सोमवार, 2 नवंबर 2026

*४ राजारामजी*

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*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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*दादू प्रीतम के पग परसिये, मुझ देखण का चाव ।*
*तहाँ ले सीस नवाइये, जहाँ धरे थे पाँव ॥*
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*४ राजारामजी*
४- चौथे राजारामजी भी अपने गुरुदेव कुंजदासजी के समान ही भजनानन्दी महात्मा थे । राजारामजी ने भी करोली से ७ मील गंगापुर रोड़ पर मांच ग्राम की सीमा में विद्यमान अस्थल नामक स्थान बनवाया था । कारण—एक तो यहां पर करोली नरेश की दी हुई भूमि थी उसकी व्यवस्था के लिये व्यवस्थापक के निवास के लिये और जो विरक्त संत शहर में नहीं रहना चाहें उनके एकान्त निवास के लिये, लाल पत्थर का अच्छा स्थान बनवाया था । अस्थल में दादू वाणी मंदिर भी है । 
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वाणी मंदिर की पूजा व स्थान की व्यवस्था वर्तमान में रामचरणदासजी करते हैं । मेरे पूछने पर उन्होंने मुझे करोली की कुंजदासजी की कुंज के महन्त ज्ञानदासजी का शिष्य अपने को बताया था । उक्त कारणों से ही राजारामजी ने अस्थल नामक स्थान बनवाया था । अस्थल के पास कुछ बस्ती है, वह अस्थल नाम से ही बोली जाती है । कारण—अस्थल के बनने के पश्चात ही बसी है । 
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राजारामजी की घटना भी सुनने में आती है कि—उनके समकालीन करोली नरेश ने आज्ञा निकाली थी कि—मेरे राज्य में रहने वालों को सबको कर देना होगा । उक्त आज्ञा साधुओं के स्थानों पर भी लागू हो गई । कुंज के महन्त राजारामजी को भी कर देने की सूचना मिली । राजारामजी ने कहा—करोली नरेश को आश्रम में बुलवाकर देंगे । राजा कुंज में आये तब कुंज में आने पर करोली नरेश का जो स्वागत होता था वैसा ही स्वागत किया गया । फिर कर की बात चली । तब राजारामजी ने कहा—ठीक है । 
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फिर एक थाल सुन्दर कपड़े से ढककर राजा के पास रखा गया । राजा ने उसे उघाड़ कर देखा तो कपड़े के नीचे राजारामजी का ही शिर कटा हुआ दीख पड़ा । यह देख राजा डर गया । फिर राजा के आगे से थाल हटा दिया और राजा ने राजारामजी से पूछा—यह क्या लीला है ? राजारामजी ने कहा—हमने तो शिर तक भगवान् को दे दिया है । फिर आप हम से कर क्या लेंगे । हमारे पास तो अपना कहने योग्य अब कुछ भी नहीं है । 
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फिर राजारामजी का कटा हुआ शिर देखकर तथा राजारामजी की निष्ठा देखकर करोली नरेश ने संतों से कर लेने की आज्ञा अपनी पीछे लौटा ली । इससे सूचित होता है कि राजारामजी भी अपने गुरु कुंजदासजी के समान महान् संत थे । राजारामजी भी करोली में ही वि. स. १८४१ श्रावण सुदि ९मी को ब्रह्मलीन हुये थे । चरण चौकी पर अंकित दोहा —
''श्रावण इकतालीस में, सुदि नवमी अनुराग ।
महन्त राजारामजी, कियो कलेवर त्याग ॥'' 
इनके चरण पधराने का समय वि.स. १८४५ वैशाख सुदि १० मी चरण चौकी पर अंकित है । किसी कारण से चरण पधराने में देर हो गई होगी । इनकी समाधि कुंजदासजी की समाधि के बराबर है । इनकी समाधि की भी छत्री बनी हुई है । 
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५- नन्दरामजी, ६- हरिनारायणजी, ७- पुरुषोत्तमजी, ८- जयरामदासजी, इन चार के चरण स्थल के सामने कूप पर एक ही चौकी में हैं । माधोदासजी ने वि. स. १९१९ माह सुदि १२ को पधराये हैं । करौली का जो विवरण ज्ञात हुआ वह सब लिख दिया है । अन्य स्थान पर लिखित—करौली के कुंज की महन्त परंपरा इस प्रकार है । १- राघवदासजी, २- कुंजदासजी, ३- मुरलीदासजी, ४- राजारामजी । नं. २, ३, ४ के चरण चिन्ह करौली में हैं । ५- जयरामदासजी, ६- पुरुषोत्तमदासजी, ७- नन्दरामजी, ८- हरिनारायणजी, ९- माधवदासजी, इन पांच के चरण चिन्ह अस्थल के कूप के पास में हैं । १०- गोपालदासजी, ११- ज्ञानदासजी । इति श्री चतुर्थ अध्याय समाप्तः
(क्रमशः)

*४९. भ्रम विधवंस कौ अंग ७७/८०*

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*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
*श्रद्धेय श्री Tapasvi @Ram Gopal Das की प्रेरणा से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Meta AI*
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*४९. भ्रम विधवंस कौ अंग ७७/८०*
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*तेजपुंज की सुरति मैं, तेजपुंज प्रकास ।* 
*(तहां)तन मन बिलै समान सौ, सु कहि जगजीवनदास ॥७७॥*
जब साधक की सुरति, उसकी चेतना तेजपुंज परमात्मा में लग जाती है, तब वहाँ तेजपुंज का ही प्रकाश हो जाता है । संत जगजीवन दास जी कहते हैं, उस अवस्था में तन और मन दोनों उसी में विलीन हो जाते हैं, समा जाते हैं, जैसे नमक पानी में समा जाता है ।
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कहि जगजीवन नांम मैं, सब काहू का सीर ।
जो है प्यासा सो पिवै. हरि जल अम्रित नीर ॥७८॥
संत जगजीवन साहेब कहते हैं, राम नाम में ही सब का सीर है, सब की शीतलता है, सबकी तृप्ति है । हरि नाम अमृत जल के समान है, जो प्यासा है, जिसे सच्ची प्यास लगी है, वह इसे पी लेता है और अमर हो जाता है ।
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*पांचौं तत्त४ पवित्र करि, प्रेम भगति मन राषि ।* 
*कहि जगजीवन आतमां, सुणैं अगम की साषि ॥७९॥*
(४. पांचौं तत्त=पृथ्वी आदि पाँच महाभूत)
पाँचो तत्वों को पवित्र करके, मन में प्रेम-भक्ति को धारण करके रखो । संत जगजीवन दास जी कहते हैं, तब यह आत्मा अगम की साखी सुनने योग्य होती है, अर्थात उस परम अगम्य लोक की वाणी सुन पाती है । तन शुद्ध, मन में प्रेम, तभी अनहद नाद सुनाई देता है ।
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*कहि जगजीवन रांमजी, रीता५ भरौ भंडार ।*
*प्रेम भगति दीदार हरि, सुमिरन बिरह बिचार ॥८०॥*
{५. रीता=रिक्त(खाली)}
संत जगजीवन साहेब कहते हैं, हे राम जी, मेरा भंडार खाली है, आप इसे भर दीजिए । वह भंडार किस चीज से भरेगा ? प्रेम-भक्ति से, हरि के दीदार से, सुमिरन से और बिरह के विचार से । यही सच्चा धन है जिससे जीव का भंडार भरता है ।
(क्रमशः) 

