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सोमवार, 9 फ़रवरी 2026

समाधि के सागर में निमग्न

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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
🌷 *#श्रीरामकृष्ण०वचनामृत* 🌷
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*मनसा के पकवान सौं, क्यों पेट भरावै ।*
*ज्यों कहिये त्यों कीजिये, तब ही बन आवै ॥*
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साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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मैं श्रीरामकृष्ण की उक्तियों को सुनकर लिख रहा था, उन्होंने कहा - "हाँ देखो, भंग-भंग रट लगाने से कुछ न होगा । भंग ले आओ, उसे घोंटो और पीओ ।" इसके बाद उन्होंने मुझसे कहा - "तुम्हें तो संसार में रहना है, अतएव ऐसा करो कि नशे का गुलाबी रंग रहा करे । काम-काज भी करते रहो और इधर जरा सुखी भी रहो । तुम लोग शुकदेव की तरह तो कुछ हो नहीं सकोगे कि नशा पीते ही पीते अन्त में अपने तन की खबर भी न रहे - जहाँ-तहाँ बेहोश पड़े रहो ।
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"संसार में रहोगे तो एक आम-मुखतारनामा लिख दो । उनकी जो इच्छा, करें । तुम बस बड़े आदमियों के घर की नौकरानी की तरह रहो । बाबू के लड़के-बच्चों का वह आदर तो खूब करती है, नहलाती-धुलाती है, खिलाती पिलाती है, मानो वह उसी का लड़का हो; परन्तु मन ही मन खूब समझती है कि यह मेरा नहीं है । वहाँ से उसकी नौकरी छूटी नहीं कि बस फिर कोई सम्बन्ध नहीं ।
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"जैसे कटहल काटते समय हाथ में तेल लगा लिया जाता है, उसी तरह(भक्तिरूपी) तेल लगा लेने से संसार में फिर न फँसोगे, लिप्त न होओगे ।"
अब तक जमीन पर बैठे हुए बातें हो रही थीं । अब उन्होंने खाट पर चढ़कर लेटे लेटे मुझसे कहा - "पंखा झलो ।" मैं पंखा झलने लगा । वे चुपचाप लेटे रहे । कुछ देर बाद कहा, "अजी, बड़ी गरमी है, पंखा जरा पानी में भिगा लो ।"
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मैंने कहा, "इधर शौक भी देखता हूँ कम नहीं है !" हँसकर उन्होंने कहा, "क्यों शौक नहीं रहेगा ? - शौक रहेगा क्यों नहीं ?" मैंने कहा - "अच्छा, तो रहे, रहे, खूब रहे ।" उस दिन पास बैठकर मुझे जो सुख मिला वह अकथनीय है ।
अन्तिम बार - जिस समय की बात तुमने तीसरे खण्ड में लिखी है*(*ता. २३ मई १८८५ देखिये ।) - मैं अपने स्कूल के हेडमास्टर को ले गया था, उनके बी. ए. पास करने के कुछ ही समय बाद । अभी थोड़े ही दिन हुए उनसे तुम्हारी मुलाकात हुई थी ।
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उन्हें देखते ही श्रीरामकृष्णदेव ने मुझसे कहा - "क्यों जी, तुम इन्हें कहाँ पा गये ? ये तो बड़े सुन्दर व्यक्ति हैं ।
"क्यों जी, तुम तो वकील हो । बड़ी तेज बुद्धि है । मुझे कुछ बुद्धि दे सकते हो ? तुम्हारे पिताजी अभी उस दिन यहाँ आये थे, आकर तीन दिन रह भी गये हैं ।"
मैंने पूछा - "उन्हें आपने कैसा देखा ?"
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उन्होंने कहा - "बहुत अच्छा आदमी है, परन्तु बीच बीच में बहुत ऊल-जलूल भी बकता है ।"
मैंने कहा - "अब की बार मुलाकात हो तो ऊल-जलूल बकना छुड़ा दीजियेगा ।"
वे इस पर जरा मुस्कराये । मैंने कहा- "मुझे कुछ बातें सुनाइये ।"
उन्होंने कहा - "हृदय को पहचानते हो ?"
मैंने कहा - "आपका भाँजा न ? मुझसे उनका परिचय नहीं है ।"
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श्रीरामकृष्ण - हृदय कहता था, 'मामा, तुम अपनी बातें सब एक साथ न कह डाला करो । हर बार उन्हीं उन्हीं बातों को क्यों कहते हो ?' इस पर मैं कहता था, 'तो तेरा क्या, बोल मेरा है, मैं लाख बार अपना एक ही बोल सुनाऊँगा ।'
मैंने हँसते हुए कहा, 'बेशक, आपने ठीक ही तो कहा है ।'
कुछ देर बाद बैठे ही बैठे ॐ ॐ कहकर वे गाने लगे - 'ऐ मन, तू रूप के समुद्र में डूब जा ।...'
दो-एक पद गाते ही गाते सचमुच वे डूब गये । - समाधि के सागर में निमग्न हो गये ।
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समाधि छूटी । वे टहलने लगे । जो धोती पहने हुए थे, उसे दोनों हाथों से समेटते समेटते बिलकुल कमर के ऊपर चढ़ा ले गये । एक तरफ से लटकती हुई धोती जमीन को बुहारती जा रही थी । मैं और मेरे मित्र, दोनों एक दूसरे को टोंच रहे थे और धीरे धीरे कह रहे थे, 'देखो, धोती सुन्दर ढंग से पहनी गयी है ।' कुछ देर बाद ही 'हत्तेरे की धोती' कहकर, उसे उन्होंने फेक दिया ।
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फिर दिगम्बर होकर टहलने लगे । उत्तर तरफ से न जाने किसका छाता और छड़ी हमारे सामने लाकर उन्होंने पूछा, 'क्या यह छाता और छड़ी तुम्हारी है ?' मैंने कहा, 'नहीं ।' साथ ही उन्होंने कहा, "मैं पहले ही समझ गया था कि यह छाता और छड़ी तुम्हारी नहीं है । मैं छाता और छड़ी देखकर ही आदमी को पहचान लेता हूँ । अभी जो एक आदमी आया था, ऊल-जलूल बहुत कुछ बक गया, ये चीजें निस्सन्देह उसी की हैं ।"
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कुछ देर बाद उसी हालत में चारपाई पर वायव्य की तरफ मुँह करके बैठे गये । बैठ ही बैठे उन्होंने पूछा, "क्यों जी, क्या तुम मुझे असभ्य समझ रहे हो ?"
मैंने कहा, "नहीं, आप बड़े सभ्य हैं । इस विषय का प्रश्न आप करते ही क्यों हैं ?"
श्रीरामकृष्ण - अजी, शिवनाथ आदि मुझे असभ्य समझते हैं । उनके आने पर धोती किसी न किसी तरह लपेटकर बैठना ही पड़ता है । क्या गिरीश घोष से तुम्हारी पहचान है ?
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मैं - कौन गिरीश घोष ? वही जो थियेटर करता है ?
श्रीरामकृष्ण – हाँ ।
मैं - कभी देखा तो नहीं, पर नाम सुना है ।
श्रीरामकृष्ण - वह अच्छा आदमी है ।
मैं - सुना है, वह शराब भी पीता है !
श्रीरामकृष्ण - पिये, पिये न, कितने दिन पियेगा ?
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फिर उन्होंने कहा, 'क्या तुम नरेन्द्र को पहचानते हो ?'
मैं - जी नहीं ।
श्रीरामकृष्ण - मेरी बड़ी इच्छा है कि उसके साथ तुम्हारी जान-पहचान हो जाय । वह बी. ए. पास कर चुका है, विवाह नहीं किया ।
मैं - जी, तो उनसे परिचय अवश्य करूँगा ।
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श्रीरामकृष्ण - आज राम दत्त के यहाँ कीर्तन होगा । वहाँ मुलाकात हो जायगी । शाम को वहाँ जाना ।
मैं - जी हाँ, जाऊँगा ।
श्रीरामकृष्ण - हाँ, जाना, जरूर जाना ।
मैं - आपका आदेश मिला और मैं न जाऊँ ! - अवश्य जाऊँगा ।
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फिर वे कमरे की तस्वीरें दिखाते रहे । पूछा - "क्या बुद्धदेव की तस्वीर बाजार में मिलती है ?"
मैं - सुना है कि मिलती है ।
श्रीरामकृष्ण - एक तस्वीर मेरे लिए ले आना ।
मैं - जी हाँ, अब की बार जब आऊँगा, साथ लेता आऊँगा ।
फिर दक्षिणेश्वर में उन श्रीचरणों के समीप बैठने का सौभाग्य मुझे कभी नहीं मिला ।
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उस दिन शाम को रामबाबू के यहाँ गया । नरेन्द्र को देखा । श्रीरामकृष्ण एक कमरे में तकिये के सहारे बैठे हुए थे, उनके दाहिनी ओर नरेन्द्र थे । मैं सामने था । उन्होंने नरेन्द्र से मेरे साथ बातचीत करने के लिए कहा ।
नरेन्द्र ने कहा, 'आज मेरे सिर में बड़ा दर्द हो रहा है । बोलने की इच्छा ही नहीं होती ।'
मैं - रहने दीजिये, किसी दूसरे दिन बातचीत होगी ।
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उसके बाद उनसे बातचीत हुई थी, अलमोड़े में, शायद १८९७ की मई या जून के महीने में ।
श्रीरामकृष्ण की इच्छा पूरी तो होने की ही थी, इसीलिए बारह साल बाद वह इच्छा पूरी हुई । अहा ! स्वामी विवेकानन्दजी के साथ अलमोड़े में वे उतने दिन कैसे आनन्द में कटे थे ! कभी उनके यहाँ, कभी मेरे यहाँ, और कभी निर्जन में पहाड़ की चोटी पर ! उसके बाद फिर उनसे मुलाकात नहीं हुई । श्रीरामकृष्ण की इच्छा-पूर्ति के लिए ही उस बार उनसे मुलाकात हुई थी ।
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श्रीरामकृष्ण के साथ भी सिर्फ चार-पाँच दिन की मुलाकात है, परन्तु उतने ही समय में ऐसा हो गया था कि उन्हें देखकर जी में आता था जैसे हम दोनों एक ही दर्जे के पढ़े हुए विद्यार्थी हों । उनके पास हो आने पर जब दिमाग ठिकाने आता था, तब जान पड़ता था कि बाप रे ! किसके सामने गये थे !
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उतने ही दिनों में जो कुछ मैंने देखा है - जो कुछ मुझे मिला है, उसी से जी मधुमय हो रहा है । उस दिव्यामृतवर्षा हास्य को यत्नपूर्वक मैंने हृदय में बन्द कर रखा है । अजी, वह आश्रयहीनों का आश्रय हैं । और उसी हास्य से बिखरे हुए अमृत-कणों के द्वारा अमरीका तक में संजीवनी का संचार हो रहा है और यही सोचकर 'ह्रष्यामि च मुहुर्मुहुः, ह्रष्यामि च पुनः पुनः' - मुझे रह-रहकर आनन्द हो रहा है ।
(समाप्त)

