"श्री दादू अनुभव वाणी(३)" लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
"श्री दादू अनुभव वाणी(३)" लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

सोमवार, 18 दिसंबर 2017

= साधु का अँग =(१५/१२३-४)


#daduji 
卐 सत्यराम सा 卐 
*श्री दादू अनुभव वाणी* 
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥ 
*साधु का अँग १५* 
जहं तिरिये तहं डूबिये, मन में मैला होइ ।
जहं छूटे तहं बँधिये, कपट न सीझे कोइ ॥१२३॥
जिस मनुष्य शरीर में आकर भवसागर को पार किया जाता है, उस मनुष्य शरीर को पाकर भी यदि मन में अविद्या - मल रहेगा तो डूबेगा ही । जिन सन्तों के सत्संग में मुक्ति प्राप्त होती है, उसमें जाकर भी यदि मन में विषय - चिन्तन ही रहा तो उल्टा बन्धन में ही पड़ेगा । क्योंकि, कपट से कोई भी ब्रह्म प्राप्ति रूप सिद्धावस्था को प्राप्त नहीं होता ।
.
*सत्संग महिमा*
दादू जब लग जीविये, सुमिरण संगति साध ।
दादू साधू राम बिन, दूजा सब अपराध ॥१२४॥
इति साध का अँग समाप्त: ॥१५॥सा - १२४॥
सन्त - महिमा पूर्वक सत्संग करने की प्रेरणा कर रहे हैं - सँसार में जब तक जीवित रहें तब तक राम - नाम का स्मरण और सन्तों की संगति करते ही रहना चाहिए । क्योंकि राम - भजन और सन्त - संगति से अन्य जो भी कार्य हैं, वे पाप मिश्रित होने से पाप रूप हैं ।
इति श्री दादू गिरार्थ प्रकाशिका साधु का अँग समाप्त ॥१५॥
(क्रमशः)

रविवार, 17 दिसंबर 2017

= साधु का अँग =(१५/१२१-२)

#daduji

卐 सत्यराम सा 卐

*श्री दादू अनुभव वाणी* 
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
.
*साधु का अँग १५*
.
झूठा साचा कर लिया, काचा कंचन सार ।
मैला निर्मल कर लिया, दादू ज्ञान विचार ॥१२१॥
जिसने मिथ्यावादियों को सत्यवादी बना लिया, साधन में कच्चों को सुवर्ण - सार के समान पक्का और सुन्दर बना लिया, अविद्या - मल को ज्ञान द्वारा नष्ट करके निर्मल ब्रह्म रूप बना लिया, उसी सन्त का ज्ञान विचारने योग्य है और वही श्रेष्ठ सन्त है ।
*अमिट पाप*
काया कर्म लगाइ कर, तीरथ धोवे आइ ।
तीरथ माँहीं कीजिये, सो कैसे कर जाइ ॥१२२॥
१२२ - १२३ में कहते हैं - पवित्र होने के स्थान पर पाप करने से वह पाप अमिट हो जाता है - सँसारी प्राणी कुकर्मों द्वारा अन्त:करण के पाप लगाते हैं और तीर्थों में आकर उसे धोते हैं किन्तु तीर्थों में जो पाप किया जाता है, वह किस प्रकार जायगा ? वह तो अमिट हो जाता है ।
(क्रमशः)

शुक्रवार, 8 दिसंबर 2017

= साधु का अँग =(१५/११८-२०)

#daduji
卐 सत्यराम सा 卐
*श्री दादू अनुभव वाणी* 
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
.
*साधु का अँग १५*
.
विष का अमृत कर लिया, पावक का पाणी ।
बांका सूधा कर लिया, सो साधु बिनाणी१॥११८॥
जो पहले अन्त:करण की वृत्ति विषयाकार होने से विष रूप थी, उसे ब्रह्माकार करके जिसने अमृत कर लिया, क्रोधाग्नि को क्षमा रूप जल बना लिया, भगवत् से विमुख चलने वाले मन को विचार द्वारा सरल करके भगवान् के सम्मुख कर लिया, वही विज्ञानी१ सन्त है ।
दादू ऊरा१ पूरा कर लिया, खारा मीठा होइ ।
फूटा सारा कर लिया, साधु विवेकी सोइ ॥११९॥
दैवी गुणों की सँख्या जो कम१ थीं उसे दैवी गुणों की वृद्धि से परिपूर्ण किया, विषय - वासना रूप खारेपन को हटा कर मधुर भक्ति - रस से अन्त:करण को मधुर बनाया, आशा रूप छिद्र के वैराग्य रूप लाख लगा कर अन्त:करण - घट को ब्रह्मज्ञान - रस रहने योग्य बनाया, वही विवेकी सन्त है ।
बँध्या मुक्ता कर लिया, उरझ्या सुरझ समान ।
बैरी मिंता कर लिया, दादू उत्तम ज्ञान ॥१२०॥
काम - क्रोधादि शत्रुओं को आत्म - सँयम द्वारा शान्त मित्र बना दिया वो आसुर गुण - शत्रुओं को दैवी गुणों में बदल दिया, मोह - ममता से आबद्ध मन को वैराग्य द्वारा खोल दिया और अज्ञान साँसारिक जाल में उलझे जीव को ज्ञान द्वारा सुलझा कर ब्रह्म समान बना दिया, वही उत्तम ज्ञान युक्त सन्त है ।
(क्रमशः)

