बुधवार, 17 जून 2026

२८. आत्म अनुभव कौ अंग ५/८

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२८. आत्म अनुभव कौ अंग ५/८
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सदा रहै आनंद मैं, सुन्दर ब्रह्म समाइ । 
गूंगा गुड कैसैं कहे, मनही मन मुसकाइ ॥५॥
श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - साधक भी इस आत्मानन्द में तन्मय(लीन) हो कर, दिव्य अनुभव वैसे ही करता रहता है जैसे गूंगा मनुष्य स्वयं गुड़ खा कर भी उस का माधुर्य दूसरों को नहीं बता पाता । वह केवल अपने मन में मुसकरा कर रह जाता है ॥५॥
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जाकौ निश्चै ऊपजै, अनुभव आतम ज्ञांन । 
सुन्दर सो बोलै नहीं, सहज भया गलतांन ॥६॥
जिस साधक के हृदय में प्रभु परमात्मा का यह साक्षात्कार(ज्ञान) उद्भूत हो जाता है वह निश्चित ही उसके विषय में कुछ कहने की स्थिति में न रह कर दिन रात उसी में लीन रहता है ॥६॥
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जाकौ अनुभव होत है, सोई जानै सार । 
सुन्दर कहैं बनैं नहीं, मुख तैं एक लगार ॥७॥
जिस साधक ज्ञानी को इस प्रभु परमात्मा के साक्षात्कार का अनुभव हो जाता है वह उस का परम तत्त्व(महत्त्व) समझता है । परन्तु वह इस(अनुभव) को दूसरों को बताने में स्वयं को असमर्थ ही पाता है । इस विषय में उस के मुख से एक भी शब्द बोलने की स्थिति नहीं रह जाती ॥७॥
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कामी जानै काम सुख, सोऊ कह्यौ न जाइ । 
आतम अनुभव परम सुख, सुन्दर बचन बिलाइ ॥८॥
लोक में भी हम देखते हैं कि कोई कामभोगी नाना प्रकार के कामभोगों का आनन्द लेता है, परन्तु वह भी उन स्वयं अनुभूत कामभोगों के सुख का अनुभव दूसरों के सम्मुख यथार्थ रूप से वर्णन नहीं कर पाता; क्योंकि यह अनुभवसुख है ही ऐसा कि जिस का वाणी के माध्यम से वर्णन कथमपि नहीं किया जा सकता । उसको आत्मानुभव के यथार्थ वर्णन हेतु कोई यथार्थ शब्द ही नहीं मिलते ॥८॥
(क्रमशः)

पकड़ि पकड़ि मन कौं बैठाइ

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*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*कह्या हमारा मान मन, पापी परिहर काम ।*
*विषयों का संग छाड़ दे, दादू कह रे राम ॥*
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मन ॥
पकड़ि पकड़ि मन कौं बैठाइ ।
इहि बिधि हरि कैं सुमरणि लाइ ॥टेक॥
मन दौड़ै देही बैसाणी । आसण इसा न होइ रे प्राणी ॥
मन फोरा देही पांगुली । भौ सागर तिरिबा की रली ॥
जौ लग मन बैसै नहिं ठाइ । तौ लग तिल भरि तिर्या न जाइ ॥
मन जाते का करौ गयेसा । बषनां सतगुर कह्यौ संदेसा ॥१५२॥
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मन चंचल है । एक आलम्बन पर टिकता नहीं है । पकड़कर लाओ, फिर भाग जाता है । भागते रहना ही इसकी नियति है । इस पर बषनांजी कहते हैं, साधक का कर्तव्य है, वह भागते हुए चलायमान मन को पकड़-पकड़ कर जाने से रोककर एक लक्ष्य में स्थिर करने का प्रयत्न करे ।
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इसप्रकार से इस चंचल मन को रामस्मरण में संलग्न करे । मन दौड़ता है । देह एक जगह स्थिर रहती है । हे प्राणी ! इस प्रकार से आसन सिद्ध नहीं होता है, रामजी का भजन नहीं होता है । मन विषयविकारों से विनिर्मुक्त होकर हल्का हो जाये तथा शरीर विषयों को भोगे नहीं = पांगुला हो जाये । वास्तव में भव रूपी सागर से पार होने का तरीका यही है ।
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जब तक मन परमात्मा रूपी एकस्थान = लक्ष्य में स्थिर नहीं होता तब तक संसार-सागर की पूरी दूरी में से एक तिलभर की दूरी तक भी पार हुआ नहीं जा सकत । जाते हुए मन को गयेसा = ग्रहण करो = रोको, बषनां कहता है, सद्गुरु महाराज का सर्वप्रथम संदेश = उपदेश यही है ॥१५२॥

*२०. सुमिरण का अंग ~१३/१६*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*.

*२०. सुमिरण का अंग ~१३/१६*
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*षट् दर्शन नाम हि कहैं, नाम हि वेद पुरान ।*
*तो रज्जब नाम हि गहो, पाया भेद विनान१ ॥१३॥*
षड् दर्शन(६ शास्त्र) वा नाथ, जंगम, सेवड़े, बौद्ध, सन्यासी, शेष, ये ६ के नाम स्मरण की प्रेरणा करते हैं और वेद पुराणादि सदग्रंथ भी नामस्मरण साधन को श्रेष्ठ कहकर उसके करने की प्रेरणा करते हैं । उक्त शास्त्रादि तथा सद्गुरु के उपदेश से हमने नाम स्मरण विषयक रहस्यमय विज्ञान१ प्राप्त कर लिया है । अत: साधक को नाम-स्मरण साधन ही करना चाहिये ।
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*सब ही वेद विलोय कर, अंत दृढावें नाम ।*
*तो रज्जब जगदीश भज, इतना ही है काम ॥१४॥*
सम्पूर्ण वेदों का मनन करके विद्वान् संत नामस्मरण रूप साधन ही दृढ़ता से करने की प्रेरणा करते हैं । तब जगदीश्वर का ही भजन करना चाहिये, साधक को अपने कल्याण के लिये नाम स्मरण रूप कार्य ही बहुत है ।
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*साधू वेद बोल हि सु यूं, राम कहे सब कीन ।*
*जन रज्जब जग उद्धरहिं, जो जीव जगपति लीन ॥१५॥*
संत तथा वेद ऐसा ही कहते हैं कि - जिसने राम का स्मरण कर लिया, उसने सब कुछ कर लिया । जो जीव जगतपति परमेश्वर के स्मरण में लीन होते हैं, वे जगत से पार हो जाते हैं ।
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*रज्जब पैठे राम में, सो रट द्वारे होय ।*
*मिलबे को मारग यही, और न दूजा कोय ॥१६॥*
जो भी राम के स्वरूप रूप धाम में प्रवेश करते हैं, वे राम स्मरण रूप द्वार से ही करते हैं, राम से मिलने का मार्ग यही है अन्य कोई भी नहीं है ।
(क्रमशः)

