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शुक्रवार, 17 जुलाई 2026

सुखासक्ति का त्याग

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*सुख मांहि दुख बहुत हैं, दुख मांही सुख होइ ।*
*दादू देख विचार कर, आदि अंत फल दोइ ॥*
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*॥ श्रीहरि: ॥*
दिनांक 17.7.26.
वि. सं. 2083, 'रौद्र' नाम संवत्सर, आषाढ़ मास, शुक्ल पक्ष, तृतीया, शुक्रवार। (गीता दैनन्दिनी अनुसार)।
1- परम श्रद्धेय स्वामीजी श्री रामसुखदासजी महाराजका प्रवचन—
दिनांक— 13.9.95, सांय 5.0 बजे।
स्थान— गांधी मैदान, जोधपुर।
*विषय— सुखासक्ति का त्याग।*
2- गीता पाठ— गीता पाठ अध्याय 17 श्लोक संख्या 21 से 28 तक।
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*🕉️ संसारमें जो सुख सामग्री दिख रही है, यह सब धोखा है और परमात्मा सबको आनन्द देने वाले हैं। धोखे वाली चीज आपका निरन्तर त्याग कर रही है और परमात्माका और आपका संबंध नित्य-निरन्तर है, परमात्मा कभी किसीका साथ छोड़ते ही नहीं। जो आपसे नित्य निरन्तर अलग हो रहा है, उस शरीर-संसारसे अलग होना है और जो परमात्मा नित्य निरन्तर आपके साथ रह रहे हैं, उन्हीं परमात्माको प्राप्त करना है। यह सत्संगकी खास बात है।*
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*🕉️ रुपये आ जाय, अनुकूल पदार्थ मिल जाय, मैं सुख पूर्वक जीता रहूँ— ये खास मोह है, आदर, मान, सत्कार अच्छा लगता है, ऐसी रूचि पतन करने वाली है। संसारको, नाशवान् वस्तुओंको सत्ता-महत्ता दे दी है, यह बाधा है। ये सब वस्तुएँ तो रहेगी नहीं और इनकी आशा, विश्वास, भरोसा रखा तो दुःख पाना पड़ेगा, रोना पड़ेगा। मनुष्य मरनेसे डरते हैं, वह मृत्यु प्रतिक्षण नजदीक आ रही है। आप यदि अपना कल्याण चाहते हैं, तो भोगोंका और अनुकूलताकी इच्छाका विषके समान त्याग कर देना चाहिए। भोग पदार्थ, आराम, मान-बड़ाई अच्छे लगते हैं, यह खास खतरा है।*
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*🕉️अनुकूलता जितना बांधती है, प्रतिकूलता उतना नहीं बांधती। अनुकूलताका सुख बेहोश कर देने वाला है, लेकिन प्रतिकूलता होशमें लाने वाली है। सावधान रहने वाला अनुकूलता-प्रतिकूलता, दोनोंमें नहीं फँसता है। भोग पदार्थ, मान-बढ़ाई, आदर-सत्कार, आराम— ये बांधने वाले हैं; अपमान, निन्दा, तिरस्कार, पैसोंका घाटा आदि बुरे लगते हैं, लेकिन ये दुखदाई परिस्थितियाँ आपको कल्याणकी तरफ अग्रसर कराने वाली हैं। खेड़ापाके श्रीरामदास जी महाराजको जोधपुरके राजाने देश-निकाला दे दिया, हुक्म मिला जब वे मकानके बाहर दातुन कर रहे थे, उसी समय वहाँसे चल दिए, गुरु महाराजका दिया हुआ गुटका और छड़ी साथमें ली, उसीमें आनन्द मान लिया, मकान, रुपये-पैसों आदिकी तरफ देखा ही नहीं।*
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*🕉️श्रीमद्भागवतमें भगवान् कहते हैं— 'जिस पर मैं कृपा करता हूँ, उसका धन हर लेता हूँ, भाई-बंधुओंसे संबंध विच्छेद करा देता हूँ, सब तरफसे उसके ऊपर दुःख आ जाते हैं— फिर भी वह मेरा भजन नहीं छोड़ता है, तो मैं उस भक्तका दास हो जाता हूँ।' जैसे वैद्य कड़वी दवाई रोगीका रोग दूर करनेके लिए देता है, ऐसे ही भगवान् प्रतिकूलता हमें जन्म-मरणसे रहित करनेके लिए, अपना प्रेम प्रदान करनेके लिए देते हैं, इसलिए प्रतिकूलतामें दु:खी नहीं होकर परम आनन्द मनाना चाहिए।*
बहुत श्रेष्ठ प्रवचन है।

शनिवार, 4 जुलाई 2026

भगवत्प्रदत्त विवेकका आदर

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
* दादू सांई को संभालतां, कोटि विघ्न टल जांहि ।*
* राई मन बैसंदरा, केते काठ जलांहि ॥*
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*॥ श्रीहरि: ॥*
दिनांक 4.7.26.
वि. सं. 2083, 'रौद्र' नाम संवत्सर, आषाढ़ मास, कृष्ण पक्ष, चतुर्थी, शनिवार। (गीता दैनन्दिनी अनुसार)।
1- परम श्रद्धेय स्वामीजी श्री रामसुखदासजी महाराजका प्रवचन—
दिनांक— 10.8.95, प्रातः 5.18 बजे।
स्थान— जयपुर।
*विषय— भगवत्प्रदत्त विवेकका आदर करनेसे भगवत्प्राप्ति।*
2- गीता पाठ— गीता पाठ अध्याय 12 श्लोक संख्या 11 से 20 तक।
* जो मनुष्य अपने ज्ञानका, अपनी समझका, अपने अनुभवका आदर नहीं करता है, वह न शास्त्रोंका, न ईश्वरका, न गुरुजनोंका— किसीका भी आदर नहीं कर सकेगा। मनुष्योंको कम-से-कम अपनी समझ, अपनी जानकारीका आदर तो करना ही चाहिए। यह बात सब जानते हैं कि शरीर पैदा हुआ है और समय होने पर निश्चित ही मरेगा, फिर भी इस ज्ञानका आदर नहीं करते हैं। इस बातका अर्थ है कि यह मनुष्य शरीर भगवान् ने जिस विशेष उद्देश्यके लिए दिया है, मनुष्य शरीरमें भगवत्प्राप्तिका मौका दिया है, उसे शरीरके रहते प्राप्त कर लेना चाहिए। ऐसा नहीं करके मनुष्य शरीरमें नहीं करने योग्य कार्य करते हैं, यह अपने विवेककी हत्या है।*
* गांधीजीका एक पत्र अखबारमें छपा, जिसमें लिखा था— 'मैं एक सौ आठ वर्ष तक जीवित रहूँगा।' सेठजी श्री जयदयाल जी, जो गीता प्रेसके उत्पादक, संस्थापक, संरक्षक, संचालक— सब कुछ थे, इस बात पर बोले कि एक सौ आठ वर्ष तक न गांधीजी जीयेंगे, न इतने वर्षों तक मैं जीऊंगा, लिख लो। ऐसे अपने जीवित रहनेका भरोसा किसीको है? यदि नहीं, तो फिर मनुष्य शरीरमें करने लायक असली कामसे क्यों वंचित हो रहे हैं। 'मानहिं मातु पिता नहिं देवा। साधुन्ह सन करवावहिं सेवा॥ जिन्ह के यह आचरन भवानी। ते जानेहु निसिचर सब प्रानी॥'*
* जीनेका तो भरोसा नहीं है और मरनेकी तैयारी नहीं है, और तीसरा कोई मार्ग है नहीं। मनुष्य शरीरमें आकर जो काम करने लायक था, वह कर लिया, अब शरीर रहे या जावे, अपने इसकी गर्ज नहीं रही। 'रज्जब धोखा को नहीं फल दे सूखा खेत।' मनुष्य शरीरमें आकर जो काम करना चाहिए, वह कर लिया, अब मृत्युका भय नहीं है। मृत्युका भय तभी तक रहता है, जब तक मनुष्य शरीरमें जो काम करने आये हैं, वह नहीं किया हो। ऐसी निश्चिन्तता जिसके आ गई है, तो बढ़िया है और जिसके ऐसी निश्चिन्तता नहीं है, उसे तत्परता पूर्वक भगवान् में लग जाना चाहिए। 'नवग्रह चौंसठ जोगनी बावन वीर पर्जंत। काल भक्ष सबको करै, हरि शरणै डरपंत॥'*
* जड़ चीजोंकी जो चाहना है, वह कामना है और चिन्मय तत्त्वकी इच्छा आवश्यकता है। स्वयंकी जो मांग है, वह आवश्यकता है और शरीर, इन्द्रियाँ, मन-बुद्धिको लेकर जो मांग है, वह कामना है। कामनाकी तो निवृत्ति ही होती है और आवश्यकताकी पूर्ति ही होती है, आवश्यकता अधूरी रहती ही नहीं। मनुष्य मात्रको परमात्मप्राप्ति हो सकती है, यह बात मुझे सन्तोंसे मिली है, शास्त्रोंमें नहीं मिली है। 'जो जिव चाहे मुक्ति को तो सुमरीजे राम। हरिया गैले चालतां जैसे आवे गांव॥' सन्तोंने वाणीमें अपना अनुभव लिख दिया है, ऐसे मनुष्य शरीरको प्राप्त कर अपना उद्धार कर ही लेना चाहिए।*

रविवार, 28 जून 2026

परमात्म-तत्त्व


*🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏*
*🌷 卐 सत्यराम सा 卐 🌷*
*शब्द सरोवर सुभर भर्‍या, हरि जल निर्मल नीर ।*
*दादू पीवै प्रीति सौं, तिन के अखिल शरीर ॥*
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*॥ श्रीहरि: ॥*
दिनांक 28.6.26.
वि. सं. 2083, 'रौद्र' नाम संवत्सर, शुद्ध ज्येष्ठ मास, शुक्ल पक्ष, चतुर्दशी, रविवार। (गीता दैनन्दिनी अनुसार)।
1- परम श्रद्धेय स्वामीजी श्री रामसुखदासजी महाराजका प्रवचन—
दिनांक— 19.11.90, प्रातः 5.18 बजे। स्थान— श्री मुरली मनोहर धोरा, भीनासर।
2- गीता पाठ— गीता पाठ अध्याय 11 श्लोक संख्या 1 से 11 तक।
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*⚜️ परमात्म-तत्त्वकी प्राप्ति सुगम है, क्योंकि परमात्म-प्राप्तिके लिए ही मानव शरीर मिला है। जिसके लिए मनुष्य शरीर मिला है, उसीकी प्राप्ति कठिन होगी, तो फिर सुगम क्या होगा? मनुष्य शरीरका प्रयोजन तत्त्वकी प्राप्ति, मुक्ति, कल्याण, परम-लाभकी प्राप्ति, भगवान् में प्रियता, सर्वोपरि स्थितिकी प्राप्ति ही है। संसार नाशवान् है, परिवर्तनशील है— यह जानते हुए भी इसको सत् मानते हैं, यह बड़ी गलती है; यह अपने ही ज्ञानका अनादर है; अपनी जानकारीके निरादरका ही बन्धन है।*
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*⚜️ कौन नहीं जानता कि शरीर और शरीरसे संबंधित प्राणी-पदार्थ नाशवान् हैं, एक दिन अवश्य बिछुड़ेंगे; फिर भी हम इन्हें स्थाई रखना चाहते हैं, इनसे सुख लेते हैं, इनका आश्रय लेते हैं; फिर चाहते हैं कि हमारी पारमार्थिक उन्नति हो— ऐसी आशा रखना कहाँ तक ठीक है? नाशवान् में जो सत्य बुद्धि है, इसको दूर करनेकी सामर्थ्य मनुष्य मात्रमें है, इसमें कोई भी अयोग्य नहीं है, फिर भी इसे दूर नहीं करते— यह दूसरी गलती है। संसारके दूसरे काम होंगे या नहीं होंगे, उनमें तो सन्देह है, लेकिन मरेंगे या नहीं मरेंगे, इसमें सन्देह नहीं है। जिनमें सन्देह है, उनमें तो रात-दिन लगे हुए हैं और जो मौत निश्चित आनी है, उसकी तरफ ध्यान ही नहीं देते हैं।*
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*⚜️ सत्संगसे स्वभाव बदलता ही है। यदि ऐसा नहीं होता तो सत्संग करना, सद्विचार करना, अपनी उन्नतिके लिए विचार करना— सब निरर्थक हो जायेगा। सत्संग करने वालोंमें औरोंकी अपेक्षा विलक्षणता आती ही है, फिर भी हम अपना पूरा सुधार नहीं करते और थोड़ेमें सन्तोष कर लेते हैं— यह बड़ी बाधा है। मुक्त होने पर स्वभावमें ही फर्क पड़ता है; न तो जड़ शरीरमें फर्क पड़ता है, न चेतन आत्मामें ही फर्क पड़ता है, केवल मनुष्यका स्वभाव बदलता है।*
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*⚜️ गीताजीमें कामनाका त्याग और भगवान् को याद रखना— इन दो बातों पर बहुत जोर दिया गया है। नाम-जपकी महिमा सब मानते हैं, नाम-जपसे लाभ होता ही है। किसीके नाम-जप करनेकी जँच जाय, तो इसमें रत्तीभर भी पराधीनता नहीं है। मनमें कामना रहने पर ही वस्तुओंके नहीं मिलनेका दुःख होता है और कामनाका त्याग कर दें, तो वस्तु मिले, चाहे न मिले, दुःख होता ही नहीं। सेठजीने निष्कामता पर बड़ा जोर दिया है, सेठजीकी वाणीमें आता है कि— 'मुझे गीताजीसे और नाम जपसे जितना लाभ हुआ है, उतना लाभ किसी अन्य साधनसे नहीं हुआ है।'*
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*⚜️ वस्तुओंका मिलना या नहीं मिलना कामना करनेके अधीन नहीं है, अपितु एक अलग विधानके अन्तर्गत है, तो फिर कामना रखनेसे क्या लाभ? 'चाह गई चिन्ता मिटी, मनवा बेपरवाह। जिसके कछु नहिं चाहिए, सो शाहनपति शाह॥' परमात्म-तत्त्वके प्राप्तिकी इच्छा कामना नहीं है, यह जिज्ञासा, मुमुक्षा है, जो पूरी होती ही है।*

