"श्री दादूदयाल वाणी(आत्म-दर्शन)(५)" लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
"श्री दादूदयाल वाणी(आत्म-दर्शन)(५)" लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

रविवार, 21 सितंबर 2014

= अबिहड़ का अंग ३७(१०/११) =

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
https://www.facebook.com/DADUVANI
*#श्रीदादूदयालवाणी०आत्मदर्शन*
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज
.
*अबिहड़ का अंग ३७*
.
*अबिहड़ अंग बिहड़ै नहीं, अपलट पलट न जाइ ।*
*दादू अघट एक रस, सब में रह्या समाइ ॥१०॥* 
टीका - हे जिज्ञासु ! वह चैतन्य ब्रह्मस्वरूप कूटस्थ, कभी पलटता नहीं है । और न उसमें आने - जाने रूप क्रिया ही है । और फिर ‘अघट’ कहिये वह बेसी कमती भाव को कभी प्राप्त नहीं होता । सबमें सूत्र आत्मारूप से समा रहा है, उसी में अपने मन को लगाइये ॥१०॥ 
हरि अबिहड़ अविनाशि है, सिरजे की प्रतिपाल । 
जगन्नाथ बिसरै नहीं, सुख दुख सब ही काल ॥ 
अपलट सो पलटै नहीं, अविहड़ बिहर न जाहिं । 
हरि हरिजन जगन्नाथ ये, उभै अडिग जग माहिं ॥ 
.
*अन्त समय की साखी*
*जेते गुण व्यापैं जीव को, तेते तैं तजे रे मन ।*
*साहिब अपणे कारणैं,(भलो निबाह्यो प्रण) ॥११॥* 
इति अबिहड़ का अंग सम्पूर्ण - ३७॥ साखी ११॥ 
टीका - ब्रह्मऋषि जगत्गुरु दादूदयाल जी महाराज कहते हैं कि हे मन ! जितने गुणों के विकार, विषय - वासना, अनात्म - अहंकार आदि तैंने अपने स्वस्वरूप ब्रह्म प्राप्ति के लिये त्यागे । यह तैंने अपना प्रण इस मनुष्य देह में बहुत अच्छा निभाया । अपनी प्रतिज्ञा पूरी करी तैंने, तुझे धन्यवाद है । यह साखी अन्त समय में, परम गुरुदेव महाराज ने उच्चारण की थी ॥११॥ 
इति अविहड़ का अंग टीका सहित सम्पूर्ण - ३७॥ साखी ११॥ 
.
*"अनन्त विभूषित श्री ब्रह्मऋषि जगद्गुरु श्री दादूदयाल जी महाराज की अनुभव वाणी", पूवार्द्ध भाग की सजीवनी टीका दृष्टान्तों सहित रची -*
*द्वारा - महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी ।*
*इति - ॐ शान्ति ! शान्ति ! शान्ति !*

शनिवार, 20 सितंबर 2014

= अबिहड़ का अंग ३७(७/९) =

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
https://www.facebook.com/DADUVANI
*#श्रीदादूदयालवाणी०आत्मदर्शन*
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज
.
*अबिहड़ का अंग ३७*
.
*दादू अबिहड़ आप है, साचा सिरजनहार ।*
*आदि अंत बिहड़ै नहीं, बिनसै सब आकार ॥७॥* 
टीका - हे जिज्ञासु ! वह सत्य स्वरूप परमात्मा अपरिवर्तनीय है और आदि से अन्त तक चैतन्य शक्ति एकरस रहती है, कभी उसका उत्पत्ति नाश नहीं होता । काल का उस पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता । अपने मन को उसी में लगा ॥७॥ 
.
*दादू अबिहड़ आप है, अविचल रह्या समाइ ।*
*निहचल रमता राम है, जो दीसै सो जाइ ॥८॥* 
टीका - हे जिज्ञासु ! ‘अबिहड़’ कहिए, आप स्वयं न बदलने वाला परमात्मा अविनाशी, अचल, कृपालु, सर्वव्यापक, एकरस, निर्गुण राम है । ‘जो दीसै सो जाइ’ - अर्थात् नामरूप आकार वाली सम्पूर्ण वस्तुएँ, काल पाकर नष्ट हो जाती हैं । इसलिये उस चैतन्य स्वरूप में अपने मन को लगाओ ॥८॥ 
.
*दादू अबिहड़ आप है, कबहूँ बिहड़े नांहि ।*
*घटै बधै नहीं एक रस, सब उपज खपै उस मांहि ॥९॥* 
टीका - हे जिज्ञासु ! आप स्वयं सत्यस्वरूप परमात्मा, न बदलने वाला है । कभी भी उसके चैतन्य स्वरूप में परिवर्तन नहीं आता है । वह न तो कभी घटता है, न कभी बढ़ता है, उसका सदैव एकरस स्वरूप रहता है । नाम रूप सम्पूर्ण वस्तुएँ मायावी हैं उसी में उत्पन्न होती हैं और उसी में समय पाकर विलय हो जाती हैं । जैसे फेन, तरंग, बुदबुदे, लहर, जल से उत्पन्न होकर जल में ही विलय होते रहते हैं ॥९॥ 
(क्रमशः)