गुरुवार, 7 दिसंबर 2017

= साधु का अँग =(१५/११५-७)


#daduji
卐 सत्यराम सा 卐 
*श्री दादू अनुभव वाणी* 
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥ 
*साधु का अँग १५*
*साधु सज्जन*
दादू सहजैं मेला होइगा, हम तुम हरि के दास ।
अंतरगति तो मिल रहे, पुन: प्रकट परकास ॥११५॥
सभी सन्त एकात्मभाव से मिले ही रहते हैं, यह कहते हैं - हम और तुम हरि के भक्त हैं, अत: अन्त में तो हरि के स्वरूप में अपना एकता रूप मिलन सहज ही होने वाला है और अब भी बुद्धि की विचार रूप गति एक होने से वो साक्षी रूप से भीतर से तो मिल ही रहे हैं, फिर कभी प्रकट रूप से शरीरों द्वारा मिल कर भी अपने हृदय के भावों को प्रकाशित करेंगे ।
प्रसंग कथा - सन्त प्रवर दादूजी महाराज आंधी ग्राम में आये हुये हैं, यह जान कर दौसाकी टहलड़ी पहाड़ी पर साधना कर रहे उनके शिष्य जगजीवन जी ने गुरुजी के दर्शन की इच्छा की, तब उनके सँतोषार्थ दादूजी ने यह साखी लिख भेजी थी ।
*साधु महिमा*
दादू मम शिर मोटे भाग, साधों का दर्शन किया ।
कहा करे जम काल, राम रसायन भर पिया ॥११६॥
सन्त - महिमा कह रहे हैं - आज बड़े भाग्य से ही हमने सन्तों का दर्शन किया है । जिनने सँतों के सत्संग में राम - भक्ति - रसायन रुचि भर पान किया है, उनका नरक के अधिदेव यम और काल क्या कर सकते हैं ? यही साखी नारायणा ग्राम में प्राचीन सँतों के दर्शन करके कही थी । प्रसंग कथा दृ - सु - सि - त - ११ - २६३ में देखो ।
*साधु सामर्थ्य*
दादू एता अविगत आप तैं, साधों का अधिकार । 
चौरासी लख जीव का, तन मन फेरि संवार ॥११७॥
११७ - १२१ में सन्तों की सामर्थ्य बता रहे हैं - मन - वाणी के अविषय परमात्मा ने अपने आप प्रसन्नता से ही सँसार के सँतों को इतना अधिकार दे रक्खा है कि वे चौरासी लाख योनियों के जीवों के बिगड़े हुये तन - मन को पुन: सुधार देते हैं । 
(क्रमशः)

बुधवार, 6 दिसंबर 2017

= साधु का अँग =(१५/११२-४)

#daduji

卐 सत्यराम सा 卐 
*श्री दादू अनुभव वाणी* 
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥ 
*साधु का अँग १५* 
दादू राम मिलन के कारणैं, जे तूँ खरा उदास ।
साधू संगति शोध ले, राम उन्हों के पास ॥११२॥
हे साधक ! यदि तू राम के साक्षात्कारार्थ सच्चा आतुर है तो सन्तों की संगति द्वारा राम की खोज कर । कारण, राम विशेष रूप से सन्तों के पास ही रहते हैं ।
*पुरुष प्रकाशी(सँत महिमा)*
ब्रह्मा, शँकर, शेष, मुनि, नारद, ध्रुव, शुकदेव ।
सकल साधु दादू सही, जे लागें हरि सेव ॥११३॥
११३ - ११४ में ज्ञान - प्रकाश युक्त सँतों की महिमा कह रहे हैं - ब्रह्मा, शँकर, शेष, वशिष्ठादि मुनि, नारदादि देवर्षि, ध्रुवादि राजर्षि, शुकदेवादि विरक्त, जो भी भगवद् भक्ति में लगे हुये ज्ञानी सन्त हैं, वे सब ही सच्चे सँत हैं और उनकी महिमा सँसार में प्रकट है ।
साधु कमल हरि बासना, सत भ्रमर संग आइ ।
दादू परिमल ले चले, मिले राम को जाइ ॥११४॥
सँसार - सरोवर में ज्ञानी सन्त कमल रूप हैं । ब्रह्म का अपरोक्ष ज्ञान ही उनमें सुगँध है । साधक सन्त - भ्रमर उनके सत्संग में आकर, ब्रह्म का मूलतत्व - ज्ञान रूप परागण लेकर, देहाध्यासादि रहित आगे चल पड़ते हैं और निर्विकल्प अवस्था में जाकर अभेद रूप से राम में मिल जाते हैं । 
(क्रमशः)