सोमवार, 22 जून 2026

"नाद ब्रह्म : सृष्टि का मूल स्रोत"

🪷🙏 🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🪷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*साभार ~@Subhash Jain*
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*दादू शब्द अनाहद हम सुन्या,*
*नखसिख सकल शरीर ।*
*सब घट हरि हरि होत है, सहजैं ही मन थीर ॥*
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"नाद ब्रह्म : सृष्टि का मूल स्रोत"
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"नाद ब्रह्म" हिंदू दर्शन, वेदांत, योग और भारतीय शास्त्रीय संगीत की एक बहुत गहरी और महत्वपूर्ण अवधारणा है। इसका शाब्दिक अर्थ है — "नाद ही ब्रह्म है" या "ध्वनि/शब्द ही परम सत्य/ईश्वर है"।

सरल भाषा में समझें~
पूरे ब्रह्मांड की उत्पत्ति, संचालन और अस्तित्व ध्वनि/कंपन (वाइब्रेशन) से हुआ माना जाता है। जैसे आधुनिक विज्ञान कहता है कि सब कुछ ऊर्जा और कंपन है, वैसे ही प्राचीन भारतीय ऋषियों ने इसे नाद के रूप में देखा और कहा कि यह नाद ही परम ब्रह्म है।

मुख्य दो प्रकार के नाद~
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1.आहत नाद —
जो सामान्य ध्वनियाँ हैं, जो किसी आघात/टकराव से बनती हैं (जैसे तबला बजाना, बोलना, संगीत वाद्ययंत्र)।
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2.अनाहत नाद (या अनहद नाद) —
यह बिना किसी आघात के, स्वतः होने वाली दिव्य ध्वनि है। इसे कोई कान से नहीं सुन सकता जब तक मन बहुत शांत और एकाग्र न हो जाए। यह शब्द ब्रह्म या नाद ब्रह्म का मूल रूप है।

योगी गहन ध्यान, नादयोग या शब्द साधना से इस अनाहत नाद को सुनते हैं। इसे विभिन्न रूपों में वर्णित किया जाता है जैसे:
ॐ की मूल कंपन
घंटी, शंख, वीणा, झंकार, तुंकार जैसी सूक्ष्म ध्वनियाँ अंत में यह निर्गुण ब्रह्म में विलीन हो जाती है।

महत्व क्या है?

सृष्टि का मूल —
वेदों और उपनिषदों में माना गया है कि सबसे पहले ॐ(प्रणव) की ध्वनि हुई, उसी से सारा जगत उत्पन्न हुआ।

ईश्वर प्राप्ति का मार्ग —
नादयोग के द्वारा अनाहत नाद का श्रवण करके मनुष्य ब्रह्म में लीन हो सकता है।

संगीत का आधार —
भारतीय शास्त्रीय संगीत इसी सिद्धांत पर टिका है। संगीत सिर्फ मनोरंजन नहीं, बल्कि ब्रह्म प्राप्ति का साधन माना जाता है।

आधुनिक कनेक्शन —
आज क्वांटम फिजिक्स भी कहती है कि सब कुछ कंपन/वाइब्रेशन है — यह नाद ब्रह्म की बात से बहुत मिलता-जुलता है।

प्रसिद्ध वाक्य~
नादं ब्रह्मेति — नाद ही ब्रह्म है।
शब्दाद्वैतवाद — शब्द ही ब्रह्म है, जगत शब्दमय है।

संगीतरत्नाकर जैसे ग्रंथों में लिखा है: "नाद रूपं परं ब्रह्म"।

संक्षेप में ~
नाद ब्रह्म का अर्थ है कि ईश्वर ध्वनि/कंपन के रूप में सर्वव्यापी है और उसी से सारी सृष्टि बनी है। गहन साधना से जब हम बाहरी ध्वनियों को पार करके अनाहत नाद सुनते हैं, तो हम ब्रह्म को सीधे अनुभव कर लेते हैं

