शुक्रवार, 6 नवंबर 2026

*अविचल मंत्र*


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🌷*卐 श्री दादूदयालवे नम: 卐*🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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*दादू वाणी ब्रह्म की, अनभै घट प्रकाश ।*
*राम अकेला रह गया, शब्द निरंजन पास ॥*
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*दादू वट दर्शन*
ब्रह्म भजन करते हुये जग्गाजी मोरड़ा जा पहुंचे । ग्राम के लोगों से पूछा — दादूजी महाराज ने जिस वट वृक्ष को हरा किया था वह कहां है ? तब एक मानव जग्गाजी को साथ लेकर तालाब पर आया और तालाब की पाल पर एक विशाल वट का वृक्ष दिखाते हुये कहा — इसी बड़ को दादूजी महाराज ने हरा किया था । जग्गाजी ने उस वट वृक्ष के अति श्रद्धा से परिक्रमा दी तथा दंडवत की और उसके नीचे ही ब्रह्म भजन करने लगे । एक रात्रि वट वृक्ष के नीचे ही ब्रह्म भजन किया । फिर दूसरे दिन गुरुदेवजी के दर्शन करने सांभर नगर को चल दिये । सांभर में दादूजी के पास पहुँचकर गुरुजी को दंडवत करके तथा हाथ जोड़कर सामने बैठ गये ।
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*अविचल मंत्र*
दादूजी महाराज ने पूछा — भ्रमण कर आये ? जग्गाजी — जी हां । दादूजी — कहां-कहां गये ? जग्गाजी — यहां से करड़ाला और वहां से सलेमाबाद में जाकर परशुरामजी का दर्शन भी कर आया । फिर सलेमाबाद की सब घटना सुनाई और कहा — परशुरामजी ने मुझे गुरु मंत्र पूछा था । उन्होंने कहा था - तुम्हारे गुरुजी ने तुमको गुरुमंत्र क्या दिया है ? मैंने कहा — 'सत्यराम' बताया है तब उन्होंने कहा — सत्यराम' तो शिरोमणि मंत्र है ही किन्तु दादूजी का तो संप्रदाय चलेगा । अतः साम्प्रदायिक मंत्र तो कोई भिन्न ही होना चाहिये । अतः आप हम लोगों के लिये एक गुरु मंत्र तो निश्चित कर ही दें ।
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तब दादूजी ने कहा — अच्छा फिर ऐसी बात है तो लो सुनो । इतना कहकर दादूजी महाराज ने निम्न मंत्र सुनाया —
"दादू अविचल¹ मंत्र, अमर² मंत्र, अखंड³ मंत्र, अभय⁴ मंत्र, राम⁵ मंत्र, निजसार⁶ ।
सजीवन⁷ मंत्र, सवीरज⁸ मंत्र, सुन्दर⁹ मंत्र, शिरोमणि¹⁰ मंत्र, निर्मल¹¹ मंत्र, निराकार¹² ॥
अलख¹³ मंत्र, अकल¹⁴ मंत्र, अगाध¹⁵ मंत्र, अपार¹⁶ मंत्र, अनन्त¹⁷ मंत्र, राया¹⁸ ।
नूर¹⁹ मंत्र, तेज²⁰ मंत्र, ज्योति²¹ मंत्र, प्रकाश²² मंत्र, परम²³ मंत्र, पाया²⁴ ॥
उपदेश दीक्षा(दादू गुरु राया) ।
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*मंत्रार्थ* — *१-दादू*-दा = ज्ञान, भक्ति आदि दैवी गुणों के प्रदाता, दू = अज्ञानादि सभी दोषों के नाशक अविचल मंत्र = क्रिया रहित परब्रह्म तत्त्व । मंत्र = गुप्त भाषण करने योग्य । उत्तम जिज्ञासुओं को ही अविचल ब्रह्म का उपदेश किया जाता है । जो साधक अविचल-अविचल जपता है, वह अविचल ब्रह्म स्वरूप को ही प्राप्त होता है ।

*२-अमर मंत्र* = सभी संसार मरण शील है किन्तु इसमें गुप्त रूप से स्थित परब्रह्म मृत्यु आदि का भी शासक और अमर है । जो साधक अमर अमर जपता है, वह भी अमर ब्रह्म को प्राप्त होता है ।

*३-अखंड मंत्र* = ब्रह्म कभी भी क्षीण नहीं होता सदा अक्षय एक रस रहता है । इस लिये अखंड (अक्षय) है । इसे जपने से अक्षय ब्रह्म को प्राप्त हो जाता है ।

*४-अभय मंत्र* = सभी प्रकार के भय से रहित होने से ब्रह्म अभय है । इसे जपने से निर्भय ब्रह्म को ही प्राप्त होता है ।

*५-राम मंत्र* = दूध में घृत के समान संसार के प्रत्येक अणु में रमा हुआ होने से ब्रह्म राम है । जो राम-राम जपता है, वह भी रमने वाला राम ही हो जाता है ।

*६-निजसार* = निज स्वरूप और विश्व का सार तत्त्व होने से ब्रह्म निजसार है । जो निजसार मंत्र को जपता है, वह निज स्वरूप ब्रह्म को प्राप्त होकर विश्व का सार हो जाता है ।

*७-सजीवन मंत्र* = सदा जीवित रहने से ब्रह्म सजीवन है । जो इसे जपता है, वह भी सजीवन ब्रह्म को प्राप्त होता है ।

*८-सवीरज मंत्र* = निर-तिशय बल वाला होने से ब्रह्म सवीर्य है जो इसे जपता है वह भी निर-तिशय बल वाले ब्रह्म स्वरूप को ही पाता है ।

*९-सुन्दर मंत्र* = जिस सुन्दरता से असुन्दर शरीर भी सुन्दर भासते हैं । वह ब्रह्म ही सुन्दर है । इसे जपने वाला भी सुन्दर ब्रह्म को प्राप्त होता है ।

*१०-शिरोमणि मंत्र* = सर्वोपरि होने से ब्रह्म शिरोमणि है । जो शिरोमणि शिरोमणि जपता है वह भी शिरोमणि ब्रह्म ही हो जाता है ।

*११-निर्मल मंत्र* = अविद्यादि मल रहित होने से ब्रह्म निर्मल है । जो इसको जपता है, वह भी निर्मल ब्रह्म रूप ही हो जाता है ।

*१२-निराकार* = आकार रहित होने से ब्रह्म निराकार है । इसका जप करने वाला निराकार ब्रह्म ही हो जाता है ।

*१३-अलख मंत्र* = इन्द्रियों का अविषय होने से ब्रह्म अलख है । जो इसे जपता है, वह अलख ब्रह्म ही हो जाता है ।

*१४-अकल मंत्र* = सभी प्रकार की कलाओं से रहित होने से ब्रह्म अकल है । जो इसे जपता है, वह भी अकल ब्रह्म रूप को ही प्राप्त होता है ।

*१५-अगाध मंत्र* = शास्त्र संतों द्वारा भी थाह न पाने से ब्रह्म अगाध है । जो इस अगाध मंत्र को जपता है, वह अगाध ब्रह्म को ही प्राप्त होता है ।

*१६-अपार मंत्र* = किसी भी प्रकार ब्रह्म का पार नहीं आता है, अतः वह ब्रह्म अपार है । जो अपार मंत्र को जपता है, वह अपार ब्रह्म ही हो जाता है ।

*१७-अनन्त मंत्र* = उत्पत्ति नाशादिक से रहित होने से ब्रह्म अनन्त है । अनन्त मंत्र का जापक भी अनन्त ब्रह्म को ही प्राप्त होता है ।

*१८-राया*= सब का स्वामी होने से ब्रह्म राजा है । जो राया मंत्र का जाप करता है, वह विश्व के राजा ब्रह्म को ही प्राप्त होता है ।

*१९-नूर मंत्र* = ब्रह्म आत्म स्वरूप होने से नूर है । जो नूर मंत्र का जाप करता है, वह आत्म स्वरूप को प्राप्त करता है ।

*२०-तेज मंत्र* = निरतिशय प्रभाव सम्पन्न होने से ब्रह्म तेज रूप है । जो तेज मंत्र का जप करता है, वह भी निरतिशय प्रभाव रूप ब्रह्म को प्राप्त करता है ।

*२१-ज्योति मंत्र* = सूर्यादि ज्योतियों को भी ज्योति प्रदाता होने से ब्रह्म ज्योति स्वरूप है । ज्योति मंत्र का जापक भी ज्योति स्वरूप ब्रह्म को प्राप्त होता है ।

*२२-प्रकाश मंत्र* = ज्ञान रूप होने से ब्रह्म प्रकाश रूप है । प्रकाश मंत्र का जापक प्रकाश रूप ब्रह्म को प्राप्त होता है ।

*२३-परम मंत्र* = सबसे उत्कृष्ट होने से ब्रह्म परम है । जो परम मंत्र का जाप करता है, वह भी सबसे उत्कृष्ट ब्रह्म को प्राप्त करता है ।

*२४-पाया* = सर्व व्यापक और आत्म स्वरूप होने से ब्रह्म साधकों को सभी स्थानों में प्राप्त हुआ है, अतः ब्रह्म आत्म स्वरूप से पाया हुआ ही है । जो पाया मंत्र का जाप करता है, वह भी उस ब्रह्म को आत्म स्वरूप से प्राप्त कर लेता है ।

इस प्रकार जो साधक गुरु से प्राप्त उपदेश द्वारा जिस भाव से ब्रह्म को जपता है, उसी भाव से उसे प्राप्त हो जाता है ।