मंगलवार, 5 दिसंबर 2017

= साधु का अँग =(१५/१०९-११)

#daduji
卐 सत्यराम सा 卐 
*श्री दादू अनुभव वाणी* 
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥ 
*साधु का अँग १५* 
कुसंगति केते गये, तिनका नाँव न ठाँव ।
दादू ते क्यों उद्धरैं, साधु नहीं जिस गाँव ॥१०९॥
कुसंगति के द्वारा कितने ही प्राणी नष्ट हो गये हैं, उनका सँसार में न नाम रहा है और न स्थान ही रहा है । जिस ग्राम में सँत नहीं रहते, उस ग्राम के लोगों का उद्धार कैसे हो सकता है ?
.
भाव भक्ति का भँग कर, बटपारे१ मारहिं बाट२ । 
दादू द्वारा मुक्ति का, खोले जड़ैं कपाट ॥११०॥
जो लोग भाव - भक्ति के द्वारा मुक्ति - धाम - द्वार के कपाट खोलते हैं और उसमें प्रवेश करने के लिए आगे बढ़ते हैं, तब दूर्जन और दूर्गण रूप लुटेरे१ मार्ग२ में ही विषयों में प्रवृत्त करना रूप मारपीट द्वारा उनके भाव - भक्ति को छीन कर, मुक्ति - धाम - द्वार के कपाट बन्द कर देते हैं ।
.
*सत्संग महिमा*
साधु संगति अंतर पड़े, तो भागेगा किस ठौर । 
प्रेम भक्ति भावे नहीं, यहु मन का मत और ॥१११॥
१११ - ११२ में किसी साधक को सत्संग का माहात्म्य कह रहे हैं - हे साधक ! यदि सँत - संगति से तू उपराम(अन्तराम) करने लगेगा, तो इस साँसारिक कष्ट निवारण के लिए सँत - संगति से भाग कर किस स्थान में जायगा ? सत्संगति के अतिरिक्त कोई उपाय नहीं है । यदि तुझे भगवान् की प्रेमाभक्ति अच्छी नहीं लगती तो तेरे मन का यह सिद्धान्त परमार्थ - पथ से भिन्न ही है । 
(क्रमशः)

सोमवार, 4 दिसंबर 2017

= साधु का अँग =(१५/१०६-८)

#daduji

卐 सत्यराम सा 卐

*श्री दादू अनुभव वाणी* 
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
.
*साधु का अँग १५*
.
दादू राम न छाड़िये, गहिला तज सँसार ।
साधू संगति शोध ले, कुसंगति संग निवार ॥१०६॥
हे बावरे प्राणी ! साँसारिक प्रीति को त्याग दे किन्तु राम - नाम चिन्तन को कभी मत त्याग । कुसंगति और साधारण मनुष्यों के संग को त्याग कर सँतों की संगति द्वारा अपने स्वरूप की खोज कर ।
दादू कुसंगति सब परिहरै, मात पिता कुल कोइ ।
सजन स्नेही बान्धवा, भावै आपा होइ ॥१०७॥
माता, पिता, बान्धव, कुल, जाति, प्रेम, मित्रादिक का संग यदि बुरा हो तो त्याग देना चाहिए और चाहे अपने ही क्रोधादिक अवगुण हों, उन सबको को भी त्याग देना चाहिए ।
अज्ञान मूर्ख हितकारी, सज्जन: समो रिपु: ।
ज्ञात्वा त्यजँति ते, निरामयी मनोजित: ॥१०८॥
आत्म - ज्ञान तथा व्यावहारिक ज्ञान से शून्य मूर्ख यदि शुभ - चिन्तक मित्र भी हो तो भी उसको शत्रु के समान जान कर त्यागते हैं, वे ही मन को जीत कर जन्म - मरण - रोग से मुक्त होते हैं ।
(क्रमशः)

रविवार, 3 दिसंबर 2017

= साधु का अँग =(१५/१०३-५)