रविवार, 12 अप्रैल 2026

= १७८ =

*🌷🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏🌷*
*🌷🙏 卐 सत्यराम सा 卐 🙏🌷*
*सोई सुहागिनी साच श्रृंगार,*
*तन मन लाइ भजै भर्तार ॥*
*भाव भक्ति प्रेम ल्यौ लावै,*
*नारी सोई सार सुख पावै ॥*
*साभार ~ @Hariya K Video*
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यह पुरी है जहां कण-कण में भगवान जगन्नाथ बसते हैं। उनकी महिमा, उनके चमत्कार, उनकी लीलाएं कोई क्या जाने। लेकिन कभी-कभी उनकी सबसे अनोखी लीलाएं सबसे साधारण इंसानों के जीवन से बुनी जाती हैं। वह रात जब सब कुछ शुरू हुआ।
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कुटिया के भीतर प्रभुदास अपनी छोटी सी दुकान पर पान बना रहे हैं। उनके चेहरे पर संतोष है। पर आंखों में कुछ अधूरापन। आठ बार भोग लगता है। दिन में आठ बार छप्पन भोग क्या-क्या नहीं चढ़ता मेरे प्रभु को। मीठे पकवान, नमकीन पकवान, फल, दूध सब कुछ। मेरा मन हर बार एक ही सवाल पूछता है। इतना सब कुछ पर पान क्यों नहीं ? भोजन के बाद एक पान.. आ हा.. कितना संपूर्ण हो जाता मेरा प्रभु का भोग।
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यह कहानी सिर्फ एक पान वाले की नहीं है। यह उस रहस्य की है जिसमें स्वयं भगवान ने भाग लिया। उस रात जब पुरी सो रही थी, प्रभुदास की यह अनकही प्रार्थना भगवान तक पहुंच गई थी और भगवान की लीला तो अपरंपार है। वो ऐसे रास्ते ढूंढ लेते हैं जिनकी कोई कल्पना भी नहीं कर सकता। प्रभुदास अपनी कुटिया के किवाड़ बंद करके सोने की तैयारी करते हैं। तभी बाहर से हल्की खटखटाहट होती है। इतनी रात को कौन होगा ? वह दरवाजा खोलते हैं।
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सामने दो बेहद खूबसूरत नौजवान खड़े हैं। उनके घुंघराले बाल कंधों तक फैले हैं। कानों में चमकते कुंडल हैं और वस्त्र भी असाधारण रूप से सुंदर हैं। उनकी आंखों में एक दिव्य चमक है। नमस्ते प्रभुदास जी। क्या थोड़ा पान मिल सकता है ? बहुत देर से चल रहे हैं। थकान हो रही है। अरे अरे हां हां जरूर। आप दोनों इतनी रात को पहले कभी देखा नहीं ? जी हम बस ऐसे ही भटकते हुए यहां आ गए।
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प्रभुदास तुरंत उनके लिए दो पान बनाते हैं। उनकी सुंदरता और विनम्रता से वह इतने मोहित हो जाते हैं कि कुछ और पूछना भूल जाते हैं। लीजिए ताजाताजा पान। दोनों युवक पान लेते हैं। एक दूसरे को देखकर मुस्कुराते हैं और पान खाते हैं। आ लाजवाब। ऐसा पान तो हमने कभी नहीं खाया। हां, सच में मन तृप्त हो गया। बहुत-बहुत धन्यवाद प्रभुदास जी। पान का पैसा ? अरे मुझे तो याद ही नहीं रहा। कोई बात नहीं। कल आ जाएंगे तो ले लूंगा।
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और फिर ऐसा ही होने लगा। हर रात वही दो रहस्यमय नौजवान आते पान खाते और बिना कुछ कहे बिना कुछ दिए चले जाते प्रभुदास के लिए तो जैसे वे ईश्वर का ही कोई वरदान थे । बलरामदास के मन में सवाल उठते रहे। अरे यह कौन है यह दोनों बालक इतनी रात को प्रभुदास की कुटिया से निकल रहे हैं मैंने इन्हें कभी मंदिर में देखा नहीं युवक तेजी से गली में मुड़ उड़ जाते हैं और आंखों से ओझल हो जाते हैं। अजीब बात है। रोज रात को देखता हूं बस रात को ही। प्रभुदास की कुटिया से कुछ तो गड़बड़ है।
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अगले कुछ दिन बलराम दास उन पर नजर रखने लगा। बलरामदास के मन में सवाल उठते रहे। एक और रात बलरामदास एक खंभे के पीछे छिपे हैं। युवक प्रभुदास की कुटिया से निकलते हैं। आज तो जरूर पूछूंगा प्रभुदास से। कहीं कोई गलत काम तो नहीं हो रहा ? प्रभुदास जरा एक बात सुनिए। अरे बलराम दास जी आइए आइए बैठिए। सुबह-सुबह कैसे आना हुआ ? क्या पान बनाऊं ? नहीं पान नहीं। मैं कुछ पूछने आया हूं और आपसे सच-सच जानना चाहता हूं। पूछिए पूछिए। मैं भला आपसे क्या छुपाऊंगा ?
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प्रभुदास मैं कुछ दिनों से देख रहा हूं। हर रात दो नौजवान बालक आपकी कुटिया से निकलते हैं। इतनी रात को यह कौन बालक हैं ? और यहां क्या कर रहे थे ? मुझे नहीं पता बलराम दास जी कि वो कौन है। पर हां वे प्रतिदिन मेरे घर आते हैं और मुझसे पान लेकर जाते हैं। और बिना मूल्य दिए चले जाते हैं। है ना ? मैंने देखा है उन्हें निकलते हुए। जब भी मैं उन्हें देखता हूं ना तो उनसे इतना मोहित हो जाता हूं कि मैं पान की कीमत मांगना ही भूल जाता हूं। अब इसमें मेरा क्या दोष है ? बताइए। अगर ऐसा ही चलता रहा तो आपका घर कैसे चलेगा ? बताइए...
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जब भी वे दोनों बालक आपके पास आएंगे तो आप उनसे पान की कीमत मांगना और अगर वह आपको पान की कीमत ना दें तो उनसे कहना कि वे दोनों बंधक के रूप में अपनी-अपनी चादर आपके पास छोड़ जाए। प्रभुदास अपनी दुकान बंद करने वाले हैं। तभी दोनों युवक फिर से आते हैं। नमस्ते प्रभुदास जी। क्या आज भी आपका बेहतरीन पान मिल पाएगा ? प्रभुदास उन्हें देखकर फिर से मोहित हो जाते हैं।
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पर बलरामदास की बात याद आती है। वह थोड़ा संकोच करते हैं। पान देने के बाद आप दोनों इतने दिनों से पान खा रहे हैं। पर मैंने आपसे कभी दाम नहीं लिया। पर आज आपको पान के बदले में दाम देना होगा। अरे आप तो कभी हमसे दाम मांगते ही नहीं है। हमने तो सोचा इसलिए हम आज कोई धन लेकर नहीं आए। हमारे पास अभी देने को कुछ नहीं है। कल आएंगे तो दे देंगे। वादा रहा। नहीं नहीं बहाना बनाने से नहीं चलेगा। बलराम दास जी ने मुझे समझाया है। आज ही देना होगा। बिना दाम दिए मैं तुम दोनों को नहीं जाने दूंगा।
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लेकिन हमारा आज जाना अति आवश्यक है। प्रभुदास जी। हम पर विश्वास रखिए। कल हम बहुत सारा धन लाकर देंगे। तो ठीक है। बिना दाम दिए जा सकते हो। लेकिन अपनी यह चादर मेरे पास रखनी होगी। कल जब दाम लाओगे तो चादर वापस ले जाना या बंधक के तौर पर रहेगी। युवक विवश होकर अपनी-अपनी चादरें उतारते हैं। दोनों युवक बिना चादरों के ही तेजी से वहां से निकल जाते हैं। प्रभुदास ने अपनी नादानी में भगवान की लीला का एक और अध्याय लिख दिया था।
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उस रात पुरी में किसी को अंदाजा नहीं था कि मंदिर में एक अजीब सा तूफान आने वाला है। मुख्य पुजारी भगवान जगन्नाथ और बलभद्र के विग्रहों के पास पहुंचते हैं ताकि उन्हें सुबह की पूजा के लिए तैयार कर सकें। वह भगवान जगन्नाथ को ओढ़ाई गई श्वेत चादर को हटाते हैं। फिर बलभद्र जी की ओर बढ़ते हैं। पर अरे यह क्या ? बलभद्र जी की चादर कहां गई ? जगन्नाथ जी की भी नहीं है। रात को तो मैंने खुद अपने हाथों से उन्हें चादर ओढ़ाई थी। यह कैसे गायब हो गई ? अरे सुनिए। सब यहां आइए जल्दी।
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क्या हुआ महाराज ? दोनों विग्रहों पर से श्वेत चादरें नहीं है। किसने चुराई हैं ? चोरी ? पर यहां ? अगर कोई चोर आया होता तो प्रभु के कीमती आभूषण, रत्नजित मुकुट चुराता। श्वेत चादर कोई क्यों चुराएगा ? अपशगुन भगवान कहीं नाराज तो नहीं हैं ? शांत सब शांत हो जाओ। यह खबर फैलनी नहीं चाहिए। पहले ढूंढो मंदिर के हर कोने में देखो। लेकिन यह खबर आग की तरह फैल गई। पूरी पूरी में हाहाकार मच गया। लोगों के मन में डर था और यह बात राजा प्रताप रुद्रदेव तक भी पहुंची।
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यह क्या हो रहा है ? प्रभु जगन्नाथ की चादरें गायब हो गई हैं। क्या मेरे सेवक सो रहे थे ? महाराज पुजारियों का कहना है कि उन्होंने खुद रात में चादरें ओढ़ाई थी। कोई निशान नहीं है चोरी का। यह मेरे राज्य पर कलंक है। यह सब मेरे मंदिर के सेवकों की लापरवाही है। बुलाओ उन सबको। मैं उन्हें कड़ी से कड़ी सजा दूंगा। महाराज पर कोई परवर नहीं। जिसने भी लापरवाही की है, उसे दंड भुगतना पड़ेगा। राजा का क्रोध स्वाभाविक था। सब डर गए थे।
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पर जब भगवान स्वयं अपनी लीला कर रहे हो तो भला कोई भक्त दंड क्यों पाए ? भगवान अपने भक्तों को कैसे दंड मिलने दे सकते थे ? बलराम दास गहरी नींद में हैं। अचानक उनके स्वप्न में एक अद्भुत प्रकाश फैलता है। भगवान जगन्नाथ और बलभद्र उनके सामने प्रकट होते हैं। उनका दिव्य रूप बलराम दास को विस्मय में डाल देता है। प्रभु मेरे प्रभु जगन्नाथ बलभद्र जी आप आप यहां उठो बलराम दास डरो नहीं। मैं तुम्हें एक रहस्य बताने आया हूं। आज्ञा दीजिए प्रभु।
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जो चादरें मंदिर से गायब हुई है वे किसी ने चुराई नहीं है। क्या ? पर पर कैसे ? तुम्हें याद है वह भोला प्रभुदास पान वाला जिसने तुम्हें बताया था कि दो बालक उससे बिना मूल्य के पान लेते हैं। हां प्रभु याद है। मैंने ही उसे कहा था कि उन बालकों से दाम मांगे या बंधक के रूप में उनकी चादर रखवा ले। वही बालक मैं और बलभद्र थे। हम प्रभुदास की उस छोटी सी इच्छा को जानते थे कि हमें भोजन के बाद पान अर्पित किया जाए। हम खुद को रोक नहीं पाए। हम रोज रात उसके पास पान खाने जाते थे।
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प्रभु यह क्या लीला है आपकी ? मैं कितना मूर्ख था कि मैंने उन्हें चोर समझा। मैंने तो मैंने तो प्रभुदास को कहा कि वह आपसे चादरें रखवा ले। हां। और जब प्रभुदास ने हमसे दाम मांगे तो हम नहीं दे पाए। क्योंकि हम जानते थे कि उसके मन में क्या है और जब उसने चादरें मांगी तो हमने सहर्ष अपनी चादरें उसे दे दी क्योंकि वह उसकी भक्ति का प्रतिफल था। वह चादरें अब प्रभुदास के पास हैं। ये तो अद्भुत है प्रभु। सुबह होते ही राजा प्रताप रुद्रदेव के पास जाओ और उन्हें यह सब बताओ।
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उन्हें कहना कि वे प्रभुदास के पास जाए और उन्हें यह भी बताना कि आज से मेरे भोजन के बाद पान चढ़ाने की परंपरा शुरू की जाए। यह प्रभुदास की भक्ति का सम्मान होगा। स्वप्न टूट जाता है। बलरामदास हड़बड़ा कर उठ बैठते हैं। उनके माथे पर पसीना है और आंखें खुली की खुली हैं। वह चारों ओर देखते हैं। ये ये सपना था ? नहीं। यह तो सच था। मेरे प्रभु ने मुझे दर्शन दिए। मुझे राजा के पास जाना होगा।
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महाराज रुकिए दंड मत दीजिए। मुझे कुछ कहना है बहुत जरूरी। बलराम दास क्या है यह सब ? क्षमा करें महाराज। पर यह दंड रुकना चाहिए। चादरें किसी ने चुराई नहीं है। स्वयं भगवान जगन्नाथ ने मुझे स्वप्न में सब कुछ बताया है। स्वप्न तुम होश में तो हो ? मेरे प्रभु के वस्त्रों की चोरी हुई है। और तुम स्वप्न की बात कर रहे हो ? हां महाराज यह सत्य है। वो चादरें प्रभुदास के पास हैं। वो पान वाला वही दो बालक जो उससे रोज पान लेते थे। वह स्वयं प्रभु जगन्नाथ और बलभद्र थे।
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मैंने ही प्रभुदास को कहा था कि वह उनसे दाम मांगे या चादर बंधक रखवा ले। क्या कह रहे हो तुम ? प्रभु जगन्नाथ और बलभद्र स्वयं एक पान वाले से पान लेने आते थे। हां महाराज भगवान ने अपनी लीला मुझे बताई है। उन्होंने कहा है कि वे प्रभुदास की उस छोटी सी इच्छा को पूरा करना चाहते थे कि उन्हें भोजन के बाद पान अर्पित किया जाए। प्रभुदास की भक्ति इतनी पवित्र थी कि भगवान स्वयं उसके पास चले आए। राजा प्रताप रुद्रदेव अपनी कुर्सी से उठ खड़े होते हैं। उनके चेहरे पर पहले अविश्वास, फिर आश्चर्य और फिर गहरी श्रद्धा के भाव आते हैं।
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महाराज अगर यह सत्य है तो यह प्रभु की महान लीला है। तो फिर हमें तुरंत प्रभु दास के पास चलना चाहिए। यह देखना होगा। यह जानना होगा। यदि यह सत्य है तो प्रभु दास को मैं अपने सिर आंखों पर बैठाऊंगा। महाराजा प्रताप रुद्रदेव, बलराम दास और उनके साथ मंत्री, सेनापति तथा कुछ लोग प्रभुदास की छोटी सी कुटिया के पास पहुंचते हैं। महाराज आप आप यहां मुझसे क्या गलती हो गई ?
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शांत हो जाओ प्रभुदास। हम तुमसे कुछ पूछने आए हैं। क्या तुम्हारे पास कोई ऐसी श्वेत चादरें हैं जो तुम्हें दो नौजवान बालकों ने दी हो ? प्रभुदास पहले घबराते हैं। वो कांपते हाथों से अपनी दुकान के कोने में रखी उन दोनों श्वेत चादरों को निकालते हैं। जी महाराज यह रही वो चादरें। कल रात उन बालकों ने इन्हें बंधक के तौर पर मेरे पास रखा था। राजा प्रताप, रुद्रदेव और बलराम दास चादरों को देखते हैं। वे हूबहू वैसी ही हैं जैसी मंदिर में भगवान को ओढ़ाई जाती थी। यह वही चादरें हैं।
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प्रभुदास क्या तुम जानते हो यह किसकी चादरें अपने पास रखी हैं ? प्रभुदास वो दोनों बालक स्वयं भगवान जगन्नाथ और बलभद्र थे। तुमने स्वयं प्रभु को अपने हाथों से पान खिलाया है। जैसे ही प्रभुदास यह बात सुनते हैं, उनके चेहरे का रंग बदल जाता है। उनकी आंखों में आंसू भर आते हैं। वह अपनी ही नादानी पर अवाक रह जाते हैं। उन्होंने जिनसे दाम मांगे, जिनसे चादर रखवाई, वे स्वयं भगवान थे। प्रभु मेरे प्रभु मैंने आपको पहचाना नहीं। मैंने तो आपसे चादर रखवा ली। यह कैसा पाप किया मैंने ? नहीं प्रभुदास यह पाप नहीं है। यह तो प्रभु की लीला है और तुम्हारी महान भक्ति का प्रमाण। तुमने अपनी शुद्ध भक्ति से प्रभु को साक्षात अपने पास बुला लिया। धन्य हो तुम। धन्य है तुम्हारा जीवन। उस दिन प्रभुदास के जीवन का अर्थ बदल गया।
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एक छोटा सा पान वाला जिसे भगवान ने स्वयं अपने दर्शन दिए। उसकी भक्ति की कहानी सदियों के लिए अमर हो गई। प्रभुदास की अटूट भक्ति के कारण स्वयं भगवान ने इच्छा व्यक्त की है कि भोजन के बाद उन्हें पान अर्पित किया जाए। उस दिन से भगवान जगन्नाथ के मंदिर में भोजन के बाद पान खिलाने की परंपरा शुरू हो गई। प्रभुदास ने अपना सारा जीवन मंदिर की सेवा में लगा दिया। वह एक उदाहरण बन गए कि भक्ति प्रेम पूर्वक की जाए तो ईश्वर तक अवश्य पहुंचती है। प्रभु जगन्नाथ के चमत्कारों का जितना वर्णन करें उतना ही कम है।

रविवार, 25 मई 2025

= १७७ =

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*🌷🙏 卐 सत्यराम सा 卐 🙏🌷*
*दादू निराकार मन सुरति सौं, प्रेम प्रीति सौं सेव ।*
*जे पूजे आकार को, तो साधु प्रत्यक्ष देव ॥*
*साभार ~ @Subhash Jain*
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समस्त जीव ही नतमस्तक थे ऐसे बाबा मीणा संत "बाबा मल्ला" इन्हें जहाज़ वाले बाबा के नाम से जाना जाता है यह स्थान टहला क्षेत्र में पहाड़ों के बीचों-बीच में स्थित है !!
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मीना समाज के सिध्द संत थे 'बाबा मल्ला' बाबा का जन्म ग्राम - अलीपुर, तह.- बजूपाडा, ज़िला - दौसा में हुआ था और इन्होने जारवाल गोत्र में जन्म लिया, बाबा ने गृहस्थ जीवन को अपनाया और इनके बच्चे भी थे फिर जब इनके मन में बैराग उत्पन्न हुआ तो इन्होने बाणगंगा नदी के पास तपस्या की थी फिर सरिस्का के घने जंगलों में चले गए थे !!
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जानकार लोग बताते है कि शेर तो इनकी सुरक्षा करते थे और जब ये सो जाते थे तो शेर आकर इनके तलवे चाटा करते थे शेर इनकी आवाज़ सुनकर दौडे चले आते थे !!
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ये बाबा अपने आश्रम में आने वालो की सारी बातें पहले ही जान लेते थे ये बहुत बड़े 'माइंड रीडर' थे, बताते है कि इनके भंडारे में कभी माल खत्म नही होता था चाहे कितने भी लोग प्रसाद ग्रहण कर ले इनके छूने के बाद वहाँ पर कड़ाई में पानी डालकर पुए उतारे जाते थे और वे बेहद ही स्वादिष्ट बनते थे !!
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जब ये अंतर्ध्यान हुए तो वहाँ के जानवर बहुत बैचेंन हो गए थे और गाय,शेर आदि जंगली जानवर उन्हें आवाज़ दे दे कर पुकारते रहे थे काफी दिनों तक !!

