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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*जिसमें सब कुछ सो लिया, निरंजन का नांउँ ।*
*दादू हिरदै राखिए, मैं बलिहारी जांउँ ॥*
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राग बिलावल ॥१३॥ भक्तमहिमा ॥
*राम भजन तैं भलौ भयौ ।*
अठसिधि नौनिधि द्वारै आई, घर कौ सब दालिद्र गयौ ॥टेक॥
एक समैं धू खेलत होते, राजा अपणी गोद लयौ ।
सरब सुहागणि गरब कियौ अति, बाँह पकड़ि धु उठाइ दयौ ॥
रोवत धू माता पैं आये, मात कहै हरि नांहि भज्यौ ।
सबद सुणत धू बन कौं चाले, सब माया कौ मोह तज्यौ ॥
आगैं जात मिले रिषि नारद, ग्यान ध्यान उपदेस दयौ ।
गुर कौ सब्द ह्रदा मैं राख्यौ, जब तैं मधुबन जाइ छयौ ॥
ध्यान धरे धू सुमिरण लागे, अंतरजामी मानि लियौ ।
लोक प्रलोकि दोउ तिनि पाये, राज दियौ धू अटल कियौ ॥
सूत कौ त्रास दई हरिनाकसि, जन प्रहलाद सौं बैर ठयौ ।
मनसा बाचा हरि हरि भाखे, अपणे बैर सौं आप हयौ ॥
घन घोरें बरिखा रुति आई, जो बरस्यौ सो मांहि चयौ ।
नामदेव कै बेठियौ बीठल, छानि छवन कौं आप ठयौ ॥
बेचन गयौ गजी गुदरी मैं, महापुरिष कहूँ बैठि रह्यौ ।
जन कबीर के बारदि आई, भाँति भाँति कौ नाज नयौ ॥
छानि छपरवा सरकी टाटी, “पींजण हूँतौ ताँति तयौ” ।
गरीबदास से गरीब निवाजे, दादू कौ दीदार दयौ ॥
भजन उजागर सुख कौ सागर, जिनहि भज्यौ तिन बहुत भयौ ।
बषनां बहुत गरीब निवाजे, ताथैं ग्रीबनिवाज कह्यौ ॥१४०॥
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पाठान्तर “पींजणहूँतौ ताँति तयौ” के स्थान पर मंगलदासजी महाराज द्वारा संपादित पुस्तक में “ताको पलट र महल भयो” पाठ है । हस्तलिखित दोनों पुस्तकों में उक्त पाठ ही है । रामजी का भजन करने से ही सर्वविध भला हुआ । घर में अठसिद्धि और नवनिधि आई तथा घर का सारा दारिद्र्य समाप्त हो गया ।
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एक बार बालक ध्रुव खेलते-खेलते अपने पिता के दरबार में चले गये । राजा ने उन्हें गोद में उठा लिया । विमाता सुरुचि को यह सह्य न हो सका । उस सर्व सौभाग्यशालिनी ने भारी गर्व करते हुए बाँह पकड़कर बालक ध्रुव को गोदी में से नीचे उतार दिया । रोते हुए ध्रुव अपनी माता सुनीति के पास आये और गोद में से नीचे उतार देने का कारण पूछने लगे ।
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माता ने कहा, बेटा ! तुमने हरि का भजन नहीं किया । इसलिये तुम्हें पिता की अंक = गोद से उतरना पड़ा । माता के शब्दों को सुनते ही सारी माया का मोह त्यागकर ध्रुव भगवद्भजन करने को वन में चल दिये । रास्ते में जाते हुओं को नारद ऋषि मिले जिन्होंने गुरुज्ञान = मंत्र तथा भगवद्ध्यान की विधि का उपदेश दिया । जब से बालक ध्रुव तपस्या करने को मधुवन(मथुरा) में जाकर रहे तब से उन्होंने गुरु प्रदत्त सब्द = उपदेस को हृदय में पूर्णरूपेण धारण करके रखा ।
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परमात्मा का ध्यान करते हुए ध्रुव परमात्म-स्मरण में लग गये और अन्तर्यामी परमात्मा ने उस भजन-ध्यान को स्वीकार कर लिया । परिणामस्वरूप उन्होंने लोक और परलोक दोनों के ही सुख प्राप्त किये । भगवान ने उन्हें पृथिवी का ३६००० वर्ष तक का राज दिया और परलोक में इसके उपरान्त अटल राज प्रदान किया ।
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हिरण्यकश्यपु ने पुत्र प्रहलाद को नाना कष्ट दिये जिससे उसका अपने पुत्र से स्थाई बैर हो गया । प्रहलाद मनसा, वाचा ‘हरि-हरि’ का जाप करते रहे । हिरण्यकश्यपु अपने किये पापों से आप ही मारा गया ।
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घनघोर जल वर्षा करने वाली वर्षाऋतु आई जिसका जितना भी पानी बरसा वह सारा का सारा घर के भीतर ही गिरा । एक बूंद भी छान से ढलक कर घर के बाहर नहीं गिरी । नामदेव के पास छान छाने को कोई भी सहायक नहीं था । अतः स्वयं विट्ठल परमात्मा ही बैठिया = छान छाने वाला बुनकर आया और छान छाकर चला गया ।
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कबीर रेजी बेचने को गुदरी = बाजार में गया । ठंड का समय था । कोई भजनानंदी महात्मा ठंड से काँप रहा था । कबीर ने उस रेजी को उस महापुरुष संत को ओढ़ने को दे दी । इधर विद्वेषी ब्राह्मणों ने मौका देखकर पूरे शहर में डोंडी पिटवा दी कि आज कबीर के यहाँ षड्दर्शन भंडारा है । अतः सभी प्रसाद पाने को पधारें ।
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कबीर घर में कुछ भी व्यवस्था न होने से जंगल में जाकर छुप गया । परमात्मा ने तरह त्र के अन्नों से लदी हुई बालद कबीर के घर भेज दी जिससे षड्दर्शन भंडारा आनंदपूर्वक सम्पन्न हो गया । छान, छप्पर, शिर की टाटी और पींजने की पींजणी सभी कुछ तार-तार हो गये । ऐसे गरीबदास जैसे गरीबों को भी आपने अपनी कृपा से दादू रूप में दर्शन देकर कृतार्थ किया ।
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परमात्मभजन उजागर होता है, प्राप्त होता है । वह अखंड सुख का सागर है । जिन्होंने भी उसको भजा है, उन्होंने ही उससे अखंडानंद की प्राप्ति ही है । बषनां कहता है, परमात्मा ने अनेकों गरीबों, दीनों पर कृपा की है, उनको कृतार्थ किया है । इसलिये मैंने उसको गरीबनवाज नाम से पुकारा है ॥१४०॥