही थी । किन्तु सेवडों ने प्रचार किया कि साधु की बात मानकर यदि वर्तमान भैरव आदि की उपासना छोड़ दोगे तो भैरव रुष्ट होकर अधिक दुःख देगा । किन्तु हरिदासजी ने कहा~ भैरव आप का कुछ नहीं बिगाड़ेंगे । अवश्य ही आपको बहकाने वाले कुछ उपद्रव कर सकते हैं किन्तु भगवान् अति शीघ्र उस उपद्रव को नष्ट करके आप सबको सुख प्रदान करेंगे । आप मेरे वचनों पर विश्वास करो । हरिदासजी भी सिद्ध संत माने जाते थे ।
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अतः ग्राम के लोगों ने उनकी बात मानना स्वीकार कर लिया तब हरिदासजी ने कहा~अपने-अपने घरों से सब जंत्र मंत्र तोड़ कर फैंक दो । घर घर में हरि नाम का संकीर्तन करो, दादू वाणी का पाठ करो, सत्संग करो, सफाई से रहो । ग्राम वासियों ने हरिदासजी की आज्ञानुसार ही किया । सब जंत्र मंत्र हटा दिये । फिर दूध देने वाले पशु-गाय, भैंस बकरी आदि के स्थनों से दूध न निकल कर रक्त निकलने लगा ।
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यह देखकर लोग भयभीत हुये और कहने लगे । यह क्या हुआ ? सेवडों ने कहा~देवी देवताओं का प्रकोप हुआ है । साधु का कहना मानने से ही ऐसा हुआ है । ग्राम के सब घरों में हाहाकार मच गया । संतों की बुराई होने लगी । दंभी सेवड़े अति प्रसन्न हुये । महात्मा हरिदासजी चौपाल में थे । ग्राम के नर-नारी सब उनके पास आकर अपनी स्थिति बताने लगे ।
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हरिदासजी ने कहा~चिन्ता मत करो अभी शीघ्र ही भगवान् ठीक कर देंगे । यह कह कर अपने गुरु प्रेमदासजी तथा दादूजी का स्मरण करके अपने कमंडलु से जल लेकर “सत्यराम दादूराम” मंत्र बोलते हुये सब नर नारियों पर छिड़क दिया और अपने कमंडलु में भर-भर के के सब को जल दे दिया और कहा कि अपने सब पशुओं तथा घरों में यह जल छिड़क दो, भगवान् सब ठीक कर देंगे । जनता ने हरिदासजी की आज्ञानुसार ही किया । उससे सब उपद्रव शांत होकर ग्राम में आनन्द की लहर चल पड़ी ।
(क्रमशः)

३१. अन्योन्य भेद कौ अंग १/४

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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३१. अन्योन्य भेद कौ अंग १/४
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१ज्ञान की विभिन्न पद्धतियों का निरूपण –
सुन्दर ज्ञानी नृपति कै, सेना है चतुरंग । 
रथ अश्व गज त्रय अवस्था, इन्द्रिय पाइक संग ॥१॥
१राजा की समता से ज्ञानी की प्रशंसा : महाराज श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - जैसे लोक में किसी राजा के पास चतुरङ्गिणी(रथ, अश्व, गज एवं पैदल - इन चार अङ्गों वाली) सेना में १. रथ, २. घोड़े, ३. हाथी एवं पैदल सेना होती है; उसी प्रकार ज्ञानी साधक के पास भी चार अङ्गों वाली सेना होती है । ज्ञानी की सेना में उसका १. श्रवण ही रथसेना है, २. मनन अश्वसेना है तथा ३. निदिध्यासन अवस्था उसकी गजसेना है एवं ४. उसकी इन्द्रियाँ ही उस की पैदल सेना(पाइक) है ॥१॥
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तुरिया सिंघासन कियौ, तुरियातीत सु वोक । 
ज्ञान छत्र है सीस पर, सुन्दर हर्ष न शोक ॥२॥
उस ज्ञानी की तुर्य(चतुर्थ) अवस्था उसका सिंहासन है तथा उसकी तुर्यातीत अवस्था उसका ओक(वास स्थान = राजप्रासाद, महल) है । ज्ञानी का ज्ञान उसका छत्र है । इन सबल साधनों के कारण वह ज्ञानी भी एक बलवान् राजा के समान ही अपने ज्ञानसाम्राज्य पर निष्कण्टक(निर्विघ्न) शासन करता है ॥२॥
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रथ चौवीस हु तत्व कौ, कर्म सुभासुभ बैल । 
सुन्दर ज्ञानी सारथी१, करै दशौं दिशि सैल ॥३॥
शास्त्रोक्त २४ तत्त्व ही उसकी लौकिक जीवनयात्रा का साधन रथ है । उस के शुभाशुभ कर्म ही उस रथ में जुते हुए बैल हैं । श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - स्वयं वह ज्ञानी ही उस रथ का सारथि(सञ्चालक) है१ । इस प्रकार वह दशों दिशाओं की अपनी यात्रा(सैल) विना किसी विघ्न बाधा के पूर्ण करता है ॥३॥ (१ आत्मानं रथिनं विद्धि, शरीरं रथमेव च । - उपनिषद्)
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तीनौं गुन इंद्रिय सकल, ये सब चालै गैल । 
सुन्दर बिचरत जगत मंहिं, ताहि न लागै मैल ॥४॥
सत्त्व, रज एवं तम - ये तीन गुण एवं उस की दशों इन्द्रियाँ ही उसके अनुचर(पीछे चलने वाले सहायक) हैं । इस प्रकार वह ज्ञानी इन साधनों से अपनी जीवनयात्रा निर्विकार भाव से पूर्ण करता रहता है ॥४॥ (१)
(क्रमशः)

