बुधवार, 6 मई 2026

*१०. विरह का अंग~ ४५/४८*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*१०. विरह का अंग~ ४५/४८*
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*विरही प्राणी चकोर है, विरहा अग्नि अँगार ।*
*रज्जब जारे और को, उनके प्राण अधार ॥४५॥*
विरही प्राणी चकोर पक्षी के समान हैं, विरह अग्नि के अँगारों के समान है । अग्नि के अँगारे अन्य को तो जलाते हैं किन्तु चकोर के भोजन रूप होने से प्राणाधार हैं, वैसे ही विरह अन्य को तो दु:ख-प्रद होता है, किन्तु भगवद्-विरही भक्तों का तो जीवन रूप होता है ।
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*विरही बेहरे विरह बिन, जे उर पावक नांही ।*
*रज्जब यथा समुद्रजिव१, जीवे ज्वाला माँहिं ॥४६॥*
यदि हृदय में विरहाग्नि न हो तो विरही हृदय फटने लगता है, जैसे अग्निकीट१ अग्नि की ज्वाला में ही जीवित रहता है, अग्नि बिना मर जाता है, वैसे ही विरही विरह बिना नहीं जी सकता ।
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*विरही सावित विरह में, विरह बिना मर जाइ ।*
*ज्यों चूंने का कांकरा, रज्जब जल मिल राइ१ ॥४७॥*
चूने के कंकर पर जब तक जल न पड़े तब तक ही वह साबित रहता है । जल पड़ते ही उसमें दरार१ पड़ती है और वह फूट जाता है, वैसे ही विरही भी विरहावस्था में ही ठीक रहता है, विरह न रहने पर मर जाता है ।
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*इश्क अल्लाह मलंग२ मन, दिल दरूंन१ बिच चौक ।*
*रज्जब मंजिल३ आशिकां, अजब४ बिना लद५ शौक ॥४८॥*
हृदय रूप भीतरी१ चौक में परमहंस२ का मन ईश्वर के विरहयुक्त प्रेम में निमग्न रहता है, यह विरह ही प्रेमियों के ठहरने का स्थान३ है । इस विलक्षण४ विरह के बिना विरही-जनों पर महान शोक रूप भार आ पड़ता५ है, जिससे व्यथित होकर रोते रहते हैं ।
(क्रमशः)

२४. सांख्य ज्ञान कौ अंग ३७/४०

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२४. सांख्य ज्ञान कौ अंग ३७/४०   
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देह कृत्य सब करत है, उत्तम मध्य कनिष्ट । 
सुन्दर साक्षी आतमा, दीसै मांहिं प्रविष्ट ॥३७॥
प्रत्यक्ष दिखायी देने वाले हमारे ये लौकिक उत्तम मध्यम हीन कर्म इस देह के द्वारा ही कृत है । हमारे देह में स्थित आत्मा तो केवल इनका द्रष्टा(साक्षी) है, जो कि देह में पृथक् रूप से स्थित है ॥३७॥
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अग्नि कर्म संयोग तें, देह कडाही संग । 
तेल लिंग दोऊ तपै, शशि आतम अभंग ॥३८॥
कर्मरूप अग्नि के संयोग से देहरूप कडाही में स्थूलशरीर एवं कारणशरीर - दोनों के प्रज्वलन से सुख दुःख का अनुभव होता है । श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - इस सुख दुःख के भोग में आत्मा का कोई सम्बन्ध नहीं होता, यह सुख दुःख का भोग केवल देह से सम्बद्ध है, आत्मा से कथमपि नहीं; क्योंकि वह आत्मा चन्द्रमा के समान सदा शीतल रहने कारण कभी न तप्त होने से पृथक्(अभंग) रहता है ॥३८॥
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सूक्षम देह स्थूल कौ, मिल्यौ करत संयोग । 
सुन्दर न्यारौ आतमा, सुख दुःख इनकौ भोग ॥३९॥
सूक्ष्म शरीर(कारण शरीर) का स्थूल शरीर का संयोग होता है । अतः वे ही इस सुख दुःख का भोग करते हैं । आत्मा इन सब से भिन्न है ॥३९॥
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हलन चलन सब देह कौ, आतम सत्ता होइ । 
सुन्दर साक्षी आतमा, कर्मन लागै कोइ ॥४०॥
शरीर की चलन, कम्पन(हिलना डुलना) आदि क्रियाओं(चेष्टाओं) में आत्मा साक्षिमात्र है । अतः उन क्रियाओं का सुख दुःख आदि फल आत्मा से सम्पृक्त नहीं होता ॥४०॥
(क्रमशः)

अैसैं मना रे अैसैं मना

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*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*संझ्या चलै उतावला, बटाऊ वन-खंड मांहि ।*
*बरियां नांहीं ढील की, दादू बेगि घर जांहि ॥*
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*सुमिरण-विधि ॥* साषी लापचारी की ॥१(१ इस साषी का अर्थ ‘सुमिरण कौ अंग’ में देखें ।)  
कौडी रमतौ डाबड़ौ डरतौ सास न लेइ  ।
बषनां साहिब तौ मिलै, यौं लै चरणाँ देइ ॥
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पद
अैसैं मना रे अैसैं मना । जहाँ चलौ साहिब अपना ॥टेक॥ 
बालबुधि ज्यूँ कौडी देइ । रिधि नैं डरता सास न लेइ ॥ 
ज्यूँ साचा सर लेनैं जाइ । जल थैं डरता बिलम न लाइ ॥ 
ज्यूँ पंथी पँथ मांहीं डरै । घर है दूरि रैंणि जिनि परै । 
अैसैं दौरि पहूँचनि करै । तौ बषनां सब कारिज सरै ॥११२॥
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जीव को प्रबोधित करते हुए कहते हैं, हे जीव ! मन को इस प्रकार संचालित कर, उसकी वृत्ति को उस राह पर चला जिस पर चलने से अपना साहिब निजस्वरूप परमात्मा का बोध = साक्षात्कार होता है । जिस प्रकार बालकबुद्धि अपरिपक्व बुद्धि वाले बालक को कोई एक कौड़ी दे देता है तो वह उसे बड़े यत्न से कहीं छिपाकर रखता है तथा उसके होने के बारे में एक श्वास भी न लेता है, किसी को कुछ भी नहीं बताता है । 
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जैसे मरजीवा = गोताखोर साचा मोती को निकालने के लिये सर = तालाब, कूपादि में उतरता है और जल में अधिक समय तक रहने के कारण श्वास रुक न जाये इस भय से उस बहुमूल्य पदार्थ को ढूंढने में जरा भी देरी नहीं करता है । 
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जिस प्रकार पंथ में चलता हुआ पंथी चलने में डरता हुआ शीघ्रता इसलिये करता है कि मेरा घर दूर तथा रास्ता लम्बा है, कहीं रात्रि न हो जाये अन्यथा अनजान रास्ते में ही कहीं रुकना पड़ जायेगा जो खतरे से खाली नहीं होगा । इस प्रकार सोचकर वह पंथी शीघ्र चलकर गंतव्य पर पहुँचता है । 
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बषनां कहता है, जो उक्त प्रकार से लक्ष्यारूढ़ होकर अनन्यभाव से लगातार संसार में निर्लिप्तभाव से रहते हुए रामजी का नाम स्मरण करता है, उसके समस्त मनोरथ पूर्ण हो जाते हैं । अर्थात् उसका लोक और परलोक दोनों सुधर जाते हैं ॥११२॥