रविवार, 1 नवंबर 2026

*४९. भ्रम विधवंस कौ अंग ७३/७६*

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*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
*श्रद्धेय श्री Tapasvi @Ram Gopal Das की प्रेरणा से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Meta AI*
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*४९. भ्रम विधवंस कौ अंग ७३/७६*
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*तेज पुंज निरबासनां८, नाद सक्ति गुन बास ।*
*जस भासै तस प्रकासै, सु कहि जगजीवनदास ॥७३॥*
{८.निरबासनां=निष्काम(कामनारहित)}
परमात्मा तेज का पुंज है और वह निष्काम है, उसमें कोई वासना नहीं । नाद उसकी शक्ति है और सब गुण उसी में वास करते हैं । संत जगजीवन दास जी कहते हैं, जैसा जिसके हृदय में भास होता है, भाव होता है, वैसा ही उसे वह प्रकाशित होता है । निर्मल हृदय को वह तेज पुंज रूप में दिखता है ।
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*मन मारुत माथि रांम कहि, मारि मारि मर जांणि ।*
*कहि जगजीवन मिलि रहै, पूरण ब्रह्म पिछांणि ॥७४॥* 
मन पवन के समान चंचल है, उसे मथ कर, मार-मार कर मार डालो, अर्थात वश में कर लो, तब जाकर मरना सार्थक होगा । संत जगजीवन साहेब कहते हैं, इस प्रकार मन को मार कर जो पूर्ण ब्रह्म को पहचान लेता है, वह उसी में मिल कर रह जाता है, फिर उसका जन्म-मरण छूट जाता है ।
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*अरथ१ निरंतर भगति हरि, अनरथ२ बिषै बिलास ।*
*जे जन भाव सुझाव सोइ, सु कहि जगजीवनदास ॥७५॥*
{१. अरथ=(हितकर)}  (२. अनरथ=अहितकर)
हितकर तो केवल एक ही है, निरंतर हरि की भक्ति, और अहितकर है विषयों में विलास करना । संत जगजीवन दास जी कहते हैं, जो जन इस भाव को समझ लेता है, सुझाव को हृदय में धर लेता है, वही सच्चा भक्त है ।
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*आदि निरंजन अंत हरि, मद्धि रांम सब ठांम ।*
*कहि जगजीवन निरखि निज३, सहज सरै सब काम ॥७६॥*
(३. निरखि निज=स्व स्वरूप को पहचानने से)
आदि में वही निरंजन है, अंत में वही हरि है, और मध्य में भी सब ठौर वही राम ही रमा है । संत जगजीवन दास जी कहते हैं, अपने निज स्वरूप को निरख लेने से, पहचान लेने से, सहज ही सब काम संवर जाते हैं, सिद्ध हो जाते हैं । आत्मज्ञान से ही परमात्मज्ञान होता है ।
(क्रमशः) 

*राघवदासजी की शिष्य परम्परा*

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*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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*सूखा सहजैं कीजिये, नीला भांजे नांहि ।*
*काहे को दुख दीजिये, साहिब है सब मांहि ॥*
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*राघवदासजी की शिष्य परम्परा*
राघवदासजी की शिष्य परंपरा करौली में चली गई । राघवदासजी का स्थान उदेही से उठकर करौली चला गया । संभव है राघवदासजी के शिष्य सुखदेवदासजी ही करौली जा बसे होंगे । करौली के स्थान की स्थापना तो राघवदासजी के समय में हो गई थी किन्तु राघवदासजी उदेही भी आते थे और रहते थे । फिर भी उनकी परंपरा करोली की परंपरा ही मानी जाती है तो इस प्रकार है-१ राघवदासजी, २ सुखदेवदासजी, ३ कुंजदासजी, ४ राजारामजी, ५ नन्दरामजी, ६ हरिनारायणजी, ७ पुरुषोत्तमजी, ८ रामदासजी, ९ माधोदासजी, १० गोपालदासजी, ११ ज्ञानदासजी । २- सुखदेवदासजी भजनानन्दी महातमा थे तथा परम विरक्त थे ।
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*कुंजदासजी*
३- कुंजदासजी दादूवाणी में कथित निर्गुण ब्रह्म की उपासना करके महान् सिद्ध संत हो गये थे । उनके तप तेज से प्रभावित होकर तत्कालीन करोली नरेश ने एक ग्राम भी उनकी भेंट किया था जो राजस्थान के एकीकरण होने से पहले तक ‘कुंज’ के महन्तजी के अधिकार में था । कुंजदासजी ने करोली में अच्छा स्थान बनवाया था जो कुंजदासजी की कुंज नाम से करोली में प्रसिद्ध है । कुंजदासजी महान् सिद्ध संत तथा अति दयालु थे ।
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उनकी दया के विषय में एक जन श्रुति चलती है कि-एक दिन एक भक्त ने कुंजदासजी को एक इमली का हरा दांतुन लाकर दिया था । तब कुंजदासजी ने कहा- भाई ! हरा वृक्ष क्यों तोड़ लाये हो मेरा राम के दांत तो सूखी से ही साफ हो जाते हैं और हमारे परमाचार्य दादूजी महाराज ने सूखे दांतुन से दांत मुख साफ करने को कहा भी है—
‘सूखा सहजैं कीजिये, नीला भांजे नांहि ।
काहे को दुख दीजिये, साहिब है सब मांहि ॥’
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फिर कुंजदासजी महाराज ने सोचा-भक्त तोड़ तो लाया है, अब इसको सफल भी बनाना ही चाहिये । अतः कुंजदासजी ने उस दांतुन से अपने दांत साफ किये । फिर उस दांतुन को चीर कर जीभ साफ की और उन चीरे हुये दोनों टुकड़ों को वहां ही अलग भूमि में रोप दिया और प्रति दिन उनको पानी पिलाते रहे । वे हरे होकर शनैः शनैः दो वृक्ष बन गये । उन वृक्षों में सब लोग एक प्रत्यक्ष चमत्कार देखते थे कि-उनके फलों में आधा आधा बीज आता था । यह देखकर सब अति आश्चर्य करते थे और कहते थे यह कुंजदासजी महाराज की करामात है । वे दोनों वृक्ष कुंजदासजी महाराज की स्मृति चिरकाल तक कराते रहे किन्तु कुछ वर्षों पहले कुंज के महन्त ने किराये के लोभ में पड़कर उन वृक्षों के स्थान में दुकानें बनवाने के लिये उनको कटवा दिया और दुकानें बनवा दीं ।
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उक्त घटना से कुंजदासजी महाराज की योग शक्ति और दयालुता का परिचय मिलता है ।
भक्त जनों में दया की, अतिशयता दिखलाय ।
दांतुन करके फेरि भी दीन्हे वृक्ष लगाय ॥
कुंजदासजी महाराज के जीवन की विशेष घटनायें उनके स्थान में कोई जानकार व्यक्ति नहीं मिलने से नहीं मिल सकीं किन्तु यह तो प्रसिद्ध ही है कि वे महान् सिद्ध संत हुये हैं । तब ही उस देश के राजा तथा प्रजागण उनसे प्रभावित हुये थे । कुंजदासजी महाराज करोली में ही ब्रह्मलीन हुये हैं । उनकी समाधि कुंज में ही एक छत्री में है । समाधि की चरण चौकी में वि. सं. १७५२ अंकित है । पूजा प्रति-दिन होती है । कोई ब्राह्मण वेतन द्वारा करता है । कुंज की आय से वेतन मिलता है । पानी डालकर घिसने आदि से मास तिथि के अक्षर बिगड़ गये हैं । समाधि की छत्री लाल पत्थर की अच्छी बनी हुई है ।
(क्रमशः)