मंगलवार, 28 जुलाई 2026

३०. ज्ञानी कौ अंग ६१/६५

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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३०. ज्ञानी कौ अंग ६१/६५ 
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इंद्री अर्थनि कौं गृहै, लिप्त न कबहूं होइ । 
सुन्दर ज्ञानी मुक्त है, कर्म न लागै कोइ ॥६१॥
ज्ञानी की इन्द्रियाँ स्वभाववश अपने विषयों को ग्रहण करती रहती हैं, परन्तु ज्ञानी उन कर्मों में लिप्त नहीं होता; क्योंकि वह उन कर्मों के फलाफल से मुक्त हो चुका है ॥६१॥
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रागी त्यागी शांत पुनि, चतुर्थ घोर बखांनि । 
ज्ञानी चारि प्रकार हैं, तिनहिं लेहु पहिचांनि ॥६२॥
ज्ञानीं के चार भेद : अन्त में, श्रीसुन्दरदासजी महाराज ज्ञानियों के चार भेद बता रहे हैं - १. रागी ज्ञानी; २. त्यागी ज्ञानी; ३. शान्त ज्ञानी; तथा ४. घोर(क्रोधी) ज्ञानी । इन चारों के क्रमशः ये लक्षण हैं, इन को समझ लो ॥६२॥
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रागी राजा जनक है, त्यागी शुक सम थोर । 
शांत जानि जमदग्नि कौं, दुर्वासा अति घोर ॥६३॥
१. राज्यसुख भोगते हुए भी ज्ञानी की जीवनचर्या वाले ज्ञानी रागी ज्ञानी कहलाते हैं; जैसे - राजा जनक । २. अपनी समस्त जीवनचर्या त्यागवृत्ति से निभाने वाले शुकदेव मुनि के समान त्यागी ज्ञानी होते हैं । ३. सदा शान्त अवस्था में रहने वाले जमदग्नि ऋषि के समान ज्ञानी शान्त ज्ञानी कहे जाते हैं । तथा ४. दुर्वासा के समान अति क्रोधी तपस्वी घोर ज्ञानी कहे जाते हैं ॥६३॥
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क्रिया सु तिनकी भिन्न है, भिन्न देह ब्यवहार । 
ज्ञान बिषै नहिं भेद है, सुंदर एक लगार ॥६४॥
महाराज श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - यहाँ वास्तविकता यह है कि इन चतुर्विध ज्ञानियों की जीवनचर्या में इन की दैहिक क्रियाएँ भिन्न हो सकती हैं; इनके देहव्यापार भिन्न(पृथक्) हो सकते हैं; परन्तु इनकी ज्ञानावस्था में कोई भेद नहीं होता, सभी का ज्ञान एक समान ही है ॥६४॥
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क्रिया देखि ज्ञानीनि की, सब कोऊ भ्रमि जांहिं । 
सुन्दर देखैं देह कृत, आशय पावै नांहिं ॥६५॥ 
इति ज्ञानी कौ अंग ॥३०॥
परन्तु लोक में साधारणतः मुर्ख जन इन ज्ञानियों की दैहिक क्रिया देख कर भ्रम में पड़ जाते हैं । वे इन की दैहिक क्रिया देखने तक ही सीमित रहकर इन की वास्तविकता(इनका ज्ञानित्व) नहीं समझ पाते ॥६५॥
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इति ज्ञानी का अंग सम्पन्न ॥३०॥
(क्रमशः)

