सोमवार, 7 सितंबर 2026

परम तितिक्षु संत विदुरजी

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🌷*卐 श्री दादूदयालवे नम: 卐*🌷
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*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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*दादू धरती ह्वै रहै, तज कूड़ कपट अहंकार ।*
*सांई कारण सिर सहै, ताको प्रत्यक्ष सिरजनहार ॥*
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अब परिचितों को भी पढ़िये—दादूपंथियों की छावनी में जागरण था । वह मेला शीतकाल में था । विदुरजी संतों के भजन सुनना चाहते थे, इससे वे दादूवाणी मंदिर में बैठे थे जो विशाल छप्पर के रूप में था । उनको वहां नंगे बैठे देखकर भूरादास कलानोरिया कुपित होकर बोला- यहां क्यों आकर बैठा है ? यहां मातायें बैठी हैं, दीखता नहीं तेरे को यह नंगे बैठने का स्थान है क्या ?
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भूरादास के उक्त वचन सुनकर विदुरजी तो क्या बोलते अन्य किसी साधु ने भी कुछ नहीं कहा- किन्तु मातृमंडल से आवाज आई । महाराज को बैठे रहने दो । ये तो संत हैं इनमें भेद दृष्टि ही ही कहां है और हम तो दूषित भाव रहित अपने बच्चों को रात दिन नंगा देखती हैं । यही बालवृत्ति इन संतजी की है । फिर भूरादास को कहा-तुम्हारा भाव अवश्य दूषित है तुम यहां बैठने के अधिकारी अवश्य नहीं हो । फिर भूरादास भी चुप हो गया । अन्य सन्तों व गृहस्थों ने किसी ने भी कुछ नहीं कहा ।
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बेरीवाले घनश्यामदासजी के शिष्य नन्दकिशोरजी मेरे से स्नेह रखते थे साथ ही आते जाते खाते पीते बैठते प्रायः साथ रहते थे । जागरण में भी हम दोनों साथ ही बैठे थे । शीत बहुत पड़ रहा था । मैंने नन्दकिशोरजी को कहा-अपन दोनों एक कम्बल में काम चला लेंगे । एक कम्बल विदुरजी को ओढ़ा आओ । मैंने मेरा कम्बल उतार कर नन्दकिशोरजी को दिया । 
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वे उठै और विदुरजी के शरीर को अच्छी प्रकार ढकर आ गये । विदुरजीने कुछ भी नहीं कहा । वे चित्रलिखित मूर्ती के समान ही विराजे रहे । हम दोनों एक कम्बल ओढ़े रहे वहां गायक संत उच्च कोटि के संतों के भजन गा रहे थे । महान् आनन्द की वर्षा हो रही थी । विदुरजी का शरीर किसी कारण हिल गया तो कम्बल उनके शरीर से नीचे गिर गया ।
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किन्तु उन परम तितिक्षु संत विदुरजी ने उस कम्बल को अपने हाथों उठाकर पुनः नहीं ओढ़ा । उक्त प्रकार की उनकी सहनशक्ति और तितिक्षा तो मैंने मेरे नेत्रों से देखी थी । इससे सूचित होता है, वे महान् तितिक्षु क्षमाशील, भजनानन्दी संत थे । उनके जीवन में ऐसी अनेक घटना घटी होगी, मैंने तो उक्त घटनायें आखों देखी लिखी हैं । उनके दर्शन फिर नारायणा दादूधाम के मेले में होते रहते थे । उनके किसी प्रकार का आग्रह नहीं था, वे गद्दे पर भी बैठ जाते थे और रेते में वैसे ही प्रसन्नता से बैठते थे ।
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स्नान के समय तो कुछ देर लगती ही नहीं थी । कारण कुछ धोना निचोना तो पड़ता ही नहीं था । वे अन्त तक दिगम्बर ही रहे थे । वे सदा अपना जीवन परम संतोष से ही व्यतीत करते रहे थे । सुनते हैं कि वि. सं. १९८९ में गोदावरी के कुंभ मेले में जाते समय बनास नदी से निकल रहे थे चातुर्मास का समय था वर्षा वर्षती ही रहती थी । पीछे से जोर से बाढ़ आ गई । इससे उनका शरीर बनास में ही बह गया । भगवान् की ऐसी ही इच्छा होगी । इस प्रकार संत विदुरजी की जीवन यात्रा समाप्त हुई ।
(क्रमशः)

*२६. भजन प्रताप का अंग ~७७/८१*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*२६. भजन प्रताप का अंग ~७७/८१*
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*माया काया मसि मिली, प्राण सु पाणी माँहिं ।*
*रज्जब सुमिरन सूर बिन, जीव जल निर्मल नाँहिं ॥७७॥*
जैसे शुद्ध जल में काला रंग मिल जाय, तो वह सूर्य की किरण द्वारा जल सूखे बिना नहीं निकलता, वैसे ही प्राणी में माया तथा काया की आसक्ति रूप मैल मिला है, नाम-स्मरण बिना जीव निर्मल नहीं हो सकता ।
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*रज्जब स्याही सुकल१ करि, सब अक्षर अरु स्थूल ।*
*नामहि निर्मल ठौर दोउ, बाकी मैले मूल ॥७८॥*
स्याही से सब अक्षर बने है ओर वीर्य१ से सब स्थूल शरीर बने हैं, जिन अक्षरों से भगवान का नाम आ जाता है, वे अक्षर तथा जिन शरीरों के हृदय में नाम चिंतन होता है वे शरीर तो निर्मल हैं, बाकि के सभी मैले हैं । अतः दोनों में निर्मलता का हेतु नाम ही है ।
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*कुलक्षण क्वैलों१ भरी, काया रीठ२ समान ।*
*नाम अग्नि उज्वल उभय, और उपाय न आन ॥७९॥*
कोयलों१ से भरी कोटड़ी अति काली होती है उसी के समान कुलक्षणों से भरी काया अति काली२ है कोयलों की कोटड़ी में अग्नि लगा दी जाय और काया के हृदय देश में नाम चिन्तन आरम्भ कर दिया, तो दोनों उज्वल हो जायँगी इनको उज्वल करने का अन्य कोई उपाय नहीं है ।
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*अंभ१ आतमा घटा घटि२, तबै बीज३ बल४ संग ।*
*भानु भजन मिलतों रजब, उभय अनुपम अंग५ ॥८०॥*
बादलों की घटा में जल१ होता है तब उसमें बिजली३ का संयोग भासता है और सूर्य का प्रकाश मिलनै से उस घटा का स्वरूप५ अनुपम भासने लगता है वैसे ही शरीर में२ आत्मा होती है तब उसमें माया की शक्ति४ भासने लगती है, फिर भगवद् - भजन होने लगता है तब तो उसके भी दैवी गुण रूप लक्षण अति उत्तम भासने लगते हैं ।
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*वपु१ वसुधा२ जीव जल पड़े, पंच स्वाद कर्म कीच ।*
*रज्जब नाम निहंग३ चढि, तब सु ते४ न तिन५ बीच ॥८१॥*
पृथ्वी२ पर जल पड़ने से कीचड़ हो जाता है, फिर सूर्य की किरण से जल आकाश३ में चढ़ जाता है तब उन५ जल कणों में वे४ रज कण नहीं रहते, वैसे ही जीव शरीर१ को धारण करता है तब पंच ज्ञानेन्द्रियों के पंच विषयों के स्वाद रूप रेता मिलने से कर्म रूप कीचड़ हो जाता है और जीव उसमें फँस जाता है, फिर नाम चिन्तन द्वारा ब्रह्म की प्राप्ति होने पर जीवों५ में वे४ विषय के राग नहीं रहते ।
(क्रमशः)