२८. आत्म अनुभव कौ अंग १/४

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२८. आत्म अनुभव कौ अंग १/४
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मुख तैं कह्यौ न जात है, अनुभव कौ आनंद ।
सुन्दर संमुझै आपु कौं, जहां न कोई द्वंद्व ॥१॥
{महात्मा श्रीसुन्दरदासजी इस अङ्ग में उस निरञ्जन निराकार के साक्षात्कार के दिव्य अनुभव से प्राप्त आनन्द का विस्तृत विवरण दे रहे हैं जो उन को श्रीगुरुमुख से श्रुत उपदेश के आश्रयण से की गयी साधना से प्राप्त हुआ था ।}
वे कहते हैं - इस आत्मानन्द के अनुभव का वर्णन हम अपने मुख से नहीं कर सकते; क्योंकि यह अनिर्वचनीय है । यह स्वयं अपने उस हृदय में ही समझने की वस्तु है जहाँ अब किसी प्रकार के द्वैत की भ्रान्ति नहीं रह गयी है ॥१॥
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उमगि चलत है कहन कौं, कछू कह्यौ नहिं जाइ ।
सुन्दर लहरि समुद्र मैं, उपजै बहुरि समाइ ॥२॥
इस दिव्य अनुभव के विषय में जब हम कुछ कहना आरम्भ करते हैं तो हम कुछ भी कहने में असमर्थ हो जाते हैं; क्यों कि हमारे हृदय समुद्र में जब एतद्विषयक आनन्द की लहर(तरङ्ग) उठती है तो वह पुनः वहीं समा जाती(रह जाती) है ॥२॥
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कह्यौ कछू नहिं जात है, अनुभव आतम सुक्ख ।
सुन्दर आवै कंठ लौं, निकसत नांहि न मुक्ख ॥३॥
अतः हम उस आत्मानन्द के उस दिव्य अनुभव के विषय में कुछ भी कहने में स्वयं को असमर्थ पाते हैं । वह वर्णन हेतु हमारे कण्ठ तक आकर भी मुख से नहीं निकल पाता ॥३॥
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सुन्दर जैसें सर्करा, गूंगै खाई होइ ।
मुख सौं कहि आवै नहीं, कांख बजावै सोइ ॥४॥
जैसे कोई गूंगा(वाणीविहीन) पुरुष स्वयं मीठा गुड(शक्कर) खा कर भी उस का स्वाद(जायका) दूसरों के सम्मुख अपनी बाणी के माध्यम से नहीं कह पाता । उस समय वह अपनी कांख(बाहुओं के मूल का गड्ढा) हथेली से बजाता हुआ केवल हर्ष प्रकट करके ही रह जाता है ॥४॥
(क्रमशः)

राम-धन ॥

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*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*राम धन खात न खूटै रे,*
*अपरंपार पार नहिं आवै, आथि न टूटै रे ॥*
*तस्कर लेइ न पावक जालै, प्रेम न छूटै रे ॥*
*चहुं दिशि पसर्यो बिन रखवाले, चोर न लूटै रै ॥*
*हरि हीरा है राम रसायन, सरस न सूखै रे ॥*
*दादू और आथि बहुतेरी, तुस नर कूटै रे ॥*
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राम-धन ॥
सोइ निरधन जाकै राम धन नांहीं ।
राम धन ताकै निधि घर मांहीं ॥टेक॥
नाणा नाँव अमर संसारि । जिनि लीया ते उतरे पारि ॥
चोर न लागै मुसै न कोइ । लियाँ थैं लाभ घणाँ ही होइ 
खर्चताँ खाताँ ओड न आवै । सांच्याँ चारि पदारथ पावै 
आगैं यहु धन जिनकै हूवा । काल दुकालाँ नांहीं मूवा ॥
दूजा धन देखताँ बिलाइ । राम अखै धन कदे न जाइ ॥
चित चरवा भरि मेल्हा पाटि । हिरदै राख्या दिपै लिलाटि ॥
सो बोहरा बोहराँ मैं कहिये । जिहि घटि राम पदारथ लहिये 
आदि अंति लूँ खरचै खाइ । बषनां कै रामधन बिनसि न जाइ ॥१५१॥
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निरधन वह है जिसके पास रामनाम रूपी धन नहीं है । जिसके पास राम-धन है उसके घर में ही धन है, ऐसा मानना चाहिये । रामनाम रूपी नाणा = धन ही संसार में अमर = हमेशा रहने वाला धन है जिन्होंने भी इसका स्मरण किया है, वे ही संसार-सागर से पार उतरे हैं । इस राम-धन को कोई भी चौर चौरी नहीं कर सकता तथा कोई भी घाड़ायती इसको छीन नहीं सकता ।
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इसको लेने से, इसका स्मरण करने से अनेकों लाभ होते हैं । यह ऐसा अक्षय धन है कि खर्चने और खाने से इसका ओड = अंत नहीं आता । इसका संचय करने से धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष रूपी चारों पदार्थों की प्राप्ति होती है ।
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पूर्वकाल में जिनके पास भी यह राम-नाम रूपी धन रहा है वे अकाल और दुष्काल के प्रभावों से सर्वथा अप्रभावित रहे हैं । अर्थात् उन्हें धर्मराज के यहाँ कष्ट भुगतने नहीं जाना पड़ा है । रामधन के अतिरिक्त अन्य सभी धन देखते-देखते ही नष्ट हो जाते हैं जबकि अक्षय रामधन कभी भी खत्म नहीं होता ।
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चित्त रूपी चरवे(चरु = जलादि भरने का पात्र) में इसको भरकर ऊपर से विषय विकार न आने देने रूपी ढक्कन से ढककर रखना चाहए । हृदय में इसको बसा लेने से ललाट देदीप्यमान हो जाता है । धन संचय करने व उधार देने वाले बोहरों में वास्तविक बोहरा यही है जिसके हृदय में राम-नाम रूपी धन विद्यमान होता है । बषनां प्रारम्भ से अब तक रोज इस रामनाम रूपी धन को खर्चता और खाता है फिर भी यह कम नहीं होता है, विनष्ट नहीं होता है ॥१५१॥

मंगलवार, 16 जून 2026

*२०. सुमिरण का अंग ~९/१२*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*२०. सुमिरण का अंग ~९/१२*
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*अकलि१ उजास२ अनन्त बल, ऋद्धि सिद्धि मधि नाम ।*
*रज्जब आवहिं शिव शक्ति, सत सुमिरण जिहिं ठाम ॥९॥*
ज्ञान१ के प्रकाश२ से देखो तो नाम स्मरण में अनन्त बल है, ऋद्धि सिद्धि नाम स्मरण से मिलती है, जिस स्थान में सत्य ब्रह्म का सम्यक् स्मरण होता है वहाँ माया ओर ब्रह्म दोनों ही आते हैं । अर्थात ब्रह्म साक्षात्कार होता है और मायिक पदार्थों की भी कमी नहीं रहती है ।
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*रज्जब अज्जब राम धन, विध्न रहित बहु माल ।*
*वित१ बे हद जाको मिले, भाग्य भले तिहिं भाल ॥१०॥*
राम स्मरण रूप अदभुत धन विघ्न रहित है, इसे कोई लूट नहीं सकता, इससे इच्छानुसार बहुत माल मिलता है, जिसको यह असीम धन१ मिलता है, उसका भाग्य विशाल समझना चाहिये ।
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*तीन लोक चौदह भुवन, अरु ब्रह्माण्ड इक्कीस ।*
*सब ठाहर सीझें१ सुमरि, रज्जब रट जगदीस ॥११॥*
तीनों लोक चौदह भुवन और इक्कीस ब्रह्माण्ड, इन सभी स्थानों में रहने वाले प्राणी ईश्वर स्मरण द्वारा ही सिद्धावस्था१ को प्राप्त हुये हैं । अत: निरंतर जगदीश्वर का स्मरण करना चाहिये ।
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*चार युग चहुँ वेद मुख्य, सबै डिढावहिं नाम ।*
*रज्जब सिध साधक कहै, यहु सीजण की ठाँम ॥१२॥*
चारों युगों के प्राणियों के उद्धारार्थ चारों वेदों ने विशेषकर नाम स्मरण रूप साधन ही दृढ़ता से करने को कहा है तथा और साधक संत भी मुक्ति रूप सिद्धावस्था को प्राप्त करने के लिये ईश्वर का नाम स्मरण रूप स्थान श्रेष्ठ बताते हैं ।
(क्रमशः)