रविवार, 8 फ़रवरी 2026

समाधिमग्न

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*सकल भुवन सब आत्मा, निर्विष कर हरि लेइ ।*
*पड़दा है सो दूर कर, कश्मल रहण न देइ ॥*
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साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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घण्टे-डेढ़-घण्टे बाद कीर्तन शुरू हुआ । उस समय मैंने जो कुछ देखा, वह शायद जन्म-जन्मान्तर में भी न भूलूँगा । सब के सब नाचने लगे । केशव को भी मैंने नाचते हुए देखा, बीच में थे श्रीरामकृष्ण, और बाकी सब लोग उन्हें घेरकर नाच रहे थे । नाचते ही नाचते बिलकुल स्थिर हो गये – समाधिमग्न । बड़ी देर तक उनकी यह अवस्था रही ।
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इस तरह देखते और सुनते हुए मैं समझा, ये यथार्थ ही परमहंस हैं । एक दिन और, शायद १८८३ ई. में, श्रीरामपुर के कुछ युवकों को मैं साथ लेकर गया था । उस दिन उन युवकों को देखकर परमहंसदेव ने कहा था, 'ये लोग क्यों आये हैं ?'
मैंने कहा, - 'आपको देखने के लिए ।'
श्रीरामकृष्ण - मुझे ये क्या देखेंगे ? ये सब लोग बिल्डिंग(इमारत) क्यों नहीं देखते जाकर ?
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मैं - ये लोग यह सब देखने नहीं आये । ये आपको देखने के लिए आये हैं ।
श्रीरामकृष्ण - तो शायद ये चकमक पत्थर हैं । आग भीतर है । हजार साल तक चाहे उसे पानी में डाल रखो, परन्तु घिसने के साथ ही उससे आग निकलेगी । ये लोग शायद उसी जाति के कोई जीव हैं ? हम लोगों को घिसने पर आग कहाँ निकलती है ?
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यह अन्त की बात सुनकर हम लोग हँसे । उसके बाद और भी कौन-कौनसी बातें हुई, मुझे याद नहीं । परन्तु जहाँ तक स्मरण है, शायद 'कामिनीकांचन-त्याग' और 'मैं की बू नहीं जाती' इन पर भी बातचीत हुई थी ।
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मैं एक दिन और गया, प्रणाम करके बैठा कि उन्होंने कहा - "वही जिसकी डाट खोलने पर जोर से 'फस्-फस्' करने लगता है, कुछ खट्टा कुछ मीठा होता है - एक वही ले आओगे?" मैंने पूछा – 'लेमोनेड ?' श्रीरामकृष्ण ने कहा- "ले आओ न ।" जहाँ तक मुझे याद है शायद मैं एक लेमोनेड ले आया । इस दिन शायद और कोई न था ।
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मैंने कई प्रश्न किये थे - "आपमें क्या जाति-भेद है ?"
श्रीरामकृष्ण - कहाँ है अब ? केशव सेन के यहाँ की तरकारी खायी । अच्छा, एक दिन की बात कहता हूँ । एक आदमी बर्फ ले आया, उसकी दाढ़ी खूब लम्बी थी, पहले तो खाने की इच्छा न जाने क्यों नहीं हुई, फिर कुछ देर बाद एक दूसरा आदमी उसी के पास से बर्फ ले आया तो मैं दाँतो से चबाकर सब बर्फ खा गया । यह समझो कि जाति-भेद आप ही छूट जाता है ।
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जैसे, नारियल और ताड़ के पेड़ जब बड़े होते हैं तब उनके बड़े बड़े डण्ठलदार पत्ते पेड़ से आप ही टूटकर गिर जाते हैं । इसी तरह जाति-भेद आप ही छूट जाता है । झटका मारकर न छुड़ाना, उन सालों की तरह !
मैंने पूछा - केशवबाबू कैसे आदमी हैं ?
श्रीरामकृष्ण - अजी, वह दैवी आदमी है ।
मैं - और त्रैलोक्यबाबू ?
श्रीरामकृष्ण - अच्छा आदमी है, बहुत सुन्दर गाता है ।
मैं - और शिवनाथबाबू ?
श्रीरामकृष्ण - आदमी अच्छा है, परन्तु तर्क जो करता है - ?
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मैं – हिन्दू और ब्राह्म में अन्तर क्या है ?
श्रीरामकृष्ण - अन्तर और क्या है ? यहाँ शहनाई बजती है । एक आदमी स्वर साधे रहता है, और दूसरा तरह तरह की रागिनियों की करामत दिखाता है । ब्राह्मसमाजवाले ब्रह्म का स्वर साधे हुए हैं और हिन्दू उसी स्वर के अन्दर तरह तरह की रागिनियों की करामत दिखाते हैं ।
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"पानी और बर्फ । निराकार और साकार । जो चीज पानी है, वही जमकर बर्फ बनती है । भक्ति की शीतलता से पानी बर्फ बन जाता है !
"वस्तु एक ही है, अनेक मनुष्य उसे अनेक नाम देते हैं । जैसे तालाब के चारों ओर चार घाट हो । इस घाट में जो लोग पानी भर रहे हैं, उनसे पूछो तो कहेंगे, जल है । उधर के घाट में जो लोग हैं वे पानी कहेंगे । तीसरे घाटवाले कहेंगे, वाटर और चौथे घाट के लोग कहेंगे, एकुआ । परन्तु पानी एक ही है ।"
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मेरे यह कहने पर कि बरीशाल में अचलानन्द अवधूत के साथ मेरी मुलाकात हुई थी, उन्होंने कहा - "वही कोतरंग का रामकुमार न ?" मैंने कहा, 'जी हाँ ।'
श्रीरामकृष्ण - उसे तुम क्या समझे ?
मैं - जी, वे बहुत अच्छे हैं ।
श्रीरामकृष्ण - अच्छा, वह अच्छा है या मैं ?
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मैं - आपकी तुलना उनके साथ ? वे पण्डित हैं, विद्वान् हैं, आप पण्डित और ज्ञानी थोड़े ही हैं ?
उत्तर सुनकर कुछ आश्चर्य में आकर वे चुप हो गये । एक मिनट बाद मैंने कहा, "हाँ, वे पण्डित हो सकते हैं, परन्तु आप बड़े मजेदार आदमी हैं । आपके पास मौज खूब है ।"
अब हँसकर उन्होंने कहा - "खूब कहा, अच्छा कहा ।"
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मुझसे उन्होंने पूछा - "क्या मेरी पंचवटी तुमने देखी है ?"
मैंने कहा, "जी हाँ ।" वहाँ वे क्या करते थे, यह भी कहा - अनेक तरह की साधनाओं की बातें । मैंने पूछा - "उन्हें किस तरह हम पायें ?"
श्रीरामकृष्ण - अजी, चुम्बक जिस तरह लोहे को खींचता है, उसी तरह वे हम लोगों को खींच ही रहे हैं । लोहे में कीच लगा रहने से चुम्बक से वह चिपक नहीं सकता । रोते रोते जब कीच धुल जाता है, तब लोहा आप ही चुम्बक के साथ जुड़ जाता है ।
(क्रमशः)

शनिवार, 7 फ़रवरी 2026

भक्तों के संग में श्रीरामकृष्ण

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🌷 *#श्रीरामकृष्ण०वचनामृत* 🌷
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*दादू मना मनी सब ले रहे, मनी न मेटी जाइ ।*
*मना मनी जब मिट गई, तब ही मिले खुदाइ ॥*
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साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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*(घ) परिच्छेद १, भक्तों के संग में श्रीरामकृष्ण* 
*(एक पत्र), (श्री अश्विनी दत्त द्वारा श्री 'म' को लिखित)*
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प्रिय प्राणों के भाई श्री 'म', तुम्हारा भेजा हुआ श्रीरामकृष्ण वचनामृत, चतुर्थ खण्ड, शरद-पूर्णिमा के दिन मिला । आज द्वितीया को मैंने उसे पढ़कर समाप्त किया । तुम धन्य हो, इतना अमृत तुमने देश भर में सींचा !... खैर, बहुत दिन हुए, तुमने यह जानना चाहा था कि श्रीरामकृष्ण के साथ मेरी क्या बातचीत हुई थी । इसलिए तुम्हें उस सम्बन्ध में कुछ लिखने की चेष्टा कर रहा हूँ । 
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मुझे कुछ श्री 'म' की तरह भाग्य तो मिला नहीं कि उन श्रीचरणों के दर्शन का दिन, तारीख, मुहूर्त, और उनके श्रीमुख से निकली हुई सब बातें बिलकुल ठीक ठीक लिख रखता; जहाँ तक मुझे याद है, लिख रहा हूँ, सम्भव है एक दिन की बात को दूसरे दिन की कहकर लिख डालूँ । और बहुतसी बातें तो भूल ही गया हूँ ।
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शायद सन् १८८१ की पूजा की छुट्टियों के समय पहले-पहल मुझे उनके दर्शन हुए थे । उस दिन केशवबाबू के आने की बात थी । नाव से दक्षिणेश्वर पहुँच, घाट से चढ़कर मैंने एक आदमी से पूछा - "परमहंस कहाँ हैं ?" उस मनुष्य ने उत्तर की ओर के बरामदे में तकिये के सहारे बैठे हुए एक व्यक्ति की ओर इशारा करके बतलाया - "ये ही परमहंस हैं ।" 
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'परन्तु मैंने देखा, दोनों पैर ऊपर उठाये और उन्हें अपने हाथों से घेरकर बाँधे हुए अध-चित होकर वे तकिये का सहारा लिए बैठे हैं । मेरे मन में आया, इन्हें कभी बाबुओं की तरह तकिये के सहारे बैठने या लेटने की आदत नहीं है; सम्भव है, ये ही परमहंस हों । तकिये के बिलकुल पास ही उनके दाहिनी ओर एक बाबू बैठे थे । मैंने सुना, वे राजेन्द्र मित्र हैं । बंगाल सरकार के सहायक सेक्रेटरी रह चुके हैं । उनके दाहिनी ओर कुछ और सज्जन बैठे हुए थे । 
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परमहंसदेव ने कुछ देर बाद राजेन्द्रबाबू से कहा - 'जरा देखो तो सही, केशव आया है या नहीं ।' एक ने जरा बढ़कर देखा, लौटकर उसने कहा - "नहीं आये ।" थोड़ी देर में कुछ शब्द हुआ तब उन्होंने फिर कहा - 'देखो, जरा फिर तो देखो ।' इस बार भी एक ने देखकर कहा - 'नहीं आये ।' साथ ही परमहंसदेव ने हँसते हुए कहा - "पत्तों के झड़ने का शब्द हो रहा था, राधा सोचती थी - मेरे प्राणनाथ तो नहीं आ रहे हैं ! क्यों जी, क्या केशव की सदा की यही रीति है ? आते ही आते रुक जाता है ।" कुछ देर बाद, सन्ध्या हो ही रही थी कि दलबलसमेत केशव आ गये ।
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आते ही जब केशव ने भूमिष्ठ होकर उन्हें प्रणाम किया, तब उन्होंने भी ठीक वैसे ही भूमिष्ठ होकर प्रणाम किया और कुछ देर बाद सिर उठाया । उस समय वे समाधिमग्न थे - कह रहे थे –
"कलकत्ते भर के आदमी इकट्ठे कर लाये हैं । इसलिए कि मैं व्याख्यान दूँगा ! व्याख्यान-आख्यान मैं कुछ न दे सकूँगा । देना हो तो तुम दो । यह सब मुझसे न होगा ।“
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उसी अवस्था में दिव्य भाव से जरा मुस्कराकर कह रहे हैं -
"मैं बस भोजन-पान करूँगा और पड़ा रहूँगा । मैं भोजन करूँगा और सोऊँगा – बस । यह सब मैं न कर सकूँगा । करना हो तो तुम करो । मुझसे यह सब न होगा ।"
केशवबाबू देख रहे हैं और श्रीरामकृष्ण भाव से भरपूर हो रहे हैं । एक-एक बार भावावेश में 'अ: अः' कर रहे हैं ।
श्रीरामकृष्ण की उस अवस्था को देखकर मैं सोच रहा था 'यह ढोंग तो नहीं है ? ऐसा तो मैंने और कभी देखा ही नहीं ।' और मैं जैसा विश्वासी हूँ, यह तो तुम जानते ही हो !
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समाधि-भंग के पश्चात् केशवबाबू से उन्होंने कहा - "केशव, एक दिन मैं तुम्हारे यहाँ गया था, मैंने सुना, तुम कह रहे हो, 'भक्ति की नदी में गोता लगाकर हम लोग सच्चिदानन्द-सागर में जाकर गिरेंगे ।' तब मैंने ऊपर देखा, (जहाँ केशवबाबू और ब्राह्मसमाज की स्त्रियाँ बैठी थीं) और सोचा, तो फिर इनकी क्या दशा होगी ? तुम लोग गृहस्थ हो, एकदम किस तरह सच्चिदानन्द-सागर में जाकर गिरोगे ? तुम लोग तो उस नेवले की तरह हो जिसकी दुम में कंकड़ बाँध दिया गया हो; कुछ हुआ नहीं कि झट वह ताक पर जा बैठता है; परन्तु वहाँ रहे किस तरह ? 
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कंकड़ नीचे की ओर खींचता है और उसे कूदकर नीचे आना पड़ता है । तुम लोग इसी तरह कुछ काल के लिए जप-ध्यान कर सकते हो, परन्तु दारा और सुतरूपी कंकड़ जो पीछे लटका हुआ नीचे की ओर खींच रहा है, वह नीचे उतारकर ही छोड़ता है । तुम लोगों को तो चाहिए भक्ति की नदी में एक बार डुबकी लगाकर निकलो, फिर डुबकी लगाओ और फिर निकलो । इसी तरह करते रहो । एकदम तुम लोग कैसे डूब सकते हो ?"
केशवबाबू ने कहा - "क्या गृहस्थों के लिए यह बात असम्भव है ? महर्षि देवेन्द्रनाथ ठाकुर ?"
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परमहंसदेव ने दो-तीन बार 'देवेन्द्रनाथ ठाकुर, देवेन्द्र, देवेन्द्र' कहकर उन्हें लक्ष्य करके कई बार प्रणाम किया, फिर कहा –
"सुनो, एक के यहाँ देवी-पूजा के समय उत्सव मनाया जाता था, सूर्योदय के समय भी बलि चढ़ती थी और अस्त के समय भी । कई साल बाद फिर वह धूम न रह गयी । एक दूसरे ने पूछा - 'क्यों महाशय, आजकल आपके यहाँ वैसी बलि क्यों नहीं चढ़ायी जाती ?' उसने कहा, 'अजी, अब तो दाँत ही गिर गये !' देवेन्द्र भी अब ध्यान-धारणा करता है – करेगा ही ! परन्तु बड़ी शान का आदमी है - खूब मनुष्यता है उसमें ।
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"देखो, जितने दिन माया रहती है, उतने दिन आदमी कच्चे नारियल की तरह रहता है । नारियल जब तक कच्चा रहता है, तब तक यदि उसका गूदा निकालना चाहो तो गूदे के साथ खोपड़े का कुछ अंश छिलकर जरूर निकल आयगा । और जब माया निकल जाती है तब वह सूख जाता है, - नारियल का गोला खोपड़े से छूट जाता है, तब वह भीतर खड़खड़ाता रहता है, आत्मा अलग और शरीर अलग हो जाता है, फिर शरीर के साथ उसका कोई सम्बन्ध नहीं रह जाता ।
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"यह जो 'मैं' है, यह बड़ी बड़ी कठिनाईयाँ लाकर खड़ी कर देता है । क्या यह 'मैं' दूर होगा ही नहीं ? देखा कि उस टूटे हुए मकान पर पीपल का पेड़ पनप रहा है, उसे काट दो, फिर दूसरे दिन देखो, उसमें कोंपल निकल रही है, - यह 'मैं' भी इसी तरह का है । प्याज का कटोरा सात बार धोओ, परन्तु उसकी बू जाती ही नहीं !"
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न जाने क्या कहते हुए उन्होंने केशवबाबू से कहा - "क्यों केशव, तुम्हारे कलकत्ते में, सुना, बाबू लोग कहते हैं, 'ईश्वर नहीं है ।' क्या यह सच है ? बाबूसाहब जीने पर चढ़ रहे हैं, एक सीढ़ी पर पैर रखा नहीं कि 'इधर क्या हुआ' कहकर गिरे अचेत, फिर पड़ी डाक्टर की पुकार, जब तक डाक्टर आवे-आवे तब तक बन्दे कूच कर गये ! और ये ही लोग कहते हैं कि ईश्वर नहीं हैं !"
(क्रमशः)