प्रेमदासजी

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*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
*दादू एता अविगत आप थैं, साधों का अधिकार ।*
*चौरासी लख जीव का, तन मन फेरि सँवार ॥*
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प्रेमदासजी = प्रेमदासजी महाराज आचार्य गरीबदासजी महाराज के शिष्य थे तथा केवलरामजी के गुरुभाई थे । आप विरक्त तथा सिद्ध संत थे । एक समय भ्रमण करते हुये खोरबसई ग्राम जो माँदी से १०-१२ मील पर है, उसके बाहर एक बड़ वृक्ष के नीचे आकर विराजे । यह बड़ सुन्दर तथा महान् भी था । इसमें एक जिंद रहता था । कोई अनजान यात्री रात्रि को उसके नीचे रह जाता था तो उसे वह जिंद मार देता था । यह ग्राम अलवर राज्य में था । 
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मानव मरने की घटना सुनकर राजकीय अधिकारी आते थे, ग्राम वालो तंग करते और कहते थे, धन के लालच से तुम मारते हो और जिन्द का नाम ले देते हो । अंत में सरकार ने ने उस बड़ के नीचे रात्रि का रहना निषेध कर दिया । प्रेमदासजी को उस बड़ के नीचे बैठे देखकर ग्राम के लोगों ने तथा राजपुरुषों ने कहा~ रात्रि को यहां किसी को भी नहीं रहने दिया जाता है । अतः आप ग्राम में पधारें । ग्राम में आप की सेवा की सब व्यवस्था हो जायेगी । इस बड़ में जिन्द रहता है, यहां रहने वाले को मार देता है । 
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यह कहने पर भी प्रेमदासजी ने कहा~ हम यहां ही रहेंगे । 
जिनको इस शरीर की सेवा करनी हो वे यहां कर दें । प्रेमदासजी का दृढ निश्चय देखकर सब लोग ग्राम को लौट गये । प्रेमदासजी भगवद् भजन करने लगे । फिर अर्धरात्रि की जिन्द ने अपनी चेष्टा आरंभ की । जहां महात्मा प्रेमदासजी सिद्धासन लगाये हुये भजन कर रहे थे, ठीक उसके ऊपर की शाखा पर बैठकर अपने पैर नीचे लटकाने लगा । 
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प्रेमदासजी के सामने उसके पैर आये तब उन्होंने जान लिया कि ये जिन्द के पैर हैं । फिर प्रेमदासजी ने श्रीदादू वाणी का पाठ उच्चस्वर से आरंभ कर दिया ।वाणी का पाठ सुनने से प्रेमदासजी के विपरीत चेष्टा करना तो तो उसका रुक गया । वह उनके समीप भी नहीं जा सका । दूर खड़े रहने पर भी प्रेमदासजी के तपतेज से वह जलने लगा और उच्चस्वर से कहने लगा मेरी रक्षा करो रक्षा करो । उसकी उक्त आवाज ग्राम वालों को भी सुनाई देने लगी । 
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प्रेमदासजी ने उसके दुःख पूर्ण शब्द सुनकर दादूवाणी का पाठ समाप्त किया और उसे पूछा क्यों भाई क्या बात है ? उसने कहा~“मेरा शरीर जल रहा है, आप मुझ पर कृपा करें ।” उसका उक्त वचन सुनकर प्रेमदासजी बोले~  यह जलन तो तेरे कर्मों का ही फल है । तूने इस वृक्ष के नीचे कई मानवों की हिंसा की है । उसका फल तुझे भोगना ही होगा । अब तुम तब ही इस दुःख से बच सकते हो जब इस वृक्ष को त्यागकर अन्यत्र चले जाओंगे और यदि फिर यहां आओ तो यही दुःख तुम्हें फिर भोगना पड़ेगा । 
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वह जिन्द फिर प्रेमदासजी की आज्ञानुसार उस बड़ से सदा के लिये चला गया । जिन्द को वहां से भगा देने से वहां की जनता तथा राजपुरुषों की प्रेमदासजी पर भारी श्रद्धा हो गई । फिर प्रेमदासदासजी ने कुछ दिन वहां ठहरकर जनता को दर्शन तथा सत्संग से सुख प्रदान किया । फिर अन्यत्र विचर गये । 
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खोरबसई के आसपास के ग्रामों में भ्रमण करते हुये प्रेमदासजी को एक हरिसिंह राजपूत वन में भेड़ बकरी चराता हुआ मिला । वह संतों में श्रद्धा रखता था, यथाशक्ति संतों की सेवा भी करता था । प्रेमदासजी की भी उसने यथाशक्ति सेवा की और उनका कल्याणमय उपदेश भी सुना । हरिसिंह की श्रद्धा भक्ति देखकर तथा उसे अधिकारी जानकार प्रेमदासजी ने उसे कहा~हरिया भेड़ बकरियों का मोह छोड़कर हरि का भजन कर और संसार का कल्याण कर । 
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उक्त वचन ने हरिसिंह को हरिदास बना दिया । हरिदास अब गुरु प्रेमदासजी की सेवा में रहकर उनके उपदेशानुसार साधन करके सिद्धावस्था को प्राप्त हो गया । निरंतर हरि भजन में लीन रहने लगा । आसपास के ग्रामों में प्रेमदासजी महाराज की कीर्ति फ़ैल गई थी कि प्रेमदासजी सिद्धकोटि के संत हैं । 
(क्रमशः)

३०. ज्ञानी कौ अंग ५७/६०

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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३०. ज्ञानी कौ अंग ५७/६० 
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सुन्दर सब कौं ज्ञान की, बातैं कहै अनेक । 
ज्यौं दर्पन बहु भांति कै, अग्नि परै कहुं एक ॥५७॥
ज्ञान के अभिन्न होने पर भी उसके वर्णन में भिन्नता : जैसे बहुत से दर्पणों से, भिन्न भिन्न होने पर भी उस में पड़ते हुए सूर्य के प्रतिबिम्ब से एक ही प्रकार की अग्नि उद्भूत होती है; उसी प्रकार सच्चे अभेदज्ञानोपदेश से भिन्न भिन्न प्रकार का वर्णन होने पर भी ज्ञान सब को एक समान(अभेद ज्ञान) ही होगा ॥५७॥
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देह चलै आतम अचल, चलत कहैं मतिमंद । 
अभ्र चलत ज्यौं देखिये, सुन्दर चलै न चन्द ॥५८॥
कुछ दृष्टान्तों द्वारा भ्रमज्ञान का निवारण : वस्तुतः आत्मा अचल(अविनाशी) एवं यह शरीर चल(विनाशी) है; परन्तु मूर्ख(अविवेकी) पुरुष इस आत्मा को उसी प्रकार चल मान बैठते हैं, जैसे कोई बालक आकाश में मेघों को उड़ता हुआ देख कर चन्द्रमा को चल मान लेता है, जब कि सचाई इसके सर्वथा विपरीत होती है ॥५८॥ (१)
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सूरय करि कैं देखिये, तवा आरसी दोइ । 
सूरय सूरय सौं दृसै, सुन्दर संमुझै कोइ ॥५९॥
भले ही कोई सूर्य के सम्मुख तवा करे या दर्पण, उस में सूर्य सूर्य रूप में दीखेगा । इसी प्रकार, आत्मा का सब भूतों या प्राणियों में पड़ने वाला प्रतिबिम्ब एक समान ही होता है ॥५९॥ (२)
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जो भिक्षा मांगत फिरै, कै जो भुक्ते राज । 
सुन्दर ज्ञानी मुक्त है, नां कछु काज अकाज ॥६०॥
ज्ञानप्राप्ति के बाद, ज्ञानी का कोई कर्तव्य या अकर्तव्य नहीं रह जाता । परन्तु पूर्व प्रारब्धवश सञ्चित्त कर्मों को, उनमें अलिप्त रहता हुआ वह राजा या रङ्ग के रूप में राज्य भोगता हुए या भिक्षा मांगते हुए भोगता रहता है ॥६०॥
(क्रमशः) 

