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🌷*卐 श्री दादूदयालवे नम: 卐*🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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*नाद विन्दु से घट भरे सो जोगी जीवे ।*
*दादू काहे को मरे, रामरस पीवे ।*
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*सुन्दरदासजी का भविष्य बताना*
फिर दादूजी महाराज ने सुन्दरदासजी को कहा- सुन्दरदासजी ! तुम तो गोपीचन्द, भरतरी, गोरक्षनाथ आदि के समान चिरंजीवी होगे । अतः सदा निर्गुण भक्ति करते हुये प्रायः गुप्त ही रहना । जो पुण्यवान और दर्शन के अधिकारी हों, उन्हें दर्शन देकर कृतार्थ करते रहना- ‘पुण्यवान को दर्शन दीज्यो, नहिं तो गुप्त जगत में रहिज्यो ।” सुन्दरदासजी ने पूछा- भगवन् ! चिरंजीवी होने का साधन क्या है ? दादूजी ने कहा-“नाद विन्दु से घट भरे सो जोगी जीवे । दादू काहे को मरे, रामरस पीवे ।”
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सुन्दरदासजी ने उक्त साखी में कथित साधना प्रारंभ करदी । सांभर में लगभग एक वर्ष रहे तव भी सुन्दरदासजी सत्संग और भोजन करके भैराणा की गुफा में भजन करते थे । प्रतिदिन सत्संग के समय प्रातःकाल आ जाते थे और भोजन करके चले जाते थे । फिर प्रहलादजी भी सुन्दरदासजी के शिष्य बनकर प्रहलाददासजी कहलाने लग गये । दोनों ही इच्छानुसार सांभर में सत्संग करके फिर दादूजी महाराज की आज्ञा लेकर घाटड़ा की ओर चले गये ।
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*द्वन्द्वपुरी निवास*
घाटड़ा से कुछ दूर द्वन्द्वपुरी में पहुंचकर वहां भजन करने लगे । द्वन्द्वपुरी से पराशर आश्रम तीन मील है । वहां पराशर गुहा है, पानी का नाला चलता है । आसपास के लोग इस आश्रम को तीर्थ मानते हैं । घाटड़ा से पराशर आश्रम पांच मील है । खोह से एक मील है और दरीबा से लगभग तीन मील है । सुन्दरदासजी व प्रहलाददासजी जब द्वन्द्वपुरी में भजन कर रहे थे तव घाटड़ा के धीरावत ठाकुरों को ज्ञात हुआ कि बीकानेर नरेश जैतसिंहजी के पुत्र भीमराजजी और उनके पुरोहित प्रहलादजी संत होकर सुन्दरदासजी तथा प्रहलाददासजी नाम से बोले जाते हैं और आजकल द्वन्द्वपुरी में भजन कर रहे हैं ।
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उस समय घाटड़ा में ३५० कोटड़ियां धीरावत ठाकुरों की थीं । सभी सरदारों ने मिलकर एक दिन अपनी सभा की और उसमें यह प्रस्ताव रखा कि-“सुन्दरदासजी और प्रहलाददासजी को अपने यहां घाटड़ा में लाकर दोनों महात्माओं की सेवा का लाभ उठावें ।” सभा के सभी सरदारों ने उक्त प्रस्ताव का समर्थन करते हुये मान लिया ।
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फिर मुख्य २ सरदार सुन्दरदासजी के पास द्वन्द्वपुरी में गये और सुन्दरदासजी को अति नम्रता से कहा- भगवन् ! हमारी प्रार्थना है कि आप घाटड़े में पधार कर दर्शन तथा उपदेशों से हम लोगों को कृतार्थ करें । महाराज सुन्दरदासजी ने उनकी प्रार्थना सुनी और कहा- हमें एकान्त स्थान चाहिये । सरदारों ने कहा— जहां आप आज्ञा देंगे, वहां आपकी इच्छानुसार कुटीर बना दी जायगी । धीरावत ठाकुरों के श्रद्धा-भाव को देखकर सुन्दरदासजी महाराज ने कहा-अच्छी बात है ।
(क्रमशः)





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