गुरुवार, 5 फ़रवरी 2026

*दुःखी जीव तथा नरेन्द्र का उपदेश*

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🌷 *#श्रीरामकृष्ण०वचनामृत* 🌷
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*दादू जीव न जानै राम को, राम जीव के पास ।*
*गुरु के शब्दों बाहिरा, तातैं फिरै उदास ॥*
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साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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*दुःखी जीव तथा नरेन्द्र का उपदेश*
नरेन्द्र गा रहे हैं । गाते हुए रवीन्द्र को मानो उपदेश दे रहे हैं ।
गाने का भाव - "तुम मोह और कुमन्त्रणाएँ छोड़ उन्हें समझो, तुम्हारी सम्पूर्ण व्यथा इस तरह दूर हो जायेगी ।" नरेन्द्र फिर गा रहे हैं –
"पी ले अवधूत, हो मतवाला, प्याला प्रेम हरिरस का रे ।
बाल अवस्था खेलि गँवायो, तरुण भयो नारीबस का रे,
वृद्ध भयो कफ वायु ने घेरा, खाट पड़ो रह्यो शाम-सकारे ॥
नाभि-कमल में है कस्तूरी, कैसे भरम मिटै पशु का रे;
बिन सद्गुरु नर ऐसहि ढूँढै, जैसे मिरिग फिरै वन का रे ॥"
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कुछ देर बाद सब गुरुभाई काली तपस्वी के कमरे में आकर बैठे । गिरीश का बुद्धचरित्र और चैतन्यचरित्र, ये दो नयी पुस्तकें आयी हैं । नरेन्द्र, शशी, राखाल, प्रसन्न, मास्टर आदि बैठे हैं । नये मठ में जब से आना हुआ है, तब से शशी श्रीरामकृष्ण की पूजा और उन्हीं की सेवा में दिनरात लगे रहते हैं । उनकी सेवा देखकर दूसरों को आश्चर्य हो रहा है । श्रीरामकृष्ण की बीमारी के समय वे दिनरात जिस तरह उनकी सेवा किया करते थे, आज भी उसी तरह अनन्यचित्त होकर भक्तिपूर्वक उनकी सेवा किया करते हैं ।
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मठ के एक भाई बुद्धचरित्र और चैतन्यचरित्र पढ़ रहे हैं । स्वरसहित जरा व्यंग के भाव से चैतन्यचरित्र पढ़ रहे हैं । नरेन्द्र ने उनसे पुस्तक छीन ली और कहा - 'इस तरह कोई अच्छी चीज को भी मिट्टी में मिलाता है ?' नरेन्द्र स्वयं चैतन्यदेव के 'प्रेम-वितरण' की कथा पढ़ रहे हैं ।
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मठ के एक भाई - मैं कहता हूँ, कोई किसी को प्रेम दे नहीं सकता ।
नरेन्द्र - मुझे तो श्रीरामकृष्णदेव ने प्रेम दिया है ।
मठ के भाई - अच्छा, क्या सचमुच ही तुम्हें प्रेम दिया है ?
नरेन्द्र - तू क्या समझेगा ! तू (ईश्वर के) नौकरों के दर्जे का है । मेरे सब पैर दाबेंगे, - शरता मित्तर और देसो भी । (सब हँसते हैं) तू शायद यह सोच रहा है कि तूने सब कुछ समझ लिया ? (हास्य)
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मास्टर - (स्वगत) - श्रीरामकृष्ण ने मठ के सभी भाइयों के भीतर शक्ति का संचार किया है, केवल नरेन्द्र के भीतर ही नहीं । बिना इस शक्ति के क्या कभी कामिनी और कांचन का त्याग हो सकता है ?
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दूसरे दिन मंगल है, १० मई । आज महामाया की पूजनतिथि है । नरेन्द्र तथा मठ के सब भाई आज विशेष रूप से जगन्माता की पूजा कर रहे हैं । पूजा-घर के सामने त्रिकोण यन्त्र की रचना की गयी, होम होगा । नरेन्द्र गीता-पाठ कर रहे हैं ।
मणि गंगा-स्नान को गये । रवीन्द्र छत पर अकेले टहल रहे हैं । स्वरसमेत नरेन्द्र स्तवन पढ़ रहे हैं, रवीन्द्र वहीं से सुन रहे हैं -
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ॐ मनोबुद्ध्यहंकारचित्तानि नाहं, न च श्रोत्रजिव्हे न च घ्राणनेत्रे ।
न च व्योम भूमिर्न तेजो न वायुश्चिदानन्दरूपः शिवोऽहं शिवोऽहम् ॥
न च प्राणसंज्ञो न वै पंचवायुर्न वा सप्तधातुर्न वा पंचकोशः ।
न वाक्पाणिपादं न चोपस्थपायुश्चिदानन्दरूपः शिवोऽहं शिवोऽहम् ॥
न मे द्वेषरागौ न मे लोभमोहौ मदो नैव मे नैव मात्सर्यभावः ।
न धर्मो न चार्थो न कामो न मोक्षश्चिदानन्दरूपः शिवोऽहं शिवोऽहम् ॥
न पुण्यं न पापं न सौख्यं न दुःखं, न मन्त्रो न तीर्थो न वेदा न यज्ञाः ।
अहं भोजनं नैव भोज्यं न भोक्ता, चिदानन्दरूपः शिवोऽहं शिवोऽहम् ॥
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रवीन्द्र गंगा-स्नान करके आ गये, धोती भीगी हुई है ।
नरेन्द्र - (मणि के प्रति, एकान्त में) - यह देखो, नहाकर आ गया, अब इसे संन्यास दे दिया जाय तो बहुत अच्छा हो !
(नरेन्द्र और मणि हँसते हैं)
प्रसन्न ने रवीन्द्र से भीगी धोती उतारने के लिए कहा, साथ ही उन्होंने एक गेरुआ वस्त्र भी दिया ।
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नरेन्द्र - (मणि से) - अब वह त्यागियों का वस्त्र पहनेगा ।
मणि - (हँसकर) - किस चीज का त्याग ?
नरेन्द्र - काम-कांचन का त्याग ।
गेरुआ वस्त्र पहनकर रवीन्द्र एकान्त में काली तपस्वी के कमरे में जाकर बैठे । जान पड़ता है कि कुछ ध्यान करेंगे ।
(क्रमशः)

बुधवार, 4 फ़रवरी 2026

रवीन्द्र का पूर्वजीवन

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*दादू माया का गुण बल करै, आपा उपजै आइ ।*
*राजस तामस सात्विकी, मन चंचल ह्वै जाइ ॥*
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साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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*परिच्छेद ४~वराहनगर मठ*
*(१)रवीन्द्र का पूर्वजीवन*
आज सोमवार है, ९ मई, १८८७, जेष्ठ कृष्ण की द्वितीया । नरेन्द्र आदि भक्तगण मठ में हैं । शरद, बाबूराम और काली पुरी गये हुए हैं और निरंजन माता को देखने के लिए । मास्टर आये हैं । भोजन आदि के पश्चात् मठ के भाई जरा देर विश्राम कर रहे हैं । गोपाल(बूढ़े गोपाल) गाने की कापी में गाना उतार रहे हैं ।
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दिन ढल रहा है । रवीन्द्र पागल की तरह आकर उपस्थित हुए । नंगे पैर, काली धारी की सिर्फ आधी धोती पहने हुए हैं, पागल की तरह आँखों की पुतलियाँ घूम रही हैं । लोगों ने पूछा, 'क्या हुआ ?' रवीन्द्र ने कहा, 'जरा देर बाद बतलाता हूँ, मैं अब और घर न लौटूँगा, यहीं आप लोगों के साथ रहूँगा । उसने विश्वासघात किया, जरा देखिये तो साहब, पूरे पाँच साल की आदत, - सो शराब पीना तक मैंने उसके लिए छोड़ दिया - आज आठ महीने हुए मुझे शराब छोड़े, इसका फल यह कि वह पूरी धोखेबाज निकली ।' मठ के भाइयों ने कहा- 'तुम जरा ठण्डे हो लो, तुम आये किस सवारी से ?'
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रवीन्द्र - मैं कलकत्ते से बराबर नंगे पैर पैदल चला आ रहा हूँ ।
भक्तों ने पूछा, 'तुम्हारी आधी धोती क्या हो गयी ?' रवीन्द्र ने कहा, 'आते समय उसने धर-पकड़ की, इसी में आधी धोती फट गयी ।' भक्तों ने कहा, 'तुम गंगा-स्नान करके आओ, आकर ठण्डे होओ, फिर बातचीत होगी ।'
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रवीन्द्र का जन्म कलकत्ते के एक बहुत ही प्रतिष्ठित कायस्थ वंश में हुआ है । उम्र २०-२२ साल की होगी । श्रीरामकृष्ण को उन्होंने दक्षिणेश्वर कालीमन्दिर में देखा था और उनकी कृपा प्राप्त की थी । एक बार तीन रात लगातार वहाँ रह भी चुके थे । स्वभाव के बड़े मधुर और कोमल हैं । श्रीरामकृष्ण इन पर बड़ा स्नेह करते थे । परन्तु उन्होंने कहा था, "तेरे लिए अभी देर है अभी तेरे लिए कुछ भोग बाकी हैं । अभी कुछ न होगा ।
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जब डाकू छापा मारते हैं, तब ठीक उसी समय पुलिस कुछ कर नहीं सकती । जब हलचल कुछ शान्त हो जाती है तब पुलिस आकर गिरफ्तार करती है ।" आज रवीन्द्र वारांगना के जाल में पड़ गये हैं, परन्तु और सब गुण उनमें हैं । गरीबों के प्रति दया, ईश्वर-चिन्तन, यह सब उनमें है । वेश्या को विश्वासघातक जानकर आधी धोती पहने हुए मठ में आये हैं । संसार में अब नहीं लौटेंगे, इसका उन्होंने दृढ़ संकल्प कर लिया है ।
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रवीन्द्र गंगा-स्नान के लिए जा रहे हैं । परामाणिक घाट पर जायेंगे । एक भक्त भी साथ जा रहे हैं ।
उनकी हार्दिक इच्छा है कि साधुओं के साथ इस युवक में चेतना का संचार हो । गंगा-स्नान के पश्चात् रवीन्द्र को वे घाट ही के पासवाले एक श्मशान में ले गये । वहाँ उसे लाशें दिखलाने लगे । कहा - "यहाँ कभी कभी रात को मठ के भाई आकर ध्यान करते हैं । यहाँ हम लोगों के लिए ध्यान करना अच्छा है । संसार की अनित्यता खूब समझ में आती है ।" उनकी यह बात सुनकर रवीन्द्र ध्यान करने के लिए बैठे, परन्तु ज्यादा देर तक ध्यान नहीं कर सके । मन चंचल हो रहा था ।
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दोनों मठ लौटे । पूजा-घर में आकर दोनों ने श्रीरामकृष्ण के चित्र को प्रणाम किया । भक्त ने कहा, मठ के भाई इसी कमरे में ध्यान करते हैं । रवीन्द्र जरा देर के लिए ध्यान करने बैठे । परन्तु ध्यान अधिक देर तक न हो सका ।
मास्टर - क्या मन बहुत चंचल हो रहा है ? शायद इसलिए तुम इतनी जल्दी उठ पड़े ? शायद ध्यान अच्छी तरह जमा नहीं ?
रवीन्द्र - यह निश्चय है कि अब घर न लौटूँगा, परन्तु मन चंचल जरूर है ।
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मास्टर और रवीन्द्र मठ में एकान्त स्थान पर खड़े हैं । मास्टर बुद्ध की बातें कर रहे हैं । देवकन्याओं का एक गाना सुनकर बुद्ध को पहले-पहल चैतन्य हुआ था । आजकल मठ में बुद्धचरित्र और चैतन्यचरित्र की चर्चा प्रायः हुआ करती है । मास्टर वहीं गाना गा रहे हैं ।
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रात को नरेन्द्र, तारक और हरीश कलकत्ते से लौटे । आते ही उन्होंने कहा - 'ओह, खूब खाया !' कलकत्ते में किसी भक्त के यहाँ उनकी दावत थी ।
नरेन्द्र और मठ के दूसरे भाई, मास्टर तथा रवीन्द्र आदि भी, 'दानवों के कमरे' में बैठे हुए हैं । मठ में नरेन्द्र को रवीन्द्र का सब हाल मिल चुका है ।
(क्रमशः)