*४७. अध्यातम कौ अंग ३३/३६*

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*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
*श्रद्धेय श्री Tapasvi @Ram Gopal Das की प्रेरणा से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Meta AI*
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*४७. अध्यातम कौ अंग ३३/३६*
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रिदै चक्र मंहि रांमजी, रोम रोम सब ठांम ।
कहि जगजीवन जन जपै, ए अजपा ए नांम ॥३३॥
हृदय चक्र में ही राम जी हैं, जो रोम-रोम और सब जगह विराजमान हैं । जगजीवन जी महाराज कहते हैं भक्त जन इसी अजपा नाम को जपते हैं ।
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कंठ चक्र करता पुरष, करन करावन जोग ।
कहि जगजीवन ते लहैं, तिंहिं तन हरष न सोक ॥३४॥
कंठ चक्र में वह कर्ता पुरुष विराजमान है, जो सब कुछ करने-कराने योग्य है । संत जगजीवन जी कहते हैं उसे पा लेने पर शरीर में न हर्ष रहता है न शोक ।
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भौंर चक्र१ भगवंत भजि, भाव भगति रस होइ ।
कहि जगजीवन सहज मैं, सुन्नि समांवै सोइ ॥३५॥
(१. भौंर चक्र=भ्रमर चक्र) 
भ्रमर चक्र में भगवान का भजन करने से जीव में भाव-भक्ति का रस उत्पन्न होता है । संत जगजीवन जी कहते हैं की जीव उसी सहज अवस्था से शून्य में समा जाता है । 
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नोली२ बांधि भुवंगम, ये अध्यातम जोग ।
कहि जगजीवन नांउं भजि, भूलै षटरस भोग ॥३६॥
(२. नोली=नेती-धोती आदि हठयोग के छह कर्मों में से पाँचवां कर्म)
नेती-धोती से शरीर को बांध कर भुजंगम अर्थात कुंडलिनी को जगाना, यही अध्यात्म योग है । संत जगजीवन जी कहते हैं नाम भजने से साधक छहों रसों के भोगों को भूल जाता है ।
(क्रमशः)  

रविवार, 6 सितंबर 2026

*विदुरजी का दिगम्बर होना*

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*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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*निश वासर लागै नहीं, नहिं लागै शीतल घाम ।*
*क्षुधा तृषा लागै नहीं, घट-घट आतम राम ॥*
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*विदुरजी का दिगम्बर होना* = नारायणा दादूधाम के आचार्य दयारामजी महाराज ने गुहाला के स्थान में चातुर्मास किया था । चातुर्मास में विदुर जी भी साथ थे । एक दिन विदुर जी प्रातः स्नान करके आये थे और पहाड़ की टेकड़ी पर बने हुए स्थान में अपनी धोती खोलकर ठीक तरह बांधने लगे थे । उसी समय पांचूजी नामक एक साधू ने विदुरजी को कहा- “प्रातः काल ही क्या दर्शन करा रहा है, रोटी मिलने देगा या नहीं ।” यह सुनकर विदुरजी ने अपने मुख से कुछ नहीं कहा किन्तु धोती को वहां ही पटककर मां के गर्भ से निकले थे वैसे ही दिगम्बर रूप में महल के उत्तर की ओर अधिक ऊंचाई नहीं थी वहां से कूदकर चल दिए और सालवाड़ी डूंगरी पर जाकर ऊंधे पड़ गए ।
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४-५ दिन के पश्चात् विजारण्या जाटों की ढांणी की एक वृद्धमाता ने उनको पड़ा देखकर पूछा-महाराज ! यहां क्यों पड़े हो ? तब विदुरजी बोल तो नहीं सके किन्तु हाथ की ओक मुख के लगाकर जल मांगा । फिर बुढिया ने जल मंगवाकर विदुरजी को पिलाया और उस वृद्धा माता ने उनको दूध देकर एक दो दिन पश्चात् रोटी देना आरम्भ किया और गुहाला स्थान में सूचना दी कि आपके एक साधु दिगम्बर अवस्था में पहाड़ी पर पड़े हैं । इनको ले जाओ । फिर साधु आये भी और साथ चलने का आग्रह भी बहुत किया किन्तु न तो विदुरजी उन साधुओं के साथ गए और न पुनः वस्त्र ही धारण किए । कुछ दिन के पश्चात् उस पहाड़ी से भी विचार गये फिर रमते ही रहते थे ।
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डूंगर के मलारणे में दादूपंथी नागों की छावनी में भंडारी मोतीराम जी ने जुगतरामजी मंडलेश्वर का चातुर्मास कराया था । उस चातुर्मास में, मेरा राम भी था और विदुरजी भी थे । वे गणेशदासजी संत की कुटिया पर एक तखत पर रहा करते थे । आपका शरीर श्यामवर्ण था पेट बढ़ा हुआ था जिससे आपकी गोप्येन्द्रिय प्रायः दीखती भी नहीं थी । 
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आप परिग्रह शून्य दिगम्बर तो थे ही आपका हृदय भी परम विरक्त था ।आपकी सहन शक्ति भी विलक्षण ही थी । आप प्रतिदिन वहां मोरेढ़ नदी को लांघकर ही शौच किया करने जाते थे । चातुर्मास में भी उनका यह क्रम भारी बाढ़ आने पर ही बन्द होता था । साधारण बाढ़ से तो पार चले ही जाते थे । सारे चातुर्मास में मेरा उनसे संपर्क रहा था । वे कभी२ इच्छा होने पर अपने रचित पद्य भी सूना दिया करते थे ।
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*विदुरजी की सहन शक्ति* = एक समय जुगतरामजी की मंडली कुरुक्षेत्र सूर्यग्रहण पर जाने लगी तब विदुरजी ने भी कहा- मेरा रामजी संत दर्शन करना चाहता है, मुझे भी साथ ले चलें । मंडलेश्वरजी ने कहा- आप दिगम्बर हैं विदेश में आपको कष्ट होगा । सब प्रकार के प्राणी मिलेंगे । दुर्जन लोग आपको दुःख भी दे सकतें हैं । उस स्थिति में मंडली के सभी साधुओं को दुःख होगा । विदुरजी ने कहा- इस बात की चिन्ता मत करो, मंडली के संतों को दुःख होने की स्थिति मैं नहीं आने दूंगा । दुःख देने वालों का आघात मैं स्वयं ही सहन कर लूंगा ।
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उस वर्ष मेरा रामजी भी मंडली के साथ ही था । मैं देखता रहा कि स्थान २ पर ग्रामों में, नगरों में उन पर कहीं बच्चे ही धूलि डालते थे तो कहीं कंकर ही उन पर फैंकते थे तो कटु वचन भी सुनाते थे किंतु संत विदुरजी का उनको कुछ कहना तो दूर रहा वे उनकी ओर देखते भी नहीं थे । कुरुक्षेत्र के मेले में दशनामी नागों ने यह कहकर कि नंगे तो हम ही रह सकते हैं तुम कैसे नंगे घूम रहे हो ? ईंटें मारी । एक दो विदुरजी के लगी भी किन्तु विदुरजी उनके दर्शन कर चल दिए कुछ भी नहीं बोले । मैं साथ था, उनकी सहन शक्ति को देखकर आश्चर्य कर रहा था ।
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कहा भी है ~
“सहनशक्ति अति होत है, संत जनों के मांहिं ।
पत्थर खाते ही रहे, विदुर कहा कुछ नांहिं ।७०।दृ.त.११।
विदुरजी ने मुझे पहले ही कह कह रखा था कि मेरे साथ कोई अनुचित व्यवहार करे उस पर आप कुछ भी नहीं बोलना । अतः उनके पीछे२ अज्ञात के समान चलता था । उक्त प्रकार मेले में उन्होंने मेरे साथ घूम२ कर सब संतों के दर्शन किए । कोई उन पर श्रद्धा भी करता था, कोई नंगा फिरना बुरा भी बताता था किन्तु वे सब सुन लेते थे । कुछ बोलते नहीं थे । यह अपरिचित समाज की बात कही गई ।
(क्रमशः)