*१०. विरह का अंग~ ४१/४४*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*१०. विरह का अंग~ ४१/४४*
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*कमान कसौटी१ विरह शर, प्राण चलावन हार ।*
*रज्जब छेदे सकल गुण, यूं अरि हूं हि सु मार ॥४१॥8
साधनजन्य कष्ट१ ही धनुष है, विरह ही बाण है, साधक प्राणी ही बाण चलाने वाला वीर है, उक्त सामग्री द्वारा ही सब गुण नष्ट किये जाते हैं, इस प्रकार ही कामादि शत्रुओं को सम्यक् रीति से मारना चाहिये ।
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*ज्यों चुंबक शिल नाल जटि, अस१ ऊभा रह जाय ।*
*त्यों रज्जब मन को विरह, जे देख्या निरताय२ ॥४२॥*
जैसे चुम्बक की शिला पर अश्व१ का पैर पड़ते ही उसके पैर की लोहे की नाल चुंबक पर भूषण में रत्न के समान जटिल हो जाती है और घोड़ा वहां ही खड़ा हो जाता है, चल नहीं सकता, वैसे ही मन को भगवद्-विरह रोक देता है, विषयों में नहीं जाने देता, जिन साधकों ने विचार२ कर के देखा है, उन्हें यह ठीक ज्ञात हुआ है ।
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*विरह केतकी पैठि कर, मन मधुकर व्है नास ।*
*रज्जब भुगते कुसुम बहु, मरे न तिन की वास ॥४३॥*
भ्रमर बहुत प्रकार के पुष्पों की वास-रस का उपभोग करता है किन्तु उसकी सुगंध से मरता नहीं और केतकी के पुष्प पर जाता है तब उसकी मस्त गंध से मस्तक फटकर मर जाता है । वैसे ही मन अन्य विषयादि से उपभोग से नहीं मरता, भगवद् -विरह व्यथा से ही मरता है ।
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*रज्जब बंशी२ विरह की, देही दरिया१ डारि ।*
*यूं अगस्त्य आरंभ बिन, मन मच्छा ले मारि ॥४४॥*
अगस्त्य के उदय होने पर वर्षाती नदी१ का पानी सुखने से मच्छी मर जाती है वा सूर्य की तीव्र किरणों के द्वारा पानी सूखने से मच्छी मर जाती है (रज्जबजी अगस्त्य शब्द का प्रयोग सूर्य के अर्थ में भी करते हैं) किन्तु अगस्त्य के जल सूखने के आरम्भ बिना भी मच्छी पकड़ने का काँटा२ नदी में डाल कर मच्छी मारी जा सकती है, वैसे ही देह रूप नदी में विरह रूपी बंशी डालकर मन-मच्छर को मारना चाहिये अर्थात विरह से मन मारा जाता है ।
(क्रमशः) 

मंगलवार, 5 मई 2026

*१०. विरह का अंग~ ३७/४०*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*१०. विरह का अंग~ ३७/४०*
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*सप्त धातु अग्नि हिं मिले, अग्नि हिं निकसे काट ।*
*रज्जब अज्जब ठौड़ को, वह्नी विमल सु वाट ॥३७॥*
लोहादि सप्त धातुओं में अग्नि मिलता है, काष्ट से अग्नि निकलता है और परमधाम रूप अदभुत स्थान को जाने के लिये भी विरहाग्नि ही शुद्ध और सुन्दर मार्ग है ।
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*तन मन काष्ट ज्यों जरहिं, हेत हुताशन लागि ।*
*रज्जब रंग भंग बंक बल, जहां विरह की आगि ॥३८॥*
जैसे अग्नि से काष्ठ जल जाता है, वैसे ही प्रेम रूप अग्नि से तनासक्ति और मन का भ्रम नष्ट हो जाता है । जहां विरहाग्नि प्रकट होता है वहां विषय-प्रेम वक्रता तथा आसुर गुणों का बल नष्ट हो जाता है ।
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*विरह चोरी१ पैठि कर, मुसे२, सकल गुण देह ।*
*जन रज्जब कम काढिले, ज्यों चुंबक तज खेह ॥३९॥*
जैसे रेत वा भस्म में छिपकर चुंबक पत्थर रेत तथा भस्म को छोड़कर लोह के कण काढ़ लेता है, वैसे ही, विरह छिपकर१ देह में घुसता है और देह को छोड़कर देह के सभी गुणों को चुरा२ कर निर्गुण स्थिति तक पहुँचा देता है ।
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*विरह बेहरे२ विगति१ से, फाड़े४ पिंड पराण३ ।*
*रज्जब रज५ मा६ काढिले, विरहा चतुर सुजाण ॥४०॥*
विरह विचित्र रीति१ से चीरता२ है, प्राणी३ के शरीर को विषयों से अलग करता है वा प्राण पिंड का वियोग४ कर देता है । और विरह ऐसा चतुर सुजान है कि रजोगुण५ में६ से निकालकर भगवान में लगाता है ।
(क्रमशः)

२४. सांख्य ज्ञान कौ अंग ३३/३६

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२४. सांख्य ज्ञान कौ अंग ३३/३६  
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देह धात माहैं मिलै, आतम कनक कुरूप । 
सुन्दर सांख्य सुनार बिन, होइ न शुद्ध स्वरूप ॥३३॥ 
यदि शुद्ध सुवर्ण रूप आत्मा में देह रूप कोई मलिन धातु मिला दी जाय तो वह कुरूप(मलिन) दिखायी देने लगता है । तब उसे सुनार रूप सद्गुरु(सांख्यशास्त्री) ही अपने ज्ञानरूप उपदेश से निर्मल बना कर उसे पुनः यथावत् तेजस्वी बना सकता है ॥३३॥
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जबहिं कंचुकी होत है, भिन्न न जानै सर्प । 
तैसैं सुन्दर आतमा, देह मिले तें दर्प ॥३४॥
जैसे सर्प को जब कैंचुली उद्भूत होने लगती है तो वह सर्प उस को अपने से भिन्न नहीं मानता; श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं उसी प्रकार हमारा यह आत्मा भी देह में अध्यास करता हुआ देहाभिमान में उन्मत्त हो जाता है ॥३४॥
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सर्प तजै जब कंचुकी, वा दिसि देखै नांहिं । 
सुन्दर संमुझै आतमा, भिन्न रहै तनु मांहिं ॥३५॥
सर्प जब अपनी केंचुली को अपने शरीर से पृथक् कर देता है तो वह घूम कर भी पुनः उस की ओर नहीं देखता; इसी प्रकार आत्मा को भी समझना चाहिये कि वह देह से पृथक् है । अतः उस का देह में आसक्ति का प्रश्न ही कहाँ उठता है ! ॥३५॥
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सुन्दर कला घटै बढै, शशि मंडल कै संग । 
देह उपजि बिनशत रहै, आतम सदा अभंग ॥३६॥
चन्द्रमण्डल का स्वरूप सदा एक समान रहता है; केवल उस की कलाएँ ही प्रतिपक्ष घटती या बढती रहती हैं । उसी प्रकार, जिज्ञासु को भी समझना चाहिये कि केवल देह के ही उत्पत्ति एवं विनाश होते हैं, आत्मा तो स्थायी, अजर, अमर एवं अविनाशी है ॥३६॥
(क्रमशः)