मंगलवार, 3 फ़रवरी 2026

मेरा परित्राण करो

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🌷 *#श्रीरामकृष्ण०वचनामृत* 🌷
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*जे नर कामिनी परहरैं, ते छूटैं गर्भवास ।*
*दादू ऊँधे मुख नहीं, रहैं निरंजन पास ॥*
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साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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नरेन्द्र - निर्लिप्त संसार कहिये या चाहे जो कहिये, काम-कांचन का त्याग बिना किये न होगा । स्त्री के साथ सहवास करते हुए घृणा नहीं होती ? जहाँ कृमि, कफ, मेध, दुर्गन्ध –
"अमेध्यपूर्णे कृमिजालसंकुले स्वभावदुर्गन्धिविनिन्दितान्तरे ।
कलेवरे मूत्रपूरीषभाविते रमन्ति मूढ़ा विरमन्ति पण्डिताः ॥
"वेदान्त-वाक्यों में जो रमण नहीं करता, हरिरस का जो पान नहीं करता, उसका जीवन ही वृथा है ।
"ओंकारमूलं परमं पदान्तरं गायत्रीसावित्रीसुभाषितान्तरम् ।
वेदान्तरं यः पुरुषो न सेवते वृथान्तरं तस्य नरस्य जीवनम् ॥
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"एक गाना सुनिये - (भावार्थ)
"मोह और कुमन्त्रणा को छोड़ो, उन्हें जानो, तब सम्पूर्ण कष्ट छूट जायेंगे । चार दिन के सुख के लिए अपने जीवन-सखा को भूल गये, यह कैसा ?
"कौपीन धारण बिना किये दूसरा उपाय नहीं - संसारत्याग !" - यह कहकर नरेन्द्र सस्वर गाने लगे –
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"वेदान्तवाक्येषु सदा रमन्तो भिक्षान्नमात्रेण च तुष्टिमन्तः ।
अशोकमन्तःकरणे चरन्तः कौपीनवन्तः खलु भाग्यवन्तः ॥"
नरेन्द्र फिर कह रहे हैं - "मनुष्य संसार में बँधा क्यों रहेगा ? क्यों वह माया में पड़े ? मनुष्य का स्वरूप क्या है ? 'चिदानन्दरूपः शिवोऽहं शिवोऽहं ।' मैं ही वह सच्चिदानन्द हूँ ।"
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फिर स्वरसहित नरेन्द्र शंकराचार्य-कृत स्तव पढ़ने लगे –
ॐ मनो बुद्धयहंकारचित्तानि नाहं, न च श्रोत्रजिह्वे न च घ्राणनेत्रे ।
न च व्योमभूमिर्न तेजो न वायुश्चिदानन्दरूपः शिवोऽहं शिवोऽहम् ॥
एक दूसरा स्तव वासुदेवाष्टक भी नरेन्द्र सस्वर पढ़ रहे हैं । "हे मधुसूदन ! मैं तुम्हारे शरणागत हूँ, मुझ पर कृपा करके काम, निद्रा, पाप, मोह, स्त्री-पुत्र का मोहजाल, विषय-तृष्णा, इन सब से मेरा परित्राण करो और अपने पाद-पद्मों में भक्ति दो ।"
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"ॐ इति ज्ञानरूपेण रागाजीर्णेन जीर्यतः।
कामनिद्रां प्रपन्नोऽस्मि त्राहि मां मधुसूदन ॥
न गतिर्विद्यते नाथ त्वमेकः शरणं प्रभो ।
पापपंके निमग्नोऽस्मि त्राहि मां मधुसूदन ॥
मोहितो मोहजालेन पुत्रदारगृहादिषु ।
तृष्णया पीड्यमानोऽहं त्राहि मां मधुसूदन ॥
भक्तिहीनं च दीनं च दुःखशोकातुरं प्रभो ।
अनाश्रयमनाथं च त्राहि मां मधुसूदन ॥
गतागतेन श्रान्तोऽहं दीर्घसंसारवर्त्मसु ।
येन भूयो न गच्छामि त्राहि मां मधुसूदन ॥
बहुधाऽपि मया दृष्टं योनिद्वारं पृथक् पृथक् ।
गर्भवासे महद्दुःखं त्राहि मां मधुसूदन ॥
तेन देव प्रपन्नोऽस्मि नारायणपरायणः ।
जगत्संसारमोक्षार्थ त्राहि मां मधुसूदन ॥
वाचयामि यथोत्पन्नं प्रणमामि तवाग्रतः ।
जरामरणभीतोऽस्मि त्राहि मां मधुसूदन ॥
सुकृतं न कृतं किंचित् दुष्कृतं च कृतं मया ।
संसारे पापपंकेऽस्मिन् त्राहि मां मधुसूदन ॥
देहान्तरसहस्राणामन्योन्यं च कृतं मया ।
कर्तृत्वं च मनुष्याणां त्राहि मां मधुसूदन ॥
वाक्येन यत्प्रतिज्ञातं कर्मणा नोपपादितम् ।
सोऽहं देव दुराचारस्त्राहि मां मधुसूदन ॥
यत्र यत्र हि जातोऽस्मि स्त्रीषु वा पुरुषेषु वा ।
तत्र तत्राचला भक्तिस्त्राहि मां मधुसूदन ॥"
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मास्टर - (स्वगत) - नरेन्द्र को तीव्र वैराग्य है । इसलिए मठ के अन्य भाइयों की भी यही अवस्था है । इन लोगों को देखते ही श्रीरामकृष्ण के उन भक्तों में, जो संसार में अब भी हैं कामिनीकांचन-त्याग की इच्छा प्रबल हो जाती है । अहा ! इनकी यह कैसी अवस्था है ! दूसरे कुछ भक्तों को उन्होंने (श्रीरामकृष्ण ने) अब भी संसार में क्यों रखा है ? क्या वे कोई उपाय करेंगे ? क्या वे तीव्र वैराग्य देंगे या संसार में ही भुलाकर रख छोड़ेंगे ?
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नरेन्द्र तथा और दो-एक अन्य भाई भोजन करके कलकत्ता गये । नरेन्द्र रात को फिर लौटेंगे । नरेन्द्र के घरसम्बन्धी मुकदमे का अब भी फैसला नहीं हुआ । मठ के भाइयों को नरेन्द्र की अनुपस्थिति सह्य नहीं होती । सब सोच रहे हैं कि नरेन्द्र कब लौटें ।
(क्रमशः)

