शुक्रवार, 25 सितंबर 2026

संत ध्यानीबाईजी

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🌷*卐 श्री दादूदयालवे नम:  卐*🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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*दादू लीला राजा राम की, खेलैं सब ही संत ।*
*आपा पर एकै भया, छूटी सबै भरंत ॥*
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महल के ज्ञात महन्तों की परंपरा इस प्रकार है~ १-लालदासजी २-सीतारामजी ३-आकारदासजी ४-कनिरामजी ५- श्योरामजी ६-तोलारामजी ७-कानदासजी वर्तमान । स्थान व जीविका—१- मकान नारायणा के तालाब की पाल पर रामकुई के पास पश्चिम में सड़क पर पश्चिम देखता है, दूसरा उक्त मकान के सम्मुख सड़क पर पूर्व देखता है । ये दो निवास स्थान हैं । 
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कुवा(कृषि योग्य भूमि व कोठी) महलकां वाली नाम से बोली जाती है । यह विरक्तों के चौभीता के पास सांभर रोड पर बड़ के व समाधि के तिवारे के पास है । एक कुवा नीमड़ी वाला रामोला के पास है । एक कोस्या कैर वाला कुवा दूदू सड़क के पास है । बाईजी रामकुमारीजी परंपरा जो कुछ ज्ञात हो सकी सो लिख दी गई है । इन रामकुमारी की परम्परा में भी अच्छे २ भजनानन्दी संत हुये हैं । सो भी ज्ञात हुये जो दिये जाते हैं देखिये....   
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संत ध्यानीबाईजी ध्यानीबाईजी का समय वि. सं. १७५० लगभग है । यह आचार्य फ़कीरदासजी की सहोदरा बहिन थीं और सभाकुमारी(रामकुमारी) जी की शिष्या थीं । इनका साधन स्थान बाईजी की पालकां थी और निवास स्थान बाईजी की पालकां के ऊपर साइड में ड्योढी ऊपर वाला चौबारा व झरोखा था । 
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फ़कीरदासजी के ब्रह्मलीन होने पर जब कई साधु आचार्य बनने की इच्छा करने लगे तब ध्यानीबाईजी ने किसी को भी नहीं बैठने दिया और कहा~ “गादी म्हारा वीर की तामें म्हारो वीर” फिर जब तक अन्य आचार्य का एक मत से निर्णय नहीं हुआ तब तक आचार्य का कार्य ध्यानीबाईजी करती रही थीं । ध्यानीबाईजी महान् योगिनी बाल ब्रह्मचारिणी थीं । रामकुमारीजी से सब साधन पद्धति का पूर्ण ज्ञान ध्यानीबाईजी को प्राप्त हुआ था । 
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पंजाब से तीन सौ संतों की अपनी मंडली घुमाते हुये दौसा के मंडलेश्वर व महन्त सुखरामजी ने सुना तब नारायणा दादू धाम में आये और सब संतों से परामर्श करके निर्णय किया कि मंदिर में प्रार्थना करने से जिसका नाम सुनाई दे उसको आचार्य बनाया जाय । फिर मंदिर में लघुजैतरामजी की आज्ञा हुई तब ध्यानीबाईजी ने सर्व समाज की सम्मति व दादूजी महाराज की आज्ञा से जैतरामजी को गादी पर बैठने दिया था । 
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इससे ध्यानीबाईजी की शक्ति का अनुमान हो जाता है । ध्यानीबाईजी नारायणा में ब्रह्मलीन हुई हैं । उनका समाधि रूप एक जीर्ण तिबारा दादूद्वारे से पश्चिम है जहां शमशान है । बाईजी रामकुमारीजी की शिष्य परम्परा में ध्यानीबाईजी महान सिद्ध हुई हैं । 
(क्रमशः)

*४७. अध्यातम कौ अंग ६६/६८*

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*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
*श्रद्धेय श्री Tapasvi @Ram Gopal Das की प्रेरणा से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Meta AI*
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*४७. अध्यातम कौ अंग ६६/६८*
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कहि जगजीवन अग्यारस३, बारस४ मांही भेद ।
तेरस५ तिस घर समावै, चौदस६ चार्यूं वेद ॥६५॥
(३. अग्यारस=एकादशी)   (४. बारस=द्वादशी)   (५. तेरस=त्रयोदशी)   (६.चौदस=चतुर्दशी)
जगजीवनदास जी महाराज चेतना की सीढ़ियाँ बता रहे हैं । 
*अग्यारस(एकादशी)* - हमारे शरीर में १० इंद्रियाँ + १ मन = ११ हुए । जब तक मन और इंद्रियाँ अपनी-अपनी ओर भाग रही हैं, तब तक जीव ग्यारह में ही अटका है ।
*बारस(द्वादशी)* - जब इन ग्यारह से आगे १२ वाँ - बुद्धि या विवेक जागता है, तब भेद दिखने लगता है - क्या अपना है, क्या पराया, क्या जड़ क्या चेतन । यहीं से साधक में भेद-बुद्धि आती है । 
*तेरस(त्रयोदशी)* - तेरस पर वह भेद मिट जाता है । साधक "तिस घर" - उस अपने निज घर में, उस दसवें द्वार वाले घर में समा जाता है । जैसे आपने पहले कहा था - मछली पानी में ही समा जाए ।
*चौदस(चतुर्दशी)* - जब वह अपने घर में समा गया, तब चारों वेद - यानी सारा ज्ञान, सारे शास्त्र, सारा पढ़ा-सुना - उसी में समा जाता है । अब बाहर के वेद पढ़ने की जरूरत नहीं, भीतर ही सब प्रकट हो जाता है । ग्यारह में जीव, बारह में भेद, तेरह में निज घर, चौदह में सब वेद उसी में लय ।
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पून्यूं७ पुण्य पवित्र तन, राम नाम रस लीन ।
कहि जगजीवन मिलि रहै, ज्यूं जल मांहै मीन८ ॥६६॥
(७. पून्यूं=पूर्णिमा)   (८. मीन=मछली)
जगजीवन जी महाराज के इस दोहे में दो बहुत मीठी बातें हैं -
*१. पून्यूं पुण्य* - चौदस तक ज्ञान हुआ, पर पूनम पर पूर्णता होती है । जब बहुत जन्मों के पुण्य इकट्ठे होते हैं, तब यह तन पवित्र होता है । और पवित्र तन की पहचान क्या ? वह राम नाम के रस में लीन हो जाता है । जैसे मिश्री पानी में घुल जाती है, वैसे तन नाम में घुल जाता है ।
*२. ज्यूं जल मांहै मीन* - आपने पहले भी मछली का उदाहरण दिया था । यह बाबा जी का सबसे प्रिय उदाहरण है । मछली जल से अलग होकर जी नहीं सकती, और जल में रहकर भी वह जल से अलग नहीं दिखती । वैसे ही जब तन राम-नाम-रस में पवित्र हो जाता है, तो वह हरि में ही मिला रहता है । उसे अलग करना पड़े ही नहीं, वह मिला ही हुआ है । जैसे मछली और पानी ।
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कहि जगजीवन राम रस, रसना हरि रस राचि ।
निरबाणी निर्मोह रहै, बिषै बच९ हरि रचि ॥६७॥
(९. बिषै बच=विषय भोगों से बचता हुआ)
जीभ को राम-रस में, हरि-रस में रंग लो । वाणी से परे होकर, मोह रहित होकर, विषयों से बचते हुए हरि में ही रच जाओ ।
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दीरघ बुधि१० दीरघ भजन, दीरघ भगति प्रकास ।
ते मन ते तन ते सबद, सु कहि जगजीवनदास ॥६८॥
(१०. दीरघ बुधि=विशाल बुद्धि)
जिसकी बुद्धि विशाल है, उसका भजन भी बड़ा है और उसकी भक्ति का प्रकाश भी दीर्घ है । वह मन से, तन से और शब्द से एक ही हो जाता है ।
(क्रमशः)  