शनिवार, 31 अक्टूबर 2026

हरिश्चन्द्र सत

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*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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*दादू शब्द बाण गुरु साध के, दूर दिसन्तरि जाइ ।*
*जिहि लागे सो ऊबरे, सूते लिये जगाइ ॥*
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*हरिश्चन्द्र सत से मनहर-*
तक्षक भये हैं ततकाल विश्वामित्र मुनि,
राघो चढ़ि रूख रोहितास वन डस्यो है ।
जाके जी में कसर कटाक्ष नाहीं कामना की,
का जाने कर्तार गति काहे को धौं कस्यो है ।
बालक विलाप करें तोवा त्रयलोक नाथ,
धर्म की जहाज बूड़ी ऐसो ज्ञानी ग्रस्यो है ।
बोल्यो रोहितास जनि रोवो पुनि मेरी सोंह,
पाहुणे से देख पेख का को घर वस्यो है ॥४३॥
हरिश्चन्द्र सत में कवित्तों की संख्या ७० के लगभग होनी चाहिये ।
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*ध्रुव चरित्र से इन्दव-*
ध्रुव की जननी ध्रुव को समभावत, रोवै कहा रट राम धणी को ।
केतेक राज कहां नृप आसन, का पर तूं कर मेल वनी को ॥
यह साल मिटै ततकाल करो तप, मृत्तक हो सुत धाम धनी को
राघो कहै कुल की ममता तज, ज्ञान के खड्ग से मार मनी को ॥६॥ 
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*ग्रन्थ करुणा विनती से*
हा ! हा ! धनी दुःख देत गनी, तुम ही तुम एक अधार हो मेरे ।
जानत हो परवेदन की, परमेश्वर जा प्रभु न्याय है तेरे ॥
जोर करे तिन को समभावहु, साहब जी चढ़ सांक के केरे ।
राघो अनाथ अतीत की हे हरि, भीर परे भगवन्त निवेरे ॥४॥
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*ग्रन्थ चेतावनी से*
समये सुमरचो नहिं राम धणी, सु धणी जम की तन त्रास सहैगो ।
आठ रु बीस में शीश ज्यूं सूम को, दे दशहुं दिशि आग दहैगो ॥
योजन द्वादश घाट घरे को, सो ता मधि मूरख भूरि मरैगो ।
राघो कहै निगुरे निगुसांई को, आवत ही जम कंठ गहैगो ॥१॥
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*कवित्त ग्रंथ, संगति अंग से मनहर-*
दास की पूरण आश संगति करै निवास,
पाप ताप होत नाश गहै गुण सार जी ।
पाय है परम सुख राम नाम जाके मुख,
बिसरै न एक चुख प्राण आधार जी ॥
सोई जन जाके तन नाम से रहै लगन,
घर वन राखै मन सोई स्वामी कार जी ।
राघो गुरु-मंत्र प्रति राखै रैन दिन रति,
सुमिर सुमिर सिद्ध साध भये पार जी ॥३॥
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गुरु शिष्य सम्बाद ग्रंथ, से गुरु वचन चौपाई -
अब कुछ बात कहूं मैं नीकी, सो तूं सुन शिष जीवन जी को ।
नाम लेत नरक नहीं जाई, और युगन से यह अधिकाई ॥२७॥
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*उत्पत्ति स्थिति चिंतामणि ग्रंथ से दोहा-*
श्री हरि श्री गुरु से कही, सो श्री गुरु कहि मुभ ।
रघवा रंचक गम भई, श्री गुरु पै पायो गुभ ॥२६४॥
भक्तमाल के उदाहरण इस ग्रंथ में पहले भी आये हैं और आगे भी आते ही रहेंगे । उक्त उदाहरणों से ज्ञात होता है कि राघवदासजी महाराज अच्छे संत कवि थे । अब इनकी शिष्य परंपरा का परिचय दिया जाता है ।
(क्रमशः)

*४९. भ्रम विधवंस कौ अंग ६९/७२*

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*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
*श्रद्धेय श्री Tapasvi @Ram Gopal Das की प्रेरणा से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Meta AI*
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*४९. भ्रम विधवंस कौ अंग ६९/७२*
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*वेद बचन प्रतिपाल करि, अक्षर अक्षर गमि ग्यांन ।*
*कहि जगजीवन निर अक्षर हरि, तिस घर धर्या न ध्यांन ॥६९॥*
संत जगजीवनदास जी कहते हैं, वेद के एक-एक वचन का पालन करके, एक-एक अक्षर से ज्ञान की गति को समझ कर भी, अगर जीव ने निर-अक्षर(अविनाशी) हरि में ध्यान नहीं लगाया, तो सब व्यर्थ है । निर-अक्षर का अर्थ है जो अक्षरों से परे है, अविनाशी है । अक्षर ज्ञान तो साधन है, साध्य तो निर-अक्षर राम है ।
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*सब क्रित करै सरीर का, हरि क्रित करै न कोइ ।*
*कहि जगजीवन रांम क्रित, रांम क्रिपा लहै४ सोइ ॥७०॥*
(४. रामक्रिपाल=जा पै क्रिपा राम की होई)
सब लोग शरीर की कृति करते हैं, शरीर के सुख-साधन जुटाते हैं, पर हरि की कृति, हरि का भजन कोई नहीं करता । संत जगजीवन साहेब कहते हैं, राम की कृति वही कर पाता है, जिस पर राम की कृपा होती है । बिना कृपा के हरि-भजन में मन नहीं लगता ।
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*खरी कसौटी५ कीजिये, भुवन मंझि६ निज सांइ ।*
*कहि जगजीवन चित्र सब, निरखै प्रतिबिंब मांहि ॥७१॥*
(५. कसौटी=परख)   (६. मंझि=मध्य)
इस भुवन के मध्य में अपने साईं की खरी कसौटी करो, सच्ची परख करो । संत जगजीवन दास जी कहते हैं, जैसे चित्र में सब कुछ दिखता है पर वह केवल प्रतिबिंब है, वैसे ही यह सारा संसार उसी परमात्मा का प्रतिबिंब है । चित्र को देखकर चित्रकार को पहचानो, प्रतिबिंब को देखकर बिंब को पहचानो ।
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*जगजीवन साधै पवन, सोधै सबद सरीर ।*
*रांम भगति ले बाहिरा७, सतगुरु करै न सीर ॥७२॥*
{७. बाहिरा=बाह्य(सांसारिक) भोगों से}
कोई पवन को साधता है, प्राणायाम करता है, कोई शब्द से शरीर को शोधता है, परन्तु राम भक्ति के बिना वह बाहरी ही रह जाता है, भीतर प्रवेश नहीं कर पाता । संत जगजीवन साहेब कहते हैं, जब तक सतगुरु स्वयं उसे शीतल नहीं करता, सीर नहीं करता, तब तक वह बाहरी साधनों में ही भटकता रहता है ।
(क्रमशः)