*उपदेश दीक्षा(दादू गुरु राया)* = उत्तम गुरु का दीक्षा रूप उपदेश ऐसा ही होता है । 
(क्रमशः)

*५०. चाणेक कौ अंग ५/८*

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*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
*श्रद्धेय श्री Tapasvi @Ram Gopal Das की प्रेरणा से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Meta AI*
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*५०. चाणेक कौ अंग ५/८*
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*हरि थैं बिमुख सरीर सौं, कहो प्रभु को नहिं नांम ।*
*कहि जगजीवन मिल रहै, सो मति१ दीजै रांम ॥५॥*
{१. मति=नहीं(निषेध)}
इस साखी में संत जगजीवन जी महाराज भगवान् से एक बहुत ही मार्मिक प्रार्थना कर रहे हैं । वे कहते हैं, जो शरीर हरि से बिमुख है, अर्थात् जिसने भगवान् से मुख मोड़ लिया है और जो प्रभु का नाम तक नहीं कहता, ऐसे शरीर धारी जीव से हे प्रभु, मुझे कभी मिलना न पड़े । जगजीवन जी कहते हैं, हे राम, ऐसी मति अर्थात् ऐसी संगति मुझे मत दीजिये । भाव यह है कि भजनहीन व्यक्ति की संगति भी हमारे भजन को नष्ट कर देती है, इसलिए संत सदा यही मांगते हैं कि हमें कुसंग से बचाये रखना ।

*कहि जगजीवन रांम तजै रस, मन सुभाव तन जाइ ।*
*आंख सदा फल पर रहै, ऊँट कटेरा२ खाइ ॥६॥*
(२. कटेरा=ऊँट की फल खाने की इच्छा कितनी ही प्रबल क्यों न हो, परन्तु वह स्वभाववश काँटे ही खाता है) 
यहाँ महाराज जी जीव के स्वभाव की एक अद्भुत उपमा देते हैं । वे कहते हैं, जीव राम रूपी रस को तज देता है, अर्थात् भगवान् के प्रेम के मीठे रस को छोड़ देता है, और मन के सुभाव से तन इधर-उधर भटक जाता है । इसकी दशा उस ऊँट जैसी है, जिसकी आंख सदा आकाश में लगे मीठे फल पर रहती है, परन्तु स्वभाववश वह नीचे पड़े हुए कटेरा अर्थात् काँटे ही खाता रहता है । इसी प्रकार जीव चाह तो अमृत फल रूपी राम प्रेम को रहा है, परन्तु आदत के कारण विषयों के काँटे ही खाता रहता है । फल की इच्छा रखते हुए भी काँटा खाने का स्वभाव नहीं छूटता, यही जीव की सबसे बड़ी विडम्बना है ।
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*कहि जगजीवन रांमजी, सठ हठ मठ मंहि मार ।*
*आदि अलख भरतार तजि, जार करै विभिचार३ ॥७॥*
{३. विभिचार=व्यभिचार(सम्भोग)}
इस साखी में बहुत कठोर शब्दों में जीव की मूर्खता पर चोट की गई है । सठ अर्थात् शठ, मूर्ख जीव, हठ करके मठ में ही अपनी शक्ति को मार रहा है, अर्थात् हठयोग आदि बाहरी साधनों में शरीर को कष्ट दे रहा है । परन्तु आदि अलख भरतार अर्थात् सबके आदि पति, अलख अविनाशी परमात्मा को तज कर, वह जार से व्यभिचार कर रहा है । यहाँ जार का अर्थ है माया रूपी विषय । जैसे कोई स्त्री अपने सच्चे पति को छोड़कर जार पुरुष के संग व्यभिचार करे, वैसे ही जीव अपने सच्चे स्वामी राम को छोड़कर विषय रूपी जार के साथ रमण कर रहा है । यह आध्यात्मिक व्यभिचार है, जो जीव को नीचे गिरा देता है ।
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*कहि जगजीवन रांमजी, दालिद्द४, दुख ही पाइ ।*
*प्रेम भगति रस भूल करि, बिषिया५ सौं लपटाइ ॥८॥*
{४. दालिद्द=दारिद्रय(निर्धनता)}   (५. बिषिया=विषय भोग) 
संत जगजीवन जी कहते हैं, हे रामजी, जो जीव प्रेम भगति के रस को भूल कर बिषिया अर्थात् विषय-भोगों से लपटाइ अर्थात् लिपट जाता है, वह दालिद्द अर्थात् दारिद्रय को ही प्राप्त होता है । यह दारिद्रय केवल पैसे का नहीं, बल्कि प्रेम का, शांति का, आनंद का दारिद्रय है । विषयों से लिपटने पर हाथ में दुःख के सिवा कुछ नहीं आता । जिस प्रकार आग से लिपटने पर जलन ही मिलती है, वैसे ही विषयों से लिपटने पर जीव को दुःख और दरिद्रता ही मिलती है, और वह सच्चे धन रूपी प्रेम भक्ति से वंचित रह जाता है ।
(क्रमशः)

गुरुवार, 5 नवंबर 2026

कुत्ते के रूप में

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🌷*卐 श्री दादूदयालवे नम: 卐*🌷
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*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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*दादू माला तिलक सौं कुछ नहीं, काहू सेती काम ।*
*अन्तर मेरे एक है, अहनिशि उसका नाम ॥*
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परशुरामजी ने जब जाना कि ये दादूजी के शिष्य हैं, तब पुजारी को बुलवाकर उसे कहा — अभी जो भगवान् के जलेबियों का भोग लगाया था उसमें से एक व्यक्ति की खुराक जितना प्रसाद ला दो । पुजारी ने तत्काल ला दिया । तब परशुरामजी महाराज ने कहा — संतजी ! अभी पंक्ति में देर है, अतः यह प्रसाद पालो । जग्गाजी ने परशुरामजी की आज्ञा मानकर वह प्रसाद पा लिया । फिर परशुरामजी ने पूछा — संतजी ! आपके गुरुजी ने आपको क्या मंत्र दिया है ? और अपने मत का स्वरूप क्या बताया है ?
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जग्गाजी ने कहा — हमारे गुरुजी सत्यराम बोलते हैं और निरंतर जप करने के लिये ‘राम’ मंत्र बताते हैं । जप की विधि इस प्रकार बताते हैं —
“मन मनका कर इवासा धागा, सुरति निरति से पोय सभागा ।
त्रिपुटी स्थिर कर ध्यान बताया, अजपा जाप इसी विधि गाया ॥
हो निर्वैर विकार विहावे, झूठ कपट निन्दा नहिं भावे ॥”
‘आत्माराम अविनाशी कृत “दादूचतुर्युगलीला” ग्रंथ के कलियुग लीला दशम प्रभाव के जग्गाजी के उक्त वचन सुनकर परशुरामजी प्रसन्न हुये किन्तु फिर बोले — ‘सत्यराम’ तो शिरोमणि मंत्र है ही किन्तु दादूजी का मत भी कुछ विलक्षणता रखता है और मुझे अपनी साधन शक्ति से ज्ञात होता है कि दादूजी का शिष्य समुदाय बहुत बढ़ेगा और वह एक संप्रदाय का रूप धारण कर लेगा । इससे उसका कोई भिन्न मंत्र भी होना ही चाहिये ।
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तब जग्गाजी ने कहा — ये आपके वचन मैं दादूजी महाराज को कहूँगा, फिर वे कोई भिन्न मंत्र बतायेंगे तो, हम लोग उसको गुरु मंत्र कहा करेंगे । आपकी द्वितीय बात मत के स्वरूप संबंधी है, सो तो हमारे गुरुदेव संक्षेप से बताते हैं ।
आप सुनें —
“आपा मेटे हरि भजे, तन मन तजे विकार ।
निरवैरी सब जीव से, दादू यह मत सार ॥”
सर्व प्रकार के अहंकार को मिटाकर निरंतर हरि का भजन करना, शरीर तथा मन के विकारों को त्यागना, सर्व प्राणियों से निरवैर रहना अर्थात् वैर न करके सब पर दया ही करना । यही संपूर्ण धार्मिक संप्रदायों का सार तत्व है, सोई हमारा मत है । दादूजी की उक्त साखी सुनकर परशुरामजी अति प्रसन्न हुये ।
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इस प्रकार विचार करते २ पंक्ति का समय हो गया और भगवान् के भोग आ गया । भोग लग जाने पर तथा पंक्ति लगाने का संकेत होने पर परशुरामजी ने पंक्ति के प्रबन्धक को बुलवाकर कहा — ये संत दादूजी के शिष्य हैं । इनको पंक्ति में ले जाओ, इनसे भेद भाव मत रखना, अच्छी प्रकार प्रेम से जिमा देना । परशुरामजी महाराज के पास तो पंक्ति के प्रबन्धक ने कुछ नहीं कहा किन्तु उनके मन में भेद भाव ही बना रहा । वे मन में सोचने लगे — दादू तो माला, तिलक आदि वैष्णवों के कुछ भी चिन्ह नहीं रखते, न मूर्ति पूजा ही करते हैं, सबको समान ही समझते हैं । उनके शिष्य को हम पंक्ति में कैसे बैठा सकते हैं ? ठीक है महाराज ने कहा है तो भोजन करा सकते हैं ।
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वे जग्गाजी को ले गये और जहां बर्तन मांजा करते थे वहां ले जाकर कहा — यहां बैठजा । जग्गाजी तो उच्च कोटि के संत थे । उन्हें मान अपमान का तो कोई विचार नहीं था । इससे वे वहां ही बैठ गये । फिर उनको भोजन करने के लिये एक फूटी हुई हँडिया का ठीकरा दिया और भोजन भी भेद भाव रखकर ही परोसा । जब जीमने लगे तब जग्गाजी ने सोचा — स्थान, पात्र आदि सब कुत्ते के योग्य हैं । अतः मुझे कुत्ते के रूप में ही जीमना चाहिये ।
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फिर जग्गाजी तो संकल्प सिद्ध महात्मा थे, सब को कुत्ते के रूप में भासने लगे और सब पंक्ति में प्रत्येक साधु को दूसरे की थाली में कुत्ता खाता हुआ दीखने लगा । इससे सब एक साथ कहने लगे तेरी थाली में कुत्ता खाता है, तेरी थाली में कुत्ता खाता है । इस प्रकार कोलाहल होने लगा । उसको सुनकर परशुरामजी आये और बोले — क्यों इतना कोलाहल कर रहे हो ? तब प्रत्येक साधु ने कहा — उसकी थाली में कुत्ता खाता है, उसकी थाली में कुत्ता खाता है ।
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यह सुनकर परशुरामजी महाराज ने पूछा — वे दादूजी के शिष्य संत कहां हैं ? साधुओं ने कहा — वह भी नहीं हैं, उसके स्थान में एक कुत्ता खा रहा है । फिर परशुरामजी उस स्थान पर गये, वहाँ राख फैली हुई थी । वह बर्तन मांजने का स्थान था । जग्गाजी को दिये हुये ठीकरे में एक कुत्ता निडर होकर खा रहा था । उसे देखकर परशुरामजी समझ गये कि इन मूर्खों ने सन्त के साथ अनुचित व्यवहार किया है । इसी से यह लीला उन संतजी ने ही दिखायी है । कहा भी है —
पांति भेद कर संत से, होता है उपहास ।
परशुराम के जग्गा का, करत श्वान सब पास ॥३३॥ ह. त. ११
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फिर परशुरामजी उस कुत्ते की ओर मुख करके बोले — संतजी ये लोग तो मूर्ख हैं और केवल साम्प्रदायिक अभिमान से ही अन्धे हो रहे हैं । आपने इनका अभिमान नष्ट करने के लिये जो कुछ किया है सो अच्छा ही किया है किन्तु अब अपनी लीला को समेट लीजिये । इतना कहते ही जग्गाजी अपने रूप में भासने लगे । फिर तो तत्काल सब कुत्ते अन्तर्धान हो गये । यह देखकर सब लज्जा से नत मस्तक हो गये कुछ भी नहीं बोल सके । फिर परशुरामजी ने कहा — तुम लोग किसी संत को नहीं पहचान सको तो मेरे कहने पर तो मान लिया करो किन्तु अपने अभिमान में निमग्न रहने से मेरी बात भी नहीं सुनते ।
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ये परम संत दादूजी के शिष्य हैं, इसलिये सरल स्वभाव होने से यह साधारण लीला ही दिखाकर रह गये और कोई होता तो कुछ अन्य उपद्रव भी कर सकता था । फिर जग्गाजी परशुरामजी को तथा सब संतों को प्रणाम करके वहां से चले आये । यह समाचार सहसा ग्राम में भी फैल गया था । जग्गाजी जिस वैश्य के वस्त्र लाये थे, उसके पास गये तब ग्राम के नर-नारी दौड़ दौड़कर मार्ग पर जग्गाजी के दर्शन करने आ रहे थे । वैश्य के वस्त्र देकर तथा अपने वस्त्र पहन कर जग्गाजी मोरड़ा का मार्ग पूछकर मोरड़ा को चल दिये ।
(क्रमशः)