ईश्वरदासजी की रचनायें

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*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
*दादू राम हृदय रस भेलि कर, को साधु शब्द सुनाइ ।*
*जानो कर दीपक दिया, भ्रम तिमिर सब जाइ ॥*
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ईश्वरदासजी की रचनायें = ईश्वरदासजी मारोठ की ये रचनायें देखने में आई है-
१- सत्यराम मंत्र की संस्कृत में व्यख्या
२- “दादू दयालु सत्वराज” यह संस्कृत श्लोकों में हैं, इसमें १८ श्लोक है
३- “दादू दयालु प्रार्थना सप्तक” यह संस्कृत श्लोकों में है । इसमें ९ श्लोक हैं ७ में प्रार्थना है । ८ वें में रचना करने का स्थान काशी बताया है । ९ वें में सप्तक का माहातम्य कहा है ।
४- आगे इन पत्रों में दादूजी की महिमा के कुछ श्लोक हैं, किन्तु इनके आदि में इनका नाम नहीं है और अंत में समाप्ति भी नहीं की है । हो सकता है ये फुटकर श्लोक ही हों व इन पत्रों पर लिखने वाले महानुभाव ने उस निबन्ध से इतने ही श्लोक लिखे हों । किसी भी कारण से ही यह निबन्ध अधूरा ही है ।
५- “सत्यराम स्तोत्र” संस्कृत श्लोकों में है । इसमें १३ श्लोक हैं । इसकी रचना मारोठ में ही हुई है । ईश्वरदासजी काशी से भ्रमण करते हुये भैराणे की यात्रा करने आये तब वहां से मारोठ के रघुनाथदासजी गरीबदासोत ईश्वरदासजी को मारोठ ले आये थे । फिर वे मारोठ में ही ब्रह्मलीन हो गये थे । ‘सत्यराम स्तोत्र’ की रचना मारोठ में ही हुई होगी । “सत्यराम स्तोत्र” की प्रति मैंने जो देखी थी वह वि. सं. १९४४ भादवा वदि ११ बृहस्पतिवार की साधु लालदास की मारोठ में ही लिखी हुई थी । इसकी समाप्ति पर लिखा है~ “इति ईश्वरदासेन विदुषा विरचितंति्वदम्, सत्यरामोंभिधं स्तोत्रं समाप्तिमग मच्छुमाम् ।”
६- ईश्वरदासजी ने श्रीदादूवाणी पर भी टिपण्णी की थी ऐसी जन श्रुति है किन्तु वह मेरे देखने में तो नहीं आई है । उक्त रचनाओं से ज्ञात होता है कि ईश्वरदासजी अच्छे विद्वान्, योगी और विरक्त संत थे । अब उनकी रचना के उदाहरण भी देखें~
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श्री दादूदयालु सत्वराज का दशम श्लोक~
शिखरणीछंद~
“अनाधाराधारो, विदित भव पारस्सुख करो ।
वदान्यो वादान्य, स्सफल कुल धन्य:कालि विधुः ॥
महासारो पारो, निहत रिपु मारो वृष गवच्छ-
शरण्योज्ञानाम्भे, वसतु हृदि दादू धृति धरः ॥१०॥
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“सत्यराम स्तोत्र”- का एकादशम श्लोक- शार्दूल विक्रीड़ित-
श्री दादू सुखदो, नृणां सुमनसा, दादू भजे दादुना ।
पाल्योसि्म प्रभुणा, तदर्चन जनिः कायोस्तु में दादुवे ॥
दादोर्लब्ध बरागता, हरिपदं दादोर्गतिर्दुर्लभा ।
दादो मेस्तु मनो गुरौ वरद हे, दादों भवान्मामव ॥११॥
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लक्ष्मणदासजी का महोत्सव ब्रह्मभोज रघुनाथदासजी ने वि. सं. १९३४ में किया था । उसका सूचक ईश्वरदासजी रचित दोहों में एक शिलालेख है, जो स्थान के तिबारे की ताक में अभी भी सुरक्षित है । उस स्थान की परंपरा यह है १- लक्ष्मणदास जी २- रघुनाथदासजी ३- प्रतापदासजी ४- रामदासजी ५- बालकदास जी वर्तमान है ।
(क्रमशः)