शुक्रवार, 30 अक्टूबर 2026

*३१. साधु संगति परम लाभ का अंग ~१३/१६*

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*🌷卐 सत्यराम सा 卐🌷*
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*३१. साधु संगति परम लाभ का अंग ~१३/१६*
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*तन मन सिमटे सहज ही, जो सत्संगति होय ।*
*जन रज्जब दृष्टांत को, बेली लजालू जोय ॥१३॥*
देखो ! दृष्टान्त के लिये लाजवन्ती की बेलि, जैसे लाजवन्ती मनुष्य के हाथ पड़ने से संकुचित हो जाती है, वैसे ही सत्संग से प्राणी के तन तथा मन विषय-विस्तार को त्याग कर प्रभु में स्थिर हो जाते हैं, तन ब्रह्म स्वरूप सन्तों की सेवा में और मन निरंतर ब्रह्म चिन्तन में ही स्थिर रहता है ।
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*साधु चन्दन बैन वास तैं, कुल काष्ट गये रोग ।*
*रज्जब देखहु देखते, भये देव गति जोग ॥१४॥*
देखो ! चन्दन की सुगन्ध से काष्ट का कुल परम्परागत दुर्गंध रूप से नष्ट होकर वह देखते देखते ही देवताओं के पास जाकर उनकी पूजा के योग्य हो जाता है, वैसे ही सन्तों के वचनों की श्रवण करने से प्राणी का कुल परम्परागत हीन जाति रूप रोग देखते देखते ही नष्ट होकर वह ब्रह्म प्राप्ति के योग्य हो जाता है ।
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*रज्जब पलटे जीव सुध१, साधु संगति आय ।*
*पारस लोहा पहुप२ तिल, स्त्रक३ चन्दन वन राय४ ॥१५॥*
जैसे पारस से लोहा सुवर्ण रूप में, पुष्पों२ से तिल तैल सुगन्ध रूप में, निर्गंध पुष्प - माला३ चन्दन से इत्र सुगन्ध रूप में और चन्दन वृक्ष से वन पंक्ति४ के वृक्ष चन्दन रूप में बदल जाते हैं, वैसे ही सरल१ स्वभाव वाले साधारण जीव भी साधु संगति में आकर संत रूप में बदल जाते हैं ।
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*स्वर्ग नसीनी१ जगत जहाज, दीर्ध दुर्भिक्ष२ में ज्यों नाज ।*
*दुख की दारू३ जीवन जड़ी४, रज्जब साधु समागम घड़ी ॥१६॥*
संतों के समागम की घड़ी, स्वर्ग में चढ़ने के लिये सीढी१, संसार सागर से तिरने के लिये जहाज, महान दुष्काल२ के कष्ट से बचने के लिये अन्न, रोग से बचने के लिये औषधि३, जीवन को सुरक्षित रखने के लिये रसायन बूंटी४ रूप है ।
(क्रमशः)

*३१. साधु संगति परम लाभ का अंग ~९/१२*

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*🌷卐 सत्यराम सा 卐🌷*
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*३१. साधु संगति परम लाभ का अंग ~९/१२*
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*रज्जब निमधे१ राम जी, साधु जन सु जहाज ।*
*काढ़हिं शक्ति२ समुद्र से, प्रभु प्रकटे पर काज ॥९॥*
राम जी संसार-समुद्र के मध्यनहीं१ मिलते, अर्थात संसार-भावना से पार होने पर ही राम का साक्षात्कार होता है और उससे पार करने के लिये श्रेष्ठ संत जन ही जहाज हैं, जैसे जहाज समुद्र से निकलता है, वैसे ही संत माया२ से निकालते हैं, प्रभु ने संत परोपकारार्थ ही प्रकट किये हैं ।
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*ज्यों नाले मिल नापिगा१, सिन्धु समाप्त सु नीर ।*
*त्यों रज्जब रामहिं मिलै, सत संगति बहु वीर२ ॥१०॥*
जैसे नालों का जल नदियों१ में मिलकर समुद्र में जा मिलता है फिर नदी नालों का नाम समाप्त हो जाता है, वह समुद्र जल कहलाता है वैसे ही हे भाई२ ! संसारी प्राणी साधु संगति के द्वारा बहुत से राम के वास्तव स्वरूप को प्राप्त होते हैं, फिर वे संसारी नहीं कहलाते, ब्रह्म रूप ही कहे जाते हैं ।
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*पारस चुंबक लोह मिल, पुनि चन्दन वन राय१ ।*
*जड़ पलटे मृतक चलहिं, त्यों सत्संगति आय ॥११॥*
पारस के सङ्ग से जड़ लोहा सुवर्ण रूप में बदलता है, चन्दन के सङ्ग से जड़ वन पंक्ति१ के वृक्ष चन्दन रूप में बदलते हैं और मृतकवत लोहा चुंबक के सङ्ग से चलने लगता है, वैसे ही सत्सङ्गति में आने से जड़ अज्ञानी प्राणी ज्ञानी रूप में बदलता है तथा परमार्थ में न चलने वाला मृतकवत प्राणी साधन द्वारा परमार्थ में चलने लगता है ।
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*ज्यों शिल१ सूखी नदी में, जड़ी तुम्बिका बेल ।*
*सो रज्जब सहजैं तिरे, त्यों सत्संगति मेल ॥१२॥*
जैसे निरस सूखी शिला१ तुम्बिकाओं की बेलि में जड़ी हो, अर्थात उसके बहुत से तुम्बड़े बाँध दिये जाय तो वह अनायस तिर जाती है, वैसे ही मूर्ख प्राणी भी प्रतिदिन सत्संग करने लग जाय तो वह भी सहज ही संसार-सागर का तैर कर पार हो जायगा ।
(क्रमशः)

