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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*दादू बेली आत्मा, सहज फूल फल होइ ।*
*सहज सहज सतगुरु कहै, बूझै बिरला कोइ ॥*
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सुमिरण ॥ साषी लापचारी की ॥१ (१ इसका अर्थ “सुमिरण का अंग” की साषियों में देखें ।)
कुणका बीणत क्यूँ फिरै, पूरी रासि बिठाइ ।
कहि बषनां तिहि दास कौं, कबहूँ काल न खाइ ॥
पद ॥
हरि का भगताँ कै उन्हालू स्यालू नीपनी ।
गुरि म्हारै बोया राम नाम बीज ॥टेक॥
धौला सा दोइ बलद हमारै, रासि पुराणी आरै ।
हाली हाकै मेर न राखै, लार लागौ सूंकारै ॥
मन पवन हल फाल हमारै, जुड़ौ जुगति करि भाई ।
गुर कै सब्द खेत मैं जूतौ, साषि सबै बणि आई ॥
नाड़ि नेह श्रावणाँ नांहीं करि, बीज भात सिष भाकै ।
गुरि कह्यौ जाहि खेत खड़ि भाई, सदा प्रीति सौं हाँकै ॥
हालीड़ा कै मनसा हालाणि, छाक सँवारी ल्यावै ।
पीसै पोवै पाणी आणैं, आगै हुई कमावै ॥
हालीड़ा कै कांधै जाली, जाकै ग्यान कुदाली ।
खेत मांहि तैं खणि खणि काढ़ै, महा पाप की डाली ॥
साध सँगति म्हारै साँवण लागौ, भाव भादवौ आयौ ।
प्राण पपीहौ बोलण लागौ, आछि बांधि झड़ लायौ ॥
बाड़ि बिचार चहूँ दिसि रोपी, सील करै रखवाली ।
बमेक डाँवजा ऊपरि बैठौ, हरिहाई सब टाली ॥
भला कमेत्याँ खेत कमाया, लुणि चुणि कीया भेला ।
तेज का पुंज खला मैं दीसै, हाली सदा सचेला ॥
गुर कै भर्यौ बीज कौ कोठौ, धरम बावड़ौ बाह्यौ ।
सहँसकारि ह्वै सावढ तूठी, लोक सिलैस बधायौ ॥
मनसा मेढि बिचालै गाडी, पाँचाँ बलदाँ गाही ।
बाव सुबाव तूँतड़ा उड़ि गया, कण पति सब घरि आई ॥
ग्यान गाडै करि ढोवण लगा, कोठा भरिबा लागा ।
कहि बषनां म्हारै नौ निधि निपनी, टोटा सगला भागा ॥८२॥
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उन्हालू = गर्मी में बोई जाकर शीतकाल में तैयार होने पर कटने वाली फसल । स्यालू = शीतकाल में बोई जाकर गर्मियों में पककर तैयार होने पर कटने वाली फसल । रासि = रस्सी । पुराणी = लकड़ी की छड़ी जिसके अग्रभाग में बहुधा लोहे की एक पैनी कील लगी रहती है, इसे ही आर भी कहते हैं । इसको बैल की गुदा के पास के हिस्से पर अड़ाकर बैल को जल्दी चलने के लिये प्रेरित किया जाता है । बैल हाँकनेवाला उस-समय मुँह से कुछ शब्द करता है जिसे सूकारौ करना कहा जाता है ।
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हाली = बैलों को हाँकने वाला, खेती करने वाला । मेर = पड़दा, व्यवधान, ढिलाई । फाल = हल के अग्रभाग में लगा लोहे का नुकीला टुकड़ा जो जमीन को चीरता है । जुड़ौ = जूड़ा, जुवा, जिसको बैलों की गर्दन पर रखा जाता है और जूड़े का हल से या गाड़ी से सम्बन्ध कर दिया जाता है जिन्हें बैल खींचता है । जूतौ = जोतना । साषि = फसल ।
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नाड़ी = हल के पिछले हिस्से में एक नाली होती है जिसमें बीज भरा रहता है । जैसे-जैसे हल चलता जाता है इसमें से बीज जमीन में गिरता जाता है । नाहीं = उक्त नाली का गोलाकार ऊपरी भाग जिसमें बीज भरा जाता है, जिसे अंग्रेजी में होपर कहते हैं । खड़ि = खेती कर । हालीड़ा = खेती करने वाला । हालणि = हालीड़ा की पत्नी । छाक = भोजन । कमावै = बिना कहे ही खेती आदि करके धन कमाती है ।