गुरुवार, 24 सितंबर 2026

ब्रह्मानन्द को देने वाली

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*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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*सदा लीन आनन्द में, सहज रूप सब ठौर ।*
*दादू देखै एक को, दूजा नाहीं और ॥*
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दादूजी की शिष्या दोउ सकल शिर वन्दनी सु, 
आनन्द की कंदनी सबन मति भाई है । 
रहैं गलतान दोउ भला बुरा कहै कोउ, 
सूक्षम सुरति जाय शून्य में समाई है ॥
राजा मानसिंह कह्यो कन्या तुम व्याह करो, 
वरचो वर सोई हरि सृष्टि जो उपाई है । 
कियो जिन त्याग प्रभु दियो दरशन भाग, 
ब्रह्म रस पाग लिव लागी उभै बाई है ॥४८३॥
दादूजी की शिष्या रामा और श्यामाबाई दोनों ही सबके मस्तकों द्वारा वन्दनीय और श्रेष्ठ थीं अर्थात् उनको सब नमस्कार करते थे । ब्रह्मानन्द की तो वे जड़ ही थीं अर्थात् ब्रह्मानन्द को देने वाली थीं । सर्व की बुद्धि को प्रिय लगती थीं । चाहे उन्हें कोई भला कहो या बुरा उस पर उनका ध्यान जाता ही नहीं था । वे तो दोनों निजानन्द में निमग्न रहती थीं । उनकी मनोवृत्ति तो सूक्ष्म होकर तथा संसार दशा से ऊंची जाकर ब्रह्म में ही समाई रहती थी ।
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कुछ लोगों के कहने से आमेर में आमेर के राजा मानसिंह ने दादूजी से कहा- “इन बाइयों का विवाह कर दो ।” तब दादूजी ने कहा- “उनको पूछो यदि वे करना चाहती हैं तो कर दिया जाय ।” पूछा गया तब दोनों बाइयों ने कहा- जिस हरि ने यह सृष्टि उत्पन्न की है, उसी हरि रूप वर को हमने वर लिया है, अर्थात् वह परमेश्वर ही हमारा स्वामी है । अन्य वर हम नहीं करेंगी । जिसने सांसारिक विषयों का त्याग किया है, उन प्रभु ने दौड़ाकर दर्शन दिया अतः दोनों बाइयों ने सब कुछ त्यागकर  ब्रह्म भक्ति अपनाई थी । 
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दोनों बाइयों की वृत्ति ब्रह्म में ही लगी रहने से वे दोनों ब्रह्मरस(भक्ति) में ही अनुरक्त रहती थीं । अन्य में उनकी वृत्ति जाती ही नहीं थी । दोनों बाइयों का साधन धाम नारायणा में बाईजी की पालका ही था । दोनों बाईजी उक्त स्थान पर ही दादूवाणी मन्दिर में भजन पूजन सत्संग व विश्राम करती थीं । सभाबाईजी के पाट पर कल्याणजी विराजे थे । इनके दो शिष्य थे । 
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यह भक्तमाल के मू. छ. ६५७ में लिखा है “श्री बाईजी सभा, पाट कल्याण दोय शिष” बाईजी रामकुमारीजी के उत्तराधिकारी महन्तों की परंपरा वर्तमान महन्त वृजमोहनदासजी ने हरभाड़े के स्थान की चरण चौकियों के आधार पर भेजी है । कारण- रामकुमारीजी बाईजी के थांभे का मुख्य स्थान हरमाड़ा ही रहा है । नारायण से हरमाड़ा चले गये थे । हरमाड़ा में तालाब के किनारे बगीची है, हनुमानजी का मन्दिर है । 
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एक स्थान इनका चूरू में भी था, बिड़ला घंटाघर से गोशाला जाने वाली सड़क पर था किन्तु अब वह समाप्त हो गया है । हरमाड़े के स्थान की परंपरा अब तक चल रही है । महन्त परंपरा इस प्रकार है-१ राम- कुमारीजी वि. सं. १६५९ से नारायणा में विराजे थे । २-महन्त चेतनदासजी हुये । ये महान् सिद्ध संत थे । इन से हनुमानजी साक्षात् बातें करते थे । इन की अपने समय में महान् प्रतिष्ठा थी । ये भूत भविष्य के ज्ञाता योगीराज थे । इनकी समाधि हरमाड़े में अब भी पूजी जाती है । 
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भक्तों की मनो- कामनायें भावना के अनुसार अब भी मानने वाकों की पूर्ण होती हैं । ये महान् संत हुये हैं । इनकी चरण चौकी में वि. सं. १७०८ अंकित है । ३-महन्त सीताबाईजी । ४ महन्त रामसुखदासजी । ५-महन्त सीतारामजी । ६-महन्त दुईदासजी । ७- महन्त रामदासजी । ८-महन्त लालदासजी । ९- महन्त ब्रिज-मोहनजी वर्तमान हैं । 
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बाईजी के थांभे के महन्त प्रथम चेतनदासजी ने एक महल बनवाया था । वह महल बहुत सुन्दर था और सर्व महलों से प्रथम था । वह वर्तमान भंडार(टीन) के उत्तर में गरीब-दासोतों की पिछली सीढ़ियों के दक्षिण में स्थित भू भाग पर अवस्थित था किन्तु अब नष्ट हो चुका है । अब केवल एक चौक के रूप में है । इसी महल के कारण इस रामकुमारीजी की परंपरा के संतों की संज्ञा महलका हो गई थी । इस महल की ज्ञात संत परम्परा में महल के महन्त कनिरामजी थे । ये दादूद्वारे के भण्डारी होने से भंडारी कनिरामजी कहलाते थे । उनके उत्तराधिकारी महन्त श्योरामजी महलका(गरीबनिवाज) थे । उनके उत्तराधिकारी तोलारामजी हुये जो आचार्य प्रकाशदेवजी के ख़ास बड़े भ्राता थे । वर्तमान में कानदासजी हैं । 
(क्रमशः)