शुक्रवार, 19 सितंबर 2014

= अबिहड़ का अंग ३७(४/६) =

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
https://www.facebook.com/DADUVANI
*#श्रीदादूदयालवाणी०आत्मदर्शन*
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज
.
*अबिहड़ का अंग ३७*
.
दादू संगी सोई कीजिये, सुख दुख का साथी ।
दादू जीवन - मरण का, सो सदा संगाती ॥४॥
टीका - हे जिज्ञासु ! वह अविनाशी समर्थ परमेश्वर, सच्चा साथी है । उसी का संग कहिये शरणा लेना चाहिये । क्योंकि जन्म से मरण पर्यन्त, सुख - दुःख में वही इस जीव का साथ देता है और सदैव वह इसके साथ रहता है ॥४॥
‘जैमल’ जासौं प्रीति करि, जो जग अक्षै रु पास ।
ना वह मरै न बीछुरै, ना तुम होहु निरास ॥
मित्र मृग मूसा जिसे, काग कछू चहुँ यार ।
दुख सुख में बिहड़ै नहीं, त्यूं हरिजन हरि लार ॥
दृष्टान्त - कव्वा और मृग में गहरी मित्रता थी । सच्चे मित्र जानकर एक मूसा भी आकर उनका मित्र बन गया । चोथा कछुवा एक नदी के किनारे, इन तीनों से बोला - कि आप लोग भी, मुझे अपना मित्र बना लो । बना लिया । यह चारों आपस में सुख - दुःख में एक को एक साथ देते रहे । कभी भी मित्र से मित्र अलग नहीं हुए । इसी प्रकार हरिजन जो भक्त हैं, उनसे कभी भगवान भी अलग नहीं होते हैं । उनकी रक्षा करते है । यह दृष्टान्त पहले आ चुका है ।
.
दादू संगी सोई कीजिये, जे कबहूँ पलट न जाइ ।
आदि अंत बिहड़ै नही, ता सन यहु मन लाइ ॥५॥
टीका - हे जिज्ञासु ! ऐसा साथी बनाइये, जिसका कभी परिवर्तन नहीं होता है । और काल द्वारा आदि से अन्त पर्यन्त, कभी भी नाश को नहीं प्राप्त होता । ऐसे सच्चिदानन्द स्वरूप, अधिष्ठान चेतन से अपना मन लगाइये ॥५॥
हरि सा मिंत मंडाण में, नाहिंन कहुँ कबीर ।
जत बिसरै बिसरै नहीं, स्वारथ बिना सधीर ॥
.
दादू अबिहड़ आप है, अमर उपावनहार ।
अविनाशी आपै रहै, बिनसै सब संसार ॥६॥
टीका - हे जिज्ञासु ! आप सृष्टि रचयिता परमेश्वर अविनाशी, वह आप स्वयं न बदलने वाला है । और बाकी माया और माया का कार्य सम्पूर्ण संसार परिर्वतनशील है । उसी अमर पुरुष में अपने मन को लगाकर अमरभाव को प्राप्त होइये ॥६॥
(क्रमशः)

गुरुवार, 18 सितंबर 2014

= अबिहड़ का अंग ३७(१/३) =

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
https://www.facebook.com/DADUVANI
*#श्रीदादूदयालवाणी०आत्मदर्शन*
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज
.
*अबिहड़ का अंग ३७*
"दादू अमर फल खाइ" - इस सूत्र के व्याख्यान स्वरूप बेली के अंग के तदनन्तर, अब अबिहड़ का अंग निरूपण करते हैं ।
.
*मंगलाचरण*
*दादू नमो नमो निरंजनं, नमस्कार गुरुदेवतः ।*
*वन्दनं सर्व साधवा, प्रणामं पारंगतः ॥१॥* 
टीका - अब हरि, गुरु, संतों को नमो, नमस्कार, वन्दना प्रणाम आदि करके ‘अबिहड़’ कहिये, न बदलने वाले स्वरूप निरंजनदेव, अर्थात् उस एक अद्वैत अविनाशी ब्रह्मतत्व का विचार करने के लिए अज्ञान से पार होकर, नित्य संयोग को समझ कर, ब्रह्म में अभेद होते हैं ॥१॥ 
.
*दादू संगी सोई कीजिये, जे कलि अजरावर होइ ।*
*ना वह मरै, न बीछूटै, ना दुख व्यापै कोइ ॥२॥* 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! उसी को अब साथी बनाइये, जो इस कलि संसार में, अजर अमर स्वरूप है, वह न तो मरता है और न बिछुड़ता है । न उसको किसी प्रकार का दुख व्याप्त होता है ॥२॥ 
आदि मध्य अरु अंत लौं, हरि है सदा अभंग । 
कबीर उस कर्तार का, सेवक तजै न संग ॥ 
.
*दादू संगी सोई कीजिये, जे थिर इहि संसार ।*
*ना वह खिरै, न हम खपैं, ऐसा लेहु विचार ॥३॥* 
टीका - हे जिज्ञासु ! उस अविनाशी आत्म - स्वरूप परमात्मा को अपना संगी बनाइये, जो इस संसार में सदैव स्थिर रहता है । न तो वह कभी खिरता है और उसका संग करके, न हम मुक्त पुरुष, उसमें अभेद होकर नष्ट ही होते हैं । ऐसे अविनाशी स्वरूप का विचार करके, हे मुमुक्षुओ ! उसी के साथ अपनी वृत्ति को लगाओ ॥३॥ 
(क्रमशः)