हिरदै राम रहै जिहि रासी

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*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*चार पदार्थ मुक्ति बापुरी, अठ सिधि नव निधि चेरी ।*
*माया दासी ताके आगे, जहँ भक्ति निरंजन तेरी ॥*
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*सुमिरण-माहात्म्य ॥*
हिरदै राम रहै जिहि रासी । रहै तौ काटै जम की पासी ॥टेक॥
जिहिं घटि सुमिरण बारहमासी । अठ सिधि नव निधि ताकै दासी ॥
साध पहूँता तिहि घरि जासी । भरमैं नाहीं लख चौरासी ॥
लोक प्रलोक परम पद पासी । बिनसै नहीं सदा अबिनासी ॥
बषनां राम भज्याँ यूँ थासी । सेवग स्वामी एक कहासी ॥१११॥
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जिसके हृदय में राम-नाम का स्थाई निवास रहता है, उसकी यम-फाँसी रामजी के हृदय में निवास करने के कारण कट जाती है, रामजी जम की फाँसी को काटकर निजस्वरूप में अवस्थित कर देते हैं ।
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“तदा दृष्टु स्वरूपेऽवस्थानं” । योगसूत्र जिसके हृदय में रामनाम का स्मरण बारहों-मास = अहर्निश चलता रहता है, आठों सिद्धियाँ तथा नव निद्धियाँ उसकी दासी हो जाती हैं, आज्ञानुसार चलने लग जाती है “रामचरण अैसि आरति ताकै । अठ सिधि नौ निधि चेरी जाकै ।” राम नाम की साधना करने वाला उसी स्थान को उसी स्थिति को प्राप्त करता है जहाँ राम-नाम की साधना करने वाले अन्य संत गये हैं ।
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ऐसा साधक पुनरपि जन्म-मरण के चक्र में भ्रमण नहीं करता क्योंकि वह मुक्त हो जाता है । जब तक राम-नाम-साधक लोक में जीता है तब तक सुख भोगता है और मरने पर परमपद की प्राप्ति करता है । वस्तुतः वह नहीं मरता है, उसका शरीर मरता है क्योंकि वह सदा-सदा के लिये अविनासी = विनष्ट न होने वाला हो जाता है ।
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(आत्मा तो हमेशा ही अजर अमर है किन्तु कर्मों के कारण बार-बार जन्मने-मरने की अपेक्षा से ही विनाशी होना कहा जाता है ।) बषनां कहता हैं, रामजी का भजन करने का प्रभाव उक्त प्रकार से तो होता ही है अंत में भक्त और भगवान्, सेवक और स्वामी दोनों एक हो जाते हैं ।
“सेवक स्वामी भया समाना । रामहि राम और नहिं आना ॥”॥१११॥

सोमवार, 4 मई 2026

२४. सांख्य ज्ञान कौ अंग २९/३२

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२४. सांख्य ज्ञान कौ अंग २९/३२ 
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पावक लोह तपाइये, होइ एकई अंग ।
तैसैं सुन्दर आतमा, दीसै काया संग ॥२९॥
जैसे लोह के दो खण्डों को अग्नि से अत्यधिक तपाया जाय तो प्रयास करने पर वे दोनों खण्ड एक हो(मिल) जाते हैं; वैसे ही यह आत्मा भी, देह में अतिशय आसक्ति के कारण, देह से मिला हुआ दीखता है ॥२९॥
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चोट परै घन की जबहिं, पावक भिन्न रहाइ । 
सुन्दर दीसै प्रगट हौ, लोहा बधता जाइ ॥३०॥
जब उष्ण लोह पर घन की चोट पड़ती है तो हम प्रत्यक्ष देखते हैं कि अग्नि चमक कर उस से पृथक् हो जाती है और न्यूनता या वृद्धि आदि लौह में आती हैं; उसी प्रकार रागादि विकार देह को ही होते हैं, आत्मा को नहीं ॥३०॥
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सुन्दर पावक एकरस, लोहा घटि बढि होइ । 
तैसैं सुख दुख देह कौं, आतम कौं नहीं कोइ ॥३१॥
जैसे वहाँ अग्नि सदा समस्थिति में रहने वाला है, हानि या वृद्धि लोह में ही होती है; वैसे ही ये शीत उष्ण, सुख दुःख भी देह को सताते हैं; आत्मा को नहीं ॥३१॥
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नीर क्षीर ज्यौं मिलि रहे, देह आतमा दोइ । 
सुन्दर हंस बिचार बिन, भिन्न भिन्न नहिं होइ ॥३२॥
जैसे दूध में जल मिला दिया जाता है वैसे ही देह में आसक्ति के कारण यह आत्मा उस से मिला हुआ दिखायी देता है । वहाँ जैसे किसी विवेकी हंस के विना कोई अन्य दूध को जल से पृथक् नहीं कर सकता; उसी प्रकार कोई ज्ञानी साधक ही इस देह से आत्मा को पृथक् रूप से जान सकता है ॥३२॥
(क्रमशः)

हिरदै राम बसाईला

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*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*मिश्री मांही मेल कर, मोल बिकाना बंस ।*
*यों दादू महँगा भया, पारब्रह्म मिल हंस ॥*
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परिचय ॥ साषी लापचारी की ॥१ (१ इन साषियों का अर्थ ‘सुसंगति कौ अंग’ में देखें ।) 
ज्यूँ तिल बास्या फूल सँगि, यौं हिरदै राम बसाइ ।
तौ बषनां त्याँह की बासना, जुग जाताँ नहिं जाइ ॥
तिल फूलाँ की बास लै, दुहूँ काठाँ बिचैं पिड़ाइ । 
यौं बषनां मन पीड़िये, तौ कबहूँ बास न जाइ ॥  
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पद ॥ १
हिरदै राम बसाईला । 
फूलौं की बास तिलौं मैं आई, तिल फुलेल कहाईला ॥टेक॥
तेल बासना सभा सारी मैं, नासा परखि सराहीला । 
साध बासना दूरि दिसंतरि, महलि महलि महकाईला ॥ 
कोमल पुहुप बासना सूषिम, तिल मैं सहजि समाईला । 
अैसै हिरदैं राम हमारै, भाग बड़े सो आईला ॥
हरि हिरदै कस्तूरी डावै, अैसा भेद लखाईला । 
बषनां ज्याँ कस्तूरी बासी, तिहि डाबै बासना जाईला ॥११०॥  
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बषनांजी आत्मसाक्षात्कार की अपनी स्थिति को बताते हुए कहते हैं, मेरे हृदय में रामजी बस गया है । जिसप्रकार फूलों की सुगंधि तैल में मिलकर या फूल तिलों के साथ पेरे जाने पर फुलेल = इत्र कहाने लगता है, ऐसे ही रामनाम की साधना द्वारा मेरे अंदर रामजी का निवास हो गया है और मैं नित्य-शुद्ध-बुद्ध आत्मस्वरूप = रामजीस्वरूप अपने आपको अनुभव करने लगा हूँ । 
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तेल = फुलेल की सुगंधि सभा में लगाकर जाने पर सभाजनों द्वारा नासिका में सुगंधि आने पर सराही जाती है । इसीप्रकार रामनाम साधना की सुगंधि अथवा साधु-संतों की संगति की सुगंधि देश-देशान्तरों तक घर-घर को सुगंधित = राममय बना देती है । जिस प्रकार की कोमल पुष्पों की सूक्ष्म सुगंधि तिलों में सहज में ही समाहित हो जाती है । वैसे ही निःवासनामय मेरे हृदय में शुद्ध सच्चिदानंदमय राम बड़े भाग्य से प्रकट हो गया है । 
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मेरे हृदय को परात्पर-परब्रह्म-परमात्मा ने उसीप्रकार सुगंधित कर दिया है जैसे डिब्बे को कस्तूरी सुगंधित कर देती है और परमात्मा मेरे हृदय में ठीक उसीप्रकार स्थाई रूप में बस गया है जैसे जिस डिब्बे में कस्तूरी रखी जाती है उसमें से उस कस्तूरी को निकालने के उपरांत भी उसकी सुगंधि कभी भी जाती नहीं है । जिसप्रकार डिब्बे में कस्तूरी की सुगंधि रहती है, ऐसे ही हृदय में रामजी रहते हैं, यह रहस्य मुझे ज्ञात हो गया है ॥११०॥  