#daduji
卐 सत्यराम सा 卐
*श्री दादू अनुभव वाणी* 
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
.
*साधु का अँग १५*
.
सब ही मृतक देखिये, किहिं विधि जीवैं जीव ।
साधु सुधारस आन कर, दादू बर्षे पीव ॥१०३॥
सभी सँसारी प्राणी आत्मज्ञान न होने से मृतकवत् ही देखे जाते हैं । ये जीव किस प्रकार जीवित हो सकते हैं ? हां, यदि परमात्मा, परमार्थी सन्त - बादल को यहां ही लाकर ब्रह्म - ज्ञान - सुधा - रस की वृष्टि करावे, तो जीवित हो सकते हैं ।
हरिजल बर्षे बाहिरा१, सूखे काया खेत ।
दादू हरिया होइगा, सींचनहार सुचेत ॥१०४॥
सँत - बादल से हरि - भक्तिप्रद उपदेश रूप जल की वर्षा हो किन्तु श्रोता यदि बहिर्मुखी हो तो उसकी काया - भूमि का अन्त:करण खेत सूखेगा व उपदेश धारण न करने से काम - क्रोधादि के झँझावात१ द्वारा विनष्ट होगा । यदि अन्त:करण खेत को सींचने वाला जिज्ञासु भली प्रकार सावधान होगा तो श्रुति द्वारा उपदेश - जल को अन्त:करण खेत में ले जायेगा और उससे भक्ति ज्ञानादि की उत्पत्ति द्वारा अन्त:करण - खेत ब्रह्मानन्द रूप हरियाली को प्राप्त होगा ।
*कुसंगति*
गँगा यमुना सरस्वती, मिलैं जब सागर माँहिं ।
खारा पानी ह्वै गया, दादू मीठा नाँहिं ॥१०५॥
१०५ - ११० में कुसंगति के त्याग की प्रेरणा कर रहे हैं - गँगा, यमुना, सरस्वती आदि नदियाँ जब क्षार - समुद्र में मिलती हैं, तब उनका मधुर जल, मधुर न रहकर खारा हो जाता है । वैसे ही कुसंग से अच्छा अन्त:करण भी बुरा बन जाता है । अत: कुसंगति को त्यागो । 
(क्रमशः)

शनिवार, 2 दिसंबर 2017

= साधु का अँग =(१५/१००-२)

#daduji
卐 सत्यराम सा 卐
*श्री दादू अनुभव वाणी* 
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
.
*साधु का अँग १५*
.
*साधु परमार्थी*
सब ही मृतक समान हैं, जीया तब ही जाणि । 
दादू छाँटा अमी का, को साधू बाहै आणि ॥१००॥
१०० - १०४ में साधु परमार्थी होते हैं यह कहते हैं - हरि - विमुख सभी प्राणी बारँबार मरने के कारण मृतक समान ही हैं । यदि कोई ज्ञानी सन्त भाग्यवश आकर ज्ञानामृत की उपदेश रूप विंदू जिस पर डालता है और वह उसे धारण करके ब्रह्म को अभेद रूप से प्राप्त कर लेता है, तब ही उसे जीवित जानो ।
सब ही मृतक ह्वै रहे, जीवैं कौन उपाइ ।
दादू अमृत रामरस, को साधू सींचे आइ ॥१०१॥
सभी सँसारी प्राणी मृतक तुल्य हो रहे हैं, वे किस उपाय से जीवित हो सकते हैं ? हां, एक उपाय है, यदि कोई परमार्थी सन्त आकर उन पर राम - रस रूप अमृत का छिड़काव करे तो वे जीवित हो सकते हैं ।
सब ही मृतक देखिये, क्यों कर जीवैं सोइ ।
दादू साधू प्रेमरस, आणि पिलावे कोइ ॥१०२॥
सभी सँसारी प्राणी हरि - भक्ति से हीन होने से भीतर से मृतक तुल्य ही हैं । वे किस प्रकार जीवित हो सकते हैं ? हां, यदि कोई परमार्थी सन्त आकर भगवत् प्रेमा - भक्तिरस पान करावे तो जीवित हो सकते हैं ।
(क्रमशः)

गुरुवार, 30 नवंबर 2017

= साधु का अँग =(१५/९७-९९)

#daduji
卐 सत्यराम सा 卐 
*श्री दादू अनुभव वाणी* 
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥ 
*साधु का अँग १५* 
साधु शब्द सुख बरषि हैं, शीतल होइ शरीर ।
दादू अंतर आतमा, पीवे हरि जल नीर ॥९७॥
सँत अपने शब्दों द्वारा आनन्द की वर्षा करते हैं जिससे ईर्ष्यादि रूप जलन मिट कर अन्त:करण समता रूप शीतलता को प्राप्त होता है और जैसे तालाब का जल नदी के जल को पान करता है, वैसे ही अन्तर - साक्षी आत्मा रूप नीर ब्रह्म - साक्षात्कार रूप जल को पान करता है=ब्रह्म से अभेद हो जाता है ।
.
दादू दत१ दरबार का, को साधू बांटे आइ ।
तहां रामरस पाइये, जहं साधू तहं जाइ ॥९८॥
कोई विरले उत्तम सँत ही आकर सत्संग - सभा में भगवद् प्राप्ति का हेतु उपदेश रूप दान१ वितरण करते हैं । अत: जहां सन्त हो, वहां ही साधक जाय, क्योंकि वहां ही राम - भक्ति - रस का उपदेश प्राप्त होता है ।
.
*चौप चर्चा*
दादू श्रोता स्नेही राम का, सो मुझ मिलवहु आणि१ ।
तिस आगे हरिगुण कथूँ, सुनत न करई काणि२॥९९॥
भगवत् - कथा कहने की उत्कंठा दिखा रहे हैं - हे परमेश्वर ! हमें वह श्रोता आकर१ मिले जो आपका स्नेही हो और सत्संग में आकर श्रवण करते समय लोक - लज्जादि२ न करके प्रेम पूर्वक मनन द्वारा धारण करे । हम उसके आगे हरिगुण कथन करेंगे । 
(क्रमशः)