रविवार, 26 जुलाई 2026

३१ ईश्वरदासजी

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*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
*दादू सिरजनहारा सबन का, ऐसा है समरत्थ ।*
*सोई सेवक ह्वै रह्या, जहँ सकल पसारैं हत्थ ॥*
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३१ ईश्वरदासजी = ईश्वरदासजी १२ वर्ष स्थान में रहे । सवाईसिंह मारोठ के ठाकुर के पुत्र नहीं था । उसने ईश्वरदासजी से प्रार्थना की । ईश्वरदासजी ने उसको पुत्र होने का वर दिया । पुत्र हो गया । पुत्र होने पर सवाईसिंह ईश्वरदासजी के पूर्ण भक्त हो गये थे और ईश्वरदासजी की तन मन वचनादि से सेवा करते थे । ईश्वरदासजी जंगली औषधियाँ भी जानते थे ।
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शौच जाते थे तब पास के काला पर्वत पर से कुछ बूटियाँ लाया करते थे । अपने पास आने वाले रोगियों को स्वरोदय का विचार करके उचित समझते तो देते थे । सर्प तथा गोहरे का विष भी बूटियों से उतार देते थे । औषधि जिनको देते थे वे निश्चय रूप से ठीक ही हो जाते थे । स्वरोदय के विचार से उचित ज्ञात नहीं होता उसे औषधि नहीं देते थे । फिर वह मर ही जाता था ।
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मारोठ की जनता ईश्वरदासजी को बहुत मानती थी । ईश्वरदासजी भूत व भविष्य को भी जान जाते थे । एक दिन कुचामन के ठाकुर केशरीसिंह आपके दर्शन करने आये थे । उन्होंने पूछा~ मैं पूर्व जन्म में कौन था ? ईश्वरदासजी ने कहा काशी के भंगी । ठाकुर - भंगी से कुचामन नरेश कैसे बना ? ईश्वरदासजी - प्रयाग कुंभ से बहुत से संत काशी गये थे, कुछ के हैजा हो गया था उनकी सेवा के पुण्य से । ठाकुर - इसमें विश्वास कैसे हो ? ईश्वरदास- अब तुम्हारे देह में अदीठ होगा, वह हो जाय तो सत्य मानना । फिर अदीठ होया । इससे ज्ञात होता है, वे भूत भविष्य के ज्ञाता योगी थे ।
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ब्रह्मलीन होना व समाधि = ईश्वरदासजी वि. सं.१९५६ में ब्रह्मलीन हुये हैं, ऐसा उनकी छत्री के शिलालेख से ज्ञात होता है । ईश्वरदासजी की समाधि एक अच्छी छत्री के रूप में एक पर्वत की टेकड़ी पर है । चरण चौकी पर यह शिलालेख अंकित है- वि. सं. १९५६ मार्गशीर्ष कृष्णा ३ सोमवार । हो सकता है यही उनके ब्रह्मलीन होने का समय हो अथवा चरण प्रतिष्ठा का भी हो सकता है । चरण प्रतिष्ठा का हो तो भी कुछ दिनों का ही फरक हो ससकता है । क्योंकि वे वहां अति प्रतिष्ठित थे, अतः उनकी छत्री शीघ्र ही बन गई होगी ।
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चौकी में एक छप्पय भी है, वह भी देखिये~
नगर रम्य मारोठ, बन्या अतिशय कर पावन ।
तहं पंडित ईश्वरदास, भये सज्जन मन भावन ॥
योग स्वरोदय ज्ञान भानु, सोइ तिमिर नशावन ।
प्रकट देत उपदेश, सकल जन दुःख मिटावन ॥
मुख एक कीरति बहुत, कहं लग वर्ण नित नवी ।
आतम निश्चय धार के, ब्रह्मलोक गे तज भुवि ॥१॥
दोहा~ईश्वरदास ईश्वर मिले, काट जगत का मोह ।
विद नाद मन सदन में, मोक्ष पदारथ जोह ॥२॥
ईश्वरदासजी की समाधि की छत्री पर आने वाले भावुकों की कामनायें अब भी पूर्ण होती हैं । भाव से चरण जल पान करने से रोग मिटते हैं । आप मारोठ के प्रतिष्ठित संत माने जाते हैं ।
(क्रमशः)

*२२. अजपा जाप का अंग ~१७/२०*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*२२. अजपा जाप का अंग ~१७/२०*
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*रज्जब जप जप जन थके, अजपा जपा न जाय ।*
*अगह अंभ ज्यों आरसी, आख्यूं सो न गहाय ॥१७॥*
जैसे न ग्रहण करने योग्य दर्पण का पानी आँखों से दिखता तो है किन्तु पकड़ा नहीं जाता, वैसे ही बहुत से भक्त जन जप करते २ थक तो गये है किन्तु उनसे अजपा नहीं जपा जाता अर्थात वह तो स्वत: ही होता रहता है ।
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*स्वपने मन सुमिरन करे, लगे नहीं तन ताप ।*
*अचेत उदर अरभक१ वधै, यूं ह्वै अजपा जाप ॥१८॥*
स्वप्न में मन शरीर में अग्नि लगने का स्मरण करता है तब स्थूल शरीर को कहां ताप लगता है तथा माता के पेट में बालक१ बढ़ता है तब माता को कब पता लगता है कि किस क्षण में कितना बढ़ा, ऐसे ही अनजान में निरंतर अजपा जाप होता रहता है ।
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*मन पवन अरु सुरति को, आतम पकङै आप ।*
*रज्जब लावै तत्त्व सौं, यूं ही अजपा जाम ॥१९॥*
जब साधक आत्मा मन और बुद्धि वृत्ति को स्वयं निग्रह करके परब्रह्म रूप तत्त्व के चिन्तन में लगता है तब जैसे चिन्तन निरंतर होता रहता है, वैसे ही अजपा जाप होता है ।
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*ब्रह्माण्ड पिण्ड मन प्राण तज, सुख में सुरति समाय ।*
*रज्जब अजपा जाप यहु, नर देखो निरताय ॥२०॥*
ब्रह्माण्ड, शरीर, मन, प्राण इन सबको त्याग कर बुद्धि - वृत्ति सुख स्वरूप ब्रह्म में समा जाय, इसका नाम अजपा जाप है । हे साधक नरो ! विचार करके देखो, तुम्हें भी भली भांति ज्ञात होगा ।
(क्रमशः)