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जाली = जेली = लकड़ी का एक डंडा जिसके सिरे पर त्रिशूल के आकार में तीन लकड़ी होती हैं । खणि-खणि = खोद-खोद कर । डाली घास-फूस, पेड़ पौधे । आछि बांधि = उत्साह, जोश के साथ । बाड़ = डौली, चारदीवारी । सील = ब्रह्मचर्यव्रत । बमेक = विवेक । डाँवजा = मचान । हरिहाई = हरा-हरा खाने की आदत वाले पशु जो अनधिकृत रूप से खेत में घुसकर फसल को खा जाते हैं । कमेत्याँ =खेती करने वाले, कमाई करने वाले ।
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लुणि-चुणि = काटकर, लावणी करके । खला = खलियान । सचेला = सावधान । बावड़ौ = खेत । सहँसकारि = संस्कार । सावढ़ तूटी = अच्छी मात्रा में प्राप्त । सिलैस = किसान खेत में से अन्न काटता है तब कुछ न कुछ उसमें से खेत में बिखरता है, उसे ही सिलैस कहते हैं । मेढि = लकड़ी । बिचालै = बीच में । सुबाव बाव = अच्छी हवा में, तेज हवा में बरसाया ।
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गाही = दाँय की, खाकले में से अन्न को निकालने के लिये खाकले युक्त अन्न पर बैलों को चलाया जाता है जिससे खाकला अलग हो जाता है तथा अन्य अलग हो जाता है । तेज हवा में दोनों को ऊपर से नीचे डालने पर हल्का खाकला दूर गिरता है तथा भारी अन्न गिराने वाले के सामने गिरता है । बैलों द्वारा खूंदने को दाँय करना, गाहना कहते हैं तथा ऊपर से नीचे गिराने को बरसाना कहते हैं, कहीं कहीं सलिया करना भी कहते हैं ॥
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मेरे गुरु महाराज ने राम-नाम रूपी बीज हरिभक्तों के हृदय रूपी खेतों में बोया है जिससे उनके स्वात्मतत्व रूपी शीतकालीन तथा उष्णकालीन दोनों ही फसलें भरपूर मात्रा में उत्पन्न हुई है । यह राम-नाम-साधना रूपी खेती कैसे-कैसे, किस-किस का सहकार लेकर की गई है, का विवरण देते हुए पदकार कहते हैं, विवेक और वैराग्य रूपी दो बैल हमारे पास सदैव रहते हैं । इन दोनों का व्यवहार लक्ष्यानुसार हो, एतदर्थ अनासक्ति और त्याग रूपी रस्सी तथा आर से इन्हें नियंत्रित किया जाता है ।
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साधक रूपी हाली इन विवेक-वैराग्य रूपी बैलों को बिना व्यवधान के लगातार संपादित करता है = हाँकता है । यदि कहीं बीच में मन रूपी आलस्य व्यवधान डालने का प्रयत्न करता है तो साधक रूपी हाली सूकारौ रूपी त्याग तथा अनासक्ति के द्वारा पुनः इनको लक्ष्योन्मुख करता है । खेती रूपी साधना करने के लिये मन रूपी हल है । प्राण रूपी फाल है । युक्ति रूपी जुड़ा है । गुरु का उपदेश रूपी जोत हृदय रूपी खेत में सदैव विद्यमान रहता है जिससे साषि = साख = फसल उत्पन्न होने की सारी सामग्री का सरंजाम = इंतजाम हो जाता है ।
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परमात्मा में अनन्य अनुराग ही नाड़ी है । श्रवण ही नाहीं है । श्रद्धापूर्वक भगवन्नाम का उच्चारण ही बीज का बपन = बोना है । गुरु महाराज के आदेश साधक ! आपको साधना करने की विधि सिखा दी गई है, कृपया अब साधना करना प्रारम्भ कर दो” को प्राप्त कर उसके अनुसार श्रद्धा-प्रीति पूर्वक साधना को करे । हाली रूपी साधक के पास हालण रूपी मनसा है जो प्रातः काल होते ही साधक रूपी हाली को भोजन रूपी साधना में उपयोगी सभी सामग्रियाँ, सद्गुणों को उपलब्ध करा देती है ।