बुधवार, 29 नवंबर 2017

= साधु का अँग =(१५/९४-६)

#daduji
卐 सत्यराम सा 卐 
*श्री दादू अनुभव वाणी* 
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥ 
*साधु का अँग १५* 
दादू सब जग फटिक पषाण है, साधू सैन्धव होइ ।
सैन्धव एकै ह्वै रह्या, पानी पत्थर दोइ ॥९४॥
सँपूर्ण जगत के दँभी - जन श्वेत पत्थर के समान हैं और सँत सैन्धव के समान हैं । सँत - सैन्धव ब्रह्म - जल में मिल कर अद्वैत भाव से रहता है और दँभी - पत्थर ब्रह्म - जल से भिन्न द्वैत भाव से रहता है ।
*साधु परमार्थी*
को साधु जन उस देश का, आया इहिं सँसार । 
दादू उसको पूछिये, प्रीतम के समचार ॥९५॥
९५ - ९८ में सँत परमार्थी होते हैं, यह कह रहे हैं - जिसमें परब्रह्म का साक्षात्कार होता है, उस निर्विकल्प समाधि देश का यदि कोई सँत लोक - कल्याणार्थ इस सँसार दशा में उतर कर उपदेश करता हो तो उसको अपने प्रियतम परब्रह्म की प्राप्ति के साधन रूप समाचार पूछना चाहिए, क्योंकि उसे पूरा अनुभव है । साँसारिक विषय नहीं ।
समाचार सत पीव के, को साधू कहेगा आइ ।
दादू शीतल आतमा, सुख में रहे समाइ ॥९६॥
परब्रह्म - प्राप्ति के सच्चे साधन रूप समाचारों का उपदेश, परब्रह्म को प्राप्त कोई विरला ही सन्त आकर करेगा । उसके उपदेश द्वारा विषमता रूप जलन मिट कर बुद्धि को समता रूप शीतलता प्राप्त होगी और वह मनन - निदिध्यासन द्वारा ब्रह्मानन्द में लीन रहेगी ।
(क्रमशः)

मंगलवार, 28 नवंबर 2017

= साधु का अँग =(१५/९१-९३)


#daduji 
卐 सत्यराम सा 卐 
*श्री दादू अनुभव वाणी* 
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥ 
*साधु का अँग १५* 
दादू अवगुण छाड़ै गुण गहै, सोई शिरोमणि साध । 
गुण अवगुण तैं रहित है, सो निज ब्रह्म अगाध ॥९१॥
जो अपने हृदय के काम - क्रोधादिक अवगुणों को त्यागे और दूसरों के अवगुण देखना त्यागे तथा क्षमादि दैवी गुणों को धारण करे और दूसरों के गुण ही देखे, वही शिरोमणि सँत माना जाता है और जो गुण - अवगुण से रहित है, वह तो सबका निज - स्वरूप अगाध ब्रह्म रूप ही होता है ।
*जग जन विपरीत*
दादू सैन्धव फटिक पषाण१ का, ऊपरि एकै रँग ।
पानी माँहीं देखिये, न्यारा न्यारा अँग ॥९२॥
९२ - ९४ में जगत् के पाखँडी जन और सन्त जन की विपरीतता बता रहे हैं - सैंधव नमक का और श्वेत बिल्लौर पत्थर१ का ऊपर से तो एक - सा ही रँग दिखाई देता है, किन्तु जल में डालकर देखोतो उनका स्वरूप भिन्न - भिन्न प्रतीत होता है । सैंधव पानी में घुल जायगा, किन्तु पत्थर नहीं । वैसे ही सन्त और पाखँडी जनों का ऊपर से भेष तो एक सा ही भासता है किन्तु साधना की परिपाकावस्था में अपने आप ही भेद खु जाता है, वही आगे दिखा रहे हैं ।
दादू सैंधव के आपा नहीं, नीर खीर परसँग ।
आपा फटिक पषाण के, मिले न जल के संग ॥९३॥
सैंधव में कठौरता न होने से वह जल में दुग्ध के समान मिल जाता है । श्वेत पत्थर में कठौरता होने से वह जल में नहीं मिलता । वैसे ही सच्चे सँत में जीवत्व अहँकार न होने से वह ब्रह्म में लय हो जाता है । दँभी में जीवत्व अहँकार होने से वह ब्रह्म में लय नहीं हो पाता । 
(क्रमशः)

सोमवार, 27 नवंबर 2017

= साधु का अँग =(१५/८८-९०)