मल्ला बाबा जैसे महान संत का जन्म मीणा वंश में हुआ जिससे पूरा मीणा समाज गर्व महसूस करता है तथा समस्त मीणा समाज कोटि कोटि नमन करता हूँ !!

रविवार, 11 मई 2025

= १७६ =

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*🌷🙏 卐 सत्यराम सा 卐 🙏🌷*
*नाहीं ह्वै करि नाम ले, कुछ न कहाई रे ।*
*साहिब जी की सेज पर, दादू जाई रे ॥*
*साभार ~ @Subhash Jain*
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"शुद्र, वैश्य, क्षेत्रीय, ब्राह्मण" ये चार व्यक्तित्व के ढंग है। शूद्र वह है,,,जो परम आलस्य से भरा है। जिसे कुछ करने की इच्छा नहीं है। कुछ होने की इच्छा नहीं है। खाना मिल जाये, वस्त्र मिल जायें, बस काफी है। वह जी लेगा। और जो इस तरह जी रहा है, वह शूद्र है। तुममें से अधिक लोग शूद्र की भांति जी रहे हैं। तुम किसी और को शूद्र मत कहना। तुम क्या कर रहे हो ? खाना-कपड़े, इनको कमा लेना। रात सो जाना, सुबह उठ कर फिर कमाने में लग जाना। जन्म से लेकर मृत्यु तक तुम्हारी प्रक्रिया शूद्र की है। इसलिए मनु कहते हैं कि हर आदमी शूद्र की भांति पैदा होता है। ब्राह्मणत्व तो एक उपलब्धि है।
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दूसरा वर्ग है,,, जिसके लिए जीवन लग जाये लेकिन धन इकट्ठा करना है, पद इकट्ठा करना है, वह वैश्य है। चाहे सब खो जाये, आत्मा बिक जाये उसकी, कोई हर्जा नहीं है, लेकिन तिजोरी भरनी चाहिए। आत्मा बिलकुल खाली हो जाये, लेकिन तिजोरी भरी होनी चाहिए। बैंक-बैलेंस असली परमात्मा है। धन असली धर्म है। वह भी तुम्हारे भीतर है। उसको मनु ने वैश्य कहा है। इस वैश्य शब्द को थोड़ा सोचो। जो स्त्री अपने शरीर को बेचती है, उसे हम वेश्या कहते हैं। *और जो अपनी आत्मा को बेचता है उसे मनु ने वैश्य कहा है। वह वेश्या से बुरी हालत में है।*
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एक तीसरा वर्ग है,,, जिसकी जिंदगी में अहंकार के सिवाय और कुछ भी नहीं है। जो किसी भी तरह, ‘मैं सब कुछ हूं’, बस, इस मूंछ पर ही ताव देता रहता है। वह क्षत्रिय है। वह हमेशा तलवार पर धार रखता रहता है। उसको अहंकार के सिवाय कोई रस नहीं। धन जाये, जीवन जाये, सब दांव पर लगा देगा। लेकिन दुनिया को दिखा देगा, कि मैं कुछ हूं। ना-कुछ नहीं। वह एक वर्ग है। तीसरी दौड़ अहंकार की दौड़ है, कि मैं सब कुछ हूं।
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और एक चौथा वर्ग है, जो सिर्फ ब्रह्म की तलाश में है। जो कहता है: और सब व्यर्थ है। न तो आलस्य का जीवन अर्थपूर्ण है, क्योंकि वह प्रमाद है। होश चाहिये। न धन के पीछे दौड़ अर्थपूर्ण है, क्योंकि वह कहीं भी नहीं ले जाती। उससे कोई कहीं पहुंचता नहीं। धन तो मिल जाता है, आत्मा खो जाती है। नहीं, ब्रह्म से कम पर राजी नहीं होना है। ब्राह्मण कहता है, तुम कुछ भी नहीं हो, तभी तो जीवन का परम धन उपलब्ध होगा।
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जब तुम नहीं रहोगे, तभी तो ब्रह्म उतरेगा। आलस्य तोड़ना है शूद्र जैसा; धन की दौड़ छोड़नी है वैश्य जैसी; अहंकार छोड़ना है क्षत्रिय जैसा; तब कभी कोई ब्राह्मण हो पाता है। ये चार व्यक्तित्व के ढंग हैं। ऐसे चार तरह के लोग हैं जमीन में।
इन चार में तुम बराबर बांट लोगे। पांचवां आदमी तुम न पाओगे। और चार से कम में भी काम न चलेगा, तीन से भी काम न चलेगा। इसलिए दुनिया में जितने भी मनुष्यों को बांटने के प्रयोग हुए हैं, सबने चार में बांटा है।
ओशो; दीया तले अंधेरा

= १७५ =

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*दादू कहिए कुछ उपकार को,*
*मानै अवगुण दोष ।*
*अंधे कूप बताइया, सत्य न मानै लोक ॥*
*साभार ~ @Subhash Jain*
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“भारत में मैं कई राजनेताओं को जानता था, लेकिन मैंने उनमें कोई भी दिमाग नहीं देखा। सरल सी बातें, जिन्हें कोई भी समझ सकता है, जिन्हें समझने के लिए कोई महान प्रतिभा नहीं चाहिए, वे बातें भी ये नेता नहीं समझते।
मेरे एक मित्र भारतीय सेना के सेनापति थे। जब पाकिस्तान ने भारत पर हमला किया, तो इस व्यक्ति – जिनका नाम था जनरल चौधरी – ने प्रधानमंत्री से पलटवार की अनुमति मांगी; यह आवश्यक था, केवल रक्षात्मक रहना कोई मदद नहीं करने वाला था। यह तो एक सामान्य सैन्य रणनीति है; अगर आप रक्षात्मक हो जाते हैं, तो आप पहले ही हार चुके हैं। सबसे अच्छा तरीका आक्रामक होना है।
अगर पाकिस्तान ने कश्मीर के एक हिस्से पर हमला किया था, तो चौधरी का विचार था कि हम पाकिस्तान पर चार या पाँच मोर्चों से हमला करें। इससे वे भ्रमित हो जाएंगे, बिखर जाएंगे, उन्हें समझ नहीं आएगा कि अपनी सेना कहाँ भेजें। उनका हमला विफल हो जाएगा क्योंकि उन्हें अपने देश की सारी सीमाओं की रक्षा करनी होगी।
लेकिन राजनेता ! प्रधानमंत्री नेहरू ने उन्हें सूचित किया – ‘सुबह 6 बजे तक इंतजार करो।’ जनरल चौधरी ने मुझे बताया कि उन्हें सेना से निकाल दिया गया – सार्वजनिक रूप से नहीं। सार्वजनिक रूप से उन्हें सम्मानपूर्वक सेवानिवृत्त किया गया, लेकिन उन्हें दरअसल निकाल दिया गया। उनसे कहा गया – ‘या तो तुम इस्तीफा दो या हम तुम्हें निकाल देंगे।’
कारण यह था कि उन्होंने सुबह 5 बजे ही पाकिस्तान पर हमला कर दिया – आदेश से एक घंटा पहले। वह समय बिल्कुल उपयुक्त था; 6 बजे तक तो सूरज निकल आता, लोग जाग चुके होते। 5 बजे हमला करने से दुश्मन पूरी तरह घबरा जाता – और उन्होंने वैसा ही किया – पूरा पाकिस्तान काँप उठा। वे लाहौर से सिर्फ 15 मील दूर थे – जो पाकिस्तान का सबसे बड़ा शहर है।
पूरी रात नेहरू और उनकी कैबिनेट इस बात पर चर्चा करते रहे – करना है या नहीं करना। और सुबह 6 बजे तक भी कोई निर्णय नहीं लिया गया था। उन्होंने रेडियो पर सुना – ‘जनरल चौधरी लाहौर में प्रवेश कर रहे हैं।’ यह बात राजनेताओं के लिए बहुत ज़्यादा हो गई। उन्होंने उन्हें रोक दिया – लाहौर से मात्र 15 मील पहले। 
और मैं देख सकता हूँ कि यह कितनी बड़ी मूर्खता थी। अगर जनरल ने लाहौर पर कब्जा कर लिया होता, तो कश्मीर और भारत की समस्या हमेशा के लिए सुलझ गई होती। अब यह कभी नहीं सुलझने वाली – जो कश्मीर का हिस्सा पाकिस्तान ने कब्जा किया है – और वह इसीलिए हुआ क्योंकि जनरल चौधरी को वापस बुला लिया गया, ‘क्योंकि भारत एक अहिंसक देश है और तुमने आदेश का इंतजार नहीं किया।’
उन्होंने उनसे कहा – ‘मैं सैन्य रणनीति समझता हूँ, आप नहीं समझते। सुबह 6 बजे तक आपका आदेश कहाँ था ? पाकिस्तान पहले ही कश्मीर के एक सुंदर हिस्से पर कब्जा कर चुका है – और आप बस पूरी रात चर्चा ही करते रहे। यह कोई ऐसी बात नहीं है जिस पर चर्चा की जाए – यह युद्धभूमि पर तय की जाती है। अगर आपने मुझे लाहौर पर कब्जा करने दिया होता तो हम सौदेबाज़ी की स्थिति में होते। अब हम सौदेबाज़ी की स्थिति में नहीं हैं। आपने मुझे रोक दिया। मुझे लौटना पड़ा।’
संयुक्त राष्ट्र ने युद्धविराम रेखा तय कर दी। अब 40 सालों से UN की सेनाएँ वहाँ गश्त कर रही हैं, उस ओर पाकिस्तानी सेनाएँ गश्त कर रही हैं, इस ओर भारतीय सेनाएँ। 40 साल – सिर्फ बकवास ! और संयुक्त राष्ट्र में वे अब भी चर्चा करते हैं लेकिन कोई निष्कर्ष नहीं निकलता।
और जिस क्षेत्र पर पाकिस्तान ने कब्जा कर लिया है, उसे अब वापस नहीं लिया जा सकता क्योंकि युद्धविराम हो चुका है। उन्होंने अपनी संसद में यह तय कर लिया है कि जिस भूभाग पर उन्होंने कब्जा किया है, वह अब पाकिस्तान में सम्मिलित है। अब वे अपने नक्शों में उसे पाकिस्तान का हिस्सा दिखाते हैं। वह अब ‘अधिकृत क्षेत्र’ नहीं रहा, वह पाकिस्तान का हिस्सा बन चुका है।
मैंने जनरल चौधरी से कहा था – ‘यह तो बहुत ही सरल बात थी कि तुम्हें सौदेबाज़ी की स्थिति में रहना चाहिए था। अगर तुमने लाहौर पर कब्जा कर लिया होता, तो वे तुरंत कश्मीर छोड़ने के लिए तैयार हो जाते, क्योंकि वे लाहौर नहीं गंवा सकते थे। या फिर अगर युद्धविराम होता, तो कोई बात नहीं – लाहौर हमारे पास रहता। किसी भी स्थिति में हमारे पास कुछ सौदेबाज़ी के लिए होता। भारत के पास अब कुछ नहीं है – फिर पाकिस्तान क्यों परवाह करेगा ?’
लेकिन राजनेताओं के पास निश्चित ही दिमाग नहीं होता।”
— ओशो (From Darkness to Light, 1987)