*५०. चाणेक कौ अंग १/४*

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*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
*श्रद्धेय श्री Tapasvi @Ram Gopal Das की प्रेरणा से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Meta AI*
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*५०. चाणेक कौ अंग १/४*
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*ठांम ठिकाणां बाहिरा, ठंठपाल२ किस कांम ।*
*जगजीवन ठाठा सबद, ठिक सौं कहै न रांम ॥१॥*
(१. चाणेक=चाणक्य=कोरड़ा, चाबुक)   (२. ठंठपाल=सूखी डाल और पत्तियों वाला वृक्ष=ठूंठ)   (स्थूणा)
इस साखी में संत जगजीवन जी महाराज उन लोगों के विषय में बता रहे हैं, जिनका कोई ठांम-ठिकाना नहीं है । ठांम-ठिकाना का अर्थ है, सच्चे सद्गुरु का आश्रय, संतों की संगति और भजन की दृढ़ भूमिका । जिसके जीवन में यह ठौर नहीं है, वह ठंठपाल अर्थात् ठूंठ पेड़ के समान है, जिसमें न हरियाली है, न छाया है, न फल है । जगजीवन जी कहते हैं, ऐसे लोग केवल ठाठा सबद अर्थात् दिखावे के बड़े-बड़े शब्द बोलते हैं, ज्ञान की ऊँची-ऊँची बातें करते हैं, परन्तु ठिक सौं अर्थात् सच्चे हृदय से प्रेम से राम नाम नहीं कहते । जहाँ राम नाम हृदय से नहीं है, वहाँ सारा ठाट-बाट व्यर्थ है ।
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*भीतर टोटा३ भजन का, बोलै बोल कुबोल४ ।*
*जगजीवन जिव आपणां, आप करावै मोल ॥२॥*  
{३. टोटा=घाटा(=कमी)}  (४. कुबोल=अपशब्द)
यहाँ महाराज जी कारण और कार्य का सम्बन्ध बता रहे हैं । जब भीतर भजन का टोटा है, अर्थात् हृदय में राम नाम की पूंजी की कमी है, तो बाहर वाणी में कुबोल ही निकलते हैं । भीतर की शून्यता ही बाहर अपशब्द, निन्दा, कठोरता के रूप में प्रकट होती है । भजन ही वाणी को पवित्र करता है । संत जगजीवन जी कहते हैं, ऐसा जीव अपना मोल आप ही कराता है, अर्थात् जैसा बोलेगा, वैसा ही संसार उसका मूल्य आंकेगा । मीठा बोलेगा तो आदर पायेगा, कड़वा बोलेगा तो स्वयं ही अपना अपमान करा लेगा ।
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*कहि जगजीवन रांमजी, बंबई५, साकत मुख५ ।*
*बांणी सुध६ न ऊचरै, ताथैं पावै दुख ॥३॥*  
{५-५. बंबई-बांबी(सांप का बिल)}  {साकत मुख=शाक्तमुख(दुष्ट मुख या दुर्मुख)}  {६. सुध=शुद्ध, स्पष्ट या पवित्र(शुभ)}
इस साखी में दो बहुत सुन्दर उपमायें दी गई हैं, बंबई और साकत मुख । बंबई अर्थात् सांप की बांबी, जो भीतर से विष से भरी और अंधेरी होती है । साकत मुख अर्थात् शाक्त या दुर्जन का मुख, जो सदा दूसरों को दुःख देने के लिए ही खुलता है । संत जगजीवन जी रामजी को साक्षी करके कहते हैं, जिसका मुख बांबी जैसा और दुर्जन जैसा बना हुआ है, उसके मुख से सुध बांणी अर्थात् शुद्ध, पवित्र, हितकारी वाणी कभी नहीं निकलती । उसकी वाणी में सदा दोष, छिद्र, विष ही रहता है, और उसी कारण से वह जीवन भर दुःख पाता है ।
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*काकबचन७ कायादहण८, निरमल९ बचन निवास ।*
*बिष अम्रित दोउ रसन मैं, सुकहि जगजीवनदास ॥४॥* 
(७. काकवचन=कौए के समान कठोर वाणी)  (८. कायादहण=शरीर में जलन पैदा करने वाली)   {९. निरमल=मलरहित(शुद्ध)} 
इस साखी में महाराज जी वाणी के दो रूपों का फल बता रहे हैं । काकबचन अर्थात् कौए के समान कर्कश, कड़वे वचन, ये कायादहण हैं, अर्थात् सुनने वाले के शरीर और मन में जलन पैदा कर देते हैं, जैसे आग लगा दी हो । इसके विपरीत निरमल बचन अर्थात् मलरहित, शुद्ध, मधुर, सत्य वचन, ये हृदय में निवास अर्थात् शांति का घर बना देते हैं । संत जगजीवनदास जी बहुत विचार करके, सुकहि अर्थात् अच्छी तरह विचार करके कहते हैं, देख लो, विष और अमृत दोनों इसी एक रसना अर्थात् जीभ में रखे हुए हैं । चाहो तो विष बाँटकर सबको जलाओ, चाहो तो अमृत बाँटकर सबको शीतल कर दो ।
(क्रमशः)

