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*#श्रीदादूदयालवाणी०आत्मदर्शन*
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज
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*अबिहड़ का अंग ३७*
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*अबिहड़ अंग बिहड़ै नहीं, अपलट पलट न जाइ ।*
*दादू अघट एक रस, सब में रह्या समाइ ॥१०॥*
टीका - हे जिज्ञासु ! वह चैतन्य ब्रह्मस्वरूप कूटस्थ, कभी पलटता नहीं है । और न उसमें आने - जाने रूप क्रिया ही है । और फिर ‘अघट’ कहिये वह बेसी कमती भाव को कभी प्राप्त नहीं होता । सबमें सूत्र आत्मारूप से समा रहा है, उसी में अपने मन को लगाइये ॥१०॥
हरि अबिहड़ अविनाशि है, सिरजे की प्रतिपाल ।
जगन्नाथ बिसरै नहीं, सुख दुख सब ही काल ॥
अपलट सो पलटै नहीं, अविहड़ बिहर न जाहिं ।
हरि हरिजन जगन्नाथ ये, उभै अडिग जग माहिं ॥
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*अन्त समय की साखी*
*जेते गुण व्यापैं जीव को, तेते तैं तजे रे मन ।*
*साहिब अपणे कारणैं,(भलो निबाह्यो प्रण) ॥११॥*
इति अबिहड़ का अंग सम्पूर्ण - ३७॥ साखी ११॥
टीका - ब्रह्मऋषि जगत्गुरु दादूदयाल जी महाराज कहते हैं कि हे मन ! जितने गुणों के विकार, विषय - वासना, अनात्म - अहंकार आदि तैंने अपने स्वस्वरूप ब्रह्म प्राप्ति के लिये त्यागे । यह तैंने अपना प्रण इस मनुष्य देह में बहुत अच्छा निभाया । अपनी प्रतिज्ञा पूरी करी तैंने, तुझे धन्यवाद है । यह साखी अन्त समय में, परम गुरुदेव महाराज ने उच्चारण की थी ॥११॥
इति अविहड़ का अंग टीका सहित सम्पूर्ण - ३७॥ साखी ११॥
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*"अनन्त विभूषित श्री ब्रह्मऋषि जगद्गुरु श्री दादूदयाल जी महाराज की अनुभव वाणी", पूवार्द्ध भाग की सजीवनी टीका दृष्टान्तों सहित रची -*
*द्वारा - महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी ।*
*इति - ॐ शान्ति ! शान्ति ! शान्ति !*



















