*🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏*
*🌷卐 सत्यराम सा 卐🌷*
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*२६. भजन प्रताप का अंग ~५३/५६*
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*यथा पद्मनी नीच कुल, केशर विष्टा होय ।*
*रज्जब भुगतैं राजवी१, कुल कारण नहिं कोय ॥५३॥*
पद्मनी जाति की नारी नीच कुल में उत्पन्न हो जाती है, केशर विष्टा के खाद से अच्छी उगती है । उक्त दोनों को राज१ पुरुष या राजा महाराजा भी भोगते हैं । अत: उत्तमता में उत्तम कुल कारण नहीं है, वस्तु की उत्तमता ही कारण है ।
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*कुल पर्वत नहिं पूजिये, सुत प्रतिमा की मानि१ ।*
*त्यों रज्जब रामहिं भजे, गई सकल कुल कानि ॥५४॥*
पत्थर की मूर्ति का कुल पहाड़ है, उसकी तो कोई पूजा नहीं करता, उसके पुत्र पत्थर से बनी मूर्ति को पूज्य१ समझकर पूजा करते हैं, वैसे ही राम का भजन करने से कुल की संपूर्ण लज्जा चली जाती है अर्थात भक्त में कुलादि दोष न देखकर उसकी पूजा करते हैं ।
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*दीरध कुल सु अतेरु बूडे, लघु कुल तारक तारै ।*
*सो रज्जब गुण कैसे मेटें, जा सौं जल निधि पारै ॥५५॥*
बड़े कुल के हो और तैरना नहीं जानते हो, तो स्वयं भी डूबते हैं और ज्ञान नौका द्वारा तैरने वाले हों, तो वे तारने वाले होने से संसार-सागर से तारते हैं । जिस ज्ञान के द्वारा वे संसार-सिन्धु से पार करते हैं, वह उनका गुण कैसे मेटा जा सकता है ?
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*प्रतिमा१ नई पुराने पर्वत, प्रत्यक्ष देखो जोय ।*
*रज्जब भरम दिनों का भागा, पूजा किसकी होय ॥५६॥*
मूर्ति१ जिस पर्वत के पत्थर से बनी है, वह पर्वत पुराणा है और मूर्ति नई है, यह अपनी दृष्टि द्वारा प्रत्यक्ष देख सकते हो । देखने प्रतिमा अधिक दिन की है वा पर्वत यह भ्रम तो दूर हो ही जाता है, फिर बड़ी आयु वाला पूज्य हो, तो पर्वत की पूजा करनी चाहिये मूर्ति की नहीं । अत: पूजा में हेतु भजन का प्रताप ही है, आयु नहीं ।
(क्रमशः)












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