बुधवार, 4 नवंबर 2026

*करड़ाला यात्रा*

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🌷*卐 श्री दादूदयालवे नम: 卐*🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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*स्वांगी साधु बहु अन्तरा, जेता धरणी आकाश ।*
*साधु राता राम सौं, स्वांगी जगत की आश ॥*
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*करड़ाला यात्रा*
एक दिन सांभर में जग्गाजी ने दादूजी महाराज को प्रणाम करके प्रार्थना की — भगवन् ! मेरा मन करता है, आपकी तपो भूमि करड़ाला के तथा मोरड़ा वट वृक्ष के दर्शन कर आऊं । अतः आप मुझे जाने की आज्ञा दीजिये । दादूजी महाराज ने जग्गाजी की विशेष इच्छा देखकर आज्ञा दे दी । फिर जग्गाजी दादूजी महाराज को साष्टांग दंडवत सत्यराम करके करड़ाला के लिये प्रस्थान कर गये ।
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वे भ्रमण करते हुये करड़ाला ग्राम में पहुँचे । वहां के चारण भक्तों ने जग्गाजी को पूछा — आप कौन हैं ? और कहां से आये हैं ? जग्गाजी ने कहा — मैं संत प्रवर दादूजी महाराज का शिष्य हूँ और सांभर से दादूजी की आज्ञा लेकर ही यहां की यात्रा करने आया हूँ । मुझे आप लोग दादूजी महाराज जहां विराज कर तपस्या करते थे उस स्थान का दर्शन कराओ । दादूजी महाराज का नाम सुनकर वे लोग आनन्द में मग्न होकर बोले — बहुत अच्छा, अभी पधारिये । दादूजी महाराज की तो इस ग्राम पर बड़ी कृपा रही है ।
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फिर दो व्यक्ति जग्गाजी के साथ गये और पर्वत के मध्य भाग में एक ककेड़ा वृक्ष के पास पहुँच कर बोले — इस वृक्ष के नीचे ही दादूजी महाराज भजन करते थे । अब आस पास के ग्रामों के लोग इसको दादूजी का ककेड़ा ही बोलते हैं । फिर जग्गाजी ने दादूजी महाराज की यह साखी —
“प्रीतम के पग परसिये, मुख देखन का चाव ।
तहां ले शीश नमाइये, जहां धरे ते पाव ॥”
बोलते हुये उस स्थान को साष्टांग दंडवत किया । फिर वहां ककेड़े की छाया में कुछ देर बैठे ।
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उस समय उन करड़ाले के निवासी दोनों व्यक्तियों ने दादूजी महाराज के वहां पर निवास की चर्चा चलाई । वे कहने लगे — दादूजी महाराज संतोष की तो साक्षात् मूर्ति ही हैं । उनके समान संयम नियमादि साधन साधारण व्यक्ति से तो होने कठिन ही हैं । यहां तो वे निरंतर ब्रह्म-भजन में ही रहते थे । इत्यादिक दादूजी महाराज के साधन सम्बन्धी बहुत सी बातें कह कर कहा — अब पधारिये दर्शन हो गये हैं । फिर जग्गाजी उनके साथ नीचे ग्राम में आ गये और भोजन करके रम गये ।
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भ्रमण करते हुये सलेमाबाद के पास आ गये और किसी से पूछा — इस ग्राम का क्या नाम है ? उसने कहा — सलेमाबाद है किन्तु आजकल इसको परशुराम पुरी भी कहते हैं । यहां निम्बार्क संप्रदाय के आचार्य परशुरामजी महाराज विराजते हैं । तब जग्गाजी ने अपने मन में सोचा पास ही आ गया हूँ, अब तो परशुरामजी महाराज का दर्शन करके ही आगे चलूंगा ।
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*परशुरामजी के दर्शन*
फिर वे परशुरामजी के स्थान पर गये किन्तु उनके द्वार पर स्थित लोगों ने उनको भीतर नहीं जाने दिया । जग्गाजी समझ गये कि इन्होंने मुझे कंगाल समझ कर रोक दिया है । फिर वे ग्राम में एक वैश्य की दुकान पर गये । वैश्य से वार्तालाप होने से इनको दादूजी का शिष्य जानकर उसने इनसे बहुत प्रेम किया और बोला — सेवा की आज्ञा दीजिये । जो भी आपकी आज्ञा होगी उसे पालन किया जायगा, लेश मात्र भी संकोच नहीं कीजिये । तब जग्गाजी ने कहा — कुछ समय के लिये आप अपने पहनने के वस्त्र मुझे दे दीजिये । मेरे वस्त्र यहां रखकर तथा आपके पहनकर मैं परशुरामजी के दर्शन करके आ जाऊंगा तब आपके वस्त्र आपको देकर मेरे वस्त्र पहन लूंगा ।
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अधिक श्रद्धा के कारण उस वैश्य ने अन्य कुछ भी न पूछ कर तत्काल अपने वस्त्र जग्गाजी को दे दिये । फिर अपने वस्त्र उतार के सेठ का भेष बनाकर जग्गाजी चले । मार्ग में ऊंट के मेंगने पड़े थे, उनमें से लगभग पांच सेर मेंगने अपने कंधे पर रखे हुये वस्त्र में बांध कर उसको हाथ में लटका लिया । फिर परशुरामजी के द्वार पर आये तब उनके हाथ में मेंगनों की गठड़ी लटकती हुई देखकर द्वार पर स्थित लोगों ने सोचा कोई बड़ा सेठ है । हाथ में प्रसाद की गठड़ी भी है, हमें भी प्रसाद मिलेगा तथा महाराज को भी अच्छी भेंट चढ़ायेगा । ऐसा सोचकर तत्काल दो तीन व्यक्ति उठकर सामने आये और बोले — आइये सेठ साहब ! हम आपको महन्त महाराज के पास ले चलते हैं ।
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फिर वे सेठ भेषधारी जग्गाजी को परशुरामजी महाराज के पास ले गये । परशुरामजी के पास जाकर जग्गाजी ने मेंगनों की गठड़ी एक ओर रखकर पहले मेंगनों की गठड़ी को साष्टांग दंडवत प्रणाम किया । फिर वह गठड़ी परशुरामजी के चरणों में रखकर परशुरामजी महाराज को दंडवत करके सामने बैठ गये । इनका यह विचित्र व्यवहार देखकर परशुरामजी महाराज ने सोचा — इसमें कोई रहस्य अवश्य है । परशुरामजी ने पूछा — आप कौन है ? कहां से आये हैं ? और इन मेंगनों की गठड़ी को प्रथम दंडवत करने का क्या रहस्य है ? मेरे पास आप किस लिये आये हैं ?
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*परशुरामजी के प्रश्नों के उत्तर*
परशुरामजी महाराज के उक्त चार प्रश्न सुनकर परम सिद्ध जग्गाजी बोले — भगवन् ! मैं संत प्रवर दादूजी का शिष्य हूँ, जग्गाजी मेरे इस शरीर का नाम है । इस समय मैं दादूजी महाराज की तपोभूमि करड़ाला की यात्रा करके इधर आ रहा हूँ । आपके धाम के पास आकर मैंने पूछा — इस ग्राम का क्या नाम है ? तब उत्तर मिला यह परशुरामपुरी है । यह सुनकर मेरी प्रबल इच्छा हुई कि परशुरामजी महाराज का दर्शन करके ही आगे चलूंगा किन्तु आपके द्वार पर स्थित लोगों ने मुझे दरिद्री जानकर भीतर नहीं आने दिया ।
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तब मैंने सोचा — परशुरामजी महाराज के दर्शन अवश्य करने हैं । अतः कोई उपाय करना ही होगा । फिर मैं एक वैश्य के पास से जो मैंने पहन रखे हैं, ये वस्त्र मांग लाया और मार्ग में पड़े हुये मेंगने द्वार पर स्थित लोगों को यह दिखाने के लिये कि — सेठजी प्रसाद लाये हैं हमें भी मिलेगा, बांध लाया । मेंगनों की गठड़ी को प्रथम दंडवत करने का रहस्य यही है कि — इनकी कृपा से ही आपके दर्शन हो सके हैं । अतः इनका उपकार मान कर प्रथम दंडवत इनको किया है । आपके पास आपके दर्शन करने ही आया हूँ । इतना कह कर जग्गाजी मौन हो गये ।
(क्रमशः)

*४९. भ्रम विधवंस कौ अंग ८५/८७*

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*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
*श्रद्धेय श्री Tapasvi @Ram Gopal Das की प्रेरणा से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Meta AI*
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*४९. भ्रम विधवंस कौ अंग ८५/८७*
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*कहि जगजीवन निरजला, बरष दिवस मंहि एक ।*
*हरि के कारण हरि भगति, अैसी करैं अनेक ॥८५॥*
संत जगजीवन साहेब कहते हैं, सच्चा निर्जला तो वर्ष में एक दिन नहीं, प्रतिदिन है । हरि के कारण, हरि की भक्ति के लिए भक्त ऐसी अनेक साधनाएं करते हैं । अर्थात निर्जला केवल एकादशी का व्रत नहीं, हर दिन मन को विषय-जल से निर्जल रखना ही सच्ची हरि भक्ति है ।
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*कहि* जगजीवन दार कौ, ब्रिषभ न खैंचे भार* ।*
*रांम सुमीर जन ऊधरै, जगजीवन बिसतार ॥८६॥*
(*-*. काष्ठनिर्मित बैल गाड़ी को कभी नहीं खींच सकता)
आपने बहुत सुंदर टिप्पणी की है, काठ से बना बैल कभी गाड़ी का भार नहीं खींच सकता । वैसे ही केवल बाहरी जड़ साधनों से भवसागर पार नहीं होता । संत जगजीवन दास जी विस्तार से कहते हैं, राम को सुमिर कर ही जन का उद्धार होता है । सजीव राम नाम ही गाड़ी खींचेगा, निर्जीव साधन नहीं ।
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*कहि* जगजीवन अस्म को, अस्व कोय घडि घात ।*
*अराभष बाजी अलाप धी, हरि बिन कटै न बाट* ॥८७॥*
{*-*. पत्थर के बने घोड़े से कोई मूर्ख(=अल्पधी) ही यात्रा करने की सोच सकता है}
जैसा आपने लिखा, पत्थर के बने घोड़े से कोई मूर्ख ही यात्रा करने की सोचेगा । वैसे ही हरि बिना यह जीवन की बाट, यह रास्ता कटने वाला नहीं है । संत जगजीवन साहेब कहते हैं, जो अल्प बुद्धि वाले हैं, वे नश्वर साधनों को, पत्थर के घोड़े को ही सच्चा मान बैठते हैं और हरि नाम रूपी सजीव घोड़े को भूल जाते हैं ।
॥ इति भ्रम विध्वंस कौ अंग संपूर्ण ॥
(क्रमशः)