#daduji 
卐 सत्यराम सा 卐 
*श्री दादू अनुभव वाणी* 
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥ 
*साधु का अँग १५* 
.
साहिब का उनहार सब, सेवक माँहीं होइ । 
दादू सेवक साधु सो, दूजा नाहीं कोइ ॥८८॥ 
परमात्मा के समान ही भक्त में दिव्य गुण होते हैं । अत: वह परमात्मा ही श्रेष्ठ भक्त के रूप में अवतरित होता है । इस कारण कोई भी श्रेष्ठ भक्त परमात्मा से भिन्न नहीं होता ।
.
जब लग नैन न देखिये, साधु कहैं ते अँग । 
तब लग क्यों कर मानिये, साहिब का प्रसंग ॥८९॥ 
सँतजन ब्रह्म साक्षात्कार होने पर जो निर्द्वन्द्वता, समतादि लक्षण आते बताते हैं, जब तक वे लक्षण विचार - नेत्रों से जिस व्यक्ति में नहीं दिखाई देते, तब तक उस व्यक्ति की यह बात कि - "मुझे ब्रह्म का साक्षात्कार हो गया है" कैसे मानी जा सकती है ? 
.
दादू सो जन साधू सिद्ध सो, सोइ सकल शिरमौर ।
जिहिं के हिरदै हरि बसे, दूजा नाहीं और ॥९०॥
जिसके हृदय में हरि का विशेष रूप से निवास है, वही सँत है, वही सिद्ध है और वही सर्व - श्रेष्ठ है । दूसरा और कोई भी सँत, सिद्ध और सर्वश्रेष्ठ नहीं हो सकता । 
(क्रमशः)

रविवार, 26 नवंबर 2017

= साधु का अँग =(१५/८५-७)


#daduji
卐 सत्यराम सा 卐 
*श्री दादू अनुभव वाणी* 
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥ 
*साधु का अँग १५* 
निराकार सौं मिल रहे, अखँड भक्ति कर लेह । 
दादू क्यों कर पाइये, उन चरणों की खेह ॥८५॥ 
जो अँखड भक्ति द्वारा निराकार ब्रह्म से मिलकर अपने को अखँड बना लेते हैं, वे ही सँत हैं । उन सँतों के चरणों की रज सहज में कैसे प्राप्त हो सकती है ? 
.
साधु सदा सँयम रहे, मैला कदे न होइ । 
दादू पँक परसै नहीं, कर्म न लागे कोइ ॥८६॥ 
सँत सदा सँयम से रहता है, उसका अन्त:करण कभी भी मैला नहीं होता । कारण, वह किसी भी निषिद्ध कर्म में नहीं लगता, इसीलिए उसे पाप रूप कीचड़ स्पर्श नहीं करता । 
.
साधु सदा सँयम रहे, मैला कदे न होइ ।
शून्य सरोवर हँसला, दादू विरला कोइ ॥८७॥ 
सन्त सदा सँयम से रहता है, उसका अन्त:करण अविद्या - मल से मैला कभी नहीं होता; किन्तु ब्रह्म - सरोवर पर रहने वाला ऐसा जीवन्मुक्त सँत - हँस कोई विरला ही मिलता है । 
(क्रमशः)

शनिवार, 25 नवंबर 2017

= साधु का अँग =(१५/८२-४)

#daduji

卐 सत्यराम सा 卐

*श्री दादू अनुभव वाणी* 
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
.
*साधु का अँग १५*
.
जिहिं घट प्रकट राम है, सो घट तज्या न जाइ । 
नैनहुं माँहीं राखिये, दादू आप नशाइ ॥८२॥ 
जिस शरीर के अन्त:करण में राम का ज्ञान - प्रकाश प्रकट रूप से है, ऐसे सँत के शरीर की सेवा हम से त्यागी नहीं जाती । ऐसे ज्ञानी सन्त को नेत्रों के आगे रखते हुये अपना साँसारिक अहँकार हटाकर सदा उसका सत्संग करना चाहिए ।
.
*पुरुष प्रकाशी*
दादू जिहिं घट दीपक राम का, तिहिं घट तिमिर न होइ ।
उस उजियारे ज्योति के, सब जग देखे सोइ ॥८३॥
ज्ञान प्रकाश सम्पन्न पुरुष का परिचय दे रहे हैं - जिस पुरुष के अन्त:करण में ब्रह्म का यथार्थ ज्ञान - दीपक है, उसके हृदय में अज्ञानाँधकार नहीं रहता । उस ज्ञान - ज्योति के प्रकाश से वह सम्पूर्ण जगत् को ब्रह्म रूप देखता है ।
*साधु अबिहड़* 
कबहुं न बिहड़े सो भला, साधू दिढ़ मति होइ । 
दादू हीरा एक रस, बांध गाँठड़ी सोइ ॥८४॥ 
साधक वो सँत की श्रेष्ठता बता रहे हैं - जो ज्ञानी सँत में दृढ़ बुद्धि से श्रद्धा करके सत्संग करे और उनका जो एकरस ज्ञानरूप हीरा है, उसे अन्त:करण रूप गठरी में बांध कर कभी भी न त्यागे, वही साधक श्रेष्ठ है वो जो सन्त दृढ़ मति होकर, एकरस ब्रह्म रूप हीरा को ब्रह्माकार, वृत्ति रूप गठरी में बांध कर कभी भी न त्यागे, वही ज्ञानी सँत श्रेष्ठ है ।
(क्रमशः)