*४७. अध्यातम कौ अंग २९/३२*

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*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
*श्रद्धेय श्री Tapasvi @Ram Gopal Das की प्रेरणा से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Meta AI*
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*४७. अध्यातम कौ अंग २९/३२*
र रौ म मौ अक्षर उभै, ए गुर ग्यांन निवास ।
अबिगत आग्या१२ चक्रषट१३ खोजौ, सु कहि जगजीवनदास ॥२९॥
{१२. आग्या=आज्ञा(हटयोग का षष्ठ) चक्र}   {१३. चक्र षट=छह चक्र(उपरि लिखित)}
र-रौं और म-मौं ये दोनों अक्षर गुरु के ज्ञान का निवास हैं । जगजीवनदास जी महाराज कहते हैं अविगत ब्रह्म को आज्ञा चक्र में और इन छहों चक्रों में खोजो ।
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मूल चक्र मंहि महारस, मन पावन मथि धाम ।
कहि जगजीवन मेर परि, सैर सिरै१४  सुख नांम ॥३०॥
(१४. सैर सिरै=उत्तम साधना)
मूलाधार चक्र में महारस भरा है, जो मन को पवित्र करने वाला परम धाम है । संत जगजीवन जी कहते हैं मेरुदंड पर उत्तम साधना करने से उस सुख-स्वरूप नाम की प्राप्ति होती है ।
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इन्द्री चक्र अगाध हरि, अबिगत अलख अनंत ।
कहि जगजीवन उनमनी, केई जन परसैं कंत१५ ॥३१॥
(१५. परसै कंत=ब्रह्म साक्षात्कार)
इन्द्री चक्र में वह अगाध हरि अविगत, अलख और अनंत रूप में है । जगजीवन जी महाराज कहते हैं उनमनी अवस्था में कोई बिरला जन ही उस कांत रूप ब्रह्म का साक्षात्कार कर पाता है ।
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नाभि चक्र नीझर झरै, निरमल नूर निवास ।
अनहद बांणी ऊपजै, सु कहि जगजीवनदास ॥३२॥
नाभि चक्र में अमृत का झरना झरता है, वहाँ निर्मल प्रकाश का निवास है । संत जगजीवनदास जी कहते हैं वहीं से अनहद वाणी उपजती है ।
(क्रमशः) 

*२६. भजन प्रताप का अंग ~७३/७६*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*२६. भजन प्रताप का अंग ~७३/७६*
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*निष्काम नाम ले नर नारायण, सुमिरत शक्ति१ सकाम ।*
*रज्जब रज२ तज काढ़ तू, भजन भेद गति३ प्राम४ ॥७३॥*
निष्काम भाव से नाम-स्मरण करने से नर नारायण को प्राप्त करता है और सकाम भाव से करने से माया१ मिलती है । हे साधक ! तू रजोगुण२ का त्याग करके मन को माया से निकाल, तभी तुझे भजन भेद की रीति३ प्राप्त४ होगी ।
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*नाम विसारे नींद है, गृह वैराग्य सु हानि ।*
*रज्जब रटे सु रैनि दिन, सोई जाग्या जानि ॥७४॥*
राम नाम को भूलना ही निद्रा है, नाम को भूलने से गृहस्थ तथा विरक्त दोनों को ही हानि है जो रात्रि-दिन नाम को रटता है, वही जगा हुआ है ऐसा ही जानना चाहिये ।
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*झूंठ साँच के संग सदा, ज्यों दीपक अँधियार ।*
*रज्जब लोई लय बुझत, तिमिर न आवत बार ॥७५॥*
जैसे दीपक के साथ अँधेरा रहता है, वैसे ही सत्य के साथ मिथ्या रहता है । दीपक की ज्योति बुझने पर अँधेरे को आते देर नहीं लगती, वैसे ही सत्य स्वरूप परमात्मा के नाम का स्मरण हटाते ही हृदय में मिथ्या मायिक प्रपंच आते देर नहीं लगती ।
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*रज्जब रीता राम बिन, भर्या भजे भगवान ।*
*मनसा वाचा कर्मना, नीके किया निदान ॥७६॥*
राम के भजन के बिना प्राणी खाली है, जो भगवान का भजन करता है वही भरा है । हमने मन, वचन, कर्म से खाली और भरे का यही मूल कारण निश्चय किया है ।
(क्रमशः)

*४७. अध्यातम कौ अंग २५/२८*

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*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
*श्रद्धेय श्री Tapasvi @Ram Gopal Das की प्रेरणा से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Meta AI*
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*४७. अध्यातम कौ अंग २५/२८*
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रांम निरंजन निराकार हरि, स्वाधिस्टांन४ अस्थान ।
कहि जगजीवन ब्रह्मा उतपति, सावत्री भी ग्यांन ॥२५॥
(४. स्वाधिस्टांन=हठयोग का द्वितीय चक्र)
वह राम ही निरंजन और निराकार हरि है, उसी का निवास स्वाधिष्ठान चक्र में है । संत जगजीवन जी कहते हैं वहीं से ब्रह्मा जी की उत्पत्ति होती है और सावित्री रूपी ज्ञान भी वहीं से प्रकट होता है ।
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निराकार निरलेप हरि, मणिपुर५ बिसनु बिलास ।
लिछमी सक्ति तहँ रहै, सु कहि जगजीवनदास ॥२६॥
(५. मणिपुर=हठयोग का तृतीय चक्र)
जो हरि निराकार और निर्लेप है, वही मणिपुर चक्र में विष्णु रूप में विलास करता है । संत जगजीवनदास जी कहते हैं लक्ष्मी रूपी शक्ति भी वहीं निवास करती है ।
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परम पुरुष परमातमा, अनहद६ धुनि हरि हेत ।
कहि जगजीवन पारबतीप्रिय७, सुमिरण भये सचेत ॥२७॥
{६. अनहद=अनाहत(हठयोग का चतुर्थ) चक्र}   {७. पारबती प्रिय=शिव(आदिनाथ)} 
परम पुरुष परमात्मा ही अनाहत चक्र में अनहद धुनि के रूप में प्रेम रूप है । जगजीवन जी कहते हैं वहीं पार्वती-प्रिय शिव जी विराजते हैं, जिनके स्मरण से जीव सचेत हो जाता है ।
तेज पुंज प्रकाश परम गुर,  विसुध८ मारग हंस९ ।
कहि जगजीवन विद्या१० वांणी, तजै अविद्या११ अंस ॥२८॥
{८. विशुध=विशुद्ध(हठयोग का पंच्चम) चक्र}   {९. हंस=अवधूत योगी)  
(१०. विद्या=ब्रह्मविद्या)   (११. अविद्या=अज्ञान)    
विशुद्ध चक्र में तेज के पुंज स्वरूप परम गुरु का प्रकाश है और वही हंस रूपी अवधूत योगी का मार्ग है । जगजीवन जी कहते हैं वहाँ ब्रह्मविद्या की वाणी प्रकट होती है जिससे अज्ञान का अंश मिट जाता है ।
(क्रमशः)