मंगलवार, 3 नवंबर 2026

*३१. साधु संगति परम लाभ का अंग ~२९/३२*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*३१. साधु संगति परम लाभ का अंग ~२९/३२*
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*रज्जब अज्जब काम है, साधु जन संसार ।*
*जिन मिलते मोहन मिलैं, प्राणपुरुष ह्वै पार ॥२९॥*
संसार में संत जनों का कार्य अद्भुत देखा जाता है, जिसके संग से प्राणधारी पुरुष संसार-सागर से पार होकर विश्व-विमोहन ब्रह्म में ही मिल जाता है ।
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*रज्जब अज्जब रूप, साधु जन संसार मधि१ ।*
*जेहिं मिल मिलहिं अनूप, सकल बोल कारज सिधि२ ॥३०॥*
संसार में१ संत जनों का स्वरूप अद्भुत है, उनके सभी वचन जीव के कार्य को सिद्ध२ करने वाले होते हैं और जिनके सङ्ग से उपमा रहित परमात्मा भी मिल जाते हैं ।
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*असंख्य१ लोक आतम फिरे, तो भी साधु न होय ।*
*जन रज्जब सत्सङ्ग बिन, सीझया२ सुन्या न कोय ॥३१॥*
जीवात्मा अनन्त१ लोकों में फिर आवे, तो भी साधु नहीं हो सकता, संसार में सत्सङ्ग के बिना कोई भी ज्ञानी२ हुआ हो ऐसा नहीं सुनने में आता ।
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*भाव भक्ति सत जत जुदे, अंग१ न आवहिं अंग२ ।*
*रज्जब रीती३ आतमा, एक बिना सत्संग ॥३२॥*
भाव, भक्ति, सत्य भाषण, ब्रह्मचर्य आदि भिन्न भिन्न साधन करने से प्रिय१तम ब्रह्म अभेद रूप से अपने शरीर२ में नहीं आता अर्थात आत्मा और ब्रह्म की एकता का ज्ञान नहीं होता । वह तो सत्सङ्ग से ही होता है । अत: सत्सङ्ग के बिना जीवात्मा आत्म-ज्ञान रहित होने से खाली३ ही माना जाता है ।
(क्रमशः)

*३१. साधु संगति परम लाभ का अंग ~२५/२८*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*३१. साधु संगति परम लाभ का अंग ~२५/२८*
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*परम पुरुष पारस परसि, साधु सोना होय ।*
*तो रज्जब सत्संग सौं, मिलत न वरजो कोय ॥२५॥*
पारस से स्पर्श पर लोहा सोना हो जाता है, वैसे ही सत्संग में जाने से ध्यानादि द्वारा परम पुरुष परमात्मा से मिलकर साधारण प्राणी भी संत हो जाता है, अत: सत्संग में जाकर संतों से मिलने वाले को कोई न रोके ।
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*साधु वाणी छाँह हमाई१, भाग हुं पड़े शीश पर आई ।*
*देखत दोन्य पाँवहि राज, रज्जब होहिं सकल शिर ताज ॥२६॥*
संतों की वाणी कान में और हमा१ पक्षी की छाया शीश पर बने भाग्य से ही पड़ती है, जिसके शिर पर हमा पक्षी की छाया पड़ती है वह राजा हो जाता है और जिसके कानों में संतों की वाणी पड़ती है वह सकल शिरोमणी आत्म राज्य ब्रह्म पद को प्राप्त होता है । देखते देखते वर्तमान शरीर में ही दोनों महाराज पद को प्राप्त हो जाते हैं ।
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*साधु संदल१ पारस पारा, भृंगी छाँह हमाय२ ।*
*रज्जब मन तन पलटणों, भागहुं मिलहि सु आय ॥२७॥*
साधु, चन्दन१, पारस, पारा भृंगी और हमा२ पक्षी की छाया, इनका संयोग मन और शरीर दोनों को बदलने वाला है तथा बड़े भाग्य की प्रेरणा से ही आकर ऐसा संयोग मिलता है । साधु संग से शरीर संयम और मन में ज्ञान रूप परिवर्तन होता है, चन्दन से पृक्ष का गंध और गुण और आकार बदलता है । पारस से लोह का मूल्य और रंग बदलता है । पारा से औषधि रसायन रूप में बदल जाती है । भृंगी से कीट का आकार और स्वभाव बदलता है । हमा पक्षी की छाया से भाग्य और भेष बदलता है ।
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*हद१ बेहद२ के बीच में, साधु३ संत दलाल ।*
*सौदा४ आतम राम सौं, इन करि ह्वै दर५हाल६ ॥२८॥*
मायिक संसार१ और ब्रह्म२ के बीच में श्रेष्ठ३ संत ही दलाल है, इनके द्वारा ही आत्म का राम से मिलन रूप व्यापार४ वर्तमान६ में५ ही हो जाता है ।
(क्रमशः)

*३१. साधु संगति परम लाभ का अंग ~२१/२४*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*३१. साधु संगति परम लाभ का अंग ~२१/२४*
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*जो दत१ जीव हिं जीव दे, तिहिं पसाव२ प्रभु दूर ।*
*रज्जब साधु नाम देहिं, सु नरहरि३ करे हजूर ॥२१॥*
जीव को अन्य जीव जो सुवर्णादि दान देते हैं, उस दान१ से प्रभु की कृपा२ नहीं होती, साधु नाम रूप दान देते हैं, वह नाम सम्यक् रीति से प्रभु३ के पास उपस्थित कर देता है ।
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*चिदानन्द का चिन्तवन, चौरासी में नाँहिं ।*
*जन रज्जब सो पाइये, साधु संगति माँहिं ॥२२॥*
चौरासी लक्ष योनियों में चेतन आनन्द स्वरूप ब्रह्म का चिन्तन भी नहीं हो पाता, वह ब्रह्म साधु संगति में आत्म रूप से प्रत्यक्ष प्राप्त होता है ।
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*नाव नाव साधु कनें१, बूडत लेहि चढाय ।*
*महिमा उस उपकार की, रज्जब कही न जाय ॥२३॥*
साधु के पास१ राम-नाम रूप नौका है, वह संसार सागर में डूबते हुये प्राणी को उस पर चढा लेता है और प्रभु के पास पहुँचा देता है, साधु के उस उपकार की महिमा किसी भी प्रकार कही नहीं जा सकती ।
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*शब्द संदेश ना लहत, साधुन कनें जो जीव ।*
*तो रज्जब रह१ चलती नहीं, प्राण न परसत पीव ॥२४॥*
जो जीव साधुओं के पास से शब्द रूप समाचार नहीं सुनता, तो उसकी वृत्ति परमार्थ मार्ग१ में नहीं चल सकती और वह प्राणी प्रभु से नहीं मिल पाता ।
(क्रमशः)

*३१. साधु संगति परम लाभ का अंग ~१७/२०*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*३१. साधु संगति परम लाभ का अंग ~१७/२०*
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*रज्जब साधु दरसतैं, साहिब आवे याद ।*
*आयु न पूजे१ उस पल२ हिं, देखर दीज्यो दाद३ ॥१७॥*
संन्तों के दर्शन मात्र से ही परमात्मा का स्मरण होने लगता है, फिर सत्सङ्ग के तो एक क्षण२ के बराबर१ भी संपूर्ण आयु नहीं हो सकती, अत: सत्सङ्ग का महात्म्य प्रत्यक्ष देखकर के अवश्य प्रशंसा३ करना चाहिये ।
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*साधु दत्त१ की मिति२ नहीं, सांई आवे हाथि ।*
*रज्जब और न देखिये, देता ऐसी आथि३ ॥१८॥*
साधु के दान१ की सीमा२ नहीं है, उसके उपदेश से परमात्मा भी हाथ आ जाते हैं अर्थात मिल जाते हैं । देखिये और कोई भी ऐसी पूंजी३ नहीं देता, जिससे परमात्मा मिल सकें ।
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*सदा अभूली भूलिये, भूल्या आवे याद ।*
*यहु रज्जब सत्संग फल, देखर दीज्यो दाद ॥१९॥*
जीव जिसे कभी भी नहीं भूलता उस माया को भी सत्संग से भूल जाता है और जिसे भूला रहता है वह परमात्मा स्मरण हो आता है । यही सत्संग का फल है यह प्रत्यक्ष देखकर सत्सङ्ग की प्रशंसा अवश्य करनी चाहिये ।
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*रज्जब साधु दान सम, दिया किसी का नांहि ।*
*मनसा वाचा कर्मना, समझ देख मन माँहिं ॥२०॥*
साधु को दिये हुये दान के समान किसी का भी दान नहीं होता, हम तो मन, वचन, कर्म से यथार्थ ही कहते हैं, तुम भी मन में विचार कर देख लो ।
(क्रमशः)