*४७. अध्यातम कौ अंग ६१/६४*

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*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
*श्रद्धेय श्री Tapasvi @Ram Gopal Das की प्रेरणा से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Meta AI*
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*४७. अध्यातम कौ अंग ६१/६४*
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त्रिकुटी५ आगै भीजिये, सो हूनर हरि नाउं ।
कहि जगजीवन नीपजै, नूर पिवै निज ठाउं ॥६१॥
(५. त्रिकुटी=भौंहों के मध्य कुछ ऊपर का स्थान)
त्रिकुटी से आगे भीगना, डूबना ही हरि नाम का सच्चा हुनर है । हे नर ! सच्चा मनुष्य वही है जो इस हुनर को करे, वही प्रधान कर्ता है । जो कर्ता होते हुए भी अकर्ता रहे, देह में रहते हुए भी विदेह रहे ।
जगजीवन जी महाराज कहते हैं - तर्क-वितर्क, चतुराई हुनर नहीं है । सच्चा हुनर, सच्ची कला तो यही है कि तुम उस नाम में भीग जाओ, डूब जाओ । फिर तुम नहीं रहते, बस हरि ही रह जाता है ।
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हूनर तू नर नांव नर, करतब करता६ एह ।
कहि जगजीवन करै अकरता, देही मांहि बिदेह ॥६२॥
(६. करतब करता=प्रधान कर्ता)
संत जगजीवन जी कहते हैं, नर कहलाने लायक नर तो वही है जिसमें यह हुनर है । और यह हुनर क्या है ? यही कि वह कर्ता होते हुए भी अकर्ता हो जाए । हम सब कर्ता हैं - मैं कर रही हूँ, मैंने किया । इसी 'मैं' से सारा बंधन बनता है । सच्चा नर वह है जो संसार के सारे काम करे - सेवा भी करे, व्यवहार भी निभाए, पर भीतर से जाने कि करने वाला मैं नहीं, कराने वाले दादूजी है । हाथ उसके, सत्ता हरि की । जैसे एक अच्छी नौकरानी घर का सारा काम करती है पर जानती है घर मेरा नहीं है । और जब कोई कर्ता होते हुए भी अकर्ता हो गया, तो वह देह में रहते हुए भी विदेह हो गया । शरीर में है, पर शरीर का नहीं है । कमल के पत्ते पर पानी की तरह ।
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षिर मंहि अक्षर खोज हरि, तो खिरै न कबहूं खोड़ि७ ।
कहि जगजीवन नांव भजि, वपु मंहि बावन जोड़ि८ ॥६३॥
(७. खोड़ि=गड्ढा, खोखला । ८. बावन जोड़ि=शरीर ५२ बंधनों से बंधा)
सिर के अंदर ही हरि रूपी अक्षर को खोज लो तो शरीर कभी खोखला नहीं होगा । जगजीवन जी महाराज कहते हैं नाम को भजो, ये शरीर ५२ बंधनों से बंधा है ।
("वपु मंहि बावन जोड़ि" - इसके दो बहुत ही सुंदर अर्थ हैं, 
१. पहला अर्थ - ५२ अक्षरों का जाल : हमारी हिंदी वर्णमाला में मूल ५२ अक्षर माने गए हैं( स्वर-व्यंजन मिलाकर)। संत कहते हैं कि यह सारा संसार इन ५२ अक्षरों के जाल से ही बना है । शास्त्र, वेद, पुराण, झगड़ा, तर्क-वितर्क, मान-बड़ाई सब इसी बावन अक्षर में उलझा है । यह पढ़ा-लिखा ज्ञान है, पर यह मुक्त नहीं करता । और हरि रूपी एक अक्षर - जो अ + क्षर = जिसका नाश न हो, वह अविनाशी नाम है । वह आँखों से पढ़ा नहीं जाता, वह तो सुरति से खोजा जाता है । तो जगजीवन जी महाराज कहते हैं - बाहर के बावन में मत उलझो, अंदर के एक अक्षर(नाम) को खोज लो ।
२. दूसरा अर्थ - शरीर के ५२ बंधन : संत-वाणी में शरीर को बंधनों का घर कहा है । मोटे तौर पर गिनें तो - 
५ ज्ञान इंद्रिय + ५ कर्म इंद्रिय + ५ तत्व + ५ तन्मात्रा + मन + बुद्धि + चित्त + अहंकार = २४
५ मुख्य प्राण (प्राण, अपान, समान, उदान, व्यान) + ५ उप-प्राण (नाग, कूर्म, कृकल, देवदत्त, धनंजय) = १०
३ शरीर के बंधन - स्थूल, सूक्ष्म, कारण + ३ गुण - सत, रज, तम = ६
६ विकार - काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर + ६ अवस्थाएं - भूख, प्यास, शोक, मोह, जन्म, मृत्यु = १२
इसीलिए कहते हैं - "कहि जगजीवन नांव भजि" - इन बंधनों को काटने का एक ही उपाय है, नाम भजन । जैसे ही नाम की धारा अंदर जागती है, ये सारे बंधन ढीले पड़ जाते हैं ।)
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पवन पिंगला१ रवि तपै, चन्द्र पंगुला२ मन ।
कहि जगजीवन मद्धि घर, राम रटै निज जन ॥६४॥
(१. पिंगला=दक्षिण भाग की नाड़ी । २. पंगुला=इड़ा नाड़ी)
पिंगला नाड़ी में सूर्य जैसा पवन तपता है और इड़ा नाड़ी चंद्रमा जैसी शीतल है, जगजीवन जी महाराज कहते हैं ज्ञानी जन इनके मध्य घर में राम को रटता है ।
(क्रमशः) 

बुधवार, 23 सितंबर 2026

बाइयों का समाज में समादर

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*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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*मना ! जप राम नाम लीजे,*
*साधु संगति सुमिर सुमिर, रसना रस पीजै ॥*
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दादूजी के दरबार रहिये जनम भरि,
तोहू काहू बात की कमी न दीखे काई जी ।
तुमको संतोष वे को विधना संवारी आप,
छाजन भोजन करि सर्व सुखदाईजी ॥
हमतो दर्श देखि अति ही निहाल भये,
और अब कहा कहैं मुख से बनाई जी ।
बार बार कर जोरि बीनती करत राजि,
सुन्दर को हंसिकर सीख दीजे बाईजी ॥४॥
उक्त मनहर में बाईजी के समय में नारायणा दादूधाम में संतों को जो अनुकूलतायें थीं, उनका प्रदर्शन करते हुए, बाईजी के कार्य और विचारों से प्रसन्न होकर सुन्दरदासजी नारायणा दादूधाम से विचरने के लिए बाईजी से आज्ञा मांग रहे हैं ॥
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इन्दव –
पीछे तुम्हार हि आय मिलै सब छाजन भोजन जे कछु कीजे ।
आदर मान सबै विधि पाइये नाम तुम्हारो जहां तहां लीजे ॥
बार हि बार कहा तुमसे कहैं सुन्दर की अरदास सुनीजे ।
चित्त हमारो भयो रमि वे करि बाईजी वेगि रजा मोहि दीजे ॥५॥
उक्त इन्दव में बाईजी का प्रभाव बताते हुए जाने की आज्ञा मांग रहे हैं ।
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जे तक द्यौस रहे दरबार में जानत हैं बड़ भाग हमारो ।
जैसी तुम्हारी कृपा हम ऊपर तैसी सदाहि रहो इक सारो ।
मारग चालत होत परिश्रम आबत जात अत्यन्त उन्हारो ।
सुन्दरदास कहै कर जोर जु, बाईजी आयुस पाऊं तुम्हारो ॥६॥
उक्त इन्दव में बाईजी का अपने प्रति स्नेह प्रदर्शित करते हुये तथा अधिक उष्णकाल आ रहा है मार्ग चलने में अति परिश्रम होगा । यह कह कर जाने की आज्ञा शीघ्र मांग रहे हैं ।
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उक्त सवैया सप्तक से सभाकुमारी बाईजी का महत्व प्रकट होता है । सुन्दरदासजी जैसे महान् संतों के ह्रदय में भी सभाकुमारी(रामकुमारी) जी के प्रति कितना आदर है, यह उक्त सप्तक से सूचित हो जाता है । रूपकुमारीजी(श्याम कुमारी) जी बहुत कम बोलती थीं । वह ब्रह्म भजन में लीन रहती थीं । दोनों साथ रहने से जब भी बोलने का प्रसंग आता था तब सभाकुमारीजी बोला करती थीं ।
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राघवदासजी ने भी अपनी भक्तमाल में युगल बाइयों के विषय में दो मनहर दिए हैं, वे भी यहां दिए जाते हैं । उनसे भी ज्ञात होगा कि बाइयों का समाज में कैसा समादर था~
दादूजी के पाट को प्रताप देख्यो दशों दिशि,
रामा श्यामा बाई राजे दोउ ओर चढती ।
दर्शन को आवें संत महन्त प्रवीन१ दीन,
आतमा अनन्त दीसे जै जै कार पढ़ती ।
निरंजन निराकार अलख अपरंपार,
ऐसे रहे रात दिन राम राम रटती ।
राघो कहै ऋद्धि सिद्धि छाजन२ भोजन यश,
जानराय कीन्ही जान सर्व बात बढ़ती ॥४८२॥
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दादूजी की गद्दी का प्रताप उस समय दशों दिशाओं में फैला हुआ देखा जाता था । दादूजी की गद्दी के दोनों ओर रामा(रामकुमारी) और श्यामा(श्याम कुमारी) दोनों बाई बैठी हुई दिखाई देती थीं । एक और रामकुमारीजी और दूसरी ओर श्यामकुमारीजी का दर्शन होता था । (ये उस बीच के समय में ही बैठती थीं जब केवलदासजी ने गद्दी छोड़ी और मसकीनदासजी नहीं बैठे थे) । दोनों बाईजी ध्यान तथा ज्ञान दोनों ही दिशाओं में बढ़ती हुई संतों को ज्ञात होती थीं ।
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दोनों बाईजी के दर्शन करने-सन्त,महन्त, विद्वान१ तथा दीन गरीब सभी आते थे । उनके पास जय ध्वनि करती हुई अनेक आत्मायें देखि जाती थीं । दोनों बाईजी निरंजन, निराकार, अलख और अपरंपार ब्रह्म का नाम रात दिन रटते हुये प्रभु-प्रेम में ऐसे निमग्न रहती थीं, जैसे जल में मछली । राघवदासजी कहते हैं- दोनों बाईयों के पास ऋद्धि, सिद्धि, वस्त्र२, भजन आदि की कुछ भी कमी नहीं रहती थी । जानराय भगवान् ने उनकी अवस्था जानकर उनकी सर्व बातों में वृद्धि कर दी थी और उनका सुन्दर यश भी बढ़ा दिया था ।
(क्रमशः)