२४. सांख्य ज्ञान कौ अंग २५/२८

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२४. सांख्य ज्ञान कौ अंग २५/२८
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सूक्षम तें सूक्षम परै, सुन्दर आपुहि जांनि ।
तो तें सूक्षम नांहिं कौ, याही निश्चय आंनि ॥२५॥
श्रीसुन्दरदासजी अपनी आत्मा को समझा रहे हैं - हे आत्मन् ! अभी बतायी गयी गणनाओं में सिद्ध सूक्ष्मतम तत्त्व से भी तुम पर(अग्र) हो । यही निश्चित समझ लो कि यहाँ तुम से सूक्ष्मतम तत्त्व अन्य कोई नहीं है ॥२५॥
(तु०- भगवद्‌गीता -अणोरणीयांसमनुस्मरेद् यः-८/९) ॥
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इन्द्रिय मन अरु आदि दे, शब्द न जानै तोहि ।
सुन्दर तौतें चपल ये, तूं इनितें क्यौं होहि ॥२६॥
हे आत्मन् ! इन्द्रिय या मन आदि के साथ तो तुम्हारी एक अंश की भी समानता नहीं है । वे तो सभी तेरी अपेक्षा बहुत अधिक चञ्चल(चपल) है; जब कि तूं उन सब की अपेक्षा सर्वथा शान्त है । अतः इन में तुम्हारी गणना कैसे हो सकती है ! ॥२६॥
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धूलि धूम अरु मेघ करि, दीसै मलिनाकाश ।
सुन्दर मलिन शरीर संग, आतम शुद्ध प्रकाश ॥२७॥
यद्यपि आकाश स्वभावतः स्वच्छ एवं निर्मल होता है; परन्तु वह धूलि, धूम या बादलों के कारण आवृत या मलिन दीखता है, ऐसे ही शुद्ध तेजोमय आत्मा भी, मलिन देह का सङ्ग कर, मलिन दिखायी देता है ॥२७॥
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देहनि कै ज्यौं द्वार मैं, पवन लिपै कहुं नाहिं ।
तैसैं सुन्दर आतमा, दीसै काया माहिं ॥२८॥ 
जैसे प्राणियों के देह में, देह की अपेक्षा आकाश, पवन आदि पदार्थ सूक्ष्म होने के कारण न कहीं लिप्त होते हैं और न कहीं रुकते ही हैं; उसी प्रकार श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं कि आत्मा भी, अतिशय सूक्ष्म होने के कारण, देह में न कहीं लिप्त होता है और न कहीं रुकता ही है ॥२८॥
(क्रमशः)

कलि ब्यापी त्याँहनैं ब्यापी

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*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*सतगुरु बरजै सिष करै, क्यूँ कर बंचै काल ।*
*दहदिश देखत बह गया, पाणी फोड़ी पाल ॥*
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*कृतघ्नशिष्य ॥*
कलि ब्यापी त्याँहनैं ब्यापी ।
गुर तैं पलटि दूसरा हूवा, आपौ थापै पापी ॥टेक॥
ज्ञान सिखाया ध्यान सिखाया, पढिया पोथी पाटी ।
गुरि जाण्यौ थौ सेवा करसी, सिख ले दौड्यौ लाठी ॥
गुर की भेट भूंगडा मेल्है, सिख नैं लोंग सुपारी ।
जै बाबौ सिख स्वामजी कौ, माता सिखि छै म्हारी ॥
कीयौ कृत्य परायौ मेटै, पलट्या उलटी धारी ।
धरती कहै कृत्यघण सेती, इहि हूँ भार्याँ मारी ॥
दोइ दोइ गुराँ दोइ दोइ जीभाँ, दोइ दोइ दुरमति वाला ।
सटक्या फिरै साँप की नाँई, बाहरि भितरि काला ॥
गुर सूँ हेत भाव नहिं कोई, सिख साखा सूँ मोहा ।
बषनौं कह ते लूणहरामी, साधन ही सैं द्रोहा ॥१०९॥
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जो कृतघ्न शिष्य गुरुमहाराज से विमुख होकर अपने महत्त्व की स्थापना करते हैं, उन्हें निश्चय ही कलियुग व्याप गया है; उन पर कलियुग प्रभावी हो गया है । गुरुमहाराज ने यह जानकर कि पढ़-लिखकर शिष्य सेवा करेगा, सेवा कराने में लालच में आकर गुरु ने शिष्य को ज्ञान सिखाया, परमात्मा का ध्यान करना सिखाया, पुस्तकें पढ़ना सिखाया, लिखना सिखाया किन्तु शिष्य ने सेवा तो कुछ की नहीं उल्टे गुरु की लट्ठी को ही ले दौड़ा (गुरु की आय के स्त्रोत रूप लाठी को ही ले भागा)।
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कृतघ्नशिष्य गुरुमहाराज को सिके चने = भूंगड़ों की भेंट चढ़ाता है जबकि शिष्यों को लौंग सुपारी की बक्षीस करता है । अर्थात् गुरुमहाराज का माहात्म्य कम करता है तथा स्वयं की प्रतिष्ठा बढ़ाता है । कोई जब उससे पूछता है कि तुम्हारा पिता ही जब स्वामीजी का शिष्य है तो तू भी तो उनका शिष्य हुआ कि नहीं हुआ । तब वह कृतघ्न शिष्य कहता है, ऐसा है तो क्या हो गया, माता तो मेरी ही शिष्या है ।
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कृतघ्नशिष्य दूसरों के अच्छे कार्यों को मिटा देने को तत्पर रहता है । जो उसके प्रति उपकार करते हैं पलटकर उनका वह अपकार ही करता है । ऐसे कृतघ्नी लोगों को अपने ऊपर रहते देखकर पृथिवी कहती है, मुझे ऐसे ही कृतघ्न पापियों ने अपने भार से बोझिल कर रखी है । संसार में असली नकली दो प्रकार के गुरु हैं । शरीर में दो प्रकार की एक रामनाम स्मरण करने वाली तथा दूसरी जागतिक वार्तालाप करने वाली जिव्हाएँ हैं ।
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इसी प्रकार दो प्रकार की दुर्मति = दुर्बुद्धि = कृतघ्न लोग होते हैं जो संसार में माता-पिता-गुरु-बन्धु-बांधवों का अपमान करते हैं तथा परमार्थ में परमात्मा का भजन नहीं करके परमात्मा की अवहेलना करते हैं । ऐसे मानव सर्प की भाँति हैं जो बाहर-भीतर दोनों ही रूप में काले है तथा धन, मान, प्रतिष्ठा के लिये इधर-उधर दौड़ते फिरते हैं । कृतघ्न शिष्य गुरु के प्रति किंञ्चितमात्र भी श्रद्धा-प्रेम नहीं रखता जबकि शिष्यगणों से मोह = रागात्मक सम्बन्ध बनाकर रखता है क्योंकि उनसे सम्बन्ध रखने से उसे धन, मान, प्रतिष्ठा मिलती है । बषनां कहता है ऐसे शिष्य निश्चय ही लूणहरामी = कृतघ्न हैं, जो साधन = सज्जनपुरुषों से, सुहृदयों से अकारण ही वैर करते हैं ॥१०९॥