बुधवार, 17 सितंबर 2014

= बेली का अंग ३६(१५/१६) =

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
https://www.facebook.com/DADUVANI
*#श्रीदादूदयालवाणी०आत्मदर्शन*
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज
.
*बेली का अंग ३६*
.
*सतगुरु संगति नीपजै, साहिब सींचनहार ।*
*प्राण वृक्ष पीवै सदा, दादू फलै अपार ॥१५॥* 
टीका - हे जिज्ञासु ! यह बेली सतगुरु की संगति से उत्तम साधक के अन्तःकरण में पनपती है और साहिब परमात्मा की दया रूपी जल से यह पुष्ट होती है । इस प्रकार प्राण रूप वृक्ष, ईश्वर की दया और सतगुरु के सत्य उपदेश रूपी जल को पीकर, अपार मुक्ति रूप फल को प्राप्त होता है ॥१५॥ 
.
*दया धर्म का रूंखड़ा, सत सौं बधता जाइ ।*
*संतोष सौं फूलै फलै, दादू अमर फल खाइ ॥१६॥* 
इति बेली का अंग सम्पूर्णः ३६॥ साखी १६॥ 
टीका - हे जिज्ञासु ! दया रूप धर्म का वृक्ष, सत्य स्वरूप परमात्मा का नाम स्मरण रूप जल प्राप्त करके, हरा भरा रहता है, और फिर संतोष के द्वारा, भक्ति रूप फूल, और ज्ञान वैराग्य रूपी फल को प्राप्त करता है । उस फल को उत्तम साधक भक्षण करके, जीवन - मुक्त होते हैं ॥१६॥ 
कोइ नृप के तन कोढ हो, हंस दरश के काज । 
सदाव्रत पक्षिन दियो, सुन आयो खगराज ॥ 
दृष्टान्त - एक राजा के शरीर में कोढ़ हो गया । उससे राजा का शरीर जलता रहता । एक महात्मा ने बताया कि हंस का दर्शन करने से यह बीमारी नष्ट हो जाएगी । राजा ने पूछा - हंसों का दर्शन कैसे होवे ? महात्मा बोले - पक्षियों को सदाव्रत दिया करो, अर्थात् भोजन दिया करो । कभी हंस भी आ जावेंगे और उनका दर्शन पा लोगे । राजा वैसे ही करने लगा । एक समय मानसरोवर पर अकाल पड़ गया । हंस हंसनी उड़ते हुए, सदाव्रत के लिए राजा के यहाँ आ गये । राजा आया और उनको मोतियों का भोजन दिया । उनका दर्शन करते ही राजा का कोढ निवृत्त हो गया ।
दूधां न्हावो, पूतां फलो, समर्थ भरो भंडार । 
बखना ताकी धन्य घड़ी, साध जिमावैं द्वार ॥ 
जा घर साधु संचरै, रुचि कर भोजन लेइ । 
बखना ताके भवन की, नौ ग्रह चौकी देइ ॥ 
दाता तरवर दया फल, उपकारी जीवन्त । 
पक्षी चले दिसावरां, वृक्षा सुफल फलन्त ॥ 
धर्मात्मा वृक्ष रूप हैं, उनके दया रूपीफल है । ऐसे उपकारी संसार में जीवित हैं । पक्षी हंस - हंसनी ने आशीर्वाद दिया कि हे वृक्ष रूप राजा ! तूँ हमेशा सुन्दर फलों से फलता - फूलता रहना । यह कहकर मानसरोवर को उड़ चले ।
इति बेली का अंग टीका सहित, सम्पूर्णः ३६॥ साखी १६॥
(क्रमशः)

मंगलवार, 16 सितंबर 2014

= बेली का अंग ३६(१३/१४) =

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
https://www.facebook.com/DADUVANI
*#श्रीदादूदयालवाणी०आत्मदर्शन*
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज
.
*बेली का अंग ३६*
.
*अमृत बेली बाहिये, अमृत का फल होइ ।*
*अमृत का फल खाइ कर, मुवा न सुणिया कोइ ॥१३॥* 
टीका - हे जिज्ञासु ! अन्तर्मुख विवेक - बुद्धि रूप बेली को, निष्काम भक्ति में लगाइये, तो फिर उस बुद्धि रूप बेली के ज्ञानरूपी अमृत फल लगेगा । उसको भक्षण करने वाले उत्तम साधक, न तो कोई मरे हैं और न आगे मरेंगे । जीवन - मुक्त हो जावेंगे ॥१३॥
.
*दादू विष की बेली बाहिये, विष ही का फल होइ ।*
*विष ही का फल खाय कर, अमर नहिं कलि कोइ ॥१४॥* 
टीका - हे जिज्ञासु ! बहिर्मुख बुद्धि रूप बेली कुसंग में लगी हुई है तो विषय रूपी जल को पीने से चौरासी में जीव जाते हैं । फिर चौरासी के दुःखों को भोगते रहते हैं । ऐसे जीव कलियुग में कभी भी अमर नहीं होते ॥१४॥
(क्रमशः)

सोमवार, 15 सितंबर 2014

= बेली का अंग ३६(१०/१२) =

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
https://www.facebook.com/DADUVANI
*#श्रीदादूदयालवाणी०आत्मदर्शन*
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज
.
*बेली का अंग ३६*
.
*दादू अमर बेलि है आत्मा, खार समंदां मांहिं ।*
*सूखे खारे नीर सौं, अमर फल लागे नांहिं ॥१०॥* 
टीका - हे जिज्ञासु ! ‘अमर बेलि’ कहिए साधक की अन्तर्मुख वृत्ति, संसार में आसक्ति रखने वाली विषय - वासना रूपी खारे जल को पीकर आत्म - भावना की तरफ से सूख गई है । उस बुद्धिरूप बेलि के, ज्ञान अमृत रूप फल नहीं लगता है ॥१०॥ 
.
*दादू बहु गुणवंती बेलि है, ऊगी कालर मांहिं ।*
*सींचै खारे नीर सौं, तातैं निपजै नांहिं ॥११॥* 
टीका - हे जिज्ञासु ! बुद्धि रूपी बेली बहुत गुणवान है, परन्तु विषय - वासना रूप कालर भूमि में स्थिर हो रही है और इन्द्रियों के विषय रूपी खारे नीर को पीकर क्षीण होती जाती है । वह बुद्धि ब्रह्म अनुसरणी नहीं बनती, इसीलिये अमर फल से वंचित रहती है ॥११॥ 
.
*बहु गुणवंती बेली है, मीठी धरती बाहि ।*
*मीठा पानी सींचिये, दादू अमर फल खाहि ॥१२॥* 
टीका - हे जिज्ञासु ! मनुष्य की बुद्धिरूपी बेली बहुत गुणवान है । इसको सत्संग रूपी मीठी धरती में लगाइये और फिर निष्काम नाम - स्मरण रूपी मीठे जल से सींचिये । फिर उस बुद्धि रूप बेली का ज्ञान अमृत रूपी फल खाकर साधक जीवन मुक्त हो जाता है ॥१२॥
(क्रमशः)