*४७. अध्यातम कौ अंग ५७/६०*

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*श्रद्धेय श्री Tapasvi @Ram Gopal Das की प्रेरणा से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Meta AI*
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*४७. अध्यातम कौ अंग ५७/६०*
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झिलमिल जोति पिछांणिये, तेजहि झमकै तार ।
कहि जगजीवन तहां हरि, अम्रित झरै रस सार ॥५७॥
जहाँ झिलमिल करती ज्योति है, जहाँ तेज के तारे झमकते हैं, संत जगजीवन जी कहते हैं वहीं हरि हैं और वहीं से सार रूपी अमृत रस झरता है ।
(जब साधक दसवें द्वार पर सुरति टिकाता है, तो पहले अंधेरा नहीं, एक झिलमिलाती हुई ज्योति दिखती है । जैसे बरसात में बादलों के बीच बिजली झिलमिलाए । यही आत्मा की पहली झलक है । उस झिलमिल ज्योति में आगे चलकर स्थिर तारे जैसा तेज प्रकट होता है । संतों ने उसे ही गुरु का तारा, या सुरति का तारा कहा है । वह टिमटिमाता नहीं, एकटक चमकता है । वही हरि का द्वार है। हरि कोई मूर्ति नहीं, वही प्रकाश-पुंज है, जब सुरति उस तारे में लय हो जाती है, तब वहाँ से अमृत की बूँदें टपकती हैं । योगियों ने इसे सहस्त्रार से झरता अमृत कहा है । उस एक बूँद से मन का सारा खारापन, सारा विषय-विकार मिट जाता है । फिर बाहर का कोई रस अच्छा नहीं लगता)
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नाम निरंजन निरामै२, नाराइण निज रूप ।
कहि जगजीवन निरंतर, निरगुण निरखि अनूप ॥५८॥
(२. निरामै=रोग रहित)
जगजीवन जी महाराज कहते हैं निरंजन का नाम ही रोग-रहित करने वाला है, वही नारायण का अपना रूप है । उस अनुपम निरगुण को निरंतर देखो ।
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हरि हूनर३ नर नीपजै, उपजै भगति अगाध ।
कहि जगजीवन समझि लै, सकल सिखावैं साध ॥५९॥
(३. हूनर=हुनर, कला)
सच्चा हुनर वही है जो मनुष्य में हरि को प्रकट कर दे और अगाध भक्ति उपजा दे । संत जगजीवन जी कहते हैं, जिस हुनर से हरि मिले, वही सबसे श्रेष्ठ है, सभी संतों का यही मत है ।
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जिस हूनर हरि मंहि रहै, सोइ सिरै करि जानि ।
कहि जगजीवन दूसरा, हूनर नहीं है हानि४ ॥६०॥
(४. हानि=अनर्थ, नुकसान)
जगजीवन जी महाराज कहते हैं जिस हुनर से हरि में स्थिर रह सकें उसे ही श्रेष्ठ समझा जाय, इनसे अलग जो हुनर दिखे वह हुनर नहीं हानि ही है ।
(क्रमशः)  

मंगलवार, 22 सितंबर 2026

युगलबाईजी की भेंट के सवैये

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*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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*आत्म बोधी अनुभवी, साधु निर्पख होइ ।*
*दादू राता राम सौं, रस पीवेगा सोइ ॥*
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*युगलबाईजी की भेंट के सवैये =* 
अब युगलबाईजी पर छोटे सुन्दरदासजी की श्रद्धा का परिचय देते हैं, देखिये~ मनहर~
दादूजी के पीछे तो चलाई है गरीबदास, 
ताके पीछे बाईजी चलावत है चौगनी । 
जोई आवे भेट भाव कोउ लेहु कोई खाय, 
राखिये को नाहीं चाव देने ही की सुनी ॥ 
अति ही गंभीर धीर शीतल ज्यों गंगनीर, 
पायो है जु पुरो पीर परम महामुनी । 
सुन्दर विराजै जोर दरबार दोउ ओर, 
संत बैठे-ठौर ठौर दर्शन करे दुनी ॥१॥ 
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उक्त मनहर से ध्वनित होता है कि गरीबदासजी के शिष्य केवलरामजी ने जब गद्दी त्याग दी थी तब बाईजी ने गरीबदासजी से भी चौगनी आचार्य की रीति नीति का निर्वाह किया था । आप गद्दी के बराबर बैठ कर आचार्य का सब कार्य करती रहीं थीं । जब संतों का दरबार लगता था तब गद्दी के दोनों ओर बाइयां बैठकर समाज सम्बन्धी सब विचार किया करती थीं और सबको आचार्य के समान ही आज्ञा देकर समाज को स्थिर रखा था । 
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भगति मुकती भरपूर है भंडार मांहीं, 
रिद्धि और सिद्धि कोउ चाहै सो तहां लहै । 
गुण तो समूह संग ठौर-ठौर राग रंग, 
प्रेम मांहिं भीजे अंग गंग सो गिरा बहै ॥ 
संतन को व्यूह सब आगे बैठो देखियत, 
सभाजी विराजमान सुन्दर कहा कहै । 
वरष वरष प्रति होय जात जै जै कार, 
दादूजी के दरबार दौलत सदा रहै ॥२॥ 
उक्त मनहर में सभाबाईजी के संचालन समय की दादूद्वारे की स्थिति का परिचय दिया है ।
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देश देश ही तैं दौरे आवत सेवक जन, 
दादूजी के दरबार देखन मिलाप जूं । 
जैसे काशी कुरुक्षेत्र मथुरा प्रयाग हेत, 
जात है जगत सब काटन का पाप जू ॥ 
परम पुनीत ठौर ऐसो न तीरथ और, 
जहां के आये से जांहिं संताप जू । 
सुन्दर शोभा अनन्त निशि दिन गावें संत, 
बाईजी विराजें गुरु गादी आपै आप जू ॥३॥ 
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उक्त मनहर में नारायणा दादूधाम को परम पुनीत तीर्थ बताते हुए कहा है कि-बाईजी को आचार्य के अभाव में गादी का संरक्षण करने के लिये समाज ने गादी के पास नहीं बैठाया था किन्तु बाईजी स्वयं ही अपने तप तेज से तब तक गादी का संरक्षण करती थीं, जब तक समाज आचार्य बैठाने पर एक मत नहीं हुआ था । यही अर्थ उक्त मनहर के “बाईजी विराजै गुरुगादी आपै आपजू” से ध्वनित होता है । 
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जब समाज मसकीनदासजी को आचार्य पद पर बैठाने में एक मत हो गया तब बाईजी सभाकुमारीजी अपने साधन धाम बाईजी की पालकां में बैठ कर निर्गुण ब्रह्म की भक्ति करने लग गई थीं । रूपकुमारीजी तो सभाकुमारीजी की अनुगामिनी ही थीं, वह भी उनके साथ ही रहती थीं । दोनों बाईजी की पालकां में ही भजन करती थीं । 
(क्रमशः)