*वासना के रहते ईश्वर में अविश्वास होता है*

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🌷 *#श्रीरामकृष्ण०वचनामृत* 🌷
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*दादू प्यासा प्रेम का, साहिब राम पिलाइ ।*
*प्रकट प्याला देहु भर, मृतक लेहु जिलाइ ॥*
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साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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*वासना के रहते ईश्वर में अविश्वास होता है*
प्रसन्न - कभी तो तुम कहते हो, भगवान हैं ही नहीं और अब ये सब बातें सुना रहे हो । तुम्हारी बातों का कुछ ठीक ही नहीं । तुम प्रायः मत बदलते रहते हो । (सब हँसते हैं)
नरेन्द्र - यह बात अब कभी न बदलूँगा - जब तक वासनाएँ रहती हैं तब तक ईश्वर पर अविश्वास रहता है । कोई न कोई कामना रहती ही है । कुछ नहीं तो भीतर ही भीतर पढ़ने की इच्छा रह गयी । पास करूँगा, पण्डित होऊँगा, इस तरह की वासना ।
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नरेन्द्र भक्ति से गद्गद होकर गाने लगे ।
'वे शरणागतवत्सल हैं, पिता और माता हैं । ...'
'जय देव, जय देव, जय मंगलदाता, जय जय मंगलदाता ।
संकटभयदुःखत्राता, विश्वभुवनपाता , जय देव, जय देव ॥
नरेन्द्र फिर गा रहे हैं । भाइयों से हरिरस का प्याला पीने के लिए कह रहे हैं । कहते हैं, ईश्वर पास ही हैं, जैसे मृग के पास कस्तूरी ।
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"पीले अवधूत, हो मतवाला, प्याला प्रेम हरिरस का रे ।
बाल अवस्था खेलि गँवायो, तरुण भयो नारीबस का रे ।
वृद्ध भयो कफ वायु ने घेरा, खाट पड़ो रह्यो शाम-सकारे ।
नाभि-कमल में है कस्तूरी, कैसे भरम मिटै पशु का रे ।
बिन सद्गुरु नर ऐसहि ढूँढ़ै, जैसे मिरिग फिरै वन का रे ॥"
मास्टर बरामदे से ये सब बातें और संगीत सुन रहे हैं ।
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नरेन्द्र उठे । कमरे में आते समय कह रहे हैं - 'इन युवकों से बातचीत करते करते मेरा सिर गरम हो गया ।' बरामदे में मास्टर को देखकर उन्होंने कहा, 'मास्टर महाशय, आइये पानी पियें ।'
मठ के एक भाई नरेन्द्र से कह रहे हैं, 'इतने पर भी तुम क्यों कहते हो कि ईश्वर नहीं है ?' नरेन्द्र हँसने लगे ।
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*नरेन्द्र का तीव्र वैराग्य । गृहस्थाश्रम*
दूसरे दिन सोमवार है । ९ मई १८८७ । सबेरे मास्टर मठ के बगीचे में एक पेड़ के नीचे बैठे हुए हैं । मास्टर सोच रहे हैं - "श्रीरामकृष्ण ने मठ के भाइयों का काम-कांचन छुड़ा दिया । अहा ! ईश्वर के लिए ये लोग व्याकुल हो रहें हैं ! यह स्थान मानो साक्षात् वैकुण्ठ है ! मठ के भाई मानो साक्षात् नारायण हैं ! श्रीरामकृष्ण को गये अभी अधिक दिन नहीं हुए । इसलिए वे सब भाव अब भी ज्यों के त्यों बने हैं ।
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"अयोध्या तो वही है, परन्तु राम नहीं है ।'
"इनसे तो उन्होंने(श्रीरामकृष्ण ने) गृहत्याग करा लिया, फिर कुछ और जो हैं, उन्हें ही क्यों घर में रखा है, उनके लिए क्या कोई उपाय नहीं है ?"
नरेन्द्र ऊपर के कमरे से देख रहे हैं । मास्टर अकेले पेड़ के नीचे बैठे हैं । उतरकर हँसते हुए वे कह रहे हैं - 'क्यों मास्टर महाशय, क्या हो रहा है ?'
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कुछ बाते हो जाने पर मास्टर ने कहा - 'अहा ! तुम्हारा स्वर बड़ा मधुर है ! कोई श्लोक कहो ।'
नरेन्द्र स्वर से अपराध-भंजन स्तव कहने लगे । गृहस्थगण ईश्वर को भूले हुए हैं, - बाल्य, प्रौढ़ और वार्धक्य तक वे न जाने कितने अपराध करते हैं ! क्यों वे मनसा, वाचा और कर्मणा ईश्वर की सेवा नहीं करते ? –
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"बाल्ये दुःखातिरेको मललुलितवपुः स्तन्यपाने पिपासा,
नो शक्तश्चेन्द्रियेभ्यो भवगुणजनिताः जन्तवो मां तुदन्ति ।
नानारोगादिदुःखाद्रुदनपरवशः शंकरं न स्मरामि,
क्षन्तव्यो मेऽपराधः शिव शिव शिव भो श्रीमहादेव शम्भो ॥
प्रौढोऽहं यौवनस्थो विषयविषधरैर्पचभिर्मर्मसन्धौ,
दष्टो नष्टो विवेकः सुतधनयुवतिस्वादुसौख्ये निषण्णः ।
शैवीचिन्ताविहीनं मम हृदयमहो मानगर्वाधिरूढम्,
क्षन्तव्यो मेऽपराधः शिव शिव शिव भो श्रीमहादेव शम्भो ॥
वार्धक्ये चेन्द्रियाणां विगतगतिमतिश्चाधिदैवादितापैः,
पापैः रोगैर्वियोर्गस्त्वनवसितवपुः प्रौढिहीनं च दीनम् ।
मिथ्यामोहाभिलाषैर्भमति मम मनो धूर्जटेर्ध्यनिशून्यम्,
क्षन्तव्यो मेऽपराधः शिव शिव शिव भो श्रीमहादेव शम्भो ॥
स्नात्वा प्रत्यूषकाले स्नपनविधिविधौ नाह्यतं गांगतोयं,
पूजार्थं वा कदाचित् बहुतरगहनात् खण्डबिल्वीदलानि ।
नानीता पद्ममाला सरसि विकसिता गन्धधूपौ त्वदर्थ,
क्षन्तव्यो मेऽपराधः शिव शिव शिव भो श्रीमहादेव शम्भो ॥
गात्रं भस्मसितं सितं च हसितं हस्ते कपालं सितं,
खट्वांगं च सितं सितश्च वृषभः कर्णे् सिते कुण्डले ।
गंगाफेनसिता जटा पशुपतेश्चन्द्रः सितो मूर्धनि,
सोऽयं सर्वसितो ददातु विभवं पापक्षयं सर्वदा ॥..."
स्तवपाठ हो गया । फिर बातचीत होने लगी ।
(क्रमशः)

सोमवार, 2 फ़रवरी 2026

*गुरुभाइयों के साथ नरेन्द्र*

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*दादू ऐसा बड़ा अगाध है, सूक्षम जैसा अंग ।*
*पुहुप वास तैं पतला, सो सदा हमारे संग ॥*
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साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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*गुरुभाइयों के साथ नरेन्द्र*
ध्यानवाले कमरे में अर्थात् काली तपस्वीवाले कमरे में नरेन्द्र और प्रसन्न आपस में बातचीत कर रहे हैं । कमरे में एक दूसरी तरफ राखाल, हरीश और छोटे गोपाल हैं । बाद में बूढ़े गोपाल भी आ गये ।
नरेंद्र गीतापाठ करके प्रसन्न को सुना रहे हैं -
“ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति ।
भ्राम्यन् सर्वभूतानि यन्त्रारूढ़ानि मायया ॥
तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत ।
तत् प्रसादात् परां शान्तिं स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम् ॥
सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज ।
अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः ॥
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नरेन्द्र - देखा ? - 'यन्त्रारूढ़' ! 'भ्रामयन् सर्वभूतानि यन्त्रारूढ़ानि मायया ।' इस पर भी ईश्वर को जानने की चेष्टा ! तू कीट से भी गया-बीता है, तू उन्हें जान सकता है ? जरा सोच तो सही आदमी क्या है । ये जो अगणित नक्षत्र देख रहा है, इनके सम्बन्ध में सुना है, ये एक एक Solar system(सौरजगत्) हैं । हम लोगों के लिए जो यह एक ही Solar system है, इसी में आफत है । जिस पृथ्वी की सूर्य के साथ तुलना करने पर वह एक भटे की तरह जान पड़ती है, उस उतनी ही पृथ्वी में मनुष्य चल-फिर रहा है ।
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नरेन्द्र गा रहे हैं । गाने का भाव -
"तुम पिता हो, हम तुम्हारे नन्हे-से बच्चे हैं । पृथ्वी की धूलि से हमारा जन्म हुआ है और पृथ्वी की धूलि से हमारी आँखे भी ढँकी हुई हैं । हम शिशु होकर पैदा हुए हैं और धूलि में ही हमारी क्रीड़ाएँ हो रही हैं, दुर्बलों को अपनी शरण में ग्रहण करनेवाले, हमें अभय प्रदान करो ।
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एक बार हमें भ्रम हो गया है, क्या इसीलिए तुम हमें गोद में न लोगे ? - क्या इसीलिए एकाएक तुम हमसे दूर चले जाओगे ? अगर ऐसा करोगे तो, हे प्रभु हम फिर कभी उठ न सकेंगे, चिरकाल तक भूमि में ही अचेत होकर पड़े रहेंगे । हम बिलकुल शिशु हैं, हमारा मन बहुत ही क्षुद्र है । हे पिता, पग-पग पर हमारे पैर फिसल जाते हैं ।
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इसलिए तुम हमें अपना रुद्रमुख क्यों दिखलाते हो ? - क्यों हम कभी कभी तुम्हारी भौंहों को कुटिल देखते हैं ? हम क्षुद्र जीवों पर क्रोध न करो । हे पिता, स्नेह-शब्दों में हमे समझाओं - हमसे कौनसा दोष हो गया है ? यदि हमसे सैकड़ों बार भी भूल हो जाय, तो सैकड़ों ही बार हमें गोद में उठा लो । जो दुर्बल हैं, वे भला कर क्या सकते हैं ?" "तू पड़ा रह । उनकी शरण में पड़ा रह ।"
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नरेन्द्र भावावेश में आये हुए-से फिर गा रहे हैं - (भावार्थ) –
"हे प्रभु, मैं तुम्हारा गुलाम हूँ । मेरे स्वामी तुम्हीं हो । तुम्हीं से मुझे दो रोटियाँ और एक लंगोटी मिल रही हैं ।"
"उनकी (श्रीरामकृष्णदेव की) बात क्या याद नहीं है ? ईश्वर शक्कर के पहाड़ हैं, और तू चींटी, बस एक ही दाने से तो तेरा पेट भरता है, और तू सोच रहा है कि मैं यह पहाड़ का पहाड़ उठा ले जाऊँगा । उन्होंने कहा है, याद नहीं ? -
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'शुक-देव अधिक से अधिक एक बड़ी चींटी समझे जा सकते हैं ।' इसीलिए तो मैं काली से कहा करता था, 'क्यों रे, तू गज और फीता लेकर ईश्वर को नापना चाहता है ?"
"ईश्वर दया के सागर हैं । उनकी शरण में तू पड़ा रह । वे कृपा अवश्य करेंगे । उनसे प्रार्थना कर -
'यत्ते दक्षिणं मुखं तेन मां पाहि नित्यम् ।‘ –
"असतो मा सद् गमय ।
तमसो मा ज्योतिर्गमय ॥
मृत्योर्माऽमृतं गमय ।
आविराविर्म एधि ॥
रूद्र यत्ते दक्षिणं मुखम् ।
तेन मां पाहि नित्यम् ॥"
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प्रसन्न - कौनसी साधना की जाय ?
नरेन्द्र - सिर्फ उनका नाम लो । श्रीरामकृष्ण का गाना याद है या नहीं ?
नरेन्द्र श्रीरामकृष्णदेव का वह गाना गा रहे हैं, जिसका भाव है –
"ऐ श्यामा, मुझे तुम्हारे नाम का ही भरोसा है । पूजनसामग्री, लोकाचार और दाँत निकालकर हँसने से मुझे क्या काम ?
तुम्हारे नाम के प्रताप से काल के कुल पाश छिन्न-भिन्न हो जाते हैं, शिव ने इसका प्रचार भी खूब कर दिया है, मैंने तो अब इसे ही अपना आधार समझ लिया है । नाम लेता जा रहा हूँ; जो कुछ होने का है, होता रहेगा । क्यों मैं अकारण सोचकर जीवन नष्ट करूँ ? ऐ शिवे, मैंने शिव के वाक्य को सर्वसार समझ लिया है ।"
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प्रसन्न - तुम अभी तो कह रहे हो, ईश्वर है । फिर तुम्हीं बदलकर कहते हो, 'चार्वाक और अन्य दूसरे दर्शनाचार्य कह गये हैं, यह संसार आप ही आप हुआ है ।'
नरेन्द्र - तूने Chemistry (रसायन शासत्र) नहीं पढ़ा ? अरे यह तो बता, Combination (समवाय - संयोग) कौन करता है ? पानी तैयार करने के लिए आक्सीजन, हाइड्रोजन और इलेक्ट्रिसिटी, इन सब चीजों को मनुष्य का हाथ इकट्ठा करता है ।
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"Intelligent Force (ज्ञानपूर्वक शक्तिचालना) तो सब लोग मानते हैं । ज्ञानस्वरूप एक ही है, जो इन सब पदार्थों को चला रहा है ।"
प्रसन्न - दया उनमें है, यह हम कैसे जानें ?
नरेन्द्र - 'यत्ते दक्षिणं मुखं' वेदों में कहा है ।
"जॉन स्टुअर्ट मिल भी यही कहते हैं । जिन्होंने मनुष्य के भीतर दया दी, उनमें न जाने कितनी दया है ! वे (श्रीरामकृष्ण) भी तो कहते थे - 'विश्वास ही सार है ।' वे तो पास ही हैं । विश्वास करने से ही सिद्धि होती हैं ।"
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यह कहकर नरेन्द्र मधुर स्वर में गाने लगे –
"मोको कहाँ ढूँढ़ो बन्दे मैं तो तेरे पास में ।
ना रहता मैं झगड़ि बिगड़ि में, ना छुरी गढ़ास में ।
ना रहता में खाल रोम में, ना हड्डी ना माँस में ॥
ना देवल में ना मसजिद में, ना काशी-कैलास में ।
ना रहता मैं अवध-द्वारका, मेरी भेंट विश्वास में ॥
ना रहता मैं क्रिया करम में, ना योग संन्यास में ।
खोजोगे तो आन मिलूँगा, पल भर की तलाश में ॥
शहर से बाहर डेरा मेरा, कुटिया मेरी मवास में ।
कहत कबीर सुनो भई साधो, सब सन्तन के साथ में ॥"
(क्रमशः)