*रचना के उदाहरण*

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*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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*दादू शब्द विचार करि, लागि रहे मन लाइ ।*
*ज्ञान गहै गुरुदेव का, दादू सहज समाइ ॥*
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*रचना के उदाहरण*
*साखी-*
गगन गिरासी विमल चित, अजर जरावराहार ।
जन राघो वे संत जन, छन्द मुक्ति संसार ॥४॥*साधु महिमा*
जे जन आशा जित भये, ता जन को जग दास ।
राघो जे आशा सु रत्त, ते करें जगत की आस ॥६॥*विरक्तता*
राघो बोलत परखिये, बोल मनुष को मोल ।
इक मुखतें मोती झड़ै, इकमुख सेती टोल ॥१७॥*शब्द अंग*
सत सुकृत दोऊ बड़े, सत से बड़ो न कोय ।
राघो सत तपरूप है, सत से सब कुछ होय ॥१८॥*उपदेश अंग*
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*अरिल्ल-*
कलियुग कठिन कठोर न कसके पाप से ।
सुत शैतान्यां करें अवश्य मां बाप से ॥
चेला गुरु से गुप्त दुरावै दाम रे ।
परि हां ! राघो छाड़ी रीति मिले क्यों रामरे ॥१॥*कलयुगी अंग*
कोटी ध्वज बाजार बैठते बांणिये ।
दुनियांदार सराफ जगत में जांणिये ॥
हीरा मोती लाल मुहर थैलो भरी ।
परि हां ! राघो ना वें काम काल वरियां तुरी ॥३॥*चितावनी अंग*
हिन्दू के हद वेद रहै मर्याद में ।
खंडै न खोटो खाय वस्तु नहिं वाद में,
तज असार गहि सार राम रस पीजिये ।
परि हां ! राघो युक्ति विचार योग यग कीजिये ॥४॥*न्याय मार्गी अंग*
ज्ञानी गुण की राशि निर्गुण से हो रहे ।
गहै शील संतोष काम क्रोध हि दहै ॥
खिझै न रीझै चाह चित्त को पेखणों ।
परि हां ! राघो हर्ष न शोक तमासौ देखणों ॥११॥*ज्ञानोपदेश अंग*
विमुख जाय जनि देहु अतिथि गृह द्वार से ।
टूक ग्रास घटि खाउ स्वकीय अहार से ॥
सत में से सत बांटि सत्य हरि राखि है ।
परि हां ! जन राघो धर्मराय धर्म की साखि है ॥१२॥*धर्म कसौटी अंग*
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*पद- सारंग राग-*
ऐसो राम गरीब निवाज है,
भक्त वत्सल शरणाई समरथ, सारगा जनके काज है ॥टेक॥
आदि अन्त मध्य अखंड अहो निशि, अनन्त लोक जाको राज है ।
सुर नर असुर नाग पशु पक्षी, देत सबन जल नाज है ॥१॥
रिधि सिधि भक्ति मुक्ति को दाता, पूरा ब्रह्म जहाज है ।
निर्बल को बल निर्धन को धन, बहुत विरुद की लाज है ॥२॥
कर्ता पुरुष अनातम आतम, सन्तन मध्य समाज है ।
राघो तन मन करि नौछावर, मिलन माहात्म्य आज है ॥३॥
(क्रमशः)

*४९. भ्रम विधवंस कौ अंग ६५/६८*

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*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
*श्रद्धेय श्री Tapasvi @Ram Gopal Das की प्रेरणा से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Meta AI*
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*४९. भ्रम विधवंस कौ अंग ६५/६८*
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*नांम सुमिरि रांमहि मिलै, बिरह अगनि तन दाग१ ।*
*कहि जगजीवन सहज घरि, रहै रांम सूं लाग ॥६५॥*
{१. दाग=जला कर(निवीर्य कर)}
संत जगजीवन साहेब कहते हैं, राम नाम को सुमिरने से ही राम मिलते हैं, पर सुमिरन ऐसा हो कि बिरह की अग्नि में यह शरीर दग्ध हो जाए, अर्थात विषय-वासनाएं जल जाएं । जब तन की वासना जल जाती है, तब जीव सहज घर में, अपने आत्म-स्वरूप में स्थिर होकर राम में लगा रहता है ।
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*बेद२ बचन प्रतिपाल करि, रांम बिसरि बिष खाइ२ ।*
*कहि जगजीवन जगतगुर, ते क्यौं परसैं आइ ॥६६॥*
(२=२. वेदों के कथनानुसार चलना तो, रांम भजन को त्याग कर विष खा कर श्री को नष्ट करने के समान है)
आपने स्वयं इसका सुंदर अर्थ लिखा है, कि केवल वेद के वचनों का पालन करते रहना और राम भजन को छोड़ देना, यह विष खाकर अपनी आत्मा को नष्ट करने के समान है । संत जगजीवन दास जी कहते हैं, ऐसे लोग जो राम को भूल कर केवल कर्मकांड में लगे हैं, वे जगतगुरु परमात्मा को कैसे छू पाएंगे, अर्थात कैसे प्राप्त कर पाएंगे ।
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*बेद बचन प्रतिपाल करि, प्रीतिरत मगन सरीर ।* 
*कहि जगजीवन उभै मधि, हरि भजि किया न सीर ॥६७॥*  
कोई वेद के वचनों का पालन करने में लगा है, तो कोई प्रीति में रत होकर शरीर के सुख में मगन है । संत जगजीवन साहेब कहते हैं, दोनों के बीच में ही जीव उलझा रह गया, उसने हरि को भज कर अपने जीवन को शीतल, तृप्त और सार्थक नहीं किया । सीर का अर्थ है शीतलता या सार ।
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*बेद बचन प्रतिपाल करि, अगम ठौर गम३ नांहि ।* 
*कहि जगजीवन रांम तजि, भूलि रहै भ्रम मांहि ॥६८॥* 
(३. गम=गति)
केवल वेद-वचनों का पालन करने से उस अगम ठौर तक गति नहीं होती, वहाँ पहुँच नहीं होती । जगजीवन दास जी कहते हैं, राम को छोड़ कर जीव भ्रम में ही भूला भटका रहता है । वेद राह बताते हैं, पर मंजिल तो राम भजन से ही मिलती है ।
(क्रमशः)