१२वें आचार्य नारायणदास जी

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*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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*ता माली की अकथ कहानी, कहत कही नहिं आवै ।*
*अगम अगोचर करत अनन्दा, दादू ये जस गावै ॥*
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१२वें आचार्य नारायणदास जी के खालसे का स्थान पहले दादूद्वारे नारायणा के बाग़ में एक था । उनमें आपकी शिष्य परंपरा के संत नानकदासजी, रामदासजी हुये हैं किन्तु उस स्थान में भी अब कोई साधु नहीं है । आचार्य नारायणदासजी की शिष्य परंपरा में चतुर्भुजजी अच्छे विद्वान् संत हुये हैं । आप सामान्य रूप से तो शास्त्रों के ज्ञाता थे ही किन्तु विशेष रूप से पौराणिक पंडित थे ।
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भागवत् व दादूवाणी की कथा विशेष रूप से करते थे । वाणी पर इनकी टिप्पणी है । आजकल नारायणा में उसी पुस्तक से कथा होती है । वि. सं. १९५० के लगभग इनका देहांत हुआ था । ये अच्छे संत थे । इनके शिष्य पंडित नन्दरामजी भी अच्छे विद्वान् थे । आचार्य दयारामजी के कथावाचक भी रहे थे । चन्द्रिका प्रसाद द्वारा संपादित दादूवाणी पर आपकी सम्मति भी छपी है ।
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१३ वें आचार्य उदयरामजी महाराज के दो शिष्य थे १~ गुलाबदासजी २-काशीरामजी । गुलाबदासजी आचार्य हुये और काशीरामजी की शिष्य परंपरा इस प्रकार है~ काशीरामजी के लक्षमणदासजी । इन दोनों के चरण एक चौकी में नारायणा में ही हैं । वि. सं. १९३६ वैशाख वदि ७ शुक्रवार को पधराये । लक्षमणदासजी के लायकरामजी उनके शिवलालदासजी । लायकरामजी के चरण शिवलालदासजी ने वि. सं. २००० कार्तिक वदि ९ शुक्र को नारायणा में पधराये ।
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शिवलालदासजी के शिष्य गोपालदासजी नलू ग्राम में रहे । उनके सुखदेवदासजी, उनके मेदरामजी वर्तमान में हैं । आचार्य उदयरामजी की परंपरा का एक स्थान मूडोती ग्राम में भी है । मेदरामजी रहते हैं किन्तु यह स्थान बहुत पुराणा है । वि. सं. १७७७ में नारायणा से पहले नारायणदासजी ने मूडोती में अपना साधन धाम बनाया था और परमार्थ के लिये एक बावड़ी बनाई थी । वि. सं. १७७७ में । उसमें शिला लेख हैं ।
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१४वें आचार्य गुलाबदासजी के दो प्रमुख शिष्य थे- हरजीरामजी तथा दयारामजी । दोनों ही आगे पीछे आचार्य गद्दी पर विराजे । इससे इनका खालसा अलग नहीं चला । इससे इनकी शिष्य परंपरा का कोई अन्य स्थान नहीं है ।
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१५वें आचार्य हरजीरामजी के दो शिष्य थे-बालदासजी पुजारी और भूरादासजी भंडारी । बालदासजी पुजारी के शिष्य बसन्तीदासजी वर्तमान हैं । भूरादासजी भंडारी के शिष्य सन्मानदासजी भंडारी वर्तमान हैं । इनकी परंपरा का अन्य कोई स्थान नहीं है ।
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१६वें आचार्य दयारामजी के अनेक शिष्य हुये हैं किन्तु कोई स्थानधारी या स्वतंत्र रूप से स्थान स्थापित नहीं किया । आपके शिष्य- १ भंडारी रामनाथदासजी । २- रामचन्द्रदासजी, ये आचार्य चैनरामजी के स्थान रैंण में चले गये । ३- बलरामदासजी ४- लालदासजी थे सिरोही(शेखावटी) के स्थान में चले गये । ५- रामलालजी आचार्य हो गये ।
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६ पं. रामदासजी कथा वाचक ये भी मेड़ता में अन्य स्थान कृष्णदेवजी महाराज के स्थान में चले गये । ७- भंडारी मंगलदासजी ये भी आचार्य चैनरामजी की परंपरा के स्थान इन्दावड़ में चले गये । ८- विदुरजी इन्होंने प्रथम चानसेन के किशनदासजी से जयपुर जेल में दीक्षा ली थी । किशनदासजी भी जमात में एक मीणे के मारे जाने से जेल में थे । जेल से छूटने पर विदुरजी आचार्य दयारामजी महाराज के साथ रहने लगेथे और आचार्यजी से सत्य उपदेश प्राप्त होने से उनको ही गुरु मानते थे ।
(क्रमशः)

शनिवार, 5 सितंबर 2026

*२६. भजन प्रताप का अंग ~६९/७२*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*२६. भजन प्रताप का अंग ~६९/७२*
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*नर नारायण नाम में, सुमिरन सम ये श्वास ।*
*भूलैं भूत१ विभूति२ में, रज्जब किया विमास३ ॥६९॥*
नर यदि अपने ये श्वास नाम स्मरण में लगाकर बराबर स्मरण करता रहे, तो नारायण हो जाय, किन्तु विचार३ करने पर ज्ञात हुआ कि प्राणी१ माया२ में लगकर परमात्मा के स्मरण को भूल जाते हैं ।
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*तिति२ बार३ माया मुक्त, नरहरि१ नाम समाय ।*
*रज्जब छूटे लय लक्ष्य, लच्छी४ मय ह्वै जाय ॥७०॥*
जितनी देर मन भगवान्१ के नाम-स्मरण में रहता है, उतनी२ देर३ माया से मुक्त रहता है और जब मन को स्मरण द्वारा नाम में लय करने का लक्ष्य छूट जाता है तब मन माया४मय हो जाता है अत: मन को स्मरण में ही रखना चाहिये ।
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*रज्जब जाप जिकर१ करै, तिति बार जीव जाग ।*
*सुमिरण भूले श्वास जिहिं, तब सूता पल लाग ॥७१॥*
जितनी देर जीव नाम का जप, तथा भगवद् सम्बन्धी चर्चा१ करता है, उतनी देर ही जागता है और जिसके श्वास नाम स्मरण भूलने पर आते हैं तब समझो उसके नेत्रों की पलक लग गई और वह सूता है ।
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*नाम विसारन नींद निज, जागण जप जगदीश ।*
*मन वच कर्म रज्जब कहै, खैंचत वेद हदीस ॥७२॥*
जगदीश्वर के नाम को भूलना ही निद्रा है और जपना ही जागना है । यह मैं भी मन, वचन, कर्म से कहता हूँ और वेद हदीस(मुसलमानों का स्मृति जैसा ग्रन्थ, मुहम्मद साहिब के वचनों का संग्रह) भी रेखा खैंच कर कहते हैं, अर्थात प्रतिज्ञापूर्वक कहते हैं ।
(क्रमशः)

*२६. भजन प्रताप का अंग ~६५/६८*

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*🌷卐 सत्यराम सा 卐🌷*
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*२६. भजन प्रताप का अंग ~६५/६८*
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*रज्जब हरि रिधि तिनहुं की, जो जप जीवित बाल ।*
*माल न मूओं को मिले, जे खाये कर्म काल ॥६५॥*
पिता के मरने पर उसका बालक जीवित हो तो उसे धन मिलता है, मरे हुये को नहीं मिलता, वैसे ही जीवत्व अहंकार मरनै पर ब्रह्मचिन्तन रूप बाल जीवित रहता है तभी उसे ब्रह्म साक्षात्कार रूप ऋद्धि प्राप्त होती है, कर्म और काल के द्वारा खाये जाकर मरने वालों को ब्रह्म साक्षात्कार रूप माल नहीं मिलता ।
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*रज्जब भागी भूख, भजन करत भगवंत का ।*
*गये सु दारिद दूख, आपद फिर आवे नहीं ॥६६॥*
भगवान् का भजन करने से भक्तों की सभी प्रकार की आशा तृष्ण रूप भूख भाग जाती है तथा दरिद्रता जन्य दु:ख दूर जाते हैं, पुन: विपत्ति नहीं आती ।
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*माया छाया पांव तल, जब सांई सूरज शीश ।*
*रज्जब कही विचार कर, दीसै विश्वा बीस ॥६७॥*
जब सूर्य शिर पर होते हैं, तब छाया पैरों के पास नहीं आती, वैसे ही जब भजन द्वारा परमात्मा निरंतर हृदय में रहते हैं तब माया चरणों में आ गिरती है । हम ने अपने विचार करके ही कहा है और विचारशीलों को यह बात बीसों विश्वा यथार्थ ही दिखाई देती है ।
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*रंकार अलिफ१ भीतर लिखे, कागज कमल कलूब२ ।*
*अतुल तुला कैसे तुले, बिच बैठा महबूब३ ॥६८॥*
किसी दानी सेठ के बहुत आग्रह करने पर कि कुछ तो ग्रहण करो, तब नामदेव ने तुलसी पत्र पर "राँ" लिखकर कहा - "इसकी बराबर तोल दो" सेठ ने तुला पर हीरादि रत्न, सुवर्णादि धातु, अन्न, यज्ञ, दानादि सभी चढाये किन्तु "राँ" की बराबरी नहीं हुआ । वैसे ही राम मंत्र का पहला१ अक्षर "राँ" जिसके भीतर हृदय२ कमल रूप कागज पर लिखा है अर्थात उसका निरंतर चिन्तन होता है और प्रेम-पात्र३ परमात्मा भीतर बैठा है, वह भक्त भजन के प्रताप से अतुल्य है, वह कैसे किसके बराबर हो सकता है ?
(क्रमशः)