*२०. सुमिरण का अंग ~५/८*

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*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*२०. सुमिरण का अंग ~५/८*
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*रज्जब भजन भण्डार में, दीरघ दौलत१ दोय ।*
*इहां सुखी संसार मधि, आगे आनँद होय ॥५॥*
भजन रूप भण्डार में दो प्रकार का महान धन१ है एक तो वैराग्य और दूसरा आत्मज्ञान । वैराग्य से व्यक्ति राग रहित व्यवहार करता है, अत:वह संसार में सुखी रहता है और आत्मज्ञान से आगे आनन्द स्वरूप हो जाता है । भजन करने से वैराग्य और ज्ञान स्थिर रहते हैं ।
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*रैणाइर१ रंकार२ मधि, मुकता३ रिधि सिधि माँहिं ।*
*जन रज्जब मथ जापकर, रत्नहुं टोटा नाँहिं ॥६॥*
समुद्र१ में रत्न रूप धन बहुत था, देव दानवों ने मन्थन करके निकाला, वैसे ही हे साधक ! राम के बीज मंत्र "राँ"२ में ऋद्धि सिद्धि रूप धन बहुत३ है, जाप रूप मन्थन कर, फिर तेरे पास भी कमी नहीं रहेगी ।
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*साहिब के घर सौंज१ बहु, सुमिरन सम कोइ नाँहिं ।*
*रज्जब भज भगवंत ह्वै, सकल बोल ता माँहिं ॥७॥*
ईश्वर के घर में नाना प्रकार की सामग्री१ है किन्तु स्मरण के समान कोई भी नहीं है । भजन करने से प्राणी भगवान् बन जाता है, संपूर्ण शास्त्र तथा सभी संतों का वचन उसे भगवत् स्मरण में लगाने की ही प्रेरणा करते हैं ।
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*रज्जब बंदा बंदगी, कियों सरे सब काज ।*
*सेवक सेवा कर लहै, श्री सहित शिर-ताज ॥८॥*
भक्त जब भक्ति करता है तब ही उसके विक्षेप निवृत्तिपूर्वक सभी कार्य सिद्ध होते हैं । इस कारण सेवक सेवा करके माया और माया पति परमात्मा को भी प्राप्त करता है ।
(क्रमशः)

सोमवार, 15 जून 2026

२७. अक्षर बिचार कौ अंग १७/२०

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२७. अक्षर बिचार कौ अंग १७/२०  
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आपुन लघु ह्वै जात है, और हि दे सनमांन । 
सुन्दर रीति बडेन की, जानहिं संत सुजांन ॥१७॥ 
लोक में भी हम देखते हैं कि भले लोगों की यह परिपाटी(परम्परागत स्वभाव) है कि वे स्वयं साधारण(सत्सङ्गति एवं गुरुभक्ति से संयुक्त = लघु) होते हुए भी दूसरे(अपने अनुगामियों) का सम्मान ही करते हैं । यह बात सभी सज्जन जानते हैं ॥१७॥
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जो कोउ आइ बडौ कहै, धरैं बडाइ सीस । 
तौ हू आप समा करै, सुन्दर बिस्वा बीस ॥१८॥ 
ऐसे सज्जनों का यह स्वभाव ही होता है कि उनके पास आकर उन से बड़ा कोई कुछ कहता है तो वे उस के महत्त्व(बडप्पन) को ध्यान में रखते हुए, स्वयं समता रखकर उन को पूर्णतः(बीस विस्वा) सन्तुष्ट करते हैं ॥१८॥
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सुन्दर लघुता गहि रहै, दूरि करैं जब गर्ब ।
गुरु ताही कौं देत है, बित्त आपनौ सर्ब ॥१९॥ 
जो शिष्य गुरु के सम्मुख अपना सब सांसारिक अभिमान त्याग कर लघुता(नम्रता) ग्रहण किये रहता है, गुरुदेव प्रसन्न होकर ऐसे गुणी शिष्य को ही अमूल्य ब्रह्मज्ञानोपदेश प्रदान करते हैं ॥१९॥
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जौ गुरु कै पीछे रहै, तौ लघु दीरघ होइ । 
आगै लघु कौ लघु रहै, सुन्दर पुस्तक जोइ ॥२०॥
इति अक्षर बिचार को अंग ॥२७॥
छन्दःशास्त्र के अनुसार जैसे जो लघु वर्ण गुरु वर्ण का अनुगमन करता है वह समय पा कर स्वयं गुरुत्व धारण कर लेता है । गुरु वर्ण से आगे रहने वाला लघु वर्ण सदा लघु ही रह जाता है; इसी प्रकार गुरुदेव का अनुगमन करने वाला शिष्य कभी न कभी समय पाकर (साधना पूर्ण होने पर) स्वयं गुरु हो जाता है; परन्तु जो शिष्य होकर भी गुरु से अभिमान करता है वह सदा लघु(साधनाहीन) ही रह जाता है । उसकी साधना कभी सफल नहीं हो सकती । उस का तत्त्वज्ञानी(ब्रह्मसाक्षात्कार) होना तो असम्भव हो समझिये ॥२०॥
इति अक्षरविचार का अंग सम्पन ॥२७॥
(क्रमशः) 

तीधोधो भाई तीधोधो

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*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*दादू मोह संसार को, विहरै तन मन प्राण ।*
*दादू छूटै ज्ञान कर, को साधु संत सुजाण ॥*
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राग भैरूँ ॥१७॥माया
तीधोधो भाई तीधोधो, चिति परै तौ तीधोधो ।
मुध परै तौ तीधोधो, दुहुँ पवाड़ाँ तीधोधो ॥टेक॥
ज्याँह कै नाँहीं त्याँहनैं रोज रुवावै, छै तो बहुत पचावै ।
संपति बिपति दोउ तीधोधो, इहि बिधि नाच नचावै ॥
एकाँ कै आगै व्है निकसी, सो सँगि लागा जावै ।
एकाँ कै बासै बसि चाली, तिनकौं चित्त लगावैं ॥
जे राची तौ तीधोधो, बिरची तौ तीधोधो ।
बषनां बहुत नचाया आगैं, जे उबर्या तो कोई को ॥१५०॥
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“तीधोधो” का सही शाब्दिक अर्थ क्या है, पता नहीं किन्तु प्रसंगानुसार ‘बुरा है’ अर्थ अमझ में आता है । स्वामी मंगलदासजी महाराज ‘ठीक है’ अर्थ की कल्पना करते हैं । यदि वे पूरे पद की व्याख्या करके ‘ठीक है’ अर्थ से संगति बैठाते तो हमें सुविधा होती । खैर ! पाठक अर्थ पढ़ें । इस पद में बषनांजी ने माया के धन-सम्पत्ति रूप को हेय बताया है । उनके अनुसार माया के अर्जन, रक्षण और व्यय तीनों में ही अनेक कष्टों को सहन करना पड़ता है । अतः उनके विचार से माया हरतरह से ही बुरी है । इन्हीं विचारों की प्रतिध्वनि है इस पद में ।
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माया बुरी है, हे भाई ! माया सर्वथा त्याज्य है । यदि इस माया के न होने पर इसके प्राप्त्यर्थ चिति परै = चित्त में चिंतन चलता है तो वह भी बुरा है । इसके विपरीत यदि माया के होने पर चित्त इसमें मुध = मुग्ध = आसक्त हो जाता है तो भी बुरा है क्योंकि इस मिथ्या माया का न होने पर चिंतन तथा होने पर इसमें आसक्ति दोनों ही बुरे हैं ।
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जिसके पास माया नहीं होती वे नित्य ही माया की प्राप्ति हेतु रोते हैं कि हाय ! हम हतभाग्य हैं जो हमारे पास फूटी कौड़ी भी नहीं है । इसके विपरीत जिनके पास माया है उन्हें भी यह पचावै = परेशान करती है । राजा कर के रूप में, चोर चोरी करके, बलवान जबरदस्ती करके इस माया को छीन लेने का प्रयत्न करते हैं । अतः जिसके पास माया है, वह सदैव चिंता निमग्न रहता है कि कोई मुझसे इसे छीनकर न ले जाये । अतः सम्पत्ति तथा विपत्ति दोनों ही बुरी है । क्योंकि दोनों ही मनुष्य को नाना नाच नचाती हैं ।
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एकाँ कै =जिनके सामने से माया चली जाती ही वे इस माया के ही पीछे-पीछे दौड़ते हैं कि कैसे भी यह उनके घर में रुक जाये, आ जावे । इसके विपरीत जिनके घर में निवास करके वह चली जाती है वे भी अहर्निश इसके चिंतन में ही लगे रहते हैं । अतः यदि यह माया घर में रहती है तब भी बुरी है । और चली जाती है तब भी बुरी है इस माया ने पूर्वकाल में भी अनेकों को अनेक नाच नचाये हैं । कोई भगवद्भक्त ही इससे बच पाये हैं, वे विरले ही हैं ॥१५०॥