गुरुवार, 29 अक्टूबर 2026

*राघवदासजी की वाणी*

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🌷*卐 श्री दादूदयालवे नम:  卐*🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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*दुर्बल देही निर्मल वाणी, दादू पंथी ऐसा जाणी ।*
*काहू जीव विरोधे नांही, परमेश्‍वर देखे सब माँही ॥*
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एक समय दुष्काल के कारण ग्राम की जनता अन्न की कमी से ग्राम छोड़ कर जाने लगी थी । दयालु संत राघवदासजी ने जनता को कहा—जाओ मत सब लोग भंडार से अन्न ले आओ, बनाकर पावो, भगवान् का भजन करो, कहीं मत जावो । भगवान् ने राघवदासजी टेक की रखी । नया अन्न न आने तक उनका भंडार सब ग्राम को अन्न देता रहा था । कहा भी है—
जन सेवा में भक्त जन, करत नहीं संकोच ।
राघवदास ने ग्राम को, अन्न दिया तज सोच ॥२७१॥दृ.त.९
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एक समय राघवदासजी ने ब्रह्म भोजन दिया था । जीमने वालों की संख्या बढ़ जाने से घृत की कमी आ गई । मालपुओं की तई चल रही थी । पंक्तियां भी बैठी जीम रही थीं । घृत शीघ्र प्राप्त नहीं हो सका । अत: राघवदासजी स्नान के तालाब से जल के पीपे भर लाये और घृत के स्थान में तई में डाल दिये । वह जल घृत बन गया । फिर घृत आने पर जितने पीपे तालाब से लाकर तई में डाले थे तालाब में उतने ही पीपे घृत के डाल दिये । इससे सूचित होता है कि भक्तों के कार्य में जल भी घृत का काम कर देता है । कहा भी है- 
भक्त जनों के कार्य में, जल भी दे घी काम ।
राघवदास के ताल जल, बना सु घृत अभिराम ॥३६४॥दृ.त.९
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राघवदासजी महाराज के तप तेज व परोपकारादि दिव्य गुणों से प्रभावित होकर तत्कालीन करौली नरेश उनको करौली ले गये थे तथा करौली में ही निवास स्थान बनवाकर उसमें विराजने की प्रार्थना की थी और निर्वाह के लिये भूमि भेंट की थी । कुछ समय आप विराजे भी थे । उदेई भी जाते थे और रहते भी थे । राघवदासजी ब्रह्मलीन उदेई ग्राम में ही हुये थे । उनकी समाधि उदेई में ही है । राघवदासजी की समाधि उदेई ग्राम में श्वेत चबूतरे के नाम से प्रसिद्ध है ।  
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राघवदासजी अच्छे विद्वान और कवि थे । उनकी रचना से ही ज्ञात होता है कि वे कवि गुणों से विभूषित थे । उन्होंने अपने दादा गुरु प्रहलाददासजी की प्रेरणा से भक्तमाल की रचना की थी । प्रेरणा में कारण था - नाभाजी ने सगुण उपासक वैष्णवों की कथा ही भक्तमाल में दी थी । यह देखकर प्रहलाददासजी ने सोचा भक्त तो सगुण और निर्गुण दोनों प्रकार के ही होते हैं । अतः दोनों ही प्रकार के भक्तों की कथा भक्तमाल में होनी चाहिये । 
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ऐसा विचार करके अपने पौत्र शिष्य राघवदासजी को आज्ञा दी कि - तुम ऐसी भक्तमाल की रचना करो जिसमें निर्गुण ब्रह्म के भक्तों तथा सगुण ब्रह्म के भक्तों की कथायें हों । वे भक्त चाहे किसी भी संप्रदाय के हों व किसी भी जाति के हों, किसी भी देश के हों, किसी भी भेष के हों । सभी प्रकार के पक्ष का त्याग करके भक्तों की कथायें उसमें दो । राघवदासजी ने अपने दादा-गुरुजी की आज्ञा मानकर सभी की कथायें अपनी भक्तमाल में दी हैं । उनके समय तक जो भक्त हुये हैं और जिनको वे जान सके उनको अपनी भक्तमाल में स्थान दिया है । 
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यही बात निम्न कवित्त में है-
"अग्र गुरु नाभाजी को आज्ञा दीन्ही कृपा कर,
प्रथम ही साखी छप्पै कीन्ही भक्तमाल है ।
तैसे प्रहलादजी विचार कहा राघोजी से,
करो संत-श्रावली सु बात ये रसाल है ॥
लिई मान करी जान धरे ध्यान भक्त सब,
निर्गुण सगुण षट् दरशन विशाल है ।
साखी छप्पै मनहर इन्दव अरिल्ल चौपै,
निसानी सवैया छंद जानयौ हंसाल है ॥"
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उक्त कवित्त इन राघवदासजी की भक्तमाल के पद्य टीकाकार चतुरदासजी की रचना का ६३१ वां मनहर कवित्त है । उक्त विवरण के अनुसार राघवदासजी ने ऐसी ही भक्तमाल रची । नाभाजी की भक्तमाल में समास व्यास से लगभग चार सौ भक्तों की कथायें हैं किन्तु राघवदासजी की भक्तमाल में समास व्यास से लगभग १२ सौ भक्तों की कथायें हैं । अतः राघवदासजी की भक्तमाल नाभाजी की भक्तमाल से तिगुनी बड़ी है । यह समास से मंगलदासजी जाखल की ढांणी वालों ने सुन्दरोदय के छप्पै में "जनयश" से सूचित किया है । छप्पै का अगला पद 'बारसी सहस रवि" से सूचित किया है कि - इन राघवदासजी की वाणी १२ हजार है । इसलिये अब उनकी रचना का परिचय भी यहां दिया जाता है । 
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*राघवदासजी की वाणी*
राघवदासजी की वाणी के *साखी भाग* में अंग ५८ हैं और साखी तथा अन्य चौपाई आदि *छोटे पद्य* १७२३ हैं । *अरिल्ल ग्रंथ* में १७ अंग हैं और ३७० अरिल्ल हैं, अरिल्ल ग्रंथ में ३६ चौपाई भी हैं । *पद भाग* की ३० रागों में १७९ गेय पद हैं । उत्पत्ति स्थिति चितावनी ग्रंथ में चार सौ के लगभग पद्य हैं । *लघु ग्रंथ* १- सवैया ग्रंथ- इसमें ६ अंगों में ७१ सवैयै हैं । *कवित्त ग्रंथ*- इसमें १३ अंगों में १२५ के लगभग कवित्त हैं । ३- गुरु शिष्य संवाद ग्रंथ, इसमें ९१ चौपाई आदि पद्य हैं । ४- गुरुदत्त रामरज ग्रंथ, इसमें ४३ दोहा चौपाई और कवित्त हैं । ५- हरिश्चन्द्रसत ६- ध्रुव चरित्र । ७- कहरा विनती ग्रंथ, ८- चितावणी ग्रंथ । ९- वाणी । १०- अरिल्ल ग्रंथ । ११- उत्पत्ति स्थिति चितावनी । १२- सत्तवार, इसमें २६ पद हैं । १३- पन्द्रह तिथि, इसमें ६९ पद्य हैं । १४- भक्तियोग इसमें ६१ पद्य हैं । 
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१४ ग्रंथ इनके प्राप्त होते हैं और एक भक्तमाल । और भी कोई हो तो ज्ञात नहीं है । किन्तु १५ ग्रंथ तो इनके देखने में आते हैं । इन सबकी पद्य संख्या ग्रंथ संख्या पद्धति से अर्थात ३२ अक्षर का पद्य मानकर संख्या करने से १२ हजार होती है । अतः मंगलदासजी जाखल की ढांणी वालों ने यही संख्या अपने 'सुन्दरोदय के छप्पै में दी है । वह छप्पैया राघवदासजी के विवरण के आरंभ में पहले दिया जा चुका है । उसका अंश यहां भी पाठकों की सुविधा के लिये दिया जाता है - "जन यश वाणी सहस रवि" इसका अर्थ होता है - जन यश भक्तों का यश भक्तमाल को मिलाकर राघवदासजी की वाणी १२ हजार है ।
(क्रमशः)