= १७४ =

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*दादू सरवर सहज का, तामें प्रेम तरंग ।*
*तहँ मन झूलै आत्मा, अपणे सांई संग ॥*
*साभार ~ @Krishna Krishna*
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*"इश्क़ और प्रेम – ये दो शब्द दिखने में पास-पास लगते हैं,लेकिन इनके बीच की दूरी उतनी ही है जितनी सतह और गहराई में होती है।* इश्क़ बाहर की यात्रा है – आँखों से शुरू होती है, कल्पनाओं में भटकती है, और आकांक्षाओं में उलझ जाती है। इश्क़ में चाह होती है – किसी को पाने की, किसी को बाँधने की, और जहां चाह होती है, वहाँ भय भी होता है – खो देने का। इसीलिए इश्क़ बेचैन करता है, थका देता है।
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लेकिन प्रेम... प्रेम भीतर की यात्रा है। प्रेम में पाने का कोई आग्रह नहीं, प्रेम में बस बहाव है – देना, और फिर भी खाली न होना। प्रेम आत्मा का संगीत है – जो शब्दों से परे है। प्रेम में तुम दूसरे को नहीं, खुद को मिटा देते हो। और वही मिट जाना – मिल जाना बन जाता है। इश्क़ में तुम किसी और में खुद को देखना चाहते हो, प्रेम में तुम खुद को भूल जाते हो – और वही भूलना, ध्यान है।
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*जब इश्क़ जागरूकता में रूपांतरित हो जाता है,तो वह प्रेम बन जाता है।और प्रेम... प्रेम तो परमात्मा की सुगंध है।"*
~ओशो 💞💞

रविवार, 27 अप्रैल 2025

= १७३ =

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*जिसकी सुरति जहाँ रहै, तिसका तहँ विश्राम ।*
*भावै माया मोह में, भावै आतम राम ॥*
*साभार ~ @Chetan Ram*
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🍁*आसक्ति का परिणाम*🍁

एक संन्यासी था विरक्त भाव से शान्ति से जंगल में रहते हुए ईश्वर प्राप्ति हेतु तप करता रहता था। एक दिन वहाँ से इक राहगीर व्यापारी गुजरा और उसने विश्राम हेतु एक रात वहीं उन संन्यासी की कुटिया में बितायी।
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वह संन्यासी के स्वभाव व सेवा से बहुत प्रसन्न हुआ और जाने से पहले उस व्यापारी ने संन्यासी को एक सुंदर कम्बल दान में दिया। संन्यासी को वह कम्बल बहुत आकर्षक लगा।
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वह उसे बार-बार छू कर निहारता रहता। ऐसा सुन्दर व कोमल कम्बल उसने कभी नहीं देखा था, वह अब हर क्षण उस कम्बल को नज़रों के सामने रखता। अतः संन्यासी का दिनों दिन उस कम्बल से लगाव गहरा होता गया।
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अब उसको हर समय कम्बल की चिंता सताती कि वह ख़राब या गन्दा न हो जाये, या फिर कहीं कोई और उसे चुरा न ले आदि। समय के साथ साथ ऐसा परिवर्तन हुआ कि जो श्रद्धा – प्रेम व लगाव उसके मन में परमात्मा के लिये था उसका स्थान अब उस कम्बल ने लिया था।
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अंततः कम्बल के प्रति आसक्ति के परिणामस्वरूप जब उसकी मृत्यु का क्षण आया तब भी उस समय उसके मन में अंतिम ख़्याल केवल कम्बल का ही आया।
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जिसके कारणवंश वह संन्यासी जो परमात्मा से अत्यंत प्रेम करता था परन्तु कम्बल के प्रति गहन आसक्ति की वजह से उसके जीवन व हृदय में परमात्मा का स्थान दूसरे नम्बर पर हो गया था और वह कम्बल अब उसकी पहली प्राथमिकता हो गया था, अत: प्राण त्यागते समय भी केवल कम्बल का विचार ही उसके मन में उत्पन्न हुआ।
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जैसाकि श्रीकृष्ण ने गीता के 8:5 श्लोक में कहा है कि जो कोई भी, मृत्यु के समय, अपने शरीर को छोड़ते समय केवल मेरा स्मरण करते हुए शरीर का त्याग करता है, वह मुझे व मेरा स्वभाव प्राप्त कर लेता है। इसमें कोई संदेह नहीं है।
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परन्तु उस संन्यासी को परमात्मा से अधिक लगाव सांसारिक वस्तु — एक कम्बल से हो गया था अंततः उसी का ही ख़्याल उसे मरते समय आया।
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परिणामस्वरूप अब वह संन्यासी अगले जन्म मे पतंगा (कपड़े का कीड़ा – moth) बन कर पैदा हुआ। और लगभग अगले एक सौ जन्मों तक जब तक वह कम्बल कीड़ों द्वार खा कर पूर्णतः नष्ट नहीं हो गया तब तक वह संन्यासी बार-बार वही पंतगे का कीट बन कर पैदा होता रहा।
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अब इस कहानी के आधार पर अगर हम इस तथ्य का अवलोकन करें कि जीवन में हमें जो भी मिलता है क्या वह ईश्वर की कृपा है या हमारे कर्मों का फल! तो हम पाते हैं कि ईश्वर की कृपा तो सब के लिए बराबर मात्रा में बहती है परन्तु इस अस्थायी तथा नश्वर संसार के असंख्य सांसारिक आकर्षण व लगाव वह छतरियाँ हैं.... जिन्हें हम अपने सर पर छतरी की तरह खुला रखते हैं और परमात्मा की उस कृपा को स्वयं तक पहुँचने से स्वयं ही रोक देते हैं।
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ईश्वर ने अपनी लीला द्वारा हर वस्तु का निर्माण किया है, व उनसे आनन्द पाने के लिये हमें इन्द्रियां भी प्रदान की है। व उसके साथ-साथ परमात्मा ने हमारे क्रमिक विकास व उसे (पूर्ण परमात्मा) जो जीवन का सर्वोच्च लक्ष्य है को प्राप्त करने के लिये – हमारे हृदय में सदा अतृप्त रहने वाली एक तड़प व बेचैनी का भाव भी भर दिया है।
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जिसके कारण हम इस संसार में जब भी परमात्मा के अलावा कुछ भी और प्राप्त करते हैं तो निश्चितता कुछ समय के पश्चात हमारे मन में उस वस्तु के प्रति असंतुष्टी का भाव या फिर उसे खोने का भय शीघ्र ही उत्पन्न हो कर हमें बेचैन करने लगता है..!!

गुरुवार, 17 अप्रैल 2025

= १७२ =

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*चोर अन्याई मसखरा, सब मिलि बैसैं पांति ।*
*दादू सेवक राम का, तिन सौं करैं भरांति ॥*
*साभार ~ @Subhash Jain*
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लाओत्सु ने कहा हैः जब मैं कुछ सत्य की बात कहता हूं तो लोग हंसते हैं, उपहास करते हैं; तब मैं निश्चित समझ जाता हूं कि जौ मैंने कहा, वह सत्य ही होना चाहिए। अगर वह सत्य न होता तो लोग उपहास क्यों करते !
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एक फकीर थे~महात्मा भगवानदीन। वे मुझसे बोले कि जब भी मैं लोगों को ताली बजाते सुनता हूं. . . बड़े प्यारे वक्ता थे. . . तो मैं दुःखी हो जाता हूं। क्योंकि जब लोग ताली बजा रहे हैं तो मैंने जरूर कोई गलत बात कही होगी। जो लोगों तक की समझ में आ रही है, वह गलत ही होनी चाहिए। लोग इतने गलत हैं !
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वे बड़े नाराज हो जाते थे, जब उनके बोलने में कोई ताली बजा दे। बड़े नाराज हो जाते थे कि मैंने कोई ऐसी गलत बात कही कि तुम ताली बजाते हो ! लोग तो ताली बजाकर प्रसन्न होते हैं, सुनकर प्रसन्न होते हैं कि ताली बजायी जा रही है; वे बड़े नाराज हो जाते थे। वे कहते थे~मैं बोलूंगा ही नहीं, अगर ताली बजायी। तुमने ताली बजायी–मतलब कि कुछ गलत बात हो गयी।
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लाओत्सु ठीक कह रहा है कि अगर लोग उपहास न करते तो मैं समझ लेता कि यह सत्य होगा ही नहीं। सत्य का तो सदा उपहास होता है, क्योंकि लोग इतने असत्य हैं। लोग झूठे हैं, इसलिए सत्य पर हंसते हैं। हंसकर अपने को बचाते हैं। उनकी हंसी आत्मरक्षा है।
“जगत् करे उपहास, पिया का संग न छोड़ै।
प्रेम की सेज बिछाय मेहर की चादर ओढ़ै॥’
फिकर ही मत करना संसार की; तुम तो अपनी प्रेम की सेज बिछा लेना और परमात्मा की याद करना कि तुम आओ, तुम्हारे लिए सेज तैयार कर रखी है।
.
“प्रेम की सेज बिछाय, मेहर की चादर ओढ़ै। और करुणा की चादर ओढ़ना। प्रेम का बिस्तर बनाना और करुणा की चादर बना लेना। संसार के प्रति करुणा रखना, परमात्मा के प्रति प्रेम रखना–बस ये दो चीजें सध जाएं। हंसनेवालों के प्रति करुणा रखना, नाराजगी मत रखना। अगर नाराजगी रखी तो वे जीत जाएंगे। अगर करुणा रखी, तो ही तुम जीत पाओगे। वे हंसें, तो स्वीकार करना कि ठीक ही हंसते हैं। जहां वे खड़े हैं, वहां से उन्हें हंसी आती है हम पर, ठीक ही है। उनकी स्थिति में ऐसा ही होना स्वाभाविक है। उन पर करुणा रखना।
.
“ऐसी रहनी रहै तजै जो भोग-विलासा।’
यह बड़ा अपूर्व सूत्र है। पलटू कहते हैं कि भक्त के प्रेम में और करुणा में, और परमात्मा के स्मरण में अपने-आप भोग-विलास छूट जाता है।
“ऐसी रहनी रहै तजै जो भोग-विलासा।’
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भोग-विलास छोड़ना न पड़े, छूट जाए–ऐसी रहनी रहे। परमात्मा की स्मृति जिसके जीवन में भरी है, उसको कहां भोग-विलास की याद रह जाती है ! वह तो परमभोग भोग रहा है; अब तो छोटे-मोटे भोग की बात ही कहां ! हीरे बरस रहे हों तो कोई कंकड़-पत्थर बीनता है ? अमृत बह रहा हो तो कोई नाली के गंदे पानी को भर कर घर लाता है ? जहां फूलों की वर्षा हो रही हो, वहां कोई दुर्गंध समेटता है ? जहां सच्चा सुख मिल रहा हो वहां क्षणभंगुर सुख की कौन चिंता करता है ?
“ऐसी रहनी रहै तजै जो भोग-विलासा।’
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परमात्मा की मस्ती में रहे। परमात्मा के आनंद-भाव में रहे। परमात्मा के प्रेम में रहे और जगत्‌ के प्रति करुणा से भरा और सुरति की धारा बहे। बस फिर अपने-आप ऐसी रहनी पैदा हो जाती है, जीवन का ऐसा ढंग, जीवन में ऐसी चर्या पैदा हो जाती है कि भोग-विलास अपने-आप छूट जाते हैं। छोड़ने नहीं पड़ते, छोड़ने पड़ें, तो बात ही गलत हो गयी। छोड़ने पड़ें तो घाव रह जाएंगे; छूट जाएं तो बड़ा स्वास्थ्य और बड़ा सौंदर्य होता है। व्यर्थ को छोड़ना पड़े तो उसका अर्थ हुआ कि अभी कुछ सार्थकता दिखायी पड़ती थी, इसलिए चेष्टा करनी पड़ी, छोड़ना पड़ा। व्यर्थ व्यर्थ की भांति दिखायी पड़ जाए, तो फिर चेष्टा नहीं करनी पड़ती, हाथ खुल जाते हैं, व्यर्थ गिर जाता है। आदमी पीछे लौटकर भी नहीं देखता।
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“रहनी रहै तजै जो भोग-विलासा।
मारे भूख-प्यास, याद संग चलती स्वासा॥’
फिर तो भूख-प्यास तक की याद नहीं रह जाती, क्योंकि श्वास-श्वास में उसी की ही याद चलती है। कहां का भोग, कहां का विलास ! कौन धन को इकट्ठे करने में पड़ता है ! कौन पद की चिंता करता है ! कौन आदर-समादर खोजता है ! कौन सम्मान खोजता है ! जिसको उस प्राण-प्यारे की तरफ से मान मिलने लगा, इस संसार में कोई मान अब अर्थ नहीं रखता। “मारे भूख-प्यास, याद संग चलती स्वासा।’ यह जो श्वास के साथ याद बहने लगती है, इससे भूख-प्यास तक मर जाती है।
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एक तुमने बात कभी खयाल की–बहुत मनोवैज्ञानिक है ! जब तुम दुःखी होते हो, तुम ज्यादा भूखे-प्यासे अनुभव करते हो। जब तम दुःखी होते हो, तब तुम ज्यादा भोजन कर लेते हो। क्योंकि दुःखी आदमी भीतर खाली-खाली मालूम पड़ता है–किसी से भी भर लो, किसी तरह भर लो भीतर का गङ्ढा ! 
सुखी आदमी कम भोजन करता है। परम सुख में तो भूख भूल ही जाती है। परम सुख में तुम ऐसे भरे मालूम पड़ते हो भीतर, कि कहां भूख, कहां प्यास ! जब भी सुख घटता है तो आदमी भर जाता है। जब भी जीवन में दुःख होता है, तो आदमी जबरदस्ती अपने को भरने लगता है; खाली-खाली मालूम पड़ता है–“चलो किसी भी चीज से भर लो।’
ओशो