रविवार, 3 मई 2026

*१०. विरह का अंग~ ३३/३६*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*१०. विरह का अंग~ ३३/३६*
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*काया काष्ठ मनुवा धोम,*
*इश्क अग्नि मिल जाँहिं सु व्योम ।*
*आदि अंत मधि मुक्ति सुमाग,*
*रज्जब लहिये पूरण भाग ॥३३॥*
जैसे अग्नि के संयोग से काष्ठ की धुआँ आकाश में चली जाती है, वैसे ही विरह-युक्त प्रेम से मन शरीरासक्ति को छोड़ कर परब्रह्म के स्वरूप में लीन होता है । सृष्टि के आदि, मध्य और अन्त में भी यह विरह ही मुक्ति धाम का सुन्दर मार्ग माना जाता है । कोई भाग्यशाली ही इस पूर्णब्रह्म प्राप्ति के साधन मार्ग को ग्रहण करता है ।
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*नर नारी सब नाज, विरहा बारू भाड़ की ।*
*रज्ज्ब अज्जब साज, काचे पाके परसतैं ॥३४॥*
जैसे नाज के कच्चे दाने भाड़ की गरम बालू से मिलकर पक जाते हैं, उनकी उगने की शक्ति नष्ट हो जाती है, वैसे ही नर नारी भगवद् विरह के ताप से पक जाते हैं, उनकी जन्मादि क्लेशदायिनी शक्ति नष्ट हो जाती है । अत: सिद्धावस्था को प्राप्त करने को लिये भगवद्-विरह अद्भुत सामग्री है ।
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*दोस्त नाँहिं दर्द सम, जे दिल अंदर होय ।*
*जीव सीव१ एकै करे, जे ब२ सदा हु ते दोय ॥३५॥*
यदि मन में हो तो विरह-व्यथा के समान जीव का मित्र अन्य कोई भी नहीं है, कारण, जो अब२ अज्ञान दशा में सदा से ही दो भास रहे हैं उन जीव और ब्रह्म१ को एक करता है ।
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*विरह अग्नि व्है युक्ति सौं, आतम सार१ मझार ।*
*कपट कीट कुल काढि दे, तामें फेर न सार ॥३६॥*
लोह१ के युक्ति से अग्नि लगाया जाय तो, लोह का सब मैल निकाल देगा । वैसे ही जीवात्मा में युक्ति पूर्वक विरह प्रकट होगा, तो उसका सब कपट निकाल देगा । उक्त बात सर्वथा सत्य है ।
(क्रमशः)

शनिवार, 2 मई 2026

२४. सांख्य ज्ञान कौ अंग २१/२४

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२४. सांख्य ज्ञान कौ अंग २१/२४
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जे बिकार हैं देह कै, देहहि के सिर मारि । 
सुन्दर यातें भिन्न ह्वै, अपनौ रूप बिचारि ॥२१॥
अतः तुम्हारे लिये हितकर यही होगा कि जो देह के विकार(दोष) हैं, उन को उसी तक सीमित रहने दो; क्योंकि तुम उस से भिन्न हो । स्व रूप पर कुछ तो विचार कर के देखो ! ॥२१॥
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सुन्दर यह नहिं यह नहीं, यह तौ है भ्रम कूप । 
नाहिं नाहिं करते रहैं, सो है तेरौ रूप ॥२२॥
'तुम में देह का यह विकार नहीं है' या 'यह नहीं है' - ऐसा बताने में बहुत समय लगेगा और इससे नाना प्रकार के भ्रमजाल के उद्भव की सम्भावना है; अतः इसके स्थान पर 'नहीं है', 'नहीं है' कहने से भी कार्य सिद्ध हो जायगा । इसी वर्णन में तुम्हारा वास्तविक स्वरूप भी छिपा है ॥२२॥
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एक एक कै एक पर, तत्व गिनैं तै होइ । 
सुन्दर तूं सब कै परै, तौ ऊपरि नहिं कोइ ॥२३॥
पचीस तत्वों की गणना में दूसरा तत्त्व पहले से पर है । इस प्रकार की गणना में तूं इन सब से पर है । तुझ से ऊपर(उत्तम) कोई तत्त्व नहीं है ॥२३॥
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एक एक अनुलोम करि, दीसहिं तत्व स्थूल । 
एक एक प्रतिलोम तें, सुन्दर सूक्षम मूल ॥२४॥
इन तत्त्वों की अनुलोम गणना में भी पहला तत्त्व दूसरे तत्त्व से स्थूल है । इसी प्रकार प्रतिलोम गणना में दूसरा तत्त्व पहले तत्त्व से सूक्ष्म है ॥२४॥
(क्रमशः)

स्वारथ लागै घी गुड़ मीठौ

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*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*भरी अधौड़ी भावठी, बैठा पेट फुलाइ ।*
*दादू शूकर स्वान ज्यों, ज्यों आवै त्यों खाइ ॥*
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*स्वार्थ-परमार्थ ॥*
स्वारथ लागै घी गुड़ मीठौ । और जनम कहु कौंनैं दीठौ ॥टेक॥
स्वारथि कारणि अनरथ कीजै । दई दोस किसा कौ दीजै ॥
सदा रहै स्वारथ के पासै । परमारथ थैं अलगौ नासै ॥
पाप पुंनि की कौंण चलावै । जे खुरदा चहुँ की घर मैं आवै ॥  
मंछ गिलगिलिया जुग मांही । परमेसुर कौ को डर नांहीं ॥
बषनां स्वारथ मैं सह लोई । परमारथ मैं बिरला कोई ॥१०८॥
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चार्वाक मतानुयायियों की खरी आलोचना इस पद में की गई है । चार्वाकों का कथन है .....
“यावज्जीवेत्सुखंजीवेत् ऋणं कृत्वा घृतं पिवेत् । 
भस्मीभूतस्य देहस्य पुनरागमनं कुतः ॥” 
(सर्वदर्शन संग्रह श्लोकांक १८) 
जो देह भस्मीभूत हो जाती है उसका पुनरागमन फल भोगने के लिये क्यों कर हो सकता है । अतः इसी जन्म में जो भी खाना, पीना, मौज-मस्ती करनी हो वह कर लेनी चाहिये । यदि मौज-मस्ती के लिये हाथ में पैसा न भी हो तो कोई बात नहीं, ऋण लेकर ही घी, दूध खाना चाहिये क्योंकि मरने के बाद चुकाने की कोई आवश्यकता नहीं है । इन्हीं विचारों को प्रकारान्तर से बषनांजी कहते हैं ।
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स्वारथ = शरीर पोषणार्थ घी, गुड़ खाना रुचिकर लगता है । खाने वाले कहते हैं, अन्य जन्म किसने देखा है, जो खाना-पीना है, वह इसी जन्म में खा पी लो, मौज मस्ती कर लो । जिसको हमने देखा नहीं, उसके पीछे पड़कर क्यों हम हमारी मौज मस्ती को छोड़ें । इस प्रकार की सोच वालों के संबंध में बषनांजी कहते हैं, स्वार्थ के कारण तो अनर्थ करते हैं, दुराचरण, हिंसा, कपट, पाखंड करते हैं । 
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फिर बताइये ! ये लोग कैसे विधाता को दोष दे सकते हैं जैसा कि प्रायः लोगों को दोष देते हुए देखा गया है 
“सो परत्र दुख पावहीं, सर धुनि धुनि पछिताहिं । 
कालहि कर्महि ईश्वरहि, मिथ्या दोष लगाहिं ॥” 
वस्तुतः ये लोग सदा ही स्वार्थांध हुए रहते हैं । परमार्थ से सर्वथा अलग रहते हैं । समय पड़ने पर उसकी आलोचना भी कर डालते हैं ? इनके लिये पाप और पुण्य का कोई महत्त्व नहीं है । 
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राह, बेराह, उचित-अनुचित जिस भी रास्ते से धन मिलता है उसी को अंगीकृत करके घर में खुरदा = धन-सम्पत्ति कमा कर लाते हैं । फिर सभी घरवाले मिलकर उसका उपयोग करते हैं । जुग = पूरे जीवन भर मद्य, मांस, मछली जैसे निषिद्ध भोज्यों को खाते हैं । परमेश्वर का डर बिल्कुल ही मन में नहीं लाते हैं कि अंत में वह हमें हमारे दुष्कर्मों का दण्ड देगा । बषनां कहता है, सभी लोग स्वारथ के वशीभूत हुए हुए हैं । परमार्थ में किसी-किसी विरले की ही प्रवृत्ति है । 
“मनुष्याणां सहस्त्रेषु कश्चिद्यतति सिद्धये । 
यततामपि सिद्धानां कश्चिन्मां तत्त्वतः”॥१०८॥