*४७. अध्यातम कौ अंग ५३/५६*

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*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
*श्रद्धेय श्री Tapasvi @Ram Gopal Das की प्रेरणा से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Meta AI*
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*४७. अध्यातम कौ अंग ५३/५६*
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कहि जगजीवन कंवल मंहि, करम रहित करतार ।
उलटि सुरति१ तहां राखिये, निरखि निरंजन सार ॥५३॥
१. सुरति=स्मृति ।
जगजीवन जी कहते हैं, हृदय-कमल में वह करतार बैठा है जो कर्मों से परे है । अपनी सुरति को संसार से उलट कर वहाँ लगाओ और उस सार रूपी निरंजन को देखो ।
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कहि जगजीवन च्यारि जुग, हरि चरचा चित्त राखि ।
हरि चिंतामणि चरचिये, प्रेम सुधारस चाखि ॥५४॥
चारों युगों में बस हरि की चर्चा को ही चित्त में रखो । उस चिंतामणि रूपी हरि का स्मरण प्रेम के अमृत रस को चखते हुए करो ।
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छप्पन भोग लगाइ तहां, जहां निरंजन देव ।
कहि जगजीवन आतमा, परमातम की सेव ॥५५॥
छप्पन भोग वहीं लगते हैं जहाँ निरंजन देव है । आत्मा से परमात्मा की सेवा ही सच्चा भोग है ।
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एहि जुगति अरपै भगति, एहि भाव एहि भेद ।
कहि जगजीवन जागि जन, बिन स्वासा पढ़ि बेद ॥५६॥
इसी युक्ति से, इसी भाव और भेद से भक्ति अर्पण करो । हे जन जागो और बिना श्वास के ही वेद को पढ़ो, अर्थात अजपा जाप करो ।
("बिन स्वासा पढ़ि बेद" का अर्थ, किताब वाला वेद पढ़ना नहीं है । इसका अर्थ है अजपा जाप । 
१. हम लोग माला से या मुँह से जो जाप करते हैं, उसमें श्वास खर्च होती है । 
२. जब सुरति भीतर गगन मंडल में टिक जाती है, तब जाप अपने आप चलने लगता है - बिना जपे । 
३. वहाँ श्वास की डोरी टूट जाती है, प्राण स्थिर हो जाते हैं । 
उसी स्थिरता में वेद का असली भेद समझ में आता है । वही चारों वेदों का सार है - सोऽहम्, तत्त्वमसि । जगजीवन जी महाराज कहना चाहते हैं कि - बाहर के श्वास को रोक कर नहीं, बल्कि भीतर की सुरति को स्थिर करके उस धुन को सुनो जो बिना बजाए बज रही है । वही बिना श्वास का वेद-पाठ है । जैसे मछली पानी में रहते हुए पानी को नहीं जपती, बस उसी में रहती है - वैसे ही जीव राम में रह जाता है)
(क्रमशः) 