शुक्रवार, 11 अप्रैल 2025

= १७१ =

*🌷🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏🌷*
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*दादू है को भय घणां, नाहीं को कुछ नाहीं ।*
*दादू नाहीं होइ रहु, अपणे साहिब माहिं ॥*
*साभार ~ @Subhash Jain*
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अहिंसा क्या है ?
अहिंसा आत्मा है महावीर की दृष्टि से। अगर महावीर से हम पूछें कि एक ही शब्द में कह दें कि धर्म क्या है ? तो वे कहेंगे अहिंसा। कहा है उन्होंने– अहिंसा परम धर्म है।अहिंसा पर क्यों महावीर इतना जोर देते हैं ? किसी ने नहीं कहा, ऐसा अहिंसा को। कोई कहेगा, परमात्मा; कोई कहेगा, आत्मा; कोई कहेगा, सेवा; कोई कहेगा, ध्यान; कोई कहेगा, समाधि; कोई कहेगा, योग; कोई कहेगा, प्रार्थना; कोई कहेगा, पूजा।
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महावीर से अगर हम पूछें, उनके अंतर्तम में एक ही शब्द बसता है और वह है अहिंसा। क्यों ? तो जिसको महावीर के माननेवाले अहिंसा कहते हैं, अगर इतनी ही अहिंसा है तो महावीर गलती में हैं। तब बहुत क्षुद्र बात कही जा रही है। महावीर को माननेवाला अहिंसा से जैसा मतलब समझता है, उससे ज्यादा बचकाना, चाइल्डिश कोई मतलब नहीं हो सकता। उससे वह मतलब समझता है– दूसरे को दुख मत दो। महावीर का यह अर्थ नहीं है। क्योंकि धर्म की परिभाषा में दूसरा आये, यह महावीर बरदाश्त न करेंगे। इसे थोड़ा समझें।
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धर्म की परिभाषा स्वभाव है, और धर्म की परिभाषा दूसरे से करनी पड़े कि दूसरे को दुख मत दो, यही धर्म है, तो यह धर्म भी दूसरे पर ही निर्भर और दूसरे पर ही केंद्रित हो गया है। महावीर यह भी न कहेंगे कि दूसरे को सुख दो, यही धर्म है। क्योंकि फिर वह दूसरा तो खड़ा ही रहा। महावीर कहते हैं– धर्म तो वहां है, जहां दूसरा है ही नहीं। इसलिए दूसरे की व्याख्या से नहीं बनेगा।
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दूसरे को दुख मत दो– यह महावीर की परिभाषा इसलिए भी नहीं हो सकती, क्योंकि महावीर मानते नहीं कि तुम दूसरे को दुख दे सकते हो, जब तक दूसरा लेना न चाहे। इसे थोड़ा समझना। यह भ्रांति है कि मैं दूसरे को दुख दे सकता हूं और यह भ्रांति इसी पर खड़ी है कि मैं दूसरे से दुख पा सकता हूं, मैं दूसरे से सुख पा सकता हूं, मैं दूसरे को सुख दे सकता हूं। ये सब भ्रांतियां एक ही आधार पर खड़ी हैं।
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अगर आप दूसरे को दुख दे सकते हैं तो क्या आप सोचते हैं, आप महावीर को दुख दे सकते हैं ? और अगर आप महावीर को दुख दे सकते हैं तो फिर बात खत्म हो गयी। नहीं, आप महावीर को दुख नहीं दे सकते। क्योंकि महावीर दुख लेने को तैयार ही नहीं हैं। आप उसी को दुख दे सकते हैं जो दुख लेने को तैयार है। और आप हैरान होंगे कि हम इतने उत्सुक हैं दुख लेने को, जिसका कोई हिसाब नहीं।
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आतुर हैं, प्रार्थना कर रहे हैं कि कोई दुख दे। दिखाई नहीं पड़ता...दिखाई नहीं पड़ता, लेकिन खोजें अपने को। अगर एक आदमी आपकी चौबीस घंटे प्रशंसा करे, तो आपको सुख न मिलेगा, और एक गाली दे दे तो जन्म भर के लिए दुख मिल जाएगा। एक आदमी आपकी वर्षो सेवा करे, आपको सुख न मिलेगा, और एक दिन आपके खिलाफ एक शब्द बोल दे और आपको इतना दुख मिल जाएगा कि वह सब सुख व्यर्थ हो गया। इससे क्या सिद्ध होता है ?
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इससे यह सिद्ध होता है कि आप सुख लेने को इतने आतुर नहीं दिखाई पड़ते हैं जितना दुख लेने को आतुर दिखाई पड़ते हैं। यानी आपकी उत्सुकता जितनी दुख लेने में है उतनी ही सुख लेने में नहीं है। अगर मुझे किसी ने उन्नीस बार नमस्कार किया और एक बार नमस्कार नहीं किया, तो उन्नीस बार नमस्कार से मैंने जितना सुख नहीं लिया है, एक बार नमस्कार न करने से उतना दुख ले लूंगा।
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आश्चर्य है ! मुझे कहना चाहिए था, कोई बात नहीं है, हिसाब अभी भी बहुत बड़ा है। कम से कम बीस बार न करे तब बराबर होगा। मगर वह नहीं होता है। तब भी बराबर होगा, तब भी दुख लेने का कोई कारण नहीं है, मामला तब तराजू में तुल जाएगा। लेकिन नहीं, जरा सी बात दुख दे जाती है। हम इतने सैंसिटिव हैं दुख के लिए, उसका कारण क्या है ? उसका कारण यही है कि हम दूसरे से सुख चाहते हैं - इतना ज्यादा कि वही चाह हमें दुख मिलने का द्वार बन जाती है, और तब दूसरे से सुख तो मिलता नहीं – मिल नहीं सकता। फिर दुख मिल सकता है, उसको हम लेते चले जाते हैं।
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महावीर नहीं कह सकते कि अहिंसा का अर्थ है दूसरे को दुख न देना। दूसरे को कौन दुख दे सकता है, अगर दूसरा लेना न चाहे। और जो लेना चाहता है उसको कोई भी न दे तो वह ले लेगा। यह भी मैं आपसे कह देना चाहता हूं। कोई वह आपके लिए रुका नहीं रहेगा कि आपने नहीं दिया तो दुख कैसे लें। लोग आसमान से दुख ले रहे हैं। जिन्हें दुख लेना है, वे बड़े इन्वेन्टिव हैं । वे इस-इस ढंग से दुख लेते हैं, इतना आविष्कार करते हैं कि जिसका हिसाब नहीं है। वे आपके उठने से दुख ले लेंगे, आपके बैठने से दुख ले लेंगे, आपके चलने से दुख ले लेंगे, किसी चीज से दुख ले लेंगे। अगर आप बोलेंगे तो दुख ले लेंगे, अगर आप चुप बैठेंगे तो दुख ले लेंगे कि आप चुप क्यों बैठे हैं, इसका क्या मतलब ?
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हम दुख के लिए भी उत्सुक हैं– कम से कम दुख तो दो, अगर सुख न दे सको। कुछ तो दो, दुख भी दोगे तो चलेगा, लेकिन दो। इसलिए हम आतुर हैं चारों तरफ, और संवेदनशील हैं। हम अपनी सारी इंद्रियों को चारों तरफ सजग रखते हैं, एक ही काम के लिए कि कहीं से दुख आ रहा हो तो चूक न जाएं। तो उसे जल्दी से ले लें। कहीं कोई और न ले ले; कहीं चूक न जाएं; कहीं अवसर न खो जाए। यह दुख हमारे रहने की वजह है, जीने की वजह है।
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जितने दुख आपको मिल रहे हैं उसमें से निन्यानबे प्रतिशत आपके आविष्कार हैं। निन्यानबे प्रतिशत! जरा खोजें कि किस-किस तरह आप आविष्कार करते हैं दुख का। कौन-कौन सी तरकीबें आपने बिठा रखी हैं! असल में बिना दुखी हुए आप रह नहीं सकते। क्योंकि दो ही उपाय हैं, या तो आदमी सुखी हो तो रह सकता है, या दुखी हो तो रह सकता है। अगर दोनों न रह जाएं तो जी नहीं सकता।
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दुख भी जीने के लिए काफी बहाना है। दुखी लोग देखते हैं आप, कितने रस से जीते हैं? इसको जरा देखना पड़ेगा। दुखी लोग कितने रस से जीते हैं? वह अपने दुख की कथा कितने रस से कहते हैं? दुखी आदमी की कथा सुनें, कैसा रस लेता है। और कथा को कैसा मैग्निफाई करता है, उसको कितना बड़ा करता है। सुई लग जाए तो तलवार से कम नहीं लगती है उसे।
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कभी आपने खयाल किया है कि आप किसी डाक्टर के पास जाएं और वह आपसे कह दे कि नहीं, आप बिलकुल बीमार नहीं हैं, तो कैसा दुख होता है ! वह डाक्टर ठीक नहीं मालूम पड़ता । किसी और बड़े एक्सपर्ट को खोजना पड़ता है, इससे काम नहीं चलेगा। यह कोई डाक्टर है ! आप जैसे बड़े आदमी, और आपको कोई बीमारी ही नहीं है। या कोई छोटी- मोटी बीमारी बता दे, कि कह दे, गर्म पानी पी लेना और ठीक हो जाओगे। तो भी मन को तृप्ति नहीं मिलती।
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इसलिए डाक्टरों को, बेचारों को अपनी दवाइयों के नाम लैटिन में रखने पड़ते हैं, चाहे उसका मतलब होता हो अजवाइन का सत। लेकिन लैटिन में जब नाम होता है, तब मरीज अकड़ कर घर लौटता है, प्रिस्क्रिप्शन लेकर कि ये कुछ काम हुआ ! जिएंगे कैसे, अगर दुख न हो तो जिएंगे कैसे ! या तो आनंद हो तो जीने की वजह होती है। आनंद न हो तो दुख तो हो ही !
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तो महावीर की अहिंसा का यह अर्थ नहीं है कि दूसरे को दुख मत देना, क्योंकि महावीर तो कहते ही यह हैं कि दूसरे को न कोई दुख दे सकता है और न कोई सुख दे सकता है। महावीर की अहिंसा का यह भी अर्थ नहीं है कि दूसरे को मारना मत, मार मत डालना क्योंकि महावीर भलीभांति जानते हैं कि इस जगत में कौन किसको मार सकता है, मार डाल सकता है।
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महावीर से ज्यादा बेहतर और कौन जानता होगा यह कि मृत्यु असंभव है। मरता नहीं है कुछ। तो महावीर का यह मतलब तो कतई नहीं हो सकता कि मारना मत, मार मत डालना किसी को क्योंकि महावीर तो भलीभांति जानते हैं। और अगर इतना भी नहीं जानते तो महावीर के महावीर होने का कोई अर्थ नहीं रह जाता। लेकिन महावीर के पीछे चलने वाले बहुत साधारण-साधारण परिभाषाओं का ढेर इकट्ठा कर दिये हैं।
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कहते हैं, अहिंसा का अर्थ यह है कि मुंह पर पट्टी बांध लेना, कि अहिंसा का अर्थ यह है कि संभलकर चलना कि कोई कीड़ा न मर जाए, कि रात पानी मत पी लेना, कि कहीं कोई हिंसा न हो जाए। यह सब ठीक है। मुंह पर पट्टी बांधना - कोई हर्जा नहीं है, पानी छानकर पी लेना - बहुत अच्छा है। पैर संभालकर रखना, यह भी बहुत अच्छा है, लेकिन इस भ्रम में नहीं कि आप किसी को मार सकते थे। इस भ्रम में नहीं। मत देना किसी को दुख, बहुत अच्छा है। लेकिन इस भ्रम में नहीं कि आप किसी को दुख दे सकते थे।
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मेरे फर्क को आप समझ लेना। मैं यह नहीं कह रहा हूं कि आप जाना और मारना और काटना; क्योंकि मार तो कोई सकते ही नहीं हैं - यह मैं नहीं कह रहा हूं ! महावीर की अहिंसा का अर्थ ऐसा नहीं है। महावीर की अहिंसा का अर्थ ठीक वैसा है जैसे बुद्ध के तथाता का। इसे थोड़ा समझ लें। महावीर की अहिंसा का अर्थ वैसा ही है जैसे बुद्ध के तथाता का। तथाता का अर्थ होता है टोटल एक्सेप्टेबिलिटी, जो जैसा है वैसा ही हमें स्वीकार है। हम कुछ हेर-फेर न करेंगे।
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अब एक चींटी चल रही है रास्ते पर, हम कौन हैं जो उसके रास्ते में किसी तरह का हेर-फेर करने जाएं ? अगर मेरा पैर भी पड़ जाए तो मैं उसके मार्ग पर हेर-फेर करने का कारण और निमित्त तो बन जाता हूं। और मार्ग बहुत है। वह चींटी अभी जाती थी। अपने बच्‍चों के लिए शायद भोजन जूटाने जा रही थी। पता नहीं उसकी अपनी योजनाओ का जगत हे। मैं उसके बीच में न आ जाऊं। ऐसा नहीं है कि न आने से मैं बच जाऊंगा। फिर भी आ सकता हूं। लेकिन महवीर कहते है मैं उसकी तरफ से बीच में न आऊं।
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जरूरी नहीं है कि मैं ही चींटी पर पैर रखूं, तब वह मरे। चींटी खुद मेरे पैर के नीचे आकर मर सकती है। वह चींटी जाने, वह उसकी योजना जाने। महावीर जानते हैं कि यह जीवन के पथ पर प्रत्येक अपनी योजना में संलग्न है। वह योजना छोटी नहीं है। वह योजना बड़ी है, जन्मों-जन्मों की है। वह कर्मो का बड़ा विस्तार है उसका। उसकी अपने कर्मों की, फलों की लंबी यात्रा है। मैं किसी की यात्रा पर किसी भी कारण से बाधा न बनूं। मैं चुपचाप अपनी पगडंडी पर चलता रहूं। मेरे कारण निमित्त के लिए भी किसी के मार्ग पर कोई व्यवधान खड़ा न हो। मैं ऐसा हो जाऊं, जैसे हूं ही नहीं।
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अहिंसा का महावीर का अर्थ है कि मैं ऐसा हो जाऊं, जैसे मैं हूं ही नहीं। यह चींटी यहां से ऐसे ही गुजर जाती है जैसे कि मैं इस रास्ते पर चला ही नहीं था, और ये पक्षी इन वृक्षों पर ऐसे ही बैठे रहते हैं जैसे कि मैं इन वृक्षों के नीचे बैठा ही नहीं था। ये लोग इस गांव के, ऐसे ही जीते रहते हैं जैसे मैं इस गांव से गुजरा ही नहीं था । जैसे मैं नहीं हूं। महावीर का गहनतम जो अहिंसा का अर्थ है, वह है एब्सेंस, जैसे मैं नहीं हूं।
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मेरी प्रेजेंस कहीं अनुभव न हो, मेरी उपस्थिति कहीं प्रगाढ़ न हो जाए, मेरा होना कहीं किसी के होने में जरा-सा भी अड़चन, व्यवधान न बने। मैं ऐसे हो जाऊं जैसे नहीं हूं। मैं जीते जी मर जाऊं। अहिंसा का अर्थ है, गहनतम अनुपस्थिति। इसलिए मैंने कहा कि बुद्ध का जो तथाता का भाव है, वही महावीर की अहिंसा का भाव है। तथाता का अर्थ है — जैसा है, स्वीकार है। अहिंसा का भी यही अर्थ है कि हम परिवर्तन के लिए जरा भी चेष्टा न करेंगे।
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जो हो रहा है ठीक है, जो हो जाए, ठीक है। जीवन रहे तो ठीक है, मृत्यु आ जाए तो ठीक है। हमारी हिंसा किस बात से पैदा होती है ? जो हो रहा है वह नहीं, जो हम चाहते हैं वह हो। तो हिंसा पैदा होती है। हिंसा है क्या ? इसलिए युग में जितना ज्यादा परिवर्तन की आकांक्षा भरती है, युग उतने ही हिंसक होते चले जाते हैं । आदमी जितना चाहता है, ऐसा हो, उतनी हिंसा बढ़ जाएगी।
ओशो
महावीर वाणी, प्रवचन 4