रविवार, 1 फ़रवरी 2026

*श्रीरामकृष्ण का प्रेम तथा राखाल*

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🌷 *#श्रीरामकृष्ण०वचनामृत* 🌷
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*शब्दों मांहिं राम-रस, साधों भर दीया ।*
*आदि अंत सब संत मिलि, यों दादू पीया ॥*
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साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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*श्रीरामकृष्ण का प्रेम तथा राखाल*
राखाल काली तपस्वी के कमरे में बैठे हुए हैं । पास ही प्रसन्न है । उसी कमरे में मास्टर भी हैं ।
राखाल अपनी स्त्री और लड़के को छोड़कर आये हैं । उनके हृदय में वैराग्य की गति तीव्र हो रही है । उन्हें एक यही इच्छा है कि अकेले नर्मदा के तट पर या कहीं अन्यत्र चले जायें । फिर भी वे प्रसन्न को बाहर भागने से समझा रहे हैं ।
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राखाल - (प्रसन्न से) - कहाँ तू बाहर भागता फिरता है ? यहाँ साधुओं का संग –
क्या इसे छोड़कर कहीं जाना होता है ? - तिसपर नरेन्द्र जैसे व्यक्ति का साथ छोड़कर ? यह सब छोड़कर तू कहाँ जायगा !
प्रसन्न - कलकत्ते में माँ-बाप हैं । मुझे भय होता है कि कहीं उनका स्नेह मुझे खींच न ले । इसीलिए कहीं दूर भाग जाना चाहता हूँ ।
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राखाल - श्रीगुरु महाराज जितना प्यार करते थे, क्या माँ-बाप उतना प्यार कर सकते हैं ? हम लोगों ने उनके लिए क्या किया है, जो वे हमें उतना चाहते थे ? क्यों वे हमारे शरीर, मन और आत्मा के कल्याण के लिए इतने तत्पर रहा करते थे ? हम लोगों ने उनके लिए क्या किया है ?
मास्टर - (स्वगत) अहा ! राखाल ठीक ही तो कह रहे हैं, इसीलिए उन्हें (श्रीरामकृष्ण को) अहेतुक कृपासिन्धु कहते हैं ।
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प्रसन्न - क्या बाहर चले जाने के लिए तुम्हारी इच्छा नहीं होती ?
राखाल - जी तो चाहता है कि नर्मदा के तट पर जाकर रहूँ । कभी कभी सोचता हूँ कि वहीं किसी बगीचे में जाकर रहूँ और कुछ साधना करूँ । कभी यह तरंग उठती है कि तीन दिन के लिए पंचतप करूँ; परन्तु संसारी मनुष्यों के बगीचे में जाने से हृदय इनकार भी करता है ।
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क्या ईश्वर हैं ?
'दानवों के कमरे' में तारक और प्रसन्न दोनों वार्तालाप कर रहे हैं । तारक की माँ नहीं है । उनके पिता ने राखाल के पिता की तरह दूसरा विवाह कर लिया है । तारक ने भी विवाह किया था, परन्तु पत्नी-वियोग हो गया है । मठ ही तारक का घर हो रहा है । प्रसन्न को वे भी समझा रहे हैं ।
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प्रसन्न - न तो ज्ञान ही हुआ और न प्रेम ही, बताओ क्या लेकर रहा जाय ?
तारक - ज्ञान होना अवश्य कठिन है परन्तु यह कैसे कहते हो कि प्रेम नहीं हुआ ?
प्रसन्न - रोना तो आया ही नहीं, फिर कैसे कहूँ कि प्रेम हुआ ? और इतने दिनों में हुआ भी क्या ?
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तारक - क्यों ? तुमने श्रीरामकृष्णदेव को देखा है या नहीं ? फिर यह क्यों कहें कि तुम्हें ज्ञान नहीं हुआ ?
प्रसन्न - क्या खाक होगा ज्ञान ? ज्ञान का अर्थ है जानना । क्या जाना ? ईश्वर है या नहीं इसी का पता नहीं चलता –
तारक - हाँ, ठीक है, ज्ञानियों के मत से ईश्वर है ही नहीं ।
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मास्टर - (स्वगत) – अहा ! प्रसन्न की कैसी अवस्था है ! श्रीरामकृष्ण कहते थे, "जो लोग ईश्वर को चाहते हैं, उनकी ऐसी अवस्था हुआ करती है । कभी कभी ईश्वर के अस्तित्व में सन्देह होता है ।' जान पड़ता है, तारक इस समय बौद्ध मत का विवेचन कर रहे हैं, इसीलिए शायद उन्होंने कहा - 'ज्ञानियों के मत से ईश्वर है ही नहीं ।' परन्तु श्रीरामकृष्ण कहते थे - 'ज्ञानी और भक्त, दोनों एक ही जगह पहुँचेंगे ।'
(क्रमशः)

शुक्रवार, 30 जनवरी 2026

*नरेन्द्र तथा शरणागति*

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🌷 *#श्रीरामकृष्ण०वचनामृत* 🌷
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*दादू राम हृदय रस भेलि कर,*
*को साधु शब्द सुनाइ ।*
*जानो कर दीपक दिया,*
*भ्रम तिमिर सब जाइ ॥*
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साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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*नरेन्द्र तथा शरणागति*
नरेन्द्र वार्तालाप कर रहे हैं । मास्टर भीतर नहीं गये । बड़े घर के पूर्व ओरवाले दालान में टहलते रहे, कुछ अंश सुनायी पड़ रहा था ।
नरेन्द्र कह रहे हैं, 'सन्ध्यादि कर्मों के लिए न तो अब स्थान ही है, न समय ही ।'
एक सज्जन - क्यों महाशय, साधना करने से क्या वे मिलेंगे ।
नरेन्द्र - उनकी कृपा ।
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गीता में कहा है –
"ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेर्जुन तिष्ठति ।
भ्रामयन् सर्वभूतानि यन्त्रारूढ़ानि मायया ॥
तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत ।
तत्प्रसादात् परां शान्तिं स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम् ॥"
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“उनकी कृपा के बिना हुए साधन-भजन कहीं कुछ नहीं होता । इसलिए उनकी शरण में जाना चाहिए ।"
सज्जन - हम लोग यदा-कदा यहाँ आकर आपको कष्ट देंगे ।
नरेन्द्र - जरूर, जब जी चाहे, आया कीजिये ।
"आप लोगों के वहाँ, गंगा-घाट में हम लोग नहाने के लिए जाया करते हैं ।"
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सज्जन - इसके लिए हमारी ओर से कोई रोक-टोक नहीं । हाँ, कोई और न जाया करे ।
नरेन्द्र - नहीं, अगर आप कहें तो हम भी न जाया करें ।
सज्जन - नहीं, नहीं, ऐसी बात नहीं; परन्तु हाँ, अगर आप देखें कि कुछ और लोग भी जा रहे हैं तो आप न जाइयेगा ।
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सन्ध्या के बाद फिर आरती हुई । भक्तगण फिर हाथ जोड़कर एकस्वर से 'जय शिव ओंकार' गाते हुए श्रीरामकृष्ण की स्तुति करने लगे । आरती हो जाने पर भक्तगण दानवों के कमरे में जाकर बैठे । मास्टर बैठे हुए हैं । प्रसन्न गुरुगीता का पाठ करके सुनाने लगे । नरेन्द्र स्वयं आकर सस्वर पाठ करने लगे । नरेन्द्र गा रहे हैं –
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"ब्रह्मानन्दं परमसुखदं केवलं ज्ञानमूर्तिम्
द्वन्द्वातीतं गगनसदृशं तत्त्वमस्यादिलक्ष्यम् ।
एकं नित्यं विमलमचलं सर्वदा साक्षिभूतम्
भावातीतं त्रिगुणरहितं सद्वरुं तं नमामि ।"
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फिर गाते हैं –
"न गुरोरधिकं न गुरोरधिकम् । 
शिवशासनतः शिवशासनतः ॥
श्रीमत् परं ब्रह्म गुरुं वदामि । 
श्रीमत् परं ब्रह्म गुरुं भजामि ॥
श्रीमत् परं ब्रह्म गुरुं स्मरामि । 
श्रीमत् परं ब्रह्म गुरुं नमामि ॥"
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नरेन्द्र सस्वर गीता का पाठ कर रहे हैं और भक्तों का मन उसे सुनते हुए निर्वात निष्कम्प दीप-शीखा की भाँति स्थिर हो गया । श्रीरामकृष्ण सत्य कहते थे कि 'बंसी की मधुर ध्वनि सुनकर सर्प जिस तरह फन खोलकर स्थिर भाव से खड़ा रहता है, उसी प्रकार नरेन्द्र का गाना सुनकर हृदय के भीतर जो हैं, वे भी चुपचाप सुनते रहते हैं ।' अहा ! मठ के भाइयों की गुरु के प्रति कैसी तीव्र भक्ति है !
(क्रमशः)

गुरुवार, 29 जनवरी 2026

*पिता-पुत्र संवाद । पहले माँ-बाप या पहले ईश्वर ?*

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🌷 *#श्रीरामकृष्ण०वचनामृत* 🌷
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*दादू कुसंगति सब परिहरै, मात पिता कुल कोइ ।*
*सजन स्नेही बांधवा, भावै आपा होइ ॥*
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साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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*पिता-पुत्र संवाद । पहले माँ-बाप या पहले ईश्वर ?*
श्रीयुत शशी के पिता आये हुए हैं । उनके पिता अपने लड़के को मठ से ले जाना चाहते हैं । श्रीरामकृष्ण की बीमारी के समय प्रायः नौ महीने तक लगातार शशी ने उनकी सेवा की थी । उन्होंने कालेज में बी. ए. तक अध्ययन किया था । प्रवेशिका में इन्हें छात्रवृत्ति मिली थी ।
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इनके पिता गरीब होने पर भी निष्ठावान् ब्राह्मण हैं और साधना भी करते हैं । शशी अपने माता-पिता के सब से बड़े लड़के हैं । उनके माता-पिता को बड़ी आशा थी कि ये लिख-पढ़कर रोजगार करके उनका दुःख दूर करेंगे; परन्तु इन्होंने ईश्वर-प्राप्ति के लिए सब को छोड़ दिया था । अपने मित्रों से ये रो-रोकर कहा करते थे, 'क्या करूँ, मेरी समझ में कुछ नहीं आता ! हाय ! माता-पिता की मैं कुछ भी सेवा न कर सका ।
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उन्होंने न जाने कितनी आशाएँ की थीं ! मेरी माता को अलंकार-आभूषण पहनने को नहीं मिले । मेरी कितनी साध थी कि उन्हें गहने पहनाऊँगा ! कहीं कुछ भी न हुआ । घर लौट जाना मुझे भार-सा जान पड़ता है । उधर श्रीगुरुमहाराज ने कामिनी-कांचन का त्याग करने के लिए कहा है । अब तो जाने की जगह रही ही नहीं ।'
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श्रीरामकृष्ण की महासमाधि के पश्चात् शशी के पिता ने सोचा, बहुत सम्भव है, अब वह घर लौटे; परन्तु कुछ दिन घर रहने के पश्चात् जब मठ स्थापित हुआ तब मठ में आते-जाते ही शशी सदा के लिए मठ में रह गये । जब से यह परिस्थिति हुई तब से उनके पिता उन्हें ले जाने के लिए प्रायः आया करते हैं । परन्तु शशी घर जाने का नाम भी नहीं लेते । आज जब उन्होंने यह सुना कि पिताजी आये हुए हैं, वे एक दूसरे रास्ते से नौ दो ग्यारह हो गये ताकि उनसे भेंट न हो ।
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उनके पिता मास्टर को पहचानते थे । वे मास्टर के साथ ऊपरवाले बरामदे में टहलते हुए उनसे बातचीत करने लगे ।
पिता - यहाँ कर्ता कौन है ? यही नरेन्द्र सारे अनर्थों का कारण जान पड़ता है । सब लड़के राजी-खुशी घर लौट गये थे । फिर से स्कूल-कालेज जाने लगे थे ।
मास्टर - यहाँ कर्ता(मालिक) कोई नहीं है । सब बराबर हैं । नरेन्द्र क्या करे ? बिना अपनी इच्छा के क्या कोई आ सकता है ? क्या हम लोग सदा के लिए घर छोड़कर आ सके हैं ?
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पिता - अजी, तुम लोगों ने तो अच्छा किया, क्योंकि दोनों तरफ की रक्षा कर रहे हो, तुम लोग जो कुछ कर रहे हो, इसमें धर्म नहीं है क्या ? हम लोगों की भी तो यही इच्छा है कि शशी यहाँ भी रहे और वहाँ भी रहे । देखो तो जरा, उसकी माँ कितना रो रही है !
मास्टर दुःखित होकर चुप हो गये ।
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पिता - और साधुओं की तलाश में इतना क्यों मारा-मारा फिरता है ? वह कहे तो मैं उसे एक अच्छे महात्मा के पास ले जाऊँ । इन्द्रनारायण के पास एक महात्मा आये हुए हैं, बहुत सुन्दर स्वभाव है । चलें, देखें न ऐसे महात्मा को !
राखाल और मास्टर काली तपस्वी के घर के पूर्व ओर के बरामदे में टहल रहे हैं । श्रीरामकृष्ण और उनके भक्तों के सम्बन्ध में वार्तालाप हो रहा है ।
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राखाल - (व्यस्त भाव से) - मास्टर महाशय, आइये, सब एक साथ साधना करें ।
"देखिये न, अब घर भी सदा के लिए छोड़ दिया है । अगर कोई कहता है, 'ईश्वर तो मिले ही नहीं, फिर क्यों अब यह सब हो रहा है ?' - तो इसका उत्तर नरेन्द्र बड़ा सुन्दर देता है । कहता है, 'राम नहीं मिले तो क्या इसलिए हमें श्याम (अमुक किसी भी) के साथ रहकर लड़के-बच्चों का बाप बनना ही होगा ?' अहा ! एक एक बात नरेन्द्र बड़े मार्के की कह देता है । जरा आप भी पूछियेगा ।"
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मास्टर - ठीक तो है । राखाल भाई, देखता हूँ, तुम्हारा मन भी खूब व्याकुल हो रहा है ।
राखाल - मास्टर महाशय, क्या कहूँ, दोपहर को नर्मदा जाने के लिए जी में कैसी विकलता थी । मास्टर महाशय, साधना कीजिये, नहीं तो कहीं कुछ न होगा । देखिये न, शुकदेव भी डरते थे । जन्मग्रहण करते ही भगे । व्यासदेव ने खड़े होने के लिए कहा, परन्तु वे खड़े भी नहीं होते थे ।
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मास्टर - योगोपनिषद् की कथा है । माया के राज्य से शुकदेव भाग रहे थे । हाँ, व्यास और शुकदेव की कथा बड़ी ही रोचक है । व्यास संसार में रहकर धर्म करने के लिए कह रहे थे । शुकदेव ने कहा, 'ईश्वर के पादपद्मों में ही सार है ।' और संसारियों के विवाह तथा स्त्री के साथ रहने पर उन्होंने घृणा प्रकट की ।
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राखाल - बहुतेरे सोचते हैं, स्त्री को न देखा तो बस फतह है । स्त्री को देखकर सिर झुका लेने से क्या होगा ? कल रात को नरेन्द्र ने खूब कहा, 'जब तक अपने भीतर काम है, तभी तक स्त्री की सत्ता है, अन्यथा स्त्री और पुरुष में कोई भेद नहीं रह जाता ।'
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मास्टर - ठीक है । बालक और बालिकाओं में यह भेद-बुद्धि नहीं रहती ।
राखाल - इसलिए तो कहता हूँ, हम लोगों को चाहिए कि साधना करें । माया के पार गये बिना ज्ञान कैसे होगा ? चलिये, बड़े कमरे में चलें । वराहनगर से कुछ शिक्षित मनुष्य आये हुए हैं । नरेन्द्र से उनकी क्या बातचीत हो रही है, चलिये सुनें ।
(क्रमशः)