शनिवार, 13 सितंबर 2014

= बेली का अंग ३६(७/९) =

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
https://www.facebook.com/DADUVANI
*#श्रीदादूदयालवाणी०आत्मदर्शन*
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज
.
*दादू सूखा रूंखड़ा, काहे न हरिया होइ ।*
*आपै सींचै अमीरस, सुफल फलिया सोइ ॥७॥* 
टीका - हे जिज्ञासु ! यह स्थूल शरीर रूपी वृक्ष, ज्ञान - भक्ति रूप जल प्राप्त किये बिना सूख रहे हैं । अब किस प्रकार हरे होवें ? यदि उत्तम भाग्य से सच्चे ब्रह्मनिष्ठ सतगुरु मिलें और वे अपने सत्य उपदेश अमृत रूप जल से सींचें, तो फिर उन शरीर रूपी वृक्षों के ज्ञान अमृत रूप फल लगें ॥७॥ 
.
*कदे न सूखै रूंखड़ा, जे अमृत सींच्या आप ।*
*दादू हरिया सो फलै, कछू न व्यापै ताप ॥८॥* 
टीका - हे जिज्ञासु ! जो चतुर साधक, इस काया रूप वृक्ष को अर्थात् अन्तःकरण में, निष्काम नाम - चिन्तन रूप जल से सींचे, तो भाव - भक्ति रूप हरियाली वाला बना रहे और आत्म - परिचय रूपी ज्ञान - फल से फले । फिर उस फल को उत्तम साधक खाकर जन्म - मरण रूप संताप से मुक्त होवे ॥८॥ 
.
*जे घट रोपै राम जी, सींचै अमी अघाइ ।*
*दादू लागै अमर फल, कबहूँ सूख न जाइ ॥९॥* 
टीका - हे जिज्ञासु ! जो उत्तम साधक, इस घट रूप अन्तःकरण में निर्गुण ब्रह्मरूप राम को धारण करेअथवा इस शरीर को अद्वैत सत्संग में रोपे, और फिर अन्तःकरण में अद्वैत नाम - चिन्तन रूप ग्राहक बहावे । फिर इस प्रकार तृप्त होने से, जीवन मुक्ति रूप अखंड फल, इस मनुष्य शरीर में प्राप्त होता है । उसका मनुष्य - जन्म फिर व्यर्थ नहीं जाता ॥९॥ 
(क्रमशः)

शुक्रवार, 12 सितंबर 2014

= बेली का अंग ३६(४/६) =


🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
https://www.facebook.com/DADUVANI
*#श्रीदादूदयालवाणी०आत्मदर्शन*
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज
.
*बेली का अंग ३६*
.
*दादू बेली आत्मा, सहज फूल फल होइ ।*
*सहज सहज सतगुरु कहै, बूझै बिरला कोइ ॥४॥* 
टीका - हे जिज्ञासु ! अन्तःकरण की आत्माकार वृत्ति रूप बेली, सहज समाधि में स्थित होने पर इसके निष्काम भक्ति रूप फूल और ज्ञान रूपी फल लगता है । सत्य उपदेश के देने वाले ब्रह्मनिष्ठ सतगुरु सहज - सहज इस बेली को अपने अनुभव रूप उपदेश जल से सींचते हैं । उपरोक्त फल - फूल लगने वाली बेली को अपने प्रयत्न से ब्रह्माकार बनाते हैं । परन्तु इस सतगुरु के भेद को कोई उत्तम जिज्ञासु ही जानते हैं ॥४॥ 
.
*जे साहिब सींचै नहीं, तो बेली कुम्हलाइ ।*
*दादू सींचै सांइयाँ, तो बेली बधती जाइ ॥५॥* 
टीका - हे जिज्ञासु ! ब्रह्मनिष्ठ सतगुरु जिज्ञासु की वृत्ति रूप बेली को अपने सत्य उपदेश रूपी जल से नहीं सींचें, तो साधक की वृत्तिरूप बेली मुरझाती है, अर्थात् उदास रहती है । और सतगुरु भक्ति - वैराग्य - ज्ञान रूपी जल से सींचते रहें, तो यह बेली साक्षी कूटस्थ रूप वृक्ष पर अपना विस्तार करती रहती है अर्थात् स्वरूपाकार बनी रहती है ॥५॥ 
.
*हरि तरुवर तत आत्मा, बेली कर विस्तार ।*
*दादू लागै अमर फल, कोइ साधू सींचनहार ॥६॥* 
टीका - हे जिज्ञासु ! कूटस्थ साक्षीरूप हरि तो वृक्ष हैं और जिज्ञासु की आत्माकार वृत्ति बेली है । जैसे वृक्ष का सहारा लेकर बेली पनपती है, वैसे ही साधक की चैतन्य रूप बेली, कूटस्थ साक्षी का विचाररूपी आसरा लेकर स्वरूपाकार विस्तार को प्राप्त होती है । उस बेली के ज्ञान - रूपी अमृत फल लगता है, परन्तु इस बेली को कोई सच्चे काछ - वाछ निष्कलंक ब्रह्मनिष्ठ संत, अपने उपदेशों से सींचने वाले होते हैं ॥६॥
(क्रमशः)