सोमवार, 21 सितंबर 2026

*युगल बाइयों का दृढ निश्चय =*

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*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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*दादू पूरणहारा पूरसी, जो चित रहसी ठाम ।*
*अन्तर तैं हरि उमग सी, सकल निरंतर राम ॥*
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*= पद =* 
आप आपणे में खोजो रे भाई, वस्तु अगोचर गुरु लखाई ॥ टेक ॥ 
ज्यौं मही विलोये माखण आवे, त्यों मन मथियाँ तैं तत पावे ॥१॥ 
काष्ट हुताशन रह्या समाई, त्यों मन मांहि निरंजन राई ॥२॥ 
ज्यों अवनी में नीर समाना, त्यों मन माहिं साँच सयाना ॥३॥ 
ज्यों दर्पण के नहिं लागे काई, त्यों मूरति मांहीं निरख लखाई ॥४॥ 
सहजैं मन मथिया तैं तत पाया, दादू उन तो आप लखाया ॥५॥ 
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उक्त उपदेश के अनुसार साधना करके युगल बाइयाँ गार्गी सुलभा के समान योगिनियां हो गई थीं और आजन्म शीलव्रत से ही रही थीं । आमेर में वहाँ पंडितों ने बाइयों का विवाह कराने के लिये आंदोलन किया था तथा आमेर नरेश मानसिंह को प्रेरित किया था और आग्रह किया था कि आप दादूजी को कहकर बाइयों का विवाह करावें । 
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पंडितों के आग्रह से आमेर नरेश मानसिंह ने दादूजी महाराज से प्रार्थना की कि स्वामिन् ! बाइयों का विवाह संस्कार तो करा ही देना चाहिये । तब दादूजी महाराज ने कहा~ बाइयों से पूछ लो । फिर राजा मानसिंह ने बाइयों के पास जाकर उनसे प्रार्थना की~ बाइयों ! आपको विवाह संस्कार अवश्य करा ही लेना चाहिये । तब राजा को बाइयों ने दादूजी महाराज की यह साखी सुनाई~ 
‘जे था कंत कबीर का, सोई वर बरहूँ । 
मनसा वाचा कर्मना, मैं और न करहूँ ॥ 
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कहा भी है~
नृप पूछी आमेर के, बाइयों को दो व्याहि । जो
पति वरयो कबीरजी, सो करि वियो१ न जाहि ॥  
पूर्वकाल के कबीरादि संतों ने जो वर वरा था, उसी परमात्मा को हम वर बनायेंगी । हम मन वचन कर्म से कहती हैं~ अन्य१ किसी को भी स्वामी नहीं बनायेंगी । हमारा स्वामी तो एक परब्रह्म परमात्मा ही है । 
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*युगल बाइयों का दृढ निश्चय =* 
फिर सभाकुमारीजी ने कहा~ राजन्  ! हमारे आगे यह प्रस्ताव रखने से पहले आपको कुच्छ विचार कर लेना चाहिये था । यह प्रस्ताव यदि संसार दशा की बाइयों के पास रक्खा जाता तब तो उचित ही समझा जाता किन्तु हमारे आगे रखना व्यर्थ है, हमारा मन तो परब्रह्म के चिन्तन में लीन रहता है । हमारे मन में विषय सुख संबन्धी संकल्प ही नहीं है । हमें विषयानन्द से अति श्रेष्ठ भजनानन्द मिल रहा है । 
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अम्रित पान करने वाले खाटी छाछ से बनी हुई राबड़ी पीने की इच्छा करेंगे क्या ? वैसे ही जिनको भजनानन्द प्राप्त होता है, वें विषय सुख की इच्छा कभी भी नहीं करते हैं । विषय सुख संबन्धी विचार प्रभु भक्ति से हीन प्राणियों में ही उठते हैं । प्रभु भक्ति ह्रदय में आने पर तो विषय सुख से उपराम हो जाता है । यदि विषय सुख श्रेष्ठ होता तो अनेक राजा महाराजाओं ने उसे त्याग करके भगवद् भक्ति सुख के लिये राज्य का भी त्याग करके वनवासी नहीं बनते । 
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आपको जो इस कार्य में प्रवृत्त करने वाले हैं, वे तो विषय जल की मीन बने हुये हैं । उनको विषय से भिन्न कुछ नहीं भासता । वे संसार दशा के लोग हैं किन्तु हमारी स्थिति उनसे भिन्न ही है । जो सांसारिक प्राणी होते हैं, वे अपने मन के समान ही भक्तों का मन भी समझते हैं, यह उनका अज्ञान ही है । भक्तों के मन में अज्ञानियों के समान विचार नहीं होते हैं । भक्तों के मन में विवेक होता है । वे भलीभांति समझते हैं कि ये सांसारिक विषय सुख हमने प्रति जन्म में भोगे हैं, इनसे आज तक तृप्ति नहीं हुई तो अब क्या होगी । 
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भोग भोगने से तो भोगों की आशा अधिक ही बढ़ती है । घृत डालने से अग्नि शान्त नहीं होती है उलटी बढ़ती ही है । अतः वे संसार के विषय सुख भक्तों के आगे कोई महत्व नहीं रखते हैं । भक्तों को नीरस प्रतीत होते हैं ।इससे उनका त्याग करके ही भक्त लोग भजनानन्द प्राप्त करते हैं और सांसारिक प्राणी तो कुत्ते के समान होते हैं । जैसे कुत्ता खाकर उलटी कर देता है फिर उस उलटी को भी खा जाता है, वैसे ही ये संसार के सभी विषय प्राणी के भोगे हुये हैं । प्रत्येक जन्म में इनको भोगता आया है फिर भी उन झूंठे पदार्थों को ही भोगता रहता है और अपने मन में फूलता रहता है । 
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अतः हमारे विवाह संबन्धी विचार तुम मन से निकाल दो और अपने करने योग्य कार्य करो । किसी के बहकाने से बिना विचार ऐसे प्रश्न नहीं उठाओ । फिर दोनों बाइयां राजा को सिंह रूप में दीखने लगी, तब राजा डर गया । इससे दोनों बाइयों को प्रणाम करके राजा दादूजी के पास आ गया । इस उकर प्रसंग से सिद्ध होता है कि बाइयां योग युक्त तथा दृढ़ निश्चय वाली थीं । युगल बाइयों ने अपना साधनधाम नारायणा ही रखा था । आपका स्थान नारायणा दादूद्वारे में बाईजी की पालकां के नाम से प्रसिद्ध है ।
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केवलरामजी जब गद्दी का मोह छोड़कर अलग हो गये थे, तब अनेक साधु गद्दी पर बैठने को तैयार हुये थे । उस समय सभाकुमारीजी बाईजी ने ही गद्दी की रक्षा की थी । सभाकुमारीजी ने साधु समाज में खड़े होकर कहा था कि~ गद्दी का अधिकारी होगा और समाज एक मत होकर जिसे बैठायेगा, वही गद्दी पर बैठ सकेगा । बाईजी का उक्त वचन सुनकर सब शांत हो गये थे । कारण- बाईजी का तप का तेज ऐसा ही था, वे महान् महात्मा थीं । फिर जब समाज एक मत होकर मसकीनदासजी को बैठाने में राजी हो गया  तब ही आपने गद्दी का संरक्षण छोड़ा था । इससे सूचित होता है कि बाईजी की आज्ञा को सब मानते थे । कारण वे महान् संत थीं । 
(क्रमशः)

*४७. अध्यातम कौ अंग ४९/५२*

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*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
*श्रद्धेय श्री Tapasvi @Ram Gopal Das की प्रेरणा से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Meta AI*
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*४७. अध्यातम कौ अंग ४९/५२*
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कहि जगजीवन खोजि तन, खसम३ लहै तजि खाख४ ।
खिजमत कीजै खरी५ खरि, तौ तन कोड़ी लाख ॥४९॥
(३. खसम=पति)   (४. खाख=धूल या राख)    (५. खिजमत खरी खरि=शुद्ध निष्कलंक सेवा)
संत जगजीवन जी कहते हैं, इस शरीर के अंदर ही खोज कर अपने मालिक, अपने पति रूपी परमात्मा को पा लो, और इस शरीर की धूल, राख जैसी ममता को छोड़ दो । अगर तुम शुद्ध, निष्कलंक भाव से उसकी सेवा करोगे, तो ये कौड़ी जैसा तुच्छ शरीर भी लाखों-करोड़ों जैसा अनमोल हो जाएगा ।
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कहि जगजीवन गाइ गुन, गहरी बात बिचारि ।
गगन मंडल मैं मगन ह्वै, गुनसागर गहि जारि ॥५०॥
संत जगजीवन जी कहते हैं, हरि के गुणों को गाओ और इस गहरी बात पर विचार करो । इस संसार से ऊपर उठकर, गगन मंडल में मगन हो जाओ, और उस गुणों के सागर परमात्मा को पकड़कर, संसार की माया को जला डालो ।
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कहि जगजीवन धणी कर, काया धासै नाम ।
जो घर घेरै पंच६ ऐ, तौ रस प्यावै राम ॥५१॥
(६. पंच=पाँचों इन्द्रियों पर संयम)
संत जगजीवन जी कहते हैं, जो अपने मालिक राम के नाम से इस काया को सुवासित कर लेता है, और जो अपने घर रूपी शरीर में पाँचों इंद्रियों को वश में करके रखता है, तो राम स्वयं उसे अपने प्रेम का रस पिलाते हैं ।
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कहि जगजीवन नाद मंहि, निहचल राखै ब्यंद ।
जोग जुगति जीवन ग्रहै, तौ जक७ पावै ज्यंद८ ॥५२॥
(७. जक=संतोष, तृप्ति)    (८. ज्यंद=प्राण)
संत जगजीवन जी कहते हैं, जो साधक भीतर के अनहद नाद में अपने बिंदु, अपने मन को स्थिर रखता है, और योग की युक्ति से जीवन को संभालता है, तो उसके प्राणों को सच्चा संतोष और तृप्ति मिल जाती है ।
(क्रमशः)  