बुधवार, 28 जनवरी 2026

*नरेन्द्र तथा धर्मप्रचार । ध्यानयोग और कर्मयोग*

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🌷 *#श्रीरामकृष्ण०वचनामृत* 🌷
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*घीव दूध में रमि रह्या, व्यापक सब ही ठौर ।*
*दादू वक्ता बहुत हैं, मथि काढैं ते और ॥*
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साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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*नरेन्द्र तथा धर्मप्रचार । ध्यानयोग और कर्मयोग*
नरेन्द्र 'दानवों के कमरे' में बैठे हुए हैं । चुन्नीलाल, मास्टर तथा मठ के और भाई भी बैठे हुए हैं । धर्म-प्रचार की बातें होने लगी ।
मास्टर - (नरेन्द्र से) - विद्यासागर कहते हैं, 'मैं तो बेतों की मार खाने के डर से ईश्वर की बात किसी दूसरे से नहीं कहता ।'
नरेन्द्र - बेतों की मार खाने का क्या मतलब ?
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मास्टर - विद्यासागर कहते हैं, 'सोचो मरने के बाद हम सब ईश्वर के पास गये । सोचो कि केशव सेन को यमदूत ईश्वर के पास ले गये । केशव ने संसार में पाप भी किया है । जब यह सप्रमाण सिद्ध हुआ, तब बहुत सम्भव है, ईश्वर कहें कि इसे पच्चीस बेंत लगाओ । इसके बाद, सोचो, मुझे ले गये । मैं भी अगर केशव सेन के समाज में जाता हूँ, अन्याय करता हूँ, तो इसके लिए सम्भव है, आदेश हो कि इसको बेंत लगाओ ।
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तब, अगर मैं कहूँ कि केशव सेन ने ही मुझे इस तरह समझाया था, तो सम्भव है कि ईश्वर दूत से कहें, "केशव सेन को फिर ले आओ ।" केशव के आने पर सम्भव है, उससे वे पूछें - "क्या तूने इसे उपदेश दिया था ? खुद तो तू ईश्वर के सम्बन्ध में कुछ जानता नहीं और दूसरे को उपदेश दे रहा था ? है कोई - इसको पच्चीस बेंत और लगाओ ।" " (सब हँसते हैं)
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"इसीलिए विद्यासागर कहते हैं, 'मैं खुद तो सम्हल सकता ही नहीं, फिर दूसरों के लिए बेंत क्यों सहूँ ? (सब हँसते हैं) मैं खुद तो ईश्वर के सम्बन्ध में कुछ जानता नहीं, फिर दूसरे को क्या लेक्चर देकर समझाऊँ ?’ "
नरेन्द्र - जिसने इस विषय को (ईश्वर को) नहीं समझा, उसने और दस-पाँच विषयों को कैसे समझ लिया ?
मास्टर - दस-पाँच विषय कैसे ?
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नरेन्द्र - जिसने इस विषय को नहीं समझा, उसने दया और उपकार कैसे समझ लिया ? – स्कूल कैसे समझ लिया ? स्कूल खोलकर बच्चों को विद्या पढ़ानी चाहिए और संसार में प्रवेश करके, विवाह करके, लड़कों और लड़कियों का बाप बनना ही ठीक है, यही कैसे समझ लिया ?
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"जो एक बात को अच्छी तरह समझता है, वह सब बातों की समझ रखता है ।"
मास्टर - (स्वगत) - सच है, श्रीरामकृष्ण भी तो कहते थे - "जिसने ईश्वर को समझा है, वह सब कुछ समझता है ।" और संसार में रहना, स्कूल करना, इन सब बातों के सम्बन्ध में उन्होंने कहा था, "ये सब रजोगुण से होते हैं ।" विद्यासागर में दया है, इस प्रसंग में उन्होंने कहा था, "यह रजोगुणी सत्त्व है, इसमें दोष नहीं ।"
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भोजन आदि के पश्चात् मठ के सब गुरुभाई विश्राम कर रहे हैं । मास्टर और चुन्नीलाल नैवेद्यवाले कमरे के पूर्व ओर अन्दर से महल की जो सीढ़ी है, उसके पटाव पर बैठे हुए वार्तालाप कर रहे हैं । चुन्नीलाल बतला रहे हैं किस तरह उन्होंने दक्षिणेश्वर में पहले-पहले श्रीरामकृष्ण के दर्शन किये ।
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संसार में जी नहीं लग रहा था, इसलिए एक बार वे पहले संसार छोड़कर चले गये थे और तीर्थों में भ्रमण किया करते थे । वही सब बातें हो रही हैं । कुछ देर में नरेन्द्र भी पास आकर बैठे । फिर योगवासिष्ठ की बातें होने लगीं ।
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नरेन्द्र - (मास्टर से -) और विदूरथ का चाण्डाल होना ?
मास्टर - क्या तुम लवण की बात कह रहे हो !
नरेन्द्र - अच्छा, क्या आपने योगवासिष्ठ पढ़ा है ।
मास्टर - हाँ, कुछ पढ़ा है ।
नरेन्द्र - क्या यहीं की पुस्तक पढ़ी है ?
मास्टर - नहीं, मैंने घर में कुछ पढ़ा था ।
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मठ की इमारत से मिली हुई पीछे कुछ जमीन है ! वहाँ बहुतसे पेड़-पौधे हैं । मास्टर पेड़ के नीचे अकेले बैठे हुए हैं, इसी समय प्रसन्न आ पहुँचे । दिन के तीन बजे का समय होगा ।
मास्टर - इधर कुछ दिनों से कहाँ थे तुम ! तुम्हारे लिए सब के सब बड़े सोच में पड़े हुए हैं । उनसे मुलाकात हुई ? तुम कब आये ?
प्रसन्न - मैं अभी आया, आकर मिल चुका हूँ ।
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मास्टर - तुमने चिट्ठी लिखी थी कि मैं वृन्दावन चला । हम लोग बड़ी चिन्ता में पड़े थे । तुम कितनी दूर गये थे ?
प्रसन्न – कोन्नगर तक गया था । (दोनों हँसते हैं)
मास्टर - बैठो, जरा कुछ कहो, सुनूँ । पहले तुम कहाँ गये थे ?
प्रसन्न - दक्षिणेश्वर कालीमन्दिर - एक रात वहीं रहा ।
मास्टर - (सहास्य) - हाजरा महाशय अब किस भाव में हैं ?
प्रसन्न - हाजरा ने कहा, 'मुझे भला क्या समझते हो ?' (दोनों हँसते हैं)
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मास्टर - (सहास्य) - तुमने क्या कहा ?
प्रसन्न - मैं चुप हो रहा ।
मास्टर – फिर ?
प्रसन्न - फिर उसने कहा, 'मेरे लिए तम्बाकू ले आये हो ?' (दोनों हँसते हैं) मेहनत पूरी करा लेना चाहता है । (हास्य)
मास्टर - फिर तुम कहाँ गये ?
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प्रसन्न - फिर कोन्नगर गया । रात को एक जगह पड़ा रहा । और भी आगे चले जाने के लिए सोचा । पश्चिम जाने के लिए किराये के लिए भलेमानसों से पूछा कि यहाँ किराया मिल सकता है या नहीं ।
मास्टर - उन लोगों ने क्या कहा ?
प्रसन्न - कहा, 'धेली-रुपया कोई चाहे दे दे, पर इतना किराया अकेला कौन देगा ?' (दोनों हँसे)
मास्टर - तुम्हारे साथ क्या था ?
प्रसन्न - दो-एक कपड़े और श्रीरामकृष्णदेव की तस्वीर । तस्वीर मैंने किसी को नहीं दिखलायी ।
(क्रमशः)