*१०. विरह का अंग~ २९/३२*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*१०. विरह का अंग~ २९/३२*
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*दुख दिनकर की दृष्टि१ करि, नेह नीर नभ जाहिं ।*
*रज्जब रमिये शून्य२ में, यही युक्ति जग माँहिं ॥२९॥*
सूर्य की किरणों१ के द्वारा ही जल आकाश में जाता है, वैसे ही भगवद्-विरह-दु:ख से ही प्राणी का प्रेम विषयों से हट कर प्रभु में जाता है । विरह द्वारा प्रकट प्रेम से ही निर्विकार२ ब्रह्म में रमण करना चाहिये । ब्रह्म से मिल कर ब्रह्मानन्द प्राप्त करने की श्रेष्ठ युक्ति जगत् में यही है ।
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*रज्जब आज्ञा अग्नि मधि१, आतम अंभ२ निकास ।*
*उलट समावे शून्य में, पंथी पंथ सु तास ॥३०॥*
जैसे गरमी पड़ने से जल२ समुद्र के मध्य१ से निकल कर आकाश में चढ़ता है, वैसे ही गुरु-उपदेश रूप आज्ञा से आत्मा रूप पथिक संसार से निकल कर सांसारिक भावनों से विपरीत विरह रूप प्रभु प्राप्ति के मार्ग द्वारा निर्विकार ब्रह्म में समाता है ।
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*विरह सूर अति गति तपै, तन मन मांड१ मझार ।*
*रज्जब निकसे राम जल, विरहा के उपकार ॥३१॥*
ब्रह्मांड१ में सूर्य विशेष रूप से तपता है तब समुद्र से जल निकल कर बर्षता है, वैसे ही जब भक्त का तन मन विरह से अत्यन्त व्याकुल होता है तब राम का दर्शन होता है । अत: राम का दर्शन विरह के उपकार से ही होता है ।
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*तन मन ओले ज्यों गलहिं, विरह सूर की ताप ।*
*रज्जब निपजै देखतों, यूं आपा गलि आप ॥३२॥*
जैसे सूर्य के ताप से बर्फ के पत्थर गलकर देखते देखते ही जल रूप हो जाते हैं, वैसे ही विरह-जन्य दु:ख से तन मन के अहंकारादि विकार गल जाने से देखते देखते ही आत्मज्ञान उत्पन्न होकर साधक अपने शुद्ध स्वरूप ब्रह्म को प्राप्त हो जाते हैं ।
(क्रमशः)

शुक्रवार, 1 मई 2026

२४. सांख्य ज्ञान कौ अंग १७/२०

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२४. सांख्य ज्ञान कौ अंग १७/२०
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सुन्दर सिर को सीस है, प्राननि कौ है प्रांन । 
कहत जीव कौं जीव सब, शास्तर वेद पुरांन ॥१७॥
इसी प्रकार इस देह के शिर एवं प्राण का आधार भी तूं ही है । तेरे सहारे ये दोनों भी अपना अपना व्यापार कर पाते हैं । इसी लिये वेद, पुराण आदि सभी शास्त्र इस शरीर को, इस में तुम्हारी स्थिति तक ही 'जीवित' कहते हैं ॥१७॥
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सुन्दर तू चैतन्य घन, चिदानंद निज सार । 
देह मीन असुच्चि जड, बिनसत लगै न बार ॥१८॥
हे आत्मा ! तूं चेतनरूप है, सत् चित् आनन्दमय है, मूल तत्त्व है । इसके विपरीत यह शरीर तो विकारों से परिपूर्ण, अतएव अशुचि एवं जड है । इस को विनष्ट होने में कोई विलम्ब नहीं लगता ॥१८॥
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सुन्दर अविनाशी सदा, निराकार निहसंग । 
देह बिनश्वर देखिये, होइ पलक मैं भंग ॥१९॥
श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - हे आत्मा ! तुम तो नित्य, अविनाशी निराकार एवं सङ्गरहित हो; जब कि तुम्हारा यह शरीर क्षणमात्र में ही विनष्ट हो जाने वाला है अतएव विनाशी कहलाता है ॥१९॥
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सुन्दर तूं तौ एकरस, तोहि कहौं समुझाइ । 
घटै बढै आवै रहै, देह बिनसि करि जाइ ॥२०॥
अथ च, तुम तो सदा एकरस(एक भाव में) रहने वाले हो; जब कि यह शरीर कभी घटता है, कभी बढ़ता है, कभी आता है, कभी जाता है । इस प्रकार यह देह निरन्तर विनशनशील है ॥२०॥
(क्रमशः)

उपिलौ मारै न माँहिलौ तारै

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*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*कामधेनु कै पटंतरे, करै काठ की गाइ ।*
*दादू दूध दूझै नहीं, मूरख देइ बहाइ ॥*
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*भ्रमविध्वंश*
उपिलौ मारै न माँहिलौ तारै । 
पंडित होइ सु अरथ बिचारै ॥टेक॥  
स्यंघ कहैं पणि पोरिष नांहीं । 
बसै पँखेरुवा मुहड़ा मांहीं ॥
साध कहैं सो तौ यहु नांहीं । 
घड़िया बैठा घड़िया मांहीं ॥
अलख निरंजन की करि आस । 
बषनां याँह कौ किसौ बिसास ॥१०७॥ 
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इस पद में बषनांजी ने सगुणमार्गियों के उस कथन का खंडन किया है जिसमें कहा गया है..... 
“न देवोविद्यते काष्ठे न पाषाणे न मृण्मये । 
भावोहि विद्यते देवो तस्माद्भावोहि कारणं ॥” 
परमात्मा काष्ठमय, पाषाणमय अथवा मृण्मयमय नहीं है । साधक इनमें परमात्मा के होने की भावना करता है । इसीलिए इन्हें भगवद्विग्रह कहा जाता है और इसलिये भाव की प्रधानता है । बषनांजी कहते हैं, न ऊपरी शक्ति किसी को मार सकती है और न अंदरूनी शक्ति किसी को जिला सकती है । 
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एक निर्गुण-निराकार परमात्मा में ही जिलाने और मारने की शक्ति है । वही सबको पैदा करता है, सबका पालन-पोषण करता है तथा अंत में वही सबका संहार भी करता है । तदितर ऊपर-नीचे के देवी-देव, भूत-प्रेत, यंत्र-मंत्रों में यह शक्ति नहीं है । जो वास्तविक पंडित = बुद्धिमान होते हैं वे इसी प्रकार का विचार करते हैं । उदाहरणार्थ, कहने के लिये किसी को ‘सिंह’ कहते हैं किन्तु यदि उसमें पौरुषत्व = बल सिंह के समान नहीं है तो उसको सिंह कहना व्यर्थ है । 
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इसी प्रकार यदि पंखों वाले पक्षी पिंजरे में बसते हों तो उनकी पंखों का क्या लाभ । वे उड़ नही सकते । वस्तुतः साधु-संत जिस परमात्मा का कथन करते हैं वह परमात्मा स्वयं द्वारा रचित तथा भावित इन पत्थर खंड़ों में (घड़िया = बनाये हुआ में) नहीं है ।(पहला घड़िया शब्द निर्मित करने का अर्थ व्यंजित करता है जबकि दूसरा घड़िया = भावना से भावित, वेदमंत्रों के द्वारा प्राणप्रतिष्ठित अर्थ द्योतित करता है ।) 
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यदि कोई घर में लकड़ी की गाय बनाकर रख ले और उसमें भावना करे कि यह वास्तविकता में गाय है तो क्यों नहीं वह गाय दूध देती है और क्यों नहीं गाय की भावना करने वाला उक्त व्यक्ति उस दूध-दही से निकले घृत से चुपड़ी रोटी खाता है । क्यों लूखी रोटी खाता है । वास्तव में काष्ठ में दूध देने वाली गाय नहीं हो सकती है । अतः उसमें भावना करना व्यर्थ है । आशा तो मात्र एक निरंजन-निराकार-परमात्मा की करनी चाहिये । वही ‘कर्तुंअकर्तुंअन्यथाकर्तुंसमर्थ’ है । अन्यों में विश्वास करना व्यर्थ है ॥१०७॥ 