*२६. भजन प्रताप का अंग ~६१/६४*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*२६. भजन प्रताप का अंग ~६१/६४*
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*कुल साँकल काया कड़ी, लोहा में सु विशेष ।*
*रज्जब प्रभु पारस परसि, कचंन होत सु देख ॥६१॥*
जैसे लोहे की साँकल में लोहे की कङियां विशेष रूप से लगी रहती हैं, किन्तु देख, पारस का स्पर्श होते ही सुवर्ण हो जाता है, वैसे ही कुल में विशेष रूप से शरीर फँसा है, किन्तु भजन द्वारा प्रभु की प्राप्ति होते ही कुल और शरीर का अध्यास जाता रहता है ।
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*राम नाम की गर्ज सुन, बधै वंश ज्यों भाव ।*
*रज्जब रीझ्या देखकर, अति आतुर गति चाव ॥६२॥*
जैसे बादल की गर्जना सुनकर बाँस बढ़ता है, वैसे ही राम-नाम की ध्वनी सुनकर भाव बढ़ता है उत्साह और आतुरतापूर्वक शीध्र गति से जो भाव बढ़ता है उसे देख कर हम अति प्रसन्न हैं ।
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*आतम फल आतुर उदय, तथा आँवली राति ।*
*रज्जब अज्जब देखिये, इस अंकुर की जाति ॥६३॥*
जैसे आमला के भादू के कृष्ण पक्ष की एक ही अंधेरी रात्रि में एक साथ ही सब फल आ जाते हैं, वैसे ही अन्त:करण में भजन का फल शीध्रता से एक साथ उदय हो जाता है, इस आमला और भजन रूप अंकुर की जाति ऐसी अदभुत देखी जाती है ।
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*एक आदमी आँवलनि, फल पावे तत्काल ।*
*अन्य सु अठारह भार नर, सहज सु फल सुन साल१ ॥६४॥*
एक भजनानन्दी मनुष्य तो ऐसा होता है कि उसे आमलिन के समान तत्काल ही फल मिल जाता है और सुनो, अन्य मनुष्य अठारह भार वनस्पतियों के समान है, जैसे अन्य वनस्पतियों के वर्ष१ भर में कोई के कब, कोई के कब शनै: शनै: फल लगता है, वैसे ही उन मनुष्यों को अपने कर्म का शनै:शनै: फल मिलता है ।
(क्रमशः) 

*अथ अध्याय ५ =*

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*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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*प्रेम भक्ति दिन दिन बधै, सोई ज्ञान विचार ।*
*दादू आतम शोध कर, मथ कर काढ़या सार ॥*
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*अथ अध्याय ५ =*
*८ वें आचार्य निर्भयरामजी की शिष्य परंपरा =*
आचार्य निर्भयरामजी के शिष्य चरणदासजी की परंपरा इस प्रकार है~
१~ चरणदासजी पुजारी, २~ लालदासजी, ३~सुखरामजी पुजारी, ४~ साहिबरामजी, ५~ लायकरामजी, ६~ आत्मारामजी, ७~ वन्नादासजी वर्तमान हैं । इनके सुयोग शिष्य पूर्णदासजी भी अच्छे संत हैं । १~ चरणदासजी प्रसिद्ध संत तथा पुजारी थे । ८~ सुखरामजी मान्यता प्राप्त पुजारी हुये हैं ।
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आचार्य निर्भयरामजी के खालसे का दूसरा स्थान-नारायणा में है । इसमें रामदयालदासजी वि. सं. १८५१ में थे, उनके हरविलासदासजी । आगे इस स्थान की प्रणाली अप्राप्त है । तीसरा स्थान नारायणा में केशवरामजी वि. सं. १८९१ में थे । आगे इस स्थान की प्रणाली भी अप्राप्त है । चौथा स्थान-तुलसीदासजी वि. सं. १९०८ में थे । उनके तोतारामजी हुये । आगे इस स्थान की भी प्रणाली प्राप्त नहीं हो रही है ।
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निर्भयरामजी महाराज के खालसे की एक चरणदासजी की प्रणाली चल रही है । इनका एक स्थान नारायणा ग्राम में कुंड के पास सुखरामदासजी वाला स्थान है । नारायणा के खाख चौक में तालाब के किनारे पुजारी चरणदासजी की बगीची भी विद्यमान है । पुजारी सुखरामदासजी ने कुंडवाली हवेली तथा अपनी सभी संपत्ति दादू पंथ के वर्तमान आचार्य को भेंट कर दी थी । खाख चौक की बगीची भी आचार्यजी को भेंट कर दी थी । इस परंपरा में चरणदासजी पुजारी तथा सुखरामदास जी पुजारी दोनों अच्छे महात्मा हो गये हैं । अन्य संत भी भजनानन्दी ही हुये हैं ।
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९ वें आचार्य जीवणदासजी महाराज के खालसे का अब कोई स्थान नहीं है और पूर्व का विवरण भी नहीं मिल रहा है । आप गादी पर ६ वर्ष विराजे थे । अतः आपने अधिक शिष्य भी नहीं किये हों तथा आप परम विरक्त भजनानन्दी थे । अतः शिष्य करना भी नहीं चाहते होंगे । कोई भी कारण हो । आपके खालसे के स्थान अब नहीं हैं ।
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१० वें आचार्य दिलेरामजी महाराज के खालसे में भी अब कोई स्थान शेष नहीं है तथा पूर्व का विवरण भी नहीं मिल सका है । दिलेरामजी महाराज ने अपना उत्तराधिकारी अपने ज्येष्ठ शिष्य रामबगसजी को बनाया था किन्त्तु वे गद्दी पर केवल १७ दिन विराजकर विरक्त होने से गद्दी छोड़कर विचर गये थे । उनका स्थान हरमाड़ा ग्राम में है । वे हरमाड़ा में रहने लग गये थे । उस स्थान को दादूद्वारा अस्थल से बोलते थे । यह स्थान हरमाड़ा ग्राम के बीच में है । स्थान के नीचे दुकानें भी हैं । एक मकान और एक दुकान अलग भी है ।
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कृषि योग्य भूमि और कुंआ भी था किन्तु अब स्थान में कोई साधु नहीं है । इस स्थान के अन्तिम उत्तराधिकारी रामरसदासजी हुये हैं । यह स्थान अच्छा प्रतिष्ठित था । ग्राम के ठाकुर व बस्ती इस पर पूर्ण श्रद्धा रखती थी । कारण यहां निवास करके परम विरक्त रामबागसजी महाराज ने भजन किया था और उनकी शिष्य परंपरा के संत भी भजनानन्दी होते रहे होंगे । अतः भजनानन्दी संतों का आश्रम होने से सबकी श्रद्धा थी किन्तु अब स्थान समाप्त है ।
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११ वें आचार्य प्रेमदासजी महाराज के खालसे के स्थान भी अब नहीं हैं और पूर्व का विवरण कुछ नहीं मिल सका है ।
(क्रमशः)