गुरुवार, 23 नवंबर 2017

= साधु का अँग =(१५/७९-८१)

#daduji
卐 सत्यराम सा 卐
*श्री दादू अनुभव वाणी* 
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
.
*साधु का अँग १५*
घर वन माँहीं राखिये, दीपक जलता होइ । 
दादू प्राण पतँग सब, जाइ मिलैं सब कोइ ॥७९॥ 
ज्ञान - दीपक प्रज्वलित हो जाने पर शरीर को चाहे घर में रक्खो या वन में, जिज्ञासु प्राणी रूपी पतँग तो सब वहां ही पहुंच जायेंगे ।
घर वन माँहीं राखिये, दीपक प्रकट प्रकास । 
दादू प्राण पतँग सब, आइ मिलैं उस पास ॥८०॥ 
हृदय में ज्ञान - दीपक का प्रकाश प्रकट हो जाने पर शरीर को घर में रक्खो वो वन में, जिज्ञासु प्राणी रूपी पतँग तो सब अपने आप उस ज्ञानी के पास आकर ब्रह्म - प्रकाश में लय हो जाते हैं । 
घर वन माँहीं राखिये, दीपक ज्योति सहेत । 
दादू प्राण पतँग सब, आइ मिलैं उस हेत ॥८१॥ 
ज्ञान - दीपक की ज्योति सहित शरीर को घर में रखोवो वन में, जिज्ञासु प्राणी - पतँग तो सब उस ज्योति के लिए वहां ही आकर ब्रह्म प्रकाश में मिल जायेंगे ।
(क्रमशः)

बुधवार, 22 नवंबर 2017

= साधु का अँग =(१५/७६-७८)

#daduji

卐 सत्यराम सा 卐

*श्री दादू अनुभव वाणी* 
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
.
*साधु का अँग १५*
*भ्रम विध्वँसन* 
दादू लीला राजा राम की, खेलैं सब ही सन्त । 
आपा पर एकै भया, छूटी सबै भरँत१ ॥७७॥ 
टीलाजी का भ्रम दूर कर रहे हैं - जिनकी साँसारिक भ्राँति१ नष्ट होकर अपना पराया एक हो गया, उन अद्वैत स्थिति को प्राप्त हुये सँतों में राजा राम की शक्ति आ जाती है । उस शक्ति के द्वारा सभी सँत ऐसी लीला करते रहते हैं ।
.
*जग जन विपरीत* 
दादू आनंद सदा अडोल सौं, राम स्नेही साध । 
प्रेमी प्रीतम को मिले, यहु सुख अगम अगाध ॥७८॥
जगत् से विपरीत परमात्मा की ओर जाने वाले सन्तों के सुख का परिचय दे रहे हैं - राम के प्यारे सन्त सदा निश्चल परमात्मा के चिन्तन में लगे रहने से आनन्द में रहते हैं । सँसारी प्राणी विषयों में लगे रहने से दुखी रहते हैं । परमात्मा के प्रेमी सन्त अपने प्रियतम परमात्मा को प्राप्त होते हैं । यह ब्रह्म - प्राप्ति रूप आनन्द अगम अगाध है ।
.
*पुरुष प्रकाशी* 
घर वन माँहीं राखिये, दीपक ज्योति जगाइ । 
दादू प्राण पतँग सब, जहं दीपक तहं जाइ ॥८०॥ 
८० - ८४ में ज्ञान दीपक से प्रकाशित हृदय सन्त का परिचय दे रहे हैं - दीपक की ज्योति जगाकर चाहे घर में रक्खो वो वन में, पतँग तो वहां ही चले जायेंगे । वैसे ही ज्ञान - दीपक के प्रकाश से युक्त पुरुष घर में रहो या वन में, जिज्ञासु प्राणी तो सब वहां ही पहुंच जायेंगे । 
(क्रमशः)

सोमवार, 20 नवंबर 2017

= साधु का अँग =(१५/७३-५)