रविवार, 14 जून 2026

*२०. सुमिरण का अंग ~१/४*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*२०. सुमिरण का अंग ~१/४*
इस अंग में स्मरण संबंधी विचार दिखा रहे हैं -
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*राम नाम मूल मंत्र, सत्य नाम निरंजनं ।*
*यथा ध्यावै तथा पावै, भजे भरिये भाजनं ॥१॥*
राम नाम ही मूल मंत्र है, सत्य नाम ही निरंजन ब्रह्म है, जो जैसी उपासना करता है, वैसा ही फल पाता है । भजन करने से अवश्य ही अन्त:करण रूप पात्र आनन्द से भर जाता है ।
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*रज्जब रटि जटि नामसौं, आठों पहर अखण्ड ।*
*सुमिरण सम सौदा नहीं, निरख देख नौ खंड ॥२॥*
आठों पहर अखंण्ड नाम रटते हुये, जैसे जङिया भूषण में नग को जड़ता है, वैसे ही वृत्ति नाम में जड़ दे । हे साधक ! चाहे तू पृथ्वी के नौओं खंण्ड में दृष्टि फैलाकर देखले, स्मरण के समान श्रेष्ठ साधन रूप व्यापार नहीं मिलेगी ।
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*इस माया मंडाण मधि, सुमिरण सम कछु नाँहिं ।*
*सो आधार उर राखिये, जन रज्जब जिव माँहिं ॥३॥*
इस माया रचित संसार में कल्याण का साधन हरि स्मरण के समान अन्य कोई भी नहीं है । अत: हे जीव ! उसीको अपने कल्याण का आधार समझकर निरंतर हृदय में रखना चाहिये ।
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*बावन अक्षर वारिनिधि, मध्य रत्न रंकार ।*
*रज्जब लिया विलोय वित, आतम का आधार ॥४॥*
जैसे समुद्र में रत्न हैं, वैसे ही वर्णमाला के ५२ अक्षरों में "राँ" है ।देव दानवों ने समुद्र का मंथन करके १४ रत्न रूप धन निकाला था, वैसे ही संतों ने वर्णमाला से "राँ" निकाला है, जो कल्याण मार्ग में जीवात्मा का आश्रय है, अर्थात नाम चिन्तन से ही कल्याण होता है ।
(क्रमशः)

२७. अक्षर बिचार कौ अंग १३/१६

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२७. अक्षर बिचार कौ अंग १३/१६ 
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देखत दीसै एक ही, अरथ बिचारय दोइ । 
सुन्दर अद्भुत बात है, संमुझै पंडित कोइ ॥१३॥
जैसे स्वरसहित व्यञ्जन सामान्य दृष्टि से एक ही दीखते हैं, परन्तु विचार करने पर व्यञ्जन स्वर का पृथक् विभाजन भी ज्ञात हो जाता है; उसी प्रकार ब्रह्म समस्त जगत् में व्याप्त है, परन्तु विवेकशून्य पुरुष इसे अनुभव नहीं कर पाता । अतः विवेकी के लिये यही विवेक का फल है कि वह विवेक के आश्रयण से ब्रह्मज्ञानी हो पाता है ॥१३॥
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सोरठा
विंजन होइ तकार, तालिब होइ शकार जो । 
सुन्दर होइ छकार, उभय बरन नहिं देखिये ॥१४॥
ज्ञान के संस्कार का माहात्म्य : जैसे किसी शब्द में 'त्' के सम्मुख तालव्य 'श' हो तो वे दोनों मिल कर, व्याकरण शास्त्र के संस्कार के आधार पर, 'च्छ' हो जाते हैं । वहाँ पहले वाले 'त्' एवं 'श' दोनों व्यञ्जन नहीं दिखायी देते१ ॥१४॥ {१ द्र० - शश्छोऽटि (पा० सू० ८.४.६.३)}
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यौं द्विज सूद्र सु एक, ज्ञान बिषैं नहिं भेद है । 
उभय बरन तजि टेक, ब्रह्म रूप सुन्दर भये ॥१५॥
इसी प्रकार ब्रह्मज्ञान से पूर्व ब्राह्मण एवं शूद्र जातियों में दिखायी देने वाला द्वैत भाव ब्रह्मज्ञान के बाद नहीं दिखायी देता । श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - क्योंकि ब्रह्मज्ञान के बाद किसी भी प्रकार के द्वैत(जातिभेद) की कहीं कोई कल्पना ही नहीं रह जाती । तब समस्त संसार ब्रह्म की सुन्दरता में मग्न हो जाता है । यही संस्कार का माहात्म्य है ॥१५॥
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दोहा
दीरघ कै पीछे भये, ह्वै अनयास गुरुत्व । 
सुन्दर लघु दीरघ करै, ज्यौं अक्षर संयुत्व ॥१६॥
छन्दःशास्त्र के माध्यम से आत्मतत्त्वविवेक : अब श्रीसुन्दरदासजी छन्दः शास्त्र (काव्यशास्त्र) के अनुसार देवनागरी वर्णमाला के वर्णों के माध्यम से आत्मतत्त्व पर अपने विचार प्रस्तुत कर रहे हैं । छन्दःशास्त्र का यह सिद्धान्त२ है कि यदि काव्यपाठ में पठित किसी शब्द में कोई अनुस्वार () युक्त, दीर्घ या संयुक्त वर्ण हो, या विसर्ग (:) युक्त वर्ण हो तो उससे पूर्व का वर्ण दीर्घ(गुरु) माना जाता है । इसके अनुसार वे कहते हैं‌‍‍ - दीर्घ(अपने से बड़े) - का अनुगमन करने पर लघु(छोटे) को भी अनायास ही गुरुत्व(महत्त्व) प्राप्त हो जाता है । जैसे काव्यपाठ में कोई संयुक्त(मिले हुए) वर्ण, स्वयं लघु होते हुए भी, अपने से पीछे वाले वर्ण को गुरुत्व(महत्त्व) प्रदान कर देता है ॥१६॥ 
(२ सानुस्वारश्च दीर्घश्च, विसर्गी च गुरुर्भवेत् । 
वर्णः संयोगपूर्वश्च, तथा पादान्तगोऽपि वा ॥ - छन्दः शास्त्र ।)
(क्रमशः) 

 

॥भक्ति महिमा॥

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*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*दादू सांई सतगुरु सेविये, भक्ति मुक्ति फल होइ ।*
*अमर अभय पद पाइये, काल न लागै कोइ ॥*
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राग बिभास ॥१६॥भक्ति महिमा॥ 
गाइये रामइयौ दातार । 
सब सुख आपै रोर कापै, निरधाराँ आधार ॥टेक॥
नारद सारद द्वारै गावैं, कीरति करैं कैंबार ।
नाथ अनाथ बन्धू, दालिद भंजनहार ॥
अखै अमरपद चारि पदारथ, देत न लावै बार ।
मैं आस करनैं गाइयौ, कवला नौं भरतार ॥
दूझै सदा भगति कै दोझै, खंडित नांहीं धार ।  
भगती भूरी दान आपै, मुकती पाडी लार ॥
पीलीपहु आराधियौ, म्हारा समर्थ सिरजनहार ।
बषनां दरबारि पहाऊ बोलै, बासन्यौं करतार ॥१४९॥