*४७. अध्यातम कौ अंग २१/२४*

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*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
*श्रद्धेय श्री Tapasvi @Ram Gopal Das की प्रेरणा से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Meta AI*
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*४७. अध्यातम कौ अंग २१/२४*
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जोगी जल पीवै सदा, पच्छिम नीर निवांण ।
जगजीवन ऊँड़ा७ अथग८, जांणै सोई जांण ॥२१॥
(७. ऊँडा=गहरा)   {८. अथग=अथाह(अगाध)}
सच्चा योगी सदा पश्चिम दिशा के शांत जल को पीता है । यहाँ पश्चिम नीर का अर्थ है सुषुम्ना नाड़ी से बहने वाला अमृत, और निवांण का अर्थ है इड़ा-पिंगला को रोक कर पश्चिमवाहिनी* करना । संत जगजीवन जी कहते हैं वह जल बहुत गहरा और अथाह है, उसका स्वाद वही जानता है जिसने पीया है ।
{पश्चिमवाहिनी*=हमारी साँस सामान्य दिनों में आगे की तरफ बहती है, संसार की तरफ । इसे पूर्ववाहिनी कहते हैं । जब योगी प्राणायाम से इड़ा(बायीं) और पिंगला(दायीं) नाड़ी को रोक देता है, तब प्राण बीच वाली नाड़ी सुषुम्ना में चलने लगता है । यह सुषुम्ना नाड़ी रीढ़ की हड्डी के साथ-साथ पीछे की ओर, ऊपर की तरफ जाती है। पीछे की दिशा को ही शास्त्रों में पश्चिम दिशा कहा गया है । तो पश्चिमवाहिनी का अर्थ हुआ - प्राण को संसार की ओर से मोड़ कर, पीछे रीढ़ के रास्ते से ऊपर सहस्रार की ओर ले जाना । इसी को उल्टी गंगा बहाना या उल्टी चाल भी कहते हैं ।}
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प्राण रि देह न पूतला, सैंदेही९ सब जाइ ।
जगजीवन तो जांणिये, जाण्यां जोग जगाइ ॥२२॥
(९. सैंदेही=अनायास ही)
प्राण कोई देह का पुतला नहीं है । देह के बिना भी प्राण अपने आप ही सब जगह चला जाता है । संत जगजीवन जी कहते हैं उस प्राण-तत्व को तो तभी जाना जाता है, जब योग को जगा कर ज्ञान प्राप्त किया जाए ।
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कोइ बिरला जोगी जोगवे, मनसा देवी१ लार२ ।
कहि जगजीवन जहाँ आप हरि, तहँ मिलि करैं विचार ॥२३॥
(१. मनसा देवी=मन की वृत्ति)   (२. लार=साथ)
कोई बिरला ही योगी होता है जो अपनी मन की वृत्ति रूपी मनसा देवी को साथ लेकर योग साधता है । संत जगजीवन जी कहते हैं जहाँ स्वयं हरि विराजमान हैं, वहीं मन को ले जाकर उससे मिल कर विचार करना चाहिए ।
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रांम रांम हरि रांमजी, आधारे आधार३ ।
कहि जगजीवन गणेश अगणित, सिधि बुधि सक्ती सार ॥२४॥
(३. आधार=हठयोग के छह चक्रों में प्रथम आधारचक्र) 
राम-नाम ही सबका मूल आधार है, यहाँ तक कि हठयोग के छह चक्रों में जो पहला मूलाधार चक्र है, उसका भी आधार वही राम है । संत जगजीवन जी कहते हैं वही राम अगणित गणेश रूप हैं और सिद्धि, बुद्धि तथा समस्त शक्तियों का सार हैं ।
(क्रमशः) 

शुक्रवार, 4 सितंबर 2026

*हरमाड़ा का स्थान*

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*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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*आप तैं उपाइ बाजी, निरखि देखै सोइ ।*
*बाजीगर को यहु भेद आवै, सहज सौंज समोइ ॥*
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*जूनियां स्थान* = जूनियां स्थान की प्रणाली अज्ञात है । जूनियां में गरीबदासोत भी अपना स्थान बताते हैं । किन्तु कुछ वर्ष पूर्व मैं जूनियां गया था । वहां केवल एक माखूजी की परंपरा का स्थान है । उसकी परंपरा माखूजी के थांमे के वर्णन में दी जायगी । कनिरामजी स्वामी नारायणा ने परमेश्वरदास को आचार्य चैनरामजी की शिष्य परंपरा के स्थान का उत्तराधिकारी बताया है किन्तु परमेश्वरदासजी आत्मारामजी माखूजी की परंपरा के स्थान के उत्तराधिकारी थे ।
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हां हो सकता है कि ~गरीबदासोतों वह मसकीनदासोतों के कोई अप्रधान स्थान हों, उनके रिक्त होने पर परमेश्वरदासजी का अधिकार हो गया हो । एक स्थान ग्राम में भी था । किन्तु वह भी आत्मारामजी का ही था । ऐसा मैंने ग्राम वालों से सुना था और परमेश्वरदासजी ने आत्मारामजी के गुरु परंपरा दौलतरामजी और आत्मारामजी तथा आत्मारामजी के शिष्य के नामों से युक्त जूनियांरावजी के भूमि आदि के पट्टे भी मुझे दिखाये थे ।
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*आखतड़ी का स्थान *= आचार्य चैनरामजी की शिष्य परंपरा का स्थान आखतड़ी में था । पूर्व का संपन्न स्थान था । उसके उत्तराधिकारी रामदयालजी हुये हैं । अन्य कुछ ज्ञात नहीं है । नारायणा के अन्य स्थान = एक आचार्य चैनरामजी की शिष्य परंपरा के स्थान की प्रणाली पूर्ण रूप से ज्ञात नहीं हो सकी । इस स्थान में सं. १८७९ में केवलरामजी थे । उनके मनीरामजी हुये । केवलरामजी प्रसिद्ध संत थे, दादूवाणी के कथा वाचकों में प्रधान माने जाते थे । अब यह स्थान समाप्त है ।
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नारायणा के दूसरे स्थान का कुछ विवरण इस प्रकार है~ १~हरिकृष्णदासजी वि. सं. १८०९ । २~ जीवणदासजी वि. सं. १८५९ । ३~ आशारामजी वि. सं. १८९१ । ४~ जोगीदासजी । इनमें प्रथम हरिकृष्णदासजी अच्छे संगीतज्ञ थे । वीणा वादकों में प्रधान माने जाते थे । वे प्रायः वीणा बजाते हुये हरिगुण गाते रहते थे । अच्छे महात्मा थे । भगवद् भजन ही इन का मुख्य कार्य था ।
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*हरमाड़ा का स्थान*== आचार्य चैनरामजी महाराज की शिष्य परंपरा के स्थान हरमाड़ा की परंपरा आचार्य चैनरामजी महाराज के शिष्य १~गोर्धनदासजी वि. सं. १८४२ । २-मोतीरामजी सं. १८८० । ३~ मयारामजी ४- सेवादासजी ५~ कुशलदासजी ६- हृदयरामजी वि. सं. १९११ । ७~विसनदासजी वि. सं. १९३१ । ८- रामवगसजी सं. १९२८ । ९- देईरामजी १० जयकिशनजी ११- संतोषदासजी वि . सं. १९५१ । १२- दयालबगसजी गुड़िया सं. १९७३ । १३- आडारामजी वि. सं. २०३० । १४- मानदासजी वर्तमान में हैं । यह स्थान हरमाड़ा ग्राम के तालाब के दक्षिणी किनारे पर है । उस क्षेत्र में इस स्थान की अच्छी प्रतिष्ठा थी । यह स्थान कई जातियों का गुरुद्वारा था । इस स्थान के संतों का उस प्रदेश में अच्छा प्रभाव था ।
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१३-आडारामजी ने आचार्य रामलालजी का चातुर्मास भी करवाया था । आडारामजी भ्रमण भी करते थे । संतों के शब्दों को संग्रह भी किया करते थे । इनकी संग्रही वृत्ति थी । आप दादूवाणी का पाठ पढ़ाया करते थे । आपने बहुतों को वाणी पढ़ाई थी । ये पंच केश रखते थे । इनका स्थान एक नारायणा दादूधाम के बाग़ में और एक नारायणा के बाजार में माताजी का कुआ के पास है । इनके उत्तराधिकारी मानदास हैं । उक्त आचार्य चैनरामजी महाराज के शिष्य परंपरा के स्थानों का परिचय इनकी परंपरा के वर्तमान स्वामी कनिरामजी ने बताया है । वही यहां लिखा गया है । इति श्री चतुर्थ अध्याय समाप्त: ४
(क्रमशः)