बुधवार, 28 अक्टूबर 2026

*३१. साधु संगति परम लाभ का अंग ~५/८*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*३१. साधु संगति परम लाभ का अंग ~५/८*
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*रज्जब पारस परसते, लोहा पलट्या गोत१ ।*
*त्यों निर्धन धनवंता मिल, अ वित्त२ स वित्ता३ होत ॥५॥*
लोहा पारस से मिलता है तब उसका गोत्र१ बदल जाता है फिर वह लोह न कहलाकर सुवर्ण कह लाता है, वैसे ही ज्ञान-धन से युक्त संत से मिलकर निर्धन अज्ञानी प्राणी, ज्ञान-धन से रहित२ होने पर भी ज्ञानधन - युक्त३ होकर ज्ञानी कहलाता है ।
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*रज्जब लघु दीरध मिलत, मान महातम जोय१ ।*
*यथा तक्र२ पय३ परसतों, जावण हुं दधि होय ॥६॥*
देखो१, जैसे थोड़ी-सी छाछ२ दूध३ में मिलती है, तब वह जावण भी दही बन जाता है, वैसे ही यह बात निश्चित रूप से मानो कि - जब छोटे बङों से मिलते हैं तब छोटे का महात्म्य बढ़ जाता है अर्थात साधारण जीव की संत संग से उन्नति होती है ।
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*रीते संगति भर्यों की, जे हुंहि भूरि१ सु२ भाग ।*
*देख दश गुने होत हैं, शून्य सु एक हिं लाग ॥७॥*
यदि बहुत१ अच्छा२ भाग्य होता है तब कहीं ज्ञान-धन से खाली प्राणी को ज्ञान-धन से परिपूर्ण संतों का संग मिलता है, मिलने पर तो देखो, एक(१) पर शून्य(०) लगते ही दश(१०) गुना हो जाता है, वैसे ही अज्ञानी ज्ञानी हो जाता है ।
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*भव-सागर संसार यह, साधू शुद्ध जहाज ।*
*रज्जब परसे पार ह्वै, कठिन सरे यहु काज ॥८॥*
यह संसार जन्म से आदि दुखों का समुद्र है इससे पार करने के लिये निर्विकार संत ही जहाज हैं, जो उन संतों का संग करते हैं, वे इस भव-सागर से पार हो जाते हैं, उनका यह कठिन कार्य संत द्वारा सिद्ध हो जाता है ।
(क्रमशः)

*३१. साधु संगति परम लाभ का अंग ~१/४*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*३१. साधु संगति परम लाभ का अंग ~१/४*
इस अंग में सन्त संगती ही प्राणी के लिए परम लाभ रूप है, यह कहेंगे -
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*साधु संगति सुठि१ भली, घड़े२ माँहिं घड़३ लेय ।*
*रज्जब सौंज४ सँवारि कर, जीव माँहिं जिव५ देय ॥१॥*
संतों की संगति अच्छी से भी अच्छी१ है, ईश्वर के बनाये२ हुये शरीर में भी भक्ति ज्ञानादि सुखद साधन उत्पन्न३ कर देती है और कर्मेन्द्रिय, ज्ञानेन्द्रिय, अन्त:करणादि सभी सामग्री४ सुधार कर जीव में भी जीव देती है अर्थात ब्रह्म प्राप्ति व परमशांति५ देती है ।
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*जैसे चन्दन बावना, वेधि१ गया वनराय२ ।*
*त्यों रज्जब पलटे सबै, साधु संगति आय ॥२॥*
जैसे बावने चन्दन की सुगंध से सभी वन पंक्ति२ विद्ध१ हो जाती है अर्थात सभी वृक्ष चन्दन बन जाते हैं वैसे ही साधु संगति में आकर सभी बदल जाते हैं, अर्थात संत बन जाते हैं ।
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*लोहा पारस परसतों, रूद्र१ रूप ह्वै जाय ।*
*रज्जब गत२ ज्ञाता भया, साधु संगति आय ॥३॥*
लोहे के भयंकर शस्त्र को पारस का स्पर्श मिलता है तब उसका भयंकर१पना चला जाता है और वह प्रिय दर्शन सुवर्ण रूप बन जाता है, वैसे ही साधु संगति में आने से जीव का जो ब्रह्म से भिन्न ज्ञातापना है वह चला२ जाता है, वह ब्रह्म का ज्ञाता अपने को न मानकर ब्रह्म रूप ही मानता है ।
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*पारस परसत लोह, सौंधे१ सौं महँगा भया ।*
*तो क्यों न करीजे मोह, रज्जब साँचे साधु सौं ॥४॥*
लोहा पारस से मिलते ही सस्ते१ से महँगा बन जाता है, वैसे ही सन्तों की संगति से जीव की उन्नति होती है, फिर संतों से प्रेम क्यों नहीं करना चाहिये ? अवश्य करना चाहिये ।
(क्रमशः)

*३०. तीर्थ सत्संग का अंग ~९/११*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*३०. तीर्थ सत्संग का अंग ~९/११*
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*तीरथ आतम राम है, परसे१ पावन होय ।*
*जन रज्जब पहुँचे बिना, अध उतरे नहीं कोय ॥९॥*
आत्म रूप राम ही तीर्थ है, उससे मिलते१ ही प्राणी पवित्र होकर पवित्र करने वाला हो जाता है । आत्मा और राम की अभेद अवस्था में पहुंचे बिना सर्वथा पाप नहीं उतरते, कारण, प्रायश्चित द्वारा पाप नष्ट करने पर भी कर्तृत्व भाव होने से पुनः हो जाता है ।
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*चरणार्विन्द ते प्रकटी, साधु हृदय मँझार ।*
*रज्जब गंगा ज्ञान की, मन मल मज्जन हार ॥१०॥*
संतों के हृदय स्थान में स्थित परमात्मा के स्वरूप भूत चरण कमलों से ज्ञान-गंगा प्रकट हुई है, इसका ब्रह्म साक्षात्कार रूप जल पाप रूप मल को सदा के लिये हटाकर मन को उज्वल करने वाला है ।
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*सलिता१ साधु जवाब जल, मन मल मज्जन होय ।*
*रज्जब रज यूं ऊतरे, उर अंतरि अध धोय ॥११॥*
साधु ही नदी१ है, प्रश्न का उत्तर ही जल है, संतों के साथ प्रश्नोत्तर होने से मन का संशय रूप मल हटकर मन संशय-रहित उज्वलता को प्राप्त होता है । इस प्रकार हृदय के भीतर का संशय रूप पाप धोया जाता है, तब अविद्या रूप रज भी उतर जाती है । अविद्या नष्ट होते ही ब्रह्म प्राप्ति रूप जीवन का लक्ष्य पूरा हो जाता है ।
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इति श्री रज्जब गिरार्थ प्रकाशिका सहित “३०. तीर्थ सत्संग का अंग” समाप्त ॥
(क्रमशः)