रविवार, 20 सितंबर 2026

*= युगलबाईजी थांभा =*

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*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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*श्रम न आवै जीव को, अनकिया सब होइ ।*
*दादू मारग महर का, बिरला बूझै कोइ ॥*
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*अथ अध्याय ६* 
*= युगलबाईजी थांभा =* 
खालसे में तीसरा और चौथा थांबा युगलबाईजी का है । ईश्वर की प्रेरणा से दादूजी द्वारा दिए गये लवंग एवं काली मिर्च प्रसाद से वि. सं. १६३६ श्रावण शुक्ला द्वितीया को युगल{एक साथ दो} बाइयों का जन्म दामोदर व्यास की पत्नि उमा के गर्भ से हुआ था, इससे उनकी संज्ञा युगल बाई प्रसिद्ध थी । वैसे उनके नाम सभाकुमारी और रूप- कुमारी थे । आगे चल कर उनको संतगण रामकुमारी, श्यामकुमारी नामों से बोलते थे । 
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लवंग फल स्वरूप में द्विज नारी ने प्राप्त कर गर्भ धारण किया और समय पाकर क्रमशः गरीब व मसकीन नामक बालकों को जन्म दिया, फिर एक-दो वर्ष के अन्तराल के बाद काली मिर्च प्रसाद- प्रभाव से नौवें मांस युगल कन्याऔं को जन्म दिया । गुरुदेव की कृपा से द्विज दामोदर के घर सुन्दर चार सन्ताने खेलने लगी । संत-प्रसाद पाकर उसके आनन्द का वारपार नहीं था ।

अविगत अगोचर परमेश्वर की लीला कौन जान सकता है? उसके गुणों का व्याख्यान कौन कर सकता है? जब साधारण बाजीगर की लीला कोई नहीं समझ सकता, तो फिर श्री हरि जैसे जगत् को नचाने वाले महान् बाजीगर की माया साधारण जन भला कैसे जान सकता है । जैसे ब्रह्मा की मानसिक संकल्प शक्ति से सनकादिक उत्पन्न हु ए। वैसे ही दादूजी महाराज के (वरदान) प्रसाद से विप्र कन्या उमा ने चार सन्ताने गरीबदास, मस्कीन दास, रामा और श्यामा बाईयां वरदान स्वरूप प्रगट हुए। विक्रम समवत् १६३२ में गरीब दास और १६३४ में मस्कीन दास, १६३६ में दोनों युगल कन्यायें(रामाकुमारी व श्यामा कुमारी) ने जन्म लिया । 
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भगवत स्वरूप दादू जी महाराज द्वारा देव कुसुम (लवंग) प्रसाद व वरदान पाकर द्विज सेवक दामोदर एवं उमा अत्यन्न हर्षित रहने लगे । उक्त चारों सन्तान हरि आज्ञा से दादू जी के वर देने पर महा योगेश्वर दादू जी की इच्छा मात्र से हुई थी । कैसे? जैसे ब्रह्मा ने सनकादि आदि की सृष्टि मन की इच्छा मात्र से ही मानस सृष्टि की थी और विश्वामित्र ने अपनी इच्छा से तपो बल द्वारा सृष्टि रची थी । 
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एक हजार कन्याओं के सहित अद्भूत विमान को कर्दम ने मानसी सृष्टि तपोबल से ही की थी । वसिष्ठ ने नभ में मानसी सृष्टि रूप कुटिया तपो बल से ही रचि थी । मत्सेन्द्रनाथ जी ने गोरक्षनाथ की उत्पत्ति तपो बल से मनके द्वारा ही की थी । युवनाश्व के पेट से मानधाता का जन्म इतिहास में अति प्रसिद्ध है । महाभारत वनप. १२६, २७, २८ । वैसे ही दादू जी ने भी भगवत् आज्ञा से उक्त चार व्यक्ति योग रूप तपोबल से ही उत्पन्न किये थे । 
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योगियों में यह सामर्थ्य हो इसमें तो कहना ही क्या है ? राक्षस भी अपनी मायिक सृष्टि रच देतें हैं । द्रोपदी और धृष्टद्युम्न भी बिना बिन्दु के ही उत्पन्न हुये थे । वे मायिक भी नहीं थे । मत्सेन्द्रनाथ भी योग बल से मत्स्य से मानव बने थे । यह इतिहास पुराणादि में प्रसिद्ध है । ईश्वर की तथा ब्रह्मरूप संतों की शक्ति विचित्र होती है । उनके लिए ऐसी बात असम्भव नहीं है ।
(क्रमशः) 

*४७. अध्यातम कौ अंग ४५/४८*

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*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
*श्रद्धेय श्री Tapasvi @Ram Gopal Das की प्रेरणा से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Meta AI*
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*४७. अध्यातम कौ अंग ४५/४८*
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कहि जगजीवन सांस मंहि, रांम निरंजन वास ।
ज्यूं चात्रिग२ जल बूंद कों, यों जन पिव पिव प्यास ॥४५॥
(२. चात्रिग=चातक पक्षी, जो स्वाति नक्षत्र में मेघवृष्टि का जल ही पीता है)
संत जगजीवन जी कहते हैं साँसों में ही निरंजन राम का वास है । जैसे चातक पक्षी को स्वाति की बूंद की प्यास लगी रहती है, वैसे ही भक्त जन पिय-पिय की रट लगाए रहता है ।
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कहि जगजीवन खेलतां, खाता पीता राम ।
हंसतां रोवतां बोलतां, एक निरंजन नाम ॥४६॥
संत जगजीवन जी कहते हैं, ज्ञानी भक्त के लिए तो खेलते हुए, खाते-पीते हुए, हँसते हुए, रोते हुए, बोलते हुए - हर क्रिया में बस एक ही निरंजन राम का नाम रहता है । वह हर काम करते हुए भी राम को नहीं भूलता, उसका हर श्वास ही राम-नाम हो जाता है ।
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कहि जगजीवन जोग मंहि, भाव भगति रस भोग ।
ए अध्यातम अलख हरि, तिहि तन हरष न सोक ॥४७॥
संत जगजीवन जी कहते हैं, सच्चा योग तो वही है जहाँ भाव-भरी भक्ति का रस भोगा जाए । जो अध्यात्म के द्वारा उस अलख हरि को पा लेता है, उसके शरीर में न तो ज्यादा खुशी रहती है, न ज्यादा दुःख । वह हर हाल में एक समान रहता है ।
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कहि जगजीवन कंवल मंहि, किरण अनंत कहंत ।
केवल करता बिसंभर, अबिगत आप रहंत ॥४८॥
संत जगजीवन जी कहते हैं, हमारे हृदय-कमल के अंदर उस परमात्मा की अनंत किरणें चमक रही हैं । वही एक करतार सबका भरण-पोषण करने वाला है, वही बिसंभर है, जो खुद अव्यक्त रूप से सबमें रहता है ।
(क्रमशः) 