*४७. अध्यातम कौ अंग १७/२०*

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*श्रद्धेय श्री Tapasvi @Ram Gopal Das की प्रेरणा से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Meta AI*
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*४७. अध्यातम कौ अंग १७/२०*
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कहि* जगजीवन देह थैं, अबिगत करै बिदेह१ ।
वो देहि आगै चलै, अगम ठौर करि नेह ॥१७॥
*-*. १७ से ४७ तक की साषियों में योगशास्त्र का वर्णन है ।
(१. विदेह=देहाध्यासरहित)
संत जगजीवनदास जी कहते हैं कि साधक पहले इस स्थूल देह के भाव से ऊपर उठता है और देहाध्यास(मैं देह हूँ) से मुक्त होकर विदेह हो जाता है । फिर वह सूक्ष्म देह से भी आगे निकल कर, उस अगम्य स्थान(परमात्मा के धाम) से प्रेम लगा लेता है । 
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खैंचि पवन मन खोज तन, खालिक२ सौं चित लाइ ।
सहजैं बरसै प्रेम रस, जगजीवन तहां आइ ॥१८॥
{२. खालिक=सृष्टिकर्ता(सिरजनहार)}
प्राणायाम से पवन को खींच कर, मन को शरीर के भीतर खोज कर, और चित्त को सृष्टिकर्ता मालिक में लगाओ । ऐसा करने से सहज ही प्रेम के रस की वर्षा होने लगती है और साधक जगजीवन(परमात्म स्वरूप) तक पहुँच जाता है ।
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रिधि सिधि प्रहरी रांम कहि, मन मथि३ मांही पैठी ।
जगजीवन हाथी सबद, उठै तहां ही बैठि ॥१९॥
(३. मन मथि=मन का निरोध कर)
रिद्धि-सिद्धि को तो बाहर का पहरेदार समझो, उन्हें राम-नाम कह कर बाहर ही रोक दो । मन का मंथन करके, मन को रोक कर भीतर प्रवेश करो । संत जगजीवनदास जी कहते हैं कि भीतर अनहद हाथी के समान गम्भीर शब्द(अनहद नाद) उठ रहा है, वहीं स्थिर होकर बैठ जाओ ।  
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बंक नालि४ रस पीवतां, ससिहर५ खैंचै सूर६ ।
जगजीवन तहँ सहजि घर, बाजै अनहद तूर ॥२०॥
(४. बंक नालि=तालुमूल में जिह्वा का स्पर्श)   (५. ससिहर=चन्द्रनाड़ी)   (६. सूर=सूर्यनाडी) 
जब योगी बंकनालि(तालू मूल में जीभ लगाकर - खेचरी मुद्रा) से अमृत रस का पान करता है, तब चन्द्र नाड़ी सूर्य नाड़ी को खींच लेती है अर्थात इड़ा-पिंगला का भेद मिट जाता है । संत जगजीवनदास जी कहते हैं कि उसी सहज अवस्था रूपी घर में अनहद के तुरही-नगाड़े बजने लगते हैं ।
(क्रमशः)

गुरुवार, 3 सितंबर 2026

*कुशालीरामजी*

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*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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*अविनाशी साहिब सत्य है, जे उपजै विनशै नांहि ।*
*जेता कहिये काल मुख, सो साहिब किस मांहि ॥*
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१~ *कुशालीरामजी* को जोधपुर नरेश मानसिंह ने नीमोला ग्राम की ४५ बीघा भूमि समर्पण की थी वि. सं. १८६६ में । ठाकुर मालुम सिंह ने स्थान की सेवा के लिये कुशालीरामजी को वि. सं. १८६० व १८६९ में दो बार भूमि दी थी और चार आने प्रति-दिन के हिसाब से रैंण के जागीरदार स्थान सेवा दादूजी की सेवार्थ देते थे । प्रति गाड़ी अन्न की जो बिक्री के लिये आती थी उससे ६ छटाँक अन्न दादू द्वारे को दिया जाता था । और प्रति हलवाला प्रतिवर्ष एक धड़ी अन्न की सेवा दादूद्वारे की करता था ।
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७~ *नानकदासजी* वि. सं. २००१ मार्गशीर्ष पूर्णिमा से स्थान की सेवा कर रहे हैं । चार ग्रामों की~ १- बछवास, २- नीमोला, ३- खारिया, ४- जाबली की तथा रैंण के जागीरदार की दी हुई भूमि लोगों ने दबाली थी । नानकदासजी ने अति परिचय कर उक्त पांचों ही ग्रामों की भूमि को पुनः स्थान के नीचे लगाने का श्लाघनीय कार्य किया था । रैंण की भूमि रैंण के जागीरदार ने, खारिया की खारिये के दोनों जागीरदारों ने, जाबली की भूमि जोधपुर नरेश ने दी थी । पालीवाल भक्त पाली से संतों को यहां लाये थे और अभी तक पालीवाल भक्त स्थान की सेवा करते हैं ।
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*कुशालीरामजी* ने जोधपुर नरेश के सिंगी मंत्री का अदीठ मिटाया था इससे जोधपुर नरेश ने भूमि दी थी और रैंण का स्थान भी बनवाया था । रैंण स्थान की शाखा रूप स्थान~ १~ बछवास, २~ नीमोला, ३~खारिया, ४~जावली, ५~डावराणी है । नानकदासजी ने स्टेशन व कुचेरा रोड़ पर स्कूल के पास धर्मार्थ प्याऊ भी बनाई है और उसे सदा चलाते हैं । अन्यान्य धर्म कार्यों में व साधु सेवा में अग्रसर रहते हैं । अच्छे संत हैं ।
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*बूड़सू स्थान* ~ आचार्य चैनरामजी महाराज की शिष्य परंपरा बूड़सू(मारवाड़) अच्छा स्थान था । किन्तु न तो इसकी प्रणाली ज्ञात हो सकी है तथा यह स्थान भी समाप्त हो गया है ।
*खन्डेल स्थान* ~ आचार्य चैनरामजी की शिष्य परंपरा का स्थान खंडेल था । यह स्थान फुलेरा की शाखा रूप था । इसके अधिष्ठाता धनीरामजी थे । वर्तमान में कौन है कोई है या नहीं है निश्चय नहीं हो सका ।
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*तिलोनिया स्थान* ~ तिलोनिया स्थान नारायणा चैनरामजी महाराज के शिष्य परंपरा के स्थान का शाखा रूप था इसकी पूर्ण प्रणाली अज्ञात है । जो ज्ञात हो सकी है सो यह है १~ मगनीरामजी २~ सम्पतरामजी ३~ लक्ष्मणदासजी । आगे समाप्त है ।
*मन्डावरिया स्थान* ~ यह स्थान तिलोनिया स्टेशन से पश्चिम की ओर है किन्तु अब उसमें साधु नहीं है । राजकीय स्कूल है । इसमें पहले लक्ष्मणदासजी वैद्य थे । *झीटिया स्थान* ~ झिटिया मारवाड़ में है । यहां का स्थान आचार्य चैनरामजी महाराज की शिष्य परंपरा का ही था । पहले इसमें चन्दनदासजी थे । अब कोई नहीं है ।
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*राजगढ़ का स्थान* ~ राजगढ़(अलवर) के स्थान की प्रणाली ज्ञात नहीं हो सकी । अब स्थान तो है किन्तु साधु नहीं है । यह स्थान आचार्य निर्भयरामजी महाराज के समय में बना था । यह प्रतिष्ठित स्थान था । राजगढ़ दादूद्वारे के भंडारी सदाव्रत का कार्य करने वाले भंडारी इसी स्थान के उत्तराधिकारी थे । अलवर राज्य तक इनकी पहुँच थी । अब स्थान रिक्त है ।
(क्रमशः)