गुरुवार, 11 सितंबर 2014

= बेली का अंग ३६(१/३) =

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
https://www.facebook.com/DADUVANI
*#श्रीदादूदयालवाणी०आत्मदर्शन*
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज
.
*बेली का अंग ३६*
"सब जग बैठा जीति कर, काहू लिप्त न होइ" - इस सूत्र के व्याख्यान स्वरूप, साक्षीभूत अंग के तदनन्तर अब बेली का अंग निरूपण करते हैं ।
.
*मंगलाचरण*
*दादू नमो नमो निरंजनं, नमस्कार गुरुदेवतः ।*
*वन्दनं सर्व साधवा, प्रणामं पारंगतः ॥१॥* 
टीका - अब हरि, गुरु संतों को नमो नमस्कार वन्दना करके बेली का स्वरूप प्रतिपादन करते हैं ॥१॥ 
.
*दादू अमृत रूपी नाम ले, आत्म तत्वहि पोषै ।*
*सहजैं सहज समाधि में, धरणी जल शोषै ॥२॥* 
टीका - हे जिज्ञासु ! निर्वासनिक निष्काम भाव से आत्म - स्वरूप परमेश्वर का, अभेद निश्चय रूप नाम - स्मरण रूप अमृत, काल से छुड़ाने वाला, अन्तःकरण चतुष्टय की चारों अवस्थाओं(जागृत, स्वप्न, सुषुप्ति, तुरिया) में, आत्माकार वृत्ति की दृढ़ता स्थिति में, आत्म - तत्व की भावना रूप बेली को पोषण करता रहे, और निर्द्वन्द्व सहज समाधि में स्थित होकर धरती रूप शरीर में, नाम - स्मरण रूप जल को पीता रहे ॥२॥ 
.
*पसरै तीनों लोक में, लिप्त नहीं धोखे ।*
*सो फल लागै सहज में, सुन्दर सब लोके ॥३॥* 
टीका - हे जिज्ञासु ! ब्रह्म अनुसारिणी वृत्ति रूप बेली, अर्थात् असत्य नाम रूप संसार में सत्य की कल्पना और सत्य में असत्य की कल्पना करके, वृत्ति धोखे में नहीं आवे । उस वृत्ति का प्रवाह, स्थूल - सूक्ष्म - कारण शरीर से आगे बढ़कर, कूटस्थ रूप वृक्ष पर ‘पसरै’ कहिए, स्थिर होवे और फिर पंचकोषमय शरीरों के अध्यास में, वृत्ति को आसक्त न होने देवे, तो फिर इस वृत्ति के जीव ब्रह्म की एकता रूप ज्ञान - फल लगता है । यही फल तीन लोक और चौदह भवन में सबसे उत्तम है ॥३॥
(क्रमशः)

मंगलवार, 9 सितंबर 2014

= साक्षीभूत का अँग ३५(१६/१७) =

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
https://www.facebook.com/DADUVANI
*#श्रीदादूदयालवाणी०आत्मदर्शन*
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज
.
*साक्षीभूत का अंग ३५*
.
*देवै लेवै सब करै, जिन सिरजे सब कोइ ।*
*दादू बन्दा महल में, शोभा करैं सब कोइ ॥१७॥*
टीका - हे जिज्ञासु ! जिसने तीन लोक और चौदह भवन रचे हैं, वही समर्थ इनमें निवास करने वाले, जीवों को प्रारब्ध – कर्मानुसार, देते - लेते हैं । परन्तु अनन्य भक्त तो अन्तःकरण रूपी महल में, निष्काम स्मरण रूप सेवा में लगे हैं और संसार में सभी लोग, उन भक्तों की शोभा करते हैं ॥१७॥
.
*कर्ता साक्षीभूत*
*दादू जुवा खेले जाणराइ, ताको लखै न कोइ ।*
*सब जग बैठा जीत कर, काहू लिप्त न होइ ॥१८॥*
इति साक्षीभूत का अंग सम्पूर्णः ३५॥ साखी १८॥
टीका - हे जिज्ञासु ! वह जाणराइ अन्तर्यामी, घट - घट की जानने वाले परमात्मा, आप स्वयं सम्पूर्ण बाजी रचकर आप ही खिलाड़ी बन रहे हैं । किन्तु अज्ञानरूप आवरण होने से, साधारण प्राणी उसको देख नहीं सकते और वह आप स्वयं कूटस्थ चैतन्य, सबको जीत कर साक्षीरूप से स्थित हो रहे हैं । और किसी भी बन्धन से वे बँधे हुए नहीं हैं ॥१८॥
इति साक्षीभूत का अंग टीका सहित सम्पूर्णः ३५॥ साखी १८॥
(क्रमशः)

सोमवार, 8 सितंबर 2014

= साक्षीभूत का अँग ३५(१३/१५) =

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
https://www.facebook.com/DADUVANI
*#श्रीदादूदयालवाणी०आत्मदर्शन*
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज
.
*साक्षीभूत का अंग ३५*
.
*केई सेवक ह्वै रहे, केई साधु संगति मांहि ।*
*केई आइ दर्शन करैं, हम तैं होता नांहि ॥१३॥* 
टीका - हे जिज्ञासु ! कई सांसारिक प्राणी, अनेक प्रकार की वासना लेकर सेवक बन रहे हैं । वैसे ही कई साधुओं की संगति करते हैं । कितने ही आ - आकर दर्शन करते हैं, परन्तु निष्कामी अन्तर्मुखी संतजनों ने इन बहिरंग दिखावटी सब कर्मों का त्याग किया है ॥१४॥ 
.
*ना हम करैं करावैं आरती, ना हम पिवैं पिलावैं नीर ।*
*करै करावै सांइयाँ, दादू सकल शरीर ॥१४॥* 
टीका - हे जिज्ञासु ! मुक्तजन अन्तर्मुखी संत कहते हैं कि न तो हम बहिरंग आरती करते हैं, और न कराते हैं, वैसे ही न हम पीते हैं, और न पिलाते हैं । कर्ता करने वाला, कराने वाला, हमारे तो केवल अधिष्ठान चैतन्य ही है । वह सब शरीरों में सूत्र आत्मा रूप से व्यापक हो रहा है । ऐसे मुक्त पुरुष व्यष्टि अहंकार से रहित होकर समष्टि चेतन में अभेद हो गये हैं ॥१५॥ 
.
*करै करावै सांइयाँ, जिन दिया औजूद ।*
*दादू बन्दा बीच में, शोभा को मौजूद ॥१५॥* 
टीका - हे जिज्ञासु ! मुक्त पुरुषों का निश्चय रूप यह व्यवहार है कि जिस समर्थ ने यह औजूद, शरीर दिया है, वही इसमें कर्ता कराने वाला आप है । अपने अनन्य दासों के अन्तःकरण में स्थित होकर, उनको संसार में शोभा दिलाते हैं, परन्तु वह अनन्य दास, अपने को कर्ता नहीं मानते ॥१६॥ 
(क्रमशः)