*१०. विरह का अंग~ २५/२८*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*१०. विरह का अंग~ २५/२८*
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*रज्जब भय की भाकसी१, करणी२ कूंदै३ पाय ।*
*हाथ हरकड़ी हेत की, सरक्या रती न जाय ॥२५॥*
हमारा मन हरि-वियोग जन्य भय रूप कैद१ की कोठड़ी में बन्द है उसके कर्तव्य२ रूप कुंडा३ लगा है और उसके वृत्ति रूप हाथ में हरि-प्रेम रूप हथकड़ी पड़ी है, अत: विषयों की ओर उससे किंचित मात्र भी नहीं चला जाता ।
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*इन्द्री अनंग१ न ऊतरे, आँख्यूं आँसू जाँहिं ।*
*रज्जब मन मोरा भये, महापुरुष महि२ मांहि ॥२६॥*
पृथ्वी२ में हरि विरही रूप महापुरुषों के मन मयूर पक्षी के समान हो गये हैं, जैसे मोर पक्षी के सामने मोरनी आने पर मोर की आँखों से आँसू गिरते हैं तब मूत्र इन्द्रिय से बिन्दु१ नहीं गिरता, वैसे ही हरि-विरह भक्तों के आँखों से अश्रु गिरते रहते है अत: उन्हें काम नहीं सताता ।
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*इन्द्रिय आभै१ पंच मिल, घट२ सु घटा जुरी आय ।*
*रज्जब विषय न वर्ष ही, विरह वायु ले जाय ॥२७॥*
पंच ज्ञानेन्द्रियों का विषयाशा रूप बादल१ मिलकर अन्त:करण२ रूप आकाश में अच्छी घटा बन गई है, फिर भी उक्त घटा विषय-वारि नहीं वर्षा सकती, कारण, इसे विरह रूप वायु उड़ाकर ले जाता है, अर्थात हृदय में भगवद् विरह आने पर विषयाशा तथा विषयासक्ति नहीं रहती है ।
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*विरह सु वोहित१ बैठकर, तिरिये शुक्र२ समंद ।*
*इहिं ठाहर पौहण३ यही, पार पहुँचण बंद४ ॥२८॥*
विरह रूप जहाज१ पर बैठकर काम२-समुद्र को तैरना चाहिये । इस काम-समुद्र के पार जाने के लिये यह भगवद् विरह ही श्रेष्ठ वाहन३ है, इसी से काम-समुद्र के बाँध४ पर पहुँचा जाता है अर्थात काम को जीता जाता है ।
(क्रमशः)

गुरुवार, 30 अप्रैल 2026

२४. सांख्य ज्ञान कौ अंग १३/१६

 

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२४. सांख्य ज्ञान कौ अंग १३/१६
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सुन्दर तूं न्यारौ सदा, क्यौं इंद्रिनि संग जाइ । 
ये तो तेरी शक्ति करि, बरतैं नाना भाइ ॥१३॥
अरे भाई ! तूं तो इन सब(इन्द्रियों) से पृथक् है, फिर इन के साथ तूं क्यों भ्रान्त हो रहा है ! यह बात तेरी समझ में क्यों नहीं आती कि तूं इन का सञ्चालक है अतः ये सब तेरे अधीन हैं, तेरे ही आश्रय से ये अपना समस्त व्यापार कर पाती हैं ॥१३॥
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सुन्दर मन कौं मन कहै, बहुरि बुद्धि कौं बुद्धि । 
तोहि आपने रूप की, भूलि गई सब सुद्धि ॥१४॥
तूं इस देहस्थ मन को अपना मान रहा है, इस देह में स्थित बुद्धि को भी अपना मान रहा है । क्या तुझे स्व रूप की दशा(स्मृति) पूर्णतः विस्मृत हो चुकी है ॥१४॥ 
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कहै चित्त कौं चित्त पुनि, सुन्दर तोहि बखानि । 
अहंकार कौं है अहं, जानि सकै तो जानि ॥१५॥
तूं इस देहस्थ चित्त को भी अपना मान बैठा है और इसके अहङ्कार में अपना ममत्व कर रहा है । यह तेरा कितना विशाल प्रमाद है – इस बात को तूं अब भी जान सके तो जान ले ॥१५॥ 
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सुन्दर श्रवणनि कौ श्रवण, आहि नैंन कौं नैंन । 
नासा कौं नासा कहै, अरु बैननि कौ बैंन ॥१६॥
तूं इन स्वदेहस्थ श्रवण, नेत्र, नासिका एवं रसना - इन्द्रियों को अपना मान कर इन में स्वत्व कर बैठा है । परन्तु वस्तुतः तूं ही इनका वास्तविक श्रवण, नेत्र, नासिका एवं रसना है । तेरे सहारे से ही ये अपना व्यापार कर पाती हैं ॥१६॥
(क्रमशः)

एता ही मैं जाणीलै

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*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*दादू दह दिश दीपक तेज के, बिन बाती बिन तेल ।*
*चहुँ दिसि सूरज देखिये, दादू अद्भुत खेल ॥*
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*ब्रह्मविचार ॥*
एता ही मैं जाणीलै । पूरण ब्रहम बखाणीलै ॥टेक॥
अबिनासी दीपक बिन थालै । तेल जलै न बाती न्हालै ॥
अगनी होइ न मँदिर प्रजालै । सब सूझै तिहि कै उजियालै ॥
करमादिक दीपक जे कीजै । तेल जलै बाती पणि छीजै ॥
जीव दगध जे पड़ै पतंगा । आदि अंति दीपक कौ भंगा ॥
रे पारिख क्यूँह पारिख कीजै । खोटा रालि खरा नित लीजै ॥
रालि आरसी तवै दिखालौ । जैठै लागौ तंहिठै कालौ ॥
बुझिये दिवै न होइ उजियालौ । गलथनिया मैं दूध दिखालौ ॥
बषनौं कहै सुनौं रे लोई । परिख करैगा बिरला कोई ॥१०६॥
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आगे एक पंक्ति में जितना सा कहा जा रहा है; बस, उतने में ही पूर्णब्रह्म परमात्मा को जानले और उसका अहर्निश बखान = स्मरण कर ले । अविनाशी ब्रह्न रूपी दीपक थालै = किसी स्थान विशेष में जलकर वहीं प्रकाश नहीं करता । वह तो देश, काल और वस्तु के परिच्छेद से सर्वथा अन्वछिन्न है .....
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“दिक्कालाद्यन्वच्छिन्नानन्तचिन्मात्रमूर्तये ।
स्वानुभूत्येकमानाय नमः शांताय तेजसे ॥”
वह सर्वत्र प्रकाशित होता है । (अर्थात् परमात्मा ब्रह्माण्ड के जर्रे जर्रे में व्याप्त है) उस ब्रह्म रूपी दीपक में न तैल जलता है और बत्ती ही दिखाई देती है ।
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(माया विद्या और अविद्या के नाम से दो प्रकार की है । अथवा माया तथा अविद्या नाम से दो प्रकार की है । अथवा माया तथा अविद्या नाम से दो प्रकार की है । सत्वप्रधान माया तथा रज-तम प्रधान अविद्या होती है । माया ईश्वर की उपाधि है जबकि अविद्या जीव की उपाधि है । ब्रह्म इन दोनों से अतीत है । यही दीपक का बिना तैल तथा बाती के जलना है ।)
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उस दीपक के जलने से न अग्नि = ताप ही उत्पन्न होती है और न मंदिर ही उससे जलता है । फिर भी उसके प्रकाश से सब कुछ दिखाई देता है । (वह निर्गुण-निराकार-परमात्मा अकर्ता है फिर भी सारी सृष्टि का उत्पादन उसी से होता है क्योंकि वह जगत का अभिन्ननिमित्तोपादन कारण कहा जाता है । सारी सृष्टि का उत्पादन, संचालन, नियंत्रण करने के उपरांत भी वह उसमें लिपता नहीं है । यही दीपक के जलने पर भी न अग्नि का उत्पन्न होना तथा न मंदिर का जलना है ।) इसके विपरीत करमादिक = अवतार धारण करके कर्म करने वाले अवतारी भगवान का दीपक बनाते हो तो उस दीपक का तैल भी जलता है तथा बत्ती भी छीजती है ।
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(सगुण परमात्मा को भी कर्मों का बदला चुकाना पड़ता है । यथा बाली ने रामावतार का बदला कृष्णावतार में व्याध बनकर लिया तथा इनको अंत में शरीर त्यागकर अथवा शरीर सहित इस जगत् से जाना भी पड़ता है । यही सगुण परमात्मा रूपी दीपक की बत्ती का छीजना तथा तैल का जलना है) जो भी जीव रूपी पतंगे सगुण परमात्मा की साधना रूपी लौ पर आसक्त होकर गिरते हैं उनका नाश अवश्यम्भावी होता है ।
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(सगुणोपासक मोच्छ न लेही ॥ मोक्ष न मिलना ही नाश होना है ।) क्योंकि सगुण-परमात्मा रूपी दीपक का आदि होकर एक दिन अंत भी होता है । बषनांजी कहते हैं, अरे परीक्षक ! कुछ तो परीक्षा करके सत्य को जानने का प्रयत्न कर । खोटा रूपी सगुण-परमात्मा को रालि = त्यागकर खरा = निष्कलंक-निर्गुण-निराकार-परमात्मा को अंगीकार कर । यदि तू आरसी = दर्पण रूपी निर्गुण-निराकार-परमात्मा को त्याग कर काले तवे रूप सगुण परमात्मा को अंगीकृत करेगा तो जिस जगह उस तवे को लगायेगा, वहीं वह तुझे काला कर देगा ।
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बुझे हुए दीपक से उजाला नहीं होता । जो अवतारी परमात्मा यहाँ से चला गया उससे मुक्ति की आशा करना ठीक वैसे ही व्यर्थ है जैसे बकरी के गले के थनों से दूध प्राप्ति की आशा करना । जिस प्रकार गले के थनों में दूध दिखावटी होता है वैसे ही अवतार भगवान दिखावटी परमात्मा है; वास्तविक नहीं । हे लोगों ! सुनो; बषनां डंके की चोट से कहता है, नित्य-अनित्य, असली-नकली परमात्मा की परीक्षा विरला ही करता है । हरेक के वश की बात नहीं है ॥१०६॥