#daduji 
卐 सत्यराम सा 卐 
*श्री दादू अनुभव वाणी* 
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥ 
*साधु का अँग १५* 
*रस* 
दादू मीठा पीवे राम रस, सो भी मीठा होइ । 
सहजैं कड़वा मिट गया, दादू निर्विष सोइ ॥७४॥ 
भक्ति - रस का फल बता रहे हैं - जो साधक मधुर सन्तों के सत्संग में जाकर मधुर राम - रस का पान करता है, वह भी मधुर सन्त हो जाता है । जिनने पूर्व में पान किया है, उनका क्रोधादिक कटुपना सहज ही नष्ट हो गया और वे विषय - वासना - विष से रहित हुये हैं ।
.
*साधु परीक्षा लक्षण*
दादू अंतर एक अनँत सौं, सदा निरँतर प्रीति ।
जिहिं प्राणी प्रीतम बसे, सो बैठा त्रिभुवन जीति ॥७४॥
सन्त परीक्षा का लक्षण बता रहे हैं - जो सदा प्रतिक्षण प्रीति पूर्वक अन्तर वृत्ति द्वारा एक अनन्त परमात्मा के चिन्तन में तत्पर रहता है, इस प्रकार साधन करने पर जिसके हृदय में प्रियतम परमात्मा विशेष रूप से निवास करते हैं, वह त्रिभुवन को विजय करके परब्रह्म के स्वरूप में स्थिर हुआ है ।
.
*साधु महिमा*
दादू मैं दासी तिहिं दास की, जिहिं संग खेले पीव ।
बहुत भांति कर वारणे, तापर दीजे जीव ॥७५॥
प्रभु प्राप्त सन्त पर अपनी श्रद्धा प्रकट कर रहे हैं - जो महानुभाव सन्त अपने स्वामी परमात्मा को प्राप्त करके उसके संग आनन्द लेते हैं, हम उनकी सेविका के समान हैं । हे साधको ! उक्त प्रकार के सन्तों पर अपने प्राण बहुत - भाँति से निछावर कर देना चाहिए । 
(क्रमशः)

रविवार, 19 नवंबर 2017

= साधु का अँग =(१५/७०-७२)

#daduji

卐 सत्यराम सा 卐
*श्री दादू अनुभव वाणी* 
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
.
*साधु का अँग १५*
.
*जग जन विपरीत*
दादू सब जग दीसे एकला, सेवक स्वामी दोइ । 
जगत दूहागी राम बिन, साधु सुहागी सोइ ॥७०॥ 
७१ - ७३ में सँसारी जन और भक्त जन की विपरीतता दिखा रहे हैं - सब जगत् के प्राणी भगवान् की भक्ति न करने के कारण भगवत् साक्षात्कार बिना अकेले ही दिखाई देते हैं । सेवा करने के कारण सेवक और स्वामी दोनों साथ रहते हैं । राम - भजन बिना जगत् के प्राणी दुर्भाग्य - युक्त हैं और जन्म - मरण के प्रवाह में बहे जाते हैं । जो भक्ति करने वाला सन्त है, वह भगवान् की समीपता के कारण सौभाग्य - सँपन्न है ।
.
दादू साधू जन सुखिया भये, दुनिया को बहु द्वन्द्व ।
दूनी दुखी हम देखताँ, साधुन सदा अनन्द ॥७१॥
सन्त - जन निर्द्वन्द्व होने से सुखी हुये हैं, साँसारिक प्राणियों के काम - क्रोधादिक बहुत द्वन्द्व लगे हुये हैं । अत: हम देखते हैं कि सँसारी प्राणी दु:खी हैं और निर्द्वन्द्व होने से सन्तों को आनन्द रहता है ।
दादू देखत हम सुखी, सांई के संग लाग ।
यों सो सुखिया होयगा, जाके पूरे भाग ॥७२॥
देखो, सबके देखते हुये हम भक्ति - ज्ञानादि द्वारा परमात्मा के संग लगकर आनँद में हैं तथा जिसका भाग्य महान् होगा, वह भी भक्ति ज्ञानादि द्वारा परमात्मा के संग लग कर हमारे समान आनन्द प्राप्त करेगा ।
(क्रमशः)

शनिवार, 18 नवंबर 2017

= साधु का अँग =(१५/६७-९)


#daduji
卐 सत्यराम सा 卐
*श्री दादू अनुभव वाणी* 
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
.
*साधु का अँग १५*
*संगति कुसंगति* 
दादू असाधु मिले अंतर पड़े, भाव भक्ति रस जाइ । 
साधु मिले सुख ऊपजे, आनंद अँग न माइ ॥६७॥ 
६७ - ६९ में सुसंगति कुसंगति का फल बता रहे हैं - असँत के मिलने से भगवान् साधन में व्यवधान पड़ता है, भगवद् - विश्वास तथा भक्ति - रस चला जाता है । सँत के मिलने से हृदय में ब्रह्म सुख उत्पन्न होता है और परमानन्द शरीर में समाता भी नहीं, सँतों की स्तुति आदि के रूप में बाहर उमड़ पड़ता है ।
.
दादू साधू संगति पाइये, राम अमी फल होइ ।
सँसारी संगति पाइये, विष फल देवे सोइ ॥६८॥
सँतों की संगति प्राप्त होती है तो उसका फल अमृतत्व देने वाला राम का साक्षात्कार होता है और सँसारी प्राणियों की संगति प्राप्त होती है तो वह बारँबार मृत्यु देने वाला विषय - वासना रूप फल देती है ।
दादू सभा सँत की, सुमति उपजे आइ ।
शाकत की सभा बैसताँ, ज्ञान काया तैं जाइ ॥६९॥
सँतों की सभा में आकर बैठने से हृदय में सुमति उत्पन्न होती है और दुर्जनों की सभा में बैठने से पूर्व - प्राप्त ज्ञान भी अन्त:करण से चला जाता है ।
(क्रमशः)