शनिवार, 19 सितंबर 2026

*४७. अध्यातम कौ अंग ४१/४४*

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*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
*श्रद्धेय श्री Tapasvi @Ram Gopal Das की प्रेरणा से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Meta AI*
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*४७. अध्यातम कौ अंग ४१/४४*
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कहि जगजीवन संजमी, हरी भजि रांम अगाध ।
सात द्वीप नौ खंड मैं, एक कोइ कै आध ॥४१॥
संत जगजीवन जी कहते हैं संयमी बन कर अगाध राम-हरि को भजो । सात द्वीप और नौ खंड में ऐसा कोई बिरला ही है जो आधा भी भजता हो, अर्थात् सच्चा भक्त बहुत ही दुर्लभ है ।
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कहि जगजीवन जुगत मंहि, भाव भगति जस जोग ।
रांम ह्रिदै महिं राखि हरि, कदै न व्यापै रोग ॥४२॥
संत जगजीवन जी कहते हैं युक्ति के साथ भाव-भक्ति जैसा योग करो । हरि राम को हृदय में रखो, तो कभी कोई रोग नहीं व्यापेगा ।
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कहि जगजीवन तेज मंहि, सेज तिरै ज्यूं नांव ।
भगति अखंडित सो करै, जा के पूरे भाव ॥४३॥
संत जगजीवन जी कहते हैं तेज के भीतर वह इस प्रकार है जैसे पानी पर नाव तिरती है । अखण्ड भक्ति वही कर पाता है जिसके भाव पूरे होते हैं ।
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कहि जगजीवन उनमनी१, उपजै जोग जुगति ।
कोइ जन जाणैं जौहरी, हरि भजि हरि की गति ॥४४॥
(१. उनमनी=चित्त की एकाग्र अवस्था)
संत जगजीवन जी कहते हैं उनमनी अवस्था में योग की युक्ति उपजती है । कोई जौहरी जैसा पारखी जन ही हरि को भज कर हरि की गति को जानता है ।
(क्रमशः) 

शुक्रवार, 18 सितंबर 2026

*२८. साधु असाधु परीक्षा का अंग ~५/८*

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*🌷卐 सत्यराम सा 卐🌷*
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*२८. साधु असाधु परीक्षा का अंग ~५/८*
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*आकार भार दौन्यों द्रसहिं, कंकर पुन: कपूर ।*
*उभय चढे आकाश दिशि, उभय मधि धूर ॥५॥*
ककंर तथा कपूर में आकार और भार दोनों ही दिखाई देते हैं किन्तु कपूर का तो आकार-भार आकाश में चढ़ता है और ककंर का पृथ्वी में मिल कर धूलि हो जाता है, वैसे ही साधु का आत्मा ब्रह्म में लय हो जाता है, असाधु का आकार-भार संसार में रहता है ।
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*आभे१ अवनि२ सु देखिये, त्यों साधु संसार ।*
*एक समाये शून्य में, एक रहै आकार ॥६॥*
जैसे बादल१ और पृथ्वी२ का आकार दिखाई देता है, वैसे ही साधु और सांसारिक असाधु प्राणी का आकार दिखाई देता है, किन्तु जैसे बादल का आकार आकाश में मिल जाता है, वैसे ही साधु ब्रह्म में मिल जाता है और जैसे आकार बना रहता है, वैसे ही असाधु का संसार बना रहता है ।
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*पाणी अरु पाषाण के, पर्वत पृथ्वी माँहिं ।*
*एक समाये सूर में, इक अवनि सु छाडे नाँहिं ॥७॥*
पृथ्वी में बर्फ और पत्थर दोनों ही प्रकार के पर्वत हैं किन्तु बर्फ के पर्वत तो सूर्य में समा जाते हैं, अर्थात गलकर किरणों द्वारा ऊँचे चढ़ जाते हैं, किन्तु पत्थर के पृथ्वी को नहीं छोड़ते, वैसे ही संत तो ब्रह्म में मिल जाते हैं किन्तु असंत संसार को नहीं छोड़ते ।
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*रज्जब पानी पृथ्वी पर पड़या, पृथ्वी पानी माँहिं ।*
*ज्यों सलिल समाना शून्य में, त्यों अवनि आकाश न जाँहिं ॥८॥*
जल पृथ्वी पर पड़ा है और पृथ्वी जल में है, किन्तु जैसे जल आकाश में चला जाता है, वैसे ही पृथ्वी आकाश में नहीं जाती, वैसे ही संत-असंतों के शरीर भी परस्पर मिले रहते हैं, किन्तु संत तो ब्रह्म में लय हो जाते हैं असंत नहीं होते ।
(क्रमशः) 

*४७. अध्यातम कौ अंग ३७/४०*

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*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
*श्रद्धेय श्री Tapasvi @Ram Gopal Das की प्रेरणा से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Meta AI*
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*४७. अध्यातम कौ अंग ३७/४०*
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सहंस किरण३ सप्त बिराजै, कोटि किरण रवि तेज ।
कहि जगजीवन मद्धि जन, खेलैं* पिव की सेज* ॥३७॥
{३. सहंसकिरण=सहस्त्र किरण(हजार किरणों वाला)}
(**-**. खेलैं पीव की सेज=मध्यम मार्गी साधक ही ब्रह्मसाक्षात्कार की साधना कर सकते हैं)
जहाँ हजार किरणों वाले चंद्रमा और करोड़ किरणों वाले सूर्य का तेज विराजमान है । संत जगजीवन जी कहते हैं मध्यम मार्ग के साधक ही वहाँ प्रियतम की सेज पर अर्थात ब्रह्म के साक्षात्कार में खेलते हैं ।
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रेचक पूरक कुम्भक४ त्राटक५, तुरीया ध्यांन६ समाधि ।
कहि जगजीवन सब लहै, अकाल पुरिष आराधि ॥३८॥
(४. ४-४. रेचक, पूरक, कुम्भक=प्राणायाम की क्रियाएँ)
(५. त्राटक=हटयोग के अनुसार किसी बिन्दु पर दृष्टि को स्थिर करना)
(६. तुरीय ध्यान=चतुर्थ ध्यान)  
रेचक, पूरक, कुम्भक, त्राटक और तुरीय ध्यान समाधि । संत जगजीवन जी कहते हैं ये सब साधन अकाल पुरुष की आराधना से ही प्राप्त होते हैं ।
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ए अध्यातम अगम गति, कोइ जन जांनै जांन ।
कहि जगजीवन सबद मैं, सोहं सबद समांन ॥३९॥
यह अध्यात्म की अगम गति है, कोई बिरला ज्ञानी जन ही इसे जानता है । संत जगजीवन जी महाराज कहते हैं शब्द में ही सोहं शब्द समाया हुआ है ।
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सोहं हंसा जाप जपि, हरिजन परसै रांम ।
कहि जगजीवन बसत मैं, मस्त रहै सब ठांम ॥४०॥
सोहं-हंस का जाप जप कर हरि का जन राम को प्राप्त कर लेता है । संत जगजीवन जी कहते हैं वह संसार में रहते हुए भी सब जगह मस्त रहता है । 
(सोहं-हंस का जाप = यह कोई माला से किया जानेवाला जाप नहीं है, यह तो हमारी साँस के साथ अपने आप चल रहा है । 
१. हंस क्या है ? जब हम साँस लेते हैं तो हं की ध्वनि होती है, और छोड़ते हैं तो स: की ध्वनि होती है । इसी हंस: - सोऽहम् को उल्टा करने से सोहं बनता है । शास्त्रों में इसे अजपा जाप कहते हैं - जो बिना जपे ही जपा जा रहा है । दिन-रात में २१६०० बार यह अपने आप चलता है ।
२. सोहं का अर्थ क्या है ? सो = वह(परमात्मा) अहं = मैं हूँ, अर्थात् "वह ब्रह्म मैं ही हूँ" ।
३. साधना कैसे होती है ? साधक कुछ नहीं जपता, वह केवल होशपूर्वक अपनी आती-जाती साँस को देखता है । साँस अंदर आई तो सुना - सो, साँस बाहर गई तो सुना - हं । संत जगजीवन जी कहते हैं, जब यह सुना-सुनी पक्की हो जाती है, तब - हरिजन परसै राम - जीव राम को छू लेता है । फिर उसे जपना नहीं पड़ता, वही जाप अपने आप होने लगता है । इसी को सहज अवस्था कहते हैं ।)
(क्रमशः)