रविवार, 7 सितंबर 2014

= साक्षीभूत का अँग ३५(१०-१२) =

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
https://www.facebook.com/DADUVANI
*#श्रीदादूदयालवाणी०आत्मदर्शन*
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज
.
*साक्षीभूत का अंग ३५*
.
*बुरा भला सिर जीव के, होवै इस ही मांहि ।*
*दादू कर्ता कर रह्या, सो सिर दीजै नांहि ॥१०॥* 
टीका - हे जिज्ञासु ! इस शरीर के भीतर, चिदाभास युक्त अन्तःकरण में ही, शुभ – अशुभ, पाप - पुण्य उत्पन्न होते हैं । उनके अनुसार ही सृष्टिकर्ता ईश्वर फल देता है ॥११॥ 
.
*साधु साक्षीभूत*
*कर्ता ह्वै कर कुछ करै, उस मांहि बँधावै ।*
*दादू उसको पूछिये, उत्तर नहीं आवै ॥११॥* 
टीका - हे जिज्ञासु ! यदि ‘कर्ता’ कहिए सबका कारण चैतन्य ही, आप सब शुभ - अशुभ करके, स्वयं चैतन्य रूप जीव, उस कर्ता रूप अहंकार में बँध जावे, तो कैसे ठीक है ? क्योंकि कर्ता तो सब शुभ - अशुभ कर्म रूप बन्धनों से अलग रहता है ॥१२॥ 
कुंड खणायो खोद कर, जती घाट नहीं कीन्ह । 
गाय मरी बावस कहीं, हत्या मम क्यूं दीन्ह ॥ 
दृष्टान्त - एक नगर में जती जी बहुत पैसे वाले थे । उसी नगर में एक वेदान्ती संत भी आकर प्रवचन करने लगे । सभी लोग प्रवचन में जाते । एक रोज जती जी भी गये । जती जी को प्रवचन अच्छे लगे, फिर तो रोज ही जाने लगे । महात्मा जी को किसी ने कहा कि जती जी बहुत पैसे वाले हैं । महात्मा बोले - जती जी आपके पास पैसा है, इसका आप क्या करोगे ? कुछ जन - समुदाय की सेवा में खर्च कर दो । जती जी बोले - कहाँ लगाऊं ? महात्मा बोले - अमुक स्थान पर एक जलाशय कुण्ड बना दो । 
जती जी ने खूब पैसा लगाकर प्रेम से कुण्ड बनवा दिया, परन्तु उसके गऊ - घाट नहीं रखा । ग्रीष्म काल में एक गऊ प्यास से घबराई हुई कुण्ड के चारों तरफ घूमने लगी । जब रास्ता न मिला तो पानी देखकर, पानी पीने को सीढ़ियों से उतरती समय गिर गई और खत्म हो गई । वह गौ हत्या जतीजी के पास आई और बोली - आप मुझको धारण करो । जती जी बोले - तुम पानी के लिये गिरी हो, इन्द्र के पास जाओ, इन्द्र भोगेगा, इन्द्र ने पानी बरसाया है । जब इन्द्र के पास गई, इन्द्र बोले - चलो तुम कुण्ड पर, मैं आता हूँ । 
सायंकाल जती जी कुण्ड पर रोज जाया करते थे और कुण्ड को देखकर मन में राजी होते और सोचते कि मैंने कितना पैसा लगाया है । मेरे जैसा कुण्ड कौन बनाएगा ? जती कुण्ड पर बैठे थे । इन्द्र मनुष्य रूप में आये और कुण्ड के चारों मेर घूमने लगे और बोले - धन्य हो ! किस महात्मा ने इतना पैसा लगाकर यह कुण्ड बनाया है ? उसको तो स्वर्ग की प्राप्ति होगी ? 
पुनः पुनः कहने लगे । तब जती जी बोले - अरे ! मैंने पैसा लगाया है और किसने लगाया है ? अभी तो मैं जिन्दा बैठा हूँ । इन्द्र बोले - यह गौ हत्या मेरे पास क्यों भेजी ? आप तो कर्ता हो रहे हो, तो गऊ - घाट क्यों नहीं बनाया ? जती जी चुप हो गये और गौ हत्या का पाप भोगना पड़ा । जब जीव कर्ता होकर कर्म करता है तो, उसके फल को भी भोगता है ।
.
*दादू केई उतारैं आरती, केई सेवा कर जांहि ।* 
*केई आइ पूजा करैं, केई खिलावें खांहि ॥१२॥* 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! कई सांसारिक जीव सकाम - कर्मी मन्दिरों में जाकर आरती उतारते हैं और कई जाकर सकाम सेवा करते हैं । कई वासनाओं को लेकर पूजा करते हैं । कई फल इच्छा से संतों को भोजन कराके, आप खाते हैं । परन्तु यह दिखावटी और सकाम सेवा - पूजा आदि, विशेष फल देने वाले नहीं हैं ॥१३॥
(क्रमशः)

शनिवार, 6 सितंबर 2014

= साक्षीभूत का अँग ३५(७-९) =

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
https://www.facebook.com/DADUVANI
*#श्रीदादूदयालवाणी०आत्मदर्शन*
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज
.
*साक्षीभूत का अंग ३५*
.
*स्वकीय मित्र - शत्रुता*
*दादू जामण मरणा सान कर, यहु पिंड उपाया ।*
*साँई दिया जीव को, ले जग में आया ॥७॥*
टीका - हे जिज्ञासु ! यह चेतन रूपी जीव, परमात्मा का दिया हुआ, प्रारब्ध कर्म अनुसार, जन्म ने - मरने वाले शरीर रूपी पिंड को लेकर, जगत में आया है । फिर जैसे कर्म करता है, वैसे ही आगे मित्र और शत्रु तैयार होते रहते हैं ॥७॥
"जन्मना जायते म्रुत्युर्ध्रुवम् ॥ " - गीता
.
*दादू विष अमृत सब पावक पाणी, सतगुरु समझाया ।*
*मनसा वाचा कर्मणा, सोई फल पाया ॥८॥*
टीका - हे जिज्ञासु ! सत् उपदेश के देने वाले सतगुरु ने अपने सत् उपदेशों द्वारा परमार्थ और व्यवहार का मार्ग बताया है, और विचारवान साधक, स्वयं विचार करके, सतगुरु के बताये हुए मार्ग को समझे । विष अमृत कहिए, माया और माया के कार्य प्रपंच में आसक्ति, विष के समान है । और परमेश्वर का नाम - स्मरण, अमृत के तुल्य है । क्रोध अग्नि रूप है और शांति जलरूप है । जैसे जैसे राजस सात्विक तामस कर्म करता है, वैसे - वैसे यह जीव फल भोगता रहता है ॥८॥
.
*दादू जानै बूझै जीव सब, गुण औगुण कीजे ।*
*जान बूझ पावक पड़ै, दई दोष न दीजे ॥९॥*
टीका - हे जिज्ञासु ! जीव गुण और अवगुण अर्थात् पाप और पुण्य को जानता है, भली प्रकार समझता है, जैसे कोई अग्नि में जान बूझकर पांव रखें, तो जलेगा ही । इसी प्रकार जीव, शुभ - अशुभ जैसे कर्म करेगा, उनका वैसा ही फल भोगेगा । इसमें ईश्वर को दोष नहीं देना चाहिये ॥९॥
(क्रमशः)