*अध्याय ५~जग्गाजी*

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*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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*दादू सब जग नीधना, धनवंता नहीं कोइ ।*
*सो धनवंता जाणिये, जाके राम पदार्थ होइ ॥*
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*अध्याय ५~जग्गाजी*
एक दिन सांभर में एक गुजराती सज्जन आये । उनका नाम जगिया भाई था । वे अपनी पत्नी की प्रेरणा से धन प्राप्ति के लिये भ्रमण कर रहे थे । जब उनको कहीं भी विशेष रूप से धन नहीं मिला तब उन्होंने निश्चय किया—सांभर से लवण खरीद कर देश को ले चलें, इससे कुछ तो प्राप्त होगा ही । वे सांभर में आये तब उन्होंने सुना—यहां दादूजी नाम के एक गुजराती संत हैं । वे बड़े सिद्ध पुरुष हैं । जगियाभाई ने अपने मन में सोचा—यदि दादूजी सिद्ध पुरुष हैं, तब तो मुझे धन भी दे सकते हैं । मुझे उनके पास अवश्य चलना चाहिये । 
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फिर वे दादूजी के आश्रम में गये । दादूजी का दर्शन करके नमो नारायण बोलते हुये दादूजी के चरणों में मस्तक रखकर प्रणाम किया फिर सामने बैठ गये और अपनी कथा सुनाकर बोले—स्वामिन् ! मुझे धन की अभिलाषा है । आप सिद्ध पुरुष हैं । अतः मेरी आशा पूर्ण कर दीजिये । यदि मैं बिना धन घर को जाऊंगा तो मेरी स्त्री क्रोधित होकर मुझे बहुत गालियां देगी । वह मुझे बहुत दुःख देती है । जगियाभाई की उक्त बातें सुनकर दादूजी बोले—
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बार हि बार कहूँ रे गहिला, राम नाम कांई विसारच्यो रे ।
जन्म अमोलक पामियो¹ एव्हो² रतन कांई हारच्यो रे ॥टेक॥
विषया बाह्या³ नैं तहं धायो, कीधो⁴ नहिं म्हारो वारच्यो⁵ रे ।
माया धन जोई नैं भूल्यो, सर्वस येणे⁶ हारच्यो रे ॥१॥
गर्भवास देह दमतो' प्राणी, आश्रम तेह संभारच्यो रे ।
दादू रे जन राम भणीजे,नहिं तो यथा विधि हारच्यो रे ॥२॥
अर्थ—अरे अनसमझ ! मैं तुझे बारं बार कहता हूं, तू राम का नाम चिन्तन करना क्यों भूला है ? यह अमूल्य मानव जन्म तुझे प्राप्त¹ हुआ है, ऐसा² रत्न विषयों में क्यों खो रहा है ? विषयों से बहक³ कर के जहां विषय प्राप्त हों वहां ही दौड़ता है । मैंने जिनको त्यागने⁵ के लिये कहा वे कामादि तो नहीं त्यागे, मेरा कहना नहीं किया⁴ । मायिक कनकादि धनों को देखकर प्रभु को भूल रहा है । इस⁶ व्यवहार से तू अपना सर्वस्व खो रहा है । हे प्राणी ! गर्भवास में तेरा सूक्ष्म देह बारं बार अति कष्ट⁷ पाता रहा है । गर्भवास रूप आश्रम में तूने उस प्रभु को स्मरण किया था, अब फिर भूल गया है । अरे जन ! राम नाम चिन्तन तथा उच्चारण कर, नहीं करने से तो जैसी विधि से तू चल रहा है, ऐसे तो अपने जन्म को व्यर्थ ही खो रहा है । 
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उक्त उपदेश सुनकर जगियाभाई बोला—
''राम नाम केम थाय गुसांई, राम नाम तणो स्थान कहांई ॥
किम हृद थाय राम तू नामू, केन्हीं संगति थी हूँ प्रामू ॥''
जगियाभाई के उक्त प्रश्नों को सुनकर संत प्रवर दादूजी महाराज बोले—
''वाहला म्हारा ! प्रेम भक्ति रस पीजिये,
रमिये रमता राम, म्हारा वाहला रे ।
हिरदा कमल में राखिये, उत्तम एहज ठाम, 
म्हारा वाहला रे ॥टेक॥
वाहला म्हारा ! सदगुरु शरणे अणासरे,
साधु समागम थाय, म्हारा वाहला रे ।
वाणी ब्रह्म बखाणिये आनन्द में दिन जाय, 
म्हारा वाहला रे ॥१॥
वाहला म्हारा ! आत्म अनुभव उपजे,
उपजे ब्रह्म गियान, म्हारा वाहला रे ।
सुख सागर में झूलिये, साँचो यह स्नान,
म्हारा वाहला रे ॥२॥  
वाहला म्हारा ! भव बंधन सब छूटिये,
कर्म न लागे कोय, म्हारा वाहला रे ।
जीवन मुक्ति फल पामिये¹ अमर अभय पद
होय, म्हारा वाहला रे ॥३॥
वाहला म्हारा ! अठ सिधि नव निधि आंगणे,
परम पदारथ चार म्हारा वाहला रे ।
दादू जन देखे नहीं, रातो सिरजन हार,
म्हारा वाहला रे ॥४॥
अर्थ — हे हमारे प्रिय आत्मा ! प्रेमाभक्ति रस का पान करो । हृदय कमल में सदा राम का ध्यान रखो । राम के ध्यान के लिये यही उत्तम स्थान है किन्तु सद् गुरु की शरण लिये बिना यह काम आगे नहीं चलता । संतों का समागम भी होना ही चाहिये । संत ब्रह्म सम्बन्धी वाणी कहते हैं, उनके संग से दिन आनन्द पूर्वक निकलते हैं । बुद्धि में आत्मानुभव उत्पन्न होकर ब्रह्म-ज्ञान प्रकट होता है, फिर तो साधक सुख-सागर में झूलता है । यही सच्चा स्नान है । इस स्नान से संपूर्ण बन्धन खुल जाते हैं । कर्तृत्व भाव न रहने से कोई भी कर्म का फल नहीं लगता । 
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जीवनमुक्ति रूप फल प्राप्त करके अमर-अभय पद को प्राप्त¹ होता है । फिर उसके निवास स्थान के आंगन में अष्ट सिद्धि, नव निधि और अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष ये चारों पदार्थ आते हैं किन्तु वह भक्त उनकी ओर देखता भी नहीं, वह तो सृष्टिकर्ता प्रभु के स्वरूप में ही अनुरक्त रहता है । उक्त पद के रहस्यमय उपदेश को श्रवण करके जगिया भाई दादूजी के शिष्य बन गये और भगवद् भजन करके एक महा सिद्ध पुरुष हो गये, फिर ये जग्गाजी के नाम से प्रसिद्ध हुये ।
(क्रमशः)

*४९. भ्रम विधवंस कौ अंग ८१/८४*

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*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
*श्रद्धेय श्री Tapasvi @Ram Gopal Das की प्रेरणा से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Meta AI*
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*४९. भ्रम विधवंस कौ अंग ८१/८४*
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*आतम अस्थल रांमजी, डिगै न कबहूं मंड ।*
*कहि जगजीवन नांम भजि, निरखि नूर नौ खंड ॥८१॥*
आत्मा रूपी अस्थल में राम जी विराजते हैं, वह अस्थल कभी डगमगाता नहीं, कभी नष्ट नहीं होता । संत जगजीवन दास जी कहते हैं, तू नाम को भज, तो तुझे नौ खंडों में, सारे ब्रह्मांड में उसी नूर का दर्शन होगा । वह एक ही नूर सब जगह रमा है ।
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*कहि जगजीवन सक्ति करि, अस्थल अडिग करंत ।*
*रांम बिमुख देही डिगी, अंबुज अंबु भरंत ॥८२॥*
संत जगजीवन साहेब कहते हैं, शक्ति के द्वारा इस अस्थल को अडिग किया जाता है, साधना की शक्ति से आत्मा स्थिर होती है । जो राम से विमुख है, उसकी देह डिग जाती है, नष्ट हो जाती है, जैसे कमल का पत्ता जल भरते ही डूब जाता है । अंबुज=कमल, अंबु=जल ।
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*कहि जगजीवन निरजला, लोक करै यौं नांहि ।*
*हरि जन राखै ते सही, रांम भगति ब्रत मांहि ॥८३॥*
संत जगजीवन साहेब निर्जला व्रत के बारे में कहते हैं, लोक जिस प्रकार निर्जला करता है, केवल अन्न-जल त्याग कर, वह सच्चा निर्जला नहीं है । सच्चा निर्जला तो वह है जो हरि जन रखते हैं, अर्थात राम भक्ति के व्रत में स्थित रहना, विषयों से निर्जल रहना, वही सही निर्जला है ।
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*कहि जगजीवन निरजला,अन्न उदिक की आड़ ।*
*हरि तजि चित भ्रम दूसरा, मनसा लाड़ै लाड़ ॥८४॥*
कई लोग निर्जला का बहाना बनाते हैं, अन्न-जल की आड़ लेते हैं, पर चित्त में हरि को छोड़ कर दूसरे भ्रम में लगे रहते हैं । मनसा लाड़ै लाड़ का अर्थ है मन में तरह-तरह के लाड़, लाड-प्यार, विषयों की चाह में लिप्त रहना । संत जगजीवन साहेब कहते हैं, बाहर से अन्न-जल त्यागा और भीतर मन विषयों में लिपटा रहा, तो वह निर्जला किस काम का ।
(क्रमशः)