मंगलवार, 27 जनवरी 2026

*योगवासिष्ठ-पाठ । संकीर्तनानन्द तथा नृत्य*

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🌷 *#श्रीरामकृष्ण०वचनामृत* 🌷
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*दादू सेवक सांई वश किया, सौंप्या सब परिवार ।*
*तब साहिब सेवा करै, सेवक के दरबार ॥*
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साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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*योगवासिष्ठ-पाठ । संकीर्तनानन्द तथा नृत्य*
आज रविवार है । मास्टर शनिवार को आये हैं । बुध तक अर्थात् पाँच दिन मठ में रहेंगे । गृही भक्त प्रायः रविवार को ही मठ में दर्शन करने के लिए आया करते हैं । आजकल बहुधा योगवासिष्ठ का पाठ हुआ करता है । मास्टर ने श्रीरामकृष्ण से योगवासिष्ठ की कुछ बातें सुनी थी । देह-बुद्धि के रहते योगवासिष्ठ के 'सोऽहम्' भाव के अनुसार साधना करने की श्रीरामकृष्ण ने मनाही की थी और कहा था, 'सेव्यसेवक-भाव ही अच्छा है ।'
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मास्टर - अच्छा, योगवासिष्ठ में ब्रह्मज्ञान की कैसी बातें हैं ?
राखाल - भूख-प्यास, सुख-दुःख, यह सब माया है, मन का नाश ही एकमात्र उपाय है ।
मास्टर - मन के नाश के पश्चात् जो कुछ बच रहता है, वहीं ब्रह्म है, क्यों ?
राखाल – हाँ ।
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मास्टर – श्रीरामकृष्ण भी ऐसा ही कहते थे । न्यांगटा ने उनसे यही बात कही थी । अच्छा, राम को वशिष्ठजी ने संसार में रहने के लिए कहा है, क्या ऐसी कोई बात तुम्हें उस ग्रन्थ में मिली ?
राखाल - नहीं, अभी तक तो नहीं मिली । इसमें तो राम को कहीं अवतार ही नहीं लिखा है ।
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यही बातचीत चल रही है, इसी समय नरेन्द्र, तारक तथा एक और भक्त गंगातट से टहलकर आ गये । उनकी इच्छा सैर करते हुए कोन्नगर तक जाने की थी, परन्तु नाव नहीं मिली । सब के सब आकर बैठे । योगवासिष्ठ का प्रसंग फिर चलने लगा ।
नरेन्द्र - (मास्टर से) – बड़ी अच्छी कहानियाँ हैं । लीला की कथा आप जानते हैं ?
मास्टर - हाँ, योगवासिष्ठ में है, मैंने कुछ पढ़ा है । लीला को ब्रह्मज्ञान हुआ था न ?
नरेन्द्र - हाँ, और इन्द्र-अहल्या-संवाद, तथा विदूरथ राजा चाण्डाल हुए - वह कथा ?
मास्टर - हाँ, याद आ रही है ।
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नरेन्द्र - वन का वर्णन भी कितना मनोहर है !
नरेन्द्र आदि भक्तगण गंगा-स्नान को जा रहे हैं । मास्टर भी जायेंगे । धूप देखकर मास्टर ने छाता ले लिया । वराहनगर के श्रीयुत शरच्चन्द्र भी साथ ही गंगा नहाने जा रहे हैं । ये सदाचारी ब्राह्मण युवक हैं । मठ में सदा आते रहते हैं । कुछ दिन पहले वैराग्य धारण करके ये तीर्थाटन भी कर चुके हैं ।
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मास्टर - (शरद से) - धूप बड़ी तेज है ।
नरेन्द्र - तो यह कहो कि छाता ले लूँ ।
(मास्टर हँसते हैं)
भक्तगण कन्धे पर अँगौछा डाले हुए मठ का रास्ता पार कर परामाणिक घाट के उत्तर तरफवाले घाट में नहा रहे हैं । सब के सब गेरुआ वस्त्र धारण किये हुए हैं । आज ८ मई, १८८७ है । धूप बड़ी तेज है ।
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मास्टर - (नरेन्द्र से) - कहीं लू न लग जाय ।
नरेन्द्र - आप लोगों का शरीर भी तो वैराग्य में बाधक है - है न ? मेरा मतलब है आपका, देवेन्द्रबाबू का –
मास्टर हँसने लगे और सोचने लगे - 'क्या केवल शरीर ही बाधक है ?'
स्नान करके भक्तगण मठ लौटे और हाथ-पैर धोकर श्रीरामकृष्ण के कमरे में (जहाँ श्रीरामकृष्ण की पूजा होती थी) गये । प्रणाम करके श्रीरामकृष्ण के पादपद्मों में प्रत्येक भक्त ने पुष्पांजलि चढ़ायी ।
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पूजा-घर में नरेन्द्र को जाने में कुछ देर हो गयी । श्रीगुरु महाराज को प्रणाम करके नरेन्द्र फूल लेने को बढ़े तो देखा, पुष्पपात्र में फूल एक भी नहीं था । उन्होंने पूछा - 'फूल नहीं है ?' पुष्प-पात्र में दो-एक बिल्वदल बच रहे थे, चन्दन में उन्हें ही डुबाकर अर्पण किया । फिर एक बार घण्टाध्वनि की। अन्त में प्रणाम करके 'दानवों के कमरे' में जाकर बैठे ।
मठ के गुरुभाई अपने आपको भूत तथा दानव कहते थे, क्योंकि भूत दानव शिवजी के अनुयायी हैं । और जिस कमरे में सब एक साथ बैठते थे, उसे 'दानवों का कमरा' कहते थे ।
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जो लोग एकान्त में ध्यान-धारणा और पाठ आदि करते थे, वे लोग दक्षिण ओर के कमरे में रहते थे । काली द्वार बन्द करके अधिकतर उसी कमरे में रहते थे, इसलिए मठ के गुरुभाई उस कमरे को काली तपस्वी का कमरा कहते थे । काली तपस्वी के कमरे के उत्तर तरफ पूजा-घर था । उसके उत्तर ओर जो कमरा था, उसमें नैवेद्य रखा जाता था । 
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उसी कमरे में खड़े होकर लोग आरती देखते और वहीं से भगवान श्रीरामकृष्ण को प्रणाम करते थे । नैवेद्यवाले कमरे के उत्तर में 'दानवों का कमरा' था । यह कमरा खूब लम्बा था । बाहर के भक्तों के आने पर इसी कमरे में उनका स्वागत किया जाता था । 'दानवों के कमरे' के उत्तर तरफ एक और छोटासा कमरा था । यह 'पान-घर' के नाम से पुकारा जाता था । यहाँ भक्तगण भोजन करते थे ।
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'दानवों के कमरे' के पूर्व कोने में दालान थी । उत्सव होने पर भोजन आदि की व्यवस्था इसी कमरे में की जाती थी । दालान के ठीक उत्तर तरफ रसोईघर था ।
पूजा-घर और काली तपस्वी के कमरे के पूर्व ओर बरामदा था । बरामदे के दक्षिण-पश्चिम कोने में वराहनगर की एक समिति का पुस्तकालय था । 
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ये सब कमरे दुमँजले पर थे । जीने दो थे । एक तो पुस्तकालय और काली तपस्वी के कमरे के बीच से, और दूसरा, भक्तों के भोजन करनेवाले कमरे के उत्तर तरफ । नरेन्द्र आदि भक्तगण इसी जीने से शाम को कभी कभी छत पर जाते थे । वहाँ बैठकर वे लोग ईश्वर-सम्बन्धी अनेक विषयों की चर्चा किया करते थे ।
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कभी भगवान श्रीरामकृष्ण की बातें, कभी शंकराचार्य की, कभी रामानुज की और कभी ईसा मसीह की बातें होती थीं । कभी हिन्दू-दर्शन की बातें होती थीं तो कभी यूरोपीय दर्शन का प्रसंग चलता था, कभी वेदों, कभी पुराणों और कभी तन्त्रों की कथाएँ हुआ करती थीं ।
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'दानवों के कमरे' में बैठकर नरेन्द्र अपने दैवी कण्ठ से परमात्मा के नामों और उनके गुणों का कीर्तन किया करते थे । शरद अपने दूसरे भाइयों को गाना सिखलाते थे । काली वाद्य सीखते थे । इस कमरे में नरेन्द्र कितनी ही बार कीर्तन करते हुए आनन्द करते और आनन्दपूर्वक नृत्य किया करते थे ।
(क्रमशः)

सोमवार, 26 जनवरी 2026

बस राम नहीं हैं

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🌷 *#श्रीरामकृष्ण०वचनामृत* 🌷
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*हम चाहैं सो ना मिलै, और बहुतेरा आइ ।*
*दादू मन मानै नहीं, केता आवै जाइ ॥*
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साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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राखाल से नरेन्द्र ने प्रसन्न की बात कही । प्रसन्न ने नरेन्द्र को एक पत्र लिखा है, वह पत्र पढ़ा जा रहा है । पत्र इस आशय का है - "मैं पैदल ही वृन्दावन चला । मेरे लिए यहाँ रहना अच्छा नहीं है । यहाँ भाव का परिवर्तन हो रहा है । पहले तो मैं माता-पिता और घर के दूसरे मनुष्यों का स्वप्न देखा करता था, इसके पश्चात् मैंने माया की मूर्ति देखी । दो बार मुझे बड़ा कष्ट मिला, घर लौट जाना पड़ा था । इसीलिए अब की बार दूर जा रहा हूँ ।
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श्रीरामकृष्णदेव ने मुझसे कहा था 'तेरे वे घरवाले सब कुछ कर सकते हैं, उनका विश्वास न करना ।' "
राखाल कह रहे हैं, "वह इन्हीं अनेक कारणों से चला गया है । और उसने यह भी कहा है, 'नरेन्द्र अपनी माँ और भाइयों की खबर लेने और मुकदमा आदि करने के लिए घर चला जाया करता है । मुझे भय है कि उसकी देखा-देखी कहीं मुझे भी घर जाने की इच्छा न हो ।' "
यह सुनकर नरेन्द्र चुप हो रहे ।
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राखाल तीर्थ जाने की बातचीत कर रहे हैं । कह रहे हैं, 'यहाँ रहकर तो कहीं कुछ न हुआ । उन्होंने (श्रीरामकृष्ण ने) जो कहा है - ईश्वरदर्शन, वह कहाँ हुआ ?' राखाल लेटे हुए हैं । पास ही भक्तों में कोई लेटे हुए हैं, कोई बैठे ।
राखाल - चलो, नर्मदा की ओर निकल चलें ।
नरेन्द्र - निकलकर क्या होगा ? ज्ञान इससे थोड़े ही होता है, जिसके सम्बन्ध में तूने इतनी रट लगा दी है ।
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एक भक्त - तो फिर संसार का त्याग तुमने क्यों किया ?
नरेन्द्र - राम को नहीं पाया, इसलिए क्या श्याम के साथ रहना चाहिए ? ईश्वर-लाभ नहीं हुआ, इसलिए क्या बच्चे पैदा करते रहना चाहिए ? यह कैसी बात है ?
यह कहकर नरेन्द्र जरा उठ गये । राखाल लेटे हुए हैं ।
कुछ देर बाद नरेन्द्र फिर लौटे और आसन ग्रहण किया ।
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मठ के एक भाई लेटे ही लेटे हास्य में कह रहे हैं मानो ईश्वर-दर्शन के बिना उन्हें बड़ा कष्ट हो रहा हो - "अरे, कोई है ? - मुझे एक छुरी तो दो, प्राणान्त कर लूँ – बस अब तो कष्ट सहा नहीं जाता !"
नरेन्द्र - (मानो गम्भीर होकर) - वहीं है, हाथ बढ़ाकर उठा लो (सब हँसते है)
फिर प्रसन्न की बात होने लगी ।
नरेन्द्र - यहाँ भी माया ! फिर हम लोगों ने संन्यास क्यों लिया ?
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राखाल - 'मुक्ति और उसकी साधना' नामक पुस्तक में है कि संन्यासियों को एक जगह नहीं रहना चाहिए । 'संन्यासीनगर' की कथा उसमें है ।
शशी - मैं संन्यास-फन्यास नहीं मानता । मेरे लिए ऐसा कोई स्थान नहीं है, जो अगम्य हो । ऐसी कोई जगह नहीं है, जहाँ मैं न रह सकूँ ।
भवनाथ की बात चलने लगी । भवनाथ की स्त्री को कठिन पीड़ा हुई थी ।
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नरेन्द्र - (राखाल से) - जान पड़ता है, भवनाथ की बीबी बच गयी; इसीलिए मारे खुशी के दक्षिणेश्वर घूमने गया था ।
काँकुड़गाछी के बगीचे की बातचीत होने लगी । रामबाबू वहाँ मन्दिर बनवाने का विचार कर रहे हैं ।
नरेन्द्र - (राखाल से) - रामबाबू ने मास्टर महाशय को एक 'ट्रस्टी'(trustee) बनाया है ।
मास्टर - (राखाल से) - परन्तु मुझे तो इसकी कोई खबर नहीं ।
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शाम हो गयी । शशी श्रीरामकृष्ण के कमरे में धूप देने लगे । दूसरे कमरों में श्रीरामकृष्ण के जितने चित्र थे, वहाँ भी धूप-धूना दिया गया । फिर मधुर कण्ठ से उनका नामोच्चारण करते हुए उन्हें प्रणाम किया ।
अब आरती हो रही है । मठ के गुरु-भाई और दूसरे भक्त हाथ जोड़कर खड़े हुए आरती देख रहे हैं । झाँझ और घण्टे बज रहे हैं । भक्तवृन्द एकस्वर से आरती गा रहे हैं –
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"जय शिव ओंकार, भज शिव ओंकार ।
ब्रह्मा विष्णु सदाशिव, हर हर हर महादेव ।"
नरेन्द्र पहले गाते हैं, पीछे से उनके दूसरे गुरु-भाई । यही गायन श्रीकाशीधाम में विश्वेश्वर-मन्दिर में हुआ करता है ।
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भोजन आदि समाप्त करते हुए रात के ग्यारह बज गये । भक्तों ने मास्टर के लिए एक बिछौना बिछा दिया और वे स्वयं भी सो गये ।
आधी रात का समय है । मास्टर की आँख नहीं लगी । वे सोच रहे हैं । - 'सब तो है, - अयोध्या तो वही है, परन्तु बस राम नहीं हैं ।' मास्टर चुपचाप उठ गये । आज वैशाख की पूर्णिमा है । मास्टर अकेले गंगाजी के तट पर टहल रहे हैं । श्रीरामकृष्ण की बातें सोच रहे हैं ।
(क्रमशः)