शुक्रवार, 5 सितंबर 2014

= साक्षीभूत का अँग ३५(४-६) =

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज
.
*साक्षीभूत का अंग ३५*
.
*कर्ता साक्षीभूत ~*
*करता है सो करेगा, दादू साक्षीभूत ।*
*कौतिकहारा ह्वै रह्या, अणकर्ता अवधूत ॥४॥*
टीका ~ हे जिज्ञासु ! ‘साक्षीभूत’ कहिए सबका कारण चैतन्य वह अन्तर्यामी, ‘कौतिकहारा’ कहिये, तमाशगीर होकर आप विराट रूप, एकान्त दृष्टा, अणकर्ता, कूटस्थ चैतन्य, अवधूत, किसी माया और माया के कार्य से न धूताने वाला, सूत्र आत्मा रूप से आप सबमें व्याप्त हो रहा है । उसी में अपनी वृत्ति को स्थिर कर ॥४॥
.
*दादू राजस कर उत्पत्ति करै, सात्विक कर प्रतिपाल ।*
*तामस कर परलै करै, निर्गुण कौतिकहार ॥५॥*
टीका - हे जिज्ञासु ! वह निर्गुण साक्षी चैतन्य रजोगुण प्रधान प्रकृति से सम्पूर्ण सृष्टि की उत्पत्ति करता है, और सतोगुण द्वारा सबका पालन होता है, तथा तमोगुण प्रधान प्रकृति से सबका संहार करता है ॥५॥
.
*दादू ब्रह्म जीव हरि आत्मा, खेलैं गोपी कान्ह ।*
*सकल निरन्तर भर रह्या, साक्षीभूत सुजान ॥६॥*
टीका - हे जिज्ञासु ! वह साक्षी चैतन्य, आप स्वयं ब्रह्म और जीव रूप से, तथा हरि और आत्मा रूप से, गोपी और कृष्ण की भांति खेल खेल रहे हैं । और हे सुजान साधक ! वही साक्षी चैतन्य सबमें परिपूर्ण रूप से व्याप्त हो रहे हैं ॥६॥
(क्रमशः)

गुरुवार, 4 सितंबर 2014

= साक्षीभूत का अँग ३५(१-३) =

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज
.
*साक्षीभूत का अंग ३५*
‘‘खुशी तुम्हारी त्यूं करो, हम तो मानी हार’’ - इस सूत्र के व्याख्यान स्वरूप, विनती के अंग के तदनन्तर साक्षी स्वरूप का विचार करने के लिये साक्षीभूत का अंग निरूपण करते हैं ।
.
*मंगलाचरण*
*दादू नमो नमो निरंजनं, नमस्कार गुरुदेवतः ।*
*वन्दनं सर्व साधवा, प्रणामं पारंगतः ॥१॥*
टीका ~ हे सर्व के साक्षी रूप निरंजन देव ! आपको हमारी बारम्बार नमो - नमो है और जो गुरुदेव निरंजन को साक्षी रूप क रके जाना है, उनको भी हमारी नमस्कार है और सर्व ही संत जो उस परमेश्वर को साक्षीरूप बनाकर, उसके स्मरण में लग रहे हैं, उनको भी हम वन्दना करते हैं । इस प्रकार हरि, गुरु, संतों को जो प्रणाम करते हैं, वे संसार से पार होकर ‘गतः’, कहिये साक्षी रूप परमात्मा में अभेद होते हैं ॥१॥
.
*भ्रम विध्वंसन*
*सब देखणहारा जगत का, अंतर पूरै साखि ।*
*दादू साबित सो सही, दूजा और न राखि ॥२॥*
टीका ~ हे जिज्ञासु ! यह अधिष्ठान रूप चेतन परमात्मा, सब संसार के शुभ, अशुभ कर्मों को भीतर साक्षीरूप से देखता रहता है और सर्व के अन्दर प्रेरणा करता है तथा सर्व का साक्षी है । उसी परमात्मा रूप साक्षी में अपनी वृत्ति को स्थिर कर और संसार के नाश होने वाले पदार्थों में आसक्त मत हो ॥२॥
.
*मांही तैं मुझ को कहै, अन्तरजामी आप ।*
*दादू दूजा धंध है, साचा मेरा जाप ॥३॥*
टीका ~ हे जिज्ञासुओं ! मांही तै कहिए, शरीर के भीतर अन्तःकरण में, वह अन्तर्यामी रूप साक्षी, प्रेरणा रूप उपदेश करते हैं कि सच्चा तो एक मेरा एक जाप ही है । माया और माया का कार्य रूप सब धन्धे जीव को फँसाने वाले हैं अथवा संसार के वासनामय कर्म सब व्यर्थ हैं ॥३॥
(क्रमशः)

बुधवार, 3 सितंबर 2014

= विनती का अँग ३४ =(८२)