आपै = प्रदान करे । रोर = रौरव नरक तुल्य कष्ट तथा रौरव नरक के जनक पापों को कापै = काटता है । दूझै = दूध देता है, यहाँ द्रवित = प्रसन्न होता है । दोझै = दुहने की क्रिया । धार = दूध । भूरी = भैंस, यहाँ प्रभूत मात्रा में । पाडी = भैंस की बच्ची, यहाँ मुक्ति । पीलीपहु = रक्षक, आधार, अधिष्ठान । पहाऊ = प्रण, प्रतिज्ञा करने वाला; यहाँ परमात्मा शरणागतवत्सल है, वह अपने भक्तों की रक्षा करने की प्रतिज्ञा करता है, करने की प्रतिज्ञा के वचन बोलता है । बासन्यौ = बसने वाला । दातार रमैयाराम का सदा नामस्मरण करिये । वह समस्त सुखों = लौकिक-पारलौकिक दोनों को प्रदान करता है तथा रौरव समेत सभी नरकों के कष्टों तथा रौरवादि नरकों में जाने के हेतभूत समस्त पापों को जड़ सहित काट डालता है । वह अनाश्रितों का आश्रय देने वाला है ।
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नारद तथा शारदा उसके द्वार पर खड़े होकर उसके गुणों का गायन दिन में कई बार करते हैं । अर्थात् हमेशा करते ही रहते हैं । वह परमात्मा अनाथों का बन्धु तथा दारिद्र का भंजनहार है । अक्षय व अमर चौथे पुरुषार्थ मुक्ति को देने में वह तनिक भी विलम्ब नहीं करता है । ऐसे कमला के पति परात्पर-परब्रह्म-परमात्मा को मैंने आशा करके ही गाया है कि वह अपने स्वभावानुसार मुझे भी अपनी अखय-अमर-भक्ति देकर मुक्ति प्रदान कर देगा । 
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वह परमात्मा सदा ही भक्ति रूपी साधा से ही प्रसन्न होता है । उसकी वह प्रसन्नता एकबार हो जाने के पश्चात् कभी भी किसी भी स्थिति में खण्डित नहीं होती । वह सदैव अखण्डित रूप में ही बनी रहती है । वह उच्च कोटि की भक्ति(प्रेमाभक्ति) प्रभूत मात्रा में प्रदान करता है और अंत में मुक्ति रूपी बोनस और देता है । मेरे समर्थ सृजनहार अधिष्ठानस्वरुप इष्ट की आराधना करने पर वह घट-घट में बसने वाला, परमात्मा के न्यायालय रूपी धर्मराज के दरबार में भक्त के पक्ष में ही बोलता है ॥१४९॥

शनिवार, 13 जून 2026

२७. अक्षर बिचार कौ अंग ९/१२

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२७. अक्षर बिचार कौ अंग ९/१२ 
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जैसैं बिंजन मिलत है, पर अक्षर सौं जाइ । 
अहंकार सुन्दर गयें, आतम ब्रह्म समाइ ॥९॥
जैसे स्वररहित कोई भी व्यञ्जन आगे वाले व्यञ्जन वर्ण से जा मिलता है; वैसे ही प्राणी की अहन्त्व ममत्व भावना मिटने से उस का आत्मा ब्रह्म में लीन हो जाता है ॥९॥ (तु० - निर्ममो निरहङ्कारः स शान्तिमधिगच्छति - भ० गी० २/७१) ॥
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बिंजन पर अक्षर मिलै, द्वैत भाव दरसाइ । 
भक्त मिलै भगवंत कौं, सुन्दरदास कहाइ ॥१०॥
भक्त की अपेक्षा ज्ञानी का वैशिष्ट्य : जैसे किसी स्वररहित(क् आदि) व्यञ्जन के पर व्यञ्जन में मिल जाने पर भी उन दोनों में द्वैतभाव दिखायी देता है; इसी प्रकार भक्त का भगवान् से मिलन होने पर भी वह उसका दास 'सुन्दर का दास' ही कहलाता है; क्योंकि उनमें द्वैत भाव है ॥१०॥
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बिंजन पर अक्षर मिलै, द्वैत भाव नहिं कोइ । 
सुन्दर ज्ञानी ब्रह्ममय, एक मेक मिल होइ ॥११॥
परन्तु जैसे किसी स्वररहित व्यञ्जन के आगे वाले स्वर में मिल जाने पर उन दोनों का द्वैत भाव मिट जाता है, वे एकमेक(एकरस) हो जाते हैं; उसी प्रकार, ज्ञानी भी ब्रह्म का साक्षात्कार हो जाने पर वह उसमें तन्मय हो जाता है ॥११॥
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बिंजन स्वर अक्षर मिलै, होइ और ही रूप । 
रज बीरज संयोग तें, उपजै देह स्वरूप ॥१२॥
दो स्वरों के मिलन की एक अन्य विशेषता : जैसे 'अ' स्वर में 'इ' स्वर मिल जाने पर उनकी एक व्यञ्जनरहित अन्य विशिष्ट आकृति(ए) बन जाती है; उसी प्रकार स्त्री एवं पुरुष के रज एवं वीर्य के संयोग से एक विशिष्ट आकृति(मानव शरीर) बन जाती है ॥१२॥
(क्रमशः) 

भाव भजन की भाठी आगे

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*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*पीवै पिलावै राम रस, माता है हुसियार ।*
*दादू रस पीवै घणां, औरों को उपकार ॥*
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साधु ॥
भाव भजन की भाठी आगे, राम रसाइण पीवन लागे ॥टेक॥
देहरी कलाली तूं जिनि नाटै, हरि रस तौ है तन कै साटै ।
एक पियाला हमकौं दीया, साथी सह मतिवाला कीया ॥
सद मति वाले साध हमारे, तन मन कापड़ गहणें मारे ।
सार सुधा रस हिरदै धारैं, हरि रस पिवैं पिचकारी डारें ॥
पीवैं सदा खुमार न भागै, ल्यावही ल्याव सदा ल्यौ लागै ।
नाचें गावैं हरि रस राते, बषनां दादूपंथी माते ॥१४८॥
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मानस में कहा है ‘तन बिनु बेद भजन नहि बरना’ बिना शरीर के परमात्मा का भजन कर पाना संभव नहीं है । यहाँ देह से तात्पर्य मात्र मनुष्य देह से है क्योंकि इसके अतिरिक्त अन्य सभी शरीर भोग शरीर हैं । उनमें नये कर्म रूपी भजन भाव करने संभव नहीं है । इसीलिये सभी ग्रंथों में कहा गया है, “एहि तन करि फल विषय न भाई । स्वर्गउ स्वल्प अंत दुखदाई ॥’’ अतः मनुष्य जन्म पाकर रामरस सुधा का पान करना चाहिये, विषयविष का परित्याग करना चाहिये ।
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संत-महात्मा भाव = श्रद्धा तथा भजन की भट्टी पर तैयार हुए रामरसायन रूपी मद को पीने में लगे रहते हैं । वे कहते हैं, हे देह रूपी कलाली ! तू इस मद को पीने-पिलाने के लिये निषेध मत कर क्योंकि हरि रस तो तबही तक पिया जा सकता है जब तक शरीर विद्यमान है । साधु-संत रूपी गुरुमहाराज ने एक प्याला पीने को मुझ बषनां को भी दिया जिसने मुझे तो मतवाला बनाया ही, मेरे साथियों को भी राम-रसायन में सरावोर कर दिया ।
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मेरे संगी-साथी साधु सदमति = सत् स्वरुप परमात्मा का भजन-ध्यान करने वाले हैं । उन्होंने तन और मन के कापड़ = पड़दों को उतार दूसरों को दे दिये हैं । अर्थात् तन और मन दोनों को सर्वथा निर्विषय करके उनमें रामजी को बसा लिया है । वे सारस्वरूप सुधारस को ही हृदय में धारण करते हैं । वे स्वयं उस हरिरस को पीते हैं तथा उपदेश रूपी पिचकारियों में भर-भरकर अन्यों को पिलाते हैं ।
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वे उस हरिरस को दिन-दो दिन अथवा ऋतु विशेष में नहीं पीकर सदैव पीते हैं जिसका नशा कभी उतरता ही नहीं है । वे सदैव कलाली रूपी सुरति से राम-नाम-स्मरण रूपी रसायन और लाकर कर पिला, और लाकर पिला ही कहते रहते हैं । अर्थात् उनका राम-नाम-स्मरण के प्रति प्रेम प्रतिक्षण बढ़ता ही है ‘प्रतिक्षणवर्धमानं ।’ हरिरस में निमग्न हुए वे कभी नाचते हैं और कभी भगवन्नाम का गायन करते हैं ।
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मैं दादूपंथी बषनां भी उसी रामरसायन में निमग्न हूँ ॥१४८॥ यहाँ एक बात लक्ष्य करने की है कि दादूजी के अनुयायी प्रारंभ से ही ‘दादूपंथी’ कहलाते हैं न कि संत श्रीसुंदरदास द्वारा बताये गये ‘ब्रह्म संप्रदायी’ । इसीलिए सुंदरदासजी के मत को पंथ में मान्यता नहीं मिल सकी ।