सोमवार, 2 नवंबर 2026

*४ राजारामजी*

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*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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*दादू प्रीतम के पग परसिये, मुझ देखण का चाव ।*
*तहाँ ले सीस नवाइये, जहाँ धरे थे पाँव ॥*
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*४ राजारामजी*
४- चौथे राजारामजी भी अपने गुरुदेव कुंजदासजी के समान ही भजनानन्दी महात्मा थे । राजारामजी ने भी करोली से ७ मील गंगापुर रोड़ पर मांच ग्राम की सीमा में विद्यमान अस्थल नामक स्थान बनवाया था । कारण—एक तो यहां पर करोली नरेश की दी हुई भूमि थी उसकी व्यवस्था के लिये व्यवस्थापक के निवास के लिये और जो विरक्त संत शहर में नहीं रहना चाहें उनके एकान्त निवास के लिये, लाल पत्थर का अच्छा स्थान बनवाया था । अस्थल में दादू वाणी मंदिर भी है । 
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वाणी मंदिर की पूजा व स्थान की व्यवस्था वर्तमान में रामचरणदासजी करते हैं । मेरे पूछने पर उन्होंने मुझे करोली की कुंजदासजी की कुंज के महन्त ज्ञानदासजी का शिष्य अपने को बताया था । उक्त कारणों से ही राजारामजी ने अस्थल नामक स्थान बनवाया था । अस्थल के पास कुछ बस्ती है, वह अस्थल नाम से ही बोली जाती है । कारण—अस्थल के बनने के पश्चात ही बसी है । 
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राजारामजी की घटना भी सुनने में आती है कि—उनके समकालीन करोली नरेश ने आज्ञा निकाली थी कि—मेरे राज्य में रहने वालों को सबको कर देना होगा । उक्त आज्ञा साधुओं के स्थानों पर भी लागू हो गई । कुंज के महन्त राजारामजी को भी कर देने की सूचना मिली । राजारामजी ने कहा—करोली नरेश को आश्रम में बुलवाकर देंगे । राजा कुंज में आये तब कुंज में आने पर करोली नरेश का जो स्वागत होता था वैसा ही स्वागत किया गया । फिर कर की बात चली । तब राजारामजी ने कहा—ठीक है । 
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फिर एक थाल सुन्दर कपड़े से ढककर राजा के पास रखा गया । राजा ने उसे उघाड़ कर देखा तो कपड़े के नीचे राजारामजी का ही शिर कटा हुआ दीख पड़ा । यह देख राजा डर गया । फिर राजा के आगे से थाल हटा दिया और राजा ने राजारामजी से पूछा—यह क्या लीला है ? राजारामजी ने कहा—हमने तो शिर तक भगवान् को दे दिया है । फिर आप हम से कर क्या लेंगे । हमारे पास तो अपना कहने योग्य अब कुछ भी नहीं है । 
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फिर राजारामजी का कटा हुआ शिर देखकर तथा राजारामजी की निष्ठा देखकर करोली नरेश ने संतों से कर लेने की आज्ञा अपनी पीछे लौटा ली । इससे सूचित होता है कि राजारामजी भी अपने गुरु कुंजदासजी के समान महान् संत थे । राजारामजी भी करोली में ही वि. स. १८४१ श्रावण सुदि ९मी को ब्रह्मलीन हुये थे । चरण चौकी पर अंकित दोहा —
''श्रावण इकतालीस में, सुदि नवमी अनुराग ।
महन्त राजारामजी, कियो कलेवर त्याग ॥'' 
इनके चरण पधराने का समय वि.स. १८४५ वैशाख सुदि १० मी चरण चौकी पर अंकित है । किसी कारण से चरण पधराने में देर हो गई होगी । इनकी समाधि कुंजदासजी की समाधि के बराबर है । इनकी समाधि की भी छत्री बनी हुई है । 
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५- नन्दरामजी, ६- हरिनारायणजी, ७- पुरुषोत्तमजी, ८- जयरामदासजी, इन चार के चरण स्थल के सामने कूप पर एक ही चौकी में हैं । माधोदासजी ने वि. स. १९१९ माह सुदि १२ को पधराये हैं । करौली का जो विवरण ज्ञात हुआ वह सब लिख दिया है । अन्य स्थान पर लिखित—करौली के कुंज की महन्त परंपरा इस प्रकार है । १- राघवदासजी, २- कुंजदासजी, ३- मुरलीदासजी, ४- राजारामजी । नं. २, ३, ४ के चरण चिन्ह करौली में हैं । ५- जयरामदासजी, ६- पुरुषोत्तमदासजी, ७- नन्दरामजी, ८- हरिनारायणजी, ९- माधवदासजी, इन पांच के चरण चिन्ह अस्थल के कूप के पास में हैं । १०- गोपालदासजी, ११- ज्ञानदासजी । इति श्री चतुर्थ अध्याय समाप्तः
(क्रमशः)

*४९. भ्रम विधवंस कौ अंग ७७/८०*

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*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
*श्रद्धेय श्री Tapasvi @Ram Gopal Das की प्रेरणा से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Meta AI*
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*४९. भ्रम विधवंस कौ अंग ७७/८०*
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*तेजपुंज की सुरति मैं, तेजपुंज प्रकास ।* 
*(तहां)तन मन बिलै समान सौ, सु कहि जगजीवनदास ॥७७॥*
जब साधक की सुरति, उसकी चेतना तेजपुंज परमात्मा में लग जाती है, तब वहाँ तेजपुंज का ही प्रकाश हो जाता है । संत जगजीवन दास जी कहते हैं, उस अवस्था में तन और मन दोनों उसी में विलीन हो जाते हैं, समा जाते हैं, जैसे नमक पानी में समा जाता है ।
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कहि जगजीवन नांम मैं, सब काहू का सीर ।
जो है प्यासा सो पिवै. हरि जल अम्रित नीर ॥७८॥
संत जगजीवन साहेब कहते हैं, राम नाम में ही सब का सीर है, सब की शीतलता है, सबकी तृप्ति है । हरि नाम अमृत जल के समान है, जो प्यासा है, जिसे सच्ची प्यास लगी है, वह इसे पी लेता है और अमर हो जाता है ।
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*पांचौं तत्त४ पवित्र करि, प्रेम भगति मन राषि ।* 
*कहि जगजीवन आतमां, सुणैं अगम की साषि ॥७९॥*
(४. पांचौं तत्त=पृथ्वी आदि पाँच महाभूत)
पाँचो तत्वों को पवित्र करके, मन में प्रेम-भक्ति को धारण करके रखो । संत जगजीवन दास जी कहते हैं, तब यह आत्मा अगम की साखी सुनने योग्य होती है, अर्थात उस परम अगम्य लोक की वाणी सुन पाती है । तन शुद्ध, मन में प्रेम, तभी अनहद नाद सुनाई देता है ।
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*कहि जगजीवन रांमजी, रीता५ भरौ भंडार ।*
*प्रेम भगति दीदार हरि, सुमिरन बिरह बिचार ॥८०॥*
{५. रीता=रिक्त(खाली)}
संत जगजीवन साहेब कहते हैं, हे राम जी, मेरा भंडार खाली है, आप इसे भर दीजिए । वह भंडार किस चीज से भरेगा ? प्रेम-भक्ति से, हरि के दीदार से, सुमिरन से और बिरह के विचार से । यही सच्चा धन है जिससे जीव का भंडार भरता है ।
(क्रमशः) 

रविवार, 1 नवंबर 2026

*४९. भ्रम विधवंस कौ अंग ७३/७६*

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*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
*श्रद्धेय श्री Tapasvi @Ram Gopal Das की प्रेरणा से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Meta AI*
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*४९. भ्रम विधवंस कौ अंग ७३/७६*
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*तेज पुंज निरबासनां८, नाद सक्ति गुन बास ।*
*जस भासै तस प्रकासै, सु कहि जगजीवनदास ॥७३॥*
{८.निरबासनां=निष्काम(कामनारहित)}
परमात्मा तेज का पुंज है और वह निष्काम है, उसमें कोई वासना नहीं । नाद उसकी शक्ति है और सब गुण उसी में वास करते हैं । संत जगजीवन दास जी कहते हैं, जैसा जिसके हृदय में भास होता है, भाव होता है, वैसा ही उसे वह प्रकाशित होता है । निर्मल हृदय को वह तेज पुंज रूप में दिखता है ।
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*मन मारुत माथि रांम कहि, मारि मारि मर जांणि ।*
*कहि जगजीवन मिलि रहै, पूरण ब्रह्म पिछांणि ॥७४॥* 
मन पवन के समान चंचल है, उसे मथ कर, मार-मार कर मार डालो, अर्थात वश में कर लो, तब जाकर मरना सार्थक होगा । संत जगजीवन साहेब कहते हैं, इस प्रकार मन को मार कर जो पूर्ण ब्रह्म को पहचान लेता है, वह उसी में मिल कर रह जाता है, फिर उसका जन्म-मरण छूट जाता है ।
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*अरथ१ निरंतर भगति हरि, अनरथ२ बिषै बिलास ।*
*जे जन भाव सुझाव सोइ, सु कहि जगजीवनदास ॥७५॥*
{१. अरथ=(हितकर)}  (२. अनरथ=अहितकर)
हितकर तो केवल एक ही है, निरंतर हरि की भक्ति, और अहितकर है विषयों में विलास करना । संत जगजीवन दास जी कहते हैं, जो जन इस भाव को समझ लेता है, सुझाव को हृदय में धर लेता है, वही सच्चा भक्त है ।
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*आदि निरंजन अंत हरि, मद्धि रांम सब ठांम ।*
*कहि जगजीवन निरखि निज३, सहज सरै सब काम ॥७६॥*
(३. निरखि निज=स्व स्वरूप को पहचानने से)
आदि में वही निरंजन है, अंत में वही हरि है, और मध्य में भी सब ठौर वही राम ही रमा है । संत जगजीवन दास जी कहते हैं, अपने निज स्वरूप को निरख लेने से, पहचान लेने से, सहज ही सब काम संवर जाते हैं, सिद्ध हो जाते हैं । आत्मज्ञान से ही परमात्मज्ञान होता है ।
(क्रमशः) 