*३०. तीर्थ सत्संग का अंग~ ५/८*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*३०. तीर्थ सत्संग का अंग~ ५/८*
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*ज्ञान गंग तहँतें१ चली, प्राणि प्रवीण सु न्हाहिं ।*
*रज्जब पाप जू युगन के, जीव जड़े सो जाँहिं ॥५॥*
जैसे गंगा ब्रह्म लोक में स्थित विष्णु के चरणों१ से चली है, वैसे ही संतों के हृदय में स्थित परमात्मा के स्वरुपभूत चरणों से ज्ञान-गंगा चली है, इसमें चतुर प्राणी स्नान करते हैं । जो युगों से जीव के ह्रदय में पाप भूषण में नग के समान जटित हैं, वे सभी ज्ञान-गंगा में स्नान करने से हट जाते हैं ।
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*ज्ञान गंग पर देही१ देवल२, मूरति आतम राम ।*
*इहां३ सांपड़ो४ सेय प्राणपति, सरहि५ शिरोमणि काम ॥६॥*
ज्ञान-गंगा पर आत्मा१ रूप मंदिर२ है, आत्म स्वरुप राम ही उसमें मूर्ति है अर्थात ज्ञान द्वारा आत्म स्थित होने पर ही आत्मा में आत्मस्वरूप राम का साक्षात्कार होता है । अतः इस३ ज्ञान-गंगा में स्नान४ करके आत्म स्थिति द्वारा अभेद रूप से ब्रह्म की भक्ति करो अर्थात निरंतर ब्रह्माकर वृत्ति रक्खो, इससे तुम्हारा परम-सुख प्राप्ति रूप सबसे बड़ा कार्य सिद्ध५ होगा ।
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*सत्य तीर्थ सत्संग है, वारि विमल बिच बोध ।*
*रज्जब राज मल ऊतरे, वेत्ता१ वदन२ सु शोध३ ॥७॥*
सच्चा तीर्थ सत्संग ही है, संशय विपर्य्यय रहित पवित्र ज्ञान ही उसमें जल है, सत्संग तीर्थ में स्नान करने से पाप रूप मल और अविद्या रूप रज सदा के लिए उतर जाते हैं । ज्ञानी१ के मुख२ के शब्दों में इस ज्ञान-जल को खोज३ कर स्नान करो ।
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*सत्य तीर्थ सत्संग है, जल जगदीश्वर नाम ।*
*दान पूण्य को बहु किये, रज्जब अठसठ ठाम१ ॥८॥*
दान, पुण्य, यज्ञादि करके उनका फल स्वर्गादी सुख भोगने के लिए तो बहुत तीर्थ बनाए हैं और उनमें ६८ स्थान१ मुख्य हैं किन्तु सच्चा तीर्थ तो सत्संग ही है, परमात्मा का नाम ही उनमें जल है अर्थात सत्संग द्वारा नाम चिंतन करने से ही परमात्मा की प्राप्ति होती है, सत्य ब्रह्म की प्राप्ति में हेतु होने से ही सत्संग सत्य तीर्थ है ।
(क्रमशः)
 

*३०. तीर्थ सत्संग का अंग ~१/४*

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*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*३०. तीर्थ सत्संग का अंग ~१/४*
इस अंग में सत्संग रूप तीर्थ संबंधी विचार कर रहे हैं ~
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*साधु सलिता१ शब्द जल, इहिं गंगा कोई जाय ।*
*रज्जब रज मल२ ऊतरे, मन भागीरथि न्हाय ॥१॥*
संत रूप नदी१ में शब्द रूप जल है, इस गंगा में स्नानार्थ कोई बिरला ही जाता है, जो उक्त भागीरथी गंगा में स्नान करता है उसके मन के पाप२ और अविद्या रूप रज दोनों ही हट जाते हैं ।
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*साधु तीरथ ज्ञान जल, बिरला पावे कोय ।*
*रज्जब यहु अठसठ अगम, प्राप्त भाग्य से होय ॥२॥*
संत रूप तीर्थ का ज्ञान जल किसी बिरले साधक को ही प्राप्त होता है, यह संततीर्थ ६८ तीर्थ करने वालों से तो अगम ही है अर्थात उन्हें प्राप्त होना कठिन है, यह तो बड़े भाग्य से ही मिलता है ।
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*महन्त मुखहि मंदाकिनी, वाणी वारि१ प्रवाह ।*
*गगन गंग निर्मल बहै, मन मज्जन२ कर न्हाह३ ॥३॥*
महान् संतों का मुख ही मंदाकिनी गंगा है, उनकी वाणी ही उसमें जल१ का प्रवाह है, यह निर्मल ज्ञान गंगा आकाश में ही बहती है अर्थात शब्द आकाश का गुण है, उसी में चलता है, इस ज्ञान गंगा में स्नान३ करके मन को उज्वल२ करो ।
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*चिदानन्द के चरण निज, साधू के उर माँहिं ।*
*पेखो पति के पगन को, ठाहर और सु नाँहिं ॥४॥*
चेतन-आनन्द स्वरुप परमात्मा के निजी अर्थात आत्मस्वरूप चरण संतों के हृदय में हैं, अपने स्वामी परमात्मा के पाद पद्मों को वहां ही देखो, एनी स्थान में उनका दर्शन नहीं हो सकेगा ।
(क्रमशः)

*४९. भ्रम विधवंस कौ अंग ६१/६४*

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*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
*श्रद्धेय श्री Tapasvi @Ram Gopal Das की प्रेरणा से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Meta AI*
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*४९. भ्रम विधवंस कौ अंग ६१/६४*
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*रांम बिमुख जनमैं मरै, मरै बसै बसिमार ।* 
*कहि जगजीवन रांम रटि, हरि भजि उतरै पार ॥६१॥*  
संत जगजीवन साहेब कहते हैं, जो जीव राम से विमुख है, वह जन्म लेता है और मर जाता है, मर कर फिर नर्क में बसता है और फिर राम को भूल जाता है । यही उसका बार-बार का चक्कर है । इसलिए हे जीव, राम नाम को रट ले, हरि को भज ले, इसी से तू इस भवसागर से पार उतर जाएगा ।
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*कहि जगजीवन पवन नहिं, मन नहिं मोहि सरीर ।*
*अबिगत अलख अगाध है, सतगुरु सा हित धीर ॥६२॥*
संत जगजीवन दास जी कहते हैं, परमात्मा न तो पवन जैसा प्राण है, न मन है, न यह मोह वाला शरीर है । वह तो अबिगत है, अलख है, अगाध है, अर्थात इंद्रियों से परे है । उस परमात्मा तक पहुंचाने वाला, उसका सच्चा हितैषी और धीरज बंधाने वाला केवल सतगुरु ही है ।
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*जहं लग प्रतिमा पूजि सब, सब तीरथ फिर न्हाइ ।*
*कहि जगजीवन भाव सिध४, कोइ जन हरि गुण गाइ ॥६३॥*
(४. भावसिध=भाव भक्ति से पूर्ण साधक)
जहाँ तक सब लोग प्रतिमाओं की पूजा कर लेते हैं, सब तीर्थों में घूम-घूम कर नहा लेते हैं, पर इससे सिद्धि नहीं मिलती । संत जगजीवन साहेब कहते हैं, भाव से ही सिद्धि मिलती है, कोई बिरला जन ही सच्चे भाव से हरि के गुण गाता है और वही पार होता है ।
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*बेद५ कतेब६ मसीत७ देहुरा८, दोइ पष रहतां रांम ।*
*कहि जगजीवन जुगल मधि, कोइ जन सुमिरै नांम ॥६४॥*
(५. बेद=हिन्दुओं का पवित्र ग्रन्थ)   (६. कतेब=पवित्र कुरान) 
(७. मसीति=मस्जिद)   (८. देहुरा=देवालय या देवमूर्ति)
वेद हिन्दुओं के पास है, कतेब मुसलमानों के पास, मसीत यहाँ है तो देहुरा वहाँ है, इन दो पक्षों के बीच में ही लोग राम को बाँट कर रह गए हैं । संत जगजीवन दास जी कहते हैं, इन दोनों पक्षों के झगड़े के बीच में रहकर भी कोई बिरला जन ही है, जो पक्षपात छोड़कर सच्चे राम नाम को सुमिरता है । वही सच्चा सुमिरन है ।
(क्रमशः)