गुरुवार, 10 अप्रैल 2025

= १७० =

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*कर्मै कर्म काटै नहीं, कर्मै कर्म न जाइ ।*
*कर्मै कर्म छूटै नहीं, कर्मै कर्म बँधाइ ॥*
*साभार ~ @Subhash Jain*
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*अष्‍टावक्र': महागीता*~*‘तू असंग है।’*
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कोई तेरा संगी-साथी नहीं। शरीर भी तेरा संगी-साथी नहीं, श्वास भी तेरी संगी-साथी नहीं, मन के विचार भी तेरे संगी-साथी नहीं। तू असंग है। भीतर भी कोई साथी नहीं, बाहर की तो बात ही क्या ! पति-पत्नी, परिवार, मित्र, प्रियजन कोई साथी नहीं। साथ होंगे, संगी कोई भी नहीं। साथ होना केवल बाह्य घटना है। भीतर से किसी से कोई जोड़ बनता नहीं। तू असंग, क्रिया-शून्य है।
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इसलिए कर्म के जाल की तो बात ही मत उठाओ। अगर अष्टावक्र से तुम यह पूछोगे कि आप कहते हो अभी-अभी हो सकती है मुक्ति, तो कर्मों का क्या होगा ? जन्म-जन्म तक पाप किये, उनका क्या होगा ? उनसे छुटकारा कैसे होगा ? अष्टावक्र कहते हैं, तुमने कभी किये ही नहीं। भूख के कारण शरीर ने किया होगा कुछ। प्राण के कारण प्राण ने किया होगा कुछ। मन के कारण मन ने किया होगा कुछ।
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तुमने कभी कुछ नहीं किया। तुम सदा से असंग हो; अकर्म में हो। कर्म तुमसे कभी हुआ नहीं, तुम सारे कर्मों के द्रष्टा हो। इसलिए इसी क्षण मुक्ति हो सकती है। खयाल करना, अगर कर्मों के सारे जाल को हमें तोड़ना पड़े तो शायद मुक्ति कभी भी न हो सकेगी। असंभव है। अनंत काल में हमने कितने कर्म किये, उनका कुछ लेखा-जोखा करो। अगर उन सब कर्मों से छूटना पड़े तो उन कर्मों से छूटने में अनंत काल लगेगा।
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और यह जो अनंत काल छूटने में लगेगा, इसमें भी तुम बैठे थोड़े ही रहोगे, कुछ तो करोगे। तो कर्म तो फिर होते चले जायेंगे। तो यह श्रृंखला तो अंतहीन हो जायेगी। इस श्रृंखला की तो कभी कोई समाप्ति आने वाली नहीं, इसमें से कोई निष्कर्ष आने वाला नहीं। अष्टावक्र कहते हैं, अगर कर्मों से मुक्त होना पड़े, फिर मुक्ति होती हो, तो मुक्ति कभी होगी ही नहीं। लेकिन मुक्ति होती है।
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मुक्‍ति का होना इस बात का सबूत है कि आत्मा ने कर्म कभी किये ही नहीं। न तो तुम पापी हो न तुम पुण्यात्मा हो; न तुम साधु हो न तुम असाधु हो। न तो कहीं कोई नर्क है और न कहीं कोई स्वर्ग है। तुमने कभी कुछ किया नहीं; तुमने सिर्फ सपने देखे हैं, तुमने सिर्फ सोचा है। तुम भीतर सोये रहे, शरीर करता रहा। जिन शरीरों ने कर्म किये थे, वे जा चुके। उनका फल तुम्हारे लिए कैसा।
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तुम तो भीतर सोये रहे, मन ने कर्म किये। जिस मन ने किये वह प्रतिपल जा रहा है। मैंने सुना है, एक भूतपूर्व महाराजा ने देखा कि ड्राइंग-रूम गंदा है। तो नौकर झनकू को डांटा। कहा, बैठक में मकड़ी के जाले लगे हैं। तुम दिन भर क्या करते हो ? झनकू ने कहा, हुजूर ! जाला कौनो मकड़ी लगाई होई। हम तो अपन कोठरिया में औंघात रहे ! तुम तो औंघाते रहे भीतर, जाला कौनो मकड़ी लगाई होई।
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शरीर ने जाले बुने, मन ने जाले बुने, प्राण ने जाले बुने—तुम तो सोये रहे। जागो ! जागते ही तुम पाओगे तुमने तो कभी कुछ किया नहीं। तुम तो करना भी चाहो तो कुछ कर नहीं सकते। अकर्म तुम्हारा स्वभाव है। अकर्ता तुम्हारी स्वाभाविक दशा है।
ओशो; अष्‍टावक्र: महागीता