३०. ज्ञानी कौ अंग ५२/५६

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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३०. ज्ञानी कौ अंग ५२/५६ 
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अंत्यज ब्राह्मण आदि दै, दार मथै जो कोइ । 
सुन्दर भेद कछू नहीं, प्रगट हुतासन होइ ॥५३॥
[अब श्रीसुन्दरदासजी महाराज ५३ से ५६ तक की चार साषियों से ज्ञान की भेद - भावरहित व्यापकता एवं सब के लिये समान रूप से पवित्रकरण के सामर्थ्य में चार अकाट्य तर्क देकर उसे स्पष्ट कर रहे हैं - ]
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अभेद ज्ञान की व्यापकता के चार उदाहरण : श्रीसुन्दरदासजी महाराज कहते हैं - सब जानते हैं कि दो काष्ठों की रगड़ से अग्नि उत्पन्न हो जाती है । अब वे दो काष्ठ किसी ब्राह्मण से मिलें या किसी अन्त्यज(हीन जातिज) से, इससे उस अग्नि की उत्पादनक्रिया में कोई अन्तर नहीं आयगा । उन दोनों काष्ठों को रगड़ने से अग्नि उत्पन्न होगी; ऐसे ही वह अभेदज्ञानोपदेश किसी ब्राह्मण से मिले या अन्त्यज से; उस से ज्ञानप्राप्ति होगी ही - यह निश्चित मानिये ॥५३॥ (१)
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दीपग जोयौ बिप्र घर, पुनि जोयौ चंडाल । 
सुन्दर दोऊ सदन कौ, तिमिर गयौ ततकाल ॥५४॥
इसी प्रकार, सब जानते हैं कि दीपक के प्रकाश से अन्धकार नष्ट होता ही है । अब वह दीपक किसी ब्राह्मण के घर में हो या किसी अन्त्यज के, दीपक के प्रकाश में क्या अन्तर आयगा ! इसी प्रकार इस ज्ञानोपदेश के विषय में भी समझना चाहिये ॥५४॥ (२)
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अंत्यज कै जल कुम्भ मैं, ब्राह्मन कलस मंझार । 
सुन्दर सूर प्रकाशिया, दुहुंवनि मैं इकसार ॥५५॥
सभी जानते हैं कि किसी ब्राह्मण के घर में रखे हुए घट के जल में या किसी अन्त्यज के घर में रखे हुए घट के जल में सूर्य का प्रकाश समान(एक सा) ही पड़ता है । ऐसा नहीं होता कि ब्राह्मण के घट में सूर्य का प्रकाश दूसरा तथा अन्त्यज के घर वाले कुम्भ के जल में सूर्य का कोई दूसरा प्रकाश पड़ता हो; यही स्थिति अभेदज्ञानोपदेश के विषय में भी समझनी चाहिये ॥५५॥ (३)
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अंत्यज ब्राह्मन आदि दे, किंवा रंक कि भूप । 
सुन्दर दर्पन हाथ लै, सो देखै निज रूप ॥५६॥
जैसे किसी ब्राह्मण या अन्त्यज को, किसी राजा या दरिद्र को अपने हाथ में लिये हुए दर्पण में अपना ही रूप दीखता है; उसी प्रकार किसी भी अभेदज्ञानोपदेश से ब्रह्मज्ञान ही होगा, अन्य ज्ञान नहीं ॥५६॥ (४)
(क्रमशः) 

३०. ज्ञानी कौ अंग ४९/५२

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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३०. ज्ञानी कौ अंग ४९/५२
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चौपरि खेलहिं द्वै जने, सुन्दर बाजी लाइ । 
जीतै सु तौ खुसाल ह्वै, हारै सौ मुरझाइ ॥४९॥
संसार में विजय-पराजय भी एक प्रकार से क्रिया ही है । जैसे - कोई दो खिलाड़ी चौपड़ खेलते हों, उन में अन्त में एक जीतता है और एक हारता है । जीतने वाले को प्रसन्नता होती है और हारने वाले को खिन्नता ॥४९॥
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एक जनौ दुहुं वोर कौं, चौपरि खेलै आंनि । 
सुन्दर हार न जीत कछु, ऐसैं ज्ञानी जांनि ॥५०॥
परन्तु वहाँ एक तीसरा पुरुष भी उनका खेल देखने के लिये दर्शक रूप में आ बैठे । खेल के अन्त में हार जीत के बाद उस हार जीत से न उसको प्रसन्नता होती है, न खिन्नता ही । संसार में यही तटस्थता की स्थिति ज्ञानी की भी समझनी चाहिये ॥५०॥
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सुन्दर देख्या आपुकौ, सुने आपुनै बैंन । 
बूझ्या अपनी बूझि कौं, समुझ्या अपनी सैंन ॥५१॥
वह ज्ञानी ब्राह्मी स्थिति में पहुँचने के बाद, ब्रह्म को सर्वव्यापक समझता हुआ, संसार के सभी रूपों को अपना ही रूप, संसार के सभी शब्दों को अपना ही शब्द, संसार के सभी विचारों एवं संकेतों को अपना ही विचार एवं संकेत समझता है ॥५१॥
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सुन्दर भाया आपु कौं, आया अपुनी ठांम ।
गाया अपने ज्ञान कौं, पाया अपना धांम ॥५२॥
श्रवण मनन निदिध्यासन करते करते उस को सर्वत्र स्व रूप का ही भान हुआ, अतः वह अन्त में स्वरूप में ही स्थित हो गया । इस स्वरूपस्थिति का चिन्तन मनन करता हुआ वह निर्वाण(परम तत्त्व का साक्षात्कार) को प्राप्त हो गया ॥५२॥
(क्रमशः) 

