*🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏*
*🌷卐 सत्यराम सा 卐🌷*
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*२०. सुमिरण का अंग ~७७/८०*
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*घट दीपक बाती पवन, ज्ञान ज्योति सु उजास ।*
*रज्जब सीचे तेल ले, प्रभुता पुष्टि प्रकाश ॥७७॥*
शरीर दीपक है, प्राण वायु बत्ती है, ज्ञान ज्योती है, उसका सत्ता प्रकाश सुन्दर है, जैसे तेल सींचने से प्रकाश की वृद्धि होती है, वैसे ही हरि-स्मरण करने से प्रभुता की और ज्ञान ज्योति के सत्ता प्रकाश की भी वृद्धि होती है, अर्थात ब्रह्म को सर्वत्र व्यापक देखने लगता है ।
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*नाम निरंजन नीर है, सब सुकृत वनराय१ ।*
*जन रज्जब फूले फले, सुमिरन सलिल सहाय ॥७८॥*
निरंजन ब्रह्म का नाम जल है, और संपूर्ण शुभ कर्म वन पंक्तियाँ१ है, जैसे जल वर्षने से सब वन फूलते फलते हैं, वैसे ही नाम-स्मरण की सहायता से संपूर्ण सुकृतों की वृद्धि होती है ।
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*सुमिरन सेवा मूल है, सब सुकृत श्रृंगार ।*
*रज्जब शोभा सकल की, देखो सुमिरन हार ॥७९॥*
हरि-नाम-स्मरण ही भक्ति का मूल है, अर्थात नाम-स्मरण से ही भक्ति होती है और संपूर्ण शुभ कर्मों का श्रृंगार है । लोक में भी प्रसिद्ध है, नाम-स्मरण करने वाले संत सभी की शोभा बढ़ाता है ।
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*नाम नाक बिन कुछ नहीं, सुकृत सबै श्रृंगार ।*
*रज्जब रुचे न राम वर, तामें फेर न सार ॥८०॥*
जिस नारी के नाक नहीं उसके सभी श्रृंगार - बेकार है, वह अपने स्वामी को प्रिय नहीं लगती, वैसे ही नाम-स्मरण के बिना संपूर्ण सुकृत भी कुछ नहीं, नाम सुमिरण बिना साधक राम को प्यारा नहीं लगता, यह बात यर्थात है ।
(क्रमशः)



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जो मनुष्य अपने ज्ञानका, अपनी समझका, अपने अनुभवका आदर नहीं करता है, वह न शास्त्रोंका, न ईश्वरका, न गुरुजनोंका— किसीका भी आदर नहीं कर सकेगा। मनुष्योंको कम-से-कम अपनी समझ, अपनी जानकारीका आदर तो करना ही चाहिए। यह बात सब जानते हैं कि शरीर पैदा हुआ है और समय होने पर निश्चित ही मरेगा, फिर भी इस ज्ञानका आदर नहीं करते हैं। इस बातका अर्थ है कि यह मनुष्य शरीर भगवान् ने जिस विशेष उद्देश्यके लिए दिया है, मनुष्य शरीरमें भगवत्प्राप्तिका मौका दिया है, उसे शरीरके रहते प्राप्त कर लेना चाहिए। ऐसा नहीं करके मनुष्य शरीरमें नहीं करने योग्य कार्य करते हैं, यह अपने विवेककी हत्या है।*



