*राघवदासजी की शिष्य परम्परा*

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*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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*सूखा सहजैं कीजिये, नीला भांजे नांहि ।*
*काहे को दुख दीजिये, साहिब है सब मांहि ॥*
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*राघवदासजी की शिष्य परम्परा*
राघवदासजी की शिष्य परंपरा करौली में चली गई । राघवदासजी का स्थान उदेही से उठकर करौली चला गया । संभव है राघवदासजी के शिष्य सुखदेवदासजी ही करौली जा बसे होंगे । करौली के स्थान की स्थापना तो राघवदासजी के समय में हो गई थी किन्तु राघवदासजी उदेही भी आते थे और रहते थे । फिर भी उनकी परंपरा करोली की परंपरा ही मानी जाती है तो इस प्रकार है-१ राघवदासजी, २ सुखदेवदासजी, ३ कुंजदासजी, ४ राजारामजी, ५ नन्दरामजी, ६ हरिनारायणजी, ७ पुरुषोत्तमजी, ८ रामदासजी, ९ माधोदासजी, १० गोपालदासजी, ११ ज्ञानदासजी । २- सुखदेवदासजी भजनानन्दी महातमा थे तथा परम विरक्त थे ।
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*कुंजदासजी*
३- कुंजदासजी दादूवाणी में कथित निर्गुण ब्रह्म की उपासना करके महान् सिद्ध संत हो गये थे । उनके तप तेज से प्रभावित होकर तत्कालीन करोली नरेश ने एक ग्राम भी उनकी भेंट किया था जो राजस्थान के एकीकरण होने से पहले तक ‘कुंज’ के महन्तजी के अधिकार में था । कुंजदासजी ने करोली में अच्छा स्थान बनवाया था जो कुंजदासजी की कुंज नाम से करोली में प्रसिद्ध है । कुंजदासजी महान् सिद्ध संत तथा अति दयालु थे ।
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उनकी दया के विषय में एक जन श्रुति चलती है कि-एक दिन एक भक्त ने कुंजदासजी को एक इमली का हरा दांतुन लाकर दिया था । तब कुंजदासजी ने कहा- भाई ! हरा वृक्ष क्यों तोड़ लाये हो मेरा राम के दांत तो सूखी से ही साफ हो जाते हैं और हमारे परमाचार्य दादूजी महाराज ने सूखे दांतुन से दांत मुख साफ करने को कहा भी है—
‘सूखा सहजैं कीजिये, नीला भांजे नांहि ।
काहे को दुख दीजिये, साहिब है सब मांहि ॥’
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फिर कुंजदासजी महाराज ने सोचा-भक्त तोड़ तो लाया है, अब इसको सफल भी बनाना ही चाहिये । अतः कुंजदासजी ने उस दांतुन से अपने दांत साफ किये । फिर उस दांतुन को चीर कर जीभ साफ की और उन चीरे हुये दोनों टुकड़ों को वहां ही अलग भूमि में रोप दिया और प्रति दिन उनको पानी पिलाते रहे । वे हरे होकर शनैः शनैः दो वृक्ष बन गये । उन वृक्षों में सब लोग एक प्रत्यक्ष चमत्कार देखते थे कि-उनके फलों में आधा आधा बीज आता था । यह देखकर सब अति आश्चर्य करते थे और कहते थे यह कुंजदासजी महाराज की करामात है । वे दोनों वृक्ष कुंजदासजी महाराज की स्मृति चिरकाल तक कराते रहे किन्तु कुछ वर्षों पहले कुंज के महन्त ने किराये के लोभ में पड़कर उन वृक्षों के स्थान में दुकानें बनवाने के लिये उनको कटवा दिया और दुकानें बनवा दीं ।
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उक्त घटना से कुंजदासजी महाराज की योग शक्ति और दयालुता का परिचय मिलता है ।
भक्त जनों में दया की, अतिशयता दिखलाय ।
दांतुन करके फेरि भी दीन्हे वृक्ष लगाय ॥
कुंजदासजी महाराज के जीवन की विशेष घटनायें उनके स्थान में कोई जानकार व्यक्ति नहीं मिलने से नहीं मिल सकीं किन्तु यह तो प्रसिद्ध ही है कि वे महान् सिद्ध संत हुये हैं । तब ही उस देश के राजा तथा प्रजागण उनसे प्रभावित हुये थे । कुंजदासजी महाराज करोली में ही ब्रह्मलीन हुये हैं । उनकी समाधि कुंज में ही एक छत्री में है । समाधि की चरण चौकी में वि. सं. १७५२ अंकित है । पूजा प्रति-दिन होती है । कोई ब्राह्मण वेतन द्वारा करता है । कुंज की आय से वेतन मिलता है । पानी डालकर घिसने आदि से मास तिथि के अक्षर बिगड़ गये हैं । समाधि की छत्री लाल पत्थर की अच्छी बनी हुई है ।
(क्रमशः)

शनिवार, 31 अक्टूबर 2026

हरिश्चन्द्र सत

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*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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*दादू शब्द बाण गुरु साध के, दूर दिसन्तरि जाइ ।*
*जिहि लागे सो ऊबरे, सूते लिये जगाइ ॥*
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*हरिश्चन्द्र सत से मनहर-*
तक्षक भये हैं ततकाल विश्वामित्र मुनि,
राघो चढ़ि रूख रोहितास वन डस्यो है ।
जाके जी में कसर कटाक्ष नाहीं कामना की,
का जाने कर्तार गति काहे को धौं कस्यो है ।
बालक विलाप करें तोवा त्रयलोक नाथ,
धर्म की जहाज बूड़ी ऐसो ज्ञानी ग्रस्यो है ।
बोल्यो रोहितास जनि रोवो पुनि मेरी सोंह,
पाहुणे से देख पेख का को घर वस्यो है ॥४३॥
हरिश्चन्द्र सत में कवित्तों की संख्या ७० के लगभग होनी चाहिये ।
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*ध्रुव चरित्र से इन्दव-*
ध्रुव की जननी ध्रुव को समभावत, रोवै कहा रट राम धणी को ।
केतेक राज कहां नृप आसन, का पर तूं कर मेल वनी को ॥
यह साल मिटै ततकाल करो तप, मृत्तक हो सुत धाम धनी को
राघो कहै कुल की ममता तज, ज्ञान के खड्ग से मार मनी को ॥६॥ 
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*ग्रन्थ करुणा विनती से*
हा ! हा ! धनी दुःख देत गनी, तुम ही तुम एक अधार हो मेरे ।
जानत हो परवेदन की, परमेश्वर जा प्रभु न्याय है तेरे ॥
जोर करे तिन को समभावहु, साहब जी चढ़ सांक के केरे ।
राघो अनाथ अतीत की हे हरि, भीर परे भगवन्त निवेरे ॥४॥
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*ग्रन्थ चेतावनी से*
समये सुमरचो नहिं राम धणी, सु धणी जम की तन त्रास सहैगो ।
आठ रु बीस में शीश ज्यूं सूम को, दे दशहुं दिशि आग दहैगो ॥
योजन द्वादश घाट घरे को, सो ता मधि मूरख भूरि मरैगो ।
राघो कहै निगुरे निगुसांई को, आवत ही जम कंठ गहैगो ॥१॥
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*कवित्त ग्रंथ, संगति अंग से मनहर-*
दास की पूरण आश संगति करै निवास,
पाप ताप होत नाश गहै गुण सार जी ।
पाय है परम सुख राम नाम जाके मुख,
बिसरै न एक चुख प्राण आधार जी ॥
सोई जन जाके तन नाम से रहै लगन,
घर वन राखै मन सोई स्वामी कार जी ।
राघो गुरु-मंत्र प्रति राखै रैन दिन रति,
सुमिर सुमिर सिद्ध साध भये पार जी ॥३॥
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गुरु शिष्य सम्बाद ग्रंथ, से गुरु वचन चौपाई -
अब कुछ बात कहूं मैं नीकी, सो तूं सुन शिष जीवन जी को ।
नाम लेत नरक नहीं जाई, और युगन से यह अधिकाई ॥२७॥
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*उत्पत्ति स्थिति चिंतामणि ग्रंथ से दोहा-*
श्री हरि श्री गुरु से कही, सो श्री गुरु कहि मुभ ।
रघवा रंचक गम भई, श्री गुरु पै पायो गुभ ॥२६४॥
भक्तमाल के उदाहरण इस ग्रंथ में पहले भी आये हैं और आगे भी आते ही रहेंगे । उक्त उदाहरणों से ज्ञात होता है कि राघवदासजी महाराज अच्छे संत कवि थे । अब इनकी शिष्य परंपरा का परिचय दिया जाता है ।
(क्रमशः)