🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷*卐 श्री दादूदयालवे नम: 卐*🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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*करामात कलंक है, जाकै हिरदै एक ।*
*अति आनन्द व्यभिचारिणी, जाके खसम अनेक ॥*
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*संत गोपालदासजी*
गोपालदासजी बाईजी के थांभे के संत थे । आप सकराय के पास सिकंदरे में बाईजी के थांभे का स्थान था वहां ही दीक्षित हुये थे । एक मत से ये जयपुर में ही दीक्षित हुये थे । आप उच्चकोटि के भजनानन्दी महात्मा थे ! सुना जाता है कि-आपका सम्मान तत्कालीन राजा भी करते थे । आपका देहान्त वि. सं. १८०० में जयपुर में हुआ था ।
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आपके शरीर का जुलूस जयपुर के सांगानेर दरवाजे से निकाला गया । उस समय सांगानेर दरवाजे से किसी का भी शव नहीं निकाला दिया जाता था । यह आपके शव को ही सौभाग्य प्राप्त हुआ था । इससे सूचित होता है कि उस समय जयपुर में आपकी अति प्रतिष्ठा थी । आप महान् भजनानन्दी परम विरक्त संत थे । आपने अपने दर्शन और सत्संग से अनेकों का कल्याण किया था । आपका समय भजन विचार और सत्संग में ही व्यतीत होता था ।
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*महान् योगी संत भक्तरामजी*
भक्तरामजी महाराज बाईजी के थांभे के चूरू के स्थान में दीक्षित हुये थे । प्रारंभ में आप विद्याध्ययन के लिये रामगढ़ गये थे । एक दिन किसी साधारण कारण से ही कुपित होकर पंडित ने इनको कहा- तुम्हारे गुरु ने तो यह उपदेश दिया है- दादू धरती होय रहु । फिर तुम क्यों व्यर्थ इन पानों में माथा मारते हो ? इस वचन से भक्तरामजी को अत्यधिक विचार हुआ । फिर आप उसी समय अध्ययन त्याग कर वहां से विचर गये और विचरते विचरते बीकानेर में आ गये ।
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बीकानेर में नृसिंह सागर के मार्ग पर आपकी गुफा थी वहां ही भजन करते रहे । आप बीकानेर में डागों की पंचायती बगीची में भी रहे थे । एक दिन बगीचे के कमरे के कपाट बन्द होने पर भी आप बाहर आ गये थे और भीतर चले गये थे । इनकी यह सिद्धि देखकर एक कथावाचक पंडित ने कहा-"इन सिद्धियों में क्या रखा है ? महाराज !" पंडित के उक्त वचन से उन्होंने अपना अपमान नहीं माना और बोले-पंडितजी ! आप सत्य ही कहते हैं, ये सिद्धियां अवश्य ही भगवत् मार्ग में बटमार का काम करती हैं ।
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इससे सूचित होता है कि- संत सत्य बात को सत्य ही मानते हैं । अपनी कही हुई बात के लिये हठ नहीं करते और लज्जित भी नहीं होते । कहा भी है-
"संत सत्य को सत्य ही, मानें करें न लाज ।
पंडित वचन से नहिं हुये, भक्तराम नाराज ॥१७२॥ह.त.१३॥
एक समय बीकानेर नगर में भक्तरामजी दादूवाणी की कथा कर रहे थे और नीचे लिखी साखी की व्याख्या कर रहे थे-
"नैनों भर नहिं देखिये, यह सब माया रूप ।
तहं ले नैना राखिये, जहां है तत्व अनूप ॥"
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उस समय एक पंडित ने तर्क की-"दादूजी तो संसार को माया का रूप बताकर देखने का निषेध कर रहे हैं और आप देख रहे हैं यह क्या ? वक्ता को तो कहने के समान ही करना चाहिये ।" भक्तरामजी ने तर्क का उत्तर तर्क से नहीं दिया प्रत्युत उसको उपदेश मानकर बोले-"अब नहीं देखूंगा ।" उस दिन से कथा करना छोड़ दिया । वन में रहकर भजन ही करने लगे । उस दिन के बाद दृष्टि भर किसी को भी नहीं देखते थे । कहा भी है-
संत कुतर्कों से नहीं, क्षुभित होत हैं लेश ।
भक्तराम ने विप्र का, मान लिया उपदेश ॥४२७॥ह.त.११॥
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एक दिन तत्कालीन बीकानेर नरेश संत भक्तरामजी के दर्शन करने वन में उनका पता लगाकर गये थे । वे राजा को वन में एक वृक्ष के नीचे बैठे भजन करते हुये मिले । शीतकाल का समय था । राजा भक्तरामजी के लिये एक बहुमूल्य दुशाला ले गया था । भक्तरामजी को प्रणाम करके उक्त दुशाला उनको ओढ़ा दिया और हाथ जोड़कर सामने बैठ गया । कुछ देर के पश्चात् भक्तरामजी उठे तब वह दुशाला उनके शरीर से नीचे गिर पड़ा और वे चल दिये । राजा आदि की हिम्मत उन्हें रोकने की नहीं हुई । कहा भी है-
"विरत संत श्रीमान अरु, श्री में करें न राग ।
भक्तराम उठ चल दिये, नृप रु दुशाला त्याग ॥१५०॥ह.तं.१३।
(क्रमशः)




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