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वह सद्गुण-सदाचार रूपी अन्न को पीसती है = संपादित करती है । उससे भोजन बनाती है = उनको आचरित करती है । सद्गुण-सदाचार के सहायक रूपी जल को कूवे रूपी अन्यों, साधकों के जीवनचरित्र = आचरणों को देखकर अपने में भी उत्पन्न करती है और साधक को साधना में निश्चल होकर सहायता करती है = बिना कुछ कहे अपने आप ही धन कमाती है, खेती का काम काज करती है ।
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साधक रूपी हाली के कंधे पर सदैव त्याग रूपी जेली रहती है जो ज्ञान रूपी कुदाली द्वारा अंतःकरण रूपी खेत में से निकाले गये महान पापी दुर्गुण दुर्विचारों रूपी घास-फूस, पेड़-पौधों को अपने में टाँग-टाँग कर बाहर निकाल फैंकती है । साधु-संतों की संगति में प्राप्त होने वाला ज्ञान ही साधक के लिये श्रावण का महीना है जिसमें खेती के लिये जल वर्षा होती है । भावभक्ति का उदय होना ही भाद्रपद मास के समान है ।
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पपीहा भाद्रपद मास में ‘पीव’ ‘पीव’ बोलता है । यहाँ प्राण = प्राणी = साधक पूरे उत्साह = जोश के साथ झड़लायौ = निरंतर भगवन्नाम का जप करने लगा । भजन-स्मरण में किसी प्रकार का कोई भी विघ्न न पड़े एतदर्थ विचार रूपी बाड़ साधक ने चारों ओर लगाई । शील = ब्रह्मचर्य अथवा सदाचरण उस बाड़ की सुरक्षा करता है । साधक विवेक रूपी मचान पर बैठकर विषय-विकारों की ओर सहज ही दौड़ने वाली चित्तवृति रूपी हरहाई जानवरों को आने से रोकता है ।
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इस प्रकार सुधी = लक्ष्यारूढ साधकों रूपी कृषकों ने साधना रूपी अच्छी मात्रा में फसल पैदा की । तेज का पुंज = परमात्मा रूपी अन्न खलियान रूपी हृदय में प्रकट हो गया, दीखने लगा । हाली रूपी साधक सदैव सावधान रहता है, कहीं किसी भी तरह से अन्न रूपी परमात्मा को विषयविकार रूपी चौर, चौरी करके न ले जाये ।
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वस्तुतः गुरु महाराज ने रामनाम रूपी बीज का कोठा = भण्डार जो उनके पास पहले से ही भरा हुआ रखा था = उनके द्वारा परीक्षत था = साधना किया हुआ था, को शिष्य रूपी खेत में अपना धर्म समझकर बोया = को प्रदान किया । शिष्य के पूर्वजन्म के संस्कारों से वह रामनाम की साधना प्रभूत मात्रा में = अच्छी प्रकार सफल हुई ।
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अन्य लोगों ने भी उसके उपदेशों से, साहचर्य से खूब लाभ लिया । साधक रूपी किसान ने अन्तःकरण रूपी खलियान में सुरति रूपी लकड़ी को गाड़ा = पूर्णरूपेण रामनाम मय बनाया । उसके सहारे चलने के लिये पांचों ज्ञानेन्द्रिय रूपी पाँच बैलों को गाहने में लगाया । जब गाहने से खाकला तथा अन्न अलग-अलग हो गये = आत्मा और अनात्मा तत्वों का स्पष्टतः बोध हो गया तथा ज्ञान रूपी हवा से ब्रह्मात्मैक्य का बार-बार अनुभव करने लगे ।
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जिससे कोठों के कोठे भरने लगे = अखंडानंद का अनुभव रूप बरसाने की क्रिया से खाकला उड़कर दूर हो गया तथा कण = अन्न रूपी परमात्मा अंतःकरण रूपी घर में प्रकट हो गया । फिर ज्ञान रूपी गाड़े में अन्नरूपी परमात्मा को ढोने लगे = अनुभव होने लगा । बषनां कहता है, गुरु महाराज की कृपा से मुझे नौनिधि रूपी परमात्मा मिल गया है जिससे जन्म-मरण रूपी सारा टोटा = नुकसान समाप्त हो गया है ॥८२॥