परमार्थी महात्मा

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*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
*दादू शब्दैं ही सूक्ष्म भया, शब्दैं सहज समान ।*
*शब्दैं ही निर्गुण मिले, शब्दैं निर्मल ज्ञान ॥*
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२५. प्रेमदासजी =
प्रेमदासजी गरीबदासजी के थांभे के छापरी ग्राम में दीक्षित हुये थे । वे परमार्थी महात्मा थे । उन्होंने तालाब, कूप आदि बनवाये तथा अन्य भी परमार्थ के कार्य किये थे । वे ईश्वर भजन, श्री दादू वाणी का पाठ व विचार और परोपकार इनको ही अच्छा मानते थे । दादूजी महाराज ने भी तो परोपकार भजन ही बताया है~
"हरिभज साफिल जीवना, परोपकार समाय ।
दादू मरणा तहँ भला, जहँ पशु पक्षी खाय ॥
प्रेमदासजी का देहान्त वि . सं . १८७५ के आस पास हुआ था । वे अच्छे संत थे ।
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२६ रामकादासजी =
रामकादासजी गरीबदासोत गिधाणी ग्राम में दीक्षित हुये थे । आप परम भजनीक संत थे । जैसे दादूजी महाराज ने कहा है कि रात दिन भजन ही करना चाहिये~
"दादू नीका नाम है, हरि हृदय न विसार ।
रात दिवस रटबो करी, रे मन यही विचार ॥"
वैसे ही रामकादासजी रात दिन हरि भजन में ही लगे रहते थे । अधिकतर ध्यान में लगे रहने से लोग उन्हें ध्यानीजी नाम से भी बोलने लग गये थे ।
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इनके दो शिष्य थे, वे भी गुरुजी के उपदेश तथा गुरुजी को निरंतर भजन में लगे रहते देखकर दोनों ही हरि भजन में ही लगे रहते थे । आप वि.सं. १९५६ के आसपास ब्रह्मलीन हुये थे । आपके शिष्य भी एक वि.सं. १९६२ के व दूसरा १९७० के आसपास ब्रह्मलीन हो गये थे । इन तीनों ही महानुभावों ने वैराग्य पूर्वक भजन ही किया था । अन्य सांसारिक प्रपंच में वे लेशमात्र भी मन नहीं लगाते थे ।
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२७. किशोरदासजी = किशोरदासजी अतीत स्थान बीलू में दीक्षित हुये थे । आप पौराणिक विद्वान् तथा अच्छे चिकित्सक थे । आपकी कथा शैली बहुत अच्छी थी । आपकी लिखी हुई भागवत बीलू में तथा बड़ाउ में थी । आपके अक्षर सुन्दर होते थे । आपने भागवत तथा दादूवाणी के प्रवचनों द्वारा भक्त जनता को परमानन्द प्रदान किया था । आप अच्छे विद्वान् संत थे । वि .सं . १९२५ में नारायणा दादूधाम में ही आप ब्रह्मलीन हुये थे ।
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२८ सेवारामजी = सेवारामजी मोटलास ग्राम के निवासी थे । मोटलास दांता रामगढ़ के पास है । ये गरीबदासजी महाराज के तीन पीढ़ी बाद हुये हैं । सुना जाता है, इनके हनुमानजी का इष्ट था । ये बड़े सिद्ध संत थे । बादशाही शासन तथा शाहपुर मनोहर के रावजी द्वारा इनके १२ अस्थ्लों में कोठी कुये जीविका के रूप में निकले हुये थे ।
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२९.३०. नवलदालजी, लक्ष्मणदासजी~
नवलदासजी व लक्ष्मणदास जी ने मारोठ में साधन धाम ने बनाया था । दोनों संत भजनानन्दी थे । उनकी सेवा के लिये मारोठ के तत्कालीन ठाकुर ने ९९ बीघा १७ विसवा भूमि भेंट की थी । लक्ष्मणदासजी के शिष्य रघुनाथदासजी गरीबदासोत मारोठवाले भैराणे की यात्रा करने गये थे । वहां उनको संत श्रेष्ठ ईश्वरदासजी का दर्शन हुआ । ईश्वरदासजी जमात उदयपुर में दीक्षित हुये थे किन्तु थोड़े दिन के पश्चात ही जमात छोड़कर विरक्त रूप में विचरते थे ।
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ईश्वरदासजी की विद्वत्ता, वैराग्य, शील स्वभाव आदि से प्रभावित होकर रघुनाथदासजी ने ईश्वरदासजी से प्रार्थना की- भगवन् ! हमारे यहां मारोठ पधारिये । ईश्वरदासजी ने कहा~ चल तो सकता हूं किन्तु वहां मेरी सेवा उचित रूप से नहीं हो सकेगी । रघुनाथदासजी ने पूछा~ आपकी ऐसी क्या सेवा है ? जिसे हम नहीं कर सकेंगे । ईश्वरदासजी ने कहा~ मैं स्वर साधना तथा हठ योग साधना में लगा हुआ हूँ । अतः भोजन भी स्वर के हिसाब से ही करता हूँ ।
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भोजन के समय आप कहेंगे भोजन करो किन्तु मेरा स्वर उस समय भोजन करने योग्य नहीं होगा तो मैं भोजन नहीं कर सकूंगा । इत्यादिक व्यवहार आप को अच्छा नहीं लगेगा तथा योग साधना में भी पूरा-पूरा बन्धन रहता है । उक्त बातें सुनकर रघुनाथदासजी ने कहा~ सेवा की चिन्ता तो आप छोड़ दें, सेवा तो सभी प्रकार की हो जायगी । फिर ईश्वरदासजी रघुनाथदासजी के साथ मारोठ आ गये । उनकी सभी प्रकार की सेवा सुचारू रूप से होती रही ।
(क्रमशः)