*१९. लै का अंग ~८/१०*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*१९. लै का अंग ~८/१०*
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*रज्जब लाहा१ लाभ ल्यौ, टूटे टोटा हानि ।*
*सावधान साधे रही, रे जीव जीवन जानि ॥८॥*
ब्रह्म में वृत्ति लीन करने से लोभ१ पर लाभ होता है और ब्रह्म से वृत्ति हटाने पर हानि पर हानि होती है । हे जीव ! ब्रह्म में वृत्ति लगाने रूप साधन को अपना जीवन जानकर सावधानी से करता रह, इसी में तेरा कल्याण है ।
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*ल्यौ सुमिरन धुनि ध्यान धर, चिवन१ नेह कर नाम ।*
*जन रज्जब जप जिकर रट, सुरति संभालैं राम ॥९॥*
ब्रह्म में वृत्ति लीन करना, स्मरण करना, नाम-ध्वनी-कीर्तन करना, ध्यान धरना, चिन्तन१ करना, प्रभु में प्रेम करना, जप करना, प्रभु की चर्चा करना, नाम रटना, प्रभु में सुरति लगाना, और राम को याद करना, ये सर्वोपयोगी साधन हैं, इन्हें करते रहना चाहिये ।
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*बन्दे को यहु बंदगी, साहिब करना याद ।*
*यह सेवा सुमिरन इहै, इहै जिकर फरियाद ॥१०॥*
भगवान को निरंतर याद रखना, यही भक्त की भक्ति है, यही सेवा है, यही स्मरण है, यही चर्चा है, यही पुकार है । ‪‎
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इति श्री रज्जब गिरार्थ प्रकाशिका सहित “१९. लय का अंग” समाप्त ॥
(क्रमशः)‬ 

*१९. लै का अंग ~५/७*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*१९. लै का अंग ~५/७*
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*जन रज्जब या लोक में, ल्यौ निस्तारण हार ।*
*आदि अंत मधि मुनि मही, लघु दीरध लौ लार ॥५॥*
इस लोक में ब्रह्म में वृत्ति लगाना रूप साधन ही संसार से पार करने वाला है । इस भूमंडल से सृष्टि के आदिकाल, मध्यकाल और अंत समय तक जो भी मुनि हुये है, वे ब्रह्म में वृत्ति लगाना रूप साधन से ही लघु से महान हुये हैं ।
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*रज्जब लायक ठौर ल्यौ, ल्यौ में रहे सु लाज ।*
*लघु दीरघ ह्वै लाग ल्यौ, ल्यौ करणी शिरताज ॥६॥*
ब्रह्म में वृत्ति लगाना रूप साधन निर्विकल्प स्थिति रूप उचित स्थान में स्थित करता है तथा इस साधन से ब्रह्म प्राप्ति द्वारा संसार में साधक की लज्जा रह जाती है, ब्रह्म में वृत्ति लगाकर लघु भी महान हो जाते हैं, मानव के लिये ब्रह्म में वृत्ति लगाना रूप कर्तव्य शिरोमणि है ।
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*ल्यौ मारग लूटैं नहीं, लोभी लूटण हार ।*
*रज्जब पग लागे चलहिं, परपंची सरदार ॥७॥*
परमानन्द को लूटने की आशा वाले, ब्रह्म में वृत्ति लगाकर तो नहीं लूटते
किन्तु उसे लूटने के लिये संसार प्रपंच में फंसे हुये श्रीमान् सरदारों के पैरों में लगे चलते हैं अर्थात उनकी गुलामी करते हैं और दु:ख ही पाते हैं ।
(क्रमशः) 

२७. अक्षर बिचार कौ अंग ५/८

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२७. अक्षर बिचार कौ अंग ५/८ 
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उहै ऐंन उह गैंन है, नुकता ही कौ फेर । 
सुंदर नुकता भ्रम लग्यौ, ज्ञान सुपेदा हेर ॥५॥
यद्यपि अैन एवं गैंन - दोनों अक्षर आकृति में समान हैं; केवल गैंन में छोटा सा नुकता अधिक लगा हुआ है । अतः इस नुकते के कारण इन के विषय में द्वैत की भ्रान्ति होती है । इस भ्रान्ति(नुकता) को मिटाने के लिये जिज्ञासु को हरताल(अक्षर मिटाने का सफेद रंग रूपी) गुरुपदिष्ट ज्ञान की खोज करनी चाहिये ॥५॥
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ऐंन ऐंन के ऊपरैं, नुकता फूला होइ । 
ऐंन गैंन ह्वै जात है, ऐंन न सूझै कोइ ॥६॥
इस अैंन अक्षर के सीधे ऊपर लगा हुआ यह नुकता ऐसा प्रतीत होता है मानो किसी की आँखों में फूला(नेत्र रोग) हो गया हो । इस रोग के कारण, द्रष्टा(जिज्ञासु) को वह अैंन(आत्मा) ही गैंन(संसार) के रूप में भ्रमात्मक दिखायी देने लगता है ॥६॥
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नुकता फूला ऊपरै, सुन्दर अंजन लाइ । 
नुकता फूला दूरि ह्वै, ऐंन हि ऐंन दिखाइ ॥७॥
जैसे वह नेत्ररोगी किसी वैद्य के पास जा कर अपने फूला रोग के नाश के लिये कोई अंजन औषध लेकर उस से अपना वह रोग नष्ट कर लेता है; उसी प्रकार जिज्ञासु को अपना यह सांसारिक भ्रम मिटाने के लिये किसी समर्थ गुरु के पास जाकर उससे ज्ञानोपदेश ग्रहण करना चाहिये । तदनुरूप साधना करने पर ही जिज्ञासु को उस सर्वव्यापक आत्मा का साक्षात्कार हो पायगा ॥७॥ (क)
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ज्यौं आकार अक्षरनि मैं, त्यौं आतम सब मांहिं । 
सुन्दर एकै देखिये, भिन्न भाव कछु नांहिं ॥८॥
देवनागरी अक्षरों के माध्यम से आत्मतत्त्व पर विचार : जैसे देवनागरी लिपि के क, ख आदि सभी वणों में 'अ' अक्षर सम्पृक्त रहता है, वैसे ही सभी प्राणियों में आत्मा व्याप्त है । अतः साधक को सभी प्राणियों में समभाव रखना चाहिये; क्योंकि उनमें कोई भिन्नता नहीं है ॥८॥
(क्रमशः)