= १६९ =

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*आपै मारै आपको, आप आप को खाइ ।*
*आपै अपना काल है, दादू कहि समझाइ ॥*
*आपै मारै आपको, यहु जीव विचारा ।*
*साहिब राखणहार है, सो हितू हमारा ॥*
*साभार ~ @Subhash Jain*
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महावीर के सिवाय और कोई रास्ता नहीं है..
महावीर के जन्म-उत्सव पर थोड़ी सी बातें आपसे कहूं, इससे मुझे आनंद होगा। आनंद इसलिए होगा कि आज मनुष्य को मनुष्य के ही हाथों से बचाने के लिए सिवाय महावीर के और कोई रास्ता नहीं है। मनुष्य को मनुष्य के ही हाथों से बचाने के लिए महावीर के सिवाय और कोई रास्ता नहीं है।
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ऐसा कभी कल्पना में भी संभव नहीं था कि मनुष्य खुद के विनाश के लिए इतना उत्सुक हो जाएगा। इतनी तीव्र आकांक्षा और प्यास उसे पैदा होगी कि वह अपने को समाप्त कर ले, इसकी हमने कभी कल्पना भी नहीं की थी। लेकिन विगत पचास वर्षों से मनुष्य अपने को समाप्त करने के सारे आयोजन कर रहा है ! उसकी पूरी चेष्टा यह है कि एक-दूसरे को हम कैसे समाप्त कर दें, कैसे विनष्ट कर दें !
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पिछले पचास वर्षों में दो महायुद्ध हमने लड़े हैं और दस करोड़ लोगों की उसमें हत्या की है। और ये युद्ध बहुत छोटे युद्ध थे, जिस तीसरे महायुद्ध की हम तैयारी में हैं, संभव है वह अंतिम युद्ध हो, क्योंकि उसके बाद कोई मनुष्य जीवित न बचे। मनुष्य ही जीवित नहीं बचेगा, वरन कहा जा सकता है कि कोई प्राण जीवित नहीं बचेगा।.. हर आदमी जो मौजूद है इस जमीन पर, इस जमीन पर जो हो रहा है, उसका सहयोग उसमें है।
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अगर दुनिया में दस करोड़ लोग मारे गए हैं, स्मरण रखें, उस हत्या का जिम्मा आप पर है। कोई यह भूल से न समझे कि उस हत्या पर मेरा जिम्मा नहीं है। जो सोचता हो कि मैं चींटियों को बचा कर निकल जाता हूं, जो सोचता हो कि पानी छान कर मैं पी लेता हूं, इसलिए मुझ पर हिंसा का क्या भार है, वह नासमझ है। उसे पता नहीं, हिंसा बहुत गहरी और बहुत सामूहिक है।
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अगर मेरे मन में थोड़ा सा भी क्रोध उठता है, अगर मेरे मन में थोड़ी सी भी घृणा उठती है, अगर मेरे मन में दूसरे को नष्ट करने का थोड़ा सा भी खयाल उठता है, तो नागासाकी में जो अणु बम गिरा, उसमें मेरा हाथ है। और भविष्य में भी अगर किसी मुल्क पर, किसी का दुर्भाग्य होगा और अणु बम गिरेंगे, उसमें मेरा हाथ होगा। वह मेरे छोटे से क्रोध की चिनगारी, जब लाखों लोगों के क्रोध की चिनगारियां इकट्ठी होती हैं तो युद्ध में परिणत हो जाती हैं। बड़े युद्ध आकाश में नहीं लड़े जाते हैं, लोगों के हृदय में लड़े जाते हैं।
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अगर आपके हृदय में क्रोध उठता है, सारे युद्धों के लिए आप जिम्मेवार होंगे। अगर आपके हृदय में घृणा उठती है, सारे युद्धों का भार और उत्तरदायित्व आपको अनुभव करना होगा। और जब तक यह अनुभव न हो, जब तक मैं सारी जमीन पर जो हो रहा है उसमें अपने को सहयोगी अनुभव न करूं, तब तक मैं धार्मिक नहीं हो सकता हूं।
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यह जो स्थिति है समय की, यह जो रुख है चीजों का, यह जो प्रवाह है समय का, इसे बदलना होगा अगर मनुष्य को बचाना है। अगर मनुष्य को बचाना है, तो मनुष्य को बदलना अपरिहार्य हो गया है। और अगर हम थोड़ी देर भी चूक गए और मनुष्य को हम नहीं बदल सके तो मनुष्यता को बचाना असंभव हो जाएगा। यह पचास वर्ष भी मुश्किल है कि आदमी बच जाए।
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यह मुश्किल है कि हम सन दो हजार देख पाएं। हम बीसवीं सदी को पूरा होते देख पाएं, यह असंभव मालूम होता है। जैसा मनुष्य है, अगर वह वैसा ही रहा, तो यह मुश्किल है कि मनुष्य के बचने की कोई संभावना मानी जाए। मनुष्य का भाग्य और मनुष्य का जीवन और भविष्य समाप्त हो गया है। एक ही आशा की किरण है कि मनुष्य परिवर्तित हो सके। और वह मनुष्य के परिवर्तन की किरण महावीर से मिल सकती है।
– ओशो, महावीर या महाविनाश
प्रवचन: ०५ व्यक्ति है परमात्मा
भगवान महावीर जयंती की सभी को हार्दिक शुभकामनाएं !

= १६८ =

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*स्वांगी साधु बहु अन्तरा, जेता धरणी आकाश ।*
*साधु राता राम सौं, स्वांगी जगत की आश ॥*
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मैंने सुना है, एक गांव में एक फकीर है। उस गांव का राजा रात को निकलता है कभी, तो बार-बार उस फकीर को देखता है कि नीम के वृक्ष के नीचे वह सर्दी की रातों में ठिठुरता रहता है। फिर उसने गांव में पता लगाया। उसके वजीरों ने कहा, वह साधारण आदमी नहीं है, वह बहुत, बहुत अदभुत व्यक्ति है; कहीं पहुंच गया, कुछ पा लिया, कुछ हो गया है उसकी जिंदगी में। तो सम्राट ने एक रात उससे जाकर कहा कि आप यहां न पड़े रहें, मेरे मन में बड़ी श्रद्धा का उदय हुआ है, चलें आप राजमहल में, वहीं निवास करें।
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राजा ने सोचा--शायद न भी सोचा हो, लेकिन अचेतन में कहीं छाया रही होगी--कि संन्यासी तो फौरन कहेगा, राजमहल ? मैं नहीं जा सकता हूं। हम फकीर हैं, हम झोपड़ों में सड़क के किनारे पड़े रहते हैं। राजमहल हमारे लिए नहीं है। लेकिन सम्राट यह कह ही रहा था कि तभी वह फकीर उचका और राजा के घोड़े पर सवार हो गया। और उसने कहा, चलिए, किस तरफ चलें ?
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राजा को बड़ी मुश्किल हो गई। श्रद्धा एकदम समाप्त हो गई। उसने कहा कि मैंने कहा भी नहीं और यह आदमी राजी हो गया ! यह कैसा संन्यासी है ? लेकिन अपने ही शब्द वापस लेने में भी तो देर लग जाती है। अब एकदम से कैसे शब्द वापस ले ले ! मन तो वहीं खट्टा हो गया। क्योंकि भोगी जो हैं वे सिर्फ त्यागियों को पूज सकते हैं। भोगियों की पूजा ने ही त्यागियों को पैदा किया हुआ है।
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इसलिए जिसकी धन से जितनी ज्यादा लोलुपता होगी, वह उस आदमी के पास जाकर पैर छुएगा जिसने धन को लात मार दी होगी। वह इसलिए पैर छुएगा कि हां, यह है कुछ आदमी। यह पहुंच गया वहां जहां मुझे भी पहुंचना चाहिए। जो आदमी स्त्रियों के पीछे दीवाना होगा, वह ब्रह्मचारी के जाकर पैर पड़ेगा। वह कहेगा कि यह है आदमी। हम अपने से उलटे को पूजते हैं। 
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और अगर पूजा लेनी हो तो आम लोग जैसे हैं उससे उलटे होना जरूरी हो जाता है। अगर वे पैर से चलते हैं तो आप शीर्षासन करिए, फिर पूजा मिलनी शुरू हो जाती है। पूजा सिर्फ उलटे को मिलती है। और जो उलटा है, वह बदला हुआ नहीं है। सिर के बल खड़े हो जाइए चाहे पैर के बल, आदमी आप वही हैं। आदमी नहीं बदल जाता सिर के बल खड़े होने से।
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राजा बहुत मुश्किल में पड़ गया, लेकिन निमंत्रण दिया था तो फकीर को घर ले गया। अच्छे से अच्छा महल था, फकीर को ठहरा दिया। लेकिन श्रद्धा चली गई। क्योंकि श्रद्धा भोगी की त्यागी में हो सकती है। और धीरे-धीरे श्रद्धा मिटती गई। क्योंकि जो भी खाने को कहा, उसने खाना ले लिया; जहां भी सोने को कहा, वह सो गया--मखमली गद्दे थे तो स्वीकार कर लिए। 
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तब तो राजा ने कहा, बात सब खराब हो गई। मैं बड़ी गलती में पड़ गया। मैं किस तरह के आदमी को ले आया ! छह महीने बाद राजा ने एक दिन जाकर उस फकीर को कहा कि एक सवाल मेरे मन में उठा है, पूछ लूं ? वह सवाल यह है कि मुझमें और आपमें अब फर्क क्या है ? उस संन्यासी ने कहा, तुम छह महीने बाद पूछ रहे हो, सवाल तो उसी रात उठ गया था।
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उसने कहा, क्या मतलब ? संन्यासी ने कहा, जब मैं घोड़े पर सवार हुआ था, तभी सवाल उठ गया था। लेकिन बड़े कमजोर आदमी हो, पूछने में भी छह महीने लगा दिए ! उस राजा ने कहा, शायद आप ठीक कहते हैं, सवाल तो उसी वक्त उठ गया था।
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तो उसी वक्त पूछ लेना था, उस फकीर ने कहा। कैसे कमजोर आदमी हो ! फिर राजा ने कहा, अब आज तो बता दें, कि अब मुझमें और आपमें फर्क क्या है ? फकीर ने कहा, सच में ही फर्क जानना है, तो चलो उसी जगह चलें जहां से यह सवाल उठा था। वहीं जवाब दे दूंगा। वे गए गांव के बाहर, उस झाड़ के नीचे, फिर वे चलते ही गए। राजा ने कहा, वह झाड़ भी निकल गया, अब आप जवाब दे दें।
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उस फकीर ने कहा, थोड़े और आगे, थोड़े और आगे। फिर वे गांव की सीमा-रेखा पर पहुंच गए, जहां राजा का राज्य समाप्त हो जाता था। नदी थी, फकीर ने कहा, नदी भी पार कर लें। उस राजा ने कहा, लेकिन मतलब क्या है ? अब जवाब दीजिए, दोपहर हो गई, धूप सिर पर चढ़ गई। उस फकीर ने कहा, जवाब मेरा यही है कि अब मैं तो आगे जाता हूं, तुम भी साथ चलते हो ?
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उस राजा ने कहा, मैं कैसे जा सकता हूं ? मेरी पत्नी, मेरे बच्चे, मेरा राज्य ! उस फकीर ने कहा, तो मैं तो जाता हूं। अगर फर्क दिखाई पड़े तो देख लेना। तुम्हारे महल में मैं था, लेकिन तुम्हारा महल मेरे भीतर न था। तुम सिर्फ महल में नहीं हो, महल भी तुम्हारे भीतर है। 
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अब कहां है महल तुम्हारा ? कहां है पत्नी ? कहां हैं तुम्हारे बच्चे ? लेकिन तुम कहते हो कि मुझे लौटना पड़ेगा--मेरी पत्नी, मेरे बच्चे, मेरा महल ! मेरा कुछ भी नहीं है। मैं तुम्हारे महल में मेहमान था, मैं तुम्हारे महल का मालिक न था। महल के भीतर था मैं, लेकिन महल मेरे भीतर न था। अच्छा मैं जाऊं ?
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राजा के मन में श्रद्धा का फिर उदय हुआ। श्रद्धा के उदय होने में भी देर नहीं लगती, जाने में भी देर नहीं लगती। वह एकदम संन्यासी के पैर पकड़ लिया और उसने कहा, महाराज, कहां मुझे छोड़ कर जाते हैं ! वापस चलें।
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उसने कहा, मैं फिर घोड़े पर सवार हो सकता हूं, लेकिन श्रद्धा का अंत हो जाएगा। अब तुम मुझे जाने दो। मुझे कोई कठिनाई नहीं है, मैं लौट सकता हूं। लेकिन तुम बड़ी मुश्किल में पड़ जाओगे। छह महीने मैं तो बड़े मजे में सोया, तुम बड़ी मुसीबत में रहे। 
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फिर सवाल उठ जाएगा, अगर मैं लौटा। तो अब मत लौटाओ। मैं तो लौट सकता हूं, क्योंकि मेरे लिए यह दिशा और वह दिशा, सब बराबर है। इधर जाऊं कि इधर जाऊं, कि कहीं न जाऊं, कोई फर्क नहीं पड़ता है। लेकिन तुम मुसीबत में पड़ जाओगे।
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इस आदमी को मैं संन्यासी कहता हूं। जो संसार से भयभीत है वह संन्यासी नहीं है। लेकिन जो संसार में ऐसे रहने लगा, जैसे मेहमान है, अतिथि है; जो संसार में ऐसे रहने लगा कि संसार चारों तरफ है, लेकिन उसके भीतर नहीं है; वह आदमी संन्यस्त है।
~आचार्य रजनीश "ओशो"
"समाधि के द्वार पर-प्रवचन-१"