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
https://www.facebook.com/DADUVANI
*#श्रीदादूदयालवाणी०आत्मदर्शन*
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज
.
*विनती का अँग ३४*
.
*दादू जे साहिब लेखा लिया, तो शीश काट शूली दिया ।*
*मिहर मया कर फिल किया, तो जीये जीये कर जिया ॥८२॥*
इति विनती का अंग सम्पूर्णः ३४ ॥साखी ८२॥*
टीका ~ हे साहिब ! यदि आप हमारे मनुष्य - जन्म के कर्त्तव्यों का हिसाब लेओ, तो हम आपको देने में असमर्थ हैं । चाहे तो आप हमारा सिर काट लो, चाहे आप सूली पर चढ़ा दो, तो भी हमारे अपराधों का दण्ड पूरा नहीं हो सकता है । और आप अपने अपराधी सेवक जानकर ‘मिहर’ कहिये, क्षमा कर दो, तो हम जीकर, क्योंकि आप सब जीवों के जीवन रूप हो, आपके स्वरूप को प्राप्त हो सकते हैं ॥८२॥
वर्ष छत्तीस हजार लौं, करी बंदगी सार ।
अदल कियां उलटी पड़ी, फजल किया छुटकार ॥
दृष्टान्त ~ एक तपस्वी ने छत्तीस हजार वर्ष तक तप किया । जब परमेश्वर के दरबार में वह पहुँचा, तो न्यायकारी परमेश्वर उसको बोले ~ तुमसे हिसाब लें या माफ कर दें । तपस्वी जी बोले ~ महाराज ! आप हिसाब ले लो । तब परमेश्वर बोले ~ कि तुम तप करके जब चले तो, एक नगर के किनारे पनघट के कुएँ पर एक लड़की से जल पीने को माँगा था ।
उस लड़की ने तुम्हें कहा कि मेरे पतिदेव के पास थोड़ा जल रखने आई हूँ, उनको जल की जरूरत है । मुझे देर हो जायेगी । आपको पिलाकर, फिर मुझे दुबारा और जल निकालना पड़ेगा, इसलिये आप मेरे घर चलो, वहाँ मैं आपको जल भी और भोजन भी दोनों आपको देऊंगी । तब तुम उस लड़की से बोले ~ कि तुम मुझे एक लोटा जल का दे दो, मैं तुम्हें एक हजार वर्ष की तपस्या का फल देता हूँ ।
तब उस लड़की ने तुम्हें, एक लोटा जल का दिया । और उसने हजार वर्ष की तपस्या का फल तुमसे लेकर अपने पति को अर्पण कर दिया, तो छत्तीस पानी के लोटों में तो, तुम्हारे छत्तीस हजार वर्ष का तप खत्म हो गया । तुमने तो मेरा पानी बहुत गिराया है, बहुत पिया है, बहुत स्नान किया है । पानी का हिसाब तो तुम पहले पूरा दे दो, उसके बाद और सब हिसाब लेंगे । तपस्वी जी काँपने लग गये और रोम खड़े हो गये, और नेत्रों में से आंसू बहाते हुए बोले ~ हे नाथ ! आपको हिसाब कोई नहीं दे सकता है । जब आप हमको अपराधी जानकर क्षमा करोगे, तभी छुटकारा हो सकता है ।
इति विनती का अंग टीका सहित सम्पूर्णः ३४ ॥साखी ८२॥

मंगलवार, 2 सितंबर 2014

= विनती का अँग ३४ =(८१)

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
https://www.facebook.com/DADUVANI
*#श्रीदादूदयालवाणी०आत्मदर्शन*
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज
*विनती का अँग ३४* 
*खुशी तुम्हारी त्यों करो, हम तो मानी हार ।*
*भावै बन्दा बख्शिए, भावै गह कर मार ॥८१॥*
टीका ~ हे स्वामिन् ! जैसी आपकी इच्छा हो, वैसा ही आप हमारे साथ बर्ताव करें । हम तो सब प्रकार आपके सामने हार मान चुके हैं, क्योंकि हमने भारी - भारी अपराध किये हैं । चाहे तो आप, हमको अपने अपराधी सेवक जानकर, हमारे अवगुणों को माफ करिये और चाहे आप हमको पकड़कर मारिये, सजा दीजिये । हम तो सब प्रकार आपके सामने हताश हो रहे हैं ॥८१॥ 
(क्रमशः)

सोमवार, 1 सितंबर 2014

= विनती का अँग ३४ =(८०)

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
https://www.facebook.com/DADUVANI
*#श्रीदादूदयालवाणी०आत्मदर्शन*
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज
*विनती का अँग ३४* 
*मुझ भावै सो मैं किया, तुझ भावै सो नांहि ।*
*दादू गुनहगार है, मैं देख्या मन मांहि ॥८०॥*
टीका ~ हे दयालु ! जो हमारे मन को व्यावहारिक काम प्रिय लगे, वह ही हमारे मन ने काम किये हैं । आपको प्रिय लगने वाले कोई भी काम हमने नहीं किये, इसीलिये हम आपके गुनहगार अपराधी हैं । मैंने मन में भली प्रकार से विचार कर देख लिया है कि हम आपके दरबार के सदैव अपराधी बंदे हैं ॥८०॥ 
(क्रमशः)

रविवार, 31 अगस्त 2014

= विनती का अँग ३४ =(७९)

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
https://www.facebook.com/DADUVANI
*#श्रीदादूदयालवाणी०आत्मदर्शन*
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज
*विनती का अँग ३४* 
*करुणा*
*तुम को भावै और कुछ, हम कुछ किया और ।*
*मिहर करो तो छूटिये, नहीं तो नांहीं ठौर ॥७९॥*
टीका ~ हे परमेश्वर ! आपको तो सरलता, निश्छलता, निष्कपटता, प्रेमभाव, प्रेमाभक्ति इत्यादिक सद्गुणयुक्त भक्त प्रिय लगते हैं और हमने तो हे दयालु ! इनके विपरीत ही काम किए हैं । आप हमारे ऊपर दया करोगे, तभी हमारा जन्म - मरण आदि दुःखों से छुटकारा होगा, नहीं तो हमको कहीं भी ठिकाना नहीं हैं ॥७९॥
(क्रमशः)