१०. विरह का अंग~ २१/२४

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*१०. विरह का अंग~ २१/२४*
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*दृग१ द्रुम२ डारी ऐन३, चित चुल्है पावक जरै ।*
*परी अग्नि उत४ घैन५, तो रज्जब रस६ इत७ झरै ॥२१॥*
वृक्ष२ की गीली डाली चूल्हे में लगी हो और चूल्हे में अग्नि बहुत५ हो तो चुल्हे४ से बाहर जो लकड़ी का मुख७ है उससे पानी६ निकलता है, वैसे ही चित्त में सच्चा३ विरहाग्नि हो तो नेत्रों१ से अश्रु निकलते रहते हैं ।
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*रज्जब वह्नी१ विरह की, गुण गण अवटै३ वीर४ ।*
*काया काठ कसेरे२ जरहिं, सु नैनहुं निकसे नीर ॥२२॥*
चुल्हे पर चढे हुये बर्तन में दालादि के दाने अग्नि१ के द्वारा उबलते२ हैं, जब अग्नि ठीक नहीं जलता है तब लकङियों को चिमटा से छेड़ने३ से ठीक जलने लगता है और लकड़ी गीली होने से चूल्हे से बाहर वाले मुख में पानी निकलता है, वैसे ही हे भाई४ ! विरह रूप अग्नि कामादि गुणों के समूह को तपाकर शक्ति -हीन करता है । विरहीजनों की कथा सुनना वा भगवान् का स्मरण करना ही विरहाग्नि को छेड़ना है, उस से शरीर जलता है अर्थात क्षीण होता है और नेत्रों से अश्रु गिरते रहते हैं ।
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*रोज१ रेश्मी जेवङों२ हुं, तन मन बाँधे घोलि३ ।*
*जन रज्जब जो यूं जड़े, सु कहां जाहिं कहु खोलि ॥२३॥*
विरहीजनों के तन मन विरह-व्यथा के रुदन रूप रेशमी१ रस्सों२ से कसकर३ बांधे हुये हैं, कहिये फिर जो ऐसे अच्छी प्रकार जकड़े हुये हैं, वे भगवान् के बिना कहां जाकर अपने रुदन रूप बन्धन को खोल सकते हैं अर्थात भगवन् के दर्शन से ही उनका रोना बन्द होता है ।
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*रज्जब चाढे दुर्ग दुख, बाँधे सांकल शोच ।*
*हरियाली ताले जड़े, क्यों निकसे मन मोच ॥२४॥*
भगवद् विरहजनों को विरह ने दुख रूप किले में चढाकर शोक रूप जंजीर से बांध रक्खा है और हरि दर्शन का अभाव रूप ताला लगा रखा है, उक्त ताले को खोलने की ताली हरि के पास है, वे अपनी कृपा रूप ताली से खोल कर दर्शन न दे तब तक मन दुख-दुर्ग से निकलकर शोक-सांकल से कैसे मुक्त हो सकता है ?
(क्रमशः)

बुधवार, 29 अप्रैल 2026

२४. सांख्य ज्ञान कौ अंग ९/१२

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२४. सांख्य ज्ञान कौ अंग ९/१२
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जाकी सत्ता पाइ करि, सब गुन ह्वै चैतन्य । 
सुन्दर सोई आतमा, तुम जिनि जानहुं अन्य ॥९॥
जिस की सत्ता(सङ्ग) पा कर ये सब अचेतन गुण चैतन्य धारण कर लेते हैं, वह चेतन आत्मा ही है । तुम इसे कोई अन्य न समझो ॥९॥
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बुद्धि भ्रमै मन चित्त पुनि, अहंकार बहु भाइ । 
सुन्दर ये तौं तैं भ्रमै, तूं क्यौं इनि संग जाइ ॥१०॥
उन क्षुधा तृषा, शोक मोह से देहस्थित बुद्धि, मन चित्त एवं अहङ्कार ये तेरे द्वारा ही सञ्चालित होते हैं । श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - हे आत्मन् ! ये भ्रान्त होते हैं तो होते रहें; तूं भी इनके साथ लग कर भ्रान्ति में क्यों पड़ता है ! ॥१०॥
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श्रोत्र त्वचा दृग नासिका, रसना रस कौं लेत । 
सुन्दर ये तौं तैं भ्रमै, तूं क्यौं बांध्यौ हेत ॥११॥
श्रोत्र, त्वचा, नासिका, चक्षु एवं रसना - ये सभी ज्ञानेन्द्रियाँ तेरे ही सहारे से अपना अपना विषय ग्रहण करने में समर्थ हो पाती हैं; क्योंकि इन का सञ्चालक तूं है, अतः ये भ्रान्त होती हैं तो होती रहें । तूँ इनके साथ अपनी आसक्ति(= हेत) क्यों रख रहा है ? ॥११॥
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बाक्य पानि अरु पाद पुनि, गुदा उपस्थ हि जांनि । 
सुन्दर ये तो तैं भ्रमैं, तूं क्यौं लीने मांनि ॥१२॥
हे आत्मन् ! वाणी, हाथ, पैर, गुदा एवं मूत्रेन्द्रिय - ये कर्मेन्द्रियाँ भी तेरे ही आश्रयण से सञ्चालित होती हैं, अतः इन को तूं अपना सञ्चालक क्यों मान रहा है ॥१२॥
(क्रमशः)