*४७. अध्यातम कौ अंग १३/१६*

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*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
*श्रद्धेय श्री Tapasvi @Ram Gopal Das की प्रेरणा से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Meta AI*
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*४७. अध्यातम कौ अंग १३/१६*
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सबद सुन्नि ही मांही समावै, अंतरगति धुनि एह ।
कहि जगजीवन च्यार  मातरा, अहंकार नहिं देह ॥१३॥
वह सच्चा शब्द बाहर नहीं, भीतर के शून्य में समाया हुआ है । जब ध्यान अंदर जाता है तो एक दिव्य धुन सुनाई देती है । संत जगजीवनदास जी कहते हैं - इसे ही चार मात्रा वाला शब्द कहते हैं । जो इसे सुन लेता है, उसकी देह में अहंकार नहीं रहता ।
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परसन परसै आंन अंग, परसै हरि रस प्यास ।
कहि जगजीवन पंच मातरा, तीन पच्चीस निवास ॥१४॥
स्पर्श इन्द्री से दूसरे अंगों का स्पर्श होता है, पर भक्त तो हरि-रस की प्यास का ही स्पर्श करता है । संत जगजीवनदास जी कहते हैं - यही पाँच मात्रा वाला मंत्र है । इसका वास तीन गुण और पच्चीस प्रकृतियों से परे है ।
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रूपद्रिष्टि, रस रसन हरि, गंध नासिका बास ।
इंद्री अपरस सबद थिति, सु कहि जगजीवनदास ॥१५॥
आँखों से हरि का रूप देखना, जीभ से हरि के नाम का रस लेना, नाक से उसी की सुगंध में बसना । संत जगजीवनदास जी कहते हैं - जब पाँचों इन्द्रियाँ संसार से अछूती होकर उस शब्द में टिक जाती हैं, तभी सच्ची भक्ति बनती है ।
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पंच मातरा बांचिये, एकै अक्षर लाइ ।
कहि जगजीवन समझि करि, गोबिंद के गुण गाइ ॥१६॥ 
उस पाँच मात्रा वाले मंत्र को एक अक्षर - ‘सत्’ में मन लगाकर जपो । संत जगजीवनदास जी कहते हैं - इसे समझ कर गोविंद के गुण गाओ, यही सार है ।
(क्रमशः)  

बुधवार, 2 सितंबर 2026

*मेड़ता स्थान*

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*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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*ना हम छाड़ैं ना गहैं, ऐसा ज्ञान विचार ।*
*मध्य भाव सेवैं सदा, दादू मुक्ति द्वार ॥*
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*मेड़ता स्थान*
आचार्य चैनरामजी महाराज के शिष्य परंपरा के मेड़ता स्थान की पूर्व की प्रणाली ज्ञात न होने से नारायणदास वैद्य(वि. सं. १९९७) २~जोहरादासजी वर्तमान हैं । यह स्थान घोसी वाड़ा में था । चिकित्सा के कारण प्रसिद्ध भी था किन्तु अब बिक चुका है । कृष्णदेवजी महाराज की छत्री के पास अनेक संतों के चरण हैं किन्तु ज्ञात नहीं हैं कि वे चैनराम महाराज की शिष्य परंपरा के हैं या नहीं हैं किन्तु चैनरामजी महाराज के पीछे के ही हैं ।
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एक छोटी छत्री जो भण्डार के पास है, उसमें बाईजी रामकुमारीजी के चरण हैं । इसमें वि. सं. १८५५ बदि १४ बुधवार लिखा है~ यह संत सोनारामजी की शिष्या थी । पास की तलाई को डोकरी तलाई भी कहते हैं और वह बाई रामकुमारीजी की बनवाई हुई है, ऐसा सुनते हैं । छत्री में शिला लेख~ दोहा-
“सतगुरु सोनारामजी, नृमल सुनायो नाम ।
लाहो हरि बाई लियो, रामकुवरि भजराम ॥
अष्टादस सौ चौवने, बदि फागुण बुधवार ।
दिन चौदश बाई भया, राम कुवरि भो पार ॥१॥
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यह छत्री आज इस वर्ष वि. सं. २०३२ में १७७ वर्ष पूर्व की है । हो सकता है सोनारामजी चैनरामजी की शिष्य परंपरा के ही हों । एक लम्बे चबूतरे पर भी १८७६ में सुन्दरदासजी के, सं. १८८० में पं. रामदासजी के । सं. १८४६ में श्रीनाथजी के । सं. १८९२ में अमरदासजी के । इत्यादिक चरण हैं किन्तु निश्चय पता नहीं कि ये सब चैनरामजी की शिष्य परंपरा के हैं । चैनरामजी महाराज के ब्रह्मलीन होने के पीछे के हैं और कृष्णदेवजी महाराज के छत्री के पास हैं । अतः उनका यहां संकेत कर दिया है ।
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*फुलेरा स्थान*
फुलेरा में आचार्य चैनरामजी महाराज की शिष्य परंपरा का स्थान था । फुलेरा शहर से उत्तर की ओर नागों की छावणी के पास था । अच्छा प्रतिष्ठित स्थान था । कुवा व कृषि योग्य भूमि भी थी । इस स्थान के दो संतों का ही परिचय प्राप्त होता है~ १- उदयरामजी २- मोहनदासजी । अब स्थान समाप्त है ।
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*रैंण स्थान*
आचार्य चैनरामजी की परंपरा का स्थान रैंण में दादूद्वारा है । इसमें एक~कुशालीरामजी महान् संत हुये हैं । उनके दो शिष्य थे, वीररामजी और चैनरामजी । चैनराजी आचार्य कृष्णदेवजी की सेवा में रहते थे । इससे उनके कृपापात्र हो गये और आगे नारायणा दादूधाम के आचार्य बन गये थे । वीरमदासजी रैंण दादूद्वारा में रहे । २-वीरमदासजी, ३-लालदासजी, ४-बोदूरामजी, ५-रघुनाथदासजी, ६-रामचन्द्रदासजी, ७-नानकदासजी वर्तमान हैं । यह स्थान रैंण के तालाब के पश्चिम तट और ग्राम के दक्षिणी छोर पर है ।
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रघुनाथदासजी तक स्थान ठीक चला । बीच में शिथिलता आ गई थी किन्तु नानकदासजी ने इसे पुनः ठीक स्थिति पर पहुँचाया है । पहले कच्चा स्थान था । नानकदासजी ने पक्का दादू मंदिर बना दिया है । नानकदासजी स्थान की अच्छी सेवा कर रहे हैं । आगत अतिथियों व संतोंकी भी अच्छी सेवा करते हैं । उन्होंने स्थान की प्रतिष्ठा बढ़ाई है ।
(क्रमशः)

*४७. अध्यातम कौ अंग ९/१२*

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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
*श्रद्धेय श्री Tapasvi @Ram Gopal Das की प्रेरणा से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Meta AI*
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*४७. अध्यातम कौ अंग ९/१२*
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सदा सुखी नर संजमी, नित उठ साधै जोग ।
जगजीवन भगवंत भजि, भूलै षटरस भोग* ॥९॥
जो संयमी पुरुष नित्य उठकर योग साधता है, वह सदा सुखी रहता है । संत जगजीवनदास जी कहते हैं, भगवान के भजन में ऐसा आनंद है कि छहों रसों के सांसारिक भोग फीके लगने लगते हैं ।
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रूपद्रिष्टि* आगै सुरति, ता मैं बसै अनूप ।
कहि जगजीवन एक मातरा, मिलि रहै साध सरूप ॥१०॥
(*-*. १० से १६ तक की साषियों में सांख्य दर्शन के अनुसार पच्च तन्मात्राओं का वर्णन है) हैं । [१. रूप तन्मात्रा] आँख के सामने सुरति टिकाने से उसमें अनुपम परमात्मा का वास दिखता है । एक मात्रा सिद्ध होने पर साधक साधु-स्वरूप में मिल जाता है ।  
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रस रसनां हरि रस पीवै, आंनि बिषै रस त्यागि१० ॥
कहि जगजीवन हरिजन हरि सौं, दोइ मातरा लागि ॥११॥
(१०. आंनि विषै रस त्यागि=अन्य सांसारिक विषय भोगों का परिणाम) 
[२. रस तन्मात्रा] जीभ से दूसरे विषय-भोगों के रस को छोड़कर हरि-रस पीना । दो मात्रा लगने पर हरि का जन हरि से एक हो जाता है ।
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गंध सुगंध निवास हरि, अगम बांसना जांनि ।
कहि जगजीवन तीन मातरा, आगै तत्त पिछांनि ॥१२॥ 
[३. गंध तन्मात्रा] हरि का निवास दिव्य सुगंध में है, उस अगम सुगंध को पहचानो । तीन मात्रा पूरी होने पर साधक आगे के तत्व को पहचानने लगता है ।
(क्रमशः)