॥गुरुकृपा ॥

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*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*दादू काया कटोरा दूध मन, प्रेम प्रीति सों पाइ ।*
*हरि साहिब इहि विधि अंचवै, वेगा वार न लाइ ॥*
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राग काल्हेरौ ॥१५॥गुरुकृपा ॥
दयाल नैं चोघताँ म्हाँकी भूखड़ली भागी ।
अठसिधि नौनिधि नाखि पाछी, चरन कवल अनरागी ॥टेक॥
ब्रह्मा बिसन महेस सुर नर, तपता तीन्यूँ आगी ।
गुर दादू परसादि बषनौं, सबद सुनत त्यागी ॥१४७॥
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दयालु परब्रह्म-परमात्मा का चोघताँ = साक्षात्कार कर लेने पर मेरी सांसारिक भोगविलासों को भोगने की भूख समाप्त हो गई । मिने आठ सिद्धि तथा नौ निधियों को त्याग दिया है तथा मैं पूर्णतः परमात्मा का प्रेमी बन गया हूँ । जिस माया के आगे ब्रह्मा, विष्णु, महेश, सुर,नर सभी हाथ जोड़कर खड़े रहते हैं उस माया का गुरु दादूजी की कृपा व उनका उपदेश सुनकर मैंने परित्याग कर दिया है और परमात्मा का साक्षात्कार कर लिया है ॥१४७॥

शुक्रवार, 12 जून 2026

२७. अक्षर बिचार कौ अंग १/४

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२७. अक्षर बिचार कौ अंग १/४
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ऐंन१ नहीं अरु ऐंन है, गैंन२ नहीं अरु गैंन ।
सुन्दर नुकता३ आर सी, दूरि किये तें ऐंन ॥१॥
[श्रीसुन्दरदासजी महाराज इस अङ्ग में उर्दू(अरबी, फारसी) लिपि एवं देवनागरी लिपि के अक्षरों के माध्यम से आत्मतत्त्व एवं ब्रह्मतत्त्व पर विचार कर रहे हैं । अतः पाठक को, इस अङ्ग का स्वाध्याय प्रारम्भ करने से पूर्व, इन लिपियों से सम्बद्ध व्याकरण शास्त्र का ज्ञान होना भी अत्यावश्यक है । अतः पाठक उधर भी ध्यान दें ।] 
(१ ऐंन = प्रत्यक्ष । २ गैंन = अप्रत्यक्ष । ३ नुकता = बिन्दु । फारसी के ऐन अ) अक्षर पर बिन्दु लगाने से गैन अक्षर(ग) बन जाता है ।) उर्दू लिपि के अक्षरों के माध्यम से आत्मतत्त्व पर विचार : यह आत्मा अज्ञानावरण के कारण हम को अभी प्रत्यक्ष नहीं दिखायी देता है; परन्तु वह गुरुपदेश से प्राप्त आध्यात्मिक साधनों द्वारा प्रत्यक्ष(अैंन) किया जा सकता है । इसी प्रकार वह आत्मा वस्तुतः मलविक्षेपरहित एवं निर्विकार है, परन्तु वही माया के विकारों से संश्लिष्ट होकर विकारमय(गैंन = परोक्ष) प्रतीत होता है ।
महाराज श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - यदि उसमें से नुकता (विकार या बिन्दु को पृथक् कर दिया जाय वह पुनः अैंन(निर्विकार एवं निष्कलङ्क) ही हो जायगा ॥१॥
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सुन्दर नुकता भिन्न है, मिल्यौ ऐंन सौं नांहिं ।
मिलि करि दोऊ बांचिये, मिले अमिल यौं मांहिं ॥२॥
यद्यपि इस अैंन में यह नुकता(मायाविकार) आत्मा से सर्वथा भिन्न है; क्योंकि यह इस अैंन(आत्मा) से किसी भी तरह मेल नहीं खाता । इन को मिला कर पढनेधना करने) पर स्पष्ट समझ में आ जाता है कि यहाँ दो अनमेल चीजें मिली हुई प्रतीत हो रही हैं ॥२॥
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ऐंन आतमा जानिये, नुकता भयौ शरीर ।
सुन्दर दोऊ भिन्न हैं, मिले देखियें बीर ॥३॥
हे भाई ! यहाँ अैंन अक्षर से आत्मा का बोध होता है और इसमें लगे हुए नुकते को मायाकृत शरीर समझिये । ये दोनों(आत्मा एवं शरीर) स्वभावतः भिन्न हैं । इन को मिला कर पढ़ने से यही ज्ञात होता है ॥३॥
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ऐंन सु दीरघ देखिये, नुकता तनक दिखाइ ।
सुंदर नुकता तनक तैं, ऐंन गैंन ह्वै जाइ ॥४॥
इस ऐंन अक्षर में, छोटा सा नुकता लगा देने से, इस का आकार दीर्घ(लम्बा) प्रतीत होता है । छोटे से नुकता(अविद्यामय आवरण) के लग जाने पर यह अैंन(शुद्ध आत्मा) ही गैंन(जन्ममरण की दीर्घपरम्परा) बन जाता है ॥४॥
(क्रमशः)

आनंद बधावौ बाजै

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*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*सतगुरु अलख अलाह का, कहु कैसा है नूर ।*
*दादू बेहद हद नहीं, सकल रह्या भरपूर ॥*
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राग ललित ॥१४॥परिचय॥
आनंद बधावौ बाजै आतम केवल राम बिराजै । 
अगरि चंदनि आंगनौं लिपाऊँ, मुतियन चौक पुराऊँ ॥टेक॥
प्रेम कलस सर ऊपरि धारौं, हरि आयाँ सामाहीं पधारौं । 
पाँच सहेली मंगल गावो, तन मन वारि वारि दरसन पावो ॥
गोवल गुड़ी भयौ उछाह, नारी नेह घरि आयौ नाह ।  
आजि म्हारै बस्ती आज म्हारै बासा, कहै बषनौं हरि पुरवी आसा ॥१४६॥ 
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आत्मा में निष्केवल रामजी विराजमान हो जाए अर्थात् दोनों का एकाकार हो जाए, एतदर्थ आनन्ददायक बधावे = मंगल गीत गाता हूँ । अगर और चंदन से मैं अपना आंगन लीपता हूँ तथा मोतियों से चौक पूरता हूँ । प्रेम रूपी कलश मस्तक पर धारण करता हूँ तथा परात्पर-परब्रह्म हरि के आने पर उसका स्वागत करने को उसके सन्मुख जाता हूँ । 
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हे मेरी पाँचों ज्ञानेन्द्रियों रूपी सहेलियों ! मंगल गीतों का उच्चारण करो और उस प्रियतम रूप रामजी पर तन-मन न्यौछावर करके उसका दर्शन करो । गोवल = वियोग, गुडी = समाप्त हो गया । पत्नी रूपी साधक के घर में पति रूपी परमात्मा आ गया है । परिणामतः हृदय में अत्यन्त उछाह = आनन्द छा गया है । 
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प्रियतम के आ जाने से आज मेरे घर में बस्ती  = चहलपहल हो गई । (बस्ती = जनसमुदाय । जन समुदाय के आ जाने पर चहल पहल ही होती है, सूनापन मिट जाता है ।) वह मेरे घर में ही निवास कर रहा है । बषनां कहता है, परात्पर-परब्रह्म-परमात्मा ने मेरे हृदय रूपी घर में पधार कर मेरी मनोभिलाषा पूर्ण की है ॥१४६॥