*२२. अजपा जाप का अंग ~१३/१६*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*२२. अजपा जाप का अंग ~१३/१६*
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*वक्र बैन वायू रहित, होय सु अजपा जाप ।*
*रज्जब मन उनमनि लगे, प्रकटे आपे आप ॥१३॥*
अजपा जाप मुख, वचन और प्राण वायु से रहित ही होता है, अजपा जाप से मन समाधि में लग जाता है और अपने आत्म-स्वरूप का साक्षात्कार अपने आप ही हो जाता है ।
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*मिहरि पतिव्रत मीन मत, दोनों नाम न लेहिं ।*
*पै होत इष्ट अलाहिदे, नेह माग जीव देहिं ॥१४॥*
पतिव्रता नारी मुख से तो पति का नाम नहीं लेती किन्तु उसके मन में पति ही बसा रहता है, मछली मुख से तो पानी नहीं पीती किन्तु रोम रोम से पीती ही रहती है, वैसे ही अजपा जाप करने वाला मुख से तो नाम उच्चारण नहीं करता किन्तु भीतर निरंतर करता ही रहता ही रहता है । उक्त तीनों अपने प्रियतमों के अलग होने से प्रेम के मार्ग में अपना प्राण भी त्याग देते हैं ।
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*कछी पंछी हेत ले, अंडे क्यों उपजंत ।*
*रज्जब राम कहे बिन ऐसे, अजपा जाप करन्त ॥१५॥*
कछुवी अपने अंडे दूर जल तट पर रखती है, उसी से वे पककर फूट जाते हैं । कुंज पक्षी हिमालय पर अंडा रखता है, उस पर भारी बर्फ राशि जम जाती है, कूंज उन्हें उन में वृत्ति रख कर पालता है । देखो ये उक्त अंडे माताओं के दूर रहने पर भी स्नेह से बच्चे के रूप में कैसे उत्पन्न हो जाते हैं, वैसे ही राम नाम बोले बिना ही साधक स्नेह से अजपा जाप करते हैं ।
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*हरि जी गाहक हेत के, नारायण लेहिं नेह ।*
*तो मनसा वाचा कर्मना, संतों करो सनेह ॥१६॥*
हरि तो प्राणी के प्रेम के ग्राहक हैं, नारायण हृदय के स्नेह को ही लेते हैं, तब हे संतों ! मन, वचन और कर्म से प्रभु से प्रेम ही करो, प्रेम से ही अजपा जाप होता है ।
(क्रमशः) 

शुक्रवार, 24 जुलाई 2026

३०. ज्ञानी कौ अंग ४५/४८

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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३०. ज्ञानी कौ अंग ४५/४८
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बन तैं घर आवै नहीं, घर तैं बन नहिं जाइ । 
सुन्दर रवि उद्दोत तैं, तिमिर कहां ठहराइ ॥४५॥
एक बात और, ब्रह्मज्ञान होने पर यदि ज्ञानी वन में रह रहा हो घर में आना(गृहस्थ होना) उसके लिये आवश्यक नहीं और यदि ज्ञानावस्था में वह घर में है तो उसे वन में जाने(संन्यासी होने) की आवश्यकता ही नहीं हैं; क्योंकि सभी जानते हैं कि सूर्य के प्रकाश के सम्मुख अन्धकार कहीं भी नहीं ठहर पाता ! ॥४५॥
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पंखी की पर टूट कैं, भूमि पर्यौ जिहिं ठौर । 
सुन्दर उडिबे तें रह्यौ, मिटी सकल ही दौर ॥४६॥
सचाई यह भी है - जैसे किसी पक्षी के पंख टूट जाने पर वह जहाँ गिरता है, वहाँ पड़ा रह जाता है वहाँ से उड़ नहीं पाता । यही स्थिति ज्ञानी की भी होती है । उस की स्थिति पक्षविहीन पक्षी के तुल्य हो जाती है । उस की भी जब समस्त जन्मपरम्परा नष्ट हो जाती है, तब वह अवशिष्ट प्रारब्ध कर्म भोग कर निर्वाण(मुक्ति) प्राप्त कर लेता है ॥४६॥
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एक क्रिया खेती करै, बंधन होत अपार । 
एक क्रिया भोजन करत, बंधन उतनी बार ॥४७॥
मनुष्यों का एक कर्म(क्रिया) कृषि(खेतन में अन्न पैदा करना) है । जिस में 'यह करो, यह न करो' आदि अनेक विधि - निषेध रूप बन्धन लगे होते हैं । इसी प्रकार, मनुष्यों का एक कर्म भोजन भी है; उसमें भी समाज ने उतने ही प्रकार के विधि - निषेधात्मक बन्धन लगा रखे हैं ॥४७॥
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एक क्रिया मल मूत्र कौं, तजत नहीं कछु प्यार । 
सुन्दर ज्ञानी की क्रिया, बंधन नहीं लगार ॥४८॥
मनुष्यों के साथ एक नित्य(दैनिक) क्रिया बन्धन के रूप में मल मूत्र के त्याग की भी लगी हुई है जिसको वे किसी राग के विना ही प्रतिदिन करते हैं । श्रीसुन्दरदासजी के कहने का तात्पर्य यह है कि संसार की छोटी बड़ी सभी क्रियाएँ बन्धन रूप हैं । केवल ज्ञानी की ज्ञानक्रिया ही एक ऐसी क्रिया है जिसमें किसी प्रकार का बन्धन नहीं है ॥४८॥
(क्रमशः)