*१९. लै का अंग ~१/४*

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*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*१९. लै का अंग ~१/४*
इस अंग में वृत्ति लगाना रूप लय साधना का विचार कर रहे हैं -
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*रज्जब ल्यौ मन लाँघिये, लाँबे लोक अनंत ।*
*आतम के अंतर उठे, कामिनि पावे कंत ॥१॥*
जब नारी की जीवात्मा में लय साधना उठता है, अर्थात वह अपने पति में वृत्ति लगाकर सती होती है तब लय मार्ग द्वारा बड़े बड़े अनन्त लोकों को लांघकर अपने पति को प्राप्त कर लेती है । वैसे ही साधक लय साधना द्वारा अनेक वासनामय लोकों को लांधकर परब्रह्म को प्राप्त होता है ।
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*ल्यौ१ लाग्यों लहिये अलह, लौ१ में लूट अपार ।*
*रज्जब लौ लहिय लुक्या२, उर अन्य न आधार ॥२॥*
लय साधना द्वारा ईश्वर प्राप्त होता है, लय साधना में स्थिर होने पर अपार अध्यात्म धन लूटा जा सकता है । जो माया की आड़ में छिपा२ हुआ परब्रह्म है उसे लय साधना के द्वारा ही प्राप्त करो । हृदय अन्य साधना का आधार निरंतर नहीं बन सकता, ब्रह्माकार वृत्ति१ ही हृदय में निरंतर रह सकती है ।
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*ल्यौ की लाठी मारतौं, मीच सु मारी जाय ।*
*रज्जब ल्यौ लाल हिं मिलै, लौ में काल न खाय ॥३॥*
ब्रह्म में वृत्ति लगाना रूप दंडा मारने से मृत्यु भी मारी जाती है, इस साधना के करने वाले प्रियतम ब्रह्म से मिलते हैं, ब्रह्म में वृत्ति होने के समय काल नष्ट नहीं करता, अर्थात समाधि में स्थित रहने में आयु क्षीण नहीं होती ।
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*रज्जब लौ में लाभ है, लीन हुआ रहु माँहिं ।*
*लौ में लत१ लागे नहीं, और खता२ मिट जाँहिं ॥४॥*
ब्रह्म में वृत्ति लगाने से परमानन्द प्राप्ति रूप भारी लाभ है, अत: वृत्ति ब्रह्म में लीन करके ही रहना चाहिये । ब्रह्म में वृत्ति लगाने रूप साधन में स्थित रहने से कौई भी दुर्व्यसन१ नहीं लगता और काम क्रोधादि के द्वारा भी धोखा२ नहीं खाता ।
(क्रमशः)

बुधवार, 10 जून 2026

२६. बिचार कौ अंग ४८/५०

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२६. बिचार कौ अंग ४८/५०
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जाही कौं चितवन करैं, तैसौ ही ह्वै जाइ । 
सुन्दर ब्रह्म बिचार तें, ब्रह्म हिं मांहि समाइ ॥४८॥
हे जिज्ञासु ! लोक में हम देखते हैं कि जो जैसा निरन्तर चिन्तन करता है वह वैसा ही बन जाता है । अतः यदि तुम भी ब्रह्म का सतत चिन्तन करोगे तो तुम ब्रह्मरूप हो जाओगे ॥४८॥ (ब्रह्मविद् ब्रहौव भवति) ।
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करत बिचार बिचारिया, एकै ब्रह्म बिचार । 
सुन्दर सकल बिचार मैं, यह बिचार निज सार ॥४९॥
जब किसी विचारवान् पुरुष ने निरन्तर विविध विचार करते हुए जब इस ब्रह्म के विषय में विवेकपूर्वक विचार किया तो उस के लिये वह विचार ही सर्वोपरि(सर्वोत्तम) हो जाता है; क्योंकि उसके द्वारा किये सभी विचारों में केवल इस ब्रह्मविचार में ही तत्त्व(सार) दृष्टिगोचर होता है ॥४९॥
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ब्रह्म बिचारत ब्रह्म ह्वै, और बिचारत और । 
सुन्दर जा मारग चलै, पहुंचै ताही ठौर ॥५०॥
इति बिचार कौ अंग ॥२६॥
श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - हे जिज्ञासु ! यदि तुम निरन्तर ब्रह्म का चिन्तन करोगे तो ब्रह्म रूप ही हो जाओगे । यदि अन्य पुत्र स्त्री धन आदि सांसारिक पदार्थों का चिन्तन करोगे तो तुमको वही उपलब्ध होंगी; क्योंकि हम लोक में यही देखते हैं कि जो जिस लक्ष्य की ओर जाने के मार्ग का अनुसरण करेगा, वह उसी लक्ष्य पर पहुँचेगा - यह निश्चित है ॥५०॥
इति विचार का अंग सम्पन्न ॥२६॥
(क्रमशः)

प्राणीड़ा पाणी पायौ लोडै

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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*दादू जे साहिब को भावै नहीं, सो जीव न कीजी रे ।*
*परिहर विषय विकार सब, अमृत रस पीजी रे ॥*
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उपदेश ॥
प्राणीड़ा पाणी पायौ लोडै, तौ इहै मति सांधी रे ।
मानसरोवर फूटैगौ रे, जे मनसा पालि न बांधी रे ॥टेक॥
पहिली बांधी पीछैं न छूटै, बांध्याँ ही बधि आवै रे ।
अब अैसी बांधी मन मेरा, तामैं पाणी बहुत समावै रे ॥
पाँच पचीस दसौं दिसि जाता, ए सब मांहै लीजै रे ।
नौ सै नदी नवासी नाला, उलटि अफूठा दीजै रे ॥
तीनि ताल तौ लगनिज ऊंडौ, चौथें सेझौ कीजै रे ॥
मुकती घाट सुरति पणिहारी, तहाँ हरि जल कलस भरीजै रे ॥
वा सरोवर कौ पाणी आणी, वैंस र यौ सर लीजै रे ।
हरि रस पैसि बिचालैं रसना, बेगौ बेगौ पीजै रे ॥१४५॥
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हे प्राणी ! तू इस प्रकार का मति = विवेक उत्पन्न कर कि जिसके द्वारा मनुष्य जन्म रूपी जल सही दिशा में गतिमान हो सके । यदि तू मनसा की पाल नहीं बांधेगा तो एक न एक दिन मनुष्य-जन्म रूपी मानसरोवर फूटकर बर्बाद हो जायेगा । वर्षा आने के पूर्व बांधी गई पाल वर्षा आने पर फूटती नहीं । समय रहते पाल बांध देने से सरोवर में जल बढ़ता ही है । 
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शरीर की आयु पूरी होने के पूर्व ही भजन-ध्यान करके परमात्मा की प्राप्ति का यत्न प्रारम्भ कर दिया जाता है तो एक न एक दिन परमात्मा का साक्षात्कार हो ही जाता है । जीवन व्यर्थ बर्बाद नहीं होता । अतः हे मेरे मन ! अबकी बार मनसा को परमात्माभिमुख करने रूपी पाल को इस प्रकार बांध कि उसमें परमात्मा की प्रेमयुक्त भक्ति रूपी जल प्रभूत मात्रा में एकत्रित हो जाये । 
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पाँच इंद्रियाँ तथा इनकी पचीस प्रकृतियाँ पूर्व में दशों दिशाओं में विषयभोग करती फिरती थीं । अब उनको बाहर से हटाकर अंतर्मुखी कर डाल । नौ प्रधान नाड़ियों तथा नौ सौ सहायक नाड़ियों की गति को उल्टाकर शब्द रूपी ब्रह्म की ओर कर दें । तीन गुण रूपी तीन ताल = सरोवरों की गहराई अतीव गंभीर है । अतः इन तीनों सरोवर को तैर कर चौथे सरोवर = तुरीयावस्था का सेझा = स्त्रोत प्राप्त कर ले, तुरीयावस्था में प्रविष्ट हो जा ।  
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सुरति को जल भरने वाली पनिहारी बनाकर मुक्ति रूपी घाट पर हरि रूपी जल हृदय रूपी कलश में भर । उस ब्रह्म रूपी सरोवर का पाणी रूपी भक्ति लाकर उसको अपने हृदय में विराजमान कर ले जिससे तुझे ब्रहम रूपी सरोवर मिल जायेगा । हरिरस में निमग्न होकर हृदय और रसना के माध्यम से इस हरिरस का जल्दी-जाल्दी पान कर ॥१४५॥